मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन complete

दोस्तो इस फोरम में आप हिन्दी और रोमन (Roman ) स्क्रिप्ट में नॉवल टाइप की कहानियाँ पढ़ सकते हैं
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मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन complete

Postby rajaarkey » 05 Oct 2015 08:48

मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन

दोस्तो आपके लिए तुषार की एक और मस्त कहानी लेकर हाजिर हूँ दोस्तो वैसे तो मैं तुषार की 2 कहानियाँ चन्डीमल हलवाई..
छोटी सी जान चुतो का तूफान पहले ही पोस्ट कर चुका हूँ उम्मीद करता हूँ आपको ये कहानी भी पसंद आएगी
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Re: मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन

Postby rajaarkey » 05 Oct 2015 09:39

मेरा नाम समीर है….मैं अपने रूम मे चेर पर बैठा हुआ था…बाहर सहन में मेरी सौतेली बेहन नजीबा चारपाई पर बैठी अपनी किताब पर पढ़ रही थी….उस वक़्त मेरी उमर 17 साल थी…और मैं 12थ क्लास में पढ़ रहा था… नजीबा उस वक़्त 9थ क्लास मे थी….उस पर जवानी और हुश्न इस क़दर चढ़ा था कि, पूछो मत…एक दम गोरा रंग उसकी हाइट 5, 3 इंच थी….सामने ऑरेंज कलर के कमीज़ और वाइट कलर की सलवार पहने वो किसी अप्सरा से कम नही लग रही थी…मैं अपने रूम मे चेअर पर बैठा हुआ अपनी सौतेली बेहन के जिस्म को घूर रहा था…जी हां सौतेली बेहन….बात तब की है जब मैने होश संभालना शुरू किया था….तब मेरी जिंदगी मे बहुत खोफ़नाक हादसा पेश आया…. मेरी अम्मी की बाइक आक्सिडेंट मे मौत हो गयी….वक़्त के साथ -2 सब नॉर्मल होने लगा…

अब्बू सरकारी बॅंक मे जॉब करते थे…जो पास की ही सिटी मे था…मैं सुबह उनके साथ ही तैयार होकर स्कूल जाता….क्योंकि मेरा अड्मिशन अब्बू ने गाओं के सरकारी स्कूल मे ना करवा कर सिटी के प्राइवेट स्कूल मे करवाया था….स्कूल से छुट्टी के बाद मैं सीधा बॅंक ही चला जाया करता था….और उसके बाद शाम को अब्बू के साथ ही घर वापिस आता था….जिंदगी इसी तरह गुजर रही थी….वक़्त ऐसे गुज़रता रहा.. मैं 7थ क्लास मे हो चुका था…कई रिस्तेदार अब्बू को दूसरी शादी करने के लिए काफ़ी वक़्त से ज़ोर लगा रहे थी…लेकिन अब्बू का कहना था कि, जब तक मैं अपने आप को संभालने लायक नही हो जाता….वो दूसरी शादी के बारे मे सोचेंगे भी नही…

मैं थोड़ा बड़ा हो चुका था….अब मैं खुद अकेला स्कूल आने जाने लगा था…तो रिस्तेदारो के बार -2 कहने पर अब्बू ने दूसरी शादी करने का फैंसला कर लिया.. मैं स्कूल के बाद बॅंक ना जाकर अकेला घर आ जाया करता था….और खुद ही अकेला सुबह बस से स्कूल भी जाने लगा था….इससे अब्बू की सरदार्दी काफ़ी हद तक कम हो चुकी थी….क्योंकि पहले उन्हे भी मेरे साथ बॅंक के टाइम से पहले ही घर से निकलना पड़ता था…जब मैं 10थ स्टॅंडर्ड मे हुआ तो, अब्बू और उनके बॅंक मे ही काम करने वाली एक विडो औरत के बीच अफेर हो गया….रिस्तेदार भी अब्बू को दूसरे शादी करने के लिए बार बार कहते थी…इसलिए उन्होने नाज़िया नाम की उस विडो से शादी कर ली…नाज़िया मेरी सौतेली अम्मी बॅंक मे उँची पोस्ट पर थी…बला की खूबसूरत औरत थी….उस समय उसकी उम्र 30 साल थी…जब उसकी और अब्बू की शादी हुई थी….कई बार तो मुझे अब्बू की किस्मत से भी जलन होने लगती थी…

