बाल उपन्यास -परियों का देश

Jemsbond
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बाल उपन्यास -परियों का देश

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 11:32

बाल उपन्यास -परियों का देश

लेखक-श्रीनाथ सिंघ

एक् लड़का था । बड़ा प्यारा, बड़ा दुलारा और बड़ा हँसमुख । उसका नाम था गोपाल । बाप की छड़ी को वह घोड़ा बनाकर चलता था और सिर पर लाल रंग की टोपी लगाता था । गोपाल से दो वर्ष बड़ी उसकी एक बहन थी । उसका नाम था चमेली । चमेली अपने पास हमेशा एक छोटी सी बांस की सन्दूक रखती .थी जिसमें उसकी गुड़िया बन्द रहती थी ।
ये दोनों भाई-बहन रोज सबेरे घर से निकल कर खेत में टहलने जाते थे । गोपाल अपने बाप की घड़ी को घोड़ा बनाता था । चमेली अपनी बांस की सन्दूक लेकर उसके पीछे खड़ी होती थी और दोनों टिक-टिक करते हुये हरे-भरे खेतों का एक चक्कर लगा आते थे ।
अब उस दिन की बात सुनिये जिस दिन से हमारी यह कहानी शुरू होती है । उस दिन गोपाल की नींद जरा जल्दी खुल गई । तारे कुछ-कुछ फीके पड़ गए थे पर चन्द्रमा फीका नहीं पड़ा था । गोपाल ने बिस्तर पर लेटे ही लेटे कहा-चमेली दीदी, चमेली दीदी!
चमेली ने जवाब दिया-मैं बड़ी देर से जग रही हूँ । तुमको विश्वास न हो तो चन्द्रमा में: जो बुढ़िया बैठी है उससे पूछ लो । तब से वह मेरी ही ओर देख रही है ।
गोपाल बोला-उठोगी नहीं, बहाना करोगी ।
चमेली ने कहा-पहले: अपने घोड़े को तैयार करो ।
कू कू कू ''
''चमेली दीदी! चमेली दीदी! बाग: में कोयल बोल रही. है । आज उसी तरफ चलेंगे । उठो: जल्दी करो ।''
चमेली उठ कर बैठ गई । गोपाल उठकर खड़ा हो गया । कोयल की आवाज न सुन पड़ती तो शायद ये दोनों अभी कुछ; देर और बिस्तर पर पड़े-पड़े बातें करते और फिर माँ के उठाने से उठते ।
कोयल की कू-कू ने झटपट दोनों को तैयार कर लिया ।' चमेली ने अपनी बांस की सन्दूक ली और गोपाल ने अपना'- घोड़ा सँभाला ।
अब दोनों घर से बाहर गाँव के रास्ते पर थे । सब तारे डूब चुके थे । सिर्फ एक तारा फीके चन्द्रमा के पास चमक रहा था ।
गौपाल ने कहा-जान पड़ता है । मङ्गल तारा यही है । मास्टर साहब बताते थे कि यह हमारी था के बहुत करीब: है और इसमें भी आदमी बसे हैं ।
चमेली ने कहा-नहीं यह शुक्र होगा । देखो न कानी आँख- की तरह कैसा टकटकी बाँधे देख रहा है । शायद चन्द्रमा को चिढ़ा रहा है । बड़ा ऐबी जान पड़ता है ।
गोपाल बोला-तब इसे शनीचर कहो । ऐबी तो शनीचर होता है।
“कूँ!”
चमेली ने चिल्लाकर कहा-रास्ता देखो! घोड़े को तेज करो चाबुक लगाओ । चलो बढ़ो ।
दोनों खटपट-खटपट दौड़ने लगे और गाने लगे-
चल-चल धोड़े सरपट चल ।
झटपट झटपट झटपट चल ।।

बहुत दूर जाना है हमको ।
फिर वापस आना है हमको ।।
पल में चलकर पार पियारे ।
जंगल झाड़ी ऊसर दल-दल ।।

चल चल धोड़े सरपट चल ।
झटपट झटपट झटपट चल ।।

दोनों दौड़ने लगे । हरी घास पर बिखरे ओस के कितने, मोती उनके पैरों से लग कर टूट गए, इसका उन्हें पता भी नहीं चला । गोपाल की टोपी की तरह पूरब की दिशा लाल हो रही: थी पर इसकी ओर भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया । बस, कोयल की कू-कू'' की ओर कान लगाए दोनों थिरकते हुए चले जा रहे थे। एकाएक गोपाल बोल उठा – चमेली दीदी! जरा सामने देखो तो क्या है?
“नीम का पेड़ है और क्या है?”
“नहीं नहीं, ऊपर देखो!”
“ऐं! यह तो गुब्बारा जान पड़ता है”।
'' हां! हां! जान पड़ता है कहीं उड़ा जा रहा था पेड़ में अटक गया ।''
अब दो में से एक को भी कोयल की कू-कू का ध्यान न रहा । पेड़ के पास पहुंचते हो घोड़ा रुक गया । गोपाल ने उसे फौरन एक झाड़ी से बाँध दिया । चमेली ने बाँस की सन्दूक बोलकर अपनी गुड़िया को बाहर निकाला और कहा-प्यारी गुड़िया सबेरे की हवा का आनन्द लो । सबेरे की हवा बड़ी फायदेमन्द होती है ।
इसके बाद दोनों पेड़ के पास पहुंचे । गुब्बारा एक रस्सी से पेड़ की डाल से बंधा था और हवा के झोकों से हिल रहा था ।
'चमेली ने कहा-गोपाल, तुम यही खड़े रही, मैं पेड़ पर चढ़ूंगी ।
गोपाल बोला-नहीं मैं चढ़ूंगा। तुम लड़की हो, लड़कियों को पेड़ पर न चढ़ना चाहिए ।
चमेली झुंझला कर बोली-बहुत बात करना सीख गया है । मैं तुझे पेड़ पर नहीं चढ़ने दूंगी । कहीं कुछ हो जाय तो मां मेरे ही ऊपर बिगड़ेंगी ।
''नहीं-नहीं, अम्मा को मालूम है कि मैं पेड़ पर चढ़ता हूँ । तुम्हें उस दिन की बात याद है जब उन्होंने खुद ही दातौन तोड़ने के लिए मुझे पेड़ पर चढ़ाया था ।''
अन्त मैं गोपाल ही पेड़ पर चढ़ा । और ऐसी फुर्ती से चढ़ा जैसे बन्दर चढ़ते हैं । चमेली ने मुस्कराकर कहा-वाह रे बंदर!
फिर उसने कहा-रस्सी पकड़ कर खींचो । देखो गुम्बारा नीचे आता है या नहीं?
गोपाल ने जोर लगाया ।
हाँ आता है! ''
''अच्छा । पहले खूब खींचकर दूसरी जगह बाँध दो तब बाकी रस्सी लेकर नीचे उतर आओ ।' '
गोपाल ने कहा-बहुत मामूली गुब्बारा है । इसे मैं एक ' हाथ से ही खींचकर नीचे ला सकता हूँ ।
चमेली ने डांटकर कहा-अरे बन्दर! कहीं गुब्बारा तुझे लेकर उड़ न जाय । जरा सावधानी से काम कर ।
चमेली अपनी यह बात खतम भी नहीं कर पायी थी कि उसे पेड़ में फड़फड़ाहट सी सुनाई पड़ी । उसने ऊपर की ओर देखा तो उसके होश उड़ गए । गुब्बारा उत्तर की ओर उड़ा चला जा रहा था और उसमें लटका हुआ गोपाल कह रहा था-अहा हा! देखो! देखो! ''
चमेली अपनी गुड़िया छोड्‌कर उसी ओर को दौड़ पडी ।. उसे डर था कि कहीं गोपाल गुब्बारे के साथ उड़कर अनजान देश को न चला जाय ।
धीरे-धीरे गुब्बारा ऊँचा उठने लगा । अब चमेली और भी डरी । गोपाल को भी डर मालूम होने लगा । घबड़ाहट की आवाज में उसने कहा-''चमेली दीदी! ''
चमेली ऊपर की ओर आँखें किये दौड़ी जा रही थी । एका-एक गड्‌ढे में पैर पड़ जाने से वह फिसलकर गिर पड़ी ।
पर उसका भाई संकट में था। तुरन्त ही वह फिर उठी। अब गोपाल बहुत ऊँचे पहुँच चुका था और पतले तागे में बंधे मेढ़क की तरह झूलता हुआ दिखाई दे रहा था। चमेली की आँखों से आँसू बहने लगे । वह जोर-जोर स रोने लगी- हाय हाय! भैया गोपाल अब क्या करूँ? किसको पुकारूँ? अम्मा! अम्मा! गोपाल उड़ा जा रहा है ।
पर उस सुनसान स्थान में उसकी मदद करने वाला वहाँ कोई न था ।
'सूरज निकल रहा था । सामने उत्तर की ओर एक बड़ा पहाड़ खड़ा था । यह पहाड़ काले बादल की तरह बड़ा डरावना दिखाई देता था । पहाड़ पूरब से पच्छिम तक बहुत दूर तक लम्बा चल गया था । उसकी चोटी पर सबेरे की धूप ने एक सुनहली लकीर खींच दी थी । जान पड़ता था जैसे किसी बादल के सिरे पर बिजली चमकी हो और चमक कर रह गई हो, गायब न हुई हो । गोपाल ने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था । थोड़ी देर को वह भूल गया कि वह कहाँ है और पहाड़ की चोटी पर सबेरे की यह सुनहली शोभा देखने लगा । वह उड़ता जा रहा था और सबेरे की यह शोभा देखता जा रहा था ।
गोपाल ने सोचा शायद यह हिमालय. है । चमेली का वह गीत उसे याद था –

उत्तर में खड़ा हिमालय
बहुत बड़ा है बड़ा हिमालय।

बादल उसमें अड़ जाते हैं
मनमाना जल बरसाते हैं।
भारत से जो लड़ने आते
उसे देख कर डर जाते हैं।

