मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है

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Kamini
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Re: मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है

Post by Kamini » 03 Dec 2017 08:58

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Re: मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है

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rajsharma
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Re: मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है

Post by rajsharma » 04 Dec 2017 13:48

Dhanywad dosto
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
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rajsharma
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Re: मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है

Post by rajsharma » 04 Dec 2017 13:48

सुल्तान भाई तेज़ी से मेरे करीब आया और आते साथ ही मुझे दो चार ज़ोरदार किसम के थप्पड़ रसीद करते हुआ गुस्से में फूँकारा” मुझे तो तुम्हे बहन कहते हुए भी घिन आती है, आ जाने दो गुल नवाज़ को,आज हम दोनो ने तुम्हारे टोटे टोटे ना किए तो कहना”.

भाई के थप्पड़ और जान से मार देने की धमकी सुन कर मेरे हाथ पावं फूल गये.

मुझे जिस बात का डर था वो ही बात अब होने जा रही थी.

मेरा सारा राज़ भाई के सामने खुल गया था. और अब मुझे पता था कि मेरी इस हरकत का अंजाम सिवाय मौत के कुछ और नही हो गा.

मौत तो अब मुझे अपने सामने आती दिखाई दे रही थी. मगर फिर भी में आख़िरी कॉसिश के तौर पर रोते हुए भाई के कदमों में गिर गई और उस के पावं पकड़ लिए” भाई खुदा के लिए मुझे माफ़ कर दो मैने जो कुछ भी किया निहायत मजबूर हो कर किया है”

“अपने नापाक जिस्म को मुझ से दूर करो ज़लील औरत” भाई गुस्से में मुझे दुतकारते हुआ चीखा.

“ भाई एक दफ़ा मेरी सारी बात तो सुन लो फिर चाहे मुझे क़तल कर देना”मैने भाई के पावं और मज़बूती से पकड़ते हुए कहा.

मेरी आँखों से ज़रो कतर आँसू जारी थे और रोते रोते मेरी आँखे सुराख होने लगीं.

“अच्छा उठ कर बिस्तर पर बैठो और बको कि तुम ने ये जॅलील हरकत क्यों की” मेरा इस तरह रोने और मिन्नत समझाहत से शायद सुल्तान भाई का दिल पसीज गया. और उन्हो ने मुझ फर्श से उठा कर बिस्तर पर बैठाते हुए कहा और खुद भी मेरे साथ ही बिस्तर पर बैठ गया.

बिस्तर पर बैठे हुए मैने अपना सर झुका कर आहिस्ता आहिस्ता शुरू से ले कर आख़िर तक सारी बात सुल्तान भाई को सुना दी.

मैने अपनी बात सुनाते वक़्त पूरी कॉसिश की कि तफ़सील बयान करने के दौरान कोई गंदा लफ़्ज मेरे मुँह से ना निकल पाए.

सुल्तान भाई मेरा भाई होने से पहले एक मर्द था.

और एक मर्द होने के नाते मेरी बातों को सुन कर उस का मर्दाना पन का उभर आना एक बिल्कुल फितरती अमल था.

शायद ये मेरी बातों की गर्मी का ही असर था. कि में अब अपने भाई के लहजे में थोड़ी नर्मी और उस के जिस्म के अंदाज़ को थोड़ा बदला हुआ महसूस करने लगी थी.

“वैसे उस रात तुम्हारी शेव ना होने की वजह से मुझे थोड़ा शक तो हुआ था कि शायद ये मेरी बीवी नुसरत नही है. मगर इस के बाद तुम ने मुझ सोचने समझने का मोका ही नही दिया. लेकिन क्या गुल नवाज़ को भी इस बात का शाक नही हुआ कि उस के साथ बिस्तर पर उस की बीवी नही बल्कि उस की बहन सो रही है” सुल्तान भाई मुझ से सवाल किया.

और साथ ही गैर इरादी तौर पर आहिस्ता से अपना दायां (राइट) हाथ आगाए बढ़ा कर मेरी रेशमी शलवार के उपर से मेरी गोश्त से भरपूर रान पर रख दिया.

सुल्तान भाई का इस तरह अपनी रान पर हाथ रोकने और साथ ही उन के मुँह से पहली बार अपनी चूत की शेव के मुतलक बात सुन मुझ थोड़ी शरम महसूस हुई.

