ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

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jay
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by jay » 02 Dec 2017 22:29

प्रिन्सिपल सर और मेरे अन्य साथियों ने ताली बजा कर मेरी बात का अनुमोदन किया.. फिर प्रिन्सिपल बोले…

प्रिंसीपल- डियर स्टूडेंट्स.. ये कॅंपस आप लोगों के आने वाले भविश्य के निर्माण का एक ऐसा श्रोत है, जिसकी हम जैसी कद्र करेंगे, ये हमें वैसा ही मार्ग दर्शन देगा.

अगर हम इसे बुराईओं का अड्डा बना देंगे, तो कल को हमारे संस्थान से निकले हुए स्टूडेंट की सामाजिक प्रतिष्ठा भी धूमिल पड़ जाएगी, लोग हमें इज़्ज़त की नज़र से देखना बंद कर देंगे.

आप सबका नाम देख कर एक बार को मेरे दिमाग़ मे आया था कि अगर मुझे अपने कॉलेज को साफ-सुथरा करना है तो आप सभी को यहाँ से निकल देना चाहिए. लेकिन…

मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए… हमें रियली प्राउड फील करना चाहिए.. कि हमारे कॉलेज में अरुण जैसा स्टूडेंट मौजूद है.

जानते हो जब मैने आप सभी को रेस्ट्रीक्ट करने का फ़ैसला किया तो इसने क्या कहा…?? सभी उनके चेहरे की तरफ उत्सुकता से देखने लगे..

इसने कहा- सर इन बच्चों की नादानियों का इनके माता-पिता को डंड देना ठीक नही है, इसमें उनकी क्या ग़लती है? बड़े अरमान सँजोके उन बेचारों ने अपने बच्चों को यहाँ भेजा है, जिनमें से कुछ तो ऐसे भी हो सकते हैं कि दो वक़्त की रोटी का साधन जुटाने में भी असमर्थ हों, लेकिन महंत मजूरी करके इन्हें यहाँ पढ़ा रहे हैं.

और फिर इसी के सुझाव को मद्दे नज़र रखते हुए ये फ़ैसला लिया कि आप सभी को एक मौका और दिया जाए तो में चाहता हूँ, कि आप सभी ये वादा करें कि आज के बाद ऐसी कोई भी ग़लत आदत में नही पड़ोगे, अगर कोई भी स्टूडेंट दुबारा ऐसा करते हुए पाया गया, तो फिर कॉलेज उसे किसी भी कीमत पर आगे नही रख पाएगा.

क्या आप सभी एक मौका और चाहते हैं ? अपने-2 हाथ खड़े करके सहमति दें.. सबने अपने हाथ खड़े कर दिए..

प्रिंसीपल- आशा करता हूँ, आप सभी मन लगा कर अपनी पढ़ाई में लगेंगे, और आनेवाले एग्ज़ॅम में अच्छा कर के दिखाएँगे, ऑल दा बेस्ट बाय्स…आंड टेक केयर…

जैसे ही प्रिन्सिपल मीटिंग हॉल से गये, हम भी उनके पीछे-2 निकालने लगे, तो सभी स्टूडेंट्स ने हमें आवाज़ दे कर रोक लिया..

हम लोग मुड़े और उन लोगों की तरफ देखा. उनमें ज़्यादातर सीनियर्स ही थे. उन सभी ने मुझे थक्स बोला और सच्चे दिल से अपनी ग़लती स्वीकार करते हुए, सुधरने का वादा किया.

कुछ एक तो मेरे पैरों में पड़ गये, और रोते हुए कहने लगे…

सच में अरुण तूने हमें बचा लिया, वरना हमारे निकाले जाने के बाद हमारे माँ-बाप शायद जिंदा नही बचते.. वो कैसे-2 करके हमें यहाँ पढ़ा रहे हैं, और हम ये नीच काम में लगे है… अपने आप पर ही घिन सी आ रही है हमें.

मे- बीती बात बिसार के आगे की सुध लो… यही रास्ते को फॉलो करो और अपनी ग़लतियों से सबक लेके आगे बढ़ते रहो, सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी, सो प्लीज़ डॉन’ट बे शाइ आंड मूव फॉर्वर्ड…

एक महीने बाद फाइनल एग्ज़ॅम शुरू हो गये, सब उसमें बिज़ी हो गये..

एक साल कैसे बीट गया, पता ही नही चला, कुछ खट्टी-मीठी यादों के बीच कहना पड़ेगा इट वाज़ नोट बाद.

