उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Jemsbond
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:44

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'महेन्द्र रात में ही उठकर चला गया,' यह सुनकर राजलक्ष्मी बहू पर बहुत नाराज हुई। उन्होंने समझा बहू की लानत-मलामत से ही वह चला गया। उन्होंने आशा से पूछा- "महेन्द्र रात चला क्यों गया?" आशा ने सिर झुकाकर कहा- "मालूम नहीं, माँ!"
राजलक्ष्मी को लगा, यह भी रूठने की बात है। आज़िजी से कहा- "तुम्हें नहीं मालूम तो किसे मालूम होगा? कुछ कहा था उससे?" आशा ने सिर्फ 'नहीं' कहा।
राजलक्ष्मी को यकीन न आया। ऐसा भी हो सकता है भला। पूछा- "कल वह गया कब?" सकुचाकर आशा बोली- "नहीं जानती।"
राजलक्ष्मी ने ज़ोर देकर यह भी कह दिया कि आशा के आचरण और स्वभाव की वजह से महेन्द्र घर से निकल गया। सिर झुकाकर यह फटकार झेलती हुई आशा अपने कमरे में जाकर रोने लगी। अपने मन में सोचने लगी, 'पता नहीं क्यों कभी मेरे स्वामी ने मुझे प्यार किया था और यह भी नहीं जानती कि उसका वह प्यार मैं फिर कैसे पा सकूँगी। जो प्यार करता है, उसे कैसे खुश करना चाहिए, हृदय आप ही यह बता देता है, लेकिन जो प्यार नहीं करता, उसके हृदय को कैसे पाया जा सकता है, आशा यह क्या जाने। जो आदमी किसी और को प्यार करता है, उससे सुहाग पाने-जैसी शर्मनाक कोशिश वह कैसे करे?' शाम को परिवार के ज्योतिषीजी और उनकी बहन आई। बेटे की ग्रहशांति के लिए राजलक्ष्मी ने उन्हें बुलवाया था। बहू की जन्म-कुंडली और हाथ देखने का राजलक्ष्मी ने उनसे अनुरोध किया, और इसके लिए आशा को वहाँ बुलवाया गया। दूसरों के आगे अपनी बदनसीबी की चर्चा के संकोच से कुंठित होकर आशा किस तरह से अपना हाथ निकालकर बैठी कि इतने में अपने कमरे के पास वाले अंधेरे बरामदे में राजलक्ष्मी को जूतों की हल्की-सी आहट सुनाई दी- कोई जैसे दबे पाँव जा रहा हो। राजलक्ष्मी ने पूछा- "कौन?" पहले तो कोई जवाब न मिला। फिर आवाज़ दी-"कौन है?" इस पर महेन्द्र चुपचाप कमरे में आया।
आशा खुश तो क्या होती, महेन्द्र की लज्जा देखकर लज्जा से उसका हृदय भर गया। अब महेन्द्र को अपने घर में ही चोर की तरह आना पड़ा है। ज्योतिषीजी और उनकी बहन के रहने से उसे और भी शर्म आई। दुनिया-भर के सामने अपने स्वामी के लिए लाज़ ही आशा को दु:ख से बड़ी हो उठी थी। और अब राजलक्ष्मी ने धीमे-से कहा-"बहू, पार्वती से कह दो, महेन्द्र का खाना लगा दो," तो आशा बोली-"न, मैं ही ले आती हूँ।"
घर की दास-दासियों से भी वह महेन्द्र को ढके रखना चाहती।
इधर ज्योतिषीजी और उनकी बहन को देखकर महेन्द्र मन-ही-मन बड़ा नाराज़ हुआ। उसकी माँ और स्त्री जंतर-मंतर से उसे वश में लाने के लिए इन अशिक्षित मूर्खों के साथ बेहयाई से साज़िश कर रही हैं, यह महेन्द्र को सहन नहीं हुआ। इस पर जब ज्योतिषीजी की बहन ने, ज़रूरत से ज़्यादा शहद- सने स्वर में पूछा- 'कुशल तो है, बेटे' तो उससे वहाँ बैठा न गया। उनके कुशल-प्रश्न का उत्तर दिए बिना ही बोला- "माँ, मैं ज़रा ऊपर चलता हूँ।"
माँ ने समझा, महेन्द्र शायद एकांत में बहू से बात करना चाहता है। बेहद खुश होकर खुद रसोई में गई। जाकर आशा से कहा- "जाओ, जल्दी से ऊपर जाओ, महेन्द्र को शायद कुछ काम है।" आशा धड़कते हृदय और सकुचाते कदमों से ऊपर गई। सास के कहने से उसने यह समझा कि महेन्द्र ने शायद उसे बुलाया है। लेकिन अचानक ही उससे कमरे में जाते न बना, वह पहले अंधेरे दरवाज़े की आड़ से महेन्द्र को देखने लगी।
महेन्द्र बड़े ही सूने मन से फर्श के बिस्तर पर तकिए के सहारे लेटा-लेटा छत के शहतीर गिन रहा था। वही महेन्द्र तो था। सारा कुछ वही मगर कितना परिवर्तन!
आशा अंधेरे में खड़ी-खड़ी जितना ही महेन्द्र को देखने लगी, उतना ही उसके मन में होने लगा कि महेन्द्र अभी-अभी उसी विनोदिनी के यहाँ से आया है, उसके अंगों में उसी विनोदिनी का स्पर्श है, ऑंखों में उसी की मूरत, कानों में उसी विनोदिनी की आवाज़, मन में उसी विनोदिनी की वासना घुली-मिली है। आशा इस महेन्द्र को अपनी पवित्र भक्ति कैसे दे, कैसे एक मन से कहे कि आओ, मेरे हृदय में विराजो। विनोदिनी का महेन्द्र मानो आशा के लिए पराया पुरुष हो। इतने में छत के लोहे-लक्कड़ से महेन्द्र की अनमनी नज़र सामने की दीवार की तरफ उतरी। उसकी नज़र का अनुसरण करते हुए आशा ने देखा, दीवार पर महेन्द्र की तस्वीर के पास ही आशा का एक फोटो लटक रहा है। उसके जी में आया, दामन से उसे ढक दे। अभ्यासवश क्यों वह आज तक उसकी नज़र में न आया, क्यों अब तक उसने उतार नहीं फेंका, यही सोचकर वह अपने को धिक्कारने लगी। उसे लगा, महेन्द्र मन-ही-मन हँस रहा है। अंत में आजिज़ आए महेन्द्र की नज़र दीवार से नीचे उतर आई। अपनी मूर्खता मिटाने के लिए आशा आजकल साँझ को काम-काज और सास की सेवा से फुरसत पाते ही काफ़ी रात तक लिखा-पढ़ी करती थी। उसके पढ़ने-लिखने की कापी-किताबें कमरे में एक तरफ रखी हुई थीं। महेन्द्र ने उनमें से एक कापी उठा ली और देखने लगा। आशा की ख्वाहिश होने लगी कि चीखकर उसे छीन लाए। अपने कच्चे हरफ पर महेन्द्र की व्यंग्य दृष्टि की कल्पना करके वह एक पल-भर भी और न खड़ी रह सकी। तेज़ी से नीचे उतर गई- आहट छिपाने की भी चेष्टा न रही।
महेन्द्र का खाना तैयार था। राजलक्ष्मी सोच रही थी 'महेन्द्र बहू से हँसी दिल्लगी कर रहा होगा,' लिहाज़ा भोजन ले जाकर बीच ही में रुकावट डालने को जी नहीं चाह रहा था। आशा को उतरते देख खाने की जगह पर थाली रखकर उन्होंने महेन्द्र को खबर दी। महेन्द्र खाने जाने को उठा ही था कि आशा दौड़कर कमरे में गई और दीवार से अपनी तस्वीर उतारकर छत की दीवार के बाहर फेंक दी और अपनी कापी-किताबें उठा ले गई।
खा-पीकर महेन्द्र कमरे में आ बैठा। राजलक्ष्मी ने लेकिन बहू को आस-पास कहीं नहीं पाया। अंत में रसोई में जाकर देखा, आशा उनके लिए दूध उबाल रही थी। कोई ज़रूरत न थी इसकी, क्योंकि जो नौकरानी रोज़ दूध उबाला करती थी, वह पास ही थी और आशा के इस निरर्थक उत्साह पर ऐतराज़ कर रही थी। पानी डालकर जितना दूध वह रोज़ गायब करती थी, आज वह हाथ से जाता रहा, इससे वह अकुला रही थी।
राजलक्ष्मी बोलीं- "अरे, यहाँ क्यों बहू, ऊपर जाओ!"
आशा ने ऊपर जाकर सास के कमरे में पनाह ली। बहू के इस व्यवहार से राजलक्ष्मी नाराज़ हुईं। सोचा, 'उस मायाविनी के फंदे से निकलकर महेन्द्र घड़ी-भर के लिए घर भी आया, तो नाराज़ होकर, रूठ कर बहू फिर उसे घर से निकालने को तैयार! और विनोदिनी के फंदे में जो महेन्द्र पड़ा वह ही तो आशा के ही चलते। मर्द तो गलत राह पर चलने के लिए पाँव बढ़ाए ही रहता है। औरत का कर्तव्य है, छल-बल कौशल से उसे सही रास्ते पर रखे।'
राजलक्ष्मी ने फटकार बताई- "यह तुम्हारा क्या रवैया है, बहू! खुश-किस्मती से स्वामी कहीं घर आ गए तो मुँह लटकाए तुम इस- उस कोने में क्यों छिपी फिरती हो?" खुद को कसूरवार समझ अंकुश खाए हुए की तरह आशा ऊपर गई और मन को आगा-पीछा करने का ज़रा भी मौक़ा न देकर वह एक साँस में कमरे के अन्दर चली गई। दस बज चुके थे। उस समय महेन्द्र बिस्तर के पास खड़ा बेमतलब बड़ी देर से चिन्तित-सा मच्छरदानी झाड़ रहा था। उसके मन में विनोदिनी के लिए एक तीखा अभियान हो गया था। वह मन में सोच रहा था कि विनोदिनी ने आखिर मुझे ऐसा ख़रीदा हुआ ग़ुलाम समझ रखा है कि मुझे आशा के पास भेजते हुए उसके जी में ज़रा भी आशंका न हुई। कहीं मैं आज से आशा के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करूँ तो वह किसके सहारे इस दुनिया में खड़ी होगी? उसने सोचा वह विनोदिनी से अपनी उपेक्षा का बदला ज़रूर लेगा।
आशा ने जैसे ही कमरे में क़दम रखा, महेन्द्र का अनमना होकर मच्छरदानी झाड़ना बन्द हो गया। एक समस्या हुई कि आशा से वह बोल-चाल कैसे शुरू करे। बनावटी हँसी हँसकर अचानक जो बात उसकी जबान पर आ गई, महेन्द्र वही बोला। बोला, "मैं देख रहा हूँ, तुमने भी मेरी तरह पढ़ने में जी लगाया है। यहाँ कापी-किताबें पड़ी देखी थीं, कहाँ गईं?" बात बेसिर-पैर की लगी। इतना ही नहीं, उसने आशा को चोट की। गँवार आशा शिक्षित होने की चेष्टा कर रही है, वह बड़ी ही गोपन बात थी उसकी। और उसका वह संकल्प अगर किसी के हँसी-मज़ाक के अभ्यास से भी गोपन रखने का विषय था तो वह ख़ासतौर से महेन्द्र। और उसी महेन्द्र ने जब बोल-चाल के आरम्भ में ही हँसकर वही बात चलाई, तो बेरहम बातों की मार खाए कोमल बच्चे के देह-सा उसका मन संकुचित और पीड़ित होने लगा। वह कुछ बोली नहीं मुँह फेरकर तिपाई का किनारा पकड़े खड़ी रही।
मुँह से बात निकलते ही महेन्द्र ने समझ लिया था कि बात संगत और समय के अनुकूल नहीं हुई। लेकिन ऐसी स्थिति में उपयुक्त बात क्या हो सकती है, वह सोच ही न सका। बीच में एक इतना बड़ा विद्रोह हो गया, उसके बाद पहले की तरह कोई सहज बात जँचती नहीं। महेन्द्र ने सोचा, 'मसहरी के अन्दर दाखिल हो जाऊँ, तो वहाँ के एकान्त से बात करना शायद सहज हो।' यह सोचकर अपनी धोती के छोर से वह फिर मसहरी झाड़ने लगा। नया अभिनेता रंगमंच पर जाने से पहले जैसे अपना पार्ट मन-ही-मन दुहराया करता है, महेन्द्र वैसे ही मसहरी के सामने खड़ा-खड़ा अपने वक्तव्य और कर्तव्य की सोचता रहा। इतने में हल्की-सी आहट हुई। महेन्द्र ने मुड़कर देखा, लेकिन आशा नहीं थी।
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अगले दिन महेन्द्र ने माँ से कहा- "माँ, पढ़ने-लिखने के लिए मुझे कोई एकांत कमरा चाहिए। मैं चाची वाले कमरे में रहूँगा।"
माँ खुश हो गई, "तब तो महेन्द्र अब घर में ही रहा करेगा। लगता है, बहू से सुलह हो गई। भला अपनी ऐसी अच्छी बहू की सदा उपेक्षा कर सकता है। ऐसी लक्ष्मी को छोड़कर उस मायाविनी डायन के पीछे वह कब तक भूला रह सकता है?"
माँ ने झट कहा- "हर्ज क्या है, रहो!"
उन्होंने तुरन्त कुंजी निकाली, ताला खोला और झाड़-पोंछ की धूम मचा दी- "बहू, अरी ओ बहू, कहाँ गई?" बड़ी कठिनाई से घर के एक कोने में दुबकी हुई बहू को बरामद किया गया- "एक धुली चादर ले आओ! इस कमरे में मेज़ नहीं है, लगानी पड़ेगी। इस रोशनी से काम नहीं चलेगा, ऊपर से अपना वाला लैम्प भिजवा दो।" इस तरह दोनों ने मिलकर उस घर के राजाधिराज के लिए अन्नपूर्णा के कमरे में राज-सिंहासन तैयार कर दिया। महेन्द्र ने सेवा में लगी हुई माँ-बहू की तरफ ताका तक नहीं, वहीं किताब लिये ज़रा भी समय बर्बाद न करके गम्भीर होकर पढ़ने बैठ गया। शाम को भोजन के बाद वह फिर बैठा। सोना ऊपर के कमरे में होगा या वहीं, कोई न समझ सका। बड़े जतन से राजलक्ष्मी ने आशा को मूरत की तरह सजाकर कहा- "बहू, महेन्द्र से पूछ तो आओ, उसका बिस्तर क्या ऊपर लगेगा?"
इस प्रस्ताव पर आशा का पाँव हर्गिज़ न हिला, वह सिर झुकाए चुपचाप खड़ी रही। नाराज़ होकर राजलक्ष्मी खरी-खोटी सुनानें लगीं। बड़े कष्ट से आशा दरवाज़े तक गई, पर उससे आगे न बढ़ सकी। दूर से बहू का वह रवैया देखकर राजलक्ष्मी नाराज़ होकर इशारे से निर्देश करने लगीं। मरी-सी होकर आशा कमरे में गई। आहट पाकर किताबों से सिर न उठाकर ही महेन्द्र ने कहा- "मुझे अभी देर है- फिर तड़के से ही उठकर पढ़ना है- मैं यहीं सोऊँगा।"
शर्म की हद हो गई! आशा महेन्द्र को ऊपर सुलाने के लिए थोड़े ही गिड़गिड़ाने आई थी।
वह निकली। निकलते ही खीझकर राजलक्ष्मी ने पूछा- "क्यों, क्या हुआ?"
आशा बोली- "अभी पढ़ रहे हैं। वे यहीं सोएँगे।"
कहकर वह अपने अपमानित शयन-कक्ष में चली गई। कहीं उसे चैन नहीं- मानो सब कुछ दोपहर की धारती-सा तप उठा है। कुछ रात बीती, तो उसके कमरे के दरवाज़े पर थपकी पड़ी- "बहू, बहू, दरवाज़ा खोलो!"
आशा ने झटपट दरवाज़ा खोल दिया। दमे की मरीज़ राजलक्ष्मी सीढ़ियाँ चढ़कर तकलीफ से साँस ले रही थीं। कमरे में जाकर वह बिस्तर पर बैठ गईं और वाक्-शक्ति लौटते ही बोलीं- "तुम्हारी अक्ल की बलिहारी! ऊपर कमरा बन्द किए पड़ी हो! यह क्या राग-रोष का समय हे! इस मुसीबत के बाद भी तुम्हारे भेजे में बुध्दि नहीं आई! जाओ नीचे जाओ!" आशा ने धीमे-से कहा- "उन्होंने कहा है, एकांत में रहेंगे।"
राजलक्ष्मी- "कह दिया और हो गया। गुस्से में जाने क्या कह गया, उसी पर तुम तुनक बैठोगी। ऐसी तुनक-मिज़ाज होने से काम नहीं चलेगा। जाओ, जल्दी जाओ।" दु:ख के दिनों में सास को बहू से लाज नहीं। जो भी तरकीब उन्हें आती है, उसी से महेन्द्र को किसी तरह बाँधना पड़ेगा। आवेग से बातें करते हुए राजलक्ष्मी का फिर से दम फूलने लगा। अपने को थोड़ा-बहुत सँभालकर उठीं। आशा भी आजिज़ न होकर पकड़कर उन्हें नीचे लिवा ले गई। उनके सोने के कमरे में आशा ने उन्हें बिठा दिया और पीठ की तरफ तकिए लगाने लगी। राजलक्ष्मी बोलीं- "रहने दो बहू, किसी को भेज दो। तुम जाओ!"
अबकी आशा ज़रा भी न हिचकी। सास के कमरे से निकलकर सीधी महेन्द्र के कमरे में गई। महेन्द्र के सामने मेज़ पर किताब खुली पड़ी थी- वह मेज़ पर दोनों पैर रखकर कुर्सी पर माथा टेके ध्या्न से न जाने क्या सोच रहा था। उसके पीछे पैरों की आहट हुई। चौंककर उसने पीछे की ओर देखा। मानो किसी के ध्या न में लीन था- एकाएक धोखा हुआ कि वह आ गई। आशा को देखकर महेन्द्र सँभला। खुली किताब को उसने अपनी गोद में खींच लिया।
मन-ही-मन महेन्द्र को अचरज हुआ। इन दिनों ऐसे बेखटके तो आशा उसके सामने नहीं आती- अचानक भेंट हो जाती है तो वह वहाँ से चल देती है। आज इतनी रात को वह इस सहज भाव से उसके कमरे में आ गई, ताज्जुब है! किताब से ऑंखें हटाए बिना ही महेन्द्र ने समझा, आज आशा के लौट जाने का लक्षण नहीं। वह महेन्द्र के सामने आकर स्थिर भाव से खड़ी हुई। इस पर महेन्द्र से मान करते न बना। सिर उठाकर उसने देखा। आशा ने साफ़ शब्दों में कहा- "माँ का दम उखड़ आया है। चलकर एक बार देख लो तो अच्छा हो!" महेन्द्र- "वे हैं कहाँ?"
