उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Jemsbond
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उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:35

उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर


विनोद की माँ हस्मिती महेन्द्र की माँ राजलक्ष्मी के पास जाकर धरना देने लगी। दोनों एक ही गाँव की थीं, छुटपन में साथ खेली थीं।
राजलक्ष्मी महेन्द्र के पीछे पड़ गई- "बेटा महेन्द्र, इस गरीब की बिटिया का उध्दार करना पड़ेगा। सुना है, लड़की बड़ी सुन्दर है, फिर लिखी-पढ़ी भी है। उसकी रुचियाँ भी तुम लोगों जैसी हैं।
महेन्द्र बोला- "आजकल के तो सभी लड़के मुझ जैसे ही होते हैं।"
राजलक्ष्मी- "तुझसे शादी की बात करना ही मुश्किल है।"
महेन्द्र- "माँ, इसे छोड़कर दुनिया में क्या और कोई बात नहीं है।"
महेन्द्र के पिता उसके बचपन में ही चल बसे थे। माँ से महेन्द्र का बर्ताव साधारण लोगों जैसा न था। उम्र लगभग बाईस की हुई, एम.ए. पास करके डॉक्टरी पढ़ना शुरू किया है, मगर माँ से उसकी रोज-रोज की ज़िद का अन्त नहीं। कंगारू के बच्चे की तरह माता के गर्भ से बाहर आकर भी उसके बाहरी थैली में टँगे रहने की उसे आदत हो गई है। माँ के बिना आहार-विहार, आराम-विराम कुछ भी नहीं हो पाता।
अबकी बार जब माँ विनोदिनी के लिए बुरी तरह उसके पीछे पड़ गई तो महेन्द्र बोला, "अच्छा, एक बार लड़की को देख लेने दो!"
लड़की देखने जाने का दिन आया तो कहा, "देखने से क्या होगा? शादी तो मैं तुम्हारी खुशी के लिए कर रहा हूँ। फिर मेरे अच्छा-बुरा देखने का कोई अर्थ नहीं है।" महेन्द्र के कहने में पर्याप्त गुस्सा था, मगर माँ ने सोचा, "'शुभ-दृष्टि'1 के समय जब मेरी पसन्द और उसकी पसन्द एक हो जाएगी, तो उसका स्वर भी नर्म हो जाएगा।" राजलक्ष्मी ने बेफिक्र होकर विवाह का दिन तय किया। दिन जितना ही क़रीब आने लगा, महेन्द्र का मन उतना ही बेचैन हो उठा। मात्रा दो-चार दिन पहले वह कह बैठा- "नहीं माँ, यह मुझसे हर्गिज न होगा।"
छुटपन से महेन्द्र को हर तरह का सहारा मिलता रहा है। इसलिए उसकी इच्छा सर्वोपरि है। दूसरे का दबाव उसे बर्दाश्त नहीं। अपनी स्वीकृति और दूसरों के आग्रह ने उसे बेबस कर दिया है, इसीलिए विवाह के प्रस्ताव के प्रति नाहक ही उसकी वितृष्णा बढ़ गई और विवाह का दिन नज़दीक आ गया तो उसने एकबारगी 'नाही' कर दी। महेन्द्र का जिगरी दोस्त था बिहारी; वह महेन्द्र को 'भैया' और उसकी माँ को 'माँ' कहा करता था। माँ उसे स्टीमर के पीछे जुड़ी डोंगी- जैसा भारवाही सामान मानती थीं और वैसी ही उस पर ममता भी रखती थीं। वे बिहारी से बोलीं- "बेटे, यह तो अब तुम्हें ही करना है, नहीं तो उस बेचारी लड़की...."
बिहारी ने हाथ जोड़कर कहा- "माँ, यह मुझसे न होगा। अच्छी न लगी कहकर महेन्द्र जो मिठाई छोड़ देता है वह मैंने बहुत खाई; मगर लड़की के बारे में ऐसा नहीं हो सकता।"
राजलक्ष्मी ने सोचा, 'भला बिहारी विवाह करेगा! उसे तो बस एक महेन्द्र की पड़ी है, बहू लाने का ख्याल भी नहीं आता उसके मन में।'
यह सोचकर बिहारी के प्रति उनकी कृपा-मिश्रित ममता कुछ और बढ़ गई।
विनोदिनी के पिता कुछ ख़ास धनी न थे, परन्तु अपनी इकलौती बेटी को मिशनरी मेम रखकर बड़े जतन से पढ़ाया-लिखाया। इतना ही नहीं घर के काम में भी चाक-चौबंद किया। वे गुजर गए और बेचारी विधवा माँ बेटी के विवाह के लिए परेशान हो गई। पास में रुपया-पैसा नहीं, ऊपर से लड़की की उम्र भी ज़्यादा।
आखिर राजलक्ष्मी ने अपने मैके में गाँव के एक रिश्ते के भतीजे से विनोदिनी का विवाह करा दिया।
कुछ ही दिनों में वह विधवा हो गई। महेन्द्र ने हँसकर कहा, "गनीमत थी कि शादी नहीं की।"
कोई तीन साल बाद माँ-बेटे में फिर एक बात हो रही थी।
"बेटा, लोग तो मेरी ही शिकायत करते हैं।"
"क्यों भला, तुमने लोगों का ऐसा क्या बिगाड़ा है?"
"बहू के आने से बेटा पराया न हो जाए, मैं इसी डर से तेरी शादी नहीं करती- लोग यही कहा करते हैं।"
महेन्द्र ने कहा, "डर तो होना ही चाहिए। मैं माँ होता, तो जीते-जी लड़के का विवाह न करता। लोगों की शिकायतें सुन लेता।"
माँ हँसकर बोली- "सुनो, जरा इसकी बातें सुन लो।"
महेन्द्र बोला- "बहू तो आकर लड़के को अपना बना ही लेती है। फिर इतना कष्ट उठाने वाली माँ अपने-आप दूर हो जाती है। तुम्हें यह चाहे जैसा लगे मुझे तो ठीक नहीं लगता।"
राजलक्ष्मी ने मन-ही-मन गद्गद होकर हाल ही आई अपनी विधवा देवरानी से कहा, "सुनो मँझली, जरा महेन्द्र की सुनो! कहीं बहू आकर माँ पर हावी न हो जाए, इसी डर से वह विवाह नहीं करना चाहता। ऐसी बात कभी सुनी है तुमने?"
चाची बोलीं, "यह तुम्हारी ज्यादती है बेटे! जबकि जो बात हो, वही अच्छी लगती है। माँ का दामन छोड़कर अब घर-गृहस्थी बसाने का समय आ गया है। अब नादानी अच्छी नहीं लगती उल्टी शर्म आती है।"
राजलक्ष्मी को यह बात अच्छी नहीं लगी। इस सिलसिले में उन्होंने जो कुछ कहा, वह जैसा हो मगर स्वमर भीगा तो नहीं था। बोलीं- "मेरा बेटा अगर और लड़कों की अपेक्षा अपनी माँ को ज़्यादा स्नेह करता है, तो तुम्हें शर्म क्यों लगती है, मँझली बहू? कोख का लड़का होता तो समझ में आता।"
राजलक्ष्मी को लगा, 'निपूती बेटे के सौभाग्यवाली सेईर्ष्या कर रही है।'
मँझली बहू ने कहा- "तुमने बहू लाने की चर्चा चलाई इसीलिए यह बात निकल गई, वर्ना मुझे क्या हक है?"
राजलक्ष्मी बोलीं- "मेरा बेटा अगर विवाह नहीं करता, तो तुम्हारी छाती क्यों फटती है! ठीक तो है, लड़के की जैसे आज तक देख-भाल करती आई हूँ, आइन्दा भी कर लूँगी- इसके लिए और किसी की मदद की ज़रूरत न होगी।"
मँझली बहू आँसू बहाती चुपचाप चली गई। महेन्द्र को मन-ही-मन इससे चोट पहुँची। कॉलेज से कुछ पहले ही लौटकर वह अपनी चाची के कमरे में दाखिल हुआ।
वह समझ रहा था कि चाची ने जो कुछ कहा था, उसमें सिवाय स्नेह के और कुछ न था। और उसे यह भी पता था कि चाची की एक भानजी है, जिसके माता-पिता नहीं हैं। वे चाहती हैं कि महेन्द्र से उसका ब्याह हो जाए। हालाँकि शादी करना उसे पसन्द न था। फिर भी चाची की यह आंतरिक इच्छा उसे स्वाभाविक और करुण लगती है। उसे मालूम था कि उनकी कोई संतान नहीं है।
महेन्द्र कमरे में पहुँचा, तो दिन ज़्यादा नहीं रह गया था। चाची अन्नपूर्णा खिड़की पर माथा टिकाए उदास बैठी थी। बगल में कमरे में खाना ढका रखा था। शायद उन्होंने खाया नहीं।
बहुत थोड़े में ही महेन्द्र की आँखें भर आतीं। चाची को देखकर उसकी आँखें छलछला उठीं। क़रीब जाकर स्निग्ध स्वर से बोला- "चाची!"
अन्नपूर्णा ने हँसने की कोशिश की। कहा, "आ बेटे, बैठ!"
महेन्द्र का मन भीगा हुआ था। चाची को दिलासा देने के विचार से वह अचानक बोल उठा, "अच्छा चाची, तुमने अपनी भानजी की बात बताई थी, एक बार दिखा सकती हो?" कहकर महेन्द्र डर गया।
अन्नपूर्णा हँसकर बोलीं- "क्यों? शादी के लड्डू फूट रहे हैं बेटा!"
महेन्द्र झटपट बोल उठा- "नहीं-नहीं, अपने लिए नहीं, मैंने बिहारी को राज़ी किया है। लड़की देखने का कोई दिन तय कर दो!"
अन्नपूर्णा बोलीं- "अहा, उस बेचारी का ऐसा भाग्य कहाँ? भला उसे बिहारी-जैसा लड़का नसीब हो सकता है!"
महेन्द्र चाची के कमरे से निकला कि दरवाज़े पर माँ से मुलाकात हो गई। राजलक्ष्मी ने पूछा, "क्यों रे, क्या राय-मशविरा कर रहा था?"
महेन्द्र बोला- "राय-मशविरा नहीं, पान लेने गया था?"
माँ ने कहा- "तेरा पान तो मेरे कमरे में रखा है।"
महेन्द्र ने कुछ नहीं कहा। चला गया।
राजलक्ष्मी अन्दर गई और अन्नपूर्णा की रुलाई से सूजी आँखें देखकर लमहे-भर में बहुत सोच लिया। छूटते ही फुफकार छोड़ी- "क्यों मँझली बहू महेन्द्र के कान भर रही थी, है न?"
और बिना कुछ सुने तत्काल तेज़ी से निकल गई।
2
कन्या देखने की बात महेन्द्र ने की ज़रूर मगर वह भूल गया फिर भी अन्नपूर्णा नहीं भूली। उन्होंने लड़की के अभिभावक, उसके बड़े चाचा को जल्दी में श्यामबाज़ार पत्र भेजा और एक दिन तय कर लिया।
महेन्द्र ने जब सुना कि देखने का दिन पक्का हो गया है तो बोला- "चाची, इतनी जल्दी क्यों की! बिहारी से तो मैंने अभी तक ज़िक्र नहीं किया।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "ऐसा भी होता है भला! अब अगर तुम लोग न जाओ तो वे क्या सोचेंगे?"
महेन्द्र ने बिहारी को बुलाकर सारी बातें बताईं कहा-"चलो तो सही, लड़की न जँची, तो तुम्हें मजबूर नहीं किया जाएगा।"
बिहारी बोला- "यह मैं नहीं कह सकता। चाची की भानजी को देखने जाना है। देखकर मेरे मुँह से यह बात हर्गिज न निकल सकेगी कि लड़की मुझे पसन्द नहीं।"
महेन्द्र ने कहा- "फिर तो ठीक ही है।"
बिहारी बोला- "लेकिन तुम्हारी तरफ से यह ज्यादती है, महेन्द्र भैया! खुद तो हल्के हो जाएँ और दूसरे के कन्धे पर बोझ रख दें, यह ठीक नहीं। अब चाची का जी दुखाना मेरे लिए बहुत कठिन है।"
महेन्द्र कुछ शर्मिन्दा और नाराज होकर बोला-"आखिर इरादा क्या है तुम्हारा?"
बिहारी बोला- "मेरे नाम पर जब तुमने उन्हें उम्मीद दिलाई है तो मैं विवाह करूँगा। यह देखने जाने का ढोंग बेकार है।"
बिहारी अन्नपूर्णा की देवी की भांति भक्ति करता था। आखिर अन्नपूर्णा ने खुद बिहारी को बुलवाकर कहा- "ऐसा भी कहीं होता है, बेटे! लड़की देखे बिना ही विवाह करोगे। यह हर्गिज न होगा। लड़की पसन्द न आए तो तुम हर्गिज 'हाँ' नहीं करोगे। समझे। तुम्हें मेरी कसम....!"
जाने के दिन कॉलेज से लौटकर महेन्द्र ने माँ से कहा- "जरा मेरा वह रेशमी कुरता और ढाका वाली धोती निकाल दो!"
माँ ने पूछा- "क्यों, कहाँ जाना है?"
महेन्द्र बोला- "काम है, तुम ला दो, फिर बताऊँगा।"
महेन्द्र थोड़ा सँवरे बिना न रह सका। दूसरे के लिए ही क्यों न हो, लड़की का मसला जवानी में सभी से थोड़ा सँवार करा ही लेता है।
दोनों दोस्त लड़की देखने निकल पड़े।
लड़की के बड़े चाचा अनुकूल बाबू ने अपनी कमाई से अपना बाग वाला तिमंजिला मकान मुहल्ले में सबसे ऊँचा बना रखा है।
गरीब भाई की माँ-बाप-विहीना बेटी को उन्होंने अपने ही यहाँ रखा है। उसकी मौसी अन्नपूर्णा ने कहा था, मेरे पास रहने दो। इससे खर्च की कमी ज़रूर होती, लेकिन गौरव की कमी के डर से अनुकूल राज़ी न हुए। यहाँ तक कि मुलाकात के लिए भी कभी उसे मौसी के यहाँ नहीं जाने देते थे। अपनी मर्यादा के बारे में इतने ही सख्त थे वे।
लड़की के विवाह की चिन्ता का समय आया। लेकिन इन दिनों विवाह के विषय में 'यादृशी भावना यस्य सिध्दर्भवति तादृशी' वाली बात लागू नहीं होती। चिन्ता के साथ-साथ लागत भी लगती। परन्तु दहेज की बात उठते ही अनुकूल कहते, 'मेरी भी तो अपनी लड़की है, अकेले मुझसे कितना करते बनेगा।' इसी तरह दिन निकलते जा रहे थे। ऐसे में बन-सँवरकर खुशबू बिखेरते हुए रंग-भूमि में अपने दोस्त के साथ महेन्द्र ने प्रवेश किया।
चैत का महीना। सूरज डूब रहा था। दुमंजिले का दक्षिणी बरामदा चिकने चीनी टाइलों का बना, उसी के एक ओर दोनों मेहमानों के लिए फल-फूल, मिठाई से भरी चाँदी की तश्तरियाँ रखी गईं। बर्फ़ के पानी-भरे गिलास जैसे ओस-बूँदों से झलमल। बिहारी के साथ महेन्द्र सकुचाते हुए खाने बैठा। नीचे माली पौधों में पानी डाल रहा था और भीगी मिट्टी की सोंधी सुगन्ध लिये दक्खिनी बयार महेन्द्र की धप-धप धुली चादर के छोर को हैरान कर रही थी। आसपास के दरवाज़े के झरोखों की ओट से कभी-कभी दबी हँसी, फुसफुसाहट, कभी-कभी गहनों की खनखनाहट सुनाई दे रही थी।
खाना खत्म हो चुका तो अन्दर की तरफ देखते हुए अनुकूल बाबू ने कहा- "चुन्नी, पान तो ले आ, बेटी!"
जरा देर में संकोच से पीछे का दरवाज़ा खुल गया और सारे संसार की लाज से सिमटी एक लड़की हाथ में पानदान लिये अनुकूल बाबू के पास आकर खड़ी हुई। वे बोले, "शर्म काहे की बिटिया, पानदान उनके सामने रखो!"
उसने झुककर काँपते हुए हाथों से मेहमानों की बगल में पानदान रख दिया। बरामदे के पश्चिमी छोर से डूबते हुए सूरज की आभा उसके लज्जित मुखड़े को मंडित कर गई। इसी मौके से महेन्द्र ने उस काँपती हुई लड़की के करुण मुख की छवि देख ली।
बालिका जाने लगी। अनुकूल बाबू बोले- "ज़रा ठहर जा, चुन्नी! बिहारी बाबू, यह है छोटे भाई अपूर्व की लड़की, अपूर्व तो चल बसा, अब मेरे सिवाय इसका कोई नहीं।" और उन्होंने एक लम्बी उसाँस ली।
महेन्द्र का मन पसीज गया। उसने एक बार फिर लड़की की तरफ देखा।
उसकी उम्र साफ-साफ कोई न बताता। सगे-सम्बन्धी कहते, बारह-तेरह होगी। यानी चौदह-पन्द्रह होने की सम्भावना ही ज़्यादा थी। लेकिन चूँकि दया पर चल रही थी इसलिए सहमे से भाव ने उसके नवयौवन के आरम्भ को ज़ब्त कर रखा था।
महेन्द्र ने पूछा- "तुम्हारा नाम?"
अनुकूल बाबू ने उत्साह दिया- "बता बेटी, अपना नाम बता!"
अपने अभ्यस्त आदेश-पालन के ढंग से झुककर उसने कहा- "जी, मेरा नाम आशालता है।"
"आशा!" महेन्द्र को लगा, नाम बड़ा ही करुण और स्वर बड़ा कोमल है।
दोनों मित्रों ने बाहर सड़क पर आकर गाड़ी छोड़ दी। महेन्द्र बोला- "बिहारी, इस लड़की को तुम हर्गिज मत छोड़ो?"
बिहारी ने इसका कुछ साफ़ जवाब न दिया। बोला-"इसे देखकर इसकी मौसी याद आ जाती है। ऐसी ही भली होगी शायद!"
महेन्द्र ने कहा- "जो बोझा तुम्हारे कन्धे पर लाद दिया, अब वह शायद वैसा भारी नहीं लग रहा है।"
बिहारी ने कहा- "नहीं, लगता है तो ढो लूँगा।"
महेन्द्र बोला- "इतनी तकलीफ उठाने की क्या ज़रूरत है? तुम्हें बोझा लग रहा हो तो मैं उठा लूँ।"
बिहारी ने गम्भीर होकर महेन्द्र की तरफ ताका। बोला- "सच? अब भी ठीक-ठीक बता दो! यदि तुम शादी कर लो तो चाची कहीं ज़्यादा खुश होंगी- उन्हें हमेशा पास रखने का मौक़ा मिलेगा।"
महेन्द्र बोला- "पागल हो तुम! यह होना होता तो कब का हो जाता।"
बिहारी ने कोई एतराज न किया। चला गया और महेन्द्र भी यहाँ-वहाँ भटककर घर पहुँच गया।
माँ पूरियाँ निकाल रही थीं। चाची तब तक अपनी भानजी के पास से लौटकर नहीं आई थीं।
महेन्द्र अकेला सूनी छत पर गया और चटाई बिछाकर लेट गया। कलकत्ता की ऊँची अट्टालिकाओं के शिखरों पर शुक्ला सप्तमी का आधा चाँद टहल रहा था। माँ ने खाने के लिए बुलाया, तो महेन्द्र ने अलसाई आवाज़ में कहा- "छोड़ो, अब उठने को जी नहीं चाहता।"
माँ ने कहा- "तो यहीं ले आऊँ?"
महेन्द्र बोला- "आज नहीं खाऊँगा। मैं खाकर आया हूँ।"
माँ ने पूछा- "कहाँ खाने गया था?"
महेन्द्र बोला- "बाद में बताऊँगा।"
वे लौटने लगीं तो थोड़ा सोचते हुए महेन्द्र ने कहा-"माँ! खाना यहीं ले आओ।"
3
रात में महेन्द्र ठीक से सो नहीं पाया। आज ही वह बिहारी के घर पहुँच गया। बोला- "भई यारो, मैंने बड़ी ध्या न से सोचा ओर देखा- कि चाची यही चाहती है कि शादी मैं ही करूँ।"
बिहारी बोला- "इसके लिए सोचने की ज़रूरत नहीं थी। यह बात तो वे खुद कई बार कह चुकी हैं।"
महेन्द्र बोला- "तभी तो कहता हूँ, मैंने आशा से विवाह न किया तो उन्हें दु:ख होगा।"
बिहारी बोला- "हो सकता है!"
