कामलीला complete

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Kamini
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Re: कामलीला

Post by Kamini » 11 Sep 2017 13:54

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Re: कामलीला

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rangila
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Re: कामलीला

Post by rangila » 12 Sep 2017 19:19

रानो एक हाथ से अपने वक्ष मसलती दूसरे हाथ से अपने भगांकुर को रगड़ने लगी।
और इस तरह जल्दी ही चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई, शरीर एक बार ज़ोर से कांपा और फिर झटके लेने लगा।
शीला तब तक उंगली चलाती रही जब तक वह शांत न पड़ गई।
तभी उसके फोन पर सोनू की मिस्ड आ गई।
‘तुम ही जाओ दी, मुझमें हिलने की भी हिम्मत नहीं, मुझे पूछे तो कह देना कि मैं आज आकृति के पास ही सो गई हूँ।’ रानो बेहद शिथिल स्वर में बोली।
‘और यहां की सफाई?’
‘थोड़ी देर में मैं कर दूंगी। तुम जाओ।’
अपनी नाइटी दुरुस्त करती शीला उठ कर कमरे से बाहर निकल आई।
सोनू के चक्कर में बाहर अंधेरा ही रखा जाता था, उसी अंधेरे में जा कर शीला ने चुपके से सोनू को अंदर ले लिया।
उसे देख कर वह चौंका था और अपेक्षित रूप से रानो के बारे में पूछा था तो रानो का बताया जवाब उसे दे के शीला ख़ामोशी से अपने कमरे में ले आई थी।
वह पहले से काफी गर्म थी और अब सम्भोग के लिये एक मर्द भी उपलब्ध था, उसकी ख्वाहिशें बेलगाम हो उठीं।
आज उसने खुद से पहल की।
जो भी उसके दिमाग में था, जो जो वह सोचती आई थी मगर अपनी स्त्री सुलभ लज्जा और झिझक के कारण करने में असमर्थ रही थी, आज उसने वह सब किया।
उसने जिस खुलेपन और आक्रामक अन्दाज़ में वासना के इस खेल को पूरा किया, उसने सोनू को भी चकित कर दिया जो उसके इशारों पर अलग अलग आसनों से बस उसे भोगता रहा।
आज रोकने के लिये रानो भी नहीं थी। उसने जी भर के दो घंटे में तीन बार पूर्ण सम्भोग करने के बाद ही सोनू को मुक्त किया और उसके जाने के बाद सुकून की गहरी नींद सो गई।
अगली सुबह उसके लिये तो नार्मल ही थी मगर रानो दर्द से बेहाल थी और उसकी योनि भी बुरी तरह सूज गई थी— जिसके लिये उसे बाकायदा दवा भी लेनी पड़ी थी।
बहरहाल, यह सिलसिला चल निकला… लगभग हर रोज़ ही रात को एक निश्चित वक़्त पे सोनू आने लगा और उसके साथ सम्भोग का अवसर शीला को ही मिलता था।
रानो ने जैसे खुद पर सब्र की बंदिशें लगा ली थीं उन दिनों… उसने जैसे खुद को चाचा के लिये ही सुरक्षित कर लिया था।
चाचा ने अगले बार जब पुकार लगाई तो उसकी योनि सही हालात में आ चुकी थी और इस बार उसे कम तकलीफ और हल्की सूजन का ही सामना करना पड़ा था जो दो दिन में ठीक हो गई थी।
और फिर उसकी योनि चाचा के स्थूलकाय लिंग की आदी हो गई थी जिससे उसे न सिर्फ कष्ट से छुटकारा मिल गया था बल्कि मज़े में भी वृद्धि हो गई थी।
हालांकि ऐसा नहीं था कि शीला को आत्मग्लानि न होती हो… वह जिस रास्ते पर चल पड़ी थी वहां उसे शरीर का सुख तो हासिल था मगर ये ग्लानि किसी भी पल में उसका पीछा न छोड़ती थी।