आशा- "अपने सोने के कमरे में हैं। नींद नहीं आ रही है।"
महेन्द्र- "अच्छा, चलो, उन्हें देख आऊँ।"
बहुत दिनों के बाद आशा से इतनी-सी बात करके महेन्द्र जैसे हल्का हुआ। किसी दुर्भेद्य किले की दीवार-सी नीरवता मानो उन दोनों के बीच स्याह छाया डाले खड़ी थी- महेन्द्र की ओर से उसे तोड़ने का कोई हथियार न था, ऐसे समय आशा ने अपने हाथों किले में एक छोटा-सा दरवाज़ा खोल दिया। आशा सास के कमरे के दरवाज़े पर खड़ी रही। महेन्द्र गया। उसे असमय में अपने कमरे में आया देखकर राजलक्ष्मी को डर लगा। सोचा, 'कहीं फिर दोनों में कहा-सुनी हो गई और वह चल देने की कहने आया हो।' पूछा- "अब तक सोया नहीं महेन्द्र?" महेन्द्र ने कहा- "क्या दमा उखड़ आया है, माँ?"
ज़माने के बाद यह सवाल सुनकर उनके मन में मान हो आया। समझीं, 'जब बहू ने जाकर बताया, तो यह माँ का हाल पूछने आया है।' इस आवेश से उनका कलेजा और भी काँपने लगा। किसी तरह बोलीं- "तू सो जाकर, यह कुछ नहीं।"
महेन्द्र- "नहीं, नहीं एक बार जाँच देखना अच्छा है। यह बीमारी टालने की नहीं।"
महेन्द्र को पता था, माँ को हृदय की बीमारी है। इस वजह से तथा उनके चेहरे का लक्षण देखकर उसे घबराहट हुई।
माँ ने कहा- "जाँचने की ज़रूरत नहीं। मेरी यह बीमारी नहीं छूटेगी।"
महेन्द्र ने कहा- "खैर, आज की रात के लिए सोने की दवा ला देता हूँ। सवेरे अच्छी तरह से देखा जाएगा।"
राजलक्ष्मी- "दवा ढेर खा चुकी, दवा से कुछ होता-जाता नहीं। बहुत रात हो गई, तुम सो जाओ।"
महेन्द्र- "तुम्हें ज़रा चैन तो मिले।"
इस पर राजलक्ष्मी ने दरवाज़े पर खड़ी बहू को संबोधित करके कहा- "बहू, तुम रात में महेन्द्र को तंग करने के लिए यहाँ क्यों ले आईं!"
कहते-कहते उनकी साँस की तकलीफ और भी बढ़ गई। तब आशा कमरे में आई। उसने कोमल किन्तु दृढ़ स्वर में महेन्द्र से कहा- "तुम सोओ जाकर। मैं माँ के पास रहूँगी।"
महेन्द्र ने आशा को अलग बुलाकर कहा- "मैंने एक दवा लाने भेजा है। दो-खुराक दवा होगी। एक से अगर नींद न आए तो घंटे-बाद दूसरी खुराक देना। रात में साँस और बढ़े तो मुझे खबर देना।"
कहकर महेन्द्र अपने कमरे में चला गया। आशा आज जिस रूप में उसके सामने प्रकट हुई, उसके लिए वह रूप नया था। इस आशा में संकोच नहीं, दीनता नहीं- यह आशा अपने अधिकार में खड़ी हुई थी। अपनी स्त्री की महेन्द्र ने अपेक्षा की थी, मगर घर की बहू के लिए संभ्रम हुआ।
आशा ने जवाब न दिया। पीछे बैठकर पंखा झलने लगी। राजलक्ष्मी ने कहा- "तुम सोओ जाकर, बहू।"
आशा धीमे-से बोली- "मुझे यहीं रहने को कह गए हैं।"
आशा समझती थी कि यह जानकर माँ खुश होंगी कि महेन्द्र उसे माँ की सेवा के लिए छोड़ गया है।
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राजलक्ष्मी ने जब साफ़ समझ लिया कि आशा महेन्द्र के मन को बाँध नहीं पा रही है, तो उनके जी में आया, कम-से-कम मेरी बीमारी के नाते ही महेन्द्र को यहाँ रहना पड़े, तो भी अच्छा है। उन्हें डर लगा, कहीं वे सचमुच ठीक न हो जाएँ। इसलिए आशा से छिपाकर दवा फेंकने लगीं।
अनमना महेन्द्र ख़ास कुछ ख्याल नहीं करता था। लेकिन आशा यह देख रही थी कि राजलक्ष्मी की बीमारी दबने के बजाय कुछ बढ़ ही रही है। वह सोचती, 'महेन्द्र खूब सोच-विचारकर दवा नहीं दे रहा है- उसका मन इतना ही ख़राब हो गया है कि माँ की तकलीफ भी उसे सचेतन नहीं कर पाती।' उसकी इस दुर्गति‍ पर आशा अपने मन में उसे धिक्कारे बिना न रह सकी। एक तरफ से बिगड़ने पर कोई क्या हर तरफ से बर्बाद हो जाता है। एक दिन शाम को बीमारी की तकलीफ में राजलक्ष्मी को बिहारी की याद आ गई। जाने वह कब से नहीं आया। आशा से पूछा- "जानती हो बहू, बिहारी आजकल कहाँ है? उसका महेन्द्र से कुछ झगड़ा है, क्यों? यह उसने बड़ा बेजा किया, बहू! उस- जैसा महेन्द्र का भला चाहने वाला और कोई दोस्त नहीं।"
कहते-कहते उनकी ऑंखों में ऑंसू जमा हो आए। एक-एक करके आशा को बहुतेरी बातें याद आईं। अंधा और भोली आशा को समय पर चेताने के लिए जाने कितनी बार, कितनी कोशिश बिहारी ने की और उन्हीं कोशिशों के चलते वह आशा का अप्रिय हो उठा।
फिर बड़ी देर तक चुपचाप चिंतित रहकर राजलक्ष्मी बोल उठीं- "बहू, बिहारी होता तो हमारे इस आड़े वक्त में बड़ा काम आता। वह हमें बचाता, बात यहाँ तक न बढ़ पाती।"
आशा चुपचाप सोचती रही। उसाँस लेकर राजलक्ष्मी ने कहा- "उसे अगर मेरी बीमारी का पता चल जाए, तो वह हर्गिज़ नहीं रुक सकता।"
आशा समझ गई, राजलक्ष्मी चाहती हैं कि बिहारी को यह खबर मिले। बिहारी के न होने से वह असहाय-सी हो गई हैं।
कमरे की बत्ती गुल करके चाँदनी में महेन्द्र खिड़की के पास चुप खड़ा था। पढ़ना अच्छा नहीं लग रहा था। घर में कोई आराम नहीं। जो नितांत अपने हैं, उनसे जब सहज नाता टूट जाता है तो उन्हें बिराने की तरह आसानी से छोड़ा नहीं जा सकता और फिर प्रियजन के समान सहज ही अपनाया भी नहीं जा सकता।
पीछे आहट मिली। महेन्द्र ने समझा, आशा आई है। मानो आहट उसे मिली ही नहीं, इस भाव से वह स्थिर रहा। आशा बहाना ताड़ गई, फिर भी वह कमरे से बाहर नहीं गई। पीछे खड़ी-खड़ी बोली- "एक बात है, वही कहकर मैं चली जाऊँगी।"
महेन्द्र ने पलटकर कहा- "जाना ही क्यों पड़ेगा- ज़रा देर बैठ ही जाओ।"
इस भलमनसाहत पर उसने ध्या'न न दिया। स्थिर खड़ी-खड़ी बोली- "बिहारी भाई साहब को माँ की बीमारी की खबर देना लाज़िमी है।"
बिहारी का नाम सुनते ही महेन्द्र के गहरे ज़ख्म पर चोट लगी। अपने को सँभालकर वह बोला- "लाज़िमी क्यों है, मेरे इलाज का भरोसा नहीं हो रहा है, क्यों?"
आशा ने मन में यह शिकायत भरी-सी थी कि महेन्द्र माँ के इलाज में उतना ध्याबन नहीं दे रहा है, तो उसके मुँह से निकल पड़ा- "कहाँ, उनकी बीमारी तो जरा भी नहीं सुधरी, बल्कि दिन-दिन बढ़ती ही जा रही है।"
इस मामूली बात में जो ऑंच थी, महेन्द्र अपने अहंकार से आहत हो विस्मित व्यंग्य के साथ बोला-"देखता हूँ, तुमसे डाक्टरी सीखनी पड़ेगी।" इस व्यंग्य से आशा को उसकी जमी हुई वेदना पर अप्रत्याशित चोट लगी। तिस पर कमरा अंधेरा था, जो सदा ही चुप रह जाने वाली आशा आज बे-खटके तेज़ी के साथ बोल उठी- "डाक्टरी न सही, माँ की सेवा सीख सकते हो।" आशा से ऐसा जवाब पाकर महेन्द्र के अचरज की सीमा न रही। ऐसे तीखे वाक्य सुनने का वह आदी न था। वह कठोर हो उठा। बोला- "तुम्हारे बिहारी भाई साहब को यहाँ आने की मनाही क्यों की है- तुम तो जानती हो- शायद फिर याद आ गई है!"
आशा तेज़ी से बाहर चली गई। शाम की ऑंधी मानो उसे ढकेलकर ले गई। शर्म अपने लिए न थी। जो आदमी सिर से पैर तक अपराध में डूबा हो, वह जुबान पर ऐसे झूठे अपवाद भी ला सकता है! इतनी बड़ी बेहयाई को लाज के पहाड़ से भी नहीं ढका जा सकता।
आशा के चले जाने के बाद ही महेन्द्र अपनी पूरी हार का अनुभव कर सका। महेन्द्र को मालूम भी न था कि आशा कभी भी किसी भी अवस्था में महेन्द्र को इस तरह धिक्कार सकती है। उसे लगा, जहाँ उसका सिंहासन था, वहीं वह धूल में लोट रहा है। इतने दिनों के बाद अब उसे ये शंका होने लगी, 'आशा की वेदना कहीं घृणा में न बदल जाए।'
और उधर बिहारी की चर्चा आते ही विनोदिनी की चिंता ने उसे बेताब कर दिया। पश्चिम से बिहारी लौटा या नहीं, कौन जाने? हो सकता है, इस बीच विनोदिनी उसका पता ले आई हो, विनोदिनी से बिहारी की भेंट भी असंभव नहीं। महेन्द्र से अब प्रतिज्ञा का पालन न हो सका।
रात को राजलक्ष्मी की तकलीफ बढ़ गई। उससे न रहा गया। उन्होंने महेन्द्र को बुलावा भेजा। बड़ी तकलीफ से बोलीं फूटी- "महेन्द्र, बिहारी को देखने को मेरा बड़ा जी चाहता है- बहुत दिनों से वह नहीं आया है।" आशा सास को पंखा झल रही थी। मुँह नीचा किये बैठी रही। महेन्द्र ने कहा- "वह यहाँ नहीं है। जाने कहाँ पछाँह गया है।"
राजलक्ष्मी ने कहा- "मेरी अंतरात्मा कह रही है, वह यहाँ है, सिर्फ तुझसे रूठकर नहीं आ रहा है। मेरे सिर की कसम रही, कल तू एक बार उसके यहाँ जाना।" महेन्द्र ने कहा- "अच्छा, जाऊँगा।"
आज सब बिहारी के लिए परेशान हैं।
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दूसरे दिन तड़के ही महेन्द्र बिहारी के यहाँ पहुँच गया। देखा, दरवाज़े पर कई बैलगाड़ियों पर नौकर-चाकर सामान लाद रहे हैं। महेन्द्र ने भज्जो से पूछा- "माजरा क्या है?" भज्जो ने कहा- "बाबू ने बाली में गंगा के किनारे एक बगीचा लिया है। यह सब वहीं जा रहा है।" महेन्द्र ने पूछा- "बाबू घर पर हैं क्या?" भज्जो ने कहा-"वे सिर्फ दो दिन कलकत्ता रुककर कल बगीचे चले गए।"
सुनते ही महेन्द्र का मन आशंका से भर गया। उसकी गैरहाजिरी में बिहारी से विनोदिनी की भेंट हुई है, इस पर उसे कोई सन्देह न रहा। उसने कल्पना की ऑंखों से देखा, विनोदिनी के डेरे के बाहर भी बैलगाड़ियाँ लद रही हैं। उसे यह निश्चित-सा लगा कि इसलिए मुझ नासमझ को विनोदिनी ने डेरे से दूर ही रखा है।
पल की भी देर न करके महेन्द्र गाड़ी पर सवार हुआ और कोचवान से हाँकने को कहा। बीच-बीच में कोचवान को इसके लिए गालियाँ सुनाईं कि घोड़े तेज नहीं चल रहे हैं। गली के अन्दर डेरे के दरवाज़े पर पहुँचकर देखा, यात्रा की कोई तैयारी नहीं है। डर लगा, वहीं यह काम पहले ही न हो चुका हो। तेज़ी से किवाड़ के कड़े खटखटाए। अन्दर से जैसे ही बूढ़े नौकर ने दरवाज़ा खोला, महेन्द्र ने पूछा- "सब ठीक तो है?"
उसने कहा- "जी हाँ, ठीक ही है।"
ऊपर जाकर महेन्द्र ने देखा, विनोदिनी नहाने गई है। उसके सूने सोने के कमरे में जाकर महेन्द्र विनोदिनी के रात के बिस्तर पर लोट गया, दोनों हाथों से खींचकर चादर को छाती के पास ले आया और सूँघकर उस पर मुँह रखते हुए बोला- "बेरहम, निर्दयी!"
हृदय के उच्छ्वास को इस तरह निकलकर वह सेज से उठकर विनोदिनी का इन्तज़ार करने लगा। कमरे में चहलकदमी करते हुए देखा, फर्श्श के बिछौने पर एक अखबार खुला पड़ा है। समय काटने के ख्याल से कुछ अनमना-सा होकर अखबार अठाकर देखा। जहाँ पर उसकी नज़र पड़ी, वहीं पर बिहारी का नाम था। उसका मन बात-की-बात में अखबार देखते-देखते वहीं पर टूट पड़ा। किसी ने संपादक के नाम पत्र लिखा था, 'मामूली तनखा पाने वाले गरीब किरानियों के बीमार होने पर नि:शुल्क चिकित्सा और सेवा के लिए बिहारी ने बाली में एक बगीचा ख़रीदा है, वहाँ एक साथ पाँच आदमियों के लिए प्रबन्ध हो चुका है, आदि-आदि।'
यह खबर विनोदिनी ने पढ़ी, पढ़कर उसके मन में क्या हुआ होगा! बेशक उसका मन उधर ही भाग-भागकर रहा होगा। न केवल इसीलिए बल्कि महेन्द्र का जी इस वजह से और भी छटपटाने लगा कि बिहारी के इस संकल्प से उसके प्रति विनोदिनी की भक्ति और भी बढ़ जाएगी। बिहारी को महेन्द्र ने अपने मन में 'हम्बग' और उसके इस काम को 'सनक' कहा।
विनोदिनी के पैरों की आहट सुनकर महेन्द्र ने अखबार मोड़ दिया। नहाकर विनोदिनी कमरे में जो आई, महेन्द्र उसके चेहरे की तरफ देखकर हैरत में आ गया। उसमें जाने कैसा एक अनोखा बदलाव आ गया था। मानो पिछले कई दिन तक वह धूनी जलाकर तप कर रही थी। शरीर उसका दुबला हो गया था और उस दुबलेपन को भेदकर उसके पीले चेहरे से एक दमक निकल रही थी।
बिहारी के पत्र की उम्मीद उसने छोड़ दी है। अपने ऊपर बिहारी की बेहद हिकारत की कल्पना करके वह आठों पहर चुपचाप जल रही थी। बिहारी मानो उसी का तिरस्कार करके पछाँह चला गया है- उस तक पहुँच पाने की कोई तरकीब उसे नहीं सूझी। काम-काजी विनोदिनी काम की कमी से इस छोटे-से घर में घुल रही थी- उसकी सारी तत्परता खुद उसी को घायल करती हुई चोट करती थी। उसके समूचे भावी जीवन को इस प्रेमहीन, कर्महीन, आनन्दहीन घर में इस सँकरी गली में सदा के लिए कैद समझकर उसकी बागी प्रकृति हाथ न आने वाले अदृष्ट के ख़िलाफ़ मानो आसमान से सिर मारने की बेकार कोशिश कर रही थी। नादान महेन्द्र ने विनोदिनी की मुक्ति के सारे रास्तों को चारों तरफ से बंद करके जीवन को इतना सँकरा बना दिया है, उस महेन्द्र के प्रति उसकी घृणा और विद्वेष की सीमा न रही। विनोदिनी का दुबला-पीला चेहरा देखकर महेन्द्र के मन में ईर्ष्या जल उठी। उसमें ऐसी कोई शक्ति नहीं कि वह बिहारी की चिंता में लगी इस तपस्विनी को ज़बरदस्ती उखाड़ सके? गिद्ध जैसे मेमने को झपट्टा मारकर देखते-ही-देखते अपने अगम अभ्रभेदी पहाड़ के बसेरे में ले भागता है, क्या वैसी ही कोई मेघों से घिरी दुनिया की निगाहों से परे जगह नहीं, जहाँ महेन्द्र अकेला अपने इस सुन्दर शिकार को कलेजे के पास छिपाकर रख सके?
विरह की जलन स्त्रियों के सौंदर्य को सुकुमार कर देती है, ऐसा महेन्द्र ने संस्कृत-काव्यों में पढ़ा था। आज विनोदिनी को देखकर वह जितना ही अनुभव करने लगा, उतना ही सुख-सने दु:ख के आलोड़न से उसका हृदय बड़ा व्यथित होने लगा।
विनोदिनी ज़रा देर स्थिर रही। फिर पूछा- "तुम चाय पीकर आए हो?"
