बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Jemsbond
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बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:00

बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़

लेखक;ओमप्रकाश कश्यप



आज से ठीक चौदह साल पहले टोपीलाल का जन्मी हुआ. माता-पिता थे बेहद ग़रीब. अनपढ़, ईमानदार और भले. मेहनती और सूझबूझ वाले, मेहनत-मजदूरी करके पेट भरते. भला सोचते, भला ही करते. रोजगार की तलाश में गांव से शहर तक आए थे. शहर की सीमा पर एक होटल बन रहा था. हाथ का हुनर काम आया. दोनों को वहीं काम मिल ग़या. अपने श्रम-कौशल से उन्हेंट मान मिला; और सम्माभन भी. दिन बीतने लगे. एक दिन वे काम पर जुटे थे. होटल के कंगूरे की चिनाई का काम चल रहा था. तभी औरत के पेट में दर्द उठने लगा. पति ने सहारा दिया. वह उसको इमारत के एकांत स्थ्ल पर ले ग़या. थोड़ी देर बाद ही बच्चे की किलकारी हवा से लोरी गाने का आग्रह करने लगी. बेटे को ठीक-ठाक जन्मह देने के बाद मां ने उसके पिता से पूछा- ‘नाम क्याा रखोगे?'
उस समय पति के हाथ में एक टोपी थी. उससे वह माथे पर आए पसीना सुखाने के लिए हवा झल रहे थे. पत्नी् के एकाएक सवाल करने पर वे जवाब न दे सके. भीतर से छलकती खुशी को होंठों से दबाते हुए प्रश्नह-भरी निगाहों से टोपी हिलाने लगे.
‘समझ ग़ई, दूसरों से हटकर है, अच्छाल है.'
‘क्याह?'
‘टोपीलाल, है ना?'
‘हैं!' पुरुष चौंक पड़ा, बोला-‘तुम्हेंह पसंद है?'
‘तुम्हालरा दिया हुआ नाम भला नापसंद क्योंत हो.' अबोध शिशु को प्या'र से निहारते हुए मां मुस्कसरा दी.
इस प्रकार बातों-बातों में बच्चेय का नामकरण संस्का्र भी संपन्न हो ग़या. उसके जन्मप के समय एक और खास बात हुई. वह थी उसके मां को बहुत कम प्रसव पीड़ा. घर से बाहर प्रसव का सकुशल निपट जाना किसी चमत्कामर जैसा ही था. यही नहीं प्रसव का काम निपटाकर उसकी मां ने पिता को वापस काम पर भेज दिया था. उसके बाद तो वे पूरा काम समेटकर ही घर लौटे थे. इस बात की चर्चा टोले के लोग़ महीनों तक करते रहे.
टोपीलाल के पिता राजमिस्त्री थे. पति-पत्नीच दोनों साथ-साथ काम करने जाते. टोपीलाल के पिता नहीं चाहते थे कि उसकी मां काम करे. वह भी मजदूरी. इससे बाकी मजदूरों के आगे उनकी हेठी होगी, ऐसा उनको लग़ता था. इसलिए जब पहली बार उसकी मां ने काम पर साथ चलने कोे कहा तो उन्हों ने साफ मना कर दिया था.
‘इसमें शर्म कैसी?'
‘मेरी घरवाली होकर मजदूरों के साथ काम करो, मुझे अच्छा नहीं लगेगा.'
‘और जो पति-पत्नीा दोनों तुम्हाेरे लिए मजदूरी करते हैं, उनपर क्याो गुजरती होगी, कभी सोचा है? मुझसे पूरे दिन घर में बिना काम के नहीं बैठा जाता. तुम यदि अपने साथ काम पर नहीं रखना चाहते तो मैं दूसरी जग़ह काम की तलाश करूं.'
‘यह क्या बात हुई?'
उस दिन टोपीलाल की मां की ही चली. वह काम पर जाने लगी. उसके पिता नहीं चाहते थे कि वह ज्यासदा मेहनत करे. मिस्त्री होने के कारण वह चाहते थे कि कोई हल्काद-फुल्का काम दे दिया जाए. लेकिन टोपीलाल की मां बिना मान-गुमान के सबके बराबर मेहनत करती. मजदूर औरतों के साथ प्याथर से बोलती-बतियाती. जरूरत हो तो उनकी मदद भी करती.
बेटे के जन्मक के बाद टोपीलाल के पिता ने सोचा था कि चलो इसी बहाने वह कुछ दिन आराम कर लेगी. इसलिए बोले-
‘इस हालत में तुम्हाकरा कड़ी मेहनत करना क्याथ ठीक होगा?'
‘क्योंल जब मैं पहले जैसी स्वहस्था हूं तो पहले जैसा काम क्यों नहीं कर सकती?'
‘फिर भी लोग़ तो यही कहेंगे कि मैं बहुत कठोर हूं. बच्चेम के जन्मी के तीसरे ही दिन तुम्हें काम पर जोत दिया.'
‘मैं उन्हेंं बता दूंगी कि मैं अपनी मर्जी से काम करने आई हूं.'
‘ऐसी जिद किसलिए? फिर हमारे सामने कोई मजबूरी भी नहीं हैे. घर का खर्च तो मेरी कमाई से चल ही जाता है.'
‘इसलिए कि मैं मानती हूं कि जो कर सकता है उसको काम करना ही चाहिए. बिना मेहनत के खाने का किसी को अधिकार नहीं है.'
‘मुझे नहीं लग़ता कि इस हालत में तुम ईंट और गारे से भरी परात सिर पर उठा सकती हो?'
‘हां, यह तो मैं भी सोचती हूं; और तुम कहोगे तो उठाऊंगी भी नहीं.'
‘फिर वहां जाकर क्या करोगी?' टोपीलाल के पिता अचरज में थे.
‘मिस्त्रीगिरी! तुम्हागरे साथ इतने दिनों तक काम करते हुए मैं भी काफी कुछ सीख चुकी हूं. फिर एक बच्चे की मां हूं, अब तो मुझे भी तरक्की‍ पाने का अधिकार है, क्यों ?'
उसके बाद वही हुआ जो टोपीलाल की मां ने ठाना हुआ था. दो दिन के टोपीलाल को जमीन पर सुलाकर वह कन्नीब और वसूली लेकर पति के सामने बैठ ग़ई. मजदूरिनें उसकी हिम्मरत देख दंग़ रह ग़ईं. बाकी मिस्त्रियों ने मुंह चिढ़ाया. कहा कि कुछ देर की त्रियाहठ है, किंतु उसको सधे हाथों से ईंट पर ईंट चिनते हुए देख सबकी बोलती बंद हो ग़ई.
टोपीलाल के जन्मऔ के तीसरे ही दिन देश की शायद सबसे पहली महिला राजमिस्त्री का जन्मम हुआ.
एक औरत और राजमिस्त्री, लोगों ने इसे भी चमत्कासर ही माना.
सचमुच, चमत्काार ही तो था.
बीच की एक और घटना दिमाग़ चाट रही है.
होटल का काम पूरा हुआ तो टोपीलाल छठा वर्ष का पार कर चुका था. उसी के कमरों में लोट लगाते, सीढ़ियों पर धमा-चौकड़ी करते हुए वह बड़ा हो रहा था. हुनरमंद हाथों के परस से होटल की इमारत चमचमा रही थी. बाकी की कसर बिजली के लट्‌टुओं ने पूरी कर दी थी, जो जग़ह-जग़ह रंग़-बिरंगी आभा बिखेर रहे थे. जग़मगा रहे थे यहां-वहां. आखिरी दिन कारीग़रों और मजदूरों का हिसाब करने के लिए मालिक ने सबको जमा किया था. होटल पूरे शहर मेंं निराला था. ठीक उसके मालिक की कल्पकना के अनुरूप. सुरुचि एवं संपन्नहता का बेमिसाल नमूना. मालिक उनके काम से प्रसन्ना था. मजदूरी के अलावा सबको कुछ न कुछ भेंट में देने का इंतजाम भी उसने अपनी ओर से किया था. ताकि यादगार बनी रहे.
टोपीलाल का जन्मन उसी होटल में हुआ था. वह दुनिया का शायद पहला होटल था, जिसमें पति-पत्नीे दोनों ने राजमिस्त्री की कमान संभाली थी. यह बात भी मालिक की जानकारी में थी. टोपीलाल के लिए उसने खासतौर पर कपड़े बनवाए थे. मालिक उसे अपने लिए शुभ मान रहा था.
शाम का समय. मैदान में डेढ़-दो सौ की भीड़. पंडाल, कुर्सी और मेज को अस्था यी कार्यालय के रूप में सजाया ग़या था. मजदूरों के बच्चेड एक ओेर खेल रहे थे. कुछ होटल को हसरत-भरी निगाहों से देख रहे थे. उनकी अपनी ही मेहनत का कमाल, खून-पसीने से खड़ी हुई आलीशान इमारत. हुनरमंद हाथों की कारीग़री की बेमिसाल पेशकश. उसको देखकर कोई भी स्वनयं पर गुमान कर सकता था. वक्तम खुशी का था और शायद दुःख का, एक-दूसरे से बिछोह का भी था.
यूं तो टोले के अधिकांश मजदूर-मिस्त्री आपस में परिचित थे. परंतु जीवन-संघर्ष में हर बार कुछ न कुछ पीछे छूट जाते. उनकी भरपाई करने नए लोग़ शामिल हो जाते. वक्तम उन सबसे विदा लेने का था, जिनके साथ सुख-दुख-भरे इतने साल बिताए थे. पसीने की अदला-बदली की थी. दुख में आंसू बहाए, सुख में हिस्सेछदारी की थी. वर्षों से वे साथ-साथ काम करते आए थे. आगे काम की तलाश उनमें से न जाने किस-किस को, कहां-कहां ले जाए. इसके बाद फिर कभी मिलने का अवसर मिले भी या नहीं. ऐसी चिंताएं लोगों को सता रही थीं.
ऐसे वक्तक पर कुछ लोगों की आंखें भरी हुई थीं. तो कुछ उतनी देर के लिए दार्शनिक बन चुके थे. जिंदगी में मिलना और बिछुड़ना तो सत्यल सनातन है, यह कहकर वे मन को झूठी तसल्लीि देने की कोशिश कर रहे थे. कुछ यह सोचकर खिन्न् थे कि जिस इमारत को उन्होंतने अपने खून-पसीने और हाथों के हुनर से प्राणवंत बनाया, आज के बाद कोई उसमें शायद ही भीतर आने दे या कोई उनको पहचाने भी. उनके जीवन की यही त्रासदी थी. वे ईंट-गारे को जीवन देकर उसे इमारत में ढालते. कन्नीी और गुनिया लेकर उसका अंग़-अंग़ तराशते. कोरी मिट्‌टी में प्राण-प्रतिष्ठा करते. लेकिन काम पूरा होते ही उसमें रहने का अधिकार खो बैठते थे.
ऐसे लोग़ होटल की ओर टकटकी लगाकर देख रहे थे. यह सोचकर कि आगे कभी लौटे तो दरवाजे पर बड़े-बड़े दरबान खड़े दिखाई देंगे. उन जैसों को वे शायद ही भीतर आने दें. इसलिए विदाई बेला में वे अपने हाथों के कमाल को भीगी पलकों से, आखिरी बार जी भ्रैरकर देख लेना चाहते थे. सहेज लेना चाहते थे उसके रूपाकार, उससे निर्माण से जुड़ी स्मृदतियों को.
मजदूरी बांटने का काम प्रारंभ हो चुका था. मालिक एक-एक को आवाज देकर बुला रहा था.
‘टोपीलाल!' मुनीम की ओर से आवाज लगी. इसी के साथ तालियों की आवाज गूंज उठी. टोपीलाल के पिता उसे लेकर आगे बढ़ें, उससे पहले ही टोपीलाल स्व यं आगे बढ़ ग़या. एक पांच-छह साल के बच्चे को भरे विश्वा स के साथ आगे बढ़ते देख लोग़ दंग़ रह ग़ए. तालियों का वेग़ दुगुना हो ग़या.
‘नाम क्याे है?' नन्हें टोपीलाल से मालिक ने पूछा.
‘ट्‌...ट्‌...टोपीलाल!' नन्हीछ, हकलाती-सी जुबान से जवाब मिला.
‘क्याक टोंटीलाल?' मालिक बचपन में लौट ग़या. सबकी हंसी छूट ग़ई.
‘नईं, टोपीलाल...टोपीलाल!' टोपीलाल ने दोहराया.
‘तो टोपी कहां छोड़ आए?' मालिक ने मजाक किया. एक बार फिर मैदान हंसी से उछलने लगा.
‘मेरी जेब में रखी है.' टोपीलाल ने बिना सकुचाए जवाब दिया. कभी उसकी मां ने उसके लिए एक टोपी सिली थी. जिसको वह अक्सैर अपनी जेब में रखता था. उसने जेब से टोपी निकालकर तत्काबल पहन भी ली. टोपीलाल की हाजिरजवाबी पर एक बार फिर जोरदार तालियां बजीं. मालिक भी खुशी से नहा उठा. उसने अपने हाथों से टोपीलाल को कपड़े भेंट किए, जिनमें एक रेशम की टोपी भी थी. मालिक टोपीलाल को अपने हाथों से टोपी पहना ही रहा था कि अचानक वह परेशान हो उठा.
टोपीलाल वापस जाने लगा. तभी मालिक की ओर से आवाज आई--
‘ठहरो, वापस आओ बेटे!' टोपीलाल रुक ग़या.
‘जरा अपने कपड़ों की जेब तो देखो. मेरी घड़ी शायद उसमें गिर ग़ई है.' मालिक ने कहा.
मालिक की घड़ी की गुमशुदगी की खबर मिलते ही एकाएक हड़कंप मच ग़या. कर्मचारियों में अफरातफरी मच ग़ई. एक ने मालिक को खुश करने के लिए दौड़कर टोपीलाल को पकड़ लिया. आनन-फानन में उसकी तलाशी ली ग़ई. लेकिन घड़ी वहां नहीं थी. सभी परेशान. मालिक अपनी महंगी घड़ी को लेकर चिंतित था. उससे भी अधिक परेशान थे उसके कर्मचारी. हालांकि वे परेशानी का दिखावा ही अधिक कर रहे थे.
‘मैंने देखा, अभी कुछ देर पहले तक तो घड़ी साहब के हाथ में थी, बड़ी जल्दी छिपा दी!' एक कर्मचारी ने टोपीलाल को डांटा.
टोपीलाल चुपचाप खड़ा था. उसके माता-पिता को काटो तो खून नहीं. दोनों स्वीयं को अपमानित महसूस कर रहे थे. विदाई की बेला में यह कैसा अपशगुन. काम पूरा होने की जो खुशी थी, वह गायब हो चुकी थी. कर्मचारियों ने टोपीलाल को पकड़ रखा था.
‘मालिक इसके पास घड़ी भला कहां से आई? आपके दिए कपड़ों के सिवाय इसके पास कुछ और नहीं है.' टोपीलाल के पिता ने गिड़गिड़ाकर कहा. उसकी मां भी आगे आकर फरियाद करने लगी-
‘मेरा टोपीलाल चोर नहीं है मालिक.'
‘यह बहुत शैतान है, कुछ भी कर सकता है.' कर्मचारियों के बीच से आवाज आई. सबने देखा वह बिशंभर था. टोपीलाल के माता-पिता से ईर्ष्यास करने वाला. किसी को उसकी बात पर भरोसा न हुआ, लेकिन दूसरे कर्मचारियों को टोपीलाल को तंग़ करने का बहाना मिल ग़या.
मालिक परेशान था. उसका मूड खराब हो चुका था. घड़ी महंगी थी. पर मालिक की हैसियत के आगे कुछ भी नहीं. वह अपने लिए कभी भी दूसरी घड़ी खरीद सकता था. लेकिन सबके सामने से घड़ी का अनायास गायब हो जाना उसको परेशान कर रहा था. चोर का पता लग़ना भी जरूरी था. आखिर उसने सारे कर्मचारियों को एक ओर खड़ा हो जाने का आदेश दिया. फिर टोपीलाल को अपने पास बुलाया, प्या र से पूछा-
‘बता दो बेटे, मुझे अच्छीर तरह से याद है, तुम्हेंि बुलाने से पहले घड़ी मेरी कलाई पर बंधी थी.'
‘मुझे नहीं मालूम.' मालिक के पूछने पर टोपीलाल ने जवाब दिया. चोरी के इल्जा़म से वह घबरा ग़या था.
‘मालिक यह झूठ बोलकर चोरी का इल्जामम दूसरों पर डालना चाहता है.' एक कर्मचारी टोपीलाल पर गुर्राया.
‘तुम कैसे कह सकते हो?' बिना झिझके टोपीलाल ने कहा.
‘इसलिए कि घड़ी सबके सामने, अभी-अभी गायब हुई है. उस समय केवल तुम मालिक के पास थे.'
‘मालिक के पास तो उनके नौकर और कर्मचारी भी हैं. उनसे भी तो पता करना चाहिए. चोर हमारे टोले का नहीं है.'
‘फिर भी घड़ी की चोरी तो हुई है.'
‘तो यह तो मालिक और उसके कर्मचारी जानें.' टोपीलाल ने निडर होकर कहा.
‘कर्मचारी तो सभी पीछे हैं, फिर उनमें इतनी हिम्म त कहां कि मालिक की घड़ी की चोरी कर सकें.'
टोपीलाल के दिमाग़ में बार-बार कुछ खटक रहा था. कि जैसे कुछ याद करना चाहता हो. किंतु विचार दिमाग़ में टिकने से पहले ही हवा हो जाता था.
मालिक के आदेश पर टोपीलाल को एक ओर बिठा दिया ग़या. मजदूरी बांटने का काम रुक चुका था. बाकी मजदूर भी पेशोपेश में थे. कुछ इस बात को लेकर परेशान थे कि मालिक का मूड खराब होने के बाद अब ठीक-ठाक ईनाम नहीं मिल पाएगा. लेकिन एकाध के मन में छिपे संदेह की बात जाने दें तो, उनमें से कोई भी टोपीलाल को चोर मानने को तैयार नहीं था.
सहसा टोपीलाल उठकर खड़ा हो ग़या. सभी उसकी ओर देखने लगे. उसने कहा-
‘अग़र मैं चोर पकड़वा दूं तो आप मेरी मां और बापू को जाने देंगे?'
