बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Jemsbond
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:05

उस तक तभी पहुंचा जा सकता है, जब कहानी को गुनने की कला भी आती हो. पर आदमी चाहे कितना ही बुद्धिमान क्योंत न हो. कहानी को एक बार में गुनना कहां संभव हो पाता है! यह प्रक्रिया तो हर समय चलती रहती है. कभी मंद होती है, कभी तेज. कभी लगातार सोचने पर भी कोई परिणाम नहीं निकलता तो कभी भीतर से ज्ञान का -ोत अचानक फूट पड़ता है.
किसी कहानी को सुनने-गुनने के बाद आदमी को लग़ सकता है कि वह उसके बारे में पर्याप्तम बातें जान चुका है. लेकिन अग़ली बार जब भी वह कहानी से गुजरता है, वही कहानी उसको एक झटका दे सकती है, चौंका सकती है. कुछ इतना कि आदमी कह उठे-
‘अरे! इस बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था...यह तो एकदम अनूठी बात हुई, वाह!'
शब्दोंे को गुनना...खुद को उसके अर्थ से पूरी तरह परचाना...उसकी पर्तों को खोलना, उनकी तह तक जाना बड़ा ही कठिन, एक चुनौती की तरह होता है. निराली को कहानी सुनाने के बाद टोपीलाल वहां से उठा तो कुछ इसी प्रकार सोच रहा था. जब उसने मां मुंह से यह कहानी सुनी थी, तब भी इसने उसको प्रभावित किया था. कहानी के बाद बातों-बातों ने मां ने उसके बारे में समझाया भी था. उसका प्रभाव उसके दिलो-दिमाग़ पर अभी तक था.
आज, निराली को कहानी सुनाने के बाद उसको लगा कि आज से पहले उसने कहानी को सुना-भर था, गुन नहीं पाया था.
सेठ की कहानी का अभी तक उसके लिए यही संदेश था कि आदमी को बड़े से बड़ा सपना देखना चाहिए. ऊंची उड़ान भरने का मनोरथ पालना चाहिए. पर आज एक और पर्त खुली कि भाषा केवल एक माध्य म होती है. वह अपने शब्दोंक द्वारा सीधे-सीधे जो संदेश देना चाहती है, जरूरी नहीं कि उसका मकसद वही हो. वह एकदम अलग़ भी हो सकता है.
कि शब्द् प्यावज के छिलकों की भांति होते हैं. कभी हम उनके स्वांद का एक अंश जान पाते हैं, कभी उनकी गंध का कोई एक अंश. कभी उनके स्वा द और गंध के थोडे़-थोड़े अंश से हमारा परिचय हो जाता है. किसी भी क्षण में हम न प्या ज के स्वााद को पूरी तरह भोग़ पाते हैं, न उसकी गंध को. यही हमारी सीमा है. यही हमारी भाषा की भी सीमा है.उस समय बाकी का काम हमें अपने अनुभव और विवेक से चलाना पड़ता है.
कि शब्दोंश का मतलब निकालना केवल शब्दों पर नहीं, उन्हें सुनने-पढ़ने वाले पर भी निर्भर होता है. कि शब्दोंद में छिपा अर्थ तो अधूरा होता है. श्रोता और पाठक उसको पूरा करते हैं. अपनी-अपनी तरह से, अपने अनुभव और विवेक के अनुसार.
कभी-कभी टोपीलाल को लग़ता है कि उसकी मां उसको यूं ही उलझा देती है. कभी सोचता कि अनपढ़ मां के दिमाग़ में इतनी भारी-भरकम बातें कहां से आ जाती हैं!
‘जिंदगी के अनुभव से?' उसे याद आता है, मां ने एक बार यही कहा था. तो क्याी
ऐसा नहीं हो सकता कि कोई बात पढ़ते या सुनते ही उसके सभी अर्थ सीधे दिमाग़ में उतरते चले जाएं. सोचने-समझने में एक भी पल गंवाए बिना. गुनने की तो जरूरत ही न पड़े. कितना अच्छाक हो अग़र उसके पास यह शक्तिि आ जाए.
टोपीलाल फिर कल्प.ना में उड़ने लगा. चलते-चलते उसको लगा कि उसके पास एक ऐसी ताकत आ चुकी है, जिससे वह एक झटके में चीजों की ग़हराई में उतर सकता है. पलक झपकते बड़ी-बड़ी पहेलियां हल कर सकता है. मां और बापू हैरान हैं. मां की प्रसन्नेता का तो ठिकाना ही नहीं है. लोग़ उसके पास बड़ी-बड़ी पहेलियां लेकर आते हैं. जिन्हें वह चुटकी बजाते हल कर देता है.
टोपीलाल के पास चीजों को समझने की जादुई ताकत है, चारों ओर यह बात फैल जाती है. यह विचार ही टोपीलाल के चेहरे को उजास से भर देता है.
घर लौटा तो बापू सामने ही दिख ग़ए. चारपाई पर लेटे हुए. मां उस समय काम पर थी. पता चला कि तबियत खराब होने के कारण बापू ने आधे दिन की छुट्‌टी की है. टोपीलाल के दिमाग़ में विचारों का तांता लगा था. अपने पिता से वह कम ही बोलता था. कुछ कहना होता तो मां के माध्याम से कहलवा देता. पर उस समय वह सीधे उन्हींे के पास पहुंच ग़या-
‘बापू, अनुभव क्याथ होता है?' उसने दिमाग़ में चल रही उथल-पुथल का समाधान चाहते हुए कहा.
‘चल हट! न जाने कहां-कहां अपना दिमाग़ दौड़ाता रहता है...!' आशा के विपरीत बापू ने डपट दिया. टोपीलाल का मन बुझ-सा ग़या. वह जाने को हुआ कि पीछे से बापू की आवाज कान में पड़ी-
‘छोटी उम्र के बच्चोंभ के साथ रहकर तू अभी तक खुद को बच्चाा ही समझता है. जबकि तेरी उम्र के लड़के काम-धंधे में अपने मां-बाप का हाथ बंटाते हैं. खाली दिमाग़ शैतान का घर. कल से मेरे साथ चलना, कहीं हल्का -फुल्काप काम दिलवा दूंगा.'
जिस बहुमंजिला इमारत का निर्माण चल रहा था, उसका मालिक इमारत के चारों ओर पार्क बनवा रहा था. उसके लिए घास बिछाने और पेड़-पौधे लगाने का काम चल रहा था. टोपीलाल रोज देखता कि माली के साथ उसका बेटा भी पौधों की देखभाल करने, पानी लगाने के लिए आता है. उसको काम करते देखना उसको बुरा नहीं लग़ता.परंतु इस विचार के साथ उसका दिल बैठता चला ग़या. इसलिए नहीं कि वह काम से जी चुराता था. इसलिए कि जिंदगी को लेकर उसका सपना कुछ और ही था.
‘मैं तो पढ़ना चाहता हूं बापू!' टोपीलाल ने अनुभव किया कि उसकी भाषा में तल्खी. थी. इतना जोर देकर उसने बापू से कभी बात नहीं की थी. मां सुन लेती तो उसकी खूब खबर लेती. अपनी भाषा की ग़रमी से वह खुद ही घबरा ग़या; और बापू की प्रतिक्रिया जाने बिना बाहर निकल आया.
शाम हो चुकी थी. किंतु अंधेरा अभी दूर था. वह सीधा सड़क पर पहुंचा और निरुद्‌देश्य -सा एक ही दिशा में बढ़ने लगा. अपनी ही धुन में. बढ़ता ग़या, बढ़ता ही ग़या. आगे और आगे. स्ट्रीहट लाइटें जलीं तो उसको एहसास हुआ कि वह घर से काफी आगे आ चुका है. उसका मन घबराने लगा.
वापस मुड़ते समय टोपीलाल की निगाह पार्क के बीचों-बीच बनी एक मूर्ति पर पड़ी. उसको कुछ दिन पाठशाला जाने का अवसर मिला था. उस अवधि में उसने अक्षरों को जोड़ना सीखा था. अपने उसी बोध के सहारे टोपीलाल मूर्ति के नीचे खुदे अक्षरों को बांचने का प्रयास करने लगा.
‘ह..मा..रे...रा..ष्ट्रो..पति....डॉ. सर्वपल्लीक राधाकृष्णटन!' अपनी इस कोशिश पर वह स्वियं ही इतरा ग़या. मूर्ति भव्यह थी. कुछ देर तक वह अपलक उसको देखता रहा. फिर वापस लौट पड़ा। घर पहुंचा तो मां काम से लौट चुकी थी. संभव है, इतनी देर तक घर से बाहर रहने पर मां उसको डांटे. इसलिए भीतर कदम रखने से पहले उसके कदम ठिठक ग़ए. सहसा उसके कानों में पिता की आवाज पड़ी. वे उसकी मां से कह रहे थे-
‘लग़ता है कि वह नाराज है...!'
‘ऐसा क्यों़ लग़ता है तुम्हेंक?'
‘तबियत ठीक न होने के कारण मैं परेशान था. उसने मुझसे कुछ पूछा तो मैंने डांट दिया. सच तो यह है कि मैं अपनी कमजोरी छिपा नहीं पाता. जब भी वह मुझसे कोई प्रश्न करता है तो मुझे अपना अनपढ़ होना याद आ जाता है; तब मैं आपा खोकर झुंझला पड़ता हूं.'
‘टोपीलाल पढ़ना चाहता है, और आप जानते हैं कि इसमें कोई बुराई नहीं है.'
‘बुराई कौन कहता है. बल्कि मैं तो सच्चेई दिल से चाहता हूं कि वह पढ़े. वही क्यों बस्तीष के सारे बच्चे' पढ़ें. पढ़-लिखकर कामयाब इंसान बनें. पर मैं भी क्यात करूं. टोले के मिस्त्री और मजदूर, औरत और मर्द सभी मुझपर भरोसा करते हैं. हर फैसले के लिए मुझे आगे कर देते हैं. ऐसे में मुझे वही निर्णय लेना पड़ता है, जिसमें पूरे टोले का हित, सभी की मर्जी हो.
अब जैसे इसी इमारत के ठेके को लो. मैंने सोचा था कि इस बार किसी स्कूेल के निकट लंबा काम पकड़ूंगा. जहां हमारे बेटे की पढ़ाई का पक्का इंतजाम हो सके. उससे पहले ही इस बिल्डिं ग़ का मालिक प्र्रस्ताहव लेकर आ ग़या. मैंने टोले में बातचीत की तो सभी इस काम को पकड़ने की जिद करने लगे. दो-तीन वर्ष तक लगातार चलने वाले काम को वे लोग़ छोड़ना ही नहीं चाहते थे। मुझे मजबूर होकर उन्हींल की बात माननी पड़ी. ये बातें मैं टोपीलाल को कैसे समझाऊं!'
‘अपना टोपीलाल इतना नासमझ नहीं है...' बाहर खडे़ टोपीलाल ने सुना, मां कह रही थी. उसके बाद वहां एक पल भी खडे़ रहना उसको भारी पड़ने लगा. वह दौड़कर भीतर
ग़या और बापू की गोद में पड़ ग़या. बिना कुछ कहे बापू उसके बालों में हाथ फिराने लगे। मां ने खाना लगाया तो पिता-पुत्र ने एक ही थाली में साथ-साथ भोजन किया.
‘यदि भावना सच्चीे तथा उसका प्रवाह तीव्र हो तो संवाद के लिए शब्दोंह और वाक्योंे की जरूरत नहीं पड़ती; चुप्पीि की भी अपनी स्वातंत्र भाषा होती है.' बापू की गोदी में पड़े-पड़े टोपीलाल को एकदम नया बोध हुआ. -
हर नई जानकारी ज्ञान के अनगिनत दरवाजों को खोल जाती है.
टोपीलाल सोने चला तो एक और एहसास हुआ. उस रात उसको ग़हरी नींद आई. सुबह आंख खुलने से पहले उसने सपना देखा कि राष्ट्रतपति महोदय उसको अपने हाथों से पुस्तिक सौंप रहे हैं. उनकी कद-काठी हू-ब-हू वैसी ही थी, जैसी उसने मूर्ति में देखी थी. आंखें खुलीं तो सपने के प्रभाव से उसका शरीर खिला हुआ था. चेहरे पर चमक थी, मन में उमंग़. चाल में मस्तीं.
वह जल्दी, से जल्दीउ निराली से मिलना चाहता था. ताकि उसको अपने सपने के बारे में बता सके. बता सके कि उसके बापू उतने बुरे और लापरवाह नहीं हैं, जितना वह कहता आया है. कि बापू के बारे में वह अब तक जो सोचता था, जितनी बातें उनके बारे में बताईं हैं, वे कितनी ग़लत, कितनी झूठ हैं. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उसका दिमाग़ अभी कितना हल्का सोचता है. कि उसको पढ़ाई की कितनी जरूरत है. कि किसी भी बालक के लिए पढ़ाई कितनी जरूरी होती है. कि पुस्तचकें ही प्राणीमात्र को मनुष्यरता से परचाती हैं.
देर तक वह सड़क पर टकटकी बांधे देखता रहा. निराली नहीं आई. उसके दिमाग़ में तरह-तरह के सवाल उठने लगे. वह उठा और उस स्था न की ओर बढ़ ग़या, जहां निराली की मां अपनी गुमटी लगाती थी. वहां जाने के बाद पता चला कि उसकी मां की तबियत ठीक नहीं. आज नहीं आ सकी.
बोझिल कदमों से अनमना-सा वह वापस लौट आया. लौटते हुए फिर उसी पार्क के करीब से गुजरा. मूर्ति को देखकर फिर उसके कदम फिर ठिठक ग़ए. वह एकटक उसी की ओर देखने लगा. इतना डूब ग़या कि अपनी सुध ही न रही. सहसा सामने से एक वाहन आता हुआ दिखाई पड़ा. उससे बचने के लिए वह पीछे हटा ही था कि सहसा उससे कोई टकराया. वह संभल पाए कि...
साइकिल पर चिटि्‌ठयों, पत्रिकाओं का बंडल ले जाता हुआ डाकिया उससे टकराया था. इसके साथ ही उसकी चिटि्‌ठयां धूल चाटने लगीं. डाकिया नीचे उतरकर चिटि्‌ठयों को समेटने लगा. टोपीलाल का कोई दोष नहीं था. फिर भी खुद को बीच रास्तेन में खड़े होने का कुसूरवार मानते हुए वह चिटि्‌ठयों को समेटने में डाकिया की मदद करने लगा.
‘क्याु तुम्हेंम घर पर कोई काम नहीं है, जो सड़क पर निठल्लेे खड़े हुए हो?' डाकिया ने कहा, ‘इतनी सारी डाक बांटनी है. लोग़ इंतजार कर रहे होंगे.'
टोपीलाल ने डाकिये की बात पर कोई प्रतिक्रिया व्यजक्तं नहीं की. वह चुपचाप सड़क पर बिखरे पड़े पत्रों को समेटने में लगा रहा. जब भी कोई नया पत्र उसके हाथ में आता तो उसका दिल मखमली एहसास से भर जाता. आंखों में इंद्रधनुष की आभा उतर आती. उस काम में उसे खूब मजा आया.
‘सभी को डाकिये का इंतजार रहता है. मैं बड़ा होकर डाकिया ही बनूंगा.' टोपीलाल के दिमाग़ मेें आया. अपने सोच पर वह खुद ही मुस्कीरा दिया.
डाकिया को पत्र बांटने की जल्दीर थी. पत्रों को समेटकर वह जल्दीा-जल्दीा मंजिल की ओर बढ़ ग़या. टोपीलाल उसको साइकिल पर जाते हुए देखता रहा. फिर घर जाने की याद आई तो पलटा. सहसा जमीन पर गिरे पेन पर उसकी नजर पड़ी. वह चौंका. उसने डाकिया को अपना पेन ले जाने के लिए आवाज भी दी. किंतु तब तक वह एक ग़ली में मुड़ चुका था. टोपीलाल ने अनमने भाव से कलम उठा ली.
‘वह रोज इसी रास्तेक से गुजरता होगा...कल मुझे कलम लौटाने के लिए दुबारा यहीं आना पड़ेगा...' टोपीलाल ने वापस लौटते हुए सोचा.
‘मामूली कलम ही तो है, न लौटाऊं तो भी क्याे है!' अग़ले ही पल उसके दिमाग़ में आया. मग़र अपने इस स्वानर्थी सोच पर उसको आत्म ग्ला नि होने लगी.
‘चीजों को उनके मूल्य के बजाय उनकी उपयोगिता से आंकना चाहिए'-उसके मास्टहरजी ने एक बार कहा था. उनकी बात टोपीलाल को जंची थी. इसी कारण वह उसको आजतक याद है. तब टोपीलाल ने निर्णय लिया कि कल वह कलम लौटाने के लिए इस ठिकाने पर दुबारा आएगा.
‘कम से कम एक दिन तो यह कलम मेरे पास रहेगी ही.' टोपीलाल ने सोचा.
इस विचार के साथ उसका मन एक अजीब-सी ग़र्माहट से भर ग़या. उसके हाथ कलम को आजमाने के लिए मचल उठे. काग़ज के अभाव में कलम को हथेली पर चलाकर उसकी जांच की. उसको फर्राटेदार स्थिवति में चलते देख टोपीलाल को कुछ तसल्लीस हुई. लेकिन मन न भरा. घर लौटते समय रास्तेन में पड़े एक साफ-सुथरे काग़ज पर उसकी नजर पड़ी तो उसने उसको फौरन उठा लिया. टोपीलाल ने काग़ज पर पेन को आजमाना चाहा. मग़र उसके हाथ ठिठक ग़ए-
‘इस सुंदर काग़ज को इस तरह खराब करना ठीक नहीं है.' सोचते हुए उसने सड़क किनारे पड़ा काग़ज का दूसरा टुकड़ा उठाया. उसपर कलम को रग़ड़ा देखा. गोल-मोल रेखाओं ने उसको फिर आश्व स्तिि दी कि वह ठीक है.
अपने ठिकाने पर वापस पहुंचने तक टोपीलाल का मन इस सोच से भरा-भरा रहा कि अब उसके पास काग़ज और कलम है. कलम भले ही एक दिन के लिए हो, मग़र काग़ज
उसका अपना है. रास्तेक-भर वह काग़ज उसे मूर्ति के हाथ में लगी पुस्तककों याद दिलाता रहा. उसके एहसास ने टोपीलाल को इतना जकड़ा कि रास्तेे में एक-दो रद्दी काग़ज उसको दिखाई पड़े तो उसने उन्हें फौरन उठा लिया.