महेन्द्र ने कहा, "मेरा ख्याल है, यह तो ज्यादती होगी।"
"हाँ! बात तो ठीक है।" बिहारी ने कहा- "यह बात थोड़ी देर से आपकी समझ में आई। कल आ जाता तो अच्छा होता।"
महेन्द्र- "एक दिन बाद ही आया, तो क्या बुरा हो गया।"
विवाह की बात पर मन की लगाम को छोड़ना था कि महेन्द्र के लिए धीरज रखना कठिन हो गया। उसके मन में आया- इस बारे में बात करने का तो कोई अर्थ नहीं है। शादी हो ही जानी चाहिए।
उसने माँ से कहा- "अच्छा माँ, मैं विवाह करने के लिए राजी हूँ।"
माँ मन-ही-मन बोलीं- "समझ गई, उस दिन अचानक क्यों मँझली बहू अपनी भानजी को देखने चली गई। और क्यों महेन्द्र बन-ठनकर घर से निकला।"
उनके अनुरोध की बार-बार उपेक्षा होती रही और अन्नपूर्णा की साजिश कारगर हो गई, इस बात से वह नाराज़ हो उठीं। कहा- "अच्छा, मैं अच्छी-सी लड़की को देखती हूँ।"
आशा का ज़िक्र करते हुए महेन्द्र ने कहा- "लड़की तो मिल गई।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "उस लड़की से विवाह नहीं हो सकता, यह मैं कहे देती हूँ।"
महेन्द्र ने बड़े संयत शब्दों में कहा- "क्यों माँ, लड़की बुरी तो नहीं है।"
राजलक्ष्मी- "उसके तीनों कुल में कोई नहीं। ऐसी लड़की से विवाह रचकर कुटुम्ब को सुख भी न मिल सकेगा।"
महेन्द्र- "कुटुम्ब को सुख मिले न मिले लड़की मुझे खूब पसन्द है।" उससे शादी न हुई तो मैं दुखी हो जाऊँगा।"
लड़के की ज़िद से राजलक्ष्मी और सख्त हो गईं। वह अन्नपूर्णा से भिड़ गईं- "एक अनाथ से विवाह कराकर तुम मेरे लड़के को फँसा रही हो। यह हरकत है।"
अन्नपूर्णा रो पड़ी- "उससे तो शादी की कोई बात ही नहीं हुई, उसने तुम्हें क्या कहा, इसकी मुझे जरा भी खबर नहीं।"
राजलक्ष्मी इसका रत्ती- भर यकीन न कर सकीं।
अन्नपूर्णा ने बिहारी को बुलवाया और आँसू भरकर कहा- "तय तो सब तुमसे हुआ था, फिर तुमने पासा क्यों पलट दिया? मैं कहे देती हूँ शादी तो तुम्हें ही करनी पड़ेगी। यह बेड़ा तुम न पार करोगे तो मुझे बड़ी शर्मिन्दगी उठानी होगी। वैसे लड़की अच्छी है।"
बिहारी ने कहा- "चाची, तुम्हारी बात मंजूर है। वह तुम्हारी भानजी है, फिर मेरे 'ना' करने की कोई बात ही नहीं। लेकिन महेन्द्र..."
अन्नपूर्णा बोलीं- "नहीं-नहीं बेटे, महेन्द्र से उसका विवाह किसी भी हालत में न होगा। यकीन मानो, तुमसे विवाह हो, तभी मैं ज़्यादा निश्चिंत हो सकूँगी। महेन्द्र से रिश्ता हो यह मैं चाहती भी नहीं।"
बिहारी बोला- "तुम्हीं नहीं चाहतीं तो कोई बात नहीं।"
और वह राजलक्ष्मी के पास जाकर बोला- "माँ, चाची की भानजी से मेरी शादी पक्की हो गई। सगे-सम्बन्धियों में तो कोई महिला है नहीं इसलिए मैं ही खबर देने आया हूँ।"
राजलक्ष्मी- "अच्छा! बड़ी खुशी हुई बिहारी, सुनकर। लड़की बड़ी भली है। तेरे लायक। इसे हाथ से जाने मत देना!"
बिहारी- "हाथ से बाहर होने का सवाल ही क्या! खुद महेन्द्र भैया ने लड़की पसन्द करके रिश्ता पक्का किया है।"
इन झंझट से महेन्द्र और भी उत्तेजित हो गया। माँ और चाची से नाराज़ होकर वह मामूली-से छात्रावास में जाकर रहने लगा।
राजलक्ष्मी रोती हुई अन्नपूर्णा के कमरे में पहुँचीं; कहा- "मँझली बहू, लगता है, उदास होकर महेन्द्र ने घर छोड़ दिया, उसे बचाओ!"
अन्नपूर्णा बोली- "दीदी, धीरज रखो, दो दिन के बाद गुस्सा उतर जाएगा।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "तुम उसे जानती नहीं बहन, वह जो चाहता है, न मिले तो कुछ भी कर सकता है। जैसे भी हो, अपनी बहन की लड़की से...."
अन्नपूर्णा- "भला यह कैसे होगा दीदी, बिहारी से बात लगभग पक्की हो चुकी।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "हो चुकी, तो टूटने में देर कितनी लगती है?"
और उन्होंने बिहारी को बुलवाया। कहा- "तुम्हारे लिए मैं दूसरी लड़की ढूँढ़ देती हूँ- मगर इससे तुम्हें बाज आना पड़ेगा।"
बिहारी बोला- "नहीं माँ, यह नहीं होगा। सब तय हो चुका है।"
राजलक्ष्मी फिर अन्नपूर्णा के पास गईं। बोलीं- "मेरे सिर की कसम मँझली, मैं तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ... तुम्हीं बिहारी से कहो! तुम कहोगी तो बिगड़ी बन जाएगी।" आखिर अन्नपूर्णा ने बिहारी से कहा- "बेटा, तुमसे कुछ कहने का मुँह नहीं है, मगर लाचारी है क्या करूँ। आशा को तुम्हें सौंपकर ही मैं निश्चिंत होती, मगर क्या बताऊँ, सब तो तुम्हें पता है ही।"
बिहारी- "समझ गया। तुम जो हुक्म करोगी, वही होगा। लेकिन फिर कभी किसी से विवाह करने का मुझसे आग्रह मत करना!"
बिहारी चला गया। अन्नपूर्णा की आँखें छलछला गईं। महेन्द्र का अमंगल न हो, इस आशंका से उन्होंने आँखें पोंछ लीं। बार-बार दिल को दिलासा दिया- "जो हुआ, अच्छा ही हुआ।"
और इस तरह राजलक्ष्मी- अन्नपूर्णा- महेन्द्र में किल-किल चलते-चलते आखिर विवाह का दिन आया। रोशनी हँसती हुई जली, शहनाई उतनी ही मधुर बजी जितनी वह बजा करती है। यानी उसके दिल के साथ कोई न था।
सज-सँवरकर लज्जित और मुग्ध-मन आशा अपनी नई दुनिया में पहली बार आई। उसके कंपित कोमल हृदय को पता ही न चला कि उसके इस बसेरे में कहीं काँटा है। बल्कि यह सोचकर भरोसे और आनन्द से उसके सारे ही संदेह जाते रहे कि इस दुनिया में एकमात्र माँ- जैसी अपनी मौसी के पास जा रही है।
विवाह के बाद राजलक्ष्मी ने कहा- "मैं कहती हूँ, अभी कुछ दिन बहू अपने बड़े चाचा के घर ही रहे।"
महेन्द्र ने पूछा- "ऐसा क्यों, माँ?"
माँ ने कहा- "तुम्हारा इम्तहान है। पढ़ाई-लिखाई में रुकावट पड़ सकती है।"
महेन्द्र बोला- "आखिर मैं कोई नन्हा-नादान हूँ। अपने भले-बुरे की समझ नहीं मुझे?"
राजलक्ष्मी- "जो हो, साल-भर की ही तो बात है।"
महेन्द्र ने कहा- "इसके माँ-बाप रहे होते, तो मुझे कोई एतराज न होता लेकिन चाचा के यहाँ इसे मैं नहीं छोड़ सकता।"
राजलक्ष्मी-(अपने आप) "बाप रे आप ही मालिक, सास कोई नहीं! कल शादी और आज ही इतनी हमदर्दी! आखिर हमारी भी तो शादी हुई थी। मगर तब ऐसी बेहयाई न थी।"
महेन्द्र ने दृढ़ता से कहा- "तुम बिल्कुल मत सोचो, माँ! इम्तहान में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।"
4
आखिर राजलक्ष्मी असीम उत्साह से बहू को गृहस्थी के काम-काज सिखाने में जुट गई। भण्डार रसोई और पूजा-घर में आशा के दिन कटने लगे, रात को अपने साथ सुलाकर वह उसके आत्मीय बिछोह की कमी को पूरा करने लगीं।
काफ़ी सोच-समझकर अन्नपूर्णा आशा से दूर ही रहा करतीं। कोई अभिभावक जब खुद सारी ईख का रस चूसने लगता है, तब निराश बच्चे की रंजिश कम नहीं होती। महेन्द्र की हालत भी वैसी ही हो गई। उसकी आँखों के सामने ही नवयुवती वधू का सारा मीठा रस गिरस्ती के कामों में निचुड़ता रहे, यह भला कैसे सहा जा सकता है।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:36

अन्नपूर्णा जानती थीं कि राजलक्ष्मी ज्यादती कर रही है। फिर भी उन्होंने कहा- "क्यों बेटे, बहू को गृहस्थी के धन्धे सिखाए जा रहे हैं; अच्छा ही तो है। आजकल की लड़कियों की तरह उपन्यास पढ़ना, कार्पेट बुनना और सिर्फ बाबू बने रहना क्या अच्छा है?"
महेन्द्र उत्तेजित होकर बोला- "आजकल की लड़कियाँ आजकल की लड़कियों की तरह ही रहेंगी। वह चाहे भली हों, चाहे बुरी। मेरी स्त्री अगर मेरी ही तरह उपन्यास पढ़कर रस ले सके तो इसमें क्या बुरी बात है। यह न तो परिहास की बात है न पछतावे की।"
अन्नपूर्णा के कमरे में बेटे की आवाज़ सुनकर राजलक्ष्मी सब छोड़कर आ गईं। रूखे स्वर में बोलीं- "क्या मनसूबे बनाए जा रहे हैं?"
महेन्द्र ने वैसे ही उत्तेजित भाव से कहा, "मनसूबे क्या होंगे, बहू को घर में नौकरानी की तरह काम मैं न करने दूँगा।"
माँ ने अपनी तीखी जलन को दबाकर बड़े ही तीखे धीर भाव से कहा- "आखिर उससे क्या कराना होगा?"
महेन्द्र बोला- "मैं उसे लिखना-पढ़ना सिखाऊँगा।"
राजलक्ष्मी कुछ न बोलीं। तेज़ी से क़दम बढ़ाती हुई चली गईं और बहू का हाथ पकड़कर खींचती हुई महेन्द्र के पास लाकर बोलीं- "यह रही तुम्हारी बहू, सिखाओ लिखना-पढ़ना!"
और अन्नपूर्णा की तरफ पलटकर गले में अचरा डालकर कहा- "माफ करो मँझली बहू, माफ करो! तुम्हारी भानजी की मर्यादा मेरी समझ में न आई। मैंने इसके कोमल हाथों में हल्दी लगाई है। अब तुम इसे धो-पोंछकर परी बनाकर रखो- महेन्द्र को सौंपो- ये आराम से लिखना-पढ़ना सीखे, नौकरानी का काम मैं करूँगी।"
राजलक्ष्मी अपने कमरे में चली गईं और दरवाज़ा ज़ोर से बन्द कर लिया।
क्षोभ से अन्नपूर्णा ज़मीन पर बैठ गई। अचानक यह क्या हो गया, आशा के पल्ले नहीं पड़ा कि माजरा क्या है? महेन्द्र नाराज़ हो गया। मन-ही-मन बोला- "जो हुआ सो हुआ, अब से अपनी स्त्री का भार अपने हाथों में लेना पड़ेगा, नहीं तो जुल्म होगा।"
मन और कर्तव्य बोध दोनों मिल जाएँ तो अच्छा लगता है। पत्नी की उन्नति के चक्कर में महेन्द्र रम गया। न तो उसे काम का ध्याहन रहा न लोगों की परवाह।
घमण्डी राजलक्ष्मी ने अपने- आप कहा- 'अब अगर महेन्द्र बीवी को लेकर मेरे दरवाज़े पर सिर पीटकर जान दे दे तो भी मैं मुड़कर नहीं देखूँगी। देखती हूँ, माँ को छोड़कर बीवी के साथ कैसे रहेगा?'
दिन बीतने लगे। राजलक्ष्मी के दरवाज़े पर किसी अनुतप्त के पाँवों की आहट न सुनाई पड़ी।
राजलक्ष्मी ने अपने मन में तय किया- 'अच्छा माफी माँगने आएगा तो माफ कर दूँगी, नहीं तो कहाँ जाएगा। बहुत दुखी हो जाएगा बेचारा। लेकिन माफी कोई माँगे तभी तो आप माफ कर सकते हैं। कोई माफी के लिए दहलीज पर आया ही नहीं। राजलक्ष्मी ने सोचा कि मैं ही जाकर उसे क्षमा कर आऊँगी। लड़का रूठ गया है तो क्या माँ भी रूठी रहे!'
तिमंजिले पर एक कोने के छोटे-से कमरे में महेन्द्र सोया करता था, वही उसकी पढ़ने की जगह भी थी। इधर कई दिनों से माँ ने उसके कपड़े सहेजने, बिस्तर बिछाने, झाड़ने-बुहारने में कोई दिलचस्पी नहीं ली। मातृ-स्नेह के जिन कर्तव्यों की वह आदी थीं, बहुत दिनों तक उन कामों को न करने से वही दुखी हो गई। उस दिन दोपहर को एकाएक मन में आया, 'अभी महेन्द्र कॉलेज गया होगा, इसी बीच उसका कमरा ठीक कर आऊँ, लौटकर वह समझ जाएगा कि कमरे से माँ का हाथ फिरा है।'
सीढ़ियों से राजलक्ष्मी ऊपर गई। महेन्द्र के कमरे में दरवाज़े का एक पल्ला खुला था। सामने जाते ही मानो काँटा चुभ गया। चौंककर ठिठक गई। देखा, फर्श पर महेन्द्र लेटा है और दरवाज़े की तरफ पीठ किए बहू धीरे-धीरे उसके पाँव सहला रही है। दोपहर की तेज़ धूप में खुले कमरे में दाम्पत्य-लीला देखकर राजलक्ष्मी शर्म और धिक्कार से सिमट गई और चुपचाप नीचे उतर आई।
5
कुछ दिन सूखा पड़ने से नाज के जो पौधे सूखकर पीले पड़ जाते हैं, बारिश आने पर वे तुरन्त बढ़ जाते हैं। आशा के साथ भी ऐसा ही हुआ। जहाँ उसका रक्त सम्बन्ध था, वहाँ वह कभी भी आत्मीयता का दावा न कर सकी, आज पराए घर में जब उसे बिन माँगे हक मिला, तो उसने इसे लेने में देर न की।
उस दिन दोपहर में राजलक्ष्मी नीचे उतर आई। उसने सोचा अन्नपूर्णा को जलाया जाए। बोली- "अरी ओ मँझली, जाकर देख ज़रा तुम्हारी नवाब की बेटी नवाब के घर से कैसा पाठ पढ़कर आई है! घर के बड़े-बूढ़े आज होते तो ।"
अन्नपूर्णा ने कातर होकर कहा- "दीदी, अपनी बहू को तुम शिक्षा दो, या हुकूमत चलाओ मुझे क्या? मुझसे क्यों कह रही हो।"
राजलक्ष्मी धनुष की तनी डोरी-सी टंकार उठी- "हूँ, मेरी बहू! जब तक तुम मंत्री हो, वह मुझे कैसे मान सकती है!"
यह सुनकर अन्नपूर्णा पैर पटकती हुई महेन्द्र के कमरे में पहुँच गई। आशा से बोली- "तू इस तरह से मेरा सिर नीचा करेगी री, मुँहजली! शर्म नहीं, हया नहीं, समय-असमय का ख्याल नहीं, बूढ़ी सास पर सारा गृहस्थी का बोझ डालकर तुम यहाँ आराम फरमा रही हो? मेरा ही नसीब जला कि मैं तुझे इस घर में ले आई।"
कहते-कहते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे और आशा भी सिर झुकाए आँचल के छोर को नाखून से नोंचती हुई चुपचाप रोने लगी।
महेन्द्र ने कहा- "यह देखो, इसके लिए मैं स्लेट, बही, किताब सब ख़रीद लाया हूँ। इसे मैं लिखना-पढ़ना सिखाऊँगा, चाहे लोग मेरी निन्दा करें।"
अन्नपूर्णा बाली- "ठीक है, लेकिन यह क्या तमाम दिन? शाम के बाद घण्टा-आधा घण्टा पढ़ लिया बस! घण्टा-आधा घण्टा पढ़ना ही तो काफ़ी होगा।"
महेन्द्र- "इतना आसान नहीं है चाची, पढ़ने-लिखने में समय लगता है।"
अन्नपूर्णा खीझकर चली गई। आशा भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। महेन्द्र दरवाज़ा रोककर खड़ा हो गया-उसने आशा की गीली आँखों की विनती न मानी। वैसे आशा को नहीं लगता कि लिखना-पढ़ना जरूरी भी है फिर भी वह अपनी पति की खातिर किताबों पर एकबारगी झुककर सिर हिलाती हुई बताई चीज़ें याद करती रहती। कमरे के कोने में छोटी-सी मेज़ पर डॉक्टरी की किताब खोले मास्टर साहब कुर्सी पर बैठे होते, बीच-बीच में कनखियों से छात्रा को देखते रहते। अचानक अपनी किताब बन्द करके आवाज़ दी- "चुन्नी!" यह आशा का ही घरेलू नाम था।
चौंककर आशा ने उधर देखा। वह बोला, "जरा लाओ तो किताब देखूँ, कहाँ पढ़ रही हो? आशा को लगा जाँच होगी और उसमें पास होने की उम्मीद कम ही थी। आगे-आगे पाठ और पीछे सपाट कुछ यही हाल था। एक हाथ से उसकी कमर को कसकर लपेटकर दूसरे हाथ से किताब पकड़कर पूछा- "आज कितना पढ़ गई- देखूँ तो।"
जितनी पंक्तियों पर वह सरसरी निगाह फेर गई थी, दिखा दिया। महेन्द्र ने अचरज से कहा- "ओह, इतना पढ़ गई! मैंने कितना पढ़ा, बताऊँ?"
और अपनी किताब के किसी अध्याईय का शीर्षक-भर दिखा दिया। अचरज से आँखें बड़ी-बड़ी करके आशा ने पूछा- "तो इतनी देर से कर क्या रहे थे?"
उसकी ठोढ़ी पकड़कर महेन्द्र ने कहा- "मैं किसी के बारे में सोच रहा था; और जिसके बारे में सोच रहा था, वह दीमक का वर्णन पढ़ने में मशगूल थी!"
इस बे-वजह शिकायत का सटीक जवाब आशा न दे सकी, लेकिन प्रकम की प्रतियोगिता में झूठी हार मान लेनी पड़ती है।
ऐसे ही एक रोज़ महेन्द्र मौजूद नहीं था। मौक़ा पाकर आशा पढ़ने बैठ गई कि अचानक कहीं से आकर उसने आँखें मींच लीं और किताब छीनकर कहने लगा, "बे-रहम, मैं नहीं होता हूँ तो तुम मेरे बारे में सोचती तक नहीं। किताबों में डूब जाती हो!"
आशा ने कहा- "तुम मुझे गँवार बनाए रखोगे?"
महेन्द्र ने कहा- "तुम्हारी कृपा से अपनी ही विद्या कौन आगे बढ़ रही है!" बात आशा को लग गई। फौरन चल देने का उपक्रम करती बोली- "मैंने तुम्हारी पढ़ाई में ऐसी कौन-सी रुकावट डाली है?"
उसका हाथ थामकर महेन्द्र ने कहा- "यह तुम नहीं समझोगी? मुझे भूल कर तुम जितनी आसानी से पढ़-लिख लेती हो, तुम्हें भूलकर उतनी आसानी से मैं नहीं पढ़-लिख पाता।"
शिक्षक ही जब शिक्षा की सबसे बड़ी बाधा हो तो छात्रा की क्या मजाल कि विद्या के वन में राह बनाकर चल सके। कभी-कभी मौसी की झिड़की याद आती और चित्त विचलित हो जाता। सास को देखकर शर्म से गड़ जाती लेकिन सास उसे किसी काम को न कहती। अपने मन से उनकी मदद करना चाहती तो वह पढ़ाई के हर्जे की बात कहकर वापस भेज देती।
आखिर अन्नपूर्णा ने आशा से कहा- "तेरी जो पढ़ाई चल रही है, वह तो देख ही रही हूँ, महेन्द्र को क्या डॉक्टरी का इम्तहान न देने दोगी?"
