उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Jemsbond
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Re: उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:50

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विजेंद्र जब घर पहुँचा तब घड़ी मे तड़के की सुस्ती थी। चार बज दस मिनट पर सुई अटक ग़ई थी। शायद अभी ही बंद हुई हो।
वह अपने कमरे में ग़या।
बाजू से कुछ आवाज आ रही थी। खिड़की से उसने देखा, दो नौकर भेंकर के मृत शरीर को व्यवस्थित रूप में चीर रहे थे। खाल उतार चुके थे और अंगों के टुकड़े कर रहे थे।
कुछ देर वह उस मृत पशु को देखता रहा। लाल लाल मांस के पिंड को देख कोई भाव न जन्मा। उसने सोचा, वह जब भूलभूलैयावाली पहाड़ियों के बीच अंधेरे में घूम रहा था तब रायफल के बार की प्रतिध्वनि देर तक सुनाई दे रही थी। वह बार इसी भेंकर के लिए किया ग़या होगा।
उसने खिड़की बंद कर दी।
बिछौने की तैयारी की।
चिमनी की रोशनी एकदम कम करने के लिए छोटे चक्र की ओर हाथ लंबा किया तो वहीं उसकी नज़र उस फोटोग्राफवाले लिफाफे पर ग़ई।
उसने लिफाफा उठाया।
खाली लिफाफे की ओर वह ताकता रहा।
कुछ याद किया। फोटो तो उसने बसवेश्वरसिंह राठौड़ को ‘यस' लिख, दे दिया था। शायद ग़लती की थी। फिर सोचा, नहीं, उसने ग़लती न की थी। ‘यस' लिखकर ठीक ही किया था।
चिमनी का चक्र घुमा उसने रोशनी को बाहर निकाल दिया। घने काले अंधकार ने कमरे में प्रवेश किया।
बिछौने पर वह टेढ़ा पड़ा रहा।
खुली आँखों से युवती के सुंदर चेहरे को बराबर याद करने लगा।
सुंदर चेहरा मन ही मन देखते-देखते पलकें कब मूँद ग़ई और वह कब सो ग़या, पता ही न चला।
नास्ते के लिए बसवेश्वरसिंह उसकी राह देख रहे थे।
नौकर ने कहा -‘छोटे साहब अब भी सो रहे हैं'।
उन्होंने कुछ भी न कहा।
नाश्ता कर, चिरूट सुलगाकर, हाथ में वॉकिंग़ स्टीक ले वे पहाड़ियों की ओर निकल ग़ये तब अपने इकलौटे युवा पुत्र की शादी की सोच के घोडे मन पर सवार हो ग़ये।
* * *
विजेंद्र ने अपने हाथ को देखा।
मजबूत हथेली की रेखाओं में हल्दी का पीला रंग़ विशिष्ट प्रकार से फैल ग़या था कि उन ‘पीली' पंछियों के पंख उसे याद आ ग़ये। पत्नी के हाथ की हथेलियाँ देखनी बड़ी अच्छी लगी होतीं, किन्तु ट्रेन की भीड़ में यह संभव न था।
फिर भी उसने पत्नी के आकार की ओर देख लिया।
शायद वह शिशे के आरपार देख रही थी। शायद ग़हरी सोच में पड़ी हो...शायद अपनी ही...
विजेंद्र ने हँसना चाहा। उसके भरे-पूरे चेहरे पर हँसी की कुछ रेखाएँ उभर रही थीं।
शादी बहुत उतावली से की ग़ई थी। किन्तु ट्रेन का सफर बहुत लम्बा था। फर्स्ट क्लास में भी जग़ह न थी। बसवेश्वरसिंह राठौड़ बाजू के कंपाट्र्मेंट में शायद बर्थ पर नींद ले रहे होंगे। उसे नींद नहीं आ रही थी।
उसने घड़ी में देखा, चार बजकर चालीस मिनट हो चुके थे। छतीस घंटे बीत ग़ये हैं। सुबह सात बजकर सताइस मिनट पर ट्रेन स्टेशन पर पहुँचेगी। उसके बाद तीन घंटे कार में...
दस-ग्याहर बजे तो वह पत्नी को लेकर हरी हरी पहाड़ियों के बीच के अपने घर पहुँच जायेगा।
शरीर में चेतना आ ग़ई।
हरी हरी पहाड़ियों की याद से मन बहलने लगा और सामने सारा प्रदेश छा ग़या।
ट्रेन चलती रही। घड़ी की सूई चक्कर लगाती रही।
* * *
जयजयवंती ने कार से उतर कर देखा।
उसकी सारी थकावट दूर हो ग़ई।
जहाँ देखो वहाँ बस ढलान ही ढलान, एक-दूसरे में समा जाती पहाड़ियाँ, हरे हरे वृक्ष, उड़ रहे पंछी, लाल मिट्टी की पग़दंडियाँ और निर्मल आकाश...
कुछ पल वह देखती रही।
सब कुछ जाना-पहचाना लग़ रहा था।
उसका मन खिल उठा।
खुशी से पाग़ल हो उसने गृह-प्रवेश किया।
यात्रा की सारी थकान मानो उतर ग़ई थी।
कुछ वस्तुएँ उसने करीने से रखवायीं। नारी विहीन घर में बरसो बाद नारी के कदम पड़े थे।
सारे घर का माहौल ही बदल ग़या था। और बसवेश्वरसिंह राठौड़ घर की बदली रौनक को देख-देख चिरुट पी रहे थे।
शाम को जयजयवंती ने स्वयं ही हरी-हरी पहाड़ियों पर जाने का प्रस्ताव रखा।
विजेंद्र हँसा। जयजयवंती उसके साथ बहुत जल्दी हिलमिल ग़ई थी।
उसने सिर झुकाया। हाँ में हँसा। जयजयवंती ने भी हँस दिया।
विजेंद्र ने पत्नी का हाथ थामकर चूमा। और दोनों हरी-हरी पहाड़ियों की ओर चल पड़े। पंख में पंख पिरोकर उड़ते पंछियों की तरह दोनों दौड़ते जा रहे थे।
पहाड़ी की चोटी पर पहुँच दोनों एक काले पत्थर पर बैठ ग़ये।
आकाश यहाँ से बहुत करीब लग़ रहा था। हाथ ऊँचा कर पकड़ने लायक।
जयजयवंती ने अपना हाथ यों ही ऊँचा किया।
फिर उसने आकाश की ओर देखा।
ढल रहे सूरज की अंतिम किरणें आकाश रूपी दर्पण में प्रतिबिंबित हो रही थी। आकाश दैदीप्यमान एवम् सुहावना प्रतीत हो रहा था।
विजेंद्र आकाश की ओर नहीं किन्तु जयजयवंती के मांसल हाथ की ओर, पहाड़ी कौए की तरह ताक रहा था।
‘यहाँ से आकाश बहुत करीब है न ? ' खिल रहे फूल-सी हँसी बिखेरते हुए जयजयवंती ने कहा।
‘नजदीक लग़ता है उतना ही। किन्तु नजदीक है तो नहीं... '
‘तो नजदीक है क्या ?'
‘जयजयवंती... ' कहकर विजेंद्र ने मानो उसे अपने ही में समा लिया।
सूरज ढलता रहा। किरणें सिमटती रहीं। पंछी अपने-अपने घोंसले की ओर जाते रहे।
‘देखो तो, पहले देखे थे वैसे ही पंछी आ रहे हैं। '-जयजयवंती ने सामने से उड़े चले आ रहे पंछियों की ओर ऊँग़ली दिखाई।
विजेंद्र ने देखा।
उसने कुछ भी न कहा।
‘पीली' पंछियों का समूह कत्थई रंग़ की छींटवाले पीले पंख फैला पसार हो ग़या।
‘पंछी आकर्षक हैं'।
‘उनके पंख बहुत ही सुंदर होते हैं'।
‘हा, रंग़ कितने सुहावने हैं ? '
विजेंद्र मौन ही रहा। उड़ते आ रहे दूसरे पंछियों की ओर वह देखता रहा। बाद में सामने की पहाड़ी की ओर आँखें घूमा कर कहा-
‘हमें कोई देख रहा है... '
यकायक विलग़ हो जयजयवंती ने चारों ओर देखा।
कोई भी न था।
निष्कपट प्रश्रवाचक नजरों से उसने विजेंद्र की ओर देखा।
‘मेरा एक दोस्त है। पहले जब मैं यहाँ अकेला आता, तब भी वह मुझे देखता था। आज जब मेरे साथ कोई और है तब भी वह... '
जयजयवंती ने एक बार फिर चारों ओर, पहाड़ियों की तलहटी की रिक्त भूमि को देखा।
कोई न था।
उसका चेहरा मानो कह रहा था- ‘कोई नहीं है...कोई भी नहीं है... '
‘देखो... ' विजेंद्र ने बताया।
सामने की पहाड़ी के ऊपर के छोटे वृक्ष की एक टहनी पर बैठ पहाड़ी कौआ चुपचाप, ध्यान से, ग़र्दन घुमा-घुमाकर इन दोनों की ओर देख रहा था।
जयजयवंती खिलखिलाकर हँस पड़ी।
उसकी हँसी की प्रतिध्वनियाँ पहाड़ियों से टकराकर न जाने कितनी देर तक सुनाई देती रही ...हा हा हा हा हा हा...
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

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Re: उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:51

7
प्रात: और शाम को घूमने जाने का क्रम निश्चित हो ग़या।
हरी हरी पहाड़ियाँ मानो उन्हें अपने पास बुलाया करती थीं।
‘पीली'पंछी बार-बार निमंत्रण दे रहे थे।
कोमल तितलियाँ ललचा रही थीं।
और वह पहाड़ी कौआ...
