अधूरी हसरतें

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Re: अधूरी हसरतें

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Rohit Kapoor
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Re: अधूरी हसरतें

Post by Rohit Kapoor » 10 Nov 2017 14:18

निर्मला घर पर आ चुकी थी लेकिन आज भी उस का दिन बड़ा ही उत्तेजक रहा एक तो वह शीतल की कपड़ों से इंप्रेस हो चुकी थी,,,, वह शीतल से ज्यादा खूबसूरत थीै लेकिन इस तरह के कपड़े उसने कभी नहीं पहनीे थेी। शीतल को देख कर उसे भी इस तरह के कपड़े पहनने की इच्छा होने लगी,, जिस तरह से शीतल की बड़ी बड़ी चूचीयो के बीच की गहरी लकीर लो कट ब्लाउज में उसे साफ नजर आ रही थी,,, उसे देखकर निर्मला की भी इच्छा होने लगी कि वह भी इस तरह के ब्लाउज पहने ताकि उसकी भी बड़ी बड़ी चूचीयों की गहरी लकीर साफ नजर आए क्योंकि आज उसे एक नया अनुभव हुआ था,,,, आज पहली बार उसकी जानकारी में उसने यह जानते हुए भी कि कोई उसे पेशाब करते हुए देख रहा है फिर भी वह उन,,,, कामी और प्यासी नजरों के सामने ही अपनी साड़ी उठा कर के अपनी मुलायम पेंटी को नीचे सरका के और अपनी बड़ी बड़ी सुडोल गांड को दिखाते हुए नीचे बैठ कर पेशाब करके जो उसने अपनी इस उम्र में भी उफान मारती जवानी के जलवे दिखाई है,,,,,, उसे देख कर तो देखने वालों की हालत खराब हुई थी बल्कि जलवा दिखाते समय जो हलचल निर्मला के बदन में मची थी वैसी हलचल का अनुभव वह कभी-कभार और शुभम के सामने ही कर पाती थी। शीतल की कही गई बातों पर उसे पूरा यकीन हो चुका था वास्तव में औरत के पास दिखाने के लिए बहुत कुछ होता है,,,,


बल्कि मर्द ही औरतों के हर एक अंग को देखने के लिए पागल हुए रहते हैं। कुर्सी पर बैठे हुए निर्मला को शीतल की कही गई हर एक बात याद आ रही थी पर उसकी बात में सच्चाई भी थी औरत अगर चाहे तो अपने बदन के जोर पर मर्दों से कुछ भी करवा सकती है। निर्मला तुम शीतल से भी ज्यादा खुशनसीब थी क्योंकि दोनों की उम्र लगभग सामान ही थी लेकिन फिर भी शीतल से ज्यादा खूबसूरत और उससे कई मायने में फिट थी। निर्मला के बदन का हर एक ढांचा ऐसा लगता था कि मानो बड़ी ही फुर्सत से तराशा गया हो,,,,,
उसके संगमरमरी बदन का ऊभार और कटाव मर्दों की सांसे ऊपर नीचे करने में सक्षम थी। निर्मला तो वैसे भी हमेशा साधारण तरीके से ही रहती थी लेकिन शादगी मैं भी उस का निखार उभरकर सामने आता था। निर्मला के मन में भी शीतल की तरह ट्रांसपेरेंट साड़ी पहनने की इच्छा होने लगी थी उसकी ही तरह बैकलेस ब्लाउज पहन कर अपनी गोरी चिकनी पीठ दिखाने की इच्छा हो रही थी। क्योंकि आप उसे भी अच्छी तरह से समझ में आ गया था कि अपने बदन का जलवा दिखाकर जो उत्तेजना का अनुभव होता है उससे भी ज्यादा मजा दूसरों को अपना बदन दिखा कर उन्हें तड़पाने में आता है। बाथरूम वाली बात को सोचकर वह पुरी तरह से गंनगना गई थी।। उसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था कि वह दूसरे लड़कों के सामने ऐसा कर पाई। वह मन में सोच रही थी की ऊन लड़कों पर क्या गुजरी होगी जब वह अपनी साड़ी को धीरे धीरे अपनी नरम नरम उंगलियों के सहारे अपनी साड़ी को ऊपर की तरफ उठा रही थी,,,, पहले बहुत शरारती लड़के उसकी चिकनी गोरी टांगो को देखे होंगे,,, और गोरी चिकनी टांगों को देखकर एकदम गर्म हो गए होंगे जैसे-जैसे साड़ी घुटनों तक पहुंची होगी घुटनों को देखकर उनके लंड में सुरसुराहट होने लगी होगी,,,,, और जब साड़ी मोटी मोटी और एकदम चिकनी जांघो तक पहुंची होगी तो वह नजारा देख कर उन लड़कों का लंड खड़ा हो गया होगा,,,,, वह लड़के मोटी चिकनी नंगी जांघों को देखकर आपस में फुसफुसा रहे होंगे,,,,, और जैसे ही साड़ी पूरी तरह से कमर तक पहुंची होगी तो उन लोगों को लाल रंग की मखमली पैंटी नजर आई होगी जिसके अंदर,,,,, मर्दों के बदन में कामोत्तेजना प्रसार करने का माध्यम छिपा होता है,,,, उस गोलाकार और भराव दार गांड को देख कर तो उन लड़को का लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया होगा और वह लोग अपनी पैंट की चैन खोलकर उसे बाहर निकाल कर अपने हाथ में ले लिए होंगे,,,,