महेन्द्र ने कहा- "समझ लो, पीकर ही आया हूँ, मगर इस वजह से अपने हाथ से प्याला देने की कंजूसी मत करो-प्याला मुझे दो।"
शायद जानकर ही विनोदिनी ने निहायत निर्दयता से महेन्द्र से इस उच्छ्वास को चोट पहुँचाई। कहा- "बिहारी भाई साहब इन दिनों कहाँ हैं, मालूम है?"
महेन्द्र का चेहरा फक हो गया। बोला- "कलकत्ता में तो वह नहीं हैं इन दिनों।"
विनोदिनी- "पता क्या है उनका?"
महेन्द्र- "यह तो वह किसी को बताना नहीं चाहता।"
विनोदिनी- "खोज नहीं की जा सकती पूछ-ताछ करके?"
महेन्द्र- "मुझे ऐसी ज़रूरत नज़र नहीं आती।"
विनोदिनी- 'जरूरत ही क्या सब-कुछ है, बचपन से आज तक की मैत्री क्या कुछ भी नहीं?"
महेन्द्र- "बिहारी मेरा छुटपन का साथी है, तुम्हारी दोस्ती महज़ दो दिन की है, फिर भी ताकीद तुम्हारी ही ज़्यादा है।"
विनोदिनी- "इसी से तुम्हें शर्म आनी चाहिए। दोस्ती कैसे करनी चाहिए, यह तुम अपने वैसे दोस्त से भी न सीख सके?"
महेन्द्र- "मुझे इसका क़तई मलाल नहीं, मगर धोखे से औरत का दिल कैसे लिया जाता है, यह विद्या उससे सीखता तो आज काम आती।" विनोदिनी- "केवल चाहने से वह विद्या नहीं सीखी जा सकती, उसकी क्षमता होनी चाहिए।"
महेन्द्र- "गुरुदेव का पता मालूम हो, तो मुझे बताओ, इस उम्र में उनसे दीक्षा ले आऊँ, फिर क्षमता की कसौटी होगी।"
विनोदिनी- "मित्र का पता ढूँढ़ निकालने की जुर्रत न हो तो प्रेम की बात जुबान पर मत लाओ! बिहारी भाई साहब से तुमने ऐसा बर्ताव किया है कि तुम पर कौन यकीन करेगा?"
महेन्द्र- "मुझ पर पूरा यकीन न होता तो मेरा इतना अपमान न कर पातीं-मेरे प्रेम पर अगर इतनी निश्चिन्तता न होती, तो शायद मुझे इतनी तकलीफ न होती। बिहारी पालतू न बनने की कला जानता है, वह कला अगर इस बदनसीब को बता देता तो वह एक दोस्त का फर्ज अदा करता।"
"आखिर बिहारी आदमी है, इसी से पालतू नहीं बनता"- यह कहकर विनोदिनी खुले बालों को पीठ पर बिखेरकर खिड़की पर जिस तरह खड़ी थी, खड़ी रही। महेन्द्र अचानक खड़ा हुआ। मुट्ठी कस ली और नाराजगी से गरजकर बोला- "आखिर बार-बार मेरा अपमान करने का साहस क्यों करती हो तुम? इस इतने अपमान का कोई बदला नहीं मिलता, वह तुम्हारी क्षमता के कारण या मेरे गुण से? इतना बड़ा पुरुष मैं नहीं कि चोट करना जानता ही नहीं।"
इतना कहकर वह विनोदिनी की तरफ देखता हुआ ज़रा देर स्तब्ध रहा, फिर बोला- "विनोद, चलो यहाँ से चलें- कहीं और। चाहे पछाँह, चाहे किसी पहाड़ पर, जहाँ तुम्हारा जी चाहे- चलो! यहाँ जीना मुहाल है। मैं मरा जा रहा हूँ।"
विनोदिनी बोली- "चलो अभी चलें पछाँह।"
महेन्द्र- "पछाँह?"
विनोदिनी- "किसी ख़ास जगह नहीं। कहीं भी दो दिन रहते- घूमते फिरेंगे।"
महेन्द्र- "ठीक है, आज ही रात को चलो!"
विनोदिनी राज़ी होकर महेन्द्र के लिए खाना बनाने गई। महेन्द्र ने समझ लिया, बिहारी वाली खबर विनोदिनी की नज़रों से नहीं गुज़री। अखबार में जी लगाने- जैसी स्थिति अभी उसके मन की नहीं है। कहीं अचानक उसे वह खबर न मालूम हो जाय, इसी उधेड़-बुन में महेन्द्र पूरे दिन चौकन्ना रहा।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:45

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बिहारी की खोज-खबर लेकर महेन्द्र लौटेगा, इस आशा से घर में उसकी रसोई बनी थी। काफ़ी देर हो गई तो दुखी राजलक्ष्मी बेचैन हो उठीं। रात-भर नींद न आई थी, इससे वह काफ़ी थकी थीं, फिर महेन्द्र के लिए यह बेताबी उन्हें और कष्ट दे रही थी। यह देखकर आशा ने पूछ-ताछकर यह पता किया कि महेन्द्र की गाड़ी वापिस आ चुकी है। कोचवान से मालूम हुआ, महेन्द्र बिहारी के यहाँ से होता हुआ पटलडाँगा के डेरे पर गया है। राजलक्ष्मी ने सुना और दीवार की तरफ करवट बदलकर लेटी रहीं। आशा उनके सिरहाने चित्र-लिखी-सी बैठी पंखा झलती रही और दिन समय पर आशा को खाने के लिए जाने का वह आदेश किया करती थीं- आज कुछ न कहा। कल जब उनकी तबीयत ज़्यादा ख़राब थी, यह देखकर भी महेन्द्र विनोदिनी के मोह में चला गया, तो राजलक्ष्मी के लिए दुनिया में कुछ भी करने का मन बुझ गया। कोई दो बजे आशा बोली- "माँ, दवा पीने का वक्त हो गया।"
राजलक्ष्मी ने कोई जवाब न दिया, चुप रहीं, आशा दवा लाने जाने लगी, तो बोलीं- दवा की ज़रूरत नहीं बहू, तुम जाओ!"
आशा ने माँ के रूठने का मर्म समझा और उसकी समझ ने उसके हृदय के आन्दोलन को दूना कर दिया। आशा से न रहा गया। अपनी रुलाई रोकते-रोकते वह फफक पड़ी। राजलक्ष्मी धीरे-धीरे करवट बदलकर आशा की तरफ हो गई और स्नेह से उसका हाथ सहलाने लगीं। कहा- "बहू, तुम्हारी उम्र ही क्या है, सुख का मुँह देखने का तुम्हें बहुत समय है। मेरे लिए तुम परेशान मत होओ बिटिया, मैं काफ़ी जी चुकी, अब क्या होगा जीकर?"
आशा की रुलाई और उमड़ आई। उसने ऑंचल से मुँह दबा लिया। रोगी के घर इस तरह निरानन्द दिन मन्द गति से कट गया। रूठे रहने के बावजूद दोनों नारियों को अन्दर-ही-अन्दर आशा थी कि महेन्द्र अभी आएगा। खटका होते ही दोनों के शरीर में एक चौंक-सी जगती थी, इसे दोनों समझ रही थीं। धीरे-धीरे सूर्यास्त की आभा धुँधली पड़ गई- कलकत्ता के अन्त:पुर में उस गोधूलि की आभा में न तो खिलावट है, और न अधेरे का आवरण ही होता है- वह विषाद को गहरा और निराशा के ऑंसू सुखा डालती है। कर्म और भरोसे के बल को वह छीन लेती है, लेकिन विश्राम और वैराग्य की शांति नहीं लाती। रोग से दुखी घर की उस सूनी और कुरूप साँझ में आशा पाँव दबाए गई और दीया जलाकर कमरे में ले आई। राजलक्ष्मी ने कहा, "बहू, रोशनी नहीं सुहाती, दीए को कमरे से बाहर रख दो।"
आशा दीये को बाहर रख आई। घना होकर अधेरा जब अनन्त रात को छोटे से कमरे में ले आया, तो आशा ने धीमे-से राजलक्ष्मी से पूछा- "माँ, उन्हें खबर भिजवाऊँ क्या?"
राजलक्ष्मी ने सख्त होकर कहा- "नहीं-नहीं, तुम्हें मेरी कसम, महेन्द्र को खबर मत देना!"
आशा स्तब्ध रह गई। रोने की उसमें शक्ति न थी। कमरे के बाहर से बैरे ने आवाज़ दी- "माँजी, बाबू के यहाँ से चिट्ठी आई है।"
यह सुना और तुरंत राजलक्ष्मी के मन में आया, 'हो न हो, महेन्द्र की अचानक तबीयत ख़राब हो गई है। इसीलिए वह आ न सका और चिट्ठी भेजी है।' चिन्तित और परेशान होकर उन्होंने कहा, "देखो तो बहू, महेन्द्र ने क्या लिखा है?"
काँपते हुए हाथों से आशा ने बाहर जाकर रोशनी में चिट्ठी खोलकर पढ़ी। उसने लिखा था, इधर कुछ दिनों से तबीयत उचाट है, इसलिए वह घूमने के लिए पछाँह जा रहा है। माँ की बीमारी के लिए ख़ास कोई चिंता की बात नहीं। उन्हें बराबर देखने के लिए नवीन डॉक्टर से कह दिया है। रात को उन्हें नींद न आए या सिर-दर्द हो तो क्या करना होगा, यह भी उसने लिखा था। साथ ही दवाखाने से मँगाकर उसने हल्के और ताकतवर पथ्य के दो डिब्बे भी भेज दिए थे। फिलहाल गिरीडीह के पते पर माँ का हाल लिखने के लिए चिट्ठी में 'पुनश्च' में अनुरोध किया था।
चिट्ठी पढ़कर आशा स्तम्भित हो गई- एक ज़बरदस्त धिक्कार ने उसके दु:ख को छिपा लिया। यह कठोर समाचार वह माँ को किस तरह सुनाए?
आशा के इस विलम्ब से राजलक्ष्मी बहुत ही उतावली हो उठीं। बोलीं- "बहू, मुझे बताओ, महेन्द्र ने क्या लिखा है?"
आशा ने आखिर अन्दर बैठकर शुरू से आखिर तक चिट्ठी पढ़ सुनाई। राजलक्ष्मी ने कहा- "अपनी तबीयत के बारे में उसने क्या लिखा है, ज़रा वह जगह फिर से पढ़ो तो..." आशा ने फिर से पढ़ा- "इधर कुछ दिनों से तबीयत उचाट-सी चल रही थी, इसीलिए मैं..."
राजलक्ष्मी- "बस, बस, रहने दो। उचाट न हो तबीयत, क्या हो! बुङ्ढी माँ मरती भी नहीं और बीमार होकर उसे तंग करती है। तुम मेरी बीमारी को कहने उससे क्यों गई?" कहकर वह बिस्तर पर लेट गई। बाहर जूतों की चरमराहट हुई। बैरे ने कहा- "डॉक्टर आए हैं।"
खाँसकर डॉक्टर साहब अन्दर आए। घूँघट निकालकर आशा पलंग की आड़ में हो गई। डॉक्टर ने पूछा- "आपको शिकायत क्या है, यह तो कहें।"
राजलक्ष्मी झुँझलाकर बोलीं- "शिकायत क्यों होगी? किसी को मरने भी न देंगे। आपकी दवा से ही क्या मैं अमर हो जाऊँगी?"
राजलक्ष्मी कह उठीं- "तकलीफ की दवा तभी होती थी, जब विधवाएँ जल मरती थीं अब तो बाँधकर मारना ठहरा। आप जाएँ डॉक्टर साहब, मुझे तंग न करें- मैं अकेली रहना चाहती हूँ।" डॉक्टर ने डरकर कहा- "ज़रा आपकी नब्ज़..."
राजलक्ष्मी ने खीझकर कहा- "मैं कह रही हूँ, आप जाइए... मेरी नब्ज़ सही है- यह ख़तरा नहीं कि यह जल्दी छूटेगी।"
लाचार होकर डॉक्टर कमरे से बाहर चला गया। उसने आशा को बुलाया। उससे बीमारी का सारा ब्यौरा पूछा। सब-कुछ सुनकर गम्भीर-सा होकर वह फिर कमरे में गया। बोला- "महेन्द्र मुझ पर आपके इलाज का भार सौंप गया है। अगर आप इलाज़ न कराएँगी, तो उसे दु:ख होगा।"
महेन्द्र को दु:ख होगा, यह बात राजलक्ष्मी को मज़ाक जैसी लगी। उन्होंने कहा- "महेन्द्र की इतनी फ़िक्र न करें आप। दुनिया में हर किसी को दु:ख भोगना पड़ता है। आप जाएँ, मुझे सोने दें।"
डॉक्टर ने समझा, बीमार को ज़्यादा तंग करना ठीक नहीं। वह बाहर निकला और जो कुछ करना था, आशा को बता दिया।
आशा जब कमरे में लौटी, तो राजलक्ष्मी बोलीं- "तुम ज़रा आराम कर लो जाकर, बिटिया! तमाम दिन मरीज़ के पास बैठी हो! हारू की माँ से कह दो, बगल के कमरे में बैठेगी।"
आशा राजलक्ष्मी को समझती थी। यह उनके स्नेह का आग्रह नहीं, आदेश था- इसे मान लेने के सिवा चारा नहीं। उसने हारू की माँ को भेज दिया था और अपने कमरे में नीचे लेट गई।
दिन-भर उसने खाया-पीया नहीं। तकलीफ भी थी। उसका तन-मन चूर-चूर हो गया था। उस दिन पड़ोस में दिन में ब्याह के बाजे बजते रहे। अभी फिर शहनाई पर धुन छिड़ी। उस रागिनी से चोट खाकर रात का अधेरा काँपकर आशा पर बार-बार आघात करने लगा। उसके अपने विवाह के दिन की छोटी-से-छोटी घटना भी सजीव हो उठी और सबने मिलकर रात के आसमान को स्वप्न की छवि से पूर्ण कर दिया। कमरे में रोशनी जलाकर वह काग़ज़ लिये लगातार ऑंसू पोंछती हुई लिखने बैठ गई- "पूजनीय मौसी- तुम्हारे सिवाय आज मेरा कोई नहीं। एक बार आओ और अपनी इस दुखिया को अपनी गोद में उठा लो, वरना मैं जिऊँगी कैसे! क्या लिखूँ, नहीं जानती। चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। तुम्हारी प्यारी चुन्नी"
47
अन्नपूर्णा काशी से आई। धीरे-धीरे राजलक्ष्मी के कमरे में जाकर उन्हें प्रणाम करके उनके चरणों की धूल माथे ली। बीच में इस बिलगाव के बावजूद अन्नपूर्णा को देखकर राजलक्ष्मी ने मानो कोई खोई निधि पाई। उन्हें लगा, वे मन के अनजान ही अन्नपूर्णा को चाह रही थीं। इतने दिनों के बाद आज पल-भर में ही यह बात स्पष्ट हो उठी कि उनको इतनी वेदना महज़ इसश्लिए थी कि अन्नपूर्णा न थीं। एक पल में उसकी चुकी चित्ता ने अपने चिरंतन स्थान पर अधिकार कर लिया। महेन्द्र की पैदाइश से भी पहले जब इन दिनों जिठानी-देवरानी ने वधू के रूप में इस परिवार के सारे सुख-दु:खों को अपना लिया था- पूजा-त्योहारों पर, शोक-मृत्यु में दोनों ने गृहस्थी के रथ पर साथ-साथ यात्रा की थी- उन दिनों के गहरे सखीत्व ने राजलक्ष्मी के हृदय को आज पल-भर में आच्छन्न कर लिया। जिसके साथ सुदूर अतीत में उन्होंने जीवन का आरम्भ किया था- तरह-तरह की रुकावटों के बाद बचपन की सहचरी गाढ़े दु:ख के दिनों के उनकी बगल में खड़ी हुई। यह एक घटना उनके मौजूदा सुख-दु:खों, प्रिय घटनाओं में स्मरणीय हो गई। जिसके लिए राजलक्ष्मी ने इसे भी बेरहमी से चोट पहुँचाई थी, वह आज कहाँ है!
अन्नपूर्णा बीमार राजलक्ष्मी के पास बैठकर उनका दायाँ हाथ अपने हाथ में लेती हुई बोलीं- "दीदी!" राजलक्ष्मी ने कहा- "मँझली!"
उनसे और बोलते न बना। ऑंखों में ऑंसू बहने लगे। यह दृश्य देखकर आशा से न रहा गया। वह बगल के कमरे में जाकर ज़मीन पर बैठकर रोने लगी।
राजलक्ष्मी या आशा से अन्नपूर्णा महेन्द्र के बारे में कुछ पूछने का साहस न कर सकीं। साधुचरण को बुलाकर पूछा- "मामा, महेन्द्र कहाँ है?"
मामा ने महेन्द्र और विनोदिनी का सारा किस्सा कह सुनाया। अन्नपूर्णा ने पूछा- "बिहारी कहाँ है?"
साधुचरण ने कहा- "काफ़ी दिनों से वे इधर आए नहीं। उनका हाल ठीक-ठीक नहीं बता सकता।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "एक बार बिहारी के यहाँ जाकर खोज-खबर तो ले आइए!"
साधुचरण ने उसके यहाँ से लौटकर बताया- "वे घर पर नहीं हैं, अपने बाली वाले बगीचे में गए हैं।"
अन्नपूर्णा ने डॉक्टर नवीन को बुलाकर मरीज़ की हालत के बारे में पूछा। डॉक्टर ने बताया, "दिल की कमज़ोरी के साथ ही उदरी हो आई है, कब अचानक चल बसें, कहना मुश्किल है।" शाम को राजलक्ष्मी की तकलीफ बढ़ने लगी। अन्नपूर्णा ने पूछा- "दीदी, नवीन डॉक्टर को बुलवा भेजूँ?"
राजलक्ष्मी ने कहा- "नहीं बहन, नवीन डॉक्टर के करने से कुछ न होगा।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "तो फिर किसे बुलवाना चाहती हो तुम?"
