अधूरी हसरतें

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Kamini
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Re: अधूरी हसरतें

Post by Kamini » 03 Dec 2017 09:01

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Re: अधूरी हसरतें

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rajaarkey
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Re: अधूरी हसरतें

Post by rajaarkey » 04 Dec 2017 12:06

mast.....................
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Rohit Kapoor
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Re: अधूरी हसरतें

Post by Rohit Kapoor » 07 Dec 2017 12:56

निर्मला अपने बेटे के कमरे में खड़े-खड़े अपने बेटे के टनटनाए हुए लंड को देख कर चुदवासी हुए जा रही थी। कार के अंदर अपने बेटे से जबरदस्ती चुदाई का वह एहसास अभी भी उसके मन में ताजा था वह जानती थी कि उसके बेटे का मोटा लंड उसकी बुर में एकदम रगड़ता हुआ अंदर बाहर होता था। जिसकी रगड़ की गर्मी में उसकी बुर की अंदरूनी दीवारे पसीज पसीज कर पानी छोड़ रही थी। अपने बेटे के लंड को देखकर उसका जोर-जोर से कमर हिलाना याद आ गया जो कि बिना रुके अपनी गति को बिना परिवर्तित कीए एक ही लय में उसकी बुर में अंदर बाहर डालते हुए उसे चोद रहा था। शुभम की जबरजस्त कमर हिलाई से ही वह समझ चुकी थी कि उसके बेटे में बहुत दम है। क्योंकि इस तरह के जबरदस्त प्रहार के साथ आज तक अशोक ने कभी भी उसकी चुदाई नही किया था,,, अशोक का लंड को बुर की पूरी तरह से गहराई भी कभी नहीं नाप पाया था और शुभम हर धक्के के साथ निर्मला की बुर की गहराई में उतर जाता था। उसे यकीन नहीं हो पा रहा था कि सुबह इतनी जबरदस्त धक्कों के साथ उसकी चुदाई करेगा और इतनी देर तक टिका भी रहेगा वरना अशोक तो पत्ते की महल की तरह दो चार धक्को मेही ढेर हो जाता था।
निर्मला की सांसो की गति गति तीव्र गति से चल रही थी बड़ा ही मोहक और मादक नजारा कमरे का बना हुआ था शुभम बिस्तर पर पीठ के बल एकदम चित लेटा हुआ था,,, उसका लंड नींद में होने के बावजूद भी पूरी तरह से छत की तरफ मुंह उठाए खड़ा था। निर्मला के बदन में हलचल सी मची हुई थी उसकी बुर उत्तेजना के मारे पानी पानी हुए जा रही थी पेंटी पूरी तरह से गीली होने लगी थी। निर्मला की बुर में चीटियां रेंगने लगी थी एक ही दिन में यह दूसरी बार था जब उसका मन चुदवाने को व्याकुल हुए जा रहा था। निर्मला की सांसे बड़ी ही तीव्र गति से चल रही थी। रिश्तो के बीच की मर्यादा की डोरी को उसने रात को ही कार के अंदर तोड़ चुकी थी,,,, मान मर्यादा संस्कार सब कुछ पीछे छुट़ चुका था
शुभम के कुंवारेपन को खुद उसकी मां ही तोड़ चुकी थी।
शुभम के मन में कोई भी पछतावा नहीं था इसलिए तू एकदम गहरी नींद में बेफिक्र होकर वह सो रहा था और निर्मला थी की,, एक बार फिर से उसके मन में चुदवाने की कसक जगने लगी थी। वैसे भी वह कर भी क्या सकती थी चुदाई का सुख होता है इतना बेहतरीन और आनंद दायक कि इंसान उस सुख को पाने के लिए हमेशा लालायित रहता है। एक बार निर्मला ने अपने बेटे के लंड को अपनी बुर में ले चुकी थी इसलिए सारी सरमाया दूर हो चुकी थी लेकिन थोड़ी सी झिझक अभी भी उसके मन में थी। क्योंकि उस समय तो मौसम भी कुछ हद तक बेईमानी पर उतर आया था दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति आकर्षण का बल कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था। जो कि धीरे-धीरे वह आकर्षण संभोग में तब्दील हो गया पर यहां तो शुभम गहरी नींद में सो रहा था। लेकिन उसका लंड पूरी तरह से ऐसा खड़ा था कि मानो किसी की चुदाई करने जा रहा हो,,, तभी निर्मला को ख्याल आया कि कुछ ही घंटे पहले शुभम ने उसकी जमकर चुदाई किया था हो सकता है अभी भी उसके सपने में वह उसे ही चोद रहा हो तभी तो उसका लंड इस तरह से टनटना कर खड़ा है। जैसे कि उस रात वह शुभम से चुदने का सपना देख रही थी।
निर्मला को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें कमरे का माहौल पूरी तरह से गरमा चुका था एक तरफ उसका बेटा पूरी गहरी नींद में लेटा हुआ था जिसका लंड तनकर एकदम छत की तरफ मुंह उठाए खड़ा था। और दूसरी तरफ निर्मला जोशी उसके बिस्तर के करीब खड़ी होकर उसके लंबे लंड को ही देखे जा रही थी और एक बार फिर से उसकी बुर कुबुलाने लगी थी अपने बेटे के लंड को पूरी तरह से अपने अंदर उतारने के लिए। निर्मला की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी इसलिए उसने अपने साड़ी पूरी तरह से कमर तक उठा कर पैंटी के ऊपर से ही अपनी बुर को रगड़ना शुरु कर दी थी जो की पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। निर्मला घर आने पर अपने कपड़े चेंज नहीं की थी । यह वही उत्तेजक कपड़े थे जिसे देखकर शुभम