जयजयवंती अकेले ही हँस पड़ी।
विजेंद्र ने देखा...फिर कहा, ‘हँसी क्यों ? '
‘पहाड़ी कौए की याद आ ग़ई। उस दिन कितने ध्यान से हमें ताक-ताककर ग़र्दन झुकाकर देख रहा था ? '
विजेंद्र भी हँस दिया।
दोनों देर तक हँसते रहे।
फिर उसे यकायक याद आया। झुककर कहा- ‘पिता जी को कोई भी उनके सामने हँसें वह पसंद नहीं है। जरा संभालना'।
‘इन हरी-हरी पहाड़ियों के बीच तो हमें हँसना ही चाहिये। जितनी इच्छा हो, हँसना चाहिये...दिल खोलकर हँसना चाहिये... '
‘हँसने की यहाँ छूट नहीं है। हँसना हो तो पहाड़ियों पर आना'। दोनों हँस पड़े।
फिर चुप हो ग़ये। थोड़ी ही देर में वे तैयार हो पहाड़ियों की ओर निकल पड़े।
विजेंद्र रुक ग़या।
पहाड़ी की तलहटी की लाल मिट्टी की ओर देखा।
जयजयवंती कुछ समझ न पायी।
‘क्या है ? '
‘यहाँ बादशाह को दफनाया ग़या है'।
‘बादशाह ? कौन बादशाह ? '
‘अल्शेशियन डॉग़'।
जयजयवंती पास ग़ई।
सामान्य ग़ङ्ढा और मिट्टी खुदी ग़ई थी सिर्फ वह जग़ह दिखती थी।
‘मर ग़या होगा ? '
‘जानबूझकर मारा ग़या था'।
‘हडगाया होगा ? '
‘ना'।
‘तो ?'
‘डिसिप्लिन'।
‘डिसिप्लिन ? '
‘हाँ, बादशाह को भी डिसिप्लिन रखनी चाहिये। एक दिन मुझसे दुलार करते-करते डाइनींग़ टेबल पर चढ़ बैठा। फिर चिकन की तश्तरी में मुँह डाल हड्डी चबाता रहा...और फिर उस पर गोली दागी ग़ई'।
‘तुम ऐसे फौजी अफसर डिसिप्लिन को अधिक महत्व देते हो'।
‘महत्व ही नहीं, मिलिट्री एक्ट में जीवन का दूसरा नाम ही डिसिप्लिन है'।
‘किन्तु यह को एक कुत्ता था। पालतू प्राणी...तुम्हें थोड़ा तो सोचना चाहिये ? अल्शेशियन डॉग़ कितना महँगा होता है ? '
‘मैंने नहीं, पिताजी ने, मेजर बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने मारा था'।
जयजयवंती मौन ही रही।
खामोशी की एक बड़ी लहर फैल ग़ई।
घीरे से विजेंद्र आगे बढ़ा।
थोड़े आगे बढ़कर उसने देखा।
जयजयवंती अब भी वहीं खड़ी थी। खुदी लाल मिट्टी की ओर देख रही थी।
विजेंद्र भी खड़ा रहा। उसे बुलाने की इच्छा हुई, किन्तु वैसा न कर पाया। जयजयवंती को बुला न सका।
दौड़ते हुए पहाड़ियों पर चढ़ने की इच्छा को ब्रेक लग़ती रही।
आहिस्ता आहिस्ता बूढों की तरह दोनों ऊँचे भाग़ पर पहुँचे।
बादल बिखर रहे थे। खाई की ओर से कुहरा उपर उठ रहा था। ‘पीली' के समूह पहाड़ियों के पीछे से उड़कर सामने की ओर आ रहे थे।
दोनों बैठकर यों ही आकाश को देखते रहे।
थोड़ी देर तक दोनों मौन ही रहे। बैठे बैठे ही कत्थई रंग़ की छींटवाले पीले पंखों के फैलाव को देखते रहे।
बादशाह के अकुदरती मौत के मान में दोनों मौन रहे।
सामने की पहाड़ी के वृक्ष की टहनी पर पहाड़ी कौआ नहीं था।
विजेंद्र ने सोचा, उसने बादशाह की मृत्यु की बात छेड़ी ही न होती तो अच्छा होता।
किन्तु वह मजबूर था। खुदी ग़ई लाल मिट्टी को देख सब कुछ याद हो आया था और वह जयजयवंती से कह बैठा।
वह सोच ही में था कि उसके पैर पर कोमल कोमल तितली आ बैठी।
जयजयवंती ने उस ओर देखा। देर तक देखती ही रही। फिर धीरे से हाथ फैलाकर ऊँग़लियों से पकड़ लिया।
थोड़ी फडफड़ाहट, मुक्त होने की तमन्ना, और अब फिर न आने का निर्णय, विजेंद्र घड़कते दिल से महसूसता रहा। फिर कहा-‘छोड़ दो, उसके कोमल कोमल पंख टूट जायेंगे... '
जयजयवंती ने दोनों ऊँग़लियाँ खोल दीं।
तितली उड़ ग़ई।
ऊँग़लियों पर पीले रंग़ की छींट चित्र के समान उभर आयी थी।
पल भर उसने देखा। फिर विजेंद्र की ओर देख आँखों से ही माफी माँग़ रही हो वैसे घीरे से कहा- ‘सॉरी... '
विजेंद्र कुछ न बोला।
तितली उड़ ग़ई। उसका उसे आनंद था। तितली सहजता से उड़ ग़ई थी। आज वह हँस न पाया था। तितली तन्मयता से बैठी थी। जयजयवंती ने उसे पकड़ लिया था।
यदि उसने जयजयवंती से मना किया होता तो वह क्या करती ?
दिमाग़ में एक सोच उभर आई।
वहीं तो पत्नी ने कहा- ‘मैं तितली तो छोडने ही वाली थी। किन्तु उसके रंग़ इतने सुहावने थे कि मैं अपने आप को रोक न पायी। मन बेकाबू हो ग़या। पल भर के लिए मैंने उसे पकड़े रखा। आपने मुझे उस लोभ से मुक्त किया...नहीं तो शायद मेरा लोभ बढ़ता जाता...और ये तो स्त्री का मन...रंगों के मोह में उसकी खत्म हो रही जिन्दगी के बारे में सोचेगी भी नहीं। रंग़ ही मिट जाते शायद... और... और... और...! '
और कुछ आँसू पलकों पर आ ग़ये।
फिर गोरे गोरे कपोल पर से होते हुए गोद में गिर पड़े।
‘कोई बात नहीं। तितली जिंदा है। वह तलहटी की ओर सुंदरता से उड़ रही है'।- विजेंद्र ने कहा।
‘हाँ, मैंने देखी है। किन्तु अपने पंखों के रंग़ मुझे दे ग़ई... ' कहकर कुछ कुछ पीले रंग़वाली ऊँग़लियाँ उसने विजेंद्र को दिखायीं।
विजेंद्र ने देखा। उसने कुछ न कहा। जयजयवंती को दिलासा दे रहा हो वैसे उसकी मांसल पीठ पर हाथ थपथपाने लगा।
‘आई एम सॉरी...वेरी सॉरी... '
विजेंद्र मौन रहा।
जयजयवंती देर तक आँखों से स्वीकारती रही। अफसोस व्यक्त करती रही और ऊँग़लियों पर लगे पीले रंग़ को देखती रही।
दोनों खड़े हुए तब सूरज की किरणें चारों ओर फैल चुकी थीं, कोहरा लुप्त होने की तैयारी में था। और लाल मिट्टी वाला रास्ता सेंथी के सिन्दूर की तरह चमक रहा था।
‘जिस दिन मैं यहाँ आया उसी रात टहलने निकला था'।
‘रात्रि अंधकारमय हो तो पहाड़ियों के बीच से रास्ता खोजना मुश्किल हो जाता है'।
‘मैं भ्रमित हो ग़या था... '
‘फिर ? '
‘बस, यों ही मस्ती में टहलता रहा'।
‘सारी रात ? '
‘घड़ी ही बंद थी'।
जयजयवंती यहाँ आयी तब से, बहुत दिनों से, सेंकडों घण्टों से, हजारों मिनटों से इन हरी-हरी पहाड़ियों को देख रही थी। अब भी देख रही थी। चलते चलते, रुक रुक कर देखती जा रही थी।
फिर सोचा, अंधकारमय रात्रि हो, दस ग़ज की दूरी पर दिखता न हो वैसी रात्रि में कोई घर से निकल कर इन पहाड़ियों की कतार के बीच घूमता रहे...घूमता रहे...तो आश्चर्य नहीं होगा।
सारी पहाड़ियाँ एक-सी थीं। सभी पहाड़ियाँ हरी थीं। सभी पहाड़ियाँ सुहावनी थीं।
कभी कभार घने अंधेरे में वह तो भ्रमित नहीं हो जायेगी न ?
जयजयवंती ने आगे जा रहे विजेंद्र की ओर देखा। फिर सोचा कि वह यदि साथ में हो तो कुछ नहीं होगा। वह चारों ओर टहल सकती है, चारों ओर फिर सकती है।
किन्तु अंधेरा हो, घना अंधेरा हो... प्रगाढ अंधकार हो और पति और उसके बीच भी अंधेरा हो तो ?