और जैसे-जैसे पेंटी नीचे की तरफ सरक रही होगी उन लोगों को एकदम गोरी चमकती गोल गोल गांड नजर आने लगी होगी गांड के बीच की गहरी फांक भी नजर आने लगी होगी और उसे आंख को देख कर उन लड़कों की आंखें चौंधिया गई होगी,,,,, और वह लोग यही सोच रहे होंगे कि काश जो लंड वोे लोग हाथ में लिए हुए हैं,,,, उस लंड के सुपाड़े को वह गांड की गहरी दरार में घुसा पाते रगड़ पाते,,,, वह लोग कुछ और सोच पाते तभी जब वह पेशाब करने के लिए नीचे बैठी होगी तब ऊन लोगों की हालत और ज्यादा खराब होने लगी होगी,,,, तब उन लोगों काला ठुनकी मारने लगा होगा,,,, वह शरारती लड़की सबसे ज्यादा तड़पे होंगे जब रसीली बुर मे से उन लड़कों के लिए अमृत समान पेशाब की धार फूट पड़ी होगी,,,,, पेशाब की धार के साथ साथ उसमें से निकल रही मधुर आवाज को उनके कान सुन पाए होंगे कि नहीं यह तो कहना मुश्किल ही होगा लेकिन पेशाब की धार निकलता हुआ देखकर वह लोग एक दम मस्त हो गए होंगे,,,, और अलौकिक नजारा देखते हुए अद्भुत कल्पना में विचरने लगे होंगे। उन लोगों को बुर की गुलाबी पत्तियां निश्चित तौर पर एकदम साफ साफ नजर आ रही होंगी क्योंकि पेशाब करते समय वह जान बूझकर थोड़ा सा झुक गई थी ताकि वह लोग ठीक से नजारा देख पाए। बहुत शरारती लड़की पार्टीशन की दरार में से एक अद्भुत अलौकिक और कामोत्तेजना की परिभाषा सामान कामुक नजारा देख कर अपने-अपने मानस पटल पर अपनी शिक्षिका को पर्याय बनाते हुए ना जाने कैसे-कैसे कामोत्तेजना से भरपूर कल्पनाएं करते हुए अपने लंड को हिलाने लगे होंगे। उन शरारती लड़कों की कल्पनाएं भी बड़ी रंगीन और कामोत्तेजित होंगी,,,,, कोई कल्पना करके यह सोचते हुए मुट्ठ मार रहा होगा कि वह अपनी शिक्षिका के साथ संभोग कर रहा है तो कोई यह कल्पना कर रहा होगा कि वह अपनी शिक्षिका के साथ मुखमैथुन का सुख भोग रहा है। और कोई यह कल्पना करता होगा कि वह अपने शिक्षिका की रसीली बुर को अपनी जीभ से चाट रहा है यह सब कल्पना करते हुए और उसने पेशाब करता हुआ देखकर जोर-जोर से मुठ मारते होंगे,,,, और जैसे-जैसे उस की पेशाब की धार का जोर कमजोर होती होगी वैसे वैसे वह लोग अपनी अपनी चरमोत्कर्ष करीब पहुंचते होंगे और जैसे ही वह पेशाब करके उठती होगी वैसे ही तुरंत उन शरारती लड़कों का लंड जोर से पिचकारी फेंक देता होगा,,,,

