उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Jemsbond
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Postby Jemsbond » 20 Jun 2016 13:40

महेन्द्र को इस तरह क्षोभ बढ़ चला कि अपनी उतावली से वह आप ही अचरज में पड़ गया। डर उठा। और, विनोदिनी ने सुन ही लिया तो क्या कि महेन्द्र उसे प्यार नहीं करता? इसमें दोष भी क्या? ऑंधी आने पर नाव की जंजीर जैसे लंगर को कसकर पकड़ती है, वैसे ही अकुलाहट में महेन्द्र ने आशा को और भी कसकर पकड़ा।
रात को महेन्द्र ने आशा का मुँह अपनी छाती से लगाकर पूछा- "चुन्नी, ठीक बताओ, तुम मुझे कितना प्यार करती हो?"
आशा सोचने लगी- "यह सवाल कैसा! बिहारी के बारे में जो शर्मनाक बात निकली है, क्या उसी से उस पर सन्देह की ऐसी छाया पड़ी?"
वह शर्म से मुई-सी होकर बोली- "छि:, आज यह क्या पूछ रहे हो तुम! तुम्हारे पैर पड़ती हूँ, साफ़ बताओ, मेरे प्यार में तुम्हें कब क्या कमी दिखाई दी?"
उसे सताकर उसका माधुर्य निचोड़ने की नीयत से महेन्द्र बोला- "फिर तुम काशी क्यों जाना चाहती हो?"
आशा बोली- "मैं नहीं जाना चाहती। कहीं भी नहीं जाऊँगी मैं।"
महेन्द्र- "लेकिन चाहा तो था पहले?"
आशा बहुत दुखी होकर बोली- "तुम्हें पता है, मैंने क्यों चाहा था?"
आशा बोली- "हर्गिज नहीं, मजे से रहने के लिए नहीं जाना चाहती थी मैं।"
महेन्द्र ने कहा- "सच कहूँ चुन्नी, और किसी से विवाह किया होता तो तुम इससे कहीं ज़्यादा सुखी होती।"
सुनते ही चौंककर आशा महेन्द्र से छिटक पड़ी और तकिए में मुँह गाड़कर काठ की मारी-सी पड़ी रही। कुछ ही क्षण में उसकी रुलाई रोके न रुकी। सांत्वना देने के लिए महेन्द्र ने उसे कलेजे से लगाने की कोशिश की, पर आशा तकिए से चिपकी रही। पतिव्रता के ऐसे रूठने से महेन्द्र सुख, गर्व और धिक्कार से क्षुब्ध होने लगा।
विनोदिनी सोचने लगी, 'आखिर ऐसी तोहमत लगाए जाने पर बिहारी ने प्रतिवाद क्यों नहीं किया? उसने झूठा प्रतिवाद भी किया होता, तो मानो विनोदिनी को खुशी होती। ठीक ही हुआ कि महेन्द्र ने बिहारी पर ऐसी चोट की। यह उसका पावना ही था। आखिर बिहारी- जैसा आदमी आशा को प्यार क्यों करेगा? इस चोट ने बिहारी को दूर जो हटा दिया, मानो वह अच्छा ही हुआ'-विनोदिनी निश्चिन्त हो गई। लेकिन मृत्यु-बाण से बिंधे बिहारी का रक्तहीन पीला मुखड़ा विनोदिनी के हर काम में उसके पीछे-पीछे घूमता-सा रहा। विनोदिनी के अन्दर जो एक सेवा पारायण नारी-प्रकृति थी, वह उस कातर चेहरे को देखकर रोने लगी।
दो-तीन दिन तक वह सभी कामों में अनमनी रही। आखिर उससे न रहा गया। उसने एक सान्त्वना पत्र लिखा-
"भाई साहब, तुम्हारा जो सूखा चेहरा देखा, है, तब से मैं हृदय से यही कामना करती हूँ कि तुम भले-चंगे हो जाओ, जैसे तुम थे, वैसे ही हो जाओ- तुम्हारी वह सहज हँसी फिर कब देखूँगी- वह उदार बातें फिर कब सुनूँगी; एक पंक्ति में अपनी कुशल मुझे लिख भेजो!- तुम्हारी विनोदिनी, भाभी।"
दरबान के मार्फत चिट्ठी उसने बिहारी को भेज दी।
बिहारी आशा को प्यार करता है, इस बात को महेन्द्र इस रूखाई और इस बेहयाई से जुबान पर ला सकता है।- बिहारी ने यह कभी स्वप्न में भी न सोचा था। क्योंकि उसने खुद भी कभी ऐसी बात को दिल में जगह न दी थी।
लेकिन बात जब एक बार मुँह से निकल पड़ी, तो एकबारगी मार तो नहीं डाला जा सकता। उसमें सच्चाई का बीज जितना था, देखते-ही-देखते वह अकुराने लगा। अब उसने खुद को कसूरवार समझा। मन-ही-मन बोला- "मेरा गुस्सा करना तो शोभा नहीं देता, महेन्द्र से माफी माँगकर विदा लेनी होगी। उस रोज़ मैं कुछ इस तरह चला आया था, मानो महेन्द्र दोषी है, मैं विचारक हूँ... अपनी यह ग़लती मुझे कबूल करनी पड़ेगी।"
बिहारी समझ रहा था, आशा चली गई है। एक दिन शाम को वह धीरे-धीरे जाकर महेन्द्र के दरवाज़े पर जाकर खड़ा हुआ। राजलक्ष्मी के दूर के रिश्ते के मामा साधुचरण पर नज़र पड़ी। कहा- "कई दिनों से इधर आ नहीं सका-सब कुशल तो है?"
साधुचरण ने कुशल कही। बिहारी ने पूछा- "भाभी काशी कब गईं?"
साधुचरण ने कहा- "कहाँ, गई कहाँ? उनका जाना अब न होगा।"
यह सुनकर बिहारी सब-कुछ भूलकर अन्दर जाने को बेचैन हो उठा। पहले वह जैसे ग्रहण भाव से खुशी-खुशी अपनों-सा परिचित सीढ़ियों से अन्दर जाया करता था, सबसे हँसता-बोलता था, जी में कुछ होता न था, आज उसकी मनाही थी, दुर्लभ था वह- इसकी याद आते ही उसका मन पागल हो गया। बस एक बार, केवल अन्तिम बार इसी तरह अन्दर जाकर परिवार के सदस्य-सा राजलक्ष्मी से घूँघट निकाले आशा- भाभी से दो बातें- मात्र कर आना उसके लिए परम आकांक्षा का विषय बन बैठा।
साधुचरण ने कहा- "अरे, अंधेरे में खड़े क्यों रह गए, अन्दर आओ!"
बिहारी तेज़ी से दो-चार डग की तरफ बढ़ा और मुड़कर बोला- "नहीं, चलूँ मैं, काम है।" और जल्दी से लौट गया।
उसी रात बिहारी पश्चिम की ओर कहीं चला गया।
बिहारी घर पर नहीं मिला- दरबान विनोदिनी की चिट्ठी लेकर लौट आया। महेन्द्र डयोढ़ी के सामने वाले बगीचे में टहल रहा था। उसने पूछा- "किसकी चिट्ठी है?" दरबान ने बताया। महेन्द्र ने उससे चिट्ठी ले ली। एक बार तो जी में आया, चिट्ठी वह विनोदिनी को दे आए- कुछ कहे नहीं, सिर्फ विनोदिनी का लज्जित चेहरा देख आए। उसे इसमें ज़रा भी शक न था कि खत में लज्जा की बात ज़रूर है। याद आया, पहले भी एक बार उसने बिहारी को चिट्ठी भेजी थी। आखिर खत में है क्या, यह जाने बिना मानो उससे रहा ही न गया। उसने अपने- आपको समझाया, 'विनोदिनी उसी की देख-रेख में है, उसके भले-बुरे का वही ज़िम्मेदार है। लिहाज़ा ऐसे सन्देह वाले खत को खोलकर देखना वाज़िब है। विनोदिनी को ग़लत रास्ते पर हर्गिज़ नहीं जाने दिया जा सकता। खोलकर महेन्द्र ने उस छोटी-सी चिट्ठी को पढ़ा। वह सहज भाषा में लिखी थी, इसलिए उसमें मन का सच्चा उद्वेग फूट पड़ा था। महेन्द्र ने उसे बार-बार पढ़ा। खूब सोचा, मगर समझ नहीं सका कि विनोदिनी का झुकाव है किस तरफ। उसे रह-रहकर यही आशंका होने लगी, चूँकि मैंने यह कहकर उसका अपमान किया है कि मैं उसे प्यार नहीं करता, इसीलिए रूठकर वह अपने मन को और तरफ लगाना चाहती है। इसके बाद महेन्द्र के लिए धीरज रखना असम्भव हो उठा। जो लड़की अपने-आपको उसके हाथों सौंप देने के लिए आई थी, वह महज ज़रा-सी ग़लती से उसके कब्जे से निकल जाएगी। यह सोचकर महेन्द्र भीतर-ही-भीतर सुलगने लगी। मन में सोचा, 'विनोदिनी मन-ही-मन अगर तुझे चाहती है, तो उसकी खैर जानो-क्योंकि वह एक जगह बँधी रहेगी। अपने मन का तो मुझे पता है, मैं उस पर कभी जुल्म नहीं कर सकूँगा... वह मुझे निश्चिन्त होकर प्यार कर सकती है। मैं आशा को प्यार करता हूँ, मुझसे उसे कोई ख़तरा नहीं। यदि वह और किसी तरफ खिंची तो क्या अनर्थ होगा, वह कौन जानता है?" महेन्द्र ने निश्चय किया, 'अपने को प्रकट किए बिना किसी-न-किसी तरह फिर से विनोदिनी को अपनी ओर खींचना ही पड़ेगा।'
अन्दर जाते ही महेन्द्र ने देखा, विनोदिनी बीच में ही खड़ी उत्सुकता से किसी का इन्तज़ार कर रही है और महेन्द्र का मन डाह से जल उठा। बोला- "नाहक इन्तज़ार में खड़ी है, भेंट नहीं होने की। यह लीजिए, आपकी चिट्ठी लौट आई।"
कहकर उसने चिट्ठी उसकी ओर फेंक दी।
विनोदिनी बोली- "खुली क्यों?"
महेन्द्र जवाब दिए बिना ही चला गया। 'बिहारी ने चिट्ठी खोलकर पढ़ी और कोई जवाब न देकर चिट्ठी वापस भेज दी' यह सोचकर विनोदिनी की सारी नसें दप-दप करने लगीं। उसने चिट्ठी ले जाने वाले दरबान को बुलवा भेजा। वह और कहीं चला गया था- न मिला। चिराग की कोर से जैसे गरम तेल की बूँदें टपक पड़ती हैं- बन्द कमरे में विनोदिनी की दमकती हुई ऑंखों से ऑंसुओं में टपक गए। उसने अपनी चिट्ठी के टुकड़े कर डाले, फिर भी उसे चैन न मिला। स्याही की उन दो-चार लकीरों को भूत और वर्तमान से पोंछ डालने की, क़तई मनाही कर देने की गुंजाइश क्यों नहीं? गुस्से में आई मधुमक्खी जिस प्रकार हर सामने पड़ने वाले को काट खाती है- उसी प्रकार क्षुब्ध विनोदिनी अपने चारों ओर की दुनिया को जला डालने पर आमादा हो गई। मैं जो भी चाहती हूँ, उसी में रुकावट? किसी बात में कामयाबी नहीं!
25
उस दिन फागुन की पहली बसन्ती बयार बह आई। बड़े दिनों के बाद आशा शाम को छत पर चटाई बिछाकर बैठी। मध्दिम रोशनी में एक मासिक पत्रिका में छपी हुई एक धारावाहिक कहानी पढ़ने लगी। एक जगह जब कहानी का नायक काफ़ी दिनों बाद पूजा की छुट्टी में अपने घर लौट रहा था कि डकैतों के चंगुल में फँस गया। आशा का दिल धड़क उठा। इधर ठीक उसी समय नायिका सपना देखकर रोती हुई जग पड़ी। आशा के ऑंसू रोके न रुके। वह कहानियों की बड़ी उदार समालोचक थी। जो भी कहानी पढ़ती, वह उसे अच्छी लगती। विनोदिनी को बुलाकर कहती, "भई ऑंख की किरकिरी, मेरे सिर की कसम रही, इस कहानी को पढ़ देखना। ऐसी ही है! पढ़कर रोते-रोते बेदम!"
