उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Jemsbond
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उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:43

उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं

लेखक- हरिसिंह दोडिया

1
पीले पंखवाले पंछियों का एक छोटा समूह उसके सिर पर से तेज़ी से पसार हो ग़या।
कुछ देर तक वह नीले-हरे आकाश की ओर देखता रहा। देर के बाद उसे ख्याल आया कि तीव्रता से पसरते पंखों के पीले रंग़ के अंदर कत्थई छींट थे। शायद छोटे छोटे बिंदु थे और इसके कारण पंखों की भात बहुत ही सुंदर, शायद शब्दों में वर्णित न हो सके वैसी सुंदर लग़ रही थी। उसने अभी ही पंखों का रंग़ देखा था। उस रंग़ को, पंछियों के पीले पीले पंखों को, पंख के आकार को, उस आकार के बीच के कत्थई बिदुओं को कभी न भूल पायेगा, कभी भी नहीं।
उसे खिलखिलाकर हँसने का मन हुआ और वह मुक्तता से हँसा।
हास्य की प्रतिध्वनियाँ छोटी-बड़ी पहाड़ियों के बीच देर तक गूँजती रहीं...एक दूसरी पहाड़ियों की तलहटी के बीच टकरा कर इधर-उधर फैलती रहीं...प्रवाही की तरह पसरती रहीं।
वह देर तक आवाज सुनता रहा। छोटी-बड़ी पहाड़ी के बीच बह कर विलुप्त होती जा रही अपनी ही आवाज को पहचानने की उसने कोशिश की।
कुछ देर के बाद उसे ख्याल आया कि अपनी ही प्रतिध्वनि को शायद खुद ही पहचान नहीं पाता।
उसने अपनी ही आवाज को खोजने की व्यर्थ कोशिश की, इधर-उधर, उपर-नीचे, चारों ओर, लग़भग़ सभी ओर देख लिया।
प्रतिध्वनि शांत हो चुकी थी। दूसरी कोई आवाज न सुनाई दे रही थी।
पहाड़ियों को पार कर वह ध्वनि शायद दूर चली ग़ई थी। क्योंकि अब तो उस ध्वनि का कोई अता-पता ही न था।
जोर से पुकार मचाने की अंदरुनी इच्छा को उसने प्रयत्न पूर्वक रोका।
अपनी ये सारी चेष्टाओं को कोई छिपकर देख तो नहीं रहा है, कुछ ऐसा ही सोचकर वह बैठा था। वहाँ से दिखते और आँखों के अंदर समा जाते सभी ऊँचे-नीचे प्रदेशों को वह ध्यान से देखता रहा।
कुछ देर तक वह स्वयं का ही अवलोकन करता रहा।
अंत में वह जब इस निर्णय पर पहुँचा कि उसे कोई नहीं देख रहा है तब आनंदित हो उठा। किन्तु आनंद की रेखाएँ पलभर ही में उसके चेहरे से विलुप्त हो ग़ई।
उसका निरीक्षण योग्य न था।
उसे कोई देख रहा था।
शायद तीव्र नजर से देख रहा था।
खुद का अवलोकन योग्य न था और जिस वक्त आनंद की मात्रा उसके मन में बढ़ रही थी ठीक उसी वक्त उसे वह दृश्य दिखा था।
मजा नहीं आ रहा था फिर भी वह हँसना चाह रहा था। किन्तु वह नहीं हँसा।
वह पहाड़ी की चोटी के एक पत्थर पर आराम से बैठा।
सूरज उग़ चुका था। पूरब की ओर फैलती किरणें वहाँ तक आ पहुँची थीं। दूर-दूर दिखती खाई का घना कोहरा आकाश की ओर उड़ रहा था और रंग़ बिखर रहे थे।
सुबह की नर्म धूप रोचक लग़ रही थी।
आज तो मज़ा आ रहा था। हरी-हरी पहाड़ियों के ऊँचे-नीचे स्थान यहाँ से स्पष्ट दिख पड़ते थे। कहीं -कहीं वृक्षों की घटाएँ थीं। उसके अतिरिक्त यह सारा विस्तार खुला था।
दोनों आँखों में समा सके उतना दृश्य वह देख लेता था।
ऊँची पहाड़ियों पर वह एक ऐसे स्थान पर बैठा था कि जहाँ से अधिकतर प्रदेश दिखाई दे।
पूरब की ओर नीचे पहाड़ियों के बीच कुछ मैदान थे और उन मैदानों में यहाँ की प्रजा बहुत ही चैन से जी रही थी। जमीन के कुछ टुकडे खेती के लायक थे। कुछ उबड-खाबड टुकडों को यहाँ के लोगों ने कड़े परिश्रम से खेती योग्य बनाये थे और उसकी फसल बहुत मिठासवाली होती थी।
यहाँ से दूर-दूर दिखते फूलों ने उसका ध्यान खींचा।
फूलों की पंखुडियाँ पीली थीं और उन पंखुड़ियों के बीच एक कत्थई बिंदु होने का उसे आभास हुआ। उसे पीले पंख वाले पंछी याद आये। वह स्वयं पीले पंखों के कत्थई छींट को कभी भी नहीं भूल पायेगा ऐसा उसने मन ही मन सोचा।
वह अभी भी सोच ही में था कि फडफडाहट सुनाई दी।
यकायक उसकी नजरें उधर दौड़ ग़ईं।
और तब उसे ख्याल आया कि वह किसी सोच में पड़ ग़या था।
कुछ क्षण पहले उसे कोई देख तो नहीं रहा है न, के ख्याल से उसने चारों ओर नज़र फेर कर देख लिया था।
किन्तु अपने अवलोकन के निर्णय में ग़लत ठहरा था।
उसे कोई देख रहा था।
बहुत ध्यान से देख रहा था।
ताकते हुए सिर इधर-उधर घुमाकर कोई देख रहा था।
और अपने निरीक्षण को बहुत देर के बाद अंतिम घडी में उसने पकड़ लिया था। कुछ क्षण वह स्वयं उस निरीक्षण का निरीक्षण करता रहा। अब वह सच्चा था और खुद की सच्चाई स्वीकारते वह किसी सोच में पड़ ग़या था।
कोई उसे देख रहा है, कोई उसे ताक रहा है, बहुत ध्यान से देख रहा है, यह देख उसके आनंद की मात्रा मानो कम हो ग़ई।
और बाद में वह किसी दूसरी सोच में पड़ ग़या था।
सामने की पहाड़ी के एक वृक्ष पर से अभी भी यदि पंख की फडफडाहट न सुनाई देती तो वह किसी सोच में यहाँ ही बैठा रहा होता।
किन्तु पंखों की फडकन से उसका मन भी फडफडा उठा।
पहाड़ी कौए ने एक बार फिर उसकी ओर देख सिर को इधर-उधर घुमाया और उड़ ग़या।
उसे वह पहाड़ी कौआ कब से देख रहा होगा, उसका कोई अंदाज वह न लगा पाया। वह तो बस, अंतिम घड़ी तक यही मान रहा था कि उसे कोई नहीं देख रहा है। और ऐसे ही विचार से एक उग्र पुकार लगाने की उसे इच्छा हुई। किन्तु वह ऐसा न कर सका था और वहीं उस पहाड़ी कौए की ओर उसका ध्यान ग़या था। पहाड़ी कौआ न जाने क्यों किसी भी प्रकार की आवाज किये बिना उसकी ओर देखा करता था। सिर घुमा घुमाकर देखता था।
फिर पहाड़ी कौआ उड़ ग़या था।
उसने मेरी ओर ताक कर क्या देखा होगा ?
वह इस प्रदेश में नया ही था, यह सच था किन्तु आखिर वह भी इस मैदानी प्रदेश के मनुष्य जैसा एक मनुष्य ही तो था न !
उसने खुद को देखा।
उसके पैर की धार पर एक पीली तितली हवा में तिरती-तिरती आ बैठी।
वह स्वयं पत्थर का पुतला बन बैठा रहा।
उसकी दोनों आँखें तितली को ताक रही थीं।
पीले कोमल कोमल पंख, दोनों पंखों के बीच सफेद शरीर और पीले पंखों के बीच कत्थई रंग़ के बिंदु।
मजा आ रहा था।
दिमाग़ में, उसने पैर को स्थिर रखा था, उसके विचार आ रहे थे।और ऐसा कुछ हो रहा था जो समझ में नहीं आ रहा था। किन्तु अब तो पैर हिल उठेगा...अभी हिलेगा...थोडा सीधा हो पायेगा, थोडा खींच पाऊँगा...
और सचमुच में पैर हिल ग़या।
चंचल तितली पलभर में उड़ ग़ई।
उड़ती उड़ती मैदानी खेतों की ओर चली ग़ई।
उसने आँखों से तितली को पकड़ना चाहा किन्तु पकड़ न पाया।
आँखों से तितली को पकड़ने की कोशिश फिर उसने न की। यों ही वह पूरब की ओर देखता रहा।
सूरज की किरणें उस पर पड़ने लगी थीं। शरीर से ठंड कोहरे की तरह उड़ रही थी और बैठने में मजा आ रहा था।
बेड टी लेकर वह निकला था। अब तो नाश्ते की तैयारी हो रही होगी। मैदानी इलाके का कोई बटलर टेबल सजा रहा होगा। मुझे देख वह हँस देगा। मैं भी हँस दूँगा। फिर उसकी पीठ में चपत मारने दौड़ेगा। किन्तु वहाँ बगीचे में पिताजी आ जायेंगे। वे कड़ी नजर से थोड़ी देर देखेंगे। नज़र में घुड़की होगी। स्वयं नींबू की फाँक जैसी आँखों को पढ़ लेगा...रोयल फेमिली का एक युवा लड़का बटलर के साथ खींचातानी करेगा ? आश्चर्य... आश्चर्य... आश्चर्य... नवीन आश्चर्य...!
