ज़िंदगी भी अजीब होती है Restart

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007
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Re: ज़िंदगी भी अजीब होती है Restart

Post by 007 » 29 Oct 2017 13:01

प्रीतम मेरी बाहों मे सिमटने लगी कुछ सर्द मौसम और कुछ दिल मे भावनाओं का ज्वर बेशक प्रीतम मेरी मंज़िल नही थी पर सफ़र मे हमसफर ज़रूर थी . मैने उसे सीने से चिपका लिया और अपनी आँखो को मूंद लिया.

प्रीतम- ये सुकून पहले क्यो ना मिला.

मैं- सच कहूँ तो सुकून पहले ही था. आज तो बस हम भाग रहे है दौड़ रहे है पता नही किसके पीछे और किसलिए. सब रूठ गया अब ना घर है ना परिवार बस मुसाफिर बनके रह गये है भटक रहे है अपने आप को तलाश करते हुए, जानती है इस नौकरी ने मुझे रुतबा तो दिया पर मैं इसे अपना नही पाया हूँ. चाहे मेरी ड्यूटी घने जंगलों मे रही या बर्फ़ीली वादियो मे, देश मे या बाहर बस इस नौकरी के बोझ को कंधो पर महसूस किया है मैने. दुनिया नौकरी के लिए तरसती है पर मैं वापिस अपनी बेफिक्री को जीना चाहता हूँ.

प्रीतम- मुमकिन नही अब, समय आगे बढ़ गया है तुमको भी आगे बढ़ना होगा.

मैं- जानती हो अनिता भाभी के बहुत अहसान है मुझ पर उन्होने बहुत किया मेरे लिए . बेशक हमारे बीच शारीरिक संबंध थे पर एक दोस्त से बढ़कर, मैं बता ही नही सकता कि वो क्या थी और क्या है मेरे लिए, पर तुम्हारी बात को ले लो, समय बदल गया है भाभी को समझना चाहिए इस बात को कुछ चीज़े अब पहले सी नही रही. और जो बाते उन्होने निशा के लिए बोली दिल मे तीर की तरह चुभ रही है.

प्रीतम- बुरा मत मानियो पर अनिता को अभी काबू कर ले वरना ये आग जो वो लगा रही है सारा कुनबा जलेगा इसमे. कल को जब निशा के आगे तुम्हारे इन संबंधो की बात आएगी तो चाहे वो कितना भी विश्वास करती हो तुम पर , उसका दिल तो टूट ही जाएगा ना तब तुम क्या करोगे याद रखना औरत की नज़र मे एक बार गिरे तो उठ नही पाओगे. तुम्हे सदा ही अपना माना है इसलिए कहती हूँ अनिता को समझा लो .

मैं- सोचा तो है भाभी से बात करके कोई रास्ता निकालूँगा.

प्रीतम- बेहतर रहेगा यार.

प्रीतम ने अपना हाथ मेरी जॅकेट मे डाल दिया और मेरे सीने को सहलाने लगी.

मैं- याद है कैसे तेरे जिस्म को चाशनी मे भिगो कर खाया करता था मैं .

प्रीतम- नादानियाँ थी वो सब, पर आज मीठी यादे है .

मैं- पर उस टाइम तू टॉप थी गाँव की, हर कोई बस तेरे आगे पीछे ही घूमता था .

प्रीतम- चढ़ती जवानी की नादानियाँ, आज सोचो तो हँसी आ जाती है. याद है एक बार मेरी माँ ने बस पकड़ ही लिया था अपने को.

मैं- काश पकड़ ही लेती तो ठीक रहता ना.

प्रीतम- अच्छा जी तब तो सिट्टी – पिटी गुम हो गयी थी.

मैं- तब आज जितना हौंसला कहाँ था .

प्रीतम- क्या फ़ायदा इस हौंसले का , अब हम नही है.

मैने अपनी छाती पर उसका रेंगता हाथ पकड़ लिया और थोड़ा सा और उसको अपने करीब कर लिया.

प्रीतम- निशा को भी ऐसे ही पकाते हो क्या तुम

मैं- ये तो निशा ही जाने, कभी कहती नही कुछ ऐसा वो.

प्रीतम- समझदार लड़की है मुझे खुशी है कोई तो मिला जो तुमको थाम सकेगा.