इस एक साल के कॉलेज के अनुभव ने मेरे सेल्फ़ कॉन्फिडॅन्स को और बढ़ा दिया था, बचपन से चाचा के साथ बीते मेरे दिनो की वजह से जो दिलेरी आ चुकी थी, वो आज कारगर सिद्ध हो रही थी.

एग्ज़ॅम गुजर गया, सीनियर वाले चले गये, हम सीनियर में आ गये, नये एडमिसन शुरू हुए, रगिन्ग की प्रथा फिर एक बार शुरू हुई, मेरे दोस्तों ने भी कहा, कि यार चलो किसी की रगिन्ग करते हैं, मैने मना कर दिया, कि देखो भाई, में कोई ऐसा काम नही करना चाहता जिससे किसी को कष्ट हो.

स्टूडेंट्स जो ड्रग अडिक्ट हो गये थे, वो कॉलेज छोड़ने से पहले पर्षनली मिलके गये, और मुझे उन्होने सच्चे मन से थॅंक्स कहा और आक्सेप्ट किया कि आज जो उन्हें डिग्री मिली है, वो मेरी वजह से है, वरना क्या पता वो एग्ज़ॅम दे भी पाते या नही, और देते भी तो कैसे?

उन चार लड़कों को मैने कमिटी मेंबरशिप तो दी, लेकिन उनका नाम गुप्त रखा और उन्हें सेक्रटेली काम करने के लिए कहा, जिससे इन्फर्मेशन निकालने में ज़्यादा मुश्किल पेश ना आए.

क्लासस स्टार्ट हो चुकी थी, सब अपनी-2 स्टडी मे बिज़ी हो गये.

हर हफ्ते रिंकी का लेटर मुझे मिलता रहता था, वो इंटर्मीडियेट कर चुकी थी और कोशिश में थी कि उसके पापा, आगे भी पढ़ने की पर्मीशन दे दें.

इस बीच, कुछ बाहरी असमाजिक तत्व कॅंपस में घुसने की कोशिश करते रहते थे अपने धंधे को आगे कॅंपस में फैलाने के लिए, चूँकि हमारी टीम सतर्क थी तो उन्हें चान्स नही मिल पा रहा था,

फिर भी डर तो रहता ही था, कि कभी ना कभी ये फिर पन्पेन्गे और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करेंगे. इसका कोई पार्मानॅंट सल्यूशन तो ढूढ़ना ही पड़ेगा.

मैने इस बाबत प्रिन्सिपल सर से मुलाकात की, और उनको रिक्वेस्ट की अगर आप पोलीस का बॅक-अप सपोर्ट अगर दिला सकें तो इस समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की जा सकती है.

उनके संबंध शहर के एसपी से अच्छे थे, उन्होने उनसे मिलने के लिए रिक्वेस्ट की, तो उन्होने हमें मिलने का समय दे दिया.

में प्रिन्सिपल के साथ एसपी ऑफीस पहुँचा, और उन्हें इस समस्या के निदान के लिए बात की.

प्रिंसीपल- एसपी साब, आपको तो ग्यात ही होगा, बीते साल हमारे कॉलेज में एक ड्रग डीलिंग का केस पकड़ा था, जिसमें 8 स्टूडेंट एन मौके पर पकड़े गये थे डीलिंग करते हुए..

एसपी- हां सर मुझे पता है, और उन आठों पर अभी भी केस चल रहा है.

प्रिंसीपल- उनको रंगे हाथों पकड़वाने का श्रेय, इस बच्चे और इसके 3 अन्य साथियों पर जाता है..

एसपी प्रशंसा भरी नज़रों से मुझे देखते हुए बोले- वेल डिड यंग मॅन.. क्या नाम है तुम्हारा…

मे- सर ! अरुण…

प्रिंसीपल- तबसे लेके आज तक, बाहरी ड्रग डीलर्स ने कई बार कोशिश की है घुसने की, लेकिन अरुण जैसे हमारे कुछ और भी स्टूडेंट्स हैं, जो इन चीज़ों पर नज़र रखे हुए हैं, और उन्हें नाकाम करते रहे हैं.

लेकिन कब तक,,? इसलिए हम चाहते हैं, कि इस बुराई का कोई स्थाई हल खोजा जाए, और इस शहर को भी इससे मुक्ति मिल सके. इसके लिए अरुण के पास एक योजना है, लेकिन वो तभी कारगर हो सकती है, जब उसमें पोलीस का सपोर्ट हो.