राजलक्ष्मी ने कहा- "एक बार बिहारी को बुलवा सको, तो अच्छा हो।"
अन्नपूर्णा के दिल में चोट लगी। उस दिन काशी में उन्होंने बिहारी को दरवाज़े पर से ही अंधेरे में अपमानित करके लौटा दिया था। वह तकलीफ वे आज भी न भुला सकी थीं। बिहारी अब शायद ही आए। उन्हें यह उम्मीद न थी कि इस जीवन में उन्हें अपने किए का प्रायश्चित करने का कभी मौक़ा मिलेगा।
अन्नपूर्णा एक बार छत पर महेन्द्र के कमरे में गई। घर-भर में यही कमरा आनन्द-निकेतन था। आज उस कमरे में कोई श्री नहीं रह गई थी- बिछौने बेतरतीब पड़े थे। साज-सामान बिखरे हुए थे, छत के गमलों में कोई पानी नहीं डालता था, पौधे सूख गए थे।
आशा ने देखा, मौसी छत पर गई है। वह भी धीरे-धीरे उनके पीछे-पीछे गई। अन्नपूर्णा ने उसे खींचकर छाती से लगाया और उसका माथा चूमा। आशा ने झुककर दोनों हाथों से उनके पाँव पकड़ लिये। बार-बार उनके पाँवों से अपना माथा लगाया। बोली- "मौसी, मुझे आशीर्वाद दो, बल दो। आदमी इतना कष्ट भी सह सकता है, मैंने यह कभी सोचा तक न था। मौसी, इस तरह कब तक चलेगा?"
अन्नपूर्णा वहीं ज़मीन पर बैठ गई। आशा उनके पैरों पर सिर रखकर लोट गई। अन्नपूर्णा ने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया और चुपचाप देवता को याद करने लगीं।
ज़माने के बाद अन्नपूर्णा के स्नेह-सने मौन आशीर्वाद ने आशा के मन में बैठकर शांति का संचार किया। उसे लगा, उसकी मनोकामना पूरी हो गई है। देवता उस- जैसी नादान की उपेक्षा कर सकते हैं, मगर मौसी की प्रार्थना नहीं ठुकरा सकते।
मन में दिलासा और बल पाकर आशा बड़ी देर के बाद एक लंबा नि:श्वास छोड़कर उठ बैठी। बोली- "मौसी, बिहारी भाई साहब को आने के लिए चिट्ठी लिख दो!" अन्नपूर्णा बोलीं- "उँहूँ, चिट्ठी नहीं लिखूँगी।"
आशा- "तो उन्हें खबर कैसे होगी?"
अन्नपूर्णा बोलीं- "मैं कल खुद उससे मिलने जाऊँगी।"
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जिन दिनों बिहारी पश्चिम में भटकता फिर रहा था, उसके मन में आया, 'जब तक कोई काम लेकर न बैठूँ चैन न मिलेगा।' यही सोचकर उसने कलकत्ता के गरीब किरानियों के मुफ़्त इलाज और सेवा-जतन का भार उठाया। गर्मी के दिनों में डाबर की मछलियाँ जिस तरह कम पानी और कीचड़ में किसी प्रकार जिंदा रह लेती हैं, तंग गलियों के सँकरे कमरों में परिवार का बोझ उठाने वाले बेचारे किरानियों की ज़िन्दगी वैसी ही है-उन दुबले, पीले पड़े, चिन्ता से पिसने वाले भद्रवर्ग के लोगों के प्रति बिहारी को बहुत पहले ही दया हो आई थी- इसलिए उसने उन्हें बगीचे की छाँह और गंगा-तट की खुली हवा दान देने का संकल्प किया।
बाली में उसने बगीचा ख़रीदा और चीनी कारीगरों से छोटे झोंपड़े बनवाने शुरू किए। लेकिन मन को राहत न मिली। काम में लगने का दिन ज्यों-ज्यों क़रीब आने लगा, उसका मन अपने निश्चय से डिगने लगा। बार-बार उसका मन यही कहने लगा- "इस काम में कोई सुख नहीं, रस नहीं, सौंदर्य नहीं-यह महज़ एक नीरस भार है।" काम की कल्पना ने इसके पहले कभी भी बिहारी को इतना परेशान नहीं किया। कभी ऐसा भी था कि बिहारी को ख़ास कोई ज़रूरत ही न थी, जो कुछ भी सामने आ जाता, उसी में वह सहज ही अपने को लगा सकता था। अब उसके मन में न जाने कौन-सी भूख जगी है, उसे बुझा लेने के पहले और किसी भी चीज़ में उसकी आसक्ति नहीं होती। जैसी शुरू से आदत रही है, इस-उस में हाथ डालकर देखता और दूसरे ही क्षण उसे छोड़कर छुटकारा पाना चाहता! बिहारी में यौवन सिकुड़कर आराम कर रहा था। उसने कभी सज्ञान होकर इस तरफ देखा भी नहीं, लेकिन विनोदिनी के स्पर्श ने उसे धधका दिया। अभी-अभी पैदा हुए गरुड़ की तरह अपनी खुराक के लिए वह सारी दुनिया को झिंझोड़ती फिर रही है।
बिहारी का जो पिछला जीवन सुख और सन्तोष से कट गया, उसे वह अब भारी नुकसान समझता। ऐसी मेघघिरी साँझ जाने कितनी आईं, पूर्णिमा की कितनी रातें- वे सब हाथों में अमृत का पात्रा लिये बिहारी के सूने हृदय के द्वार से चुपचाप लौट गईं- उन दुर्लभ शुभ घड़ियों में कितने गीत घुटे रहे, कितने उत्सव न हो पाए, इसकी कोई हद नहीं। बिहारी के मन में जो पुरानी सुधियाँ थीं, उन्हें विनोदिनी ने उद्यत चुम्बन की रक्तिम आभा से ऐसा फीका और तुच्छ कर दिया था। जीवन के ज़्यादातर दिन महेन्द्र की छाया में कटे! उनकी सार्थकता क्या थी? प्रेम की वेदना में सारे जल-थल-आकाश के केन्द्र-कुहर से ऐसी ताप में इस तरह बाँसुरी बजती है, यह तो अचेतन बिहारी कभी सोच भी न पाया था। विनोदिनी ने बिहारी को बाँहों में लपेटकर अचानक एक पल में जिस अनोखे सौंदर्य-लोक में पहुँचा दिया, उसे वह कैसे भूले! फिर भी उस विनोदिनी से बिहारी आज इस तरह दूर क्यों है? इसलिए कि विनोदिनी ने जिस सौंदर्य-रस से बिहारी का अभिषेक किया उस सौंदर्य के अनुकूल संसार में विनोदिनी से किसी संबंध की वह कल्पना नहीं कर सकता।
वह न तो मानिनी का मान भंग करना चाहता है, न सौन्दर्य को कलंकित करना चाहता है और न ही महेन्द्र से कुहनी बाजी करना होता है। शायद यही वजह है कि वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। अपने बगीचे के दक्खिन में फले जामुन-तले बिहारी मेघ-घिरे प्रभात में चुपचाप पड़ा था, सामने से कोठी की डोंगी आ-जा रही थीं। अलसाया-सा वह उसी को देख रहा था। वेला धीरे-धीरे बढ़ती जा रह थी। नौकर ने आकर पूछा, "भोजन का प्रबन्ध करे या नहीं?" बिहारी ने कहा-"अभी रहने दो।"
इतने में उसने चौंककर देखा, सामने अन्नपूर्णा खड़ी है। बदहवास-सा वह उठ पड़ा, दोनों हाथों से उनके पाँव पकड़कर ज़मीन पर माथा टेककर प्रणाम किया। अन्नपूर्णा ने बड़े स्नेह से अपने दाएँ हाथ से उसके बदन और माथे को छुआ। भर आए से स्वर में पूछा- "तू इतना दुबला क्यों हो गया है, बिहारी?"
बिहारी ने कहा- "ताकि तुम्हारा स्नेह पा सकूँ।"
सुनकर अन्नपूर्णा की ऑंखें बरस पड़ीं। बिहारी ने व्यस्त होकर पूछा- "तुमने अभी भोजन नहीं किया है, चाची?"
अन्नपूर्णा बोलीं- "अभी मेरे खाने का समय नहीं हुआ।"
बिहारी बोला- "चलो-चलो, मैं रसोई की जुगत किए देता हूँ। एक युग के बाद तुम्हारे हाथ की रसोई पत्तल का प्रसाद पाकर जी जाऊँगा मैं।"
महेन्द्र और आशा के बारे में बिहारी ने कोई चर्चा नहीं की। इसका दरवाज़ा तो एक दिन खुद अन्नपूर्णा ने ही अपने हाथों बन्द कर दिया था। मान में भरकर उसने उसी निष्ठुर निषेध का पालन किया। खा चुकने के बाद अन्नपूर्णा ने कहा- "घाट पर नाव तैयार है बिहारी, चल, कलकत्ता चल!"
बिहारी बोला- "कलकत्ता से मेरा क्या लेना-देना।"
अन्नपूर्णा ने कहा- "दीदी बहुत बीमार है, वे तुम्हें देखना चाहती हैं एक बार।"
सुनकर बिहारी चौंक उठा। पूछा- "और महेन्द्र भैया।"
अन्नपूर्णा- "वह कलकत्ता में नहीं है, बाहर गया है।"
सुनते ही बिहारी का चेहरा सफेद पड़ गया। वह चुप रहा।
अन्नपूर्णा ने पूछा- "तुझे क्या मालूम नहीं है सारा किस्सा?"
बिहारी बोला- "कुछ तो मालूम है, अंत तक नहीं।"
इस पर अन्नपूर्णा ने विनोदिनी को लेकर महेन्द्र के भाग जाने का किस्सा बताया। बिहारी की निगाह में जल-थल-आकाश का रंग ही बदल गया, उसकी कल्पना के ख़ज़ाने का सारा रस सुनते ही कड़वा हो गया- "तो क्या वह मायाविनी उस दिन शाम को मेरे साथ खेल, खेल गई? उसका प्रेम-निवेदन महज़ मक्कारी था! वह अपना गाँव छोड़कर बेहया की तरह महेन्द्र के साथ भाग गई!"
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बिहारी सोच रहा था, दुखिया आशा की ओर वह देखेगा कैसे! डयोढ़ी के अंदर क़दम रखते ही स्वामीहीन घर की घनीभूत पीड़ा उसे दबोच बैठी। घर के नौकर-दरबानों की ओर ताकते हुए बौराए हुए महेन्द्र के भाग जाने की शर्म ने उसके सिर को गाड़ दिया। पुराने और जाने-पहचाने नौकरों से उसने पहले की तरह मुलायमियत से कुशल-क्षेम न पूछी। हवेली में जाने को मानो उसके क़दम नहीं उठ रहे थे। दुनिया के सामने खुले-आम महेन्द्र बेबस आशा को जिस गहरे अपमान में छोड़ गया है, जो अपमान औरत के सबसे बड़े परदे को उघाड़कर उसे सारी दुनिया की कौतूहल-भरी कृपा-दृष्टि के बीच खड़ा कर देता है, उसी अपमान के आवरणहीन स्वरूप में बिहारी सकुचाई और दुखित आशा को कौन-से प्राण लेकर देखेगा!
लेकिन इन चिन्ताओं और संकोच का मौक़ा ही न रहा। हवेली में पहुँचते ही आशा दौड़ी-दौड़ी आई और बिहारी से बोली- "भाई साहब, जरा जल्दी आओ, माँ को देखो जल्दी!"
बिहारी से आशा की खुलकर बातचीत ही पहली थी। दुर्दिन का मामूली झटका सारी रुकावटों को उड़ा ले जाता है-जो दूर-दूर रहते हैं, बाढ़ उन सबको अचानक एक सँकरी जगह में इकट्ठा कर देती है।
आशा की इस संकोचहीन अकुलाहट से बिहारी को चोट लगी। इस छोटे-से वाकये से ही वह समझ सका कि महेन्द्र अपनी गिरस्ती की कैसी मिट्टी पलीद कर गया है।
बिहारी राजलक्ष्मी के कमरे में गया। अचानक साँस की तकलीफ हो जाने से राजलक्ष्मी फीकी पड़ गई थीं-लेकिन वह तकलीफ ज़्यादा देर नहीं रही इसलिए सँभल गईं।
बिहारी ने राजलक्ष्मी को प्रणाम किया। चरणों की धूल ली। राजलक्ष्मी ने उसे पास बैठने का इशारा किया और धीरे-धीरे कहा- "कैसा है बिहारी? जाने कितने दिनों से तुझे नहीं देखा!"
बिहारी ने कहा- "तुमने अपनी बीमारी की खबर क्यों नहीं भिजवाई? फिर क्या मैं ज़रा भी देर कर पाता।"
राजलक्ष्मी ने धीमे-से कहा- "यह क्या मुझे मालूम नहीं, बेटे! तुझे कोख में नहीं रखा मैंने, लेकिन तुझसे बढ़कर मेरा अपना क्या दुनिया में है कोई?"
कहते-कहते राजलक्ष्मी की ऑंखों से ऑंसू बहने लगे। बिहारी झटपट उठा। ताखों पर दवा-दारू की शीशियों को देखने के बहाने उसने अपने-आपको जब्त किया। उसके बाद आकर उसने राजलक्ष्मी की नब्ज़ देखनी चाही। राजलक्ष्मी बोलीं- "मेरी नब्ज़ को छोड़- मैं पूछती हूँ, तू इतना दुबला क्यों हो गया है?"
अपने दुबले हाथों से राजलक्ष्मी ने बिहारी की गर्दन की हड्डी छूकर देखी।
बिहारी ने कहा- "जब तक तुम्हारे हाथ की रसोई नसीब नहीं होती, यह हवा ढकने की नहीं। तुम जल्दी ठीक हो जाओ माँ, मैं इतने में रसोई का इन्तज़ाम कर रखता हूँ।"
राजलक्ष्मी फीकी हँसी हँसकर बोलीं- "हाँ, जल्दी-जल्दी इन्तज़ाम कर, बेटे- तेरी देख-रेख के लिए कोई भी नहीं है। अरी ओ मँझली- तुम लोग अब बिहारी की शादी करा दो, देखो न, इसकी शक्ल कैसी हो गई है।" अन्नपूर्णा ने कहा- "तुम चंगी हो लो, दीदी- यह तो तुम्हारी ही ज़िम्मेदारी है।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "मुझे अब यह मौक़ा न मिलेगा। बहन, बिहारी का भार तुम्हीं लोगों पर रहा, इसे तुम लोग सुखी रखना? मैं इसका ऋण नहीं चुका सकी, लेकिन भगवान भला करे इसका।" यह कहकर उन्होंने बिहारी के माथे पर अपना दायाँ हाथ फेर दिया।
आशा से कमरे में न रहा गया। वह रोने के लिए बाहर चली गई। अन्नपूर्णा ने भरी हुई ऑंखों से बिहारी को स्नेह-भरी दृष्टि से देखा।
राजलक्ष्मी को अचानक न जाने क्या याद आ गया। बोलीं- "बहू, अरी ओ बहू!" आशा के अन्दर आते ही बोलीं- "बिहारी के खाने का इंतजाम किया या नहीं?"
बिहारी बोला- "तुम्हारे इस पेटू को सबने पहचान लिया है माँ। डयोढ़ी पर आते ही नज़र पड़ी, अंडे वाली मछलियाँ लिये वैष्णवी जल्दी-जल्दी अन्दर जा रही है, मैं समझ गया, अभी इस घर से मेरी ख्याति मिटी नहीं है।"
और बिहारी ने हँसकर आशा की ओर देखा।
आशा आज शर्माई नहीं। स्नेह से हँसते हुए उसने यह दिल्लगी कबूल की। इस घर के लिए बिहारी क्या है, पहले आशा यह पूरी तरह न जानती थी- बहुत बार एक बे-मतलब का मेहमान समझकर उसने उसकी उपेक्षा की है, बहुत बार उसकी यह बेरुखी उसके व्यवहार में साफ़ झलक पड़ी है। उसी अफ़सोस से धिक्कार से उसकी श्रद्धा और करुणा की तरफ तेज़ी से उमड़ पड़ी है।
राजलक्ष्मी ने कहा- "मँझली बहू, यह महाराज के बस की बात नहीं, रसोई की निगरानी तुम्हें करनी पड़ेगी। काफ़ी कड़वा न हो तो अपने इस 'बाँगाल'1 ¬लड़के को खाना नहीं रुचता।"
बिहारी बोला- "माँ, तुम्हारी माँ विक्रमपुर की लड़की थीं और तुम नदिया ज़िले के एक भले घर के लड़के को बांगाल कहती हो! मुझे यह बर्दाश्त नहीं।"
इस पर काफ़ी दिल्लगी रही। बहुत दिनों के बाद महेन्द्र के घर की मायूसी का भार मानो हल्का हो गया।
इतनी बातें होती रहीं, मगर किसी भी तरफ से किसी ने भी महेन्द्र का नाम न लिया। पहले बिहारी से महेन्द्र की चर्चा ही राजलक्ष्मी की एकमात्र बात हुआ करती थी। महेन्द्र ने अपनी माँ का इसके लिए बहुत बार मज़ाक भी उड़ाया है। आज उसी राजलक्ष्मी की ज़बान पर भूलकर भी महेन्द्र का नाम न आते देखकर बिहारी दंग रह गया।
राजलक्ष्मी को झपकी लग गई। बाहर जाकर बिहारी ने अन्नपूर्णा से कहा- "माँ की बीमारी तो सहज नहीं लगती।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "यह तो साफ़ ही देख रही हूँ।" कहकर अन्नपूर्णा खिड़की के पास बैठ गईं।
बड़ी देर चुप रहकर बोलीं- "महेन्द्र को तू खोज नहीं लाएगा, बेटे! अब तो देर करना वाजिब नहीं जँचता।"
बिहारी कुछ देर चुप रहा, फिर बोला- "जो हुक्म करोगी, वह करूँगा। उसका पता मालूम है किसी को?"