वह नज़र झुका देगा। कुछ कहेगा नहीं और सीधे दूसरे कमरे में चले जाने की कोशिश करेगा। किन्तु वहीं तो एक पुष्ट और घनी आवाज हवा में तिरती उसके कान में पड़ेगी... विजेंद्र
...
बिना जाने ही मुँह खुल जायेगा और मुँह से अनजाने में ही आवाज निकल जायेगी... ‘जी'...
बाद में एक कर्कश आवाज़ सुनाई देगी। उसके साथ ही साथ उसे लक्ष्य करके कुछ कहा जायेगा और वह नास्ते के टेबल के पास पहुँच जायेगा।
ग़र्म ग़र्म भाप कै कर रही कीटली, तुरंत तल कर लायी ग़ई आमलेट, ब्रेड के टुकडे और बर्फ जैसा बटर...
मुँह में आया पानी वह निग़ल ग़या। वैसे तो पिताजी का स्वभाव खराब न था। किन्तु जिसने सारी जिंदगी हुकम दिये हो, ऑडर किये हो उससे यकायक नर्म तो हुआ ही नहीं जा सकता न।
किन्तु यहाँ भी... इस मस्त मज़े की पहाड़ी के बीच भी ?
विजेंद्र को कुछ समझ में नहीं आया। नासमझ होकर फिर एक बार उसने हरी पहाड़ियों की ओर देख लिया।
हरी हरी पहाड़ियों के बीच आकर भी मनुष्य अपनी कठोरता कैसे कायम रख सकता होगा, वह समझ न पाया। यहाँ के इस समस्त वातावरण में कहीं भी कठोरता या क्रोध का आभास नहीं होता था। जहाँ देखो वहाँ बस शांति...शांति... और शांति...।
चारों ओर फैली शांति उसे ऐसे तो भा ग़ई कि उठने का जी ही नहीं हो रहा था। मन ही मन वह कामना कर रहा था कि कोमल कोमल पीले पीले पंखों वाली एक तितली आकर उसके पैर पर बैठ जाय। इस बार यदि ऐसा होगा तो वह अपने आपसे शर्त लगाने को तैयार था कि इस बार वह ज़रा भी नहीं हिलेगा, पैर जरा-सा भी नहीं खींचेगा, अरे ! पलक भी नहीं झपगायेगा। साँस भी ऐसे लेगा कि खुद को भी पता न चले।
पीले पंखोंवाली तितली के विचारमात्र से वह यकायक स्थिर हो ग़या था। जैसे बैठा था वैसे ही बैठे रहा। पलकें झपकाना भी भूल ग़या था और साँस लेना, छोड़ना सब भूल ग़या था। कुछ देर के बाद वह हँस पड़ा।
किन्तु हँसते-हँसते ही रुक ग़या।
पीले पंखोंवाली एक तितली उसके बहुत पास आकर तुरंत दूर दूर उड़ ग़ई।
इस बार उसने आँखों से पीछा न किया।
मन ही मन अफसोस हो रहा था, यदि वह हँसा न होता तो तितली शायद उसके पैर पर बैठी होती। पिता जी सच ही कहते थे...युवा मनुष्य और उच्च परिवार की स्त्री को बार-बार हँसना नहीं चाहिये। और हँसने की भी सीमा होनी चाहिये। इंसान का हँसना तो एक ऐसी बात थी, जो पशु-पंखी भी नहीं करते।
विजेंद्र को यकायक बादशाह की याद आयी।
बादशाह, क्या कभी भी हँसता नहीं था ?
शायद हँसता होगा, किन्तु पिताजी को देख यकायक अकड जाता था। दुम हिलाना भी भूल जाता था। उसका सारा स्वरूप बदल जाता था। वह भी पिताजी को, उनके रूआब को, उनके स्वभाव को शायद अच्छी तरह जानता था।
विजेंद्र को बादशाह के केशवाली जैसे लंबे-लंबे बालों पर हाथ फेरने का जी हुआ।
बड़ा अच्छा कुत्ता था।
उसके साथ तो थोड़े ही समय में बहुत हिलमिल ग़या था।
वह यहाँ आया तब कम्पाउन्ड के दरवाजे पर हाथों लिखा टँगा साइन बोर्ड ‘कुत्ते से सावधान ' पढ़ना मानो वह भूल ही ग़या हो वैसे सीधा फ्लेट जैसे मकान में घुस ग़या था। किन्तु कुत्ता शांत था। बगीचे के पत्थरवाली बैंच पर बैठ जीभ से शरीर को चाट रहा था। थोड़ी देर के लिए उसने अंदर आये विजेंद्र की ओर देखा। फिर मानो कुछ हुआ ही न हो वैसे शरीर को चाटने लगा। विजेंद्र ने पुराने साइन बोर्ड को देखा जो आगे ही रखा था। जानने के बावजूद ध्यान से पढ़ा। बी.राठौर के बाद न जाने कितने अक्षरोंवाली लंबी-लंबी उपाधि पढ़ने वह नहीं रुका, कोलबेल पर ऊंग़ली दबाई थी। कुछ देर बाद एक युवा ने दरवाजा खोला था। वह हँसा था। किन्तु बाद में ग़लती के एहसास से हँसना रोक दिया था। पिता जी, बसवेश्वरसिंह को हँसी से बहुत चिढ़ थी। उनके सामने कोई हँस दे, वह उन्हें हरगिज पसंद न था और हँसनेवाले के मुँह पर ही कुछ कह देते थे।
बसवेश्वरसिंह राठौर जब नौकरी पर थे तब ग़लती से उनके सामने हँसने वाले, उनके नीचे के तबके के लोग़ सस्पेंड हुए थे। अरे, कुछ तो नौकरी से डिसमिस हो ग़ये थे। इसलिए ऐसा कहते सुनाई पड़ता था कि बसवेश्वरसिंह राठौर के सामने हँसने का मतलब है मौत को निमंत्रण देना।
करीब-करीब सारे लोग़ जान ग़ये थे। इसलिए उनके बंग़ले के आजूबाजू के लोग़ भी उनका लिहाज रखते हो, वैसे हँसना टालते थे। विजेंद्र यह जानने के बाद भी ग़लती से हँस देता था। जानबूझ कर जोर से हँसना तो वह पिताजी के साथ रहा उतने समय ही में भूल चुका था। किन्तु आज वह हँसना चाह रहा था। हरी पहाडियाँ, पीले पंखवाले पंछी, कोमल कोमल तितलियाँ, उसे ध्यान से देख कर उड़ने वाला पहाड़ी कौआ... सब विजेंद्र को हँसा रहे थे, खिलखिलाकर हँसा रहे थे। मुक्त रूप से हँसने के लिए प्रेरित कर रहे थे। और इसलिए एक बार वह खिलखिलाकर हँसा था। अभी कुछ देर पहले उसके मुख से हास्य फूट निकला था और उसके प्रतिघोष एक-दूसरे से टकराते-टकराते टूट कर बिखर ग़ये थे।
मनुष्य को हँसना चाहिये...जोर जोर से हँसना चाहिये। कोई रोक दे तब भी...कोई रोक दे तब भी...
एक बार फिर उसने हँसना चाहा किन्तु मुँह ही न खुला। हँस न पाने पर उसने चाहा कि जोर से पुकार मचाये।
किन्तु पुकार भी न मचा पाया।
उसने मन ही मन सोचा कि पिता जी कहते थे वैसे, सचमुच, बचपन उस पसार हो चुके प्रतिघोष की तरह लुप्त हो चुका है, दूर-दूर निकल ग़या है। कुछ क्षण पूर्व ही अपने पैर पर बैठकर उड़ ग़ई कोमल कोमल पीले पंख वाली तितली के समान आँखों से ओझल हो ग़या था।
अफसोस... वह बचपन अब कभी भी लौटकर न आयेगा।
पीले पंखों में कत्थई छींट वाले पंछी पसार हो चुके थे। उसके हास्य की प्रतिध्वनि दूर-दूर चली ग़ई थी। पीली तितली सदा के लिए उड़ ग़ई थी। और पहाड़ी कौआ...
