ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

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Kamini
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by Kamini » 06 Dec 2017 21:35

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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

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jay
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by jay » 07 Dec 2017 17:25

thanks all
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(ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना running.......).
(वक्त का तमाशा running)..
(ज़िद (जो चाहा वो पाया) complete).
(दास्तान ए चुदाई (माँ बेटी बेटा और किरायेदार ) complete) .. (सातवें साल की खुजली complete)
(एक राजा और चार रानियाँ complete).............(माया complete...)-----(तवायफ़ complete).............
(मेरी सेक्सी बहनें compleet)........(दोस्त की माँ नशीली बहन छबीली compleet)............(माँ का आँचल और बहन की लाज़ compleet)..........(दीवानगी compleet )....... (मेरी बर्बादी या आबादी (?) की ओर पहला कदमcompleet)........(मेले के रंग सास,बहू और ननद के संग)........


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(कोई तो रोक लो)
(ननद की ट्रैनिंग compleet)..............( सियासत और साजिश)..........(सोलहवां सावन)...........(जोरू का गुलाम या जे के जी).........(मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन)........(कैसे भड़की मेरे जिस्म की प्यास)........(काले जादू की दुनिया)....................(वो शाम कुछ अजीब थी)

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jay
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by jay » 07 Dec 2017 17:26


लुक्का ने भी बैठे ही बैठे उससे हाथ मिलाया, दोनो के हाथ मिलते ही कस गये, और एक-दूसरे की शारीरिक क्षमता को परखने लगे.

नौजवान का हाथ थोड़ा छोटा था लुक्का के मुक़ाबले, लेकिन शक्ति में कमी नही आने दी उसने.

नौजवान- मिल कर खुशी हुई लुक्का भाई, मेरा नाम राका है, ये मेरे साथी हैं, हम राजपुरा में ड्रग डीलिंग का धंधा चलते है, अच्छी-ख़ासी डिमॅंड है इस चीज़ की वहाँ.

हमने आप का नाम सुना था, और ये भी हमें पता है कि आपकी डीलिंग डाइरेक्ट दुबई से है. ये बात उसने अंदाज़े से ही बोल दी थी.

तीर सही निशाने पे लगा.

लुक्का - सही सुना है तुमने, में इस शहर का बेताज बादशाह हूँ, सारे गैर क़ानूनी काम मेरी देख-रेख में होते हैं. पोलीस मेरी जेब मे रहती है, अब तुम अपने आने का प्रायोजन कहो, बोलो मेरे से क्यों मिलना चाहते थे.

नौजवाना- इफ़ यू डॉन’ट माइंड लुक्का भाई, मे आपसे अकेले में बात करना चाहूँगा.. !

लुक्का - तुम बोल सकते हो, ये मेरे बहुत खास आदमी हैं..

नौजवान – मे आपके आदमियों पर शक़ नही कर रहा हूँ, लेकिन इंसान का ओवर कॉन्फिडॅन्स कभी-2 नुकसानदेह होता है लुक्का भाई,

मुझे पता है आज दिन भर पोलीस ने शहर में क्या-2 किया है ..? अब इतना सब बिना अंदर की इन्फर्मेशन के तो संभव नही हो सकता ना…!

लुक्का को लगा लड़का कुछ ज़्यादा ही समझदार है, उसे उसकी बात मानने पर मजबूर होना पड़ा.

उसने अपने आदमियों को बाहर जाने का इशारा किया.. ! तो वो उसकी ओर ताज्जुब से देखने लगे…!

लुक्का ने थोड़े नाराज़गी वाले अंदाज में उनकी ओर देखा तो वो बाहर की ओर चल दिए..

उसके पाँचों गुंडे और वो तीनों नौजवान भी बाहर चले गये. उस नौजवान ने फ़ौरन गेट अंदर से लॉक कर दिया,

लुक्का – गेट क्यों बंद किया..?

नौजवान- दीवारों के भी कान होते है भाई….!