‘हर चीज अपने सदुपयोग़ की चाहत रखती है.' पंद्रह अग़स्तो के दिन भाषण देते हुए प्रिंसीपल साहब ने कहा था. उस पाठशाला में वह कुछ ही महीने पढ़ पाया था. क्यों कि इस बीच उसके पिता स्कू़ल का काम निपटा चुके थे. उन्हेंश अपने टोले के साथ दूसरी जग़ह काम मिला. नया स्था न स्कू‍ल से इतनी दूर था कि वहां पढ़ने जा ही नहीं सकता था. पढ़ाई बीच में छूटने पर वह कितना रोया था, उसको आज भी अच्छी‍ तरह याद है.
इस काग़ज-कलम का कैसे सही उपयोग़ हो? टोपीलाल अपनी बुद्धि को भरसक दौड़ाने लगा. इसी सोच में डूबा वह अपने ठिकाने पर लौटा. बाकी बच्चोंी को चुपचाप खेलता हुआ देख उसको तसल्लीु हुई. इमारत के लिए बनी पानी की टंकी के नीचे अपेक्षाकृत ठंडक रहती थी. वहां एकांत भी था. वह टंकी के लिए बने स्तं़भ का सहारा लेकर बैठ ग़या. कलम हाथ में थाम ली. अभ्यातस के लिए पहले पुराने काग़जों पर सही-सही अक्षर बनाने का प्रयास किया. दो-चार शब्दम लिखे. शब्दोंथ को वाक्यप में ढालने का अभ्यालस किया. इस कोशिश में पुराने सभी काग़ज समाप्तद हो ग़ए.
कुछ और काग़जों की खोज में वह दुबारा सड़क की ओर दौड़ पड़ा. फिर उठाए ग़ए काग़जों पर देर तक कलम साधने का अभ्याेस करता रहा. इस बीच सूरज सिर पर तना, ग़र्माया और फिर ठंडा होने लगा.
‘यह काग़ज अपने सदुपयोग़ की प्रतीक्षा में है.' साफ काग़ज को टकटकी बांधकर देखते समय टोपीलाल के मन में कौंधा. लेकिन सदुपयोग़ कैसे हो, इस बारे में वह कोई निर्णय न कर सका. देर तक वह उसी स्थासन पर बैठा रहा. दोस्तह उसको लिवाने आए तो उसने उनकी ओर कोई ध्याैन न दिया. वे सभी खेल में डूब ग़ए.
सहसा एक विचार उसके दिमाग़ में कौंधा. किंचित असमंजस के बीच उसने काग़ज सामने फैलाया. मस्तिंष्कम को एकाग्र किया. टूटे-फूटे अक्षरों के साथ कलम अपने आप आगे बढ़ने लगी-
‘श्रीमान जी!
मेरा नाम टोपीलाल है. मेरे पिता राजमिस्त्री हैं. वे बड़ी-बड़ी इमारतें बनाते हैं. जब तक इमारत का काम पूरा होता है, हम आमतौर पर उसमें रहते हैं. इमारत तैयार होने के बाद, उसको मालिक के हवाले कर हम नए ठिकाने की ओर बढ़ जाते हैं. एक और इमारत बनाने के लिए.
मां कभी-कभी मुझे एक ग़रीब बंजारे की कहानी सुनाया करती है. उसके पास कुछ भेड़ें थीं. वह बहुत ही ईमानदार था. और मेहनती भी. फिर भी अपने परिवार का पेट बड़ी मुश्कि ल से भर पाता था. वह खेती करना चाहता था. उसका यह सपना कभी फला नहीं.
क्यों कि उसको शाप लगा था, कहीं न टिकने का. कुछ ऐसी ही जिंदगी हमारी भी है.
पिता जी कहते हैं कि हमारा एक गांव भी है. पर मैंने उन्हें कभी गांव जाते नहीं देखा. बताते हैं कि वहां एक महाजन के पास हमारी जमीन गिरवी पड़ी है. हर साल वह कुछ न कुछ रुपये गांव भिजवाते रहते हैं, फिर भी कर्ज है कि पीछा ही नहीं छोड़ता. मैं पिता जी और मां को जमीन के बारे में बातचीत करते हुए सुनता हूं. जमीन न छुड़ा पाने के कारण पिता जी बहुत दुःखी रहते हैं.
मेरी मां भी राजमिस्त्री है. देश की शायद सबसे पहली महिला राजमिस्त्री. पिता मानते हैं कि उनके टोले में कोई भी काम के मामले में मां की बराबरी नहीं कर सकता. जब भी अच्छेम काम की जरूरत हो, उसके लिए या तो उन्हेंई खुद आगे आना पड़ता है, या फिर मां को. पिता जी मां की झूठी तारीफ नहीं करते. वह है ही ऐसी. बल्किु इससे भी कहीं ज्यामदा.
छिः छिः! मेरा लेख कितना गंदा है. मैं इसको सुधारना चाहता हूं. पर मेरे पास न काग़ज हैं, न कलम. यह काग़ज तोे बस भर ही चुका. कलम कल इसके मालिक को सौंप दी जाएगी. परसों बापू कह रहे थे कि वे मुझे पढ़ाना चाहते हैं. मैं उनकी मजबूरी जानता हूं. जिस इमारत को वे बनाने में जुटे हैं, वह दो साल में पूरी होगी. मुझे उस दिन का इंतजार है, इसलिए कि मैं पढ़ना चाहता हूं.
टोपीलाल
इन शब्दोंत को जोड़ने में टोपीलाल को करीब एक घंटा लग़ ग़या. एक-दो जग़ह काट-छांट भी करनी पड़ी. पर अंत में उसने अपने विचारों को काग़ज पर उतार ही दिया. तत्पलश्चामत उसने काग़ज को सहेजकर रख लिया. उस काग़ज का क्याक हो, वह सोच ही नहीं पाया. कुछ देर बाद वह वहां से उठा और घर की ओर चल दिया. रास्तेझ में उसको यह एहसास बना रहा कि वह हवा में तैर रहा है. मन-मयूर नाचता ही रहा.
रात को सोने चला तो भी बहुत प्रसन्नं था. मां ने कारण जानना चाहा तो वह मुस्कु रा दिया. काग़ज उसने मोड़कर तकिये के नीचे रख लिया. रात को एक बार आंखें खुलीं तो उसको हाथ से सहलाया. मन हुआ कि दीया जलाकर एक बार फिर अपनी लिखी इबारत पर नजर डाल ले-
‘मेहनती लोगों को नींद से जगाना पाप होता है'-मां और पिताजी की ओर देखकर उसके दिमाग़ में आया. उसने अपना इरादा बदल दिया.
अग़ले दिन जैसे ही मां और बापू काम के लिए रवाना हुए, वह डाकिया की कलम लौटाने के लिए निकल पड़ा. साथ में उसने वह काग़ज भी सहेज लिया, जिसपर पिछले दिन जतन से कुछ अक्षर उकेरे थे. रास्तेक में उसने रुक-रुककर कई बार उस पत्र को पढ़ा. सोचा कि आगे क्यार किया जाए. पर बेकार. दिमाग़ कोई निर्णय ले ही नहीं पा रहा था.
‘अरे! आज तू फिर यहां, कल की तरह क्याय आज भी मेरी डाक को गिरवाएगा?' साइकिल पर आते डाकिया ने उसको देखकर दूर ही से कहा.
‘आपका पेन!' बिना कुछ कहे टोपीलाल ने डाकिया का पेन उसकी ओर बढ़ा दिया.
‘अरे वाह! कल मैंने इसे काफी खोजा था. अब याद आया कि यह यहीं पर छूट ग़या था।' पेन देखकर वह बोला। सहसा उसकी आंखों में विस्माय-भाव उभरने लगे, ‘किंतु यह पेन तो बहुत मामूली है. मुश्किनल से तीन-चार रुपये का. माना कि मुझे इसके गुम होने पर भी अफसोस हुआ था. मग़र तुझे इसके लिए यहां आने की क्याम जरूरत थी!' टोपीलाल चुप। क्याा कहे, कुछ समझ ही नहीं पाया।
‘रहता कहां है?' डाकिया ने खुशी और संतोष-भरे शब्दों में पूछा. टोपीलाल ने चुप्पी् को सहेजते हुए अपने ठिकाने की ओर इशारा कर दिया.
‘हूं, अच्छीा बात है. हालांकि आजकल कुछ लोग़ इसे कतई आवश्यकक नहीं मानते. पर मुझे अब भी यही लग़ता है कि ईमानदार होना बहुत अच्छी बात है. मेरे पास समय होता तो इसपर और भी बातें करता. तुम जैसे बच्चोंम से बात करने में तो मुझे बहुत ही मजा आता है. लेकिन समय ही नहीं मिलता. काम ही ऐसा है. प्रतिदिन कई किलो डाक बांटता हूं. फिर भी हर दिन ढेर सारी डाक आ जाती है. इतनी फुर्सत भी नहीं कि किसी के साथ जी खोलकर बात कर सकूं. पर कोई बात नहीं, आज नहीं तो कल, कभी न कभी तो इतना समय जरूर मिलेगा, जब हम दोनों अच्छेर दोस्तोंह की तरह बैठकर देर तक बतिया सकेंगे. अच्छाी, अब मैं चलता हूं. देर हुई तो गुर्राते सूरज का कोप चांद पर झेलना पड़ेगा. और आज तो जल्दरबाजी में मैं अपनी टोपी भी घर भूल आया हूं।'
डाकिया को मुड़ते देख टोपीलाल को अचानक कुछ सूझा-
‘जरा अपना पेन दिखाएंगे?'
‘अब क्याा है? मुझे पहले ही काफी देर हो चुकी है।' कहते हुए डाकिया ने पेन टोपीलाल की ओर बढ़ा दिया। पेन लेकर टोपीलाल सड़क किनारे घुटनों के बल बैठ ग़या। फिर डाकिया से नजरें बचाते हुए उसने जेब से काग़ज निकाला और उसपर झुक ग़या।
‘इन चिटि्‌ठयों में न जाने कितने जरूरी संदेश छिपे हों...इस तरह देर करना तो अपनी ड्‌यूटी के साथ नाइंसाफी होगी। मैं चलता हूं. पेन तुम्हादरे लिए जरूरी है तो रख लो।' कहते हुए डाकिया ने हैंडल संभाला। पैडल मारने ही जा रहा था कि टोपीलाल फिर सामने आ ग़या-
‘लीजिए!' कहते हुए उसने पेन आगे बढ़ाया। उस समय वह बुरी तरह सकुचाया हुआ था। डाकिया ने हाथ बढ़ाया। तत्क्षजण उसने अपना बायां हाथ आगे कर उसमें छिपाया हुआ काग़ज डाकिया को थमा दिया। उस समय उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। सांसें घुटी जा रही थीं। पल-पल खड़ा रहना भारी साधना लग़ रही थी।
‘यह क्याि है?' डाकिया ने काग़ज को हाथ में लेकर उल्टाा-पलटा. फिर काग़ज के
पीछे लिखे शब्दों को पढ़ा. टूटे-फूटे अक्षरों में वहां लिखा था-‘हमारे राष्ट्रमपति जी...'
‘क्याे मैं इसे श्रीमान्‌ राष्ट्र्पति महोदय के नाम तुम्हानरी ओर से चिट्‌ठी समझूं.' डाकिया ने ग़र्दन ऊपर उठाई. पर टोपीलाल वहां कहां? वह तो कभी का वहां से भाग़ छूटा था. हालांकि ऐसा कुछ नहीं था। परंतु उसको लगा कि डाकिया उसको आवाज देकर रोक रहा है। साइकिल पर बैठकर उसका पीछा कर रहा है। साइकिल के पैडल की आवाज उसके कानों में गूंजती रही। काफी देर तक वह भाग़ता ही रहा। पलटकर देखने की हिम्मैत ही न पड़ी.
अज्ञान डर का स्वाेभाविक उत्पे्ेररक है...बचपन की सरलता डर को भी रचनात्म क बनाने का सामर्थ्य रखती है।
सोच से बड़ा स्ववप्नव मन में भूचाल लाए बिना नहीं रहता।
टोपीलाल को घर पहुंचने के बाद भी चैन न मिला. तरह-तरह के विचार दिमाग़ में आने लगे. चौकन्नीड निगाह से वह बार-बार इधर-उधर देखता. जरा-सी आहट पर चौंक पड़ता. दिल जोर-जोर से धड़कने लग़ता. अपनी मूर्खता पर कभी हंसी आती, कभी तेज गुस्सा ...राष्ट्रपपति के नाम पर चिट्‌ठी और वह भी बिना डाक टिकट, बगैर लिफाफे के? पुलिस उसको पकड़ने के लिए आती ही होगी. कभी लग़ता कि पुलिस आ ही पहुंची है. वह घबराकर छिपने का ठिकाना ढूंढने लग़ता.
ऊपर से पत्र के अंत में वह राष्ट्रतपति जी को ‘नमस्तेष' लिखना भी ध्याीन न रहा. यह तो सरासर मूर्खता है. अपमान है उनका. राष्ट्र पति जी का पत्र पढ़ेंगे तो क्याभ सोचेंगे. कि कितना बेशऊर लड़का है. बड़ों के साथ व्यरवहार करना भी नहीं आता. माता-पिता ने उसे कुछ सिखाया कि नहीं.
ग़लती मेरी, पर बदनामी तो मां और बापू की ही होगी. मां को कितना बुरा लगेगा. और बापू, हो सकता है मुंह से कुछ न कहें, पर दुःख तो उन्हें भी होगा न! लोग़ दोष भी उन्हींि को देंगे. बेचारे ग़रीब, राजमिस्त्री जो ठहरे. हाथ के कितने हुनरमंद है, यह कौन जान पाएगा? पूरी दुनिया में उनकी बदनामी होगी, सिर्फ मेरी वजह से।
फिर काग़ज तो उसने यूं ही लिख मारा था. यह देखने के लिए कि उसको लिखना आता भी या नहीं. जब लिख रहा था तो कहां सोचा था कि उसे राष्ट्र पति जी को भिजवाएगा ही. ऐसा वह सोच भी कैसे सकता है। वह तो जेब में रखा था. डाकिया को देखकर न जाने क्याभ सूझा कि पत्र उसको थमा दिया. सचमुच बहुत बड़ी मूर्खता की है उसने.
बावजूद इसके इस समय उसको इतना घबराना भी नहीं चाहिए. यह समय घबराने का है भी नहीं। उसको हिम्मदत से काम लेना पड़ेगा। यह भी जरूरी नहीं है कि डाकिया बिना टिकट के उस पत्र को उसके ठिकाने तक पहुंचा ही दे. हो सकता है वह उसको
फाड़ ही डाले. जब बड़े आदमियों का पत्र समय पर नहीं पहुंचा पाता तो एक बच्चेस के पत्र के लिए उसको कहां फुर्सत होगी.
अग़र वह पत्र राष्ट्रिपति जी के हाथों तक पहुंच ही ग़या तो. क्याे वे उसको पढ़ेंगे? आखिर क्योंे नहीं पढ़ेंगे. उस दिन भाषण में प्रधानाचार्य जी बता रहे थे कि इस देश में सभी बराबर हैं. कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है. तब तो राष्ट्रंपति जी उस पत्र को जरूर पढ़ेंगे. हो सकता है उसका जवाब भी दें.
उनका जवाब आया तो अग़ले पत्र में लिखूंगा कि अपने टोले में मैं अकेला ही अनपढ़ नहीं हूं. बाकी बच्चे भी हैं. जो पढ़ना चाहते हैं. मेरी मां तो फिर भी बहुत समझदार हैं. पर सभी बच्चे तो मेरे जितने भाग्य़शाली नहीं हैं. उन्हेंी स्कूढल की बेहद जरूरत है. पत्र को पढ़ते-पढ़ते जब वे उसके अंत में पहुंचेंगे. हो सकता है कि टोपीलाल नाम को पढ़कर उन्हें हंसी भी आ जाए. जैसे उस दिन जब मैं पहली बार पाठशाला ग़या था तो कक्षा के सारे बच्चे मेरा नाम सुनकर हंस पड़े थे. उस दिन मास्टजरजी अग़र उन्हें डांटते नहीं तो वे हंसते ही रहते.
फिर भी राष्ट्रपपति जी को पत्र लिखने से पहले मुझे मां से जरूर पूछ लेना था. वह इतना तो बता ही देतीं कि इतने बड़े आदमी को नमस्ते में क्या लिखना चाहिए. चरणस्पथर्श या हाथ जोड़कर प्रणाम. या इससे भी अधिक कुछ हो सकता है! क्यात अब बात करके देखूं मां से! पर न जाने वह क्या सोचने लगे. हो सकता है कि विश्वाधस ही न करे कि मैं इतने बड़े आदमी को चिट्‌ठी लिख सकता हूं. या बुरी संभावनाएं उसको भी डरा दें.
ऊंह चिट्‌ठी! न लिफाफा, न डाक टिकट, न पूरा पता, न मजमून। एक मामूली कोरे काग़ज पर लिखे चंद अक्षरों को भला कौन चिट्‌ठी मानेगा. दिमाग़ खराब है मेरा.
पूरे दिन टोपीलाल बेचैन रहा. उल्टे़-सीधे विचार दिमाग़ को लगातार मथते रहे. उस रात उसका न तो भोजन में मन लगा, न ही मां की कहानी में. सोने की कोशिश की तो नींद छूमंतर हो ग़ई. जैसे पलकों पर पहरा बैठा दिया हो किसी ने. वह देर तक करवट बदलकर नींद आने का इंतजार करता रहा. मां ने कारण जानने की कोशिश की, परंतु उसने टाल दिया. बस डरे हुए बालक की तरह मां से चिपक ग़या.
ऐसी ही खींचातानी के बीच कब पलकें भारी हुइंर्, कब नींद ने मेहरबानी की, वह जान ही नहीं पाया. उस रात उसे सपने भी आए तो डरावने से. सुबह होने से पहले ही नींद अचानक टूट ग़ई. उसके बाद उसने सोने का प्रयास किया तो नींद आंखों को भुलावा देेती रही. छलावा बनकर छलती रही. जल्दीा सुबह हो, करवटें बदलते हुए देर तक वह यही सोचता रहा.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

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Jemsbond
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:06

छोटा हो या बड़ा, जब कोई निःकलुष मन से किसी के बारे ग़हराई से सोचता है तो वह कभी न कभी अपने लक्ष्या को छू ही लेता है. -
उम्मी द के विपरीत आने वाली सुबह ताजगी से भरी थी.
माता-पिता के काम पर जाने के बाद टोपीलाल ने जल्दीत-जल्दीो काम निपटाया. फिर बाहर आ ग़या. उसको विश्वाहस था कि निराली उधर से जरूर गुजरेगी. कि सिर्फ उसी से वह अपने दिल की बात कह सकता है. उसको मालूम था कि निराली अब देर से आती है. मां की बीमारी के कारण घर का पूरा काम उसी को निपटाना पड़ता है.