यही सब सोचते हुए निर्मला एकदम उत्तेजित हो गई थी उसकी सांसें भी भारी हो चली थी और उसकी पैंटी काम रस में डूबने लगी थी। प्यासी निर्मला की कामोत्तेजना इतनी ज्यादा प्रज्वलित हो चुकी थी की उसके द्वारा किए गए सारे कल्पनाओ के चलचित्र किसी फिल्म की तरह उसके मानस पटल पर चल रहे थे जिसकी वजह से वह सिर्फ सोचते ही सोचते झड़ चुकी थी,,,, वह कल्पना करके ही अपने चरम सुख को प्राप्त कर ली थी वह भी एक दम हैरान थी,,, ना तो उसने अपनी चुचियों को ही अपने हाथों से मसली और ना ही अपनी हथेली को अपनी बुर पर रखकर रगड़ी,,,,, बिना अपने हाथों को हरकत दिए मात्र कल्पना के ही जोर से ही उसकी बुर नै पानी फेंक दी थी। वह स्वयं अपनी हालत पर हैरान होते हुए अपने हाथ को साड़ी के ऊपर से ही बुर को स्पर्श की तो पहले से भी ज्यादा अपनी पेंटिं को गीली पाकर वह हैरान हो गई और तुरंत कुर्सी से उठ कर बाथरूम की तरफ चली गई। थोड़ी देर बाद वह फ्रैश होकर बाहर आ गई । निर्मला को अब स्कूल के बाथरूम में पेशाब करते हुए अपनी मदमस्त गांड ऊन शरारती लड़कों को दिखाने की जैसी आदत सी पड़ गई थी।,, वह भी अब रीशेष होने का इंतजार करती रहती थी,,, जैसे जैसे रिसेस होने का समय नजदीक होता जाता वैसे-वैसे उसकी उत्सुकता और दिल की धड़कन बढ़ती जाती। रिशेष की घंटी बजते ही वह तुरंत मौका देख कर बाथरूम की तरफ चल देती,,,, खास करके ऐसे ही समय पर बाथरूम की तरफ जाती जब वहां पर भीड़ भाड़ नहीं के बराबर होती थी। ताकि वह खूब अच्छे से अपनी मदमस्त गोरी गांड के दर्शन ऊन शरारती लड़कों को करा सकें।


धीरे धीरे निर्मला अपने बदन के दर्शन कराने में माहिर होने लगी वह बड़ी ही कामुक अदा से अपनी गांड पेशाब करते समय दिखाती थी।
उसकी अब दीली ख्वाहिश ऐसी थी कि उसका बेटा भी उसे पेशाब करते हुए देखें,,,, लेकिन उसकी ख्वाहिश पूरी नहीं हो पा रही थी अब तो वह घर में भी इस तरह के कपड़े पहने लगी थी कि जिसमें से उसके हर अंग उपांग साफ साफ नजर आते थे,,,,, मखमली गाउन जो की पूरी तरह से उसके मदमस्त बदन से चिपके रहते थे,,, जिसकी वजह से उसके बदन का हर एक कटाव- साफ साफ नजर आता था। उसके ब्लाउज और गाउन दोनों के गले डीप होने लगे थे जिसकी वजह से ऊसकी बड़ी बड़ी चुचीयो की लंबी और गहरी लकीर के साथ साथ आधे से भी ज्यादा चूचियां अब बाहर की तरफ झलकती रहती थी। अब तो शुभम अपनी नजरें सेक सेंक कर ही पागल हुए जा रहा था। शुभम को अपनी मां के इस रहस्यमय बदलाव और पहनावे के बारे में कुछ समझ नहीं आ रहा था लेकिन उसकी नजरें जो भी देख रही थी उस की जवानी की तड़प को बढ़ाने के लिए काफी थी,,,, शुभम को तो इस में बहुत मजा आ रहा था निर्मला भी अपने इस नए रवैये का भरपूर आनंद ले रही थी लेकिन वह अपने बेटे को इससे भी कई ज्यादा दिखाना चाहती थी। पर ना जाने ऐसी कौन सी बात थी,,, जिससे वह हीचक रही थी।
यह हीचकीचाहट थी निर्मला और शुभम के बीच पवित्र रिश्तो के धागे की,,,, संस्कार और परंपराओं के मर्यादा की,,,,


जोकि निर्मला को आगे बढ़ने में रोक रहे थे,,,,, शुभम तो सब कुछ करने के लिए तैयार था बस इंतजार था एक इशारे की लेकिन यह ईसारा उसे अब तक नहीं मिल पाया था। निर्मला भी काफी चुदवासी हो चुकी थी तभी तो वह कल्पना करके ही झड़ जाती थी,,,,, बार-बार वह अपने बेटे से चुदवाने की कल्पना करके अपनी उंगली को अपनी बुर मे डाल कर अपने ही हांथो से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करती लेकिन हर बार यह प्यास और भी ज्यादा बढ़ती जाती थी।ऊसे ईंतजार था की कब उसका बेटा अपने मोटे और लंबे लंड से ऊसकी प्यास बुझाएगा।

इसी आस में वह एक दिन अपने कमरे में सोई हुई थी,,,, कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और रात के करीब 12:00 बज रहे थे निर्मला का पति अशोक घर पर नहीं था ।