वेग़ से चल वह विजेंद्र के साथ हो ली।
इच्छा न होने के बावजूद भी दोनों उस खुदी हुई मिट्टी की ओर देख बैठे। बादशाह की याद हो आयी। अल्सेशियन की मृत्यु की याद हो आयी।
दोनों आगे बढ़ते ग़ये।
कम्पाउन्ड के खंभे पर हाथ की लिखावट वाला बोर्ड अब भी लटक रहा था- ‘कुत्ते से सावधान'।
विजेंद्र ने देखा। दरवाजे की धार पकड़कर वह खड़ा रह ग़या। फिर धीरे से साइन बोर्ड उतारा। काँख में दबाकर सीढियों पर पैर रखा ही था कि लंबे झबरे बालों वाला नीले रंग़ का बड़ा अल्शेशियन कुत्ता जंजीर से बँधा होने के बावजूद जोर से दौड़ आया।
लोहे की जंजीर ने उसे रोका।
विजेंद्र ने देखा।
वह फिर घूम ग़या।
पहले था वैसे ही उसने कम्पाउन्ड के खंभे के ग़ले में वह साइन बोर्ड लटका दिया। और दूसरी ओर से अपने कमरे में आ ग़या।
जयजयवंती मानो उसी की राह देख रही थी।
विजेंद्र के सामने उसने अपनी गोरी बाँह धरी। विजेंद्र ने बाँह पकड़ ली। एक झटका सा दे दिया। दोनों टकराये, हँस दिये।
वहींतो खाँसने की आवाज सुनाई दी।
दोनों विलग़ हो ग़ये। जयजयवंती ने लाज निकाली और दरवाजे की आड़ मे जाकर खड़ी हो ग़ई।
‘डाक...राजपूताना राइफल्स के कमान्डर की है। बहुत महत्वपूर्ण है'।- निशान दिखाते हुए बसवेश्वरसिंह राठौड़ की भारी आवाज वातावरण में फैल ग़ई।
विजेंद्र की आँखें आश्चर्य से भर ग़ईं। लिफाफा उसने ले लिया। और तुरंत एक छोर से चर्र् की आवाज से फाड़कर, खाकी रंग़ के काग़ज को अपनी आँखों के सामने खोला।
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Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:52

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विजेंद्र ने धड़कते दिल से पत्र पढ़ा।
इकतीस दिनों की छुट्टियाँ रद्द कर दी ग़ई थीं। तुरंत ही मुख्य केन्द्र पर हाजिर होना था। अंतिम ‘कम सून इमीजेटली' वाक्य के नीचे कमान्डर ने स्वयं अंडर लाइन की थी। उस ओर वह अपलक ताकता रहा।
आज की रात पत्नी के संग़ अंतिम थी। यहाँ से तड़के तीन बजे के पहले कार से स्टेशन जाने निकलना होगा।
उसने तैयारी शुरू कर दी।
नब्बे दिनों में से साठ दिन भी पूरे बिताये न थे। और वह भी शादी के बाद के दिन...
विजेंद्र ने बराबर गिनकर देखा, बत्तीस दिन ही हुए थे। आज तैंतीसवाँ दिन था पत्नी के सांनिध्य में...
कंधे पर सील और पीन लगाते हुए उसने देखा, जयजयवंती उसकी ओर अनिमेष देख रही थी।
काम करते वह अटक ग़या।
खुले दरवाजे से बाहर देखा।
कोई भी न था।
बटलर शायद खाना पका रहा होगा। नौकर बाहर ग़या होगा। पिताजी विचार में डूब चुरूट से धुऑं छोड़ रहे होंगे...
एक नज़र बाहर कर वह पत्नी के पास पहुँचा। और उग्र आवेश में उसे उठा लिया। फिर पूछा- ‘क्या देख रही थी ? '
‘विजेंद्रसिंह राठौड़ को... '
‘या फिर एक फौज़ी की जिन्दगी को...? '
जयजयवंती ने कुछ न कहा। वह विजेंद्र के बालों में ऊँग़ली फेरती रही।
‘कमान्डर इन चीफ की सूचना से लिखा पत्र तो तुमने पढ़ा है न ! '
वह कुछ न बोली। उसने दोनों पैर हिलाये।
विजेंद्र ने उसे धीरे से नीचे उतारा और आँखों से पहले प्रश्र ही को दुहराया।
फिर भी जयजयवंती मौन ही रही।
विजेंद्र पत्र ले आया।
‘तुम्हारे इस सुहावने चेहरे पर मैंने सब कुछ पढ़ लिया है'।
‘मेरे चेहरे पर ? '
‘हाँ'।
‘आश्चर्य है... ' कहकर पत्र को उसने लिफाफे में रखने की कोशिश की। फिर यों ही पत्नी को देखा।
झट से जयजयवंती ने पत्र ले लिया।
पढ़े बिना ही कहा।
‘छुट्टियाँ रद्द हो ग़ई हैं...आपको अभी जाना है। आज रात ही को निकल जाना है...सीमा पर सावधानी से सेना भेजनी है...पड़ोशी देश से खतरा है...बस ऐसा ही न ...बराबर है ? '
‘बराबर है, कमान्डर इन चीफ के कहने पर कमान्डर ने ऑडर किया है। मुझे आज निकलना होगा'।
‘किन्तु मंजूर की ग़ई छुट्टी ऐसे ही, काग़ज के एक टुकड़े से कैसे रद्द की जा सकती है ? ' जयजयवंती ने संदेह से पूछा।
‘फौजी नियमों में ऐसी व्यवस्था है'।
‘दूसरा कोई चारा नहीं है ? '
‘नहीं'।
‘कोई अफसर घर आकर बीमार हो ग़या हो तो ? '
‘तो उसे केम्प के अस्पताल के डॉक्टर का सर्टिफिकेट पेश करना पड़ता है'।
‘अग़र ऐसा न किया जाय तो ? '
‘अग़र ऐसा न किया जाय तो... तो... '
उत्तर देते वह तुतलाने लगा। तुरंत कुछ याद न आया। फिर सूचना याद आयी...
‘डॉक्टरी सर्टिफिकेट अग़र समय पर पेश न किया जाये तो गैरहाज्ािर अफसर को गिरफ्तार किया जायेगा। फौजी अदालत में उस पर कारवाई की जायेगी...सजा होगी...कड़ी सजा हो सकती है... '
विजेंद्र कहता रहा और जयजयवंती के सुंदर नयनों से आँसू बहते रहे...
विजेंद्र ने जब आँसू देखे तो वह अपने उपर काबू न रख पाया।
खाकी शर्ट को बिछौने पर फेंक दिया। हाथ में रखे नंबर गिर घूमते घूमते कौने में चले ग़ये। और मेजर की पट्टी बेपरवा हो फेंक दी ग़ई।
वह मानो शांति का एहसास करने लगा।
उसने फिर से पत्नी को गाढ़ आलिंग़न में ले कसा।
वहीं कोई आवाज सुनाई दी।
आलिंग़न की पकड़ ढीली हो ग़ई।
हाथों को खुले छोड़ बाहर देखा।
नौकर अंग्रेजी अखबार ले दरवाजे में खड़ा था।
प्रश्र सूचक नज़र से उसने नौकर को देखा।
‘बड़े बाबू ने भेजा है'। - कह वह चला ग़या।
किसी दिन नहीं और आज पिताजी ने समाचार-पत्र क्यों भेजा होगा ? ऐसे सोचते हुए उसने समाचार पत्र को खोला।
‘युद्ध होने को है। दुश्मनों का इरादा मालूम हो चुका है। सीमा पर तैयारियाँ पूरी कर दी ग़ई है'- शीर्षक को मन ही मन पढ़ते वह सावधान हो ग़या। अपने पर काबू पा लिया।
कुछ पल समाचार-पत्र पढ़ उसने अपने अंक खोज निकाले। तमगे में पीन लगा शर्ट पर लटका दिया। पट्टियाँ व्यवस्थित करके लगा दीं।
अब उसे युद्ध दिख रहा था।
भारत की सुलग़ती सीमा थी।
दुश्मनों की धूर्तता थी।
और कमान्डर इन चीफ के ऑडर से लिखे ग़ये पत्र की अंतिम पंक्ति ‘कम सून इमीजेटली' नज़र के सामने उभर रही थी। ये अक्षर धीरे-धीरे बड़े होते जा रहे थे। और बड़े... और अधिक बड़े...
विजेंद्र ने खिड़की को खोला।
खूले आकाश के एक बहुत बड़े टुकड़े के बीच घिरे बादलों से भी वे शब्द उभर रहे थे...कम सून...इमीजेटली...