एसपी- श्योर सर हमारा महकमा आपकी हर संभव मदद करेगा, इनफॅक्ट हम भी इस बुराई का अंत चाहते हैं. बताओ अरुण तुम्हारी क्या योजना है ?
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(ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना running.......).
(वक्त का तमाशा running)..
(ज़िद (जो चाहा वो पाया) complete).
(दास्तान ए चुदाई (माँ बेटी बेटा और किरायेदार ) complete) .. (सातवें साल की खुजली complete)
(एक राजा और चार रानियाँ complete).............(माया complete...)-----(तवायफ़ complete).............
(मेरी सेक्सी बहनें compleet)........(दोस्त की माँ नशीली बहन छबीली compleet)............(माँ का आँचल और बहन की लाज़ compleet)..........(दीवानगी compleet )....... (मेरी बर्बादी या आबादी (?) की ओर पहला कदमcompleet)........(मेले के रंग सास,बहू और ननद के संग)........


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(कोई तो रोक लो)
(ननद की ट्रैनिंग compleet)..............( सियासत और साजिश)..........(सोलहवां सावन)...........(जोरू का गुलाम या जे के जी).........(मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन)........(कैसे भड़की मेरे जिस्म की प्यास)........(काले जादू की दुनिया)....................(वो शाम कुछ अजीब थी)

Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

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jay
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by jay » 02 Dec 2017 22:30

मैने अपनी योजना उन्हें समझाई, और अपने 8 नाम उन्हें लिख के दिए और कहा, कि अगर इन नामों में से किसी को भी पोलीस की जब भी मदद लगे उन्हें तुरंत मिले.

हम एसपी के ऑफीस और उनका पर्सनल फोन नंबर लेके कॉलेज लौट आए,

अब मुझे लगा कि अगर इस बुराई से लोगों को निजात दिलानी है, तो मैदान मे बिना कुदे ये संभव नही है, ये भी संभावना थी कि शायद इसमे पोलीस के कुछ अधिकारी भी शामिल हों.

हॉस्टिल आकर मैने अपने कमिटी मेंबर्ज़ को बुलाया, और उनसे सलाह-मशविरा करने लगा..

अपडेटेड सास्स मेंबर्ज़:
आक्टिव मेंबर्ज़ :- (साइ) - अरुण, धनंजय, ऋषभ, जगेश
सेक्राट मेंबर्ज़ :- (लाइ)- सागर, मोहन, (टाइ)- रोहन, कपिल.

मे- दोस्तों अब समय आ गया है ड्रग माफिया को इस शहर से उखाड़ फेंकने का, जिससे ना रहेगा बाँस, और ना बजेगी बाँसुरी.

ये लो शहर एसपी का ऑफीस और घर का फोन नंबर, जब भी कभी तुम लोगों को पोलीस की हेल्प की ज़रूरत लगे, तुरंत फोन कर सकते हो, हम सभी के नाम उनके ऑफीस में हैं, और अपना नाम बताते ही वो हर संभव मदद करेंगे.

अब ध्यान से सुनो, कल से ही हमें जल्दी सुबह 5 बजे उठके जिम में पहुँचना है, और यथा संभव जितनी जल्दी हो सके अपने को इस काबिल कर लेना है, कि कोई भी तुम्हें हल्के मे लेने की ग़लती ना कर सके.

शरीरक मजबूती हमें अपने काम में सफलता दिलाएगी. एक हफ्ते बाद हम फाइटिंग की प्रॅक्टीस शुरू करेंगे.

एक महीने के बाद हम इस पर आक्षन शुरू कर देंगे, किसी को इसमें कोई कुछ दिक्कत लगे तो अभी बता दो.

सभी जान मेरी शक्ल इस तरफ देख रहे थे मानो में कोई अजूबा हूँ.

जगेश – पर यार अरुण, हम अपने कॅंपस पर तो फोकस रखे हुए ही हैं, फिर ये सबसे हमारा क्या मतलब? और हमें पढ़ाई भी तो करनी होती है, तो इन सब बातों के लिए समय कहाँ से मिलेगा.

मे- कितने घंटे पढ़ाई करता है जगेश..? 2-4 या और ज़्यादा. मे तेरी बात से सहमत हूँ कि हम अपने कॅंपस में फोकस रखे हुए ही हैं, लेकिन कब तक? कल को हमें यहाँ से जाना होगा, उसके बाद..?

रोहन – तो क्या जिंदगी भर का हमने कोई ठेका ले रखा है,..?

