बाप के रंग में रंग गई बेटी

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Kamini
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Re: बाप के रंग में रंग गई बेटी

Post by Kamini » 05 Sep 2017 15:36

जब मनिका को पता चला कि आज फाइनली उसकी और उसके पिता की मुलाक़ात होने वाली है, तो वो तो ख़ुशी के मारे फूलि ना समाई, उसकी आँखों के सामने उस रात का मंज़र आ गया जब उसके पापा और उसके बीच सब कुछ होने ही वाला था, उस रात को याद कर मनिका गर्म होने लगी

"अरे मणि कहाँ खो गयी बेटी, आज तो आखिर तेरी मुलाकात हो ही जाएगी तेरे पापा से" मधु मनिका को टोकते हुए बोली

"जी मम्मी....." मनिका थोड़ी सकपकाते हुए बोली और फिर तुरन्त अपने कमरे की तरफ चल
दी


मनिका ने कमरे में आकर अंदर से कमरे को बंद किया और फिर सीधा बेड पर आकर गिर गई, पापा के आने की खुशि से उसकी सांसे भारी होने लगी, उसका रोम रोम रोमांचित हो उठा,
"उन्ह्ह्ह्ह…ह्म्प्फ़्फ़्फ़्फ़…ओह्ह पापाआआआ, अब जाकर मेरी तमन्ना पूरी होगी, 1 साल बाद आपको देखूंगी, हाय कैसा होगा वो पल " मनिका अपने पापा से मिलने के सपने संजोते हुए अपने आपको आईने में देख सजने संवरने लगी, ऐसा लग रहा था जैसे वो अपने पापा से नही अपने लवर से मिलने वाली हो,

इधर जयसिंह अब घर जाने के लिए रवाना हो गया, उसके मन मे हल्का हल्का डर तो था पर उसके पास और कोई विकल्प भी नहीं था, आज नहीं तो कल उसे मनिका का सामना करना ही पड़ेगा, इसी उधेड़बुन में लगा जयसिंह जल्दी ही अपने घर पहुंच गया, उसने अपनी गाड़ी गेराज में खड़ी की ओर घर के अंदर आ गया,

जैसे ही मनिका ने घर के बाहर गाड़ी की आवाज़ सुनी, उसका दिल जोरो से धड़कने लगा, उसके शरीर मे हज़ारो चींटिया सी रेंगने लगी, वो धड़कते दिल के साथ अपने कमरे से बाहर निकली, और सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए हॉल की तरफ बढ़ने लगी,

जयसिंह सोफे पर दूसरी तरफ मुंह करके बैठा था, उसकी पीठ मनिका की तरफ थी, इसलिए वो मनीका को आते हुए नही देख पा रहा था, कनिका और हितेश अपने पापा के साथ बैठकर अपनी स्कूल की बाते बता रहे थे,

मनिका शर्म के मारे आंखे झुकाए हुए स्लो मोशन में ऐसे आगे बढ़ रही थी कि मानो वो अपनी सुहागरात की सेज की तरफ बढ़ रही हो, जैसे जैसे वो नज़दीक जा रही थी उसे अपनी सांसे भारी होती महसूस हो रही थी,
अब वो सोफे के बिल्कुल पास आ गई थी


"पापाआआआ.............." मनिका ने कांपते होठों से जयसिंह को पुकारा

जयसिंह ने जैसे ही नज़रें घुमाई, उनके सामने मनिका अपनी पलके झुकाए खड़ी थी,
"शहर जाकर उसकी सुंदरता में चार चांद लग गए थे, उसकी काली झील जैसी आंखे , तीखे नैन नक्श, पतले गुलाबी होंठ जिनका जयसिंह दीवाना हुआ करता था, वो ऐसे खड़ी थी मानो अजंता की कोई मूरत " जयसिंह ने जब उसे देखा तो देखता ही रह गया, उसके मुंह से शब्द ही नही निकल रहे थे,अभी थोड़ी देर पहले जिस मनिका से वो दूर रहने की सोच रहे थे, उसके चांदी जैसे खूबसूरत बदन को देखकर जयसिंह का मन एक पल के लिए डोल गया पर दूसरे पल ही उन्हें अपने से किया हुआ वादा याद आ गया कि अब वो मनिका से जितना दूर हो सके रहेंगे, और उन्होंने तुरंत अपनी धोखेबाज़ नज़रो को उस पर से हटा लिया,