गेट बंद होते ही वो चारों भी जो लुढ़के पड़े थे, लोगों के बीच से उठ खड़े हुए और फिर उन सातों ने मिलकर उन पाँचों गुण्डों को घेरे में ले लिया, अब उन सभी के हाथों में गन्स दिखाई दे रही थी.

गुंडा 1– धोका..! कॉन हो तुम लोग..?

तुम जैसे देश और समाज के दुश्मनो की मौत और फिर धानी---धानी—लगातार 6 फाइयर हुए, और वो पाँचों गुंडे काउंटर पर बैठे गुंडे समेत ईश्वरपूरी को जाने वाली ट्रेन का टिकेट खरीदते हुए दिखाई पड़े..!

इधर जैसे ही फाइरिंग की आवाज़ लुक्का के कानों में पड़ी, वो चोंक पड़ा..!
कों हो तुम.. ?

अरुण …!! अरुण नाम है मेरा, सुना तो होगा मेसी में तेरे चूमाचो को जैल भिजवाने वाला में ही हूँ.

आज तेरे सारे शहर के अड्डों की वाट लगाने वाला भी में ही हूँ.
तेरे खरीदे हुए पोलीस के कुत्तों की रेमंड करने वाला भी में ही हूँ.. और अब तेरे गुनाहों की सज़ा देने वाला हूँ, अब अचानक उसके हाथ में गन नज़र आ रही थी.…

लुक्का की तो आँखें फटी की फटी रह गयीं, उसने ख्वाब में भी नही सोचा होगा, कि कोई 19-20 साल का लड़का उसको उसके ही अड्डे पर इस तरह गन पॉइंट पे ले लेगा.

अरुण ने रेवोल्वर की नाल के इशारे से उन लड़कियों को वहाँ से जाने के लिए इशारा किया, वो दोनो कांपति हुई एक कोने मे जाके दुबक गयी.

लुक्का चीखता हुआ अपने आदमियों को आवाज़ देने लगा… जग्गा…असलम… कहाँ मर गये सब के सब, जल्दी आओ..!

सब मार चुके हैं लुक्का…! सर्द लहजे मे कहा अरुण ने…

क्या..? क्या बोला तू..? ये नही हो सकता..?

तूने गोलियों की आवाज़ नही सुनी..? यही नही, तेरे क्लब के बाहर खड़े भडुवे भी अल्लाह मियाँ को प्यारे हो चुके हैं, अब सिर्फ़ तू अकेला बचा है..

लुक्का अभी तक सोफे से उठ भी नही पाया था, अरुण थोड़ा सा इधर-उधर देखने लगा तभी लुक्का को मौका मिल गया, और टेबल से एक शराब का खाली ग्लास उठा कर अरुण के गन वाले हाथ पर फेंक मारा.

निशाना सटीक था, नतीजा, गन उसके हाथ से छूट गयी, लुक्का की फुर्ती क़ाबिले तारीफ थी, जैसे ही गन अरुण के हाथ से च्छुटी, लुक्का का जिस्म सोफे से ना सिर्फ़ उच्छला, सीधा अरुण के उपर जंप लगा दी..

अरुण भी सतर्क था, वो अपनी जगह से एक पैर पर घूम गया, नतीजा लुक्का अपनी ही झोंक में सीधा टीवी के केस से जा टकराया..

घूमते ही अरुण ने उसके पिच्छवाड़े पर एक भरपूर किक रसीद कर दी, लुक्का जो अपने को संभालने की कोशिश कर ही रहा था, की फिर धडाम से जा टकराया.

लुक्का समझ चुका था, लड़के से आसानी से पार वो नही पा सकता, उसे अपनी पूरी क्षमता से इसके साथ लड़ना होगा.

