कामलीला complete

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Kamini
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Re: कामलीला

Post by Kamini » 02 Sep 2017 18:05

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rangila
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Re: कामलीला

Post by rangila » 04 Sep 2017 13:03

नमकीन स्वाद बुरा नहीं था मगर दिमाग में भरी वर्जना ने उसे गले में स्वीकारने न दिया और मैंने उसे थूक दिया।
फिर शिश्नमुंड पर जीभ फिराते जैसे उसे साफ़ किया और साइड में थूकती रही।
फिर जब मन में तसल्ली हो गई कि अब वह साफ़ हो चुका है तो उसे होंठों का छल्ला बनाते मुंह में लिया और मुंह जितनी नीचे तक उतार सकती थी उतार लिया।
यहाँ तक कि वह गले में घुसने लगा और उबकाई सी महसूस हुई तो एकदम से बाहर निकाल कर हाँफने लगी।
एक बार फिर कोशिश की, फिर उबकाई महसूस होने पर उसे बाहर निकाल दिया। कुछ सेकेंड खुद को संभाल कर अगली कोशिश की।
थोड़ी देर में समझ में आ गया कि उसे गले में उतारने की ज़रुरत नहीं थी। जितना सहज रूप से मुंह में ले सकती थी उतना ही लेना था और ‘गप-गप’ करके ऐसे चूसना है जैसे बचपन में लॉलीपॉप चूसा करते थी।
थोड़ी देर की कोशिशों के बाद मुझे लिंग-चूषण आ गया और फिर मैं अपनी योनि में उठती तरंगों से ध्यान हटा कर उसके लिंग को चूसने लग गई।
अब फिर उसी नमकीन स्वाद का मुंह में अनुभव हुआ तो उसका कोई प्रतिकार न किया और सहजता से उसे गले में उतार गई।
उधर सोनू भी अपनी पूरी तन्मयता से योनि के चूषण और जीभ से भेदन में लगा हुआ था।
सच कहूँ तो उस वक़्त दिमाग में अनार से छूट रहे थे और नस-नस में ऐसी मादकता भरी ऐंठन हो रही थी कि उसे शब्दों में ब्यान नहीं कर सकती।
फिर उसने मेरे कूल्हों को थाम कर साइड में किया तो मेरी एकाग्रता भंग हुई।
वह मेरी तरफ विजयी नज़रों से देखता, मुस्कराता नीचे उतर कर खड़ा हो गया- दीदी, इधर आओ और इस तरह झुको जैसे ज़मीन पर घुटनों के बल बैठते हुए चारपाई के नीचे घुसते हैं न… बिल्कुल वैसे ही!
उसने आगे बढ़ कर मुझे थामते हुए कहा- जहाँ तक रंजना के बताये मुझे मालूम था कि वह ‘डॉगी स्टाइल’ की बात कर रहा था।
मैंने खुद को उसके हवाले कर दिया और उसने मुझे बिस्तर के किनारे खींच कर उसी अंदाज़ में झुका दिया।
अब मैं किसी बिल्ली की तरह खुद का चेहरा, सीना, दोनों हाथ बिस्तर से सटाये, घुटनों पर बल दिये झुकी बैठी थी और मेरा पिछले हिस्सा हवा में ऊपर उठा हुआ था।
मैं अपने पीछे नहीं देख सकती थी मगर कल्पना कर सकती थी कि इस तरह मेरी योनि और गुदा दोनों उसके सामने साफ़ नुमाया रहे होंगे और उन हिस्सों को इतने नज़दीक से और साफ साफ देख रहा होगा जिन्हें मैं भी आज तक नही देख पाई थी।
यह सोच कर मुझे इतनी शर्म आई कि मैंने आँखें बंद कर लीं।
वह थोड़ा झुक कर नीचे हुआ और मेरे नितंबों को दबाते हुए योनि पर जीभ इस तरह फेरने लगा जैसे कोई रसीली चीज़ मज़े ले लेकर चाट रहा हो।
मेरे खून में कुछ पलों के लिए ठंडी हुई चिंगारियाँ फिर उड़ने लगीं।
और जब उसने महसूस कर लिया होगा कि योनि अंदर तक उसकी लार और मेरे रस से भीग चुकी है और समागम के लिए पूरी तरह तैयार है तो उसने मेरे नितंबों को थोड़ा नीचे दबाते हुए अपने लिंग के हिसाब से एडजस्ट कर लिया।
फिर अपने लिंग को पकड़ कर उसे योनि के छेद से सटाया और आहिस्ता से अंदर धकेलने की कोशिश करने लगा।
अवरोध चिकनेपन के कारण बेहद कमज़ोर साबित हुआ और लिंग योनिमुख की संकुचित दीवारों को चीरता हुआ अंदर धंस गया।
दर्द ने एक बार फिर मेरी खैरियत पूछी लेकिन मैंने दांत पर दांत जमाये उसे झेलने में ही भलाई समझी।
उसने अंदर सरकाते हुए नितम्बों पर मज़बूत पकड़ बना रखी थी।
ऐसे में निकल तो सकती नहीं थी, अलबत्ता यह कर सकती थी कि खुद अपने एक हाथ को नीचे ले जाकर अपनी योनि को रगड़ने लगी थी।
भगांकुर पर उंगलियों का घर्षण उस दर्द से लड़ने में मददगार था जो इस घड़ी मेरे रोमांच के असर को कम कर रहा था।