का मनं डगमगाने लगा था। उसकी आंखों में अपनी मां के बदन से संसर्ग करने लिए एक चमक सी नजर आने लगी थी। निर्मला के साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिर चुका था जिससे उसकी भारी भरकम छातियां शुभम के होश उड़ाने के लिए पूरी तरह से तैयार थी वह अभी नींद में था निर्मला को यह समझ में नहीं आ रहा था कि उसे जगाना ठीक रहेगा या नहीं। क्योंकि उसे इस तरह से गहरी नींद में जगाने से कहीं उसका जोस ठंडा ना हो जाए यही सोचकर उस ने उसे नींद से नहीं जगाई। लेकिन अपनी उत्तेजना अपनी प्यास कैसे बुझाएं यह भी उसे समझ में नहीं आ रहा था। धीरे-धीरे उत्तेजना के मारे उसने अपनी पैंटी को जांघो तक सरका दी थी। उसकी चिकनी रसीली बुर फुल कर गरम रोटी की तरह हो गई थी जो कि उसमें से मालपुआ के समान रस टपक रहा था। यह मालपुआ कारण मर्दों के लिए किसी अमृत से कम नहीं था जिसे वह किसी बर्तन से नहीं बल्कि खुद ही अपनी जीभ लगा कर उसके स्वाद का रसपान करने के लिए तड़पते रहते हैं। मर्द औरत के मालपुआ में से टपक रहे मदन रस का रसपान किस तरह से करते हैं उसका अनुभव अभी तक पूरी तरह से निर्मला को भी नहीं था क्योंकि उसने अभी तक अशोक द्वारा एक कला का उपयोग पूरी तरह से नहीं कर के देखी थी शुरु शुरु में इस तरह की कला का प्रदर्शन अशोक द्वारा जरुर हुआ था लेकिन उस समय के माहौल के अनुसार इस समय का माहौल पूरी तरह से बदल चुका था जो कि उसके मानस पटल पर से पूरी तरह से बिसर चुके थे। वह धीरे धीरे अपनी बुर में अपनी उंगली को उतारना शुरू कर दी,,, साथ ही जैसे जैसे वह अपनी उंगली को अंदर बाहर करते जा रही थी,, उसकी सांसो की गति और भी ज्यादा तीव्र होती जा रही थी। निर्मला अपनी बुर की प्यास बुझाने के लिए पूरी तरह से तड़प रही थी व्याकुल हुए जा रहे थे उसे कुछ सूझ नहीं रहा था तभी उसने कुछ ऐसा कर डाला जिसके बारे में उसने कभी सोची भी नहीं थी और ना ही कभी आज तक ऐसा की थी।
निर्मला धीरे धीरे करके अपनी पेंटि को पूरी तरह से अपनी लंबी चिकनी टांगो से बाहर कर दी,,,, और साड़ी को भी उतार फेंकी,,,, साड़ी को उतार ने के बाद वह अपनी पेटीकोट की डोरी को खोलकर पेटीकोट को भी नीचे फर्श पर फेंक दी। उसे अपने बदन की गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रही थी इसलिए जल्दी-जल्दी अपने ब्लाउज के बटन को खोलकर ब्रा सहित उसे भी उतार फेंकी,,, निर्मला इस समय बिल्कुल नंगी हो चुकी थी किस तरह से उसने अब तक शर्म की चादर ओढ़ कर अपनी संस्कार को अपने अंदर से कभी भी दूर नहीं होने दी थी उसी तरह से आज उसने अपने संस्कार और शर्म की चादर को अपने ऊपर से पूरी तरह से उतार कर पूरी तरह से बेशर्म हो चुकी थी। निर्मला का यह रूप आज तक किसी ने नहीं देखा था खुद शुभम भी उसका नया और कामी रुप देख कर हैरान हो चुका था। लेकिन अपनी मां के इस नए रूप को देखकर क्रोध करने की जगह वह इस कामुक रूप देखकर पूरी तरह से प्रशन्न और उत्तेजित हो चुका था। अगर ईस समय वह जाग रहा होता तो शायद जिस तरह का वाक्या रात को दोनों के बीच घट चुका था उसे देखते हुए इस समय निर्मला को कुछ भी करने की जरूरत नहीं थी जो भी करना था वह शुभम खुद ही करता। वह खुद ही अपनी मां की साड़ी को उतारता उसकी ब्लाउज के बटन को खोलता उसकी पेटीकोट की डोरी को खोलकर उस की पेटीकोट को नीचे सरका देता,,,,और ऊसकी गीली पेंटी को उतार कर कब अपने मुसल जेसे लंड को उसकी बुर में उतार देता इसका अंदाजा शायद निर्मला को भी नहीं था। लेकिन अभी शुभम सो रहा था इसलिए जो भी करना था वह निर्मला को ही करना था निर्मला एक बार अपनी दूर को अपनी हथेली से रगड़ी और अगले ही पल अपने बेटे के बिस्तर पर चढ़ गई,,,,
और देखते ही देखते निर्मलां घुटनों के बल आगे बढ़ते हुए,,,, उसकी कमर के करीब पहुंच गई और एक घुटने को आगे बढ़ाकर उसकी कमर के बगल में रखी और दूसरे घुटने को आगे की तरफ करके शुभम के कमर के इर्द गिर्द अपनी पोजीशन को ठीक तरह से बना ली,,,,,, वह एक नजर अपने बेटे पर डाली तो बड़ी मासूमियत के साथ वह गहरी नींद का आनंद ले रहा था जिसे देखकर उसके होठों पर मुस्कान खिल गई,,,, मैं धीरे से एक हाथ नीचे ले जाकर अपने बेटे के खड़े लंड को पकड़ ली,,, लंड की गर्माहट उसके बदन को पूरी तरह से झन झनाकर रख दी,,,, उत्तेजना के मारे निर्मला का गला सूख रहा था,,,,,, वह जिस तरह की हिम्मत आज दिखाने जा रही थी इस तरह की हिम्मत के बारे में कभी उसने ना कल्पना की थी और ना ही अशोक के साथ ऐसी हिम्मत दीखाने की कोशिश हि की थी जिस के साथ वह चुदाई का पूरी तरह से मजा ले सकती थी। लेकिन उस समय संस्कार और मर्यादा की दीवार इतनी ज्यादा लंबी थी कि वह उस दीवार को लांघने की सोच भी नहीं सकती थी,,,, लेकिन इस समय उसके बदन पर वासना के पर लग चुके थे जिससे वह इस तरह की दीवारें लांघने में पूरी तरह से सक्षम हो चुकी थी।