अन्नपूर्णा- "पता ठीक-ठीक किसी को मालूम नहीं, ढूँढ़ना पड़ेगा। और एक बात तुमसे कहूँ- आशा का ख्याल करो। अगर विनोदिनी के चंगुल से महेन्द्र को तू न निकाल सका, तो वह ज़िंदा न रहेगी।" मन-ही-मन तीखी हँसी-हँसकर बिहारी ने सोचा, 'मैं दूसरे का उद्धार करूँ- भगवान मेरा उद्धार कौन करे!' बोला- "विनोदिनी के जादू से महेन्द्र को सदा के लिए बचा सकूँ, मैं ऐसा कौन-सा मंतर जानता हूँ, चाची!" इतने में मैली-सी धोती पहने आधा घूँघट निकाले आशा अपनी मौसी के पाँवों के पास आ बैठी। उसने समझा था, दोनों में राजलक्ष्मी की बीमारी के बारे में बातें हो रही हैं इसीलिए चली आई। पतिव्रता आशा के चेहरे पर गुम-सुम दु:ख की मौन महिमा देखकर बिहारी के मन में एक अपूर्व भक्ति का संचार हुआ। शोक में गर्म ऑंसू से सिंचकर इस तरुणा ने पिछले युग की देवियों-जैसी एक अटूट मर्यादा पाई है। राजलक्ष्मी की दवा और पथ्य के बारे में आशा से बातें करके बिहारी ने उसे वहाँ से जब विदा किया, तो एक उसाँस भरकर उसने अन्नपूर्णा से कहा- "महेन्द्र को मैं उस चंगुल से निकलूँगा।" बिहारी महेन्द्र के बैंक में गया। वहाँ उसे पता चला महेन्द्र इन दिनों उनकी इलाहाबाद- शाखा से लेन-देन करता है।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

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Jemsbond
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:45

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स्टेशन जाकर विनोदिनी औरतों वाले डयोढे दर्जे के डिब्बे में जा बैठी। महेन्द्र ने कहा, "अरे, कर क्या रही हो, मैं तुम्हारा दूसरे दर्जे का टिकट ले रहा हूँ।"
वह बोली "बेजा क्या है, यहाँ आराम से ही रहूँगी।" महेन्द्र ताज्जुब में पड़ गया। विनोदिनी स्वभाव से ही शौकीन थी। गरीबी का कोई भी लक्षण उसे न सुहाता था। अपनी गरीबी को वह अपने लिए अपमानजनक ही मानती थी। महेन्द्र ने इतना समझ लिया था कि कभी उसके घर की खुशहाली, विलास की सामग्रियों और औरों की अपेक्षा उनके धनी होने के गौरव ने ही विनोदिनी के मन को आकर्षित किया था। इस धन-दौलत की, इन सारे आराम और गौरव की वह सहज ही मालकिन हो सकती थी, इस कल्पना ने उसे बड़ा उत्तेजित कर दिया था। आज जब उसको महेन्द्र पर प्रभुत्व पाने का मौक़ा मिला है, अनचाहे भी वह उसकी धन-दौलत को अपने काम में ला सकती है, तो वह क्यों ऐसी असह्य उपेक्षा से यों तनकर तकलीफदेह शर्मनाक दीनता अपना रही है? वह महेन्द्र पर कम-से-कम निर्भर रहना चाह रही थी।
महेन्द्र ने पूछा- "पछाँह की तरफ जहाँ भी चाहे, चलो! सुबह जहाँ गाड़ी रुकेगी उतर पडेंग़े।"
महेन्द्र को ऐसी यात्रा में कोई आकर्षण नहीं। आराम न मिले तो तकलीफ होती है। बड़े शहर में रहने की इच्छा-जगह न मिले तो मुश्किल। इधर मन में यह डर लगा रहा कि विनोदिनी चुपचाप कहीं उतर न पड़े।
इस तरह विनोदिनी शनि ग्रह की तरह घूमने और महेन्द्र को घुमाने लगी। कहीं भी चैन न लेने दिया। विनोदिनी बड़ी जल्दी दूसरे को अपना बना सकती है। कुछ ही देर में हमसफरों से मिताई कर लेती। जहाँ जाना होता वहाँ की सारी बातों का अता-पता लगा लेती, रात्रिशाला में ठहरती और जहाँ जो कुछ देखने जैसा होता, उन बन्धुओं की मदद से देखती। अपनी आवश्यकता से महेन्द्र विनोदिनी के आगे रोज-रोज़ अपने को बेकार समझने लगा। टिकट लेने के सिवाय कोई काम नहीं। शुरू-शुरू के कुछ दिनों तक वह विनोदिनी के साथ-साथ चक्कर काटा करता था, लेकिन धीरे-धीरे वह असह्य हो गया। खा-पीकर वह सो जाने की फ़िक्र में होता, विनोदिनी तमाम दिन घूमा करती। माता के लाड़ में पला महेन्द्र यों भी चल सकता है, कोई सोचता भी न था।
एक दिन इलाहाबाद स्टेशन पर दोनों गाड़ी का इन्तज़ार कर रहे थे। किसी वजह से गाड़ी आने में देर हो रही थी। इस बीच और जो गाड़ियाँ आ-जा रही थीं, विनोदिनी उनके मुसाफिरों को गौर से देख रही थी। शायद उसे यह उम्मीद थी कि पछाँह में घूमते हुए चारों तरफ देखते-देखते अचानक किसी से भेंट हो जाएगी। कम-से-कम रुँधी गली के सुनसान घर में बेकार की तरह बैठकर अपने को घोंट मारने की अपेक्षा खोज-बीन में, इस खुली राह की चहल-पहल में शान्ति थी।
अचानक उधर काँच के एक बक्स पर नज़र पड़ते ही विनोदिनी चौंक उठी। उसमें उन लोगों की चिट्ठियाँ रखी जाती हैं, जिनका पता नहीं चलता। उसी बक्स के पत्रो में से एक में उसने बिहारी का नाम देखा। बिहारी नाम कुछ असाधारण नहीं। यह समझने की कोई वजह न थी कि यह बिहारी विनोदिनी का ही वांछित बिहारी का सन्देह न हुआ। उसने ठिकाना याद कर लिया। महेन्द्र एक बेंच पर बड़ा खुश बैठा था। विनोदिनी उसके पास जाकर बोली-"कुछ दिनों यहीं रहूँगी।"
विनोदिनी अपने इशारे पर महेन्द्र को नचा रही थी और फिर भी उसके भूखे-प्यासे मन को खुराक तक न देती थी, इससे उसके पौरुष गर्व को ठेस लग रही थी और उसका मन दिन-प्रतिदिन बागी होता जा रहा था। इलाहाबाद रुककर कुछ दिन सुस्ताने का मौक़ा मिले तो मानो वह भी जाय- लेकिन इच्छा के अनुकूल होने के बावजूद उसका मन विनोदिनी के ख्याल पर राज़ी होने को सहसा तैयार न हुआ। उसने नाराज़ होकर कहा- "जब निकल ही पड़ा तो जाकर ही रहूँगा, अब लौट नहीं सकता।"
विनोदिनी बोली- "मैं नहीं जाऊँगी।"
महेन्द्र बोला- "तो तुम अकेली रहो, मैं चलता हूँ।"
विनोदिनी बोली- "यह सही।" और बेझिझक उसने इशारे से कुली को बुलाया और स्टेशन से चल पड़ी।
पुरुष के कर्तत्व-अधिकार से परिपूर्ण महेन्द्र स्याह-सूरत लिये बैठा रह गया। जब तक विनोदिनी ऑंखों से ओझल न हो गई, वह देखता रहा। बाहर आकर देखा, विनोदिनी एक बग्घी पर बैठी है। उसने चुपचाप सामान रखवाया और कोचबक्स पर बैठ गया। अपने अभिमान की मिट्टीपलीद होने के बाद उसमें विनोदिनी के सामने बैठने का मुँह न रहा।
लेकिन गाड़ी चली, तो चली। घंटा-भर बीत गया, शहर छोड़कर वह खेतों की तरफ जा निकली। गाड़ीवान से पूछने में महेन्द्र को संकोच हुआ। शायद गाड़ीवान यह सोचेगा कि असल में अन्दर की औरत ही मालकिन है, इस बेकार आदमी से उसने यह भी सलाह नहीं की है कि कहाँ जाना है। वह कड़वा घूँट पीकर चुपचाप कोचबक्स पर बैठा रहा।
गाड़ी यमुना के निर्जन तट पर सुन्दर ढंग से लगाए एक बगीचे के सामने आकर रुकी। महेन्द्र हैरत में पड़ गया। 'किसका है यह बगीचा? इसका पता विनोदिनी को कैसे मालूम हुआ?'
फाटक बंद था। चीख-पुकार के बाद बूढ़ा रखवाला बाहर निकला। उसने कहा- "बगीचे के मालिक धनी हैं, बहुत दूर नहीं रहते। उनकी इजाज़त ले आएँ तो यहाँ ठहरने दूँगा।"
विनोदिनी ने एक बार महेन्द्र की तरफ देखा। बगीचे के सुन्दर घर को देखकर महेन्द्र लुभा गया था- बहुत दिनों के बाद कुछ दिनों के लिए रुकने की उम्मीद से वह खुश हो गया। विनोदिनी से कहा- "चलो, उस धनी के पास चलें। तुम बाहर गाड़ी पर रहना, मैं अन्दर जाकर किराया तय कर लूँगा।"
विनोदिनी बोली- "मैं अब चक्कर नहीं काट सकती। तुम जाओ, मैं तब तक यहीं सुस्ताती हूँ। डरने की कोई बात नहीं।"
महेन्द्र गाड़ी लेकर चला गया। विनोदिनी ने उस बूढ़े ब्राह्मण को बुलाकर उसके बाल-बच्चों के बारे में पूछा; वे कौन हैं, कहाँ काम करते हैं, बच्चियों की शादी कहाँ हुई है। उसकी स्त्री के देहान्त हो जाने की बात सुनकर करुण स्वर में बोली- "ओह, तब तो तुम्हें काफ़ी तकलीफ है। इस उम्र में दुनिया में निरे अकेले पड़ गए हो, कोई देखने वाला नहीं!"
और बातों-बातों में विनोदिनी ने पूछा- "यहाँ बिहारी बाबू न थे?"
बूढ़े ने कहा- "जी हाँ, थे कुछ दिन। माँजी क्या उनको पहचानती हैं?" विनोदिनी बोली- "वे हमारे अपने ही हैं।"
बूढ़े से बिहारी का जो हुलिया मिला, उसे विनोदिनी को कोई शुबहा न रहा। घर बुलाकर उसने सब कुछ पूछ-ताछ लिया कि बिहारी किस कमरे में सोता था, कहाँ बैठता था। उसके चले जाने के बाद से घर बन्द पड़ा था, इससे लगा कि उसमें बिहारी की गंध है। लेकिन यह पता न चल सका कि बिहारी गया कहाँ- शायद ही वह फिर लौटे।
महेन्द्र किराया चुकाकर मालिक से वहाँ रहने की इजाज़त ले ली।
51
शाम को महेन्द्र जब उस यमुना के तट पर जा बैठा, तो प्रेम के आवेश ने उसकी नज़रों में, साँसों में, नस-नस में, हड्डीयों के बीच गाड़े मोह रस का संचार कर दिया आसमान में डूबने सूरज की किरणों की सुनहरी वीणा वेदना की मूच्छना से झरती जोत के संगीत से झंकृत हो उठी!
बारिश जैसा हो रहा था। नदी अपने उद्दाम यौवन में। महेन्द्र के पास निर्दिष्ट कुछ नहीं था। उसे वैष्णव कवियों का वर्षाभिसार याद आया। नायिका बाहर निकली है; यमुना के किनारे वह अकेली खड़ी है। उस पार कैसे जाए? अरे ओ, पार करो, पार कर दो। महेन्द्र की छाती के अन्दर यही पुकार पहुँचने लगी- 'पार करो'।
नदी से उस पार बड़ी दूर पर वह अभिसारिका खड़ी थी- फिर भी महेन्द्र उसे साफ़ देख पाया। उसका कोई काल नहीं, उम्र नहीं, वह चिरंतन गोपबाला है, मगर महेन्द्र ने उसे फिर भी पहचान लिया- पहचाना कि वह विनोदिनी है। सारा विरह, सारी वेदना यौवन का सारा भार लिये वह उस युग के अभिसार के लिए चली थी और आज के युग के किनारे आ निकली है। आज के इस सूने यमुना-तट के ऊपर आकाश में वही स्वर सुनाई पड़ रहा है। 'अरे ओ, पार करो, पार कर दो!'
महेन्द्र मतवाला हो गया। विनोदिनी उसे ठुकरा देगी, चाँदनी रात के इस स्वर्ग-खण्ड को वह लक्ष्मी बनकर पूरा न करेगी, वह सोच भी नहीं सका। वह तुरन्त उठकर विनोदिनी को ढूँढ़ने चल दिया। सोने के कमरे में गया। कमरा फूलों की खुशबू से महमहा रहा था। खुली खिड़कियों से छनकर चाँदनी सफेद बिछौने पर आ पड़ी थी। बगीचे के फूलों से सजी वह बसंत की बिखरी लता-जैसी चाँदनी में बिस्तर पर लेटी हुई थी।
महेन्द्र का मोह दुगुना हो गया। उसने रुँधे गले से कहा- "विनोद, मैं यमुना के तट पर तुम्हारी राह देख रहा था और तुम यहाँ इन्तज़ार कर रही हो, यह सन्देशा मुझे चाँद ने दिया। इसी से मैं यहाँ आ गया।" यह कहकर महेन्द्र बिस्तर पर बैठने ही जा रहा था कि विनोदिनी उठ बैठी और दायाँ हाथ बढ़ाकर बोली-"जाओ; इस बिस्तर पर मत बैठो।" पाल वाली नाव मानो चौंर में अटक गई- महेन्द्र कहा न माने, इसीलिए विनोदिनी बिस्तर से उतरकर खड़ी हो गई।
महेन्द्र ने पूछा- "तो तुम्हारा यह शृंगार किसके लिए है? किसका इन्तज़ार कर रही हो?"
विनोदिनी ने अपनी छाती को दबाकर कहा- "मैं जिसके लिए सजी-सँवरी, वह मेरे अंतस्तल में है।" महेन्द्र ने पूछा- "आखिर कौन? बिहारी।"
विनोदिनी बोली- "उसका नाम तुम अपनी ज़बान पर मत लाओ!"
महेन्द्र- "उसी के लिए तुम पछाँह का दौरा कर रही हो?"
विनोदिनी- "हाँ, उसी के लिए।"
महेन्द्र- "उसका पता मालूम है?"
विनोदिनी- "मालूम नहीं, मगर जैसे भी हो, मालूम करूँगी।"
महेन्द्र- "तुम्हें यह हर्गिज़ न मालूम होने दूँगा।"
विनोदिनी- "न सही, मगर मेरे हृदय से उसे निकाल नहीं पाओगे।"
यह कहकर विनोदिनी ने ऑंखें बन्द करके अपने हृदय में एक बार बिहारी का अनुभव कर लिया।
फूलों से सजी विरह-विधुरा विनोदिनी से एक साथ ही खिंचकर और ठुकराया जाकर महेन्द्र अचानक भयंकर हो उठा; वह मुट्ठी कसकर बोला- "छुरी से चीरकर मैं उसे तुम्हारे कलेजे से निकाल बाहर करूँगा।" विनोदिनी ने दृढ़ता से कहा- "तुम्हारे प्रेम से तुम्हारी यह छुरी मेरे हृदय में आसानी से घुस सकेगी।"
महेन्द्र- "तुम मुझसे डरती क्यों नहीं? यहाँ तुम्हें बचाने वाला कौन है?"
विनोदिनी- "बचाने वाले तुम हो! तुम्हीं मुझे अपने से बचाओगे।"
महेन्द्र- "इतनी श्रद्धा, इतना विश्वास अब भी है!"
विनोदिनी- "यह न होता तो मैं खुदकुशी कर लेती, तुम्हारे साथ परदेस न आती।"
महेन्द्र- "क्यों न कर ली खुदकुशी- उस विश्वास की फाँस मेरे गले में डाल कर मुझे देश-देशान्तर में घसीटकर क्यों मार रही हो? सोच देखो, तुम मर जाती तो कितना कल्याण होता!" विनोदिनी- "जानती हूँ, मगर जब तक बिहारी की उम्मीद है, मर न पाऊँगी।"
महेन्द्र- "जब तक तुम नहीं मरतीं, तब तक मेरी आशा भी नहीं मरने की, मैं भी छुटकारा नहीं पाने का। आज से मैं हृदय से भगवान से तुम्हारी मृत्यु की कामना करता हूँ। तुम मेरी भी न बनो, बिहारी की भी नहीं! जाओ, मुझे मुक्ति दो। मेरी माँ रो रही है, स्त्री रो रही है, उनके ऑंसू दूर से ही मुझे जला रहे हैं। जब तक तुम मर नहीं जातीं; मेरी और दुनिया-भर की आशा से परे नहीं हो जातीं, तब तक मुझे उनके ऑंसू पोंछने का अवसर नहीं मिलेगा।"
इतना कहकर महेन्द्र बड़ी तेज़ी से बाहर निकल गया। अकेली पड़ी विनोदिनी अपने चारों तरफ माया का जाल बुन रही थी, उसे वह फाड़ गया। विनोदिनी खड़ी-खड़ी चुपचाप बाहर देखती रही- आकाश-भरी चाँदनी को ख़ाली करके उसका सारा संचित अमृत कहीं चला गया? वह क्यारियों वाला बगीचा, उसके बाद रेती-भरा किनारा, उसके बाद नदी का काला-काला पानी, उसके बाद सारा पार का धुँधलापन- सब मानो एक सादे काग़ज़ पर पेंसिल का बना चित्र हो- नीरस, बेमानी।
उसने महेन्द्र को किस बुरी तरह अपनी ओर खींचा है खौफनाक तूफ़ान की तरह कैसे उसे जड़ समेत उखाड़ लिया है- यह अनुभव करके आज उसका हृदय मानो और भी बेचैन हो गया। उसमें यह सारी शक्ति तो है, फिर भी बिहारी पूर्णिमा की रात में उमड़े हुए समुद्र की तरह उसके सामने आकर पछाड़ क्यों नहीं खाता? क्यों बे-मतलब प्यार की कचोट रोज़ उसके ध्यान में आकर रोती है? उसे लगा सब बेकार और निरर्थक है। इतनी व्यर्थता के बावजूद जो जहाँ है, वहीं खड़ा है- दुनिया में किसी बात का कोई कार्यक्रम नहीं। सूरज तो कल भी उगेगा और दुनिया अपने छोटे-से काम को भी न भूलेगी। और बिहारी जैसे दूर रहा है, वैसे ही दूर रहेगा और उस ब्राह्मण के बच्चे को किताब का नया पाठ पढ़ाता रहेगा।
उसकी ऑंखों से ऑंसू फूटकर झरने लगे। अपनी इच्छा और शक्ति लिये वह किस पत्थर को ढकेल रही है? उसका हृदय लहू से नहा उठा, लेकिन उसकी तकदीर सुई की नोक के बराबर भी न खिसकी।
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रात में महेन्द्र सोया नहीं- थकावट के मारे सुबह-सुबह उसे नींद आई। सुबह आठ-नौ बजे के क़रीब जगकर वह झट उठ बैठा। पिछली रात की कोई अधूरी पीड़ा नींद के भीतर-ही-भीतर घूमती रही थी। सचेतन होते ही महेन्द्र उसकी तकलीफ महसूस करने लगा। कुछ ही देर में रात की सारी घटना मन में जाग पड़ी। सुबह की उस धूप में, पूरी नींद न आ पाने की थकावट से सारी दुनिया और ज़िन्दगी बड़ी सूखी-सी लगी। घर छोड़ने की ग्लानि, धर्म छोड़ने का परिताप और इस उद्भ्रांत जीवन की ये ज़िल्लतें आखिर वह किसके लिए झेल रहा है! मोह के आवेश से रहित सुबह की इस धूप में महेन्द्र को लगा, वह विनोदिनी को प्यार नहीं करता। उसने रास्ते की ओर झाँका- सारी दुनिया परेशान-सी काम के पीछे भाग रही है और आत्म-गौरव को कीचड़ में डुबोकर एक बेरुखी औरत के पैरों से लिपटे रहने की जो नादानी है, वह महेन्द्र की निगाहों में स्पष्ट हो उठी। आवेग के किसी बड़े झोंके के बाद हृदय में अवसाद आता है, ऐसे वक्त थका-हारा हृदय अनुभूति के विषय को कुछ समय के लिए दूर हटाना चाहता है।
फिर तो धिक्कार के इस मार-चक्र से अपने को छुडाकर घर जाने के लिए महेन्द्र ललक उठा, बिहारी को निर्भर करने योग्य अडिग मिताई बड़ी बेशकीमती लगने लगी। महेन्द्र मन-ही-मन कह उठा- 'जो वास्तव, गम्भीर और स्थायी होता है, उसमें अनायास, बाधा-विहीन-सा अपने को पूरी तरह खोया जा सकता है, इसीलिए उसके गौरव को हम नहीं समझते। जो महज धोखा है, जिसकी तृप्ति में भी सुख का नाम नहीं, चूँकि वह हमें अपने पीछे घुड़दौड़-सी कराता है, इसलिए हम उसे अपनी चरम कामना का धन समझते हैं।'
महेन्द्र ने तय किया- 'मैं आज ही अपने घर जाऊँगा। विनोदिनी जहाँ भी रहना चाहेगी, वहीं उसका इन्तज़ाम करके मैं मुक्त हो जाऊँगा'- यह ज़ोर से उच्चारण करते ही उसके मन में एक आनन्द का उदय हुआ। लगातार दुविधा का जो भार वह ढोता चला आ रहा था, हल्का हो गया। अब तक होता ऐसा रहा कि, अभी-अभी जो बात उसे रुचती न थी, दूसरे ही क्षण उसे मानने को मजबूर होना पड़ता था, हाँ- ना कहते न बनता; उसकी अन्तरात्मा उसे जो आदेश देती, सदा बलपूर्वक उसे दबाकर वह दूसरी ही राह पर चला करता। अभी जैसे ही उसने ज़ोर से कहा- 'मैं मुक्त हो जाऊँगा'-वैसे ही शरण पाकर उसके झकझोरे हुए हृदय ने उसे बधाई दी।
महेन्द्र बिस्तर से उठा, मुँह-हाथ धोया और विनोदिनी से मिलने गया। देखा, कमरा अन्दर से बन्द है। दरवाज़े पर धक्का देकर पूछा- "सो रही हो?" विनोदिनी बोली- "नहीं, अभी जाओ!"