खैर अब स्टोरी पर आते है….मैं और नजीबा घर मे अकेले थे….हमारे घर मे पीछे की तरफ दो कमरे थे…..एक साइड मे किचन था….किचन और कमरे आगे से बरामदे से कवर थे….आगे खुला सहन था…और फिर आगे दो रूम और थे…जिसमे से एक ड्रॉयिंग रूम और दूसरा रूम नज़ीबा का था…गेट के दूसरी तरफ बाथरूम था….मैं अपनी हवस भरी नज़रों से नजीबा की तरफ देख रहा था…और नजीबा भी बीच -2 में सर उठा कर मेरी तरफ देखती…और जब हम दोनो के नज़रें आपस मे मिलती तो वो शरमा कर नज़रे झुका लेती….हालाँकि अब्बू की शादी को 2 साल हो चुके थे…और नजीबा और नाज़िया दोनो शादी के बाद यहाँ रहने आ गयी थी….लेकिन पहले ऐसा कुछ नही हुआ था….जो पिछले चन्द दिनो से हो रहा था…

नजीबा भी बहाने बहाने से मेरी तरफ देख कर स्माइल कर रही थी…उसकी नजरो मे बहुत कुछ छुपा हुआ था….लेकिन हमारा रिस्ता ऐसा था कि, मैं चाह कर भी आगे कदम नही बढ़ा सकता था..ऐसा नही था कि, उस समय मुझे समझ नही थी… समझ तो मुझे बहुत पहले आ चुकी थी…कि एक औरत और मर्द के बीच कैसा रिस्ता होता है..और मैं उसकी नजरो को कुछ हद तक समझ भी पा रहा था…लेकिन पिछले कुछ दिनो मैं ऐसा कुछ क्या हो गया था…जो नजीबा का मुझे देखने का नज़रया ही बदल गया था….ये मेरी समझ से बाहर था…वो मुझे पहले भाई कह कर बुलाती थी… लेकिन पिछले कुछ दिनो से मैने अपने लिए उसके मूह से भाई वर्ड नही सुना था…वो जब भी मुझसे कुछ पूछने आती तो, सिर्फ़ आप कह कर ही बात करती…

मसलन आप को खाना ला दूं….आप चाय पीएँगे…..ऐसे ही बात कर रही थी…. लेकिन ऐसा क्या अलग हो गया था…जिससे नजीबा का रैवया बदल गया था…मैं अपने ख्यालो मे खोया हुआ था क़ी, बाहर डोर बेल बजी….मैने देखा नजीबा ने अपनी बुक चारपाई पर रखी और जब वो चारपाई से उतरने लगी तो, वो मेरे रूम के साइड की तरफ उतरी…वैसे वो दूसरी तरफ से भी उतर स्काती थी…..चारपाई से उतरने के बाद उसने अपनी कमीज़ के पल्ले को नीचे से पकड़ कर अपनी कमीज़ को नीचे की तरफ खेंचा…जिससे उसके मम्मे उसकी तंग कमीज़ मे और सॉफ शेप मे नज़र आने लगे….वो ऐसे रिएक्ट कर रही थी….मानो उसका मेरी तरफ ध्यान ही ना हो…

फिर उसने अपना दुपट्टा चारपाई से उठाया और बाहर जाकर गेट खोला तो, मुझे बाहर से रीडा की आवाज़ आई….अब ये रीडा कॉन है….उसके बारे मे और उसके परिवार के बारे मे आप लोगो को बता दूं….बात अब्बू के दूसरी शादी से पहले की है….तब मैं स्कूल से घर आता और खाना खा कर अपनी गली के यारो दोस्तो के साथ सरकारी स्कूल के ग्राउंड मे क्रिकेट खेलने पहुच जाता..और जब अब्बू के आने का वक़्त होता तो उससे थोड़ा पहले ही घर पहुचता…जिसका असर मेरी पढ़ाई पर होने लगा था…..सेप्टेंबर में जब इंटर्नल एग्ज़ॅम हुए तो, मैं बुरी तरह फैल हो गया….वैसे तो मैं पढ़ाई मे शुरू से ही तेज था…लेकिन जब ये आज़ादी मिली थी….मैने अपनी किताबों को उठा कर नही देखा था….जब अब्बू ने मार्क्स शीट देखी तो अब्बू मुझसे सख़्त नाराज़ हुए, और गुस्सा भी किया….

अगले ही दिन जब मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहा था…..तो अब्बू ने मेरे लिए एक नया फरमान जारी कर दिया…कि आज से मैं स्कूल से वापिस आने के बाद सीधा अब्बू के दोस्त फ़ारूक़ के घर चला जाउ…दरअसल अब्बू और फ़ारूक़ करीबी दोस्त थे…फ़ारूक़ के घर मे उसके बीवी सुमेरा और फ़ारूक़ की बेटी रीदा रहती थी….रीदा की शादी को 3 साल हो चुके थे…उसके दो बच्चे थे…जो कि ट्विन्स थे….रीदा का हज़्बेंड गुल्फ मे जॉब करता था…तकरीबन एक साल पहले रीदा का हज़्बेंड फ़ारूक़ के बेटे को भी अपने साथ ले गया था…..रीदा की शादी जिस घर मे हुई थी….उनकी फॅमिली बहुत बड़ी थी…