मैं- अभी तो तुम ही थाम लो ना मुझे.

प्रीतम- मैं तो हमेशा ही महकती हूँ तुम्हारे अंदर कही ना कही.

प्रीतम ने करवट ली और मेरे उपर आ गयी अगले ही पल मेरे होंठ उसके होंठो की क़ैद मे थे मैने बस उसकी पीठ पर अपनी बाहे कस दी और खुद को उसके हवाले कर दिया. उसका चूमना कुछ ऐसे था जैसे चूल्हेस की दहक्ति लौ. उसके किस करने मे कुछ तो बात थी मेरे हाथ उसकी मांसल गान्ड को सहलाने लगे थे और आवेश मे मैने उसकी पाजामी को नीचे सरका दिया.

मेरे अंदर महकती उसकी सांसो ने मुझे उत्तेजित करना शुरू कर दिया था.कुछ ही देर मे हम दोनो के कपड़े चारपाई के नीचे पड़े थे और हम दोनो के दूसरे के जिस्म को रगड़ते हुए किस करने मे खोए हुए थे. प्रीतम के बदन पर बढ़ती हुई उमर के साथ जो निखार आया था उसने उसको और भी मादक बना दिया था . प्रीतम का हाथ मेरे लंड को अपनी मुट्ठी मे भर चुका था जिसे वो अपनी चूत पर तेज तेज रगड़ रही थी. उसकी बेहद गीली चूत पर बस एक हल्के से धक्के की ज़रूरत थी और मेरा लंड सीधा उन गहरी वादियो मे खो जाता जिसकी गहराई को शायद ही कभी कोई नाप पाया हो.

भयंकर सर्दी के मौसम मे एक रज़ाई मे मचलते दो जवान जिस्म एक दूसरे मे समा जाने को बेताब हो रहे थे. और जैसे ही प्रीतम का इशारा मिला मैने अपने लंड पर ज़ोर लगा दिया प्रीतम की चूत ने अपने पुराने साथी का मुस्कुराते हुए स्वागत किया और मैं पूरी तरह से उ पर छा गया .

“आह, आराम से क्यो नही डालता तू हमेशा आडा टेढ़ा ही जाता है ” प्रीतम ने कहा.

मैं- ज़ोर लग ही जाता है जानेमन.

प्रीतम- ज़ोर लग ही गया है तो अब पूरा लगाना .

प्रीतम का यही बेबाकपन मुझे बहुत पसंद था उसके इन्ही लटको झटको पर तो मैं फिदा था पहले भी और आज भी उसके नखरे जानलेवा ही थे. उसने अपनी टाँगे उठा कर मेरे कंधो पर रख दी और मैं उसकी छाती को मसल्ते हुए उसकी चूत मारने लगा. खाट चरमराने लगी .

प्रीतम- ये भी जाएगी क्या.

मैं- पता नही पर आज तू खूब चुदेगि ये पक्का है .

प्रीतम- सच मे

मैं- देख लियो.

प्रीतम- चल दिखा फिर.

मैं- आज तू देख ही ले, आज जब तक तेरे पुर्ज़े ना हिला दूं उतरूँगा नही तेरे उपर से.

प्रीतम- कसम है तुझे अगर उतरा तो जब तक मैं ना चीखू, ना चिल्लाऊ उतरना नही.

मैं- नही उतरूँगा. आज पुरानी यादो को ताज़ा कर ही लेते है जानेमन .

प्रीतम ने अपनी टाँगे उतारी और अपने होंठो को किस के लिए खोल दिया.
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Re: ज़िंदगी भी अजीब होती है Restart

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Re: ज़िंदगी भी अजीब होती है Restart

Post by Kamini » 29 Oct 2017 18:05

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Re: ज़िंदगी भी अजीब होती है Restart

Post by 007 » 18 Nov 2017 18:40

अपनी जीभ से मेरी जीभ को गोल गोल रगड़ते हुए मेरी नस-नस मे मादकता भर रही थी वो और मैं सच कहता हूँ कि मैं बहुत खुशनसीब हूँ जो मुझे जीवन मे कुछ ऐसी लड़कियो-औरतो के साथ जीने का मौका मिला जो बेस्ट इन क्लास थी. चूत तो सबके पास होती है पर ज़िंदगी मे कुछ लोग बस ऐसे आपसे जुड़ जाते है कि बेशक उन रिश्तो का कोई नाम नही होता पर उनकी अहमियत बहुत होती है.