"पापाआआआ......आप कैसे हो............???? " मनिका ने दोबारा अपनी पलके झुकाए ही पूछा

"ममम्मम मैं......ठीक हूँ.... मणि......तुम्म्म्म्म कैसी हो....." जयसिंह ने अपनी पूरी हिम्मत समेटकर पूछा

"मैं भी ठिक्क हूं... पापा" मनिका ने जवाब दिया

"तुम्म्म्म्म बैठो, मैं थोड़ा हाथ...मुंह धोकर आता हूँ मणि......." जयसिंह ने कांपते हुए कहा और बिना नज़रे फेरे ही सीधा अपने रूम में चले गए

अंदर आकर वो सीधा बाथरूम में घुस गए.....और हथेलियों से पानी अपने मुंह पर मारने लगे, उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था मानो कहीं दूर से भागकर आ रहे हो, उनकी हार्ट बीट तेज़ हो गई थी, उन्हें पसीना आने लगा, उन्होंने तुरंत अपने कपड़े निकाले और शावर के नीचे आकर खड़े हो गए


शावर से निकलती पानी की बूंदे जब उनके शरीर को भिगोने लगी तो उनको कुछ रिलैक्स महसूस होने लगा

" चिंता मत कर जयसिंह, सब ठीक हो जाएगा.... देख उसने खुद तेरे से आकर बात की, इसका मतलब शायद वो तुझे माफ कर चुकी है...... हो सकता है समय के साथ उसकी नफरत कम हो गई हो........तू बस उससे आराम से बात कर...... जितना कम हो सके उतनी ही बात कर ....हो सकता है वो तुझे एक और मौका दे दे अपनी गलती सुधारने का.....नहीं नहीं वो हमेशा से गुस्सेल रही है.... वो मुझे कभी माफ नही करेगी.....अगर उसने मधु को बता दिया तो........नहीं वो मधु को नही बताएगी....अगर बताना होता तो अब तक बता चुकी होगी.....शायद वो तुझे सुधरने का एक मौका दे रही है....इस मौके को मत गंवाना ....." जयसिंह अपने अन्तर्मन से बाते कर रहा था
नहाने के बाद उसने अपना पजामा पहना ओर ऊपर टीशर्ट डालकर वापस हॉल की तरफ बढ़ने लगा, मधु ने अब तक खाना लगा दिया था, सभी लोग जयसिंह का ही इंतेज़ार कर रहे थे,

जयसिंह आकर सीधा अपनी कुर्सी पर बैठ गया ( जहाँ अक्सर घर का मुखिया बैठता है ) उसके एक तरफ मधु और कनिका थी तो दूसरी तरफ मनिका और हितेश

मधु ने सबकी प्लेट्स में खाना सर्व किया, सबने खाना खाना शुरू कर दिया....मनिका और जयसिंह दोनों ही बिल्कुल धीरे धीरे खाना खा रहे थे, जयसिंह के तो निवाला बड़ी मुश्किल से गले से नीचे उतर रहा था...