अरुण अपनी जगह कमर पर हाथ रखे खड़ा उसके उठने का इंतजार कर रहा था.
जैसे ही लुक्का उठके घुमा, अरुण ने एक फ्लाइयिंग किक उसको मारी, इस बार लुक्का पूरी तरह चोन्कन्ना था, वो अपने जगह से हट गया, और अरुण का शरीर अपनी ही झोंक मे घूमता हुआ सोफे पे गिरा, पीछे से लुक्का ने उसके उपर जंप लगा दी, उसका भारी भरकम शरीर अरुण के उपर गिरा…

दोनो के वजन और झटके को भारी सोफा भी नही झेल पाया और वो पीछे को उलट गया, दोनो दूर तक लुढ़कते चले गये..

दोनो ही फुर्ती से खड़े हो गये, और एक दूसरे को खा जाने वाली नज़रों से घूर्ने लगे… दोनो की आँखों से खून बरस रहा था मानो,…!!!!

लुक्का दाँत पीसते हुए बोला- यहाँ आकर अपनी मौत को दावत दी है तूने लौन्डे… आज तुझे पता चलेगा कि लुक्का से टकराने का अंज़ाम क्या होता है..और वो अरुण के उपर झपटा..

अरुण ने एक कदम साइड में हटके ना केवल अपने को उसके बार से बचाया अपितु, घूम के उसका राइट हॅंड लुक्का के गले से कस गया… और दाँत पीसते हुए अपने बाजू से उसकी गर्दन को कसते हुए गुर्राया.. ..

बहुत खून चूसा है हरामजादे तूने इस शहर के नौजवानों का, आज तुझे पता चलेगा, कि एक सच्चा देश का आम नागरिक भी जब अपनी पर आता है, तो तेरे जैसे समाज के कीड़ों का क्या हाल करता है.. और देखते-2 उसका बाजू लुक्का की गर्दन में और कस गया…!

गला दबने से लुक्का के फरिस्ते कून्च कर गये, उसका चेहरा लाल भभुका हो गया, पूरे शरीर का खून उसके चेहरे पर जमा हो गया, आँखें उबल पड़ने को तैयार थी….

लेकिन वो भी हकीम लुक्का था.. कोई इतनी आसानी से उसपे काबू पा ले ये मुमकिन नही था, ये बादशाहत उसे किसी खैरात में नही मिली, अपने दम पर उसने इसे हासिल किया था, वो अभी भी किसी दाँव चलाने की कोशिश में था..

अचानक लुक्का ने अपने को पीछे को धकेलना शुरू कर दिया, और धकेलते-2 वो उसको उल्टे पड़े सोफे तक ले आया, जैसे ही अरुण के पैर सोफे से टकराए, अपनी पूरी शक्ति जुटा, लुक्का पीछे को उलट गया, नतीजा अरुण उल्टे पड़े सोफे पर धडाम से गिरा और उपर से लुक्का उसके उपर, उसकी पकड़ ढीली पड़ गयी..

लुक्का ने अपने दोनो हाथों से पकड़ के अरुण के हाथों को अपने गर्दन से अलग किया और खड़ा होते ही, अरुण को बिना कोई मौका दिए, झुक कर उसके मजबूत हाथ ने अरुण का गला कस लिया…!

उसका बड़ा सा कठोर हाथ अरुण के गले से कस गया, और अपनी ताक़त के ज़ोर से उसने उसको हवा मे उठा लिया…

अरुण के पैर हवा में झूल रहे थे, अब अरुण को लगने लगा कि वो गया, कुछ भी करने की स्थिति में नही था वो. चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया था मुँह खुल चुका था, आँखें और जीभ बाहर को आने लगी थीं.

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jay
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by jay » 07 Dec 2017 17:27


उधर लगभग आधे घंटे से ज़्यादा समय तक दरवाजा नही खुला, तो अरुण के दोस्तों को अब चिंता होने लगी.. और उन्होने दरवाजे को पीटना शुरू कर दिया.. जब काफ़ी देर तक भी कोई रेस्पॉन्स नही हुआ, तो वो सब मिलकर उसे तोड़ने की कोशिश करने लगे.

लेकिन दरवाजा भी काफ़ी मजबूत था, आसानी से टूटने वाला नही था, वो चोट पे चोट मारते रहे, लेकिन वो टस से मस नही हो पाया..