मोहन – और इन सब चक्करों में पड़ने से हम गुण्डों से सीधा-2 पंगा ले रहे हैं यार, हमारी जान को भी ख़तरा हो सकता है ऐसे तो.

मे- और किसी को कुछ कहना है इस बारे में..?

थोड़ी देर शांति छाई रही जब किसी की कोई और प्रतिक्रिया नही मिली तो मे बोला.

देखो भाई ! तुम्हें लगता है कि ये सब काम में कुछ पाने के लालच मे, या मेरा कोई निहित स्वार्थ सिद्ध हो रहा हो उसके लिए कर रहा हूँ, तो ऐसा बिल्कुल नही है.

ड्रग अडिक्षन एक सामाजिक बुराई है, जो हमारे समाज को शरीरक और आर्थिक दोनो ही दृष्टि से खोखला कर रहा है, कुछ मुट्ठी भर लोग अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए इसे समाज में फैला रहे हैं, लेकिन आचे लोग आँख बंद किए बैठे हैं, कोई इसके खिलाफ कुछ करना ही नही चाहता है.

हम लोगों ने एक छोटे से प्रयास से इस बुराई को किसी हद तक अपने कॉलेज से उखाड़ फेंका है, जिसका नतीजा हम सबके सामने है, इस साल के रिज़ल्ट के रूप में.

सोचो अब अगर हम और थोड़ी सी कोशिश करें तो इस शहर को भी इस बुराई से मुक्ति दिला सकते हैं.

रही बात गुण्डों से पंगा लेने की, तो अगर वो बुरे काम के लिए अपनी जान का रिस्क ले सकते हैं, तो क्या हम एक अच्छे काम के लिए रिस्क नही ले सकते ?

वैसे भी चोर के पाव कितने होते हैं दोस्त ? एक बार उखड़े, तो उन्हें खदेड़ने मे ज़्यादा वक़्त नही लगेगा.

सोचो अगर इस काम में हमें सफलता मिल जाती है, तो हमारा ही नही हमारे कॉलेज का नाम भी स्वर्ण अक्षरों मे लिखा जाएगा, इस शहर के इतिहास में.

और ना जाने कितनी ही माओं की दुयाएं मिलेंगी हमें.

इस छोटी सी जिंदगी मे अगर कुछ अच्छा करके जायें तो उपरवाले के यहाँ भी सीना चौड़ा करके जा सकते हैं.

मेरे भाई, जिंदगी तो कुत्ते-बिल्ली भी जीते हैं, लेकिन शेर के जीने का अंदाज ही निराला होता है.

में तो भाई गुमनामी की जिंदगी जी नही सकता, और मैने फ़ैसला कर लिया है, कि जहाँ तक मेरे बस में होगा में इस बुराई के खिलाफ लड़ता रहूँगा, अब अगर जिसको मेरे साथ आना है, मोस्ट वेलकम, और नही आना है तो भी वेलकम.

कबीर ने कहा है “जो घर फूँके आपनो चले हमारे साथ”

बस मुझे आप लोगों से इतना ही कहना है कि “ज़िल्लत की जिंदगी से इज़्ज़त का एक पल हज़ार बार बेहतर”

जिसको मेरे साथ आना है, वो सुबह डॉट 5 बजे जिम मे मिले, इतना बोल कर में कमरे से बाहर निकल गया, और पीछे छोड़ गया एक गहन सन्नाटा.
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Kamini
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by Kamini » 03 Dec 2017 08:48

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jay
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by jay » 03 Dec 2017 18:53

डिन्नर के बाद हम अपने कमरे में आ गये, मैने इस विषय पर अपनी तरफ से फिर कोई बात नही की थी, मे थोड़ी देर अपनी बुक लेके स्टडी करने में लगा था, कि धनंजय मेरे पास आके बैठ गया.

मैने सवालिया नज़रों से उसकी ओर देखा.. उसने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिया और मेरी आँखों में झाँकते हुए बोला..

धनंजय – अरुण तू क्या है..?

मे – मतलब…? ये कैसा सवाल है…?

धनंजय- इतनी उँची सोच मात्र 19 साल के एक साधारण से लड़के की तो हो नही सकती ना यार !!

हमारी बताओं को सुनकर ऋषभ और जगेश भी हमारे पास आकर बैठ गये..

रिसभ- तेरे जैसा कलेजा हर किसी का नही है दोस्त !