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Re: मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन

Postby rajaarkey » 05 Oct 2015 09:40

रीदा के हज़्बेंड के 4 भाई और थे….इसलिए जब रीदा का भाई अपने जीजा के साथ अब्रॉड गया तो, रीदा यहाँ आ गयी….उसके ससुराल वालो ने भी कोई एतराज नही किया था…रीदा उस वक़्त हमारे गाओं मे सबसे ज़यादा एजुकेटेड थी….उसने इंग्लीश मे बॅचलर’स किया हुआ था….इसी वजह से अब्बू ने मुझे ये फरमान सुनाया था…मानो जैसे किसी ने मेरी आज़ादी मुझ से छीन ली थी….पर शायद अब्बू नही जानते थे कि, वो मुझे किस दलदल मे धकेल रहे है….ऐसा दलदल जिसने मेरे जेहन मे सभी रिश्ते नातो को ख़तम कर दिया…मैं इस दुनिया मे सिर्फ़ एक ही रिश्ते को सच मानने लगा था…और वो था मरद और औरत का रिश्ता….

सुमेरा फ़ारूक़ की दूसरी बीवी थी….उसकी पहली बीवी का इंतकाल हो चुका था…जब रीदा 6 साल की हुई थी….तो बड़ी मुश्किलो के बाद रीदा की अम्मी दूसरी बार प्रेग्नेंट हुई. लेकिन प्रेग्नेन्सी मे कुछ कॉंप्लिकेशन होने की वजह से ना तो रीदा की अम्मी बच सकी और ना ही बच्चा बच सका….रिस्तेदारो के बार -2 कहने और ज़ोर देने पर फ़ारूक़ ने अपनी ही साली सुमेरा से शादी कर ली…क्योंकि सुमेरा के घर वाले नही चाहते थे कि, उनकी बच्ची की आखरी निशानी को किसी तरह की मुश्किले पेश आए…मैं सुमेरा को चाची और फ़ारूक़ को चाचा कहता था…और रीदा को रीदा आपी कह कर बुलाता था….जब मैने स्कूल से आकर उनके घर जाना शुरू किया तो, तब सुमेरा चाची 35 साल की होगी..

उसकी हाइट 5 फुट 4 इंच के करीब थी…..सुमेरा की रंगत ऐसी थी जैसे किसी ने दूध मे केसर मिला दिया हो…..बिल्कुल गोरा रंग लाल सुर्ख गाल मम्मे तो ऐसे कि, मानो रब्बर की बॉल्स हो….हमेशा कसे हुए लगते थे….सुमेरा की जो चीज़ सबसे ज़्यादा कातिलाना थी….वो थी उसकी बाहर को निकली हुई गोल मटोल बुन्द…जब वो कभी घर से बाहर निकल कर दुकान तक जाती थी…तो देखने वाले के लंड पर बिजलियाँ गिर पड़ती थी…यही हाल रीदा का भी था….उसकी उमर उस समय करीब 22 साल के करीब थी….शादी और बच्चो के बाद उसका जिस्म भी सुमेरा की तरह भर चुका था.. 34 साइज़ के मम्मे और वैसे ही बाहर को निकली हुई उसके बड़ी बुन्द देख कर लोगो का बुरा हाल हो जाया करता था….और फ़ारूक़ चाचा उस वक़्त 48 से 50 के बीच के होगे…

जब मैने चाची सुमेरा के घर जाना शुरू किया तो, वहाँ मैं ऐसे दलदल मे फँसा कि फिर कभी बाहर निकल नही पाया…मेरे अंदर आज जो शैतान है…वो सुमेरा चाची और रीदा आपी की वजह से ही है….उस दोरान क्या हुआ कैसे हुआ…वो बाद मे आपके सामने आ जाएगा….फिलहाल तो रीदा आपी जिसे मैं अब सिर्फ़ रीदा कह कर बुलाता हूँ जब हम अकेले होते है…वो घर आ चुकी थी…..रीदा और नजीबा दोनो वही चारपाई पर बैठ गये….रीदा की नज़र जब मुझ पर पड़ी तो उसने इशारे से मुझे सलाम कहा…मैने भी जवाब मे इशारा किया…और साथ ही नोटीस किया कि, जब रीदा ने सलाम के बाद नजीबा की तरफ देखा तो, दोनो के होंटो पर अजीब सी मुस्कान थी… मुझे समझ मे नही आ रहा था कि, आख़िर हो क्या रहा है…जिस दिन से नजीबा के रंग ढंग बदले थे….उस दिन भी रीदा घर पर आई हुई थी…