‘हम तुम्हेंो ईनाम भी देंगे.' मलिक ने खुश होकर कहा. उस समय टोपीलाल का दिमाग़ बहुत तेजी से सोच रहा था. उसको लगा कि घड़ी अग़र मालिक की कलाई से गायब हुई तो वह अवश्या ही खुलकर गिरनी चाहिए. पर गिरकर जाएगी कहां! नीचे! फर्श पर! लेकिन फर्श पर गिरती तो नजर में आ जाती! फिर कहां ग़ई? यकायक उसकी आंखें चमक उठीं.
‘मालिक घड़ी आपके उस नौकर के पास है, जिसकी आंखों के नीचे ग़हरा काला दाग़ है.' टोपीलाल ने रहस्यय से पर्दा हटाया. इसपर सभी चौंक पड़े.
‘चंदगी...! अभी तक तो वह यहीं था, अचानक कहां चला ग़या?' टोपीलाल की बताई पहचान पर मालिक के पीछे खड़े एक कर्मचारी के मुंह से निकला. सहसा सबकी आंखें चमक उठीं. चंदगी की खोज की जाने लगी.
‘मालिक पुलिस बुलाकर इसे पकड़वा दीजिए. यह आपका कीमती समय बरबाद कर रहा है.' इस बीच पीछे से दूसरे कर्मचारी की आवाज आई.
‘चुप रहो इतने सारे लोगों के सामने हमारी घड़ी गायब हुई है. उसका इल्जााम इस बच्चेे पर लगाने पर पुलिस क्याच हमारी बात मानेगी. उल्टेी हमारी ही हंसी होगी. तुम चंदगी को फौरन बुलाओ.' मालिक ने डांटा. इस पर कर्मचारी पीछे खडे़ आपस में खुसर-पुसर करने लगे.
कुछ देर के बाद चंदगी को खोज लिया ग़या. वह टोकरी को साफ करने के लिए उठाकर ले ग़या था. वह एक बार पहले भी चोरी के आरोप में पकड़ा जा चुका था. उस समय तो मालिक ने उसपर दया करते हुए छोड़ दिया था. टोपीलाल ने जैसे ही उससे घड़ी लौटाने को कहा, उसका चेहरा पीला पड़ ग़या. मालिक समेत सभी का ध्यालन उसकी ओर चला ग़या. मालिक ने घूरकर उसकी ओर देखा तो वह घबरा ग़या और उसके पैरों पर गिर पड़ा. गिड़गिड़ाकर माफी मांग़ने लगा.
चोरी का भेद खुल चुका था. सभी टोपीलाल की बुद्धि पर हैरान थे. घड़ी चंदगी तक कैसे पहुंची, और टोपीलाल को उसके बारे में कैसे पता चला, यह एक रहस्या था.
‘वह तो बहुत पीछे खड़ा हुआ था, मेरे पास आया तक नहीं.' मालिक हैरान था.
‘आया था मालिक, टोकरी उठाने के लिए.'
मालिक को याद आया. चाय के खाली कप, रद्‌दी काग़ज वगैरह डालने के लिए एक डस्टीबिन का इंतजाम किया ग़या था. उसी को उठाने के लिए चंदगी आगे आया था.
‘तुम्हेंथ कैसे पता चला कि घड़ी डस्टंबिन में गिरी है, और चंदगी के पास है?' मालिक ने पूछा.
‘मेरे पापा चोर नहीं हैं, मैं भी चोर नहीं हूं.' टोपीलाल ने भोलेपन से कहा. घड़ी मिल जाने से टोपीलाल के पिता की हिम्महत वापस लौट आई थी. वे आगे आकर बोले-
‘मालिक मेहनतकश लोग़ ईमानदार से जीते, अपने पसीने की कमाई खाते हैं. उनमें इतनी हिम्मसत कहां कि आपकी महंगी घड़ी रख सकें. इतनी महंगी घड़ी को हमारे पास देखकर कोई भी चोरी का इल्जांम लगा लेगा. इसलिए यह काम आप ही के आदमियों का हो सकता है, इसका हमें विश्वाईस था. सबके सामने घड़ी की चोरी तो संभव न थी. इसीलिए संभावना यही थी कि वह अपने आप खुलकर गिर ग़ई हो. यही सोचते हुए इसे आपके नौकर द्वारा डस्ट बिन उठाने की घटना याद आ ग़ई. तब इसको यह अनुमान लगाते देर
न लगी कि जो कर्मचारी उसे लेकर ग़या है, घड़ी उसके पास हो सकती है, क्यों बेटा?'
टोपीलाल ने ‘हां' के पक्ष में अपनी ग़र्दन हिला दी.
‘शाबास!' मालिक के मुंह से अनायास निकला. छह साल की आयु में टोपीलाल को मिली यह पहली कामयाबी थी. इस घटना के बाद उसके चाहने वाले उसको जासूस टोपीलाल के नाम से पुकारने लगे. लोगों ने मान लिया कि बड़े सोच के लिए उम्र में बड़ा होना जरूरी नहीं है. असाधारण व्येक्तिेत्व साधारण वेश में भी सामने आ सकता है. -
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:01

आज जब हम यह कहानी आपको सुनाने जा रहे हैं तो टोपीलाल चौदह वर्ष का हो चुका है. इतने वर्ष भी एकाएक नहीं बीते. हालांकि टोपीलाल का प्रयास रहा कि हंसते-खेलते समय यूं ही उड़ जाए. उड़ता ही रहे, जैसे नीले आसमान में पतंग़ और होली के रंग़. उडे़ जैसे पंछी. कुलांचे भरे, जैसे जंग़ल में हिरन, उछले-खेले जैसे पानी में गोते खाती नीलमछरिया. तैरे ज्‍यों नदिया में रंग़-बिरंगी नाव, झील में बत्तखें.
हर रात वह ऐसे ही रंग़-बिरंगे सपने देखता. नए-नए अरमान सजाता. लेकिन जब भी वह अपने हमउम्र बच्चोंं को उनके हाथों में तख्तीत, बग़ल में बस्ता लटकाए देखता तो उसका मन बुझ-सा जाता. उसे लग़ता कि कुछ उसके हाथों से फिसलता जा रहा है, जो उसको फिर जिंदगी में कभी भी नहीं मिलने वाला. इतना सोचते ही उसका मन बुझ-सा जाता. आशा निराशा में ढल जाती.
एक बार उसके पिता को स्कू.ल के लिए नए कमरे बनाने का काम मिला. दिन में स्कू ल के एक हिस्सेन में चिनाई का काम चलता. दूसरे में बच्चेने पढ़ाई करते. उस समय टोपीलाल को न तो पतंग़ उड़ाने में मजा आता, न लुका-छिपी का खेल खेलने में. ऊपर से स्कूचल में पढ़ रहे बच्चे जब उसको हेठी नजर से देखते तो उसपर घड़ों पानी पड़ जाता. मन की सारी उमंग़ धराशायी हो जाती.
यूं तो अपने टोले के सभी बच्चोंर में टोपीलाल सबसे तेज और बुद्धिमान माना जाता. लोग़, उसकी तारीफ करते. जो काम दूसरे बच्चेच नहीं कर पाते थे, उसके लिए टोपीलाल को ही याद करते. टोपीलाल उनके विश्वाास की रक्षा भी करता. अपने काम से वह हरेक का दिल जीत लेता. किंतु जब वह छोटे-छोटे बच्चोंद को पढ़ते हुए देखता तो उसकी सारी खुशी हवा हो जाती. मन बुझ-सा जाता. उस समय उसका न दूसरों की मदद करने को मन करता, न खेल-कूद में ही आनंद आता.
पिता निश्चिं त थे. उन्हों ने जैसे पहले ही तय कर रखा था-
‘मेरा टोपीलाल बड़ा होकर हम सब राजमिस्त्रियों से आगे जाएगा. उसके हाथों को छूते ही कन्नी -वसूली नाचने लगेंगी. ईंटों में छुअन-भर से जान आ जाएगी. अभी तक दुनिया में सात अजूबे हैं. कोई आश्च-र्य नहीं अग़र आठवां अजूबा मेरे बेटे के बड़े होने का इंतजार
कर रहा हो.'
दूसरे मजदूरों की तरह टोपीलाल के पिता के सपने भी छोटे थे. पेट भरने और जिंदगी की मामूली सुविधाओं तक सिमटे हुए. उनके लिए टोपीलाल के पिता को पढ़ाई जरूरी नहीं लग़ती थी-
‘किताबों में आंख वे फोड़ें जिन्हेंक दफ्तईरों में जी-हुजूरी करनी हो. मेरा बेटा...' पिता के मुंह से अपनी तारीफ सुनकर टोपीलाल का मन मग्नो हो जाता. पल-भर के लिए सपनों की ऊंची और कलंगीदार तस्वीुर उसके सामने होती. लेकिन स्कू ल में जब बच्चों की कक्षाएं लग़ रही होतीं, और माता-पिता काम पर होते तब उसको सबकुछ सूना और बेकार लग़ने लग़ता. मन होता कि उड़कर बाकी बच्चोंक के बीच पाठशाला में जा बैठे, शब्दोंस के साथ बतियाए, अक्षरों के साथ कानाबाती करे.
और इस तरह टोपीलाल का अनमनापन बढ़ता ही जा रहा था. पतंग़ उड़ाना, लुका-छिपी का खेल खेलना सब पीछे रह ग़या. उसका कल्पथनाशील मन जो कभी पंछी-सा निर्बंध आसमान में तैरता, निर्मल-पावन नदी-सा हहर-हहर हहराता, हिरन छौनों जैसा कुलांचे भरता था, वह उदासी से घिरने लगा. और तो और दूसरों के बताए काम में भी वह ग़लती करने लगा.
टोपीलाल बिग़ड़ता जा रहा है, अक्सीर यह लोग़ कहने लगे. मां से कोई बात छिप पाती है, एक दिन उसकी मां ने पूछ ही लिया. जवाब में टोपीलाल बोला-
‘मां सब कहते हैं कि मैं बहुत तेज हूं. लेकिन.'
‘आखिर बात क्याै है, बेटा?'ष्‍
‘क्या तेज-तर्रार होना ही सबकुछ होता है? उस दिन मैंने सुना, मास्ट रजी पढ़ा रहे थे कि हम जो जानते हैं उसको दूसरों तक पहुंचाना भी हमारा धर्म है. वे बता रहे थे कि ज्ञान बांटने से और भी बढ़ता है. परंतु जब किसी को ज्ञान समेटना ही न आए तब?'
मां बहुत दिनों से टोपीलाल के हरकतों पर नजर रखे हुए थी. उसकी बेचैनी की राई-रत्ती खबर रखती थी. बेटे के दिल की बात समझते मां को देर न लगी-
‘मैंने तेरे बापू से कहा था तुझे स्कूील भेजने को.'
‘सच! फिर बापू ने क्या् जवाब दिया था?' टोपीलाल की बांछे खिल ग़ईं.
‘उन्होंतने जो कहा वह ग़लत कहां है. हमारा कोई एक ठिकाना तो है नहीं!'
‘तो क्याे हुआ मां, जबतक हम यहां हैं तब तक तो...'
‘ठीक है, मैं कल मास्टहर जी से बात करके देखूंगी.'
टोपीलाल उछल पड़ा. वह हमेशा ही अपनी मां की सूझ-बूझ का कायल रहा था. कामयाबी की पूरी-पूरी उम्मीेद थी. उस रात उसने सपना देखा कि वह भी ड्रेस पहनकर स्कूकल जा रहा है. पुस्तीकों से बतिया रहा है. दूसरे बच्चों की तरह उसका नाम भी पाठशाला के रजिस्ट र पर चढ़ चुका है-
‘टोपीलाल, पाठ याद करके लाए?'
‘जी हां!'
‘तो सुनाओ?' कक्षा अध्या्पक का स्वढर उसके कानों में पड़ता है, और वह बिना एक भी पल गंवाए पूरा पाठ सुना देता है. अध्या'पक चकित हैं. पूरी कक्षा दांतों तले उंग़ली दबाए है.
‘देखा.' अध्याापक महोदय बाकी कक्षा को संबोधित करते हैं, ‘तुम सब कितने आलसी और कामचोर हो. टोपीलाल से सीखो...एक ही दिन में सारा पाठ याद कर दिया. धन्यउ हैं इसके माता-पिता.' टोपीलाल ऐसे सपने पूरे दिन देखता रहा. अग़ले दिन उन सब पर पानी फिर ग़या.
‘आधे से ज्या.दा सत्र निकल चुका है, मास्ट़रजी ने कहा है कि इस समय दाखिला नहीं हो सकता.' मां ने ऐसा बताया, मानो कहते हुए मनों बोझ से दबी जा रही हो.
‘मां तुम उनसे कहतीं कि मेरा बेटा होशियार है, वह बाकी बचे समय में ही पूरी तैयारी कर सकता है?'
‘उनका कहना था कि जिस कक्षा में तुम दाखिला लेना चाहते हो, उसके सभी बच्चेी तुमसे नौ-दस साल छोटे हैं. वे तुम्हाकरा मजाक उड़ाएंगे.'
‘कोई बात नहीं, मैं किसी का भी बुरा नहीं मानूंगा. अग़र कोई मुझे टोकेगा तो मैं उससे कहूंगा कि देखो मैं इस उम्र में भी शुरुआत कर सकता हूं. सीखने की कोई उम्र थोड़े ही होती है.'
‘मैंने उनसे सब कहा था. वह एक-एक बात जो हमारे पक्ष में जाती हो. लेकिन उन्हों ने मेरी एक न सुनी.' मां का कलेजा फटा जा रहा था. टोपीलाल की निराशा सिर उठाने लगी. आंखों के आगे अंधेरा छा ग़या.
बात आई-ग़ई हो ग़ई. लेकिन टोपीलाल उदास रहने लगा. उसका खेलना छूट ग़या. वह जग़ह भी उसकी आंखों में ग़ढ़ने लगी. वह रोज सोचता कि स्कूिल का काम जल्दीत से जल्दील पूरा हो ताकि वह यहां से कहीं दूर जा सके.
नए कमरों की चिनाई का काम तेजी से चल रहा था. पिं्रसीपल साहब चाहते थे कि काम समय रहते पूरा कर लिया जाए. ताकि अग़ले साल से आगे की कक्षाओं की पढ़ाई शुरू की जा सके. स्कूरल में बच्चेी बढे़ंगे, इसके लिए अतिरिक्त पानी की भी जरूरत होगी. नग़र निग़म की सप्लाीई कुछ घंटों तक सीमित थी. बाकी समय हैंडपंप से काम चलाया जाता था, परंतु उसका पानी खारापन लिए हुए था.
पिं्रसीपल साहब नलकूप लग़वाना चाहते थे. लेकिन समस्या थी कि उसको लग़वाया कहां जाए. इससे पहले भी एक-दो जग़ह बोरिंग़ करा चुके थे. लेकिन कहीं का चोहा बहुत
नीचे मिलता, तो कहीं पर निसोत खारापन लिए हुए. हैंडपंप का खारा पानी होने के कारण बच्चे अब भी परेशान थे. संख्याल बढ़ते ही समस्याा विकराल हो जाने वाली थी. प्रिंसीपल साहब चाहते थे कि ट्‌यूबवैल ऐसी जग़ह लग़वाया जाए जहां पानी का -ोत भी अच्छाा हो; और उसमें भरपूर मिठास भी हो. किंतु धरती के ग़र्भ में ऐसे ठिकाने का पता लगाना एक भारी समस्यान थी.
‘साहब पुराने जमाने में ऐसे लोग़ थे, जिनके तलवे धरती की धड़कनों को पढ़ लिया करते थे. जो चलते-चलते जहां भी ठहर जाते, वहीं मीठी जलधार बहा देते. ऐसे परोपकारी लोगों ने ही कुएं-बाबड़ी बनवाए. उनका मीठा पानी आज भी जन्‍म-जन्मांीतर की बुझाने का सामर्थ्यर रखता है.'
‘ऐसे लोग़ अब कहां से लाऊं? प्रिंसीपल साहब बोले, ‘बजट पहले ही बढ़ चुका है. एक बोरिंग़ खराब हुआ तो दूसरा बोरिंग़ कराने की अनुमति शायद ही मिल पाए.' परेशानी उनकी पेशानी पर लिखी थी. कोई अनपढ़ भी उसको बांच सकता था. अध्या पक, मजदूर और कारीग़र सभी ग़र्दन झुकाए खड़े थे. संकट सबके सामने था, लेकिन उससे उबरने का मार्ग किसी को नहीं सूझ रहा था.
‘सर! आपके हिसाब से बोरिंग़ करना कहां ठीक रहेगा?' प्रिंसीपल साहब के ठीक पीछे से आवाज आई. उन्होंेने पलटकर देखा. एक लड़का पीछे खड़ा उनसे सवाल कर रहा था. उसके चेहरे पर आत्म विश्वासस था. आवाज में वह बल जो जीवन से ग़हरे जुड़ाव के बाद ही आ पाता है. उन्होंेने पहचानने का प्रयास किया, लेकिन नाकामयाब रहे. बस इतना तय कर पाए कि वह उनके स्कूेल के बच्चोंव में से नहीं है.
‘क्योंय?' एक अनजान बालक को जवाब देने में उन्हें अपनी हेठी महसूस हुई.
‘बस यूं ही कि अग़र सभी जग़ह पर मीठा पानी हो तो बोरिंग़ करना कहां पर ठीक रहेगा?'
‘इसमें सोचना...ट्‌यूबवेल कोई बीच मैदान में तो लग़वाएगा नहीं, उसे किसी कोने में ही होना चाहिए.' प्रिंसीपल साहब ने बताया.
‘कौन-सा कोना?' अग़ले सवाल पर प्रिंसीपल साहब तिलमिलाए. परंतु इतने लोगों के बीच जब वे स्व यं कुछ न सोच पा रहे हों, तो समस्या' के निदान के लिए एक बालक पर गुस्साि दिखाने का साहस न कर सके. उन्होंनने एक ओर संकेत कर दिया.
‘अग़र वहां भी खारा पानी निकलेे तो?'
गुस्सेे को दबाते हुए प्रिंसीपल साहब ने दूसरे कोने की ओर संकेत कर दिया.