यह सुनकर आशा ने अपने जी को कड़ा किया। महेन्द्र से कहा- "तुम्हारे इम्तहान की तैयारी नहीं हो पा रही है। आज से मैं नीचे मौसी के कमरे में रहा करूँगी।"
इस उम्र में ऐसा कठोर सन्न्यास-व्रत! सोने के कमरे से एकबारगी मौसी के कमरे में निर्वासन! ऐसी कठोर प्रतिज्ञा करते हुए उसकी आँखों के कोनों में आँसू झलक पड़े, बेबस होठ काँप उठे और गला रुँध गया। महेन्द्र बोला- "बेहतर है, चाची के कमरे में ही चलो! मगर तब उन्हें हमारे कमरे में ऊपर आना पड़ेगा।"
ऐसा एक गम्भीर प्रस्ताव मज़ाक बन गया, आशा इससे नाराज़ हुई। महेन्द्र ने कहा- "इससे तो अच्छा है कि तुम रात-दिन मुझे आँखों-आँखों में रखो और निगरानी करो! फिर देखो कि मेरी इम्तहान की पढ़ाई चलती है कि नहीं।"
एक दिन बारिश हो रही थी। बादल घिरे थे। ऐसे में बदन पर एक सुवासित महीन चादर और जुही की माला गले में डाले महेन्द्र मगन-मन अपने सोने के कमरे में पहुँचा। अचानक आशा को चौंका देने के विचार से- जूतों की आवाज़ न होने दी। झाँककर देखा, पूरब की खुली खिड़की से पानी के छींटे लिये हवा के तीखे झोंके कमरे में आ रहे हैं, दीया बुझ गया है और आशा नीचे बिछावन पर पड़ी रो रही है।
महेन्द्र जल्दी से उसके क़रीब गया और पूछा- "क्या बात है?" वह दूने आवेग से रोने लगी। बड़ी देर के बाद महेन्द्र को जवाब मिला कि "मौसी से और बर्दाश्त न हो सका। वह अपने फुफेरे भाई के यहाँ चली गईं।"
महेन्द्र के मन में आया, 'गईं तो गईं, लेकिन बदली की ऐसी सुहानी साँझ को ख़राब कर गईं।'
अन्त में सारा गुस्सा माँ पर आया। वही तो इन सारे अनर्थों की जड़ है।
महेन्द्र ने कहा- "हम भी वहीं चले जाएँगे, जहाँ चाची गई हैं। देखते हैं, माँ किससे झगड़ती है?"
और उसने नाहक ही शोर-गुल के साथ असबाब बाँधने के लिए कुली को बुलाना शुरू कर दिया।
राजलक्ष्मी समझ गईं। धीरे-धीरे महेन्द्र के पास आईं। शान्त स्वर में पूछा- 'कहाँ जा रहा है?"
महेन्द्र ने पहले कोई जवाब ही न दिया। दो-तीन बार पूछे जाने पर बताया- "चाची के पास।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "अरे तो मैं ही उन्हें यहाँ बुला देती हूँ।"
राजलक्ष्मी उसी समय पालकी पर सवार होकर अन्नपूर्णा के घर गईं। गले में कपड़ा डालकर हाथ जोड़ते हुए कहा- "खुश हो मँझली बहू, मुझे माफ करो!"
अन्नपूर्णा ने जल्दी-जल्दी उनके पैरों की धूल ली। कातर स्वर में कहा- "दीदी, मुझे दोषी क्यों बना रहीं? तुम जैसा हुक्म दोगी, वैसा ही करूँगी।"
राजलक्ष्मी ने कहा- "तुम चली आई हो, तो मेरे बेटा-पतोहू भी घर छोड़कर यहीं आ रहे हैं।"
कहते-कहते वह रो पड़ी।
जिठानी-देवरानी दोनों घर लौट आईं। तब भी वर्षा हो रही थी। अन्नपूर्णा जब महेन्द्र के कमरे में पहुँची, आशा का रोना थम चुका था। महेन्द्र बातों से उसे हँसाने की कोशिश कर रहा था। आसार थे कि बदलियाँ यूँ ही नहीं गुजर जाएँगी।
अन्नपूर्णा ने कहा- "चुन्नी, तू मुझे घर में भी न रहने देगी और कहीं जाऊँ तो भी पीछे लग जाएगी। क्या मेरे लिए कहीं चैन नहीं!"
आशा चौंक पड़ी।
महेन्द्र बड़ा ही खीझकर बोला- "क्यों चाची, चुन्नी ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?"
अन्नपूर्णा ने कहा- "बहू की ऐसी बेहयाई बर्दाश्त न हो सकी तभी यहाँ से चली गई थी। फिर अपनी सास को रुलाकर मुँहजली ने मुझे क्यों बुलवाया?"
जीवन के अध्याीय में माँ-चाची ऐसी विघ्नकारिणी होती हैं, महेन्द्र को इसका पता न था।
दूसरे दिन राजलक्ष्मी ने बिहारी को बुलवाकर कहा-"बेटा बिहारी, तुम एक बार महेन्द्र से पूछ देखो, जमाने से गाँव नहीं गए। मैं एक बार बारासत जाना चाहती हूँ।"
बिहारी ने कहा- "जमाने से नहीं गईं तो क्या हुआ? खैर, मैं पूछ देखता हूँ। मगर वह राजी भी होगा, ऐसा नहीं लगता।"
महेन्द्र ने कहा- "जन्म-भूमि को देखने की इच्छा ज़रूर होती है। लेकिन माँ का वहाँ ज़्यादा दिन न रहना ही अच्छा होगा। बरसात के मौसम में वह जगह अच्छी नहीं।"
महेन्द्र बड़ी आसानी से राजी हो गया, इससे बिहारी कुढ़ गया। बोला- "माँ अकेली जाएँगी, वहाँ उनकी देख-भाल कौन करेगा?"
"भाभी को भी साथ भेज दो न?"
कहकर बिहारी हँसा।
बिहारी के इस गहरे व्यंग्य से कुण्ठित होकर महेन्द्र ने कहा- "मेरे लिए यह कोई मुश्किल है क्या?"
मगर बात इससे आगे न बढ़ी।
बिहारी इसी तरह आशा के मन को विमुख कर दिया करता और यह जानकर कि आशा इससे कुढ़ती है, उसे मजा आता।
कहना बेकार होगा, राजलक्ष्मी जन्म-भूमि के दर्शन के लिए उतनी बेताब न थीं। गर्मी के दिनों में जब नदी का पानी सूख जाता है, तो मल्लाह कदम-कदम पर लग्गी से थाह लेता है कि कहाँ कितना पानी है। राजलक्ष्मी ने सोचा न था कि उनके बारासत जाने का प्रस्ताव इतनी जल्दी मंजूर हो जाएगा। सोचा, 'अन्नपूर्णा और मेरे दोनों के घर से बाहर जाने में फ़र्क़ है।'
अन्नपूर्णा भीतरी मतलब समझ गई। कहने लगी, "दीदी जाएँगी, तो मैं भी न रह सकूँगी।"
महेन्द्र ने माँ से कहा- "सुन लिया तुमने? तुम जाओगी तो चाची भी जाएँगी। अपनी गृहस्थी का क्या होगा फिर?"
राजलक्ष्मी विद्वेष के ज़हर से जर्जर होकर बोलीं- "तुम भी- जा रही हो मँझली? तुम्हारे जाने से काम कैसे चलेगा? नहीं, तुम्हें रहना ही पड़ेगा।"
राजलक्ष्मी उतावली हो गई। दूसरे दिन दोपहर को ही तैयार हो गई। महेन्द्र ही उन्हें पहुँचाने जाएगा, इसमें किसी को भी शुबहा न था। लेकिन रवाना होते वक्त मालूम पड़ा महेन्द्र ने माँ के साथ जाने के लिए प्यादे और दरबान तक कर रखे हैं।
बिहारी ने पूछा- "तुम अभी तक तैयार नहीं हुए क्या, भैया?"
महेन्द्र ने लजाकर कहा- "मेरे कॉलेज की..."
बिहारी ने कहा- "खैर, तुम छोड़ दो! माँ को मैं वहीं छोड़ आता हूँ।"
महेन्द्र मन-ही-मन नाराज हुआ। अकेले में आशा से बोला, "सचमुच, बिहारी ने ज्यादती शुरू कर दी है। वह यह दिखाना चाहता है कि वह माँ का ख्याल मुझसे ज़्यादा रखता है।"
अन्न्पूर्णा को रह जाना पड़ा। परन्तु लाज, कुढ़न और खीझने से वह सिमटी-सी रहीं। चाची में यह दुराव देखकर महेन्द्र नाराज हुआ और आशा भी रूठी रही।
राजलक्ष्मी मैके पहुँची। तय था कि उन्हें छोड़कर बिहारी आ जाएगा लेकिन वहाँ की हालत देखकर वह ठहर गया।
7
राजलक्ष्मी के मैके में महज दो-एक बूढ़ी विधवाएँ थीं। चारों तरफ घना जंगल और बाँस की झाड़ियाँ; पोखर का हरा-भरा पानी; दिन-दोपहर में स्यार की 'हुआं-हुआं' से राजलक्ष्मी की रूह तड़प उठती।
बिहारी ने कहा- "माँ, जन्म-भूमि यह ज़रूर है, मगर इसे 'स्वर्गादपि गरीयसी' तो हरगिज नहीं कहा जा सकता। तुम्हें यहाँ अकेली छोड़कर लौट जाऊँ तो मुझे पाप लगेगा।" राजलक्ष्मी के प्राण भी काँप उठे। ऐसे में विनोदिनी भी आ गई। विनोदिनी के बारे में पहले ही कहा जा चुका है। महेन्द्र से, और कभी बिहारी से उसके विवाह की बात चली थी। विधाना की लिखी भाग्य-लिपि से जिस आदमी से उसका विवाह हुआ वह जल्दी ही चल बसा।
उसके बाद से विनोदिनी घने जंगल में अकेली लता-सी, इस गाँव में घुटकर जी रही थी। वही अनाथ, राजलक्ष्मी के पास आई, उन्हें प्रणाम किया और उनके सेवा-जतन में जुट गई। सेवा तो सेवा है, घड़ी को आलस नहीं। काम की कैसी सफाई, कितनी अच्छी रसोई, कैसी मीठी बातचीत! राजलक्ष्मी कहती- "काफ़ी देर हो चुकी बिटिया, तुम भी थोड़ा-सा खा लो जाकर!"
वैसे राजलक्ष्मी उसकी फुफिया सास थी।
अपने प्रति बड़ी लापरवाही दिखाती हुई विनोदिनी कहती- "हमारे दु:ख- सहे शरीर में नाराजगी की गुंजाइश नहीं। अहा, कितने दिनों के बाद तो अपनी जन्म-भूमि आई हो! यहाँ है भी क्या? काहे से तुम्हारा आदर करूँ!"
बिहारी तो दो ही दिनों में मुहल्ले-भर का बुजुर्ग बन बैठा। कोई दवा-दारू, तो कोई मुकदमे के राय-मशविरे के लिए आता; कोई उसकी इसलिए खुशामद करता कि किसी बड़े दफ़्तर में उसके बेटे को नौकरी दिला दे; कोई उससे अपनी दरखास्त लिखवाता। बूढ़ों की बैठक और कुली-मजूरों के ताड़ी के अड्डे तक वह समान रूप से जाता-आता। सभी उसका सम्मान करते।
गँवई-गाँव में आए कलकत्ता के उस नवयुवक के निर्वासन-दण्ड को भी विनोदिनी अंत:पुर की ओट से हल्का करने की भरसक कोशिश किया करती। मुहल्ले का चक्कर काटकर जब भी वह आता तो पाता कि किसी ने उसके कमरे को बड़े जतन से सहेज-सँवार दिया है; काँसे के एक गिलास में कुछ फूलों-पत्तों का गुच्छा सजा रखा है। और सिरहाने के एक तरफ पढ़ने योग्य कुछ किताबें रख दी हैं। किताबों में किसी महिला के हाथ से बड़ी कंजूसी के साथ छोटे अक्षरों में लिखा है।
गाँवों में अतिथि-सत्कार का जो आम तरीका है, उससे इसमें थोड़ा फ़र्क़ था। उसी का ज़िक्र करते हुए बिहारी जब तारीफ करता, तो राजलक्ष्मी कहतीं- "और ऐसी लड़की को तुम लोगों ने कबूल नहीं किया!"
हँसते हुए बिहारी कहता- "बेशक हमने अच्छा नहीं किया माँ, ठगा गया। मगर एक बात है, विवाह न करके ठगाना बेहतर है, ब्याह करके ठगाता तो मुसीबत थी!" राजलक्ष्मी के जी में बार-बार यही आता रहा, "यही तो मेरी पतोहू होने योग्य थी। क्यों न हुई भला!"
राजलक्ष्मी कलकत्ता लौटने का ज़िक्र करतीं कि विनोदिनी की आँखें छलछला उठतीं। कहतीं- "आखिर तुम दो दिन के लिए क्यों आईं, बुआ? अब तुम्हें छोड़कर मैं कैसे रहूँगी?"
भावावेश में राजलक्ष्मी कह उठतीं- "तू मेरी बहू क्यों न हुई बेटी, मैं तुझे कलेजे से लगाए रखती।"
सुनकर शर्म से विनोदिनी किसी बहाने वहाँ से हट जाती। राजलक्ष्मी इस इन्तजार में थीं कि कलकत्ता से विनीत अनुरोध का कोई पत्र आएगा। माँ से अलग महेन्द्र आज तक इतने दिन कभी न रहा था। माँ के इस लम्बे बिछोह ने निश्चय ही उसके सब्र का बाँध तोड़ दिया होगा। राजलक्ष्मी बेटे के गिड़गिड़ाहट-भरे पत्र का इन्तजार कर रही थीं।
बिहारी के नाम महेन्द्र का पत्र आया। लिखा था, 'लगता है माँ बहुत दिनों के बाद मैके गई हैं, शायद बड़े मजे में होंगी।'
राजलक्ष्मी ने सोचा, 'महेन्द्र ने रूठकर ऐसा लिखा है। बड़े मजे में होंगी। महेन्द्र को छोड़कर बदनसीब माँ भला सुख से कैसे रह सकती है?'
"अरे बिहारी, उसके बाद क्या लिखा है उसने, पढ़कर सुना तो जरा!"
बिहारी बोला- "और कुछ नहीं लिखा है, माँ!"
और उसने पत्र को मुट्ठी से दबोचकर एक कापी में रखा और कमरे में एक ओर धप्प से पटक दिया।
राजलक्ष्मी अब भला थिर रह सकती थीं! हो न हो, महेन्द्र माँ पर इतना नाराज हुआ है कि बिहारी ने पढ़कर सुनाया नहीं।
गौ के थन पर चोट करके बछड़ा जिस प्रकार दूध और वात्सल्य का संचार करता है, उसी प्रकार महेन्द्र की नाराजगी ने आघात पहुँचाकर राजलक्ष्मी के घुटे वात्सल्य को उभार दिया। उन्होंने महेन्द्र को माफ कर दिया। बोलीं- "अहा, अपनी बहू को लेकर महेन्द्र सुखी है, रहे-जैसे भी हो, वह सुख से रहे। जो माँ उसे छोड़कर कभी एक पल नहीं रह सकती, वही उसे छोड़कर चली आई है, इसलिए महेन्द्र अपनी माँ से नाराज हो गया है।"
रह-रहकर उनकी आँखों में आँसू उमड़ने लगे।
उस दिन वह बार-बार बिहारी से जाकर कहती रहीं-"बेटे, तुम जाकर नहा लो। यहाँ बड़ी बदपरहेजी हो रही है तुम्हारी।"
राजलक्ष्मी अड़ गईं- "नहीं-नहीं, नहा डालो!"
बार-बार ज़िद करने से बिहारी नहाने गया। उसका कमरे से बाहर क़दम रखना था कि झपटकर राजलक्ष्मी ने वह किताब उठा ली और उसके अन्दर से पत्र को निकाला। पढ़कर विनोदिनी सुनाने लगी। शुरू में महेन्द्र ने माँ के बारे में लिखा था, लेकिन बड़ा मुख्तसर। बिहारी ने जितना-भर सुनाया, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।
उसके बाद आशा का ज़िक्र था। मौज-मजे और खुशियों से विभोर होकर लिखा था।
विनोदिनी ने थोड़ा पढ़ा और शर्म से थक गई। कहा-"यह क्या सुनोगी, बुआ!"
राजलक्ष्मी का स्नेह से अकुलाया चेहरा पल-भर में जमकर पत्थर-जैसा सख्त हो गया। जरा देर चुप रहीं, फिर बोलीं- "रहने दो!"
और चिट्ठी उन्होंने वापस न ली। चली गईं।
चिट्ठी लेकर विनोदिनी को क्या रस मिला, वही जाने। पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें दोपहर के तपे बालू-सी जलने लगी- उसका नि:श्वास रेगिस्तान की बयार- जैसी गर्म हो उठी।
'कैसा है महेन्द्र, कैसी है आशा और इन दोनों का प्रेम ही कैसा है!' यही बात उसके मन को मथने लगी। पत्र को गोद में डाले, पाँव फैलाए, दीवार से पीठ टिकाकर सामने ताकती वह देर तक सोचती रही।
महेन्द्र की वह चिट्ठी बिहारी को फिर ढूँढ़े न मिली।
अचानक उसी दिन दोपहर में अन्नपूर्णा आ धमकीं। किसी बुरी खबर की आशंका से राजलक्ष्मी का कलेजा सहसा काँप उठा। कुछ पूछने की उन्हें हिम्मत न हुई। वह फक पड़े चेहरे से अन्नपूर्णा की तरफ ताकती रह गईं।
अन्नपूर्णा ने पूछा- "कलकत्ता का समाचार ठीक है।"
राजलक्ष्मी ने पूछा- "फिर तुम यहाँ कैसे?"
अन्नपूर्णा बोली- "दीदी, अपनी गृहस्थी तुम जाकर सम्हालो। संसार से अपना जी उचट गया है। मैं काशी जाने की तय करके निकली हूँ। तुम्हें प्रणाम करने आ गई। जान में, अनजान में जाने कितने कसूर हो गए हैं माफ करना। और तुम्हारी बहू...," कहते-कहते आँखों से आँसू उफन उठे- "वह नादान बच्ची है, उसके माँ नहीं। वह दोषी हो चाहे निर्दोष, तुम्हारी है।"
अन्नपूर्णा और न बोल सकी।
राजलक्ष्मी जल्दी से उनके नहाने-खाने का इन्तज़ाम करने गई। बिहारी को मालूम हुआ तो वह घोष की मठिया से दौड़ आया। अन्नपूर्णा को प्रणाम करके बोला-"ऐसा भी होता है भला, हम सबको निर्दयी की तरह ठुकराकर तुम चल दोगी?"
आँसू जब्त करके अन्नपूर्णा ने कहा- "मुझे अब फेरने की कोशिश मत करो बिहारी, तुम लोग सुखी रहो, मेरे लिए कुछ रुका न रहेगा।"
बिहारी कुछ क्षण चुप रहा। फिर बोला- "महेन्द्र की किस्मत खोटी है उसने तुम्हें रुख़्सत कर दिया।"
अन्नपूर्णा चौंककर बोलीं- "ऐसा मत कहो, मैं उस पर बिल्कुल नाराज नहीं हूँ। मेरे गए बिना उनका भला न होगा।"
बहुत दूर ताकता हुआ बिहारी चुप बैठा रहा। अपने आँचल से सोने की दो बालियाँ निकालकर अन्नपूर्णा बोलीं- "बेटे, ये बालियाँ रख लो! बहू आए तो मेरा आशीर्वाद जताकर इन्हें पहना देना!"
बालियाँ मस्तक से लगाकर आँसू छिपाने के लिए बिहारी बगल के कमरे में चला गया।
जाते वक्त बोलीं- "मेरे महेन्द्र और मेरी आशा का ध्याकन रखना, बिहारी!"
राजलक्ष्मी के हाथों उन्होंने एक काग़ज़ दिया। कहा--'ससुर की जायदाद में मेरा जो हिस्सा है, वह मैंने इस वसीयत में महेन्द्र को लिख दिया है। मुझे हर माह सिर्फ पन्द्रह रुपए भेज दिया करना!"