जब सोनू पूरा लिंग घुसा चुका तो रुक कर नितंबों को मसलने लगा।
शायद लिंग को अपने हिसाब से जगह बनाने का पर्याप्त अवसर दे रहा था। साथ ही थोड़ा झुक कर एक हाथ मेरे वक्षों की तरफ ले आया और उन्हें मसलने लगा।
‘करो।’ थोड़ी देर बाद खुद मेरे मुंह से निकला।
वह इशारा मिलते ही सीधा हो गया और दोनों हाथों से मज़बूती से नितंबों को थाम कर अपने लिंग को आगे पीछे करने लगा।
हर बार उसकी चोट मैं अपनी बच्चेदानी पर महसूस करती और कराह उठती।
‘पूरा मत घुसाओ… मुझे गड़ रहा है।’ अंततः मैंने उसे रोकते हुए कहा।
उसने नितम्ब थपथपा कर सहमति जताई और लिंग को पूरा अंदर करने के बजाय तीन चौथाई लिंग को ही अंदर-बाहर करते सम्भोग करने लगा।
मुझे उससे कहीं ज्यादा मज़ा आया जितना पहले आ रहा था और मैं खुद भी अपने चूतड़ों को आगे-पीछे करते उसे सहयोग देने लगी जिससे उसमें और अधिक उत्साह का संचार हुआ।
फिर कमरे में उसकी भारी सांसों के साथ, मेरी सीत्कारें मिल कर संगीत पैदा करने लगीं और सम्भोग से जो लगातार ‘थप-थप’ की ध्वनि उच्चारित हो रही थी वह हम दोनों के कानों में रस घोल रही थी।
चूंकि काफी देर की चूसा चाटी के कारण हमारी उत्तेजना वैसे भी उफान पर थी तो बहुत ज्यादा देर तक ये धक्कों का सिलसिला चल न सका।
वैसे भी नये लोगों में अधीरता ज्यादा होती है जो चरमोत्कर्ष पर जल्दी ले आती है।
जल्दी ही मैं स्खलन के अकूत आनन्द का अनुभव करते हुए अकड़ गई और ज़ोर की ‘आह’ के साथ बिस्तर ही नोच डाला और उन पलों में योनि भी ऐसी कस गई जैसे उसके लिंग का गला ही घोंट देगी।
और इस कसावट ने उसे भी स्खलन की मंज़िल पर पहुंचा दिया।
वह वैसे ही गर्म धातु की फुहार छोड़ता आखरी बूंद तक धक्के लगाता रहा और पूरी गहराई में अपना लिंग घुसाता मुझे बिस्तर पर रगड़ते हुए खुद मेरे ऊपर ही लद गया।
जब शरीर की अकडन ख़त्म हुई तो मुझसे अलग होकर बिस्तर पर ऐसे फैल गया जैसे बेसुध ही हो गया हो… कुछ ऐसी ही हालत मेरी भी थी।
कुछ देर बाद जब रंजना अंदर आई तब हमारा ध्यान भंग हुआ। वह दो गिलास दूध लिये थी जो उसने हम दोनों को ही पिलाया।
फिर सोनू को अपनी सफाई की ताकीद करके मेरी सफाई की और उस दिन यह सिलसिला वहीं ख़त्म हुआ।
यह बात पिछले साल की है दी, तब से अब तक हमें जितने भी मौके मिले हैं हमने सेक्स का भरपूर आनन्द उठाया है, उसके फोन से ही सेक्स के बारे में जितना जान सकती थी, जाना है।
और जितने आसान उपयोग में लाये जा सकते हैं, उन सबका प्रयोग किया है।
रंजना खुद से अपने सगे भाई के साथ यौन-आनन्द नहीं ले सकती थी लेकिन वह हमेशा हमें सेक्स करते देखती है और खुद अपने हाथों से उन पलों में हस्तमैथुन करती है।
हाँ कभी-कभी अवि भैया जब लखनऊ आये हैं तो उसने भी सेक्स की ज़रूरत को पूरा किया है।
सोनू को यह बात मैंने बता दी थी और अपनी बहन की हालत समझते हुए उसने भी इसे स्वीकार कर लिया था।
जब भी कभी अवि भैया आते हैं, वह खुद से कोशिश करके दोनों को ऐसे मौके उपलब्ध करा देता है कि वह अकेलेपन का मज़ा ले सकें।
सुनने में कितना अजीब और गन्दा लगता है न दी कि मैं अपने से सात साल छोटे भाई जैसे लड़के से सेक्स करती हूँ, रंजना अपने सगे भाई को सेक्स करते देखती है और उससे खुद भी डिस्चार्ज होने का रास्ता निकालती है और अपने मौसेरे शादीशुदा भाई से अवैध सम्बन्ध बनाये हुए है।
कोई समाज का ठेकेदार सुन लेगा तो हमें फांसी की सजा दे देगा लेकिन क्या कोई इस सवाल का जवाब भी देगा कि हम करें तो क्या?
ज़ाहिर है कि इतनी देर से ख़ामोशी के साथ उसकी रूदाद सुनती शीला के पास भी क्या जवाब था।
चाचा के लिंग से उठते वक़्त भी उसकी उत्तेजना अधूरी रह गई थी और अब जब तमाम वर्जनाओं को दरकिनार करते रानो की दास्तान ने उसमें लगी आग और भड़का दी थी, जिसके अंत के बगैर उसमें चैन नहीं पड़ने वाला था।
‘क्या हुआ दी… चुप क्यों हो?’ उसे खामोश देख कर रानों ने उसे टोका।
‘इतना सीख गई और यह न सीख सकी कि ऐसी दास्तान सुन कर इंसान की हालत क्या होगी। क्या स्खलन के बगैर मैं चैन पा सकती हूँ? क्या मैं अभी कुछ सोच-समझ सकती हूँ?’