रात के 12:00 बज रहे थे निर्मला का पति अशोक घर पर नहीं था। निर्मला की आंखों में चुदास से भरी खुमारी छाई हुई थी,,,, उसका गाउन कमर तक चढ़ा हुआ था,,,, उसकी नजर दरवाजे पर ही टिकी हुई थी और वह खुद अपने हाथों से अपनी बुर की गुलाबी पत्तियों को मसल रही थी,, उसके मुख से हल्की हल्की गरम सिसकारी निकल रही थी,,, वह लगातार हसरत भरी निगाहों से दरवाजे को ही देखे जा रही थी,,,, ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे किसी के कमरे में आने का इंतजार हो,,,, और उसके इंतजार में वह बिस्तर पर करवट ले देकर अपनी बेचैनी को कम करने की कोशिश कर रही थी उसके बदन की तपिश से पूरा बिस्तर गर्म हो चुका था,,,, बिस्तर पर बिछाई हुई चादर पर सिलवटें पड़ चुकी थी। उसके बगल में कामाग्नि पूरी तरह से भड़क चुकी थी वह कभी अपने ही हाथों से अपने दोनों गोलाइयो को दबाती तो कभी अपनी हथेली से अपनी बुर की गुलाबी पत्तियों को मसल देती। काफी देर से वो खुद अपने ही बदन से खेल रही थी और अपनी कामाग्नि को और ज्यादा भड़का रही थी,,,,



दीवार पर टंगी घड़ी में 12:30 का समय होने लगा था कि तभी.... दरवाजे पर शुभम आकर खड़ा हो गया उसके बदन पर मात्र तौलिया लपेटा हुआ था। उसकी चौड़ी और मजबूत छाती बिल्कुल नंगी थी वह दरवाजे पर खड़े होकर कमरे के अंदर प्यासी नजरों से बिस्तर पर लेटी हुई निर्मला को ही देख रहा था। निर्मला की भी नजर अपने बेटे पर पड़ते ही वह प्रसन्न हो गई,,,,, कमरे में जल रही;डीम लाइट के उजाले में निर्मला की नंगी जांघे चमक रही थी,, शुभम के तौलिए में तंबू बना हुआ था जिस पर निर्मला की प्यासी नजरें गड़ी हुई थी।
दोनों की नजरें आपस में टकराते हीैं दोनों के बदन में सुरसुराहट सीे फैलने लगी,,, दोनों आंखों ही आंखों में अपनी हसरत भरी बातों का सिलसिला जारी रखते हुए एक दूसरे के बदन को देखकर उत्तेजित हुए जा रहे थे। तभी निर्मला अपने बेटे की तरफ देखते हुए अपनी टांगो को थोड़ा सा फैला दी और अपनी हथेली से अपनी प्यासी बुर की गुलाबी पत्तियों को मसलने लगी,,, यह ईसारा था शुभम को आमंत्रण देने का शुभम भी अपनी मां का यह आमंत्रण स्वीकार करते हुए कमरे में प्रवेश किया और दरवाजे की कड़ी लगाकर दरवाजे को बंद कर दिया। दरवाजे को बंद करने के बाद वह बिस्तर के करीब पहुंच गया और अपनी टावल को बदन पर से उतार कर फेंक दिया,,,,,, बदन पर से तौलिए के दूर होते ही शुभम का टनटनाया हुआ लंड छत की तरफ मुंह उठाए एकदम लोहे की रोड की तरह खड़ा था। जिस पर नजर पड़ते ही निर्मला की बुर उत्तेजना के मारे फूलने पिचकने लगी,,,,,, निर्मला अपनी बेटे के खड़े लंड को देखकर लगातार अपनी बुर को मसले जा रही थी उसके मुंह से हल्की हल्की गरम सिसकारी की आवाज आ रही थी,,


, जिसको सुनकर शुभम एकदम गर्म हो चुका था। डीम लाइट की लाल रोशनी में निर्मला और भी ज्यादा कामोतेजक और खूबसूरत लग रही थी। शुभम को अपनी मां के बदन की गर्मी बर्दाश्त नहीं हुई और वह तुरंत बिस्तर पर चढ़ कर अपनी मां की टांगों के बीच जगह बना लिया,,,, निर्मला यह देख कर शुभम को अपनी बाहों में भरने के लिए हाथ बढ़ाई ही थी की,,, शुभम ने अपने मोटे लंबे लंड के सुपाड़े को अपनी मां की रसीली बुर के मुहाने पर रखकर,,, एक धक्का लगाया और पनियाई बुर होने की वजह से शुभम का आधा लंड पहले ही प्रयास में ही बुर के अंदर समा गया,,,, निर्मला तो बेहद उत्तेजित और आनंदमय हो गई थी,,,, क्योंकि बरसों बाद आज उसकी प्यास बुझने वाली थी और वह भी उसके ही बेटे के लंड से,,,, निर्मला अपने बेटे को बाहों में भर कर अपनी तरफ खींचती से पहले ही शुभम ने दूसरा प्रहार किया और इस बार उसका तगड़ा लंड सब कुछ चीरता हुआ बुर की गहराई में समा गया। जैसे ही शुभम का समुचा लंड उसकी बुर में समाया उसके मुख से चीख निकल गई,,,,,, और शुभम अपनी मां की चीख सुनकर अपने होंठ को ऊसके गुलाबी होंठों पर रख कर चूसने लगा,,,, बंद कमरे में एकांत पाकर दो बदन आपस में अपनी प्यास बुझाने के लिए जूझ रहे थे,,,,, निर्मला सुगठित शरीर की मालकिन होने के बावजूद भी शुभम ने उसे कसके अपनी बांहों में जकड़े हुआ था और जोर जोर से अपनी मां की बुर में धक्के लगाते हुए अपनी मां की बुर चोद रहा था।