झुककर उन्होंने राजलक्ष्मी के पैरों की धूल माथे लगाई और तीर्थ-यात्रा को निकल पड़ी।
8
आशा को डर लगा। क्या हुआ यह? माँ चली गईं, मौसी चली गईं। उन दोनों का सुख मानो सबको खल रहा है, अब उसकी बारी है शायद। सूने घर में दाम्पत्य की नई प्रेम-लीला उसे न जाने कैसी लगने लगी। संसार के कठोर कर्तव्यों से प्रेम को फूल के समान तोड़कर अलग कर लेने पर यह अपने ही रस से अपने को संजीवित नहीं रख पाता, धीरे-धीरे मुरझाकर विकृत हो जाता है। आशा को भी ऐसा लगने लगा कि उनके अथक मिलन में एक थकान और कमज़ोरी है। वह मिलन रह-रहकर मानो शिथिल हो जाता है- प्रेम की जड़ अगर कामों में न हो तो भोग का विकास पूर्ण और स्थाई नहीं होता। महेन्द्र ने भी अपने विमुख संसार के ख़िलाफ़ विद्रोह करके अपने प्रेमोत्सव के सभी दीपों को एक साथ जलाकर बड़ी धूम-धाम से सूने घर के अमंगल में ही उसने आशा से कहा- "तुम्हें इन दिनों हो क्या गया है, चुन्नी! मौसी चली गईं तो इस तरह मुँह लटकाए क्या रहती हो? हम दोनों के प्रेम में क्या सभी प्रेम समाए हुए नहीं हैं।"
आशा दुखी होकर सोचती- 'अपने प्रेम में कोई अपूर्णता तो है। मैं तो मौसी की बात सोचा करती हूँ। सास चली गई हैं, इसका मुझे डर लगता है।'
घर के काम-काज अब ठीक से नहीं चलते। नौकर-चाकर कन्नी काटने लगे। 'तबीयत ख़राब है' कहकर नौकरानी एक दिन नहीं आई- रसोई पकाने वाला ब्राह्मण शराब पीकर गायब हो गया। महेन्द्र ने आशा से कहा-"खूब मजा आया, आज हम लोग खुद ही रसोई बनाए।"
गाड़ी से महेन्द्र न्यू मार्केट गया। कौन-सी चीज़ कितनी चाहिए, इसका उसे कुछ भी पता न था, बहुत-सा सामान उठाकर खुशी-खुशी घर लौटा। उन चीजों का किया क्या जाए, यह आशा भी ठीक से न जानती थी। प्रयोग में ही दिन के दो-तीन बज गए और बहुत-से अजीबो-गरीब खाना तैयार करके महेन्द्र को बड़ा मजा आया। लेकिन आशा महेन्द्र के उस मजे में साथ न दे सकी। अपनी अज्ञता पर उसे मन-ही-मन बड़ी लज्जा और कुढ़न हुई।
कमरे की चीज़ें इस क़दर बिखर गई थीं कि जरूरत पर कुछ पाना ही कठिन था। महेन्द्र की डॉक्टरी वाली छुरी एक दिन तरकारी काटने के काम आई और कूड़ों के ढेर में जा छिपी; जिस पर वह नोट लिखा करता था, वह कापी पंखे का काम करके अन्त में रसोई की राख में आराम करने लगी।
इन अनहोनी घटनाओं से महेन्द्र के कौतूहल की सीमा न रही, लेकिन आशा को इससे तकलीफ होने लगी। बे-तरतीबी के बहाव में सारी गृहस्थी को बहाकर हँसते हुए उसी के साथ बहते चलना उस बालिका को विभीषिका जैसा लगा।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:37

एक दिन शाम को दोनों बरामदे में बैठे थे। सामने खुली छत। बारिश खुल जाने से कलकत्ता की दूर तक फैली इमारतों की चोटियाँ चाँदनी में नहा रही थीं। बगीचे से मौलसिरी के बहुत-से ओदे फूल लाकर आशा माथा झुकाए माला गूँथ रही थी। महेन्द्र खींचातानी करके, रुकावट डालकर, उल्टा-सीधा सुनाकर नाहक ही झगड़ा करना चाह रहा था। बे-वजह इस तरह सताए जाने के कारण आशा उसे झिड़कना चाहती थी कि किसी बनावटी उपाय से उसका मुँह दबाकर महेन्द्र उसकी कहन को अकुराते ही कुचल रहा था।
किसी पड़ोसी के पिंजरे की कोयलिया कूक उठी। महेन्द्र ने उसी दम अपने सिर पर झूलते हुए पिंजरे को देखा। अपनी कोयल पड़ोसी की कोयल की बोली चुपचाप कभी नहीं सह सकती- आज वह चुप क्यों है? महेन्द्र ने कहा- "तुम्हारी आवाज़ से लजा गई है।"
उत्कण्ठित होकर आशा ने कहा- "आज इसे हो क्या गया।"
आशा ने निहोरा करके कहा- "मजाक नहीं, देखो न, उसे क्या हुआ है?"
महेन्द्र ने पिंजरे को उतारा। पिंजरे पर लिपटे हुए कपड़ों को हटाया। देखा, कोयल मरी पड़ी थी। अन्नपूर्णा के जाने के बाद खानसामा छुट्टी पर चला गया था। कोयल का किसी ने ख्याल ही न किया था। देखते-ही-देखते आशा का चेहरा फीका पड़ गया। उसकी अगुलियाँ चल न सकीं- फूल यों ही पड़े रह गए। चोट तो महेन्द्र को भी लगी, लेकिन नाहक ही रस-भंग होगा, इसलिए उसने इसे हँसकर टाल जाने की कोशिश की। बोला- "अच्छा ही हुआ। मैं इधर डॉक्टरी को निकलता और उधर यह कमबख्त 'कू-कू' करके तुम्हें जलाया करती थी।" कहकर अपने बाहु-पाश में लपेटकर उसने आशा को अपने पास खींच लेना चाहा। अपने को धीरे-धीरे उसके बन्धन से छुड़ाकर आशा ने ऑंचल से मौलसिरी के सब फूल गिरा दिए। बोली- "छि:-छि: अब देर क्यों? जल्दी जाकर माँ को ले आओ!"
9
इतने में दुतल्ले से 'महेन्द्र भैया' की पुकार सुनाई पड़ी। "अरे रे, आओ- आओ..." महेन्द्र ने जवाब दिया। बिहारी की आवाज़ से उसका हृदय खिल उठा। विवाह के बाद वह इन दोनों के सुख का बाधक बनकर कभी-कभी आता रहा है, आज वही बाधा सुख के लिए निहायत जरूरी लगी। बिहारी का आना आशा को भी अच्छा लगा। वह जरा घूँघट खींचकर जल्दी से उठ बैठी। महेन्द्र बोला-"अरे, जा कहाँ रही हो, और कोई नहीं, बिहारी आ रहा है।" आशा ने कहा- "भाई साहब के लिए नाश्ता ले आऊँ?"
एक काम का मौक़ा आ गया, इससे आशा का अवसाद कुछ हल्का हो गया।
सास की कुशल के लिए घूँघट काढ़े वह खड़ी रही। बिहारी से अभी भी वह बोलती-चालती नहीं।
अन्दर क़दम रखते ही बिहारी ने कहा- "तौबा-तौबा! कैसे कवित्व के बीच आ टपका मैं! खैर फ़िक्र न करो भाभी, मैं बैरंग वापस जाता हूँ।"
आशा ने महेन्द्र की तरफ ताका। महेन्द्र ने पूछा- "माँ की क्या खबर है, बिहारी?"
बिहारी बोला- "माँ और चाची की चर्चा अभी क्यों भाई, काफ़ी समय है।"
सच ए नाइट वाज नाट मेड फार मदर्स एंड आंट्स।
कहकर बिहारी लौट पड़ा। महेन्द्र ने उसे जबर्दस्ती खींचकर बिठा दिया। बिहारी ने कहा- "देख लो भाभी, कसूर मेरा नहीं है- यह मुझे जबरन खींच लाया है- पाप इसने किया है, अभिशाप मुझ पर न पड़े।" आशा से कोई जवाब देते नहीं बनता, इसलिए ऐसी बातों से वह खीझ उठती है। बिहारी जानकर उसे तंग करता है।
बिहारी ने कहा- "घर की हालत ऑंखों से देख रहा हूँ- अब भी क्या माँ को लाने का वक्त नहीं आया?"
महेन्द्र ने कहा- "बेशक! हम तो उन्हीं की राह देख रहे हैं।'
बिहारी ने कहा- "यही जताते हुए उन्हें पत्र लिखने में तुम्हें नाम का समय लगेगा, लेकिन उनकी खुशी का अन्त न रहेगा। भाभी, उन दो मिनटों के लिए महेन्द्र भैया को तुम्हें फुरसत देनी पड़ेगी, मेरी दरखास्त रही।"
आशा बिगड़कर चली गई। उसकी ऑंखों से ऑंसू बहने लगे।
महेन्द्र बोला- "जाने किस शुभ घड़ी में तुम दोनों की भेंट हुई थी- आखिर सुलह नहीं ही हो सकी- वही खट-पट।"
बिहारी ने कहा- "तुम्हें तुम्हारी माँ ने तो बर्बाद किया ही, पत्नी भी बर्बाद करने पर तुली है। यही मुझसे नहीं देखा जाता, इसी से जब-तब कुछ कह देता हूँ।"
महेन्द्र- "मगर नतीजा क्या होता है उसका?"
बिहारी- "नतीजा तुम्हारे लिए कुछ ख़ास नहीं होता, मेरे लिए थोड़ा-बहुत होता है।"
10
बिहारी ने खुद बैठकर महेन्द्र से चिट्ठी लिखवाई और उस पत्र के साथ दूसरे ही दिन राजलक्ष्मी को लेने गया। राजलक्ष्मी समझ गई, चिट्ठी बिहारी ने लिखवाई है- मगर फिर भी उससे रहा न गया। साथ-साथ विनोदिनी आई।
लौटकर उन्होंने घर की जो बदतर हालत देखी- तमाम यों ही गन्दा पड़ा, तितर-बितर- इसलिए बहू के प्रति उनका मन और भी ख़राब हो गया।
लेकिन बहू में यह कैसा परिवर्तन! वह छाया-सी उनके पीछे डोलती-फिरती। कहें, न कहें, हरदम हर काम में हाथ बँटाने को मुस्तैद। आज़िज आकर वह कह उठतीं- "छोड़ो-छोड़ो, मिट्टी पलीद करके रख दोगी तुम! जो काम आता नहीं, उसमें हाथ क्या डालना?"
राजलक्ष्मी के जी में आया, 'हो न हो, अन्नपूर्णा के चले जाने से ही बहू की यह तरक़्क़ी हुई है।' लेकिन फिर मन में आया, 'महेन्द्र सोचेगा, चाची थीं तो मैं बीवी के साथ निष्कंटक मौज करता था और माँ का पहुँचना था कि विरह का दु:ख शुरू हो गया। इससे यही साबित होगा कि चाची उसकी शुभैषी रहीं, माँ सुख का काँटा है। रहने दो, अपने को क्या पड़ी?"
इधर कहीं महेन्द्र दिन को बुला भेजता तो बहू जाने में आनाकानी करती। राजलक्ष्मी ही झिड़का करतीं-"महेन्द्र बुला रहा है, तुम टाल जाती हो! ज़्यादा दुलार पाने का यही नतीजा होता है। जाओ, सब्जियाँ मैं देख लूँगी।"
फिर शुरू होता वही स्लेट-पेंसिल और 'चारुपाठ' का झूठ नाटक। प्रेम के अकारण अभियोग से एक-दूसरे को दोषी ठहराना- किसका प्रेम ज़्यादा वज़नी है, इस पर निरर्थक वाद-विवाद। वर्षा के दिन को रात और चाँदनी रात को दिन बनाना।
ऐसे में एक विनोदिनी आशा के गले से लिपटकर बोली- "बहन, तुम्हारा सौभाग्य अक्षय हो... जुग-जुग! लेकिन चूँकि मैं दुखिया हूँ, इसलिए क्या मेरी तरफ एक नज़र ताकना भी गुनाह है?"
छुटपन से ही अपने आत्मीय के यहाँ पराई-सी पली थी, इसलिए लोगों के सामने आशा सदा संकुचित रहा करती। जुड़ी भौंहें और तीखी निगाह, अनिंद्य मुखड़ा और भरी हुई जवानी लिये जब विनोदिनी आई, तो खुद बढ़कर उससे परिचय करने की हिम्मत आशा की न हुई।
आशा ने गौर किया, राजलक्ष्मी से विनोदिनी को किसी भी तरह का संकोच नहीं। और मानो आशा को दिखा-दिखाकर राजलक्ष्मी भी उसका काफ़ी आदर करतीं। यह भी देखा, घर के कामकाज में विनोदिनी पटु है, प्रभुत्व मानो उसके लिए बहुत ही सहज है, स्वभाव-सिद्ध नौकर-नौकरानियों से काम लेने, झिड़कने-फटकारने और हुक्म देने में उसे ज़रा सी हिचक नहीं होती। यह सब देख-भालकर विनोदिनी के आगे आशा अपने को बहुत छोटा समझने लगी।
वही सर्वगुण संपन्न विनोदिनी जब खुद उससे नेह की भीख माँगने आई, तो उसका आनन्द चौगुना हो उमड़ पड़ा। जादूगर के माया-तरु की तरह उसके प्रेम का बीज एक ही दिन में अकुराया, पत्तों से लद गया और फल-फूल उठा।
आशा ने कहा- "हम-तुम सखिया हुईं, एक कोई नाम रख छोड़ें हम अपना।"
विनोदिनी ने हँसकर पूछा- "क्या आखिर?"
आशा ने बहुत-से अच्छे-अच्छे नाम गिनाए-"हरसिंगार, कदम्ब, मौलसिरी"
विनोदिनी बोली- "ये सारे-के-सारे बड़े पुराने पड़ गए। इन दुलार के नामों की कोई कद्र नहीं।"
आशा ने पूछा- "फिर तुम्हें कौन-सा पसन्द है?"
हँसकर विनोदिनी ने कहा- "ऑंख की किरकिरी।"
आशा कोई मीठा-सा नाम ही चाहती थी, लेकिन विनोदिनी की पसन्द से उसने दुलार की इस गाली को ही कबूल कर लिया। बाँहों से उसकी गर्दन लपेटकर बोली-"मेरी ऑंख की किरकिरी!" और हँसते-हँसते लोट-पोट हो गई।
11
आशा को एक साथी की बड़ी जरूरत थी। प्यार का त्योहार भी महज दो आदमियों से नहीं मनता- मीठी बातों की मिठाई बाँटने के लिए गैरों की भी ज़रूरत पड़ती है।
भूखी-प्यासी विनोदिनी भी नई बहू से प्रेम के इतिहास को शराबी की दहकती हुई सुरा के समान कान फैलाकर पीने लगी। सूनी दोपहरी में माँ जब सोती होतीं, घर के नौकर-चाकर निचले तल्ले के आरामगाह में छिप जाते, बिहारी की ताकीद से महेन्द्र कुछ देर के लिए कॉलेज गया होता और धूप से तपी नीलिमा के एक छोर से चील की तीखी आवाज़ बहुत धीमी सुनाई देती, तो कमरे के फर्श पर अपने बालों को तकिए पर बिखेरे आशा लेट जाती और पेट के नीचे तकिया रखकर पट पड़ी विनोदिनी उसकी गुन-गुन स्वर से कही जाने वाली कहानी में तन्मय हो जाती- उसकी कनपटी लाल हो उठती, साँस ज़ोर-ज़ोर से चलने लगती।
विनोदिनी खोद-खोदकर पूछती और छोटी-से-छोटी बात भी निकाल लेती, एक ही बात कई बार सुनती-घटना खत्म हो जाती तो कल्पना करती; कहती- "अच्छा बहन, कहीं ऐसा होता तो क्या होता और यह होता तो क्या करती?" इन अनहोनी कल्पनाओं की राह में सुख की बातों को खींचकर दूर तक ले जाना आशा को भी अच्छा लगता।
विनोदिनी कहती- "अच्छा भई ऑंख की किरकिरी, तुझसे कहीं बिहारी बाबू का ब्याह हुआ होता तो?"
आशा- "राम-राम, ऐसा न कहो! बड़ी शर्म आती है मुझे। हाँ, तुम्हारे साथ होता तो क्या कहने! चर्चा तो तुमसे होने की भी चली थी।"
विनोदिनी- "मुझसे तो जाने कितनों की, कितनी ही बातें चलीं। न हुआ, ठीक ही हुआ। मैं जैसी हूँ, ठीक हूँ।"
आशा प्रतिवाद करती। वह भला यह कैसे कबूल कर ले कि विनोदिनी की अवस्था उससे अच्छी है। उसने कहा- "ज़रा यह तो सोच देखो, अगर मेरे पति से तुम्हारा ब्याह हो जाता! होते-होते ही तो रह गया।" होते-होते ही रह गया। क्यों नहीं हुआ? आशा का यह बिस्तर, यह पलंग सभी तो उसी का इन्तज़ार कर रहे थे। उस सजे-सजाए शयन-कक्ष को विनोदिनी देखती और इस बात को किसी भी तरह न भुला पाती। इस घर की वह महज़ एक मेहमान है- आज उसे जगह मिली है, कल छोड़ जाना होगा।
तीसरे पहर विनोदिनी खुद अपनी अनूठी कुशलता से आशा का जूड़ा बाँध देती और जतन से शृंगार करके उसके पति के पास भेजा करती।
इस तरह खामखाह देर कर देना चाहती।
नाराज़ होकर महेन्द्र कहता, "तुम्हारी यह सहेली तो टस-से-मस नहीं होना चाहतीं- घर कब जाएँगी?"
उतावली हो आशा कहती, "न-न, मेरी ऑंख की किरकिरी पर तुम नाराज क्यों हो। तुम्हें पता नहीं, तुम्हारी चर्चा उसे कितनी अच्छी लगती है- किस जतन से वह सजा-सँवारकर मुझे तुम्हारे पास भेजा करती है।" राजलक्ष्मी आशा को कुछ करने-धरने न देतीं। विनोदिनी ने उसकी तरफदारी की, और उसे काम में जुटाया। विनोदिनी को आलस जरा भी नहीं था। दिन-भर एक-सी काम में लगी। आशा को वह छुट्टी नहीं देना चाहती। एक के बाद दूसरा, वह कामों का कुछ ऐसा क्रम बनाती कि आशा के लिए ज़रा भी चैन पाना गैरमुमकिन था। आशा का पति छत वाले सूने कमरे में बैठा चिढ़ के मारे छटपटा रहा है- यह सोचकर विनोदिनी मन-ही-मन हँसती रहती। आशा अकुलाकर कहती, "भई ऑंख की किरकिरी, अब इजाज़त दो, वह नाराज़ हो जाएँगे।"
झट विनोदिनी कहती, "बस, ज़रा-सा। इसे खत्म करके चली जाओ! ज़्यादा देर न होगी।" ज़रा देर में आशा फिर उद्विग्न होकर कहती- "न बहन, अब वह सचमुच ही नाराज़ होंगे। मुझे छोड़ दो, चलूँ मैं।" विनोदिनी कहती, "ज़रा नाराज़ ही हुए तो क्या। सुहाग में गुस्सा न मिले तो मुहब्बत में स्वाद नहीं मिलता- जैसे सब्ज़ी में नमक-मिर्च के बिना।"
लेकिन नमक-मिर्च का मजा क्या होता है, यह विनोदिनी ही समझ रही थी- न न थी सिर्फ उसके पास सब्ज़ी। उसकी नस-नस में मानो आग लग गई। जिधर भी नज़र करती, चिनगारियाँ उगलती उसकी ऑंखें। ऐसी आराम की गिरस्ती! ऐसे सुहाग के स्वामी! इस घर को तो मैं राजा की रिसायत, इस स्वामी को अपने चरणों का दास बनाकर रखतीं। (आशा को गले लगाकर) "भई ऑंख की किरकिरी, मुझे बताओ न, कल तुम लोगों में क्या बातें हुईं। तुमने वह कहा था, जो मैंने करने को कहा था? तुम लोगों के प्यार की बातें सुनकर मेरी भूख-प्यास जाती रहती है।"
12
एक दिन आखिर आजिज़ आकर महेन्द्र ने माँ से कहा-"यह अच्छी बात है, माँ? दूसरे के घर की एक जवान विधवा को घर रखकर एक भारी ज़िम्मेदारी कन्धे पर लाद लेने की क्या पड़ी है? जाने कब क्या मुसीबत हो?"
राजलक्ष्मी ने कहा- "अरे, यह तो अपने विपिन की बहू है, इसे मैं बिरानी थोड़े ही समझती हूँ।"
महेन्द्र ने कहा- "जो कहो, लेकिन यह अच्छा नहीं है। मेरी राय में इसे रखना ठीक नहीं।"
राजलक्ष्मी खूब जानती थीं कि महेन्द्र की राय को ठुकराना आसान नहीं। इसलिए उन्होंने बिहारी से कहा-"अरे बिहारी, तू एक बार महेन्द्र को समझाकर देख! यह विपिन की बहू जब से यहाँ है, तभी से इस बुढ़ापे में मुझे थोड़ा आराम मिला है। वह पराई हो या जो हो, किसी से कभी ऐसी सेवा नहीं मिली।"
बिहारी ने कोई जवाब न दिया। वह जाकर महेन्द्र से बोला, "यार, विनोदिनी की भी सोचते हो?"