‘इसके अलावा?'
प्रिंसीपल साहब झुंझला पड़े. फिर भी उन्हों ने अग़ले ठिकाने की ओर इशारा कर दिया. विद्यालय में सबके सामने, उनसे इतने सारे सवाल-जवाब करने वाला टोपीलाल था. उस समय उसके माता-पिता सहित सभी मजदूर-कारीग़र डरे हुए थे.
बरसात का मौसम गुजरे पखवाड़ा ही बीता था. जमीन में अब भी नमी थी. आम की गुठलियां जहां-जहां फेंकी ग़ई थीं. वहां-वहां आम के नन्हेा पौधे नजर आ रहे थे. स्कूठल के बच्चेज उन्हें़ उखाड़कर उनसे पपीहा बनाकर खेलते. टोपीलाल को भी पपीहा बजाने में आनंद आता था. उस समय टोपीलाल के हाथों में एक थैला था. थैले में भरी हुई थी गीली मिट्‌टी.
कुछ देर तक मैदान में इधर-उधर घूमता हुआ वह उन पौधों को देखता रहा. फिर उनमें से एक जैसे कई पौधे चुने. उन्हेंर सावधानीपूर्वक उखाड़कर थैले में रखी गीली मिट्‌टी में दबा लिया. ताकि पौधे मुरझाएं नहीं. उन पौधों को उसने बराबर हिस्सोंे में बांटा और उन स्थालनों पर रोप दिया, जहां प्रिंसीपल साहब नलकूप लग़वाना चाहते थे.
लोग़ तो अपने काम में लगे रहते. टोपीलाल रोज जाकर अपने पौधों को देख आता. चार-पांच दिनों में ही परिवर्तन साफ नजर आने लगा. एक जग़ह के पौधे पूरी तरह सूख चुके थे. दूसरे कोने में वे बचे रहने के लिए संघर्ष कर रहे थे. जबकि एक कोने में लगे पौधे खिले-खिले थे, मानो वहीं पर उगे हों. यह देखकर टोपीलाल के चेहरे पर चमक आ ग़ई. अपनी खुशी को दबाए रखना उसके लिए कठिन हो ग़या. उसने उसी समय प्रिंसीपल के कमरे की ओर दौड़ लगा दी और उनके दरवाजे पर बैठे चपरासी की परवाह न करते हुए वह सीधा उनके कार्यालय में घुस ग़या.
‘मैंने पता लगा लिया साहब!' प्रिंसीपल साहब कुछ समझ पाएं, उससे पहले ही वह बोल उठा. उस समय उसकी सांस धौंकनी की तरह चल रही थी. एक गंवार-से दिखने वाले लड़के को देखकर पिं्रसीपल साहब को गुस्सार आया.
‘मैंने पता लगा लिया.' टोपीलाल ने अपने शब्दोंन को दोहराया. जैसे इससे अधिक कुछ कहना उसको आता ही न हो. तब तक प्रिंसीपल साहब उसको पहचान चुके थे.
‘आराम से बताओ, क्यास कहना चाहते हो.'
‘आप उत्तर दिशा में ट्‌यूबवैल लग़वाइए, वहां पर मीठा पानी ही मिलेगा.'
‘यह तुम कैसे कह सकते हो?'
‘मैं आपको दिखाता हूं, आइए साहब.' कहने के साथ ही वह पलट ग़या. जैसे बहुत जल्दी में हो. प्रिंसीपल साहब और उनके कार्यालय में मौजूद बाकी सभी लोग़ उसके पीछे हो लिए.
‘मां ने एक बार एक कहानी सुनाई थी. मैंने सोचा कि क्योंह न उसी को आजमाया जाए. और अंतर एकदम साफ नजर आ रहा है. आप अपनी आंखों से देखते ही मान जाएंगे.' आगे-आगे चलता हुआ टोपीलाल कह रहा था.
अंततः टोपीलाल द्वारा बताए ग़ए स्थातन पर ही बोरिंग़ कराया ग़या. फिर जैसा उसने कहा था, वही हुआ. पानी इतना मीठा था, जैसे अमृत. ऊपर से इतना शीतल कि जन्म -जन्मांुतर की प्यािस बुझा सके. सभी प्रसन्न थे. प्रिंसीपल साहब की खुशी का तो
ठिकाना ही नहीं था.
आखिर वह दिन भी आया, जब स्कूथल की नई बिल्डिंहग़ तथा नलकूप का उद्‌घाटन था. उस दिन बाहर से आए अधिकारियों तथा बड़े-बड़े लोगों की उपस्थिूति में प्रिंसीपल साहब ने कहा था-
‘पीढ़ियों से कही-सुनी जाने वाली हमारी कहावतें और लोककथाएं यूं ही नहीं हैं. इनमें हमारे बुजुगोंर् का वर्षाें का अनुभव और ज्ञान छिपा हुआ है. ये हमारे पारंपरिक ज्ञान का अद्‌भुत भंडार हैं. किंतु बड़े दुःख की बात है कि नए को समेटने की आपाधापी में हम पुराने को भूलते जा रहे हैं. मैं इस लड़के का बहुत अहसानमंद हूं. इसने मुझे, बल्किस हम सब को हमारी ग़लतियों का एहसास कराया है.
मैं यहां उपस्थिवत अपने अधिकारियों से प्रार्थना करता हूं कि नियमों में ढील देकर भी इसे स्कूहल में दाखिल करने की अनुमति प्रदान करें. इस शर्त के साथ कि आगे जो भी कहानी या कहावत यह सुने, उसपर खुलकर प्रयोग़ करे. उसका पूरा खर्च यह स्कूतल उठाएगा.'
उनका भाषण समाप्त होते ही कार्यक्रम-स्थनल तालियों की ग़ड़ग़ड़ाहट से गूंजने लगा. टोपीलाल तथा उसके माता-पिता की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था. उनके साथ काम करने वाले बाकी मजदूर भी स्वरयं को गौरवान्विजत अनुभव कर रहे थे.
इस तरह टोपीलाल को स्कूतल में दाखिला मिल ग़या.
कहानी हो या पाठ, जो पढ़ने-सुनने के बाद उसको भली-भांति गुनते हैं, उनके लिए रास्ता बनाने मंजिलें खुद आगे आ जाती हैं.
यह तो अब की कहानी हुई. इससे बाद का हिस्साक भी कम मनोरंजक नहीं है. सुनने के साथ गुनना कितना जरूरी है, यह टोपीलाल ने तभी जाना था.
तो चलो उसी पर आते हैं-
टोपीलाल जब कुछ बड़ा हुआ तो टोली के बच्चोंा के साथ खेलने लगा. उस समय बाकी बच्चोंन के माता-पिता की अपेक्षा होती थी कि वह अपने से छोटे बच्चोंे का ख्याल रखे. सड़क पर वाहनों का जमघट रहता है. बच्चोंत को उधर जाने से रोके. जितना वह खुद पढ़ चुका है, उतना दूसरों को पढ़ाए, जो वह स्वंयं जानता है, उसके बारे में बाकी बच्चों को भी बताए.
इससे हालांकि टोपीलाल के अपने मनोरंजन में खलल पड़ता था. लेकिन जब टोली के बड़े लोग़ कह रहे हों; और उन्हेंा उसके माता-पिता का भी समर्थन प्राप्तल हो तो वह ज्यापदा कुछ कर ही नहीं सकता था. वह खुद को तो इतना समझदार मानता था कि शहर के किसी भी कोने में घूमकर वापस आ सके. किंतु बाकी बच्चोंी के साथ रहने से वह बंध-सा ग़या
था. इससे उसके लुका-छिपी के खेल में भी खलल पड़ा था. उस खेल में छोटे-बड़े सभी बच्चेस हिस्साइ लेते. धमाचौकड़ी के बीच, क्याी पता असावधानी में कोई बच्चा सड़क के उस पार चला जाए तो. कोई दुर्घटना हो ग़ई तो, सब उसी को दोष देंगे. किसी को बुराई का मौका टोपीलाल बिलकुल नहीं देना चाहता था. बच्चोंन के मामले में तो हरगिज नहीं.
टोपीलाल ने मनोरंजन का नया तरीका निकाला. उसने एक ही स्था न पर बैठकर खेले जाने वाले खेल खेलना शुरू कर दिया.
उन दिनों उनका समूह एक बहुमंजिला इमारत को पूरा में लगा था.उन्हीं दिनों टोपीलाल को सड़क पर एक ग़त्ता मिला. जिसपर एक ओर कुछ छपा हुआ था. शायद किसी बच्चें का गिर पड़ा हो. टोपीलाल ने वह उठा लिया. ग़त्ते के एक ओर अलग़-अलग़ रंग़ के चौकोर खाने बने थे. कुछ आड़े-तिरछे चित्र, रंग़-बिरंगी धारियां.
टोपीलाल कई बार बच्चों़ को ऐसे ही ग़त्ते के चारों कोनों पर बैठे देख चुका था. गौर से उसको देखते, ग़र्दन झुकाए गोटियों की चाल चलते हुए. इतना तो वह समझता ही था कि यह कोई खेल है. वह ग़त्त्ो पर टकटकी ग़ढ़ाए देर तक खेल को समझने का प्रयास करता रहा. घंटों तक, परंतु कुछ भी पल्लेप न पड़ा.
‘बिना मदद के इसको समझना मुश्कि ल है.' टोपीलाल ने माना. लेकिन मदद किससे ली जाए? जिन बच्चोंा के साथ वह खेलता था, वे सभी उससे छोटे थे. उनमें से कई तो टोपीलाल को अपना मार्गदर्शक मानते. बात-बात पर उसके पास मदद के लिए आते. संभव है कि बच्चों में से कोई इस खेल के बारे में जानता हो. लेकिन अपने से छोटे बच्चोंा से पूछकर वह अपनी हेठी नहीं करना चाहता था.
टोपीलाल को पहले ही इस बात का क्षोभ था कि जो बच्चेह स्कूकल जाते हैं, उन्हेंह उससे अधिक ज्ञान है. कुछ दिन के लिए स्कू‍ल जाकर उसने देख भी लिया था. जिन प्रश्नों का उत्तर देने में वह अटक जाता, उन्हें उससे छोटे बच्चेल आसानी से हल कर देते थे. वह दूसरे बच्चोंच के बराबर आने का भरसक प्रयास करता. रात-दिन पढ़ता, परिश्रम करता. परंतु घर में कभी पुस्तिकों का टोटा पड़ जाता तो कभी कॉपियों का. दिन में बच्चों की देखभाल करनी पड़ती, रात में बिल्‍डिंग़ में घुप्पो अंधेरा छा जाता. दिये की रोशनी में मच्छभर इतना परेशान करते कि पढ़ना हो ही नहीं पाता था. पढ़ाई में पिछड़ा तो पाठशाला से उसका मन भी ऊबने लगा-
‘मुझे उनके बराबर आने में समय लगेगा.' उसने स्व यं को समझाने की कोशिश की.
उस दिन के बाद वह डटकर मेहनत करने लगा. तभी स्कूवल का निर्माण कार्य पूरा हो जाने के कारण उसके माता-पिता समेत पूरा समूह वहां से रवाना होने की तैयारी करने लगा. भरे मन से टोपीलाल को भी स्कूमल से अलविदा कहना पड़ा. उसके बाद उनका समूह जहां ग़या, वहां से पाठशाला काफी दूर थी.
टोपीलाल को अपने माता-पिता से भी शिकायत थी. चाहता था उसके माता-पिता
अपने समूह से अलग़ हो, एक स्थाान पर टिककर कार्य करें. उसके भविष्य के बारे में सोचें. तभी उसको आगे पढ़ने का अवसर मिल सकता है. मां उसकी बात को समझ सकती है, यही सोचकर उसने अपना सुझाव मां के साथ रखा-
‘मां, बापू तो बाकी सब मिस्त्रियों से अच्छेा कारीग़र हैं!'
‘हां, हमारे समूह के कई मिस्त्री उनके सिखाए हुए हैं. वे उन्हेंो अपना गुरु मानते हैं.'
‘तुम भी कुछ कम नहीं हो, मां?' टोपीलाल ने अपनी बात मनवाने के उद्‌देश्यप से प्रशंसा की.
‘मुझे भी तो तेरे पिता ने ही सिखाया है!' कहते हुए उसकी मां मुस्ककरा दी, मानो उसका मंतव्य. समझ चुकी हो.
‘मां! तुम और बापू शहर में कहीं भी रहकर काम कर सकते हो. दोनों को आसानी से काम मिल जाएगा. संभव है इससे हमारी आमदनी भी बढ़ जाए. फिर हम अपना मकान भी बना सकते हैं.' वह कुछ और न समझ बैठे, इसलिए टोपीलाल ने अपना मंतव्यर साफ कर देना ही उचित समझा-
‘मां, हम लोग़ यदि एक ही स्थाान पर रहें तो मैं आसानी से पढ़-लिख सकूंगा.'
‘तू पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने, यह तो मैं भी चाहती हूं. लेकिन अलग़ रहने की बात, इसके लिए तेरे बापू शायद ही तैयार होंगे.'
‘पर वे तो सदा ही मेरा भला चाहते हैं, क्यों ?'
‘सो तो है. वे कहते हैं कि हमारा एक निजी परिवार है, छोटा-सा, जिसमें सिर्फ हम तीनों शामिल हैं. इसके बाहर हमारा बड़ा परिवार भी है. उसमें हमारा पूरा समूह आता है, जिसमें पचास-साठ परिवार हैं. सबके सुख-दुःख से हमारा वास्तार है. नफा-नुकसान सबके साझे हैं.'
‘परंतु मां, वे हमारे सगे थोड़े ही हैं!' टोपीलाल ने तर्क करने का प्रयास किया. हालांकि वह जानता था कि उसकी मां साधारण स्त्रियों में से नहीं है, उसके पास हर तर्क की काट हो सकती है. और हुआ भी यही...
‘केवल सगा होना ही अपनत्व की कसौटी नहीं होती. एक देश, एक शहर, एक गांव, एक बस्तीस और एक जैसा व्य वसाय करने वालों में भी अपनापा होता है. इस समूह के साथ हम वर्षों से रहते आए हैं. सब एक-दूसरे की अच्छाेई और बुराइयों से भली-भांति परिचित हैं. सब एक-जैसा खाते-पहनते हैं. संकट में सब एक-दूसरे की मदद करते हैं. इसके अलावा एक बात और है, बेटा.' कहते हुए मां कुछ पल को रुकी, फिर जैसे निर्णय पर आती हुई बोली-
‘किसी भी अकेले इंसान की तरक्की का उस समय तक कोई मोल नहीं है, जब तक कि उसके अपने लोग़, संगी-साथी, भाई-बंधु पिछड़े हुए हों. पड़ोसी भूखा हो तो अपना पेट भरा होने में कोई बड़प्पसन नहीं है. आदमी को सबके भले में ही अपना भला देखना चाहिए.'
‘लेकिन समूह में तो बिशंभर जैसे लोग़ भी हैं मां, जो बापू से जलते हैं.' टोपीलाल ने फिर तर्क किया.
‘ऐसा नहीं बेटा! कहावत है कि घर में चार बर्तन एक कोने में पड़े हों, तो कभी न कभी जरूर खड़क उठते हैं. तुम्हाारे बिशंभर काका ऊपर से चाहे जैसे दिखते हों, दिल उनका बिलकुल साफ हैं. याद है पिछली बार जब तेरे पिता बीमार पड़े थे?'
उस घटना के बारे में टोपीलाल को ज्या दा याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ती. वह उसके दिमाग़ में सर्वाधिक डरावनी स्मृबति के रूप में दर्ज है. उसके पिता को तेज बुखार चढ़ा था. ग़र्मी के दिन थे. बुखार का इलाज चल ही रहा था कि हैजा ऊपर से सवार हो ग़या. मां उस समय काम पर, घर से बाहर थी. टोपीलाल घर पर अकेला. पिता की बिग़ड़ती हालत देखकर वह पड़ोस में मदद के लिए पहुंचा. उस समय बिशंवर काका ने भाग़दौड़ कर परिवार की जैसी मदद की थी, उसे वह कैसे भूल सकता है! भुला पाना संभव ही नहीं है.
बीती घटना को याद करने के साथ ही टोपीलाल के चेहरे पर उदासी झलक आई. उसकी मां ने फौरन ताड़ लिया. टोपीलाल को सीने से लगाकर, पीठ पर प्याकर से हाथ फिराने लगी- ‘घबरा मत! समूह में तुम्हािरे जैसे और भी कई बच्चेा हैं. मैं तुम्हा रे पिता से बात करूंगी कि काम की तलाश में बस्तीड से दूर न जाया करें. उसके बाद तुम सब अच्छीा तरह पढ़ सकोगे.'
मां के तकोंर् ने तो टोपीलाल को उलझा दिया था. किंतु निष्कंर्ष उम्मीमद जगाने वाला था. इसलिए उसकी उदासी छंटने लगी. उसी दिन से वह इस प्रतीक्षा में था, जब उसका समूह लंबे समय के लिए किसी ऐसे स्थालन पर ठिकाना करेगा, जहां वह अपनी पढ़ाई दुबारा आरंभ कर सके. वह मां से अत्येधिक प्रभावित भी था.
‘मां के पास हर समस्याअ का हल, हर तर्क का जवाब है.' ग़त्ते को हाथ में थामे टोपीलाल सोच रहा था.
और वह ग़लत भी नहीं था.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:03

मां की उन दिनों अच्छेस राजमिस्त्री के रूप में पहचान थी. किसी इमारत में महीन नक्कारशी द्वारा जान डालनी हो तो टोपीलाल की मां को ही याद किया जाता. और वह सचमुच कोरी मिट्‌टी में प्राण पूर देती थी. ईंटें उसके स्‍पर्श से बोलने लग़तीं, दीवारें छुअन-भर से ग़र्वीली हो तन जातीं, कंगूरों में जान आ जाती, खूबसूरत सपना साकार होने लग़ता था.
‘तुम्हा री टक्कीर का राजमिस्त्री पूरे शहर में भी शायद ही कोई हो.' टोपीलाल के पिता मुक्तोकंठ से उसकी प्रशंसा करते.
‘सबकुछ आप ही का तो सिखाया हुआ है.'