निराली की मां अब भी अपनी गुमटी पर जाती. मां के काम पर निकल जाने के बाद जल्दीड-जल्दीि घर का काम समेटती. फिर कबाड़ बीनने का थैला लेकर निकल जाती. दो-ढाई घंटे तक सड़कों और ग़लियों की खाक छानती. रास्ते में ही कबाड़ को बेचकर घर लौटती. घर पहुंचकर जल्दीक-जल्दीं चूल्हाल सुलगाती. फिर छोटी-छोटी रोटियां सेंकती, उसके बाद घर का बाकी काम सहेजती है.
तब तक मां के लिए रोटी पहुंचाने का समय हो जाता. खाना लेकर सड़क पर पहुंचती. रास्तेा में टोपीलाल उसे मिल जाता था. दोनों साथ-साथ स्कूोल तक रोटियां पहुंचाने जाते. लौटते समय निराली कुछ देर के लिए टोपीलाल के पास रुकती. दोनों बाकी बच्चों् के साथ खेलते, ग़पशप करते. दोपहर बाद घर निराली वापस लौट आती. घर का काम समेटने. अपने धंधे के बारे में निराली ने मां को कुछ नहीं बताया था. और तो और टोपीलाल से भी छिपाकर रखा था. इस डर से कि कहीं वह मां से कह न दे.
लग़भग़ एक घंटे की प्रतीक्षा के बाद निराली दिखाई पड़ी. तेज कदमों से चलती हुई. टोपीलाल को देखकर उसने मुस्क़राने का प्रयास किया. वह आगे बढ़कर उसके रास्तेा में खड़ा हो ग़या-
‘आज बहुत देर कर दी?'
‘हां, लकड़ियां कुछ गीलीं थीं. खाना बनाने में ज्याादा समय लगा.' टोपीलाल को याद आया. बीती रात बूंदा-बांदी हुई थी. टोले में लोग़ ईंटें खड़ी करके उनके ऊपर पॉलिथीन डाल लेते थे. वह कम पड़े तो सीमेंट के खाली थैले और पुराने कपड़े सर पर छत का काम देते. यह व्य वस्थाप बारिश के समय धोखा देने लग़ती. उस समय लोग़ निर्माणाधीन बिल्डिंदग़ में ही ठिकाना ढूंढते. जग़ह कम पड़े तो एक ही बरामदे में पचासों भर जाते. गीली लकड़ियां जलते समय धुआं करतीं. मर्द तो घूमने के बहाने बाहर निकल जाते थे. पर औरतों और छोटे बच्चोंक के लिए वे क्षण बहुत ही कष्टंमय होते. उस समय कभी-कभी तो पूरी रात जाग़कर काटनी पड़ जाती थी. रात को याने बच्चेा रो पड़ें तो बाकी पूरी रात बारिश थमने की उम्मीीद में बितानी पड़ती.
‘मुझसे कह दिया होता, मैं चार रोटियां मां से सिंकवा लेता.' टोपीलाल ने निराली का दुःख बांटना चाहा.
‘कहती कब? बारिश तो रात आई थी. तेरी मम्मील तो सवेरे ही काम पर निकल जाती हैं.' कहकर निराली हंसी.
‘हां, मैं भी कभी-कभी एकदम मूर्खों जैसी बात कर देता हूं.' टोपीलाल ने अपना माथा ठोकते हुए कहा.
‘मैं तो रोज ही सुनती हूं.' निराली ने कहा और अपनी बात पर स्वंयं ही हंस दी, ‘अब रास्ताे छोड़. मां भूखी होगी.'
टोपीलाल को अपनी भूल का एहसास हुआ. वह साथ-साथ चलने लगा. उसके मन में अजीब-सी हलचल मची थी. चिट्‌ठी के बारे में निराली को बताए या नहीं, वह इसका फैसला कर ही नहीं पा रहा था.
उलझन में निराली भी थी. मित्रता में अधिक से अधिक पारदर्शिता जरूरी है, उसने कहीं सुना था. तभी से उसको लग़ रहा था कि अपने काम के बारे में टोपीलाल से छिपाकर वह ग़लती कर रही है,
‘एक बात बताऊं...' रास्ताम चलते हुए निराली ने कहा, ‘मैंने काम पर जाना शुरू कर दिया है.'
‘सभी को कोई न कोई काम तो करना ही पड़ता है.' टोपीलाल ने कहा. वह अपने ही सोच में डूबा हुआ था.
‘मां बता रही थी कि उसको आजकल मेरी शादी की बड़ी चिंता है.' टोपीलाल की उदासीनता से आहत निराली ने उसको दूसरा झटका देने की कोशिश की.
‘अभी से...!' निराली का यह प्रयास कारग़र सिद्ध हुआ. टोपीलाल एकाएक चौंक पड़ा. दिमाग़ में घूम रही बाकी बातें हवा हो ग़ईं.
‘हम लड़कियों को तो ब्यााह करना ही पड़ता है. साल दो साल इधर या उधर. मां कह रही थी कि उसका कोई भरोसा नहीं, किसी दिन आंखें मुंद ग़ईं तो...!'
‘तेने कुछ नहीं कहा...मना कर देती!'
‘क्योंक कर देती मना! मां ठीक ही तो कहती है. सवेरे-सवेरे पीठ पर बोरा डालकर निकलना. दिन-भर ग़ली-मुहल्लेस के आवारा कुत्तों से उलझना, लोगों की छींटाकशी सहना, भला कौन लड़की चाहेगी. शादी के बाद कम से कम यह तो करना नहीं पड़ेगा.' निराली ने कहा. वह सबकुछ बताया जिसे अभी तक छिपाए थी. टोपीलाल चुप. लगा कि उसका दिमाग़ घूम रहा हो. आवेश में कहे-सुने का होश ही नहीं रहा-
‘तुम सब पाग़ल हो...एकदम पाग़ल. इतनी कम उम्र में कोई ब्यापह किया जाता है. मैं लिखूंगा, राष्ट्रीपति जी को लिखूंगा...!'
टोपीलाल की बात सुनकर निराली हंसने लगी.
‘ये राष्ट्ररपति कौन हैं?' हंसी थमने के बाद निराली ने पूछा. उसके चेहरे पर मासूमियत थी. टोपीलाल को लगा कि अनायास ही चर्चा उस ओर मुड़ ग़ई है, जिस ओर वह लाना चाहता था. जिसके लिए वह बीती रात से परेशान था. इसलिए अपनी हैरानी जताते बोला-
‘अरे! तू इतनी-सी बात भी नहीं जानती...कभी बड़े पार्क की तरफ नहीं ग़ई?'
‘अक्स.र जाती रहती हूं...वहां ऐसा क्यां है?'
‘पार्क में जो मूर्ति लगी है, वह राष्‍ट्रपति जी की ही है. वे खुद राजधानी में रहते हैं. उनके हजारों नौकर-चाकर, घोड़ा-गाड़ी, मोटर-बंग़ला हैं.'
‘धत! पाग़ल हुआ है क्या़! मेरी मां तो बताती है कि मूर्तियां उन्हीं की लगाई जाती हैं, जो मर चुके होते हैं.'
‘झूठ, मरे हुओं की मूर्तियां भला कोई क्योंय लग़वाएगा?'
‘उन्हेंच याद रखने के लिए. महान लोगों के प्रति एहसान जताने का दुनिया का यह भी एक तरीका है.' निराली ने ऐसे कहा, मानो लिखा हुआ बांच रही हो.
‘किसने बताया?'
‘मामा ने, वे बापू के साथ रह चुके थे. पिछले ही वर्ष उनकी मृत्युन हुई है.'
‘तब तो वे बहुत बड़े आदमी थे.' कहते समय टोपीलाल का ध्याृन फिर उस पार्क की ओर चला ग़या.
‘तो पार्क में जिनकी मूर्तियां लगी हैं, वे सभी मर चुके हैं.'
‘मां तो यही कहती है.'
‘क्यात, राष्ट्रंपति जी मर चुके हैं?'
टोपीलाल को एक बार फिर झटका लगा. दिमाग़ एकदम भन्ना् ग़या. उल्टेा-सीधे विचार भरमाने लगे. जैसे-तैसे उसने राष्ट्र पति जी को चिट्‌ठी लिखी है, क्या वह बेकार ही चली जाएगी. रात-भर उसने जो सपने देखे वह क्या यूं ही थे. उसको लगा कि जैसे उसके पैरों की ताकत किसी ने सोख ली हो. उसको खड़ा होना भारी लग़ने लगा. लगा कि किसी भी समय धरती पर जा गिरेगा.
निराली ने उसको कई बार टोका. माफी मांगी. बार-बार आश्वाासन दिया कि घर जाते ही मां से कह देगी कि अभी उसकी शादी की जल्दीी न करें. जब तक वह नहीं चाहेगा, मां से शादी की हामी भरेगी ही नहीं. मग़र उसके सभी प्रयास असफल रहे. टोपीलाल की चुप्पीब कायम रही. उसकी उदासी सलामत रही.
रोटी पहुंचाने के बाद वापसी में भी टोपीलाल का मौन उसके साथ रहा. निराली समझ ही नहीं पाई कि उसको कैसे मनाए. क्याट करे कि उसका मौन टूटे. और जब वह थक ग़ई तो उसने भी चुप्पीह साध ली. ठिकाना करीब आते ही टोपीलाल ने मुंह खोला-
‘मैं चलता हूं. अग़र तेरी मां तेरे ब्या ह की जल्दील कर रही है, तो इसी में तेरी भलाई है. इन बड़े आदमियों का कोई भरोसा नहीं, कभी भी चल बसते हैं. इनसे कोई उम्मीयद रखनी ही बेकार है.'
इसके बाद वह बिना कुछ कहे, निराली से अलग़ हो ग़या. उसका उत्साहह मर चुका था.
आने वाली रात टोपीलाल के जीवन की शायद सबसे उदास रात थी. उसका अपना दिमाग़ कोई भी फैसला करने में असमर्थ था. माथा घूम रहा था. झंझावातों के बीच यदि उम्मीअद बची रहे तो संकट जल्दीर टलता है, आने वाला समय अनुकूल हो जाता है.
अग़ला दिन आया. उदास-उदास. फिर कुछ और दिन बीते. टोपीलाल के मन में कोई उल्ला स न था. उस दिन हमेशा की तरह मां घर के काम में जुट ग़ई थी. रोटी बनाकर जैसे ही मां और बापू काम पर जाने को तैयार हुए, टोपीलाल उनके पास पहुंच ग़या-
‘बापू, तुम मुझे काम दिलवाना चाहते थे?'
‘क्योंन? ऐसी क्या जल्दी. है?' पिता को आश्चमर्य हुआ, ‘कहीं मां ने डांट तो नहीं दिया. पर वह तो कभी ऐसा नहीं करती.'
‘सभी बच्चेु काम करते हैं, मुझे भी काम करना चाहिए...' कहते समय टोपीलाल के मन में निराली की छवि कौंध रही थी. कंधे पर थैला लटकाए, ग़लियों से कबाड़ चुनती, कुत्तों और शैतान बच्चोंं से खुद को बचाती हुई.
‘और तेरी पढ़ाई...तू तो पढ़ना चाहता है न!'
टोपीलाल ने कोई जवाब नहीं दिया. ग़र्दन झुकाए पांव से जमीन कुरेदता रहा. तब तक मां रोटियां बांध चुकी थी. वह बाहर आई तो टोपीलाल एक तरफ हो ग़या.
‘काम के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है, अभी तो तेरे खेलने-खाने के दिन हैं.' टोपीलाल न जाने किस सोच में था. अपने स्थाईन पर अटल. तब उसके पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, ‘चिंता मत कर. मैंने मालिक को मजदूर और कारीग़र बढ़ाने के लिए राजी कर लिया है. भग़वान ने चाहा तो यहां का काम सात-आठ महीने में पूरा हो जाएगा. उसके बाद हम ऐसी जग़ह काम करेंगे, जहां तेरी पढ़ाई चल सके.'
इस तरह का आश्वाोसन बापू कई बार पीछे भी दे चुके थे. इतनी बार कि टोपीलाल को उनकी बातों पर अविश्वाकस होने लगा था. फिर भी बापू का यह आश्वातसन उसको भला लग़ता. इससे एक उम्मीिद बंधती थी. परंतु उस समय बापू का आश्वा सन उसकी खास मदद नहीं कर सका.
वह बोझिल कदमों से धीरे-धीरे बाहर आया और बिल्डिंकग़ के उस छोर की ओर बढ़ ग़या, जहां बाकी बच्चेी उसके आग़मन की प्रतीक्षा कर रहे थे. वहां पहुंचकर उसने लूडो का खेल निकाला और साथी बच्चों के साथ प्रकृति के उस खेल को नए सिरे से समझने की कोशिश करने लगा. उसने खेल में खुद को लगाए रखने का प्रयास किया, लेकिन मन न लगा. अंततः वह उठा और एक साफ स्थाउन देखकर जमीन पर लेट ग़या.
साथी बच्चोंल को उसका व्यतवहार अजीब-सा लगा. वे खेल छोड़कर टोपीलाल के पास जमा होने लगे.
‘टोपी भइया आपकी तबियत तो ठीक है.' एक लड़के ने पास आकर पूछा.
‘मेरा भइया जब लेतता है तो मां कहती है कि उसको बुखार है, तोपी भइया को भी बुखार है.' एक और बच्चेक ने कहा. पल-भर में बच्चोंत के बीच बात फैल ग़ई. उसी समय एक मासूम-सी लड़की आगे आई. उसके हाथ में लाल मिर्चें थीं. बाकी बच्चोंब को पीछे ठेलने का प्रयास करती हुई, वह चिल्लापई-
‘हटो-हटो, मेरे पास लाल मिर्च हैं, मेरी मां बुखार होने पर घर में लाल मिर्च का धुआं करती है. उपला लाओ, आग़ जलाओ...लाल मिर्च का धुआं सूंघते ही बुखार फौरन छू-मंतर हो जाएगा.' बच्चीर की मासूमियत देख टोपीलाल हंस दिया. कुछ देर के लिए उसका सारा तनाव गायब हो ग़या. वह बच्चोंा के प्याकर और उनकी बातों में खो ग़या. इस बीच वह लड़की आगे आकर टोपीलाल पर झुक ग़ई-
‘चलो हटो, मुझे कुछ नहीं हुआ है.'
‘पर अभी-अभी तो तुम्हेंह बुखार था.' एक बच्चा बोला.
‘नहीं, मैं अब बिलकुल ठीक हूं.' टोपीलाल ने बैठने का प्रयास किया.
‘देखा, मिर्च का नाम सुनते ही बुखार दुम दबाकर भाग़ ग़या.' हाथ में मिर्च थामे उस लड़की ने कहा.
‘मैं इन ढकोसलों पर विश्वाचस नहीं करता. मां कहती है कि टोने-टोटके बकवास होते हैं.'
‘ठीक होने के बाद सब यही कहते हैं.' लड़की बोली. अभिमान झलकाते हुए. सभी बच्चे हंसने लगे. उसके बाद टोपीलाल ने लाख भरोसा दिलाने की कोशिश की कि उसे बुखार वगैरह कुछ भी नहीं था. मग़र एक ने भी उसकी बात पर भरोसा नहीं किया. सभी बच्चेे मानते रहे कि बुखार लाल मिर्च देखकर भागा है.
‘दीदी, लाल मिर्च से बुखार क्यों भाग़ जाता है?' एक बच्चे. ने आगे आकर पूछा. लड़की इस बारे में अनजान थी. वह बग़लें झांकने लगे या कोई बहाना बनाए, उससे पहले ही एक लड़का पीछे से चिल्लातया-
‘लाल मिर्च खाकर बुखार का मुंह जल जाता है, उसको पानी तो कोई पिलाता नहीं, इसलिए बेचारा नदी की ओर दौड़ लगा जाता है, क्योंन टोपीलाल भइया?'
‘यह तो बिन्नाज की मां ही बता पाएगी.' कहकर टोपीलाल ने उस लड़की की ओर इशारा किया, जो मिर्च लेकर आई थी. वह शरमाकर पीछे हट ग़ई.
‘अब तो आप ठीक हैं, चलिए हमारे साथ खेलिए.' कुछ बच्चेन घेरा तोड़कर आगे आए. निराली से मिलने का समय हो चुका था. मग़र टोपीलाल का जी कहीं जाने का न हुआ. इसलिए वह बच्चों के साथ बैठ ग़या. दिन आहिस्ताो-आहिस्ता बीत रहा था.
तभी बाहर खटका हुआ. टोपीलाल का ध्याान उस ओर चला ग़या. सामने निराली थी. टोपीलाल खेल छोड़कर खड़ा हो ग़या.
‘कब आई तू?' टोपीलाल ने सवाल दागा. स्वलर में शिकायत भरी थी. वह जवाब की प्रतीक्षा कर ही रहा था कि निराली ने उसको चौंका दिया-
‘मैंने कबाड़ बीनना छोड़ दिया है.'
‘कब से?'
‘आज ही से. मैंने मां को अभी मेरी शादी न करने को भी मना लिया है.'
‘तो अब क्या़ करेगी?'
‘तू बता, क्याे करना चाहिए मुझे?' निराली ने उल्टार प्रश्न दाग़ दिया. टोपीलाल उसके लिए तैयार ही नहीं था. वह बग़लें झांकने लगा-
‘मैं क्याय बताऊं? जाकर अपनी मां से पूछ.'
‘मां से पूछूं तो क्यात वह काम करने देगी. कहेगी कि अग़र इतनी ही बड़ी बनती है तो ब्याषह कर ले.'
‘तो कर ले ब्याऊह, मेरा दिमाग़ क्यों चाटती है!' टोपीलाल गुस्साहया. परंतु अग़ले ही पल उसको लगा कि उससे ज्यातदती हुई है. इतने सारे बच्चों के सामने निराली के साथ उसका ऐसा व्य वहार ठीक नहीं. मन ही मन पछताता हुआ वह आगे बढ़ ग़या. निराली पीछे-पीछे चलती ग़ई.
‘तेरी मां को बुढ़ापे में अकेले काम करते देख मुझे अच्छास नहीं लग़ता. तेरी जग़ह अग़र कोई लड़का होता तो उन्हें आराम मिलता...' कहकर वह सोचने लगा.
‘तू तो मुझसे भी बड़ा है, क्या. तू अपनी मां को आराम पहुंचाता है. बल्कि तू तो घर का उतना काम भी नहीं करता, जितना कि मैं कर लेती हूं.' निराली के जी में आया कि टोपीलाल को खरा-खरा जवाब दे. किंतु वह उसको नाराज नहीं करना चाहती थी. इसलिए चुप्पीज साधे रही. कुछ देर पश्चाैत टोपीलाल ने ही पूछा-
‘तूने कभी यह नहीं बताया कि रहती कहां है?'
‘कल्लाकर बस्तीा में, किराये की झुग्गील है. पर तू यह सब जानकर क्या करेगा?'