में उन लोगों की ओर देख कर मुस्कराते हुए जगेश से बोला…

जगेश ! सच बताना, तूने क्या सोच कर वर्कशॉप मे उस लौडे को जबाब दिया था कि तमीज़ से बात कर..जबकि वो 8-8 जाने थे, और तू अकेला...बोल कहाँ से आई इतनी डेरिंग तुझमें.

जगेश – क्या बात करता है यार तू भी…? मे अकेला कहाँ था, तुम लोग भी तो थे मेरे साथ..

मे- तुझे कैसे लगा कि हम तेरे फटे में टाँग अड़ाएँगे..?

जगेश - झेन्प्ते हुए… हे हे हे…अब तू मेरी खिंचाई कर रहा है, है ना !

मे- नही मे सीरियस्ली पुच्छ रहा हूँ, तुझे कैसे लगा कि हम तेरे साथ हैं…

जगेश- तूने ही तो कहा था कि तेरे रहते हम लोगों को कोई छु भी नही सकता... तो इतना तो भरोसा था तुम लोगों पर मुझे..

मे- हॅम.. इसका मतलब तुझे मेरी बात पर भरोसा था…

जगेश - बिल्कुल ! और क्यों ना हो ! तू यारों का यार है अरुण ! इतना तो में समझ चुका हूँ तुझे इस एक साल में.

मे- तो फिर अब वो भरोसा कहाँ चला गया तेरा..? जो तूने शाम को बोला था उससे तो नही लगता कि तू मुझ पर आँख बंद करके भरोसा करता है..?

धनंजय- वो अपने कॉलेज के अंदर का मामला था भाई, अब जो हम करने की सोच रहे हैं वो एक तरह से बाहरी ताक़तों से सीधी टक्कर लेने जैसा है, और वो कितने ताक़तवर हैं हमें ये भी नही पता.

मे- एक मिनट भाई ! सोच रहे है.. मतलब ? जंग शुरू हो चुकी है मेरे भाई. तू क्या सोचता है.. ! वो लोग चुप बैठे हैं? नही वो हमारी ताक में कब्से घात लगाए बैठे हैं, तुम्हें अंदाज़ा ही नही है.

हमने उनके इस शहर के बहुत बड़े मार्केट को ब्लॉक करके रखा है, इस बात से तिलमिला गये हैं वो लोग, अब अगर हमने अपनी तरफ से कुछ नही किया तो इसमें हमारी ही ग़लती होगीमेरे भाई.

इससे पहले कि वो लोग ये जान पाएँ की हम उनके खिलाफ कुछ करने वाले हैं, हमें पूरी ताक़त से उन्हें दबोचना होगा, और इसमें पोलीस हमारी यथासंभव मदद करेगी.

लेकिन यार ये तो बड़ा जोखिम है.. काँपते हुए बोला ऋषभ..

मे- ऋषभ के कंधे पर हाथ रखते हुए… तू घबराता क्यों है, कुछ नही होगा हमें, विस्वास रख मुझ पर,

और एक बात गाँठ बाँध लो तुम लोग, मौत जिंदगी का एक मात्र सत्य है, जो एक दिन सबको आनी है, कोई पड़े-2 उसका इंतजार करता है, तो कोई उससे सामना करके,
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by jay » 03 Dec 2017 18:53

भगत सिंग, आज़ाद जैसे देश के वीर सपुतो को आज भी बड़ी श्रद्धा से याद करते हैं देशवासी, वो भी तो पड़े-2 अपनी मौत का इंतजार कर सकते थे लेकिन उन्होने उसका डॅट कर सामना किया और आज पूरा देश उनको याद करता है.

धनंजय- तेरी बड़ी-2 बातें हमारे जैसे छोटे दिमाग़ में घुसने वाली नही हैं, लेकिन मे तेरे साथ हूँ दोस्त ! आँख बंद करके तेरे साथ आग मे भी कूदने को तैयार हूँ. अब जो होगा सो देखा जाएगा.

ऋषभ & जगेश- हम भी… ये जिंदगी अब तेरे हवाले है भाई, जीवन में कभी भी इसकी ज़रूरत पड़े, बस आवाज़ दे देना, सर के बाल हाज़िर हो जाएँगे तेरे साथ मर कटने को.

और हम सबने एक दूसरे के हाथों को एक साथ पकड़ा और एक निश्चय करके अपने-2 बिस्तर पर सोने चले गये.