योद्धा सा है अड़ा हिमालय
उत्तर में है खड़ा हिमालय।

कुछ दूर तक वह इस गीत को गाता रहा और मन में सोचता रहा-यह हिमालय बड़ा दयावान होगा । योद्धा लोग बड़े दयावान होते हैं । मेरी मदद यह जरूर करेगा । मैं इससे कहूँगा-हिमालय दादा! नमस्कार!
कुछ जवाब जरूर देगा । शायद कहे-- गोपाल खुश रहो ।.'
रोज खड़ा-खड़ा बहुत दूर तक की चीजें यह देखता रहता है ।' कौन जाने मुझको यह पहचानता हो । सुना है इसके शरीर मैं बड़े-बड़े पेड़ वैसे ही उगे हैं जैसे हमारे शरीर में रोएं होते हैं ।
मैं हिमालय से एक घोड़ा मागूँगा । जरूर दे देगा । उसी पर बैठ कर घर लौटूँगा । अहा हा!
' जैसे सबेरे की धूप से हिमालय हँस रहा था वैसे ही खुशी से गोपाल का चेहरा खिल उठा । उसने पीछे की ओर देखा कि. कितनी दूर उड़ आया हूँ । पर उसे कुछ पता न चला । चारों तरफ हरियाली ही हरियाली उसे दिखाई देती थी । खेतों में
किसान काम कर रहे थे । वे उसे चमेली के गुड्‌डों की तरह दिखाई पड़ते थे । उनके बैल ऐसे जान पड़ते थे मानों सफेद खरगोश के जोड़े हों । सड़कें सफेद लकीर की तरह दिखाई देती थीं और गांव और शहर गुड़ियों की छावनी की तरह जान पड़ते थे । गोपाल मदरसे में सुना करता था कि सूरज पृथ्वी से बहुत बड़ा है पर दूर होने की वजह से इतना छोटा दिखाई पड़ता है । पहले यह बात उसकी समझ में नहीं आती
थी। अब साफ-साफ समझ आने लगी। दूर से चीजें छोटी दिखाई पड़ती हैं।
एकाएक उसके कान में धीमी आवाज आई – देखो-देखो! मेंढ़क उड़ा जा रहा है। शायद कोई कौआ उसे पकड़े है।
गोपाल ने नीचे की ओर देखा। एक गांव में बहुत से लड़के जमा होकर उसकी ओर देखकर चिल्ला रहे थे। गोपाल ने जोर से कहा – मैं मेंढक नहीं हूँ । आदमी हूँ । पर शायद उसकी आवाज किसी ने नहीं सुनी । लड़के तब भी मेंढक-मेंढक चिल्लाते रहे ।
गोपाल के जी में आया कि नीचे जमीन पर कूद पड़े और इन शैतान लड़कों को यह दिखलावे कि वह मेंढक नहीं है । पर फासला ज्यादा था । कहीं ऐसा न हो कि उसकी हड्‌डी पसली तक का पता न चले । बेचारा मन मसोस कर रह गया ।
गुब्बारे की रस्सी पकड़े-पकड़े उसकी मुट्ठियों में दर्द होने लगा । उसकी अँगुलियाँ कटी जा रही थीं । लटके-लटके उसकी बाहों में और कँधों में दर्द होने लगा । अब क्या करे? कब तक इस तरह लटका रहे? अन्त में उसे एक उपाय सूझा । रस्सी में नीचे के सिरे पर एक मोटी सी गांठ लगी थी, गोपाल दोनों पैरों के तालुओं से रस्सी को दबाकर और मुट्‌ठियों को ढीली करके नीचे की ओर खिसकने लगा । खिसकते-खिसकते वह गांठ तक पहुँच गया और उस पर मजे से बैठ गया । फिर उसने दांत से रस्सी को पकड़ कर अपनी अँगुलियों को खोला । अँगुलियों में बड़ा दर्द हो रहा था और वे सीधी नहों हो रही थी । धीरे-धीरे उसका हाथ ठीक हुआ ।
अब गोपाल को भूख मालूम होने लगी । इतनी देर में वह दो बार खा चुकता था । भूख लगने के साथ ही उसे अपनी माँ का ध्यान आया । फिर चमेली का ध्यान आया । वह सोचने लगा--माँ क्या कहती होगी । चमेली घर पहुंची होगी या' नहीं? उसकी आखों में पानी भर आया । वह रोने लगा । क्या वह भूखा-प्यासा बिना अपनी प्यारी माता और बहन को देखे ही मर जायगा? आखिर कहाँ तक उड़ कर जायगा । क्या वह पृथ्वी के सिरे पर पहुँच जायगा मगर नहीं । उसने सोचा कि जमीन गोल है? यह तो हो सकता है कि वह घूम कर फिर वहीं आ जाय जहाँ से उड़ा था । पर इस यात्रा में कितने दिन लगेंगे? कुछ ठिकाना है? गोपाल का चेहरा उदास हो गया ।
गुब्बारा बहुत ऊँचे उठ गया । गोपाल ने जो नीचे की ओर देखा तो उसे डर मालूम हुआ । उसने तुरन्त अपनी आँखें मूँद लीं । आँखें बन्द करके उड़ते-उड़ते उसे नींद आ गई । इस तरह बहुत देर तक वह सोते-सोते उड़ता रहा ।
एकाएक रस्सी से एक झटका लगा और गोपाल की नींद खुल गई । गुब्बारा पहाड़ की चोटी पार कर चुका था और रस्सी एक पेड़ की डाल से उलझ गई थी । गोपाल रस्सी छोड़ कर ऐसा उठने लगा जैसे कोई नींद खुलने पर बिछौने से उठता है । नतीजा यह हुआ कि वह गिर पड़ा और नीचे लुढ़कने लगा । पहाड़ पर कहीं-कहीं झाड़ियों और घासें थीं । गोपाल उनको पकड़ने की कोशिश करता पर पकड़ न सकता । उसका तमाम बदन छिल गया । उसके कपड़े फट गये । अन्त में उसने अपने हाथ-पाँव ढीले कर दिये और लुढ़कते-लुढ़कते वह एक गहरे खड्‌ड में जा गिरा ।
खड्‌ड में घुटने भर पानी था और वह भी बहुत ठंडा । शरीर गरम होने के कारण पहले तो गोपाल को कुछ न जान पड़ा पर बाद को उसे जाड़ा मालूम होने लगा । अब वह करे तो क्या करे? खड्‌ड में से कैसे निकले । बेचारे बालक पर इतनी मुसीबत कभी नहीं पड़ी थी । वह रोने लगा ।
अब शाम हो चुकी थी और आसमान में तारे निकल आये ये । तारों की छाया खड्‌ड के पानी में पड़ रही थी । गोपाल रो रहा था और सर्दी में सिकुड़ रहा था । भूख अलग जोर से .लगी हुई थी'।
अँधेरे में गोपाल इधर-उधर हाथ से टटोलने लगा कि कहीं .सूखी जमीन मिल जाय तो वह उस पर लेटे । एक कोने में उसे ऐसी थोड़ी सी जमीन मिली । गोपाल पानी से निकल कर उसी जमीन पर खड़ा हो गया । और पैर से टटोलने से उसे' एक गुफा सी जान पड़ी । वह फौरन उस गुफा के भीतर घुस गया और आगे बढ़ने लगा । वह गुफा असल में एक सुरंग का द्वार थी । जिसे गोपाल ने टटोल कर मालूम कर लिया । काले कम्बलों की तरह अंधेरा चारों तरफ फटा था । पर गोपाल को यह निश्चय हो चुका था कि इस सुरंग का कहीं न कहीं अन्त जरूर होगा । इससे वह बराबर आगे बढ़ता गया ।
सामने की तरफ कुछ फासले पर गोपाल को उजाला दिखाई पड़ा । कुछ और बढ़ने पर ऐसा जान पड़ा जैसे कोई चिराग जलाकर बैठा हो । आशा से गोपाल का दिल हरा हो गया । उसने अपने आप से कहा-वाह रे गोपाल, तूने फतेह कर लिया । सचमुच सुरंग का खातमा हो गया था और गोपाल एक .हरे-भरे सुन्दर देश में पहुंच गया था । रात में उसे यह नहीं .मालूम हो सका कि यह देश कैसा है । पर इतना पता तो उसे चल ही गया कि जिस देश में वह आ गया है वह एक अजीब देश है । क्योंकि जो रोशनी सुरंग से उसको दिखाई पड़ रही थी उसके पास उसने एक अजीब आदमी को बैठे हुए देखा ।
वह एक बौना था । उसका सारा शरीर लाल था । बड़ाई में वह गोपाल से भी कुछ छोटा था । पर उसकी मूछें बहुत. ही बड़ी-बड़ी थीं । और दोनों तरफ मोर के दुम की तरह फैली थीं । उसकी दाढ़ी भी अजीब थी । पैर तक बढ़ती चली गई थी।
और जब वह चलता था तब दाढ़ी भी जमीन पर घिसटती हुई चलती थी । यहाँ यह बताने की जरूरत नहीं कि उसकी यह दाढ़ी और मूछें भी लाल थीं ।
गोपाल के करीब आते ही वह बौना चौंककर खड़ा हो गया और अपनी दोनों तरफ की मूछों को ऐसे तान लिया जैसे नाचते समय मोर अपनी दुम को तान लेता है । यह उस बौने के सलाम करने का ढंग था । परी देश के रहने वालों से यह, इसी तरह सलाम किया करता था ।
जब गोपाल ने कोई जवाब न दिया तब, इस बौने को. मालूम हो गया कि यह लड़का परीदेश का रहने वाला नहीं है । उसने उसकी तरफ अपनी दाढ़ी से इस तरह इशारा करके,. जैसे हाथी अपनी सूंड से किसी तरफ इशारा करता है, पूछा- जनाब आप कौन हैं? इस देश में क्या आप पहले ही पहल आ' रहे हैं?
गोपाल की यह आदत थी कि जब उससे कोई सवाल एक: साथ किये जाते थे तब वह हमेशा आखिरी सवाल का जवाब ही देता था और बाकियों को छोड़ देता था ।.
उसने जवाब दिया-हाँ, आप जो पूछेंगे मैं सब बताऊँगा।' परन्तु पहले मुझे कुछ बातें पूछ लेने दीजिये
''अच्छी बात है प्यारे बच्चे अच्छी बात है ।'
गोपाल ने पूछा-पहले यह बताइये कि आपके सामने यह जो चीज झूल रही है यह आपकी दाढ़ी है या सूँड् है?
''यह मेरी दाढ़ी है । पर मनुष्यों की दाढ़ी की तरह यह 'बेकाम नहीं है । मैं इससे बहुत से काम ले सकता हूँ ।''
''कैसे? ''
बौने ने अपनी दाढ़ी को सामने की ओर फेंक कर कहा- आप चाहें तो इस पर बैठ सकते हैं ।
गोपाल को उसकी दाढ़ी किसी दीवाल से बाहर की ओर निकली हुई कड़ी की तरह दिखाई पड़ी । उसने कहा-आपको धन्यवाद है ।
बौना मुस्कराकर बोला-नहीं-नहीं जरा बैठ कर तो देखिए।
''आप मेरा बोझा सँभाल लेंगे ?''
ओफ मैं इस दाढ़ी पर पहाड़ उठा सकता हूँ ?''
''बेशक आप बड़े मजबूत होगे इस दाढ़ी से आप और क्या काम लेते हैं .''
''इस पर खाना रखकर खाता हूँ ।'' बौना यह कहने भी .न पाया था कि उसकी दाढ़ी पर खीर से भरा एक लाल कटोरा दिखाई देने लगा ।
बौना कहने लगा-परी देश में यह बड़ा बुरा है कि जिस -चीज की इच्छा करो वह तुरन्त हाजिर हो जाती है । मुझे इस समय बिल्कुल भूख नहीं है । पर क्या आप मेरे ऊपर कृपा करके यह खीर खा सकते हैं?
गोपाल दिन-भर का भूखा-प्यासा और- थका था । बौने के यह कहते ही खीर पर टूट पड़ा और इसके लिये उसे धन्यवाद: देना भी भूल गया । चार कौर खाने के बाद ही उसके शरीर में वही ताजगी और फुर्ती आ गई जो उस समय थी जब वह चमेली के साथ घर से निकला था । उसने कहा- पानी ।
बौने की दाढ़ी पर पानी से लबालब भरा एक लाल गिलास,- दिखाई देने लगा ।
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: बाल उपन्यास -परियों का देश