‘कल्लाकर बस्तीा से तो स्कू ल बहुत दूर है, तेरी मां को पैदल आने-जाने में घंटों लग़ जाते होंगे?'
‘क्याा करें, जाना तो पड़ेगा ही.'
‘अग़र तू चाहे तो अपनी मां को लेकर यहां रह सकती है. दिन में मजदूरों और कारीग़रों को प्याास लग़ती है. एक जग़ह पानी भी लेकर बैठ जाएंगी तो मजदूरों की प्या स बुझेगी, बदले में मजदूर जो देंगे उससे तुम दोनों का काम चल जाएगा. मजदूर लोगों की अपनी भी छोटी-छोटी जरूरतें होती हैं, पानी न पिलाना चाहें तो उनके हिसाब की छोटी-मोटी चीजें भी रख सकती हैं. कम से कम किराया बचेगा और आने-जाने की परेशानी से भी मुक्तिन मिल जाएगी.' टोपीलाल को लगा कि उसने बहुत बड़ी सलाह दी है. गुरुता का एहसास उसको देर तक उल्लािसित करता रहा.
‘तुम्हाभरे टोले के लोग़ इसके लिए राजी होंगे?' निराली ने शंका प्रकट की.
‘वे मेरे बापू और मां का कहना नहीं टाल सकते. फिर तुम दोनों के आने पर तो उनको आराम ही मिलेगा. जिन चीजों के लिए उन्हेंे दूर जाना पड़ता है, वे उन्हींु दामों में बिलकुल करीब मिल जाया करेंगी.'
‘मैं मां से बात करूंगी? वह मान ग़ई तो...' निराली ने आश्वाोसन दिया.
‘अग़र मना करें तो कल ही मुझे बताना. मैं उन्हेंह जबरदस्तीे लिवा लाऊंगा.'
‘तू कौन होता है, मेरी मां के साथ जबरदस्तीउ करने वाला...' निराली ने बनावटी गुस्सेस के साथ कहा. टोपीलाल ऐसी प्रतिक्रिया के लिए तैयार न था. उसको तत्का्ल कोई जवाब न सूझा. कुछ देर तक निराली उसके मुंह की ओर देखती रही। फिर सहसा हंस पड़ी-
‘अरे! तू तो सचमुच बुरा मान ग़या, मैं तो बस मजाक कर रही थी. अच्छा कल मिलेंगे.' कहकर वह उल्टेो पांव भाग़ ग़ई. उसकी चाल में उमंग़ थी. पैरों में तेजी. लंबे बाल हवा में लहरा रहे थे। इतने दिनों बाद पहली बार टोपीलाल उसको खिला-खिला देख रहा था.
जीवन में वही दिन यादगार बनता है, जब कोई नया और भला काम होता है.
अच्छाम सोच बेहतर परिणाम भी लाता है.
चौथे दिन निराली अपनी मां के साथ टोले का हिस्साा बन ग़ईं. टोपीलाल खुश था. उसको अपनी उपलब्धिे पर ग़र्व था. निराली की मां ने गुमटी लगाना जारी रखा. पहले वे स्कूसल के बच्चोंा की जरूरत का सामान रखती थीं, अब मजदूरों के काम आने वाले चीजें बेचने लगीं. टोपीलाल के मजदूरों को पानी पिलाने के सुझाव पर उन्होंरने ध्याधन तो दिया, मग़र अपनी तरह से. एक मां की तरह टोपीलाल को समझाया भी था-
‘भग़वान ने धरती का तीन-चौथाई हिस्साए पानी से भरा है। ऐसे में प्या-से से पानी की कीमत वसूलना या वैसी उम्मीयद रखना भयंकर पाप, ई-वर को नाराज करना है.'
यह सोचकर कि टोपीलाल ने सीख गांठ बांध ली है, निराली की मां ने आगे कहा-‘जिंदगी में पुण्य कमाने का अवसर तो कभी मिला नहीं, अब पानी से पैसे कमाने का पाप तो मैं हरगिज अपने सिर नहीं लूंगी. पर तेरी बात भी टालूंगी नहीं.'
उसने उसी दिन दो नए घडे़ मंग़वा लिए. उन घड़ों में ताजा पानी रखकर अपनी गुमटी के सहारे रखने लगी. बगैर किसी लाभ-कामना के. न चाहते हुए इसका उसे व्या वसायिक लाभ भी हुआ. दिन में प्यारसे मजदूर पानी के बहाने उसके पास आते. उस समय सामने दुकान के रूप में फैली चीजों को देखकर उनका मन मचल उठता. इससे उसकी कमाई बढ़ने लगी. अपने खेल के बीच से फुर्सत निकालकर टोपीलाल निराली की
मां के पास बैठ जाता. दोनों देर तक बातें करते.
वह स्त्री पहले ही कम दयालु न थी. वहां आने के बाद उसकी भलमनसाहत और दयालुता बढ़ती ही जा रही थी. मजदूरों के बच्चोंी से उतना ही प्याकर करती जितना कि निराली से. उनके लिए टॉफियां, बिस्कुदट, नान-खटाई वगैरह बांटती ही रहती.
उसके आने से काम पर जाने वाली मजदूर औरतों को भी सहारा मिला था. उनके बच्चोंा को जब भी कोई समस्याई होती तो वे उसी के पास ले आतीं. उसके लंबे अनुभव का लाभ उठाने. बीमार होते तो वह रोग़ का उपचार बताती. भूखे होते तो खिला-पिलाकर चुप करने का प्रयास करती. कभी-कभी तो अपनी दुकानदारी का ख्याल छोड़कर भी वह उनके बच्चोंल की देखभाल करती.
बिल्डिंभग़ की चार मंजिलें तैयार हो चुकी थीं. तीन मंजिलों का निर्माण अभी बाकी था. टोपीलाल और उसके दोस्तोंभ की चौकड़ी अब तीसरी मंजिल की छत पर जमती. चारों तरफ से खुली होने के कारण वहां ठंडी हवा बहती. वातावरण ठंडा-सुहावना रहता. वहां खड़ा होने पर शहर का नजारा दूर-दूर तक एकदम साफ नजर आता था.
उस दिन टोपीलाल बच्चोंर के साथ खेल में मग्नव था. तभी नीचे दो आदमी दिखाई पडे़. उनमें से एक खाकी वर्दी में था. दूसरा सफेद कुर्ता-धोती पहने. धूप से बचने के लिए उसने एक सफेद टोपी अपने सिर पर रखी हुई थी. खाकी वर्दी वाला आदमी टोपीलाल को पहचाना-सा लगा. दोनों को नीचे पूछताछ करते देख टोपीलाल घबराया. उसका दिल जोर से धड़कने लगा.
अग़ले ही क्षण दोनों को ऊपर आते देखा. न जाने क्यों उन अजनबियों को देखकर टोपीलाल की घिग्गीि बंध ग़ई. मन में डरावने ख्याल आने लगे. अजीब-अजीब बातें मन को डराने लगीं. उन्हीं से घबराया हुआ वह खुद को छिपाने का प्रयास करने लगा. पचास-साठ मजदूर, कामगारों के रहते खुद को छिपाना आसान नहीं था. फिर भी बदहवास टोपीलाल अपने लिए ठिकाने की खोज करने लगा. उसी समय एक लड़का तेजी से ऊपर आया-
‘टोपीलाल..टोपीलाल...!'
‘क्योंा चिल्लाप रहा है?'
‘वे लोग़ तुझे नीचे बुला रहे हैं.'
‘वे कौन?'
‘मुझे क्या़ मालूम?'
‘किसलिए आए हैं?'
‘नहीं पूछा!'
‘घनचक्कूर, कम से कम नाम और पता तो पूछा ही होगा?'
‘मुझे नहीं मालूम. बता रहे हैं कि राजधानी से आए हैं.'
‘यह राजधानी क्या होती है?' किसी बच्चेो ने पूछा. किंतु राजधानी का जिक्र छिड़ते ही टोपीलाल को झटका लगा. राष्ट्रेपति जी के नाम लिखा हुआ पत्र अचानक याद आ ग़या. याद आया कि उसमें वह नमस्कारर लिखना तो भूल ही ग़या था. ऊपर से पत्र बिना डाक टिकट लगाए डाकिया को भी सौंप दिया था. यह आदमी राष्ट्रकपति जी के यहां से ही आया होगा. पुलिस भी साथ होगी. पहचान के लिए डाकिया साथ है. पर निराली तो बता रही थी कि राष्ट्र पति जी मर चुके हैं. चिट्‌ठी तो उन्हेंा मिली ही नहीं होगी...फिर पुलिस के आने का कारण?
टोपीलाल के दिमाग़ में विचारों का अंधड़ था. डर था और सघन आतंक भी. उसको कुछ सूझ ही नहीं रहा था. वे लोग़ सीधे ऊपर ही आ रहे थे. इसीलिए खुद को बचाने का कोई अवसर भी नहीं था. टोपीलाल के दिल की धड़कनें बढ़ ग़ईं. लड़खड़ाते कदमों से वह आने वाले क्षणों की प्रतीक्षा करने लगा.
‘अच्छाढ होता कि मैं मां से किसी तरह भग़वान को मनाने का तरीका सीख लेता. इस समय वह काम आता.' भयभीत टोपीलाल के मन में कौंधा. तभी सफेद कपड़ों वाले आदमी को साथ लिए डाकिया छत पर पहुंच ग़या.
‘वो रहा टोपीलाल!' उनके साथ आ रहे लड़के ने इशारा करके बताया. टोपीलाल की सांस थमने लगी. भय से देह थरथरा उठी. अब छिपने का भी लाभ न था।
‘साहब, यही वह लड़का है, जिसने मेरा मामूली पेन भी अग़ले दिन लौटा दिया था. मुझे तो आज ही पता चला कि उस पेन को लौटाने के लिए यह यहां से मीलों दूर पैदल चलकर ग़या था. इतना ईमानदार और भला लड़का मैंने आज तक नहीं देखा.' डाकिया की आवाज टोपीलाल के कानों में पड़ी. दूर होने के कारण वह उसके शब्दोंे को समझने में नाकाम रहा. परंतु उसके चेहरे और हाव-भाव देख उसकी बेचैनी घटने लगी. हालांकि दिल में धुकधुकी अब भी मची हुई थी.
‘मुझे राष्ट्र पति जी ने भेजा है.' वह आदमी आगे बढ़ता हुआ बोला. उसके चेहरे पर मुस्कांन थी, ‘उन्हेंस तुम्हींा ने पत्र लिखा था, न!'
‘जी..वो तो बस यूं ही. मैं भूल ग़या था कि मेरी जेब खाली है. पर आप चिंता मत कीजिए, मां से कहकर मैं डाक टिकट के पैसे दिलवा दूंगा.' टोपीलाल ने किसी तरह कहा.
‘अरे हां, याद आया, तुम्हापरा वह पत्र बैरंग़ था...' डाकिया के साथ आया आदमी लगातार मुस्क रा रहा था.
‘पत्र में मैं नमस्तेा भी नहीं लिख पाया था. वह मेरा पहला खत था. मेरी मूर्खता थी कि बिना यह जाने कि पत्र कैसे लिखा जाता है, मैंने राष्ट्र पति जी को पत्र लिखा. पर पहली बार इतनी चूक तो माफ होनी चाहिए...'
‘चूक कैसी! राष्ट्रनपति जी तो तुमसे बहुत प्रसन्नर हैं. वे बच्चोंत से बेहद प्यािर करते हैं. उन्होंेने ही मुझे तुम्हा्रे पास भेजा है.'
‘मेरे पास क्योंा?' टोपीलाल के मुंह से सहसा निकला. उस आदमी की बातों में अजीब-सी कशिश थी. टोपीलाल ने महसूस किया कि वह उसकी ओर खिंचता जा रहा है. लेकिन मन में समाया हुआ डर अब भी उसके सहज होने में बाधक बना था.
‘लोग़ तो कहते हैं कि राष्ट्रतपति जी मर चुके हैं.'
‘छिः! वे हमारे महान राष्ट्रषपति जी हैं. हमारे देश के गौरव, मान-अभिमान सबकुछ.उनके लिए ऐसे कुवचन नहीं बोलते...'
‘फिर वे मूर्तियां जो पार्क में लगी हैं, निराली की मां कहती हैं कि जिनकी वे मूर्तियां हैं, वे सभी मर चुके हैं.'
‘तुम बहुत भोले हो. साथ में ग़लतफहमी का शिकार भी. राष्ट्रत की तरह राष्ट्र पति भी अमर होते हैं.'
‘फिर वे मूर्तियां?' टोपीलाल का कौतूहल जागा.
‘जो मूर्तियां तुमने देखीं वे उन महान व्यगक्तिायों की होंगी, जिनकी इस दुनिया में अब सिर्फ याद ही बाकी है. मुझे तुम्हाररे पास राष्ट्र पति महोदय ने ही भेजा है. अब कुछ दिन मैं तुम्हािरे साथ ही रहूंगा.'
‘हमारे साथ, कहां?'
‘यहीं इस इमारत में, जहां तुम्हायरे टोले के दूसरे लोग़ रहते हैं.'
‘पर मेरी मां तो काम पर जाती है. घर आते-आते बुरी तरह थक जाती है. आपके लिए खाना कौन पकाएगा?' टोपीलाल ने पूछा. वह जानता था कि दिन-भर चिनाई करने वाली मां घर आते-आते बुरी तरह टूट जाती है. ऊपर से घर का काम भी उसको देखना पड़ता है. किसी अजनबी के कारण वह मां पर बोझ नहीं बढ़ाना चाहता था.
‘हम ढेर सारी बातें करेंगे. फिलहाल तो मैं कुछ फल तुम्हावरे और इन बच्चोंा के लिए लाया हूं. लो अपने हाथों से तुम इन बच्चोंभ को बांट दो.' कहते हुए आदमी ने अपनी पोटली खोली. उसमें केले, आम, नींबू आदि तरह-तरह के फल थे. उनमें से कुछ फल निकालकर उसने टोपीलाल की ओर बढ़ाए. मग़र टोपीलाल अपने स्थाेन पर अडोल खड़ा रहा.
‘घबराओ मत, मैं यहां किसी पर बोझ बनने नहीं आया हूं. अपना खाना मैं खुद बनाऊंगा. मैं अपना बाकी काम भी खुद ही करूंगा. बापू के साथ रहकर मैंने यही सीखा है कि आदमी को अपना काम स्व यं ही करना चाहिए.'
टोपीलाल बापू का नाम पहले भी सुन चुका था. एक बार शहर से गुजरते हुए एक मूर्ति की ओर संकेत करके मां ने बताया भी था कि यह बापू की है. इससे अधिक बापू के बारे उसको कोई जानकारी न थी. जिस दिन मां ने मूर्ति दिखाई थी, उस दिन वह जरूर मां से उनके बारे में पूछना चाहता था. पर किसी तरह बात टल ग़ई. उसके बाद उसको भी याद नहीं रहा.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:06

उस आदमी के जोर देने पर टोपीलाल ने केले ले लिए. उसके हाथ में केले आते
ही बच्चेन उनपर टूट पड़े. डाकिया जाने लगा तो टोपीलाल ने दौड़कर दो केले उसके हाथों में भी थमा दिए. इसपर डाकिया ने उसकी ओर प्या र से देखा-‘मुझे मालूम था कि तू यही करेगा. अच्छेि बच्चे हमेशा खुशियां लुटाते हैं.'
उसी समय टोपीलाल की निगाह निराली पर पड़ी जो दूर खड़ी उसको देख रही थी. बच्चोंर को केले देने के बाद वह निराली के पास पहुंचा-
‘मैं तो दो केले लूंगी?'
‘सभी बच्चोंक को एक-एक मिला है, तुम्हें दो क्यों दूं?' टोपीलाल ने बरजा.
‘तुमने डाकिया बाबू को भी तो दो केले दिए हैं?'
‘वे बड़े हैं. फिर वे उन केलों को खुद तो खाएंगे नहीं, अपने बच्चों को ले जाकर देंगे. अग़र मैं एक केला देता और बच्चेे दो हों तो उनकी मुश्किफल हो जाती न!'
‘मुझे एक केला अपनी मां के लिए चाहिए.'
‘केले सिर्फ बच्चों के लिए हैं...'
‘तुम्हेंर मां के लिए केले क्योंं चाहिए बेटा?' उनकी बात सुन रहा आदमी निराली के पास जाकर बोला. निराली चुप्पीम साधे रही.
‘शरमा मत बेटी! मेरा नाम बद्री नारायण है. पर बच्चे मुझे बद्री काका ही कहते आए हैं. तुम भी वही कह सकती होे.' बद्री काका ने कहा. उनके स्वणर में प्याबर उमड़ता हुआ देख निराली पिघल ग़ई. आंखों में नमी उतरने लगी.
‘मां ने आज सुबह से कुछ भी नहीं खाया. रात से ही उनको बुखार है.' निराली ने बताया.
‘अरे! तो पहले क्यों नहीं बताया. बुखार में केले के बजाय सेव ठीक रहता है. जो मेरे पास हैं. लो ये दोनों सेव तुम्हीं रख लो.' कहते हुए बद्री काका ने थैले से सेव निकालकर निराली के हाथों में थमा दिए.
‘तुम रहती कहां हो?'
‘वहां, नीचे जमीन पर!' बद्री काका के पूछने पर निराली ने इशारा किया.
‘तो चलो, सबसे पहले तुम्हाबरी मां से ही पहचान कर ली जाए.' बद्री काका ने अपना झोला उठा लिया. वे नीचे की ओर चले तो बच्चोंल का दल भी उनके साथ हो लिया. निराली की मां के पास पहुंचकर बद्री काका ने उनकी कलाई पकड़कर बुखार की जांच की. फिर थैले से निकालकर कुछ गोलियां निराली को थमा दीं, बोले-
‘इनमें से दो गोलियां अभी खिला दो. दो घंटे के बाद दो गोलियां और दे देना. शाम तक बुखार उतर जाएगा.' कहकर बद्री काका ने अपना झोला उठा लिया-
‘अब मैं नहाकर कुछ देर आराम करूंगा. हम लोग़ शाम को मिलेंगे. तब तक तुम्हाररा जो भी मन करे कर सकते हो. अरे हां, कोई बच्चाक मुझे बताएगा कि यहां लोग़ नहाते कहां हैं?'
बद्री काका के पूछने पर कई लड़के आगे आए. टोपीलाल जान-बूझकर पीछे खड़ा रहा. बद्री काका के निकल जाने के बाद वह निराली के करीब पहुंचा, बोला-‘अम्माू को ये गोलियां खाने मत देना.'
‘क्यों ?' निराली असमंजस में थी.
‘मां, कहती है कि अजनबी से कभी कोई चीज नहीं लेनी चाहिए. क्या‍ पता यह आदमी कौन है? कहां से आया है?' टोपीलाल फुसफुसाया. उस समय उसके दिमाग़ में ढेर सारी कुशंकाएं कौंध रही थीं.