निर्मला अपने बेटे का लंड थामें नजरें झुका कर अपनी बुर की गुलाबी छेंद की तरफ देख रही थी और लंड के सुपाड़े से टटोल कर अपनी गुलाबी बुर का सुराग ढूंढ रही थी। और जैसे ही सुपाड़े का स्पर्श बुर के गुलाबी छेद पर हुआ वैसे ही तुरंत निर्मला के बदन में जैसे करंट दौड़ गया हो,,,, उसका बदन पूरी तरह से एक अजीब से ऊन्माद में सिहर उठा। निर्मला को शुभम के लंड का ठिकाना मिल चुका था,,, वह एक पल की भी देरी किए बिना तुरंत अपना पूरा दबाव,,, शुभम के लंड पर बढ़ाने लगी। बुर पूरी तरह से गिली थी और एक बार शुभम निर्मला की बुर में लंड डालकर पूरी तरह से चोद चुका था,,, जिससे निर्मला की बुर का आकार शुभम के लंड के जितना बन चुका था इसलिए बड़े ही आराम से जिसे जिसे निर्मला अपनी भारी भरकम गांड का दबाव लंड पर बढ़ा रहीे थीे वैसे वैसे धीरे धीरे शुभम लंड ऊसकी मां की बुर मे धंसता चला जा रहा था। धीरे धीरे करके निर्मला अपने बेटे का लंड पूरी तरह से अपनी बुर के अंदर उतार ली और उसकी जांघों पर बैठ गई,,,,, निर्मला के बदन में पूरी तरह से उत्तेजना बढ़ चुकी थी।