सोनू के साथ जितने पल होती थी, दिमाग पर वासना हावी रहती थी मगर उसके जाते ही वो अपराधबोध से घिर जाती और इसी तरह चाचा के पास उन पलों में जाने भी उसे अपने ग़लत होने का अहसास होता था।
भले अब चाचा के लिंग का इस्तेमाल रानो करती थी मगर उन क्षणों में उसके साथ वह भी तो होती थी।
बस जैसे तैसे करते महीना भर यूँही गुज़र गया।
और फिर एक दिन…
उस रात भी हस्बे मामूल सोनू उसके साथ ही था। रानो भी साथ ही थी, हालांकि अब अक्सर वह सहवास के वक़्त उनके पास से हट जाती थी कि एकांत में शीला उन्मुक्त हो सके।
मगर उस रात साथ ही थी जब किसी ने दरवाज़ा पीटा था…
उस वक़्त शीला और सोनू के शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था और दोनों एक आसन में संभोगरत थे जब इस अनपेक्षित व्यधान ने दोनों की भंगिमाओं को ठहरा दिया।
‘मैं देखती हूँ।’ रानो उठती हुई बोली।
वह अंधेरे के बावजूद अभ्यस्त नेत्रों से देखती बाहर निकल गई और वे दिमाग में चलते विचारों और शंकाओं के झंझावात के चलते उसी अवस्था में बाहर की आवाज़ें सुनने लगे।
‘कौन हो सकता है?’ सोनू ने प्रश्न सूचक निगाहों से उसे देखा।
‘मुझे खुद ताज्जुब है इस वक़्त कौन हो सकता है… शायद किसी ने गलती से दरवाज़ा खटखटाया है।’
दूर-दूर तक किसी के भी इस वक़्त उनके यहाँ आने की कोई सम्भावना नहीं थी इसलिए शीला ने त्वरित प्रतिक्रिया दिखाने की ज़रूरत नहीं समझी थी और उसे लग रहा था किसी से गलती हुई है।
पर एकदम से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई और साथ ही रानो की घुटी-घुटी सी आवाज़ और ऐसा लगा जैसे कोई अंदर घुसा हो।
कोई अप्रत्याशित खतरा भांपते ही शीला ने सोनू को खुद से अलग किया और अंधेरे में कपड़े ढूंढने की कोशिश कर ही रही थी कि आगंतुक कमरे तक पहुंच गया।
‘लाइट जला मादरचोद।’ गुर्राती हुई आवाज़ कमरे में गूंजी।
फिर शायद रानो ने ही कमरे की लाइट जलाई थी और दरवाज़े पर रानो के बाल पकड़े चंदू किसी शैतान की तरह खड़ा था।
उसके दाएं-बाएं दो चमचे भी साथ ही खड़े थे।
और जिस घड़ी रोशनी हुई— सोनू अधलेटा सा समझने की कोशिश में उलझन ग्रस्त था कि यह हो क्या रहा था और शीला चौपाये की तरह झुकी अपने कपड़े ढूंढने के प्रयास में थी।
रोशनी होते ही वह एकदम सिमट कर बैठ गई।
‘ओहो… तो यहाँ यह रंडापा हो रहा है। हरामज़ादी… जब कहे थे कि कोई जुगाड़ न बना हो तो हमें बताना तो हमें नहीं बताया और यह लौंडे को बुला लिया।
तुझे क्या लगता है कि छोटे लौंडे से चुदवायेगी तभी मज़ा आएगा। हमारे कांटे हैं क्या? और तू बे लौंड़ू… साले दुनिया के सामने इन्हें दीदी बोलता है और रात में चोदने आता है।
अबे यह तो तरसी नदीदी थी लौड़े की— तुझे भी चूत नसीब नहीं थी कि इन बड़ी उम्र की चूतों पर फांद पड़ा। रोज़ रात को तुझे इस गली की परिक्रमा करते देखते थे पर दिमाग में ही नहीं आया कि यहाँ मुंह काला करने आता है।
परसों से पता चला कि इस घर में चरण कमल पड़ते हैं तो जुगाड़ में हम भी लग गये।’