महेन्द्र ने कहा- "तुमसे ज़रूरी बात करनी है। ज़्यादा देर न रुकूँगा।" विनोदिनी बोली- "बात अब मैं नहीं सुनना चाहती, तुम जाओ, मुझे तंग मत करो- अकेली रहने दो।"
और दिन होता, तो इससे महेन्द्र का आवेग और बढ़ ही जाता। लेकिन आज उसे बेहद घृणा हुई। सोख, इस मामूली औरत के आगे अपने- आपको मैंने ऐसा गया-बीता बना छोड़ा है कि अब उसमें मुझे बुरी तरह दुत्कारकर दूर कर देने की हिम्मत हो गई है? यह अधिकार इसका स्वाभाविक नहीं। मैंने ही यह अधिकार देकर इसके मिज़ाज को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है।
विनोदिनी की इस झिड़की से महेन्द्र ने अपने में अपनी श्रेष्ठता के अनुभव की कोशिश की। उसके मन ने कहा- "मैं विजयी होऊँगा- इसके बन्धन तोड़कर चला जाऊँगा।"
भोजन करके महेन्द्र रुपया निकालने बैंक गया। रुपया निकाला और आशा तथा माँ के लिए कुछ नई चीज़ें ख़रीदने के ख्याल से वह बाज़ार की दुकानों में घूमने लगा।
विनोदिनी के दरवाज़े पर एक बार फिर धक्का पड़ा। पहले तो आजिज़ी से उसने कोई जवाब ही न दिया; लेकिन जब बार-बार धक्का पड़ने लगा तो आग-बबूला होकर दरवाज़ा खोलते हुए उसने कहा- "नाहक क्यों बार-बार मुझे तंग करने आते हो तुम?"
बात पूरी करने के पहले ही उसकी नज़र पड़ी- बिहारी खड़ा था। कमरे में महेन्द्र है या नहीं, यह देखने के लिए बिहारी ने एक बार भीतर की तरफ झाँका। देखा, कमरे में सूखे फूल और टूटी मालाएँ बिखरी पड़ी थीं। उसका मन जबर्दस्त ढंग से विमुख हो उठा। यह नहीं कि बिहारी जब दूर था, तो उसके मन में विनोदिनी के रहन-सहन के बारे में सन्देह का कोई चित्र आया ही नहीं, लेकिन कल्पना की लीला ने उस चित्र को ढककर भी एक दमकती हुई मोहिनी छवि खड़ी कर रखी थी। बिहारी जिस समय इस बगीचे में क़दम रख रहा था, उस समय उसका दिल धड़कने लगा था- कल्पना की प्रतिमा को कहीं चोट न पहुँचे इस आंशका से उसका हृदय संकुचित हो रहा था। और विनोदिनी के सोने के कमरे के द्वार पर खड़े होते ही वही चोट लगी।
दूर रहते हुए बिहारी ने सोचा था कि अपने प्रेम के अभिषेक से मैं विनोदिनी के जीवन की सारी कालिमा को धो दूँगा। लेकिन पास आकर देखा, यह आसान नहीं। मन में करुणा की वेदना कहाँ उपजी? बल्कि एकाएक घृणा ने जगकर उसे अभिभूत कर दिया। बिहारी ने उसे बड़ा मलिन देखा।
वह तुरन्त मुड़कर खड़ा हो गया और उसने 'महेन्द्र-महेन्द्र' कहकर पुकारा। इस अपमान से विनोदिनी ने नम्र स्वर में कहा- "महेन्द्र नहीं है, शहर गया है।" बिहारी लौटने लगा। विनोदिनी बोली- "भाई साहब, मैं पैर पड़ती हूँ, ज़रा देर बैठना पड़ेगा।"
बिहारी ने सोच रखा था, वह कोई आरजू-मिन्नत नहीं सुनेगा। तय कर लिया था कि नफरत के इस नज़ारे से तुरन्त अपने को अलग कर लेगा। लेकिन विनोदिनी की करुण विनती से उसके क़दम क्षण-भर के लिए उठ न सके।
विनोदिनी बोली- "आज अगर तुम मुझे इस तरह ठुकराकर चल दिए, तो तुम्हारी कसम खाकर कहती हूँ, मैं मर जाऊँगी।"
बिहारी पलटकर खड़ा हो गया, बोला- "तुम अपने जीवन से मुझे जकड़ने की कोशिश क्यों करती हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? मैं तो कभी तुम्हारी राह में नहीं आया, तुम्हारे सुख-दु:ख में कभी दख़ल नहीं दिया।"
विनोदिनी बोली- "तुमने मुझ पर कितना अधिकार कर रखा है, एक बार तुमसे कहा था मैंने- तुमने विश्वास नहीं किया। तो भी तुम्हारी बेरुखी में भी फिर वही कहती हूँ। बिना बोले जताने का शर्म से बताने का मौक़ा तो तुमने मुझे दिया नहीं। तुमने मुझे पैरों से झटक दिया है, मैं फिर भी तुम्हारे पाँव पकड़कर कहती हूँ- मैं तुम्हें..."
बिहारी ने टोकते हुए कहा- "बस-बस, रहने दो, यह बात जबान पर मत लाओ। एतबार की गुंजाइश नहीं रही।"
विनोदिनी- "इतर लोग इस पर विश्वास न करें, पर तुम करोगे। इसीलिए मैं तुम्हें ज़रा देर बैठने को कह रही हूँ।"
बिहारी- "मेरे विश्वास करने, न करने से क्या आता-जाता है। तुम्हारी ज़िन्दगी तो जैसी चल रही है, चलती रहेगी।"
विनोदिनी- "इससे तुम्हारा कुछ आता-जाता नहीं, मैं जानती हूँ? अपना नसीब ही ऐसा है कि तुमसे मुझे सदा दूर ही रहना होगा। बस मैं केवल इतना हक नहीं छोड़ना चाहती कि मैं चाहे जहाँ रहूँ, मुझे ज़रा माधुर्य के साथ याद करना। मुझे मालूम है, मुझ पर तुम्हें थोड़ी-सी श्रद्धा हुई थी, मैं उसी को अपना अवलम्ब बनाए रहूँगी। इसीलिए मेरी पूरी बात तुम्हें सुननी होगी। मैं हाथ जोड़ती हूँ, ज़रा देर बैठो!" "अच्छा चलो!" कहकर बिहारी उस कमरे से और कहीं जाने को तैयार हुआ।
विनोदिनी बोली- "भाई साहब, जो सोच रहे हो, वह बात नहीं है। इस कमरे को कलंक की छाया नहीं छू सकी है। कभी यहाँ सोए थे- इसे मैंने तुम्हारे ही लिए उत्सर्ग करके रखा है। सूखे पड़े ये फूल तुम्हारी ही पूजा के हैं। तुम्हें यहीं बैठना होगा।"
सुनकर बिहारी के मन में पुलक का संचार हुआ। वह कमरे में गया। विनोदिनी ने दोनों हाथों से उसे खाट का इशारा किया। बिहारी खाट पर बैठा। विनोदिनी उसके पैरों के पास ज़मीन पर बैठी। विनोदिनी ने बिहारी को व्यस्त होते देखकर कहा- "तुम बैठो, भाई साहब! सिर की कसम तुम्हें, उठना मत। मैं तुम्हारे पैरों के पास भी बैठने लायक़ नहीं- दया करके ही तुमने मुझे यह जगह दी है। दूर रहूँ, तो भी इतना अधिकार मैं रखूँगी।"
यह कहकर विनोदिनी जरा देर चुप रही। उसके बाद अचानक चौंककर बोली- "तुम्हारा खाना?"
बिहारी बोला- "स्टेशन से खाकर आया हूँ।"
विनोदिनी- "मैंने गाँव से तुम्हें जो पत्र दिया था, उसे खोलकर पढ़ा और कोई जवाब न देकर उसे महेन्द्र के मार्फत लौटा क्यों दिया?"
बिहारी- "कहाँ, वह चिट्ठी तो मुझे नहीं मिली।"
विनोदिनी- "इस बार कलकत्ता में महेन्द्र से तुम्हारी भेंट हुई थी।"
बिहारी- "तुम्हें गाँव पहँचाकर लौटा, उसके दूसरे दिन भेंट हुई थी। उसके बाद मैं पछाँह की ओर सैर को निकल पड़ा, उससे फिर भेंट नहीं हुई।"
विनोदिनी- "उससे पहले और एक दिन मेरी चिट्ठी पढ़कर बिना उत्तर के वापिस कर दी?"
बिहारी- "नहीं, ऐसा कभी नहीं हुआ।"
विनोदिनी बुत-सी बैठी रही। उसके बाद लम्बी साँस छोड़कर बोली- "सब समझ गई। अब अपनी बात बताऊँ-मगर यकीन करो तो अपनी खुशकिस्मती समझूँ और न कर सको तो तुमको दोष न दूँगी, मुझ पर यकीन करना मुश्किल है।"
बिहारी का हृदय पसीज गया। भक्ति से झुकी विनोदिनी की पूजा का वह किसी भी तरह अपमान न कर सका। बोला- "भाभी, तुम्हें कुछ कहना न पडेग़ा। बिना कुछ सुने ही मैं तुम्हारा विश्वास करता हूँ। मैं तुमसे घृणा नहीं कर सकता। तुम अब एक भी शब्द न कहना!"
सुनकर विनोदिनी की ऑंखों से ऑंसू बहने लगे। उसने बिहारी के चरणों की धूल ली। बोली- "सब न सुनोगे, तो मैं जी न सकूँगी। थोड़ा धीरज रखकर सुनना होगा-तुमने मुझे जो आदेश दिया था, मैंने उसी को सिर माथे उठा लिया था। तुमने मुझे पत्र तक न लिखा, तो भी अपने गाँव में मैं लोगों की निंदा सहकर ज़िन्दगी बिता देती, तुम्हारे स्नेह के बदले तुम्हारे शासन को ही स्वीकार करती- लेकिन विधाता उसमें भी वाम हुए। जिस पाप को मैंने जगाया, उसने मुझे निर्वासन में भी न टिकने दिया। महेन्द्र वहाँ पहुँचा, मेरे घर पर जाकर उसने सबके सामने मेरी मिट्टीपलीद की। गाँव में मेरे लिए जगह न रह गई। मैंने दुबारा तुम्हें बेहद तलाशा कि तुम्हारा आदेश लूँ, पर तुमको न पा सकी। मेरी खुली चिट्टी तुम्हारे यहाँ से लाकर मुझे देते हुए महेन्द्र ने धोखा दिया। मैंने समझा, तुमने मुझे एकबारगी त्याग दिया। इसके बाद मैं बिलकुल नष्ट हो सकती थी-मगर पता नहीं तुममें क्या है, तुम दूर रहकर भी बचा सकते हो। मैंने दिल में तुम्हें जगह दी है, इसी से पवित्रा वही कठिन परिचय सख्त सोने की तरह, ठोस मणि की तरह मेरे मन में है, उसने मुझे मूल्यवान बनाया है। देवता, तुम्हारे पैर छूकर कहती हूँ, वह मूल्य नष्ट नहीं हुआ है।"
बिहारी चुप रहा। विनोदिनी भी और कुछ न बोली। तीसरे पहर की धूप पल-पल पर फीकी पड़ने लगी। ऐसे समय महेन्द्र दरवाज़े पर आया और बिहारी को देखकर चौंक पड़ा। विनोदिनी के प्रति उसमें जो उदासीनता आ रही थी,ईर्ष्या से वह जाने-जाने को हो गई। विनोदिनी को बिहारी के पाँवों के पास बैठी देखकर ठुकराए हुए महेन्द्र को चोट पहुँची।
व्यंग्य के स्वर में महेन्द्र ने कहा- "तो अब रंगमंच से महेन्द्र का प्रस्थान हुआ, बिहारी का प्रवेश! दृश्य बेहतरीन है। तालियाँ बजाने को जी चाहता है। लेकिन उम्मीद है, यही अन्तिम अंक है। इसके बाद अब कुछ भी अच्छा न लगेगा।"
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:46

विनोदिनी का चेहरा तमतमा उठा। महेन्द्र की शरण जब उसे लेनी पड़ी है, तो इस अपमान का क्या जवाब दे-व्याकुल होकर उसने केवल बिहारी की ओर देखा। बिहारी खाट से उठा। बोला- "महेन्द्र, कायर की तरह विनोदिनी का यों अपमान न करो- तुम्हारी भलमनसाहत अगर तुम्हें नहीं रोकती, तो रोकने का अधिकार मुझको है।" महेन्द्र ने हँसकर कहा- "इस बीच अधिकार भी हो गया? आज तुम्हारा नया नामकरण है- विनोदिनी!"
अपमान करने का हौंसला बढ़ता ही जा रहा है, यह देखकर बिहारी ने महेन्द्र का हाथ दबाया। कहा- "महेन्द्र, मैं विनोदिनी से ब्याह करूँगा, सुन लो! लिहाज़ा संयत होकर बात करो।" महेन्द्र अचरज के मारे चुप हो गया और विनोदिनी चौंक उठी। उसकी छाती के अन्दर का लहू खलबला उठा।
बिहारी ने कहा- "और एक खबर देनी है तुम्हें। तुम्हारी माँ मृत्यु-सेज पर हैं। बचने की कोई उम्मीद नहीं। मैं आज रात को ही गाड़ी से जाऊँगा- विनोदिनी भी मेरे साथ जाएगी।" विनोदिनी ने चौंककर पूछा- "बुआ बीमार हैं?"
बिहारी बोला- "हाँ, सख्त। कब क्या हो जाय कुछ कहा नहीं जा सकता।"
यह सुनकर महेन्द्र ने और कुछ न कहा! चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया।
विनोदिनी ने बिहारी से पूछा- "अभी-अभी तुमने जो कहा, तुम्हारी जुबान पर यह बात कैसे आई? मज़ाक तो नहीं?" बिहारी बोला- "नहीं, मैंने ठीक ही कहा है। मैं तुमसे ब्याह करूँगा।"
विनोदिनी- "किसलिए? उद्धार करने के लिए।"
बिहारी- "नहीं, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, इसलिए।"
विनोदिनी- "यही मेरा पुरस्कार है। इतना-भर स्वीकार किया, मेरे लिए यही बहुत है, इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं चाहती। ज़्यादा मिले भी तो रहने का नहीं।" बिहारी- "क्यों?"
विनोदिनी- "वह सोचते हुए भी शर्म आती है। मैं विधवा हूँ, बदनाम हूँ- सारे समाज के सामने तुम्हारी फजीहत करूँ, यह हर्गिज नहीं होगा। छि:, यह बात जबान पर न लाओ।" बिहारी- "तुम मुझे छोड़ दोगी?"