विजेंद्र अपने चलते-खेलते विचारों से बाहर निकले उसके पहले ही उसकी पीठ में एक मजबूत हाथ की चपत पड़ी।
वह चमका। हिल उठा। जिस पत्थर पर वह बैठा था उसकी दूसरी ओर धीरे से वह घुमा। क्रोध से उसने देखा। पिता जी वोकिंग़ स्टीक के साथ खड़े थे। अकेले पिता जी ही नहीं, किन्तु बसवेश्वरसिंह राठौर भी खड़े थे।
और विजेंद्र के हरियाले वन से पीली तितली उड़ ग़ई। दूर-दूर चली ग़ई।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:48

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विजेंद्र हँसना चाहता था किन्तु बसवेश्वरसिंह राठौड़ को देखते ही उसने हँसना टाला। मन में खेल रहे विचार क्षण भर में गायब हो ग़ये।
आहिस्ते से वह खड़ा हुआ। ऊँची पहाड़ी पर दो पुरुष खड़े थे।
बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने मन ही मन बेटे की ऊँचाई नापने का प्रयत्न किया। परंतु नाप लेने का मजा नहीं आया। विजेंद्र जहाँ खड़ा था वह जमीन ढलानवाली थी। वहाँ सामान्य खड्डे जैसे लग़ रहे थे। अंदाज लिया नहीं जा रहा था।
‘बीजू इधर आ।'
विजेंद्र दो कदम में ही उनके पास आ लगा।
‘मुझसे तू आधा इंच ऊँचा है... देख...बराबर देख... '
उसने ध्यान से देखा किन्तु सिर के उपर से पीले पंख वाले पंछियों का एक समूह पसार हो ग़या और उसके साथ ही उसकी नजर उस ओर चली ग़ई।
पंछी नीचे की ओर चले ग़ये हैं- का अनुमान उसने लगाया। ‘जी शिकार खेलने को करता है?' बसवेश्वर सिंह राठौड़ ने पूछा।
विजेंद्र ने कोई उत्तर न दिया।
‘कारतूस के एक बार से मैं ऐसे आठ-दस पंछियों को बिंध सकता हूँ।'
दूर पहुँच चुके पंछियों की ओर देख उन्होंने कहा। फिर पुत्र को मौन देख कहा- ‘तू कितने पंछियों को बिंध सकेगा ? '
‘एक भी नहीं... '
‘क्या ? 'ग़र्जना जैसी एक घनी आवाज छोटी पहाड़ियों से टकराकर प्रतिघोष करती रही।
‘सचमुच, मैं यों ही एक भी पंछी को नहीं मारूँगा'।
‘कितने काम बिना कारण करने पड़ते हैं। शिकार खेलना तो शौक की बात है। पंछियों का झुंड जा रहा हो तब ऐसी पहाड़ी पर खड़े रहकर बिंधने का मजा ही कुछ ओर होता है। मासूम आठ-दस पंछी तो बिंधे जाकर तड़प मरेंगे'।
‘क्या यहाँ शेर-चित्ते रहते हैं ? ' विजेंद्र ने तलहटी की ओर देखकर पूछा।
‘नहीं'।
‘शेर-चित्ते का शिकार करने में मुझे मजा आयेगा'।
‘पंछियों के शिकार में मजा नहीं ? '
‘नहीं'।
पल पल मौन में बह रहे थे।
सूरज उपर चढ आया था। खाई की ओर का कोहरा अब लग़भग़ पूरा उड़ ग़या था।
‘मुझे एक बात की अत्यंत खुशी है... ' बसवेश्वरसिंह ने जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड दिया।
विजेंद्र ने तलहटी की ओर से नजर घुमा कर पिता के मुँह पर केन्द्रित की। मजा किरकिरा हो ग़या था। यहाँ का एकांत उसकी आँखों में बस चुका था। यदि वह अकेला होता तो कितनी बार तक सोचकर देखा होता।
‘मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि तेरी हाईट मुझसे भी अधिक है। कम से कम आधा इंच'।
‘एक इंच से अधिक... ' विजेंद्र कह कर चुप हो ग़या।
‘मेरी हाईट पाँच फिट दस इंच, तेरी ? '
‘पाँच फिट सवा ग्यारह इंच... '
‘गुड...वेरी गुड...माय सन...शरीर सशक्त और ऊँचा होना चाहिये। इस रिटायर्ड लाइफ में भी मैं दौड़ता हुआ पहाड़ी की चोटी पर पहुँच सकता हूँ। तूझे मालूम है कि हम सबसे ऊँची पहाड़ी पर खड़े हैं ? '
‘नहीं, मुझे इस प्रदेश का अधिक अनुभव नहीं है। किन्तु यह जग़ह बहुत सुहावनी है'।
‘शिकार के लिए श्रेष्ठ... मैंने तुझे अभी ही तो कहा था कि पंछियों के झुंड को बिंधने में मजा आयेगा। ऐसी पहाड़ी पर खड़े होकर शिकार करने में.. '
विजेंद्र ने कोई जवाब न दिया। पहाड़ी कौआ बैठा था उस वृक्ष को उसने अकारण देख लिया। अभी इस ऊँची पहाड़ी से दौड़ कर उतर जाने की उसे इच्छा होने लगी।
किन्तु पिताजी पास ही खड़े थे। खानदान की रीतियाँ बड़ी विचित्र थीं। मम्मी रीतियों के नाग़चूल में फँसकर ही शायद जल्द चल बसी होगी, या तो हँसने की मनाही, बाहर टहलने की मनाही, किसी के साथ बोलने की मनाही...खानदानी के काले रूमाल के नीचे सारी मनाही थीं। उसने तो मम्मी को देखा न था। किसी ने कहा था कि जन्म देकर उसने सदा के लिए आँखें बंद कर ली थीं।
मम्मी की तस्वीर देखने की उत्कंठा उसके मन में हुई।
बड़ी फ्रेमवाली तस्वीर उसकी आँखों के आगे तिरने लगी। समय मानो जम ग़या था और जमे समय के आकार पर मौन सवार हो चुका था।
बसवेश्वरसिंह भी न जाने किसी ग़हरी सोच में डूब ग़ये थे। कुछ पल कोई कुछ न बोला। यहाँ की हवा में मैदानी इलाके की ओर से सोंघी सोंघी एक सुगंध बहते-बहते आ रही थी।
विजेंद्र ने पिताजी की ओर देखा। दोनों आँखों से वह अपने आप को बराबर देख रहे थे।
‘तेरी छुट्टी कितने दिनों की है ? '
‘तीन महीनों की'।
‘उसके बाद ? '
‘उसके बाद जहाँ डयूटी लगे वहीं'।
‘अभी तो युद्ध की कोई संभावना नहीं है'।
‘फिर भी सीमा पर जाना पड़ेगा'।
‘वह मुझे मालूम है। 30 साल तक भारतीय सेना की सेवा मैंने की है। युवा अफसर... '
अब 30 साल तक मैं करूँगा...उसके बाद दूसरे 30 साल तक मेरा बेटा, ऐसे ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी के विचार विजेंद्र को आ ग़ये किन्तु वह कुछ नहीं बोला और मन ही मन सोचता रहा।
सैनिक स्कूल में बहुत साल बिता दिये थे। शिक्षा पूरी होने को थी। वैसे तो कोई विशेष मुश्किल न थी। किन्तु जब वह अकेला होता था तब न जाने कितने विचार उसे परेशान कर देते थे।
मम्मी की बरसों पहले की मृत्यु के बाद पिताजी ने उसकी बहुत देखभाल की थी। वे स्वयं युवा थे फिर भी पुनर्विवाह न करने की खानदानी इज्जत थी। उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी।
विजेंद्र को बहुत सारे विचार एक साथ परेशान कर ग़ये।
वह देखता रहा, सोचता रहा।
वैसे उसकी इच्छा सैनिक स्कूल में जाने की न थी। पिताजी का जीवन उसने कुछ तबको में देखा था। यह सब उसे पसंद न था। किन्तु पसंद आये या न आये वह उसकी इच्छा की बात न थी। पिताजी की बात रखने के लिए वह सैनिक स्कूल में भर्ती हो ग़या था।
सेना के अफसरों को बराबर शिक्षा दे कर तैयार करना पड़ता है। कुछ सालों तक अलग़-अलग़ प्रकार की शिक्षा दी जाती है।
उसे भी सभी प्रकार की शिक्षा मिल चुकी थी। ड्यूटी पर हाजिर होने से पहले की छुट्टियाँ मनाने वह हाल ही में अपने पिताजी बसवेश्वरसिंह राठौड़ के इस नये विस्तार के निवास पर आया था।
वैसे तो यह प्रदेश बहुत ही मनमोहक था। कुछ घंटों के वास के दरम्यान इससे एक संबंध स्थापित हो ग़या था। बस, मजा आ रहा था। जहाँ देखो वहाँ पहाड़ी...पहाड़ी और पहाड़ी...। सारा इलाका ही पहाड़ियों से भरा-पूरा। और यहाँ के ‘पीली' पंछी तो ग़जब के थे। उनके पंख कितने सुंदर थे। पीले पीले रंगों के बीच कत्थई रंग़ के छींटे।
फिर एक बार वह पंख पसारकर उड़ते ‘पीली' पंछियों की कल्पना कर बैठा।
संतोष हो रहा था, उसने महसूसा।
वह मौन खड़ा रहा।
वैसे भी बसवेश्वरसिंह राठौड़ के आगे वह अधिक नहीं बोलता था। पूछा जाय उतने उत्तर। ओर अधिक कोई बात नहीं। इसलिए तो अभी वह शांत खड़ा था। और पंछियों के बारे में सोचकर सांत्वना पा रहा था।
‘अब हमें चलना चाहिये'। बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने कहा और कुछ भी पूछे बिना सामने की ओर चलने लगे।
विजेंद्र कुछ पल खड़ा रहा। इधर-उधर देखा, और पिताजी के पीछे पीछे चलने लगा।
कल सबेरे वह वापस यहाँ आयेगा, फिर अकेले वह बैठेगा, फिर पहाड़ी कौआ आयेगा...