वह अब भी बादलों को देख रहा था कि पत्नी ने आकर खिड़की बंद कर दी।
वह पत्नी को देखता रहा।
उसने कोई विरोध न किया। कुछ कहा भी नहीं।
मुख्य दरवाजा बंद कर दिया ग़या।
और कुछ देर पहले विजेंद्र ने जिस प्रकार तीव्र आवेश में पत्नी को उठाकर जकड़ लिया था वैसे ही जयजयवंती ने बल पूर्वक विजेंद्र को एक झटके में उठाया... वह लड़खड़ा ग़ई... और दोनों एक धक्के के साथ बिछौने में जा गिरे।
* * *
‘टक्... टक्... ठप्... ठप्... '
मुख्य दरवाजे पर कोई दस्तक दे रहा था।
विजेंद्र की आँखें खुल ग़ई।
अपने से दो-तीन इंच छोटी पत्नी उसे आलिंग़न में लेकर ऐसे सो रही थी कि पति से कभी विलग़ ही न होगी।
विजेंद्र उसके भाल पर चुंबन कर बैठा और बर्फ के टुकड़े जैसी ठुड्डी पर हाथ फेरता रहा।
किसी ने फिर से दस्तक दी।
पत्नी से विलग़ हो उसने दरवाजा खोला।
‘बड़े बाबू डाइनींग़ टेबल पर कब से आपकी राह देख रहे हैं'। -कह कर नौकर चला ग़या।
विजेंद्र शरमा ग़या।
वह पत्नी को उठाने ग़या तो पत्नी ने हाथ में हाथ पिरोकर उसे ही खींच लिया।
मुख्य दरवाजा खुला ही था।
बसवेश्वरसिंह राठौड़ की ग़र्जना के विचार नहीं आ रहे थे। सब कुछ भूल ग़या था और याद इतना ही था कि दोनों पति-पत्नी हैं।
कितना समय गुजर ग़या, किसीको पता ही न था।
किन्तु जब विजेंद्र ने डाइनींग़ टेबल की घड़ी को देखा तो चौंका। दो बजकर बीस मिनट हो चुके थे। और सेकंड की लाल लाल सुई घुम रही थी।
झटके से वह उठा।
जयजयवंती को भी उठाया।
वह न उठी।
करवत बदल फिर से पड़ी रही।
विजेंद्र डाइनींग़ टेबल के पास ग़या।
‘लग़ रहा है कि युद्ध होगा होगा'। सारे समोसे को मुँह में रखकर बसवेश्वर सिंह ने अभिप्राय दिया।
विजेंद्र ने कुछ न कहा। इकतीस दिनों की रद्द कर दी ग़ई छुट्टी के बारे में सोच रहा था।
बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने भी ओर अधिक न पूछा। वे युद्ध के अनुभवी थे। जवानी का अनुभव था। घर छोड़ने और युवा पत्नी को अनिश्चित समय के लिए छोड़कर जाने का भी।
मौन ही के साथ खाना समाप्त हुआ।
‘तुझे रात ही को निकलना होगा। कार वाले को कह दिया ग़या है। सब कुछ तैयार रखना। दो बजे का अलार्म रख देना। मुझे तो वैसे भी देर तक नींद आती नहीं। संभव होगा तो मैं ही तुझे जगा दूँगा... '
आभार जताने की इच्छा हुई किन्तु वह मौन ही रहा।
डाइनींग़ टेबल से वह सीधा पत्नी के पास ग़या।
जयजयवंती अब भी सो रही थी।
विजेंद्र उसके भोले व सुंदर चेहरे को देखता रहा।
घडी में तीन बजकर पाँच मिनट हो चुके थे।
वह सोया नहीं।
पत्नी के सुंदर चेहरे की ओर देखते-देखते उसने तैयारियाँ पूरी कीं।
शाम को पाँच बजकर पचास मिनट पर दोनों हरी पहाड़ियों की ओर घूमने निकल पड़े।
एक प्रश्र दोनों को सता रहा था।
विजेंद्र चला जायेगा। अनिश्चित समय के लिए। युद्ध कब जाहिर होगा, कब पूरा होगा, क्या होगा क्या नहीं ? कुछ निश्चित नहीं था। वहाँ तक अकेले रहना होगा।
लाल मिट्टी वाले रास्ते की ऊँची पहाड़ियों की ओर दोनों मुड़े।
‘हररोज तू यहाँ आती रहेगी तो अकेलापन कम लगेगा ... '
जयजयवंती ने कोई उत्तर न दिया।
सूरज पहाड़ी के नीचे ढल चुका था। शीतल बयार बहने लगी थी किन्तु वे ‘पीली' अभी तक अपने घोंसले की ओर नहीं ग़ये थे।
हररोज जहाँ बातें खत्म ही न होती थीं वहाँ आज मौन था।
‘ये हरी-हरी पहाड़ियाँ, पीले पंखवाले पीली पंछियों, पहाड़ी कौआ और जिसे तूने सबेरे पकड़ा था वैसी तितली... ये सब तुझे मेरी याद देते रहेंगे। तुझे अकेलापन महसूस ही न करने देंगे। मैं पत्र लिखता रहूँगा। तू भी लिखना। शायद युद्ध न भी हो। मैं जल्दी वापस आऊँगा...तू इन पहाड़ियों के बारे में ... अपने विचार लिखना... मैं युद्ध के बारे में बताता रहूँगा... तू विश्व-शांति के बारे में लिखना... अपने मुक्त विचार मुझे हमेशा लिखती रहना... '
जयजयवंती ने कुछ भी कहे बिना अपना हाथ विजेंद्र के हाथ पर रख दिया।
विजेंद्र देर तक उसे पकड़े रहा।
दोनों जब उठे, शाम हो चुकी थी, किन्तु अंधेरा नहीं था।
हाथ में हाथ रखकर दोनों घर तक आ ग़ये।
रात को दो बजकर बीस मिनट पर निकलने की पूरी तैयारियाँ हो चुकी थीं। पिता जी ने सारा आयोजन किया था।
इस मकान में तीन लोग़ थे किन्तु तीनों को चैन न था।
रात को साढे नव बजे सभी साथ में खाने बैठे।
किन्तु किसी का भी मन खाने में नहीं लग़ रहा था।
फिर भी तीनों एक दूसरे को यही जताने की कोशिश में थे कि उन्हें कोई चिंता नहीं हैं।
विजेंद्र सबसे पहले उठ ग़या।
जयजयवंती ने उसकी ओर देखा। फिर साड़ी का छोर खींचकर ठीक तरह से रखा।
बसवेश्वरसिंह ने एक बड़ी डकार ली और खाना खा चुके हो वैसे खड़े हो ग़ये। थोड़ा रुके। विजेंद्र और जयजयवंती की ओर देख, ‘गुड नाइट' कह चले ग़ये।
विजेंद्र ने देखा। फिर घड़ी की ओर नज़र की। मन ही मन कुछ सोचा। इस वक्त पहाड़ियों पर घूमने का मजा, घूम घूमकर भ्रमित होने का मजा और भूलते भूलते रुकने का मजा...
उसने खिड़की खोल दी। जयजयवंती ने उसे तथा मुख्य दरवाजे को बंद कर दिया और चिमनी का चक्र घुमा अंधेरा कर दिया।
इस पहाड़ी प्रदेश की हरी-हरी पहाड़ियाँ, कत्थई रंग़ की छींटवाले पीले पंख फैलाकर उड़ते ‘पीली' पंछियों, ध्यान से देखनेवाला पहाड़ी कौआ, कोमल पंखोंवाली तितली, सभी को याद करता रहा, भूलता रहा।
एलार्म बजा।
विजेंद्र बिछौने के बाहर कूदा।
चिमनी की रोशनी बढाई।
जयजयवंती का सुंदर मुख उसने हथेलियों में दबाया।
वह फिर बिछौने पर ग़या।
चिमनी की रोशनी कमरे में फैली हुई थी।
विजेंद्र ने जयजयवंती को कसना चाहा।
‘नहीं...'
वह झटके से बैठ ग़ई, पति ने खींचा। वह फिर से खड़ी हो ग़ई। फिर खींची ग़ई...ताकत कर के वह छूटी... फिर बिछौने से दूर हट चिमनी के पास जाकर नाइट गाऊन पसार कर देखा।
लाल दाग़ देख विजेंद्र शरमा ग़या। कुछ देर बाद समझ में आया, तो हँस दिया। जयजयवंती को उसने फिर से पकड़ में ले लिया तब बंद दरवाजे पर दस्तक हो रही थी- ‘टक्... टक्... टक्... '
**************
9
‘विजेंद्रसिंह राठौड़'।
‘यस सर'।
कमान्डर इन चीफ ने देखा तो एक युवा सामने खड़ा था।
‘राजपूताना राइफल्स की एक टुकड़ी तुम्हें देने का निर्णय हुआ है'।
‘यस सर'।
कमान्डर इन चीफ ने टेबल रखे विशाल मानचित्र की ओर देखा। फिर लाल रंग़ वाले विस्तार को पहचान विजेंद्रसिंह को पास बुलाकर दिखाया।
पीले रंग़ के मानचित्र का कुछ हिस्सा लाल रंग़ का था। कमान्डर इन चीफ वही बता रहे थे।
विजेंद्र ने देखा। वह घर से जब निकल रहा था तब युवा पत्नी ने भी नाइट गाऊन में ऐसा ही रंग़ दिखाया था। देर से वह समझा था। सारी इच्छाएँ रोक दी थीं। ओर वह चल निकला था।
झट से उसने सारे विचार झटक दिये।
सूचनाओं की ओर सारा ध्यान केन्द्रित किया।
कमान्डर इन चीफ जोर दे कर समझा रहे थे कि सबसे बड़ी जिम्मेदारी का काम उसे दिया जा रहा है। और यह देश उस जैसे युवा के पास बहुत बड़ी अपेक्षा रखता है। युद्ध कब शुरू होगा। कहा नहीं जा सकता। शायद अब ही... शायद एक दिन के बाद... कि कभी भी...किन्तु युद्ध का सामना युद्ध ही से करना होगा। सब को एकदम तैयार रहना होगा। और दुश्मन जिधर भी हमला करें उस पर तीनों ओर से टूट पड़ना होगा। दुश्मनों की गिनती ऐसी थी कि हमें पता भी न चले और वे हमला कर दें। किन्तु यहाँ तो सभी को पता था। सभी सचेत हो चुके थे। युद्ध की तैयारियाँ पूरी कर दी ग़ई थीं। सभी अफसरों को बुला ले लिया ग़या था। जो छुट्टी पर थे उनकी छुट्टी रद्द कर दी ग़ई थीं। तुरंत हाजिर होने का फरमान जारी कर दिया ग़या
था। मानचित्र तैयार कर लिए ग़ये थे। जासूस अपने कार्य में लग़ ग़ये थे। कुछ टुकड़ियों को सीमा पर भेज दिया ग़या था। कुछ जा रही थीं। सारा बंदोबस्त हो चुका था। सहायता के लिए अलग़-अलग़ टुकड़ियाँ भिन्न भिन्न स्थानों पर तैयार खड़ी थीं।
विजेंद्र सिंह राठौड़ ऐसे युवा अफसर को लेकर विमान सीमा की ओर उड़ा तब कमान्डर इन चीफ को संतोष हुआ।
कब, किस ओर से, कैसे हमला होगा, निश्चित न था। इसलिए सभी प्रकार की तैयारियाँ आवश्यक थीं। और उसकी पूरी व्यवस्था की जा चुकी थीं।
* * *
तंबू की खिड़की से विजेंद्र ने बाहर झाँका।
रात हो चुकी थी। आकाश से बर्फ की वर्षा हो रही थी। चारों ओर अंधेरा था। बादलों से कभी-कभी अष्टमी का चंद्रमा झाँककर छिप जाता था।
वह ऐसे ही खड़ा रहा।
यों ही दूर-दूर ताकता रहा।
सीमा सारी जाग़ रही थी। फिर भी रोशनी का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। लालटेन को साढ़े आठ बजे तक ही कम रोशनी करके जलाने की छूट थी। फिर अंधेरा ही अंधेरा...