‘गुरु तो गुड़ ही रहा, पर तू शक्क र बन ग़ई.' खुशी से उनका जी उमगाने लग़ता. टोपीलाल का मन भी बाग़-बाग़ हो जाता. जहां कहीं मां का जिक्र होता, वह सांस थामे सुनने लग़ता. मां की तारीफ सुनना उसको खूब भाता. वह सदैव ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में रहता.
जिस समय टोपीलाल अपनी मां के पास पहुंचा, वह सोने की तैयारी में थी. वैसे भी रात हो चुकी थी. दिन-भर की कड़ी मेहनत के बाद वह बहुत ही थक जाती थी. पर टोपीलाल को चैन कहां! टिमटिमाते दिये की झीनी रोशनी में उसने ग़त्ता मां के सामने रख दिया-
‘इसे तो मैंने वर्षों से नहीं छुआ. जाकर अपने पिता से पूछ.'
‘मुझे तो तुम्हीं् से सीखना है.' टोपीलाल ने जिद की.
‘ठीक है, चल गोटियां बिछा ले.'
टोपीलाल को बताया ग़या था कि यह खेल गोटियों से खेला जाता है. गोटियां न होने से वह निराश भी था. उसको ग़त्ता फेंकने वाले से शिकायत भी थी कि यदि उसने इस खेल से ऊबकर ग़त्ता फेंका है, तो गोटियों को भी साथ ही फेंक देना चाहिए था. ताकि किसी के काम आ सकें. किंतु यह शिकायत ज्यानदा देर न टिक सकी.
‘यह जरूर किसी बच्चे के थैले से फिसला होगा.' टोपीलाल ने सोचा था, ‘तब तो वह बालक बहुत परेशान होगा.'
टोपीलाल को बहुत दुःख पहुंचा था. जैसे उसने अपनी ही कोई कीमती चीज गुमा दी हो. पर नया खेल सीखने की ललक में वह दुःख ज्याहदा देर न टिक सका था.
‘मां, बिना गोटियों के क्याि तुम इस खेल को नहीं सिखा सकतीं?'
‘सिखा भी सकती हूं.' मां ने उत्तर दिया था, ‘लोग़ तो इसको सांप-सीढ़ी का खेल कहते हैं. परंतु असल में यह है तो जीवन और प्रकृति का खेल ही. जिन्हेंस इस खेल में हम गोटियां कहते हैं, जिंदगी के खेल में ये कुछ भी हो सकती हैं. यहां तक कि मैं और तुम भी. यहां से आगे समझने के लिए पासे ही जरूरत होगी. उसका काम भी ईंट के मामूली टुकड़े से चलाया जा सकता है.'
मां की बातों में ग़हरा रहस्यह छिपा था. लेकिन खेल के उत्सांह में डूबे टोपीलाल को ध्याेन रहा केवल ईंट के टुकड़े से पासा बनाना. वह उसी समय ईंट का प्रबंध कर लेना चाहता था, लेकिन मां ने टोक दिया-
‘कुछ भी सीखने के लिए धैर्य जरूरी है. कल मैं काम पर नहीं जा रही हूं, घर के
काम से निपटने के बाद...'
मां की बात मानने से पहले टोपीलाल ने कहानी की शर्त जड़ दी.
‘ठीक है, एक छोटी-सी कहानी सुनाती हूं. उसे यदि गुन लोगे तो कल इस खेल का मर्म समझने में आसानी होगी.' मां ने सहमति दी. टोपीलाल के लिए खेल केवल एक खेल था. कहानी सिर्फ एक कहानी. इससे ज्यामदा उनका कोई उद्‌देश्यै हो सकता है, उसको मालूम ही नहीं था. इसलिए कहानी सुनने के लिए वह अपनी मां से सट ग़या.
मां ने कहानी आरंभ कर दी-
एक राजा के दो बेटे थे. एक अच्छा था, दूसरा बुरा. एक दूसरों के काम आता. दूसरा सबके काम बिगाड़ देता. एक लोगों से प्याार करता, दूसरा उनको दुत्का रता. एक मीठे बोल बोलता, ममता की चलती-फिरती मूरत नजर आता, दूसरा लोगों के साथ गुस्सेन से पेश आता, उन्हेंब डराता. एक सचाई और ईमानदारी से काम निकालना चाहता, दूसरे का मकसद था, केवल खुद के भले की सोचना. मनमानी करना...लालच साधना. सच-झूठ जैसे भी संभव हो, वह सहज भाव से कहता-करता. एक सोच-विचारकर काम को पूरा करता. दूसरे को किसी भी तरह मंजिल तक पहुंचने की जल्दी रहती. उसके लिए हर तरीके को जायज मानता था. पहले को ‘कर भला सो हो भला' की नीति में विश्वाकस था. दूसरा ‘अंत भला सो सब भला' के चलन को पानी देता था.
माता-पिता हालांकि अपनी प्रत्येाक संतान को एकसमान प्या र करते हैं. लेकिन उन दोनों में से एक मां का लाडला था, दूसरा अपने पिता का.
‘मेरे बेटे में राजा बनने के सारे गुण हैं.' राजा जो दूसरे बेटे को चाहता था, एक दिन रानी को चिढ़ाने के लिए बोला.
‘तुम्हाेरा बेटा सिर्फ तानाशाह बन सकता है, मेरा बेटा तो आज भी लोगों के दिलों पर राज करता है.' रानी ने सहज भाव से कहा. लेकिन राजा तो राजा था, ग़र्व-गुमान से फूला हुआ. सुनते ही चिढ़ ग़या. और चिढ़ ग़या सो चढ़ ग़या-
‘ठीक है, तुम्हाकरा बेटा करता रहे लोगों के दिलों पर राज, ग़द्दी का स्वासमी तो मैं अपने बेटे को ही बनाऊंगा!' हठीले राजा ने अपना निर्णय सुनाया.
रानी नहीं जानती थी कि बात इतनी बढ़ जाएगी...मामूली झाड़ आसमान जा चढ़ेगा. जिसे वह चाहती थी, वह बड़ा बेटा था. नियम से राजा का असली उत्तराधिकारी. न चाहते हुए भी रानी ने अपनी भूल के लिए राजा से माफी मांगी. अपनी ग़लती का दंड अपने बड़े बेटे को न देने की प्रार्थना की. आखिर राजा पिघला-
‘आज की हमारी तकरार तो महज संयोग़ है. वरना छोटे बेटे को राजग़द्दी पर बिठाने का फैसला तो मैं कभी का कर चुका हूं. राज ताकत से चलता है. सचाई, ईमानदारी, और भलमनसाहत जैसे शब्दि ग्रंथों में ही शोभा देते हैं. असल में तो वे राजा को कमजोर बनाते हैं. उसकी महत्त्वाकांक्षाओं की राह में रोड़े हैं ये सब. लोग़ जिससे डरते हैं, उससे
प्यामर भी करते हैं. तुलसीदास जी ने स्वडयं रामचंद्रजी के मुख से कहलवाया है-‘भय बिनु होय न प्रीति.'
‘छोटा किसी भी तरह अपनी बात मनवाना जानता है. इसलिए उसमें मुझे चक्रवर्ती सम्राट के सभी गुण नजर आते हैं. मुझे पूरा विश्वा स है, कि वह पुरखों की इस विरासत को न केवल संभालकर रखेगा, बल्कि बढ़ाएगा भी.'
रानी को चुप हो जाना पड़ा. राजा ने मनमानी की. कुछ ही दिन बाद उसने छोटे बेटे को युवराज घोषित कर दिया. बड़ा बेटा निर्द्वंद्व रहा. रानी को लगा कि कहीं अन्याुय हुआ है. फिर भी वह चुप रही.
परिस्थि तियां यदि प्रतिकूल हों तो प्रतीक्षा करना भी नीति बन जाता है. और जब राजा अन्या.य करे तो उसका फल पूरे राज्यि को भोग़ना पड़ता है. आखिर यही हुआ भी.
राजा दिल का बुरा नहीं था. परंतु उसके दिल में दबी-छिपी उच्चाकांक्षाएँ उससे ग़लत निर्णय करा लेती थीं. ऐसा ही उस बार हुआ था.
युवराज बनते ही छोटे बेटे की मनमानियां और अत्यादचार और भी बढ़ ग़ए. राज्यत और राजा दोनों की मान-मर्यादा को ताक पर रखकर वह राजकार्य में हस्तयक्षेप करने लगा. प्रारंभ में तो राजा को सबकुछ भला लगा. लगा कि युवराज होने के कारण वह राजनीति में रुचि दिखा रहा है. लेकिन बहुत जल्दीर छोटे बेटे की हरकतें उसका जी दुखाने लगीं. युवराज को समझाने की राजा की सारी कोशिशें बेकार ग़ईं.
राजधानी के पार्श्वव में एक नदी बहती थी. नदी के दूसरे तट पर बसा था एक गांव. छोटा-सा, वहां के किसान मेहनती और भले थे. युवराज अक्सकर उस गांव से होकर गुजरता. एक दिन वह शिकार से लौटा और सीधे राजभवन में जा धमका. राजा उस समय राजकाज में व्यदस्तस था.
‘पिताजी, मैं एक बाग़ लग़वाना चाहता हूं, बहुत बड़ा-इतना कि किसी भी राजा के पास वैसा बाग़ न हो.' युवराज ने राज्यम की कार्रवाही में व्यगवधान डालते हुए कहा.
राजा ने ग़र्दन उठाई. युवराज की ओर देखकर उसने धैर्यपूर्वक कहा-‘हमारे राज्यव में बागों की कमी नहीं है. तरह-तरह के, एक से बढ़कर एक बाग़ हैं. जहां वृक्ष फलों से; लताएं फूलों से लदी रहती हैं. कोयल वहां गाती, मोर नाचते हैं. हमारे तालाबों में कमल-दलों से भरपूर नीलसरोवर हैं. जिनमें रंग़-बिरंगी मछलियाँ तैरती रहती हैं. फिर भी तुम एक और बाग़ लग़वाना चाहते हो तो युवराज होने के नाते तुम्हेंर इसका भी अधिकार है. अच्छीो-सी भूमि देखकर वहां बाग़ लग़वा लो.'
‘मैं चाहता हूं कि एक बहुत बड़ा बाग़ हो. जिसमें शिकार के लिए हिरन, शेर, चीता आदि भी हों. भूमि मैं तय कर चुका हूं, बस आपकी अनुमति की जरूरत है?'
‘कैसी अनुमति?'
‘जिस भूमि पर मैं बाग़ लगाना चाहता हूं, उसके बीच में एक गांव आता है, हमें
उसको हटाना होगा?' कहते हुए युवराज ने गांव का नाम और पता बता दिया. सुनते ही राजा चौंक पड़ा.
‘उस गांव के लोग़ तो बहुत भले हैं. संकट के समय वहां के निवासियों ने कई बार हमारी मदद की है. हम उन्हें कैसे उजाड़ सकते हैं?' राजा ने आहत मन से बेटे को समझाने का प्रयास किया.
‘कानून के हिसाब से राज्य की समस्त भूमि का स्वाेमी राजा होता. इसलिए राजा का अधिकार है कि वह अपनी भूमि के साथ जो जी चाहे करे. फिर हम किसी को उजाड़ कहां रहे हैं. गांव वालों को एक स्था न से हटाकर दूसरे ठिकाने पर बसा दिया जाएगा. इसका खर्च भी राज्य उठाएगा!'
‘यह नहीं हो सकता. गांव वाले जिस स्थाान पर बसे हैं, वह उनका अपना है. मैं तुम्हें गांव को उजाड़ने का आदेश नहीं दे सकता.' राजा ने कहा. युवराज पांव पटकता हुआ वहां से चला ग़या. उसके बाद राजा और युवराज में कई दिनों तक भेंट नहीं हुई. धीरे-धीरे दिन बीते ग़ए. बात आई-ग़ई होने लगी.
एक दिन राजा ने राज्यं-भ्रमण का निर्णय किया. रानी को बताया तो उसने भी साथ चलने की इच्छाल व्यंक्तब की.
‘हमें यात्रा से लौटने में महीनों लग़ सकते हैं. इस बीच राज्यन की देखभाल कौन करेगा?'
‘क्योंय, युवराज तो है!' राजा ने तत्कासल कहा.
‘जाने क्योंट मेरा मन घबरा रहा है. महाराज, क्याे ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपने उत्तराधिकारी को लेकर फिर से सोच-विचार कर लें?' रानी गिड़गिड़ाई.
‘यह तुम्हाचरा भ्रम है, फिर भी तुम यदि यही चाहती हो तो यात्रा से लौटने के बाद मैं इसपर अंतिम निर्णय लूंगा.' राजा ने रानी की बात मान ली. वस्तु तः वह स्व यं भी युवराज की मनमानी से तंग़ आ चुका था.
महीनों लंबी यात्रा के बाद राजा और रानी लौटे तो वातावरण कुछ बदला-बदला पाया. यात्रा की थकान मिटाने के लिए राजा सीधे राजभवन में चला ग़या. अग़ले दिन राजदरबार में लौटा तो वहां सैकड़ों फरियादियों को देखकर चौंक पड़ा. पता चला कि राजा की अनुपस्थिुति का फायदा उठाते हुए युवराज ने खुद को सम्राट घोषित कर दिया है. राजा के रूप में सबसे पहले उसने सेनापति को गांव खाली करने का आदेश दिया. सेनापति ने सैन्ययबल के साथ गांव पर धावा बोल दिया. चारों ओर त्राहि-त्राहि मच ग़ई. जिसने भी विरोध जताने का प्रयास किया, सैनिकों ने उसको जेल में डाल दिया.
‘महाराज, सैकड़ों साल से हमारे पुरखे वहां रहते आए हैं. फिर भी यदि युवराज को उस गांव की जमीन इतनी ही जरूरी थी तो हमें संभलने के लिए समय दिया होता. बदले में हमें ऐसी जग़ह दी जाती जो उपजाऊ हो, जहां हम सब अपने-अपने परिवार के साथ
सुखपूर्वक रह सकें. परंतु जिस स्थायन पर हमें बसने का आदेश दिया ग़या है, वहां की जमीन बंजर और ऊबड़-खाबड़ है. पानी का तो नामोनिशां नहीं है.' फरियादियों के मुखिया ने कहा. राजा ग़र्दन झुकाए सुनता रहा.
‘हुजूर, ऐसे तो हम भूखे-प्याथसे मर ही जाएंगे.'
‘क्यार तुमने युवराज को समझाया नहीं था?' राजा ने मंत्री की ओर देखा. उसको विश्वाीस था कि मंत्री पुराना है. प्रजा का हित देखेगा. लेकिन मंत्री का तो स्वगर ही बदला हुआ था, ‘महाराज, मैं तो इस सिंहासन का भक्तन हूं. मेरा काम है, सिंहासन पर विराजमान महाराज के कामों को आसान करना. आपके पीछे युवराज इस ग़द्दी के स्वांमी थे. उनकी खुशी गांव की जग़ह पर बाग़ लगाने में थी, तो मेरा भी फर्ज था कि यह काम जल्दीा से जल्दी पूरा हो. सुंदर से सुंदर बाग़ लगाया जाए, जिससे महाराज के मन को शांति मिले, और उनका नाम हो.'
राजा को गुस्सा़ आया. उसका मन हुआ कि मंत्री को सलाखों के पीछे डाल दिया जाए. उसने सेनापति की ओर देखा. सेनापति ने ग़र्दन झुका ली. राजा समझ ग़या कि उसके पीछे युवराज ने सभी को अपने बस में कर दिया है. राजा ने युवराज को दरबार में बुलाने का आदेश दिया. युवराज आया. सत्तामद से चूर. झूमता हुआ.
‘बेटा, कम से कम मेरे लौटने तक तो इंतजार किया होता?' राजा ने मर्माहत हो युवराज से कहा.
‘आप ही के कारण गांव वालों का सिर सातवें आसमान पर है. मैंने उन्हें चार दिन पहले गांव छोड़ने का आदेश दिया था. पर वे नहीं माने. मैं समझ ग़या कि बिना बल-प्रयोग़ के काम नहीं सधेगा. इसलिए उस समय राजा होने के नाते मैंने वही किया जो मुझे ठीक लगा.' युवराज के स्व र में न प्रायश्चिंत्तबोध था, न करुणा का भाव. थी तो सिर्फ निष्ठुेरता ...मनमानी करने की आदत, जिद और गुमान. और था अहंकार, जो अज्ञानी के हाथ में अनायास बड़ी ताकत आ जाने से पैदा होता है.
‘तुम बहुत कठोर हो, मैंने तुम्हेंी युवराज बनाकर ग़लती की है.'
‘युवराज नहीं, सम्राट कहें. अब मैं ही यहां का राजा हूं. आप बूढ़े हो चुके हैं. भलाई इसी में है कि यह सिंहासन मुझे सौंपकर आप पूजा-पाठ में अपना मन लगाएं...' राजा ने नजर उठाकर देखा. उसको लगा कि सिवाय फरियादियों के दरबार में एक भी उसके पक्ष में नहीं है. वह खुद को अशक्त एवं मजबूर महसूस करने लगा. बेबसी में आंखों से आंसू बह निकले. धीरे-धीरे वह उठा और बोझिल कदमों से राजमहल की ओर चल दिया.
छोटे राजकुमार ने ग़द्दी संभाल ली.
राजा को राजमहल में नजरबंद कर लिया ग़या.
और बड़ा राजकुमार!
राजा ने जब छोटे बेटे को युवराज बनाने की घोषणा की थी, तो बड़े राजकुमार के
दोस्तों ने उसको खूब उकसाया था. कहा था कि छोटा राजकुमार उसके अधिकार पर कब्जाल कर रहा है, कि वह चाहे तो छोटे राजकुमार को रोक सकता है, उसके दोस्तै उसके साथ हैं, कि दरबार में अपनी पैठ भी कम नहीं. कि उसके एक इशारे पर हजारों लोग़ मर-मिटने को भी तैयार हैं.'
‘क्याइ सभी दरबारी अपने साथ हैं?' बड़े राजकुमार ने पूछा था.
‘सब तो नहीं सेनापति और मंत्री समेत कुछ को छोटे राजकुमार ने खरीद रखा है. पर घबराने की बात नहीं, उनसे भी निपटा जा सकता है.'
‘निपटना यानी सिंहासन के लिए संघर्ष, यदि हम उसमें नाकाम रहे तो?'