चंदू के शब्दों से जितना ज़लील महसूस कर सकती थी… उसने किया और सोनू की हालत तो ऐसी हो रही थी जैसे रो ही देगा।
वह जैसे का तैसा उठ कर खड़ा हो गया था।
चंदू की दहशत ही ऐसी थी और सोनू तो उसके सामने बच्चा ही था।
रानो को चंदू ने एक झटके से आगे धकेला कि वह भी उनके पास बिस्तर पे आ टिकी। उसके बोलने से वह उस भभूके की महक को महसूस कर सकते थे जो बता रहे थे कि वह शराब के नशे में है।
उसके साथ जो दो चमचे थे उन्हें भी वह जानते ही थे, एक तो भुट्टू था और दूसरा बाबर… दोनों ही मोहल्ले के थे और चंदू के जैसे ही बिगड़े हुए लफंगे थे।
‘जा बे… इसके बाप और महतारी को बुला ला और तू जा के जो मोहल्ले की जो तोपें हैं उन सब को बुला के ला! जो न आने को कहे उसके खोपड़े पे घोड़ा रख के लाना। आज इन ब्लू फिल्म के हीरो हीरोइन की बारात निकालते हैं।’
‘नहीं नहीं…’ सोनू कांप कर चंदू के पैरों में पड़ गया, ‘भाई नहीं… ऐसा मत करो। जूते से मार लो आप। जो पास पल्ले पैसे हों वो ले लो पर ऐसा मत करो।’
‘तेरे पास क्या है बे गांड मारें तेरी। क्यों गुठली, तू बोल, बुलायें सबको और निकालें जनाज़ा तुम लोगों की इज़्ज़त का।’
शीला कुछ बोल तो न सकी… बस सूखे होंठों पर जीभ फिरा कर रह गई।
इस हालत में उसकी धड़कनें अनियंत्रित हो चली थीं और जिस्म पसीने से नहा गया था।
‘ऐसा मत करो दादा।’ उसकी जगह रानो ज़रूर गिड़गिड़ाई।
‘क्यों न करें। साली दुनिया हमें ही गलत बोलती है, ज़रा दुनिया को तो पता चले कि मोहल्ले में गलत कौन कौन कर रहा है।’
‘हमारी इज़्ज़त ख़राब करके आपको क्या मिलेगा दादा?’
‘सुकून… कई बार फरियाद की तुम लोगों से, हमें भी मौका दे दो— क्या हम नहीं समझते कि इतनी उम्र तक जब चूत को लौड़ा न मिले तो कैसी आग लगती है। इसीलिये कहते थे कि हमसे काम चला लो।
तो हमें बड़े गुरूर से ठुकरा देती थी और यह गुठली… यह तो बाकायदा आगबबूला हो जाती थी जैसे सती सावित्री हो और यहाँ… किया वही काम। ऊ का कहते हैं बे… हमारा ईगो हर्ट हुआ है। समझी।’
‘मम… माफ़ कर दो।’
‘तू ही बोल रही है। गुठली तो कुछ नहीं बोल रही।’
‘मम… मुझे माफ़ कर… दो।’ बड़ी मुश्किल से शीला बोल पाई।
‘एक शर्त पे।’
‘कक… कैसी शर्त?’
‘सुन बे लोड़ू— कल शाम तक कहीं से भी दो हज़ार रूपये पहुंचायेगा! समझा? और तुम दोनों— जैसे इसे एंटरटेन कर रही थी अभी इसके जाने के बाद हमें करोगी।
या दोनों लोग सीधे-सीधे हाँ बोलो या बुलाने दो हमें मोहल्ले के चौधरियों को।’
‘हह… हाँ-हाँ… मैं कल कहीं से भी आपको पैसे दे दूंगा भाई, आप मुझे जाने दो।’ सोनू गिड़गिड़ाया।
‘और तुम क्या बोलती हो?’
दोनों बहनों ने एक दूसरे को देखा।
ज़ाहिर है कि विकल्प नहीं था और न करने की स्थिति में वह नहीं थीं। उसकी बात से तो ज़ाहिर था कि वह कुछ भी कर सकता था।
बिना कोई लफ्ज़ अदा किये दोनों ने सहमति से सर हिला दिया।
‘शाबाश— चल बे कपड़े पहन… भुट्टू, छोड़ के आ इसे और दरवाज़ा ठीक से बंद कर लियो।
और तू सुन, अब से इधर आने की ज़रूरत नहीं, इनकी देखभाल हम कर लेंगे। समझा?’