महेन्द्र ने हँसकर कहा- "सोचकर रात की नींद हराम है। अपनी भाभी से पूछ देखो, विनोदिनी के ध्यारन से इन दिनों और सब ध्यामन टूट गया है।"
घूँघट की आड़ से आशा ने महेन्द्र को चुपचाप धमकाया। बिहारी ने कहा- "अच्छा, दूसरा विषवृक्ष!" चुन्नी उसे यहाँ से निकाल बाहर करने को छटपटा रही है।
घूँघट से आशा की ऑंखों ने फिर उसे झिड़का।
बिहारी ने कहा- "निकाल ही बाहर करो तो लौट आने में कितनी देर लगती है! अरे, विधवा का विवाह रचा दो, विष के दाँत एकबारगी टूट जाएँगे।"
महेन्द्र बोला- "विवाह तो कुन्द का भी कर दिया गया था।"
बिहारी ने कहा- "इस उपमा को अभी छोड़ो! विनोदिनी की बात कभी-कभी मैं सोचा करता हूँ। तुम्हारे यहाँ तो ज़िन्दगी-भर यह रह नहीं सकती और इनके यहाँ का जंगल किसी के लिए भी वनवास है।" विनोदिनी आज तक महेन्द्र के सामने नहीं गई, पर बिहारी ने उसको देखा है। उसने सिर्फ इतना समझा है कि यह स्त्री जंगल में छोड़ने लायक़ नहीं है। लेकिन शिखर घर के दिए में एक तरह से जलती है, और दूसरी तरह वह घर को आग भी लगा देती है। महेन्द्र के मन में यह शंका भी थी।
महेन्द्र ने इस बात पर बिहारी की खूब खिल्ली उड़ाई। बिहारी ने भी इसका जवाब दिया। लेकिन उसके मन ने समझा था कि यह स्त्री खिलवाड़ करने की नहीं, उसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। राजलक्ष्मी ने विनोदिनी को सावधान कर दिया। कहा- "देखना बेटी, बहू से इतनी मिठास न रखना! तुम गाँव-घर से गृहस्थ के यहाँ रही हो- आजकल के चाल-चलन को नहीं जानतीं। बुध्दिमती हो, समझ-बूझकर चलना!"
इसके बाद विनोदिनी ने आशा को दूर-ही-दूर रखा। कहा- "मैं भई होती कौन हूँ! मेरी जैसी स्त्री से अगर आप अपनी इज्जत बचाकर चलना नहीं चाहते तो कब क्या हो जाएगा, कौन कह सकता है?" आशा निहोरे-विनती करती, गिड़गिड़ाती, रोती-पीटती, लेकिन विनोदिनी एकदम अडिग। बातों से आशा आकण्ठ भर उठी, मगर विनोदिनी ने तरजीह न दी।
इधर महेन्द्र के बाजू शिथिल हो गए। जो अनियम और उच्छृंखलता पहले उसे कौतुक-सी लगती थी, वही अब धीरे-धीरे उसे दुखाने लगी। आशा की सांसारिक अपटुता से उसे खीझ होती, लेकिन जबान खोलकर कहता नहीं।
प्यार की जलती हुई सेज पर ऑंख खोलकर धीरे-धीरे घर-गृहस्थी के धन्धों, लिखाई-पढ़ाई में ध्यालन देकर महेन्द्र ने करवट बदली। अपनी चिकित्सा-सम्बन्धी किताबों का उसने जाने कहाँ-कहाँ से उद्धार किया और अपने कोट-पतलून को धूप दिखाने की चेष्टा की।
13
विनोदिनी जब बिल्कुल ही पकड़ में न आई, तो आशा को एक तरकीब सूझी। बोली, "भई ऑंख की किरकिरी, तुम मेरे पति के सामने क्यों नहीं आती, भागती क्यों फिरती हो?" विनोदिनी ने बड़े संक्षेप में लेकिन तेज़ स्वर में कहा- "छि:!"
आशा बोली- "क्यों? माँ से मुझे पता चला है, तुम हम लोगों की गैर नहीं हो।"
गम्भीर होकर विनोदिनी ने कहा- "संसार में अपना-पराया कोई नहीं होता। जो अपना मानता है, वही अपना है और जो पराया समझता है, वह अपना होते हुए भी पराया है।"
आशा ने देखा, यह बात लाजवाब है। वास्तव में उसके पति विनोदिनी के साथ ज्यादती करते हैं, सचमुच उसे गैर समझते हैं और नाहक ही उससे खीझा करते हैं।
उस दिन साँझ को आशा ने बड़े नाज़ो-अंदाज से पति के सामने छेड़ा- "तुम्हें मेरी ऑंख की किरकिरी से परिचय करना पड़ेगा।"
महेन्द्र हँसकर बोला, "तुम्हारे साहस की बलिहारी!"
आशा ने पूछा- "क्यों, इसमें डर किस बात का?"
महेन्द्र- "अपनी सखी की जिस गज़ब की ख़ूबसूरती का ज़िक्र किया करती हो वह तो खतरे से ख़ाली नहीं।"
आशा ने कहा- "खैर, वह मैं देख लूँगी। तुम उससे बोलोगे या नहीं, इतना बता दो।"
विनोदिनी को देखने का कौतूहल महेन्द्र को भी था। फिर भी यह आग्रह उसे ठीक नहीं लग रहा था।
हृदय के नाते के बारे में महेन्द्र के उचित-अनुचित का आदर्श औरों की अपेक्षा कुछ कड़ा था। इसके पहले वह विवाह की बात नहीं सुनना चाहता था, इसलिए कि कहीं माँ के अधिकार पर ऑंच न आए। और अब आशा के सम्बन्ध की रक्षा वह इस तरह से करना चाहता कि किसी पराई औरत के लिए मन में ज़रा-सी कौतूहल न पैदा हो। प्यार के मामले में वह बड़ा वैसा-सा है, लेकिन पक्का- इस बात का उसे मन-ही-मन नाज़ भी था। यहाँ तक कि वह चूँकि बिहारी को अपना दोस्त कहता, इसलिए दूसरे किसी को भी वह मित्र नहीं मानना चाहता। कोई उसकी ओर खिंचकर आता भी तो वह ज़बर्दस्ती उसकी ओर से लापरवाही दिखाता और बिहारी के सामने उस बेचारे का मज़ाक उड़ाते हुए अपनी उदासी ज़ाहिर करता। बिहारी कहीं एतराज करता तो महेन्द्र कहता, "यह तुमसे हो सकता है। कहीं भी जाते हो, तुम्हें मित्रों की कमी नहीं रहती मगर मैं हर किसी को मित्र नहीं मान सकता।"
ऐसे महेन्द्र का मन जब इधर एक अपरिचिता की ओर कौतूहल और व्यग्रता से बरबस खिंच जाया करता, तो अपने आदर्श के आगे वह नीचा हो जाता। सो वह विनोदिनी को घर से हटाने के लिए अपनी माँ को तंग करने लगा।
महेन्द्र ने कहा- "रहने भी दो चुन्नी, तुम्हारी किरकिरी से गप-शप की फुर्सत कहाँ है अपने पास? पढ़ने के वक्त किताबों से नाता और फुर्सत की घड़ियों के लिए तुम हो- इस बीच...!" दोनों के बीच में विनोदिनी के लिए सुई की नोक-भर भी जगह छोड़ने को महेन्द्र तैयार नहीं था, यह बात उसके गर्व का विषय बन बैठी। उसका वह गर्व आशा से सहा नहीं जाता, पर आज उसने हार कबूल कर ली। कहा- "खैर, मेरी ही खातिर तुम मेरी किरकिरी से बोलो!"
आशा के आगे अपने प्रेम की दृढ़ता और श्रेष्ठता प्रमाणित करके अन्त में बड़ी कृपा करके वह विनोदिनी से बात करने को राज़ी हुआ।
दूसरे दिन सुबह आशा गई और सोई हुई विनोदिनी से लिपट गई। विनोदिनी बोली- "यह कैसा गज़ब! चकोरी आज चाँद छोड़कर मेघ के दरबार में?"
आशा ने कहा- "तुम लोगों की यह कविता मेरी समझ में नहीं आती, फिर गषेबर में नाहक घी क्या डालना! जो इन बातों का जवाब दे सकता है, चलकर एक बार उसे सुनाओ!"
विनोदिनी ने पूछा- "आखिर वह रसिक है कौन?"
आशा ने कहा- "तुम्हारे देवर- मेरे पति। मज़ाक नहीं, तुमसे बातें करने के लिए वह मुझे परेशान कर रहे हैं।"
विनोदिनी अपने मन में बोली- 'बीवी के हुक्म से मेरी बुलाहट हुई है और मैं सिर पर पाँव रखकर भागी जाऊँगी- ऐसी समझा है मुझे!'
विनोदिनी किसी भी तरह तैयार न हुई। आशा पति के सामने बड़ी लज्जिु‍त हुई।
मन-ही-मन महेन्द्र इस पर बड़ा नाराज हुआ, "मेरे सामने आने में एतराज! मुझे दूसरे मामूली लोगों-सा समझती हैं? और कोई होता तो जाने कब, कितने बहानों से विनोदिनी से मिलता, बोलता-चालता। लेकिन महेन्द्र ने इसकी कभी कोशिश तक न की, इसी से विनोदिनी को क्या मेरा परिचय नहीं मिला? वह एक बार भली तरह जान लेती तो समझ जाती कि मुझमें और दूसरे किसी पुरुष में क्या फ़र्क़ है।"
दो दिन पहले विनोदिनी भी कुढ़न से बोली थी, "इतने दिनों से इस घर में हूँ और महेन्द्र एक बार मुझे देखने की कोशिश भी नहीं करता! बुआ के कमरे में होती हूँ तब भी वह किसी बहाने अपनी माँ के पास नहीं आता। ऐसी लापरवाही किस बात की। मैं कोई जड़ पदार्थ हूँ! मैं आदमी नहीं... स्त्री नहीं! कहीं वह मुझे जान पाता तो पता चलता कि उसकी प्यारी चुन्नी और मुझमें क्या फ़र्क़ है!"
आशा ने तरकीब सुझाई- "तुम कॉलेज गए हो, यह कहकर मैं उसे अपने कमरे में ले आऊँगी कि अचानक बाहर से तुम आ जाना! बस, कोई बस न चलेगा।"
महेन्द्र ने पूछा- "आखिर किस गुनाह के लिए उसे इतनी बड़ी सजा?"
आशा बोली- "मुझे गुस्सा आ गया है- तुमसे मुलाकात करने में भी आपत्ति! उसकी अकड़ तोड़कर ही रहूँगी।"
महेन्द्र बोला- "तुम्हारी प्यारी सखी को देखे बिना मैं मरा नहीं जा रहा हूँ। मैं यों चोरों की तरह मिलना नहीं चाहता।"
आशा ने महेन्द्र का हाथ पकड़कर विनती की- "मेरे सिर की कसम तुम्हें, एक बार, बस एक बार तो तुम्हें यह करना ही पड़ेगा। जैसे भी हो, उसकी हेकड़ी तो भुलानी ही पड़ेगी। फिर तुम्हारा जैसा जी चाहे करना।"
महेन्द्र चुप रहा। आशा बोली- "मेरी आरजू है, मान जाओ!"
महेन्द्र को भी ललक हो रही थी। इसीलिए बेहद उदासी दिखाकर वह सहमत हुआ।
शरत् की धुली दोपहरी। महेन्द्र के कमरे में विनोदिनी आशा को कार्पेट के जूते बनाना बता रही थी। आशा अनमनी-सी बार-बार बाहर ताक-ताककर गिनती में भूल करके अपना बेहद सीधापन दिखा रही थी। आखिर तंग आकर विनोदिनी ने उसके हाथ का कार्पेट झपटकर गिरा दिया और कहा- "यह तुम्हारे बस का नहीं, मैं चलती हूँ, काम पड़ा है।"
आशा ने कहा- "बस, ज़रा देर और देखो, अब भूल नहीं होगी।"
आशा सीने से लग गई।
इतने में दबे पाँव महेन्द्र आया और दरवाज़े के पास विनोदिनी के पीछे खड़ा हो गया। आशा सिलाई पर ऑंखें गाड़े हुए ही धीरे-धीरे हँसने लगी।
विनोदिनी ने पूछा- "एकाएक हँसी किस बात पर आ गई?"
आशा से और न रहा गया। वह खिलखिला पड़ी और विनोदिनी के बदन पर कार्पेट फेंककर बोली, "तुमने ठीक ही कहा, यह मेरे बस का नहीं।" और विनोदिनी से लिपटकर और ज़ोर से हँसने लगी। विनोदिनी पहले ही ताड़ गई थी। आशा की चंचलता और हाव-भाव से उससे छिपा कुछ न था। वह यह भी खूब जान गई थी कि महेन्द्र कब चुपचाप उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। निरी नादान बनकर उसने अपने को आशा के आसान जाल में फँसने दिया।
अन्दर आते हुए महेन्द्र ने कहा- "मैं बदनसीब ही इस हँसी से क्यों वंचित हूँ।"
चौंककर विनोदिनी ने माथे पर कपड़े का पल्ला डाला और उठने लगी। आशा ने उसका हाथ धर दबाया।
महेन्द्र ने कहा- "या तो आप बैठिए, मैं चला जाता हूँ, या फिर आप भी बैठिए, मैं भी बैठता हूँ।"
जैसा कि आम तौर से औरतें करती हैं, छीना-झपटी, शोर-गुल करके विनोदिनी ने शर्म की धूम नहीं मचाई। उसने सहज ही सुर में कहा- "आपके ही अनुरोध से बैठती हूँ, लेकिन मन-ही-मन अभिशाप न दीजिएगा।"
महेन्द्र ने कहा- "अभिशाप दूँगा। दूँगा कि आप में देर तक चलने की शक्ति न रह जाए।"
विनोदिनी ने कहा- "इस अभिशाप से मैं नहीं डरती। क्योंकि आपका देर तक ज़्यादा देर का नहीं होगा, शायद अब खत्म भी हो चला।"
और उसने फिर उठकर खड़ा होना चाहा। आशा ने उसका हाथ थाम लिया। कहा- "सिर की सौगंध तुम्हें, और कुछ देर बैठो!"
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:37

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आशा ने पूछा, "अब सच-सच बताना, मेरी ऑंख की किरकिरी कैसी लगी तुम्हें?"
महेन्द्र ने कहा- "बुरी नहीं।"
आशा बहुत ही क्षुब्ध होकर बोली, "तुम्हें तो कोई अच्छी ही नहीं लगती।"
महेन्द्र- "सिर्फ एक को छोड़कर।"
आशा ने कहा- "अच्छा, परिचय ज़रा जमने दो, फिर देखती हूँ, अच्छी लगती है या नहीं।"
महेन्द्र बोला- "जमने दो? यानी ऐसा लगातार चला करेगा रवैया?"
आशा ने कहा- "भलमनसाहत के नाते भी तो लोगों से बोलना-चालना पड़ता है। एक दिन की भेंट के बाद ही अगर मिलना-जुलना बन्द कर दो, तो क्या सोचेगी बेचारी? तुम्हारा हाल ही अजीब है। और कोई होता तो ऐसी स्त्री से दौड़कर मिला करता और तुम हो कि आफत आ पड़ी मानो!"
औरों से अपने इस फ़र्क़ की बात सुनकर महेन्द्र खुश हुआ। बोला- "अच्छा यही सही। मगर ऐसी जल्दबाज़ी क्या? मैं कहीं भागा तो नहीं जा रहा हूँ, न तुम्हारी सखी को भागने की जल्दी है- लिहाज़ा, बीच-बीच में भेंट हुआ ही करेगी और भेंट होने पर भलमनसाहत रखे, इतनी अक्ल तुम्हारे पति को है।"
महेन्द्र ने सोचा था, अब से विनोदिनी किसी-न-किसी बहाने ज़रूर आ जाया करेगी। लेकिन गलत समझा था। वह पास ही नहीं फटकती कभी, अचानक जाते-आते भी कहीं नहीं मिलती। अपनी स्त्री से वह इसका ज़िक्र भी न करता कि कहीं मेरा आग्रह न झलक पड़े। बीच-बीच में विनोदिनी से मिलने की स्वाभाविक और मामूली-सी इच्छा को छिपाए और दबाए रखने की कोशिश में उसकी अकुलाहट बढ़ने लगी। फिर विनोदिनी की उदासीनता उसे और उत्तेजित करने लगी।
विनोदिनी से भेंट होने के दूसरे दिन प्रसंगवश यों ही मज़ाक में महेन्द्र ने आशा से पूछा- "तुम्हारा यह अयोग्य पति तुम्हारी ऑंख की किरकिरी को कैसा लगा?"
महेन्द्र को इसकी ज़बरदस्त आशा थी कि पूछने से पहले ही आशा से उसे इसका बड़ा ही अच्छा ब्यौरा मिलेगा। लेकिन सब्र करने का जब कोई नतीजा न निकला, तो ढंग से यह पूछ बैठा।
आशा मुश्किल में पड़ी। विनोदिनी ने कुछ भी नहीं कहा। इससे आशा अपनी सखी से नाराज़ हुई थी। बोली-"ठहरो भी, दो-चार दिन मिल-जुलकर तो कहेगी। कल भेंट भी कितनी देर को हुई और बातें भी कितनी हो सकीं।"
महेन्द्र इससे भी कुछ निराश हुआ और विनोदिनी के बारे में लापरवाही दिखाना उसके लिए और भी कठिन हो गया।
इसी बीच बिहारी आ पहुँचा। पूछा- "क्यों भैया, आज किस बात पर विवाद छिड़ा हुआ है?"
महेन्द्र ने कहा- "देखो न, तुम्हारी भाभी ने कुमुदिनी या प्रमोदिनी जाने किससे तो जाने क्या नाता जोड़ा है लेकिन मुझे भी अगर उससे वैसा ही कुछ जोड़ना पड़े तो जीना मुश्किल जानो!" आशा के घूँघट के अन्दर घोर कलह घिर आया। बिहारी ज़रा देर चुपचाप महेन्द्र की ओर ताकता रहा और हँसता रहा। बोला- "भाभी, बात तो यह अच्छी नहीं। यह सब भुलाने की बातें हैं। तुम्हारी ऑंख की किरकिरी को मैंने देखा है, और भी अगर बार-बार देख पाऊँ, तो उसे दुर्घटना न समझूँगा, यह मैं कसम खाकर कह सकता हूँ। लेकिन इतने पर भी महेन्द्र जब कबूल नहीं करना चाहते तो दाल में कुछ काला है।"
महेन्द्र और बिहारी में बहुत भेद है, आशा को इसका एक और सबूत मिला।
अचानक महेन्द्र को फोटोग्राफी का शौक़ हो आया। पहले भी एक बार उसने सीखना शुरू करके छोड़ दिया था। उसने फिर से कैमरे की मरम्मत की, और तस्वीरें लेनी शुरू कर दी। घर के नौकर-चाकरों तक के फोटो लेने लगा।
आशा ज़िद पकड़ बैठी- "मेरी सखी की तस्वीर लेनी पडेग़ी।"
बहुत मुख्तसर में महेन्द्र ने जवाब दिया- "अच्छा!"