विनोदिनी की अच्छे-बुरे की कसौटी से आशा के उमंग, उत्साह को बड़ी चोट पहुँचती।
महेन्द्र को वह कहानी पढ़ाने का निश्चय करके गीली ऑंखों से उसने पत्रिका बन्द की। इतने में महेन्द्र आ गया। महेन्द्र बोला- "छत पर अकेली किस भाग्यवान को याद कर रही हो?"
आशा नायक-नायिका की बात भूल गई। उनसे पूछा-"आज तुम्हारी तबीयत कुछ ख़राब है क्या?"
महेन्द्र- "नहीं, तबीयत ठीक है।"
आशा- "फिर तुम मन-ही-मन जो कुछ सोच रहे हो मुझे साफ-साफ बताओ।"
आशा के डिब्बे में से एक पान निकालकर खाते हुए महेन्द्र ने कहा- "मैं यह सोच रहा था कि तुम्हारी बेचारी मौसी ने न जाने कब से तुम्हें नहीं देखा। अचानक ही एक दिन तुम वहाँ पहुँच जाओ तो वे कितनी खुश हो जाएँ।"
आशा ने कोई जवाब न दिया। उसकी ओर ताकती रही। वह समझ न सकी कि एकाएक फिर क्यों यह बात महेन्द्र के मन में आई।
आशा को चुप देखकर महेन्द्र ने पूछा- "तुम्हारी जाने की इच्छा नहीं होती क्या?"
इस बात का जवाब देना कठिन था। मौसी से मिलने की इच्छा भी होती है और महेन्द्र को छोड़कर जाने का दिल भी नहीं चाहता। आशा बोली- "कॉलेज की छुट्टियाँ होने पर जब तुम चलोगे तो मैं भी साथ चलूँगी।"
महेन्द्र- "छुट्टियों में भी जाने की गुंजाइश नहीं है। इम्तहान की तैयारी करनी है।"
आशा- "फिर रहने दो। न ही गई तो क्या?"
महेन्द्र- "रहने क्यों दे? तुमने जाना चाहा था, जाओ!"
आशा- "नहीं, मेरी इच्छा जाने की नहीं है।"
महेन्द्र- "अभी-अभी उस दिन तो ऐसी ज़बरदस्त इच्छा थी और अचानक ही वह इच्छा गायब हो गई!"
आशा नज़र झुकाए बैठी रही।
विनोदिनी से सुलह के लिए मौक़ा ढूँढ़ते हुए महेन्द्र का मन भीतर-ही-भीतर अधीर हो उठा था। आशा को चुपचाप देखकर नाहक ही उसे गुस्सा आ गया। बोला-"मुझ पर तुम्हें किसी तरह का शुबहा हुआ है क्या कि ऑंखों की निगरानी में रखना चाहती हो मुझे?" आशा की स्वाभाविक नम्रता, कोमलता और धीरजता महेन्द्र की बर्दाश्त से बाहर हो गया। अपने-आप बोला- "मौसी के यहाँ जाने की इच्छा है।- यह कहो कि मैं जाकर ही रहूँगी, जैसे भी हो। कभी हाँ, तो कभी नहीं, कभी चुप-यह क्या करती रहती हो?"
महेन्द्र की ऐसी रुखाई से आशा अचरज में पड़ी डर गई, लाख कोशिश करने पर भी उसे कोई जवाब न सूझा। यह समझ ही न पाती थी कि क्यों महेन्द्र कभी तो इतना आदर करता है और फिर अचानक बे-रहम-सा बन जाता है। इस तरह आशा के लिए महेन्द्र जितना ही दुर्बोध बनता जाता, आशा उतना ही धड़कते कलेजे से, भय और प्यार से उसे ज़्यादा जकड़ती जाती।
वह महेन्द्र पर शक करे, उसे ऑंखों की निगरानी में रखना चाहती है। यह कोई कठोर उपहास है कि निर्दय सन्देह! कसम खाकर इसका प्रतिवाद करना ज़रूरी है कि उसे हँसकर टाल जाए?
आशा थी और अब भी चुप रहते देखकर अधीर महेन्द्र तेज़ी से उठकर चला गया। फिर कहाँ तो रहा कहानी का नायक और कहाँ गई नायिका। सूर्यास्त की आभा अंधेरे में खो गई, साँझ वाली बसन्ती बयार जाती रही और सर्द हवा चलने लगी। फिर भी आशा उसी चटाई पर लेटी रही।
जब बहुत देर बाद वह कमरे में गई, तो देखा, महेन्द्र ने उसे बुलाया भी नहीं, सो गया है। मन में आया, स्नेहमयी मौसी की तरफ से उसे उदासीन देखकर महेन्द्र मन-ही-मन शायद उससे घृणा करता है। खाट पर जाकर आशा ने उसके दोनों पैर पकड़ लिये। इससे महेन्द्र करुणा से विगलित हो गया और उसने उसे खींच लेने की कोशिश की। लेकिन आशा बिल्कुल न उठी। उसने कहा-"मुझसे कोई कुसूर हुआ हो, तो मुझे माफ करो!"
महेन्द्र ने पिघलकर कहा- "तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है, चुन्नी! मैं ही बड़ा पाखण्डी हूँ, इसलिए नाहक ही मैंने तुम्हें चोट पहुँचाई।"
इस पर आशा की ऑंखें बरसती हुई महेन्द्र के पैरों को भिगोने लगीं। महेन्द्र उठ बैठा। अपनी बाँहों में उसे कसकर पास में सुलाया। रुलाई का वेग कुछ कम हुआ तो आशा बोली- "भला मौसी को देखने जाने को जी नहीं चाहता मेरा? लेकिन तुम्हें छोड़कर जाने का मन नहीं होता। इसी से जाना नहीं चाहती। तुम इससे नाराज़ मत हो।"
आशा के गीले गालों को धीरे-धीरे पोंछते हुए महेन्द्र ने कहा- "भला यह भी कोई नाराज़ होने की बात है? तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकती, इस पर मैं नाराज होऊँ? खैर, तुम्हें कहीं नहीं जाना पड़ेगा।"
आशा ने कहा- "नहीं, मैं काशी ज़रूर जाऊँगी।"
महेन्द्र- "क्यों?" आशा- "मैं तुम पर सन्देह कर रही हूँ इसलिए नहीं जाती- जब यह बात एक बार तुम्हारे मुँह से निकल गई, तो कुछ दिनों के लिए मुझे जाना ही पड़ेगा।"
महेन्द्र- "पाप मैंने किया है और प्रायश्चित तुम्हें करना पड़ेगा?"
आशा- "मैं नहीं जानती- लेकिन कहीं-न-कहीं पाप मुझसे हुआ है, नहीं तो ऐसी बातें उठती ही नहीं। जिन बातों को मैं ख्वाब में भी नहीं सोच सकती, आखिर वे बातें क्यों सुननी पड़ रही हैं।"
महेन्द्र- "इसलिए कि मैं कितना बुरा हूँ, इसका तुम्हें पता नहीं।"
आशा ने परेशान होकर कहा- "फिर! ऐसा न कहो, मगर काशी अब मैं ज़रूर जाऊँगी।"
महेन्द्र ने हँसकर कहा- "तो जाओ! लेकिन तुम्हारी नज़रों की ओट में मैं अगर बिगड़ जाऊँ तो?"
आशा बोली- "इतना डराने की ज़रूरत नहीं... मानों मैं इस विचार में ही घबरा रही हूँ।"
महेन्द्र- "लेकिन सोचना चाहिए। लापरवाही से अपने ऐसे स्वामी को अगर तुम बिगाड़ दो, तो दोष किसे दोगी?"
आशा- "दोष कम-से-कम तुम्हें न दूँगी, बेफिक्र रहो!"
महेन्द्र- "ऐसे में अपना दोष मान लोगी?"
आशा- "हज़ार बार मान लूँगी।"
महेन्द्र- "ठीक है। तो कल मैं तुम्हारे बड़े चाचाजी से मिलकर सब तय कर आऊँगा।"
और महेन्द्र ने कहा, "रात बहुत हो गई।" करवट बदलकर वह सो गया।
ज़रा देर बाद फिर इधर पलटकर अचानक कह उठा-"चुन्नी, रहने भी दो। न भी जाओगी तो क्या हो जाएगा?"
आशा बोली- "फिर मनाही क्यों? अब अगर एक बार मैं जा न पाई, तो मेरे बदन से तुम्हारी वह झिड़की हमेशा लगी रहेगी। दो ही चार दिन के लिए सही, मुझे भेज दो!"
महेन्द्र बोला- "अच्छा।"
वह फिर करवट बदलकर सो गया।
काशी जाने से एक दिन पहले आशा ने विनोदिनी के गले से लिपटकर कहा- "भई किरकिरी, मेरा बदन छूकर एक बात बताओ!"
विनोदिनी ने आशा का गाल दबा दिया। कहा- "कौन-सी?"
आशा- "पता नहीं आजकल। तुम कैसी तो हो गई हो। मेरे पति के सामने तुम निकलना ही नहीं चाहतीं।"
विनोदिनी- "क्यों नहीं चाहती, यह क्या तू नहीं जानती? उस दिन महेन्द्र बाबू ने बिहारी बाबू से जो कुछ कहा, तूने अपने कानों नहीं सुना? जब ऐसी बातें होने लगीं, तो फिर कमरे में क्या निकलना!"
'ठीक नहीं है'- आशा यह समझ रही थी और ये बातें कैसी शर्मनाक हैं, फिलहाल उसने अपने मन से यह भी समझा है। तो भी बोली- "बातें तो ऐसी जाने कितनी उठती हैं, उन्हें अगर बर्दाश्त नहीं कर सकती तो फिर प्यार क्या! तुम्हें यह सब भूलना पड़ेगा!"
विनोदिनी- "ठीक है, भूल जाऊँगी।"
आशा- "मैं कल काशी जा रही हूँ। तुम्हें इसका ख्याल रखना होगा कि उन्हें कोई तकलीफ न हो। जैसे भागती-फिरती हो, ऐसा करने से न चलेगा।"
विनोदिनी चुप रही। उसकी हथेली दबाकर आशा ने कहा- "मेरे सिर की कसम, वह वचन तो तुम्हें देना ही पड़ेगा।"
विनोदिनी बोली- "अच्छा।"
26
एक ओर चाँद डूबता है, दूसरी और सूरज़ उगता है। आशा चली गई लेकिन महेन्द्र के नसीब में अभी तक विनोदिनी के दर्शन नहीं। महेन्द्र डोलता-फिरता, जब-तब किसी बहाने माँ के कमरे में पहुँच जाता- लेकिन विनोदिनी उसे पास आने की कोई मौक़ा ही न देती।
महेन्द्र को ऐसा उदास देखकर राजलक्ष्मी सोचने लगी- 'बहू चली गई, इसीलिए महेन्द्र को कुछ अच्छा नहीं लगता है।'
अब महेन्द्र के सुख-दुख के लिहाज़ से माँ गैर जैसी हो गई है। हालाँकि इस बात के जहन में आते ही उसे मर्मांतक हुआ! फिर भी वह मयंक को उदास देखकर चिन्तित हो गई।
उन्होंने विनोदिनी से कहा- "इस बार इनफ्लूएंजा के बाद मुझे दमा-जैसा कुछ हो गया है। बार-बार सीढ़ियाँ चढ़कर मुझसे ऊपर जाते नहीं बनता। महेन्द्र के खाने-पीने का ख्याल तुम्हीं को रखना है, बिटिया!
उसकी हमेशा की आदत है, किसी के जतन के बिना महेन्द्र रह नहीं सकता। देखो तो, बहू के जाने के बाद उसे पता नहीं क्या हो गया है। और बहू की भी बलिहारी, वह चली गई!" विनोदिनी बोली- "जरूरत क्या है, बुआ!"