“भाई मुझे इस बात का तो पता नही मगर में उन दोनो को उस रात बाथरूम में प्यार करता हुआ देख चुकी हूँ” मुझे ना चाहते हुए भी सुल्तान भाई को नुसरत और गुल नवाज़ की बाथरूम वाली बात बताना पड़ी.

क्यों कि में सोच रही थी. कि शायद ये बात जान कर सुल्तान भाई का मुझ पे आने वाला गुस्सा थोड़ा ठंडा हो जाए.

कि अकेले मुझ से ही ये गुनाह सर्ज़ाद नही हुआ. बल्कि जाने अंजाने में गुल नवाज़ और नुसरत भी एक दूसरे के साथ ये हसरत कर चुके हैं.

“क्य्ाआआआआआआआआ यानी मेरे साथ साथ गुल नवाज़ भी बहन चोद बन चुका है ” मेरी बात सुन कर सुल्तान भाई का मुँह खुला का खुला रह गया.

हालाकी में अंधेरे कमरे में दो दफ़ा अपने भाई से अपनी फुद्दी मरवा चुकी थी.

मगर फिर भी आज यूँ दिन की रोशनी में अपने साथ जुड़ कर बैठे भाई के मुँह से खुलम खुल्ला इस किसम के इलफ़ाज़ सुन कर मुझे शरम आ रही थी.

“हां भाई वो दोनो भी ये सब कुछ कर चुके हैं” मैने अपने खुसक होते हुए होंठों पर अपनी ज़ुबान फेरते हुए भाई को जवाब दिया.

“रुखसाना में सारी बात समझ चुका हूँ.मगर फिर भी जो कदम तुम ने मजबूरी की हालत में उठाया वो एक बहुत बड़ा गुनाह है”सुल्तान भाई बोला.

“ठीक है भाई अगर अपना घर बचाना एक गुनाह है तो मैने ये गुनाह किया है. अब तुम चाहो तो मुझ सज़ा के तौर पर फाँसी चढ़ा दो” इतना जवाब दे कर में फिर रोने लगी.

“ अच्छा जो हो गया सो सो गया अब तुम ये रोना धोना बंद करो”. मुझ दुबारा रोता देख कर सुल्तान भाई के दिल में शायद “रहम” आ गया.

और भाई ने मेरी रान से हाथ हटा कर अपने बाज़ू को मेरे जिस्म के गिर्द लपेटा और मेरे सर को अपने चौड़े कंधे पर रख लिया.और मेरे आँसू पोछने के लिए प्यार से अपना हाथ मेरे गालों पर फेरने लगा.

अपने साथ अपने भाई का बदलता हुआ सलूक देख कर में ये सोचने लगी कि रात के अंधेरे में दो दफ़ा तो में पहले ही अपने भाई से चुदवा चुकी हूँ.

और अब जब कि मेरा सारा राज़ भी सुल्तान भाई के सामने खुल ही चुका है. तो फिर क्यों ना में हिम्मत कर के इस मोके से फ़ायदा उठा लूँ. और अपने भाई को पूरी तरह अपने काबू में कर के अपनी जान बचा लूँ.

इस लिए मैने इस मोके को “गनीमत” जानते हुए अपना रोना बंद कर दिया. और सुल्तान भाई के मज़ीद नज़दीक होते हुए सख्ती के साथ उस के जिस्म से लिपट गई.

मेरे इस तरह लीपटने से मेरे बड़े बड़े मम्मे सुल्तान भाई के जिस्म के साथ टच होने लगे.

जब कि इसी दौरान अब मैने अपना हाथ सुल्तान भाई की शलवार के उपर से उन की टाँग पर रख दिया था.

मुझे यूँ अपने साथ चिपटा देख कर भाई ने प्यार से मेरे सर के बलों में एक प्यारा सा बोसा (किस) दिया.

में भाई के इस प्यार को पा कर अब ये बात ब खूबी जान चुकी थी. कि सुल्तान भाई का गुस्सा अब रफू चक्कर हो गया है.

“रुखसाना मुझे एक बात अभी तक समझ नही आई कि तुम ने इस काम के लिए मेरा चुनाव ही क्यों किया. क्या तुम और के साथ ये गुनाह नही कर सकती थी” सुल्तान भाई ने मुझ से फिर एक सवाल पूछा.