और उससे मुख्तसर में उसकी ऑंख की किरकिरी ने कहा- "नहीं।" आशा को इसके लिए फिर एक तरकीब खोजनी पड़ी।
तरकीब यह थी कि आशा किसी तरह उसे अपने कमरे में बुलाएगी और सोते समय ही उसकी तस्वीर को लेकर महेन्द्र एक ख़ासा सबक देगा। मज़े की बात यह कि विनोदिनी दिन में कभी सोती नहीं। लेकिन उस दिन आशा के कमरे में उसे झपकी आ गई। बदन पर लाल ऊनी चादर डाले, खुली खिड़की की तरफ मुँह किए, हथेली पर सिर रखे वह ऐसी सुन्दर अदा से सोई थी कि महेन्द्र ने कहा- "लगता है, फोटो खिंचाने के लिए तैयार हुई है।"
दबे पाँव महेन्द्र कैमरा लेकर आया। किस तरह से तस्वीर अच्छी आएगी, यह तय करने के लिए विनोदिनी को बड़ी देर तक बहुत अच्छी तरह देख लेना पड़ा। यहाँ तक कि कला कि खातिर छिपकर सिरहाने के पास उसके बिखरे बालों को ज़रा-सा हटा देना पड़ा। नहीं जँचा तो उसे फिर से सुधार लेना पड़ा। कानोंकान उसने आशा से कहा- "पाँव के पास से चादर को ज़रा बाईं तरफ खिसका दो!" भोली आशा ने उसके कानों में कहा- "मुझसे ठीक न बनेगा, कहीं नींद न टूट जाए। तुम्हीं खिसका दो।"
महेन्द्र ने चादर खिसका दी।
और तब उसने तस्वीर खींचने के लिए कैमरे में प्लेट डाली। डालना था कि खटका हुआ और विनोदिनी हिल उठी, लम्बा नि:श्वास छोड़ घबराकर उठ बैठी। आशा ज़ोर से हँस पड़ी। विनोदिनी बेहद नाराज हुई। अपनी जलती हुई ऑंखों से महेन्द्र पर चिनगारियाँ बरसाती हुई बोली- "बहुत बुरी बात है।"
महेन्द्र ने कहा- "बेशक बुरी बात है। लेकिन चोरी भी की और चोरी का माल हाथ न लगा, इससे तो मेरे दोनों काल गए। इस बुराई को ही लेने दीजिए, उसके बाद मुझे सज़ा दीजिएगा।" आशा भी बहुत आरजू-मिन्नत करने लगी। तस्वीर ली गई। लेकिन पहली तस्वीर ख़राब हो गई। लिहाज़ा दूसरे दिन दूसरी तस्वीर लिये बिना फोटोग्राफर न माना। उसके बाद मित्रता के चिद्द-स्वरूप दोनों सखियों की एक साथ एक तस्वीर लेने की बात आई। विनोदिनी 'ना' न कह सकी। बोली- "यही लेकिन आखिरी है।"
यह सुनकर महेन्द्र ने उस तस्वीर को बर्बाद कर दिया। इस तरह तस्वीर लेते-लेते परिचय काफ़ी आगे बढ़ गया।
15
बाहर से हिला-डुला दो तो दबी राख में आग फिर से लहक उठती है। आशा और महेन्द्र की मुहब्बत का उछाह मंद पड़ता जा रहा था, वह तीसरी तरफ की ठोकर से फिर जाग पड़ा। आशा में हँसी-दिल्लगी की ताकत न थी, पर आशा उससे थकती न थी, लिहाज़ा विनोदिनी की आड़ में आशा को बहुत बड़ा आश्रय मिल गया। महेन्द्र को हमेशा आनन्द की उमंग में रखने के लिए उसे लोहे के चने नहीं चबाने पड़ते थे।
विवाह होने के बाद कुछ ही दिनों में आशा और महेन्द्र एक-दूसरे के लिए अपने को उजाड़ने पर आमादा थे- प्रेम का संगीत शुरू ही पंचम के निषाद से हुआ था, सूद के बजाय पूँजी ही भुना खाने पर तुले थे। अब उसकी अपनी कोशिश न रह गई। महेन्द्र और विनोदिनी जब हँसी-मज़ाक करते होते, वह बस जी खोलकर हँसने में साथ देती। पत्ते खेलने में महेन्द्र आशा को बेतरह चकमा देता, तो आशा विनोदिनी से फैसले के लिए गिड़गिड़ाती हुई शिकायत करती। महेन्द्र कोई मज़ाक कर बैठता या गैरवाजिब कुछ कहता तो आशा को यह उम्मीद होती कि उसकी तरफ से विनोदिनी उपयुक्त जवाब दे देगी। इस प्रकार इन तीनों की मण्डली जम गई।
मगर इससे विनोदिनी के काम-धन्धों में किसी तरह की ढिलाई न आ पाई। रसोई, गृहस्थी के दूसरे काम-काज, राजलक्ष्मी की सेवा-जतन- सारा कुछ खत्म करके ही वह इस आनन्द में शामिल होती। महेन्द्र आज़िजी से कहता- "नौकर-महरी को काम नहीं करने देती हो, चौपट करोगी उन्हें तुम।"
विनोदिनी कहती- "काम न करके खुद चौपट होने से यह बेहतर है। तुम अपने कॉलेज जाओ!"
महेन्द्र- "ऐसी बदली के दिन?"
विनोदिनी- "न यह नहीं होने का... गाड़ी तैयार है, जाना पड़ेगा।"
महेन्द्र- "मैंने तो गाड़ी को मना कर दिया था।"
विनोदिनी ने कहा "मैंने कह रखा था।" कहकर महेन्द्र की पोशाक लाकर हाज़िर कर दी।
महेन्द्र- "तुम्हें राजपूत के घर पैदा होना चाहिए था, लड़ाई के समय अपने आत्मीय को कवच पहनाती।"
मौज़-मजे के लिए कॉलेज न जाना, पढ़ाई में ढिलाई करना विनोदिनी क़तई न सह पाती थी। उसके कठोर शासन से दिन 'दोपहर को विनोद एकबारगी उठ गया और साँझ का अवकाश महेन्द्र के लिए बड़ा ही रमणीक और मोहक हो उठा। उसका दिन मानो अवसान के इन्तज़ार में रहता।
पहले बीच-बीच में रसोई समय पर न बनती और महेन्द्र को कॉलेज न जाने का बहाना मिल जाता। अब विनोदिनी सारा इन्तज़ाम खुद करके समय पर रसोई बनाती। खाना खत्म होता कि महेन्द्र को खबर कर दी जाती- "गाड़ी तैयार खड़ी है।" पहले कपड़ों का इस तरतीब से रहना तो दूर रहा। यही पता न होता था कि वे धोबी के यहाँ हैं कि अलमारी की ही किसी गुफा में पड़े हैं। शुरू-शुरू में विनोदिनी इन बेतरतीबियों के लिए महेन्द्र के सामने आशा को मीठा उलाहना दिया करती थी- महेन्द्र भी उस बेचारी की ला-इलाज योग्यता पर स्नेह से हँस दिया करता। अन्त में सखी के नेह से उसने आशा की सारी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। घर की शक्ल बदल गई।
अचकन का बटन नदारद है, आशा झटपट कोई तरकीब नहीं निकाल पाती कि विनोदिनी आकर अचकन उसके हाथ से झपट लेती और बात-की-बात में सी देती। एक दिन महेन्द्र की परसी हुई थाली बिल्ली ने जूठी कर दी। आशा परेशान। देखते-ही-देखते विनोदिनी ने रसोई से जाने क्या-क्या लाकर काम चला दिया। आशा दंग रह गई।
अपने खाने-पहनने, काम और आराम में, हर बात में तरह-तरह से महेन्द्र को विनोदिनी के सेवा-स्पर्श का अनुभव होने लगा। विनोदिनी के बनाए रेशमी जूते उसके पाँवों में पड़े, विनोदिनी का बुना रेशमी गुलबन्द गले में एक पति के पास जाती- उसमें कुछ तो होता आशा का अपना और कुछ किसी और का- अपनी वेश-भूषा के रूप और आनन्द में वह अपनी सखी से मानो गंगा-यमुना-सी मिल गई है। बिहारी की अब वह कद्र न रही थी- उसकी बुलाहट नहीं होती। उसने महेन्द्र को लिख भेजा- 'कल इतवार है, दोपहर को आकर मैं माँ के हाथ का बना भोजन खाऊँगा।' महेन्द्र ने देखा, यह तो इतवार ही गोबर हो जाएगा। उसने जल्दी से लिख भेजा, 'इतवार को कुछ ज़रूरी काम से मुझे बाहर जाना पड़ेगा।'
फिर भी भोजन कर चुकने के बाद बिहारी खोज-खबर के लिए महेन्द्र के यहाँ आया। नौकर से पता चला, महेन्द्र कहीं बाहर नहीं गया है। 'महेन्द्र भैया' कहकर उसने सीढ़ी से आवाज़ दी और कमरे में दाखिल हुआ। महेन्द्र बड़ा अप्रतिभ हो गया। 'सिर में बे-हिसाब दर्द है'-कहकर उसने तकिए का सहारा लिया। यह सुनकर और महेन्द्र के चेहरे का हाव-भाव देखकर आशा तो अचकचा गई। उसने विनोदिनी की तरफ इस आशय से ताका कि क्या करना चाहिए। विनोदिनी खूब समझ रही थी- मामला संगीन नहीं है, फिर भी घबराकर बोली, "बड़ी देर से बैठे हो, थोड़ी देर लेट जाओ! मैं यूडीकोलोन ले आती हूँ।" महेन्द्र बोला- "रहने दो, उसकी ज़रूरत नहीं।"
विनोदिनी ने उस पर ध्यासन न दिया। वह जल्दी से बर्फ-मिले पानी में यूडीकोलोन डालकर ले आई। आशा को गीला रूमाल देती हुई बोली- "उनके सिर पर बाँध दो!"
महेद्र बार-बार कहने लगा- "अरे छोड़ो-छोड़ो!" बिहारी हँसी रोककर चुपचाप यह नाटक देखता रहा। मन में गर्व करते हुए महेन्द्र ने कहा- "कमबख्त बिहारी देखे कि मेरी कितनी इज्ज़त होती है!"
बिहारी खड़ा था। लाज से काँपते हाथों से आशा ठीक से पट्टी न बाँध पाई लुढ़ककर यूडीकोलोन की एक बूँद महेन्द्र की ऑंख से गिर गई। विनोदिनी ने आशा से रूमाल लेकर अपने कुशल हाथों से ठीक से बाँध दिया। सफेद कपड़े के दूसरे टुकड़े को यूडीकोलोन में भिगोकर धीमे-धीमे पट्टी पर निचोड़ने लगी। आशा घूँघट काढ़े पंखा झलती रही।
स्निग्ध स्वर में विनोदिनी ने पूछा- "महेन्द्र बाबू, आराम मिलता है?" आवाज़ में इस तरह शहद घोलकर विनोदिनी ने तेज़ कनखियों से बिहारी को देख लिया। देखा, कौतुक से बिहारी की ऑंखें हँस रही हैं। उसको यह सब कुछ प्रहसन-सा लगा। विनोदिनी समझ गई, 'इस आदमी को ठगना आसान नहीं, इसकी पैनी निगाह से कुछ नहीं बच सकता।'
बिहारी ने हँसकर कहा- "विनोदिनी भाभी, ऐसी तीमारदारी से बीमारी जाने की नहीं, और बढ़ जाएगी।"
विनोदिनी- "मैं मूर्ख स्त्री, मुझे इसका क्या पता! आपके चिकित्सा-शास्त्र में ऐसा ही लिखा है, क्यों?"
बिहारी- "लिखा तो है ही। सेवा देखकर अपना भी माथा दुखने लगा। लेकिन फूटे कपाल को चिकित्सा के बिना ही चंगा हो जाना पड़ता है। महेन्द्र भैया का कपाल जोरदार है।"
विनोदिनी ने कपड़े का ओछा टुकड़ा रख दिया। कहा- "न, हमें क्या पड़ी! दोस्त का इलाज दोस्त ही करे।"
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बिहारी ने सोचा- 'ऊँहूँ! दूर-दूर रहने से अब काम नहीं चलने का। चाहे जैसे हो, इसके बीच- अपने लिए भी जगह बनानी पड़ेगी। इनमें से किसी को यह पसन्द तो न होगा, लेकिन फिर भी मुझे रहना पड़ेगा।' बुलावे या स्वागत की अपेक्षा किए बिना ही बिहारी महेन्द्र के व्यूह में दाखिल होने लगा। उसने विनोदिनी से कहा- "विनोद भाभी, इस शख़्स को इसकी माँ ने बर्बाद किया, इसकी बीवी बर्बाद कर रही है- तुम भी उस जमात में शामिल न होकर इसे कोई नई राह सुझाओ।"
महेन्द्र ने पूछा- "यानी?"
बिहारी- "यानी मेरे-जैसा आदमी, जिसे कभी कोई नहीं पूछता..."
महेन्द्र- "उसको बर्बाद करो! बर्बाद होने की उम्मीदवारी इतनी आसान नहीं बच्चू कि दरखास्त दे दी और मंजूर हो गई।"
विनोदिनी हँसकर बोली- "बर्बाद होने का दम होना चाहिए बिहारी, बाबू!"
बिहारी ने कहा- "अपने-आप में वह खूबी न भी हो तो पराए हाथ से आ सकती है। एक बार देख ही लो पनाह देकर!"
विनोदिनी- "यों तैयार होकर आने से कुछ नहीं होता- लापरवाह रहना होता है। क्या ख्याल है, भई ऑंख की किरकिरी! अपने इस देवर का भार तुम्हीं उठाओ न!"
आशा ने दो अगुलियों से उसे ठेल दिया। बिहारी ने भी इस दिल्लगी में साथ न दिया।
विनोदिनी से यह छिपा न रहा कि बिहारी को आशा से मजाक करना पसन्द नहीं। वह आशा पर श्रद्धा रखता है और विनोदिनी को उल्लू बनाना चाहता है, यह बात उसे चुभी।
उसने आशा से फिर कहा- "तुम्हारा यह भिखारी देवर मुझे इंगित करके तुमसे ही दुलार की भीख माँगने आया है- कुछ दे दो न, बहन!"
आशा बहुत खीझ उठी। जरा देर के लिए बिहारी का चेहरा तमतमा उठा, दूसरे ही दम वह हँसकर बोला- "दूसरे पर यों टाल देना ठीक नहीं है।"
विनोदिनी समझ गई कि बिहारी सब बंटाधार करके आया है- इसके सामने हथियारबन्द रहना जरूरी है। महेन्द्र भी आजिज आ गया। बोला- "बिहारी तुम्हारे महेन्द्र भैया किसी व्यापार में नहीं पड़ते, जो पास है, उसी से खुश हैं वे।"
बिहारी- "खुद न पड़ना चाहते हो चाहे, मगर किस्मत में लिखा होता है तो व्यापार की लहर बाहर से भी आ सकती है।"
विनोदिनी- "बहरहाल आपका तो हाथ ख़ाली है, फिर आपकी लहर किधर से आती है?"
और व्यंग्य की हँसी हँसकर उसने आशा को दबाया। आशा कुढ़कर चली गई। बिहारी मुँह की खाकर गुस्से में भी चुप रहा। वह जाने को तैयार हुआ, तो विनोदिनी बोल उठी- "हताश होकर न जाइए बिहारी बाबू, मैं ऑंख की किरकिरी को भेजे देती हूँ।"
विनोदिनी के उठने से बैठक टूट गई। इससे महेन्द्र मन-ही-मन नाराज हुआ। महेन्द्र की नाराज शक्ल देखकर बिहारी का आवेग उमड़ आया।
बोला- "महेन्द्र भैया, अपना सत्यानाश करना चाहते हो, करो! तुम्हारी ऐसी ही आदत रही है। लेकिन जो सरल हृदय की साध्वीड़ तुम्हारा विश्वास करके पनाह में है, उसका सत्यानाश तो न करो। अब भी कहता हूँ, ऐसा न करो!"
कहते-कहते बिहारी का गला रुँध गया।
दबे क्रोध से महेन्द्र ने कहा- "बिहारी, तुम्हारी बात बिल्कुल समझ में नहीं आती। बुझौअल रहने दो, साफ-साफ कहो।"
बिहारी ने कहा- "मैं दो टूक ही कहूँगा। विनोदिनी तुम्हें जान-बूझकर पाप की ओर खींच रही है और तुम बिना समझे क़दम बढ़ा रहे हो?"
महेन्द्र गरज उठा- "सरासर झूठ है। तुम अगर भले घर की बहू-बेटी को गलत सुबहे की निगाह से देखते हो तो तुम्हारा घर के अन्दर आना ठीक नहीं।"
इतने में विनोदिनी एक थाली में मिठाइयाँ लेकर आई और बिहारी के सामने रखी। बिहारी बोला- "अरे, यह क्या! मुझे बिल्कुल भूख नहीं।"
विनोदिनी बोली- "ऐसी क्या बात! मुँह मीठा करके ही जाना होगा।"
बिहारी बोला- "मेरी दरखास्त मंजूर हुई शायद? आदर-सत्कार शुरू हो गया?"
विनोदिनी होठ दबाकर हँसी। कहा- "आप जब देवर ठहरे, रिश्ते का ज़ोर तो है। जहाँ दावा कर सकते हैं, वहाँ भीख क्या माँगना? आदर तो आप छीनकर ले सकते हैं। आप क्या कहते हैं, महेन्द्र बाबू?" महेन्द्र बाबू ने कोई टिप्पणी नहीं की।
विनोदिनी- "बिहारी बाबू, आप शर्म से नहीं खा रहे हैं या नाराजगी से! किसी और को बुलाना पड़ेगा?"
बिहारी- "नहीं, जरूरत नहीं। जो मिला है, काफ़ी है।"
विनोदिनी- "मजाक? आप से तो पार पाना मुश्किल है। मिठाई से भी मुँह बन्द नहीं होता।"
रात को आशा ने महेन्द्र से बिहारी की शिकायत की। महेन्द्र और दिन की तरह हँसकर टाल नहीं गया, बल्कि उसने साथ दिया। सुबह ही महेन्द्र बिहारी के घर गया। बोला- "बिहारी, लाख हो, विनोदिनी आखिर अपने घर की तो नहीं है। तुम सामने होते हो तो उसे कैसी झिड़क होती है।"
बिहारी ने कहा- "अच्छा! तब तो यह ठीक नहीं। उन्हें अगर एतराज है, तो मैं सामने न जाऊँगा।"
महेन्द्र निश्चिंत हुआ। यह अप्रिय काम इस आसानी से बन जाएगा वह सोच भी न सका था। बिहारी से वह डरता था।
वह उसी दिन महेन्द्र के घर गया। बोला- "विनोद-भाभी मुझे, माफ कर दो!"
विनोदिनी- "कैसी माफी?"
बिहारी- "महेन्द्र से मालूम हुआ, मैं यहाँ आकर सामने होता हूँ, इसलिए आप नाराज हैं। इसलिए मैं माफी माँगकर रुखसत हो जाऊँगा।"
विनोदिनी- "ऐसा भी होता है भला! मैं तो आज हूँ, कल नहीं रहूंगी- मेरी वजह से आप क्यों रुख़्सत होंगे? इतना झमेला होगा, यह जानती होती तो मैं यहाँ न आती...।' कहकर विनोदिनी मुँह मलिन किए बिना ऑंसू छिपाने को तेजी से चली गई।
बिहारी के मन में आया- 'झूठे सन्देह पर मैंने नाहक ही विनोदिनी के मन को चोट पहुँचाई है।'
उस दिन मानो मुश्किल में पड़ी राजलक्ष्मी महेन्द्र के पास जाकर बोली- "महेन्द्र विपिन की बहू घर जाने के लिए उतावली हो गई है।"
महेन्द्र ने पूछा- "क्यों, यहाँ उन्हें कोई तकलीफ है?"
राजलक्ष्मी- "तकलीफ नहीं, वह कहती है, मुझ-जैसी विधवा ज़्यादा दिन दूसरे के घर रहेगी, तो लोग निन्दा करेंगे।"
महेन्द्र क्षुब्ध होकर बोला- 'तो यह पराया घर है!'
बिहारी बैठा था। महेन्द्र ने उसे खीझी निगाह से देखा।
बिहारी ने सोचा था, 'कल मैंने जो कुछ कहा, उसमें निन्दा का आभास था- शायद उसी से विनोदिनी का जी दुखा।'
पति-पत्नी दोनों विनोदिनी से रूठे रहे।
ये बोलीं- "हमें पराया समझती हो, बहन!"
वे बोले- "इतने दिनों में हम पराए हो गए।"
विनोदिनी ने कहा- "हमें क्या तुम आजीवन पकड़े रहोगी?"
महेन्द्र बोला- "ऐसी जुर्रत कहाँ!"
आशा बोली- "फिर ऐसे क्यों हमारे जी को चुराया तुमने?"
उस दिन कुछ भी तय न हो सका। विनोदिनी बोली-"नहीं बहन, बेकार है, दो दिनों के लिए ममता न बढ़ाना ही ठीक है।"
कहकर अकुलाई हुई ऑंखों से उसने एक बार महेन्द्र को देखा।
दूसरे दिन बिहारी ने आकर कहा- "विनोद भाभी, यह जाने की ज़िद क्यों? कोई कुसूर किया है- उसी की सजा?"
मुँह फेरकर विनोदिनी बोली- "कुसूर आप क्यों करने लगे, कुसूर है मेरी तकदीर का।"
बिहारी- "आप अगर चली जाएँ, तो मुझे यही लगता रहेगा कि मुझी से नाराज होकर चली गई आप।"
करुण ऑंखों से विनती ज़ाहिर करती हुई विनोदिनी ने बिहारी की ओर ताका। कहा- "आप ही कहिए न, मेरा रहना उचित है?"
बिहारी मुश्किल में पड़ गया। रहना उचित है, यह बात वह कैसे कहे?