अब्बू और मेरी सौतेली अम्मी शाम को 7 बजे से पहले घर नही आते थे…इसलिए मैं और नजीबा दोनो घर पर अकेले होते थे…वो दोनो चारपाई पर बैठी आपस मे बातें कर रही थी…बीच-2 मे कभी रीदा तो, कभी नजीबा मेरी तरफ देखती और फिर सर नीचे कर मुस्कुराने लगती…मुझे उन दोनो की बातें सुनाई नही दे रही थी…थोड़ी देर बाद नज़ीबा उठी और अपने रूम मे चली गयी….जब वो रूम से बाहर आई तो, उसने अपने कंधे पर टवल रखा हुआ था….”आपी आप बैठिए मैं अभी नहा कर आती हूँ….” ये कह कर नजीबा बाथरूम मे घुस गयी….

जैसे ही नजीबा बाथरूम मे घुसी तो, रीदा चारपाई से खड़ी हुई…उसने मुस्कराते हुए मेरी तरफ देखा….और फिर एक बार बाथरूम की तरफ देखा….और फिर वो रूम की तरफ आने लगी…उसे अंदर आता हुआ देख कर मैं भी चेअर से उठ कर खड़ा हो गया….वैसे रीदा मुझसे उम्र मे 6 साल बड़ी थी….मैने आगे बढ़ कर रीदा का हाथ पकड़ा और उसे डोर के साथ दीवार से लगा दिया….ताकि अगर रीदा बाहर आए तो उसकी नज़र सीधा हम दोनो पर ना पड़े…जैसे ही हम डोर के पीछे हुए, रीदा ने अपनी बाहों को मेरे गले मे डालते हुए अपने होंटो को मेरे होंटो की तरफ बढ़ा दिया…मैने भी एक पल जाया किए बिना रीदा के होंटो को अपने होंटो मे लेकर चूसना शुरू कर दिया…और अपनी बाजुओं को उसके कमर के गिर्द लप्पेट लिया…मैने रीदा के होंटो को चूस्ते हुए अपने हाथो को सरका कर जैसे ही उसके बाहर की तरफ निकली हुई बुन्द पर रख कर उसकी बुन्द को मसला तो, रीदा पागलो की तरफ मुझसे चिपक गयी….

उसने अपनी कमर को आगे की तरफ पुश किया तो, मेरा लंड उसकी सलवार के ऊपेर से उसकी फुददी पर जा लगा….मेरे सखत लंड को अपनी फुददी पर महसूस करके रीदा का पूरा जिस्म काँप गया…उसने अपनी आँखे खोल कर मेरी तरफ देखा…”समीर अब देर ना करो…तुम्हारा लंड भी तैयार है….और मेरी फुददी पानी छोड़ रही है….” ये कहते हुए रीदा ने अपनी सलवार का नाडा खोला और बेड के किनारे पर लेटते हुए, उसने अपनी सलवार को अपने घुटनो तक उतार दिया…फिर उसने अपनी टाँगो को घुटनो से मोड़ कर ऊपर उठा लिया….तब तक मैं भी अपनी हाफ पेंट उतार चुका था…मेरा लंड एक दम सख़्त खड़ा था…मैने अपने लंड को हाथ से पकड़ा और उसकी टाँगो के बीच आते हुए लंड के टोपे को जैसे ही उसकी फुददी के सुराख पर लगाया….तो रीदा ने अपनी आँखे बंद कर ली….”सीईईईई समीर जल्दी करें…प्लीज़ मुझसे सबर नही हो रहा….” मैने रीदा की बात सुनते ही एक जोरदार झटका मारा जिससे मेरा लंड एक ही बार मे पूरा का पूरा रीदा की फुददी के बीच मे समा गया…..

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Re: मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन

Postby rajaarkey » 05 Oct 2015 09:41

“हाईए……जान कद दिति…” रीदा ने बेड पर बिछी हुई बेडशीट को दोनो हाथो से कस्के पकड़ लिया….मैने बिना रुके तेज़ी से लंड को फुल स्पीड से अंदर बाहर करना शुरू कर दिया…उसकी कमीज़ मे उसके मम्मे मेरे झटके लगने के कारण ऊपेर नीचे झूल रहे थे…हम दोनो खामोशी से चुदाई कर रहे थे….ताकि हमारी आवाज़ कमरे से बाहर ना जाए…तकरीबन 6-7 मिनिट बाद रीदा का जिस्म अकड़ने लगा….उसने नीचे लेटे हुए अपनी गान्ड को ऊपेर की तरफ पुश करना शुरू कर दिया…और फिर एक दम से मचलते हुए उसकी फुददी ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया….और साथ ही मेरे लंड से भी पानी निकलने लगा…जैसे ही मैने अपना लंड रीदा की फुददी से बाहर निकाला तो, रीदा बेड से खड़ी हो गयी….उसने डोर से बाहर देखते हुए अपनी सलवार का नाडा बांधना शुरू कर दिया….”क्या बात है समीर…..आज कल तुम हमारी तरफ नही आ रहे…” रीदा ने सलवार का नाडा बाँधा और अपनी कमीज़ ठीक करते हुए बोली….”