ऊसकी सांसे बड़ी तीव्र गति से चल रही थी और सांसो के साथ साथ उसकी बड़ी बड़ी चूचियां भी ऊपर नीचे हो रही थी। बड़ा ही उत्तेजक नजारा था निर्मला अपने बेटे का लंड पूरा अपने बुर में उतार चुकी थी लेकिन सुबह के बदन में जरा भी हरकत नहीं हो रही थी वह पूरी तरह से गहरी नींद में था।
निर्मला से अब बिल्कुल भी रहा नहीं जा रहा था वह धीरे-धीरे शुभम के लंड पर उठने बैठने लगी,,,, निर्मला के बदन में उत्तेजना की लहर अपना असर दिखा रही थी निर्मला को बेहद आनंद की अनुभूति हो रही थी। धीरे-धीरे निर्मला अपनी गति को बढ़ाना शुरू कर दी उसे बहुत ही ज्यादा मजा आया था वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि इस तरह से अद्भुत आनंद की अनुभूति होती है। हालांकि अशोक ने शुरुआती दौर में निर्मला के साथ ऐसे आसन को करने की कोशिश कर चुका था लेकिन निर्मला होते शर्मीले स्वभाव के कारण निर्मला ही इनकार कर दी,,,, इसलिए ना तो ऐसे आसन का सुख अशोक ही भोग पाया और ना ही निर्मला को ऐसे आसन में मिलने वाली सुख की अनुभूति हो पाई इसलिए तो आज इस तरह का आसन आजमाकर वह बेहद आनंद की अनुभुती कर रही थी। उसकी गति अब बढ़ने लगी थी।
वह अब जोर-जोर से शुभम की लंड पर कुदने लगी थी।
ऊसकी बड़ी बड़ी चुचीयां हवा मे झुल रही थी। शुभम की नींद भाग चुकी थी वह अपनी मां की हरक़त देखकर पूरी तरह से उत्तेजना मे सरोबोर हो चुका था। वह कुछ भी बोल नहीं पाया बस उत्तेजना के मारे ं उसका मुंह खुला का खुला रह गया था। निर्मला शुभम की दोनों हाथ को पकड़कर उस की हथेलियों को अपनी दोनो चुचियों पर रख दि और शुभम भी मौके की नजाकत को समझते वह जोर जोर से दबाने लगा जैसे कि पके हुए आम को दबा रहा हो,,, मां बेटे दोनों के बीच किसी भी प्रकार का वार्तालाप नहीं हो रहा था दोनों एक दूसरे की आंखों में डूबते जा रहे थे। शुभम भी रह रह कर नीचे से धक्के लगा दे रहा था। निर्मला के ईस तरह से उछलने से पूरा पलंग हचमचा जा रहा था। दोनों को बेहद आनंद की प्राप्ति हो रही थी दोनों इसने रिश्ते से बेहद खुश नजर आ रहे थे। थोड़ी ही देर बाद निर्मला की सांसे और तेज चलने लगी उसका बदन अकड़ने लगा,,, शुभम का भी यही हाल था मेरी सांसे तेज चल रही थी और वहां की मौका देख कर नीचे से जोर जोर धक्के लगा रहा था। थोड़ी ही देर में दोनों एक साथ हांफते हुए झड़ने लगे। कुछ ही घंटों के अंतराल में शुभम और निर्मला का यह दूसरी चुदाई जो की दोनो को सम्पुर्ण संतुष्टी का एहसास करा गई थी।,,,,