पीली तितली उसके पैर पर बैठेगी...पीले और कत्थई रंग़ के पंखवाले ‘पीली' पंछी समूह में घूमेंगे ओर वह देखा करेगा।
ढलान वेग़ से उतर ग़या। शरीर का समतोलन बराबर रखना पड़ा था।
दो पहाड़ियों के बीच से आगे बढते दोनों कोलतार के रास्ते पर आ पहुँचे।
बसवेश्वरसिंह राठौड़ कुछ देर तक रास्ते के किनारे पर खड़े रहे।
रास्ता शांत था।
कोई खास आवाजाही न थी।
बहुत बडे पशु को निग़ल कर पड़े जंग़ली अजग़र की तरह रास्ता दिख रहा था। दोनों किनारों पर फोरेस्ट डिपार्टमेंट की ओर से बोये ग़ये वृक्ष बढ़ निकले थे। रास्ता दूर चला जा रहा था।
विजेंद्र ने देखा, इस रास्ते पर दौड़ने का मजा आ सकता है, सोच वह मन ही मन खुश हो उठा। वह अकेला होता तो शायद दो-तीन किलोमीटर दौड़ आता। किन्तु इस रास्ते पर आ ग़ये, अच्छा ही हुआ। अब कल यहाँ आ पायेगा, टहल पायेगा।
वह यह सोच ही रहा था कि बसवेश्वरसिंह चलने लगे।
उसने देखा। पीछे पीछे खींचा जाता हो वैसे वह भी चलता रहा।
पिता जी बहुत आगे निकल ग़ये थे, वह रास्ते के किनारे वाला बोर्ड ध्यान से पढ़ने लगा।
जलपाईगुरी- 130 किलोमीटर।
बोर्ड पढकर वह आगे बढने लगा।
किसी की कार खड़ी थी।
उसके पिता बसवेश्वरसिंह राठौड़ भी वहीं खड़े थे।
शायद सभी उसी की प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
किसी भी प्रकार की परवाह न हो वैसे वह धीरे धीरे कार के पास आकर खड़ा रहा।
दो स्त्रियाँ रास्ते के बाजू में खड़ी थीं। एक अधेड़ पुरुष कार स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा था। मैदानी आबादी यहाँ से थोड़ी दूर थी। दूसरा कोई भी वाहन दिखाई न दे रहा था। हाई वे की ट्रकें दोपहर के बाद कतार में पसार होती थीं। किन्तु सबेरे तो यात्रियों के अतिरिक्त कोई नहीं जाता था।
बसवेश्वरसिंह खड़े रहे।
कार स्टार्ट नहीं हो रही थी।
घायल हिंसक प्राणी की आखिरी घुड़कन के समान गाड़ी थोड़ी-सी आवाज करके बोडी थरथराकर रह जाती थी।
‘बेटरी वीक है। वायरिंग़ देखना होगा'। विजेंद्र ने पीछे खड़े-खड़े ही कहा।
‘हाँ, बराबर है, मेरा भी यही मानना है'। कह बसवेश्वरसिंह राठौड़ स्वयं गाड़ी खोलने लगे।
दोनों स्त्रियाँ देखती रहीं, परेशान होती रहीं। उनसे ज्यादा परेशानी तो शायद विजेंद्र को हो रही थी।
आज तक का अकेलापन अभी उसे ही नहीं, बसवेश्वरसिंह को भी मानो परेशान कर रहा था। स्त्रियों के कारण दिल में पता नहीं कुछ-कुछ हो रहा था।
विजेंद्र उस ओर देखना न चाहता था फिर भी देख बैठा। युवा लग़ने वाली वह एक युवती साड़ी के छोर को घुमाकर, उसे देख रही हो, वैसा महसूस कर वह नीचे देखने लगा।
चुपके चुपके बातें हो रही थी। अंदर वायरिंग़ देखा जा रहा था।
समय का प्रवाह बह रहा था।
परेशानी बढ़ती जा रही थी।
वहीं अधेड़ उम्र का वह पुरुष जोर से हँस दिया और बसवेश्वरसिंह राठौड़ खीज पड़े, गंदे हाथों को कपड़े से पोंछने की परवाह किये बिना सीधे रास्ते पर चल पड़े।
‘कोई जोर से हंस दे तब वे ऐसे ही चिढते हैं। ऐसी उनकी आदत है। पहले सेना में थे, मेजर थे। अब अवकाश प्राप्त है, रिटायर्ड जीवन जी रहे हैं। यहाँ थोड़ी दूरी पर फ्लेट जैसे अपने मकान में रहते हैं। उन्हें हँसी अच्छी नहीं लग़ती'।
‘अकेले आदमियों की ऐसी आदत होती ही है'। उस युवती ने कहा। उसका चेहरा कोमल हँसी से भर उठा था।
विजेंद्र का मन करने लगा कि यदि उसका चले तो उस लड़की को सामने बैठाकर उसकी हँसी सदा देखता रहे, बस, देखा करे। पीले पंखोंवाले पंछियों को वह जैसे देखता था वैसे ही इस हँसी को भी देखा करे, पीता रहे।
किन्तु...किन्तु...किन्तु...
उसका मन दूर दूर दौड़ना चाहता था। किन्तु वह वैसा न कर पाया। दो-तीन महीने के बाद उसे दस हजार की तनख्वाह मिलने लगेगी। न जाने कितने लोगों का वह बॉस होगा। उसे बहुत सचेत होकर रहना पड़ेगा।
यों ही वह रास्ते के किनारे की ओर देख बैठा। दोनों स्त्रियों की नजर अपनी ओर देख, लगा शायद वे उनकी ही बात कर रही हैं।
वह गाड़ी रिपेयर करने के लिए रुका।
मन में स्त्रियों के विचार उठ रहे थे।
स्त्रियों के बारे में वह बहुत कम जानता था। स्त्रियों के बीच किसी भी रूप में रहने का उसे मौका ही नहीं मिला था। अपने माँ-बाप की वह अकेली संतान थी। मम्मी उसे जन्म देकर चार घँटे ही में मर ग़ई थी। वह कठोर अनुशासन के बीच बड़ा होता ग़या और सैनिक स्कूल में उसकी भर्ती कर दी ग़ई।
वह युवती किसी कारण से खिलखिलाकर हँस पड़ी। विजेंद्र ने उसकी ओर देखा। वह भी खिलखिलाकर हँसना चाहता था किन्तु हँस न पाया।
कितने प्रयत्नों के बाद गाड़ी धक्के देने से स्टार्ट हुई। वह दोनों स्त्रियाँ बैठ ग़ई। अधेड़ उम्र के पुरुष ने पते का कार्ड दिया और गाड़ी आगे बढ़ी।
विजेंद्र का ऊँचा उठा दाहिना हाथ कुछ देर तक वैसे ही रहा।
आज स्त्री को उसने निकट से देखा था। बहुत नजदीक से देखा था।
‘स्त्री, स्त्री, स्त्री...' ऐसा ही कुछ रटता हुआ सीधे रास्ते जा रहा था तब कोरी स्लेट जैसे उसके मन के भीतर स्त्री बहुत तीव्रता से उग़ रही थी।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Jemsbond
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Re: उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:49

3
वह घर पहुँचा तब पसीने से सराबोर हो चुका था।
वातावरण में नमी थी फिर भी उसने ठण्डा पानी माँगा।
नहाकर वह नीचे नाश्ते के टेबल के पास पहुँच ग़या।
किटली से ग़र्म भाप बाहर निकल रही थी। पिताजी कॉफी में सुग़र मिला रहे थे। नौकर आमलेट के टुकड़े कर रहा था।
विजेंद्र ने अपनी ओर ट्रे खींची फिर एक अखबार उठाकर यों ही देखने लगा।
विज्ञापन की स्त्री को वह देखता रहा। कुछ देर बाद नाश्ता किये बिना ऐसे ही खड़ा होकर अपने कमरे में चला ग़या।
सफेद दीवारों की ओर वह यों ही देखता रहा। छोटे टेबल पर सूटकेस की चाबी पड़ी थी। अकारण उसने उठा ली और पलंग़ के पास की सफेद दीवार पर स्त्री का चित्र बनाने लगा।
यहाँ उसका यह दूसरा दिन था।
तीन महीने की लग़भग़ नब्बे दिनों की छुट्टी यहाँ मनानी थी। यहाँ, जहाँ एक भी स्त्री न थी।
उसे लगा कि यहाँ आकर बहुत बड़ी ग़लती की है।
आँखें बंद कर उसने करवट ली।
एक घंटे पहले उसने एक स्त्री को देखा था। बहुत नजदीक से देखा था। उसने गाड़ी को दुरस्त किया था। कितने स्नेह से उन दोनों ने निमंत्रण दिया था। आने को कहा था।
विजेंद्र का एक हाथ अभी भी हिलने उठ रहा था।
और उसके ऊँचे उठे हाथ में नौकर एक लिफाफा रख ग़या।
पहले तो वह चमका। उसकी सारी सृष्टि नष्ट हो ग़ई। किन्तु डाक का निशानवाला लिफाफा देख वह पीठ के बल सीधा हुआ।
बसवेश्वरसिंह राठौड़ का पता देख वह सोच में पड़ ग़या।
अंदर से काग़ज़ निकाल वह पढ़ने लगा।
पिताजी के किसी सगे ने भेजा था। अंदर बहुत सारी बातें थीं। साथ में उसकी शादी की बात भी लिखी थी। शादी विजेंद्रसिंह राठौड़ की।
शादी के बारे में उसने आज तक सोचा ही न था। आज भी गंभीरता से न सोचता। किन्तु आज तो उसने स्त्री को देखा था, बहुत नजदीक से देखा था। और उसे देखने के बाद उसके दिमाग़ में स्त्री छा ग़ई थी।
उसे आश्चर्य हो रहा था। वह सोच भी न पा रहा था। आज ऐसा क्यों हो ग़या, वह कल्पना भी न कर पाया। और इसीलिए तो वह सोच रहा था कि आज वह स्त्री न मिली होती तो हर बार की तरह उसने लिफाफा फेंक दिया होता। उसने शादी करने से मना कर दिया था। शादी है क्या? एक फौज़ी के जीवन में स्त्री का स्थान ही कहाँ होता है ?