हाँ, उसने ध्यान भले न दिया हो मगर समझ सकती थी, उसने खुद से शीला की नाइटी को खींचते हुए ऊपर कर दिया।
शीला ने खुद से नितम्ब, कमर ऊपर करते उसे नाइटी खींचने में मदद की थी।

रानो उसके वक्ष उभारों पर आहिस्ता आहिस्ता हाथ फेरने लगी। आज से पहले ऐसी हिम्मत न कभी रानो की हुई थी और न ही शीला कभी ऐसा करने की इज़ाज़त देती, लेकिन आज बात दूसरी थी।
आज उन्होंने शारीरिक इच्छाओं के आगे समर्पण कर दिया था और हर वर्जना को तोड़ने की ठान ली थी तो अब क्या रोकना… अब तो हर चीज़ स्वीकार थी।
आज रानो का उसके वक्ष पे फिरता हाथ उसे भला लग रहा था और उसे खुद से उसने धकेल कर नीचे कर दिया था और अपने ही हाथों से अपने वक्ष का मर्दन करने लगी थी।
रानो ने हाथ नीचे करते उसके भगांकुर तक पहुंचा दिया था और उसकी योनि से ही रस लेकर उससे उंगलियाँ गीली करके उसे रगड़ने लगी थी।
शीला के मुख से कामुक सी सीत्कारें जारी होने लगी थीं।
यहाँ तक कि थोड़ी देर शीला के भगांकुर को रगड़ने के बाद उसने बीच वाली उंगली उसके छेद के अंदर सरका दी थी और शीला ‘उफ़ आह’ करके अकड़ गई थी।
‘दीदी, तुम्हारी झिल्ली अभी बाकी है क्या?’ उसने उंगली अंदर-बाहर करते पूछा।
‘न नहीं… बचपन में… एक… बार साइकिल… चलाते… में फट… गई थी।’ शीला ने अटकते-अटकते जवाब दिया।
रानो ने अब उंगली और गहराई में धंसा दी और अंदर-बाहर करने लगी।
शीला का पारा चढ़ने लगा, जल्दी ही स्खलन की घड़ी आ गई और मुंह से तेज़ सिसकारियाँ निकालते शीला कमान की तरह अकड़ गई और झटके लेने लगी।
फिर एकदम ढीली पड़ गई और बेसुध सी हो गई।
‘दी…’ थोड़ी देर बाद रानो ने उसे पुकारा।
‘ह्म्म्म?’ शीला ने जवाब देते हुए आँखें खोली और ठीक से ऊपर चढ़ के लेट गई।
‘देखो, अगर वर्जनाओं को लात मारनी ही है तो हमारे लिए बेहतर यही है कि हम घर में मौजूद चाचा के लिंग का उपयोग करें।
लेकिन चूंकि चाचा का लिंग ही समस्या है जिससे पार पाने के लिये हमें अपनी योनियाँ इस हद तक ढीली करनी पड़ेंगी कि समागम संभव हो सके।
और योनि ढीली करना कोई दो चार बार उंगली करने से तो हो नहीं जाएगा। इसके लिए बाकायदा हमें सम्भोग करना पड़ेगा। जैसे मैंने किया है, आज मैं तो इस हाल में पहुंच गई हूँ कि कोशिश करूं तो चाचा के साथ सहवास बना सकती हूँ।
लेकिन बात तुम्हारी है, मान लो जैसे तैसे करके घुसा ही लो तो घुसाना ही तो सब कुछ नहीं है, चाचा कोई समझदार इंसान तो है नहीं कि उसे पता हो कि कैसे करना है, कितना करना है।
वह ठहरा बेदिमाग जानवर सा… क्या भरोसा एकदम जोश में आकर सांड की तरह जुट जाये। तो समझो कि फाड़ के ही रख देगा।’
‘यह ख्याल तो मुझे भी आया था कि अगर कहीं चाचा घुसाने और करने के लिए बिगड़ गया तो संभालूंगी कैसे? ये तो ऐसा मसला है कि किसी को बुला भी नहीं सकती थी।’
‘हाँ वही तो… इसीलिये चाचा के लिंग के बारे में तब सोचना जब उसे संभाल पाने की क्षमता आ जाये। फ़िलहाल किसी ऐसे इंसान के बारे में सोचो जो तुम्हारे साथ ऐसा रिश्ता भी बना सके और हमेशा के लिए सर पे भी न सवार हो।’
‘ऐसा इंसान?’ वह सोच में पड़ गई।
‘अवि भैया जैसा जिसकी अपनी मज़बूरी हो कि खुद से कभी न सवार हो या सोनू जैसा जो तुम्हारी ज़रूरत भी पूरी कर दे और फेविकोल भी न बने।’
एक-एक कर उसके दिमाग में वह सारे चेहरे घूम गये जिनके साथ उसका उठना-बैठना था, बोलना था, मिलना-जुलना था लेकिन उन तमाम चेहरों में उसे एक भी चेहरा ऐसा न दिखा जिसपे वह भरोसा कर सके।
‘नहीं।’ उसने नकारात्मक अंदाज़ में सर हिलाते कहा- जो हैं, उनमें मुझे भोगने की लालसा रखने वाले तो कई हैं लेकिन ऐसा एक भी नहीं जिस पे मैं भरोसा कर सकूँ।’
‘फिर… घर के अंदर ही जैसे रंजना को अवि भैया उपलब्ध हैं या मुझे सोनू उपलब्ध है, ऐसा भी तो कोई नहीं… जो हमारी मुश्किल हल कर सके?’
दोनों सोच में पड़ गईं।
थोड़ी देर बाद रानो उसे अजीब अंदाज़ में देखती हुई बोली- दी, अगर तू कहे तो सोनू से बात करूं?
‘क्या!’ शीला एकदम चौंक कर उसे देखने लगी- पागल तो नहीं हो गई रानो? सोच भी ऐसा कैसे लिया तूने? मैं और सोनू… छी!’
‘दी… अब यह तुम्हारे खून में दौड़े संस्कार बोले। ज़रा बताना तो यह छी कैसे हुआ?’
‘नहीं रानो, यह नहीं हो सकता। कहाँ सोनू और कहाँ मैं? मैं भला कैसे… अरे बच्चा है वह। जब पैदा हुआ तो मैं बारह साल की थी। अक्सर मैं संभालती थी उसे जब चाची को ज़रूरत होती थी।’
‘गोद तो मैंने भी खिलाया था न उसे, मुझे भी दीदी ही कहता था, आज भी कहता है पर हमारे बीच यह रिश्ता संभव हुआ न! तो तुम्हारे साथ कौन सी ऐसी वर्जना है जो तोड़ी नहीं जा सकती।’
वह चुप रह गई।
‘सोच के देख दी, क्या बुराई है इसमें? मर्द ही है वह भी, जैसे चाचा मर्द है… हमें एक मर्द ही तो चाहिये जो हमारी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा कर सके। चाचा भी तो रिश्ते में है न? तो जब उसके साथ सम्भव है तो सोनू के साथ क्यों नहीं?’