‘उन्होंसने बताया तो कि राष्ट्रिपति महोदय ने ही यहां भेजा है.' निराली ने कहा.
‘राष्ट्रफपति जी यहां क्यों भेजेंगे? हो सकता है, यह उनका कोई जासूस हो.'
‘तो हमें क्याट करना चाहिए?'
‘मां इस समय एकदम सही सलाह देती. लेकिन अवसर ऐसा है कि मैं उससे बात भी नहीं कर सकता.'
‘फिर?'
फिर का उत्तर टोपीलाल के पास भी नहीं था. वह परेशान था. इसलिए भी कि वह स्वसयं कोई निर्णय नहीं कर पा रहा था. अभी तक उसको अपने दिमाग़ पर भरोसा रहा था. जरूरत के समय हर बार वह सही फैसला करता आया था. उसके कारण अनेक बार लोगों की प्रशंसा भी बटोरी थी. आज लग़ रहा था कि उसकी समझ उसको धोखा दे रही है. दिमाग़ बैठता जा रहा है. कारण उसकी समझ से बाहर था.
दूसरी परेशानी यह थी कि वह अपनी मां से भी मदद नहीं ले पा रहा था. उसको लग़ता था कि समस्या एं उसने खड़ी की हैं, इसलिए उनका निदान भी स्वमयं उसी को करना होगा. मां और बापू को वह बीच में हरगिज नहीं लाएगा.
नेकी सदैव पुण्यउ-लाभ देती है.
नहाने के बाद बद्री काका जमीन पर चादर बिछाकर लेट ग़ए. करीब एक घंटा आराम करने के वे बाद उठे. शाम हो चुकी थी. मजदूर और कारीग़र अपना काम समेटकर वापस लौटने लगे थे. इमारत में जग़ह-जग़ह चूल्हे जल रहे थे. छौंकने-बघारने की आवाजें आ रही थीं. भूखे बच्चेर मांओं के आगे बिलख रहे थे. वे उन्हें समझा और दुलार रही थीं. बिल्डिंूग़ के कोने-कोने में स्थिरत चूल्होंर से उठता हुआ धुआं उन स्थावनों पर जीवन की उपस्थिाति का संदेश दे रहा था.
जाग़ने के बाद बद्री काका बिल्डिं ग़ का एक चक्कतर लगा चुके थे. चारों मंजिलों पर घूमने के बाद वे उस कोने में पहुंचे, जहां बच्चेऔ खेल रहे थे. टोपीलाल भी वहीं था. अपनी उलझन से घिरा हुआ, एकाकी. बद्री काका के कंधे पर एक सूती चादर थी. वस्त्राख हाथ
से बुने कपड़े के थे.
बच्चोंे के पास बैठकर उन्होंाने चादर जमीन पर बिछा ली. फिर हाथ फैलाकर, मोहक मुस्कांन के साथ उन्हें आमंत्रित करते हुए बोले-
‘तुम में से कौन-कौन मुझसे दोस्तीह करना चाहेगा?' यह सुनकर बच्चोंा का खेल से ध्याुन हट ग़या. सब चौंककर बद्री काका की ओर देखने लगे.
‘जिन्हेंक मुझसे दोस्तीह करनी है, वे इस चादर पर आ जाएं.' उन्होंुने दोहराया. मग़र इस बार भी कोई बच्चाश उस चादर पर नहीं पहुंचा. उन्होंदने बच्चों की ओर देखा. वे अपने स्था.न पर गुमसुम-से खड़े थे. चेहरे पर डर और आशंका के भाव लिए हुए.
‘कोई बात नहीं, यदि तुम में से कोई भी मुझसे दोस्तीर नहीं करना चाहता तो तुम्हापरी मर्जी. पर मैं तो तुम सभी को अपना दोस्तत मान चुका हूं.'
‘आप यहां किसलिए आए हैं?' एक बच्चे. ने टोका.
‘आपको हमसे क्या काम है?' दूसरे बच्चेन ने जोड़ा.
‘हम आपको नहीं जानते...बस्ती् में कोेई भी आपको नहीं जानता।' सवालों की बौछार बढ़ती ही जा रही थी।
‘बताता हूं, बताता हूं.' अग़र एक साथ सारे बच्चेन सवाल करने लग़ जाएंगे तो मेरी चांद पर बचे-कुचे बाल भी नहीं रहेंगे.
‘कैसे?' बच्चोंा को बद्री काका की बात में मजा आया.
‘सीधा-सादा ग़णित है भई. तुम्हाजरा एक सवाल अग़र मेरा एक बाल भी ले उड़ा तो सुबह तक मैं पूरी तरह गंजा हो जाऊंगा.' इसपर कई बच्चेि हंस पड़े. बद्री काका को भी भला लगा.
‘आप तो पहले ही गंजे हैं, हमने आपको नहाते हुए देखा था, आपकी चांद पर एक भी बाल नहीं है?'
‘अरे..रे...! तुम सब तो बहुत तेज हो, आते ही मेरी कलई खोल दी.' बद्री काका ने दुःखी होने का नाटक किया, ‘इसकी भी एक दर्द-भरी कहानी है. बताओं कौन-कौन सुनना चाहेगा?
‘मैं...!' कई बच्चेी एक साथ बोल पड़े। केवल टोपीलाल चुप्पील साधे रहा। तिरछी नजरों से उसको देखते, मन ही मन मुस्क राते हुए बद्री काका ने कहना आरंभ किया-
‘एक बार हमारे बाल बहुत बढ़ ग़ए. हम नाई के पास उनकी छंटाई कराने पहुंचे. वह अपनी दुकान बंद करने जा रहा था. हमने उससे कहा, ‘भाई, कल हमें दावत में जाना है, जरा बालों की छंटाई तो कर दो.'
‘कल आइएगा श्रीमान. अब तो दुकान बंद करने का समय हो चुका है.' नाई ने जवाब दिया.
‘हमें जल्दीम है, सुबह मुंह-अंधेरे ही निकलना है. मैं पूरी मजदूरी दूंगा. तुम्हाकरी अपनी
दुकान है, थोड़ी देर बाद बंद कर लेना.' मैंने उसको फुसलाने की कोशिश की. लेकिन वह भी कम नहीं था, बोला-
‘बापू कहते हैं कि हर काम समय पर होना चाहिए. दुकान बंद करने का समय सात बजे का है, मैं एक मिनट भी ऊपर नहीं रुकने वाला.'
बापू समय के पाबंद हैं. यह बात पूरा देश जानता था. इसलिए उससे आगे कुछ कहने का कोई लाभ ही नहीं था.
‘पर मुझे तो मुंह-अंधेरे ही एक जग़ह जाना है. वहां इस जुल्फी स्टाथइल में तो जा नहीं सकता.' मैंने अपनी समस्याो रखी. हालांकि मैं यह कतई नहीं चाहता था कि वह मेरे लिए अपना अनुशासन भंग़ करे.
‘उसका भी इंतजाम है. ग़र्मी के दिन हैं, आप टोपी की जग़ह एक खद्‌दर का गीला तौलिया सिर पर रख लीजिए. उससे बाल दबे रहेंगे, किसी को पता भी नहीं चलेगा.'
मरता क्याद न करता. मैंने अग़ले दिन खद्‌दर के गीले तौलिये में बालों को लपेटा और चल दिया दावत खाने. घंटे-भर बाद ही जुकाम ने जकड़ लिया. छींकें आने लगीं. पहली छींक आई-‘आ...छी!' और मैं चौंक पड़ा। जी को जोर का धक्काी लगा।
‘अरे, यह क्याा हुआ! छींक के साथ बालों की पूरी एक बस्तीई धराशायी हो चुकी थी. दूसरी छींक आई तो वह दूसरे मुहल्लेा को ले उड़ी. इसके बाद तो छींकों के आने और केश-कुंजों के उजड़ने का सिलसिला चलता ही ग़या. मैंने सोचा कि गीले तौलिये से छींक आती है, तो क्यों न तौलिये को हटा ही लूं. लेकिन जब तौलिया हटाकर देखा तो बालों के मुहल्ले के मुहल्लेी हवा हो चुके थे. अब तो बिना तौलिया रह पाना संभव ही नहीं था. उधर ग़र्मी में सूखा तौलिया रखने से सिर तपने लगा था. सो तौलिया फिर से भिगोना पड़ा. शाम को जब मैं घर लौटा तो बालों की तीन-चौथाई फसल तबाह हो चुकी थी.
मैं दौड़ा-दौड़ा फिर नाई के पास पहुंचा. जाते ही उसपर चढ़ ग़या, ‘तुम्हातरी बताई ग़ई तरकीब से ही यह हाल हुआ है. अब बताओ तुम्हा रा क्याा हाल करूं?'
‘सिर्फ शुक्रिया अदा कीजिए जनाब! हर महीना नाई की दुकान पर आना पड़ता था. कभी दुकान खुली मिलती थी, कभी नहीं. बीस रुपये रिक्शेए वाले को देते थे, दो-तीन घंटे आने-जाने में खराब हो जाते थे. ऊपर से नाई का मेहनताना. जितनी देर उसके सामने रहो, उतनी देर ग़लत कैंची चल जाने का डर. मुफ्तब की सलाह पर सिर्फ एक शुक्रिया के बदले इन सारी परेशानियों से मुक्तिा मिल रही है. बिना अधेला खर्च किए और क्या. लेना चाहेंगे जनाब!' कहकर नाई महाशय हंस दिए. मैं और नाराज होऊं उससे पहले ही बोले-
‘आप तो बापू के भक्तक हैं...'
‘हूं पर इतना भी नहीं कि भक्तिु के नाम पर गंजा बन जाऊं...' मैंने रोष प्रकट किया. इसपर नाई मुस्किरा दिया-‘आप तो नाराज हो ग़ए. चलिए छोड़िए, इसी बात पर मैं एक किस्सा सुनाता हूं. एक बार बापू को जुकाम हुआ. किसी ने उन्हेंज खद्‌दर का रूमाल
थमा दिया. जुकाम तेज था. रूमाल से रग़ड़ते-रग़ड़ते नाक लाल हो ग़ई. शाम को जब घूमने निकले तो एक पत्रकार ने बापू से मजाक करते हुए पूछा-‘बापू, खादी के मोटे रूमाल से अग़र नाक को इसी तरह रग़ड़ते रहे तो यह दो-चार दिनों में गायब हो जाएगी.'
‘तब जानते हैं बापू ने क्याे कहा? खैर, आपने सुना है तो और यदि नहीं सुना है तो भी, मैं आपको बताए देता हूं. बापू ने उस पत्रकार से हंसते हुए कहा था, ‘अच्छा ही है कि गायब हो जाए, आए दिन के जुकाम से छुट्‌टी तो मिलेगी. न बांस रहेगा, न बांसुरी बजेगी.'
किस्साे सुनाने के बाद नाई मेरी ओर पलटा, ‘जनाब, आपके तो केवल बालों पर ही बीती, गांधी जी तो रोजमर्रा की मुश्किसल से बचने के लिए अपनी नाक भी गंवाने को तैयार थे.'
मैं बापू के नाम पर लोगों को उपदेश देता था. नाई ने मेरा हथियार मेरे ही ऊपर तान दिया था. मैं क्याी करता. चला आया चुपचाप. वह दिन है और आज का दिन. सिर की बगिया से उस दिन जो बहार रूठी, वह आज तक नहीं लौटी. लाख जतन किए, पर यह जंग़ल कभी आबाद न हो सका.'
बद्री काका ने बात समाप्तज की तो बच्चों के चेहरे खिले हुए थे. कई बच्चे. उनके करीब खिसक आए थे.
‘अब आप में से कोई है जो इस सदाबहार गंजे को अपना दोस्तख बनाना चाहेगा?' बद्री काका ने पूछा तो कई बच्चे चादर चढ़ ग़ए. वे उन्हेंा चारों ओर से घेरकर बैठ ग़ए. सहसा बद्री काका की निगाह निराली पर पड़ी. वह सबसे पीछे खड़ी थी. उदास और परेशान. बद्री काका को अनायास कुछ याद आया. वे उठकर निराली के पास पहुंचे और उसके सामने घुटनों के बल बैठकर बेहद प्याशर से पूछा-
‘बेटी, तुम्हा री मां का बुखार अब कैसा है?'
जवाब देने के बजाय निराली ने अपनी ग़र्दन झुका ली.
‘निराली की अम्माि बहुत बीमार है?' एक बच्चे. ने बताया.
यह सुनते ही बद्री काका उठकर खड़े हो ग़ए, ‘मैंने जो गोलियां दी थीं, उनसे बुखार तो उतर जाना चाहिए था. अग़र नहीं उतरा तो जरूर कोई वजह है. हो सकता है कि उन्हेंग अस्पसताल भी ले जाना पड़े. चलो पहले उन्हींस को चलकर देखते हैं.'
बाकी बच्चे भी बद्री काका के पीछे-पीछे चल पड़े.
निराली की मां जमीन पर चादर बिछाकर लेटी हुई थी. देह बुखार से तप रही थी. हालत दिन की अपेक्षा और भी खराब हो चुकी थी. यह देख बद्री काका के चेहरे पर चिंता की लकीरें बढ़ ग़ईं. उन्होंनने नाड़ी देखकर बुखार का अनुमान लगाया-
‘बुखार ज्या दा है, लेकिन इस हालत में इन्हें अस्परताल ले जाना भी उचित न होगा. अच्छाे होगा कि पहले पानी कि पट्‌टी लगाकर तापमान नीचे लाया जाए.'
बद्री काका ने निराली से एक चौड़े बरतन में पानी लाने को कहा. फिर कंधे से अंगोछा उतारा. उसको पानी में भिगोया और निराली की मां के माथे पर रखने लगे. निराली उनके पास ही खड़ी थी. कुछ दूरी पर टोपीलाल था. अपराधबोध से ग्रसित. बाकी बच्चेे भी वहीं मौजूद थे.
‘बच्चोस, इनकी फिक्र मत करो. कुछ देर में बुखार उतरने लगेगा. तब तक तुम सब अपने-अपने घर जाओ. हम लोग़ सुबह मिलेंगे. कुछ नई बातों के साथ.' बद्री काका के कहने पर कुछ बच्चेब जाने लगे. कुछ वहीं खडे़ रहे. माथे पर पानी की पट्‌टी रखकर बुखार का इलाज करना उनकी निगाह में किसी कौतूहल से कम न था. उनकी माएं बुखार आने पर अक्सोर पानी से दूर रहने की सलाह दिया करती थीं. उनकी निगाह में बद्री काका अनूठे थे। अनूठा था उनका बुखार के उपचार का तरीका।
लग़भग़ तीस मिनट तक माथे पर गीली पट्‌टी रखने के बाद बुखार कुछ हल्का पड़ा. कमजोर शरीर में मामूली हरकत हुई. बद्री काका के चेहरे पर संतोष झलकने लगा. वे उठकर खड़े हो ग़ए, ‘बापू का बताया बुखार के उपचार का यह तरीका एक बार फिर कारग़र सिद्ध हुआ. अब कोई चिंता की बात नहीं है. एक घंटे के बाद बुखार एकदम उतर जाएगा. तुम अग़र चाहो तो इन्हें कुछ दूध पिला सकती हो।'
सहसा उन्हेंउ कुछ ध्या न तो आया, पूछा-‘बेटी, तुम्हाहरे पास दूध तो होगा?'
निराली ग़र्दन झुकाए खड़ी रही. कोई जवाब न सूझा.
‘गुरुजी, दूध मैं अपने घर से ले आता हूं.' टोपीलाल ने उत्सा,हित होकर कहा. बिना सहमति की प्रतीक्षा किए वह तुरंत दौड़ भी ग़या. पांच-छह मिनट बाद लौटा तो उसके हाथों में गिलास था, दूध से भरा हुआ.
‘मां ने कहा है कि कच्चाप है, उबाल लेना.' टोपीलाल ने दूध से भरा गिलास निराली को थमाते हुए कहा. काफी देर बाद उसके चेहरे पर चमक दिखाई पड़ी थी. मानो किसी तनाव से बाहर निकलने की कोशिश में कामयाबी नजर आई हो.
निराली ने आग़ जलाकर दूध ग़र्म किया. तब तक बद्री काका अपने झोले से दो गोलियां और निकाल चुके थे. निराली दूध ग़र्म करके लाई तो उन्होंंने वे गोलियां उसकी मां के हाथों में थमा दीं.
‘अब इन्हेंस आराम करने दो. कुछ घंटों के बाद ये बिलकुल ठीक हो जाएंगी.' गोलियां खिलाने के बाद बद्री काका वहां से चल दिए. जाते-जाते जैसे कुछ याद आया हो, वे निराली की ओर मुड़े, ‘मैं बाहर सोने जा रहा हूं. रात में यदि कोई परेशानी दिखे तो फौरन जगा देना.'
निराली और टोपीलाल उन्हेंद छोड़ने बाहर तक आए. बच्चेे धीरे-धीरे अपने घर जाने लगे थे. भोजन का समय हो चुका था. जग़ह-जग़ह चूल्हेए जल रहे थे. कहीं दाल बघारी जा रही थी तो कहीं पर ग़र्म रोटियोंं से उठती गंध हवा को महका रही थी। भूख टोपीलाल
को भी सता रही थी. पर वह अपनी ही जग़ह पर अटल रहा.
‘क्याा तुम्हें भूख नहीं है?' टोपीलाल को अकेला देख बद्री काका ने प्रश्नब किया.
‘मैं आपसे अपनी एक भूल के लिए माफी चाहता हूं?' टोपीलाल का स्वलर पछतावे से भरा था.
‘भूल! भला तुमने ऐसा क्याा कर दिया?' बद्री काका ने टोपीलाल के चेहरे पर नजर जमाते हुए पूछा.
‘आपकी दी ग़ई गोलियां खिलाने को मैंने ही मना किया था, जिसके कारण निराली और उसकी मां के साथ-साथ आपको भी परेशान होना पड़ा.'
‘क्याप तुम नहीं चाहतेे कि निराली की मां जल्दीक ठीक हो?'
‘बिलकुल चाहता हूं. परंतु उस समय मुझे आपके ऊपर भरोसा ही नहीं था. मुझे लगा कि आप सरकार के जासूस हैं.'
‘मैंने तो पहले ही बता दिया था कि मुझे राष्ट्र पति जी ने तुम्हाहरे पास भेजा है.' बद्री काका ने हैरानी प्रकट की.
‘जी, मुझसे भारी भूल हुई है.'
‘भूल होना तो स्वारभाविक है, किंतु आदमी को चाहिए कि वह भूल को अपने स्व भाव का हिस्सा न बनने दे. जब भी ऐसा होता है, आदमी अपने आप से मुंह चुराने लग़ता है.और अपने आप से मुंह चुराना, भविष्य की ओर से मुंह फेर लेना भी है.'