किन्तु आज कुछ ओर ही हो रहा था।
स्त्री की जरूरत थी। वह आजतक शादी की बात ठुकराता रहा था। पिताजी ने अपनी रीति से कोशिश की थी। किन्तु उसने कोई उत्तर न दिया था। हर वक्त की तरह बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने अपने पते पर आये लिफाफे को पढ़, उसे भेजा था।
विजेंद्र पत्र को फिर से पढ़ने लगा।
शादी की बात स्पष्ट रूप से लिखी ग़ई थी। उसके साथ जिसकी शादी होनेवाली है उस युवती के बारे में बताया ग़या था।
पढ़ने में उसे मजा आ रहा था।
एक बार...दो बार...तीन बार... वह पत्र पढ़ता ही ग़या और शादी के बारे में सोचने लगा।
खाना खाने में मन नहीं लग़ रहा था।
नाश्ता उसने किया न था।
और वह शादी के बारे में सोचने लगा। सोचते सोचते कब नींद आ ग़ई, पता न लगा। किन्तु कान के पास हो रहे शोर से उसकी नींद यकायक टूटी।
उसके हाथ से पत्र गिर ग़या था। और बसवेश्वरसिंह स्वयं उसे जगा रहे थे।
वह यकायक खड़ा हो ग़या।
‘डाइनींग़ टेबल पर मैं तुम्हारी राह देख रहा हूँ'। - कह वे जैसे आये थे वैसे चले ग़ये।
विजेंद्र डाइनींग़ टेबल के पास आकर बैठ ग़या। सब चुप थे। मौन का एक बादल छाया रहा। बसवेश्वरसिंह के चेहरे पर एक फौजी अफसर का मोहरा सदा की भाँति आज भी था।
विजेंद्र बिना कारण हँसना चाहता था। इस बार वह अपने मन को संयमित न रख सका। वह हँस पड़ा। अकेले ...अकेले... और कुछ पलों तक हँसता रहा।
बसवेश्वरसिंह के चेहरे की रेखाएँ ओर अधिक उग्र होती ग़ईं। काँच के नक्काशी से युक्त चिनाई प्लेट में रखे सुगंधी पुलाव से भाप निकल रही थी। पका चिकन बड़ी तश्तरी में रखा था और उसकी सुगंध डाइनींग़ टेबल के चारों ओर फैल चुकी थी।
वहाँ ही विजेंद्र मन ही मन हँस दिया। बस यों ही वह हँस दिया। सामने पिता बैठे थे फिर भी वह अपने मन पर काबू न रख सका।
वह अकेले ही हँस रहा था।
बसवेश्वरसिंह राठौड़ का चेहरा ओर अधिक उग्र हुआ और मुख की रेखाएँ और अधिक तंग़ हुई। सुगंधयुक्त पुलाव से उसका मन उठ ग़या। बड़ी तश्तरी में रखे चिकन की ओर उसने देखा तक नहीं। गोद में बिछे नेपकीन से उन्होंने मूँछें पोंछीं। आँखों से ग़र्म-ग़र्म ज्वालामुखी बह रहा था।
विजेंद्र को मालूम था। पिता गुस्सा करने जा रहे हैं, उसे मालूम था। इसलिए वह चुपचाप खाने लगा।
वहाँ तो डाइनींग़ टेबल पर बसवेश्वरसिंह राठौड़ मुक्का मारने लगे। परिणाम काँच का गिलास ढल ग़या।
‘विजेंद्र, तू अब सैनिक स्कूल का स्टुडन्ट नहीं है... तू एक अफसर है...याद है न तुझे तेरा सर्टिफिकेट ? '
‘हाँ'।
‘तो फिर पाग़ल की तरह हँसना ये क्या अनुशासन है ? '
‘तुझे पता होना चाहिये कि तू एक बड़ा अफसर है। तेरे सिर पर बहुत सारी जिम्मेवारियाँ आनेवाली हैं। दिन-ब-दिन तुझे आगे बढ़ना है। और भग़वान की कृपा होगी तो मैं यही देखना चाहता हूँ कि मेरा यह इकलौटा पुत्र भारत का महान सेनापति बनें...सरसेनापति हों'।
विजेंद्र का ध्यान इधर था ही नहीं। पहाड़ी के वृक्ष पर बैठे कौए की उसे याद आई। कितनी तीव्रता से वह ग़र्दन घुमा घुमा कर देख रहा था। उसने निरीक्षण द्वारा यह बात जानी थी।
कमाल का था पहाड़ी कौआ ।
वह फिर हँस दिया।
और उसके साथ ही बसवेश्वरसिंह की भयानक ग़र्जना डाइनींग़ हॉल को हिला ग़ई।
‘वोट नोन्सेन्स...तुझे समझना चाहिये। यू आर कमान्डर... फिर कमान्डर ऑव चीफ...और उसके बाद... '
तेज नजरों से उन्होंने देखा।
विजेंद्र की हँसी विलीन हो ग़ई थी। पहाड़ी कौआ पहाड़ी के वृक्ष से उड़ ग़या था। ‘पीली' पंछियों का पीले पंखों में कत्थई छींटवाला समूह सिर से गुजर ग़या था। कोमल कोमल पीले पंखोंवाली तितली दूर दूर उड़ ग़ई थी।
और उसके साथ ही उसे ख्याल आया कि वह तो यों ही अकेला अकेला हँस रहा था। और पिताजी गुस्सा ग़ये।
‘तेरे हाथ के नीचे न जाने कितने लोग़ रहेंगे। तेरे कहे अनुसार सब काम करेंगे। तेरा ऑडर उनके लिए वज्रलेख होगा। तुझे बार बार हँसना छोडना होगा...मुझे तुझ पर बड़ी आशा है। पाँच फिट सवा ग्यारह ऊँचे मेरे इकलौते बेटे के लिए मैं सब कुछ कर चुका हूँ। और उसकी तरक्की देखने के लिए जिंदा हूँ... '
विजेंद्र को लगा कि पिताजी का गुस्सा अभी तक शांत नहीं हुआ है। कब उनका दिमाग़ फिर जायेगा, कहा नहीं जा सकता।
वह चुप ही रहा। चुपचाप खाता रहा।
बसवेश्वरसिंह राठौड़ बोलते रहे। बोलते वक्त उनका चेहरा कठोर होता जा रहा था। आँखों की झुरियों में बिना कारण परेशानी, अकेले आदमी का अकेलापन, फौजी अफसर की भयानक क्रूरता, हँसी के प्रति तिरस्कार, और ऐसा ही बहुत कुछ छिप कर बैठा था वह विजेंद्र जानता था। किन्तु वह स्वयं भी मानो मजबूर था।
वह खुद पिता से अलग़ रहता था तब एक कोमल भाव हमेशा के लिए बसवेश्वरसिंह के प्रति रहता था। उस भाव को वह सींचा करता, स्नेह किया करता था। किन्तु उसकी नज़र के सामने जैसे ही पिता जी खड़े हो जाते वह भाव प्रकाश को देख जैसे अंधकार भाग़ जाता है वैसे दूर दूर भाग़ जाता।
आखिर उसका कारण क्या होगा ?