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Re: अधूरी हसरतें

Post by Rohit Kapoor » 10 Nov 2017 14:19

दोनों एक दूसरे को अपनी बाहों में ऐसे जकड़े हुए थे मानो कि एक दूसरे के अंदर समाने की कोशिश कर रहे हो। कमरे का माहौल पूरी तरह से खराब हो चुका था। बरसों से निर्मला जिस चीज को लेने के लिए तड़प रही थी वह चीज उसकी बुर के अंदर समाया हुआ था। वह जोर-जोर से अपनी मां को चोद रहा था पूरा पलंग उसके हर धक्के के साथ हील रहा था। थोड़ी ही देर में वह दोनो अपनी चरम सुख के करीब पहुंचने लगे थे। शुभम जोर जोर से धक्के लगाने लगा था।
तभी दोनों का बदन अकड़ने लगा और शुभम की एक जबरदस्त प्रहार के साथ ही,,,,, निर्मला की चीख निकल गई और वह भलभलाकर झड़ने लगी,,,,, वह चीख के साथ ही उठ कर बैठ गई,,,,, बैठकर जब गौर की तो वहां शुभम नहीं था,,,, बगल में अशोक बेसुध होकर सोया हुआ था,,,,, ऊसका गाउन कमर तक चढ़ा हुआ था और उसकी उंगलियां बुर के अंदर समाई हुई थी,,,,,, बहुत जोर जोर से सांसे लेते हुए हाथ रही थी दूर से निकल रहा नमकीन पानी उसकी हथेली को पूरी तरह से भीगो चुका था। अपनी हालत को देखकर वह हैरान थी,,,,,, लेकिन फिर अपनी हालत और हकीकत का ख्याल होते ही उसे अपने आप पर ही हंसना आ गया,,,,,
पंखा चालू होने के बावजूद भी उसके बदन से पसीने की बूंदे टपक रही थी उसे इस बात से राहत थे कि इतना कुछ होने के बावजूद भी अशोक की आंख नहीं खुली थी। वरना उसकी तेज चल रही सांसो की आवाज से अभी भी पूरा कमरा गूंज रहा था। अपने बेटे के साथ संभोग सुख लेते हुए इस प्रकार का सपना देख कर निर्मला पूरी तरह से हैरान भी थी और उत्तेजित भी।,,,, उसे यकीन नहीं हो पा रहा था कि इस तरह के भी सपने उसे आ सकते हैं। सपना देखते ही होगा तो यह सोच रही थी कि आज बरसो की तपस्या पूरी होने को आ गई थी। लेकिन आंख खुलते ही उसका सपना टूट गया था। वह मन ही मन सोचने लगी कि,,,, अगर सपना इतना कामोत्तेजना से भरा हो सकता है तो हकीकत कितनी रंगीन होगी,,,,, यह ख्याल मन में आते ही उसकी बुर सुरसुराने लगी,,,, और वह फिर से हथेली को अपनी गर्म बुर पर रख कर सो गई।।

शीतल की शादी की सालगिरह को बस 2 दिन ही बचे थे।
उसे अपने हाथों में मेहंदी लगाना था वैसे भी वह मेहंदी बड़ी अच्छी रचना देती थी इसलिए वह बैठकर अपने हाथ में मेहंदी लगाने लगी,,,, मेहंदी लगाते हुए उसे अपने बेटे से जुड़ी सारी उत्तेजना से भरपूर बातें याद आने लगी,,, बार बार उसकी आंखों के सामने फिर से उसके बेटे का खड़ा लंड तेरने लग जाता था,,,, बार-बार उसे उसके बेटे के लंड से निकलती हुई पिचकारी नजर आने लग रही थी,,,, जिसके कारण वह अपने बदन में कामोत्तेजना का अनुभव कर रही थी। और वहां पकने वाली बात तो उसे काफी परेशान किए हुए थी बार-बार वही सोच रही थी काश वो सपना सच हो जाता,,,,,,


कभी अपने एक हाथ में मेहंदी लगाते लगाते उसके मन में आईडिया सुझा,,, और वह तुरंत अपने बेटे को आवाज लगाने लगी,,,,, वह आवाज लगाती रही थी और दूसरे हाथ से अपने ब्लाउज के दो तीन बटन को खोल भी चुकी थी कंधे पर रखा पल्लू नीचे की तरफ सरका दी थी,,,, जिससे कि उसकी भरपूर जवानी किसी फिल्म. की तरह पर्दे पर नजर आ रही थी। घर पर केवल शुभम और निर्मला ही थे। निर्मला के हाथ में पूरी तरह से मेहंदी लग चुकी थी। तभी शुभम अपने कमरे से निकल कर बाहर आया और बाहर आते ही अपनी मां को बोला।