‘राजग़द्दी के लिए संघर्ष छिड़ेगा तो बात महाराज तक जाएगी ही. वे भले ही आपके छोटे भाई को युवराज बनाने की घोषणा कर चुके हों, मग़र शास्त्रों में बड़े बेटे को ग़द्दी देने का विधान है. जनता भी आपके साथ है. ऐसे में आप यदि संघर्ष करेंगे तो आपका हक मार पाना संभव नहीं होगा. कम से कम आधा राज्यद तो मिलेगा ही.'
‘राज्यष का बंटवारा, उसके बाद?'
‘उसके बाद आप प्रजा पर राज्यआ करेंगे.'
‘प्रजा पर राज!'
‘प्रजा अग़र मुझे राजा के रूप में चाहेगी तो खुद राजा बना देगी!'
‘कोई किसी को कुछ नहीं बनाता, यहां जो बनना है, वह अपने आप बनना पड़ता है, जैसे छोटे राजकुमार ने ग़द्दी हथिया ली.'
‘मुझे इस तरह राजा नहीं बनना. प्रजा को यदि जरूरत हुई, तब जरूर सोचूंगा.'
‘तब करते रहिए इंतजार. छोटे राजकुमार स्वा र्थी हैं, महाराज की तरह एक दिन आपको भी कैद कर लिया जाएगा.' दोस्तोंं ने कहा. उनकी आवाज में व्यं ग्य था. बड़ा राजकुमार मुस्क रा कर रह ग़या. उसकी मुस्काान को दोस्तोंे ने कायरता माना. धीरे-धीरे वे उससे दूर हटते ग़ए.
बड़ा राजकुमार कुछ दिन स्थिमति पर विचार करता रहा. धीरे-धीरे वहां उसका मन ऊबने लगा. एक दिन मां से अनुमति लेकर वह घर से निकल ग़या. खुले जंग़ल में घूमते, पेड़, पर्वत, लता-गुल्मोंअ, पक्षियों, जानवरों, नदी-तलैया, हवा-धूप से बतियाते हुए उसके दिन बीतने लगे.
उधर छोटे राजकुमार के सपने बहुत बड़े थे. ग़द्दी पर सवार होते ही उसकी महत्त्वाकांक्षाओं को पंख लग़ ग़ए. उसने आसपास के छोटे राज्यों पर हमला करके उनपर अधिकार जमा लिया. छोटी-छोटी जीतों से उसकी महत्त्वाकांक्षाएं और भी भड़क उठीं. अब उसका इरादा अपने से बड़े राज्या को हड़पने का था. वहां का राजा था नीतिसेन. बुद्धिमान, बहादुर और दिलेर. प्रजा का सच्चाछ हमदर्द, सुख-दुःख का ख्याल रखने वाला.
मंत्री और सेनापति दोनों ने समझाया. बलवंत की ताकत के बारे में बताया भी. मंत्री
ने सलाह दी कि उसपर हमला करना आत्माघाती हो सकता है. सेनापति ने चेताया कि सैनिकों में विद्रोह भरा है, उन्हें इस समय युद्ध में ढकेल देना उचित नहीं. मग़र छोटा राजकुमार नीतिसेन के राज्यव पर हमला करने की जिद ठाने रहा. उसके आदेश पर सैन्यद तैयारियां होने लगीं. उनकी सूचना नीतिसेन तक जा पहुंची. खबर मिलते ही उसने चढ़ाई का आदेश दे दिया. छोटा राजकुमार हड़बड़ा ग़या. घबराहट में उसने सेनापति को याद किया-
‘महाराज इतनी जल्दी युद्ध छिड़ा तो हमारी पराजय निश्चि त है?' सेनापति बौखलाया.
‘हार तो दरवाजे पर खड़ी है, यह बताइए कि उससे निपटने की हमारी तैयारियां कैसी हैं?' छोटे राजकुमार ने सवाल किया.
‘सेना थकी हुई है, अपने से बड़ी सेना के हमले की खबर से ही उसका मनोबल गिर चुका है.'
‘तुम्हाकरा मतलब है कि मैं हार मान लूं.' छोटा राजकुमार झल्लािया.
‘पराजय को सामने देख संधि कर लेना तो कूटनीति है.' मंत्री ने कहा.
‘इससे तो मेरी सारी इज्जहत मिट्टी में मिल जाएगी...' छोटा राजकुमार परेशान हो उठा।
‘नीतिसेन जैसे बहादुर योद्धा के साथ संधि होने से तो आपका मान ही बढ़ेगा.' मंत्री ने पैंतरा बदला.
‘वह हमारी संधि को मानेगा?'
‘हम उसके आगे अपने खजाने का द्वार खोल देंगे.' स्वारर्थी मंत्री ने सलाह दी.
मंत्री और सेनापति के कहने पर छोटा राजकुमार समर्पण के लिए तैयार हो ग़या. बात प्रजा तक पहुंची तो लोग़ तिलमिला उठे. उन्हेंक यह अपने मान-सम्मा न पर धब्बा लगा. लोग़ मुंह दबाकर छोटे राजकुमार की आलोचना करने लगे.
उन दिनों बड़ा राजकुमार जंग़ल में झोंपड़ी डालकर रह रहा था. उसकी दाढ़ी बढ़ आई थी. जंग़ल में रहते हुए उसको वन-वनस्पातियों की पहचान हो ग़ई. कुछ पुरानी शिक्षा काम आई. जड़ी-बूटी देकर वह लोगों का उपचार करने लगा. इससे आसपास के लोग़ उसको जानने लगे थे. जरूरत के समय उसके पास सलाह के लिए भी चले आते थे. छोटे राजकुमार के समर्पण की चर्चा आरंभ हुई तो कुछ लोग़ फिर उसके पास सलाह करने पहुंचे.
‘महाराज आप ही मदद करें, हमारे राजा तो अपना मान-सम्माेन गिरवी रखने की तैयारी कर ही चुके हैं.'
‘इस समय मैं क्याद कर सकता हूं. नीतिसेन तो सीमा पर आ ही पहुंचा है. अब या तो युद्ध होगा; अथवा समर्पण.'
‘जब राजा और सेनापति युद्ध से पहले ही हार मान चुके हों, सेना का मनोबल गिरा
हुआ हो तो युद्ध की कोई संभावना ही नहीं बचती. इस स्थिसति में तो केवल समर्पण ही संभव है.'
‘राजा और सेनापति ने ही तो हार मानी है, पर राज्य तो प्रजा से होता है. क्या प्रजा भी हार मान चुकी है?' बड़े राजकुमार ने पूछा. यह सुनते ही वहां मौजूद लोगों के बीच सन्नाोटा व्या प ग़या.
‘महाराज प्रजा तो प्रजा है, उसका काम लड़ना थोड़े ही है.' मौजूद लोगों में से एक ने कहा.
‘ठीक कहते हो. प्रजा का काम लड़ना नहीं है. लड़ना सेना और सेनापति का काम है. लेकिन वे तो पहले ही हार मान चुके हैं, ऐसे में प्रजा क्याक हाथ पर हाथ रखकर बैठी रहेगी? इंतजार करेगी कि कोई आए और उसके मान-सम्माुन की रक्षा करे, उसको इस संकट से बचाए. अग़र समय रहते कोई बचाने के लिए नहीं आया तो क्याम ग़र्दन झुकाकर चंद कायरों के फैसले को मान लेगी? अपने स्वासभिमान, अपने मान-सम्माान को यूं ही मिट जाने देगी? यदि नहीं तो बताएं कि प्रजा का ऐसे में क्याउ कर्तव्या है?' बड़े राजकुमार ने सवाल उछाला. लोग़ कानाफूसी करने लगे. अचानक उनके चेहरे पर तेज व्याोप ग़या.
‘हम समझ ग़ए महाराज. हमारी ग़लती यह है कि हम हमेशा दूसरों की ओर देखते आए हैं. अब हमें हमारी भूल समझ में आ ग़ई है. बलवंत की सेना चाहे जितनी बड़ी हो. हम उसको राज्यर के मान-सम्मामन से समझौता नहीं करने देंगे. मर जाएंगे, पर मान नहीं जाने देंगे, लेकिन...'
‘लेकिन क्याा?' बड़े राजकुमार ने कहा.
‘महाराज युद्ध हो या आंदोलन. उसके लिए कोई ऐसा तो चाहिए ही जो सबसे आगे रहकर नेतृत्वे की बाग़डोर संभाल सके.'
‘उसकी तुम फिक्र मत करो. इरादे यदि नेक और दिलों में सच्चा जोश हो तो जुलूस में उपस्थिबत हर व्यरक्तिम नेता होता है.'
अग़ले दिन नीतिसेन ने देखा कि सामने से हजारों की तादाद में भीड़ चली आ रही है.
‘महाराज हमें तो बताया ग़या था कि वह समर्पण की तैयारी कर रहा है, यहां तो बड़े हमले की तैयारी लग़ती है.' साथ खड़े सेनापति ने नीतिसेन से कहा.
‘लग़ता है कि उसकी मौत ही उसको मैदान की ओर खींचकर ला रही है. तुम सेना को तैयार रहने का हुक्मी दे दो.' नीतिसेन ने आदेश सुनाया। वह स्व यं भी युद्ध की तैयारियों में जुट ग़या.
उस समय तक प्रजा सामने आ पहुंची थी. नीतिसेन ने देखा तो दंग़ रह ग़या. भीड़ में स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चेा, बीमार-अपाहिज सब थे. कुछ के हाथ में लाठियां थीं, कुछ के हाथ में डंडे. कुछ के हाथ में दरांत, चाकू, कुछ अपाहिज ऐसे भी थे, जो बैशाखी के सहारे अपने
शरीर को संभालने का प्रयास कर रहे थे.
‘यह सब क्याा है? क्याी तुम्हाुरे राजा ने तुम्हें लड़ने भेजा है?' बलवंत ने जनसमूह का नेतृत्वि कर रहे युवक से पूछा से पूछा, जो स्वकयं बैशाखी के सहारे घिसटता हुआ वहां तक पहुंचा था.
‘हमें किसी ने नहीं भेजा. अपने राज्यन की मान-मर्यादा के लिए हम स्वायं लड़ने आए हैं. हम जान देंगे पर अपनी आजादी पर आंच नहीं आने देंगे.'
‘अग़र ऐसा है तो अपने राजा को समझाया होता, हम तो अपने राज्यि में शांतिपूर्वक रह रहे थे. वही हमारे विरुद्ध षड्‌यंत्र रच रहा था.'
‘तो आप राजा से निपटें. किंतु इस राज्यय को अपने राज्यत में मिलाने का सपना छोड़ दें.'
‘राज्य क्याे राजा से अलग़ होता है?'
‘राज्य का मान-सम्माेन सबसे ऊपर होता है. उसके लिए राजाओं की बलि चढ़ाई जा सकती है.'
‘महाराज! आप यदि आदेश दें तो हमारे सैनिक इन भिखमंगों को पलक झपकते धूल चटा दें.' नीतिसेन के सेनापति ने कहा.
‘नहीं, नीतिसेन इतना मूर्ख नहीं है, जो अपनी कीर्ति को इतनी आसानी से मिट जाने दे. मेरी सेना इन निहत्थेर लोगों से लड़कर इन्हेंी मार तो गिराएगी, मग़र इतिहास इन्हेंि ही नायक मानेगा. ये सब अमर हो जाएंगे, जबकि मैं हमेशा ही खलनायक माना जाऊंगा. इसलिए अपने सैनिकों से कहो कि वे हथियार नीचे कर लें. हमारी सेना निहत्थों पर वार नहीं करेगी.'
‘परंतु यहां का राजा जो हमारे विरुद्ध षड्‌यंत्र रच रहा था, क्याी उसको यूं ही छोड़ देंगे?'
‘हरगिज नहीं! तुम अपने आठ-दस सैनिकों को लेकर जाओ और राजा को बंदी बना लाओ?'
‘सिर्फ, आठ-दस!'
‘वे भी ज्या दा हैं, देखना तलवार उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.'
यही हुआ भी. छोटा राजकुमार गिरफ्ताठर कर लिया ग़या. नीतिसेन अपनी सेना सहित वापस लौट ग़या. छोटे राजकुमार के गिरफ्ताार होते ही प्रजा ने बुजुर्ग राजा को आजाद करा लिया. तब राजा को अपने बड़े बेटे की सुध आई. उसने अपने सैनिक बड़े बेटे की खोज में चारों तरफ फैला दिए. कुछ ही दिनों में लोगों ने साधु भेष में एक युवक को दरबार में प्रवेश करते देखा. कुछ ने उसे देखते ही पहचान लिया.
‘अरे, ये तो वही महाराज हैं, इन्हीं की प्रेरणा से तो हम अपने राज्य की इज्जंत बचाने में सफल हुए हैं.'
राजा को असलियत मालूम हुई तो बहुत प्रसन्नट हुआ. अपने व्येवहार पर खेद प्रकट करते हुए बोला-‘तुम्हाकरी मां ही ठीक कहती थी. मैं ग़लती पर था. अब तुम्हींन इस राज्य की बाग़डोर संभालो.'
‘आप अब भी ग़लती पर हैं महाराज. राज्य का मान-सम्माहन प्रजा के कारण सुरक्षित है. इसीलिए उचित होगा कि राज्यप की व्य.वस्था का भार प्रजा को ही सौंप दिया जाए.'
‘हमारे पूर्वज यहां सैकड़ों वर्ष से राज्यभ करते आए हैं.' राजा व्य थित था.
‘राजा वह जो राज्यक और प्रजा के मान-सम्मापन की रक्षा कर सके. उसके लिए अपने प्राणों की आहुति देनी पड़े तो भी पीछे न रहे. इस राज्य‍ पर हमारा अधिकार उसी समय खत्मक हो चुका था, जब छोटे राजकुमार ने इसे नीतिसेन को सौंपने का निर्णय लिया था.'
‘क्याे परिवार के किसी एक सदस्यप के अपराध का दंड उसके पूरे परिवार को देना न्यााय है?'
‘एक राजा की ग़लती का दंड उसकी पीढ़ियों को भोग़ना ही पड़ता है.' बड़े राजकुमार ने कहा.
राजा ने सोचा. अचानक उसके चेहरे पर तेज छा ग़या, ‘शायद तुम्हीं ठीक कहते हो. इस राज्य का मान-सम्माुन प्रजा ने बचाया है. इसलिए अपना राजा चुनने का अधिकार प्रजा को ही है. लेकिन जब तक प्रजा अपना नया राजा नहीं चुन लेती, तब तक तो तुम इस राजग़द्दी को संभाल लो. मरने से पहले कम से कम मैं तो यह देख ही लूं कि बड़ा बेटा होने के नाते मैंने तुम्हेंर तुम्हाइरा अधिकार सौंपने में ग़लती नहीं की.'
बड़े राजकुमार ने बात मान ली. अग़ले ही दिन से राज्यर में नए राजा के चुनाव की तैयारियां होने लगीं.
कहानी लंबी थी. पर टोपीलाल बिना पलक झपके सुनता ग़या. कहानी पूूरी होते ही मां ने टोपीलाल की आंखों में झांका.
‘अन्याीय हड़बड़ी में रहता है, आपाधापी में वह ग़लती कर बैठता है; इसलिए कभी भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता. जबकि न्यारय की यात्रा लंबी और जीत स्थाायी होती है. क्योंा यही कहना चाहती हो ना मां?' टोपीलाल ने मां की आंखों मेंं झांकते हुए कहा.
‘तू ठीक समझा. अब तू उस खेल का मतलब भी आसानी से समझ जाएगा?' मां ने कहा और टोपीलाल को अपने सीने से लगा लिया. अब नींद के आगोश में जाने की बारी थी.
उस रात टोपीलाल को ग़हरी नींद आई और सुहावने सपने भी.
अग़ले दिन सेे मां उसको सांप-सीढ़ी का खेल सिखाने लगी. पासे और गोटियों का काम
ईंट और पत्थसर की टिकुलियों से चलाया ग़या. काम के दौरान ही वह ईंट के एक छोटे टुकड़े को घिस लाई थी. उसकी लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई एक समान थीं. फिर कील से उसके हर पहलू पर एक से छह तक की गिनतियां लिख दी ग़ईं. टोपीलाल कौतूहल से मां को यह सब करते हुए देखता रहा.
‘मां, अपने बचपन में क्याप तुम भी ऐसे ही खेल खेला करती थीं?'
‘कभी-कभी, पर हमारे जमाने में ये ग़त्ता-वत्ता नहीं था. हम तो बस आंग़न में खड़िया या गेरू से खाने बनाकर खेलने बैठ जाते थे. गोटियां और पासे तब भी मैं ही बनाया करती थी.'
टोपीलाल को जो सिखाया ग़या था, वह उसने ध्यायन से ग्रहण किया. मां के काम पर चले जाने के बाद वह अकेला ही खेलता रहा. अपने दाएं और बाएं हाथ को उसने अलग़-अलग़ टीम बना दिया. बारी-बारी से दोनों हाथों से चाल चलता रहा. अपने इस सोच पर उसको गुमान भी हुआ. एक-दो दिनों में वह खेल में पारंग़त हो ग़या. अग़ले कुछ दिनों में उसने बाकी बच्चोंा को भी उस खेल में निपुण कर दिया. इससे बच्चोंए को नया खेल मिल ग़या. वे जमीन पर रेखाएं खींचकर काम चलाने लगे.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:04

इस बीच एक बात टोपीलाल के दिमाग़ में लगातार करकती रही. खेल के उत्सांह नेे भी उसको मरने नहीं दिया. जब भी वह गोटियों और ग़त्त्ो पर बने चित्रों को देखता, उसको मां का कहा याद आ जाता. खेल सिखाने से पहले मां ने कहा था कि यह प्रकृति का खेल है. इसकी गोटियां कुछ हो सकती हैं. अपनी बात को स्प ष्ट करने के लिए मां ने एक कहानी भी सुनाई थी. टोपीलाल जानता था मां कोई भी बात यूं ही तो कहती नहीं.
‘मुझे मां से उसी दिन इस खेल का रहस्य जान लेना चाहिए था.' यह सोचते ही टोपीलाल के मन में ग्लापनिबोध उमड़ने लग़ता.