‘जी भाई।’
‘चल फूट!’

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Re: कामलीला

Post by rangila » 12 Sep 2017 19:55

सोनू ने जल्दी जल्दी कपड़े पहने और दोनों बहनों पर एक नज़र डालता हुआ कमरे से निकल गया।
उसके पीछे भुट्टू भी और उन्होंने बाहर दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ सुनी।
फिर उसने वापस कमरे में आकर कमरे का भी दरवाज़ा बंद कर लिया।
‘साला यह पता होता कि ऐसी नौबत आ जाएगी तो दारु बचा लेते… और मज़ा आता।’
‘तो क्या हुआ भाई, अभी तरंग कम कहाँ हुई है। आज ऐसे ही काम चला लेते हैं। आगे से ध्यान रखेंगे कि मैडम लोगों की सेवा में दारू चकना भी लेके चलें।’ बाबर ने उसे उकसाया।
वे दोनों बिस्तर पे आ गये।
‘यह तो पहले से तैयार है— चल तू भी कपड़े उतार और तैयार हो जा।’ चंदू ने रानो से कहा।
बात कितनी भी काबिले ऐतराज़ क्यों न हो मगर जब आप फँस जाते हैं और हालात ऐसे बन जाते हैं जब किसी और विकल्प की गुंजाईश न बचे तो इंसान खुद को हालात के हवाले कर ही देता है।
जैसे उन दोनों बहनों ने उन हालात में किया।
अपने तने हुए स्नायुओं को ढीला छोड़ दिया और खुद को मन से इस बात के लिए तैयार कर लिया कि जो हो रहा है वे उसे बदल नहीं सकते तो क्यों न होने दें।
शायद शारीरिक कष्ट से ही बचत हो और क्या पता जो ऐसे नागवार हालात में उन्हें हासिल हो रहा है वह भी आगे न हासिल हो पाये। सामान्य जीवन से तो वह वैसे भी नाउम्मीद ही थीं।
रानो ने कपड़े उतार दिये।
हाँ, उसे यह अहसास था कि जिन लोगों ने हमेशा उसके तन को ढके देखा था और कल्पनाएं ही की होंगी, अब वह उसे बिना कपड़ों के देख रहे थे।
जो कहीं न कहीं उसे थोड़ी सी शर्म का अहसास करा रहा था।
ऐन यही मानसिक स्थिति शीला की भी थी, उसे अपने नग्न बदन को उनकी निगाहों के सामने खोलते उसी किस्म की झिझक महसूस हो रही थी।
लेकिन दोनों को ही यह पता था कि यह कैफियत बहुत देर नहीं रहने वाली थी।
‘भाई, मुझे तो दुबली-पतली लौंडियाएं पसंद हैं। पीछे से डालने में बड़ा मज़ा आता है।’ बाबर भद्दी सी हंसी हंसते हुए बोला।
‘मुझे भी।’ भुट्टू ने भी उसका समर्थन किया।
‘पर मुझे गुदहरी लौंडिया पसंद है इसलिये तुम दोनों बहनचोद इस कमसिन कली को चोदो और गुठली तू मेरे कने आ।’
वह तीनों अपने शरीर के कपड़े उतार के बिस्तर के सरहाने से टिक कर अधलेटे से बैठ गये।
भुट्टू और बाबर तो दरमियाने कद के और साधारण कदकाठी के लड़के थे लेकिन चंदू अच्छी लंबाई चौड़ाई वाला और कसरती बदन का स्वामी था।
उसके करम बुरे थे, उसका आचरण बुरा था लेकिन देखा जाये तो सूरत और शरीर से वह काफी अच्छा था।
और ऐसा था कि सेक्स की ख्वाहिश रखने वाली किसी भी औरत के लिये एकदम योग्य मर्द था, सहवास के लिये एक आदर्श शरीर!