बोला- "ठीक है, आपको जाना तो पड़ेगा ही, लेकिन दो-चार दिन रुककर जाएँ, तो क्या हर्ज है?"
अपनी दोनों ऑंखें झुकाकर विनोदिनी ने कहा- "आप सब लोग रहने का आग्रह कर रहे हैं आप लोगों की बात टालकर जाना मेरे लिए मुश्किल है, मगर आप लोग गलती कर रहे हैं।"
कहते-कहते उसकी बड़ी-बड़ी पलकों से ऑंसू की बड़ी-बड़ी बूँदें तेजी से ढुलकने लगीं।
बिहारी इन मौन ऑंसुओं से व्याकुल होकर बोल उठा- "महज इन कुछ दिनों में ही आपने सबको मोह लिया है, इसी से आपको कोई छोड़ना नहीं चाहता। अन्यथा न सोचें विनोद भाभी, ऐसी लक्ष्मी को चाहकर विदा भी कौन करेगा?"
आशा घूँघट काढ़े एक कोने में बैठी थी। घूँघट सरकारकर वह रह-रहकर ऑंखें पोंछने लगी।
आइन्दा विनोदिनी ने जाने की बात न चलाई।
बीच में यह जो झमेला खड़ा हुआ, उसे एकबारगी चुका देने की नियत से महेन्द्र ने प्रस्ताव रखा कि अगले इतवार को दमदम के बगीचे में पिकनिक कर आएँ।
आशा बहुत खुश हो गई। लेकिन विनोदिनी राजी न हुई। उसके तैयार न होने से आशा और महेन्द्र मायूस हो गए। उन्हें लगा, "इन दिनों विनोदिनी न जाने क्यों दूर हट जाना चाहती है!"
तीसरे पहर बिहारी आया। विनोदिनी बोली- "जरा देखिए तो बिहारी बाबू महेन्द्र बाबू दमदम जा रहे हैं पिकनिक के लिए। मैं नहीं जाना चाहती, तो सुबह से दोनों मुझसे रूठे हैं।"
बिहारी बोला- "नाराज होना उनका बेजा नहीं। आप साथ न गईं तो इनकी जो पिकनिक होगी, ईश्वर करे सातवें दुश्मन की भी वैसी न हो।"
विनोदिनी- "फिर आप भी चलिए न! आप चलें, तो मैं भी चलूँगी।"
बिहारी- "ठीक तो है। मगर बात यों है कि कर्म, दरअसल कर्त्ता की इच्छा पर होता है। बाबू की क्या राय है।?"
बिहारी के प्रति इस पक्षपात से मालिक और मालकिन, दोनों ही भीतर-भीतर कुढ़ गए। बिहारी को साथ ले चलने की बात से महेन्द्र का आधा उत्साह जाता रहा। वह बिहारी को हर तरह से यह जता देने को आतुर था कि उसकी मौजूदगी विनोदिनी को कभी पसन्द नहीं-लेकिन अब तो उसे छोड़ जाना असम्भव होगा।
महेन्द्र ने कहा- "बेजा क्या है, अच्छा ही तो है। लेकिन बिहारी तुम्हारा ख़ास ऐब है कि जहाँ जाते हो, वहाँ कोई-न-कोई हंगामा मचाने से बाज नहीं आते। या तो वहाँ आस-पास के बच्चों की जमात जुटा लोगे या फिर गोरों से मार-पीट की नौबत। क्या कर बैठोगे क्या पता?"
बिहारी महेन्द्र की अनिच्छा को समझ गया। मन-ही-मन हँसा। बोला- "दुनिया में यही तो मजा है। क्या से क्या हो जाए, कहाँ कौन-सा फसाद खड़ा हो जाए- पहले से कुछ नहीं कहा जा सकता। तो विनोद-भाभी, तड़के ही चल देना पड़ेगा। मैं समय से हाजिर हो जाऊँगा।"
सामान और नौकरों के लिए एक थर्ड क्लास और उन लोगों के लिए एक सेकेण्ड क्लास की बग्घी लाई गई। ख़ासा बड़ा एक पैक बक्स लिये बिहारी ठीक समय पर हाजिर हो गया। महेन्द्र ने कहा- "अरे यह फिर क्या उठा लाए? नौकरों वाली गाड़ी में तो अब यह आएगा नहीं।"
बिहारी बोला- 'आप परेशान न हों, मैं ठीक किए देता हूँ।"
विनोदिनी और आशा गाड़ी पर सवार हुए। बिहारी का क्या करे, महेन्द्र जरा आगा-पीछा करने लगा। बिहारी ने अपना सामान गाड़ी के ऊपर पटका और आप कोच-बक्स पर जा बैठा।
महेन्द्र के जी में जी आया। वह सोच रहा था, 'जाने बिहारी अन्दर ही बैठ जाएगा कि क्या करेगा!'
विनोदिनी ने परेशान होकर पूछा- "गिर तो नहीं पड़ेंगे बिहारी बाबू?"
बिहारी बोल उठा- "आप फ़िक्र न करें गिरना या बेहोश हो जाने की भूमिका नहीं।"
जैसे ही गाड़ी खिसकी, महेन्द्र ने कहा- "न हो तो मैं ही ऊपर जाता हूँ, बिहारी अन्दर आ जाए।"
आशा ने जल्दी से उसकी चादर खींची। कहा- "नहीं, तुम नहीं जा सकते।"
विनोदिनी बोली- "आपको आदत नहीं, क्या पता गिर-विर पड़ें।"
जोश में आकर महेन्द्र ने कहा- "गिर पडूँगा? हर्गिज नहीं।"
और वह गाड़ी से बाहर निकलने का प्रयत्न करने लगा।
विनोदिनी- "तोहमत आप बिहारी बाबू पर लगाते हैं, मगर हंगामा मचाने में बेजोड़ तो आप ही हैं।"
महेन्द्र ने जरा मुँह लटकाकर कहा- "अच्छा एक काम करें। मैं एक और गाड़ी लेकर चलता हूँ, बिहारी यहाँ आ जाए।"
आशा ने कहा, "तो मैं तुम्हारे ही साथ चलूँगी।"
विनोदिनी बोली- "और मैं तब गाड़ी में से कूद पडूँ?" होते-होते झंझट आखिर निबट गया।
रास्ते-भर महेन्द्र बड़ा गम्भीर रहा।
गाड़ी दमदम के बगीचे में पहुँच गई। नौकरों वाली गाड़ी बहुत पहले ही रवाना हुई थी, पर लेकिन अभी तक उसका पता न था।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:38

शरत् का सवेरा! बड़ा ही सुहाना। धूप निकल आई थी। ओस की बूँदें सूख चुकी थीं, पर निर्मल प्रकाश से पेड़-पौधे झिलमिला रहे थे। दीवार से लगी हरसिंगार की कतार थी। नीचे फूल बिछ गए थे। मह-मह खुशबू!
कलकत्ता की ईंट की ऊँची दीवार के घेरे में बाहर आकर आशा वन की हिरनी-सी उमग उठी। विनोदिनी के साथ उसने ढेरों फूल बीने, पेड़ से शरीफे तोड़े और नीचे बैठकर खाए। दोनों सखियों ने पोखर में देर तक स्नान किया। एक निरर्थक आनन्द से इन दो नारियों ने पेड़ों की छाया और छिटकी किरणों, पोखर के पानी और कुंजों के फूल-पत्तों को पुलकित सचेतन कर दिया।
दोनों सखियाँ नहा आईं। देखा, नौकरों वाली गाड़ी अब भी नदारद है। महेन्द्र बँगले के बरामदे में बिछी एक चौकी पर बैठा-बैठा उदास होकर एक विलायती इश्तहार पढ़ रहा था।
विनोदिनी ने पूछा- "और बिहारी बाबू?"
संक्षेप में महेन्द्र बोला- "पता नहीं।"
विनोदिनी- "चलिए, उन्हें ढूँढ़े।"
महेन्द्र- "आखिर उन्हें कोई चुराकर तो ले नहीं जाएगा! ढूँढ़े बिना भी मिल जाएँगे।"
विनोदिनी- "मगर हो सकता है, आपकी फ़िक्र से वह बेहाल हो रहे हों। चलकर उन्हें दिलासा ही दे आएँ।"
तालाब के किनारे बँधा हुआ विशाल बरगद था। उसी के चौंतरे पर बिहारी अपना पैक-बक्स खोलकर मिट्टी के तेल का चूल्हा जलाकर पानी गरम कर रहा था। जैसे ही लोग पहुँचे, उसने सबको चौंतरे पर बिठाकर एक-एक प्याला गरम चाय और तश्तरी में दो-एक मिठाइयाँ देकर उनकी खातिर की। विनोदिनी बार-बार कहने लगी-"गनीमत है कि बिहारी बाबू सारा सरंजाम साथ ले आए हैं! वरना चाय न मिलती तो क्या हाल होता महेन्द्र बाबू का।"
चाय मिली, तो महेन्द्र जी उठा। फिर भी बोला- "यह सब बिहारी की ज्यादती है। आए हैं हज़रत पिकनिक को और यहाँ भी बदस्तूर सारा इन्तज़ाम उठा लाए हैं। इससे मज़ा नहीं रहता!"
तपी दोपहरी की हवा पत्तों में मर्मराहट लाकर बहती रही, तालाब के बाँध पर जामुन की डालों पर कोयल रह-रहकर कूकती रहीं। विनोदिनी अपने बचपन का किस्सा सुनाने लगी- माँ-बाप की बात, छुटपन की सखी-सहेलियों की चर्चा। अचानक उसके माथे पर का पल्ला खिसक पड़ा। विनोदिनी की ऑंखों में कौतुक का जो तीखा कटाक्ष देख पैनी निगाहों वाले बिहारी के मन में आज तक तरह-तरह की शंकाएँ उठती रही थीं, वह श्याम चमक जब एक शान्त सजल रेखा से मन्द पड़ गई, तो बिहारी ने मानो और ही नारी को देखा। लजीली सती की नाईं विनोदिनी एकान्त भक्ति से पति की सेवा कर रही है, मंगलमयी माता के समान संतान को अपनी गोद में लिये हुए है-पहले यह छवि क्षण के लिए भी कभी बिहारी के मन में न आई-आज मानो ज़रा देर के लिए रंगमंच का परदा उठ गया और अन्दर का एक मंगल दृश्य उसे दिखाई दिया। बिहारी ने सोचा, 'विनोदिनी बाहर से विलासिनी युवती तो है, पर उसके अंतर्मन में पूजा-निरत एक नारी तपस्या में लीन है।' एक लम्बी साँस तोड़कर बिहारी ने मन-ही-मन कहा- 'सही-सही अपने को मनुष्य आप भी नहीं जानता- अंतर्यामी ही जानते हैं- परिस्थितिवश जो रूप बाहर बन जाता है, दुनिया उसी को सच समझती है।' बिहारी ने बातों के सिलसिले को टूटने न दिया, प्रश्नों से उसे जगाए रहा। आज सुबह ही जगने के जुल्म से थके हुए महेन्द्र की नींद पाँच बजे खुली। आज़िजी से बोला- "अब चल देना चाहिए।"
विनोदिनी ने कहा- "थोड़ी देर और रुकें तो?"
सामान सहेजने में अंधेरा हो आया। नौकरों ने इतने में खबर दी, किराए की गाड़ी न जाने कहाँ गायब है। ढूँढ़े न मिली। गाड़ी बगीचे के बाहर खड़ी थी। दो गोरे जबर्दस्ती उसे लेकर स्टेशन चल दिए। दूसरी गाड़ी ठीक करने के लिए नौकर भेजा गया। कुढ़ा हुआ महेन्द्र बार-बार मन में कहने लगा- 'आज का दिन मुफ़्त में बर्बाद हो गया।' ऐसी नौबत आ गई कि अपनी अधीरता वह छिपा न सका। बिहारी फिर कोच-बक्स पर जा बैठा। विनोदिनी चुपचाप ही बाहर की तरफ देखती रही- चाँदनी में अवाक् पेड़ों की पाँत दौड़ते हुए घने छाया-प्रवाह की तरह उसकी ऑंखों से होकर गुज़रने लगी। आशा गाड़ी के एक कोने में सो गई और महेन्द्र सारी राह उदास बैठा रहा।
18
पिकनिक के दिन जो वाकया गुज़रा उसके बाद फिर महेन्द्र में विनोदिनी को अपनाने की चाहत बढ़ने लगी। लेकिन दूसरे ही दिन राजलक्ष्मी को फ्लू हो गया। बीमारी कुछ ख़ास न थी, फिर भी उन्हें तकलीफ और कमज़ोरी काफ़ी थी। विनोदिनी रात-दिन उनकी सेवा में लगी रहती।
महेन्द्र बोला- "माँ के सेवा-जतन में यों दिन-रात एक करोगी, तो तुम्हीं बीमार पड़ जाओगी।"
बिहारी ने कहा- "आप नाहक परेशान हैं, भैया! ये सेवा कर रही है, करने दो। दूसरा कोई ऐसी सेवा थोड़े ही करेगा।"
महेन्द्र बार-बार मरीज़ के कमरे में आने-जाने लगा। एक आदमी काम कुछ नहीं करता, लेकिन हर घड़ी पीछे लगा फिरता है, यह बात विनोदिनी को अच्छी न लगी। तंग आकर उसने दो-तीन बार कहा- "महेन्द्र बाबू, यहाँ बैठे रहकर आप क्या कर रहे हैं? जाइए, नाहक क्यों कॉलेज से गैर-हाज़िर होते हैं?"
महेन्द्र उसके पीछे लगा डोलता है, इसका विनोदिनी को नाज़ था। खुशी थी। लेकिन फिर भी ऐसा क्या, बीमार माँ के बिस्तर के पास भी क्षुब्ध बैठे रहना- उसका धीरज टूट जाता, घृणा होती। अपने ऊपर किसी काम की ज़िम्मेदारी रहने पर वह और किसी बात का ख्याल नहीं करती। जब तक खिलाना-पिलाना, रोगी की सेवा, घर के काम-धंधे की ज़रूरत रहती- किसी ने उसे कभी ढीला-ढाला नहीं देखा और खुद भी काम-काज के समय निकम्मापन पसन्द नहीं करती।
कभी-कभी ज़रा देर को, माँ का हाल पूछने के लिए बिहारी आ जाया करता। कमरे में क़दम रखते ही वह समझ जाता कि काहे की ज़रूरत है, कहाँ कौन-सी चीज़ की कमी है, उसकी ऑंखें तुरन्त ताड़ जातीं और लमहे-भर में सब-कुछ ठीक करके वह कमरे से निकल जाता। विनोदिनी समझ रही थी कि मेरी सेवा को बिहारी श्रद्धा की नज़र से देखता है। लिहाज़ा बिहारी के आने से उसे जैसे विशेष पुरस्कार मिलता था। महेन्द्र नियम से कॉलेज जाने लगा। एक तो उसका मिज़ाज ही बड़ा कड़वा हो गया, उस पर यह कैसा परिवर्तन! समय पर खाना तैयार नहीं होता, साइस जाने कहाँ गायब रहता, मोजे का छेद धीरे-धीरे बड़ा होता जाता। ऐसी गड़बड़ में उसे पहले- जैसा आनन्द नहीं आता। जब जिस चीज़ की ज़रूरत हो, उसी क्षण उसे पा जाने से आराम कैसा होता है, इस बारे में वह कई दिन पहले ही स्वाद चख चुका था। अब उसकी कमी से आशा की जहालत में मज़ा खत्म हो गया- "चुन्नी, मैंने बाहर तुमसे कहा कि मेरे नहाने के पहले ही कुरते में बटन लगा रखना, अचकन, पतलून ठीक करके रखना- मगर यह कभी नहीं होता। नहाकर बटन लगाने और कपड़े ढूँढ़ने में ही मेरा घण्टा-भर निकल जाता है।
शर्मसार होकर आशा कहती- "मैंने बैरे से कह दिया था।"
"...बैरे से कह दिया था! खुद कर लेती तो कौन-सा गुनाह हो जाता! कभी जो तुमसे कोई काम हो!"
आशा पर मानो गाज गिरी। ऐसी झिड़की उसे कभी नहीं सुननी पड़ी। उसकी ज़बान पर या मन में यह जवाब न आया कि मेरी इस जहालत के तुम्हीं तो ज़िम्मेदार हो। उसे तो मालूम ही न था गृह-कार्य की कुशलता अभ्यास के अनुभव से आती है। वह सोचा करती थी कि अपनी अयोग्यता और निर्बुध्दिता के कारण ही मैं कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाती। जब-जब महेन्द्र ने विनोदिनी की उपमा देकर आशा को धिक्कारा है, उसने उसे विनम्रता से स्वीकारा है।
कभी-कभी आशा बीमार सास के आस-पास चक्कर काटती, कभी-कभी शर्माई-सी दरवाज़े के पास खड़ी हो जाती। उसकी इच्छा होती कि अपने- आपको वह गृहस्थी के उपयुक्त बनाए, कुछ काम करके दिखाए, परन्तु उससे कोई भी कैसी मनोवेदना उसमें भीतर-ही-भीतर बढ़ रही थी, लेकिन अपनी अस्पष्ट व्यथा और अजानी आशंका को वह साफ़ समझ नहीं पाती। वह खूब महसूस कर रही थी कि उसे चतुर्दिक् का सब-कुछ बर्बाद हो रहा है। लेकिन यह सब कैसे बना था और नष्ट ही कैसे हो रहा है और कैसे इसका प्रतिकार हो- वह नहीं जानती। रह-रहकर यही कहने को जी चाहता कि मैं अयोग्य हूँ,- मेरी मूढ़ता की तुलना नहीं हो सकती।
अब तक तो पति-पत्नी दोनों घर के एक कोने में दुबके कभी बोल-बतियाकर कभी यों ही चुपचाप मजे में दिन बिताते रहे। मगर जब विनोदिनी न होती तो आशा के साथ अकेले बैठकर महेन्द्र बात ही न कर पाता।
महेन्द्र ने बैरे से पूछा- "किसकी चिट्ठी है?"
"बिहारी बाबू की।"
"किसने दी है?"
"बहूजी (विनोदिनी) ने।"
"देखूँ जरा।" चिट्ठी ले ली। जी में आया, फाड़कर उसे पढ़े। उलट-पलटकर देखा, फिर बैरे की तरफ फेंक दिया।
बरामदे में कुछ देर चहलकदमी करके कमरे में आकर महेन्द्र ने देखा, कमरे की दीवार पर टाँगी एक तस्वीर की डोरी टूटने वाली है और इसकी वजह से तस्वीर टेढ़ी हो गई है। आशा को डाँटते हुए महेन्द्र ने कहा- "तुम कुछ भी नहीं देखतीं। इस तरह सारी चीज़ें बर्बाद हो रही हैं।"
दमदम के फूलों का जो गुच्छा बनाकर विनोदिनी ने पीतल की फूलदानी में सजाया था, वह आज भी वहीं सूखा पड़ा है। महेन्द्र कभी इन बातों पर गौर नहीं करता था, आज उसकी निगाह उस पर पड़ी। बोला- "जब तक विनोदिनी आकर फेंक न दे, यह पड़ा ही रहेगा।"
उसने फूल-समेत फूलदानी उठाकर बाहर फेंक दी। ठन्-ठन् बजती वह सीढ़ी पर लुढ़कती जा पड़ी। 'आशा मेरे मन के लायक़ क्यों नहीं रहती, क्यों वह मेरे मन-मुताबिक काम नहीं करती?' महेन्द्र बाहर निकला। जाकर फूलदानी उठा लाया। कोने में एक मेज़ पड़ी सीढ़ी पर बैठकर उसी टेबल पर कोहनी टिकाए हाथों पर सिर रखे सोया रहा।
अंधेरा होने पर कमरे में बत्ती आई, लेकिन आशा नहीं। महेन्द्र छत पर ज़ोर-ज़ोर से चहल-कदमी करने लगा। रात के नौ बजे, महेन्द्र के सूने कमरे में आधी रात का सन्नाटा छा गया- आशा फिर भी न आई। महेन्द्र ने बुलावा भेजा। सकुचाई-सी आकर वह छत पर दरवाज़े के पास ठिठक गई। महेन्द्र पास गया- उसे छाती से लगा लिया। पति के कलेजे से लगकर वह ज़ोरों से रो पड़ी- अपने को ज़ब्त न कर सकी, ऑंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। कलेजे से लगाकर महेन्द्र ने उसके बालों को चूमा- मौन आसमान के सितारे चुपचाप देखते रहे।
रात को महेन्द्र ने बिस्तर पर बैठकर बताया- "कॉलेज में मेरी रात की डयूटी लगी है, कुछ दिनों के लिए मुझे कॉलेज के ही आस-पास कहीं डेरा लेना पड़ेगा।"
आशा सोचने लगी- "गुस्सा शायद रह ही गया है? मुझ पर नाराज होकर तो नहीं जा रहे? आखिर निगुनी मैं। पति को घर से रुख़्सत करके ही रही! मेरा तो मर जाना ही अच्छा था।"
लेकिन महेन्द्र के हाव-भाव में गुस्से का कोई लक्षण न दीखा। बड़ी देर तक वह चुप रहा। आशा के मुखड़े को कलेजे से लगाकर उँगली से बालों को चीरते-चीरते उसके जूड़े को ढीला कर दिया। पहले प्यार से महेन्द्र इसी तरह आशा का जूड़ा खोल दिया करता था- आशा इस पर एतराज़ करती थी। आज मगर उसने चूँ भी न की। अचानक उसके कपाल पर ऑंसू की एक बूँद टपक पड़ी। महेन्द्र ने उसका मुँह अपनी ओर फेरकर स्नेह से रुँधे स्वर में पुकारा- "चुन्नी!"