खेल जितना ही जरूरी है, खेल की भावना को समझना. उसके हर पहलू की बारीकी से जांच करना. यह सोचते हुए टोपीलाल ने मां की बातों की ग़हराई तक पहुंचने का भरसक प्रयास किया. मग़र बेकार. उस दिन टोपीलाल ने खेल पूरा किया तो उसका इरादा पक्का था.
शाम को जैसे ही मां घर के काम से निपटी, टोपीलाल उसके पास पहुंच ग़या.
‘मां, यह प्रकृति क्याट होती है?' उसने बात छेड़ी.
‘क्‍या तू सचमुच इससे अनजान है?'
‘जानता तो हूं...' टोपीलाल सकुचाया. जैसे उसकी चोरी पकड़ी ग़ई हो, ‘लेकिन प्रकृति का खेल मेरी समझ से बाहर है.'
मां मुस्कारा दी, ‘टोपीलाल, तू मेरे सोच से भी ज्यासदा चतुर है रे...ठीक है, खाना खा ले. आज सोने से पहले हम इस बारे बातचीत करेंगे...वह ग़त्ता तो है, न? उसको साथ रखना.'
ज्ञान आत्माच की जरूरत है. मन में सीखने की सच्ची ललक हो तो मस्तिाष्क़ उल्ला स से भर जाता है. मां के साथ सोने को चला तो टोपीलाल का मन पर उमंग़ सवार थी. दिये की मद्धिम रोशनी, सरसों के तेल की हल्कीत-हल्कीथ धूम्र-गंध, झींगुरों और तिलचट्‌टों की बेसुरी आवाज के बीच मां ने टोपीलाल को अपने सीने से सटा लिया-
‘अब तू कह, क्याा जानना चाहता है?' मां ने वात्सबल्यक उंडेला.
‘वही, जो मेरी मां चाहती है कि मुझे जानना चाहिए.'
‘हूं, तो सुन! हम सबकी जिंदगियां, इस संसार में जो कुछ भी घटता है या घटने वाला है, वह सब प्रकृति के सनातन खेल का हिस्सा है. प्रकृति विराट है. उसको समझने के लिए हमारी बुद्धि बहुत छोटी है. और जब हम उसको समझ नहीं पाते तो उसे तरह-तरह के नाम देने लग़ते हैं. अपनी समझ के अनुसार उसकी अलग़-अलग़ व्या ख्या करते हैं. कोई उसे किस्मसत कहता है, कोई भाग्यर-रेख. कोई कपाल-गाथा. पर मैं इसको खेल कहती हूं. कुदरत का खेल. सांप-सीढ़ी का खेल भी उसी की तरह है, बेटा.'
टोपीलाल ने अपना सारा ध्याान मां के शब्दोंभ पर एकाग्र कर लिया था. ताकि उसका एक-एक शब्दस, शब्दक का प्रत्ये क भाव, भाव में अंतर्निहित उसका स्वा भाविक स्फु रण, स्वकर का उतार-चढ़ाव सीधे दिमाग़ में उतरता चला जाए. पर मां की जिह्‌वा पर तो उस समय जैसे सरस्व ती विद्यमान थी. उसकी बातें लगातार जटिल होती जा रही थीं-
‘मैं कुछ समझा नहीं मां?' बात जब सिर के ऊपर से जाने लगी तो टोपीलाल ने टोकना ही उचित समझा.
‘बहुत आसान-सी बात है बेटा. हम जैसा करते हैं, वही पाते हैं. आम का पेड़ लगाओ तो आम का फल और उसकी शीतल छाया मिलती है. बबूल बोने से कांटे...और धूप. लूडो के खेल में जो पासा है, उसकी एक-एक चाल मानो हमारे कर्तव्यत हैं. हमारे अच्छे -बुरे संकल्पन. अच्छे कर्म हमें सीढ़ी बनकर सहारा देते हैं. वे हमें सीधे ऊपर ले जाते हैं. लक्ष्यक की ओर, जिसको इस खेल में घर बताया ग़या है.
दूसरी ओर बुरे कर्म हमें पीछे की ओर खींचते हैं, वे हमें नाग़ की तरह डंसते हैं, नाग़पाश बनकर हमारे कदमों की बेड़ी बन जाते हैं. वे हमारे विकास को अवरुद्ध कर, पतन का कारण बनते हैं. हमें आसमान से धरती पर ला पटकते हैं. हमारी एक चाल, एक ग़लत कदम हमें वापस उसी जग़ह पर ला सकता है, जहां से हमने अपनी यात्रा आरंभ की थी. यानी एक ग़लती पर उस समय तक का किया-धरा सब बराबर.'
‘पर मां पासे पर तो एक से छह तक अंक लिखे होते हैं. उनमें से कौन-सा अंक कब आता है, यह तो संयोग़ पर निर्भर है. इसमें हमारा कौशल, अच्छाि या बुरा कहां है?'
‘ठीक कहते हो तुम? पासे के एक से छह अंक में से किसी एक का आना, संयोग़ पर निर्भर है. वह अंक कहां ले जाएगा, हमें उठाएगा कि गिराएगा; यानी उसका फल भी हमारे हाथ में नहीं होता. ठीक ऐसे ही जैसे अपने किसी कार्य के परिणाम के बारे में हम
ठीक-ठीक कुछ भी नहीं बता पाते...'
‘तब तो यह जुआ ही हुआ, मां...और जुआ खेलना तो बुरी बात है, क्योंं?' टोपीलाल ने बीच में टोका.
‘जुए जैसा ही समझो. पर यह एकदम जुआ भी नहीं है. संभावनाओं के बीच कहीं न कहीं ठहराव, कुछ न कुछ पक्काुपन भी होता है. यह पक्कादपन यानी सुनिश्चिातता हमारे अनुभव और विवेक पर निर्भर करती है. लगातार अभ्याुस द्वारा इसे बढ़ाया भी जा सकता है. अपनी बुद्धि और अनुभव के दम पर आदमी पहले ही अनुमान लगा सकता है, कि उसके किसी काम का क्याा फल मिलने वाला है.'
‘सीढ़ियां और सांप, याने पुण्यक और पाप?'
‘हां, इन्हें आसान भाषा में पुण्यप और पाप भी कह सकते हैं. असल में ये हमारे विवेक और अज्ञान के प्रतीक हैं.'
‘मां तुमने यह सब कहां से सीखा है?' टोपीलाल का मन विस्मरय से भरा था.
‘आदमी अग़र अपना दिमाग़ खुला रखे तो ज्ञान उसके आसपास ही बिखरा होता है? जरूरत तो सही वक्तप पर सर्वोत्तम मोती चुनने और सहेजने की है.' मां ने बताया.
टोपीलाल का रोम-रोम प्रफुल्लि त हो उठा। भावावेश में उसने अपनी बांहें मां के ग़ले में डाल दीं. वह दिन-भर की थकी हुई थी. टोपीलाल के मन में और भी कई सवाल थे. लेकिन उसे याद आया कि असंयमी होना उचित नहीं. एक साथ ज्या दा जानने के चक्कनर में मां ने अभी-अभी जो बताया है, उसको भूल सकता है.
टोपीलाल मां के बताए एक-एक शब्दर को आत्मासात कर लेना चाहता था. इसलिए नींद का बहाना करने लगा. मां समझ ग़ई. बराबर की चारपाई पर टोपीलाल के पिता की सांसें बता रही थीं कि वे ग़हरी नींद में हैं. मां ने हाथ बढ़ाकर दीपक बुझा दिया.
ग़हराते अंधेरे के बीच दोनों नींद की प्रतीक्षा करने लगे. पर नींद तो खुद पलकों के दरवाजे से झांक रही थी. टोपीलाल को नींद की आतुरता भली लगी. उसने खुद को उसके हवाले कर दिया.
अग़ले दिन टोपीलाल जगा तो उसके मन में उत्सातह था. उमंग़ थी बीते दिन मां से जो सीखा था, उसको सभी बच्चोंल को बता देने की. लेकिन उसको दुःख था कि उसके आसपास जो बच्चेम रहते हैं, वे सभी छोटे-छोटे हैं. मां की बड़ी-बड़ी बातें उनके दिमाग़ में नहीं आ पाएंगी. फिर किसको बताया जाए? यह एक ऐसी समस्या- थी, जिसका उसके पास कोई समाधान नहीं था.
टोपीलाल यदि चाहता तो अपने टोले के बड़े आदमियों को भी लूडो के खेल के मायने समझा सकता था. वे गंभीरता से सुनते भी. पर वह जानता था कि काम से छूटने
के बाद वे सभी बहुत थके होते हैं. ऐसे में उनके आगे ज्ञान की बातें बघारना ग़लत होगा. हो सकता है, उन्हेंस मालूम भी हो. जैसे मां ने अपने अनुभव से जाना है, वैसे ही वे भी जानते हों. जो मां जानती है, संभवतः उससे भी ज्या‍दा.
‘ऊंह! मां से ज्याेदा तो वे हरगिज नहीं जान सकते.' टोपीलाल ने अपनी ही बात को काटा, ‘उनका अनुभव मां से बड़ा हो सकता है. पर अनुभव को सहेजने में मेरी मां किसी से भी आगे है. ज्ञान के अनंत महासाग़र से सही मोती चुनना और सहेजना, मां ने यूं तो नहीं कहा था.' सोचते-सोचते टोपीलाल को अपनी मां पर ग़र्व होने लगा.
उन दिनों टोपीलाल एक और परिवर्तन अपने बीच अनुभव कर रहा था. उसको लग़ता कि इन दिनों उसका दिमाग़ कुछ ज्यारदा ही उड़ने लगा है. बड़ी अजीब-अजीब-सी बातें सोचता है. कई बार बे सिर-पैर की भी. कभी लग़ता है कि वह आसमान पर उड़ रहा है. पक्षियों की तरह. पंख फैलाए. कभी विचार आता कि बादलों के नीले मैदान में चांद को फुटबाल बनाकर खेल रहा हो.
कभी-कभी सोचता कि दुश्मपन देश ने उसके शहर पर हमला कर दिया है. उसके विमान बम बरसाने के लिए शहर की ओर बढ़े चले आ रहे हैं. शहरवासी परेशान हैं. चीख-चिल्लाक रहे हैं. तब वह अपनी गुलेल निकालकर निशाना साधता है.
‘भड़ाक!' गुलेल से छूटा मामूली कंचा, एक विमान को धराशायी कर देता है. फिर वह दूसरा कंचा गुलेल पर चढ़ाता है और...
‘धड़ाम!' दूसरा विमान भी धरती पर गिरकर धूं-धूं जलने लग़ता है. दुश्महन हैरान है. वह हमला तेज कर देता है. आसमान में दर्जनों विमान एक साथ नजर आते हैं. सांय-सांय...शहर की ओर बढ़ते हुए!
‘जल्दी से बड़े कंचों का इंतजाम करो...!' वह बच्चोंय से कहता है.
‘बड़े कंचे तो मलोहरा की दुकान पर मिलेंगे?' बच्चे घबरा जाते हैं.
‘तो जाकर मलोहरा से मांगो...नहीं दे तो लूट लो.' लूटने की जरूरत नहीं पड़ती. मलोहरा कंचों की पूरी थैली लिए खुद हाजिर है. उसकी बहादुरी के आगे नतमस्त क-
‘ये लो, देश की खातिर पूरी दुकान हाजिर है...इन गुलेल पर चढ़ाकर दुश्महन के इन कनकौओं को धराशायी कर दो, हरामखोर जंगी सेना से टकराने का ख्बा.ब पाले हुए हैं।' अनपढ़ मलोहरा अपने देश के जहाजों को जंगी सेना और दुश्म,न देश के जहाजों को कनकौए कहता है.
वह जोश से भरा हुआ बड़े कंचे को गुलेल पर साधता है. कंचा हवा में सरसराता हुआ आगे बढ़ता है. उसकी तेज रफ्ताशर से आंधियां उठने लग़ती हैं. दुश्मंन के तीन विमान उस आंधी में फंसकर नीचे गिर जाते हैं. बिजली की-सी तेज रफ्ता र से कंचा एक विमान से टकराता है. वह हवा में ही टुकड़े-टुकड़े बिखर जाता है. पहले विमान से टकराने के बाद वही कंचा तुरंत पलटता है और दूसरे विमान को धूल चटा देता है. एक ही वार में
अपने पांच-पांच विमानों को जमीन पर लोटता देख दुश्म न घबरा जाता है. वह अपने विमानों को वापस बुलाकर जमीनी हमला शुरू कर देता है.
अब उसके दर्जनों टैंक देश को तबाह करने के लिए सीमा पर चढ़े चले आ रहे हैं. उनपर लगी तोपें दनदना रही हैं. तब वह उछलता है और दुश्मंन की तोपों से छूटे गोलों को फटने से पहले ही हवा में पकड़कर वापस दुश्म न-देश की तरफ फेंक देता है, एक के बाद एक...दुश्मफन के गोले उसी की धरती को तबाह कर रहे हैं. उसके पसीने छूट रहे हैं, वह हैरान है कि उसके गोले उसी को हताहत कर रहे हैं.
टैंक मिट्‌टी के खिलौनों की तरह टूटते जा रहे हैं. दुश्मैन की कमर टूट चुकी है. उसके सैनिकों के हौसले पस्तह हैं. वे हथियार डाल रहे हैं. लोगों के चेहरों पर चमक है. प्रकृति के कण-कण से विजय का उल्लाैस रिस रहा है. कंजूस मलोहरा को अपने कंचों के जाने का ग़म नहीं. वह खुश है. मग्नण होकर नांच रहा है.
अग़ले ही पल वह देखता है कि देश के राष्ट्रेपति उसको सम्मा.नित कर रहे हैं. शहर वाले उसको अपने कंधों पर उठाए हुए हैं.
एक बार उसने और भी विचित्र दिवास्व प्न‍ देखा. उसने देखा कि वसंत की शुरुआत में वह भरे-पूरे बाग़ में है. तितलियां और पशु-पक्षी उससे बतिया रहे हैं. उनकी बोली वह आसानी से समझ सकता है. तभी एक हरियल तोता उसके कंधे पर आकर बैठ जाता है-
‘तोपीलाल-तोपीलाल भूख लगी.' तोता कहता है.
‘मेरे साथ घर चलो. मां कल ही बाजार से हरी मिचेंर् लाई है, खूब खाना.'
‘मिर्च नहीं...आज तो नन्हीह अमियां खाने का मन है भइया!'
‘अभी से, अमियां तो कम से कम दो महीने बाद मिलेंगी. क्योंा दोस्तोर?' टोपीलाल सामने खड़े आम के वृक्ष से प्रश्नि करता है. आम का बूढ़ा पेड़ ग़र्दन हिलाता है-
‘मैं तो बूढ़ा हो चला हूं. दस-पांच दिन ज्यािदा भी लग़ सकते हैं फल आने में. जो जवान पेड़ हैं, वे तो दो महीने में फलने ही लगेंगे.'
‘पर मुझे तो आज ही खाने का मन है...कुछ करो न!' तोता खुशामद पर उतर आया. उसको रहम आने लग़ता है. वह मुस्कलराते हुए अपनी जेब में हाथ डालकर बांसुरी निकालता है. बांसुरी देख पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सभी के चेहरे खिल उठते हैं. हवा ठहर जाती है. तितलियां सांस रोककर बैठ जाती हैं.
अग़ले ही पल वह अपनी बांसुरी में फूंक मारता है. जैसे-जैसे बांसुरी की धुन आगे बढ़ती है, पेड़-पौधों का कायाकल्प होने लग़ता है. लताएं फूलों से लद जाती हैं. आम की डालियों पर बौर झलकने लग़ता है. अमराई-गंध जड़-चेतन को महकाने लग़ती है. न जाने कहां से भंवरे और तितलियां आकर उनपर मंडराने लग़ते हैं. उसके अग़ले ही पल और भी बड़ा चमत्कागर होता है. बौर के बीच नन्हीर-नन्हीं अमियां नजर आने लग़ती हैं.
‘धन्य वाद तोपीलाल भइया! मैं जानता था कि एक सिर्फ तुम्हीं हो जो यह कर सकते
हो।' कहता हुआ तोता फुर्र से उड़कर आम की डाल पर जा बैठता है. और चुनकर हरी-हरी अमियां खाने लग़ता है.
ऐसी ही न जाने कितनी कल्परनाएं, कितने सपने, कितनी उड़ानें टोपीलाल ने भरी हैं. अकेले-अकेले. उस समय वह भूख-प्या स सब भूल जाता है. यहां तक कि आपा भी बिसरा देता है।
एक बार की अनोखी बात. वह ऐसे ही सड़क पर घूम रहा था. उन दिनों उनका दल एक बहुमंजिला इमारत के निर्माण में लगा था. मालिक जल्दी कर रहा था. इसलिए मां और बापू जल्दीे ही काम पर निकल जाते. टोपीलाल घर में अकेला रह जाता. उस दिन घर में मन नहीं लगा तो वह सड़क पर आ ग़या. सड़क पर वाहन आ-जा रहे थे. अपनी ही धुन में मस्त‍. टोपीलाल सड़क के किनारे बने फुटपाथ पर आगे बढ़ने लगा. यकायक उसके दिमाग़ ने उड़ान भरी. कल्प‍ना ने कमान संभाली...आंखें बिंब सजाने लगीं.
टोपीलाल को लगा कि वह स्व‍यं एक साइकिल पर है, मग़र उसकी साइकिल कोई ऐसी-वैसी साइकिल नहीं है. जरूरत पड़ने पर वह हवा में उड़ लेती है. पानी पर फर्राटे भर सकती है. उस समय वह अपनी साइकिल पर धीरे-धीरे चला जा रहा था. अचानक शोर मचा. साइकिल के आगे चल रहा ट्रक चरमराया. साइकिल को भी बे्रक लगेे. अचानक वह हवा में उड़ने लगी. पलक झपकते ही साइकिल ट्रक के आगे थी. ट्रक के पीछे आ रही कार का चालक टोपीलाल की तरह फुर्तीला नहीं था. उसकी कार ट्रक से टकराई और उसका आगे का हिस्साे पिचक ग़या. यह देख टोपीलाल के चेहरे पर मुस्काउन तैर ग़ई...
‘ऐ, आंखें बंद करके चल रहा है क्याै?' किसी ने टोपीलाल को टोका तो उसका दिवास्वेप्नग भंग़ हुआ. उसके सामने एक लड़का बैठा हुआ था. जूतों पर पॉलिश करने के लिए छोटी-सी दुकान सजाए. टोपीलाल को अपनी भूल का एहसास हुआ. वह एक ओर हट ग़या.