क्या हुआ मम्मी (इतना कहने के साथ ही उसकी नजर अपनी मां पर पड़ी तो अपनी मां को देख कर उसकी आंखें चौंधिया गई,,, इसमें शुभम का भी कोई कसूर नहीं था यह तो निर्मला तू इतनी खूबसूरत की सादगी में भी सबकी नजरें उसके ऊपर ही टिकी रहती थी और इस समय तो वह कयामत लग रही थी,,,, रेशमी बाल खुले हुए हवा में लहरा रहे थे,,,, काली कजरारी आंखें बार बार पलक झपकने की वजह से ऐसा लग रहा था कि बादल में तारे टिमटिमा रहे हैं,,, कुदरती लाल लाल होंठ हल्के से खुले हुए जिसके बीच में थोड़ा सा सफेद मोतियों सा चमकता दांत नजर आ रहा था। जो आपको निर्मला की खूबसूरती का वर्णन था बाकि जिस तरह से किसी धातु पर सोने का पानी चढ़ा कर उसकी खूबसूरती को और भी ज्यादा निखार मिलाया जाता है उसी तरह से,,, निर्मला की खूबसूरती में चार चांद लगाने वाले खूबसूरत अंग तो और भी ज्यादा कयामत ढा रहे थे,,,, साड़ी का पल्लू जो कि माथे पर या कंधे पर होने की वजह से औरत की खूबसूरती और ज्यादा बढ़ जाती है लेकिन जब यह पल्लू कमर से सरक कर नीचे आ जाए तो,,, खूबसूरती के सांचे में ढाला असली कयामत नजर आने लगता है,,,, यही हाल निर्मला का भी था निर्मला का बजन कितना खूबसूरत था उतना ही कयामत ढाने वाला भी था ब्लाउज के ऊपर के तीनों बटन खुले हुए थे। जिसमें से उसकी आधे से भी ज्यादा चूचियां नजर आ रही थी,,,, और चूचियों के बीच की गहरी लकीर तो अलग ही बखेड़ा खड़े किए हुए थी। गोलाईयों के इर्द-गिर्द ऊपसी हुई ऊपरी सतह गजब का स्तन दर्शन करा रही थी,,,,, कुल मिलाकर निर्मला खूबसूरती,,, आकर्षण और कामोत्तेजना की परिभाषा नजर आ रही थी। शुभम तो बस देखता ही रह गया वह भी भूल गया कि उसकी मां ने उसे बुलाई थी,,, और वह यही पूछने के लिए आया था कि वह क्यों बुला रही है लेकिन वह अपनी मां का रूप रंग देखकर एकदम दंग रह गया था और पूछना ही भूल गया,,,, अपने बेटे को इस तरह से ललचाई आंखों से अपने बदन को घूरता हुआ देखकर निर्मला मन ही मन प्रसन्न होने लगी,,, शुभम अपनी मां के बदन के आकर्षण में पूरी तरह से खो चुका था। निर्मला ही अपने बेटे का ध्यान भंग करते हुए मुस्कुरा कर बोली।
बेटा तुझे तो मालूम ही है की पीतल की शादी की सालगिरह कल ही है,,, इसलिए मैं वहां जाने की तैयारी कर रही थी एक हाथ में तो मेहंदी लगा चुकी हूं( मेहंदी वाले हाथ को शुभम की तरफ बढ़ा कर) लेकिन मेरा सर दुखने लगा है।

मुझ से दूसरे हाथ में मेहंदी लगाई नहीं जाएगी इसलिए तू ही लगा दे,,,,,
( निर्मला की बात सुनकर जैसे होश में आया हो इस तरह से बोला।)