इधर अरुण को अपनी मौत दिखाई देने लगी, लुक्का के मजबूत हाथ की पकड़ ज़रा भी ढीली नही हो रही थी….

इतनी आसान मौत मरने नही आया हूँ में इस धरती पर…, जैसे धमाका सा हुआ हो उसके दिमाग़ में…! अपनी पूरी शक्ति से अपने शरीर को झूले की तरह झूलाया उसने, और अपने सेधे पैर की एक ठोकर लुक्का के जांघों के जोड़े पर दे मारी…!

चोट इतनी पवरफुल और सटीक थी लुक्का के गुप्तँग पर की लगते ही अरुण उसके हाथ से छूट कर धडाम से ज़मीन पर गिरा…!

लुक्का अपने दोनो घुटने पेट से जोड़कर ज़मीन पर लॉट-पॉट होने लगा, दर्द के मारे उसके मुँह से हृदय बिदारक चीख कमरे में गूंजने लगी. वो घायल भैंसे की तरह डकरा रहा था.

अरुण ने कुछ देर अपनी साँसें संयत की और फिर देर ना करते हुए उठा, लुढ़कते हुए लुक्का को सीधा करके उसकी छाती पर पैर रख के खड़ा हो गया.

लुक्का का दर्द के मारे बुरा हाल था, शायद उसके आँड फट गये थे जुते की भरपूर चोट से.

अरुण ने अपने पेंट की जेब से एक सफेद पाउडर की थैली निकाली और उसे फाड़ कर लुक्का के मुँह मे ठूंस दिया..

ले लुक्का चख अपने ही जहर का स्वाद कैसा होता है… ? हराम जादे खा इसे..! अब क्यों नही ख़ाता मदर्चोद…….?

लुक्का के मुँह में ठूँसा पाउडर धीरे-2 उसके पेट मे भी जा रहा था, उसके मुँह से गुउन्ण—गुउन्ण की आवाज़ें आ रही थी,

एक और थैली अरुण ने अपनी दूसरी जेब निकाली ही थी कि इतने में बाहर की कोशिश काम कर गयी, और दरवाजा धडाम से अंदर की ओर आ गिरा,

जैसे ही सबने अंदर का नज़ारा देखा, सबकी बान्छे खिल उठी..!

ऋषभ, धनंजय, इस हरामजादे के हाथ पकडो.. अरुण चिल्लाया,

वो दोनो लुक्का के हाथों के उपर पैर रखके खड़े हो गये, अरुण ने दूसरी थैली भी उसके मुँह में उडेल दी.

जगेश मूत साले के मुँह मे, जगेश हक्का बक्का.. अरुण को देखने लगा, अरुण अभी भी अपने आपे में नही था..! चिल्लाया..! अब्बेय हिज़ड़ा है क्या साले ? खोल पेंट और मूत इसके मुँह मे, जिससे ये पूरा का पूरा जहर इसके पेट मे चला जाए.

जगेश ने शरमाते सकुचाते हुए अपने पेंट की जिप खोली, लौडे को बाहर निकाला और छोड़ दी मूत की धार लुक्का के मुँह मे…!

लुक्का बेहोश हो चुका था, हिला डुला के देखा, जब उसके शरीर में कोई हलचल नज़र नही आई, तब उसे उसी हालत में छोड़ कर क्लब से बाहर निकल गये वी 8 बिना लेवेल के सच्चे समाज के सेवक………………!

दूसरी सुबह इस शहर के लिए कुछ हंगामे खेज होने वाली थी, लोगो के लिए कुछ खुशियाँ लाने वाली थी..,

शहर से नशे का कारोबार बंद हो चुका था, लोकल न्यूज़ पप्रेर्स इन्ही सब खबरों से भरे पड़े थे, पोलीस ने इस सारे मामले को अपनी एक बड़ी उपलब्धि बताया था…हकीम लुक्का नशे की अधिकता से मर चुका था.

