बाल उपन्यास -परियों का देश

Jemsbond
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Re: बाल उपन्यास -परियों का देश

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 11:35

तुम्हारी जय हो जय रानी ।
फूलों सी है हंसी तुम्हारी महक सरीखे बोल ।
प्यार भरा है दिल में इतना दुनिया लेलो मोल ।।
खोल दो जग के बन्धन खोल ।
बोल दो महक सरीखे बोल ।।
बजा कर बढ़ो प्रेम का ढोल मिटा दो जग की हैरानी
तुम्हारी जय हो जय रानी
चमेली और गोपाल दोनों को यह गाना याद था. दोनों इसी को गाते उड़ते चले गए । शाम हुई, रात हुई, पर वे उड़ते ही चले गए।
दूसरे दिन जब पूरब में सूरज की लाली फूटी तब चमेली ने गोपाल से चौंक कर कहा-अरे गोपाल वह देख वह पेड् दिखाई पड रहा है । जिस पर से तू गुब्बारे के साथ उड़ा था।
गोपाल बोला-ओहो अब हम अपने गांव के पास आ गये। इसके थोड़ी ही देर बाद दोनों अपने घर के पास पहुँचे ।
पल भर के भीतर आंगन में लगे तुलसी के पेड़ पर बैठ गये। उनकी माता उदास मन चुपचाप बैठी थी । बड़ी देर तक दोनों चुपचाप दोनों इस आशा में बैठे रहे कि माँ बोलेगी तब वे' मनुष्य बन जायेंगे ।
परन्तु जब देखा कि माँ को बुलाना सहज नहीं है तब' चमेली चुपके से जाकर उसके सामने ऐसे पड़ रही जैसे कोई मरी तितली हो।
उसे देखते ही चमेली की मां ने धीरे से कहा – हाय रे बेचारी तितली।
“अरे चमेली! मैं सपना तो नहीं देख रही हूँ”
चमेली ने कहा-नहीं माँ सपना नहीं है । माता ने चमेली को पकड कर छाती से लिपटा लिया और कहा गोपाल । कहां है?
“वह सामने तुलसी के पेड़ पर तितली बना बैठा है ।'
तुम्हारी आवाज सुनते ही वह भी आदमी बन जायगा ।
मां ने तुलसी के पेड़ के पास जाकर देखा । वहाँ कोई तितली नहीं थी । बेचारी माँ बहुत घबड़ाई । चमेली भी बहुत घबड़ाई.
दोनों इधर-उधर दौड़ने लगीं ।
गोपाल की माँ ने जोर-जोर से पुकारा-गोपाल!
गोपाल!!
गोपाल बाहर उड़कर आ गया था और एक नीम के पेड़ पर बैठा हुआ था । माँ की आवाज सुनते ही वह तितली से आदमी बन गया । नीम की कमजोर पत्ती उसे सम्भाल न सकी। वह धड़ाम से नीचे जमीन पर गिर पड़ा और उसके मुँह से-
निकला-''हाय माँ तुमने मुझे मार डाला ।''
चमेली और उसकी माँ दोनों दौड़कर गौपाल के पास गए ।'
वह बच गया था । उसके बहुत चोट नहीं आई थी । माँ ने उसे जमीन से उठाकर अपनी गोद में बैठा लिया ।
उसके सिर पर हाथ फेरा और बार-बार उसका मुँह चूमा ।
सारे गाँव में शोर मच गया कि गोपाल और चमेली घर वापस आ गए हैं । गाँव भर के लड़के-लड़कियां स्त्री-पुरुष सब उन्हें देखने आये । गोपाल के घर में कड़ी भीड् और चहल-पहल हो गई । गोपाल की माँ की खुशी का ठिकाना नहीं रहा । उसकी सारी उदासी न जाने कहाँ चली गई । उसने कहा-बच्चों!
मेरे प्यारे बच्चों! तुम्हीं को देखने की आशा से मैं जीती रही नहीं तो अब तक मर गई होती।
इसके बाद गोपाल और चमेली ने अपने-अपने परीदेश में पहुँचने का हाल कह सुनाया । सुनकर जितने लोग इकट्ठे हुए थे सब दंग रह गये और सिर हिला-हिलाकर गोपाल चमेली के साहस की तारीफ करने लगे । अपने बच्चों की इतनी तारीफ सुनकर और उन्हें वापस पाकर गोपाल चमेली के माँ बाप मारे खुशी के फूले न समाते थे ।
(समाप्त)
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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