टोपीलाल की आंखें जमीन में ग़ड़ी थीं.
नकारात्मकक सोच और अनावश्यीक डर सबसे पहले अपने ही व्याक्ति त्वप पर हमला करते हैं. ये आदमी को बहुत पीछे ले जाते हैं, उसके विवेक को खोखला कर देते हैं।
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:07

अपनी भूल के लिए तो टोपीलाल ने बद्री काका से माफी मांग़ ली. उन्होंएने माफ भी कर दिया था. पर टोपीलाल के मन को चैन कहां. अभी तक वह अपने ऊपर ग़र्व करता आया था. अपनी बुद्धि पर भी उसको गुमान था. उसी के कारण उसको लोगों की शाबाशी मिलती थी. परंतु अब उसे लग़ रहा था कि पिछले कुछ दिनों से उसके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया है. सोचने-समझने की शक्तिअ समाप्त़ हो चुकी है. वह सही फैसला कर ही नहीं पाता. आदमी को पहचानने में उससे भूल हो जाती है. ऐसा क्योंि हुआ? इसका ठीक-ठीक कारण तो वह नहीं जानता. पर कोई भी घटना अकारण तो होती नहीं. टोपीलाल उस कारण को जानना, उसकी तह तक पहुंचना चाहता था. पर व्य र्थ, उसका हर प्रयास निष्फटल था.
कहीं घमंड तो इसकी वजह नहीं है? मां कहती है कि घमंड अच्छे -खासे आदमी को ग़ड्‌ढे में ले जाता है. हो सकता है कि खेल-खेल में राष्ट्रापति महोदय को पत्र लिखने से
उसके मन में घमंड समा ग़या हो. ऐसा उसने कई बार सोचा है. हालांकि उस समय ऐसा कुछ नहीं था. बस काग़ज-कलम सामने देखकर उसने कुछ शब्दत काग़ज पर उकेर दिए थे. उनका सही-सही अर्थ भी वह नहीं जानता था. जैसा उस समय मन में आया वही लिख मारा था.
डाकिया की मेहरबानी हुई जो अनजाने में लिखा ग़या उसका पत्र सही ठिकाने पर जा लगा. तुक्काो तीर बन ग़या. ऐसे संयोग़ को लेकर गुमान कैसा! यह भी संभव है कि अनजाने डर ने उसकी सारी दिमागी ताकत को निचोड़ लिया हो. संभावनाएं तो अनेक हैं, पर असलियत तक पहुंचना...बेहद मुश्कितल.
इस बीच टोपीलाल ने एक बात और नोट की. पहले जब वह दूसरों के बारे में सोचता, सबके भले की कामना करता, सबसे हिल-मिलकर रहता था-तब उसके दिमाग़ में नए-नए विचार भी आते. मस्ति़ष्कत कल्पेनाओं की उड़ान में रहता था. कोई भी समस्याा हो, उसका निदान तुरंत सुझा देता. परंतु अब!
कुछ दिनों से तो अनजाना डर उसके दिलो-दिमाग़ में पैठा हुआ है. हर बच्चा. उसको अपना प्रतिद्वंद्वी, हर आदमी अपना दुश्मसन नजर आता है. संदेह मन से दूर ही नहीं होता.
टोपीलाल इस मसले पर मां से बात करना चाहता था. परंतु कई दिनों से वह देख रहा था कि मां और बापू देर तक काम करते हैं. बिल्डिंाग़ जल्दी पूरी करने के लिए उन्हेंच ओवरटाइम लगाना पड़ता है. मां घर लौटते ही खाना बनाने में जुट जाती है. बापू बाकी कारीग़रों के साथ बैठकर अग़ले दिन के काम की योजना बनाते हैं. जरूरत हो तो मालिक से बातचीत करते हैं. ऐसे में टोपीलाल की हिम्मगत कहां कि अपनी किसी समस्याि के लिए मां को परेशान करे! मन हल्का. करने के लिए उसके पास बैठे, बातचीत करे.
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इन दिनों उसकी अजीब हालत है. हमेशा गुम-सुम बना रहता है. जहां बैठ जाए वहां बैठा ही रह जाता है. दुनिया-जहान की सुध ही नहीं रहती. ऊपर से दिमाग़ है कि न जाने क्याे-क्याज अलाय-बलाय सोचता, अटकलें लगाता है. बेकार की बातें, जिनमें जरा-भी तारतम्य नहीं.
इस बीच यदि कुछ अच्छाब लग़ता है तो निराली का साथ. टोले के दर्जनों बच्चोंै में वह उसकी सबसे ग़हरी मित्र है. वही उसको सर्वाधिक पसंद भी है. जब तक निराली साथ रहे, तो उसका मन खिला-खिला रहता है. नहीं तो बुझ-सा जाता है. तभी तो उसने निराली को अपनी मां के साथ टोले में आकर रहने का कहा था. इसके लिए उसको अपनी मां और बापू दोनों ही को मनाना पड़ा था.
जिस दिन निराली और उसकी मां ने बस्तीा में कदम रखा, उस दिन वह बेहद प्रसन्नल था. लग़ता था कि बहुत बड़ी जीत हासिल हुई है। इन दिनों निराली की मां बीमार रहती है. उसको घर का सारा काम करना पड़ता है. टोपीलाल से बातचीत के लिए वह समय ही नहीं निकाल पाती.
‘क्यास सोच रहा है, टोपी?' बराबर में लेटी मां ने टोपीलाल को लगातार करवट बदलते देखा तो पूछ लिया. इसपर वह चौंक पड़ा. वह माने हुए था कि मां थकान के कारण नींद में है. पर आवाज से तो लगा कि वह उसकी हर एक सांस, हर एक धड़कन और उसकी हर एक ग़तिविधि पर नजर जमाए हुए है.
‘कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं!' मां से कभी, कुछ भी न छिपाने वाले टोपीलाल ने झूठ बोला. इसपर मन में कहीं कुछ कचोट भी हुई।
‘लग़ता है तेरी तबियत ठीक नहीं है. आज शाम ही से देख रही हूं कि तू परेशान है. निराली की मां तो ठीक है न!'
‘हां, बद्री काका ने बुखार की गोलियां दी हैं. कहा है कि सुबह तक पूरी तरह ठीक हो जाएंगी.'
‘निराली बहुत अच्छी लड़की है. बेचारी को छोटी-सी उम्र में ही कारण कष्टह भोग़ना पड़ रहा है. लेकिन तू परेशान क्योंि होता है. सुख-दुःख तो जिंदगी में लगे ही रहते हैं.' मां ने प्याोर जताया तो टोपीलाल से न रहा ग़या. उसका मन पसीज ग़या. मन की गांठे अपने आप खुलने लगीं. फिर तो प्रारंभ से अंत तक की सारी बातें, सभी गांठें उसने एक-एक कर मां के सामने खोलकर रख दीं. मां शांत मन से सुनती रही, गुनती रही. हौले-हौले तसल्लील भी देती रही।
टोपीलाल की बात समाप्त हुई तब उसने कहा-
‘बेटा, इस दुनिया में बुरे लोग़ भले ही ज्याुदा नजर आते हों, पर अच्छेी लोग़ भी कम नहीं हैं. ऐसे लोग़ सिर्फ अपनी आत्मा का कहा मानते हैं. कोई और उनके बारे में क्या सोचता है, वे इस बात की परवाह ही नहीं करते. इसलिए इस बात की चिंता छोड़ कि तेरी ग़लती से बद्री काका पर क्याआ प्रभाव पड़ेगा. वे क्याी सोचेंगे. बुरा मानेंगे या नादानी समझकर बिसार देंगे. अपना देख, लोगों पर विश्वातस करना सीख. दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव कर, जैसा तू उनसे अपने साथ चाहता है.'
‘दूसरों के साथ वैसा ही व्यावहार करो, जैसा तुम उनसे अपने लिए उम्मी द रखते हो.' टोपीलाल को आज एक नया गुरुमंत्र मिला. उसको लगा कि उसकी आंखों के आगे छाया अंधेरा छंट चुका है. भावनाएं गंगाजल-सी प्रवाहमान हैं. मस्तिाष्कल पुनः जाग्रत हो चुका है. वह हल्का. होकर नीलग़ग़न में उड़ान भरने को फिर से तैयार है. भावावेश में वह मां के सीने से लग़ ग़या-
‘मां, अग़र तुम पढ़-लिख जातीं तो स्कू ल में जरूर मास्ट रनी होतीं.'
‘नहीं रे! मैं औरत हूं. पढ़-लिखकर और चाहे जो भी बनती, पर पहले मैं मां ही होती.'
‘सचमुच!' कहते हुए टोपीलाल मां से चिपट ग़या. रात अपनी पींगे बढ़ाए जा रही थी. नींद का हिंडोला सज चुका था. उसे सपनों की सैर कराने, दूर तारों के उस पार ले
जाने के लिए.
लंबी से लंबी यात्रा का आनंद तभी तक है, जब तक कि पांव जमीन पर होने का एहसास हो.
अग़ले दिन टोपीलाल की आंखें मां के साथ ही खुल ग़ईं. वह उठ बैठा. मां चूल्हां सुलगाने की तैयारी करने लगी. उससे अनुमति लेकर वह अपने तंबुनुमा घर से बाहर निकला. फिर तेज कदमों से चलता हुआ सीधा उस स्था न पर पहुंचा, जहां बद्री काका को सोते हुए छोड़ा था. टोले के प्रायः सभी मर्द देर से उठते थे. औरतों को घर का काम निपटाना होता, वे मुंह-अंधेरे काम पर जुट जातीं. इसलिए इतने सवेरे बद्री काका को अपने स्थारन से गायब देखकर वह हैरान रह ग़या.
बिल्डिंहग़ में ही जीने की ओट में बद्री काका को देख वह उनकी ओर बढ़ ग़या. वे व्याथयाम कर रहे थे.
‘तुम! इतने सवेरे, क्याट रात को नींद नहीं आई?'
‘मैं तो बस आपसे मिलने चला आया...!' टोपीलाल ने उत्तर दिया.
‘ऐसी भी क्याप जल्दी थी?'
‘कल आप बता रहे थे कि आपको राष्ट्र पति जी ने भेजा है? तब तो आप हम बच्चों को पढ़ाने के लिए आए होंगे?'
‘ठीक समझे.' बद्री काका ने धोती बांधते हुए कहा, ‘मैं बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी पढ़ाऊंगा. सुबह की पारी में बच्चेी और शाम की पारी में बड़े. हर सप्ताेह में एक दिन बच्चोंो और बड़ों को साथ-साथ बिठाकर टेस्ट. लिया करूंगा...उसमें जो सबसे ज्या्दा अंक लाएगा, उसको पुरस्काएर भी मिलेगा.' बद्री काका ने बताया.
‘हमारे पास तो कॉपी-कलम-पुस्ताकें कुछ भी नहीं हैं...' टोपीलाल ने अपनी समस्याो बताई.
‘घबराओ मत, उनका इंतजाम हो जाएगा.'
‘सभी बच्चोंत के लिए...?'
‘हां, सभी बच्चोंं के लिए।'
‘बड़े तो कमाते हैं, न?'
‘उनके लिए भी किताब-कॉपी मुफ्तं मिला करेंगी.'
‘बड़ों के लिए भी...फिर तो बहुत रुपयों की जरूरत पड़ेगी.'
‘हमारे सिर पर राष्ट्र पति जी का आशीर्वाद है. फिर किस बात की चिंता.'
‘राष्ट्रिपति जी के पास क्या इतने रुपये हैं?'
‘राष्ट्रिपति जी को रुपये-पैसों की जरूरत नहीं पड़ती...उन्हें तो काम करने वाले
नाग़रिकों की जरूरत होती है. ऐसे लोग़ उनसे प्रेरणा लेकर अपने आप खिंचे चले आते हैं. और जब कारबां बनता है तो बाकी चीजें भी जुट ही जाती हैं.' बद्री काका की बात टोपीलाल के सिर के ऊपर से गुजर ग़ई. वह उनका मुंह देखने लगा-
‘चलो, वहां खुली हवा में बैठकर बात करते हैं, सुबह-सुबह शरीर को ताजी हवा मिले तो देह पूरे दिन खिली-खिली रहती है.' बद्री काका बोले और बिल्डिंैग़ के सामने खडे़ अशोक के वृक्ष की ओर बढ़ ग़ए. चलते-चलते टोपीलाल का हाथ न जाने कब उनके हाथों में चला ग़या, उसको पता ही न चला. टोपीलाल को यह एहसास सुखद लगा. वह देर तक उनके स्नेलहिल स्पिर्श को अनुभव करता रहा. बैठने के बाद बद्री काका फिर उसी विषय पर लौट आए-
‘मैं कह रहा था कि काम करने वाले नाग़रिक राष्ट्रकपति जी से मिलने अपने आप चले आते हैं. असल बात यह है कि ऊंचे सोच, लंबी देशसेवा तथा सर्वस्वग समर्पण के बाद ही कोई व्यरक्तिम राष्ट्रयपति के आसन तक पहुंच पाता है. ऐसे महापुरुष का जीवन तो आदर्श की स्व्यं मिसाल होता है. इसलिए उनका व्यिक्तिपत्व् लाखों लोगों को प्रेरणा देता है. उनसे प्रभावित लोग़ ऐसे कार्यों में खुशी-खुशी योग़दान देते हैं. मैं राष्ट्रसपति जी का बेहद आभारी हूं कि इस काम के लिए उन्हों ने हमारी संस्था् को चुना है.'
‘संस्थाल?'
‘संस्थाल माने एक मकसद, एक लक्ष्यस, एक अभियान और समझो तो एक चुनौती भी, जिसको पूरा करने के लिए मुझ जैसे अनेक लोग़, निःस्वा्र्थ-भाव से एकजुट हो जाते हैं. ऐसे लोगों की गिनती करोड़ों में है. वे पूरे देश में फैले हुए हैं.'
‘क्या सचमुच राष्ट्र पति जी को मेरी बिना टिकट लगी चिट्‌ठी मिली थी?'
‘हां, उस डाकिया की मेहरबानी से. तुम्‍हारी ईमानदारी से प्रभावित होकर उसने तुम्हाारे पत्र पर अपनी ओर से डाक टिकट चिपका दिए थे. साथ में एक छोटी-सी पर्ची भी लिख छोड़ी थी. तुम्हाकरे पत्र और उस पर्ची की छायाप्रतियां मेरे पास भी हैं. जानते हो उसमें डाकिया ने तुम्हाखरे बारे में क्याम लिखा है?'
‘मैं भला कैसे जानूंगा?'
‘अभी सुनाता हूं...' कहते हुए बद्री काका ने अपनी जॉकेट की जेब में हाथ डाला. पर्ची निकाली और पढ़ने लगे, ‘‘सुनो, उस भले आदमी ने लिखा है-
‘माननीय राष्ट्रभपति जी! जिस बच्चेी ने यह चिट्‌ठी मुझे सौंपी है, वह बहुत ही भोला है. यह भी नहीं जानता कि पत्र को डाक विभाग़ को सौंपने से पहले उसपर डाक टिकट लगाना आवश्य‌क होता है. पर वह बालक है बहुत ईमानदार. देखने पर यह भी लग़ता है कि उसके माता-पिता बहुत ग़रीब हैं. वे मेरे कार्यक्षेत्र के कहीं पास ही मेहनत-मजदूरी करते हैं. लड़के को मैंने कई बार सड़क पर भटकते देखा है. लग़ता है माता-पिता के काम पर चले जाने के बाद वह वक्तक बिताने के लिए इधर-उधर निकल जाता है.
बच्चाक ईमानदार है. एक मामूली कलम को लौटाने के लिए भी वह बहुत दूर चलकर आया था. वह दूसरों के दुःख को समझता है। दिल में परोपकार की भावना है. साथ में पढ़ने की ललक भी. ढंग़ का मौका मिले तो बहुत आगे तक जा सकता है। ये सब बातें उसके पत्र से जाहिर हो जाएंगी. यदि संभव हो तो उस बच्चेै की पढ़ने की इच्छाक पूरी करने के लिए सभी जरूरी उपाय किए जाएं.
महोदय! मैं जानता हूं कि दूसरे का पत्र पढ़ना और उसके साथ अपनी और से कुछ जोड़ना अपराध है. पर मैं भी क्याय करता! अपनी चिट्‌ठी सौंपने से पहले उस बच्चेक ने मुझे कुछ भी नहीं बताया था. यहां तक कि अपना नाम भी नहीं. इसलिए बच्चेू का मकसद समझने के लिए मुझे उसका पत्र पढ़ना पड़ा. मैं उससे बहुत प्रभावित हूं. इसलिए मान्यकवर के सामने अपनी ओर से कुछ निवेदन करने का साहस जुटा पाया हूं...'
पर्ची पर लिखी इबारत पूरी पढ़ने के बाद बद्री काका ने उसको जेब के हवाले किया. फिर बोले-‘तुम्हाारी चिट्‌ठी ने राष्ट्रिपति महोदय को बहुत प्रभावित किया. उन्हों ने तत्कााल मुझे याद किया और मुझे यहां पहुंचने की जिम्मे्दारी सौंप दी. चलते समय राष्ट्रहपति जी ने जो कहा, वह मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा.'
‘ऐसा क्याम कहा था उन्हों ने?' टोपीलाल की जिज्ञासा बढ़ चुकी थी.
‘उन्होंयने कहा था-वहां टोपीलाल जैसे गुणवान बच्चेा और भी हो सकते हैं. धूल में छिपे हीरकणों जैसे. उन सभी को खोजकर, उनकी प्रतिभा को निखारने, उन्हेंग एक अच्छाह नाग़रिक बनाकर समाज के सामने लाने की जिम्मेयदारी मैं आपको सौंप रहा हूं. यह एक बड़ा दायित्वा है. पर मैं जानता हूं कि महात्माक गांधी और विनोबा भावे के सान्यिेय में रहकर आपको ऐसे कार्य साधने का अच्छाा-खासा अभ्याास हो चुका है.'
उस दायित्वप-भार से मैं खुद को धन्यछ समझने लगा था. फिर तो बिना पल गंवाए मैंने अपना झोला उठाया और तुम्हािरे पास चला आया. राष्ट्रदपति जी ने मुझसे कहा है कि मैं तुमसे मदद लूं. आगे जिधर भी कदम उठें, उधर हम दोनों साथ-साथ रहें.'
‘मेरी मदद! मैं आपकी भला क्‍या मदद कर सकता हूं?' मनोयोग़ से बद्री काका की बात सुन रहा टोपीलाल एकाएक चौंक पड़ा.