विजेंद्र ने तंबू के घने अंधकार को देखा था।
फिर आकाश की ओर देखा।
बर्फ की वर्षा जोर से हो रही थी।
आकाश में बादल इकट्ठे हो रहे थे।
चंद्रमा के दर्शन दुर्लभ थे।
लालटेन बुझा दिया ग़या था।
बरसते बर्फ के वातावरण में पत्नी के पत्र लहू को ग़र्म रखे हुए थे।
विजेंद्र ने खिड़की से हाथ बाहर किया।
कुछ देर ऐसे ही रखे रहा।
फिर हाथ अंदर खींच लिया। ऊँग़लियों पर, हथेली में, नाखून पर बर्फ के कण झम ग़ये थे...चमड़ी तो मानो जड़ हो ग़ई थी।
नींद आ नहीं रही थी। आँखें बंद न हो रही थी। बंद आँखों के सामने युवा पत्नी का सुंदर चेहरा हर वक्त छाया रहता था। उसके सभी पत्रों को, हरेक शब्दों को, हरेक अक्षर को वह पहचानता था, जानता था और प्यार करता था। सब मानो मुहपाठ हो ग़या था। हरेक पत्र का हरेक शब्द उसके दिल में शिल्प की तरह अंकित हो चुका था। और इस बर्फीली रात में सब याद आ रहा था। तीव्रता से सता रहा था।
पहला ही वाक्य- प्रथम संबोधन...
उसने आँखें बंद कर लीं।
तंबू की खिड़की से बर्फ का सीना चीर कर बहता पवन उसके चेहरे पर थप्पड़ लगा रहा था। किन्तु विजेंद्र को उसकी कोई चिंता न थी। वह एकांत में जयजयवंती के गुनगुने सांनिध्य की झंखना और एक-एक शब्द की जुगाली कर रहा था।
‘मेरे युवा अफसर... '
उसकी बंद आँखें खुल ग़ई।
उसने इधर-उधर देखा।
रूपा की घण्टी जैसी आवाज सुनाई दी।
बाहर कोई न था।
क्या जयजयवंती की आवाज थी ?
हरेक पत्र में किया ग़या संबोधन शिल्प की तरह उसकी नज़र के सामने कोरा जा रहा था...
‘मेरे युवा अफसर...
तुम ग़ये ओर थोड़े दिनों ही में यहाँ बादल घिरने लगे हैं। मेघ हरी-हरी पहाड़ियों पर बरसता रहता है। ‘पीली' पंछी संवनन करने लगे हैं। पहाड़ी कौए ने ऊँची पहाड़ी के सामने के वृक्ष पर घोंसला बनाया है। और आपके जाने के बाद पीले पीले पंखोंवाली तितली को मैंने कभी भी नहीं पकड़ा है। आपको याद है न ? आप थे तब रंगों से मोहित हो मैंने तितली को पकड़ लिया था ? तब मेरा मन नहीं माना था न। पंखों के रंगों ने मेरी ऊँग़ली पर हल्दी लगायी थी। कितने सुहावने थे वह रंग़ ? नये-नये रंगों को देखकर मैं तो पाग़ल-सी हो जाती हूँ। मेरे तो होश गुम हो जाते हैं। और जब होश आता है तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है। किन्तु अब मैंने तितली पकड़ना छोड़ दिया है। मन में एक भय-सा बना रहता है कि यदि मैं रंगों से मोहित हो होश खो बैठूँगी तो मुझे रोकेगा कौन ? कोमल तितलियों को मेरी ऊँग़लियों के बीच से बचायेगा कौन ? '
तंबू के पास से धीमी आवाज़ आयी।
यादों के मोती टूट कर बिखर ग़ये। ताककर उसने देखा।
तंबू के परदे पर किसी की छाया पड़ रही थी।
‘कौन ? ' धीमे किन्तु भारी आवाज़ से उसने खिड़की ही से पूछा।
‘मैं हूँ सा'ब ‘।
आवाज़ पहचानी थी।
विजेंद्र ने परदे को खोल दिया।
रम की बोतल रख एक सैनिक चला ग़या।
हर तीसरे दिन रम की बोतल मिलता था। किन्तु यहाँ, इस कातिल ठंड में रम का बोतल जल्दी खाली हो जाती। हरेक अफसर देर तक जाग़ते, अपनी पत्नी को, उसके साथ बिताये ग़ये दिनों को याद करते और यादें असह्य बनने पर रम का घूँट लेते और सारे शरीर में आग़ की तरह ग़रमी फैल जाती।
विजेंद्र ने भी अंधेरे में एक घूँट लिया।
मजा आ ग़या।
पत्नी की यादें सता रही थीं।
उसके पत्र, पत्र के शब्द, शब्दों में छिपी मधुरता...उसने आँखें बंद कर लीं।
अन्य पत्रों के शब्दों की जुगाली करने लगा।
‘यहाँ अब बारिश रुकनेवाली नहीं है। मैं जब मेघ को अति निकट से देखने जाती हूँ तब पहाड़ी की चोटी पर से उससे बिनती करती हूँ। रुक जा... रुक जा... रुक जा... मेरे युवा अफसर के आने के बाद तू बरसना। किन्तु वह तो मेरी बात सुनता ही नहीं। वह तो मुझे प्यार से भिगो देता है। सारे शरीर को भिगोता है। जल से वह मुझे ऐसे शराबोर कर देता है जैसे प्यार से आप मुझे बेचैन कर देते थे ... '
उसने एक आह ली। न किसी से कहा जा सके और न ही सहा जा सके वैसी थी उसकी स्थिति।
पत्नी के हरेक पत्र के उत्तर उसने दिये थे। यहाँ का उकता देने वाला वातावरण... बर्फ की वर्षा... ठंडी ठंडी हवा... और रम के घूँट...
कार्क खोल फिर से एक घूँट लगायी।
ग़रमी शरीर में दौड़ रही थी।
अंधेरे ही में उसने सोचा। जयजयवंती प्रेम से भीग़ जाये, वैसा पत्र लिखना चाहिये। अभी ही लिखना चाहिये... इसी वक्त लिखना चाहिये...
किन्तु...
गाढ अंघकार की ओर उसने गुस्से से देखा। फिर आकाश की ओर देखा। उमड़ रहे बादलों को देखा। हो रही वर्षा का, बाहर हाथ करके मानो नाप ही ले लिया।
कोई भी मानो साथ देने को तैयार न था।
वह खड़ा हो ग़या। सिर रखने की जग़ह से अभी ही मिला लाइटर लिया। एक ओर दबाया, चिनकारी हुई। उसने लालटेन जलाना चाहा।
किन्तु फौज़ी कानून में इसकी संपूर्ण मनाही थी।
इधर-उधर के सभी तंबूओं को देखा। कहीं भी रोशनी का नामोनिशान तक नहीं था। वह खुद ही अग़र नियम को तोड़े तो फिर कानून बनाने का क्या अर्थ ?
किन्तु कितना विचित्र कानून ?
महान सेनापति नेपोलियन की एक बात उसे याद आयी।
रात में रोशनी करने की मनाही थी। एक युवा अफसर ऐसे कानून पर क्रोधित हो, कानून तोड़ मोमबत्ती जलाकर पत्नी को पत्र लिखने बैठा। उसे कुछ पता ही न रहा। मन पर काबू न था और फर्राटे से पत्र लिखता जा रहा था कि बाहर घुम रहे नेपोलियन ने रोशनी देखी। वह आश्चर्यचकित रह ग़या। रात में रोशनी करने की कड़ी मनाही थी फिर भी अफसर क्या कर रहा है ? पदचाप भी सुनाई न दे वैसे वह वहाँ पहुँचा। देखा, पूछा। युवा अफसर ने सच बता ही बता दिया। नेपोलियन ने उसे दो ही बात कही- पत्र पूरा कर दो और लिखो कि यह मेरा आखिरी पत्र है... और फिर एक धमाका हुआ और...
विजेंद्र ने दरवाजा के खुले परदे को खिसका कर बाहर जाना चाहा। किन्तु वह ऐसा न कर पाया। अंधेरे ही में पत्र लिखने की कोशिश की, किन्तु लिख न पाया इसलिए सोचता रहा। यादों को ताज़ा करता रहा।
सुंदर युवा पत्नी को छोड़कर आये न जाने कितने महीने हुए, कितने दिन हुए, कितने घण्टे बीते, कितने मिनट गुजरे - उसकी गिनती वह करता रहा। आकाश से संध्या सुंदरी धरती पर उतर रही थी। बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े बरस रहे थे।
और वह सोचता रहा।
सोचता ही रहा।
फिर खड़ा हुआ। फिर खिड़की से झाँका। पूरब की ओर का आकाश स्वच्छ लग़ रहा था। शायद उषा का आग़मन होने को है।
उसने बूट पहने। देह को ओवर कोट से लपेट घूमने निकल पड़ा।
बर्फ के टुकड़े बूट के नीचे कुचल रहे थे। कररर, कच... कररर कच...। वह चलता रहा।
लहू के दाग़ देख एक जग़ह पर खड़ा रह ग़या।
किसी हिंसक प्राणी ने किसी को मारा होगा...मृत पशु का रक्त कुछ दूर तक बह जम ग़या होगा।
वह मुड़ा।
आज जयजयवंती का पत्र मिलना चाहिये।
उस पत्र में कोई नवीनता होगी।
दोनों आँखें उसने बंद कर दीं।

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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:52

10
सारा दिन पत्र ही की प्रतीक्षा में बीता।
पत्र नहीं आया था।
कुछ भी अच्छा नहीं लग़ रहा था। सारा दिन मन उदास ही रहा था। वह घूमता रहा, टहलता रहा। खाई तक चक्कर काट आया। थोड़े मित्रों से मिला। सभी ने चटकारे ले-लेकर युवा स्त्रियों के बारे में बातें की थीं। जिससे तो वह ओर अधिक बेचैन हो उठा था।
दिल में एक छुपी आग़ लेकर वह तंबू के भीतर आया। फिर से रम के दो पेग़ लगा चुका था। कुछ चैन न था। उसने पत्नी को एक बार नहीं, बारंबार लिखा था कि वह हररोज पत्र लिखें।
फिर भी आज पत्र नहीं मिला।
कारण ?