पहले कभी शीला ने उसे इस तरह देखा ही नहीं था। बचपन से ही उसकी हरकतों के चलते उससे नफरत करती आई थी।
और आज तक या शायद थोड़ा पहले तक उसे चंदू से नफरत ही रही थी लेकिन जैसे जैसे वक़्त सरक रहा था उसकी नफरत क्षीण पड़ रही थी।
उसने नग्न हुए तीनों बंदों को गौर से देखा था, उनके जननांगों को देखा था। जहाँ भुट्टू का लिंग बस पांच इंच तक और पतला सा था वहीं बाबर का उससे थोड़ा बड़ा और मोटा।
जबकि चंदू का लिंग उसकी काया के ही अनुकूल था… सोनू का लिंग लंबाई और मोटाई दोनों में चंदू से कम रहा होगा, बल्कि अब उसे ऐसा लग रहा था जैसे चंदू का लिंग परिपक्व हो और सोनू का अपरिपक्व।
हालांकि चंदू का लिंग आकर में बड़ा और मोटा होने के बावजूद भी चाचा के लिंग से बराबरी नहीं कर सकता था पर था आकर्षक।
लिंग का आकर्षण तो उसके गंदे, भद्दे और भयानक दिखने में ही होता है।
‘चलो… मुंह में लेकर ऐसे चूसो जैसे बचपन में लॉलीपॉप चूसती थी।’ चंदू उसके चेहरे को थाम कर उसकी आँखों में देखता हुआ बोला।
वह उसके पैरों के पास अधलेटी अवस्था में झुक गई थी, उसके नितंबों को चंदू ने अपनी तरफ खींच कर सहलाना शुरू कर दिया था।
और वह उसके लिंग को पकड़ कर बड़े नज़दीक से देखने लगी थी जो अभी मुरझाया हुआ था। ऐसे रोशनी में उसने कभी सोनू के लिंग को भी नहीं देखा था।
चाचा के लिंग को देखा था मगर उसे देखते, छूते वक़्त उसमे एक ग्लानि का भाव रहता था और यही भाव तब भी होता था जब वह सोनू का लिंग चूषण करती थी जबकि यहाँ ऐसा कोई भाव नहीं था।
उसने जड़ की तरफ मुट्ठी सख्त की जिससे खून और अंदर की मांसपेशियां सिमट कर ऊपर की तरफ आ गईं और यूँ आधा लिंग थोड़ा तन कर फूल गया शिश्नमुंड समेत।
वह टमाटर जैसे लाल और नरम सुपाड़े को होंठों में ले कर दबाने लगी। फिर होंठों को और नीचे सरका कर मुंह के अंदर जीभ से शिश्नमुंड को लपेट-लपेट कर भींचने लगी।
फिर मुंह से निकाल कर मुट्ठी का दबाव ढीला किया तो एकदम ढीला होकर चूहे जैसा हो गया। अब उसने हाथ नीचे सरका कर फिर उसे मुंह में लिया और होंठ जड़ तक पहुंचा दिये।
इस तरह लूज़ पड़ा लिंग सिमट कर पूरा ही उसके मुंह में समां गया मगर उसे भी ऐसा लग रहा था जैसे उसका पूरा मुंह भर गया हो।
वो गालो को भींच-भींच कर ज़ुबान पूरे लिंग पर रगड़ने लगी।
ऐसा करते उसने आँखें तिरछी करके रानो की तरफ देखा। इस वक़्त वह बाबर के लिंग को मुंह और हाथ से सहला और चूस रही थी और बाबर उसके छोटे-छोटे वक्षों को बेदर्दी से मसल रहा था।
और भुट्टू रानो के निचले धड़ को सीधा किये उसकी योनि पे झुका उसकी क्लिट्स चुभला रहा था और अपनी उंगली उसके छेद में अंदर बाहर कर रहा था।
शीला चंदू के बाईं साइड में इस तरह मुड़ी हुई लिंग चूषण कर रही थी की उसकी पीठ चंदू के चेहरे की तरफ थी। वह उलटे हाथ से उसके नितम्ब सहला रहा था और सीधे हाथ से उसके वक्ष।