विनोदिनी- "छोड़ने का अधिकार मुझे नहीं। चुपचाप तुम बहुतों की बहुत भलाई किया करते हो-अपने वैसे ही किसी व्रत का कोई-सा भार मुझे देना, उसी को ढोती हुई मैं अपने-आपको तुम्हारी दासी समझा करूँगी। लेकिन विधवा से तुम ब्याह करोगे, छि:! तुम्हारी उदारता से सब-कुछ मुमकिन है, लेकिन मैं यह काम करूँ, समाज में तुम्हें नीचा करूँ तो ज़िन्दगी में यह सिर कभी उठा न सकूँगी।" बिहारी- "मगर मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।"
विनोदिनी- "उसी प्यार के अधिकार से आज मैं एक ढिठाई करूँगी।"
इतना कहकर विनोदिनी झुकी। उसने पैर की उँगली को चूम लिया। पैरों के पास बैठकर बोली- "तुम्हें अगले जन्म में पा सकूँ, इसके लिए मैं तपस्या करूँगी। इस जन्म में अब कोई उम्मीद नहीं। मैंने बहुत दु:ख उठाया-काफ़ी सबक मिला। यह सबक अगर भूल बैठती, तो मैं तुम्हें नीचा दिखाकर और भी नीची बनती। लेकिन तुम ऊँचे हो, तभी आज मैं फिर से सिर उठा सकी हूँ- अपने इस आश्रय को मैं धूल में नहीं मिला सकती।"
बिहारी गंभीर हो रहा।
विनोदिनी ने हाथ जोड़कर कहा- "ग़लती मत करो-मुझसे विवाह करके तुम सुखी न होगे, अपना गौरव गँवा लोगे- मैं भी अपना गर्व खो बैठूँगी। तुम सदा निर्लिप्त रहो, प्रसन्न रहो। आज भी तुम वही हो-मैं दूर से ही तुम्हारा काम करूँगी। तुम खुश रहो, सदा सुखी रहो।"
53
महेन्द्र माँ के कमरे में जा रहा था कि आशा दौड़ी-दौड़ी आई। कहा- "अभी वहाँ मत जाओ!" महेन्द्र ने पूछा- "क्यों?"
आशा बोली- "डॉक्टर ने बताया है, माँ चाहे दु:ख का हो चाहे सुख का- अचानक कोई धक्का लगने से आफत हो सकती है।"
महेन्द्र बोला- मैं दबे पाँवों उनके सिरहाने की तरफ जाकर एक बार देख आऊँ जरा। उन्हें पता न चलेगा।"
आशा- "नहीं, अभी आप माँ से नहीं मिल सकते।"
महेन्द्र- "तो तुम करना क्या चाहती हो?"
आशा- "पहले बिहारी बाबू उन्हें देख आएँ, वे जैसा कहेंगे, वही करूँगी।"
इतने में बिहारी आ गया। आशा ने उसे बुलवाया था।
बिहारी को देखकर आशा को थोड़ा भरोसा हुआ। बोली- "तुम्हारे जाने के बाद से माँ और भी अकुला उठी हैं, भाई साहब। पहले दिन जब तुम न दिखाई पड़े उन्होंने पूछा- 'बिहारी कहाँ गया?' मैंने कहा- 'वे एक जरूरी काम से बाहर गए हैं। बृहस्पति तक लौट आएँगे।' उसके बाद से वे रह-रहकर चौंक-चौंक पड़ती हैं। मुँह से कुछ नहीं कहतीं लेकिन अन्दर-ही-अन्दर मानो किसी की राह देख रही हैं। कल तुम्हारा तार मिला। मैंने उन्हें बताया, तुम आ रहे हो। उन्होंने आज तुम्हारे लिए ख़ासतौर से खाने का इन्तज़ाम करवाने को कहा है। तुम्हें जो-जो चीज़ें अच्छी लगती हैं, सब मँगवाई हैं, सामने बरामदे पर रसोई का प्रबन्ध कराया है, अन्दर से वह खुद बनाती रहेंगी। डॉक्टर ने लाख मना किया, एक न सुनीं। अभी-अभी ज़रा देर पहले मुझे बुलाकर कहा, 'बहू, रसोई तुम अपने हाथों बनाना, आज बिहारी को मैं अपने सामने बैठाकर खिलाऊँगी'।
सुनते ही बिहारी की ऑंखें छलछला उठीं। पूछा- "माँ हैं कैसी?"
आशा ने कहा- "तुम खुद चलकर देखो, मुझे तो लगता है, बीमारी और बढ़ गई है।"
बिहारी अन्दर गया। महेन्द्र खड़ा अचरज में पड़ गया। आशा ने मजे में गृहस्थी सम्हाल ली है- कितनी आसानी से महेन्द्र को अन्दर जाने से रोक दिया। न संकोच किया, न रूठी। महेन्द्र आज कितना सकुचा गया है! वह अपराधी है-चुपचाप खड़ा रहा, बाहर। माँ के कमरे में न घुस सका।
फिर भी यह अजीब बात-बिहारी से वह कैसे बे-खटके बोली। सलाह-परामर्श सब उसी से। वही आज इस घर का सबसे बड़ा शुभचिंतक है, एकमात्र रक्षक है। उसको कहीं रोक नहीं, उसी के निर्देश पर सब-कुछ चलता है। कुछ दिनों के लिए महेन्द्र जो स्थान छोड़कर चला गया था, लौटकर देखा, वह स्थान अब ठीक वैसा ही नहीं है।
बिहारी के अन्दर जाते ही राजलक्ष्मी ने पूछा- "तू आ गया, बेटे?"
बिहारी बोला- "हाँ माँ, लौट आया।"
राजलक्ष्मी ने पूछा- "काम हो गया तेरा?"
खुश होकर बिहारी बोला- "हाँ माँ, हो गया। अब मुझे कोई चिन्ता नहीं रही।"
और उसने एक बार बाहर की तरफ देखा।
राजलक्ष्मी- "बहू आज तेरे लिए खुद खाना पकाएगी-मैं यहाँ से उसे बताती जाऊँगी। डॉक्टर ने मना किया है-मगर अब काहे की मनाही, बेटे! मैं क्या इन ऑंखों से एक बार तुम लोगों का खाना भी न देख पाऊँगी!"
बिहारी ने कहा- "डॉक्टर के मना करने की बात तो समझ में नहीं आती- तुम न बताओगी तो चलेगा कैसे? छुटपन से तुम्हारे हाथ की ही रसोई हमें भाई है- महेन्द्र भैया का जी तो पश्चिम की दाल-रोटी से ऊब गया है-तुम्हारे हाथ की बनाई मछली मिलेगी, तो वह जी जाएगा। आज हम दोनों भाई जैसे बचपन में करते थे, होड़ लगाकर खाएँगे। तुम्हारी बहू जुटा सके, तब जानो।" राजलक्ष्मी समझ तो गई थी कि बिहारी के साथ महेन्द्र आया है, फिर भी उसकी धड़कन बढ़ गई।
बिहारी ने कहा- "पछाँह जाकर महेन्द्र की सेहत बहुत-कुछ सुधर गई है। आज सफर से आया है, इसलिए थका-माँदा लगता है। नहाने से ठीक हो जाएगा।"
राजलक्ष्मी ने फिर भी महेन्द्र के बारे में कुछ न कहा। इस पर बिहारी ने कहा- "माँ, महेन्द्र बाहर ही खड़ा है। जब तक तुम नहीं बुलाओगी वह नहीं आएगा।"
राजलक्ष्मी कुछ बोलीं नहीं, सिर्फ दरवाज़े की तरफ नज़र उठाई। उनका उधर देखना था कि बिहारी ने कहा-"महेन्द्र भैया, आ जाओ!"
महेन्द्र धीरे-धीरे अन्दर आया। कलेजे की धड़कन कहीं एकाएक थम जाए, इस डर से राजलक्ष्मी तुरन्त महेन्द्र की ओर न देख सकी। ऑंखें अधमुँदी रहीं। बिस्तर की तरफ ताककर महेन्द्र चौंक उठा। उसे मानो किसी ने पीटा हो।
माँ के पैरों के पास सिर रखकर उनका पैर पकड़े पड़ा रहा। कलेजे की धड़कन से राजलक्ष्मी का सर्वांग काँपता रहा। कुछ देर बाद अन्न्पूर्णा ने धीमे-से कहा-"दीदी, तुम महेन्द्र को कहो कि वह उठे, नहीं तो वह यहीं बैठा रहेगा।"
बड़ी मुश्किल से उन्होंने कहा- "महेन्द्र उठ!" बहुत दिनों के बाद महेन्द्र का जो नाम लिया तो उनकी ऑंखों से ऑंसू की धारा फूट पड़ी। ऑंसू बहने से मन की पीड़ा कुछ हल्की हुई। महेन्द्र उठा, ज़मीन पर घुटना गाड़, खाट की पाटी पर छाती रखकर माँ के पास बैठा। राजलक्ष्मी ने बड़ी तसल्ली से करवट बदली। दोनों हाथों से अपनी ओर खींचकर उन्होंने महेन्द्र का सिर सूँघा, और ललाट को चूम लिया। महेन्द्र ने रुँधे कंठ से कहा- "मैंने तुम्हें बड़ी तकलीफ पहुँचाई है, माँ मुझे माफ करो।"
कलेजा ठंडा हुआ तो राजलक्ष्मी ने कहा- "ऐसा मत कह बेटे, तुझे माफ किए बिना मैं जी सकती हूँ भला! बहू कहाँ गई? बहू!" आशा पास ही दूसरे कमरे में पथ्य तैयार कर रही थी। अन्नपूर्णा उसे बुला लाई।
राजलक्ष्मी ने महेन्द्र को ज़मीन पर से उठकर बिस्तर पर बैठने का इशारा किया। महेन्द्र बैठा, तो उसकी बगल की जगह दिखाती हुई राजलक्ष्मी ने कहा-"तुम यहाँ बैठो, बहू! आज तुम दोनों को मैं पास-पास बिठाकर देख लूँ, तभी मेरी तकलीफ मिटेगी। बहू, आज मुझसे शर्म न करो! महेन्द्र के लिए जो मलाल है, उसे भी भुला दो। उसके पास बैठो।
इस पर आशा घूँघट निकाले धड़कते दिल से लजाती हुई आकर महेन्द्र के पास बैठ गई। राजलक्ष्मी ने महेन्द्र का दाहिना हाथ लिया और आशा के दाहिने हाथ से मिलाकर दबाया। बोली- "अपनी इस बिटिया को मैं तेरे हाथों सौंप जाती हूँ, महेन्द्र- इसका ख्याल रखना, ऐसी लक्ष्मी तुझे और कहीं नहीं मिलेगी। मँझली आओ, दोनों को आशीर्वाद दो, तुम्हारे पुण्य से ही दोनों का मंगल हो।" अन्नपूर्णा उनके सामने गईं। दोनों ने ऑंसू-भरे नेत्रों से उनके चरणों की धुल ली। उन्होंने दोनों के माथे को चूमा- "ईश्वर तुम्हारा मंगल करे!" राजलक्ष्मी- "बिहारी, आगे आओ बेटे, महेन्द्र को तुम माफी दो।"
बिहारी ज्यों ही महेन्द्र के सामने जाकर खड़ा हुआ, उसने उसे बाँहों में लपेटकर कसकर छाती से लगा लिया।
राजलक्ष्मी ने कहा- "मैं आशीर्वाद देती हूँ महेन्द्र, बिहारी छुटपन से तेरा जैसा मित्र था, सदा वैसा ही रहे।"
इसके बाद राजलक्ष्मी थकावट के मारे और कुछ न कह सकीं। चुप हो गईं। बिहारी कोई उत्तेजक दवा उनके होठों तक ले गया। हाथ हटाकर राजलक्ष्मी ने कहा- "अब दवा नहीं बेटे, अब मैं भगवान को याद करूँ- वही मुझे दुनिया की सारी जलन की दवा देंगे। महेन्द्र, तुम लोग थोड़ा आराम कर लो बेटे! बहू, रसोई चढ़ा दो!"
शाम को महेन्द्र और बिहारी राजलक्ष्मी की खाट के पास नीचे खाने बैठे। परोसने का ज़िम्मा राजलक्ष्मी ने आशा को दे रखा था। वह परोसने लगी। महेन्द्र का कौर नहीं उठ रहा था, कलेजे में ऑंसू उमड़े आ रहे थे। राजलक्ष्मी बोलीं- "तू ठीक से खा क्यों नहीं रहा है, महेन्द्र? खा, मैं ऑंखें भरकर देखूँ।" बिहारी ने कहा- "तुम तो जानती ही हो माँ, महेन्द्र भैया का सदा का यही हाल है। वह खा नहीं सका। भाभी, जरा यह घंट थोड़ा-सा और दो मुझे, बेहतरीन बना है।" खुश होकर राजलक्ष्मी ज़रा हँसी।...."मुझे मालूम है, बिहारी को यह बेहद पसंद है। बहू, भला उतने से क्या होगा, और दो।" बिहारी बोला- "तुम्हारी यह बहू अहले दर्जे की कंजूस है। इसके हाथ से कुछ निकलता ही नहीं।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "सुन लो बहू, तुम्हारा ही नमक खाकर बिहारी तुम्हारी ही निंदा करता है।"
आशा बिहारी की पत्तल में सब्जी डाल गई।
बिहारी बोल उठा- "हाय राम, मुझे तो सब्जी देकर ही धता बतानी चाहती है, अच्छी-अच्छी चीज़ें सब महेन्द्र भैया के हिस्से।" आशा फुसफुसाकर कह गई- "कुछ भी करो, निन्दक की जबान बन्द नहीं होने की।" बिहारी बोला- "मिठाई देकर देखो, बंद होती है या नहीं।"
दोनों दोस्त खा चुके तो राजलक्ष्मी को बड़ी तृप्ति मिली। बोलीं- "बहू, अब तुम जाकर खा लो।" आशा उनके हुक्म पर खाने चली गई। उन्होंने महेन्द्र से कहा- "तू थोड़ा सो ले, महेन्द्र!" महेन्द्र बोला- "सो जाऊँ अभी से!"
महेन्द्र ने सोच रखा था, रात को वह माँ की सेवा में रहेगा। मगर राजलक्ष्मी ने धीमे-से कहा- "बहू, देख जाओ कि महेन्द्र का बिस्तर ठीक भी है या नहीं। वह अकेला है।" आशा लाज के मारे मरी-सी किसी तरह कमरे से बाहर चली गई। वहाँ केवल बिहारी और अन्न्पूर्णा रह गए। तब राजलक्ष्मी ने कहा- "तुमसे एक बात पूछनी है, बिहारी। विनोदिनी का क्या हुआ, पता है। कहाँ है वह?" बिहारी ने कहा- "वह कलकत्ता में है।"
राजलक्ष्मी ने ऑंखों की मौन दृष्टि से ही प्रश्न किया। बिहारी समझ गया। बोला- "उसकी तुम अब फ़िक्र ही न करो, माँ!"
राजलक्ष्मी बोलीं- "उसने मुझे बहुत दुख दिया है बिहारी, फिर भी मैं अंदर से उसे प्यार करती हूँ।" बिहारी बोला- "वह भी मन-ही-मन तुम्हें प्यार करती है, माँ!"
राजलक्ष्मी- "मुझे भी यही लगता है, बिहारी। दोष-गुण सबमें होता है, लेकिन वह मुझे प्यार करती थी। ढोंग करके कोई उस तरह की सेवा नहीं कर सकती।" बिहारी बोला- "तुम्हारी सेवा करने के लिए वह तड़प रही है।"
राजलक्ष्मी ने लम्बी साँस ली। कहा- "महेन्द्र, आशा, सब तो सोने चले गए। रात में उसे एक बार ले आओ तो क्या हर्ज है?"
बिहारी ने कहा- "वह तो इसी घर के बाहर वाले कमरे में छिपी बैठी है, माँ। उसने प्रतिज्ञा की है कि जब तक तुम उसे बुलाकर माफ नहीं कर दोगी, वह पानी भी न पिएगी।" राजलक्ष्मी परेशान हो उठीं। बोलीं- "सारे दिन से भूखी है? अरे तो जा उसे बुला लो!"
ज्योंही विनोदिनी कमरे में आई, राजलक्ष्मी बोल उठीं- "राम-राम, तुमने यह किया क्या बहू, दिन-भर बे-खाए-पिए बैठी हो। जाओ, पहले खा लो, फिर बात-चीत होगी।" विनोदिनी ने उनके चरणों की धूल ली। बोली- "पहले इस पापिन को तुम माफ करो बुआ, तभी मैं खाऊँगी।"
राजलक्ष्मी- "माफ कर दिया बिटिया, माफ कर दिया- अब मुझे किसी से भी कोई मलाल नहीं।"
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Post by Jemsbond » 20 Jun 2016 13:46

विनोदिनी का दाहिना हाथ पकड़कर उन्होंने कहा-"बहू, तुमसे जीवन में किसी का बुरा न हो और तुम भी सुखी रहो!"
विनोदिनी- "तुम्हारा आशीर्वाद झूठा न होगा बुआ, मैं तुम्हारे पाँव छूकर कहती हूँ, मुझसे इस घर का बुरा न होगा।"
झुककर अन्नपूर्णा को प्रणाम करके विनोदिनी खाने गई। लौटने पर राजलक्ष्मी ने पूछा- "तो अब तुम चलीं?"
विनोदिनी- "मैं तुम्हारी सेवा करूँगी, बुआ। ईश्वर साक्षी है, मुझसे किसी बुराई की शंका न करो।"
राजलक्ष्मी ने बिहारी की तरफ देखा। बिहारी ने कुछ सोचा। फिर कहा- "भाभी रहें, कोई हर्ज नहीं।"
रात में बिहारी, अन्नपूर्णा और विनोदिनी- तीनों ने मिलकर राजलक्ष्मी की सेवा की।
इधर रात को आशा राजलक्ष्मी के पास नहीं आई, इस शर्म से वह तड़के ही उठी। महेन्द्र को सोता ही छोड़कर उसने जल्दी से मुँह धोया, कपड़े बदले और तैयार होते ही आई। तब भी धुँधलका था। दरवाज़े पर आकर उसने जो कुछ देखा, वह अवाक् रह गई। स्वप्न तो नहीं!"