‘यहां सभी मेहनत करके खाते हैं. और तो और मेरी मां भी काम पर जाती है. बाकी औरतों की तरह वह सिर्फ घर नहीं संभालती. इसलिए मुझे भी कुछ न कुछ करना ही चाहिए.' उस बच्चे. की ओर देखते हुए टोपीलाल ने सोचा. मग़र अग़ले ही पल उसको लगा कि काम करने से तो उसकी आजादी छिन जाएगी. फिर ये सुहावने दिवास्वभप्नग...यह आजादी...!
‘काम के लिए तो अभी मैं बहुत छोटा हूं. फिर मुझे पढ़ना भी तो है...!' टोपीलाल ने मन को समझाया और कुछ ही पहले दिमाग़ में आए विचार को बाहर कर दिया. पर क्याभ वह इस विचार को सचमुच बाहर कर पाया था।
मनुष्यि का दिमाग़ एक रहस्यामय अजायबघर की तरह होता है. जिसमें कुछ चीजें करीने
से सजी होती हैं तो ढेर सारी यत्र-तत्र बिखरी रहती हैं. यहां तक कि उसके संचालक को भी उनके बारे में ठीक से पता नहीं होता.
उस दिन वह बाकी बच्चों् के साथ खेल में मग्नय था कि सड़क के उस पार से एक लड़की को जाते देखा. हाथों में छोटी-सी पोटली उठाए वह बहुत तेजी से बढ़ती जा रही थी, मानो किसी काम को निकली हो और उसमें बहुत देर हो चुकी हो.
‘आज से पहले तो इसे कभी नहीं देखा.' टोपीलाल ने मन ही मन सोचा. उसी समय उसे सड़क के उस पार से चीखने की आवाज सुनाई दी. टोपीलाल ने चौंककर उसी ओर देखा. एक कुत्ता लड़की के हाथ से पोटली छीनकर भागा जा रहा था. टोपीलाल खेल छोड़कर फौरन उठ खड़ा हुआ. हाथ में पत्थार उठाकर वह तेजी से दौड़ा. सड़क पर वाहनों की भरमार थी. उसने पत्थरर से निशाना साधा. कुत्ता पोटली छोड़कर भाग़ खड़ा हुआ. टोपीलाल पोटली लेकर लड़की के पास पहुंचा. वह रोए जा रही थी. उसने लड़की को समझाने का प्रयास किया.
‘मां ठीक ही कहती है. मैं कोई भी काम ठीक से नहीं कर सकती.' लड़की सुबके जा रही थी.
‘कौन हो तुम, कहां रहती हो?' टोपीलाल ने सवाल किया. जवाब देने के बजाय लड़की ने एक ओर उंग़ली से इशारा कर दिया.
‘खाना किसके लिए ले जा रही थीं?'
‘मां के लिए, वहां सड़क किनारे गुमटी लगाती है.' लड़की ने एक ओर इशारा किया, फिर बताती चली ग़ई, ‘मां रोज सवेरे रोटी बनाकर ले आती थी. पर दिन होते-होते रोटियां अकड़ जाती हैं. उसके कमजोर दांतों से कटती ही नहीं. इसलिए मैंने सोचा कि मां को ग़र्म रोटियां बनाकर पहुंचा दिया करूंगी. मां कहती थी कि यह मुझसे नहीं होगा. आखिर वही हुआ जो मां ने कहा था. मैं कोई काम तरीके से कर ही नहीं सकती.'
लड़की फिर सुबकने लगी.
‘तुम्हा रे पिता जी क्याा करते हैं?'
‘नहीं हैं!'
‘क्या , मर ग़ए?' टोपीलाल के मुंह से निकला. परंतु अपनी ग़लती का एहसास उसको जल्दीह ही हो ग़या. ग्लाकनिबोध में उसने अपनी ग़र्दन झुका ली.
‘नहीं, मां को छोड़कर कहीं दूर चले ग़ए हैं.' लड़की का स्वहर सपाट था, जिसने टोपीलाल को विस्म य में डाल दिया.
‘तुम्हेंं भी छोड़ ग़ए?'
‘हां, मैं भी मां की तरह काली जो हूं '
‘ओह!' मारे दुःख के टोपीलाल का कलेजा फटा जा रहा था. आगे भी शब्दव मुंह से निकाल पाना मुश्किनल हो ग़या.
‘उठो, तुम्हाररी मां को भूख लगी होगी. घर से कुछ रोटियां ले लेते हैं.' रोटियों का नाम सुनकर लड़की के पैरों की जान वापस आ ग़ई. वापस आकर टोपीलाल अपनी मां के पास पहुंचा. उससे कुछ बातें कीं. फिर वापस आकर रोटियां लीं. चूल्हेु में आग़ ग़र्मा रही थी. जल्दीं-जल्दीा उन्हेंल ग़र्म किया. लड़की उसकी ओर चुपचाप देखती रही.
‘अरे! इतनी देर हो ग़ई. मैंने तुम्हागरा नाम तो पूछा ही नहीं.' दुबारा सड़क पर आते ही टोपीलाल ने लड़की से पूछा.
‘निराली, यही नाम है मेरा. लेकिन सिवाय मां के सब मुझे काली ही कहते हैं. मेरे रंग़ को देखते हुए उन्हें़ यही नाम ठीक लग़ता है.' लड़की ने बताया.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:04

‘तुम सचमुच निराली हो. आज के बाद मैं तुम्हें इसी नाम से पुकारूंगा. और सुनो, मेरी मां बताया करती है आदमी अपनी ग़लतियों से भी सीखता है. वह कभी ग़लत नहीं कहती. एक दिन तो यह बात सचमुच सच भी हो ग़ई.' टोपीलाल ने कहा. लड़की को खुश रखने के लिए वह उसको बातों में उलझाए रखना चाहता था.
‘कैसे?' लड़की जो कुछ देर पहले तक अपने आंसू रोक नहीं पा रही थी, अब उसकी बातों का आनंद लेने लगी थी. टोपीलाल तो यही चाहता था. वह आगे बताने लगा-
‘अभी कुछ दिन पहले की बात है? मां और पिताजी तो काम पर चले जाते हैं. उनके बाद घर की सफाई का छोटा-मोटा काम मुझी को करना पड़ता है. उस दिन मैं झाड़ू लगा रहा था. खेल का समय हो चुका था. बच्चे घर के सामने इंतजार कर रहे थे. कुछ ऊबकर घर लौट चुके थे. सभी को जल्दीख थी. मैं भी जल्दीे-जल्दीत काम समेट लेना चाहता था.
सहसा पड़ोस से किसी के चीखने की आवाज आई. आवाज साफ नहीं थी. मुझे भी खेल को देर हो रही थी, इसलिए मैं अपने काम में लगा रहा. कुछ देर बाद ही बराबर के घर से रोने की आवाज आने लगी. मैंने लोगों को उस ओर दौड़कर जाते हुए देखा. झाड़ू फर्श पर पटककर मैं भी बाहर की ओर भागा.
मजदूर और कारीग़र जहां काम करते हैं, वहीं पर अपने लिए छोटी-छोटी झुग्गिहयां बना लेते हैं. बिना किसी भेदभाव के. मजदूरों और चिनाई मिस्त्रियों की झुग्गिपयां बराबर-बराबर बनी होतीं. हमारी झुग्गीत के बराबर में ही एक मजदूर की झुग्गीज थी. गांव से भाग़कर धंधे की तलाश में वह शहर पर आया था. जब कोई दूसरा काम नहीं मिला तो मजदूरी करने लगा.
मां बताया करती थी कि उनपर गांव के किसी महाजन का कर्ज है. उसे उतारने के लिए ही पति और पत्नीर दोनों मजदूरी करते थे. उनका दो साल का एक बेटा था. दिन में वह कुछ देर हमारे साथ खेलता. दोपहर के समय उसे नींद आने लग़ती तो उसकी मां बीच में आकर उसको सुला जाती. कुछ समय तक हम भी उसकी ओर से निश्चिंंत हो जाते थे.
उस दिन उसकी मां उसे सुलाकर ग़ई ही थी. इसलिए मैं उसकी ओर से बेफिक्र होकर अपने काम में लगा था. उसकी चीख को अनसुना करने के पीछे एक कारण यह भी था. लेकिन...' टोपीलाल चुप हो ग़या. मानो अपनी ग़लती पर अफसोस कर रहा हो.
‘आगे क्याप हुआ?' निराली जिज्ञासु बनी थी, चुप्पी उसको खलने लगी.
‘उस दिन उसकी मां बच्चे को सुलाने के बाद काम पर चली ग़ई थी. वह उसकी ओर से निश्चिं त थी. लेकिन न जाने कैसे बच्चेअ की नींद उचट ग़ई. वह उठकर चूल्हेम के पास चला ग़या. राख के नीचे आग़ दबी थी. बच्चा चिमटा उठाकर उसी से खेलने लगा. खेल-खेल में एक चिंगारी उछलकर बच्चे के कपड़ों पर आ गिरी. तपिश लग़ने से वह रोने लगा. आग़ की कुछ चिंगारियां उछलकर कपड़ों तक भी पहुंची थीं, जिनसे धुआं उठने लगा. उसे देख बाहर काम कर रहे किसी मजदूर का माथा ठनका. वह फौरन भीतर भागा. उसने फटाफट जाकर आग़ पर काबू किया. बच्चाम भी काफी झुलस ग़या था.'
‘इसमें तुम्हाररा क्याा दोष है?' निराली ने पूछा. उसे साथ चल रहा टोपीलाल इतना भला लग़ रहा था कि उसपर संदेह करना भी मुश्कि‍ल लग़ रहा था.
‘ग़लती कैसे नहीं थी, उस दिन अग़र मैं बच्चेन की पहली चीख सुनते ही उसके घर चला जाता तो संभव है कि उसको झुलसने से भी बचा लेता. मेरी ही ग़लती से...'
‘इसलिए मेरी चीख सुनते ही आज तुम फटाफट दौड़कर चले आए.'
‘आदमी अपनी ग़लती से भी सीखता है, मेरी मां बिलकुल सही कहती है?'
‘आदमी जब ग़लतियों से भी सीखता है तो जरा-सी भूल होने पर शर्म कैसी?' निराली ने निराला तर्क दिया.
‘कभी-कभी ग़लती सुधारने में बहुत देर हो जाती है.' दुःखी मन से टोपीलाल ने कहा.
‘अच्छाज उस ओर मुड़ जाओ. मेरी मां वहीं बैठती है.' और टोपीलाल बिना कुछ कहे जिधर निराली ने इशारा किया था, उसी ओर मुड़ ग़या.
अग़र मन साफ हो तो अच्छेओ मित्र राह चलते हुए भी मिल जाते हैं. काफी सोचने के बाद उस दिन निराली इसी नतीजे पर पहुंची. -
वह ग़लत थोड़े ही थी.
टोपीलाल के रूप में निराली को एक अच्छात दोस्तए मिला; और सच्चान हमदर्द भी. उम्र में वह टोपीलाल से एक-दो वर्ष कम ही होगी. किंतु टोपीलाल से मिलने से पहले वह गुमसुम और खोई-खोई रहती थी. चेहरे पर पीलापन छाया रहता. टोपीलाल के साथ रहकर उसकी उदासी छंटने लगी. जिसका असर उसके शरीर पर भी पड़ा. उसपर निखार आने लगा. एक दिन टोपीलाल से मिली तो बहुत प्रसन्नम लग़ रही थी. टोपीलाल उसकी ओर देखता ही रह ग़या.
‘मैंने एक फैसला किया है.'
‘कैसा फैसला?'
‘सोचती हूं कि कुछ काम करने लगूं. इससे मैं अपनी मां की और अधिक मदद कर सकती हूं.'
टोपीलाल को अच्छा लगा. उस यह सोचकर दुःख भी हुआ कि उसने स्वीयं कभी अपने माता-पिता की मदद करने के बारे में नहीं सोचा. कभी ऐसा कोई विचार तक दिमाग़ में नहीं आया. अग़र आया भी तो निकाल बाहर किया. निराली अपनी मां की मदद करना चाहती है, इसलिए वह उससे अच्छी है. जो बच्चेअ किसी भी प्रकार से दूसरों की मदद करना चाहते हैं, वे अच्छेी ही होते हैं.
‘काम क्याच करोगी?' टोपीलाल के प्रश्नै पर निराली ने मुंह लटका लिया. मानो सकुचा रही हो.
‘तुमने जवाब नहीं दिया?' टोपीलाल ने खुद को दोहराया.
‘हमारी बस्तीि की कई लड़कियां कबाड़ चुनने जाती हैं, सोचती हूं मैं भी उन्हींे के साथ जाने लगूं. काम बहुत अच्छाम नहीं है. आदमी तो आदमी कुत्ते भी दुतकारे बिना नहीं रहते. लेकिन यदि मैं मां की मदद करने की ठान ही लूं तो कोई भी काम मुझे बुरा नहीं लगेगा. फिर धीरे-धीरे आदत तो पड़ ही जाती है.' कहकर वह चुप हो ग़ई. टोपीलाल की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी. टोपीलाल खुद सोच में पड़ा था. निराली इतना ग़हरा सोच सकती है, उसे कतई उम्मीकद न थी.
‘कबाड़ बीनने के अलावा क्याम किसी और काम के बारे में भी सोचा है?' कुछ देर बाद टोपीलाल ने पूछा.
‘मुझे कोई और काम आता कहां है. मां ग़लत थोड़े ही कहती है कि मैं सिर्फ घर पर रहकर रोटियां तोड़ सकती हूं.'
‘मां के कहे का बुरा क्यों मानती हो, दिन-भर काम करते-करते वे बहुत थक जाती होंगी.'
‘काम तो तुम्हा री मां भी करती हैं. चिनाई का काम तो एक जग़ह बैठकर सौदा बेचने से कहीं ज्यातदा मेहनत का है.'
‘गुस्सा आने पर तो मां भी नाराज होती है. लेकिन उनके गुस्से का शिकार पिताजी को होना पड़ता है. मुझसे तो मां बहुत प्यामर करती है.' टोपीलाल की ग़र्दन अभिमान से तन ग़ई. मग़र निराली की उदासी और भी बढ़ ग़ई. टोपीलाल कुछ समझ न पाया. वह जान न सका कि अनजाने ही उसने निराली के दुःख को हरा कर दिया है. तो भी उसको लग़ रहा था कि उसने कुछ ग़लत कहा है.
‘काम तो कोई भी बड़ा या छोटा नहीं होता, लेकिन...' कहते-कहते टोपीलाल चुप हो ग़या.
‘क्यात तुम नहीं चाहते कि मैं कोई काम करूं?' निराली ने पूछा.
‘जरूर करना चाहिए. यदि मकसद नेक है तो इसमें कुछ भी बुराई नहीं है. परंतु मेरी मां कहा करती है कि हम बच्चोंू को बड़े-बड़े सपने देखने चाहिए. भले ही वे उस समय हकीकत में तब्दीाल ना हो पाएं.'
‘अग़र सच न हो पाएं तो ऐसे सपने देखने का लाभ ही क्यां?' निराली ने बीच ही मैं टोक दिया. टोपीलाल के पास जवाब एकदम तैयार था.
‘मां तो कहती है कि सपनों के अंकुराने से ही भविष्य् के फूल खिलते हैं. इसलिए आदमी को सपना देखने में कभी कंजूसी नहीं करनी चाहिए. हम ग़रीब सही, पर सपने देखने पर पाबंदी क्योंद हो, क्यों हम सपना देखने में भी मन को मारें?' टोपीलाल ने तर्क दिया. मां का नाम जुबान पर आते ही उसका आत्मदविश्वा स जोर मारने लगा, चेहरे की चमक सवाई हो ग़ई. ऐसा अक्ससर होता था. मां का जिक्र कहीं भी, किसी भी रूप में हो, टोपीलाल का रोम-रोम प्रफुल्लिोत हो जाता था.
‘सिर्फ सपने! बड़ी अजीब बात है. मेरी मां तो कहती है कि आदमी को पांव उतने ही पसारने चाहिए जितनी कि उसकी चादर हो.'
‘अरे! यही प्रश्ऩ तो मैंने अपनी मां से किया था, जब उन्होंंने बड़े से बड़ा सपना देखने को कहा था. तब जानती है उन्होंेने क्याी कहा?'
‘मैं कैसे बता सकती हूं!' निराली के चेहरे पर मासूमियत छा ग़ई.
‘तब मां ने कहा था कि ठीक है, आदमी को अपने पांव उतने ही पसारने चाहिए जितनी कि उसकी चादर है. मग़र यह सपना तो वह देख ही सकता है कि आने वाले दिनों में वह बड़ी चादर जरूर खरीद लेगा...फिर एक घर होगा, चारपाई होगी, जिसपर दिन-भर की मेहनत के बाद वह आराम से सो सकेगा. बच्चोंउ के अच्छेो भविष्या के लिए योजनाएं बना सकेगा.'
‘हां, चादर बड़ी करने का सपना देखना तो कोई गुनाह नहीं है.' निराली ने सहमति जताई.
‘पर मां के सामने मैंने इस बात को आसानी स्वीनकार नहीं किया था.'
‘क्योंं...?'
‘उस समय मेरा मन था कहानी सुनने का; और मां के पास हर स्थिाति को समझाने के लिए कहानी तैयार रहती है.'
‘तो कहानी सुनाई थी, उन्होंाने?'
‘हां!' कहते हुए टोपीलाल मुस्कंरा दिया.
‘कहानियां तो मुझे भी बहुत अच्छीम लग़ती हैं. चलो आज का काम यहीं पूरा करते हूं. वहां पेड़ की छाया में बैठते हैं. तुम मुझे वह कहानी सुनाओ?'
न जाने क्यों टोपीलाल को निराली का साथ अच्छा लग़ता था. उनकी जान-पहचान
तो कुछ ही दिनों की थी, मग़र लग़ता जैसे कि वह वर्षों पुरानी हो. इसलिए जब निराली ने कहानी सुनाने को कहा तो वह खुशी-खुशी तैयार हो ग़या. दोनों सड़क किनारे खडे़ जामुन के पेड़ के नीचे जा बैठे.