इधर मनिका अपने पापा के इतने पास बैठकर उनके जिस्म से निकलती गर्मी को महसूस करने की कोशिश कर रही थी, जयसिंह को आज इतने दिनों बाद अपने नज़दीक पाकर उसके बदन में हल्की हल्की चिंगारियां सी फुट रही थी ...वो प्यासी निगाहों से अपने पापा को देख रही थी,

अजीब सी विडंबना थी कि ठीक 1 साल पहले उसके पापा उसको प्यासी निगाहों से देखते थे और वो बचने की कोशिश करती थी पर आज मनिका उन्हें प्यासी निगाहों से देख रही थी और जयसिंह बचने की कोशिश कर रहे थे,
सही बात ही है " जैसा बाप वैसी बेटी"

"अरे तुम दोनों इतने चुप क्यों हो, कोई झगड़ा हुआ है क्या तुम दोनों का" मधु ने जयसिंह और मनिका को इशारा करते हुए कहा

" नहीं....तो मम्म्म्ममी..... ऐसी तो कोई बात नही" मनिका झिझकते हुए बोली

"हां मधु ऐसी कोई बात नही है" जयसिंह भी लगभग मनिका के साथ ही बोल पड़ा

"तो फिर इतनी चुप्पी क्यों है , पहले तो आप लोगो की चपर चपर बन्द ही नही होती थी और अब देखो जैसे एक दूसरे को जानते ही नही हो" मधु ने उन्हें चिढ़ाते हुए कहा

जयसिंह तो बिल्कुल सुन्न हो चुका था, उसे समझ नही आ रहा था कि क्या बोले, पर इससे पहले की वो कुछ बोले, मनिका बीच मे बोल पड़ी


" अरे मम्मी, हम लोग तो वैसे भी हमेशा फ़ोन पर काफी बात कर लेते है, ओर वैसे भी खाते टाइम ज्यादा बात नहीं करनी चाहिए, आप चिंता मत करो, मैं पापा को इतना सताऊंगी, इतनी बाते करूंगी कि इन्हें खुद मुझे चुप कराना पड़ेगा" मनिका ने बात सम्भालते हुए बड़े ही शातिर तरीके से जवाब दिया और जयसिंह की तरफ तिरछी नज़रो से देखने लगी

मनिका की बात सुनकर बाकी लोग तो हसने लगे पर जयसिंह की हालत खराब हो गई, उसे समझ नही आ रहा था कि वो क्या करे इसलिए वो भी बेमन से थोड़ा सा मुस्कुरा दिया, पर उसके माथे पर शिकन की लकीरें उभर आई,
अब जयसिंह ने खाना खा लिया था, ऐसे भी वो अक्सर कम ही खाता था, सो वो उठकर किचन की तरफ हाथ धोने बढ़ा, पर इससे पहले की वो आगे बढ़े मनिका ने भी उठकर बोला कि उसका खाना हो गया है और वो तेज़ तेज़ कदमों से चलते हुए जयसिंह से पहले ही किचन में घुस गई,

उसे किचन में जाता देख एक बार तो जयसिंह ठिठका पर उसे हाथ तो धोने ही थे सो वो अंदर की ओर चल पड़ा,

मनिका किचन में हाथ धो रही थी, जयसिंह उससे थोड़ा दूर जाकर ही खड़ा हो गया
मनिका ने वाशबेसिन में हाथ धोने से पहले अपनी कुर्ती को चुपके से साइड में कर लिया था, जिससे उसकी सुंदर सी गांड उभरकर सामने आ रही थी, जयसिंह की धोकेबाज़ नज़रे तुरंत उसकी ठुमकती गांड की तरफ उठ गई, उस पर जैसे बिजली सी गिर पड़ी,
उधर मनिका जान बूझकर हाथ धोते समय अपनी कमर और गांड को होले होले हिला रही थी,

जयसिंह ने तुरंत अपनी नज़रे दूसरी तरफ फेरनी चाही पर इससे पहले की वो अपना चेहरा घुमा पाता, उस पर एक और गाज गिर पड़ी, मनिका ने जानबुझकर अपना रुमाल नीचे गिरा दिया था और अब वो उसे हटाने के लिए झुकी हुई थी