राजलक्ष्मी बोलीं- "अच्छा, कोई जरूरत नहीं। मुझसे जो हो सकेगा, वही करूँगी।"
और वह उसी समय महेन्द्र के ऊपर वाले कमरे की झाड़-पोंछ करने जाने लगी। विनोदिनी कह उठी- "तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं, तुम मत जाओ! मैं ही जाती हूँ। मुझे माफ करो बुआ, जैसा तुम कहोगी, करूँगी।" राजलक्ष्मी लोगों की बातों की क़तई परवाह नहीं करती। पति की मृत्यु के बाद से दुनिया और समाज में उन्हें महेन्द्र के सिवाय और कुछ नहीं पता। विनोदिनी ने जब समाज की निन्दा का इशारा किया, तो वह खीझ उठीं। जन्म से महेन्द्र को देखती आई है, उसके जैसा भला लड़का मिलता कहाँ है? जब कोई उसकी आलोचना करता तो राजलक्ष्मी से रह न जाता उन्हें लगता कि इसी पल उसकी जबान गल क्यों नहीं रही!
महेन्द्र कॉलेज से लौटा और आज अपने कमरे को देखकर ताज्जुब में पड़ गया। दरवाज़ा खोलते ही चन्दन और धूप की खुशबू से घर महक उठा। मसहरी में रेशमी झालर बिछौने पर धप-धप धुली चादर और पुराने तकिए के बजाय दूसरा रेशमी फूल कढ़ा चौकोर तकिया- उसकी ख़ूबसूरत कढ़ाई विनोदिनी की काफ़ी दिनों की मेहनत का फल था। आशा उससे पूछा करती थी- 'ये चीज़ें तू बनाती आखिर किसके लिए है किरकिरी?' विनोदिनी हँसकर कहती- 'अपनी चिता की सेज के लिए। मरण के सिवा अपने सुहाग के लिए है भी कौन?'
दीवार पर महेन्द्र की जो तस्वीर थी, उसके फ्रेम के चारों कोनों पर बड़ी कुशलता से रेशमी गाँठें बाँधी गई थीं- नीचे की तिपाई पर फूलदानियों में गुलदस्ते- मानो महेन्द्र की प्रतिमूर्ति को किसी अजाने भक्त की पूजा मिली हो। कुल मिलाकर घर की शक्ल ही बदल गई थी। खाट पहले जहाँ थी, वहाँ से थोड़ी खिसकी हुई थी। कमरे को दो हिस्सों में बाँट दिया गया था। खाट के पास की दो बड़ी अलमारियों में कपड़े डालने से एक ओट जैसी हो गई थी, जिससे फर्श पर बैठने का बिछौना और रात को सोने की खाट अलग-अलग हो गई थी। काँच की जिस अलमारी में आशा की शौकिया सजावट थी, खिलौने थे, उसमें के काँच पर अन्दर से लाल कपड़ा जड़ दिया गया था। अब कुछ न दीखता था। कमरे के पुराने इतिहास की जो भी निशानी थी, नए हाथ की नई सजावट से वह ढक गई थी।
थका-माँदा महेन्द्र फर्श के साफ-सुथरे बिछौने पर लेट गया। तकियों पर माथा रखते ही एक मीठी-सी खूशबू मिली- तकिए की रुई से नागकेसर का पराग और कुछ इत्र डाला गया।
महेन्द्र की ऑंखें झप आईं। लगा, इस तकिए पर जिन हाथों की कला-कुशलता की छाप पड़ी है, मानो उसी की चम्पा-कली-सी अगुलियों की सुगन्ध आ रही है।
इतने में चाँदी की तश्तरी में फल-फूल और काँच के गिलास में बर्फ़ डला अनन्नास का शर्बत लिये नौकरानी आई।
महेन्द्र ने बड़ी तृप्ति से खाया। बाद में चाँदी के डिब्बे में पान लेकर विनोदिनी आई। बोली- "इधर कई दिन मैं खाने के समय न आ पायी, माफ करना! और जो चाहे सो करो, मगर मेरे सिर की कसम रही, मेरी ऑंख की किरकिरी को यह मत लिख भेजना कि तुम्हारी देख-भाल ठीक से नहीं हो रही है। जहाँ तक मुझसे बनता है, करती हूँ।"
विनोदिनी ने पान का डिब्बा महेन्द्र की तरफ बढ़ाया। पान में भी आज केवड़े की खुशबू थी।
महेन्द्र ने कहा- "सेवा-जतन के मामले में कभी-कभी ऐसी कमी रहना भी अच्छा है।"
विनोदिनी बोली- "क्यों भला?"
महेन्द्र ने कहा- "बाद में उलाहना देकर ब्याज समेत वसूलने की गुंजाइश रहती है।"
"महाजनजी, सूद कितना?" महेन्द्र ने कहा- "खाने के समय हाज़िर न रहीं, तो बाद में हाज़िर होने के बाद भी बकाया रह जाएगा।"
विनोदिनी बोली- "ऐसा कड़ा हिसाब है तुम्हारा कि देखती हूँ, तुम्हारे हाथों पड़ जाने पर छुटकारा नहीं।"
महेन्द्र ने कहा- "हिसाब कड़ा तो उसे कहते हैं जब वसूला जा सके। यदि वसूल ही न पाओ तो हिसाब तो रखना अपने पास?"
विनोदिनी ने कहा- "वसूल करने योग्य है भी क्या! मगर कैद तो कर ही रखा है।"
और मज़ाक को एकाएक गंभीर बनाते हुए उसने एक लम्बी साँस छोड़ी।
महेन्द्र ने भी गम्भीर होकर कहा- "तो यह कैदखाना है, क्यों?"
ऐसे में रोज़ की तरह बैरा तिपाई पर बत्ती रख गया।
अचानक ऑंख पर रोशनी पड़ी, तो हाथ की ओट करके नज़र झुकाए विनोदिनी ने कहा- "क्या पता भई, बातों में तुमसे कौन जीते? मैं चली।" महेन्द्र ने अचानक कसकर उसका हाथ पकड़ लिया। कहा- "बन्धन जब मान ही लिया, तो फिर जाओगी कहाँ?"
विनोदिनी बोली- "छि: छोड़ो! जिसके भागने का कोई रास्ता नहीं, उसे बाँधने की कोशिश कैसी!"
ज़बरदस्ती हाथ छुड़ाकर विनोदिनी चली गई। महेन्द्र सुगंधित तकिए पर सिर रखे बिछावन पर पड़ा रहा। उसके कलेजे में खलबली मच गई। सूनी साँझ, सूना कमरा-नव वसन्त की बयार- विनोदिनी का मन मानो पकड़ में आया- आया; लगा महेन्द्र अब अपने को संयमित नहीं कर पाएगा। जल्दी से उसने बत्ती बुझा दी, दरवाज़ा बन्द कर लिया और समय से पहले ही बिस्तर पर सो गया। बिछावन भी तो यह पिछले वाला नहीं। चार-पाँच गद्दे पड़े थे। काफ़ी नर्म। एक खुशबू यहाँ भी। अगरु की, खस की या काहे की थी, ठीक-ठीक समझ में न आई। महेन्द्र बार-बार इस-उस करवट लेटने लगा- मानो कोई भी पुरानी एक निशानी मिले कि उसे जकड़ ले। मगर कुछ भी हाथ न आया।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Postby Jemsbond » 20 Jun 2016 13:41

रात के नौ बजे दरवाज़े पर दस्तक पड़ी। बाहर से विनोदिनी ने कहा- "भाई साहब, आपका भोजन! दरवाज़ा खोलिए!"
महेन्द्र जल्दी से उठा और दरवाज़ा खोलने के लिए कुंडी पर हाथ लगाया। लेकिन दरवाज़े को खोला नहीं, फर्श पर पट पड़ गया। बोला- "नहीं, मुझे भूख नहीं है।"
बाहर से घबराहट-भरी आवाज- 'तबीयत तो ख़राब नहीं है? पानी ला दूँ? और कुछ चाहिए?"
महेन्द्र ने कहा- "नहीं मुझे नहीं चाहिए।"
विनोदिनी बोली- "आपको हमारी कसम। क्या हुआ बताओ! अच्छा चलो तबीयत ख़राब है तो कुंडी तो खोलो।" महेन्द्र ने ज़ोर से कहा- "उँहूँ! नहीं खोलूँगा। तुम जाओ।"
महेन्द्र फिर जाकर अपने बिस्तर पर लेट गया और आशा की स्मृति को सूनी सेज पर टटोलने लगा।
लाख कोशिश करने पर भी जब नींद न आई, तो दवात-कलम लेकर आशा को खत लिखने बैठा। लिखा, 'आशा, अब और ज़्यादा दिन मुझे अकेला मत छोड़ो-तुम्हारे न रहने से ही मेरी सारी प्रवृत्तियाँ जंजीर तोड़कर मुझे न जाने कहाँ खींच ले जाना चाहती हैं। जिससे राह देख-देखकर चलूँ वह रोशनी कहाँ? वह रोशनी तो तुम्हारी विश्वास-भरी ऑंखों की प्रेमपूर्ण दृष्टि है। मेरी मंगल, ध्रुव, तुम जल्दी चली आओ! मुझे अविचल बनाओ, मुझे बचाओ, मेरे हृदय को भर दो।'
महेन्द्र न जाने कब तक लिखता रहा। दूर, और दूर के कई गिरजों की घड़ियों में तीन बजे। कलकत्ता की सड़कों पर गाड़ियों की घड़घड़ाहट थम चुकी थी, मुहल्ले के उस छोर पर किसी नटी के कंठ से विहाग की जो तान उठ रही थी, वह भी सारी दुनिया पर फैली हुई शांति और नींद में बिल्कुल डूब गई। आशा को हृदय से याद करके और मन के आवेग को लम्बे पत्र में ज़ाहिर करके महेन्द्र को काफ़ी राहत मिली और लेटते ही उसे नींद आने में देर न लगी।
सुबह उसकी नींद खुली तो बेला हो आई थी। कमरे में धूप आ रही थी।
महेन्द्र जल्दी से उठ बैठा, रात की बातें मन में हल्की हो गई थीं। देखा, रात की लिखी चिट्ठी दवात से दबी तिपाई पर पड़ी है। उसे फिर से पढ़ गया। उसे लगा-'अरे, यह किया क्या मैंने! यह तो मानो उपन्यास का वृत्तांत हो गया। गनीमत कहो कि भेजी नहीं। क्या सोचती आशा मन में! आधी तो वह समझती ही नहीं।'
रात को जो आवेग बेहिसाब बढ़ गया था, उसकी याद आते ही महेन्द्र शर्मसार हो गया। चिट्ठी के टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिए। सरल भाषा में आशा को एक छोटा-सा पत्र लिखा- "और कितनी देर करोगी तुम? तुम्हारे बड़े चाचा के आने में अगर विलंब हो, तो मुझे वैसा लिखो। मैं खुद आकर तुम्हें ले जाऊँगा। अकेले मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।"
27
महेन्द्र वापस आ गया और कुछ ही दिनों में आशा काशी पहुँच गई, इससे अन्नपूर्णा को बड़ी आशंका हुई। आशा से वह तरह-तरह के सवाल पूछने लगी- "क्यों री चुन्नी, और तेरी वह ऑंख की किरकिरी! तेरी राय में जिसके मुकाबले दूसरी गुणवंती नहीं?"
"सच मौसी, मैंने बढ़ाकर बिल्कुल नहीं कहा है। जैसी बुध्दि, वैसा ही रूप! काम-काज में उतनी ही कुशल।"
"तेरी तो सखी ठहरी। तू तो गुणवंती बताएगी ही। घर के और दूसरे लोग क्या कहते हैं?"
"माँ तो उसकी तारीफ करते नहीं थकतीं कभी। जब भी वह अपने घर जाने को कहती है, माँ परेशान हो उठती हैं। उसके जैसी सेवा कोई नहीं कर सकता। घर की नौकर-नौकरानी भी बीमार पड़ जाएँ, तो माँ-सी, बहन-सी उसकी सेवा करती है।"
"और महेन्द्र की क्या राय है?"
"उन्हें तो तुम जानती ही हो, निहायत अपना कोई न हो तो उन्हें नहीं जँचता। हर कोई उसे चाहता है, लेकिन उनसे अब तक ठीक पटरी नहीं बैठी।" "सो क्यों?"