सवाल पेचीदा था।
उसके अंदर मौजूद नैतिकता के बचे खुचे वायरस उसे कचोट रहे थे, उन वर्जनाओं की याद दिल रहे थे जिन्हें उसने बचपन से ढोया था, लेकिन अब उसमें एक बग़ावती शीला भी मौजूद थी।
जो उन वर्जनाओं से पलट कर सवाल पूछ सकती थी कि उन्होंने उसके लिए क्या सम्भावना छोड़ी है। वह जिधर भी जायेगी होगा तो सब अनैतिक ही न। तो जो चाचा के साथ हो सकता है वह सोनू के साथ क्यों नहीं?

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Re: कामलीला

Post by rangila » 04 Sep 2017 13:04

थोड़ी देर लगी उसे समझने में कि वह चूज़ करने का हक़ नहीं रखती और उसके लिए जो भी है शायद आखिरी विकल्प ही है। या अपनाओ या इस सिलसिले को भूल जाओ।
‘मगर सोनू… भला मैं उसके साथ कैसे…?’ फिर भी उसने आखिरी बार प्रतिरोध किया।
‘तो क्या सोचती हो दीदी, तुम्हारे लिए कोई सपनों का राजकुमार आएगा?’ रानो झुंझलाहट में कह तो गई मगर फ़ौरन ही अहसास भी हो गया कि उसने गलत कह दिया।
बात चुभने वाली थी, चुभी भी और चोट दिल पे लगी।
अपनी स्थिति पे उसकी आँखें छलक आईं।
वह गर्दन मोड़ कर शिकायत भरी नज़रों से रानो को देखने लगी।
‘सॉरी दी, मेरा मतलब तुम्हें चोट पहुँचाने से नहीं था बल्कि यह कहने से था कि क्या हमारे पास चुनने के लिए विकल्प हैं?’
‘सोनू तैयार होगा भला इसके लिये?’
‘हह…’ रानो एकदम से हंस पड़ी- दीदी, फितरतन आदमी जानवर होता है, जहाँ भी उसे एक अदद योनि का जुगाड़ दिखता है, वह घोड़े की तरह उस पर चढ़ दौड़ने के लिए तैयार हो जाता है। रिश्ते भला क्या मायने रखते हैं।’
वह असमंजस से उसे देखने लगी।
‘वह मन से कितना भी अच्छा हो, मगर है तो मर्द ही और भले तुम्हें हमेशा बड़ी दीदी की जगह रखा हो… मगर जब तुम पर चढ़ने का मौका मिलेगा तो इंकार नहीं करेगा। मैं कल बात करूंगी उससे, अब सो जाओ।’
कह कर वह चुप हो गई।
शीला के दिमाग में विचारों का झंझावात चल रहा था।
आज एक नई सम्भावना पैदा हुई थी जो भले वर्जित थी मगर उसकी आकांक्षाओं को पूरा कर सकती थी।
वह काफी देर तक इन्हीं संभावनाओं को टटोलती रही, फिर आखिरकार नींद ने उसे आ घेरा।
सुबह नया दिन उसके लिए नई उम्मीदें लाया था।
वह दिन भर रोज़ के के काम निपटाते खुद को मन से इस वर्जित समागम के लिये तैयार करती रही। उसे यह ठीक नहीं लग रहा था मगर यह भी सच था कि उसके पास चुनने के लिये विकल्प नहीं था।
जैसे तैसे करके दिन गुज़रा… रात को चाचा के परेशान करने की सम्भावना इसलिये नहीं थी क्योंकि कल ही उसका वीर्यपात कराया गया था।
वह जानने के लिये बेताब थी कि रानो की सोनू से क्या बात हुई होगी… कई तरह की संभावनाओं के चलते उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था।
रात के खाने के बाद उसके सिवा बाकी तीनों ऊपर अपने कमरों में चले गये और रात के ग्यारह बजे रानो अपना तकिया कम्बल लिए उसके पास आई।
‘मैंने आकृति को समझा दिया है कि चाचा अब ज्यादा परेशान करता है और दीदी अकेले नहीं संभाल पाती इसलिये मैं अब से दीदी के साथ नीचे ही सोऊँगी।’ रानो ने दरवाज़ा बंद करते हुए कहा।
‘सोनू से क्या बात हुई।’ शीला के लिये जिज्ञासा को बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था।
‘बताती हूँ दी… सांस तो लेने दो।’ वह बिस्तर पर अपना ठिकाना बनाते हुए बोली, फिर खुद भी लेट गई और उसे भी लेटने का इशारा किया।
अजीब उधेड़बुन में फसी शीला उसके बगल में आ लेटी और उसे देखने लगी।
‘पहले मैंने रंजना से बात की थी… उसे बताना ज़रूरी था मेरे लिये। और जैसी मुझे उम्मीद थी कि सुन कर उसने राहत की सांस ली थी कि इतनी देर से सही पर दीदी की समझ में यह बात तो आई।
फिर उसके सामने ही सोनू से बात की थी, इस अंदाज़ में नहीं कि तुम सेक्स के लिये मरी जा रही हो और तुम चाहती हो कि वह तुम्हें फ़क करे आ के।
बल्कि उसे तुम्हारी मज़बूरी, तुम्हारी तड़प और बेबसी का हवाला दिया था और यह जताया था कि हम दोनों, मतलब मैं और रंजना यह चाहते हैं कि वह इस मामले में हमारी मदद करे!
