कुमार विश्वास की कविताये

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shubhs
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Re: कुमार विश्वास की कविताये

Post by shubhs » 01 Jul 2016 18:54

ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
ढेर सी चमक-चहक चेहरे पे लटकाए हुए
हंसी को बेचकर बेमोल वक़्त के हाथों
शाम तक उन ही थक़ानो में लौटने के लिए
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?

ये इतने पाँव सड़क को सलाम करते हैं
हरारतों को अपनी बक़ाया नींद पिला
उसी उदास और पीली सी रौशनी में लिपट
रात तक उन ही मकानों में लौटने के लिए
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
शाम तक उन ही थकानांे में लौटने के लिए!

ये इतने लोग, कि जिनमे कभी मैं शामिल था
ये सारे लोग जो सिमटे तो शहर बनता है
शहर का दरिया क्यों सुबह से फूट पड़ता है
रात की सर्द चट्टानों में लौटने के लिए
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह?
शाम तक उन ही थकानों में लौटने के लिए!

ये इतने लोग क्या इनमें वो लोग शामिल हैं
जो कभी मेरी तरह प्यार जी गए होंगे?
या इनमें कोई नहीं जि़न्दा सिर्फ़ लाशें हैं
ये भी क्या जि़न्दगी का ज़हर पी गए होंगे?
ये सारे लोग निकलते हैं घर से, इन सबको
इतना मालूम है, जाना है, लौट आना है

ये सारे लोग भले लगते हों मशीनों से
मगर इन जि़न्दा मशीनों का इक ठिकाना है
मुझे तो इतना भी मालूम नहीं जाना है कहाँ?
मैंने पूछा नहीं था, तूने बताया था कहाँ?
ख़ुद में सिमटा हुआ, ठिठका सा खड़ा हूँ ऐसे
मुझपे हँसता है मेरा वक़्त, तेरे दोनों जहाँ

जो तेरे इश्क़ में सीखे हैं रतजगे मैंने
उन्हीं की गूँज पूरी रात आती रहती है
सुबह जब जगता है अम्बर तो रौशनी की परी
मेरी पलकों पे अंगारे बिछाती रहती है
मैं इस शहर में सबसे जुदा, तुझ से, ख़ुद से
सुबह और शाम को इकसार करता रहता हूँ

मौत की फ़ाहशा औरत से मिला कर आँखें
सुबह से जि़न्दगी पर वार करता रहता हूँ
मैं कितना ख़ुश था चमकती हुई दुनिया में मेरी
मगर तू छोड़ गया हाथ मेरा मेले में
इतनी भटकन है मेरी सोच के परिंदों में
मैं ख़ुद से मिलता नहीं भीड़ में, अकेले में

जब तलक जिस्म ये मिट्टी न हो फिर से, तब तक
मुझे तो कोई भी मंजि़ल नज़र नहीं आती
ये दिन और रात की साजि़श है, वगरना मेरी
कभी भी शब नहीं ढलती, सहर नहीं आती
तभी तो रोज़ यही सोचता रहता हूँ मैं
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह
सबका साथ सबका विकास।
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, और इसका सम्मान हमारा कर्तव्य है।

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Re: कुमार विश्वास की कविताये

Post by shubhs » 01 Jul 2016 18:54

बहुत देर से
सोकर जागी
दिशा-वधू मौसम के गाँव
अतः डरी
लज्जित-सी पहुँची
छूने दिवस-पिया के पाँव!

आँखों वाली
क्षितिज-रेख पर
काला-सूरज उदित हुआ
धरती का कर
निज दुहिता के
पाँव परस कर मुदित हुआ
कम्पित शब्द-गोट ने
सहसा चला
एक ध्वनिवाही दाँव!
बहुत देर से
सोकर जागी
दिशा-वधू मौसम के गाँव

मौन-शीत पसरा
घर-आँगन की
गतिविधियाँ सिमट गईं,
किरणों की दासियाँ
कुहासे के
अनुचा से लिपट गईं
दृष्टि अराजक हुई
छा गयी
नभ से आपदकाली छाँव!
बहुत देर से
सोकर जागी
दिशा-वधू मौसम के गाँव
सबका साथ सबका विकास।
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, और इसका सम्मान हमारा कर्तव्य है।

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Re: कुमार विश्वास की कविताये

Post by shubhs » 01 Jul 2016 18:55

मैं तो झोंका हूँ हवाओं का उड़ा ले जाऊँगा
जागती रहना, तुझे तुझसे चुरा ले जाऊँगा

हो के क़दमों पर निछावर फूल ने बुत से कहा
ख़ाक में मिल कर भी मैं ख़ुश्बू बचा ले जाऊँगा

कौन-सी शै तुझको पहुँचाएगी तेरे शहर तक
ये पता तो तब चलेगा जब पता ले जाऊँगा

क़ोशिशें मुझको मिटाने की मुबारक़ हों मगर
मिटते-मिटते भी मैं मिटने का मज़ा ले जाऊँगा

शोहरतें जिनकी वजह से दोस्त-दुश्मन हो गए
सब यहीं रह जाएंगी मैं साथ क्या ले जाऊँगा
सबका साथ सबका विकास।
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, और इसका सम्मान हमारा कर्तव्य है।

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Re: कुमार विश्वास की कविताये

Post by shubhs » 01 Jul 2016 18:55

मैं तुम्हें ढूंढने स्वर्ग के द्वार तक
रोज़ जाता रहा, रोज़ आता रहा
तुम ग़ज़ल बन गईं, गीत में ढल गईं
मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा

ज़िन्दगी के सभी रास्ते एक थे
सबकी मंज़िल तुम्हारे चयन तक रही
अप्रकाशित रहे पीर के उपनिषद्
मन की गोपन कथाएँ नयन तक रहीं
प्राण के पृष्ठ पर प्रीति की अल्पना
तुम मिटाती रहीं मैं बनाता रहा

एक ख़ामोश हलचल बनी ज़िन्दगी
गहरा ठहरा हुआ जल बनी ज़िन्दगी
तुम बिना जैसे महलों मे बीता हुआ
उर्मिला का कोई पल बनी ज़िन्दगी
दृष्टि आकाश में आस का इक दीया
तुम बुझाती रहीं, मैं जलाता रहा

तुम चली तो गईं, मन अकेला हुआ
सारी यादों का पुरज़ोर मेला हुआ
जब भी लौटीं नई ख़ुश्बुओं में सजीं
मन भी बेला हुआ, तन भी बेला हुआ
ख़ुद के आघात पर, व्यर्थ की बात पर
रूठतीं तुम रहीं मैं मनाता रहा
सबका साथ सबका विकास।
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, और इसका सम्मान हमारा कर्तव्य है।

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Re: कुमार विश्वास की कविताये

Post by shubhs » 01 Jul 2016 18:56

माँ
पालती है
पेड़ एक
लाड़ से
प्यार से
दुलार से।
माँ सुलाती है
लोरी गा
पिलाती है दूध
लुटाती है
तन मन प्राण
पेड़
होता बड़ा ज्यों-ज्यों
जड़ें
उसकी मजबूत
घुस जाती हैं
माँ में
हाथ पैर में
दिमाग में
और दिल में
चूसता है
ख़ून-पानी-माँस
महँगे आँसू
पेड़ पाता
विस्तार अद्भुत
देखता संसार
रूककर राह में
कितना बड़ा है पेड़
कितना लम्बा है पेड़
पेड़ बढ़ता
निस दिन
माँ से धँसी
जड़ों से
दूर होता
निस दिन!
सबका साथ सबका विकास।
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, और इसका सम्मान हमारा कर्तव्य है।

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