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 11:33

गोपाल ने खूब पेट भर कर खीर खाई और पानी पिया । परन्तु खीर के कटोरे से न तो एक चावल कम हुआ और न- गिलास से एक बूँद पानी, दोनों बर्तन ज्यों के- त्यों भरे थे ।' गोपाल को बड़ा आश्चर्य हुआ । बौना बोला-यहाँ कोई चीज- कभी कम नहीं होती ।
गोपाल बोला-आपकी दाढ़ी तो बड़े मजे की जान पड़ती- है । इसमें और कोई खास बात हो तो बतलाइए?
बौना तुरन्त दाढ़ी पर हाथ फेरने लगा । उसकी दाढ़ी पेट- से मिलती हुई पर तक पहुंच गयी । बौना दाढ़ी के ऊपर पेट के बल लेट गया । और अपनी मोर की दुम की तरह फैली- पूंछों को इस तरह फड़फड़ाने लगा जैसे चिड़िया अपने पंख फड़फड़ाती हैं । वह उड़ चला, देखते ही देखते अँधेरे में गायब हो गया ।
गोपाल ने चिल्लाकर कहा-बस, बस लौट आइये । समझ गया । अभी मुझे आपसे और भी बहुत सी बातें पूछनी हैं ।
बौना लौट आया ।.
गोपाल ने पूछा-आप यहाँ बैठे-बैठे क्या. कर रहे हैं?.
बौना बोला--यह परी देश की सीमा है । इसके उस तरफ मनुष्यों का देश है । मनुष्यों के देश में मार-पीट लड़ाई-झगड़े बहुत होते हैं । यह सब बातें यहाँ नहीं होतीं । इसलिए कुछ परियां मनुष्यों का देश देखने जाती हैं । उन्हीं के जाने के लिये यह रास्ता बनाया गया है । वे शाम को जाती हैं और सबेरे सूरज निकलने से पहले लौट आती हैं । जब तक सब परियाँ वापस नहीं आ जातीं तब तक मैं यहाँ रहता हूँ । उसके बाद दरवाजा बन्द करके परी शहर को चला जाता हूँ । यह रास्ता परियों के सिवाय और किसी को मालूम नहीं । आप इधर से कैसे आ गये?
गोपाल ने अपनी सारी कथा कह सुनाई जिसे सुनकर बौने का हृदय भर आया । परी देश के लोग बड़े दयावान होते हैं और किसी की जरा भी मुसीबत की बात सुनते हैं तो उनकी आँखों में आंसू आ जाते हैं ।
बौना गोपाल की पीठ पर हाथ फेरने लगा । गोपाल ने बौने की दाढ़ी पकड़ कर कहा-यदि ऐसी ही दाढ़ी मेरे भी होती तो बड़ा अच्छा होता?
अरे यह क्या? गोपाल ने देखा उसके एक लम्बी दाढ़ी निकल आई है । उसने यह देखने के लिए कि शायद मूँछें भी निकल आई हों, ऊपर के ओंठ पर हाथ फेरा । सचमुच बड़ी- बड़ी मूँछें भी निकल आई थीं ।
अब सबेरा हो रहा था । पूर्व दिशा खूब लाल हो रही थी आसमान में चारों तरफ लाली दौड़ गई थी । सबेरे की उस धीमी रोशनी में गोपाल ने देखा कि उसका शरीर भी लाल हो गया है । उसके हाथ-पाँव की अँगुलियाँ नाखून सब लाल हो
गए थे । उसनें कुछ उदास होकर कहा-''परी देन में सचमुच यह बहुत बुरा है कि यहां वो इच्छा करो वही हो जाता है अब तो यहां बहुत सोच समझ कर इच्छा करनी होगी ।''
बौना बोला --इसमें क्या शक है?
इसी बीच. में उन्हें सुरंग में से गाने की आवाज सुनाई ।
आपस में लड़ जीव जगत के उठा रहे हैं क्लेश
प्रेम दया का परियो उनको पहुँचाओ सन्देश।
बौने ने कहा – प्यारे गोपाल। एक तरफ हो जाओ। परियाँ आ रही हैं।
भाई की तलाश
अब चमेली का भी थोड़ा सा हाल सुन लो । जब तक गोपाल दिखाई पड़ा तब तक वह चिल्लाती. रही-दौड़ी लोगों दौड़ो! मेरे भैया को बचाओ । और उसकी तरफ दौड़ती रही । जब गोपाल आखों से ओझल हो गया तब वह एक जगह पर खड़ी होकर .रोने लगी ।
इस तरह रोते हुये और दौड़ते हुये चमेली बहुत दूर निकल आई थी और ऐसी जगह पहुँच गई थी जहाँ से उसे अपने घर का रास्ता भी नहीं मालूम था । उसके जी में आया कि घर में जाकर माँ-बाप से गोपाल के उड़ जाने की बात बतावे । पर अब पर पहुँचे कैसे ? रास्ता तो उसे मालूम नहीं । बेचारी बड़े चक्कर में पड़ गई । करे तो क्या करे? उसकी समझ में कुछ न आया । वह और भी जोर-जोर से रोने लगी । छोटे बच्चों का और लड़कियों का यह स्वभाव होता है कि जब उनके मन के अनुसार कोई बात नहीं होती तब वे रोने लगते हैं । तब भला चमेली क्यों न रोती? आखिर वह बेचारी भी एक छोटी लड़की ही तो थी ।
जहाँ चमेली खड़ी रो रही थी वहाँ पास ही एक किसान का खेत था । कुछ दिन निकलने पर किसान अपना खेत देखने आया । चमेली को देखकर उसे कुछ आश्चर्य हुआ । इस सुनसान जगह में यह लड़की कहाँ से आई? किसान सोचने लगा- बड़ी भोली लड़की है । शायद रास्ता भूल गई है । अरे! यह तो रो रही है ।
तुम्हें यह बात मालूम होगी कि किसान लोग किसी को दुःख में नहीं देख सकते । वे हमेशा सब के सुख-दुःख में शरीक होने को दौड़ते हैं और खुद तकलीफ सहकर दूसरों की मदद करते हैं ।
किसान फौरन चमेली के पास पहुँचा और बोला-बेटी रोती क्यों हो ' मत रोओ अपना हाल बताओ । मैं तुम्हारी मदद करूंगा । क्या रास्ता भूल गई हो?
चमेली ने सिसकते हुये कहा-''मेरा भैया उड़ गया है ''कैसे बेटी! आदमी को तो मैंने उड़ते नहीं देखा ।''
चमेली ने गोपाल के उड़ने का सारा किस्सा कह सुनाया । किसान बोला-अच्छा अब समझा! हाँ! तो बेटी वह किस तरफ उड़कर गया है?
चमेली ने कहा-सामने! उत्तर को तरफ-वह जो ऊँचा- ऊँचा पहाड़ दिखाई पड़ता है उसों तरफ ।
''कितनी देर हुई होगी बेटा ?''
''अभी-अभी को बात है बाबा ।''
''अच्छा तो फिर चलूं! तुम्हारे भैया की तलाश करूं:! तुम्हारे मां-बाप किस गांव में रहते हैं ? वे तुम्हारे लिए परेशान तो न होंगे ?''
चमेली ने कहा-अब तो मुसीबत आ ही गई है । बिना भैया को पाये मैं अकेली घर नहीं लौटना चाहती । माँ-बाप जरूर परेशान होंगे । पर अब तो इसका कोई उपाय नहीं है?
क्या आप कृपा करके उस तरफ चल सकते हैं जिधर मेरा भैया गया है?
किसान चमेली के कन्धे पर हाथ रखकर बोला-क्यों नहीं? यह भी कोई कहने की बात है बेटी! मैं अभी चलता हूँ । पर जरा तुम मेरे घर तक चलो । कुछ खाने-पीने का सामान ले लूँ । कौन जाने? लौटने में दो चार दिन लग जायँ?
किसान चमेली को लेकर अपने घर पहुँचा । उसकी स्त्री दूध गरम कर रही थी । किसान बोला-कुछ खाने-पीने का सामान है? मुझे इस लड़की के साथ जरा दूर तक जाना है ।.
इसका भाई खो गया है ।
किसान की स्त्री ने कहा-हाय! इसका भाई खो गया है?
अरे, रोते-रोते बेचारी की आँख लाल हो गई हैं । बैठ जाओ बिटिया कुछ खाओगी?
चमेली बैठ गई ।
किसान की स्त्री ने अपने हाथ से उसका मुँह धोया । अपने आँचल से पोंछा और उसके सामने एक कटोरे में थोड़ा सा द्रव और रोटी रखकर कहा-बिटिया घबड़ाना मत तुम्हारा भैया जरूर मिल जायगा । फिर उसने किसान से कहा-जरा दूर
तक ढूंढना जी! जब तक इसका भैया मिल न जाय, वापस न आना । खबरदार! सुनते हो?
किसान बोला-हाँ हाँ! कुछ बाकी न लगा रक्खूंगा। कहो तो अपना ऊँट भी तैयार कर लूं ..............
हाँ हाँ! नहों तो यह बेचारी लड़की थक न जायेगी । आह! बेचारी बड़ी भोली है । बेटी तुम्हारा क्या नाम है ?'
'चमेली! '
'आह! बड़ा प्यारा नाम है । मेरे भी एक लड़की थी । उसका भी नाम चमेली था । पर हाय! उसे भगवान ने उठा लिया ।'' किसान की स्त्री रोने लगी ।
किसान बोला-देखो! यात्रा के समय रोते नहीं ।
किसान की स्त्री ने कहा-नहीं-नहीं रोती कहाँ हूँ । फिर उसने चमेली से कहा-बेटी तुम्हारा भैया मिल जाय तो-और मुझे विश्वास है कि- जरूर मिल जायगा-तो इसी तरफ से आना! देखूंगी वह कैसा है ।
चमेली ने सिर्फ इतना कहा- 'अच्छा! ' उसके बाद उससे बोला नहीं गया । बेचारी बड़ी उदास थी ।
अब किसान बिल्कुल तैयार हो चुका था । ऊँट पर उसने एक गठरी में कुछ सत्तू, कुछ गुड और थोड़ा सा खोआ रख दिया था और एक घड़ा पानी काठी से बांधकर लटका दिया था । थोड़ा सा आटा और ई धन भी बांधकर उसने रख लिया .था । उसके हाथ में एक बड़ा सा बाँस का डंडा था । कमर में गाढ़े की एक मोटी चादर बँधी थी । चादर के अन्दर लोटा और डोरी लिपटी थी ।
ऊँट दरवाजे पर बैठा था । उसको पीठ पर बकायदे काठीं रखी थी । किसान ने चमेली को गोद में लेकर ऊँट पर बैठाल दिया और उसकी नकेल को पकड़ा दिया. उसके पीछे आप बैठ गया। ऊँट उठकर खड़ा हो गया।
किसान की स्त्री ने उसका बांस का डंडा उसे पकड़ा दिया। और कहा देखो जल्दी लौटना।
ऊँट चल पड़ा। चमेली को ऐसा जान पड़ा मानों वह ढेकी पर चढ़ी हो। ऊँट पर इसके पहले वह कभी नहीं चढ़ी थी। उसने पूछा – बाबा! ऊँट तो रेगिस्तान का जानवर है। क्यों?
किसान बोला – क्या मालूम बेटी। हमने कुछ पढ़ा नहीं है । पर हाँ सूखे मौसम से यह बहुत खुश रहता है। बरसात में बीमार हो जाता है।
बाबा! तुमने सवारी के लिये ऊँट क्यों पाला है । घोड़ा क्यों नहीं पाला ।''
किसान बोला-बेटी मैं गरीब .आदमी हूँ । फिर मुझे काम भी ज्यादा करना पड़ता है । घोड़ा पालूं तो सारा समय उसी की खिदमत में चला जाय । उसके लिए चारा भूसा इकट्‌ठा करने में बड़ी मेहनत पड़ती है । पर ऊँट झाड़ी और पेड़ की पत्तियाँ खाकर गुजर कर लेता है । इसके चारे के लिए मुझे बहुत फिक्र नहीं करनी पड़ती ।