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Re: अधूरी हसरतें

Post by Rohit Kapoor » 09 Dec 2017 14:46

दोनों ने एक बार फिर से संतुष्टि भऱा एहसास अपने बदन में महसूस कर चुके थे। निर्मला अपने बेटे के लंड के ऊपर सवार होकर भल भला कर झड़ने के बाद उसके ऊपर से उतर कर उसे से नजरें मिलाए बिना ही अपने कपड़े समेटे और उसे बिना पहने ही उसके कमरे से बाहर निकल गई लेकिन जिस तरह से निर्मला अपने कपड़ों को समेट कर ले कर जा रही थी बिस्तर पर लेटे लेटे शुभम अपनी मां को जाते हुए देख रहा था,,, उस की प्यासी नजर निर्मला की मटकती हुई गोल गांड पर ही टिकी हुई थी जो कि इस समय बेहद मादकता से भरा हुआ प्याला लग रहीे थी। निर्मला अच्छी तरह से जानती थी कि शुभम और उसके सिवा इस समय घर पर कोई भी नहीं था इसलिए वह बेझिझक अपने कपड़े पहने बिना ही वह कपड़ों को समेट कर कमरे से बाहर निकल गई और बिल्कुल नंगी ही चहल कदमी करते हुए बाथरुम के अंदर घुस गई।
घर का वातावरण पूरी तरह से बदल चुका था मां बेटे का रिश्ता अब वासना के समंदर में गोते लगाता हुआ ना जाने किस साहिल से टकरा रहा था या तो ना निर्मला ही जानती थी और ना ही शुभम,,,,, लेकिन दोनों इस नए रिश्ते से बेहद खुश हैं क्योंकि उनके चेहरे से साफ मालूम पड़ रहा था।
निर्मला की बुर से निकला मदन रस और शुभम के लंड से निकला पानी का फव्वारा दोनों मिलकर शुभम के लंड को पूरी तरह से भी हो चुके थे। शुभम अपने लंड की तरफ देख कर मन ही मन मुस्कुरा रहा था उसे अभी भी यकीन नहीं हो पा रहा था कि जिस बंदे को अपनी मुट्ठी में भरकर आगे पीछे हिलाते हुए अपनी ही मां को चोदने की कल्पना करते हुए पानी निकालता था आज वही लंड हकीकत में उसकी मां की बुर के अंदर सैर सपाटा कर के बाहर आ चुका था। अपनी मां की मटकती हुई गांड को याद करके शुभम अपने लंड पर लगे मदन रस को चादर से साफ करने लगा।
दोनों के बीच अब कोई भी रिश्ते और मर्यादा की दीवार नहीं बची थी सारे रिश्ते नाते संस्कारों और मर्यादा की दीवार को दोनों एक साथ लांघ चुके थे। निर्मला का बदन संतुष्टि और प्रसन्नता के कारण और भी ज्यादा निखर चुका था। आज दोनों की छुट्टी थी क्योंकि रात भर की थकान के कारण सुबह स्कूल जाना संभव नहीं था इसलिए अपने बेटे का प्यार पाकर निर्मला बहुत ही ज्यादा प्रसन्न होकर अपने बेटे के लिए खाना बनाई। थोड़ी देर बाद शुभम भी नहा धोकर तैयार होकर नीचे आ गया लेकिन वह अपनी मां से नजर नहीं मिला पा रहा था। और मिलाता भी कैसे क्योंकि कुछ ऐसा दोनों के बीच हो गया था कि दोनों एक दूसरे से नजर मिलाने में कतरा रहे थे लेकिन दोनों बार चुदाई का सुख बराबर हासिल करने के लिए एक दूसरे के बदन में समा जाने तक की ताकत लगा दिए थे। दोनों टेबल पर बैठ कर खाना खा रहे थे और एक दूसरे को कनखियों में देख रहे थे अपनी मां के बदन पर शुभम की नजर रह-रहकर घूम जा रहे थे जिसकी वजह से उसके लंड का तनाव फिर से बढ़ने लगा था। निर्मला की बुर एक बार फिर से फूल पीचक रही थी। इसमें दोनों का कोई दोष नहीं था मौसम का सावन तो था नहीं कि साल में बस एक ही बार आए,,,,,,, यह तो आकर्षण और रिश्तो के बीच बासना का तूफान था जोंकि बार-बार आना था।
दो दो बार अपने बेटे के लंड से चुदने के बाद भी उसकी बुर की खुजली नहीं मिली थी और मेीटती भी कैसे उसकी बुर तो बरसों से प्यासी थी। जिसकी खुजली एक दो बार की चुदाई से नहीं जाने वाली थी। निर्मला खाना खाते हुए अपने बेटे के चेहरे की तरफ देखे जा रही थी जिसे देखकर बिल्कुल भी नहीं लगता था कि उसने ही दो बार में उसकी बुर के आकार को बदल कर रख दिया है। निर्मला से तो रहा नहीं जा रहा था वह तो चाहती थी कि खाना खाते समय भी शुभम उसकी बूर में अपना लंड डालकर उसे चोदे,,,,, लेकिन शुभम तो इतना शर्मा रहा था कि उसे से ठीक से नजरें तक नहीं मिला पा रहा था। निर्मला उससे कुछ कह पाती इससे पहले ही वह जैसे तैसे करके अपना खाना खत्म किया और बिना बोले ही घर से बाहर निकल गया निर्मला प्यासी नजरों से उसे जाता हुआ देखती रह गई लेकिन उसे रोकने के लिए आवाज नहीं दे पाई।