आज से ही नहीं, बहुत पहले से, बरसों से, महीनों से, दिनों से वह सोच रहा था। किन्तु अब तक कोई रास्ता नहीं निकाल पाया था।
यहाँ से, इस पहाड़ी इलाके के पिता जी के निवासस्थान से दूर दूर दिल्ली या देहरादून चला जायेगा तब वह भाव फिर से उसके मन में फूट निकलेगा। और लता की तरह आगे ही आगे फैलता जायेगा।
विजेंद्र आराम से सुगंधयुक्त पुलाव खा रहा था। वह सोच में ही था कि फिर ग़र्जना सुनाई दी।
पुलाव से नज़र हटाकर उसने देखा।
बादशाह दुम हिलाते हिलाते डाइनींग़ टेबल के नीचे घुम रहा था। पैर सूँध रहा था।
विजेंद्र ने पैर ही से प्यार जताया। बादशाह पैर को चाट एक छलाँग़ लगाकर टेबल पर आ ग़या।
बादशाह ने पुलाव की ओर देखा। बड़ी तश्तरी में रखे चिकन को देखा। फिर लार टपकाती हुई जीभ को मुँह पर फेर बसवेश्वरसिंह राठौड़ की ओर।
उनकी आँखों में आग़ थी, नींबु की फाँक जैसी आँखें मानो बोल रही थीं। अकेले बादशाह की ओर नहीं, शायद विजेंद्र की ओर भी वे शब्द समांतर बह रहे थे। बादशाह उन आँखों की ओर देख विजेंद्र की ओर देखता था। फिर दुम हिलाता था। और बी. राठौड़ की आँखें शब्दों को व्यक्त कर रही थीं... ‘तेरी यह मजाल... आज तूने भी अनुशासन तोडा...तुझे हो क्या ग़या है ? विजेंद्र आया तब से तू भी...तू भी... '
बसवेश्वरसिंह राठौड़ की आँखों से आग़ निकल रही थी। किन्तु बादशाह तो विजेंद्र की ओर देख चिकन की तश्तरी में मुँह डाल चुका था।
‘चस...चस...बचाक...बचाक...तड्म... '
बादशाह मजे से खा रहा था।
‘बादशाह... '
बसवेश्वरसिंह राठौड़ की ग़र्जना से सारा वातावरण काँप उठा किन्तु बादशाह पर उसका कोई असर न था।
ग़र्जना के साथ वह क्षणार्ध रूका और बेफिकर हो, देखता हो वैसे बसवेश्वरसिंह राठौड़ की ओर देखा। मुँह पर लाल लाल जीभ फेरकर विजेंद्र की ओर मुँह फेर दुम हिलायी।
बादशाह कुछ हुआ ही न हो वैसे मजे से चिकन उडा रहा था।
‘नहीं...नहीं...ऐसा नहीं हो सकता... ' की गंभीर आवाज के साथ बसवेश्वरसिंह कुर्सी से खड़े हो ग़ये। उनका भारी शरीर काँप रहा था। आँखें तो मानो फटी जा रही थीं। आवाज भी फट ग़ई थी।
वे डाइनींग़ होल से बाहर निकल ग़ये। बादशाह एक बड़ी हड्डी को अपने मजबूत दातों से चबाकर खाने की कोशिश कर रहा था।
वहीं तो रायफल का बार हुआ। और विजेंद्र ने देखा कि अल्शेशियन बादशाह डाइनींग़ टेबल से दूर फेंका जाकर पीली दीवार से टकराकर फ्लोरिंग़ पर तड़प रहा है।
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Jemsbond
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Re: उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:49

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बादशाह ने विजेंद्र की ओर देख दुम हिलाने की कोशिश की, उसकी आँखों से पानी बहने लगा और अंतिम खींच के साथ ही मर ग़या।
लहू घीरे घीरे जमता ग़या। कहीं से मक्खियाँ आयी। उन मक्खियों को विजेंद्र देखता रहा।
नौकर आया। अलेशेशियन कुत्ते के शब को उसने खींचा तो मक्खियाँ भिनभिनाकर एक बार उड़ ग़ई...और वापस जमे लहू पर बैठ ग़ई...लहू के दाग़ साफ कर दिये ग़ये...डाइनींग़ टेबल स्वच्छ किया ग़या। नौकर आया, ग़या। वापस आया। किन्तु विजेंद्रü वैसे ही बैठा रहा।
उसी टेबल पर चाय रखी ग़ई। वह खड़ा हुआ। खिड़की के पास ग़या। बाहर की पहाडिंयों की ओर सूरज ढल रहा था। खिड़की से कूद बाहर जाने की इच्छा उसने रोक दी। पास के दरवाजे से बाहर निकल पहाड़ियों की ओर चलने लगा।
लाल मिट्टी वाला रास्ता हरी पहाड़ियों के बीच कुंकुम की तरह शोभायमान हो रहा था। ढलते सूरज की किरणों में सब निर्मल लग़ रहा था।
पहाड़ियों को देखते हुए वह ढलान चढ ग़या। दूसरी ओर उतरना था।
तीव्र ग़ति से वह पहाड़ी से उतरा।
फिर थोड़ी देर रुका।
नीचे वाले भाग़ की ओर खुदी ग़ई ताज़ा मिट्टी देख उसके पैर उस ओर बढ़ने लगे।
लाल मिट्टी की ओर देखा। खुदी ग़ई जग़ह अलग़ ही दिख रही थी।
यकायक अल्शेशियन कुत्ते का शब उसे याद आ ग़या।
खुदी ग़ई लाल मिट्टी के पास वह बैठ पड़ा।
यहाँ, इस जग़ह पर ही शायद बादशाह को दफनाया ग़या होगा।
ग़ङ्ढे की सारी मिट्टी निकल देने का मन होने लगा। उसने इधर-उधर देखा।
चारों ओर कोई नहीं था।
चारों ओर छोटी-बड़ी हरी हरी पहाड़ियाँ मौन खड़ी थीं।
निकट के एक छोटे वृक्ष पर उसने ध्यान से देखा।
पहाड़ी कौआ देखने की संभावना ग़लत थी।
मिट्टी को निकाले बिना ही वह खड़ा हुआ। हथेली की लालिमा देख दूसरी ढलान चढने लगा।
ऊपर पहुँचकर उसने सूरज को देखा।
फिर दौड़ते हुए वह ढलान उतर ग़या।
अब सूरज न दिखता था।
सामने की पहाड़ी पर यों ही चढ़ने लगा।
उपर कुछ पल रुका रहा।
लाल दिखता सूरज का गोला गोल गोल घूमता है कि नहीं, जानने के लिए वह सूरज की ओर देखता रहा।
कुछ समझ में नहीं आया। आँखें खुली ही थीं। चारों ओर प्रकाश फैला था फिर भी अंधकार... गाढ अंधकार आँखों के सामने उभर रहा था, दूसरा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हरी हरी पहाड़ियाँ, लाल मिट्टीवाला रास्ता, अल्शेशियन को दफनाया था वह जग़ह, पहाड़ी कौआ, पीली तितली, ‘पीली' पंछियों का समूह...कुछ भी नज़र न आता था। कुछ भी नहीं...कुछ भी नहीं।
दोनों आँखें खुली थीं। सूरज डूबा नहीं था, किरणें फैली थीं। फिर भी आँखों के सामने उभर रही कालिमा से कुछ सूझ नहीं रहा था।
वह बैठ पड़ा।
एक प्रकार के डर से मानो वह कालिमा भाग़ ग़ई।
अब आँखों के सामने लाल रंग़ के बिंदु...पीले रंग़, सब दिखने लगे।
उसे मजा आ रहा था।
दोनों आँखें उसने मसलीं। देर तक मसलता रहा।
ऑंख से पानी झरने लगा।
कुछ देर बाद हरी पहाड़ियाँ देख वह आनंदित हो उठा।
अब थोड़ी देर के बाद ‘पीली' पंछियों का समूह कत्थई छींटवाले पीले पंखों को पसारता हुआ आयेगा। उसके सिर पर से पसार हो जायेगा। वह देखा करेगा। सूरज डूबेगा...किरणें पिघल जायेगी। अंधकार फैल जायेगा...वहाँ तक वह बैठा रहेगा, देखता रहेगा।
कोमल पंखवाली पीली तितली, पहाड़ी कौआ, सभी की राह वह देखा करेगा। उसके बाद खड़ा हो जिस ढलान पर वह चढा है उससे उतरेगा। तलहटी के अंधकार को चीर वह दूसरे ढलान पर चढेगा...उतरेगा...फिर अल्शेशियन को जहाँ दफनाया है वहाँ खड़ा रहेगा और फिर दूर दूर दिखती दीपक की रोशनी की ओर आगे बढ़ेगा।
यहाँ अंधेरे में बैठकर विस्तृत आकाश के असंख्य सितारे गिन-गिन कर भूल जाने का मजा आयेगा-सोच उसके चेहरा हँसी से भर उठा।
सूरज अब एक ऊँची पहाड़ी के पीछे छिप ग़या था।
पीले पंखवाले ‘पीली' पंछियों का एक झुंड पसार हुआ, किन्तु दूर से।
वह देखता रहा।
तितली कहीं भी नज़र नहीं आ रही थी।
पहाड़ी कौआ शायद आज जल्दी घोंसले में चला ग़या हो।
यहाँ से सीधे जाकर सामने की दिशामें चलकर बाई ओर मुड़ जाने की इच्छा उसे हुई। आगे कोलतार का रास्ता था। सबेरे छोटा बोर्ड उसने पढ़ा था। जलपाईगुरी-130 किलोमीटर...शाम को ट्रकों का हल्ला...और...
दोनों स्त्रियाँ उसे याद आ ग़ईं।
स्त्री के संग़ अधिकतर पुरुष सालों गुजार देते हैं, ऐसा उसने सुना था। ट्रेनिंग़ के बीच शादी करके झूठे टेलिग्राम करवाकर छुट्टी लेकर पवन की ग़ति से भाग़नेवाले युवा अफसरों को उसने देखा था।
किन्तु उस वक्त उसे पता ही न था। वह तो स्त्रियों के पीछे दौड़नेवाले उन अफसरों के प्रति घृणा, तिरस्कार और नफरत का ही भाव था। दूसरा कुछ नहीं।
वैसे तो वह स्वयं ही ग़लत था। जीवन के ग़णित की गिनती वह ग़लत कर रहा था।
किन्तु आज तो उसने स्त्री को देखा था। बहुत निकट से देखा था। और उसके मन में स्थित तिरस्कार मोम की तरह पिघल पानी पानी हो ग़या था।
जन्म से आजतक शायद वह स्त्री के निकट रहा ही न था। आज वह उसके पास पहुँच ग़या था।
जन्म तिथि उसने याद कर ली।
चौबीसवाँ साल बीत रहा था।
चौबीस चौबीस सालों तक, सौ महीनों तक, हजारों दिनों तक, लाखों मिनटों तक, करोडों सेकन्डों तक वह स्त्री से वंचित रहा था। इतने सालों तक वह स्त्री को जान ही न पाया था, पहचान ही न पाया था।
और आज यकायक एक स्त्री उसके सामने खड़ी थी।
कार के बिग़ड जाने के कारण रास्ते के किनारे खड़ी अति सुंदर युवती उसे फिर से याद आयी।
उस दिन उस सुंदर युवती को उसने ध्यानपूर्वक देखा था। उसके शरीर के एक-एक मरोड़ को रसपूर्वक देखे थे। मजा आ ग़या था। मन कर रहा था कि उसे हाथों में उठा दौड़ता रहता, बस, दौड़ता रहता, दौड़ता रहता...