उसके पत्थर जैसे खुरदरे हाथ उसके वक्षों पर सख्ती से फिर रहे थे। वह उसके निप्पल्स भी चुटकियों में मसल देता था जिससे वह चिहुंक सी जाती थी।
उसके मुंह में समाये चंदू के लिंग में जान पड़ने लगी थी और खून का दौरान बढ़ने से वह तनने लगा था और अब उसके मुंह से बाहर आने लगा था।
उसकी आँखें चंदू से मिलीं, उनमें प्रशंसा का भाव था।
वह उसके अंडकोषों को सहलाने के साथ अब लिंग को बाहर करके लॉलीपॉप के अंदाज़ में चूसने लगी थी, जिससे उसमें अब तनाव आता साफ़ पता चल रहा था।
जबकि चंदू ने अब उसके निचले धड़ को अपनी तरफ और खींच के नज़दीक कर लिया था और अपनी बिचली उंगली उसकी योनि में घुसा दी थी।
इस उंगली भेदन से उसकी सीत्कार छूट गई थी और वह और ज्यादा उत्तेजक ढंग से लिंग चूषण करने लगी थी।
जबकि थोड़ी देर उसकी योनि में उंगली घुमाने के बाद चंदू ने उंगली बाहर निकाल कर उसके गुदा के छेद में घुसा दी थी और जैसे उसे खोदने लगा था।
यौनानन्द बढ़ाने के लिये सोनू भी अक्सर ऐसा करता था इसलिये अब ऐसा प्रयास उसे वर्जित या असहज नहीं लगता था बल्कि वह इसे भी एक सहज स्वाभाविक सेक्स क्रिया के रूप में स्वीकारने लगी थी।
हालांकि उंगली योनि में हो तो ज्यादा मज़ा देती थी मगर उससे जल्दी स्खलित होने का चांस बढ़ जाता था जबकि अभी लिंग से योनि भेदन बाकी हो, ऐसे में उंगली गुदाद्वार में ही भली थी।
बीच-बीच में वह उसके वक्षों और चुचुकों को भी मसल देता था।
जबकि उधर बाबर का लिंग पूरी तरह जागृत हो कर तन गया था तो उसने रानो को हटा दिया था और अब उसकी जगह भुट्टू था और खुद वह भुट्टू की जगह उसका योनि चूषण कर रहा था।
चंदू का लिंग उसकी लार से पूरी तरह भीगा, कड़क होकर तन गया था और उसका अग्रभाग फूलने पिचकने लगा था।
चंदू ने उसे हाथ के दबाव से अपने ऊपर इस तरह खींच लिया कि वह अपने पैर चंदू के सीने के दोनों तरफ किये उसके पेट पर बैठ गई, जिससे उसकी लसलसाती योनि चंदू के पेट से रगड़ने लगी।
चंदू ने उसे अपनी तरफ इस तरह झुकाया कि उसके वक्ष चंदू के सीने से रगड़ने लगे और दोनों के चेहरे एक दूसरे के समानांतर आ गये।
उसके मुंह से छूटती शराब की महक जो शायद सामान्य स्थिति में शीला को परेशान करती, इस हालत में… जब वह कामज्वर से तप रही थी, उसे भली ही लग रही थी।
जिस चेहरे ने उसमें हमेशा डर और घृणा उत्पन्न की थी, आज पहली बार उसे इतने करीब से देखने पर वह उसे अच्छा लग रहा था।
आज चंदू उसमे कैसा भी प्रतिरोध नहीं पैदा कर रहा था बल्कि आज उसे वह ऐसी नियामत लग रहा था कि वह खुद से उसके सामने बिछने के लिये बेकरार हुई जा रही थी।
उसके अंतर का समर्पण उसकी चेहरे और आँखों से ज़ाहिर हो रहा था जिसे चंदू जैसे घाघ के लिये समझना मुश्किल नहीं था।
उसने एक हाथ से उसके नितम्ब को दबोचते हुए दूसरे हाथ से शीला के सर के पीछे दबाव बना के उसे अपने बिलकुल पास कर लिया।
इतने पास कि दोनों की सांसें एक दूसरे के नथुनों से टकराने लगीं।