मैं: ऐसे ही तबयत कुछ ठीक नही थी…..

रीदा: अच्छा मैं बाहर जाकर बैठती हूँ….नजीबा बाहर आने वाली होगी….

रीदा के बाहर जाने के बाद मैं सिर्फ़ अंडरवेर में ही बेड पर लेट गया….अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि, मुझे बाहर से रीदा और नजीबा दोनो की बातें करने की आवाज़ आने लगी…मैं ये तो नही सुन पा रहा था कि, वो आपस मे क्या बात कर रहे है…लेकिन पता नही क्यों मुझे ऐसा लग रहा था….जैसे रीदा और नजीबा मेरे बारे मे ही बात कर रही होंगी….जब दोनो के हँसने की आवाज़ आती तो, मेरे दिल मे बेचैनी से उठती कि मैं उनकी बातें किसी तरह सुनू…मैं बेड से उठा और डोर के पास जाकर खड़ा हो गया…लेकिन वहाँ से भी कुछ भी ठीक से सुन नही पा रहा था…मैने थोड़ा सा सर बाहर निकाल कर चोरी से देखा तो, दोनो एक दूसरे की तरफ फेस किए हुए बैठी थी… दोनो की साइड मेरी तरफ थी….

तभी मेरे नज़र किचन के डोर पर पड़ी…जो मेरे रूम के बिकुल साथ था….डोर खुला हुआ था…मुझे अपने रूम से निकल कर किचन के अंदर जाने मे चन्द सेकेंड्स का वक़्त ही चाहिए था….बस प्राब्लम ये थी कि, कही दोनो मे से कोई भी मुझे किचन के अंदर जाता हुआ ना देख ले…नही तो, दोनो मुझे किचन मे जाता देख बातें बंद कर देती…खैर मैने हॉंसला करके बाहर की तरफ कदम रखा…दोनो बातों मे मसरूफ़ थी…और मैं बड़ी फुर्ती से बिना आवाज़ किए किचन के अंदर चला गया….अंदर लाइट ऑफ थी…किचन मे बाहर गेट की तरफ एक विंडो थी.. जो खुली हुई थी…विंडो के आगे जाली लगी हुई थी….और किचन से सिर्फ़ 1 फुट के फाँसले पर दोनो चारपाई पर बैठी हुई थी….

मैं धीरे-2 बिना शोर किए विंडो के पास जाकर खड़ा हो गया…अब मुझे उन दोनो की बातें सॉफ सुनाई दे रही थी….लेकिन जो मैं सोच रहा था….दोनो उसके उलट बात कर रही थी…रीदा ने नजीबा से कहा सनडे के दिन सिटी मे जाकर शॉपिंग करने की बात कर रही थी…”आपी मैं आपको पक्का नही कह सकती….अम्मी को आने दै…मैं उनसे बात करके आप को बता दूँगी….अगर अम्मी अब्बू राज़ी हो गये तो, फिर आप के साथ ज़रूर चलूंगी….मुझे भी शॉपिंग करनी है….”

रीदा: अच्छा ठीक है अम्मी से पूछ कर बता देना…और अगर वो मना करे तो, तुम्हे जो चाहिए मुझे बता देना…मैं वहाँ से खरीद लाउन्गि….

नजीबा: जी आपी…..

मैं सोचने लगा कि, जो मैं दो दिनो से सोच रहा था….शायद वो मेरे मन का वेहम हो…..ये मुझे क्या होता जा रहा है…जो हर वक़्त मेरा दिमाग़ सिर्फ़ सेक्स के बारे मे सोचता रहता है…मुझे याद है….जब शादी के बाद नजीबा अपनी अम्मी के साथ यहाँ रहने आई थी तो, मैं इस बात से किस हद तक खफा था….मैं कैसे सारा दिन अपने जेहन में उसकी अम्मी और उसके लिए नफ़रत लिए घूमता रहता था…वो नजीबा ही थी….जिसने मेरे गुस्से और नफ़रत को सहन किया…उसकी हर एक के साथ घुलमिल जाने वाली ख़ासियत के कारण ही…मैं अपने आप को अपनी सौतेली बेहन और सोतेली माँ के साथ इस घर मैं अड्जस्ट कर पाया था….मैं अभी वहाँ से हट कर वापिस अपने रूम मे जाने ही वाला था कि, रीदा ने कुछ ऐसा कहा…जिसकी वजह से मैं वही रुक गया… “नजीबा….वैसे आज तूने जो तरीका अपनाया है वो है एक दम सेट…ऐसे ही अपनी आपी का ख़याल रखना…” फिर दोनो हँसने लगी…फिर मुझे नजीबा की सरगोशी से भरी आवाज़ आई….