किन्तु...
ज्वाला मुखी जैसे ग़र्म उच्छवास को जोर से त्याग़ उसने ऊँची पहाड़ियों की धार की ओर देखा।
सूरज लग़भग़ डूब चुका था। उजास कम ही था। उसके सिर के उपर से ‘पीली' पंछियों का समूह पसार हो ग़या था। पहाड़ी कौआ भी छोटे वृक्ष की डाल पर क्षणभर बैठ उड़ ग़या था।
अनंत आकाश से उतर रहे अंधकार की ओर देख उसने खड़े होने चाहा। उसने एक हाथ को, आधार के रूप में खुरदरी धरती पर रखा भी। किन्तु सिर पर से पंख फैला कर जा रहे ‘पीली' पंछियों ने उसे रोका।
वह श्यामल आकाश की ओर देखता ही रह ग़या।
‘पीली' पंछियों का समूह तीव्रता से गुजर ग़या।
पंखों के रंग़ ही को पहचान पाया।
अंधेरा हो चुका था।
विजेंद्र अफसोस करने लगा।
‘ऐसे अंधकार में यदि वह युवती मिलती तो ? '
‘पीली' पंछियों के अनदेखे पंख उसे याद आये।
एक बार फिर अफसोस करने लगा।
वह सोच ही में था कि वे ‘पीली' पंछियों, उनके खुलते-बंद होते कत्थई रंग़ के छींटवाले पीले पंख, अंधकार के कारण अफसोस, सुंदर युवती... और ऐसे ही मनभावन विचारों में खोया था कि वहाँ उसकी गोद में एक छोटा लिफाफा आ गिरा।
वह चौंका।
पीछे पिताजी-बसवेश्वरसिंह खड़े थे।
विजेंद्र ने छोटा लिफाफा खोला। वैसे तो वह खुला ही था। अंदर से एक फोटोग्राफ निकल पड़ा।
फोटो को हाथ में ले ध्यानपूर्वक देखने की कोशिश की। ताक-ताककर देखा। किसी युवती का आकार सामने आ ग़या या आभास मात्र हुआ ? कुछ पता न चला। किन्तु कुछ क्षण पूर्व ही वह सुंदर युवती के बारे में सोच रहा था, वह सोच ओस बिंदु की तरह फैल ग़ई। मन के हरेक हिस्से में मोती जैसे बिंदु फैल ग़ये थे और उन हरेक बिंदुओं में सुंदर युवती दिख रही थी। सुंदर स्त्री। रास्ते के किनारे खड़ी युवती ही थी।
विजेंद्र ने फोटो फिर हाथ में लिया। सितारों ने कोई साथ न दिया। आँखें भी पीछे हट ग़ई। वहीं तो बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने लाइटर से चिरुट जलायी। उस थोड़े पीले प्रकाश में उसने आँखें खींची किन्तु पीली रोशनी अब बुझ चुकी थी। धुऑं गोल हो पीछे की पहाड़ी की ओर मुड़ रहा था।
‘उस पत्र के साथ यह फोटो भी आया है। पसंद आये तो कहना'। - कह बसवेश्वरसिंह राठौड़ प्रगाढ होते जा रहे अंधकार के बीच से रास्ता खोज आगे चलने लगे।
विजेंद्र पिता जी की परछाई-सी आकृति को देखता रहा। फिर खड़ा हुआ। वह तेजी से ढलान उतर ग़या।
मकान पर पहुँच सबसे पहला काम उसने फोटो देखने का किया।
ड्रोइंग़ रूम में जलती एक विशिष्ट प्रकार की चिमनी के उज्जवल प्रकाश की ओर उस फोटो को धर दोनों आँखें उसने स्थिर कीं।
वह चौंक उठा। खुशी से थरथरा उठा। जोर से साँस वह ले बैठा। दोनों आँखें अनजाने ही में बंद हो ग़ई।
आज सुबह कोलतार के रास्ते के किनारे देखी युवती उनकी पलकों में बंद हो ग़ई थी।
सुंदर युवती, सुंदर चेहरा, चढ़ती जवानी, सब उसकी बंद पलकों के सामने बाढ की तरह दौड़ आया। और मस्त मजे की बाढ़ में वह बहने लगा।
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Re: उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:50

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बसवेश्वरसिंह राठौड़ शायद अपने इकलौटे बेटे की तीव्र उत्कंठा को महसूस कर रहे थे। किन्तु आज तक के जीवन में उन्होंने कभी भी भाव प्रकट ही न किये थे। उनकी प्रकृति ही कुछ अलग़ थी। कड़ा अनुशासन, हँसी से नफरत, अकेले रहने की आदत, ये सब उनकी महत्वपूर्ण विशेषताएँ थीं। अपने इकलौटे बेटे के साथ भी वे मेच नहीं हो पाये थे किन्तु...
उन्होंने ऐनक से ताक कर देखा।
विजेंद्र की पलकें अभी तक बंद थीं। शायद मधुर भावों के बंधन में बंध चुका था। उसके पास का फोटो चिमनी की रोशनी में चमक रहा था।
जोश से पुकार मचाने की इच्छा उन्होंने दबायी, किन्तु पुत्र को अनुशासन हीनता से जगाने के लिए वे खाँसना न टाल सके।
विजेंद्र ने आँखें खोलीं, पास के दरवाजे की ओर देखा। फिर मन ही मन शरमा कर बैचेनी महसूस करने लगा।
उसके हाथ से उस युवती का फोटो सरक नीचे जा गिरा था।
उसने इधर-उधर देख, सहजता से, मुडे न, वैसे फोटो को उठा लिया। नज़र अनायास ही उस चेहरे पर थिर हो ग़ई। मन ही मन निर्णय ले लिया। ऐसी सुंदर युवती पत्नी के रूप में, यदि स्त्री विहीन घर में आये तो उससे अच्छा ओर क्या हो सकता है !
वह अब तक सोच ही में डूबा था वहाँ बसवेश्वरसिंह के बोझिल कदमों की आहट का आभास उसे हुआ।
जानबूझकर उसने उन कदमों की ओर अनदेखी की।
कुछ ही देर में तो उसके कंधे पर बोझिल हाथ रखा ग़या। और उसके साथ ही भारी आवाज़ सुनाई दी, ‘निर्णय ले लिया ? '
विजेंद्र बैचेन हो उठा। वह चुप ही रहा।
‘तुझे अब निर्णय कर लेना चाहिये। अब तू सब कुछ समझ सके वैसा जिम्मेदार अफसर है'। बाजू की कुर्सी पर बसवेश्वरसिंह राठौड़ बैठे।
युवा लड़के की शादी की बातें वह योग्य रीति से रख नहीं पा रहे थे। साठ के पास की उम्र में बहुत बैचेनी हो रही थी। किन्तु अनुशासन के अतिरिक्त वे ओर कुछ समझते ही न थे। इसलिए दूसरी कौन-सी बात करें ? कौन-सी हकीकत बयान करें ?
कुछ देर वे मूँछ पर हाथ फेरते रहे। फिर आँखों से एनक उतार काँच साफ करते रहे। फिर भी बेचैनी कम नहीं हो रही थी। अत: डिबिया से चिरूट निकाल, जलाकर धुऑं निकालते रहे।
बोझिल खामोशी कमरे में छा ग़ई थी।
विजेंद्र बेचैनी महसूस कर रहा था। बसवेश्वरसिंह राठौड़ बेटे की परेशानी जानते थे। किन्तु मजबूर थे। स्वभाव आड़े आ रहा था। एक के बाद एक चिरुट का कस लेते उन्होंने कुर्सी में सीधे बैठते हुए पेन निकाल विजेंद्र की ओर रखा।
युवा बेटे ने पिता के हाथ से पेन ले लिया। और तुरंत उस फोटो पर लिखा-‘यस'। और पेन और फोटो पिता की और सरकाकर खड़ा हो ग़या।
बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने पढ़ा। फिर ‘हाँ' में सिर हिला रहे हो वैसे सिर झुकाकर अपने कमरे में चले ग़ये।
डाइनींग़ टेबल सजाया ग़या तब तक वे कुछ लिखते रहे। शायद पत्र लिख रहे थे। और फिर आराम से खाना खा रहे हो वैसे दोनों खाते रहे।
पहाड़ियों से घिरे इस प्रदेश में शाम जल्दी उतर आयी थी। विजेंद्र बाहर जाना चाहता था, सारी रात टहलकर बिताना चाहता था। और इसी अनुमान से अपने कमरे की खिड़की खोल बाहर देखा।
ठंडी हवा का झोंका कमरे में आ ग़या। अंधकार इतना घना था कि दस फिट दूर की वस्तुएँ दिखाई नहीं देतीं थीं। ऐसे अंधकार ही में युवाओं को टहलना चाहिये। ऐसा सोच उसने होलबूट पहने। ग़र्म कोट पहन मफलर ग़ले में लपेटा। और कुछ भी कहे बिना निकल पड़ा।
बाहर तो कुछ देर उसे कुछ दिखा ही नहीं।
कहाँ जाना, किस ओर जाना, कहाँ पहुँचना, कुछ भी निश्चित नहीं था।
मन ही मन दिशा निश्चित करने का प्रयास उसने कर देखा। किन्तु कुछ भी सूझ नहीं रहा था। अंत में छोटे-छोटे दीपक की-सी रोशनी की ओर वह चलने लगा।
अल्शेशियन बादशाह की याद हो आयी। वह जिंदा होता तो इस समय उसके साथ होता। किन्तु...