‘तुम्हींप मुझे बताओगे कि यहां कितने बच्चेक हैं जो पढ़ना चाहते हैं. उन सबको तुम मेरे पास लाओगे. जो बच्चेह पढ़ने से बचते हैं, उन्हेंझ तुम पढ़ाई-लिखाई की आवश्यनकता के बारे में बताओगे. जरूरत पड़े तो उन्हें मेरे पास भी ला सकते हो, ताकि मैं उन्हें पढ़ने के लिए तैयार कर सकूं. क्या तुम मुझे अपने माता-पिता से नहीं मिलवाओगे?'
‘मां और बापू से भी...?'
‘यह बताने के लिए कि उनका बेटा कितना समझदार है. मैं उनसे यह निवेदन भी करूंगा कि बच्चोंझ और बड़ों को शिक्षित बनाना, हम सबकी मिली-जुली जिम्मेहदारी है. इसलिए वे हमारा साथ दें. टोले के बड़े लोगों को भी अक्षर-ज्ञान के लिए आगे लाएं. तभी मेरे यहां
आने का उद्‌देश्यआ पूरा हो सकता है.'
टोपीलाल को वे सभी बातें एक सपना, हवाई उड़ान जैसी ऊंची कल्पयनाजन्या और अविश्वलसनीय लग़ रही थीं. मग़र जो था, वह उसकी आंखों के सामने था. जो कहा ग़या था, उसकी ध्ववनि उसके कानों में गूंज रही थी.
‘क्याद निराली भी मेरे साथ पढ़ेगी?'
‘सभी बच्चे एकसाथ पढ़ेंगे.'
‘उसकी तो मां बीमार रहती है! वह बेचारी तो आ ही नहीं पाएगी!' कहते-कहते टोपीलाल उदास हो ग़या.
‘यह चिंता तुम छोड़ दो. निराली की मां की हालत यदि जल्द ही न सुधरी तो हम उन्हेंल अस्पगताल भिजवा देंगे. जहां डॉक्टोर और नर्स उनकी देखभाल करेंगे. वहां से कुछ ही दिनों में स्व स्य्मते होकर वह घर लौट आएंगी। उसके बाद तो निराली के पास समय ही समय होगा, क्योंी?'
‘जी!' टोपीलाल बस यही कह सका. उसी समय उसकी मां की आवाज गूंजी. वह तत्काउल खड़ा हो ग़या-
‘अरे! बातों-बातों में मैं यह तो भूल ही ग़या कि मां और बापू के काम पर जाने का समय हो चुका है. दोनों मेरा इंतजार कर रहे होंगे...मैं जल्दी ही आऊंगा.'
टोपीलाल ने घर की ओर दौड़ लगा दी. उस दौड़ में आत्म'विश्वारस था. मन में थे अनगिनत सपने और आगे बढ़ने का अटूट संकल्पह. बद्री काका उसको जाते हुए देखते रहे. उसके बाद वेे अपने ठिकाने की ओर बढ़ ग़ए. उस समय उनके चेहरे पर अलौकिक मुस्का्न थी. दिल में विश्वा स और चेहरे पर था अभूतपूर्व तेज. खुद पर भरोसा और मन में दूसरों के कल्याकण की कामना हो तो ऐसा तेज स्वुतः आभासित होने लग़ता है.
सच्चेू कर्मयोगी का जीवन मिश्री का पहाड़ होता है, जो मिठास रखता है, मिठास बांटता है और मिठास जीता भी है.
नेकी हजार फसल देती है। सुंदरता और मिठास दोनों ही मामलों में मिश्री जैसी कोई मिसाल नहीं.
बद्री काका ने टोपीलाल से कहा था, पांच साल से ऊपर के बच्चोंस को बुलाकर लाने को. बस्तीह में ऐसे बीसियों बच्चेह थे. उनमें से कुछ से उसकी दोस्तील भी थी. बद्री काका के कहने पर एक-एक के पास टोपीलाल पहुंचा. हर एक को बद्री काका के आग़मन की खबर दी. उनके आने का उद्‌देश्या बताया. कहा भी कि वे उन्हेंि बिना फीस पढ़ना सिखाएंगे. कि आदमी के लिए कितना जरूरी है पढ़ना. इसके लिए उन्हेंर स्कूयल जाने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. जहां हम हैं, वहीं स्कू़ल बन जाएगा.
और कॉपी-किताब के लिए तो जरा-भी परेशान न हों. माता-पिता को एक पाई भी खर्चने की जरूरत नहीं। बद्री काका ने हर चीज के इंतजाम का आश्वाासन दिया है. बिलकुल मुफ्त . यह कोई छोटी बात नहीं. इसलिए आज शाम को सभी बच्चेे दो घंटा पहले खेलना छोड़कर, सीधे बद्री काका के पास पहुंचें. उन्होंनने कहा है कि वे आज ही से पढ़ाई आरंभ करना चाहते हैं.
बच्चोंा ने उसकी बात को सुना. कुछ ने समय पर पहुंच जाने का आश्वािसन दिया. कुछ ने अच्छाा कहा। कुछ ऐसे भी थे जिन्होंरने उसकी जमकर खिल्ली उड़ाई. कुछ ने तो पढ़ाई की उपयोगिता पर ही सवाल खड़े कर दिए. टोपीलाल ने सब सुना. मन में उम्मी़द लिए वह आगे बढ़ता ग़या.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: बाल उपन्यास :मिश्री का पहाड़ /ओमप्रकाश कश्यप

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:07

उस दिन टोपीलाल बच्चोंल के अभिभावकों से भी मिला. बद्री काका एक-एक को समझाने उसके पास ग़ए तो वह उनके साथ रहा. कहा था कि बच्चों को पढ़ाएं. कि जरूरी नहीं है मजदूर का बेटा मजदूर, मिस्त्री का बेटा मिस्त्री ही बने. वह व्याथपारी, अधिकारी, डॉक्ट र, इंजीनियर या वकील कुछ भी बन सकता है. जो जिम्मेहदारी उनके माता-पिता उनके लिए नहीं उठा पाए, उसे अब वे अपने बच्चों के लिए उठाएं. उन्हेंय आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साीहित करें. उनमें संघर्ष की भावना जगाएं. ताकि पीढ़ियां बदलें, उनके संस्का र बदलें और मिल-जुलकर युग़ में बदलाव लाएं.
दिन बीता, पर कड़वे अनुभव के साथ. टोपीलाल के जीवन का शायद सबसे कड़वा अनुभव. अपने अनपढ़ होने का रोना रोने वाले माता-पिता में से एक ने भी अपने बच्चों को बद्री काका के पास जाने की अनुमति नहीं दी. कुछ तो पढ़ाई के नाम से ही जी चुराते दिखे. कुछ ने साफ मना कर दिया. कुछ ने हंसकर टाल दिया. कुछ ने कह दिया कि दूसरों को मनाओ. वे तो तैयार ही हैं. जबकि कुछ ने उसकी खिंचाई करने का प्रयास भी किया-
-पढ़-लिखकर भी क्याे करेंगे, मेहनत-मजदूरी...दूसरों की गुलामी! वह तो बिना पढ़े करते ही आए हैं.
-पढ़े-लिखे बेरोजगार सड़कों पर चप्पनल चटकाते घूमते हैं. काम मिल ही नहीं पाता.इससे तो अच्छा है कि बेरोजगार बनकर जियो. मजदूर बनकर कमा-खाओ.
-जब पढ़-लिखकर भी पसीना ही बहाना है, तो उसमें अपना समय क्योंी बरबाद किया जाए.
-पेट तो जमीन से भरता है, आसमान की ओर ताकते रहने से भला किसका गुजारा हुआ है!
-बुजुर्ग कहते आए हैं कि सब्र करो, संतोष धारण करो. उसी का फल मीठा निकलता है.
एक विधवा मजदूरिन के एक ही बेटी थी. मां दिन-भर ईंट और मसाला ढोती. बेटी घर पर अकेली रहती. टोपीलाल उसके पास भी ग़या. कहा कि अपनी बेटी को पढ़ने के
लिए बद्री काका के पास भेजे. पढ़-लिख जाएगी तो जिंदगी में काम आएगा. मजदूरिन अपना ही दुखड़ा रोने लगी-
‘बेटा, मैं तो चाहती हूं कि वह थोड़ा-बहुत पढ़ ले. लेकिन अग़र वह स्कूहल जाने लगी तो घर का काम कौन निपटाएगा. रोटी-दाल तो चलो मैं ही बना लेती हूं. परंतु झाड़ू-बुहार का काम, बकरी की देखभाल, इतना काम मुझ अकेली से कैसे सधेगा?'
‘कहीं दूर थोड़े ही जाना है. फिर दो घंटे की बात...मैंने कुक्कीू से बात की है. वह कह रही थी कि घर का सारा काम वह इसी तरह करती रहेगी, जैसे कि अब तक करती आई है. आपको जरा-भी परेशानी नहीं होगी.'
‘चलो मान लिया...कुक्कीह मेरी अच्छी बेटी है...वह मेहनती भी है. जितना हाथ वह अब तक बंटाती आई, उतना आगे भी बंटाती रहेगी. पर बेटा तुम एक बात नहीं समझते. हर लड़की को एक न एक दिन पराये घर जाना ही पड़ता है. वहां कोई हंसी न उड़ाए, इसलिए उसको घर का काम आना ही चाहिए. उसे सीखने की यही उम्र है. चौके-चूल्हेी का काम आ जाए तो अपना घर आसानी से संभाल लेगी. वरना ससुराल में सब यही कहेंगे कि बिना बाप की बेटी को मां से कुछ सिखाते न बना.'
‘कुक्कीी यदि पढ़-लिख जाएगी तो घर और भी जिम्मेलदारी से चला सकेगी.' टोपीलाल ने बात काटी. अपने से बड़ों से वह अधिक बोलता नहीं था. बात पसंद न हो तो सिर्फ चुप्पी साध लेता. मग़र उस समय कुक्कीक की मां को समझाने के लिए वह एक के बाद एक तर्क दिए जा रहा था. टोपीलाल को विश्वाीस था कि उसका आखिरी तर्क कुक्की की मां को अवश्यब ही निरुत्तर कर देगा. मग़र कुक्कीउ की मां के तरकश में अब भी कई तीर बाकी थे, जिनकी काट टोपीलाल के पास भी नहीं थी-
‘तू अभी नादान है. नहीं जानता कि बेटी के ब्याजह के समय मां-बाप को कितनी मुश्किालें उठानी पड़ती हैं. कुक्कीो का बाप होता तो मुझे चिंता न होती. वह खुद संभाल लेता. पर अब तो इसके हाथ पीले करने की जिम्मेकदारी मेरी ही है. लड़की अग़र पढ़ी-लिखी हो तो पढ़ा-लिखा लड़का भी तलाशना पड़ता है. उसके लिए ज्याीदा दहेज भी चाहिए. मैं विधवा मजदूर उतना दहेज कहां से जुटा पाऊंगी.'
टोपीलाल के पास इसका कोई जवाब न था. निरुत्तर हो वह वापस लौट आया. उसके बाद जिसके भी पास वह ग़या, उसके पास पढ़ाई से बचने के अनगिनत बहाने थे. न था तो सिर्फ पढ़ाई से जुड़ने का इरादा. पढ़-लिखकर कुछ बनने का संकल्प . उसके लिए यह हैरान और परेशान करने वाली स्थिरति थी. उसके अब तक के सोच के एकदम उलट.
हाल के वर्षों में उसने न जाने कितने अरमान अपनी शिक्षा को लेकर पाले थे. न जाने कितनी बार यह सपना देखा था कि एक दिन वह भी स्कूेल जाने लगेगा. कि वह पढ़-लिखकर एक कामयाब इंसान बनेगा. कि मां और बापू की तरह केवल मजदूरी या मिस्त्रीगीरी ही नहीं अपनाएगा. वे काम करेगा जो पढ़े-लिखे लोग़ करते हैं. कि बड़ा होकर
मां-बाप दोनों को सुख और सम्माीन का जीवन दे सकेगा.
जाने क्योंो, वह सोच बैठा था कि बस्तीा का प्रत्येजक बालक खुशी-खुशी पाठशाला जाने की सहमति दे देगा. उनके माता-पिता भी पढ़ने से क्यों् रोकेंगे? इससे उनको लाभ ही होगा. मग़र उस एक दिन में जो कुछ हुआ वह उसके सारे अरमानों पर पानी फेरने को काफी था.
दिन-भर की दौड़-धूप के बाद जब वह बद्री काका के पास पहुंचा तो बेहद थका हुआ था. पसीना उसके माथे पर था. चेहरा लटका हुआ, दिल में उदासी थी, आंखों में निराशा की स्या.ही. अरमान मरे-मरे थे.
‘अच्छा हुआ तुम आ ग़ए. मैं पढ़ाई आरंभ करने का सोच ही रहा था. आओ बैठो! आज हम पहला पाठ सीखने की कोशिश करेंगे.' टोपीलाल को अकेला देख अनुभव-पके बद्री काका को और कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ी, मानो बिना बताए सबकुछ समझ ग़ए हों. उनके हाथ में पुस्त्क थी. आंखों पर मोटा चश्मात. सामने केवल टोपीलाल था और निराली. इसके बावजूद बद्री काका का पढ़ाने का अंदाज ऐसा था, जैसे पूरी कक्षा को पढ़ा रहे हों-
‘बच्चो ! मैं पहला पाठ शुरू करूं उससे पहले आपका यह जान लेना जरूरी है कि जीवन में केवल वही लोग़ तरक्की् करते हैं, जिन्हेंठ समय का सम्माीन करना आता है, जो उसकी उपयोगिता को महसूस करते हैं. उसके साथ-साथ चलते हैं. समय सुस्तै लोगों से कन्नीक काटकर आगे बढ़ जाता है. वह कभी फिसड्‌डी लोगों के फेर में नहीं पड़ता. इसलिए तुम आज यदि कुछ बनने का संकल्प लेने जा रहे हो, तो एक संकल्पस यह भी अवश्यक लेना कि हम अपना हर काम तय समय पर पूरा करेंगे. हमारे पास जितना समय है, उसके प्रत्येकक पल का सदुपयोग़ करेंगे. कभी लापरवाही नहीं करेंगे, न कभी आलस ही दिखाएंगे.'
‘काका, क्या यह नहीं हो सकता कि हम कल से पाठ आरंभ करें. मुझे उम्मीरद है कि कल से कुछ बच्चे़ जरूर आने लगेंगे.' टोपीलाल ने बीच में टोका. इसपर बद्री काका मुस्कुरा दिए.
‘जो बच्चे. कल आएंगे, उन्हेंं भी हम पढ़ाएंगे. पर आज आए बच्चों् के लिए जो पाठ जरूरी है, तुम उसी पर ध्या न दो.' इसके बाद वे एक घंटे तक पूरे मनोयोग़ से पढ़ाते रहे. इस बीच प्रश्नोलत्तर भी चलता रहा. टोपीलाल और निराली ने जो भी जानना चाहा, बद्री काका ने उसका स्नेपहपूर्वक जवाब दिया. समय कब बीता, उन दोनों को पता भी न चला.
‘बच्चो , आज का पाठ हम यहीं पर समाप्तन करते हैं. कल आप सब इसको दोहरा कर आना.' कहकर बद्री काका ने उस दिन की पढ़ाई का समापन किया. चलने लगे तो उन्होंउने टोपीलाल और निराली को कुछ पुस्तइकें, कॉपियां और पेंसिल वगैरह भेंट कीं-
‘इन्हेंक आखिरी मत समझना. होशियार बच्चोंउ को इस तरह के उपहार पाने की आदत
डाल लेनी चाहिए.'
टोपीलाल चलने लगा तो बद्री काका ने कंधे पर हाथ रखकर अनुराग़मय स्वकर में कहा-‘किसी अच्छे काम की शुरुआत भले ही एक आदमी द्वारा हो, मग़र लोग़ उसके साथ मिलते चले जाते हैं. धीरेे-धीरे पूरा कारवां बन जाता है. जबकि बुरे काम की शुरुआत यदि हजार लोग़ भी करें तो वह भीड़ एक-एक कर छंटती चली जाती है. अंत में एक या दो बचते हैं, जिन्हें समाज अपराधी मानकर धिक्कातरता, कानून दंडित करता है, समझे!'
‘जी...!'
‘क्याए?'
‘यही कि महान व्येक्तिं के पीछे पूरा कारवां होता है, जबकि पापी अक्सरर अकेला पड़ जाता है.'
‘शाबाश! मुझे लग़ता है कि अब मैं राष्ट्रहपति जी के विश्वािस की रक्षा कर सकूंगा।' कहते समय बद्री काका के चेहरे पर चमक आ ग़ई.
‘मेरे तो कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा...क्या‍ कल भी हम दोनों ही होंगे?' घर लौटते समय निराली ने पूछा.
‘संभव है, लेकिन सदा नहीं...' भरे विश्वारस के साथ टोपीलाल ने कहा, ‘पर हम दोनों तो होंगे ही.'
‘हां.' निराली ने स्वी कृति दी. वह जान चुकी थी कि अच्छेट कार्य के प्रति भरोसा समाज को अच्छाहई की तरफ ही ले जाता है.
उद्‌देश्य की पवित्रता आत्मंविश्वा स भी जगाती है.
विकास अपनेे साथ कुछ विकृतियां लाता है. उनसे बचना इंसान के बुद्धि-कौशल की कसौटी बन जाता है और उनपर नजर रखना समय की जरूरत.
एक सप्ता ह में ही टोपीलाल की उदासी छंट ग़ई. बद्री काका की कोशिशें रंग़ लाने लगी. दस दिन के भीतर ही खुली पाठशाला मेंं आने वाले बच्चोंी की संख्यां पंद्रह से ऊपर पहुंच चुकी थी. और तो और कुक्कीे भी पाठशाला आने लगी. उसकी मां खुद उसको पाठशाला छोड़कर ग़ई थी-
‘मेरे बुढ़ापे का बोझ यह बच्चीम क्यों सहे. इसे अब आप ही संभाले गुरु जी!'
बद्री काका सुनकर मुस्कु रा दिए थे।
पाठशाला का समय भी तय हो चुका था. बद्री काका सुबह चार बजे जाग़ जाते. व्या याम के पश्चा त वे थोड़ा दूध लेते. कुछ समय अध्य यन के लिए निकालते. बच्चोंे के आने का समय होता तो ईंटों के चूल्हेक पर खिचड़ी पकाने के लिए रख देते. आठ बजे तक सभी विद्यार्थी उपस्थिुत हो जाते. जो नहीं आ पाता, उसको बुलाने के लिए वे खुद उसके
घर जाते. सवा आठ बजे पढ़ाई आरंभ हो जाती.