उसकी पतली सी लिंगरी उसकी मांसल जांघो से बिल्कुल चिपक गयी थी, और स्ट्रेच होने की वजह से लिंगरी हल्की सी पारदर्शी हो गयी थी, जिसमे से उसकी ब्लू कलर की छोटी सी खूबसूरत पैंटी जयसिंह की आंखों के सामने आ गयी, उसकी मोटी सी मांसल गदरायी गांड पर उस छोटी सी पैंटी को देखकर जयसिंह की सांसे ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गयी, उसका चेहरा गरम होने लगा, उसे अपने लन्ड में तनाव महसूस होने लगा,और जल्द ही उसने विकराल रूप ले लिया जिससे उसके पाजामे में उभार बन गया, मनिका जानबुझकर रुमाल उठाने में ज्यादा वक्त लग रही थी, उसने कनखियों से जयसिंह की ओर देखा तो पाजामे में उसके लन्ड का उभार उसकी आँखों से छुप नहीं पाया, उसके चेहरे पर एक शातिर हंसी आ गयी

जयसिंह से अब ओर ज्यादा बर्दास्त नही हो रहा था, उसका लन्ड पूरा उफान पर आ चुका था पर वो ये जनता था कि अगर मनिका ने उसे इस हालत में देख लिया तो गज़ब हो जाएगा, उसकी नफरत जो थोड़ी बहुत कम हुई है वो दोबारा बढ़ जाएगी, इसलिए इससे पहले की मनिका उसे देखे जयसिंह तुरन्त वहां से हटा और अपने उभार को छुपाते हुए अपने कमरे की तरफ चल पड़ा
कमरे में आते ही वो सीधा बाथरूम में घुस गया, और जल्दी जल्दी अपने हाथ धोने लगा

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Re: बाप के रंग में रंग गई बेटी

Post by Kamini » 05 Sep 2017 15:37

"तू पागल है क्या जयसिंह, एक बार जो गलती की थी अभी तक उसकी सजा भुगत रहा है और अब दोबारा वही गलती करने जा रहा था, अगर वो तुझे देख लेती तो" जयसिंह के अन्तर्मन से आवाज़ आई

अब डर के मारे जयसिंह का खड़ा हुआ लन्ड वापस बैठने लगा पर आज मनिका के इस गांड दर्शन ने उसके अंदर के मर्द को दोबारा जगा दिया था,

इधर बाकी लोगों ने भी खाना खा लिया था और अपने अपने रूम में चले गए, मधु ने बर्तन साफ किये और बाकी छोटा मोटा काम खत्म करके रूम में आ गयी,


आज जयसिंह की महीनों से दबी वासना बाहर निकल चुकी थी और वो जनता था कि अगर ये वासना शांत न कि तो दोबारा कहीं वो कुछ गलत न कर दे,

मधु ने कमरे के अंदर आकर अपनी साड़ी उतारी और नाइटी पहनने लगी, वो अक्सर सोते समय अपनी ब्रा उतार देती थी सो उसने अपनी ब्रा भी निकाल दी और टीशर्ट पहन ली

वैसे तो मधु लगभग 42 साल की थी पर उसने अपने आपको बिल्कुल मेंटेन किया हुआ था, दिखने में लगभग 30-32 साल की महिला ही लगती थी, कसा हुआ बदन, तीखे नैन नक्श, कजरारी आंखे, सांचे में ढली हुई कमर, भारी नितम्ब और सुडौल जाँघे , जिन्हें देखकर कोई भी दीवाना हो जाये
"आज बहुत खूबसूरत लग रही हो तुम" जयसिंह ने उसकी ओर देखकर कहा

"मैं तो हमेशा जैसी लगती हूं वैसी ही हूँ" मधु ने जवाब दिया

"पर आज तुम कुछ अलग सी लग रही हो" जयसिंह ने मादक आवाज़ में कहा

"हम्म्म्म, चलो कभी तो आपने ध्यान दिया, वैसे आज क्या अलग रह है आपको मुझमे" मधु ने इठलाते हुए कहा और आकर जयसिंह के साथ बेड पर लेट गयी

"पता नहीं पर आज तुम्हें देखकर मन में अजीब से ख्याल आ रहे है" जयसिंह ने ट्यूबलाइट के स्विच बन्द करते हुए कहा...अब सिर्फ उसके टेबल लैंप की हल्की हल्की रोशनी हो रही थी