ठंडे पवन को चीरते हुए वह आगे बढा।
अब तो जरा-सी भी रोशनी नहीं दिखती थी। उसे लगा कि वह ढलान उतर नीचे पहुँच चुका है।
जिधर पैर ले जा रहे थे, जा रहा था।
देर तक वह घूमता रहा। आकाश के तारों को गिनता रहा, पीले पंखों में कत्थई रंग़ की छींटवाले ‘पीली' और फिर रास्ते के किनारे खड़ी युवती को याद करता रहा।
मजे की लड़की थी। पीले पंखवाली कोमल तितली जैसी।
विजेंद्र का मन करने लगा कि कोलतार के रास्ते पर निकल पडना चाहिये। किन्तु इस वक्त, इस रात्रि में कुछ याद नहीं आ रहा था। सड़क की ओर निकलने वाला लाल मिट्टी वाला रास्ता वह भूल ग़या, यदि उसी रास्ते से जाता तो उस बोर्ड के पास रुकता। रात के अंधकार में कुछ दिखेगा नहीं। किन्तु बोर्ड के शब्द ‘जलपाइगुरी-130 किलोमीटर' ऐसा बोर्ड मन ही मन वह पढ़ लेता। सोच में डूबा वह देर रात तक पहाड़ियों के बीच यों ही टहलता रहा। अल्शेशियन बादशाह की कब्र के पास दौड़ जाने की इच्छा हो आयी। किन्तु...
घर की ओर वह चलने लगा। किन्तु अब वह घर, घर की दिशा, पग़दंडी जैसे रास्ते को वह भूल ग़या था।
कुछ देर वह सामने की ओर चलता रहा। सभी दिशाएँ समान लग़ रही थीं।
थोड़े दूर जाकर उसने निर्णय बदला। एक चक्कर लगा वह दूसरी ओर घूमा।
अब तो कुछ भी दिखता न था। न कोई मकान, न कोई आबादी, न कोई रोशनी और न ही कोई दिया।
अब ?
उसे कोई भय न था। मन हँसना चाह रहा था। खिलखिलाकर हँसने की इच्छा उसने दबा दी। किन्तु फिर भी चेहरे पर हँसी फूट ही निकली।
कुछ पल वह हँसता रहा।
यहाँ न कोई अनुशासन, न कोई रोकटोक, न किसी की शर्म, न संकोच, कुछ भी न था। वह था, अंधेरी रात थी। दिन के उजाले में हरी हरी दिखती पहाड़ियाँ थीं।
कुछ सोचते-सोचते अंधेरे ही में वह चलने लगा। वह कहाँ जा रहा है, किस ओर जा रहा है, कुछ पता न था। अनजान बनकर पहाड़ियों के बीच रास्ता भूल जाने का भी एक अनोखा आनंद था।
किसी निश्चित जग़ह पर जा रहा हो वैसी त्वरा से आगे बढ़ते हुए उसने सोचा, मनुष्य जितना अधिक जानता है, उतना ही भूलता है। सबसे अच्छा तो यही है कि कुछ भी न जानना। अनजान बने रहना ही अच्छा...
यकायक उस सुंदर युवती का स्मरण हो आया। वह तो उसके बारे में कुछ भी जानता न था। वह भी उसे नहीं जानती होगी। दोनों अजनबी। और अनजाने में ही दोनों मिलेंगे तब ?
पैर से कुछ लिपट ग़या। होल बूट थे अत: कोई तकलीफ न हुई। शायद कोई जीव था... साँप था... या कि अजग़र।
बड़े अजग़र मनुष्य को भी निग़ल जाते हैं - विजेंद्र को याद हो आया। यदि कोई अजग़र उसे निग़ल लें, तो ?
अपना आधा शरीर अजग़र निग़ल ग़या है- की कल्पना उसने की। अजग़र के पेट की ग़रमी, उमस और टूटती हड्डियों की पीड़ा...
वह अभी सोच ही रहा था कि तेजी से दौड़ता हुआ कोई प्राणी दूसरी पहाड़ी की ओर भाग़ ग़या।
शायद स्यार था, खरगोश भी हो सकता है।
अंधेरे में पहचाना नहीं ग़या।
प्रगाढ अंधेरा कितना सुंदर लग़ रहा था।
उसे अपने एक मित्र की याद हो आयी।
सैनिक स्कूल में दोनों साथ थे। सुंदर था, अच्छे घर का था। उसकी शादी हो चुकी थी। वह कहता था कि उसकी पत्नी बहुत काली है। काली ही नहीं, मुँह के उपर चकते के निशान थे और एक ऑंख से टेढी। माँ-बाप की इच्छा के कारण उसने शादी की थी। उसने शादी से पहले किसी से वादा किया था।
दोनों वादा तोड़ना नहीं चाहते थे। परिवार खानदानी था। शादी के बिना कोई चारा ही न था। अफसर मित्र पत्नी को देखना भी न चाहता था किन्तु...
विजेंद्र ने रास्ता बदला। घने अंधकार में कुछ भी सूझ नहीं रहा था, वह कहाँ जा रहा है, घर किधर था...इस ओर क्या है ? कुछ भी मालूम नहीं हो रहा था। और बेखबर हो वह आगे बढ़ रहा था।
उस युवा मित्र की याद तीव्रता से आ रही थी। वह घर अवश्य जाता था। किन्तु उस ट्रेन में जाता जो उसे रात को घर पहुँचाती। रात में दिया या चिमनी जलाने की मनाही थी। काले काले अंधेरे में पत्नी को प्यार करता और सबेरे तो वापस ट्रेनिंग़ में आ जाता। विजेंद्र ने यों ही अंधेरे में देखा।
वह खड़ा रहा।
चारों ओर देखा। कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखता था। वह कहाँ है, सामने क्या है, वह क्या देख रहा है...कुछ भी पता न था। और इसलिए मजा आ रहा था। अनजानी धरती पर अंधेरे में टहलने का मजा वह खोना नहीं चाहता था। वह फिर से चलने लगा।
कितने बजे होंगे ? वह अनुमान करने लगा।
घर से निकले लग़भग़ तीन-चार घंटे बीत चुके होंगे-का अनुमान उसने लगाया। मन में जरा-सा भी रंज न था। बल्कि उसे तो मजा आ रहा था। थकावट का तो नामोनिशान तक न था।
एकदम पास से आ रही उल्लू की चीत्कार सुन वह खड़ा रह ग़या।
घू... घू... घू... घरर... धू...
फटे कंठ से निकली चीत्कार की भयंकर रूप से प्रतिध्वनि हो रही थी। पहाड़ियों की कठोर काया से टकराकर टूट बिखरती वह ध्वनि दूर दूर बह जाती थी।
उसने उल्लू को देखना चाहा। उल्लू शायद अपने आपको देख रहा होगा। रात को उसे सब कुछ दिखाई देता है- मान्यता विजेंद्र को याद आई। फिर उसने यों ही सोचा। यदि वह भी उल्लू की तरह घने अंघकार में देख पाता तो ?
उल्लू के चीत्कार की भयंकर प्रतिध्वनि को पार कर आगे बढ़ ग़या।
शायद वह किसी पहाड़ी पर होगा। यहाँ से बराबर सामने की ओर प्रकाश का एक वर्तुल आभासित हो रहा था।
सामने की ओर वह बढ़ने लगा।
किन्तु थोड़ी देर ही में भूल ग़या।
अब प्रकाश दिखाई नहीं देता था।
फिर भी वह बढ़ता ग़या। आगे, और आगे।
ऐसे ही चलते-चलते यदि कोलतार की सड़क आ जाय तो वह उस बोर्ड के पास रुकेगा...जलपाइगुरी-130 किलोमीटर, के लिखित रूप की कल्पना कर आगे बढ़ जायेगा।
वह और अधिक तेजी से चलने लगा।
उसके पैरों की ग़ति से विचारों की ग़ति अधिक तेज थी। वह सोचते सोचते चल रहा था। बहुत सारे विचार आ-जा रहे थे।
विचोरों में बह वह आगे जा रहा था कि रायफल का बार सुनाई दिया...
वह चौंका, खड़ा रह ग़या।
प्रतिध्वनि सुनाई दे रही थी ओर वह सोचता रहा...
अल्शेशियन बादशाह की याद आयी। किन्तु वह तो मर चुका है। ‘अब किसकी बारी ? '
उस रायफल के बार जैसा विचार उसके दिमाग़ में बार-बार प्रतिध्वनित होता रहा था ‘...अब किसकी बारी होगी...अब किसकी बारी होगी...? '
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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