"जोर-जबरदस्ती मैं कभी मिला भी देती हूँ, पर बोल-चाल लगभग बन्द ही समझो! कितने कम बोलने वाले हैं, मालूम ही है तुम्हें! लोग समझते हैं, दंभी हैं। मगर बात वैसी नहीं, दो-एक ख़ास-खास आदमियों के सिवा औरों को वे बर्दाश्त नहीं कर पाते।"
अंतिम बात कहकर आशा को अचानक लाज लगी-दोनों गाल तमतमा उठे। अन्नपूर्णा खुश होकर मन-ही-मन हँसी। बोली- "ठीक कहती हो, महेन्द्र जब आया था यहाँ, उसका नाम कभी उसकी जबान पर भी न आया।"
आशा ने दुखी होकर कहा- "यही उनमें खामी है। जिसे नहीं चाहते वह मानो है ही नहीं। उसे मानो न कभी देखा, न जाना।" शांत स्निग्ध मुस्कान से अन्नपूर्णा ने कहा- "और जिसे चाहता है, मानो जन्म-जन्मांतर उसी को देखता-जानता रहा है, यह भाव भी उसमें है, है न चुन्नी?"
आशा ने उत्तर न देकर नजर झुका ली।
अन्नपूर्णा ने पूछा- "और बिहारी का क्या हाल है, चुन्नी? वह शादी करेगा ही नहीं?"
सुनते ही आशा का चेहरा गम्भीर हो गया। वह सोच ही न पाई कि क्या जवाब दे।
आशा को निरुत्तर देखकर अन्नपूर्णा घबरा गई। पूछा- "सच-सच बता चुन्नी, बिहारी बीमार-वीमार तो नहीं है।"
आशा ने कहा- "देख मौसी, उनकी बात उन्हीं से पूछ।'
अचरज से अन्नपूर्णा ने कहा- "क्यों?"
आशा बोली- "यह मैं नहीं बता सकती।" कहकर वह कमरे से बाहर चली गई।
अन्नपूर्णा चुपचाप बैठी सोचने लगी- हीरे जैसा लड़का बिहारी, कैसा हो गया है कि उसका नाम सुनते ही चुन्नी उठकर बाहर चली गई। किस्मत का फेर!
साँझ को अन्नपूर्णा पूजा पर बैठी थीं कि कोई गाड़ी बाहर आकर रुकी। गाड़ीवान घर वाले को पुकारता हुआ दरवाज़े पर थपकी देने लगा। पूजा करती हुई अन्नपूर्णा बोल उठी- "अरे लो! मैं तो भूल ही गई थी एकबारगी। आज कुंज की सास और उसकी बहन की दो लड़कियों के आने की बात थी इलाहाबाद से। शायद आ गईं सब। चुन्नी बत्ती लेकर दरवाज़ा खोल जरा!"
लालटेन लिये आशा ने दरवाज़ा खोल दिया। बाहर बिहारी खड़ा है। वह बोल उठा- "अरे यह क्या भाभी, मैंने तो सुना था, तुम काशी नहीं आओगी?"
आशा के हाथ से लालटेन छूट गई। उसे मानो भूत दिख गया। एक साँस में वह दुतल्ले पर भागी और घबराकर चीख पड़ी- "मौसी! तुम्हारे पैर पड़ती हूँ मैं, इनसे कह दो, आज ही चले जाएँ।" पूजा के आसन पर अन्नपूर्णा चौंक उठीं। कहा- "अरे, किनसे कह दूँ चुन्नी, किनसे?"
आशा ने कहा- "बिहारी बाबू यहाँ भी आ गए!"
और बगल के कमरे में जाकर उसने दरवाज़ा बन्द कर लिया।
नीचे खड़े बिहारी ने सब सुन लिया। वह उल्टे पाँवों भाग जाने को तैयार हो गया- लेकिन पूजा छोड़कर अन्नपूर्णा जब नीचे उतर आईं तो देखा, बिहारी दरवाज़े के पास ज़मीन पर बैठा है- उसके शरीर की सारी शक्ति चली गई है।
वह रोशनी नहीं ले आई थीं। अंधेरे में बिहारी के चेहरे का भाव न देख सकीं, बिहारी भी उन्हें न देख सका।
अन्नपूर्णा ने आवाज़ दी- "बिहारी!"
बिहारी का बेबस शरीर एड़ी से चोटी तक बिजली की चोट से चौंक पड़ा। बोला- "चाची, बस और एक शब्द भी न कहो, मैं चला।"
बिहारी ने ज़मीन पर ही माथा टेका, अन्नपूर्णा के पाँव भी न छुए। माँ जिस तरह गंगासागर में बच्चे को डाल आती है, अन्नपूर्णा ने उसी तरह रात के उस अंधेरे में चुप-चाप बिहारी का विसर्जन किया- पलटकर उसे पुकारा नहीं। देखते-ही-देखते गाड़ी बिहारी को लेकर ओझल हो गई।
आशा ने उसी रात महेन्द्र को पत्र लिखा- "आज शाम को एकाएक बिहारी यहाँ आए थे। बड़े चाचा कब तक कलकत्ता लौटेंगे, ठिकाना नहीं। तुम जल्दी आकर मुझे यहाँ से ले जाओ?"
28
उस दिन रात तक जागते रहने और भारी आवेग के कारण सुबह महेन्द्र में एक अवसाद तारी था। फागुन के अधबीच-गर्मी पड़नी शुरू हो गई थी। और सवेरे महेन्द्र अपने सोने के कमरे के एक ओर बैठकर पढ़ता था। आज वह तकिए के सहारे फर्श पर पड़ा रहा। बेला हो आई, नहाने नहीं गया। रास्ते में फेरी वाले आवाज़ लगाते हुए गुज़रने लगे। दफ़्तर जाने वाली गाड़ियों की अविराम गड़गड़ाहट। पड़ोसी का नया मकान खड़ा हो रहा था। मज़दूरिनें छत की कुटाई की ताल पर एक स्वर से गाने लगीं। हल्की गर्म दक्खिनी बयार से महेन्द्र की दुखती नसें शिथिल हो आई थीं। कोई कठिन निश्चय, कोई दुरूह चेष्टा, मन से जूझना आज के इस अलसाए गिरे-गिरे से वसंत के दिन के लायक़ न था।
"भाई साहब, आज हो क्या गया तुम्हें? नहाओगे नहीं, खाना तैयार है। अरे, सो रहे हो। तबीयत ख़राब है? सिर दुख रहा है?"- और, पास आकर विनोदिनी ने उसके माथे पर हाथ रखा। अधमुंदी ऑंखों और लड़खड़ाई आवाज़ में महेन्द्र ने कहा- "आज तबीयत कुछ अच्छी नहीं- नहाऊँगा नहीं आज।"
विनोदिनी बोली- "न नहाओगे, तो थोड़ा-सा खा लो!"
ज़िद करके विनोदिनी उसे रसोई में ले गई और बड़े जतन और आग्रह से खिलाया।
खा-पीकर महेन्द्र फिर आकर लेट गया। विनोदिनी उसके सिरहाने बैठकर धीरे-धीरे सिर दबाने लगी! ऑंखें बन्द किए महेन्द्र ने कहा- "तुमने अभी खाया नहीं है, भई किरकिरी! जाओ, खा लो!" मगर विनोदिनी न गई। अलसाई दोपहरी के गर्म झोंकों से घर के परदे उड़ने लगे, दीवार के पास वाले नारियल के पेड़ की बेमानी मरमराहट कमरे में आने लगी। महेन्द्र का कलेजा जोर-जोर से थिरकने लगा और विनोदिनी का घना नि:श्वास उसी ताल पर महेन्द्र के कपाल पर पड़े बालों को नचाता रहा। किसी के भी गले से एक शब्द न निकला। महेन्द्र सोचने लगा- "ओर-छोर-हीन इस संसार के अनंत स्रोत में बहा जा रहा हूँ, जरा देर के लिए कभी कहीं नाव अगर किनारे पर लगे तो उससे किसी का क्या आता-जाता है, और कितने दिनों के लिए!"
सिरहाने बैठी महेन्द्र का सिर सहलाती विनोदिनी का सिर विह्नल यौवन के भार से धीरे-धीरे झुका जा रहा था और अन्त तक उसकी लटों की नोक महेन्द्र के कपोल को छूने लगी। हवा से हिलती हुई लटों के कोमल स्पर्श से उसका सारा शरीर रह-रहकर काँप उठने लगा, साँस मानो कलेजे के पास रुक गई, बाहर निकलने की राह न मिली। महेन्द्र झटपट उठ बैठा। बोला- "न मेरी क्लास है। कॉलेज चलूँ!" कहकर वह विनोदिनी की तरफ ताके बिना खड़ा हो गया।
विनोदिनी बोली- "परेशान न हो, कपड़े मैं ला देती हूँ।"
जाकर वह महेन्द्र के कॉलेज जाने के कपड़े ले आई।
महेन्द्र जल्दी-जल्दी चला गया, लेकिन कॉलेज में मन न लगा। देर तक पढ़ने में जी लगाने की कोशिश की मगर बेकार। आखिर जल्दी ही घर लौट आया।
कमरे में दाखिल हुआ तो देखा, पेट के नीचे तकिया रखे ज़मीन पर बैठी विनोदिनी कोई किताब पढ़ रही है-घने काले बालों का ढेर उसकी पीठ पर बिखरा पड़ा है। महेन्द्र के जूतों की आवाज़ शायद उसे सुनाई नहीं दी। पैर दबाकर महेन्द्र उसके क़रीब जा खड़ा हुआ। पढ़ते-पढ़ते उसने विनोदिनी को एक दीर्घ-नि:श्वास छोड़ते हुए देखा।
महेन्द्र ने कहा- "अरी ओ करुणामयी, कल्पना की दुनिया के लिए हृदय की फिजूलखर्ची मत करो! पढ़ क्या रही हो?"
घबराकर विनोदिनी उठ बैठी। किताब अपने ऑंचल में छिपा ली। महेन्द्र ने झपटकर छीनने की कोशिश की। देर तक हाथापाई, छीना-झपटी के बाद महेन्द्र ने विनोदिनी से किताब छीन ली। देखा बंकिम बाबू की लिखी 'विषवृक्ष' थी। जल्दी-जल्दी साँस लेती हुई गुस्से में मुँह फेरकर विनोदिनी चुप हो रही।
महेन्द्र के कलेजे में बेहद उथल-पुथल मची थी। बड़ी कोशिश के बाद वह हँसकर बोला- "जा, बेहद छका दिया। मैंने सोचा था, कुछ बड़ी ही गोपनीय चीज़ होगी और पहाड़ खोदने के बाद निकली क्या, चुहिया ही न! बंकिम बाबू का 'विषवृक्ष'?"
विनोदिनी बोली- "मेरे पास भला क्या गोपनीय हो सकता है, सुनूँ तो ज़रा।"
महेन्द्र फट से कह उठा- "कहीं बिहारी की चिट्ठी आई होती!"