चमेली बोल, ओ-हाँ, यह बात तो है । जहाँ हम पेड़ के पास पहुँचते हैं वहीं यह पत्तियाँ नोचने के लिए अपनी गर्दन उठाता है । मजे में खाता-पीता चला चलता है ।
किसान ने कहा-हाँ, जहाँ पेड़ आया करे वहाँ जरा झुक जाया करो । मुझे डर है तुम्हारे कहीं चोट न आ जाय । बेटी यह ऊँट मेरी बड़ी मदद करता है । इस पर गल्ला लाद कर मैं बाजार में बेचने ले जाता हूँ । सब तरह के किसानी के काम का बोझा इस पर लाद सकता हूँ ।
''जरूर लादते होंगे बाबा ।''
इस रह ऊँट पर बैठे आपस में बातें करते किसान और चमेली दोनों चले जा रहे थे । बीच-बीच में चमेली आँखें फाड़- फाड़ कर चारों तरफ देखती जाती थी । खेत मिले, मैदान मिले जंगल मिले, गांव मिले पर गोपाल के मिलने की कोई सूरत नजर न आई ।
चमेली ने पूछा-बाबा! क्या मेरा भैया नहीं मिलेगा? किसान बोला-बेटी अभी हम आए ही कितनी दूर हैं ।
चमेली चुप हो रही । किसान ने कहा-अब दोपहर हो गई है । सामने बड़ा ऊँचा-सा जो पीपल का पेड़ दिखाई पड़ता है उसके नोचे सुस्ताकर और कुछ खा-पीकर फिर आगे चलेंगे । चमेली ने कोई जवाब नहीं दिया ।
किसान ने अपनी कमर से वह मोटी चद्‌दर खोली जिसे वह घर से बांध कर चला था । लोटा और डोर दोनों चीजें जमीन पर गिर पड़ी । किसान ने कहा-ओह इनका खयाल ही नहीं रहा ।
चद्दर को उसने पेड़ के नीचे बिछा दिया और चमेली से कहा-बेटी बैठो ।
चमेली बैठ गई । थोड़े फासले पर खूब हरी भरी झाड़ी थी । ऊंट पत्तियां खाने के इरादे से झाड़ी की ओर बढ़ने-लगा । ऊँट का नाम भोला या । किसान ने डांटकर कहा-ठहर भोला । वह ठहर गया।
किसान उसके पास जाकर बोला-भोला! बैठ तो! ऊँट बैठ गया।
चमेली ने कहा – बाबा, यह तुम्हारी सब बातें समझता है।
किसान ने ऊँट पर से सतुए की गठरी उतारते हुए कहा – हाँ, सिर्फ जवाब नहीं दे सकता। इसको भी तो भगवान ने वही जी दिया है जो हमको दिया है । मगर फिर भी बहुत से ऐसे आदमी हैं जो जानवरों के प्राण को कुछ समझते ही नहीं ।
चमेली ने उत्तर दिया-हाँ बाबा यह बात तो है । मैंने एक शिकारी को देखा था । वह पेड़ पर बैठी बेकसूर चिड़ियों को और जंगल में चरते हुए हिरन के बच्चों को जहाँ देखता था वहीं मार गिराता था ।
किसान बोला-सच है बेटी और इनमें से बहुत से शौक के लिए शिकार करते हैं । इसे वे खेल कहते हैं । जरा सोचो तो कि एक की जान जाती है और दूसरे को मजा आता है ।
चमेली ने कहा-मैं सब जानवरों को प्यार करती हूँ।
बहुत अच्छा करती हो बेटी'' कहते हुए किसान ने ऊँट को ले जाकर उसी झाड़ी से बांध दिया । और खड़ा होकर इधर-उधर देखने लगा । पास ही एक छोटी सी नदी बह रही थी। वह बहुत चौड़ी नहीं थी पर उसका पानी बहुत साफ था।
किसान ने लौटकर कहा – बेटी तुम जरा यहीँ बैठी रहो, मैं दौड़कर नहा आऊँ। झाड़ी के पास एक छोटी सी नदी है.
“अच्छी बात है।“
किसान नहाने चला गया । चमेली उदास मन से इधर उधर देखने लगी। चारों तरफ हरे-भरे खेत थे। पर दोपहर की वजह से सन्नाटा था । खेतों पर काम करने वाले लोग अपने घरों को चले गये थे । कोई आदमी दिखाई पड़ता तो शायद चमेली उससे पूछती कि क्या उसनें गोपाल को गुब्बारे' के साथ उड़ते हुए देखा है ।
इसी समय उसका ध्यान पीपल के पेड़ की ओर गया । एक चूहा पेड़ से नीचे जमीन की और तेजी से दौड़ा आ रहा था । चूहे के पीछे एक बड़ा सा काला सांप फन काढ़े चला आ रहा था । वह चूहे को खाना चाहता था । साँप को देखकर चमेली डर गई और चिल्ला पड़ी । किसान नहाकर लौट रहा था । चमेली का चिल्लाना सुनकर वह दौड़ पड़ा ।
इसी बीच में पेड़ की एक डाल पर बैठा हुआ एक मोर सांप पर झपटा और अपने पंजे से उसने साँप के फन पर एक ऐसा थप्पड़ मारा कि साँप उलट गया । फिर उसने चोंच से पकड़कर साँप को तीन-चार बार पटका । साँप मर गया । मोर उसे खाने लगा ।
किसान चमेली के पास आकर खड़ा हो गया । चूहे का दम फूल रहा था. वह दौड़कर किसान के पैरों के पास दुबक रहा ।
थोड़ी देर में किसान ने कहा--जान पड़ता है यह चूहा और मोर दोनों आदमियों से खूब परचे हैं । शायद इस पीपल के पेड़ के नीचे लोग खलियान लगाते हैं जिससे चूहा अनाज की लालच में आता है और मोर को भी किसानों के लड़के कुछ खाना-बाना दे देते हैं । किसान ने कियू! कियू! करके मार को अपने पास बुलाया । मोर उसके पास चला आया । किसान मोर की पीठ पर हाथ फेरने लगा । मानों सांप
मारने के लिए उसे शाबासी देने लगा। मोर ने अपने पंख फुला लिया। चमेली ने मोर की पीठ पर हाथ फेरा और कहा – बाबा, यह बड़ा प्यारा मोर है। इसे साथ लेते चलो और इस चूहे को भी लेते चलो।
''अच्छी बात है ।'' कहकर किसान ने सत्तू और गुड़ निकालकर साना । चमेली को उसने थोड़ा सा सत्तू और खोआ दियाा । खुद ने सिर्फ सत्तू खाया । मोर और चूहे को भी सत्तू दिया।
खा पी चुकने पर किसान ने ऊँट को कसा और सब लोग फिर चल पड़े । चूहे को चमेली ने ले लिया और मोर ऊँट की गरदन पर बैठ गया । रास्ते में किसान ने मोर और साँप की लड़ाई की बहुत सी कहानियाँ कहीं । चमेली ने कहा - यदि ये जानवर बोल सकते तो हमें अपना बहुत सा हाल बतलाते ।
किसान ने जवाब दिया-सामने के पहाड़ के उस पार जो देश है, कहते हैं वहाँ जानवर भी आदमियों की तरह बातें करते हैं । उसे परी देश कहते हैं ।
चमेली बोली- शायद गोपाल वहीं गया हो । बाबा क्या वहाँ तक चलोगे?
किसान ने कहा – नहीं, वहाँ कोई आदमी नहीं जा सकता। फिर सामने की ओर देखकर वह बोला – अरे हम लोग एक घास के मैदान में आ गए। देखो न कहीं कोई पेड़ दिखाई पड़ता है न कहीं कोई गांव। मालूम नहीं यह मैदान कहाँ तक गया हो।
अब बिलकुल शाम हो गई थी और आसमान में चन्द्रमा -की थाली पूरब से उठ रही थी! किसान ने ऊँट ही पर सत्तू सान कर सबको दिया और कहा-चाँदनी रात है, रास्ता भी साफ है । ऐसे मैदान में रात का सफर अच्छा होता है ।
रास्ते में किसान ने रेगिस्तान के यात्रियों की बहुत सी दिलचस्प कहानियाँ कहीं जिससे चमेली को नींद और थकावट कुछ भी नहीं मालूम हुई । इस तरह सूरज निकलने के बाद भी दस बजे दिन तक ये लोग चलते रहे ।
अब किसान चारों तरफ नजर दौड़ाने लगा कि कहीं कोई पेड़ दिखाई पड़े तो उसके नीचे पड़ाव डाला जाय । पर कहीं कोई पेड़ दिखाई न पड़ा । उससे उसकी चिन्ता बढ़ गई । उसने कहा-यदि आज हम किसी रेगिस्तान' में होते तो गरम बालू में भुन कर मर जाते ।
चमेली ने कहा-यह भी तो रेगिस्तान ही है ।
किसान बोला-नहीं, यहाँ कहीं बालू नहीं है । यह सिर्फ पथरीली जमीन है । परन्तु गर्मी यहाँ भी बहुत बढ़ जायगी ।
ऊँट को काठी में बँधे पानी के घड़े में हाथ डाल कर किसान ने कहा-खैर आज कल पानी का काम चल जायगा । इसी बीच मैं चमेली ने पूछा-बाबा, सामने देखो क्या दिखाई पड़ रहा है ।
किसान ने गौर से देखा । एक टूटा-फूटा खंडहर था । किसान बोला-पहले यही -बहुत दूर तक चला गया था । किसान बोला – पहले जरूर कोई शहर रहा होगा । अब उजड़ गया है । मुमकिन है किसी समय यहाँ पानी न बरसने से बड़ा भारी अकाल पड़ा हो और यह शहर और सारा देश उजड़ गया हो ।
अब सब लोग खँडहर के पास पहुंच गये थे । किसान ने कहा - जरूर यही बात है । ऊसर इसी तरह बनते हैं ।
खँडहर में एक दीवाल कुछ बची थी । इसी से मिला हुआ एक गड्‌ढा सा या । मुमकिन है यह गड्‌ढ़ा पहले तालाब रहा हो । ऊँट को बाहर बांध कर किसान उसी गड्ढे में सब को ले गया । और ऊपर से कपड़े की छाया बना कर सत्तू सानने लगा । सबने खाया । रात भर का थका किसान सो गया । चमेली को भी नींद आ नई । चूहा इधर-उधर दौड़ने लगा । वह बिल खोदने के फिराक में था । चूहों की यह आदत होती है कि जहां पहुँचते हैं. वहीं बिल खोदने लगते हैं । मौके बे मौके का ख्याल नहीं करते । मोर भी एक ऊँचे पत्थर पर दबक कर बैठ गया और सोने लगा ।
रात भरके सब- इतने जगे और थके हुए थे कि सब खूब सोये । किसी को पता ही न चला कि दिन कब खतम हो गया ।
जब किसान की नींद खुली तब चन्द्रमा .आसमान में बहुत ' ऊँचा चढ़ चुका था । उसने सबको जगाया और चलने की तैयारी करने लगा । घड़े में सिर्फ एक लोटा पानी बचा था। उसने उससे थोड़ा मुंह धोया। थोड़ा सा मोर और चूहे को
पिलाया बाकी चमेली के लिये रख दिया । आज उसने सत्तू नहीं खाया । क्योंकि सत्तू खा लेने पर उसे प्यास लगती और तब पानी कहाँ पाता ?
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: बाल उपन्यास -परियों का देश