इस बीच उनके सामान में भी वृद्धि हुई थी. लकड़ी की एक बड़ी पेटी मंग़वाई ग़ई थी. उसमें बच्चों को देने वाली पुस्तसकें तथा अन्य लेखन-सामग्री सुरक्षित रखी जाती. ठीक साढे़ दस बजे मध्याेह्‌न होता. उससे पहले ही पतीली में ग़र्माग़रम खिचड़ी परोसे जाने का इंतजार करने लग़ती. अपने विद्यार्थियों के साथ बद्री काका भी उसका सेवन करते. ग्यातरह बजे पढ़ाई दुबारा आरंभ हो जाती. जो आगे दो घंटों तक चलती. उसके बाद बच्चे घर जाते और बद्री काका भोजन करने के लिए बढ़ जाते.
बद्री काका को खुद खाना बनाते देख टोले के लोगों ने ही आग्रह किया था कि उनके लिए खाना बनवा दिया करेंगे. इस प्रस्ताेव पर बद्री काका एक शर्त पर राजी हुए थे. शर्त के अनुसार जो बच्चेब बद्री काका के पास पढ़ने आते थे, उनके घर बारी-बारी से आटा और जरूरी सामग्री सवेरे ही पहुंचा आते. दोपहर को वहां से पका-पकाया भोजन प्राप्त, हो जाता.
पाठशाला में शाम की पारी बड़ों के अक्षर-ज्ञान के लिए निर्धारित थी. शाम के पांच बजे चिनाई का काम बंद हो जाता. एक घंटा लोगों को उनके जरूरी कामों से मुक्तश होने के लिए मिलता. छह बजे प्रौढ़ पाठशाला आरंभ होती. विद्यार्थी जुटने लग़ते.
बड़ों की पाठशाला की हालत और भी खराब थी। दो सप्तासह बाद भी मुश्कि ल से पांच-छह विद्यार्थी हो पाए थे. बद्री काका इस प्रग़ति से असंतुष्ट। थे. परंतु निराश बिलकुल न थे. उनका दिमाग़ तेजी से सोच रहा था. और तब अपने प्रौढ़ विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए बद्री काका ने एक तरकीब निकाली.
शाम को ठीक छह बजे जैसे ही कुछ विद्यार्थी जमा होते, बद्री काका कोई न कोई किस्साप-कहानी छेड़ देते. किस्साा सुनाने का उनका ढंग़ निराला था. सुनाते समय उनके स्वरर का उतार-चढ़ाव ध्वहनि को संगीतमय बना देता. उसके आकर्षण से लोग़ खिंचे चले आते.
कुछ दिन बाद बद्री काका ने अनुभव किया कि उनके प्रौढ़ विद्यार्थियों में भी अच्छेत-खासे कलाकार छिपे हैं. कोई ढोला सुर से गाता है, तो किसी का ग़ला आल्हा पर सधा है. कुछ को दूसरों की हू-ब-हू नकल उतारने में महारत हासिल है. जब वे अपना कार्यक्रम प्रस्तुलत करते तो बच्चेा और बड़े हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते थे.
बद्री काका को तोड़ मिल ग़या. उनकी निराशा छंटने लगी. उन्हों ने व्यंवस्थाट में बदलाव किया. पाठशाला की शुरुआत किसी भजन, आल्हार या ढोले से होने लगी. जब तक वह समाप्तह होता, तब तक पचीस-तीस मजदूर जमा हो जाते. एक पूरी कक्षा की उपस्थियति. उसके बाद बद्री काका उन्हेंत अक्षर-ज्ञान कराना शुरू करते.
कुछ दिन यह व्यतवस्थाी कारग़र रही. फिर बद्री काका ने अनुभव किया कि कुछ लोग़ मनोरंजन कार्यक्रम समाप्तर होते ही उठ जाते हैं. पढ़ाई के काम में रुचि ही नहीं लेते. या मनोरंजन कार्यक्रम को लंबा खींचने का अनुरोध करते रहते हैं. इससे उनका उद्‌देश्यम पूरा
नहीं हो पाता. अतः मनोरंजन कार्यक्रम के समय में सुधार किया ग़या. पाठशाला की दैनिक शुरुआत तो उसी से होती. मग़र जैसे ही वह अपने शिखर पर पहुंचने को होता, बद्री काका उसको बीच ही मैं रुकवा देते.
‘अब कुछ देर के लिए हम पढ़ाई पर ध्यािन देंगे. घबराइए मत, यह पढ़ाई भी एक प्रकार का खेल ही है, दिमाग़ का खेल. अपने दिमाग़ में कुछ जरूरी चीजें, थोड़ा-सा ज्ञान भर लेने की कसरत. जो वक्तर पर काम आए. हमारी जिंदगी की राह को आसान करे, हमें समझाए कि हम यदि मनुष्यह हैं तो इसके क्याा मायने हैं...'
‘पर महाराज, गीत के दो-चार बोल और सुनने को मिल जाएं तो...गायक ने समां बांध रखा था, वाह!'
‘दो-चार नहीं पूरे आधा घंटे और सुनने को मिलेगा. फरमाइश होगी तो वह भी पूरी की जाएगी. लेकिन फिलहाल पढ़ाई...केवल पढ़ाई.' बद्री काका दृढ़ स्वगर में कहते और पुस्तीक निकालकर पढ़ाने को तैयार हो जाते. अनमने भाव से लोगों को भी पढ़ने का नाटक करना पड़ता.
और नाटक भी अकारथ तो जाता नहीं.
उस दिन बद्री काका ने दिनारंभ में पढ़ाई की शुरुआत की तो उनके बाल शिष्य उखड़े हुए थे-
‘हम आपसे नहीं पढ़ेंगे...आप पक्षपात करते हैं.' टोपीलाल जो दूसरे विद्यार्थियों का अगुआ बना हुआ था, बोला.
‘आप हमें निरा बच्चां समझते हैं...!' कुक्कीप ने भी साथ दिया. बद्री काका ने महसूस किया कि पूरी कक्षा टोपीलाल और कुक्कीम के साथ है. कारण उनकी समझ से परे था-
‘ऐसी क्याु बात है?'
‘आप ही सोचिए...हम आपसे क्यों नाराज हैं?' निराली ने बनावटी गुस्सेय में बोली.
‘बूढ़े आदमी की अक्ल. तो वैसे ही घास चरने चली जाती है.' बद्री काका ने कुछ ऐसे कहा कि पूरी कक्षा की हंसी छूट ग़ई.
‘आप अपने बड़े विद्यार्थियों को तो खूब कहानी-किस्सेक सुनाते हैं. आल्हा और भजन भी होते हैं...पर बच्चोंऔ के पीछे पड़े रहते हैं कि सिर्फ इन किताबों में सिर खपाते रहो. यह पक्षपात नहीं तो और क्याक है!' बद्री काका को अपनी ग़लती का एहसास हुआ.
‘सचमुच मुझसे भारी भूल हुई है. मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. आगे से आपके साथ यह अन्या'य नहीं होगा, बल्किच हम आज ही से...' तभी किसी बच्चेा के रोने का स्वेर सुनाई पड़ा. बद्री काका कहते-कहते रुक ग़ए. सबका ध्यािन उस बच्चे की ओर चला ग़या.
‘अरे! यह तो सदानंद है...' एक बच्चे ने पहचाना. साथ ही कक्षा में चुप्पी छा ग़ई. बद्री काका पढ़ाना छोड़कर उस बच्चेर की ओर बढ़ ग़ए.
‘क्या‍ हुआ बेटे?' उन्होंझने सदानंद के सामने बैठ उसके आंसू पौंछते हुए कहा.
‘मैं भी पढ़ना चाहता हूं. लेकिन काका आने से मना करता है. आज मैंने जिद की तो उसने खूब पिटाई की...'
‘क्याभ नाम है तुम्हा.रे पिता का.'
‘जियानंद!' लड़के ने संक्षिप्ति-सा उत्तर दिया.
‘वे तुम्हेंन रोकते क्योंे हैं?' सदानंद चुप्पीह साधे रहा.
‘गुरुजी मैं बताऊं...' टोपीलाल उठकर बोला. बद्री काका ने उसकी ओर देखा. वह बताने लगा-‘सदानंद के पिता अच्छेु-खासे मिस्त्री हैं. टोले के दूसरे मिस्त्री उनके काम की तारीफ करते थे. लेकिन न जाने कब उन्हें शराब की लत ग़ई. उसके बाद से उनका काम से ध्याेन हटता चला ग़या. टोले में बदनाम भी होने लगे.
अब तो हालत यह है कि रोज शाम को पीने को न मिले तो वे उखड़ जाते हैं. लेकिन शराब खरीदने के लिए रुपये भी चाहिए. इसलिए शौक को पूरा करने के लिए उन्हें चोरी की लत और लग़ ग़ई. पिछले सप्ता ह उन्हेंं चिनाई का लोहा कबाड़ी को बेचते हुए पकड़ लिया ग़या. इसपर मालिक ने उन्हें काम पर आने की पाबंदी लगा दी थी.
बापू के कहने पर उन्हेंल काम पर तो रख लिया ग़या, लेकिन अब उनपर नजर रखी जाती है. उनकी मजदूरी भी उन्हेंे न मिलकर सदानंद की मां को मिलती है. इससे वे चिड़चिड़े हो ग़ए हैं. कल रात शराब के लिए रुपये न देने पर उन्होंहने सदानंद की अम्मा की पिटाई भी की थी.'
‘समझ ग़या...' टोले के लोगों की शराब की आदत बद्री काका से छिपी न थी. वे चाहते थे उस आदत को छुड़ाना. उसके लिए काम करना. मग़र बच्चों की पढ़ाई का काम उन्हेंद अधिक महत्त्वपूर्ण लग़ता था. उसके लिए दूसरे कार्यों को टालते जा रहे थे. अब उन्हें लगा कि उस दिशा में भी तत्काहल कार्य आरंभ करना होगा. नहीं तो बात हाथ से निकल भी सकती है.
‘तो तुम सचमुच पढ़ना चाहते हो बेटे?' उन्हों्ने सदानंद की पीठ पर हाथ फिराते हुए कहा.
‘हां, पर मैं कुक्कीे के पास ही बैठूंगा.'
‘ठीक है, कुक्की. तुम्हाबरी खास दोस्ती है तो हम तुम्हेंक उसी के पास जग़ह देंगे. लेकिन हमारी भी एक शर्त है. तुम्हेंन यहां रोज आना पड़ेगा?'
‘काका मारेगा तो?'
‘काका को मैं समझा दूंगा. आगे से वे तुम्हेंा कुछ भी नहीं कहेंगे...' बद्री काका ने आश्वाहसन दिया. लड़का शांत हो ग़या. इसके बाद वे बच्चों की ओर मुड़े, जो मनोयोग़ से उनकी बातें सुन रहे थे-
‘सदानंद आज से ही हमारी कक्षा में बैठेगा और उसको कुक्कीख के बराबर में जग़ह दी जाएगी, क्यों कि कुक्कीव उसकी सबसे अच्छीे दोस्त् है, क्योंो कुक्की ?' कुक्कीद मुस्क,रा
दी. सदानंद की उदासी भी छंटने लगी. बच्चों् में थोड़ी खुसर-पुसर हुई. कुछ देर बाद बद्री काका ने आगे का मोर्चा संभाल लिया-
‘बच्चोभ! अपनी किताब, कॉपी बंद कर लो. अब हम एक नया खेल आरंभ करेंगे. इसे कहते हैं, खेल-खेल में कविता बनाना. मैं एक पंक्तिस दूंगा. उसमें हर बच्चां अपनी और से एक पंक्तिे जोड़ने का प्रयास करेगा. जिसकी पंक्तिम पसंद की जाएगी, वह कविता में जुड़ती चली जाएगी.
कविता पूरी होने पर हम उन सभी बच्चोंी को पुरस्कालर देंगे, जिनकी पंक्तिकयों से वह कविता बनी है. बोलो बच्चोस, क्याा तुम सब इस खेल के लिए तैयार हो? याद रहे कि सर्जनात्मेक होना, मनुष्ययता का अनिवार्य लक्षण है. जो नए ढंग़ से सोचते हैं, वही नया ग़ढ़ते हैं.'
‘हम सभी तैयार हैं?' बच्चोंह का समवेत स्वरर गूंजा.
‘पंक्ति यों को लिखेगा कौन? हाथ उठाकर बताइए!'
‘मैं...!' कई आवाजें एक साथ आईं.
‘कुक्की के दोस्तं ने आज ही से कक्षा में आना शुरू किया है, उसका लेख भी सुंदर है. इसलिए कविता को लिखने की जिम्मेीदारी कुक्कीे निभाएगी, क्योंे कुक्कीह?'
‘जी!' कुक्की ने कॉपी-कलम संभाली. बच्चेै सावधान होकर बैठ ग़ए.
सावधान होना, चेतना को जगाना और अपनी बिखरी हुई शक्तिभयों को एकजुट कर लेना है.
प्राणीमात्र के कल्यारण की इच्छार से किए ग़ए सृजन से बड़ी कोई साधना नहीं है.
शहर तरक्कीय पर था. जिन दिनों उस बिल्डिं ग़ का निर्माण-कार्य आरंभ हुआ, उन दिनों उसके बराबर में खाली मैदान था. मजदूरों के बच्चे. वहां खेलते. धमा-चौकड़ी मचाते. लोग़ अपने मवेशी चराने को ले वहां आते. मग़र कुछ महीनों के बाद उसके आसपास के भूखंडों पर निर्माण कार्य होने लगे. मजदूरों और मिस्त्रियों की संख्याम बढ़ने लगी.
धीरे-धीरे वहां सौ से अधिक परिवारों की अस्था्ई बस्तील बस ग़ई. इतने लोगों को देख छोटे दुकानदार, फेरीवाले उस ओर आने के लिए ललचाने लगे. इस बीच एक चालबाज ठेकेदार ने मैदान के सिरे पर देशी शराब का बेचने का ठेका लेकर वहां दुकान खुलवा दी. जहां ग़रीब मजदूर अपनी परिश्रम की कमाई का बड़ा हिस्साब बरबाद करने लगे.
शराब की दुकान खुलने के बाद आसपास के क्षेत्र में अपराध-दर भी बढ़ी थी. बद्री काका ने पुलिस से शराब के ठेके को वहां से हटवाने का अनुरोध भी किया था. मग़र शराब ठेकेदार के ऊंचे संपर्कों के कारण पुलिस उसपर हाथ डालने से कतरा रही थी. तब बद्री काका ने अदालत की शरण ली. मग़र कानून की पेचीदगियों का सहारा लेकर ठेकेदार
मुकदमे से बच निकला. दबाव बनाने के लिए अपने पैसे के दम पर उसने कुछ भीमकाय गुंडे भी खरीद लिए, जो उसके इशारे पर मरने-मारने के लिए तैयार होकर जाते थे.
ऐसे में ग़रीब मजदूरों को शराब के चंगुल से बचाने का एकमात्र रास्ताु था कि उन्हें उससे होने वाले नुकसान के बारे में बताया जाए. उनमें जाग़रूकता लाई जाए. उन्हेंत बौद्धिक रूप से इतना समर्थ बनाया जाए कि वे अपने भले-बुरे का निर्णय स्वंयं कर सकें. प्रौढ़ शिक्षा बद्री काका के इसी प्रयास का एक हिस्सा थी. पर लोग़ उसमें उतनी रुचि ही नहीं ले रहे थे.
बद्री काका उनकी मजबूरी भी समझते थे. दिन-भर जी-तोड़ परिश्रम के बाद उन्हेंर आराम की जरूरत पड़ती. इसलिए खाना खाकर वे सीधे चारपाई की ओर बढ़ जाते. ठेकेदार के आदमियों ने मजदूरों के दिमाग़ में चतुराईपूर्वक यह बात बिठानी शुरू कर दी थी कि शराब का नशा थकान से मुक्ति दिलाकर, पल-भर में उन्हेंई फिर तरोताजा कर सकता है। मजदूर भी उनके भुलावे में आते जा रहे थे। बद्री काका जानते थे कि इसे रोकने के लिए बड़े आंदोलन की जरूरत है. साथ में समय की भी. यह किस रूप में संभव हो, वे इसी दिशा में सोच रहे थे.
‘गुरुजी, कविता की पहली पंक्तिम क्याे होगी?' बद्री काका को चुप देख, टोपीलाल ने टोका.
‘अरे हां, मैं तो भूल ही ग़या, तुम बाल-कवियों के लिए कविता की पहली पंक्ति तो मुझी को देनी है.' बद्री काका ने कहा, ‘कविता की पहली पंक्तिू है...' बद्री काका एक पल के लिए रुक ग़ए.
‘क्याज....?' बच्चोंं का कौतूहल उनका जोश बन ग़या.
‘कविता की पहली पंक्ति. है-गुटका खाकर थूकें लाला. अब इस कविता को आप सब मिलकर आगे बढ़ाइए.
बच्चेा सोचने लगे. आपस में फुसफुसाने की आवाज भी हुई. सहसा टोपीलाल ने जोड़ा-‘मुंह है या कि गंदा नाला.'
‘इतनी जल्दीह, वाह! तुमने तो सचमुच कमाल कर दिया...अद्‌भुत! अब इससे आगे की पंक्तिि कौन बनाएगा?' बद्री काका ने हर्षातिरेक में कहा.
‘जमकर खाया पान मसाला-ठीक रहेगी गुरुजी? नए-नए आए लड़के सदानंद ने भी उस खेल में हिस्सेंदारी निभाते हुए कहा.
‘बिलकुल ठीक...अब बाकी बच्चोंस में से कोई इसको आगे बढ़ाए.'
‘मुंह में छाला, पेट में छाला.' एक बच्चेस ने जोड़ा जिसे बद्री काका ने हटा दिया-
‘चल सकता है, पर चलताऊ है. कोई बच्चा् इससे भी बेहतर जोड़कर दिखाएगा?'
‘जमकर खाया पानमसाला, हुआ कैंसर पिटा दिवाला.' इस बार कुक्कीी ने कमाल दिखाया.
‘काले धंधे जैसा काला...' बच्चों में कविता ग़ढ़ने की होड़ जैसी मच ग़ई.
‘पानमसाला...पानमसाला.'
‘धोती-कुर्ता सने पीक से...'
‘मुंह में ग़टर छिपाए लाला.'
‘शाबाश बच्चोप, तुम लोग़ तो जीनियस से भी बढ़कर हो.' बद्री काका सचमुच उत्साहहित थे. कविता ग़ढ़ने का उनका प्रयोग़ इतना सफल होगा, बच्चेो उसमें इस उत्सानह से भाग़ लेंगे, इसकी उन्होंकने कल्प ना भी नहीं की थी.
‘माथा पीट रही लालाइन.'
‘अभी वक्त है संभलो लाला.' टोपीलाल की पंक्ति को निराली ने पूरा किया.
‘आई अक्लत कसम फिर खाई.' बद्री काका ने कविता को समापन की ओर ले जाने के लिए नई पंक्तिय सुझाई. इसपर कुक्कीत ने झट से जोड़ दिया.
‘अब न छुएंगे पान मसाला.'
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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