पल में विनोदिनी की निगाह से बिजली छिटक पड़ी। अब तक मानो कामदेव कमरे के कोने में खिलवाड़ कर रहा था- वह मानो दूसरी बार जलकर राख हो गया। जलती हुई एक लपट की तरह विनोदिनी लमहे-भर में उठ खड़ी हुई। उसकी कलाई पकड़कर महेन्द्र ने कहा-"माफ करो, मैंने मज़ाक किया था।"
विनोदिनी ने तेज़ी से अपनी कलाई छुड़ा ली और कहा- "मज़ाक आखिर किसका! उनसे मैत्री के योग्य होते, तो मैं मज़ाक सह लेती। तुम्हारा दिल बड़ा छोटा है- मैत्री करने की जुर्रत नहीं, फिर मज़ाक!" विनोदिनी चलने लगी। महेन्द्र ने दोनों हाथों से उसके पैर थाम लिये।
ठीक इसी समय सामने एक छाया दिखी। महेन्द्र ने चौंककर उसके पैर छोड़ दिए। देखा, बिहारी खड़ा था।
बिहारी ने अपनी स्थिर दृष्टि से दोनों को जलाते हुए शांत और धीर स्वर से कहा- "बड़े बेमौके आ पहुँचा मैं। खैर! ज़्यादा देर ठहरना नहीं है। एक बात कहनी थी। मैं काशी गया था। पता नहीं था कि भाभी वहाँ हैं। अनजाने उनके प्रति यह कसूर हो गया। उनसे माफी माँगने का अवसर नहीं है, सो तुमसे माँगने आया हूँ। जाने-अनजाने अगर कभी मेरे मन को कोई पाप छू गया हो, तो उसके लिए उन्हें भी कोई दु:ख न सहना पड़े, तुमसे यही मेरी विनती है।"
अचानक बिहारी के सामने उसकी कमज़ोरी ज़ाहिर हो गई, इससे महेन्द्र का मन दहक उठा। अभी उदार बनने का मौक़ा न था। वह ज़रा हँसकर बोला, "एक कहावत है- ठाकुर घर में कौन? तो मैंने केला नहीं खाया। तुम्हारा ठीक वही हाल है। मैंने न तो तुम्हें दोष मानने को कहा, न इन्कार करने को ही। फिर माफी माँगकर साधु बनने क्यों आए?"
बिहारी कुछ देर खड़ा रहा। फिर जवाब देने की जोरदार कोशिश से उसके होठ काँप उठे, तो विनोदिनी बोल पड़ी- "बिहारी बाबू, तुम कोई जवाब मत दो- कुछ मत कहो! यह आदमी जो कुछ भी जबान पर लाया, वह उसी के मुँह का कलंक हो रहा है- वह कलंक तुम्हें नहीं छू पाया है।"
जाने विनोदिनी का कहा बिहारी के कानों तक पहुँचा या नहीं- जैसे स्वप्न में चलता हो, वह वहाँ से सीढ़ियों पर होकर नीचे उतरने लगा।
विनोदिनी पीछे लगी हुई गई। कहा- "भाई साहब, मुझसे तुम्हें कुछ भी नहीं कहना है? झिड़कना हो तो झिड़को!"
बिहारी फिर भी जब कुछ न बोला और आगे ही बढ़ने लगा तो विनोदिनी ने आगे आकर दोनों हाथों से दाएँ हाथ को कसकर पकड़ लिया। बेहद नफरत से उसे झटककर बिहारी चला गया। उसे यह भी न मालूम हुआ कि उस झटके से विनोदिनी गिर पड़ी। गिरने की आवाज़ सुनकर महेन्द्र दौड़ा आया। विनोदिनी के बाएँ हाथ की कोहनी फूट गई थी। लहू बह रहा था।
महेन्द्र बोला- "उफ, काफ़ी कट गया है!" और अपने महीन कुरते से थोड़ा-सा कपड़ा फाड़कर महेन्द्र ने वहाँ पट्टी बाँध देनी चाही।
विनोदिनी ने झट अपना हाथ हटा लिया। कहा- "ऊँहूँ, छोड़ दो। लहू बहने दो!"
महेन्द्र ने कहा- "पट्टी बाँधकर एक दवा देता हूँ- दर्द जाता रहेगा, घाव जल्दी ठीक हो जाएगा।"
विनोदिनी खिसक गई। बोली- "मैं दर्द मिटाना नहीं चाहती- यह जख्म रहे।"
महेन्द्र ने कहा- "आज बेताब होकर दूसरे के सामने मैंने तुम्हारी हेठी की है, माफ कर सकोगी मुझे?"
विनोदिनी बोली- "माफी किस बात की? ठीक किया है। मैं क्या किसी से डरती हूँ? मैं किसी को नहीं मानती! जो मुझे धक्का देकर गिरा जाते हैं, वही क्या अपने सब हैं और जो पैर पकड़कर खींचते हुए रोक रखना चाहते हैं, वे कोई नहीं?"
महेन्द्र उन्मत्त-सा गद्गद स्वर में बोला- "विनोदिनी! तो मेरे प्रेम को तुम पैरों से ठुकराओगी नहीं?"
विनोदिनी ने कहा- "सिर-ऑंखों रखूँगी। ज़िन्दगी में मुझे इतना ज़्यादा तो नहीं मिला कि मैं 'नहीं चाहिए' कहकर लौटा दूँ।"
महेन्द्र ने फिर तो दोनों हाथों से उसके दोनों हाथ थामकर कहा- "तो फिर मेरे कमरे में चलो! आज मैंने तुम्हारा दिल दुखाया है- तुम भी मुझे चोट पहुँचाकर चली आई हो, यह मलाल जब तक मिट नहीं जाता, मुझे न खाने में चैन है, न सोने में।"
विनोदिनी बोली- "आज नहीं। आज छोड़ दो मुझे। अगर मैंने तकलीफ पहुँचाई हो तो माफ करना!"
महेन्द्र बोला- "तुम भी माफ कर दो मुझे, वरना रात मैं सो नहीं सकूँगा।"
विनोदिनी बोली- "मैंने माफ कर दिया।"
उसी दम विनोदिनी से प्यार और क्षमा का निदर्शन पाने के लिए महेन्द्र व्यग्र हो उठा। लेकिन उसके मुँह की ओर नज़र पड़ते ही वह ठिठक गया। विनोदिनी नीचे उतर गई और वह भी छत पर टहलने लगा। आज अचानक बिहारी के सामने उसकी चोरी पकड़ी गई, इससे उसके मन में मुक्ति की एक खुशी आई। चोरी-चुपके में एक घिनौनापन है, वह घिनौनापन मानो एक आदमी के पास प्रकट होने से बहुत हद तक जाता रहा। मन-ही-मन वह बोला- 'खुद को भला बताकर मैं अब यह झूठ नहीं चलाना चाहता- लेकिन मैं प्यार करता हूँ, प्यार करता हूँ- यह बात झूठी नहीं है।' अपने प्रेम के गर्व से उसकी अकड़ इतनी बढ़ गई कि खुद को मानकर वह अकड़ में गर्व का अनुभव करने लगा।
29
दूसरे दिन सोकर उठते ही एक मीठे आवेग से महेन्द्र का हृदय परिपूर्ण हो गया। प्रभात की सुनहली किरणों ने मानो उसकी सभी चिन्ता-वासना पर सोना फेर दिया। कितनी प्यारी है पृथ्वी, कितना अच्छा आकाश! फूल के पराग जैसी हवा मानो उसके मन को उड़ा ले जाने लगी।
सवेरे-सवेरे मृदंग-मजीरे लिये वैष्णव भिखारी ने गाना शुरू कर दिया था। दरबान उन्हें खदेड़ने लगा। महेन्द्र ने दरबान को झिड़का और भिखारी को एक रुपया दे दिया। बैरा बत्ती लेकर लौट रहा था। लापरवाही से उसने बत्ती गिरा दी। चूर-चूर हो गई। महेन्द्र को देखकर तो उसके प्राण कूच करने लगे। महेन्द्र ने लेकिन डाँट नहीं बताई। कहा- "वहाँ अच्छी तरह से झाडू लगा दे, किसी को काँच न चुभ जाए।" आज कोई नुकसान उसे नुकसान जैसा न लगा।
अब तक प्रेम पर्दे के पीछे नेपथ्य में छिपा बैठा था। अब सामने आकर उसने परदा उठा दिया है। मानो सारे संसार पर से परदा उठा गया। रोज़-रोज़ की देखी-सुनी दुनिया की सारी तुच्छता गायब हो गई। पेड़-पौधे, राह चलते लोग, शहर की चहल-पहल... आज सब-कुछ जैसे अनोखा हो! संसारव्यापी यह नवीनता अब तक आखिर थी कहाँ!
उसे लगने लगा, आज विनोदिनी से और दिनों- जैसा साधारण मिलन न होगा। आज सुबह से वह बेताब घूमता रहा- कॉलेज न जा सका। जाने मिलन की घड़ी अचानक कब आ जाए- यह तो किसी पत्र में लिखा नहीं।
घर के धन्धों में जुटी विनोदिनी की आवाज़ कभी भण्डार से, कभी रसोई से महेन्द्र के कानों में पहुँचने लगी। आज यह उसे अच्छा न लगा। आज मन-ही-मन विनोदिनी को उसने संसार से बहुत दूर ले जाकर स्थापित किया था।
समय काटे नहीं कट रहा था। महेन्द्र का खाना-पीना चुक गया। घर के काम-धन्धों से छुट्टी हुई। दोपहर सुनसान हो गई। मगर विनोदिनी का पता नहीं। दु:ख और सुख, बेताबी और उम्मीद में महेन्द्र के मन के सितार के सारे तार झनझनाने लगे।
कल जिसके लिए छीना-झपटी हुई थी, वह 'विषवृक्ष' किताब फर्श पर पड़ी थी। उसे देखते ही छीना-झपटी की याद हो आई और महेन्द्र के मन में पुलकन भरा आवेश जग गया। कल विनोदिनी ने जिस तकिए पर अपना सिर रखा था, उसे क़रीब खींचकर महेन्द्र ने उस पर अपना माथा रखा। पड़ा-पड़ा 'विषवृक्ष' के पन्ने पलटने लगा। जाने कब किताब में जी लग गया और कब पाँच बज गए, पता नहीं।
इतने में एक मुरादाबादी थाली में फल-मिठाई और एक तश्तरी में बर्फ-चीनी डाल खुशबू-बसा ख़रबूज़ा लिये विनोदिनी आई। महेन्द्र से बोली- "कर क्या रहे हैं! आखिर बात क्या है, पाँच बज गए और न तुमने मुँह-हाथ धोया, न कपड़े बदले!"
महेन्द्र के मन में एक धक्का-सा लगा। उसे क्या हुआ है, यह भी पूछने की बात है? महेन्द्र खाने लगा। विनोदिनी जल्दी से महेन्द्र के छत पर सूखते कपड़े लाकर तह करने और अपने कुशल हाथों से उन्हें अलमारी में करीने से रखने लगी।
महेन्द्र ने कहा- "जरा-रुको तो सही, खा लूँ, फिर मैं भी तुम्हारा हाथ बँटाता हूँ।"
विनोदिनी ने हाथ जोड़कर कहा- "दुहाई है, और चाहे जो करो, हाथ मत बँटाना!"
महेन्द्र खा चुका तो उठकर बोला- "अच्छा, मुझे निकम्मा समझती हो खैर, हो जाए आज इम्तहान!"
और महेन्द्र ने नाहक ही कपड़े तह करने की कोशिश की।
विनोदिनी बोली- "जनाबेमन, आप रख दीजिए। मेरा काम मत बढ़ाइए!"
महेन्द्र बोला- "तो तुम काम किए जाओ, मैं देख-देखकर सीखूँ।"
वह अलमारी के सामने विनोदिनी के पास जाकर बैठ गया। विनोदिनी कपड़े झाड़ने के बहाने कभी-कभी महेन्द्र की पीठ पर उन्हें पटककर ढंग से तह लगाने और सहेजने लगी।
और इस तरह आज का मिलन शुरू हुआ। तड़के से उठकर महेन्द्र ने जैसी कल्पना कर रखी थी, उस अनोखेपन का कोई आभास ही नहीं। महेन्द्र फिर भी दुखी न हुआ, बल्कि उसे थोड़ा आराम मिला। अपने काल्पनिक आदर्श को किस तरह वह रूप देता, उसका ढंग क्या होता, क्या कहता, क्या जताता, तय नहीं कर पा रहा था। कपड़े सहेजने के इस हँसी-मज़ाक में मानो अपने गढ़े एक असम्भव और कठिन आदर्श से उसे मुक्ति मिली।
इतने में राजलक्ष्मी आई। कहा- "महेन्द्र, बहू कपड़े सहेज रही है, तू वहाँ बैठा क्या कर रहा है?"
विनोदिनी बोली- "ज़रा देखो तो सही बुआ, नाहक ही मेरे काम में देर कर रहे हैं।"
महेन्द्र बोला- "अरे रे! मैं तो मदद कर रहा था।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "हाय मेरी तकदीर! तू और मदद, सुनती है बहू, इसकी सदा की यही आदत है। माँ चाची के लाड़ में पला- कभी जो अपने हाथ से तिनका भी हिलाए!"