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 11:33

उसी तरह चांदनी रात में ऊँट पर सब लोग सवार होकर चले जा रहे थे और किसान पुराने खंडहर की कहानी कह रहा था। एकाएक चमेली ने जमीन की ओर देखकर कहा – बाबा ऊँट कहाँ चल रहा है? जमीन तो बहुत नीचे जान पड़ती है ।' किसान चौंक सा पड़ा । सचमुच ऊंट आसमान में उड़ा जा रहा था जमीन पर उसके पैर नहीं पड़ते थे । किसान ने घबड़ा कर कहा-ऐसी अनहोनी वात मैंने कभी नहीं देखी । यहां अक्ल काम नहीं करती ।
चमेली बोली-हम लग परी देश में तो नहीं आ गये?
परीदेश
सुरंग से जब परियाँ निकलीं और उन्हें एक लाल बौने की जगह पर दो लाल बौने खड़े दिखाई पड़े तब वे वहाँ जरा रुक गयीं और पूछने लगीं-लाल बौना, क्या रानी ने तुम्हारी बात मान ली?
लाल बौना ने कायदे सें-मोर की दुम की तरह मूँछे तान कर-परियों को सलाम करके कहा-''नहीं, परी रानी ने यह कहा था कि मनुष्यों के देश से कभी कोई लड़का इस तरफ आ निकलेगा और मुझे सबसे पहले देखेगा तो लाल बौना बनने
की इच्छा जरूर करेगा । आज वही हुआ ।
गोपाल ने पूछा-क्या लाल बौना होना बुरा है? अगर ऐसा हो तो मैं लाल बौना बनना नहीं चाहता ।
एक परी ने कहा-पर अब तो अपनी इच्छा से तुम आदमी .नहीं बन सकते ।
''क्यों यहाँ तो यह कायदा है कि जो इच्छा करो वही हो जाता है।
दूसरी परी ने कहा--हां पर यह भी एक बात है कि पहले तुम किसी वात की इच्छा करो और फिर थोड़ी देर बात उसी इच्छा के खिलाफ इच्छा करो तो तुम्हारी दूसरी इच्छा नहीं पूरी होगी ।
गोपाल बोला-मेरी समझ में नहीं आया कि आप क्या कह रही हैं?
तीसरी परी बोली-सुनो, मैं बताती हैं । मान लो तुमने इच्छा की कि तुम तितली वन जाओ । तब क्या होगा बता सकते हो?
''मैं फौरन तितली बन जाऊँगा ।''
''बेशक, पर उसके बाद ही यदि तुम यह इच्छा करो कि तुम मोर वन जाओ तब तुम्हारी यह इच्छा नहीं पूरी होगी ?''
गोपाल कुछ उदास होकर पूछा-किसी तरह भी नहीं?
चौथी परी ने कहा-सिर्फ एक उपाय है । वह यह कि परियों की रानी तुम्हारे लिये वैसा इच्छा करे!
गोपाल ने कहा-मैं परियों को रानी से इसके लिए कह सकता हूँ?
पाँचवीं परी ने कहा-क्यों नहीं । पर जल्दी क्या है? जब लाल बौना बन गये हो तब कुछ दिन तक लाल बौना के साथ रहो । घूमो फिरो, परी देश देखो । उसके बाद जो चाहना बन जाना रानी बड़ी अच्छी और दयावान है । वह फौरन जो चाहोगे बना देगी ।
छठी परी ने कहा-पर एक हैं रंग के दो जानवरों से लोगों को अलग-अलग पुकारने में धोखा हो सकता है । इसलिए - तुम चाहो तो इच्छा करके अपना रंग बदल सकते हो । पहले तुमने लाल दाढ़ी की इच्छा की थी या केवल दाढ़ी की ।
''मेरा ख्याल है मैंने सिर्फ दाढ़ी की इच्छा की थी ।''
''बस तुम अपना रंग बदल सकते हो?
गोपाल ने कहा-पर क्या मैं एक बात पूछ सकता हूँ ।
अभी आपने मुझको जानवर क्यों कहा?
सतवीं परी हँसने लगी । उसने कहा - बेटा तुम अभी मनुष्यों के देश से आये हो । उस देश में आदमी अपने को जानवरों से ऊँचा जीव समझता है । इस देश में वह बात नहीं है । यहाँ सब जीव समान समझे जाते हैं । इसलिए सब को जानवर कहते हैं । जिसके जान हो वही जानवर ।
गोपाल ने कहा । यहाँ तुम्हारा राज्य है । चाहे जो कह लो । पर हमारे देश में यदि किसी आदमी को जानवर कहोगी तो वह तुम्हें जरूर मार बैठेगा ।
परियाँ हँसने लगीं । आठवीं परी ने कहा-पर यहाँ कोई, किसी को नहीं मारता । कभी नहीं मरता । कोई किसी से लड़ता-झगड़ता नहीं । कोई किसी को गाली भी नहीं देता । सब एक दूसरे को प्यार करते हैं।
गोपाल बोला – यह तो बड़ा अच्छा है।
नवीं परी ने बातचीत के विषय को बदलते हुए कहा – तो तुम अपना रंग बदलना चाहते हो?
हाँ मैं चाहता हूँ कि मेरा रंग हरा हो जाए
गोपाल यह कहने भी न पाया था कि उसका रंग हरा हो गया। एकदम हरा। हरी मूंछें, हरी दाढ़ी, हरे कपड़े हरे हाथ पैर और हरी अंगुलियाँ हरे नाखून।
मारे खुशी के परियाँ नाचने लगीं और गाने लगीं -