गहरी सर्दी मे भी हम दोनो की बदन से पसीना अब टपकने लगा था रज़ाई कब उतर गयी थी मालूम ही नही हुआ था. एक दूसरे के होंठो को शिद्दत से चूस्ते हुए होड़ सी मच गयी थी कि आज एक दूसरे को पछाड़के ही दम लेना है पर प्रीतम को हराना आसान कहाँ था, वो तो हमेशा से खिलाड़ी थी इस खेल की और ये बात ही उसे औरो से जुदा करती थी.कुछ देर बाद प्रीतम मेरे उपर आ गयी और ज़ोर ज़ोर से उछलने लगी.

उसकी मोटी मोटी चुचिया बहुत जोरो से हिल रही थी और चूत से टपकता पानी पच पच की आवाज़ कर रहा था.

“आज तुझे इतना थका दूँगी कि तू याद रखेगा”अपनी उखड़ी सांसो को समेट ते हुए वो बोली.

मैं- ना हो सकेगा बावली,फ़ौज़ी हूँ मारना मंजूर है पर थकुन्गा नही चाहे लाख कॉसिश कर ले.

प्रीतम- ऐसी की तैसी तेरी और तेरी फ़ौज़ की.

प्रीतम ने अपने दोनो हाथ मेरे कंधो पर रखे और एक तरह से मेरे उपर लेट गयी अब वो अपनी भारी गान्ड का पूरा ज़ोर लगा सकती थी और उसने बिल्कुल वैसा ही करते हुए अपने चुतड़ों को पटकना शुरू कर दिया , तो मैं जैसे पागल ही हो गया , चुदाई का मज़ा पल पल बढ़ता ही जा रहा था , उपर से जिस दीवानगी के साथ वो मुझे किस कर रही थी मुझे लगा कि छोरी पागल तो नही हो गयी.मैने उसे अपनी बाहों मे कस लिया और उसका साथ देने लगा, नीचे से मेरे धक्को ने भी रफ़्तार पकड़ ली तो चुदाई का मज़ा दुगना हो गया.

मेरे होंठो को इतनी बेदर्दी से अपने मूह मे भरा हुआ था उसने कि सांस लेना मुश्किल हो गया था उपर से उसके दाँत जैसे मेरे होंठ को आज चबा ही जाने वाले थे और जिस हिसाब से मुझे दर्द हो र्हा था लगता था कि होंठ कट गया होगा .पर अब उसका बोझ संभालना मुश्किल हो रहा था तो मैने उसे घोड़ी बना दिया और क्या बताऊ यार उसका पिछवाड़ा इतना मस्त था कि पूछो ही मत.शायद अब मुझे समझ आया था की आख़िर क्यो उसे हमेशा से अपने हट्टी-कट्टी होने का नाज़ क्यो था.मैने अपना टोपा धीरे से उसकी चूत मे सरकाया और फिर निकाल लिया, फिर सरकाया और फिर निकाल लिया ऐसा कयि बार किया.

प्रीतम- मनीष चीटिंग मत कर ऐसे ना तडपा अभी पूरा मज़ा आ रहा है तो ठीक से कर.

मैं- कितना अच्छा लगता है ना जब तेरी भोसड़ी मे लंड को ऐसे आते जाते देखता हूँ.

प्रीतम- ज़िंदगी का एक ये ही तो मज़ा है प्यारे, बाकी तो सब उलझने ही है.

प्रीतम ने अपने पिछले हिस्से को पूरी तरह से उपर उठा लिया जिसकी वजह से मुझे भी उँचा होना पड़ा पर चुदाई मे कोई कसर नही थी, एक के बाद एक वो झड़ती गयी, तरह तरह के पोज़ बदलते गये पर ना वो थक रही थी और ना मैं रुक रहा था.

