हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले

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Kamini
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हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले

Post by Kamini » 24 Mar 2017 16:55



सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं



ज़िन्दगी को भी सिला कहते हैं कहनेवाले
जीनेवाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं



फ़ासले उम्र के कुछ और बढा़ देती है
जाने क्यूँ लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं



चंद मासूम से पत्तों का लहू है "फ़ाकिर"
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं

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Kamini
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Re: हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले

Post by Kamini » 24 Mar 2017 16:56

हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले
अजनबी जैसे अजनबी से मिले



हर वफ़ा एक जुर्म हो गोया
दोस्त कुछ ऐसी बेरुख़ी से मिले



फूल ही फूल हम ने माँगे थे
दाग़ ही दाग़ ज़िन्दगी से मिले



जिस तरह आप हम से मिलते हैं
आदमी यूँ न आदमी से मिले

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Kamini
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Re: हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले

Post by Kamini » 24 Mar 2017 16:57

शैख़ जी थोड़ी सी पीकर आइये
मय है क्या शय फिर हमें बतलाइये



आप क्यों हैं सारी दुनिया से ख़फ़ा
आप भी दुश्मन मेरे बन जाइये



क्या है अच्छा क्या बुरा बंदा-नवाज़
आप समझें तो हमें समझाइये



जाने दिजे अक़्ल की बातें जनाब
दिल की सुनिये और पीते जाइये

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Kamini
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शायद मैं ज़िन्दगी की सहर लेके आ गया

Post by Kamini » 24 Mar 2017 16:58

शायद मैं ज़िन्दगी की सहर लेके आ गया
क़ातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया



ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया



नश्तर है मेरे हाथ में, कांधों पे मैक़दा
लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिगर लेके आ गया



"फ़ाकिर" सनमकदे में न आता मैं लौटकर
इक ज़ख़्म भर गया था इधर लेके आ गया

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ये शीशे ये सपने ये रिश्ते ये धागे

Post by Kamini » 24 Mar 2017 16:59

ये शीशे ये सपने ये रिश्ते ये धागे
किसे क्या ख़बर है कहाँ टूट जायें
मुहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के
न जाने ये किस मोड़ पर डूब जायें



अजब दिल की बस्ती अजब दिल की वादी
हर एक मोड़ मौसम नई ख़्वाहिशों का
लगाये हैं हम ने भी सपनों के पौधे
मगर क्या भरोसा यहाँ बारिशों का



मुरादों की मंज़िल के सपनों में खोये
मुहब्बत की राहों पे हम चल पड़े थे
ज़रा दूर चल के जब आँखें खुली तो
कड़ी धूप में हम अकेले खड़े थे



जिन्हें दिल से चाहा जिन्हें दिल से पूजा
नज़र आ रहे हैं वही अजनबी से
रवायत है शायद ये सदियों पुरानी
शिकायत नहीं है कोई ज़िन्दगी से

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