निर्मला ईस बात से बेहद खुश थी की,, अब उसे बिस्तर पर प्यासी रहकर अपनी एड़िया नहीं रगड़नी पड़ेगी,,,,, उसकी प्यास बुझाने वाला उसके घर में ही मौजूद था अब अशोक पर पूरी तरह से उसे आश्रित नहीं रहना पड़ेगा। जो कि खुद उस ने आज तक उस की प्यास पूरी तरह से नहीं बुझा पाया था। वह मन ही मन सोच रही थी कि घर में अशोक शुभम और उसके सिवा कोई भी नहीं था और यही तो उसके लिए पूरी तरह से लाभदायक था क्योंकि अशोक अधिकतर घर से बाहर ही रहता था और ऐसे मैं घर पर सिर्फ शुभम और निर्मला ही रह जाते थे। निर्मला ऐसे में जब चाहे तब अपने बेटे के लंड से अपनी प्यास बुझा सकती थी ना किसी को कभी भी कोई शक होगा और ना ही किसी को पता चलेगा,,,,
और तो और अशोक महीने में एकाद दो बार बिजनेस के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहता था और ऐसे मैं रात रंगीन करने का उसके पास पूरा मौका था। यही सब सोचकर निर्मला मन ही मन प्रसन्न हुए जा रहेी थी। वह टेबल पर से झूठे बर्तन को समेटकर किचन में ले गई और वहां पर उसे साफ करने लगी। उसकी बुर की कुलबुलाहट बढ़ती जा रही थे वह फिर से अपने बेटे से चुद़ना चाहतीे थी। उसे ऐसा लग रहा था कि अभी थोड़ी देर बाद उसका बेटा घर पर आएगा तब वह एक बार फिर से अपने बेटे से चुदवाएगी,,,, इसलिए वो जल्दी जल्दी घर का सारा काम करके अपने कमरे में बैठकर अपने बेटे का इंतजार करने लगी। घड़ी की सूई अपनी धुरी पर घूमती रही समय रेत की तरह निर्मला के हाथ से फिसलता रहा,, इंतजार कर कर के निर्मला की तड़प बढ़ती जा रही थी। वह पूरी तरह से चुदवासी हो चुकी थी,,,, लेकिन शुभम घर पर वापस नहीं आया वह बाहर ही अपने दोस्तों के साथ खेलता रहा क्योंकि घर आने में उसे शर्म महसूस हो रहे थे भले ही वह ताबड़तोड़ अपने लंड का प्रहार करते हुए अपनी मां की जबरदस्त चुदाई कर चुका था । लेकिन वहां उस समय का बासना का तूफान था जो कि रोकने से भी रुक नहीं पाता,,,,, लेकिन इस समय खेल के मैदान में उसका दिमाग शांत हो चुका था इसलिए बीती बातों को याद करके वह मन ही मन शर्म सा महसूस कर रहा था कि कैसे वह अपनी मां से आंख मिलाएगा केसेे वह उससे बातें करेगा,, उसकी मां उसके बारे में क्या सोचेगी कि कैसे वह बिना शर्म कि उसकी बुर में अपना लंड पेल कर बिना रुके धड़ाधड़ उसकी चुदाई किए जा रहा था। वह सोचेगी की एक बार भी उसने उसे रोकने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं किया। लेकिन यदि उसके दिमाग में ख्याल आ रहा था कि जब उसकी मां ने ही खुद को नहीं रोक पाए तो वह क्यों उसे रोके,,, उसकी मां भी यही चाहती हो तो वह क्या कर सकता है। अगर इसमें कुछ गलत होता तो उसकी मा ही उसे खुद रोक दी होती। उसकी मां भी यही चाहती थी कि वहं उसे जमकर चोदे,,,,, तभी तो एक बार शायद गलती हो सकती है क्योंकि कार में एकांत का वातावरण भी कुछ हद तक खुद के पक्ष में ही था इसलिए कार के अंदर जो उसकी मां ने उसके साथ चुदवा कर सारी मान मर्यादा भूल गई यह हो सकता है कि माहौल के हिसाब से ना चाहते हुए भी गलत हो गया हो,,, लेकिन जो कमरे में हुआ,,,, वह गलती से नहीं हो सकता क्योंकि वह अपने कमरे में सो रहा था उसकी मां भी पूरे कपड़े पहनी हुई थी लेकिन जब बिस्तर पर उसके ऊपर चढ़ी थी तो उसके बदन पर कपड़े का एक रेशा तक नहीं था। वह पूरी तरह से नंगी थी और खुद ही उसके लंड पर बैठ कर,,, पूरे लंड को अपनी बुर में ले कर उठ बैठकर लंड को अंदर बाहर कर रही थी यह गलती से नहीं बल्कि जानबूझ कर कर रही थी इसका मतलब यही है कि वह उससे चुदना ही चाहती थी। पूरी तरह से जांच परख लेने के बाद शुभम इसी निष्कर्ष पर आया कि जो भी हो रहा है वह एक तरह से ठीक ही हो रहा है। यह सब सोचकर वह देर से घर पर लौटा शाम ढल चुकी थी। निर्मला रसोई घर में रसोई तैयार कर रही थी तभी दरवाजे पर बेल बजी,,,, घंटी की आवाज सुनते ही वह समझ गई कि शुभम खेल कर आ चुका है क्योंकि अशोक ईस समय आता नहीं था वह देर रात को ही आता था। निर्मला जल्दी से जानबूझकर अपने ब्लाउज की दो बटन को खोल दी और साड़ी को पूरी तरह से अस्तव्यस्त कर दी ताकि उसके बदन का ज्यादातर भाग शुभम को दिखाई दे। साड़ी को थोड़ा सा ऊपर करके कमर में खोज दी जिसकी वजह से उसकी गोरी चिकनी टांग नजर आने लगी। सुबह जल्दी से दरवाजे पर गई तब तक शुभम तीन चार बार बटन दबा चुका था। दरवाजा खोलते ही वह बोली।