हमें इससे कोई फ़र्क नही पड़ने वाला था, वैसे भी जितना आम लोगों की नज़र ना आयें उतना ही हम लोगों के लिए अच्छा भी था.

कमिश्नर और एसपी स्पेशली प्रिन्सिपल ऑफीस में बैठे, हम लोगों द्वारा मिली कामयाबी की भूरी-भूरी प्रशन्शा कर रहे थे, जिससे मेरे दोस्तों का सीना चौड़ा हो गया. आज उन्हें गुमान हो रहा होगा कि निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य कितना दिली शुकून देता है.

हम सभी दोस्त अपने सफल प्रयास से अति उत्साहित थे, हम लोगों में सेल्फ़ कॉन्फिडॅन्स का लेवेल काफ़ी बढ़ गया था, और ये बात अच्छी तरह घर कर गयी, कि आदमी अगर चाहे तो कुछ भी असंभव नही है.

उस घटना के 5 दिन बाद पोलीस हेड क्वॉर्टर मे एक पोलीस उपलब्धि समारोह आयोजित किया गया, जिसमें राज्य के होम मिनिस्टर से लेके आइजी, डीआइजी, कमिश्नर तक सभी बड़े-2 लोग थे, हमारे प्रिन्सिपल के साथ-2 हम 8 दोस्तों को स्पेशली इन्वाइट किया गया था वो भी स्पेशल पास भेज कर.

हम सभी समारोह मे शामिल हुए, मिनिस्टर, आइजी और डीआईजी ने पोलीस की तारीफ मे कसीदे पढ़े, जिससे हमारे प्रिन्सिपल को थोड़ा दुख हुआ, वो मेरी ओर निराशा भरी नज़रों से देख रहे थे. मैने इशारे से उनको मौन रहने को कहा.

लेकिन कमिश्नर को ये बातें हजम नही हो रही थी, तो जब उनकी बारी आई बोलने की तो वित ऑल रेस्पेक्ट टू सीनियर्स उन्होने कहा—

दोस्तो आप सब के अंदर खुशी देखकर बड़ा अच्छा लगा, कि चलो समाज से एक बड़ी बुराई का अंत देख कर सभी खुश हैं, ये एक छोटी-मोटी कामयाबी नही है, आज शायद ही कोई शहर या देश, इस बुराई की चपेट से मुक्त हो.

ये एक ऐसी बुराई है, जो हमारे समाज को ही खोखला नही करती अपितु हमारे बच्चो का भविष्य बर्बाद कर देती है, जो बच्चे आनेवाले भविष्य मे एक स्वस्थ समाज का निर्माण करने वाले होते हैं, उन्ही को ये बुराइयाँ ग़लत कामों की ओर धकेल देती हैं.

नतीजा जो स्वस्थ और संपन्न समाज हमें मिलना चाहिए, वो नही मिल पाता.

में मेसी कॉलेज के प्रिन्सिपल मिस्टर. रुस्तम सिंग और उनके 8 स्टूडेंट को स्टेज पर आमंत्रित करता हूँ, कृपया आप लोग स्टेज पर पधारने की कृपा करें.

जब हम सब स्टेज पर पहुँचे, तो फिरसे उन्होने बोलना शुरू किया..

दोस्तो ये बुराई तो निरंतर ना जाने कितने ही गत वर्षों से हमारे बीच थी, लेकिन क्या हम लोग इससे छुटकारा पा सके… ? नही ! बल्कि जानबूझ कर उसे अनदेखा करते रहे और जाने अंजाने हम भी उसमें लिप्त हो गये.

मुझे इस बात को स्वीकार करने में भी कोई शर्म महसूस नही हो रही कि हम में से ही कुछ स्वार्थी पोलीस अधिकारी उनका साथ देते रहे.

तो उस बुराई का अंत अभी संभव कैसे हुआ ? ये कभी सोचा किसी ने..?
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Re: ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना

Post by Kamini » 07 Dec 2017 19:46

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