विनोदिनी से जब भी बातचीत होती सिर्फ यही कि इसका क्या किया जाए! यह तो हर बात में अपनी माँ का मुँह देखता रहता है। वह उसकी सेवा का भार विनोदिनी पर डालकर निश्चिन्त थीं, वह इससे भी खुश थी कि महेन्द्र ने विनोदिनी की मर्यादा समझी है। महेन्द्र को सुना-सुनाकर वह बोलीं- "बहू, आज तुमने महेन्द्र के गरम कपड़े धूप में सुखा लिये, कल उसके नए रूमालों में उसके नाम का हरफ तुम्हें काढ़ देना पड़ेगा। जब से तुम्हें साथ ले आई हूँ, आदर-जतन तो कुछ किया नहीं, बस काम में ही परेशान करती रही।"
विनोदिनी ने कहा- "ऐसा कहोगी बुआ, तो मैं समझूँगी तुम मुझे पराई समझती हो।"
दुलार से राजलक्ष्मी ने कहा- "अहा बिटिया, तुम्हारी-जैसी अपनी और है कौन मेरी?"
विनोदिनी कपड़े सहेज चुकी। राजलक्ष्मी ने पूछा- "तो अब चीनी का सिरका चढ़ा दूँ कि और कोई काम है तुम्हें?"
विनोदिनी बोली- "नहीं बुआ, और कोई काम नहीं है। चलो मिठाइयाँ बना लूँ चलकर।"
महेन्द्र बोला- "अभी-अभी तो तुम रोना रो गई कि इसे काम से ही परेशान करती रही और फिर तुरन्त काम के लिए खींचे लिये जा रही हो।" विनोदिनी की ठोड़ी पकड़कर राजलक्ष्मी ने कहा- "मेरी रानी बिटिया को तो काम करना ही पसन्द नहीं है।"
महेन्द्र बोला- "आज मैंने सोच रखा था, इसके साथ कोई किताब पढूँगा बैठकर क्योंकि मेरे पास कोई काम नहीं था।"

विनोदिनी ने कहा- "ठीक है बुआ, शाम को हम दोनों भाई साहब का पढ़ना सुनेंगी- क्यों?"
राजलक्ष्मी ने सोचा- "महेन्द्र बड़ा अकेला पड़ गया है- उसे बहलाए रखना ज़रूरी है।" बोली- "हाँ, ठीक तो है। खाना बनाकर शाम हम लोग पढ़ना सुनने आएँ?"
कनखियों से विनोदिनी ने एक बार महेन्द्र को देख लिया। वह बोला- "अच्छा।" लेकिन उसे कोई उत्साह नहीं रह गया। विनोदिनी राजलक्ष्मी के साथ-साथ चली गई।
नाराज होकर महेन्द्र ने सोचा- "ठीक है, मैं भी कहीं चला जाऊँगा और देर से लौटूँगा।" और समय उसने बाहर जाने के लिए कपड़े बदले। बड़ी देर तक वह छत पर टहलता रहा, बार-बार ज़ीने की तरफ ताकता रहा और अन्त में कमरे में जाकर बैठ गया। खीझकर मन-ही-मन बोला 'आज मैं मिठाई नहीं खाऊँगा। माँ को यह बता दूँगा कि देर तक चीनी के रस को उबालते रहने से उसमें मिठास नहीं रहती।'
महेन्द्र को भोजन कराने के समय आज विनोदिनी राजलक्ष्मी को साथ ले आई। दम फूलने के डर से वे ऊपर नहीं आना चाहती थीं। महेन्द्र बहुत गम्भीर होकर खाने बैठा। विनोदिनी बोली- "अरे यह क्या भाई साहब, तुम तो आज कुछ खा ही नहीं रहे हो।"

परेशान होकर राजलक्ष्मी ने पूछा- "तबीयत तो ख़राब नहीं?"
विनोदिनी बोली- "इतने जतन से मिठाइयाँ बनाई, कुछ तो खानी ही पड़ेंगी। ठीक नहीं बनीं शायद। तो फिर रहने दो। ज़िद पर खाना भी क्या! रहने दो!"
महेन्द्र बोला- "अच्छी मुसीबत में डाल दिया है! मिठाई ही खाने की इच्छा ज़्यादा है और अच्छी लग भी रही है; तुम रोको भी तो सुनने क्यों लगा भला।" दोनों ही मिठाइयाँ महेन्द्र रस लेकर खा गया।
खाना हो गया, तो तीनों महेन्द्र के कमरे में आ बैठे। राजलक्ष्मी ने कहा- "तूने कहा था न, कोई किताब पढ़ेगा। शुरू कर न!" महेन्द्र बोला- "मगर उसमें धर्म और देवताओं की कोई बात नहीं है। तुम्हें अच्छी नहीं लगेगी।"
अच्छी नहीं लगेगी! जैसे भी हो, अच्छी तो राजलक्ष्मी को लगनी ही थी। महेन्द्र चाहे किसी भाषा में पढ़े, उसे अच्छी लगनी ही थी। आह, बेचारा महेन्द्र, बहू काशी चली गई है।- अकेला पड़ गया है। उसे जो अच्छा लगेगा, वह माँ को अच्छा क्यों नहीं लगेगा?
विनोदिनी बोली- "एक काम क्यों नहीं करते भाई साहब, बुआ के कमरे में "शान्ति-शतक" पड़ा है, आज वही पढ़कर सुनाओ। बुआ को भी अच्छा लगेगा और शाम भी मजे में कटेगी।"
महेन्द्र ने बड़े ही करुण भाव से एक बार विनोदिनी की तरफ देखा। इतने में किसी ने आकर खबर दी-"माँजी, ललाइन आकर आपका इन्तज़ार कर रही हैं।"
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Postby Jemsbond » 20 Jun 2016 13:41

ललाइन राजलक्ष्मी की जिगरी दोस्त है। शाम को उनसे गप-शप करने का लोभ छोड़ सकना उनके लिए असम्भव है। फिर भी वह नौकरानी से बोलीं-"उनसे जाकर कह, आज मुझे महेन्द्र से कुछ काम है। कल मगर ज़रूर आए। मैं उनकी प्रतीक्षा करूँगी।"
महेन्द्र झटपट बोल उठा- "तुम उनसे मिल क्यों नहीं आती हो? माँ!"
विनोदिनी बोली- "न हो तो तुम रुको बुआ; मैं ही बल्कि उनके पास जाती हूँ।"
राजलक्ष्मी प्रलोभन न छोड़ सकीं। बोलीं- "बहू, तब तक तुम यहाँ बैठो-देखूँ, मैं अगर उन्हें रुख़्सत करके आ पाऊँ। पढ़ना शुरू करो तुम लोग। मेरी प्रतीक्षा की जरूरत नहीं है।"
राजलक्ष्मी का कमरे से बाहर जाना था कि महेन्द्र से और न रहा गया। कह उठा- "जान-बूझकर क्यों तुम मुझे इस तरह परेशान करती हो?"
विनोदिनी ने अचरज से कहा- "मैंने क्या सताया तुम्हें! मेरा आना गुनाह है क्या? तो फिर क्या ज़रूरत है, मैं जाती हूँ।"
और वह नाराज-सी होकर उठने लगी।
महेन्द्र ने उसका हाथ पकड़ लिया। बोला- "इसी तरह से तो तुम मुझे जलाया करती हो।"
विनोदिनी ने कहा- "अच्छा, मुझे किसी बात की खबर न थी कि मुझमें इतना तेज है। और तुम्हारी जान तो कम कठिन नहीं है, बेहद झेल सकते हो। शक्ल से तो समझना मुश्किल है कि काफ़ी जले-झुलसे हो।"
महेन्द्र ने कहा- "शक्ल से क्या समझोगी?"- और ज़बरदस्ती विनोदिनी का हाथ खींचकर अपनी छाती से लगा लिया।
विनोदिनी 'उफ्' कर उठी ज़ोर से। महेन्द्र ने झट उसका हाथ छोड़ दिया। पूछा- "दर्द हो गया क्या?"
कल उसका हाथ जहाँ से कट गया था, वहाँ से फिर रक्त बहने लगा।
अफ़सोस से महेन्द्र ने कहा- "ग़लती हो गई, मैं भूल गया था। लेकिन मैं आज वहाँ पर पट्टी बाँधकर ही रहूँगा।"
विनोदिनी बोली- "नहीं-नहीं, कुछ नहीं हुआ। दवा मैं नहीं लगाती।"
महेन्द्र बोलीं- "क्यों?"
विनोदिनी ने कहा- "तुम्हारी डॉक्टरी की मुझे ज़रुरत नहीं। जैसा है, वैसा ही रहे।"
महेन्द्र तुरन्त गम्भीर हो गया। मन-ही-मन बोला-"औरत का मन समझ पाना बहुत ही मुश्किल है।"
विनोदिनी उठ खड़ी हुई। रूठे महेन्द्र ने रोकने की कोशिश न की। केवल पूछा- "जा कहाँ रही हो?"
विनोदिनी बोली- "काम है।"
कहकर वह धीरे-से चली गई।
महेन्द्र एक मिनट तो बैठा रहा, फिर उसे लौटाने के लिए तेज़ी से लपका। लेकिन सीढ़ी तक ही बढ़कर लौट आया और छत पर जाकर टहलने लगा। विनोदिनी प्रतिपल उसे खींचा भी करती, मगर पास नहीं फटकने देती। कोई उसे जीत नहीं सकता, महेन्द्र को इस बात का नाज़ था। इस नाज़ को आज उसने तिलांजलि दे दी। लेकिन औरों को वह जीत सकता है क्या-उसका यह गर्व भी अब नहीं रहने का? आज उसने हार मान ली, पर हरा न सका। दिल की बाबत महेन्द्र का सिर सदा ऊँचा रहा था, वह अपना सानी नहीं समझता था- लेकिन उसी बात में उसे अपना सिर मिट्टी में गाड़ना पड़ा। अपनी जो ऊँचाई उसने खो दी, उसके बदले कुछ पाया भी नहीं।
फागुन-चैत में बिहारी की ज़मींदारी से सरसों के फूल का शहद आता है और हर साल वह राजलक्ष्मी के लिए शहद भेजा करता था। इस बार भी भेज दिया।
शहद का मटका विनोदिनी खुद राजलक्ष्मी के पास ले गई। कहा- "बुआ, बिहारी भाई साहब ने भिजवाया है।"
राजलक्ष्मी ने उसे भण्डार में रख देने को कहा। बोली- "बिहारी बाबू, तुम लोगों की खोज-खबर में कभी नहीं चूकते। बेचारे की माँ नहीं, तुम्हें ही माँ मानते हैं।"
राजलक्ष्मी बिहारी को महेन्द्र की ऐसी एक छाया समझा करती थीं कि उसके बारे में विशेष कुछ जानती न थीं। वह उसका बिना दाम का, बिना जतन का और बिना चिन्ता का फरमाबरदार था। विनोदिनी ने उन्हें उसकी माँ के बारे में जो बताया, वह बात उनके मर्म को छू गई। सहसा उन्हें लगा- 'सच ही, बिहारी की माँ नहीं, वह मुझे ही माँ मानता आया है। याद आया, दु:ख परेशानी में, रोग-शोक में बिना बुलाए, बिहारी सदा चुपचाप निष्ठा के साथ उनकी सेवा करता आया है। उन सेवाओं को राजलक्ष्मी नि:श्वास-प्रश्वास की तरह ग्रहण करती रही हैं और उनके लिए किसी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की बात उनके मन में भी न आई। लेकिन बिहारी की खोज-खबर किसी ने न रखी? अन्नपूर्णा जब तक थीं, खोज-खबर रखती थीं।' राजलक्ष्मी सोचा करती थीं कि बिहारी को वश में रखने के लिए अन्नपूर्णा आडम्बर फैलाती है। उसाँस लेकर राजलक्ष्मी ने कहा- "बिहारी कोख के लड़के-जैसा ही है।"
कहते ही उनके जी में आया कि बिहारी अपने लड़के से भी ज़्यादा करता है और उसने अपनी भक्ति सदा एक-सी रखी। ख्याल आते ही एक लम्बा नि:श्वास बरबस उनके अन्तर से निकल पड़ा। विनोदिनी बोली- "उन्हें तुम्हारे हाथ की रसोई बड़ी प्रिय है।"
स्नेह-भरे गर्व से राजलक्ष्मी बोलीं- "मछली का शोरबा तो उसे और किसी के हाथ का रुचता ही नहीं।"
कहते-कहते उसे याद आया- "उधर बहुत दिनों से बिहारी नहीं आया।"
विनोदिनी ने कहा- "यही तो मैं सोच रही थी, बुआ! मगर विवाह के बाद आपके बेटे बहू को लेकर इस क़दर डूब गए हैं कि हित-मित्र कोई आकर भी क्या करे?" बात राजलक्ष्मी को ठीक लगी। बीवी को पाकर महेन्द्र ने अपने सारे हितैषियों को दूर हटा दिया। बिहारी का रूठना तो ठीक ही है- आए भी क्यों वह? बिहारी को अपनी ही जमात का आदमी समझकर उसके प्रति उनकी संवेदना बढ़ गई। वह विस्तार से विनोदिनी को बताने लगी कि छुटपन से बिहारी ने बिना किसी स्वार्थ के महेन्द्र का कितना उपकार किया है, उसके लिए कितनी बार कितनी तकलीफें झेली हैं उसने- और, बेटे के लिए उन्हें अपनी जो शिकायत थी, बिहारी के विवरण से वह उसका समर्थन करने लगी। कुछ दिनों में अपनी बहू को पाकर महेन्द्र अगर अपने सदा के साथी की ऐसी उपेक्षा करे, तो दुनिया में न्याय-धर्म फिर कहाँ रहा?