क्या बेटा मैं खोल तो रही थी तुझे बहुत जल्दी पड़ी है। ठीक से खोल तो लेनें दिया कर,,,,,, ( निर्मला दो अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग कर रहे थे लेकिन शुभम समझ नहीं पा रहा था पर दरवाजा खुलते ही जो नजारा उसकी आंखों के सामने नजर आया उस नजारे को देखकर उसके लंड में हरकत होने लगी। वह सूख को निकलता हुआ अपनी आंखों को निर्मला की चूचियों पर गड़ाए हुए बोला।

सॉरी मम्मी मुझे लगा कि आप बिजी होंगी तो ध्यान नहीं देंगेी इसलिए मैं दो चार बार बटन दबा दिया,,,,,


आजकल तुझे दबाने में कुछ ज्यादा ही मजा मिल रहा है। ( निर्मला मुस्कुराते हुए बोली लेकिन अपनी मां की यह बात सुनकर शुभम झेंप सा गया,,,,, और झेंपते हुए बोला,,,,)

क्या मम्मी,,,,,,

कुछ नहीं तू नहीं समझेगा,,,,,,, अच्छा अंदर तो आ कि ऐसे ही भूखे भेड़िए की तरह मुझे घूरता रहेगा,,,,,, ( वह सुभम की नज़रों का पीछा करते हुए बोली क्योंकि वह अभी भी उसकी अधखुलें ब्लाऊज,, में से झांक रही उसकी चूचियों को ही देख रहा था अपनी मां की बात सुनते ही वह सकपका गया।। और शरमाकर अपनी नजरें नीची कर के अंदर आ गया। शुभम मन-ही-मन अपनी मां की खुले हुए ब्लाउज के दोनों बटन के बारे में सोच रहा था आखिरकार वह क्यों खुले हुए होते हैं या ऐसा तो नहीं कि उन्हें मम्मी ही खोल देती है। लेकिन पहले तो वह इस तरह से नहीं खोलती थी,,,, अब क्यों उसके ब्लाउज के दोनों बटन खुले हुए होते हैं कहीं वह जानबूझकर अपनी चूचियों को दिखाती तो नहीं है यही तब सवाल उसके मन में उठ रहे थे।