मनुज देश का रहने वाला
परी देश में आया है ।
अपनी सारी इच्छाओं को
अपने संग' में लाया है ।।

छिन में बना लाल बौना यह
छिन में बना हरा बौना ।
अभी न जाने क्या-क्या सोचेगा
यह मानव का छौना ।।

परी देश में भारी गड़बड़
होने वाली है परियों ।
भागो - भागों निकल रही
सूरज की लाली है परियों । ।

लाल हरे बौनों का जोड़ा
हम बहुत हो भाया है ।
मनुज देश का रहने वाला
परी देश में आया है ।।

गोपाल ने देखा पूर्व दिशा की सुनहली पहाड़ी पर सूरज का गोला आधा निकल आया। सारा परी देश मोर के रंग-बिरंगे पंखों की तरह लपलपा उठा। परियाँ थिरकती हुई चली जा रही हैं। उनके पाँव रंग बिरंगी घासों पर बिखरी रंगीन ओस के मोतियों पर पड़ते हैं पर ओस की बूंदें टूटती नहीं। उनकी पोशाक भी रंग बिरंगी हैं। गोपाल को वह सबेरा अजीब दिखाई पड़ा। यहाँ लिख कर उसका समझाना कठिन है।
थोड़ी देर में हवा चलने लगी । अजीब सतरंगी हरियाली थी । घास हिल रहा था । पेड़ों कों पत्तियाँ हिल रही थीं और उन पर तरह-तरह के रंग इस तरह बन और बिगड़ रहे थे कि जान पड़ता था चारों तरफ से तरह-तरह के रंग की पिचकारी
छूट रही हो ।
उस रंगीन दुनिया में अलग रंग सिर्फ दो ही थे । लाल बौना-बिलकुल लाल और हरा बौना-बिलकुल हरा । उन पर कोई रंग न बढ़ता था ।
गोपाल ने लाल बौना से कहा-यह तो अजीब रंगीन देश है । ये रंगीन पेड़-पौधे क्या मनुष्यों के देश में नहों हो सकते?
लाल बौने ने कहा-'पेड़-पौधे रङ्गीन नहीं हैं । बिलकुल वैसे ही हैं जैसे तुम्हारे यहाँ होते हैं ।
''फिर ये रंगीन क्यों जान पड़ते हैं ।
लाल बौना बोला – सूरज की रोशनी के कारण। सूरज की रोशनी में कितने रंग होते हैं?
कुछ सोचकर गोपाल बोला – सात रंग।
लाल बौना बोला – हाँ, परी देश में सबेरे शाम ये रंग बिखर जाते हैं और अलग-अलग दिखाई देते हैं. जरा सामने के मैदान को देखो । जान पड़ता है लाल, हरी, पीली, नीली चमकदार चादरें बिछी हों । तुम्हारे देश में ये सातों रंग हमेशा एक में मिले रहते हैं । इसी से सफेद धूप दिखाई पड़ती है ।अरे । देर हो रही है । चलो घर चलें । शाम को फिर यहाँ आयेंगे ।
गोपाल परी देश के बारे में तरह-तरह की बातें सोचता हुआ लाल बौना के साथ अपनी दाढ़ी पर उड़ने लगा । नीचे की दुनिया उसे अजीब दिखाई दे रही थी । एक बड़ी झाडी के पास पहुँचने पर लाल बौना ने कहा-ठहरो, मेरा मकान आया ।
गोपाल बोला-यह झाड़ी है या मकान?
लाल बौना ने लाल हँसी हँस कर कहा-पहले अन्दर तो आओ ।
मनुष्यों के देश में लोग ईंट, पत्थर, चूना, गारा, मिट्टी, लकड़ी आदि से घर बनाते हैं । परन्तु परी देश में यह बात नहीं हे । वहाँ घर उगाए जाते हैं । बड़े-बड़े पेड़ों, छोटे-छोटे पौधों और लताओं को इस तरह उगाते हैं कि वे बाहर से तो झाड़ी जान पड़ते हैं पर अन्दर उनमें बड़े खूबसूरत कमरे कटे होते हैं ।. जाड़े के मौसम में उनमें खूब गरमाहट रहती है और गर्मी के मौसम में खूबठंडक ।
कुछ दिनों बाद लाल बौना ने गोपाल को एक झाड़ी दिखा कर कहा-वह घर तुम्हारे लिए उगाया है ।
गोपाल उस झाड़ी के अंदर घुस गया । वाह! शायद जिस जगह को इंद्रपुरी कहते हैं वह यही है । महमह फूलों की महक आ रही थी । पृथ्वी पर मुलायम घास का फर्श बिछा था । नन्हीं- नन्हीं पत्तियो वाली लताओं से अन्दर की दीवालें इस तरह ढक गई थीं कि जान पड़ता था घर अन्दर से हरे रंग से पुता हो। छत भी इसी तरह हरी पत्तियों से सँवारी गई थी । गोपाल ने मन ही मन में सोचा कि फलों की महक तो इतनी आ रहा है पर फूल एक भी नहीं दिखाई पड़ता । उसने दीवालों को और छत को गौर से देखना शुरू किया । वाह! उसकी तबियत फिर खुश हो गई । चारों तरफ नन्हें-नन्हें हरे- हरे फूल खिले थे ।
गोपाल को अपना घर लाल बौने के घर से बहुत अच्छा जान पड़ा । लाल बौने के घर में हर एक चीज लाल थीं । पेड़ लाल पौधे लाल और फूल लाल । फर्श की घास में भी लाल फल इस कदर फूले हुए थे कि फर्श लाल हो रहा था । अन्दर से वह कमरा गेंदे और गुलाब के लाल फूलों से लिपा हुआ जान पड़ता था । गोपाल ने मन ही मन कहा-यह अच्छा हुआ कि मैंने हरा बौना होना पसन्द कर लिया । हरा रंग आँखों को फायदा पहुँचाता है । हरियाली देखने से तबीयत हरी-भरी ताजी है । लाल बौने के घर में रहना पड़े तो आखें फूट जायँ । इस बेवकूफ ने लाल रंग न जाने क्यों पसन्द किया ।
गोपाल हरी घास के फर्श पर लेट गया । ऊपर हरियाली. थी । नीचे हरियाली थी । चारों तरफ हरियाली थी । मकान की पत्तियों से छन-छन कर सूरज की जो धूप आ रही थी यह भी हरी जान पड़ती थी । गोपाल खुद हरा था । उसने फिर मन ही मन क्हा-आह अगर मेरे मदरसे के साथी मेरे कमरे की यह बहार देख पाते? चाहे जैसे हो मैं घर वापस जाने पर ऐसा एक कमरा जरूर बनाऊंगा । इसी परी देश में' इस तरह घर उगाने की विद्या मैं जरूर सीखूंगा ।
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गोपाल इस सोच विचार में इस तरह डूबा हुआ था कि उसे पता ही न चला कि लाल बौना कब चुपके से आकर उसके पास बैठ गया है । जब गोपाल का ध्यान टूटा तब लाल बौना ने कहा-तुमने खाना खाया ।
अभी नहीं''
लाल बौना खुशी से हिल गया । बोला.-'-. बहुत अच्छा हुआ कोई मीठा खाना जल्दी मँगाओ । आज मुझसे बड़ी गलती यह हो गई कि खाना मँगाते समय मुझे नमक का -ध्यान हो आया था । सो खाने में तमाम नमक ही नमक आ गया । बड़े- बड़े नमक के डले । बिलकुल नहीं खाया जाता । इसलिए भागा- भागा तुम्हारे पास आया हूँ । खीर, रबड़, रसगुल्ला कोई चीज जल्दी मांगो । मुझसे ऐसी गलती अक्सर हो जाती है ।
गोपाल ने अपनी दाढ़ी सामने की तरफ तान कर कहा-मैं खीर, रबड़ी और रसगुल्ला खाऊंगा ।
तीन कटोरों में लबालब भरी तीनों चीजें हरे बौने यानी गोपाल की दाढ़ी पर दिखाई देने लगीं । ला बौना बहुत भूखा था । फौरन उसने एक रसगुल्ला उठा कर अपने मुंह में डाल लिया ।।।
सी! सी! सी! ई ई ई आह! ''
गोपाल ने पूछा- क्यों यह क्या कर रहे हो ।
''सी सी सी! ई ई ई ऊ ऊ ऊ! '' लाल बौना दोनों हाथों से अपना मुँह पीटने लगा ।
गोपाल बोला-कुछ कहोगे भी! क्या बात है!
लाल बौने ने मुँह का कौर थूकते हुए कहा-सी! ई! सी! मिर्च! तमाम भोजन में मिर्च भरी हुई है । सी.. ई? तुमने मिर्च का खयाल तो नहीं किया था? सी! सी! ई! हाय! मुँह जला जा रहा है ।
गोपाल ने कहा-''हाँ मिर्च का ख्यात जरूर आ गया था । ''बस यही बात है! सी! ई! ई! सी!
''अब क्या किया जाय? ''
''अब दिन भर भूखे मरो और क्या? मैंने नमक का ख्याल किया तुमने मिर्च का । आज दोनों भूखे रहे ।''
उस दिन सचमुच दोनों को भूखा रहना पड़ा । लाल बौने की तो भूख के मारे आँखें निकलने लगीं । गोपाल ने कहा- किसी परी ने अभी खाना न खाया हो तो जाकर उसके साथ खा आओ । मैं तो शाम को खाऊँगा ।
लाल बौने ने कहा-''चुप! चप किसी से इसका जिक्र भी न करना । नहीं तो परी देश में हम लोगों की बड़ी हँसी होगी ।
गोपाल ने पूछा-यह परी देश कितना बड़ा है । कहाँ तक गया है?
लाल बौने ने कहा – भूख के मारे घर में बैठे-बैठे जी न लगेगा. चलो आज तुमको परी देश के ऊपर से उड़ा लावें.
बस दोनों अपनी-अपनी दाढ़ी पर पेट के बल लेट गए और मूंछें फड़फड़ाकर उड़ने लगे।
ऊपर से गोपाल ने देखा कि बहुत दूर तक चारों तरफ झाड़ियां ही झाड़ियां दिखाई पड़ती हैं । झाड़ियों के बीच में खूब घास उगी है । उत्तर से दक्षिण तक और पश्चित से पूर्व तक तक चारों तरफ उड़ने के वाद लाल बौने ने कहा-अब तुम परी देश का कुछ अन्दाज लगा सकते हो ।
गोपाल बोला-बस यही परी देश है! जिसकी किस्से कहानियों में इतनी तारीफ सुनता था ।
लाल बौना ने कहा-इस झाड़ियों के देश को तुम क्या जानो । हर एक झाडी के भीतर एक सुन्दर फूलों से सजा मकान है ।
गोपाल ने कहा-एक झाड़ी से दूसरी झाडी में जानें के लिए कहीं कोई रास्ता भी तो नहीं दिखाई पड़ता ।
लाल बौना बोला-रास्ते की यहाँ क्या जरूरत यहां का हर एक रहने वाला उड़ता हुआ चलता है । जमीन पर किसी के पाँव भी पड़ते हैं?
गोपाल ने पूछा-और परी देश के बीच में घास की ढकी छोटी पहाडी सी यह क्या चीज है?
बौना ने कहा-वह परियों की रानी का महल है । उसके अन्दर बहुत से तरह-तरह की फूल पत्तियों से सजे कमरे हैं।
''उसके अन्दर हम चल सकते हैं?
नहीं, हर सोमवार' को परीदेश बाहर से सजता है । तब परियाँ बाहर निकलती हैं । उस दिन तुम वहां जा सकते हो!
गोपाल ने पूछा-और किसी दिन परिया नहीं निकलतीं?
परियाँ रात में निकलती हैं और खासकर चाँदनी रात में।
अब कुछ-कुछ रात हो गई थी और दोनों बात करते-करते उस जगह पर आ गये थे जहां पहले दिन गोपाल और लाल बौने से भेंट हुई थी ।
गोपाल ने पूछा- पहाड़ के उस तरफ मनुष्यों का देश है?
''हाँ ।' '
मनुष्यों के देश से कोई यहां आ सकता है? ''
''जिसकी तुम इच्छा करो वह आ सकता है । ''
गोपाल को चमेली का ध्यान हो आया । थोड़ी ही देर में दोनों चन्द्रमा की रोशनी में देखा कि पहाड़ पर सें एक ऊंट उड़ता हुआ उनकी तरफ आ रहा है । इस कहानी के पिछले हिस्से में हम यह बता चुके हैं 'कि ऊँट पर चमेली, किसान, मोर और चूहा आ रहे थे वह उड़ने लगा था । उनके उड़ने का यही कारण था । जब ऊँट बिलकुल करीब आ गया तब गोपाल ने देखा कि मोर के पीछे एक चूहा लिये हुये चमेली बैठी है ।
गोपाल के मुँह से निकला-चमेली दीदी!
चमेली ने गोपाल की आवाज पहचानी । पर उसे गोपाल कहीं दिखाई न पड़ा । उसने कुछ चिन्ता और' खुशी के साथ कहा-भैया गोपाल तू कहाँ है?
गोपाल बोला-इधर, मैं यहां हरा बौना खड़ा हूं ।
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Re: बाल उपन्यास -परियों का देश