सुबह डॉट 5 बजे हम चारों जिम में थे, और अपनी-2 चाय्स के हिसाब से एक्सर्साइज़ मे जुट गये, वैसे हम रोज़ कॉलेज अटेंड करने से पहले अपने देसी तरीके से कसरत तो करते ही थे, तो ऐसा कोई खास दिक्कत तो नही, बस जिम के स्पेशल तरीकों से मसल्स थोड़े वेल शेप करने थे.

अभी हमें सिर्फ़ 5 मिनट ही हुए थे एक्सर्साइज़ शुरू किए, कि वो चारों भी आ गये… धनंजय ने उन्हें वेलकम किया,

कपिल- अरुण हम चारो तुम्हारे साथ हैं, और इस लड़ाई में मरते दम तक साथ देंगे.

रोहन – अगर हमारी वजह से समाज में फैली कुछ बुराइयाँ कम हो जाती हैं, तो दिल में एक सुकून तो रहेगा कि कुछ अच्छा काम किया अपने जीवन में.

मोहन- बहुत सोचा रात को, ठीक से सो भी ना सका, अंत में ये निस्चय लिया कि मुझे भी इस नेक काम में भाग लेना चाहिए, यही सोच के साथ तो मे कमिटी का हिस्सा बना था, तो अब पीछे हटने का कोई मतलब नही है… अब जो होगा सो देखा जाएगा.

सागर – मेरे तो बाप डेड भी इस देश की सेवा में रहे, दादाजी स्वतंत्रता सेनानी थे, पिता जी भी फौज में हैं, तो मेरा खून भी सफेद तो नही हो सकता ना? और फिर भाग्यवश, ये एक मौका हाथ आया है कुछ अच्छा करने का तो इसी से शुरुआत करते हैं. क्यों..?

मे- दोस्तो ! इस तरह का जज़्बा हर किसी में नही होता, कुछ खास ही लोग होते हैं, जो दूसरों के काम आते हैं,

अपने लिए तो हर कोई जीता है, औरों के लिए जो जिए उसको सारे जहाँ का प्यार और दुआएँ नसीब होती हैं.

हां एक और बात ! ये हमारे तुम्हारे बस मैं नही है की तुम जो कर रहे हो या करने वाले हो इसमें तुम्हारा कोई अपना सहयोग या सहमति है, ये तो पूर्व निर्धारित था, हमें इस कॉलेज में ही क्यों भेजा और मिलाया, इसमें भी नियती की कोई सुनियोजित चाल है.

करण – शायद तुम सही कह रहे हो अरुण, मैने भी ये अनुभव किया है कि हमारा ये मिलना कोई संयोग नही है..ये अट्रॅक्षन अनायास नही हुआ.

धनंजय- पता नही तुम दोनो क्या ग़ूढ ज्ञान की बातें कर रहे हो, मेरी तो कुछ समझ में नही आरहा…??

मे- अब्बेय साले तू ठहरा ठाकुर आदमी, बाहुबल से सोचता है, अध्यात्मिक बातें तेरी समझ से बाहर हैं.

ऐसी ही बातें करते-2 हम सभी दोस्त एक्सर्साइज़ करते रहे, पसीना बहाते रहे, और तक कर अपने-2 रूम में फ्रेश होने चले गये.

हफ्ते के बाद से ही हमने फाइटिंग की प्रॅक्टीस शुरू कर दी, कुछ बुक्स का सहारा लिया, कुछ मूवीस से टिप लेते रहे,

1 महीने तक हमने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपने शरीर को इतना तो चुस्त-दुरुस्त बना लिया था कि नॉर्मल कंडीशन्स में 2-4 के हाथ हम में से कोई आने वाला नही था.

मैने कहा ये अंत नही है, ये प्रॅक्टीस कंटिन्यू रहनी चाहिए…

अब शुरू होना था हमारा मिसन, उसके लिए हमने वो लिस्ट निकाली जो ड्रग यूज़ करने वाले स्टूडेंट्स थे, और बाद में सुधार लिए गये थे.

कुछ सीनियर्स के नामों पर टिक किया, और उनसे बात की. चूँकि कॉलेज से अफीशियल सर्क्युलर था कि हम किसी से भी कुछ भी पुछ-ताछ कर सकते हैं, कोई सवाल या जूनियर-सीनियर का लेवेल नही चलेगा.

दो लड़कों (मोनू और चिंटू) को काम में लाने का सोचा जिन्हें शहर में ड्रग्स कहाँ-2 मिलता है, ये पता था. फिर क्या था, लग गये एक और नेक काम पर….
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