और तभी शीला ने लपक कर चंदू के होंठों को पकड़ लिया और खुद से उन्हें चूसने लगी।
उसका समर्पण देख चंदू ने भी उसके होंठों को चूसना शुरू कर दिया।
इस प्रगाढ़ चुम्बन की अवस्था में वे आसपास से बेखबर हो गये थे।

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Re: कामलीला

Post by rangila » 12 Sep 2017 19:57

जहाँ अब रानो को चित लिटा कर भुट्टू अब उसका योनिभेदन करने लगा था और बाबर अभी उसके मुख को भोग रहा था।
होंठ चूसते चूसते दोनों एक दूसरे के मुंह में जीभ घुसाने लगे।
उसे इसी अवस्था में रखे हुए चंदू ने दोनों हाथ नीचे ले जा कर अपने लिंग को उसकी योनि पर इस तरह सेट किया कि शीला ने ज़रा सा योनि को नीचे दबाया तो वो प्रवेशद्वार में फँस गया।
अब ज़ाहिर है कि यह उस लिंग से मोटा था जिसे लेने की वह आदी थी तो मांसपेशियों पर खिंचाव तो पड़ना ही था लेकिन इतनी देर की गर्माहट अच्छा खासा लुब्रीकेंट बना चुकी थी तो वह योनि की कसी हुई दीवारों पर ज़ोर डालता अंदर सरकने लगा।
चंदू इस बीच एक हाथ से उसके नितम्ब को दबाते दूसरे हाथ की बीच वाली उंगली से फिर उसके गुदा के छेद को खोदने लगा था।
ऐसा नहीं था कि इस लिंग प्रवेश पर उसे दर्द की अनुभूति नहीं हो रही थी मगर जो रोमांच उसे मिल रहा था वह उस दर्द पर हावी था। वह और आक्रामक अंदाज़ में चंदू के होंठ चूसने लगी थी।
और धीरे-धीरे चंदू का पूरा लिंग उसकी योनि में जा समाया।
इसके बाद वह स्थिर हो गई… उसने अपना चेहरा चंदू के चेहरे से हटा लिया और अपनी एक चूची पकड़ कर उसे चंदू के मुंह पर रगड़ने लगी।
चंदू ने होंठ खोले तो उसने चूचुक उसके होंठों में दे दिया और वह ज़ोर से उसे चूसने, खींचने लगा।
बीच बीच में दांत से कुतर लेता था और वह एक ‘आह’ के साथ लहरा जाती थी।
उसे फीड कराते वह अपनी कमर को एक लयबद्ध लहर तो दे रही थी लेकिन इस लहर को धक्कों में नहीं गिना जा सकता था।
जबकि चंदू ने अपने हाथों को नहीं रोका था और जो कर रहा था वही करने में अब भी लगा हुआ था और शीला एक हाथ से उसके सर को संभाले दूसरे हाथ से उसे चूची चुसा रही थी।
थोड़ी देर एक को अच्छी तरह से पीने के बाद चंदू ने मुंह हटाया तो शीला ने दूसरा स्तन उसके मुंह से लगा दिया और अब अपनी कमर को इस अंदाज़ में ऊपर नीचे करने लगी जैसे धक्के लगा रही हो।
अब चंदू ने दोनों हाथों को उसके नितंबों के निचले सिरे पर एडजस्ट कर लिया था और उसे ऊपर नीचे होने में सपोर्ट करने लगा था।
इधर उसके दोनों चेलों ने अपनी पोज़ीशन बदल ली थी और अब बाबर योनिभेदन कर रहा था जबकि भुट्टू मुख मैथुन और दोनों ही बेदर्दी से रानो के चूचों को मसल रहे थे।
इधर चंदू जब अच्छे से उसका दूसरा दूध भी पी चुका तो उसने एक पलटनी लेते हुए शीला को अपने नीचे कर लिया और खुद उस पर इस तरह लद गया कि उसका वज़न उसकी कुहनियों और घुटनों पर रहे।