"और वो अजीब से ख्याल क्या हैं भला" मधु भी अब जयसिंह की मंशा समझ चुकी थी और सच पूछो तो वो तो कई दिनों से इसके लिए तड़फ रही थी पर कभी उससे बोलने की हिम्मत ही नही हुई और कभी हिम्मत होती तो जयसिंह की नीरसता देखकर मन मार लेती, पर आज जयसिंह के बदले मूड को देखकर उसके शरीर मे चींटिया सी रेंगने लगी

"मुझे ऐसा लग रहा है कि तुम्हे कच्चा ही खा जाऊं, क्योंकि आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो" जयसिंह ने मधु की टीशर्ट के अंदर हाथ डालते हुए कहा

"अच्छा अगर हिम्मत है तो खाकर दिखाइए " मधु ने इतराकर जवाब दिया

अब जयसिंह ने टीशर्ट के अंदर से ही उसकी खरबूजे जैसी चुंचियो को अपने हाथों में भर लिया और तुरंत उसके ऊपर आकर उसके होठों को चूमने लगा, महीनों बाद अपने पति के स्पर्श से मधु एकदम से उत्तेजित हो गयी, उसके निप्पल हार्ड होकर तन गए जयसिंह बीच बीच में अपनी अंगुलियों से उसके निप्पलों को कुरेद देता जिससे मधु के शरीर मे आनन्द की एक लहर सी दौड़ जाती, अब वो दोनों पागलो की तरह एक दूसरे को चूम रहे थे, जयसिंह अपने मुंह से मधु की जीभ को पकड़कर चूसता ओर मधु भी ठीक वैसा ही करती,

जयसिंह का लन्ड अब तनकर बिल्कुल खड़ा हो गया था जो मधु की जांघो के बीच आ रहा था
जयसिंह को अब बर्दास्त करना मुश्किल हो रहा था ,,
,
उसने पलक झपकते ही मधु की टीशर्ट और नाइटी को उसके शरीर की गिरफ्त से आज़ाद कर दिया , अब मधु एक छोटी सी पैंटी में थी जिसमे उसके भारी भरकम नितम्ब बड़ी मुश्किल से समय हुए थे, जयसिंह ने उसकी पैंटी की इलास्टिक में अपनी अंगुलिया फ़साई और एक झटके में उसे निकालकर फेंक दिया, आज महिनों के बाद जयसिंह ने उसकी चुत के दीदार किये थे

मधु हमेशा अपने शरीर की साफ सफाई करती थी, हालांकि उसे चुदाई किये हुए काफी वक्त हो गया था पर फिर भी वो रेगुलरली अपनी चुत के बालों की सफाई करती रहती थी।

जयसिंह ने जब उसकी गुलाबी चुत को देखा तो उसके सब्र का बांध टूट गया, वो उस प्यारी सी चुत पर पागलो की तरह टूट पड़ा और उसे अपने मुंह मे भरकर चूसने लगा, मधु की चुत से निकलती मादक खुसबू उसके नथुनों में भर गई,


इतने दिनों बाद अपनी चुत पर जयसिंह के होठों का स्पर्श पाते ही मधु के शरीर मे सिहरन सी दौड़ गयी, जयसिंह ने अपना मुंह मधु की चुत में घुसा रखा था और अपने दोनों हाथों से उसकी दोनों चुचियों को मसल रहा था, इस दोतफ हमले के सामने मधु ज्यादा देर न टिक पायी और एक जोरदार अँगड़ाई के साथ उसकी चुत ने पानी छोड़ दिया, जयसिंह सारे पानी को अपनी जीभ से चाट गया, अब जयसिंह ने अपनी जीभ को गोल करके मधु की चुत की गहराइयों में घुसाना शुरू किया, मधु तो जैसे जन्नत की सैर कर रही थी, उसने अपने दोनों हाथों से जयसिंह के सर को पकड़ा और उसे अपनी चुत की तरफ धकेलने लगी, लगभग 10 मिनट के अंदर ही वो दोबारा झड़ गई,