आशा को कोई जवाब न मिला। अपने कोमल हाथों से उसने कसकर महेन्द्र को दबा लिया। महेन्द्र ने कहा-"मुझसे ग़लती हो गई, माफ कर दो।"
अपने फूल-से सुकुमार हाथ से महेन्द्र के होठों को दबाती हुई वह बोली- "छि:, ऐसा न कहो! तुमने कोई कसूर नहीं किया। कसूर मेरा है। मुझे दासी के समान फटकारो। मुझे अपने पाँवों में रहने लायक़ बना लो!"
जिस दिन जाना था, सुबह जगते समय महेन्द्र ने कहा- "चुन्नी, मेरी रतन, तुम्हें मैं अपने हृदय में सबसे ऊपर रखूँगा। कोई तुमसे आगे नहीं जा सकेगा।"
कलेजे को कड़ा करके सब तरह का त्याग करने को तैयार होकर उसने पति से अपनी एक निहायत मामूली-सी माँग की। बोली- "मुझे रोज़-रोज़ चिट्ठी लिखना!"
महेन्द्र ने पूछा- "तुम भी लिखोगी?"
आशा ने कहा- "मैं क्या लिखना जानती हूँ?"
उसके कान के पास की लट को सरकाता हुआ महेन्द्र बोला- "तुम अक्षय कुमार दत्ता से भी अच्छा लिख सकती हो- जिसे चारुपाठ कहते हैं!"
आशा ने कहा- "मज़ाक रहने दो, हाँ।"
जाने के पहले आशा महेन्द्र का सामान सहेजने लगी। मोटे-मोटे गरम कपड़ों की तह बनाना कठिन था, बक्स में सबका सामान और भी कठिन। दोनों ने मिलकर दबा-दुबूकर जो एक बक्स में आ जाता, उसे दो बक्सों में रखा। फिर भी भूल से जो चीज़ें छूट गईं, उनकी कई गठरियाँ अलग से बन गईं। इससे आशा शर्म महसूस करती रही, तो भी आपस की छीना-झपटी और हँस-हँसकर एक-दूसरे को दोषी ठहराने में आनन्द के पिछले दिन लौट आए। यह तैयारी विदाई की है, ज़रा देर के लिए आशा यह भूल गई। साईस कम-से-कम दस बार जता गया कि गाड़ी तैयार है, मगर कौन सुनता है। अन्त में खिन्न होकर बोला- "खोल दो घोड़ों को।"
सुबह से तीसरा पहर हो गया और अब साँझ होने को आई। तब कहीं एक दूसरे को सेहत का ख्याल रखने की ताकीद करके, नियम से चिट्ठी लिखने का बार-बार वादा कराके भारी हृदय लिये दोनों जुदा हुए। दो-दिन हुए, राजलक्ष्मी उठने-बैठने लगी हैं। शाम को बदन पर एक मोटी चादर लपेटे विनोदिनी के साथ ताश खेल रही थी। आज उसे कोई हरारत न थी। महेन्द्र कमरे में आया। विनोदिनी की तरफ उसने बिल्कुल नहीं देखा। माँ से बोला- "माँ, कॉलेज में मेरी रात की डयूटी लगी है। यहाँ से आते-जाते नहीं बनता-कॉलेज के पास ही एक डेरा ले लिया है। आज से वहीं रहूँगा।"
राजलक्ष्मी अन्दर से रूठकर बोलीं- "जाओ, पढ़ाई में हर्ज होगा, तो रह भी कैसे सकते हो!"
बीमारी तो उनकी जाती रही थी, लेकिन जैसे ही उन्होंने सुना कि महेन्द्र जा रहा है, अपने को बीमार और कमज़ोर महसूस करने लगीं। विनोदिनी से कहा- "ज़रा तकिया तो इधर खिसका दो, बिटिया!" और वह तकिए का सहारा लेकर लेट गई। विनोदिनी धीरे-धीरे उनके बदन पर हाथ फेरने लगी।
महेन्द्र ने उनके कपाल पर हाथ रखा, नब्ज देखी। माँ ने अपनी कलाई हटा ली। कहा- "नब्ज़ से क्या खाक पता चलता है! तू फ़िक्र मत कर, मैं ठीक हूँ।"
कहकर उन्होंने बड़ी बमुश्किल करवट बदली।
विनोदिनी से महेन्द्र ने कुछ न कहा। राजलक्ष्मी को प्रणाम करके वह चला गया।

19
विनोदिनी ने सोचा, 'आखिर माजरा क्या है? मान या गुस्सा या डर, पता नहीं क्या? मुझे यह दिखाना चाहते हैं कि वह मेरी परवाह नहीं करते? बाहर जाकर रहेंगे? अच्छा, यही देखना है, कितने दिन?' लेकिन खुद उसके मन में भी बेचैनी लगने लगी।
वह रोज ही उस पर नया फंदा फेंका करती, तरह-तरह के तीरों से वेधा करती थी। उस काम के चुक जाने से वह छटपटाने लगी। घर का नशा ही उतर गया। महेन्द्र विहीना आशा उसके लिए बिल्कुल स्वाद-रहित थी। आशा को महेन्द्र जितना प्यार करता था, वह विनोदिनी के प्यार के भूखे हृदय को मथा करता था। जिस महेन्द्र ने उसके जीवन की सार्थकता को चौपट कर दिया, जिसने उस जैसी नारी-उपेक्षा करके आशा- जैसी मंदबुध्दि बालिका को अपनाया- उस महेन्द्र को विनोदिनी चाहती है या उससे चिढ़ती है, उसे इसकी सज़ा देगी या अपने हृदय में एक आग लहकाई है, वह आगईर्ष्या की है या प्रेम की या दोनों की मिलावट है, यह वह सोच न पाती। वह मन-ही-मन तीखी हँसी हँसकर कहती- 'मुझ-जैसी गत किसी भी स्त्री की नहीं हुई होगी। मैं यही नहीं समझ सकी कि मैं मारना चाहती हूँ कि मरना।' लेकिन चाहे जिस वजह से भी हो, जलने के लिए या जलाने के लिए, महेन्द्र की उसे नितान्त आवश्यकता थी। गहरा नि:श्वास छोड़ती हुई विनोदिनी बोली- "बच्चू जाएगा कहाँ? उसे आना पड़ेगा। वह मेरा है।" घर की सफाई के बहाने शाम को आशा महेन्द्र के कमरे में उसकी किताबें, उसकी तस्वीर आदि सामानों को छू-छा रही थी, अपने अचरे से उन्हें झाड़-पोंछ रही थी। महेन्द्र की चीजों को बार-बार छूकर, कभी उठाकर कभी रखकर अपने बिछोह की साँझ बिता रही थी। विनोदिनी धीरे-धीरे उसके पास आकर खड़ी हो गई। आशा शर्मा गई। छूना तो उसने छोड़ दिया और कुछ ऐसा जताया मानो वह कुछ खोज रही है। विनोदिनी ने हँसकर पूछा-"क्या हो रहा है, बहन?"
होठों पर हल्की हँसी लाकर बोली- "कुछ भी नहीं।"
विनोदिनी ने उसे गले लगाया। पूछा- "भई ऑंख की किरकिरी, देवरजी इस तरह घर से चले क्यों गए?"
विनोदिनी के इस सवाल से ही आशा शंकित हो उठी। कहा- "तुम्हें तो मालूम है। जानती ही हो, काम का दबाव रहता है।
दाहिने हाथ से उसकी ठुड्डी उठाकर, मानो करुणा से गल गई हो इस तरह सन्न होकर उसने आशा को देखा और लम्बी साँस ली।
आशा का दिल बैठ गया। वह अपने को अबोध और विनोदिनी को चालाक समझा करती थी। विनोदिनी के चेहरे का भाव देखकर उसके लिए सारा संसार अंधकारमय हो गया। विनोदिनी से साफ-साफ कुछ पूछने की उसकी हिम्मत न पड़ी। दीवार के पास एक सोफे पर बैठ गई। विनोदिनी भी बगल में बैठी। उसे अपने कलेजे से जकड़ लिया। सखी के इस आलिंगन से वह अपने-आपको सम्हाल न सकी। दोनों के ऑंसू झरने लगे। दरवाज़े पर अन्धा भिखारी मँजीरा बजाता हुआ गा रहा था, 'तरने को अपने चरणों की तरणी दे माँ, तारा!'
बिहारी महेन्द्र की तलाश में आया था। दरवाज़े पर से ही उसने देखा, आशा रो रही है और विनोदिनी उसे अपनी छाती से लगाए उसके ऑंसू पोंछ रही है। देखकर बिहारी वहाँ से खिसक गया। बँगले के अंधेरे कमरे में जाकर बैठ गया। दोनों हथेलियों से अपना सिर दबाकर सोचने लगा, 'आशा आखिर रो क्यों रही है? जो बेचारी स्वभाव से ही कोई कसूर करने में असमर्थ है, ऐसी नारी को भी जो रुलाए उसे क्या कहा जाए।' विनोदिनी की उस तरह की सांत्वना, निस्वार्थ सखी-प्रेम को देखकर अभिभूत हो गया।"
वह बड़ी देर तक अंधेरे में बैठा रहा। अन्धे भिखारी का गाना जब बन्द हो गया तो वह पैर पटककर खाँसता हुआ महेन्द्र के कमरे की तरफ बढ़ा। द्वार पर पहुँचा भी न था कि आशा घूँघट काढ़कर अन्त:पुर की ओर भाग गई।
अन्दर पहुँचते ही विनोदिनी ने पूछा- "अरे, क्या आपकी तबीयत ख़राब है, बिहारी बाबू?"
बिहारी- "नहीं तो।"
विनोदिनी- "फिर ऑंखें ऐसी लाल क्यों हैं?"
बिहारी ने इस बात का जवाब नहीं दिया। पूछा-"विनोद-भाभी, महेन्द्र कहाँ गया?"
विनोदिनी गम्भीर होकर बोली- "सुना है, कॉलेज में काम ज़्यादा है। इसलिए उन्होंने वहीं कहीं पास में डेरा ले लिया है। अच्छा, मैं चलूँ!"
अनमना बिहारी दरवाज़े के सामने राह रोककर खड़ा हो गया था। चौंककर वह जल्दी से हट गया। शाम के वक्त बाहर से सूने कमरे में इस तरह विनोदिनी से बात करना लोगों को अच्छा न लगेगा।- अचानक इसका ध्यादन आया। उसके जाते-जाते बिहारी इतना कह गया-"विनोद-भाभी, आशा का ख्याल रखिएगा। सीधी है बेचारी। उसे किसी को न तो चोट पहुँचाना आता है, न चोट से अपने को बचाना।"
अंधेरे में बिहारी विनोदिनी का चेहरा न देख पाया-उसमेंईर्ष्या के भाव जग आए थे। आज बिहारी पर नज़र पड़ते ही वह समझ गई थी कि आशा के लिए उसका हृदय दु:खी है। विनोदिनी आप कुछ नहीं! उसका जन्म आशा को सुरक्षित रखने, उसकी राहों के काँटों को बीनने के लिए ही हुआ है! श्रीमान् महेन्द्र बाबू आशा से विवाह करें, इसीलिए किस्मत की मार से विनोदिनी को बारामात के बर्बर बन्दर के साथ वनवास लेना पड़ेगा। और श्रीमान् बिहारी बाबू से आशा की ऑंखों में ऑंसू नहीं देखे जाते, सो विनोदिनी को अपना दामन उठाए सदा तैयार रहना पड़ेगा! वह महेन्द्र और बिहारी को एक बार अपने पीछे की छाया के साथ धूल में पटककर बताना चाहती है कि यह आशा कौन है, और कौन है विनोदिनी! दोनों में कितना फ़र्क़ है! दुर्भाग्य से विनोदिनी अपनी प्रतिभा को किसी पुरुष-हृदय के राज्य में विजयी बनाने का अवसर नहीं पा सकी, इसलिए उसने जलता शक्तिशेल उठाकर संहारमूर्ति धारण की।
बड़े ही मीठे स्वर में विनोदिनी बिहारी को कहती गई- "आप बेफिक्र रहें, बिहारी बाबू! मेरी ऑंख की किरकिरी के लिए इतनी चिन्ता करके आप नाहक इतना कष्ट न उठाएँ।"
20
जल्दी महेन्द्र को एक चिट्ठी मिली। उस पर पहचाने अक्षर देखकर वह चौंक गया। दिन में झमेलों के कारण उसने उसे खोला नहीं- कलेजे के पास जेब में डाल दिया। कॉलेज के लैक्चर सुनते हुए, अस्पताल का चक्कर काटते हुए यक-ब-यक उसे ऐसा लग आता कि उसके कलेजे के घोंसले में मुहब्बत की एक चिड़िया सो रही है। उसे जगाया नहीं कि उसकी मीठी चहक कानों में गूँज उठेगी।
शाम को अपने सूने कमरे में महेन्द्र लैम्प की रोशनी में आराम से कुर्सी पर बैठा। अपनी देह के ताप से तपी उस चिट्ठी को बाहर निकला। देर तक उसने उसे खोला नहीं, मगर गौर से देखता रहा। उसे पता था कि खत में ख़ास कुछ है नहीं। ऐसी सम्भावना ही नहीं कि आशा अपने मन की बात सुलझाकर लिख सकेगी। उसके टेढ़े-मेढ़े हरफों और आड़ी-तिरछी पंक्तियों से उसके मन के भावों की कल्पना कर लेनी होगी। आशा के कच्चे हाथों, बड़े जतन से लिखे अपने नाम में महेन्द्र को एक रागिनी सुनाई पड़ी-"साध्वीा नारी के मन के गहन बैकुण्ठ से उठने वाला पावन प्रेम-संगीत।"
दो ही चार दिनों की जुदाई से महेन्द्र के मन का वह अवसाद चला गया। सरल आशा के नवीन प्रेम की स्मृति फिर ताजी हो गई। इन दिनों गिरस्ती की रोज़मर्रा की असुविधाएँ उसे खिझाने लगी थीं, अब वह सब मिट गया, बस कर्म और कारणहीन एक विशुद्ध प्रेमानंद की जोत में आशा की मानसी मूर्ति उसके मन में जीवन्त हो उठी।
महेन्द्र ने लिफाफे को इत्मीनान से खोला। उसमें से चिट्ठी निकालकर अपने गाल और कपाल से लगाई। महेन्द्र ने जो खूशबू कभी आशा को भेंट की थी, अकुलाए नि:श्वास-सी उसी की महक खत में से निकलकर महेन्द्र के प्राणों में पैठ गई।
खत खोलकर पढ़ा। अरे जैसी टेढ़ी-मेढ़ी पंक्तियाँ हैं, वैसी भाषा तो नहीं है! हरफ कच्चे, मगर उनसे बातों का मेल कहाँ? लिखा था- 'प्रियतम, जिसे भूलने के लिए घर से चल दिए, इस लिखावट से उसकी याद क्यों दिलाऊँ? जिस लता को मरोड़कर माटी में फेंक दिया, किस हया से वह फिर धड़ को जकड़कर उठने की कोशिश करे! जाने वह मिट्टी में मिलकर मिट्टी क्यों न हो गई!
"लेकिन इससे तुम्हारा क्या नुकसान है नाथ, लमहे-भर को याद ही आ गया तो! उससे जी को चोट भी कितनी लगेगी! मगर तुम्हारी उपेक्षा काँटे-सी मेरे पंजर में चुभकर रह गई है! तुम जिस तरह भूल बैठे, मुझे भी उसी तरह भुलाने की तरकीब बता दो।"
"नाथ, तुमने मुझे प्यार किया था, यह क्या मेरा ही कसूर था! ऐसे सौभाग्य की मैंने स्वप्न में भी आशा की थी क्या? मैं कहाँ से आई, मुझे कौन जानता था? मुझे नज़र उठाकर न देखा होता, मुझे अगर यहाँ मुफ़्त की बाँदी बनकर रहना होता, तो मैं क्या तुम्हें दोष दे सकती थी? जाने मेरे किस गुण पर तुम खुद ही बिना मेघ के बिजली ही कड़की, तो उस बिजली ने सिर्फ जलाया ही क्यों? तन-मन को बिल्कुल राख क्यों न कर डाला?
"इन दो दिनों में बेहद सब्र किया, बहुत सोचती रही, लेकिन एक बात न समझ सकी कि यहाँ रहकर भी क्या तुम मुझे ठुकरा नहीं सकते थे? मेरे लिए भी क्या घर छोड़कर जाने की जरूरत थी? क्या मैं तुम्हें इतना घेरे हूँ? मुझे अपने कमरे के कोने में, दरवाज़े के बाहर फेंक देने पर भी क्या मैं तुम्हारी नज़र में आती? यही था, तो तुम फिर गए क्यों? मेरे कहीं जाने का क्या कोई उपाय न था? बहकर आई थी, बहकर चली जाती...."
यह चिट्ठी कैसी! भाषा किसकी थी, महेन्द्र को समझते देर न लगी। महेन्द्र उस पत्र को लिए स्तंभित रहा।
बड़ी देर तक सोचता रहा। खत को उसने कई बार पढ़ा। कुछ दिनों तक जो दूर के आभास की तरह रहा, आज वह साफ़ प्रकट होने लगा। उसकी ज़िन्दगी के आसमान के एक कोने में जो धूमकेतु छाया था, आज उसकी उठी हुई पूँछ आग की रेखाओं में जलती हुई दिखाई पड़ी।
चिट्ठी यह असल में विनोदिनी की है। भोली आशा ने इसे अपनी बात समझकर लिखा है। पहले जिन बातों को उसने कभी सोचा नहीं, विनोदिनी के लिखाने से वे ही बातें उसके मन में जाग उठीं। जो नई वेदना पैदा हुई, उसे इस खूबी के साथ आशा तो हर्गिज़ ज़ाहिर नहीं कर सकती थी। वह सोचने लगी, 'सखी ने मेरे मन की बात को ऐसा ठीक-ठीक कैसे समझ लिया! और, इतना ठीक से ज़ाहिर कैसे किया!' वह अपनी अंतरंग सखी को और भी मज़बूत सहारे की तरह पकड़ बैठी। क्योंकि जो बात उसके मन में है, उसकी भाषा उसकी सखी के पास है-इतनी बेबस थी वह!
महेन्द्र कुर्सी से उठा। भवों पर बल डाला। विनोदिनी पर क्रोध करने की कोशिश की। मगर बीच में आशा पर गुस्सा आ गया। आशा की मूर्खता तो देखो, पति पर यह कैसा जुल्म! वह फिर बैठ गया और इस बात के सबूत में उस खत को फिर से पढ़ गया। अन्दर-ही-अन्दर खुशी होने लगी। यह समझकर उसने चिट्ठी को पढ़ने की बहुत चेष्टा की, मानो वह आशा की ही लिखी हो। लेकिन इसकी भाषा किसी भी तरह से भोली आशा की याद नहीं दिलाती। दो ही चार पंक्तियाँ पढ़ते ही सुख से पागल कर देने वाला एक झाग भरी शराब- जैसा सन्देह मन को ढाप लेता। प्रेम की इस प्रतीति ने महेन्द्र को मतवाला बना दिया। उसे लगने लगा चाहे खुद के प्रति हिंसा करके ही मन को किसी और तरफ लगा दे। उसने मेज़ पर ज़ोरों का मुक्का मारा और उछलकर खड़ा हो गया। बोला- "हटाओ, चिट्ठी को जला डालें।" चिट्ठी को वह लैम्प के क़रीब ले गया। जलाया नहीं, फिर एक बार पढ़ गया। अगले दिन नौकर काग़ज़ की बहुत-सी राख उठा ले गया था, लेकिन यह राख आशा की चिट्ठियों की न थी, उसके उत्तर की कई अधूरी कोशिशों की राख थी, जिन्हें अन्त में महेन्द्र ने जला दिया था।
इस बीच और एक चिट्ठी आ पहुँची-
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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