स्पिरिट-लैंप जलाकर विनोदिनी पानी गरम कर रही थी। रात को बिहारी ने पलकें भी न झपकाई थीं। उनके लिए चाय बनानी थी।
आशा को देखकर विनोदिनी खड़ी हो गई। बोली-"सारे अपराधों के साथ मैंने आज तुम्हारी शरण ली है-और कोई तो जाने की न कह सकेगा, मगर तुम अगर कह दो, 'जाओ', तो मुझे तुरंत जाना पड़ेगा।" आशा कोई जवाब न दे सकी। वह यह भी ठीक-ठीक न समझ सकी कि उसका मन क्या कह रहा है- इसलिए वह हक्की-बक्की हो गई।
विनोदिनी- "मुझे तुम कभी माफ नहीं कर पाओगी-इसकी कोशिश भी मत करना। मगर मुझे अब कोई ख़तरा मत समझना। जिन कुछ दिनों के लिए बुआ को जरूरत है, मुझे इनकी सेवा करने दो, फिर मैं चली जाऊँगी।" कल जब राजलक्ष्मी ने आशा का हाथ महेन्द्र के हाथों में दिया तो उसने मन का सारा मलाल हटाकर सोलहों आने को महेन्द्र के हाथों सौंप दिया था। आज विनोदिनी को अपनी नज़र के सामने खड़ी देखकर उसके खंडित प्रेम की ज्वाला शांत न हो सकी। इसे कभी महेन्द्र ने प्यार किया था, शायद अब भी मन-ही-मन प्यार करता हो- यह बात उसके कलेजे में लहर की तरह फूल-फूल उठने लगी। जरा ही देर बाद महेन्द्र जगेगा और वह विनोदिनी को देखेगा, जाने किस नज़र से देखेगा।
भारी हृदय लिये आशा राजलक्ष्मी के कमरे में पहुँची। बहुत शर्माती हुई बोली- "मौसी, तुम रात-भर सोई नहीं, जाओ सो जाओ!" अन्नपूर्णा ने एक बार अच्छी तरह से आशा के चेहरे को देखा। उसके बाद सोने जाने के बजाय आशा को साथ लिये अपने कमरे में गई। बोलीं- "चुन्नी, खुलकर बात करना चाहती है, तू अब बातों को मन में मत रख। गैर को दोषी बनाने का जो सुख है, मन में दोष रखने का दु:ख उससे कहीं बड़ा है।"
आशा ने कहा- "मन में कोई गाँठ मैं रखना तो नहीं चाहती हूँ मौसी, सब भूल जाना ही चाहती हूँ, मगर भूलते ही तो नहीं बनता।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "तू ठीक ही कहती है बिटिया, उपदेश देना आसान है, कर दिखाना ही मुश्किल है। फिर भी मैं तुझे एक उपाय बताती हूँ। जी-जान से इस भाव को कम-से कम रखो, मानो भूल गई है। पहले बाहर से भुलाना शुरू कर, तभी भीतर से भी भूल सकेगी।"
आशा ने सिर झुकाए हुए कहा-"बताओ, मुझे क्या करना होगा?"
अन्नपूर्णा बोलीं- "बिहारी के लिए विनोदिनी चाय बना रही है तू। दूध, चीनी, प्याला-सब-कुछ लेकर जा। मिलकर काम करो!"
आशा आदेश-पालन के लिए उठी। अन्नपूर्णा ने कहा- "यह आसान है- लेकिन मुझे एक बात और कहनी है, वह और भी सख्त है और उसका पालन तुझे करना ही पड़ेगा। जब-तब महेन्द्र से विनोदिनी की मुलाकात होगी ही और तब तेरे मन में क्या होगा, मैं जानती हूँ-लेकिन वैसे मैं कभी कनखियों से भी महेन्द्र या विनोदिनी के भाव को देखने की कोशिश तक न करना। कलेजा फटता रहे, लेकिन अडिग रहना पड़ेगा। महेन्द्र यह समझेगा कि तुझे कोई शक नहीं रहा।- टूटने के पहले जैसा था, जोड़ वैसा ही जुड़ गया है। महेन्द्र या और कोई तेरी शक्ल देखकर अपने को दोषी नहीं समझेगा। चुन्नी, यह कोई मेरा उपदेश नहीं, आग्रह नहीं, यह तेरी मौसी का आदेश है। मैं जब काशी चली जाऊँ, तब तू एक दिन को भी यह बात न भूलना!"
चाय का प्याला लिये आशा विनोदिनी के पास पहुँची। पूछा- "उबल गया पानी? मैं दूध ले आई हूँ।"
विनोदिनी अचरज से आशा का मुँह ताकने लगी। बोलीं- "बिहारी भाई साहब बरामदे में बैठे हैं। तुम उनको चाय भेज दो। इतने में बुआ का मुँह धुलाने का इंतजाम करती हूँ। अब जग जायें शायद।" विनोदिनी चाय लेकर बिहारी के पास नहीं गई। उसके प्रेम को कबूल करने के नाते बिहारी ने जो अधिकार उसे दिया था, उसके मनमाने इस्तेमाल में उसे संकोच हुआ। अधिकार पाने की जो मर्यादा है, उसे बचाना हो तो अधिकार के प्रयोग को संयत होना चाहिए। जितना मिलता है, उतने के लिए छीना-झपटी करना कँगले को ठीक लगता है।
इतने में महेन्द्र आ पहुँचा। आशा का दिल धक् कर उठा, तो भी अपने को जब्त करके उसने स्वाभाविक स्वर में महेन्द्र से कहा- "तुम इतनी जल्दी जग गए। रोशनी न आए इस वजह से मैंने खिड़कियाँ बन्द कर दी थीं।"
विनोदिनी के सामने ही इस सहज भाव से आशा को बात करते देखकर महेन्द्र के कलेजे पर मानो कोई पत्थर उतर गया। वह खुश होकर बोला- "देखने आ गया कि माँ कैसी है। वे सो रही हैं अभी तक?" आशा ने कहा, "हाँ, सो रही हैं। अभी वहाँ मत जाना! भाई साहब ने बताया- आज वे पहले से अच्छी हैं। बहुत दिनों के बाद कल रात-भर वे मजे में सोई हैं।" महेन्द्र निश्चिन्त हुआ। पूछा- "चाची कहाँ हैं?" आशा ने चाची का कमरा दिखा दिया।
आशा की यह दृढ़ता और संयम देखकर विनोदिनी को भी हैरत हुई।
महेन्द्र ने पुकारा- "चाची!"
अन्नपूर्णा स्नान करके पूजा करने की सोच रही थी। फिर भी उन्होंने कहा- "आ महेन्द्र, आ!"
महेन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया। कहा- "चाची, मैं पापी हूँ। तुम लोगों के सामने आते मुझे शर्म आती है।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "ऐसा नहीं कहते, बेटे! बच्चे तो गर्द में सनकर भी माँ की गोद में बैठते हैं।"
महेन्द्र- "मगर मेरी यह धूल कभी धुलने की नहीं, चाची!"
अन्नपूर्णा- "दो-एक बार झाड़ देने से यह झड़ जाएगी। अच्छा ही हुआ, महेन्द्र। तुझे अपने भले होने का अभिमान था। अपने पर तुझे बेहद विश्वास था। पाप की ऑंधी ने तेरे उस गर्व को तोड़ गिराया है, और कुछ नहीं बिगाड़ा।"
महेन्द्र- "अब तुम्हें मैं न जाने दूँगा, चाची। तुम्हारे चले जाने से ही मेरी यह दुर्गति हुई।"
अन्नपूर्णा- "मैं रहकर तुझे जिस दुर्गति से बचाती, वह हो गई, अच्छा हुआ। अब तुमको मेरी कोई जरूरत न पड़ेगी।" दरवाज़े पर फिर पुकार मची- "चाची पूजा करने बैठी हो, क्या?"
अन्नपूर्णा ने कहा- "नहीं, तू आ!"
बिहारी अन्दर आया। इतने तड़के महेन्द्र को जगा देखकर वह बोला- "जीवन में आज शायद पहली बार तुमने सूर्योदय देखा, भैया!"
महेन्द्र ने कहा- "हाँ भाई, मेरे जीवन में यह पहला सूर्योदय है। तुम्हें चाची से कोई राय करनी है शायद- मैं चलता हूँ।"
बिहारी ने हँसकर कहा- "तुम्हें भी कैबिनेट को मिनिस्टर बना लिया गया समझो। तुमसे तो मैंने कभी कुछ छिपाया नहीं- ऐतराज न हो तो आज भी न छिपाऊँ।"
महेन्द्र- "मैं और ऐतराज! हाँ, दावा ज़रूर नहीं कर सकता। तुम अगर मुझसे कुछ न छिपाओ, तो मैं भी फिर से आप अपने ऊपर श्रद्धा करने का मौक़ा पाऊँ।"
बहरहाल बिहारी के लिए बे-हिचक सब-कुछ कहना मुश्किल था। बिहारी की ज़बान रुक-सी गई, मगर उसने ज़ोर देकर कहा- "ऐसी बात आई थी कि मैं विनोदिनी से विवाह करूँगा- चाची से उसी के बारे में फैसला लेना था।"
महेन्द्र सकुचा गया। अन्नपूर्णा चौंककर बोलीं- "यह कैसी बात है, बिहारी?"
महेन्द्र ने बड़ा बल डालकर अपने संकोच को हटाया। कहा- "बिहारी, यह विवाह नहीं होगा।"
अन्नपूर्णा ने कहा- "इस प्रस्ताव में क्या विनोदिनी का हाथ है?"
बिहारी ने कहा- "बिलकुल नहीं।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "वह भला क्या राज़ी होगी इस पर?"
महेन्द्र बोला- "वह भला राजी क्यों न होगी, चाची! मैं जानता हूँ, वह हृदय से बिहारी की भक्ति करती है। ऐसे आश्रय को वह छोड़ सकती है भला!" बिहारी ने कहा- "विवाह का प्रस्ताव विनोदिनी से मैंने किया था, भैया उसने शर्म से इन्कार कर दिया है।"
सुनकर महेन्द्र चुप रह गया।
54
भले-बुरे राजलक्ष्मी के दो दिन निकल गए। एक दिन सुबह उनका चेहरा खिला-खिला दिख रहा था। पीड़ा का नामोनिशान नहीं था। उसी दिन उन्होंने महेन्द्र को बुलाकर कहा- "मैं अब ज़्यादा देर की मेहमान नहीं, बेटे-मगर मैं बड़े सुख से मर सकूँगी, महेन्द्र मुझे अब कोई दु:ख नहीं है। तू जब छोटा था, तो तुझे पाकर जो खुशी मुझे थी, आज उसी खुशी से मेरा हृदय भर उठा है-तुम मेरी गोदी का लाड़ला है, मेरे कलेजे का रत्न-मैं तेरी सारी बला साथ लिये जा रही हूँ, यही मेरा सबसे बड़ा सुख है।"
इतना कहकर वह महेन्द्र के मुखडे और बदन पर हाथ फेरने लगीं। महेन्द्र की रुलाई का बाँध टूट गया।
राजलक्ष्मी ने कहा- "रो मत बेटे! लक्ष्मी घर में रही। कुंजी मेरी बहू को देना। मैंने सब-कुछ सँजोकर रखा है, गिरस्ती में किसी बात की कमी न पड़ेगी तुम्हें। एक बात और कह लूँ, मेरी मौत से पहले किसी को मत बताना। मेरे बक्स में दो हज़ार के नोट पड़े हैं। वे रुपये विनोदिनी को दे रही हूँ। वह विधवा है, अकेली है, इन रुपयों के सूद से उसके दिन मज़े में कट जायेंगे। मगर उसे अपने यहाँ मत रखना। राजलक्ष्मी ने बिहारी को बुलवाया। कहा- "बेटे बिहारी, कल महेन्द्र बता रहा था, तूने लाचार जनों की चिकित्सा के लिए एक बगीचा लिया है- भगवान तुम्हें लम्बी आयु देकर गरीबों का भला करे। मेरे ब्याह के समय मेरे ससुर ने मुझे एक गाँव दिया था; वह गाँव मैं तुझे देती हूँ, उसे गरीबों की सेवा में लगाना। इससे मेरे ससुर का पुण्य होगा।"
55
राजलक्ष्मी की मृत्यु के बाद श्राद्धादि खत्म कहके महेन्द्र ने कहा- "भई बिहारी, मैं डॉक्टरी जानता हूँ। तुमने जो काम शुरू किया है, मुझे भी उसमें शामिल कर लो! चुन्नी अब ऐसी गृहिणी बन गई है कि वह भी तुम्हारी मदद कर सकेगी। हम सब लोग वहीं रहेंगे।"
बिहारी ने कहा- "खूब अच्छी तरह सोच देखो, भैया-यह काम हमेशा के लिए कर सकोगे। वैराग्य के इस क्षणिक आवेश में ऐसा स्थायी भाव मत ले बैठो!" महेन्द्र बोला- "तुम भी ज़रा सोचकर देखो, जीवन को मैंने इस तरह बखेड़ा किया है कि अब बैठे-बैठे उसके उपभोग की गुंजाइश न रही। इसे अगर सक्रियता में न खींचता चलूँ तो जाने किस रोज़ यह मुझे अवसाद में खींच ले जायगा। अपने काम में मुझे शामिल करना ही पड़ेगा।" यही बात तय रही।
अन्नपूर्णा और बिहारी दोनों बैठकर शान्त उदासी लिये पिछले दिनों की चर्चा कर रहे थे। दोनों के एक-दूसरे से अलग होने का समय क़रीब था। विनोदिनी ने दरवाज़े के पास आकर पूछा- "चाची, मैं यहाँ बैठ सकती हूँ।"
अन्नपूर्णा बोलीं- "आ जाओ बिटिया, आओ!"
विनोदिनी आई। उसने दो-चार बातें करके बिछौना उठाने का बहाना करके अन्नपूर्णा चली गई।
विनोदिनी ने बिहारी से कहा- "अब मेरे लिए तुम्हारा जो आदेश हो, कहो!"
बिहारी ने कहा- "भाभी, तुम्हीं बताओ, तुम क्या चाहती हो?"
विनोदिनी बोली- "मैंने सुना है, गरीबों के इलाज के लिए तुमने कोई बगीचा लिया है। मैं वहीं तुम्हारा कोई काम करूँगी और कुछ न बने तो खाना पकाऊँगी।" बिहारी बोला- "मैंने बहुत सोच देखा है, भाभी! इन-उन हंगामों से अपने जीवन के जाल में बेहद गाँठें पड़ गई हैं। अब एकान्त में बैठकर एक-एक करके उन्हीं गाँठों को खोलने का समय आ गया है। पहले सबकी सफशई कर लेनी होगी।
अब जी जो चाहता है, सबको मान लेने की हिम्मत नहीं पड़ती। अब तक तो गुज़रा, जितना कुछ झेला, उन सबके आवर्तन और आन्दोलन को शान्त न कर लूँ तो जीवन की समाप्ति के लिए तैयार न हो सकूँगी। अगर सारे बीते दिन अनुकूल हों, तो संसार में केवल तुमसे ही मेरा जीवन पूर्ण हो सकता था। अब तुमसे मुझे वंचित होना ही पड़ेगा। सुख की कोशिश अब बेकार है ...अब तो धीरे-धीरे टूट-फूटकर मरम्मत कर लेनी है।"
इतने में अन्नपूर्णा आई। उनके आते ही विनोदिनी ने कहा, "माँ, तुम्हें अपने चरणों में मुझे शरण देनी पड़ेगी। पापिन के नाते तुम मुझे मत ठुकराओ।" अन्नपूर्णा बोली, "चलो मेरे ही साथ चलो।"
अन्नपूर्णा और विनोदिनी जिस दिन काशी जाने लगीं, मौक़ा ढूँढ़कर बिहारी ने अकेले में विनोदिनी से भेंट की। कहा, "भाभी, तुम्हारी कोई यादगार मैं अपने पास रखना चाहता हूँ।" विनोदिनी बोली, "अपने पास ऐसा क्या है, जिसे निशानी की तरह पास रखो।"
बिहारी ने शर्म और संकोच के साथ कहा, "अंग्रेजों में ऐसी रिवाज है, अपनी प्रिय पात्रा की कोई लट याद के लिए रख लेते हैं- तुम अगर..."
विनोदिनी- "छि: कैसी घिनौनी बात! मेरे बालों का तुम क्या करोगे? वह मुई नापाक चीज़ कुछ ऐसी नहीं कि तुम्हें दूँ। अभागिन मैं, तुम्हारे पास रह नहीं सकती-मैं ऐसा कुछ देना चाहती हूँ, जो मेरा होकर तुम्हारे काम में आए।"
बिहारी ने कहा, "लूँगा।"
इस पर विनोदिनी ने ऑंचल की गाँठ से खोलकर हज़ार-हज़ार के दो नोट बिहारी को दिए।
बिहारी गहरे आवेश के साथ विनोदिनी के चेहरे की ओर एकटक देखता रहा। जरा देर बाद बोला- "और मैं क्या तुम्हें कुछ न दे पाऊँगा?"
विनोदिनी ने कहा- "तुम्हारी निशानी मेरे पास है, वह मेरे अंग का भूषण है, उसे कभी कोई छीन नहीं सकता। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"
यह कहकर उसने अपने हाथ की चोट का वह दाग़ दिखाया।
बिहारी हैरान रह गया। विनोदिनी बोली, "तुम नहीं जानते, यह आघात तुम्हारा है और यह आघात तुम्हारे ही योग्य है। इसे तुम भी वापस नहीं ले सकते।" मौसी के इतना समझाने-बुझाने के बावजूद विनोदिनी के लिए आशा अपने मन को निष्कण्टक न कर सकी थी। राजलक्ष्मी के सेवा-जतन में दोनों साथ जुटी रहीं, पर जब से उसकी नजर विनोदिनी पर पड़ी, तभी उसके दिल को चोट लगी-ज़बान से आवाज़ न निकली और हँसने की कोशिश ने उसे दुखाया। विनोदिनी की कोई मामूली सेवा लेने में भी उसका मन नाराज़ रहता। शिष्टता के नाते विनोदिनी का लगाया पान उसे लेना पड़ा, लेकिन बाद में तुरन्त थूक दिया है। लेकिन आज जब जुदाई की घड़ी आई, मौसी दोबारा घर-बार छोड़कर जाने लगीं और आशा का हृदय ऑंसू से गोला हो उठा, तो विनोदिनी के लिए भी उसका मन भर आया। जो सब-कुछ छोड़-छोड़कर एकबारगी जा रहा हो, उसे माफ न कर सके, ऐसे लोग दुनिया में कम ही हैं। उसे मालूम था, विनोदिनी महेन्द्र को प्यार करती है, क्यों न करे महेन्द्र को प्यार! महेन्द्र को प्यार करना कितना जरूरी है यह बात उससे ज़्यादा कौन जान सकता है।
वह धीरे-धीरे विनोदिनी के पास जाकर विषाद से बोली, "दीदी, जा रही हो?"
आशा की ठोड़ी पकड़कर विनोदिनी ने कहा, "हाँ बहन, जाने का समय आ गया। कभी तुमने मुझे प्यार किया था, अब अपने सुख के दिनों में उस प्यार का थोड़ा-सा अंश मेरे लिए रखना बहन, बाकी सब भूल जाना।"
महेन्द्र ने आकर नमस्ते करके कहा, "माफ करना, भाभी!"
उसकी ऑंखों के कोनों से ऑंसू की बूंदें ढुलक पड़ीं। विनोदिनी ने कहा, "तुम भी मुझे माफ करना भाई-साहब, भगवान तुम लोगों को सदा सुखी रखें!"
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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