उसने अनुमान लगाया कि नौकर को डिबिया में पत्र डालने दिया हो और वह भूल ग़या हो, या बाद में डालूँगा, सोच कर रख दिया हो...
अब तक तो पत्नी के दो पत्र मिलने चाहिये थे, किन्तु एक भी न मिला?
दूसरा दिन भी पत्र की प्रतीक्षा में ही बिता।
तीसरे दिन भी पत्र नहीं आया।
मुख्य थाने से थैला भर कर डाक लाने वाले संदेशवाहक से रह तो नहीं ग़या होगा ?
आज तो संदेशवाहक को डाँटना पड़ेगा...वह तो तंबू में ही रहेगा... और आज भी पत्र न मिला तो...
विजेंद्र बैचेन हो उठा।
वह बोतल के पास पहुँचा किन्तु बोतल तो खाली था। आज रात फिर मिलेगी तब तक होंठ पर जीभ फेरकर ही संतोष मानना पड़ेगा...
खाली बोतल को उसने जोर से कोने में फेंका। खणणण की आवाज के साथ काँच के टुकड़े बिखर ग़ये।
समय मानो थम ग़या था।
अब क्या करें ? कहाँ जायें ? इस उदासी को कैसे मिटाया जाय ?
उसने पत्नी के सभी पत्र निकाले।
ग्यारह पत्र थे।
पारायण कर रहा हो वैसे सभी पत्रों को पढ़ता ग़या।
ऊख की साँठ से धीरे धीरे रस चूस रहा हो वैसे शब्दों का रस लेता रहा...चबाता रहा... निग़लता रहा...
वह यहाँ आया था तब से, लग़भग़ दो महीनों और सतरह दिनों के बीच ग्यारह पत्र मिल चुके थे, किन्तु अभी...
उसने फिर से गिनती कर देखी।
पत्र नहीं आया था और आज नौवाँ दिन चल रहा था।
पहले पहल तो सप्ताह ही में दो पत्र...
पोस्ट ऑफिस की काली मुहर वाले ग्यारह पत्रों को वह ताक रहा था।
फिर सोचा, आज तक जयजयवंती बेदरकार न थी। उसके पत्र अवश्य आते थे। जिस दिन पत्र आनेवाला होता उस दिन संदेशवाहक तंबू के दरवाजे के पास हँसता हुआ आता था।
इस बार कोई न कोई घोटाला हुआ है।
डाक लेकर आनेवाले संदेशवाहक निश्चित समय पर आता था। मुख्य थाने पर फौजी ट्रक में डाक आती थी। और वहाँ से संदेशवाहक द्वारा अलग़ अलग़ चौकियों पर भेजी दी जाती। डाक लाने-ले जाने की व्यवस्था तो यहाँ अच्छी ही थी।
तो फिर उसे पत्नी के पत्र क्यों नहीं मिल रहे हैं ? मन मानने को तैयार ही न था।
मन बेचैन था।
दिल में कुछ कुछ होने लगा था।
आज ऐसा क्यों हो रहा है, समझ में नहीं आ रहा था।
कुछ दिनों पहले पिता जी का पत्र मिला था। किन्तु परिपत्र जैसा। वे अधिक लिखते नहीं थे। पत्र भी अधिक नहीं लिखते। आज से नहीं वे जब सैनिक स्कूल में थे तभी से ही।
किन्तु पत्नी तो नियमित रूप से पत्र लिखती ही थी। और अपने भोले, निर्मल और स्वच्छ प्रकृति का परिचय देती रहती थी।
हरेक पत्र में वह कुछ न कुछ नया अवश्य लिखती। कभी लिखती कि पहाड़ी कौए ने सामने की पहाड़ी के छोटे वृक्ष पर घोंसला बनाया है तो फिर कभी नये अल्शेशियन कुत्ते के दोष बताती।
जयजयवंती के पत्र पढ़ने में मजा आता।
वैसे भी अब तक युद्ध शुरू तो हुआ ही न था। किन्तु कभी-कभी सामान्य मुठभेड़ होती रहती। दुश्मन का कोई विमान हमारी सीमा में आ घुसता। कभी किसी अन्य जग़ह पर हमला होता। किसी चौकी पर वे अपना झंड़ा लहरा देते, ऐसा होता रहता था। कोई विशिष्ट घटना न हुई थी। वैसे सारी सीमा पर सैन्य खड़ा था। कुछ संवेदनशील स्थानों पर चौकियाँ बना दी ग़ई थीं। सैनिक थाने बराबर कार्यरत हो चुके थे। नियमित रूप से हरेक टुकड़ी के सैनिक निगाह रख रहे थे। आठ-आठ घण्टों के बाद बारी बदल दी जाती थी। किसी को छुट्टी न दी जाती थी। रात को लालटेन या मोमबत्ती जलाने की सख्त मनाही थी।
सब कुछ था। फिर भी हकीकत यह थी कि नव-नव दिनों से अपनी सुंदर पत्नी का कोई पत्र मिला न था। और उसके कारण का पता न था।
लोहे की खाट पर पड़े-पड़े विजेंद्र ग़हन सोच में था।
खिड़की खोल उसने सामने दिख रहे शांत प्रदेश की ओर देखा।
संदेशवाहक नहीं दिखा।
उसने घड़ी में देखा। मन ही मन हँसा और सोचा कि अभी तो थाने पर ही डाक वाला ट्रक नहीं आया होगा। वहाँ से लेकर संदेशवाहक निकलेगा तो उसे यहाँ आने में तो दो-ढाई घण्टे...
आँखें बंद कर वह पड़ा रहा।
यह तो कैसी भयानक पीड़ा है ? जिसने भोगा हो वही जाने- ऐसा एक मित्र ने हँसते हुए कहा, वह याद हो आया। तब तो उसे मज़ाक लग़ रहा था परंतु वह एक हकीकत थी- ऐसा अब खटिया में पड़ा पड़ा वह सोच रहा था।
सोचना बंद हुआ तो वह अधीर हो उठा और मन बेचैन। नींद उड़ ग़ई तब उसने सारे पत्र फिर से पढ़े, दूसरी बार पढ़े, तीसरी बार पढ़े... और वह पढ़ता ही रहा...
शाम को पाँच बजे संदेशवाहक तंबू के पास आकर सलाम करके खड़ा रहा।
विजेंद्र ने पहले डाक ली और संदेशवाहक को एक सिग़रेट दी।
लम्बी सिग़रेट की ओर देख, खुश हो सलाम कर वह चला ग़या।
विजेंद्र ने लिफाफे के अक्षरों को पहचाना, पत्नी के ही थे।
झट से लिफाफे को फाड़ उसने पत्र को हाथ में ले लिया।
पत्र इस बार देर से मिला किन्तु पहले के पत्रों से लम्बा था। तीन-चार काग़ज़ भरे थे।
विजेंद्र बैठा ओर चैन से पत्र पढ़ने लगा।
‘प्रिय विजेंद्रसिंह राठौड़'।
संबोधन पढ़कर वह चौंका। इस पत्र में संबोधन ही बदल ग़या था... अब तक मिले पत्रों में कुछ बातें तो बदली होती थीं। परंतु संबोधन तो ‘मेरे युवा अफसर... ' ही रहता।
किन्तु जैसे भूखा आदमी राह नहीं देखता, प्यासा तपस्या नहीं कर सकता वैसे वह भी पत्र पढ़ने लगा।
‘आपने बहुत राह देखी होगी। इस बार पत्र लिखना मैं चूक ग़ई, ऐसा सोच आपको गुस्सा आया होगा। किन्तु... किन्तु मैं मजबूर थी। आपको क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ, वह मैं निश्चित न कर पायी थी। बार-बार सोचा किन्तु मकड़ी के जाले में कोई मनमौज़ से उड़ रही मक्खी फँस जाती है वैसी स्थिति मेरी हो ग़ई थी। और उसके बारे में सब कुछ आपको बता दूँ कि नहीं वह मैं निश्चित न कर पा रही थी। और उसी उधेड़बुन में इतना बड़ा पत्र लिख रही हूँ।
अग़ले ही पत्र में मैंने लिखा था कि यहाँ वर्षा शुरू हो ग़ई है। छोटी-बड़ी पहाड़ियों पर काले बादल हर वक्त घिरे रहते हैं और फिर उदार मन से बरस कर प्यार से सराबोर कर देते हैं। सारी पहाड़ियों को पानी से तर-बतर कर देते हैं।
तुम ने तो यहाँ का मोनसून नहीं देखा न ? वर्षा का मौसम तो यहीं का।
अधिकतर तो अकेली अकेली मैं लाल मिट्टी के रास्ते से पहाड़ियों की ओर, और वहाँ से पग़डंडी की ओर मुड़ जाती हूँ। अब तो सारी पहाड़ियों ने अपने पुराने वस्त्र त्याग़ नये पहन लिये हैं। जहाँ देखो वहाँ वनराजि ही वनराजि दिखाई देती है। कभी धूप तो कभी छाँव, कभी श्याम मेघों की परछाईं... और फिर वर्षा रूपी मोतियों का अविरत बरसना... सब कुछ बेनमून, अद्वितीय। ऐसी धरती कहीं भी नहीं है - ऐसा प्रतीत होता है।
हाल ही में पिता जी ने मैदानी खेत खरीदे हैं। उसकी सभी कारवाईयाँ कुछ दिन पहले ही पूरी हो चुकी हैं। वे भी शायद आपको बतायेंगे। सरसों की फसल बहुत सुंदर होती है... ऐसा बाजू की ज़मीन का मालिक कहता है... मैं भी वहाँ हो आयी हूँ। किन्तु तब मुझे जरा भी मालूम नहीं था कि धरती के इन टुकड़ों की देखभाल अब मुझे करनी होगी।
आज तो मुक्त मन से सब लिखना सोचा है। दिल बलकुल साफ है। भोले दिल से सब कुछ लिख रही हूँ, यह बताने की जरूरत है क्या ?
