दर्द भरी शायरी

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jay
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Re: दर्द भरी शायरी

Postby jay » 23 Oct 2015 21:52

जब नहीं आए थे तुम तब भी तुम आए थे
आँख में नूर की और दिल में लहू की सूरत
याद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत

तुम नही आए अभी फ़िर भी तो तुम आए हो
रात के सीने में ताब के खंजर के तरह
सुबह के हाथ में खुर्शीद के सागर की तरह

तुम नही आओगे जब फ़िर भी तो तुम आओगे
जुल्फ दर जुल्फ बिखर जायेगा फ़िर रात का रंग
शब्-ऐ-तन्हाई में भी लुफ्त-ऐ-मुलाक़ात का रंग

आओ आने की करें बात के तुम आए हो
अब तुम आए हो तो में कोनसी शै नज़र करूँ
के मेरे पास सिवा मेहर-ओ-वफ़ा कुछ भी नही
एक दिल एक तमन्ना के सिवा के कुछ भी नहीं

एक दिल एक तमन्ना के सिवा के कुछ भी नहीं !!!

- अली सरदार जाफरी
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Re: दर्द भरी शायरी

Postby jay » 23 Oct 2015 21:53

ग़म का सितारा

मेरी वादी में वो इक दिन यूँ ही आ निकली थी
रंग और नूर का बहता हुआ धारा बन कर

महफ़िल-ए-शौक़ में इक धूम मचा दी उस ने
ख़ल्वत-ए-दिल में रही अन्जुमन-आरा बन कर

शोला-ए-इश्क़ सर-ए-अर्श को जब छूने लगा
उड गई वो मेरे सीने से शरारा बन कर

और अब मेरे तसव्वुर का उफ़क़ रोशन है
वो चमकती है जहाँ ग़म का सितारा बन कर
~अली सरदार जाफ़री
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Re: दर्द भरी शायरी

Postby jay » 23 Oct 2015 21:53

झलक

सिर्फ़ लहरा के रह गया आँचल
रंग बन कर बिखर गया कोई

गर्दिश-ए-ख़ूं रगों में तेज़ हुई
दिल को छू कर गुज़र गया कोई

फूल से खिल गये तसव्वुर में
दामन-ए-शौक़ भर गया कोई
~अली सरदार जाफ़री
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Re: दर्द भरी शायरी

Postby jay » 23 Oct 2015 21:56

जिस रात के ख़्वाब आये वोह ख़्वाबों की रात आई
शर्मा के झुकी नज़रें होटों पे वोह बात आई

पैगाम बहारों का आखिर मेरे नाम आया
फूलों ने दुआएँ दि तारों का सलाम आया
आप आये तो महफ़िल में नग़मों की बरात आई
जिस रात के ख़्वाब आये वोह ख़्वाबों की रात आई

यह महकी हुई जुल्फ़े यह बहकी हुई साँसे
नींदों को चुरा लेंगी यह नींद भरी आँखें
तक़दीर मेरी जागी जन्नत मेरे हाथ आई
जिस रात के ख़्वाब आये वोह ख़्वाबों की रात आई

चेहरे पे तब्बसुम ने एक नूर सा चमकाया
क्या काम चराग़ों का जब चाँद निकल आया
लो आज दुल्हन बन के पहलु में हयात आई
जिस रात के ख़्वाब आये वोह ख़्वाबों की रात आई

~अली सरदार जाफ़री
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Re: दर्द भरी शायरी

Postby jay » 23 Oct 2015 21:57

तुम्हारे एजाज़-ए-हुस्न की मेरे दिल पे लाखों इनायतें हैं
तुम्हारी ही देन, मेरे जौक-ए-नज़र की सारी लताफतें हैं

जवां है सूरज, जबीं पे जिसके, तुम्हारे माथे की रौशनी है
सहर हसीं है, के उसके रुख पे तुम्हारे रुख की सबाहतें हैं

मैं जिन बहारों की परवरिश कर रहा हूँ, ज़िन्दान-ए-ग़म में हमदम
किसी के गेसू-ओ-चश्म-ए-रुख्सार-ओ-लब की, रंगी हिकायतें हैं

न जाने छलकाए जाम कितने, न जाने कितने सुबू उछाले
मगर मेरी तिशनगी, कि अब भी तेरी नज़र से शिकायतें हैं

मैं अपनी आँखों में, सैल-ए-अश्क-ए-रवां नहीं, बिजलियाँ लिए हूँ
जो सर-बलंद और ग़यूर हैं, अहल-ए-ग़म! ये उनकी रवायतें हैं

~ सरदार जाफरी
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Re: दर्द भरी शायरी

Postby jay » 23 Oct 2015 21:58

ग़ज़ल (मैं और मेरी तन्हाई इन दिनों)
मैं और मेरी तन्हाई इन दिनों
बस बेज़ार से हो गए हैं

शहर की आवारा गलियों में
अपनों के मोहताज़ हो गए है

किधर जाये किससे पूछे रहगुज़र
राहे मंज़िल के तलबगार हो गए है

हर तरफ रुसवाई का मज़मा है
न जाने अपने कहाँ खो गए है

ज़ख्म पर दिल के अब दवा नहीं बाकी
हकिम सारे शहर के फना हो गए है

शहनाई जब जब बजी किसी महफ़िल में
जख्म दिल के "विकास" फिर जवां हो है

- गुमनाम विकास

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