मदद ज़ाहिर है कि तुम्हारी शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करने की थी, उसे यकीन नहीं कि तुम इसके लिये कभी तैयार होगी।
आखिर हम सबने तुम्हारे चरित्र को देखा है जाना है, कैसे सोच ले कोई कि तुम टूट गई।
मैंने उसे यकीन दिलाया कि मैं इसके लिये तुम्हें तैयार करूंगी… चाहे कैसे भी करके, बस सवाल यह है कि क्या वह इसके लिये तैयार है।
उसमें वही हिचक थी कि भला कैसा लगेगा बड़ी दीदी के साथ सम्भोग करना।
लेकिन मैं भी तो बड़ी दीदी ही थी उसके लिये। मेरे पीछे तो खुद पागल था लेकिन अब खुद की ज़रूरत पूरी होने लगी थी तो संस्कारी हिचक सामने आने लगी थी।
लेकिन फिर दिमाग ने इस सिरे से सोचना शुरू किया कि बड़ी दीदी कुंवारी हैं और अब उसे फिर एक कुंवारी योनि भोगने को मिलेगी तो आखिरकार तैयार हो गया और एक बार दिमाग ने स्वीकार कर लिया…
तो अब यह जानो कि उसे किसी चीज़ की फ़िक्र न रही होगी बल्कि दिमाग में नई योनि की कल्पनाएँ उसे और उकसा रही होंगी।’
‘भला रंजना क्या सोचती होगी… कि हम उसके भाई का इस्तेमाल कर रहे हैं।’
‘अच्छा… और वह हमें नहीं इस्तेमाल कर रहा। ताली क्या एक हाथ से बज रही है… किसने रास्ता दिखाया मुझे? तुम कुछ ज्यादा सोच रही हो दी… वह ऐसी बात सोच भी नहीं सकती।’
शीला सोच में पड़ गई।
‘फिर… कब होगा यह?’
‘आज रात ही… अभी दस पंद्रह मिनट में आएगा। हम चुपके से उसे अंदर ले लेंगे और एक घंटे बाद चला जाएगा।’
‘क्या— अभी! यहाँ!’ वह चौंक कर उठ बैठी और झुरझुरी लेती हुई बोली- नहीं, किसी को पता चल गया तो क्या सोचेगा?’
‘किसी को क्या पता चलेगा, हमारा घर जिस गली में है उसमें अंधेरा ही रहता है और कौन आता है कौन जाता है क्या पता चलता है और किसी ने देख भी लिया तो वह कौन सा अजनबी है, देखने वाला यही सोचेगा किसी काम से आया होगा।’
‘पर…’ वह उलझन में पड़ गई।
‘पर क्या? तुम ख्वामखाह उलझ रही हो। सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दो, कोई बात बिगड़ेगी तो मैं अपने ऊपर ले लूंगी। तुम फ़िक्र मत करो और दिमाग सेक्स पर एकाग्र करो।’
पर यह उसके लिये आसान नहीं था, तरह-तरह की आशंकायें, संभावनायें उसे डरा रही थीं और तभी रानो के फोन पर मिस्ड काल आई।
‘आ गया… मैं उसे लेकर आती हूँ, मैं जानती हूँ कि तुम एकदम से उसका सामना नहीं कर पाओगी, इसलिये अपनी आँखों पर स्टोल बांध लो, मैं हर तरफ घुप्प अंधेरा कर देती हूँ।’
रानो उठते हुए बोली थी और उसने तेज़ी से धड़कते दिल के साथ पास ही पड़ा अपना स्टोल उठा कर अपनी आँखों पर बांध लिया था।
अब दिमाग से ही देखना था, जो भी महसूस होता उसे दिमाग के सहारे ही कल्पना देनी थी।
रानो ने कमरे से निकलते वहाँ जलते नाईट बल्ब को बुझा दिया था और बाहर निकल गई थी और एक मिनट बाद जब वापस आई थी तो उसे महसूस हुआ कि साथ में कोई और है।
रानो ने दरवाजा बंद किया होगा और अंधेरा और गहरा गया।
‘कितना अंधेरा है दी।’ उसे फुसफुसाहट सुनाई दी और वह अनुमान लगा सकती थी कि वह सोनू ही था।
‘तुझे कौन से तीर चलाने हैं जो अंधेरे में नहीं चला सकता। मेरा हाथ पकड़ ले और मुंह बंद ही रखना।’ वह उसे बिस्तर पे ले आई।
उसके बदन की अजनबी सी गंध शीला महसूस कर सकती थी और सोनू के समीप्य से उसकी धड़कनें और बेतरतीब हो उठी थीं।
‘देख सोनू, मुझे पता है कि दी कितनी मुश्किल से तैयार हुई है, पर फिर भी उसमे हिम्मत नहीं कि तेरा सामना कर सके इसलिये अंधेरा भी किया है और आँखों पे पट्टी भी बांधी है।
तुम उनकी शर्म कायम रहने दो, वह खुद से समझेगी तो पट्टी हटायें या अंधेरा दूर करें, पर तुम इसके साथ ही जो करना है करोगे और उज्जडी बिल्कुल नहीं।
दीदी को न पता है इन सब के बारे में और न ही कोई आदत है, जो भी होगा इसके लिए सब नया होगा इसलिए इत्मीनान से और कायदे से करना कि उसे ये न लगे कि उसने मेरी बात मान कर गलती की।’
‘दी… आप दोनों को कोई शिकायत नहीं होगी।’ वह आहिस्ता से बोला।
‘शाबाश! चल फिर शुरू हो जा।’
उसने धक धक करते दिल के साथ महसूस किया था कि रानो उसके साइड में अधलेटी सी बैठ गई थी और सांत्वना भरे अंदाज़ में उसका सर सहलाने लगी थी जैसे कह रही हो ‘चिंता न करना, मैं हूँ!’।
फिर उसे सोनू के सख्त हाथों की चुभन अपने सीने पर महसूस हुई… वह उसके वक्ष सहला रहा था और एक अजनबी स्पर्श को महसूस करते ही उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।
सोनू के हाथ वह अपने सीने पर फिरते और फिर सीने से उतरते, पेट से होते, नाइटी के ऊपर से ही अपनी योनि पर रुकते महसूस किया था।
उसे तेज़ शर्म का अहसास हुआ और वह मचल कर रह गई।
उस पल में रानो ने उसे सर से ज़ोर से दबा कर जैसे इशारा किया था कि ‘खुद में समेटो मत, जो हो रहा है, उसमें मस्ती महसूस करो!’