विनोदिनी बोली- "कल रविवार है। तुम बिहारी बाबू को भोजन पर आमंत्रित करो। वह खुश हो जाएगा।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "ठीक कहा तुमने महेन्द्र के हाथ से कहकर किसी से न्योता भिजवा देते हैं।"
विनोदिनी- "नहीं, न्योता तुम खुद भेजो, बुआ।"
राजलक्ष्मी- "तुम्हारी तरह मैं क्या लिखना-पढ़ना जानती हूँ।"
विनोदिनी- "न सही, तुम्हारी तरफ से मैं ही लिखे देती हूँ।"
राजलक्ष्मी के नाम से विनोदिनी ने खुद लिखकर न्योता भेजा।
रविवार महेन्द्र के बड़े आग्रह का दिन होता। पिछली रात से ही उसकी कल्पना उद्दाम हो उठती- जो कि आज तक उसकी उम्मीद के अनुरूप हुआ कुछ भी न था। तो भी इतवार के सवेरे की आभा उसकी ऑंखों में अमृत बरसाने लगी। जागे हुए शहर की सारी हलचल अनोखे संगीत- जैसी उसके कानों में प्रवेश करने लगी।
मगर माजरा क्या है? आज कोई व्रत है माँ का? और दिन जैसा करती रही हैं, आज तो वह घर के काम-काज का ख़ास भार विनोदिनी पर सौंपकर निश्चिन्त नहीं है। आज खुद भी बहुत व्यस्त हैं वे। इसी हंगामे में दस बज गए। इस बीच किसी भी बहाने महेन्द्र एक पल के लिए भी विनोदिनी से न मिल सका। किताब में मन लगाना चाहा, बिल्कुल न लगा। अखबार के एक विज्ञापन पर नाहक ही पन्द्रह मिनट तक नज़र गड़ाए रहा। आखिर न रहा गया। नीचे गया। देखा, माँ खुद रसोई कर रही हैं और कमरे में ऑंचल बाँधे विनोदिनी उनकी मदद कर रही है। महेन्द्र ने पूछा- "बात क्या है आज? बड़ी धूम-धाम है।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "बहू ने बताया नहीं तुम्हें? आज बिहारी को खाने के लिए बुलाया है।"
"बिहारी को निमंत्रण!" महेन्द्र को सुनकर बहुत ख़राब लगा। उसने तुरन्त कहा- "मैं घर पर नहीं रहूँगा माँ।" राजलक्ष्मी- "क्यों?"
महेन्द्र- "मुझे बाहर जाना है।"
राजलक्ष्मी- "खा-पीकर जाना। ज़्यादा देर न होगी।"
महेन्द्र- "मुझे भोजन के लिए निमंत्रण है।"
कनखियों से उसे देखकर विनोदिनी बोली- "दावत है, तो जाने दो, बुआ! न हो बिहारी बाबू अकेले ही खा लेंगे।"
लेकिन अपने हाथ से जतन से पकाएँ और महेन्द्र न खाए, यह उन्हें कैसे बर्दाश्त हो! वह जितना भी आग्रह करने लगीं, महेन्द्र उतना ही टालने लगा।- इस तरह नाराज महेन्द्र ने माँ को सज़ा देने की ठानी। राजलक्ष्मी की इच्छा हुई, रसोई छोड़कर चल दें। विनोदिनी बोलीं- "तुम फ़िक्र न करो, बुआ- भाई साहब यह सब बेकार की बातें कर रहे हैं- आज वह दावत पर हर्गिज़ नहीं जाएँगे।"
राजलक्ष्मी गर्दन हिलाकर बोलीं। "नहीं-नहीं बिटिया, तुम महेन्द्र को नहीं जानतीं। वह एक बार जो तय कर लेता है, उससे नहीं डिगता।" लेकिन साबित यही हुआ कि विनोदिनी महेन्द्र को राजलक्ष्मी से कम नहीं जानती। महेन्द्र ने समझा था कि बिहारी को विनोदिनी ने ही न्योता भिजवाया है। इससे उसका जी डाह से जितना जलने लगा, उतना ही उसके लिए बाहर जाना कठिन हो गया। बिहारी क्या करता है, विनोदिनी क्या करती है, यह देखे बिना वह भला जिए कैसे? देखकर जलना ही पड़ेगा, फिर भी देखना ज़रूरी था। आज बहुत दिनों के बाद एक निमंत्रित आत्मीय की तरह बिहारी महेन्द्र के अन्त:पुर में आया। छुटपन से ही जो घर उसका जाना-पहचाना रहा है, घर के लड़के ही तरह जहाँ उसने बचपन की शरारतें की हैं, उसी द्वार पर आकर आज वह ठिठक गया। उसके अन्तर के दरवाज़े पर ऑंसू की एक लहर उमड़ उठने के लिए आघात करने लगी। उस चोट कसे पीकर होठों में हँसी लिये अन्दर गया और तुरन्त नहाकर आई राजलक्ष्मी को प्रणाम करके उनके चरणों की धूल ली। जिन दिनों बिहारी हरदम वहाँ आया-जाया करता था, ऐसे प्रणाम की प्रथा न थी। आज मानो वह सुदूर प्रवास से घर लौटा हो। प्रणाम करके उठते ही स्नेह से राजलक्ष्मी ने उसके सिर पर स्पर्श किया।
आज गहरी संवेदनाओं के साथ राजलक्ष्मी ने बिहारी के प्रति पहले से ज़्यादा स्नेह जताया। कहा- "बिहारी, तू इतने दिनों से यहाँ क्यों नहीं आया? मैं रोज़ ही सोचती थी, आज ज़रूर आएगा, मगर तेरा पता नहीं?"
बिहारी ने हँसकर कहा- "रोज़ आता होता, तो माँ रोज तुम अपने बिहारी को याद नहीं करतीं। कहाँ हैं महेन्द्र भैया?"
राजलक्ष्मी उदास होकर बोलीं- "जाने कहाँ आज दावत है उसकी, रुक न सका।"
सुनकर बिहारी का मन परेशान हो गया। 'छुटपन की मैत्री का आखिर यह अंजाम? एक लम्बा नि:श्वास छोड़कर मन से सारे विषाद को हटा देने की कोशिश करता हुआ बोला- "अच्छा, क्या-क्या बना है।" और वह अपने प्रिय व्यंजनों की बात पूछने लगा।
इतने में महेन्द्र ने आकर सूखे स्वर में पूछा-"बिहारी, कैसे हो?"
राजलक्ष्मी बोलीं- "दावत में नहीं गए?"
शर्म छिपाते हुए महेन्द्र बोला- "नहीं, गया।"
विनोदिनी नहाकर आई, तो पहले तो बिहारी कुछ बोल ही न सका। विनोदिनी और महेन्द्र को जिस रूप में वह देख गया था, वह हृदय में अंकित ही था। विनोदिनी उसके क़रीब आकर बोली- "क्यों भाई साहब, मुझे भूल गए हैं क्या?"
बिहारी बोला- "सबको पहचाना जा सकता है क्या?"
विनोदिनी ने कहा- "अगर थोड़ा-सा विचार हो तो जा सकता है।"
और उसने बुआ को पुकारकर कहा- "बुआ, खाना तैयार है।"
महेन्द्र और बिहारी खाने बैठ गए। राजलक्ष्मी पास बैठकर देखने लगीं।
महेन्द्र का ध्यारन खाने पर न था। वह परोसने के पक्षपात पर गौर कर रहा था। उसे लगा, बिहारी को भोजन परोसते हुए विनोदिनी को मानो एक ख़ास आनन्द मिल रहा है। बिहारी की पत्तल पर ही दही की मलाई और रोहू मछली का सिर डाला गया। पर चूँकि वह मेज़बान था इसलिए शिकायत की कोई गुंजाइश नहीं थी। मौसम न होने पर भी तपसी मछली मिल गई थी। उनमें से एक थी अण्डे वाली। विनोदिनी उसे बिहारी की पत्तल पर परोसने जा रही थी कि उसने कहा- "महेन्द्र भैया को दो, उन्हें बड़ी प्रिय है यह।"
महेन्द्र तीखी दबी खीझ से बोल उठा- "नहीं-नहीं, मुझे नहीं चाहिए।"
विनोदिनी ने दूसरी बार उससे अनुरोध नहीं किया और उसे बिहारी की पत्तल पर डाल दिया।
खाना खत्म हुआ। दोनों दोस्त बाहर निकले। विनोदिनी आकर बोली, "बिहारी बाबू चले मत जाना, चलिए, ऊपर के कमरे में बैठिए ज़रा देर।" बिहारी ने पूछा- "और तुम नहीं खाओगी।"
विनोदिनी बोली- "आज मेरा एकादशी का व्रत है।"
तीखे व्यंग्य की एक हल्की हास्य-रेखा बिहारी के होठों के किनारों पर खेल गई।
हँसी की यह लकीर विनोदिनी की निगाह से छिपी न रही, लेकिन जिस तरह वह हाथ के जख्म को सह गई थी- इसे भी पी गई। निहोरा करती हुई बोली- "मेरे सिर की कसम, चलो, बैठो!" महेन्द्र अचानक अजीब ढंग से गर्म हो उठा। बोला-"अक्ल से तो कोई वास्ता ही नहीं- काम-धाम पड़ा रहे, ख्वा हिश हो या न हो, बैठना ही पड़ेगा। इतनी ज़्यादा खातिरदारी का मतलब मेरी समझ में नहीं आया।" विनोदिनी ठठाकर हँस पड़ी। बोली- "भाई साहब, खातिरदारी शब्द का कोश में दूसरा कोई मतलब नहीं।"
फिर महेन्द्र से कहा- "कहने को चाहे जो कहो भाई साहब, खातिरदारी का मतलब छुटपन से जितना तुम समझते हो, शायद ही कोई समझता हो।" बिहारी बोला- "महेन्द्र भैया, एक बात है, सुन जाओ जरा!"
बिहारी ने विनोदिनी से विदा न माँगी और महेन्द्र के साथ बाहर चला गया। बरामदे पर खड़ी विनोदिनी चुपचाप सूने ऑंगन को ताकती रही।
बाहर जाकर बिहारी ने कहा- "भैया, एक बात का मैं खुलासा करना चाहता हूँ, हमारी दोस्ती क्या यहीं खत्म हो गई?"