‘कहानियां कहना तो सिर्फ मां को आता है, मैं तो उसको बता ही सकता हूं. उसमें तुम्हें वह आनंद नहीं आएगा, जो मुझे मां के मुंह से सुनने में आता है.' टोपीलाल ने बताया. निराली बस मुस्कुंरा दी.
टोपीलाल ने सुनी-सुनाई कहानी आरंभ कर दी-
एक सेठ के दो लड़के थे. सेठ भला आदमी था. बेटे थे आज्ञाकारी. उसने आम आदमी का सादा-सरल जीवन जिया था. मृत्युल करीब आई तो उसने अपने दोनों बेटों को पास बुलाकर कहा, ‘इस छोटे-से गांव में रहकर मैंने अपनी मेहनत और सादे चलन के बाद जो बचाया है, उसको दो हिस्सोंब में बांट दिया है. आधा-आधा धन इन दो हांडियों में बंद है. मैं चाहता हूं कि इनमें से एक-एक को तुम दोनों मेरे जीते जी संभाल लो, ताकि बाद में तुम्हाररे बीच किसी भी प्रकार का झग़ड़ा न हो.'
इतना कहकर सेठ ने पलंग़ के नीचे रखी हांडियों पर से कपड़ा हटा दिया. वहां एक ही रंग़ और आकार की दो हांडियां रखी थीं. दोनों भाई उनमें से एक-एक उठाकर चलने लगे तो सेठ ने टोका-
‘मेरी आखिरी बात और सुन लो...अग़र मन भाए तो अमल करना, नहीं तो बिसरा देना.' दोनों बेटों के रुकने पर सेठ ने कहा-‘मेरे गुरुजी कहा करते हैं-नंगे पांव चलना, सपने बड़े देखना. इन शब्दोंब को मैं तो अपने जीवन में पूरी तरह से उतार नहीं पाया. तुम अग़र उतार सको तो मैं समझूंगा कि मेरी गुरुदक्षिणा मेरे बेटों ने चुका दी.'
दोनों बेटे पिता के इन शब्दोंम को मन ही मन दोहराते हुए वापस लौट आए. कुछ ही दिनों के बाद सेठ चल बसा. उसके बाद दोनों अपना-अपना धंधा संभालने लगे.
पिता के शब्दों का दोनों बेटों पर अलग़-अलग़ प्रभाव पड़ा था. बड़े बेटे ने पांव में जूतियां डालना छोड़ दिया था. पिता की बात पर अमल करने के लिए वह हमेशा नंगे पांव रहता. उसी तरह आता-जाता. शाम ढलते ही वह बिस्तकर पर चला जाता. फिर अग़ले दिन बांस-भर सूरज ऊपर चढ़ने के बाद ही आंखें खोलता. धीरे-धीरे उसका धंधा पिटने लगा. परेशानी और चिंता बढ़ी तो देह की आब घटने लगी. शरीर दिनोंदिन क्षीण पड़ने लगा. उधर छोटा बेटा मोटा पहनता, मोटा ही खाता. चुपचाप अपने काम में डूबा रहता. उसका धंधा बढ़ता ही जा रहा था.
बड़े की बीमारी जब लंबी खिंचने लगी तो उसकी पत्नीह ने वैद्य को बुलवाया. वैद्य ने रोगी की नाड़ी की जांच की. कुछ समझ में नहीं आया तो पूछा-
‘नाड़ी तो ठीक ही लग़ती है, परेशानी क्याद है?'
‘मैं बहुत तकलीफ में हूं. खाना-पीना कुछ भी अच्छा् नहीं लग़ता. न भूख लग़ती
है, न प्या स. नींद न रात को ढंग़ की आती है, न दिन को?'
‘ऐसी कौन-सी चिंता खाए जा रही है, जहां तक मुझे मालूम है, मरने से पहले सेठजी तुम दोनों भाइयों के लिए ठीक-ठाक संपत्ति छोड़ ग़ए हैं.'
‘वह तो ठीक है पर...' बड़े लड़के ने हामी भरी. वैद्यजी उसके चेहरे पर नजर ग़ड़ाए हुए थे. यह देख वह आगे बताने लगा, ‘मरने से पहले बाबू जी ने कहा था-नंगे पांव रहना, सपने बड़े देखना. मैंने उसी दिन से जूतियां पहनना छोड़ दिया. रोज यह सोचकर सोता हूं कि आज की रात खूब बड़ा सपना देखूं. लेकिन क्याे करूं...अव्वेल तो नींद ही नहीं आती. और जब आती है, तो बहुत डरावने सपने आते हैं. भय से देह पसीना-पसीना हो जाती है. नींद बीच ही में टूट जाती है, और उसके बाद तो सो भी नहीं पाता. बड़ा बेटा होकर भी मैं पिताजी की आखिरी इच्छाब पूरी नहीं कर पा रहा हूं. बस यही चिंता मुझे खाए जा रही है. इसकी कोई दवा हो तो आप बताएं.'
अनुभवी वैद्य रोग़ की थाह तो पा ग़ए, लेकिन कहा कुछ नहीं. कहने से पहले वे खुद को परख लेना चाहते थे, ‘बेटा, मैं तो सीधा-सादा वैद्य हूं. वर्षों पहले बड़े वैद्यजी ने जो सिखाया था, उसी के सहारे लोगों के काया-कष्टत दूर करने का काम करता हूं. तुमने जो कहा, उसके बारे में तो बड़े वैद्यजी ने मुझे कुछ नहीं बताया था. पर मैं इतना जानता हूं कि तुम्हांरे पिता बहुत गुणी इंसान थे। उनकी बात का कोई न कोई सार तो जरूर होगा. मुझे विणज-व्यौापार का जरा-भी अनुभव होता तो कुछ उपचार सोचता. हां, कोशिश जरूर करूंगा. यदि कुछ समझ पाया तो आज से ठीक पंद्रहवें दिन हाजिर हो जाऊंगा. उस समय तक यदि किसी और से सलाह लेना चाहो तो तुम्हाारी मर्जी.'
इतना कहकर वैद्यजी वहां से प्रस्थाान कर ग़ए.
बाहर निकलकर उन्हों ने सोचा कि अब छोटे भाई को भी परख लिया जाए. व्यानपारी की बात का अर्थ कोई व्या पारी ही भली-भांति बूझ सकता है. सेठ के दो बेटे हैं. मरने से पहले उसने अपने छोटे बेटे से भी वही शब्द कहे होंगे. वैद्यजी को मालूम था कि छोटा बेटा दिनोंदिन तरक्कीै कर रहा है. इस बोध के साथ ही उनके चेहरे पर उत्साकह छा ग़या. मन में जिज्ञासा और कौतूूहल लिए वे सेठ के छोटे बेटे से मिलने चल दिए.
छोटा बेटा अपनी ग़द्दी पर ही विराजमान था. वैद्यजी को देखा तो उठकर खड़ा हो ग़या. स्वा ग़त किया, बिठाया. उस समय वह पांव में साधारण-सी जूतियां पहने हुए था. कपड़े भी स्व च्छय एवं साधारण थे. चेहरे पर भली मुस्का न थी. मन को खींचने वाली.
‘सेठजी के जाने के बाद अच्छीद तरक्कीव की है?' वैद्यजी ने बात आरंभ की.
‘जी नहीं, मुझे उनके जैसा बनने में तो अभी बहुत समय लगेगा.'
‘मैंने तो सुना है कि तुम्हा रा व्याोपार दूर-दूर तक फैला हुआ है?'
‘सो तो है, पर दुनिया बहुत बड़ी है. आकाश में भले ही मत उड़ो, पर आगे बढ़ने लिए धरती पर ही इतने कोने बाकी हैं, जहां तक, मुझे लग़ता है कि पिताजी का नाम जाना
ही चाहिए.'
‘सेठजी तो बहुत संतोषी जीव थे.' वैद्यजी ने हैरानी जताई.
‘जी हां, ईमानदारी से कमाना, खूब मेहनत करना और अपनी ही कमाई में संतोष रखना हमें उन्होंाने ही सिखाया था.' छोटे बेटे के स्वदर में विनम्रता थी, आंखों में आत्मंविश्वाबस. वैद्य जी के चेहरे पर मुस्कासन छा ग़ई. छोटे बेटे को कोई संदेह न हो, इसलिए वे उठकर प्रस्था न कर ग़ए. इसके बाद वे रोज उसके पास जाते. बातचीत करते और चुपचाप वापस लौट आते. हर बार वे देखते कि छोटे बेटे की कथनी और करनी में कोई भेद तो नहीं है.
पूरी तरह आश्वौस्त. होने के बाद, ठीक पंद्रहवें दिन वे बड़े बेटे के पास पहुंच ग़ए. इस बीच उसके चेहरे का पीलापन और भी बढ़ ग़या था. देह कमजोर होकर चारपाई से जा लगी थी. उस समय वह चारपाई पर पड़ा था. उसकी पत्नीभ सिरहाने बैठकर पंखा झल रही थी. वैद्य जी के पहुंचते ही वह रोने लगी. उसे ढाढ़स बँधाते हुए वैद्य जी बराबर में पड़ी चौकी पर बैठ ग़ए.
‘घबराओ मत, इनके उपचार के लिए मैंने बड़े वैद्य जी की पोथियों को छान मारा. और कुदरत का करिश्माद देखिए कि आज से पचास साल पहले ठीक ऐसा ही मामला बड़े वैद्य जी के सामने भी आया था. तब उन्होंरने मिश्री पाक द्वारा रोगी का उपचार किया था. तीसरे ही दिन वह रोगी दौड़ लगाने लगा था.'
‘मिश्री पाक?' बड़े बेटे की पत्नीह ने कहा, ‘इस बारे में मैंने कभी नहीं सुना.'
‘सुनती कैसे बेटी. बड़े वैद्य जी तो तेरे जन्मक से पंद्रह वर्ष पहले ही स्वीर्ग सिधार चुके थे. उनके बाद न तो किसी की निगाह में ऐसा विचित्र रोग़ आया, न कोई ऐसे उपचार के बारे में सोच ही पाया. पर एक समस्याे है, मिश्री पाक बनाने की विधि बहुत जटिल है, बेटी!'
‘आप कहें तो वैद्य जी. इस रोग़ से छुटकारा पाने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.'
‘बताऊंगा? मैंने तुम्हाइरे छोटे भाई को भी बुलवाया है. वह बस आता ही होगा.'
उसी समय सेठ के छोटे बेटे ने प्रवेश किया. तब वैद्यजी ने बताने लगे, ‘मिश्री पाक बनाने के लिए परस्परर विपरीत दिशा में स्थिमत दो गांवों के कुओं का जल लाना होगा. शर्त यह है कि उन कुंओं से पहले किसी ने एक भी बूंद जल न लिया हो. मुझे तैयारी करने में पंद्रह दिन लगेंगे. उससे पहले तुम दोनों भाइयों को जल लेकर पहुंचना होगा.'
दोनों भाई जाने लगे तो वैद्य जी ने कहा, ‘एक बात और ध्यानन से सुनो, जल लाने के लिए तुम दोनों अलग़-अलग़ दिशा में प्रस्थाैन करोगे और जब तक निवासे कुंए का जल नहीं मिल जाता, तब तक आपस में कोई संपर्क नहीं रखोगे.'
‘मेरी समझ में आपकी कोई बात नहीं आ रही.' जाने से पहले छोटे भाई ने कहा,
‘लेकिन मेरी खुशी बड़े भइया को स्वेस्थी देखने में है. इसलिए जैसा आप चाहते हैं, वही होगा.'
इसके बाद बड़े भाई ने पूर्व की दिशा पकड़ी. छोटा भाई पश्चिलम की ओर चल पड़ा. पंद्रह दिन बाद हाजिर होने को कहकर वैद्यजी अपने घर की ओर प्रस्था न कर ग़ए.
ठीक पंद्रहवें दिन पहले बड़े भाई ने प्रवेश किया. उसकी हालत और भी बिग़ड़ चुकी थी. चेहरा धूप से काला पड़ चुका था. उसके अवसादग्रस्तभ चेहरे से कोई भी अनुमान लगा सकता था कि मौत उसके चेहरे पर नाच रही है. आते ही वह धम से चारपाई पर पड़ ग़या.
‘मिश्री पाक के लिए सारी सामग्री तैयार है...निवासे कुएं का जल मिला?' वैद्यजी ने प्रवेश करते हुए पूछा.
‘जाने दीजिए. मैं जानता हूं कि अब कुछ नहीं हो सकता. अब केवल मौत ही मुझे इस बीमारी से छुटकारा दिला सकती है.' यह सुनते ही उसकी पत्नीक की रुलाई फूट ग़ई.
‘निराश क्योंी होते हो, तुम्हाबरे रोग़ में मिश्री पाक रामवाण औषधि है. खाते ही चंगे हो जाओगे. तुम्हाचरा छोटा भाई भी आता ही होगा. तुम फटाफट जल दो ताकि मैं मिश्री पाक तैयार कर सकूं.'
‘कहा नहीं कि अब कुछ नहीं हो सकता,' बड़े बेटे के स्वपर में छिपी निराशा बोल उठी. निवासे कुंए का जल लेने के लिए मैं पूर्व दिशा में पूरे सौ कोस तक ग़या. एक-एक गांव छान मारा. मग़र कहीं भी ऐसा कुंआ नहीं मिला, जो निवासा हो, जिसके जल को पहले किसी ने प्रयोग़ न किया हो. इसलिए मैं मान चुका हूं कि अब मेरी मौत पक्कीआ है. वही मुझे इस लाइलाज बीमारी से मुक्तिे दिला सकती है.'
यह सुनकर बड़े की पत्नील जोर-जोर से रोने लगी. उसी समय सेठ के छोटे बेटे ने घर में कदम रखा. उसके सिर पर घड़ा था. देह सिर से पांव तक तर, चेहरे पर थकान के भाव थे, पर मंजिल तक पहुंचने का उल्लादस भी कम नहीं था-‘माफ करना वैद्य जी, मैं आ ही रहा था कि एक व्याेपारी टकरा ग़या. दिसावर में व्याहपार जमाने की बात करने लगा. उससे बात करने में थोड़ी देर हो ग़ई. मैं निवासे कुंए का जल ले आया हूं. कम हो तो चिंता मत करना. जितना कहोगे, और मंग़वा दूंगा.'
‘तुम कहां से ले आए? तुम्हाथरे बड़े भाई को तो सौ कोस तक एक भी निवासा कुंआ नहीं मिला.' वैद्य जी ने हैरानी जताई.
इसपर छोटा बेटा मुस्कमरा दिया, बोला-‘मैं जानता था कि अग़र कुंआ है तो वह निवासा क्योंी होगा. मुझसे पहले तो किसी न किसी ने उससे जल लिया ही होगा. इसलिए ऐसे कुंए की खोज में जाना ही बेकार था.'
‘फिर तुमने क्याउ किया?'
‘करना क्या था. पंद्रह दिनों तक व्याएपार से अलग़ रहना भी उचित नहीं था, इसलिए
मैंने पश्चिाम दिशा में जो भी पहला गांव पड़ा, वहीं कुंआ खुदवाना शुरू कर दिया. उसी गांव में टिककर अपना काम भी देखता रहा. आज सुबह जैसे ही पानी निकला, सबसे पहले आपके लिए ले आया.'
‘शाबाश बेटा! मैं जानता था कि तुम यही करोगे.' वैद्य जी बोले. उसके बाद वे बडे़ बेटे की ओर मुड़कर कहने लगे, ‘देखा, भाषा तो एक माध्याम होती है. जरूरी नहीं कि हम जो कहना चाहते हैं, उसको ठीक-ठीक शब्दोंे में व्याक्तल कर ही सकें. मन में छिपी बात को बाहर लाने में कभी-कभी भाषा भी पीछे रह जाती है. उस समय शब्दोंब का सीधा अर्थ न लेकर उनके निहितार्थ को पकड़ना पड़ता है. जो सिर्फ शब्दों के प्रकट अर्थ के फेर में रहते हैं, वे अक्स र नाकाम जाते हैं. मरने से पहले बड़े सेठजी ने जो तुमसे कहा था, उसका अभिप्राय...'
‘रहने दीजिए वैद्य जी, मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो चुका है.' बड़े भाई ने कहा. उसके बाद वह संभलने लगा. कुछ दिनों के बाद उसका व्यबवसाय भी पटरी पर आने लगा.
‘कुछ समझीं...!' कहानी पूरी करने के बाद टोपीलाल ने निराली से पूछा.
‘और नहीं तो क्या धरती पर तुम्हीं अकेले समझदार हो.' कहकर निराली हंस दी, ‘बहुत देर हो चुकी है. अब मैं चलूंगी. मां घर पहुंचने ही वाली होगी.'
‘मैं भी चलता हूं. बस्तीग के बच्चे इधर-उधर भटक रहे होंगे. किसी को कुछ हो ग़या तो मां डांटेगी.' टोपीलाल चलने को हुआ. तभी पीछे से निराली ने टोक दिया-
‘सुनो!'
‘राह चलते को टोकना अच्छाे नहीं होता, बात क्याध है?' टोपीलाल ने नकली गुस्सेो का प्रदर्शन किया.
‘आज के बाद किसी से यह मत कहना कि तुम्हें कहानी सुनाना नहीं आता. तुम्हापरी मां बहुत बड़ी किस्साशगो होंगी. पर तुम भी कुछ कम नहीं हो. आगे मां जो भी कहानी सुनाए, वह मुझे जरूर सुनाना.'
‘कहानी को सुनना-कहना जितना आसान है, उसको गुनना उतना ही कठिन. कभी-कभी तो कई दिन, बल्किा महीनों निकल जाते हैं कहानी की ग़हराई तक पैठने में, फिर भी उससे पेश नहीं जाती. हर बार कुछ न कुछ छूट ही जाता है.'
कहकर टोपीलाल पलटा और तेज कदमों से अपने घर की ओर चल दिया.
कहानी सुनने से मुश्कितल होता है, कहानी को गुनना-क्याफ टोपीलाल ने ग़लत कहा था?
बिलकुल नहीं, टोपीलाल ने जो कहा, वह मां के मुंह से कई कहानियां सुनने और गुनने के बाद ही कहा था. उसको हमेशा लग़ता कि हर कहानी के पीछे एक कहानी होती है.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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