और उसने अपने दोनों हाथ ऊपर करते रानो को पकड़ लिया था।
कुछ देर सोनू के हाथ को योनि पर फिसलते देने से, उसमे अपनी शर्म को उतारने का मौका मिल गया और वह उस स्पर्श में मस्ती का अहसास करने लगी और उसके मुख से सिसकारी छूट गई।
इस सिसकारी को न सिर्फ सोनू ने महसूस किया बल्कि रानो ने भी महसूस किया और अपने हाथ से उसका हाथ ऐसे दबाया जैसे प्रोत्साहित कर रही हो।
फिर सोनू का स्पर्श गायब हो गया और उसने महसूस किया कि उसकी नाइटी ऊपर सरक रही है। वह जांघों तक उठ कर फंस गई और उसे खींचते देख उसने अपने कूल्हे ऊपर उठा लिये।
बाहर की ठंडी हवा का स्पर्श उसने पिंडलियों से लेकर अपने पेट तक अनुभव किया लेकिन अब भी नाइटी के उठने का सिलसिला अभी थमा नहीं था।
उसे पीठ की तरफ से रानो ने सपोर्ट करके थोड़ा ऊपर किया था जिससे ऊपर उठती नाइटी उसके गले तक पहुँच गई थी और अब उसके वक्ष भी हवा के उस ठन्डे स्पर्श को महसूस कर सकते थे।
यह तो वह अब आदत बना चुकी थी कि सोने से पहले अपने अंतः वस्त्रों को वह उतार देती थी।
उसने सोनू के हाथों को अपनी पिंडलियों पर फिरते महसूस किया और उसके पूरे जिस्म में एक मस्ती भरी सरसराहट दौड़ने लगी।
पहले पिंडलियां, फिर जांघें और जांघों का अंदरूनी भाग, कुछ भी उस छुअन से बाकी न रहा और उसने इस स्पर्श की सरसराहट अपनी योनि में गहरे तक महसूस की।
उसकी जांघों को सहलाते सोनू अपने हाथ बिना उसकी योनि को छुआए उसके पेट से गुज़ारते, उसके वक्ष उभारों पर ले आया।
वह एक कसक, एक तड़प सी महसूस करके रह गई।
जैसे उस घड़ी खुद से चाह रही हो कि वह उसकी योनि को छुए जो उसने नहीं छुई थी।
जबकि वह बड़े आहिस्ता-आहिस्ता उसके स्तनों का मर्दन करने लगा था और चूचुकों को चुटकियों से मसलने लगा था।
उसने अपनी नस-नस में एक अजीब सी सनसनाहट महसूस की जो दिमाग पर इस तरह हावी हो रही थी जैसे वह किसी गहरे नशे के ज़ेरे असर होती जा रही हो।
फिर उसके हाथ हट गए और उसकी रगों में होती अकड़न थम गई। कपड़ों की सरसराहट से उसने महसूस किया कि वह अपने कपड़े उतार रहा था।
कुछ पलों के ब्रेक के बाद उसने सोनू के हाथों को फिर अपनी कमर पर महसूस किया जो वहाँ ज़ोर लगा रहा था।
उसके ज़ोर को समझते हुए वह तिरछी हुई और फिर सोनू ने उसे उल्टा कर दिया।
अब इस हालत में उसकी पीठ वाला हिस्सा उसके सामने था।
हालांकि इस हालत में भी उसने रानो के हाथ थाम रखे थे और ऐसा जता रही थी जैसे उसे रानो की हर हाल में ज़रूरत है।
सोनू उसकी जांघों के ऊपर बैठ गया था। वह उसके नितंबों और जांघों की छुअन को साफ़ महसूस कर सकती थी। फिर उसके हाथ शीला ने अपने नितंबों पर फिरते महसूस किये।
वह दोनों हाथों से कुछ सख्ती से उन्हें दबा रहा था, रगड़ रहा था और इस तरह फैला रहा था जैसे पीछे से ही दोनों छेदों को देख लेना चाहता हो… वहाँ घिरे अंधेरे के बावजूद।
उसकी रगों में फिर मस्ती भरी अंगड़ाइयाँ पैदा होने लगीं।
काफी देर उसके नितंबों को मसलने के बाद वह अपने हाथ फिसलाते उसकी कमर और कन्धों पर चलाने लगा और इस क्रम में अपने जिस्म का भार उसके शरीर पर डालता चला गया।
यहाँ उसके भार से ज्यादा मायने वह नग्न स्पर्श रखता था जो सोनू के सीने और पेट की तरफ से उसकी पीठ को मिल रहा था और उससे ज्यादा रोमांचित उसे अपने नितंबों के बीच वह सख्त स्पर्श कर रहा था जो सोनू के लिंग का था।
फिर उसका पूरा भार उसने अपने शरीर पर अनुभव किया, वह उसके शरीर पर अपना शरीर रगड़ रहा था और यह रगड़ उसके सख्त लिंग की चुभन के साथ और कामोत्तेजना पैदा कर रही थी।
इसके बाद सोनू ने फिर उसे पलट लिया और आधा बिस्तर और आधा उसके शरीर पर चढ़ आया। अब उसका लिंग शीला को अपनी कमर पर महसूस हो रहा था।
अचानक उसने गर्म गर्म सांसें अपने चेहरे पर महसूस कीं… फिर दो होंठों का स्पर्श अपने होंठों पर…
कई ठंडी-ठंडी लहरें जैसे ऊपर से नीचे तक दौड़ीं और पहली बार उसने किन्ही होंठों को इतने नज़दीक पाया।
वे उसके होंठों को छू रहे थे, उन्हें रगड़ रहे थे और खोलने की कोशिश कर रहे थे लेकिन स्त्रीसुलभ लज्जा और संकोच उन्हें बांधे हुए था।

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rangila
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Re: कामलीला