नजीबा: आपी आप से एक बात पूछूँ….?

रीदा: हां पूछो….तुम मुझसे जो चाहे पूछ लिया करो….

नजीबा: आपी आपको भाई के साथ वो सब करते हुए अजीब नही लगता….

रीदा: क्या अजीब…मैं समझी नही खुल के बोल ना क्या पूछना चाहती है….

नजीबा: आपी मेरा मतलब भाई आपसे उमर मे बहुत कम है….और आप उनके साथ वो सब कुछ कर लेती है….तो आप को अजीब नही लगता उनके साथ….

नजीबा की बात सुन कर रीदा हसते हुए बोली…”अजीब क्यों लगेगा….देख इसमे उमर का क्या लेना देना…उसके पास वो गन्ना है जो एक औरत को चाहिए होता है..और मेरे पास रस निकालने वाली मशीन है…तो फिर अजीब क्यों लगेगा….” रीदा ने खिलखिला कर हंसते हुए कहा….”तोबा आपी आप भी ना कैसी -2 मिसाले देती है….”

रीदा: चल तुझे मेरी दी हुई मिसाल पसंद नही आती तो, आगे से सीधी बात किया करूँगी…दरअसल तेरे समीर भाई का लंड है ही इतना तगड़ा कि, जब फुददी मे जाता है तो उमर सुमर सब भूल जाती है…फिर तो दिल करता है…वो मेरी टांगे उठा कर अपना लंड मेरी फुददी के अंदर बाहर करता रहे…

नजीबा: छी खुदा का खोफ़ करे…कैसे गंदी बातें करती है आप….

रीदा: आए बड़ी खुदा का खोफ़ दिखाने वाली….चल आगे से ऐसी बात नही करती तुझसे…

रीदा चुप हो गये…थोड़ी देर दोनो खामोश रही….”आपी नाराज़ हो मुझसे…?” रीदा ने धीरे से कहा….”नही तो मैने क्यों नाराज़ होना….” रीदा ने नॉर्मल से टोन मे कहा….”तो फिर आप चुप क्यों हो गये….?”

रीदा: अब तुम ही कह रही थी कि, ऐसे बातें ना करें…

फिर थोड़ी देर के लिए खामोशी छाई रही…”आपी एक बात पूछूँ…” रीदा ने नजीबा की बात का कोई जवाब ना दिया…थोड़ी देर खामोशी के बाद रीदा बोली…”हां बोल क्या पूछना है….?”

नजीबा: आपी आप कह रही थी कि, भाई वो आपकी….(नजीबा शायद शरमा गयी थी… या फिर उसकी हिम्मत नही हो रही थी ऐसे अल्फ़ाज़ बोलने के लिए…)

रीदा: अब बोल भी….

नजीबा: आप कह रही थी कि, आपा का दिल करता है कि, भाई आपकी टांगे उठा कर करते रहें….लेकिन वो सब करने के लिए आपकी टांगे क्यों उठाएँगे….

रीदा: (नजीबा के बात सुन कर हंसते हुए…) हहहाः पागल है तू भी मेरे भोली नादान बच्ची…वैसे वो सब करते हुए ज़रूरी नही है कि, टांगे उठाई जाए…पर टांगे उठा कर फुददी देने मे मज़ा बहुत आता है….तू अभी ये सब नही समझेगी…लेकिन जब तेरी किसी से यारी लगेगी और तब तेरा यार तेरी टांगे उठा कर तेरी लेगा तो, तुझे मेरी बात का यकीन होगा….

नजीबा: क्या आपी आप भी…

रीदा: (हंसते हुए) हाहः सच कह रही हूँ….देखना वक़्त मेरी बात की गवाही देगा…और तब तू कहेगी कि रीदा आपी सच कहती थी…हाए तोबा मैं तो तुमसे यहाँ बातों मे ही उलझ गयी…बच्चो को अम्मी के पास छोड़ कर आई थी…अम्मी तो मेरी जान ही नही छोड़ेंगी अब…बहुत देर हो रही है अब मैं चलती हूँ….