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 11:34

घर में चमेली गोपाल को इस शक्ल में देखती तो शायद हँसती पर यहाँ उसे अफसोस हुआ । उसने कहा-भैया गोपाल तेरी यह दशा कैसे हो गई?
गोपाल ने अपने वहां पहुंचने की सारी कथा कह सुनाई- और कहा-यह परी देश है । जल्दी में यहां बिना सोचे समझे कोई इच्छा मत करना नहीं तो तुम्हारी भी शकल बदल जाएगी।
किसान ने लाल बौने की तरफ देखकर कहा--अरे: बाबा यह कौन है ।
लाल बौने ने अपनी दाढ़ी और मूँछें चढ़ाकर उसे सलाम किया । पर किसान ने समझा किए वह उसे डरा रहा है । वह बोला-खबरदार! दूर खड़ा हो! नहीं तो ऐसा डन्डा मारूँगा कि उलट जायगा ।
किसान बैल बन गया
परी देश में गोपाल का नाम हरा बौना पड़ गया था । लाल बौने ने गोपाल से पूछा- तुम जानते हो । आज कौन दिन है?
गोपाल ने अपनी आँखें मलते हुए कहा-जानता हूँ आज सोमवार है ।
हाँ रानी के स्वागत के लिये हमें तैयार हो जाना चाहिये ।
अजी अभी सूरज निकलने में बहुत देर है तब तक में सब तैयारी हो जायगी ।''
लाल बौना बोला-परन्तु तुम्हारे यहाँ मनुष्यों के देश से मेहमान बहुत आ गये हैं । इनको छिपाना होगा नहीं तो रानी गुस्सा हो जायेंगी और मुमकिन है सब को घास बना दें । परीदेश में दूर तक तुम जो हरी-भरी घास देखते हो यह असल में घास नहीं है । ये सब मनुष्य देश से आए हुए जीव हैं जो रानी की नाराजगी से घास बन गये हैं ।
चमेली बोली-अरे इतनी बेरहम रानी है । मैं चाहती हूं घासों में जितने जीव छिपे हैं वे सब अपनी असली रूप में आ जायं । लाल बौना हँसने लगा-ही ही! ही! रानी की इच्छा के खिलाफ किसी की इच्छा नहीं चल सकती ।
गोपाल ने कहा-चमेली, सोच-समझकर काम करो । यह पराया देश है यहां से हमें अपने देश वापस चलना है ।
किसान कहने लगा-कितना छोटा लड़का है पर कितनी बुद्धिमानी की बात करता है ।
लाल बौने ने किसान को झिड़क कर कहा-अब गपशप करने के लिए मौका नहीं है । बोलो किस तरह छिपोगे?
किसान बोला-खबरदार मैं तेरी झिड़की नहीं सह सकता हूं । दाढ़ी उखाड़ लूंगा ज्यादा बोलेगा तो!
लाल बौना हंसने लगा-हीं ही ही ही!
चमेली ने कहा-बाबा को चिढ़ाओ मत । इन्हीं की मदद से में यहां तक आ सकी हूँ ।
लाल बौना ने कहा-जो चिढ़ता है उसी को लोग चिढ़ाते हैं ।
गोपाल बोला-अरे! सूरज निकल रहा है जल्दी बोलो क्या करें?
लाल बौना ने ऊँट को अपने सामने झोपड़ी के पास खड़ा कर और किसान को ऊंट की गरदन के नीचे खड़ा कर दिया इसके बाद उसने हरी पत्तियों और लताओं से दोनों को ऐसा सजा दिया कि जान पड़ने लगा मानों फूल-पत्तियों का छै टांग का ऊँट खड़ा हो । फिर उसने चमेली से कहा-- तुम परी बनने की इच्छा करो । इस तरह तुम हम लोगों के साथ उड़ भी सकोगी।
चमेली ने कहा – मैं परी बनना चाहती हूँ।
बस चमेली परी बन गई । उनके हाथ-पाँव बहुत ही मुलायम हो गये ।
चमेली ने कहा - मैं मेहनत से चीज तैयार करना अच्छा समझती हूँ । खाली इच्छा से नहीं ।
लाल बौना बोला-इसमें शक नहीं कि मनुष्यों के देश में यह अच्छी बात है पर इसलिए वहाँ मार काट और लड़ाई-झगड़े भी होते रहते हैं । मान लो एक राजा ने मेहनत से एक शहर बसाया । दूसरा राजा जल्दी ही वैसा शहर बसाना चाहता है । इच्छा करते ही वह शहर नहीं बसा सकता इससे वह पहले राजा के बसाए शहर पर कब्जा करने चलता है । तब दोनों में लडाई होती है । परी देश में ऐसी लड़ाई का मौका नहीं आ सकता ।
किसान ने ऊँट के नीचे से कहा-इस बौने को क्या मालूम' मनुष्य देश में सब आदमी अपने-अपने मतलब की बात सोचते हैं । दूसरों के मतलब की परवाह नहीं करते । यदि वहां के लोग अपने मतलब के साथ-साथ थोड़ा दूसरों के. मतलब की बात भी सोचा करें तो मनुष्यों का देश स्वर्ग बन जाये स्वर्ग!
यहाँ उसने अपनी गर्दन को एक ऐसा झटका दिया कि ऊँट- के ऊपर सारी पत्तियाँ हिल उठीं ।
लाल बौना हंसने लगा-हो ही! ही!
चमेली ने किसान की तरफ मुँह करके कहा-बाबा अभी तुम चुप रहो।
गोपाल बोला-अरे गाने की आवाज आ रही है । शायद रानी बहुत करीब आ गई हैं ।
लाल बौने ने चूहा और मोर को झट पट झाड़ी में छिपा 'दिया और गोपाल चमेली से बोला-जरा ऊपर उडो और परी देश की बहार देखो ।
बात की बात में तीनों उड़ कर पेड़ों से भी ऊपर जा पहुँचे। गोपाल ने नीचे की ओर देखकर कहा-ओह सचमुच परी देश बड़ा सुन्दर है । क्या खूब वाह!
अब सूरज निकल आया था । उसकी सातों किरणें सात रज. में अलग-अलग पड़ रही थीं । कहीं लाली दौड़ा हुई थी .कहीं पियराई और नीलिमा ।
चारों तरफ जो ऊँची-नीची घास उगी हुई थी वह बराबर हो गई थी । जान पड़ता था कोई हरा फर्श बिछ गया है और उसपर रंग-बिरझी धूप पड़ रही है । झाड़ियाँ सब बाहर से खिल उठी थीं । उन पर घेरों में फूल खिले थे । हर एक झोपड़ी मैं सबसे ऊपर सूरजमुखी का एक बड़ा सा फूल खिला था; उसके नीचे चमेली की कलियों का घेरा था । इसी तरह गुलाब, गैंदा, चम्पा, जुही, आदि के फूल खिले थे । लिख कर यहाँ इस फुलवारी का वर्णन नहीं किया जा सकता । अपने दिल में ही सोच- कर तुम इसे समझ सकते हो ।
आज सब परियाँ बाहर निकली हुई थीं । सारा परी देश एक अत्यन्त सुन्दर बाग की तरह दिखाई दे रहा था और वाग में जैसे तितलियाँ उड़ती हैं वैसे ही परियाँ मँडरा रही थीं उनकी गिनती नहीं थी ।
परियों की रानी एक तिनकों के रथ पर सवार थी । रथ बड़ा ही सुन्दर वना था । रानी की पोशाक सफेद थी, बिकुल सफेद । और उस पर सूरज की किरणों का रङ्ग असर नहीं करता था । सारे परी देश में सिर्फ एक गाना हो रहा था ।
तुम्हारी जय हो जय रानी ।
फूलों सी है हंसी तुम्हारी महक सरीखे बोल ।
प्यार भरा है दिल में इतना दुनिया लेलो मोल ।।
खोल दो जग के बन्धन खोल ।.
बोल हो महक सरीखे बोल । ।
बजाकर बढ़ो प्रेम का ढोल मिटा दो सबकी हैरानी ।
तुम्हारी जय हो जय रानी । ।
हर एक मुख से एक साथ यही संगीत निकल रहा था? लाल बौना गोपाल और चमेली ये तीनों भी यही राग अलापने लगे और इसमें वे इस कदर मस्त हो गये कि उन्हें पता ही न चला की रानी कब और कहाँ चली गई ।
अब सूरज बहुत ऊँचे चढ़ आया था और उसकी सातों किरणें मिलकर एक हो गई थी । नीचे आने पर लाल बौना ने किसान' से कहा-बैन की तरह अब खड़े क्या हो? कुछ देखा?
किसान बोला-अगर मैं वाकई बैल होता तो तुम्हें ऐसी लात जमाता कि तुम कुछ दिन याद करते ।
अरे! यह क्या? किसान सचमुच बैल वन गया और लाल बौने पर उसकी एक दुलत्ती भी चल गया । चमेली ने कहा- बाबा तुम बैल वन गये ।
लाल बौना हँसने लगा-ही ही! ही । मेरी चोट अच्छी हो जाय ।
बैल बने हुए किसान ने देखा कि उससे गलती हो गई है । वह चमेली के पास जाकर उसका हाथ चाटने लगा । चमेली भी उसके मस्तक पर प्रेम से हाथ फेरने लगी । उस समय दोनों की आँखों में आँसू आ गये थे ।
इस किताब के पढ़ने वाला छोटे बच्चों! यह तो तुम जान ही गये होंगे कि परी देश में यदि कोई पहुंच जाय तो उसकी हर एक इच्छा पूरी हो सकती है । वह जो चाहेगा वही हो जायगा । हाँ, यह जरूर है कि यदि रानी चाहे तो उसकी इच्छा पूरी नहीं हो सकती।
अच्छा तो अब एक मजे की बात सुनो । किसान बैल बन गया था । बैल बन जाने पर उसे घास खाने की इच्छा हुई । परन्तु परी देश में पहले ही से बहुत सी घास थी । इससे बैल की इच्छा से परी देश को कोई नुकसान नहीं हुआ । चूहे को कोई बिल नहीं मिला । इससे वह पहले उदास हुआ फिर उसके दिल में आया-कोई अच्छा सा बिल होना चाहिये । चूहे के दिल में जैसे ही यह इच्छा पैदा हुई वैसे हो परी देश में चारों तरफ बिल ही बिल हो गये । ऐसा किसी परी का घर न रह गया सौ पचास बिल न हो गये हों । परी देश में ऐसा वात पहले कभी नहीं हुई थी । इससे सब परियाँ घबरा उठी । वे सोचने लगीं हो न हो कोई अजीब जीव इस देश में आ गया है ।
चमेली इस समय हरी घास में बैठी अपने बालों में कंघी कर रही थी । लाल बौना बोला-आज की चाँदनी रात बड़े मजे की होगी । तुमने परी देश में चाँदनी रात न देखी होगी?
गोपाल बोल उठा-हाँ! हाँ! चेमेली दीदी! यह तो में तुम्हें बताना ही भूल गया । यहाँ सोमवार की चाँदनी रात में सारा परी देश दूध के फेन की तरह सफेद दिखाई देता है । पेड़ पौधे झाड़ियों पत्ते सब सफेद दिखाई देते हैं । पेड़ों के तने और डालियाँ भी- सफेद दिखते हैं । तब रात में परियाँ सफेद - सफेद पोशाक पहन कर निकलती हैं । रात होने दो देखना । मैं भी तुम्हें सफेद दिखाई दूँगा और यह लाल बौना भी सफेद दिखाई पड़ेगा ।
चमेली अपने बालों में कंघी करती जाती थी और अपने मां को याद करती जाती थी-हाय बेचारी माँ क्या करती होगी । कौन जाने उसने खाना खाया हो या न खाया हो । उसे यह बात कैसे मालूम हो कि हम लोग यहाँ मजे में हैं । '' चमेली की दोनों आखों से आँसू के दो बड़े-बड़े बूँद निकल कर झूल पड़े । उसने यह सुना भी नहीं कि गोपाल क्या कह गया । वह अपने आप कहने लगी-अगर मैं इतनी ऊँची हो जाती जितना ऊँचा वह पहाड़ खड़ा है-नहीं, थोड़ा उससे भी ऊँची, तो शायद मैं अपनी माँ को देख लेती ।
गोपाल बोला-चमेली दीदी क्या सोच रहो हो?
गोपाल की यह बात पूरी भी न हो पाई था कि लाल बौना चिल्ला उठा-ओहो हो! अरे रे! यह क्या?
चमेली ऊँची उठती चला जा रही थी । लाल बौना और गोपाल दोनों उसकी ओर देखने लगे । दोनों को सिर्फ उसके पैर दिखाई पड़ रहे थे । दोनों हाथों की नोचे झूलती हुई कलाई की चूड़ियाँ भी कमी-कभी चमक जाती थीं । उसके शरीर का
' पता नहीं चलता था ।
गोपाल आश्चर्य से पुकारने लगा-चमेली दीदी! चमेली दीदी!
परन्तु अब कौन जवाब देता है । चमेली का सिर बहुत ऊंचे बादलों से भी ऊँचे उठ चुका था ।
लाल बौना बोला – दाढ़ी बिछाओ, जल्दी उस पर पेट पटको, मूंछें मरोड़ो, उड़ो। चमेली के मुंह तक उड़कर चलो। उससे पूछें कि यह इतनी लम्बी क्यों हुई जा रही है। कोई तारा तो नहीं तोड़ना चाहती।
अब लाल बौना और हरा बौना दोनों चमेली के दोनों हाथ छूते हुये ऊपर उड़े जा रहे थे । थोड़ी देर बाद दोनों चमेली के मुँह के पास पहुँच गए और फड़फड़ करके वहीं उड़ने लगे । चमेली पहले कुछ डर सी गई थी पर लाल बौना और गोपाल को देखते हो उसका डर जाता रहा । वह मुस्कराने लगी।
गोपाल ने कहा-चमेली दीदी बिना सोचे समझे तुमने यह क्या कर डाला । इतनी लम्बी होने से क्या फायदा?
लाल बौना बोला-कैसे बैठोगी, कहाँ लेटोगी इतना बड़ा परीदेश तुम्हारे लिए गुड़ियों का बगीचा होगा ।
चमेली ने जवाब दिया-मैंने सोचा था कि मैं इतनी लम्बी हो जाऊंगी तो शायद मेरी माँ मुझे दिखाई पड़ेगी । पर यह .बात बिल्कुल फिजूल हुई । कहीं कुछ नहीं सूझता ।
लाल बौना बोला-मनुष्य देश से चली आ रही हो और तुम्हें इतना भी पता नहीं कि आदमी की निगाह बहुत दूर तक नहीं जा सकती है।
गोपाल बोला – और इतनी दूर तक तो उड़कर आ सकती थी चमेली दीदी।
चमेलनी ने कहा – अफसोस के कारण मुझे कुछ खयाल ही न रहा। अब मैं चाहती हूँ कि मेरी माँ मेरा घर मुझे दिखाई दे।
लाल बौना बोला-कभी नहीं, एक दिन में किसी की एक से ज्यादा इच्छा पूरी नहीं हो सकती ।
चमेली ने गोपाल से कहा-अच्छा, तुम मां, बाप को देखने की इच्छा करो ।
गोपाल ने यह इच्छा करते ही देखा कि उसकी माँ घर के आंगन में बैठी रो रही है । भूख प्यास से उसका शरीर सूख गया है। गोपाल का बाप उसे धीरज बँधा रहा है । गोपाल ने चमेली से सब हाल कहा ।
चमैली बोली-भैया, मैं मां. बाप से बातचीत करने की इच्छा करूँ तो पूरी हो सकती है ?
लाल बौना बोला-आज अब तुम दोंनो की कोई और इच्छा पूरी नहीं होगी ।
चमेली ने आँखों में आँसू भर कर और लान बौने के हाथ'- जोड़कर क्हा-तो दादा मेरा यह काम कृपा करके तुम्हीं कर दो ।
लाल बौने को चमेली पर दया आ गई । उसने कहा-मैं' चाहता हूँ कि मुझे बहुत दूर तक की आवाज सुनाई पडे । इसके बाद ही बोला-सुनो तुम्हारी माँ कह रही हैं - हाय! गोपाल, हाय चमेली! तुम दोनों कहाँ चले गये? मेरे बच्चों' कहां हो।
चमेली का गला भर आया । गोपाल की आँखों में भी आँसू आ गए। लाल बौने ने चमेली की माँ से कहा .-गोपाल और चमेली की माँ! अफसोस मत करो । तुम्हारे दोनों बच्चे परी' देश में आ गये हैं । बडे मजे में हैं । जल्दी ही तुम्हारे पास आने की कोशिश करेंगे ।
गोपाल यह सुन भी रहा था और अपने घर की तरफ आँखें भी गड़ाये था । उसने कहा-चमेली दीदी! अम्मा आश्चर्य से चारों तरफ आसमान की तरफ देख रही हैं । इसी बीच में लाल बौने ने सुना-'मैं किसकी आवाज सुन रही हूँ ? भगवान क्या
स्वर्गलोक से तुम मुझसे बोल रहे हो ?' इसका लाल बौने ने जवाब दिया-नहीं परी देश का लाल बौना हूँ ।
इस समय गोपाल नीचे परी-देश की ओर देख रहा था ।।
उसने चौंककर कहा-अरे! लाल बौना! यह क्या? परी देश में तो चारों तरफ बालू ही बालू चमक रही है । जितनी झांड़ियां हैं उन सबों में आग सी लगी है । हमारा तुम्हारा घर भी सूखा जा रहा है । परियाँ सब भाग-भाग कर रानी के महल की ओर जा रही हैं 1
लाल बौने ने परी देश पर कान लगाया ।
'हाय! मरे! मरे! पानी! पानी! '
वह बोला-चमेली! तुम्हारे साथ जो ऊँट महाशय आये हैं । यह उनकी करामात जान पड़ती है । उन्होंने इच्छा की होगी कि सारा परीदेश रेगिस्तान हो जाय । हरियाली से उनसे बैर है न?
गोपाल बोला-बिल्कुल यही बात जान पड़ती है । सारा देश उजाड़ हुआ जा रहा है ।
इसी समय पूरब की ओर से बड़ी काली घटा उठी । बड़ी-डरावनी घटा थी । लाल बौना बोला-जरा पूरब की तरफ देखो । यह. तुम्हारे साथ जो मोर महाशय आये है उनकी करतूत जान पड़ती है । उन्होंने इच्छा की होगा कि खूब बादल गरजे
और पानी बरसे । परी देश बह जाय, उनकी बला से?
चमेली और गोपाल ने कोई जवाब नहीं दिया।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: बाल उपन्यास -परियों का देश