Post by rangila » 04 Sep 2017 13:05


भले उसके दिमाग में छोटे बड़े का फर्क निकल गया था पर वर्जना अभी भी कहीं बाकी थी जो उसके होंठों को बंद गठरी में बांधे थी। सोनू अपने गीले होंठों से उन्हें कुचल रहा था, मसल रहा था और अपने होंठों में खींच कर चूसने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन वह सहयोग नही कर पा रही थी।
ऐसा नहीं था कि उसे बुरा लग रहा हो मगर वह उस झिझक से नहीं जीत पा रही थी जो उसके दिल-दिमाग पर अभी तक हावी थी।
फिर वे दो गीले होंठ उसके होंठों को छोड़कर नीचे उतरते गये, पहले उसकी ठुड्डी पर, फिर गर्दन पर और फिर नीचे जहाँ से उसके उभार शुरू होते थे…
वे गीली गीली छुअन देते उनकी चोटियों पर जा थमे थे और चोटियों के गिर्द गोल घेरा बनाते फिर रहे थे।
उसने अपने निप्पलों में कड़ापन आता अनुभव किया था और जैसे वे खुद उन होंठों में जाने को आतुर हो गए थे।
फिर उन होंठों से एक जीभ बरामद हुई जो उसके एरोला पर फिरने लगी।
उसके बदन में दौड़ता नशा और बढ़ गया।
जीभ एरोला से होती उन चुचुकों पर चढ़ आई और उन्हें लपेटती फिरने लगी।
ऐसा लगा जैसे उसके बदन में उन निप्पलों से लेकर योनि की गहराइयों तक करेंट की धारा प्रवाहित होने लगी हो।
वह ऐंठने लगी, मचलने लगी।
उसने अपना एक निप्पल सोनू के मुंह में जाते महसूस किया और एकदम से गनगना कर ज़ोर की ‘आह’ कर बैठी, जिस पर बाद में उसे खुद शर्म आई।
‘दीदी के निप्पल कितने मोटे हैं।’ उसने चूषण के बीच में आवाज़ सुनी।
वह समझ न सकी कि यह तारीफ थी या बुराई। निप्पल का मोटा होना अच्छा था या ख़राब…
लेकिन प्रत्युत्तर में रानो सिर्फ ‘हूँ’ करके रह गई।
दोनों चूचुकों को चुसाते उसने अनुभव किया था कि उसकी योनि से उस रस का रिसाव होने लगा है जो इस बात का सूचक था कि वह अब समागम को आतुर है।
लेकिन समागम करने वाला तो बड़े इत्मीनान से उसके वक्ष से खेल रहा था।
फिर उसने सोचा कि अच्छा ही है यह खेल जितना लंबा चले उतना ज्यादा मज़ा।
आखिर इस सिलसिले का अंत हुआ और वह उसके चूचुकों को छोड़ कर नीचे उतरने लगा और उसके सीने के नीचे हर हिस्से पर अपनी जीभ की छुअन देते, उसके पेट तक पहुंच गया।
उसकी जीभ शीला की नाभि के गड्ढे से किलोलें करने लगी।
उसमें और सिहरनें दौड़ने लगीं.. और जब योनि के ऊपर मौजूद घने बालों से गुज़र कर नीचे गीली हुई पड़ी योनि तक पहुँचा तो इस सिहरन की इन्तहा हो गई।
वह खुद से महसूस कर सकती थी कि उसके भगोष्ठ गीले हुए पड़े थे और वह उन पर बाहर से ही जीभ चलाता, अपनी लार से और गीला करने लगा।
फिर उसने उंगलियों से योनि के होंठ खोले थे और अंदर के नर्म और गर्म भाग में उंगली फिराने लगा।
उसके पूरे शरीर में ऐसी तेज़ झनझनाहट पैदा हुई कि जिस्म अकड़ गया।
सोनू उंगली ऊपर-नीचे करके, फिर बीच वाली उंगली योनि के सबसे निचले सिरे पर मौजूद छेद में थोड़ी दूर तक उतार ले गया और अपनी जीभ की नोक से उसकी योनि की कलिकाओं को चूसने-खींचने लगा।
उन पलों में उसे ऐसा लगा जैसे उसका खुद पर अब कोई नियंत्रण न बाकी रह गया हो और उसने रानो को छोड़ दिया और हाथ नीचे करके बिस्तर की चादर ऐसे मुट्ठियों में दबोच ली जैसे अपनी ऊर्जा उसमें जज़्ब कर देना चाहती हो।
कुछ देर उन कलिकाओं को खींचने चूसने के बाद सोनू अपनी जीभ की नोक से उसके भगांकुर को छेड़ने दबाने और खोदने लगा।
उसके शरीर में दौड़ती लहरें और तेज़ हो गईं।
जबकि सोनू की उंगली लगातार अंदर-बाहर हो रही थी।
‘दीदी की झिल्ली है क्या?’ अचानक उसने मुंह उठा कर पूछा।
‘नहीं, बचपन में साइकलिंग की नज़र हो गई।’ जवाब रानो ने दिया था।
फिर उंगली और गहरे तक धंसती गई और जितनी जा सकती थी पूरी अंदर चली गई।
शीला की तड़प और बढ़ गई… उसके दिमाग में वह सब चल रहा था कि कैसे उसने रानो के साथ पहला सम्भोग किया था।
वह भी खुद को उसी मनःस्थिति में पा रही थी कि जल्दी से सब हो जाये, सोनू एकदम उसकी योनि में अपना लिंग घुसा दे और उसे इतने धक्के लगाये कि उसकी बरसों की चाह पूरी हो जाये।
लेकिन सोनू तब नया था, अनाड़ी था जबकि अब वह एक अनुभवी खिलाड़ी था, उसमें अधीरता लेशमात्र भी न रही थी और सब इतने सब्र के साथ कर रहा है जैसे…
जैसे इस सिलसिले का कोई अंत नहीं करना चाहता हो!