बावजूद इसके मर्द का काफी वज़न इस अवस्था में औरत भी महसूस करती है जैसे शीला को लग रहा था कि वो चंदू के नीचे पिसी जा रही है, उसके बोझ से दबी जा रही है।
लेकिन इस दबने में उसका दम नहीं घुट रहा था बल्कि यह दबाव चंदू के हर धक्के के साथ इस वज़न में और बढ़ोत्तरी करके उसे और ज्यादा आनन्द दे रहा था।
चंदू इस अवस्था में अपनी लंबाई के कारण उसके सर से पार चला जाता अगर उसने खुद को सिकोड़ा न होता, अपनी पीठ को थोड़ा मोड़े हुए वह उसके होंठों को भी चूसने लग गया था।
इस तरह के तूफानी धक्कों से न सिर्फ पूरा बेड हिलने लगा था बल्कि कमरे में वो संगीतमय आवाज़ भी गूंजने लगी थी जो उसे और रोमांचित कर देती थी।
तभी जैसे भुट्टू ने उसके आनन्द में व्यधान डाला- भाई… मज़ा नहीं आ रहा। बहुत ढीली है… एकदम भककोल है। आप इधर आओ न! आप को तो फिर चल जायेगा।
उसके शब्द चाबुक से चले शीला के दिमाग पर… वह किसी भी हालत में इस वक़्त चंदू को नहीं छोड़ना चाहती थी।
पर चलनी तो चंदू ही की थी… उसने उन दोनों की मिस्कीन सूरत देखी और खुद शीला के ऊपर से हट गया।
‘चल आ जा बेटा… तू भी क्या याद करेगा।’
शीला को सख्त नागवार गुज़रा मगर कर भी क्या सकती थी।
यह और बात थी कि उसकी उत्तेजना एकदम ठंडी पड़ गई थी।
इस वक़्त रानो चौपाये की पोजीशन में झुकी हुई थी और दोनों उसके आगे पीछे लगे थे। चंदू का आदेश होते ही उन्होंने रानो को छोड़ा और शीला के पास आ गये।
और चंदू ने उसी पोजीशन में रानो को दबोच लिया।
वह उसे बिस्तर के किनारे करते खुद नीचे उतर कर खड़ा हो गया और रानो की कमर को दबाते हुए उसके नितंबों को पीछे से इस तरह खोल लिया कि उसकी योनि पूरे आकर में उभर आई।
वह उसकी योनि पर ढेर सा थूक उगलता हुआ बोला- है तो वाकई भककोल… पर उस लौंडे का सामान तो इतना बड़ा नहीं था, होता तो गुठली की भी इतनी ढीली होती। तेरी कैसे हो गई?
रानो कुछ न बोल सकी।
उसने ज्यादा ज़ोर भी न दिया और अपना लिंग पकड़ कर अंदर ठूंस दिया।
चाचा के लिंग से उसकी योनि की यह हालत हुई थी मगर चंदू का लिंग भी कम नहीं था।
इसलिये चंदू को उतना ढीलापन न महसूस हुआ जिसकी शिकायत दोनों चेले कर रहे थे और वह रानो की कमर को मुट्ठियों में भींच कर ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा।
भुट्टू शीला के साइड में बैठ कर उसके मुंह में लिंग घुसाये उसके वक्ष को मसलने लगा था और बाबर नीचे उसके पैरों के बीच बैठ कर अपना लिंग अंदर घुसाने लगा था।
उसे कोई तकलीफ न हुई और आराम से अंदर चला गया। बाबर भी उसके ऊपर लद गया लेकिन उसकी लंबाई कम थी जिससे वह स्तंभन करते हुए उसके वक्षों को चूस चुभला सकता था।
अब फिर दोनों तरफ आघात होने लगे और कमरे में सहवास की मधुर ध्वनि गूंजने लगी।
यह और बात थी कि शीला अब उस यौन आनन्द को नहीं महसूस कर पा रही जो उसे चंदू से मिल रहा था।
मगर वह दोनों फिर भी थोड़े थोड़े धक्कों में जगह बदल बदल कर लगे हुए थे।

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