“भाई आप जानते हो कि गाँव में कोई भी बात राज़ नही रह सकती और जब भी ये बात खुलती.तो ना सिर्फ़ मेरा बल्कि हमारे पूरे खानदान का इस गाँव में जीना मुश्किल हो जाता” मैने अपने हाथ को आहिस्ता आहिस्ता भाई की मज़बूत टाँग के उपर घुमाते हुए जवाब दिया.
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Re: मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है

Post by rajsharma » 04 Dec 2017 13:49

सुल्तान भाई की शलवार के उपर से मेरा हाथ अब आहिस्ता आहिस्ता सरकता हुआ भाई के लंड की तरफ जा रहा था.

मेरे हाथ की इस हरकत को शायद भाई ने भी महसूस कर लिया था. जिस की वजह से शायद भाई का सोया हुआ लंड उस की शलवार में अपनी नींद से जागने लग गया.

साथ ही साथ ना चाहने के बावजूद अपने लंड को यूँ अपनी शलवार में खड़ा होता हुआ महसूस कर के सुल्तान भाई का जिस्म अब बेचैनी के आलम में थोड़ा थोड़ा टेन्स हो कर अकड़ने सा लगा था.

दूसरी तरफ मेरी इस हरकत से महज़ोज़ होते हुए मेरी अपनी फुद्दी भी अपना पानी छोड़ने लगी.

“रुखसाना ठीक है कि तुम ने ये कदम बहुत मजबूरी की हालत में उठाया है, मगर ये तो सोचो कि हम दोनो बहन भाई हैं और ये बहुत बड़ा गुनाह है जो तुम ने किया है”भाई अपनी फूलती हुआ सांस को संभालते हुए बोला.

अब मेरा हाथ सुल्तान भाई की शलवार के उपर से भाई के खड़े होते हुए लंड के बिल्कुल नज़दीक पहुँच चुका था.

“वो तो ठीक है मगर आप ये तो सोचो कि हम भाई बहन होने से पहले एक औरत और मर्द हैं.अगर मेरा शोहर मुझे एक बच्चा देने के क़ाबिल नही तो आप तो मुझे दे सकते हो ना”इस के साथ ही मैने हिम्मत की और भाई के लंड के नज़दीक पहुँचे हुए हाथ को आगे बढ़ा कर भाई के लंड पर रख दिया.

ज्यूँ ही मेरे हाथ ने शलवार के उपर से सुल्तान भाई के तने हुए लंड को अपनी गिरफ़्त में लिया भाई के मुँह से एक सिसकी भरी आवाज़ निकल गई’ हाईईईईईईईईईईईईईईईई” " उफफफफ्फ़ ये मत भूलो कि हम बहन भाई हैं और ये सब कुछ जो तुम कर रही हो ये ग़लत है. पागल मत बनो रुक जाऊओ रुखसानाआआआआआआआ”.सुल्तान भाई मुझे आगे बढ़ने से रोकने की नाकाम कॉसिश कर रहा था.

“अच्छा भाई में ये सब नही करती मगर ये बता दो कि किया आप को अच्छा लगे गा कि में बाहर के किसी मर्द के साथ ये सब करू “?

मैने सुल्तान भाई के लंड को अपनी गिरफ़्त से आज़ाद करते हुए पीछे हटने की कोशिस की.

मेरा इस तरह करने की दो वजह थीं. एक तो मैने ये बात कह कर भाई की गैरत को ललकारा था.

दूसरा ये कि में देखना चाहती थी. कि मैने अपनी बातों और हरकत से जो शोला अपने भाई के तन बदन में सुलगाया है. उस ने भड़क कर आग की शकल इकतियार की है कि नही.

वैसे सयाने सही कहते हैं. कि मर्द आख़िर मर्द ही होता है.

उस को चोदने के लिए एक मोरी (चूत) की ज़रूरत होती है. और जब उस का लंड अकड कर खड़ा हो जाता है तो फिर वो कोई परवाह नही करता कि ये मोरी बीवी की है या बहन की.

सुल्तान भाई ने एक लम्हे के लिए मेरी आँखों में आँखें डाल कर कुछ सोचा.

शायद वो ये सोच रहा था. कि जब वो अंधेरे में दो दफ़ा अपनी बहन की चूत को हर अंदाज़ में चोद चोद कर अपना बीज अपनी बहन की कोख में पहले ही डाल चुका है. तो अब क्यों फरिश्ता बनने का नाटक और तकल्लूफ किया जाय.

और पाकिस्तानी मूवी के टाइटल“एक गुनाह और सही” की तरह एक और गुनाह करने में क्या हर्ज है
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Re: मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है

Post by Ankit » 04 Dec 2017 18:43

Superb update

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