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 11:34

लाल बौना फिर कहने लगा – मनुष्यों के देश में कहीं ऊसर, कहीं समुन्दर, कहीं खेत, कहीं दलदल इसीलिए बने हैं कि वहाँ बहुत विचार वाले जीव है । कोई कुछ चाहता है कोई कुछ । ऐसी दशा में वहाँ आपस में लड़ाई मार काट क्यों न हो
कड़ कड़ कड़ कड़ '
बड़े जोर से बादल गरज उठा । सूरज छिप गया । दिन रात में बदल गया । बिजली ने लाल बौने की आंखों को चकाचौंध .कर दिया ।
लाल बौना डर कर नीचे की ओर भागा । गोपाल भी डरा पर चमेली को अकेला छोड्‌कर वह नहीं भाग सकता था । उसने कहा-चमेली दीदी! किसी तरह बैठने की कोशिश करो । जान पड़ता है कोई भारी मुसीबत आने वाली है ।
परीदेश में हलचल
परीदेश की रानी के महल में सब परियाँ इकट्ठा हुईँ। आज देश में पहला मौका था जब परियाँ इतनी घबराई हुई थीं. सब परियों के झोंपड़े उजड़ चुके थे। केवल रानी का महल बाकी था । वह इसलिए बिना रानी की इच्छा के वह सूख नहीं सकता था ।
महल के बाहर अजीब तमाशा हो रहा था । जान पड़ता था मानो बरसात और रेगिस्तान में लड़ाई हो रही है । बांहर ऊंट और मोर दोनों खुश थे । ऊँट दूर तक फैले रेगिस्तान को दखकर खुश था और मोर ऊपर की बादलों की गरज को सुन कर खुश था । बैल के रूप में किसान कभी-कभी हरी घास की इच्छा कर बैठता था इससे कुछ हरियाली दिख जाती थी । अजीब गड़बड़ मची हुई थी । एक चिडिया और एक जानवर की इच्छा ने यह हालत कर रखी थी । मनुष्य देश से और भी जानवर पहुँच जाते तो जाने क्या हो जाता ।
इस लिहाज से तो मनुष्यों के देश में यह अच्छा है कि यहाँ किसी की इच्छा पलक झपकते पूरी नहीं होती । क्योंकि यदि ऐसा होता और जानवरों की चलती तो ये इस दुनिया को न जाने क्या बना देते और तो और केवल उल्लू की इच्छा पूरी हो जाती तो सूरज के कभी दर्शन ही न होते । उल्लू महराज चौबीसों घन्टे अंधेरा बनाए रहते । खैर गनीमत हुई कि यह पक्षी परीदेश में नहीं पहुंच पाया । मगर बादलों के घिरने से जो अंधेरा हो गया था उससे लाल बौना को यही शक हुआ कि परी-देश में कोई उल्लू भी आया है इसलिए डर के मारे जब वह काँपता, घबराता भागता गिरता पड़ता रानी के महल में पहुँचा तब यही चिल्लाने लगा-परीदेश में क्या काई उल्लू भी आ पहुंचा? मैंने उसे नहीं देखा ।
एक तरफ परियां अपने बचने का उपाय सोच रही थीं दूसरी तरफ लाल बौना अपना यही बेसुरा राग अलाप रहा था । किसी को समझ में न आया वह क्या बक रहा है ।
रानी के महल में भीतर हर पत्ती पर एक जुगनू बैठा हुआ था । इससे खूब उजाला हो रहा था । उसी उजाले में एक परी ने देखा कि लाल बौना भीगा हुआ है । उसने पूछा-क्या बाहर पानी बरस रहा है?
लाल बौना बोला-नहीं गर्द बरस रही है ।
'तब तुम भीगे कैसे हो ?'
'में अभी बादलों को छूकर चला आ रहा हूं वहाँ इस कदर जोर से बिजली चमक रही है कि मैंने सोचा कि भागूंगा नहीं तो उसकी सारी चमक मेरी आँखों में घुस जायगी ।'
: इधर लाल बौने में और एक परी में ये बातें हो रही थीं इधर रानी से एक परी जोर देकर कह रही थीं-रानी इच्छा करो 'कि परीदेश फिर पहले जैसा हो जाय । तुम दिल से यह .बात चाहोगी तो जरूर हो जायगा । इसके जवाब में रानी ने कहा-मैं हमेशा बहुत सोच समझ कर इच्छा करती हूँ । अपने पास जो ताकत हो उसको सोच समझ कर काम में लगाने को मेरी हमेशा से आदत है । शायद भगवान को यही मंजूर हो कि परीदेश नाश हो जाय । इसलिए मैं बिना सोचे समझे कोई इच्छा नहीं करूँगी । लाल बौना कहां है उसे बाहर भेजो । पता लगाकर आवे कि क्या बात है । अगर मनुष्यों के देश से कोई आया होगा तो उसे पता होगा । लाल बौना रानी के सामने लाया गया । उसने अपनी दाढ़ी तान कर और मुँछें झटकर कर रानी को प्रणाम किया । मूंछे झटकने से मूछों में भरी पानी की बूंदे रानी पर जा पड़ी । रानी ने पूछा क्या बाहर से आ रहा है? कितना पानी बरस गया? ''बिल्कुल नहीं । मैं बादलों से आ रहा हूँ । आज की मुसीबत का सारा भेद मुझे मालूम हो गया है । सिर्फ एक बात नहीं मालूम हुई कि उल्लू कहाँ से और कैसे आ गया ।''
परियों की रानी ने कहा-''उल्लू तेरे दिमाग में कैसे घुस गया । अरे भाई बादल घिरे उनमें सूरज छिप गया । बस अँधेरा है । इसमें उल्लू का क्या कसूर है ।''
लाल बौना दोनों हाथों से अपना मुंह पीट कर बोला- -बेशक मैंने समझने में गलती की है । उल्लू की तलाश में मैं खुद -ही उल्लू बन गया ।
रानी ने कहा-बाकी तुझे क्या मालूम है?
लाल बौना ने गोपाल, चमेली, किसान, ऊंट, मोर, चूहा सब का सारा किस्सा कह सुनाया ।
परियों की रानी ने कहा-ये सब जीव जिस शकल में परी देश में आये थे उसी शकल में हमारे महल में हाजिर हों ।
रानी यह कह भी न पाई थी कि सब लोग उसके महल के सामने आकर खड़े हो गए ।
इसके बाद रानी ने कहा-परी देश जैसा पहले था वैसे-- ही फिर हो जाय ।
बस परीदेश फिर ज्यों का त्यों हो गया । परियां यह देखने के लिए बाहर निकल आई और रानी की तारीफ में एक गीत गाने के बाद ऊँट और मोर को देखने लगीं ।
रानी ने बाहर निकल कर कहा-तुममें से किसी को कुछ कहना है?
किसान बोला-हाँ, तुम्हारा यह लाल बौना बड़ा शैतान है । इसने मुझको बैल बना दिया था ।
लाल बौना-बिलकुल गलत! तुमने खुद बैल बनने की इच्छा की थी ।
किसान-तुमने मुझे गुस्सा दिलाया था ।
लाल बौना-तुमने भी मुझे चिढ़ाया या ।
रानी-बस, मुझे ऐसी बातें पसन्द नहीं है । यह प्रेम का देश है । यहां सब को प्रेम से रहना चाहिए । दोनों एक दूसरे को गले से लगाओ, और किसी को कुछ कहना है
गोपाल और चमेली ने एक साथ कहा - हम अपने देश वापस जाना चाहते हैं ।
रानी बोली-अच्छी बात है । पर तुम यहाँ आए कैसे?
गोपाल ने अपने आने की और चमेली ने अपने आने की कहानी कह सुनाई। चमेली के मुंह से किसान की तारीफ सुन कर रानी उठी और किसान के चरणों पर मस्तक रख कर उसे प्रणाम करने लगी।
लाल बौना बोला-इस तरह तो वह और आसमान पर चढ़ जायगा । उसके कुछ अक्ल शहूर है या यों ही उसे प्रणाम कर रही हो ।
रानी ने कहा-अक्ल शहूर हो या नहीं । मनुष्य देश में- रहने पर भी इसमें परियों के गुण मौजूद हैं । यह मुसीबत में पड़े की मदद करना जानता है । एक छोटी अनजान लड़की के लिए घर बार छोड्‌कर इतनी दूर जो आ सकता है और इतनी- तकलीफ उठा सकता है उसे मैं क्या ईश्वर भी एक बार प्रणाम करेंगे । यदि ऐसे ही आदमी मनुष्य देश में पैदा हो जायँ तो परियों को वहां जाकर प्रेम दया का गीत गाने की जरूरत ही न पड़े ।
इसके बाद रानी ने किसान से पूछा-किसान देवता और- क्या चाहते हो?
किसान बोला-चमेली का काम हो गया अब मैं अपने घर जाना चाहता हूँ ।
“अच्छा ऊँट पर बैठ जाओ”
किसान ऊँट पर बैठ गया। उसके बैठते ही ऊँट उड़ चला। चमेली बोली हम लोग भी इन्हीं के साथ जाएंगे।
रानी ने कहा – तुम बच्चे हो, अभी बहुत थके हो। दो चार दिन परी देश की सैर कर लो फिर जाना। किसान को इसलिए भेज दिया कि उस बेचारे को अपने घर बार की चिन्ता है। तुमने देखा नहीं वह कितना उदास था ।
चमेली चुप हो रही ।
मोर चुपचाप रानी की ओर देख रहा था। रानी को उस पर दया आ गई। रानी बोली मोर! चूहे को अपनी पीठ पर बैठाकर जहां से आये हो वहीं चले जाओ ।
मोर और चूहा दोनों रवाना हो गए ।
इसके बाद रानी ने लाल बौने से कहा-गोपाल और चमेली की कल मेरे यहाँ दावत होगी । सबेरा होते ही यहाँ पहुंचा जाना । उसके बाद बताऊँगी कि ये अपने घर कैसे जायेंगे ।
अब सूरज डूब चुका था । सफेद चाँदनी में परियों के गाना के बीच में से लाल बौना गोपाल और चमेली को घर लिये जा रहा था ।
वापसी
चमेली और गोपाल ने यह समझा था कि रानी के यहाँ दावत में उन्हें अच्छी-अच्छी चीजें खाने को मिलेगी । परन्तु परीदेश में दावत का बिलकुल दूसरा अर्थ है । रानी जिसका दावत देती है उसको वह बजाय अच्छे-अच्छे खाने खिलाने के अच्छी-अच्छी बातें सुनाती है । अपना दिल उसके सामने खोलती है और उसके दिल की बातें सुनती है ।
उस दिन रानी ने चमेली और गोपाल को बहुत सी अच्छी- अच्छी बातें बतलायीं । परोदेश के बारे में और मनुष्यों के देश के बारे में भी दोनों की बातें हुयी । बातें समाप्त होने पर रानी ने पूछा-बोलो, परीदेश को तुम कैसा समझते हो, यहाँ रहना चाहो तो तुम्हारे माता-पिता को भी यहीं बुला दूं?
चमेली ने जवाब दिया- परीदेश क्या है एक सपना है । थोडी देर तक सपना देखना अच्छा होता है । पर हमेशा सपना कौन देखना चाहेगा?
रानी ने कहा-परन्तु मनुष्यों की किताबों में लिखा है कि मनुष्यों का देश भी सपना है ।
गोपाल बोला-होगा, हमको क्या? हम अभी बच्चे हैं ।' हमें सब सपना है और हमारे लिए सब सच्चा है ।
रानी ने कहा-हम लोग यहाँ बुड्‌ढों की सी बातें कर रहे हैं । आज बातचीत शुरू करने में शुरू से ही गलती हो गई है । इस तरह की बातें मुझे बड़े बूढ़े मनुष्यों से करनी चाहिये थीं । तुम अभी बच्चे हो तुम्हें मनुष्यों की दुनिया का क्या पता?
चमेली बोली-मैं चाहती हूँ । मैं हमेशा इसी तरह लड़की बनी रहूँ ।
गोपाल बोला-मैं भी चाहता हूँ कि मैं हमेशा इसी तरह लड़का बना रहूँ ।
रानी बोली-उम्र की कमी से कोई बच्चा नहीं कहलाता और न उम्र की ज्यादती से कोई बुड्‌ढा । जिसका स्वभाव हमेंशा बच्चों का सा बना रहे यही बच्चा है । मनुष्यों के देश में ऐसे भी लोग होते हैं और वे ही अच्छे लोग कहे जाते हैं ।. तुम्हारे साथ जो किसान आया था वह ऐसा ही था ।
चमेली ने कहा-सचमुच बड़ा अच्छा आदमी था । वही मुझे यहाँ तक लाया । मैं अपने घर जाने पर उससे जरूर भेंट करूंगी और उसको बाबा कहूँगी ।
गोपाल बोला--मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा । मैं भी उसे बाबा कहूंगा ।
रानी ने मुस्करा कर कहा-तुम दोनों बड़े अच्छे लड़के हो 'तुमसे मैं बहुत खुश हूँ ।
गोपाल ने कहा-खुश हो तो कुछ इनाम दो ।
चमेली ने कहा--मैं इनाम नहीं चाहती । मैं किसी लालच .से अच्छी लड़की नहीं बनना चाहती ।
गोपाल बोला तब मैं भी कोई इनाम नहीं चाहता ।
रानी बोली-अब तुम दोनों परी-देश की सी बातें कर रहे हो । परियाँ अपने अच्छे कामों का कोई इनाम नहीं -चाहतीं ।
गोपाल कुछ कहने वाला था कि रानी ने कहा-मैं तुम दोनों को तितली बनाए देती हूँ । तुम बड़ी तेजी से उड़ते हुये जाओगे । और अपने घर पहुंच जाने पर अपने माँ की आवाज सुनते ही फिर मनुष्य बन जाओगे । क्यों मंजूर है? दोनों ने -एक साथ कहा-हाँ!
मुँह से 'हाँ' निकलते ही दोनों तितली बन गए । सबेरे की -सुनहली धूप में उनके रंग-बिरंगे पर चमक उठे । अब वे उड़ते- उड़ते रानी के महल से दूर लाल बौने की झाड़ी के पास पहुँच .गए थे । वहाँ से उन्हें रानी के घर में परियों का यह गाना होता हुआ सुनाई पड़ा ।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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