रीदा चारपाई से उठी और गेट की तरफ जाने लगी….नजीबा भी गेट बंद करने के लिए उसके पीछे चली गयी….मोका अच्छा था…मैं किचन से बाहर निकला और अपने रूम मे आ गया…और बेड पर लेट गया…अब कुछ कुछ मेरी समझ मे आ रहा था कि, नजीबा के रवैये में जो बदलाव आया है…वो क्यों आया है….तो क्या नजीबा मेरे साथ वो सब नही नही….नजीबा मेरे बारे मे ऐसा क्यों सोचेगी…यही सब सोचते हुए मेरी आँख लग गयी..
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Postby rajaarkey » 06 Oct 2015 07:41


शाम के 5:30 बज चुके थे…तब मेरी आँख खुली….मेरे कमरे मे रोशनी कम थी… बाहर से हल्की रोशनी कमरे मे आ रही थी…मैने आँखे खोल कर देखा तो, नजीबा मुझे पुकार रही थी

…”हाँ बोलो क्या बात है…” मैने उसके चेहरे की ओर देखते हुए कहा…जो कि मुझे ठीक से दिखाई नही दे रहा था

…”मैं छाए बनाने जा रही थी….आप के लिए भी बना दूं…” नजीबा ने सर झुकाए खड़ी थी….

” हां बना ही लो…” नजीबा मेरी बात सुन कर बाहर जाने लगी तो, मैने दीवार पर लगी घड़ी की तरफ देखा…मुझे टाइम सही से दिखाई नही दे रहा था…शायद अभी अभी सो कर उठने की वजह से….”नजीबा….”

नजीबा: जी….

मैं: टाइम क्या हुआ…?

नजीबा: जी 5:30 हुए है…

मैं: ओके….

नजीबा बाहर चली गयी….पता नही क्यों पर मेरा मन उठाने का बिल्कुल भी नही कर रहा था…मैं वैसे ही बेड पर लेटा रहा….10 मिनट बाद नजीबा चाइ का कप लेकर अंदर आई….उसने टेबल पर कप रखा…”फिर से सो गये क्या……?” नजीबा ने धीरे से कहा…

“नही जाग रहा हूँ…”

नजीबा: आपकी तबीयत तो ठीक है ना….?

मैं: ह्म्म्मी ऐसे ही सर मे हल्का सा दर्द है….

नजीबा: टॅबलेट ले लो चाइ के साथ ठीक हो जाएगा…मे अभी टॅबलेट लेकर आती हूँ….

मैं: नही रहने दो…मुझसे टॅबलेट नही खाई जाती…

नजीबा अभी वही खड़ी थी…मैं बेड से उठा और उठ कर जैसे ही लाइट ऑन की तो, नजीबा जो कि मेरी तरफ देख रही थी…उसने अपने नज़रें झुका ली….तब मुझे अहसास हुआ कि, मैं सिर्फ़ अंडरवेर मे बेड पर लेटा हुआ था….मेरा लंड जो कि अंडर वेअर मे बड़ा सा तंबू बनाए हुए था…उसकी शेप सॉफ नज़र आ रही थी….मुझे जब अपनी ग़लती का अहसास हुआ तो, मैने जल्दी से टवल उठा कर अपनी कमर पर लपेट लिया…” सॉरी वो मे….” इससे पहले कि मे कुछ बोल पाता…

.नजीबा बोल पड़ी…. “इट्स ओके…”

मैं: नही नजीबा…..फिर भी मुझे इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि, तुम रूम मे हो….और मे किस हालात मे था….प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो….

नजीबा: इट्स ओके…आप बाहर तो नही थे ना….अपने ही रूम मे थे…आप अपने रूम मे जैसे चाहे रह सकते है….

मैं: फिर भी तुम्हारे सामने मुझे ऐसी हालत मे नही होना चाहिए था…तुम्हे बुरा लगा होगा….

नजीबा; (अभी भी सर झुकाए हुए खड़ी थी….उसके गाल लाल सेब की तरह सुर्ख होकर दहक रहे थे…उसके होंठो पर हल्की सी मुस्कान फैली हुई थी….) नही तो मुझे क्यों बुरा लगेगा…

मैं: (नजीबा अपने साथ इतना ओपन देख कर मेरी भी हिम्मत बढ़ने लगी थी… मैने भी अंधेरे मे निशाना लगाया…) अच्छा अगर तुम्हे बुरा नही लगा तो, फिर सर क्यों झुका लिया मुझे देख कर….

नजीबा ने एक बार सर उठा कर मेरी तरफ देखा और फिर नज़रें झुका ली….और बिना कुछ बोले जाने लगी….मे डोर के पास खड़ा था…जैसे ही वो मेरे पास से गुजरने लगी तो, मैने उसका हाथ पकड़ लिया….ये पहली दफ्फा था जब मैने नजीबा को छुआ था….इससे पहले मैने कभी नजीबा को टच तक नही किया था….और जब मैने उसका हाथ पकड़ा तो, उसका पूरा जिसम काँप गया…जिसे मैं सॉफ महसूस कर पा रहा था..लेकिन उसने मेरे हाथ से अपना हाथ छुड़वाने के कोसिश नही की….
उसने मेरी आँखो मे झाँका और लड़खड़ाती आवाज़ मे बोली….”जी…” उसने फिर से नज़रें झुका ली…

.”नजीबा मुझे तुमसे ज़रूरी बात कहानी है…” मैने अपने अंदर हिम्मत जुटाते हुए कहा….
”जी कहिए….”