“और और्र्र्र्र्र्र्र्र्र्ररर अओर्र्र्ररर ज़ोर्र्र्र्र्र्ररर सीईईईई आआहह आहह आहह” प्रीतम अब सब कुछ भूल कर ज़ोर ज़ोर से चीखने लगी थी पर किसे परवाह थी, किसे डर था.उसके गालो पर मेरे दाँत बारबार अपने निशान छोड़ रहे थे . अब ये चुदाई चुदाई ना होकर पागलपन की हद तक पहुच गयी थी.

“और ज़ोर से चोद और दम लगा बस एक बार और झड़ना चाहती हूँ एक बार और मंज़िल दिखा दे मुझे आआआआआआआआआआआआआआआआऐययईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई” प्रीतम बडबडाने लगी.

मैं उसकी भारी गान्ड को सहलाते हुए उसकी पीठ पर किस कर रहा था और वो पागल हुए जा रही थी.करीब पाँच-छे मिनिट और घसम घिसाई हुई और फिर उसने अपने अपने नाख़ून मेरी कलाईयों मे गाढ दिए इतना ज़्यादा मस्ता गयी थी वो इस बार जो वो झड़ी मुझे भी लगा कि बस पानी निकलने ही वाला हैं मैने उसके कान मे कहा कि चूत मे ही गिरा दूं क्या तो उसने मना किया और उठ कर तुरंत मेरे लंड को मूह मे भर लिया.

उसकी जीभ की गर्मी को मैं बर्दास्त नही कर पाया और अपनी मलाई से उसके मूह को भरने लगा जिसे बिना किसी शिकायत के उसने पी लिया.जैसे ही मेरा वीर्य निकला मेरे घुटने कांप गये और मैं बिस्तर पर पड़ गया.

प्रीतम- कहा था ना दम निकाल दूँगी.

मैं- हां,दम निकाल ही दिया तूने जानेमन.

उसने रज़ाई नीचे से उठाई और हम दोनो के उपर डाल ली.कुछ देर बस पड़े रहे ऐसे ही फिर मैं उठा कच्छा पहना और बाहर को चला .

प्रीतम- कहाँ जा रहा है.

मैं- पानी पीने.

प्रीतम- तुझे चोदने के बाद ही प्यास क्यो लगती है

मैं- हमेशा से ऐसा ही है पता नही क्यो.

मैने दरवाजा खोला और बाहर आया तो देखा कि खेली पर भाभी बैठी हुई है.मैने पहले तो पानी पिया .

मैं- भाभी आप कब आई.

भाभी- जब तुम उस कुतिया के साथ कचरा फैला रहे थे.

मैं-भाभी, आप कब्से ऐसे रिक्ट करने लगे.हो क्या गया है आपको आजकल प्रीतम कोई पराई है क्या और उसकी भी अहमियत है मेरे जीवन मे.

भाभी- हाँ जानती हूँ , मेरे अलावा सब किसी की अहमियत है तेरे पास. वो तो मैं ही पागल हूँ जो पता नही क्या क्या सोच लेती हूँ. सारा दोष मेरा ही हैं , मुझे क्या पड़ी है तुम चाहे किसी के पास भी मूह मारो. अब बड़े जो हो गये हो साहब हो गये हो.

मैं- क्या बोल रही हो भाभी, आपके लिए तो हमेशा ही आपका देवेर ही रहूँगा ना, पर अब चीज़े बदल भी तो गयी है ना टाइम देखो कितना बदल गया है .

भाभी- हाँ, तभी तो ….. खैर, मुझे क्या मुझे कुछ समान लेना है अंदर से फिर जा रही हूँ तुम्हे जो करना है करो.

भाभी उठी और अंदर कमरे मे गयी मैं पीछे पीछे आ गया. भाभी ने अंदर प्रीतम को देखा पर कुछ कहा नही. और वापिस जाने लगी तो मैने भाभी का हाथ पकड़ लिया.

भाभी- हाथ छोड़ मेरा.

मैं- रूको तो सही.

भाभी- मैने कहा ना हाथ छोड़.

मैं- आपका और प्रीतम का पंगा क्या है सुलझा लो ना.

प्रीतम- रहने दे ना मनीष, ये बड़े घर की बहू हम नाली के कीड़े इसका और मेरा कैसा साथ.

मैं- यार तुम दोनो ही मेरे लिए कितने इंपॉर्टेंट हो पता हैं ना फिर कम से कम मेरी खुशी के लिए ही मान जाओ.
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