मममममम,,,,, पपपपप,,,, पर मम्मी मुझे तो आता ही नहीं,,,,

अरे मुझे पता है तुझे थोड़ा बहुत आता है,,,,, एक दिन तू ने ही तो मेरे हाथों में लगाया था,,,,, चल अब जल्दी लगा मेरा सर भी दर्द कर रहा है।
( थोड़ा-बहुत शुभम को मेहंदी लगाना आता था इसलिए वह
बिना कुछ बोले वहीं बैठ गया और मेहंदी से अपनी मां के हाथों की खूबसूरती को बढ़ाने लगा,,,,, नरम नरम हाथ को अपने हाथ में पकड़कर शुभम की हालत खराब होने लगी बार-बार मेहंदी लगाते हुए उसकी नजर निर्मला की बड़ी बड़ी चूची ऊपर चली जा रही थी जोकि ब्लाउज में तीन बटन खुले होने की वजह से उसमें समा नहीं रहे थे बाकी के बचे ब्लाउज के बटन चूचियों के वजन की वजह से तन चुके थे,,, ब्लाउज की हालत देख कर ऐसा लग रहा था कि कभी भी ब्लाउज के बटन टूट जाएंगे और उसकी बड़ी-बड़ी दोनों चुचीयां नंगी होकर,,, शुभम की आंखों के सामने तनकर खड़ी हो जाएंगी,,,, शुभम मेहंदी लगाते हुए बराबर अपनी मां की छातियों पर नजर गड़ाए हुए था जोकि निर्मला इस बात से बिल्कुल भी बेखबर नहीं थी वह तो शुभम की इस हरकत से अंदर ही अंदर खुश हो रही थी। कुछ ही देर में उत्तेजना के मारे सुभम का लंड पैंट के अंदर तन कर खड़ा हो गया,,,, चूचियों की गोलाई देखकर ब्लाउज की स्थिति कुछ ठीक नहीं लग रही थी। शुभम तो मन ही मन यही आस लगाए बैठा था कि काश यह ब्लाउज के बटन टूट जाते तो उसकी आंखों को गरमी मिल जाती,,,, निर्मला को भी अपनी बेटी के सामने अपने बदन की नुमाइश करने में बेहद आनंद मिल रहा था।
धीरे धीरे करके निर्मला की पैंटी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और यही हाल शुभम का भी था उसका लंड पेंट में तंबू बनाए हुए था।
दोनों के बदन में उत्तेजना की काम लहर पूरी तरह से छा चुकी थी। अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव करते हुए और अपनी आंखों को अपनी मां की खूबसूरत और कामुक बदन को देख कर सेक रहा था। निर्मला के दोनों हाथों में मेहंदी लग चुकी थी,,,,

बस मम्मी देखो तो अब मैं भी कैसी लगी है। ( शुभम इतना कह कर वहीं बैठा रहा उठा बिल्कुल भी नहीं क्योंकि वह जानता था कि उठने पर उसके पैंट में बना तंबू उसकी मां जरूर देख लेगी,,,, और यही निर्मला भी देखना चाहती थी इसलिए बोली,,,,)

बहुत अच्छा तो लगाया है तूने अच्छा एक काम कर ड्रावर में से बाम लाकर मेरे माथे पर लगा के थोड़ी मालिश कर दे,,,
( दरअसल निर्मला का यह बहाना था वह तो शुभम की पेंट का तंबू देखना चाहती थी अपनी मां की बात सुनकर मैं थोड़ा सा परेशान हो गया था लेकिन क्या करता है बाम कर लगाना भी जरूरी था इसलिए बेमन से वह खड़ा हुआ लेकिन खड़े होकर वह अपने पेंट के तंबू को छिपा ना सका,,,, और जल्दी से ड्रोवर की तरफ बढ़ गया लेकिन निर्मला ने उसके पैंट में बने तंबू को देख ली थी,,, और मन ही मन खुश होने लगी,,,,,
पेंट में बने तंबू को देखकर वह फिर से अपने बेटे के लंड के बारे में कल्पना करने लगी,,,,, कल्पना करते ही उसकी बुर से पानी रिसने लगा,,,, तब तक शुभम ड्रोवर मै से बाम तो नहीं लेकिन विक्स की छोटी डीबिया जरूर ले आया,,,,

मम्मी बाम तो नही मिला लेकीन विक्स ले आया,,

कोई बात नहीं इसी को लगा दे थोड़ी बहुत तो राहत मिल ही जाएगी । ( शुभम के पेंट में बने तंबू की तरफ नजर गड़ाते हुए बोली,,,, वह भी अपनी मां की नजर को पहचान गया और झट से कुर्सी के पीछे चला गया,,,, निर्मला के ठीक पीछे शुभम खड़ा था और बीक्स की डिब्बी को खोल रहा था बिक्स की डिब्बी खुल पाती इससे पहले उसके हाथ से छूटकर नीचे की तरफ गिरी,,,, लेकिन वह डिब्बी सीधे जाकर निर्मला के ब्लाउज के बीचों-बीच की पतली गहरी दरार में जाकर फंस गई। यह देख कर तो शुभम परेशान हो गया लेकिन परेशान से ज्यादा वह उत्तेजना का अनुभव करने लगा,,,, जिस जगह ्विक्स की डीबियां गिरीे थी उस जगह को लेकर निर्मला काफी उत्तेजित थी,,, क्योंकि उसके दोनों हाथ में मेहंदी लगी हुई थी,,,, ऐसे मे वह जाहिर तौर पर अपने हाथ से उस डीब्बी को तो निकाल नहीं सकती थी,,,, और शुभम था कि गिरने वाली जगह को देखकर काफी हैरान था ऐसे में वह क्या करे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसकी परेशानी को समझते हुए निर्मला बोली।