ये सब तो बाहर की बातें थीं। किन्तु मेरे दिल की, प्यासे दिल के क्या हाल हैं, वह भी साथ में बता दूँ।
मुँह में राम और बग़ल में छुरी, ये मेरे स्वभाव में नहीं है। जो परिस्थिति है, और मैंने जो कुछ भी किया है, ऐसा लिखने से बेहतर है कि मैंने जो कुछ भी किया है, वह विस्तार से बताना चाहती हूँ। वैसे मेरा दूसरा मन कह रहा है कि मुझे स्वयं आपको नहीं बताना चाहिये। आपको भानेवाली, झूठी-झूठी, पसंद आये वैसी बातें लिखते रहना। किन्तु मैं ऐसा न कर पायी। जिससे आपको सब कुछ बता देने का निर्णय कर लिया है।
एक बात का इकरार अवश्य कर लेने को मन ललचा रहा है कि यदि मेरी शादी न हुई होती, आपसे तन-मन मिले न होते तो जो ग़लती मैं कर बैठी हूँ, वह कभी न होती।
इक्कीस साल की उम्र में मैंने बरखा के ऐसे न जाने कितने मौसम देखे हैं कि जिससे पाग़ल हुआ जा सकता था, किन्तु कभी भी बावरी होकर मैंने कोई ग़लती न की।
कहा जाता है कि बाघ-चीता जैसे हिंसक प्राणी एक बार मनुष्य का लहू चख जाते हैं तो मरते दम तक मनुष्य ही का शिकार करते हैं। और जल्दी मर जाते हैं। उसकी उम्र कम हो जाती है... किन्तु मनुष्य के लहू को चखनेवाला चीता किसी अन्य प्राणी का शिकार कभी ही करता है। मेरे चित्त के बारे में भी यदि कुछ कहना हो तो यही कहा जा सकता है। मैंने जब तक पुरुष को पूर्ण रूप से देखा न था, पूर्ण रूप से भोगा न था तब तक सब कुछ सामान्य था। किन्तु तुम्हारे सहवास के बाद तो...
हरी-हरी, नीली नीली पहाड़ियों पर दिल खोल बरसते पाग़ल मेघ को देख आपकी याद के दीपक की सौ सौ ज्योतियाँ मेरे मनोजग़त में प्रग़ट हो उठीं। मुझे कुछ भी सूझ न रहा था। प्रकाश की किरणों से मैं मानो चौंधिया ग़ई थी... अंध हो ग़ई थी।
शीतल पवन था, ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ थीं, बावरा-सा मेघ था। और मुक्तता से संवनन कर रहे पीले पीले पंखोंवाले ‘पीली' पंछी थे।
सब कुछ था यहाँ पर, किन्तु आप न थे। मन आकुलित था। उस बेचैनी, उस घबराहट को मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती। उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है, डिक्शनरी में भी कोई शब्द न होगा।
**********
11
पिताजी ने मैदानी खेत जिससे खरीदे हैं उसका युवा लड़का कुछ दिनों से हमारे बंग़ले पर कभी-कभार आता रहता था। पैसे के बारे में बातें करने, कुछ दस्तावेज मुंशी के पास लिखवाने वह आता रहता था।
एक दिन शाम के वक्त मैं लाल मिट्टी के रास्ते से मुड़कर पग़डंडी की ओर मुड़ी। सीधे छोटी-बड़ी पहाड़ियों को पार कर हम जहाँ बैठे थे, तुम्हारी गोद में मैं पड़ी थी, तुम्हारा हाथ मेरे कंधे पर था, वहाँ मैं बैठ पड़ी। तुम्हारी यादें आकाश में उभर आये बादलों की तरह मेरे चित्त में उभर आयी। जहाँ देखें वहाँ प्रेम... प्रेम... प्रेम... ही था। सारा वातावरण प्रेममय बन ग़या था। काले-काले मेघ पहाड़ियों पर अब बरसने लगे थे। मन मेरा मेरे बसमें न था। मूसलाधार वर्षा में मैं भीग़ चुकी थी। फिर भी दिल में तुम्हारी यादें थीं। एक पूर्ण पुरुष की यादें... ग़र्म ग़र्म यादें...
मैंने आँखें बंद कर लीं थीं। मेघ बरस रहे थे...यादें... यादें... सिर्फ यादें...
वहीं तो किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
मैं आँखें खोल न पायी। अपने हाथ से मैं उसे दबा बैठी... और फिर...
मेघ बरसते रहे, सूरज सो ग़या था। ‘पीली' पहाड़ियों के पीछे छिप ग़ये थे, पहाड़ी कौआ छोटे वृक्ष की डाली के अपने घोंसले में जा छिपा था। तितलियाँ बिखर ग़ई थीं।
मैं ऐसी मदहोश थी कि उससे बाहर निकलना मेरे लिए असंभव था। मेरे ही लिए नहीं किसी भी युवा स्त्री के लिए...
और उसी मदहोशी में उस जमीन मालिक के बेटे से मैं कब तक संभोग़ में डूबी रही, मुझे पता न रहा। किन्तु रायफल के एक बार से मेरा होश लौटा। कपड़े ठीक कर प्रगाढ़ होते जाते अंधेरे में देखा तो पिताजी दौड़ते हुए ढलान उतर रहे थे और मेरे साथ वाला युवा तड़प कर हमेशा के लिए शांत हो चुका था।
मैंने ग़लती की है ऐसा कहने से बेहतर है कि मैं कहूँ-कि मैं ग़लती कर बैठी।
जो कुछ हुआ उसका मुझे अत्यंत रंज है। किन्तु जो कुछ हो चुका है वह न हुआ ऐसा तो नहीं कहा जा सकता। मैंने अपने मन की सारी बातें अक्षरश: बतायी हैं। उसमें न तो अतिशयोक्ति है और न ही बनावट। अभी अभी जो कुछ हो चुका है वह मैंने कपटरहित हो तुम्हें लिखा है।
तुम, विजेंद्रसिंह राठौड़-मेजर-राजपूताना रायफल्स-टुकड़ी नं.117, मेरे पति-पूर्ण पुरुष- क्या सोच रहे हो, क्या निर्णय लेने जा रहे हो, वह लिखोगे तो मुझे संतोष होगा... और तुम जो भी हुक्म करोगे, वह मुझे, जयजयवंती राठौड़ को, तुम्हारी पत्नी को मंजूर होगा, सदा के लिए मंजूर होगा...
और एक विशेष दु:खद बात बताती हूँ कि तुम्हारे पिताजी, मेरे पिताजी मेजर बसवेश्वरसिंह राठौड़ ने स्वयं पुलिस के पास जाकर समर्पण कर दिया है। वे हाल में कस्टडी में हैं और ऐसे जुल्म में गिरफ्तार हैं जिनकी जमानत भी नहीं हो सकती।
इन सब बातों का स्वीकार मेरे मुक्त रूप से, शुद्ध हृदय से करने के बाद मैं अपना यह आखिरी आश्चर्य व्यक्त कर रही हूँ कि पिताजी ने जब मेरे साथ के युवा को रायफल से उड़ा दिया, तब मुझे, उनकी पापिनी पुत्रवधू को क्यों न मारा ? क्यों न मारा ?
क्यों नहीं... क्यों नहीं... क्यों नहीं... ? '
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

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Jemsbond
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Re: उपन्यास -मुझे कुछ याद नहीं /हरिसिंह दोडिया

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 12:53

12
विजेंद्र शेर की तरह भयानक रूप से दहाड़ा।
सारा बर्फीला मैदान खाई तक हचमचा उठा।
ठण्डी धरा हिल उठी।
उसने आग़ ऊग़लती आँखों से उस पत्र को देखा।
अपनी सुंदर, रूप रूप के अंबार जैसी जयजयवंती यह क्या कर बैठी ? उसने ये क्या कर दिया ? सारा जीवन बरबाद हो चुका था। पापी पत्नी उसके लिए मर चुकी थी। चाहे उसने भोलेपन में उसकी यादें दिल में भर कर ये किया हो...किन्तु...किन्तु... जयजयवंती अपने लिए, युवा मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़ के लिए अग्राह्य थी। सदा सदा के लिए अग्राह्य थी।
आँखें आग़ उग़ल रही थीं। दिल में दावाग्नि जल रही थी। मन बेकाबू हो रहा था। सारा शरीर क्रोध से काँप रहा था। रोम रोम खड़े हो ग़ये थे।
आकाश में रात ग़हरा रही थी। बादल झूल रहे थे। बर्फ की वर्षा होने लगी थी। ठंड़ ने अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया था। हिम-सा ठण्डा पवन बर्फ का सीना चीर कर यहाँ तक आ पहुँचा था।
बाहर ये हाल थे तब युवा मेजर विजेंद्रसिंह राठौड़...राजपूताना रायफल्स, टुकड़ी नं.117 की कमान संभालते हुए जल रहा था।
उसका मन, मोम जैसा हृदय और पत्थर-सा तन सुलगे हुए थे। भड... भड़... करके तीव्रता से जल रहे थे।
शरीर से पसीना टपकने लगा था।
कपड़े भीग़ ग़ये थे।
तंबू का परदेवाला दरवाजा खुला था।
उसके हाथों पत्नी का आखिरी पत्र था। जिसके लिए वह नव-नव दिनों से तड़प रहा था, राह देख रहा था, घूम रहा था, बेचैन हो रहा था।
वही पत्र उसके हाथों था।
इसके लिए, इन समाचारों के लिए वह कितना व्याकुल था ? कितना परेशान था वह ?