और अपने मन में उठ रहे सवालों का जवाब भी उसके पास ही मौजूद था। पिछले कुछ दिनों कि अपनी मां के द्वारा हुई गंदी हरकत और अपने दोस्तों की बातों से वह तो इतना समझ ही गया था कि औरत अपने फायदे के लिए ही अपने अंगों को दिखाती है जो कि उसकी मां भी यही कर रही थी और लगभग दो बार उसका फायदा भी उठा चुकी थी जिसमें उसका याद ही नहीं बल्की खुद शुभम का भी फायदा था। यह सोचते ही उसके मन में और भी ज्यादा जिज्ञासा जगने लगी और उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। वह मन में यह सोचने लगा कि जब उसकी मां आगे से ही सब कुछ कर चुकी है और आगे भी करने के लिए पूरी तरह से तैयार है तो वह क्यों अपने कदम पीछे हटाए आखिरकार वह भी तो जवान हो रहा बलिष्ठ काठी का लड़का था उसके भी मन में ढेर सारे अरमान उठ़ रहे थे। यह सब सोचकर उसके लंड का तनाव और भी ज्यादा बढ़ने लगा था वह मन ही मन सोचने लगा था कि उसकी मां ने उसे शरीर सुख का मजा चुदाई का कैसा अद्भुत एहसास बदल में होता है यह सब सिखाई और अपने मदमस्त बदन के साथ पूरी तरह से मस्ती करने का खीमज माता बदन के साथ खेलने का पूरी तरह से मौका उसे दी,,, वह मन ही मन अपनी मम्मी को शुक्रिया अदा कर रहा था कि जिस अंग के बारे में वह कल्पना ही करता रहता था उस अंग को उसकी मां ने पूरी तरह से खोल कर ऊस ं अंग के आकार और भूगोल के साथ उसे रुबरु कराई।
यह सब सोचकर उसका मन उत्तेजना से भरने लगा । वह मन हीं मन नक्की कर लिया कि अगर ऊसकी मां आगे भी इस तरह का मौका देती रहेगी तो वह इस मौके का फायदा उठाने से बिल्कुल भी नहीं चूकेगा। वह यह सब सोच कर मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहा था और निर्मला मुस्कुराते हुए अपनी गांड को कुछ ज्यादा ही ऊभारकर मटकते हुए रसोई घर में चली गई निर्मला का यह अंदाज शुभम को पूरी तरह से उसका दीवाना बना गया। अपनी मां के अंदाज़ और उसकी हरकत को देखते हुए शुभम पूरी तरह से समझ गया कि जो कुछ भी हो रहा है वह अनजाने में नहीं बल्कि जान बूझकर ही हो रहा है। यह ख्याल मन में आते हीै उसके लंड ने ठुनकी मारना शुरू कर दिया। घर में ही चुदाई का सामान पूरी तरह से तैयार होता देख कर उसकी खुशी का कोई ठिकाना ना रहा। वह अपनी मां के अंदाज को देखने के लिए पानी पीने के बहाने रसोई घर में चला गया और जाते ही फ्रिज खोल कर,,, पानी की बोतल निकाला और पानी पीने लगा निर्मला आटा गूथ रही थी और आटा गूंथते हुए अपनी गोलगोल गांड को अजीब सी थिरकन देते हुए,,, इधर-उधर मटकाने लगी।
अपनी मां की मटकती हुई गांड को देखकर तोे शुभम की सांस ही अटक गई। उत्तेजना के मारे उसका गला सूखने लगा पेंट में तंबू पूरी तरह से बन चुका था जो कि उसकी मां की नजर में साफ साफ आ सकता था लेकिन वह उसे छुपाने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं किया। क्योंकि वह भी जान चुका था कि उसकी मां जिस तरह की हरकत कर रही है उसे फिर से लंड की जरूरत है। शुभम पानी पीते हुए ऊपर से नीचे तक अपनी मां के खूबसूरत बदन को देखकर उत्तेजित हुआ जा रहा था निर्मला भी आंटा गुंथते हुए अपने बदन का मदमस्त हिस्सा इस तरह से बाहर को निकली हुई थी कि ऐसा लग रहा था वह अपने खूबसूरत बदन का वह हिस्सा शुभम को परोस रही हो,,,,, जिसे देखकर शुभम के मुंह में पानी आ जा रहा था। शुभम पानी पीकर बोतल को फिर से फ्रीज में रख दिया लेकिन अपनी मां से कुछ भी बोल पाने की हिम्मत उसमे नहीं हो रही थी। निर्मला की बुर पानी-पानी हो जा रही थी उसे फिर से अपने बेटे के लंड की जरूरत थी दो बार चुदने के बाद भी उसकी प्यास कम होने की वजाय और भी ज्यादा बढ़ चुकी थी। वह पूरी तरह से चुदवासी हो चुकी थी। उसके जी में तो आ रहा था वह खुद शुभम को बोल दे कि वह तुझसे फिर से चुदना चाहती है तू चोद जमकर चोद,,,, लेकिन इतना कहने की हिम्मत शायद उसमें भी अभी नहीं थी। दो दो बार संभोग सुख भोग चुके मां बेटे अभी भी आगे बढ़ने से शर्मा रहे थे। निर्मला इस बात से तो पूरी तरह से आश्वस्त थी की अब वह जब चाहे तब अपने बेटे से चुद सकती है। लेकिन उसके लिए अपनी शर्म को पूरी तरह से त्याग देना पड़ेगा जो कि अभी भी उसके कदम को कुछ हद तक रोके हुए थी। निर्मला तिरछी नजरों से शुभम की तरफ देख रही थी जो कि अभी भी फ्रिज के पास ही खड़ा था और उसके तरफ ही चोर नजरों से देख ले रहा था तभी निर्मला की नजर उसके पैंट में बने तंबू पर पड़ी तो उसके मन का मोर अपने पंख फैला कर नाचने लगा। उसे यकीन हो चला कि अगर वह चाहे तो किचन में ही अपने बेटे से संभोग सुख का फिर से आनंद ले सकती है। लेकिन केसे यह उसे समझ में नहीं आ रहा था उसे डर था कि कहीं शुभम किचन से बाहर ना चला जाए इसलिए उसे रोकना बहुत जरुरी था। और सच में शुभम भी यही सोच रहा था कि ज्यादा देर तक इस तरह से रूकना ठीक नहीं है इसलिए वह किचन से बाहर निकलने को ही था की झट से निर्मला बोली।

बेटा कहां जा रहे हो आज मेरी मदद नहीं करोगे क्या?

हां हां करूंगा ना मम्मी बताओ ना क्या करना है। ( शुभम झट से जवाब देते हुए बोला वह तो खुद किचन में रुककर अपनी मां की खूबसूरत बदन के दर्शन करना चाहता था।)

बेटा जरा सब्जी तो काट दे मेरे हाथों में आटा लगा हुआ है।
(वह अपने हाथ को शुभम की तरफ दिखाते हुए बोली)

ठीक है मम्मी लाओं में सब्जी काट देता हूं। पर सब्जी कौन सी काटनी है।



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