जैसे उसे बस तड़पाते रहना चाहता हो।
‘अब करो भी।’ अचानक उसे रानो की सख्त गुर्राहट सी सुनाई दी।
रानो उसे बेहतर समझ सकती थी कि वह किस हाल से गुज़र रही थी।
‘दीदी, मेरा भी तो तैयार करो।’ उसे सोनू की बेशर्म बात सुनाई दी।
‘वह दी से नहीं होगा।’ रानो ने टालने वाले अंदाज़ में कहा।
‘तो आप करो न।’ सोनू ने ज़िद की।
फिर उसने बिस्तर पर खिसकने की सरसराहट महसूस की और यह महसूस किया जैसे सोनू अब उसके सीने की तरफ आ गया हो।
इसके बावजूद वह अब ऊपर की तरफ से उसकी योनि से मुंह भी लगाए था और उंगली से योनिभेदन भी कर रहा था।
लेकिन अब उसे एक नई किस्म की आवाज़ अपने चेहरे के पास सुनाई देने लगी थी जैसे मुंह से कोई चीज़ चूसी जा रही हो।
इतनी नादान नहीं थी कि समझ न सकती… जो वह नहीं कर सकती थी वह रानो कर रही थी, वह सोनू का लिंग चूषण कर रही थी।
शुरुआत में उसमे वितृष्णा के भाव पैदा हुए लेकिन जल्दी ही योनि से उठती सिहरनों ने उसकी विचारधारा बदल दी।
एक मर्द अगर किसी स्त्री की योनि को अपनी जीभ से चूस सकता है तो स्त्री के लिये वही चीज़ कैसे वर्जित हो गई।
हालांकि अभी वह खुद को इसके लिए तैयार नहीं पाती थी लेकिन रानो को लिंगचूषण करते देखना चाहती थी, पर पट्टी हटाने की भी हिम्मत नहीं थी।
फिर वह आवाज़ें थमी और एक बार फिर सरसराहट हुई और उसने महसूस किया कि सोनू उसकी टांगों के बीच आ बैठा हो।
तो वक़्त आ गया अब उसके पहले सम्भोग का।
उसने मानसिक रूप से खुद को लिंग के स्वागत और भेदन के लिये कर लिया।
उसने दरवाज़े पर मेहमान की छुअन महसूस की और वह परदे सरकाता हुआ अंदर झाँका, कुछ सेकेंड उसने नीचे से ऊपर चलते-फिरते जैसे टोह ली हो।
फिर उसने योनि के छेद पर उसके शिश्नमुंड का दबाव महसूस किया और उसने दोनों हाथों से उसकी जांघों के निचले हिस्से को सख्ती से थाम लिया।
वह परिपक्व थी, दर्द को ऐसे क्षणों में तवज्जोह नहीं देना चाहती थी इसलिये दिमाग से हर पल में आनन्द अनुभव करना चाहती थी।
फिर ऐसा लगा जैसे वह उसके संकुचित से छेद पर गहरा दबाव डाल रहा हो, कसी हुई दीवारें फैल रही हों।
उसने उन दीवारों को ढीला कर दिया और एकदम ऐसा लगा जैसे बंधन टूट गया हो।
जैसे रबर का छल्ला एकदम खिंच कर फैल गया हो और एक मोटा चिकना ऑब्जेक्ट अंदर प्रवेश कर गया हो।
दर्द की एक तेज़ लहर उसके दिल दिमाग को हिला गई।
उसके मुख से एक ज़ोर की ‘आह’ ख़ारिज हुई थी और उसने एक हाथ से तकिये और दूसरे हाथ से रानो की बांह दबोच ली थी और उस दर्द को बर्दाश्त करने की कोशिश करने लगी थी।
पर कुछ भी था, वह उम्र के उस दौर में नहीं थी जहाँ ऐसे वक़्त में लड़की तड़पने मचलने लगती है।
इसका कारण भी था, कि कम उम्र में योनि की मांसपेशियाँ काफी सख्त होती हैं और जब उन पर लिंग के प्रथम प्रवेश का दबाव पड़ता है तो वे खिंचते वक़्त ज्यादा तकलीफ देती हैं।
जबकि उम्र बढ़ने के साथ उन्हीं मांसपेशियों में लचीलापन बढ़ जाता है और वे ढीली हो जाती हैं। जिस दर्द को झेलने में रानो कुछ वक़्त के लिये मूर्छित हो गई थी, उसने वह दर्द झेल लिया था।
सोनू ने उसके घुटनों से पकड़ नहीं हटाई थी मगर शीला को मचलते या उसे परे धकेलते न पाकर पकड़ ढीली ज़रूर कर दी थी और उसे यह भी समझ में आ गया था कि शीला वैसे नहीं रियेक्ट करेगी जैसे वह अपेक्षा कर रहा था।
उसने लिंग को आधी दूरी पर ही रोक लिया था और योनि की मांसपेशियों को पूरा मौका दे रहा था कि वे उसके साइज़ के हिसाब से एडजस्ट हो सकें।
साथ ही उसने अपने हाथ शीला के घुटनों से हटा कर एक हाथ से उसके वक्ष को मसलने लगा था तो दूसरे हाथ से उसके भगांकुर को रगड़ने लगा था।
जबकि रानो अपने एक हाथ से शीला के सर को सहलाती उसे हिम्मत बंधाने का अहसास पैदा कर रही थी और दूसरे हाथ से उसके एक वक्ष को नर्मी से सहला रही थी।
उन दोनों की ही कोशिशों से वह जल्दी ही इस झटके से उबर गई और उसने महसूस किया कि उसकी योनि में उठी दर्द की लहरें अब ठंडी पड़ रही थीं।
उसके चेहरे पर राहत के आसार आते देख सोनू ने लिंग को पीछे खींचा और शिश्नमुंड तक बाहर निकाल कर फिर वापस अंदर ठेल दिया।
सख्त दीवारों की चरमराहट में उसने दर्द की आमेज़िश फिर महसूस की लेकिन इस बार वह बर्दाश्त के लायक था।
उसे पता था कि योनि की बनावट उलटी बोतल जैसी होती है। शुरुआत में बोतल के मुंह की तरह संकरा मार्ग होता है और संवेदना पैदा करने वाली सारी मांसपेशियाँ इसी कुछ इंच के मार्गे में होती हैं।
इसके आगे योनि खुल कर फैल जाती है, अंदर उसकी गहराई शरीरों के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है मगर यह तय है कि दर्द का रिश्ता इसी शुरुआती मार्ग से होता है।
लिंग की लंबाई कई तरह के आसनों के लिये मैटर कर सकती है लेकिन सम्भोग के लिये कोई मैटर नहीं करती।
जो लिंग आधा घुसने में जितना दर्द देगा उतना ही पूरे में भी महसूस होगा।
योनि के लिये लिंग की मोटाई मैटर करती है, जितना ज्यादा मोटा लिंग, शुरुआत में उतना ही ज्यादा दर्द और योनि के ढीली हो जाने पर शायद मज़ा भी कुछ ज्यादा हो जाता हो।

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