मैं: जाओ पहले चाइ पी आओ….बाद मे बात करते है….
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Re: मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन

Postby rajaarkey » 06 Oct 2015 07:41


मैने नजीबा का हाथ छोड़ दिया…और अपनी टीशर्ट और हाफ पेंट उठा कर पहने लगा… नजीबा बाहर जा चुकी थी…मैने कपड़े पहने और चाइ पीने लगा….नवंबर का महीना शुरू हुआ था….हमारे गाओं के आसपास के इलाक़े मे बहुत सारी नहरे बहती थी…इसलिए सर्दी अभी से बढ़ चुकी थी…चाइ पीने के बाद मैने खाली कप उठाया और किचन मे चला गया…वहाँ खाली कप रख कर ऊपेर छत पर चला गया…और छत पर जहाँ से सहन नज़र आता है….वहाँ दीवार के पास खड़ा हो गया…थोड़ी देर बाद मुझे नजीबा अपने रूम से बाहर निकलती हुई दिखाई दी…जैसे ही वो बाहर आई तो, उसकी नज़र फॉरी तोर पर ऊपर पड़ी….और जब हमारी नज़रें मिली तो, मुझे याद आया कि, मैने नजीबा को बात करने के लिए कमरे मे बुलाया था…

मैं सोच रहा था कि, मैने नजीबा को बुला तो लिया था….लेकिन अब उससे बात किया करूँ…कैसे बात शुरू करूँ…क्या कहूँ….कैसे वर्ड्स यूज़ करूँ….कि उसे बुरा भी ना लगे…हो सकता है जो मे सोच रहा हूँ….ऐसा कुछ भी उसके जेहन मे हो ही ना…और वो सब मेरा वेहम हो…कही नजीबा मुझसे नाराज़ ना हो जाए…अब्बू तो इस मामले मे शुरू से बहुत जालिम रहे है…..वो तो मुझे कभी नही बख्शेन्गे. अगर नजीबा ने कुछ अब्बू या अपनी अम्मी को बोल दिया….मे मन ही मन सोच रहा था कि, देखता हूँ कि नजीबा मुझसे बात करने के लिए ऊपेर छत पर आती है… या नही…अगर वो छत पर खुद आ जाए तो, कम से कम 10 % चान्स तो बनते है कि, मे जो सोच रहा हूँ…वो ठीक है….लेकिन उससे बात क्या करूँगा….बहुत सोचने समझने के बाद मुझे आख़िर एक रास्ता मिल ही गया….

वो रास्ता भले ही लंबा था….लेकिन उस रास्ते पर सफ़र करके मुझे अपनी मंज़िल तक पहुचने मे मदद ज़रूर मिल सकती थी…अभी मे यही सब सोच रहा था कि, मुझे नजीबा नज़र आई….इससे पहले कि वो ऊपेर देखती….मैं पीछे हट गया… और चारपाई पर बैठ गया…हमारे घर की छत पड़ोस के घरो से कोई 3-4 फुट उँची थी…और चारो तरफ अब्बू ने 5-5 फुट उँची बौंड्री बनाई हुई थी…सिर्फ़ सहन की तरफ वाली बौंड्री 4 फुट की थी…क्यों कि हमारे घर के सामने खेत थे…इसलिए खेतों से किसी को भी हमारी छत नज़र नही आती थी…मे चारपाई पर बैठा हुआ नजीबा का धड़कते हुए दिल के साथ इंतजार कर रहा था….

उसके ऊपेर की तरफ आते हुए कदमो की आहट भी मे सॉफ सुन पा रहा था….और फिर जैसे ही वो ऊपेर आई तो, मे उसका हुश्न देख कर एक दम दंग रह गया.. नजीबा ने अपने बालों को खुला छोड़ा हुआ था…हालाँकि ऊपेर अब अंधेरा छाने लगा था….लेकिन फिर भी मे उसे सॉफ देख पा रहा था…वो अभी भी ऑरेंज कलर की कमीज़ और वाइट कलर की सलवार पहने हुए थी..वो मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी

…”आप को मुझसे कोई बात करनी थी…” उसने नज़रें झुकाते हुए कहा…

.” हां बैठो….” मैने चारपाई की तरफ इशारा करते हुए कहा….तो वो मेरे बिल्कुल पास मे बैठ गयी…वो भी मेरी तरह थोड़ा नर्वस फील कर रही थी…उसने अपने हाथो को अपनी थाइस (रानो ) के ऊपेर घुटनो के पास रखा हुआ था…और अपने हाथो की उंगलियों को आपस मे मसल रही थी….
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