अब देख क्या रहा है इसे निकाल तो सही,,,,, मेरे हाथ में मेहंदी लगी है वरना मैं ही निकाल देती,,,,,,

( अपनी मां की बात सुनकर उसके बदन मे उत्तेजना की लहर दौड़नें लगी,, वह तो ना जाने कब से बेताब था अपनी मां की चुचियों को पकड़ने के लिए,,,, और यहां तो उसकी मां खुद ऊसे मौका दे रही थी। भला वह इतना सुनहरा मौका हाथ से कैसे जाने देता,,, वह ठीक अपनी मां के सामने आकर खड़ा हो गया,,, उत्सुकता और उत्तेजना की वजह से उसे इस बात का एहसास भी नहीं हुआ कि उसकी पेंट में तंबू बना हुआ है और उसकी मां की नजर ठीक उसके तंबु पर ही है। वह अपना हाथ अपनी मां की चुचियों की तरफ बढ़ाया लेकिन उसका हाथ कांप रहा था,,, उसकी उंगलियां कांप रही थी जैसे ही वह,,, डिब्बी को लेने के लिए अधिक होने ब्लाउज में हाथ डाला वैसे ही उंगलियों के कंपन की वजह से डिब्बी और अंदर चली गई,,,, ब्लाउज की हालत पहले से ही खराब थी ब्लाउज में जरा सा भी तनाव बढ़ने से ब्लाउज के बटन टूट सकते थे,,,,, इसलिए वह अपनी मां से बोला,,,,

मम्मी ब्लाउज इतना तना हुआ है कि अगर एक उंगली भी अंदर जाएगी तो हो सकता है ब्लाउज का बटन टूट जाए,,,

नननन नननन,,,, ऐसा बिल्कुल मत करना यह मेरा पसंदीदा ब्लाउज है। एक काम कर ईसके बटन खोल दे तब विक्स की डीब्बी भी मिल जाएगी,,,,
( शुभम तो यही चाहभी रहा था। उसके हाथ में तो जैसे लड्डू आ गए थे उसने एक पल का भी विलंब किए बिना अपने दोनों हाथों की उंगलियों से अपनी मां के ब्लाउज के बटन को खोलने लगा,,,, लेकिन ऊसकी उंगलियां लगातार कांप रही थी यह देखकर निर्मला को मजा आ रहा था। धीरे धीरे करके उसने अपनी मां के ब्लाउज के सारे बटन खोल दिए,,,, सारे बटन खुलते ही ऊसकी बड़ी बड़ी चुचीयां बिल्कुल. नंगी हो गई क्योंकि जानबूझकर उसने आज ब्रा भी नहीं पहनी थी।
शुभम तो अपनी मां की नंगी चूचियों को देखकर एकदम उत्तेजित हो गया,,,, ऊसकी पेंट में बना तंबू और ज्यादा भयानक नजर आने लगा,,, अब विक्स का किसको ख्याल था। वह तो ना जाने कब से नीचे गिर चुकी थी। शुभम अपनी मां की चुचियों को देखे जा रहा था और निर्मला अपने बेटे के पेंट में बने तंबु को देखे जा रही थी। शुभम अपनी मां की चुचियों को हाथों से छूना चाहता था उन्हें हथेली में लेकर दबाना चाहता था,,,, सब कुछ उसकी आंखों के सामने ही था लेकिन फिर भी वह आगे बढ़ने से कतरा रहा था।
तभी निर्मला अपने बेटे के तंबू को देखते हुए बोली,,,,

बेटा अभी तक तुझे राहत नहीं मिला क्या,,,,

मिल तो गई मम्मी,,,,,


तो फिर तेरा खड़ा क्यों है?

कुछ नहीं मम्मी यै तो ऐसे ही,,,

नही ला मुझे दिखा तो,,, तू जल्दी से खोलकर मुझे दिखा ने देखूं तुझे राहत मिली या अभी भी परेशानी है।
( अपनी मां की बात सुनकर थोड़ी तो हिचकिचाहट उसके मन में थी लेकिन फिर भी वह उत्तेजना का अनुभव करते हुए जल्दी से अपने पेंट की बटन खोल कर,,, तुरंत पेंट को जांगो तक कर दिया और अपने खड़े लंड को दिखाने लगा निर्मला नजर भर कर अपने बेटे के लंड को देख पाती उससे पहले ही गाड़ी का होरन बजने लगा शुभम समझ गया कि उसके पापा आ गए हैं उसने जल्दी से पेंट पहन लिया।।
उसकी मां भी जल्दी से बोली,,,
जल्दी से मेरे ब्लाउज के बटन बंद कर तेरे पापा देख लेंगे तो क्या समझेंगे,,,,,

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Ankit
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Re: अधूरी हसरतें

Post by Ankit » 10 Nov 2017 15:27

superb update

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Kamini
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Re: अधूरी हसरतें

Post by Kamini » 10 Nov 2017 22:24

Mast update

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