अब जयसिंह ने उसकी चुत पर से अपना मुंह उठाया और अपना पाजामे और टीशर्ट उतारना लगा, पाजामे उतरते ही उसका लम्बे लन्ड स्पंज की भांति उछलकर मधु के चेहरे के सामने आ गया, मधु ने जब लंड को इस तरह ठुमकते हुए देखा तो उससे बर्दास्त न हुआ और उसने लपककर लंड को अपने मुंह मे भर लिया और अंदर ही अंदर उसके सुपाडे पर अपनी जीभ फेरने लगी, जयसिंह को अपने लन्ड के इर्द गिर्द इतनी गर्माहट पाकर असीम आनन्द की अनुभूति होने लगी, वो मधु का सर पकड़कर अपने लंड को और अंदर घुसाने लगा, अब मधु का मुंह पूरी तरीके से जयसिंह के लन्ड से भरा हुआ था,

थोड़ी देर इसी तरह लंड चुसवाने के बाद जयसिंह ने अपना लन्ड बाहर निकाला और मधु की चुत के मुहाने पर सेट करके एक जोरदार धक्का दिया जिससे उसका आधा लन्ड चुत के अंदर घुस चुका था, महीनों से अनचुदी चुत में जब लन्ड का प्रवेश हुआ तो मधु के बदन में एक टिश सी उठी पर उसने अपने होंठों को बंद करके अपनी आवाज़ बाहर नही निकलने दी

जयसिंह ने दोबारा अपने लैंड को थोड़ा बाहर निकाला और इस बार पूरी ताकत के साथ दोबारा चुत में घुसा दिया, उसका पूरा का पूरा लंड चुत में घुस चुका था, इस बार मधु सम्भाल न सकी और उसके मुंह से हल्की सी चीख निकल गयी,

जयसिंह ने अब ताबड़तोड़ धक्के लगाना शुरू कर दिया था, हर धक्के में उसका लन्ड मधु की बच्चेदानी से टकरा रहा था,

मधु तो मजे के मारे दोहरी हो गयी, उसके मुंह से हल्की हल्की आवाज़े निकलनी शुरू हो गई,
उन्ह्ह्ह्ह…ह्म्प्फ़्फ़्फ़्फ़… ओहहहहहह यस ओहहहहहहह यस"
ओह्हहहहहह कितना तड़पाया है आपने........ओह्हहहहहह ह्म्प्फ़्फ़्फ़्फ़

लगभग 20 मिनट के घमासान के बाद जयसिंह और मधु साथ साथ झाड़ गए, उनके पानी का मिश्रण मधु की चुत से होता हुआ बेडशीट के ऊपर टपक रहा था, दोनों अभी भी बुरी तरह हांफ रहे थे, और जयसिंह का लंड अभी भी मधु की चुत में ही घुस था, पर अब दोनो की वासना सन्तुष्ट हो चुकी थी, इसलिए वो दोनों नंगे ही चुत में लंड घुसे हुए एक दूर की बाहों में मजे से सो गए।

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Re: बाप के रंग में रंग गई बेटी

Post by shubhs » 05 Sep 2017 18:22

एक नई शुरूआत
सबका साथ सबका विकास।
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, और इसका सम्मान हमारा कर्तव्य है।

Saileshdiaries
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Re: बाप के रंग में रंग गई बेटी

Post by Saileshdiaries » 07 Sep 2017 06:16

मस्त अपडेट, अगला अपडेट भी जल्दी दीजियेगा..!!
बहुत छोटा सा है ये सफर जिंदगी का,
हर एक पल को दिल से जियो..!!
आपका दोस्त - शैलेश
:)

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shubhs
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Re: बाप के रंग में रंग गई बेटी

Post by shubhs » 08 Sep 2017 18:17

भाई अपडेट
सबका साथ सबका विकास।
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, और इसका सम्मान हमारा कर्तव्य है।

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