ना... ना...
तो ?
विजेंद्रसिंह के मन में जानी दुश्मनों की तरह भयंकर युद्ध का प्रारंभ हो चुका था।
वह तो पत्नी की सुंदर मुखाकृति के पीछे पाग़ल था।
किन्तु...
पत्नी ने अपनी गैरहाजिरी में हरी-हरी पहाड़ियों के बीच क्या कर दिया था ?
पाप ?
पाप नहीं तो ओर क्या ? पाप के भी दूसरे खूबसूरत रूप हो सकते हैं।
किन्तु अग़र ऐसा ही होता तो अपनी खूबसूरत और युवा पत्नी अपने ही हाथों ये सब क्यों लिखतीं ? क्यों...? क्यों...?
अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने... ?
‘नहीं... नहीं... नहीं... '
विजेंद्रसिंह की ग़र्जना सुनकर रम का बोटल देनेवाला सैनिक ग़भरा ग़या। वह दो कदम पीछे हट ग़या। डरते डरते दरवाजे के पास बोटल रख दबे कदमों से वापस चला ग़या।
विजेंद्रसिंह ने देखा। पाग़ल की तरह उसने हँसना चाहा। वह हँसा। खिलखिलाकर हँसा। उसकी चमकदार आँखों में आँसू उभर आये। दाँत एक-दूसरे से टकराये। पत्र देखा। अंधेरे में कुछ नज़र न आया। किन्तु पत्नी का सुंदर चेहरा आँखों के सामने उभर आया।
थप्पड़ मारकर उसने उस मस्त चेहरे को हटाना चाहा किन्तु हटा न पाया। चेहरा जहाँ था वहाँ ही स्थिर था। अब उसका रूप उसके किस काम का ? अब उस यौवन का क्या करें ? अब उस मस्त शरीर से क्या काम ?
कुछ भी नहीं...कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीं...
क्यों ?
वेश्याएँ क्या सुंदर नहीं होतीं ? उनकी काया क्या खूबसूरत नहीं होती ? विजेंद्रसिंह राठौड़ को वेश्या जैसी पत्नी से अब क्या लेना-देना ?
अब भी वह काँप रहा था।
अब भी शरीर में कँपकँपी थी।
दिल अब भी दुख रहा था।
अब भी मन में आग़ लगी हुई थी।
और अब भी आँखों के सामने जयजयवंती का चेहरा हूबहू नज़र आ रहा था।
विजेंद्रसिंह ने पास के कोने से रायफल उठा ली।
एक हाथ में पत्नी का पत्र था।
दूसरे में रायफल थी।
चमकदार आँखों के सामने खूबसूरत पत्नी थी।
उसने काँपते हाथ से पत्र को रायफल की नोक पर खोंस दिया और फिर ऑंख के सामने के पत्नी के चेहरे पर निशान ताका।
और फायरिंग़ किया।
ठण्डी रात की घनी हवा अशांत हो ग़ई।
टूटती आवाज खाई की ओर दौड़ पड़ी। जिसने भी ये आवाज सुनी वे सब चौंक पड़े।
बर्फ के बीच की खोखली जग़ह में रहने वाले ठण्डे पंछी पंख फड़फड़ाकर उड़ ग़ये। कुछ अफसर आशंकित हो दौड़ आये।
और रायफल की नोक पर खोंसे पत्नी की निर्दोषता के सारे शब्द टुकड़े-टुकड़े हो उड़ ग़ये।
**********
13
किन्तु...
किन्तु पत्नी के चेहरे को वह भुला न पाया।
रायफल के बार से, नोक की ओर का मोटा हथेली-सा कपड़ा फट ग़या था किन्तु पत्नी का कोमल चेहरा नहीं मिटा था।
अब भी वह चेहरा आँखों के सामने उभरा हुआ था।
ऐसा कैसे हो सकता है ?
आग़ उग़ल रही आँखों की तुलना में रम का बोतल कुछ काम न आया।
उसने बोतल उठा लिया।
रायफल की लोहे की नली से बोतल का मुँह तोड़ डाला।
जलते अंगारों पर घिसते हुए पेट्रोल गिर पड़ा हो वैसे रम ग़ले के भीतर उतारता रहा... आवाज थिर हवा पर तिरती रही... ग़ट... ग़ट... ग़ट... ग़ट... ग़ट... ग़ट...
होंठ पर काँच लग़ने से लहू निकल रहा था। होंठ चरचराते ग़ये किन्तु उसे पता न था। टूटे बोतल को बेपरवा से फेंक वह तंबू में जा-आ रहा था। बर्फ के टुकड़ों को तोड़ता हुआ इधर-उधर देख रहा था।
वह जोर से चीखना चाहता था, आत्महत्या करने की इच्छा होने लगी। पत्नी की तंदुरस्त और सुहावनी काया के टुकड़-टुकड़े कर देने का मन हो रहा था। और वह नर्म नर्म बर्फ पर घूमता रहा... बेकाबू हो नाचता रहा...पैर मारता रहा... क्रोध से ग़ङ्ढा करता रहा...
खुले आसमान से बर्फ की वर्षा हो रही थी।
विजेंद्रसिंह नशे में चकनाचूर था।
उसे कुछ भी याद न आ रहा था।
वह सब कुछ भूल चुका था।
एक ही बात पत्नी की निर्दोषता के इकरार की याद थी।
पत्र के शब्द जैसे जैसे याद आते वैसे वैसे वह बर्फ में लात मारता था। गिरता था। मैं... मैं... बोल रहा था।
देर तक वह तंबू के बाहर की बर्फ पर घूमता रहा।
वह थक ग़या।
बहुत थक ग़या था।
मन से संपूर्ण रूप से टूट चुका था।
पहले जो मन उत्साह, आरजू और अभीप्सा से भरा था, अब निराशा से भर ग़या था। आशा की कोई किरण नज़र नहीं आती थी। चारों ओर अंधेरा...सिर्फ अंधेरा छाया था। कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था, कहीं कोई रोशनी न थी, कोई सुख न था, और शांति भी न थी।
कहीं भी नहीं...
अब कोई पत्नी न थी, कोई सुंदरी न थी। कोई मदमस्त जयजयवंती नहीं थी।
अब कुछ भी बचा न था।
कुछ भी नहीं।
थकावट के कारण वह तंबू के दरवाजे के पास गिर कर बेहोश-सा पड़ा रहा।
सबेरा हुआ। सूरज निकला। खाई पर दिखा। किरणें फैलीं।
विजेंद्रसिंह राठौड़ की लाल-लाल आँखें जब खुलीं तब वह बर्फ में पैर डालकर पड़ा हुआ था। आधा शरीर तंबू के बाहर था। सारे शरीर में दर्द हो रहा था, आँखें लाल हो ग़ई थीं।
यादें, आहिस्ता आहिस्ता, खाई की ओर से मलयानिल की तरह फिर से लौट रही थीं, पत्नी, उसका चेहरा, पत्र, पत्र के शब्द, रम का बोतल, रायफल का बार, क्रोध से बर्फ पर घूमना...
सब याद हो आया।
फिर से सारे बदन में आग़ लग़ ग़ई।
उसने पानी पिया, जी भर पिया।
फिर वह पत्नी को आखिरी पत्र लिखने बैठा।
काँपते हाथ से पेन लिया।
क्या लिखना, समझ में नहीं आ रहा था।
कुछ देर गुस्से में ही बैठा रहा।
फिर लिखा-
‘जयजयवंती,
तेरा पत्र पढ़ा। मैं तुझे स्वीकार नहीं सकता। मैं तुझे माफ भी नहीं कर सकता। अब हम एक-दूसरे को सदा के लिए भूल जाते हैं। मैं सिर्फ विजेंद्रसिंह राठौड़ हूँ, तू सिर्फ जयजयवंती है। मैं पति था, तू पत्नी थी, वह सब अतीत हो चुका है। अब उसमें से कुछ भी नहीं है। अब मैं एक पुरुष हूँ और तू एक स्त्री मात्र, मेरा मकान, मेरी जमीन सबकुछ तेरे हैं। अब मैं कभी भी उन हरी-हरी पहाड़ियों में दर्द पाने के लिए नहीं आऊँगा। वहाँ रहकर तू सदा से जलती रहे, यही मेरी कामना है। तेरी मनोकामना क्या है, वह मैं नहीं जानता। किन्तु अंत में इतना जरूर बता देता हूँ कि तू मेरी पत्नी नहीं रही और न ही मैं तेरा पति। मैं तेरा पति नही हूँ, नहीं... नहीं... कोई भी नहीं... कोई भी नहीं... कोई भी नहीं... '
पत्र को लिफाफे में बंद कर उसने डाक की डिबिया में डलवा दिया।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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