उस समय महेन्द्र के कलेजे में आग लग रही थी। विनोदिनी का व्यंग्य बिजली की लपट-सा उसके दिमाग के एक सिरे से दूसरे सिरे तक लपकता हुआ बार-बार उसे वेधा रहा था। वह बोला- "इस बात के फैसले से शायद ही तुम्हें कुछ लाभ हो, पर मेरे लिए यह काम्य नहीं। अपनी दुनिया में मैं किसी बाहरी आदमी का प्रवेश नहीं चाहता। अन्त:पुर को मैं अन्त:पुर रखना चाहता हूँ।" बिहारी ने कुछ नहीं कहा। चला गया।
ईर्ष्या के दाह से जर्जर महेन्द्र ने एक बार प्रतिज्ञा की- "विनोदिनी से मैं नहीं मिलूँगा।" और फिर उससे मिलने की उम्मीद में वह घर-बाहर, ऊपर-नीचे छटपटाता हुआ चक्कर काटता रहा। आशा ने एक दिन अन्नपूर्णा से पूछा- "अच्छा मौसी, मौसाजी तुम्हें याद आते हैं?"
अन्नपूर्णा बोलीं- "महज ग्यारह साल की उम्र में मैं विधवा हुई, पति की सूरत मुझे छाया-सी धुँधली याद है।" आशा ने पूछा- "फिर तुम किसकी बात सोचती हो?"
अन्नपूर्णा हँसकर बोलीं- "अब मैं उन भगवान की याद करती हूँ जिनमें मेरे पति हैं।"
आशा ने पूछा- "इससे तृप्ति होती है?"
स्नेह से आशा के माथे पर हाथ फेरते हुए अन्नपूर्णा ने कहा- "मेरे मन की तू क्या समझेगी बिटिया!"
आशा अपने मन में सोचने लगी- "और मैं जिनकी बात आठों पहर सोचा करती हूँ, वे क्या मेरे मन की नहीं जानते! मैं ठीक से चिट्ठी नहीं लिख सकती, इसीलिए उन्होंने मुझे पत्र लिखना बन्द क्यों कर दिया?" इधर कुछ दिनों से उसे महेन्द्र की चिट्ठी नहीं मिली। एक उसाँस लेकर आशा ने मन में सोचा- 'इस वक्त मेरी ऑंख की किरकिरी पास रही होती, तो मेरे मन की बात चिट्ठी में ठीक-ठीक लिख देती।' 'अच्छी तरह से न लिखी गई चिट्ठी का कोई मोल पति के लिए न होगा', यह सोचकर आशा ने चिट्ठी नहीं लिखी। जितना ही जतन से लिखना चाहती उतना ही चिट्ठी बिगड़ जाती। मन की बातों को जितना ही सुलझा-सहेजकर लिखना चाहती, उसकी पंक्तियाँ पूरी न पड़तीं। अगर सिर्फ एक शब्द, 'मेरे देवता', लिखने से ही अन्तर्यामी की नाईं महेन्द्र सब-कुछ समझ सकता, तो आशा का पत्र लिखना सार्थक हो सकता था। ईश्वर ने प्रेम दिया है, थोड़ी-सी भाषा क्यों न दी?
संध्यार की आरती के बाद अन्नपूर्णा मन्दिर से लौटीं, तो आशा धीरे-धीरे उनके पैर सहलाने लगी। बड़ी देर तक सन्नाटा रहा। उसके बाद आशा बोली- "अच्छा मौसी, तुम तो कहती हो कि देवता के समान पति की सेवा करना स्त्री का धर्म है, लेकिन जो स्त्री मूर्ख हो, जिसे बुध्दि न हो, जिसे यह न मालूम हो कि पति की सेवा कैसे करनी चाहिए, वह क्या करे?" अन्नपूर्णा देर तक आशा की ओर देखती रहीं। एक लम्बी साँस छोड़कर बोलीं- "मूर्ख तो मैं भी हूँ बिटिया, मगर फिर भी तो भगवान की सेवा करती हूँ।"
आशा ने कहा- "भगवान तो तुम्हारे मन को समझते हैं, तभी वे खुश होते हैं। लेकिन यों समझो, स्वामी अगर मूर्ख स्त्री की सेवा से संतुष्ट न हो?"
अन्नपूर्णा ने कहा- "सबको खुश करने की शक्ति सबमें नहीं होती, बेटी। लेकिन स्त्री अगर तहेदिल से श्रद्धा और भक्तिपूर्वक पति की सेवा और गृहस्थी के काम करती है, तो पति चाहे नाचीज़ समझकर उसे ठुकरा दे, स्वयं जगदीश्वर जतन से उसे चुन लेते हैं।"
जवाब में आशा चुप रही। मौसी द्वारा दी गई सांत्वना को उसने अपनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन यह बात, उसके दिमाग में हर्गिज़ न बैठ सकी कि पति जिसे नाचीज़ समझकर ठुकरा देंगे, उसे जगदीश्वर सार्थक कर सकेंगे। वह सिर झुकाए मौसी के पाँव सहलाती रही।
अन्नपूर्णा ने इस पर आशा को अपने और क़रीब खींच लिया। उसके माथे को चूमा। रुँधे कण्ठ को बलपूर्वक खोलकर बोली- "चुन्नी, तकलीफ झेलकर जीवन में जो सबक सीखा जा सकता है, केवल सुनकर वह सम्भव नहीं। तेरी इस मौसी ने भी तेरी उम्र में संसार से लेन-देन का बहुत बड़ा नाता जोड़ लिया था। उस समय मेरे भी जी में तेरी ही तरह होता था कि जिसकी मैं सेवा करूँगी, वह आखिर सन्तुष्ट क्यों न होगा। जिसकी पूजा करूँगी, उसका प्रसाद भला क्यों न मिलेगा? जिसके भले की करूँगी, वह मेरी चेष्टा को भली क्यों न समझेगा? लेकिन हर क़दम पर देखा, वैसा होता नहीं है। और अन्त में एक दिन दुनिया को छोड़कर चली आई। और आज यह पा रही हूँ कि मेरा कुछ भी बेकार नहीं हुआ। असल में बिटिया जिससे लेन-देन का सही सम्बन्ध है, जो संसार की इस पैंठ के असली महाजन हैं, वही मेरा सब-कुछ स्वीकार कर रहे हैं, आज मेरे अन्तर में बैठकर उन्होंने यह बात कबूल की है, काश! तब यह जानती होती! अगर संसार के कर्म को उनका समझकर करती, उन्हीं को दे रही हूँ यह समझकर संसार को अपना हृदय देती तो फिर कौन था जो मुझे दु:ख दे सकता है!"
बिस्तर पर पड़ी-पड़ी आशा बड़ी रात तक बहुत बातें सोचती रही। लेकिन तो भी ठीक-ठीक कुछ न समझ सकी।
आशा के बड़े चाचा के लौट जाने का दिन आया। जाने के पहले दिन शाम को अन्नपूर्णा ने आशा को अपनी गोदी में बिठाकर कहा- "चुन्नी, मेरी बिटिया, संसार के शोक-दु:ख से सदा तुझे बचाते रहने की शक्ति मुझमें नहीं है। मेरा इतना ही कहना है कि जहाँ भी, जितना भी कष्ट क्यों न मिले, अपने विश्वास, अपनी भक्ति को दृढ़ रखना, तेरा धर्म जिससे अटूट रहे।"
आशा ने उनके चरणों की धूल ली। बोली- "आशीर्वाद दो मौसी! ऐसा ही हो।"

31
आशा लौट आई। रूठकर विनोदिनी ने कहा- "भई किरकिरी, इतने दिन पीहर रही, खत लिखना भी पाप था क्या?" आशा बोली- "और तुमने तो लिख दिया जैसे!"
विनोदिनी- "मैं पहले क्यों लिखती, पहले तुम्हें लिखना था।"
विनोदिनी के गले से लिपटकर आशा ने अपना कसूर मान लिया। बोली- "जानती तो हो, मैं ठीक-ठीक लिख नहीं पाती। ख़ासकर तुम-जैसी पंडिता को लिखने में शर्म आती है।"
देखते-ही-देखते दोनों का विषाद मिट गया और प्रेम उमड़ आया। विनोदिनी ने कहा- "आठों पहर साथ रहकर तुमने अपने पति-देवता की आदत बिलकुल बिगाड़ रखी है। कोई हरदम पास न रहे, तो रहना मुश्किल।"
आशा- "तभी तो तुम पर ज़िम्मेदारी सौंप गई थी। और साथ कैसे दिया जाता है, यह तुम मुझसे ज़्यादा अच्छी तरह से जानती हो।"
विनोदिनी- "दिन को तो किसी तरह से कॉलेज भेजकर निश्चिं‍त हो जाती थी- मगर साँझ को किसी भी तरह से छुटकारा नहीं किताब पढ़कर सुनाओ, और-और न जाने क्या-क्या? पूछो मत, मचलने का तो अन्त नहीं।"
आशा- "आई न काबू में! जब जी बहलाने में पटु हो, तो लोग छुट्टी क्यों दें?"
विनोदिनी- "मगर सावधान बहन, भाई साहब कभी-कभी तो ऐसी अति कर बैठते हैं कि धोखा होने लगता है, शायद मैं जादू-मन्तर जानती हूँ।" आशा- "जादू तुम नहीं जानतीं तो कौन जानता है! तुम्हारी विद्या जरा मुझे आ जाती, तो जी जाती मैं।"
विनोदिनी- "क्यों, किसके बंटाधार का इरादा है! जो सज्जन घर में है, उन पर रहम करके किसी और को मोहने की कोशिश भी न करना।"
विनोदिनी को तर्जनी दिखाकर आशा बोली- "चुप भी रह, क्या बक-बक करती है!"
काशी से लौटने के बाद पहली बार आशा को देखकर महेन्द्र ने कहा- "तुम्हारी सेहत तो पहले से अच्छी हो गई है। काफ़ी तन्दुरुस्त होकर लौटी हो।" आशा को बड़ी शर्म आई। उसकी सेहत अच्छी नहीं रहनी चाहिए थी- मगर उस गरीब का बस नहीं चलता।
आशा ने धीमे-से पूछा- "तुम कैसे रहे?"
पहले की बात होती तो महेन्द्र कुछ तो मज़ाक और कुछ मन से कहता- 'मरा-मरा'। मगर अभी मज़ाक करते न बना- गले तक आकर अटक गया। कहा- "बेजा नहीं अच्छा ही था।"
आशा ने गौर किया, महेन्द्र पहले से कुछ दुबला ही हो गया है। चेहरा पीला पड़ गया है, ऑंखों में कैसी एक तेज़ चमक है। कोई भीतरी भूख मानो आग की जीभ से उसे चाटे जा रही हो। आशा पीड़ित होकर सोचने लगी-"स्वामी अपने दुरुस्त नहीं रहे यहाँ, मैं क्यों काशी चली गई। पति दुबले हो गए और खुद वह तगड़ी हो गई"-इसके लिए उसने अपनी सेहत को धिक्कारा।
महेन्द्र देर तक सोचता रहा कि अब कौन-सी बात की जाए। बोला- "चाची मजे में हैं।"
उत्तर में कुशल-क्षेम पाकर पूछने को दूसरी बात मन में लाना उसके लिए मुहाल हो गया। पास ही एक फटा-पुराना अखबार पड़ा था, उसे उठाकर वह अनमना-सा पढ़ने लगा। आशा सिर झुकाए सोचने लगी, 'इतने दिनों के बाद भेंट हुई, लेकिन उन्होंने मुझसे ठीक से बात क्यों नहीं की? बल्कि लगा, मेरी ओर उनसे ताकते भी न बना।'
महेन्द्र कॉलेज से लौटा। जल-पान करते समय राजलक्ष्मी थीं। आशा भी घूँघट निकाले पास ही दरवाज़ा पकड़े खड़ी थी- लेकिन और कोई न था।
राजलक्ष्मी ने परेशान-सी होकर पूछा- "आज तेरी तबीयत कुछ ख़राब है क्या, महेन्द्र?"
जैसे ऊब गया हो, महेन्द्र बोला- "नहीं ठीक है।"
राजलक्ष्मी- "फिर तू कुछ खा क्यों नहीं रहा है?"
महेन्द्र फिर खीझे हुए स्वर में बोला- "खा तो रहा हूँ- और कैसे खाते हैं?"
गर्मी की साँझ। बदन पर एक हल्की चादर डाल महेन्द्र छत पर इधर-उधर घूमने लगा। बड़ी उम्मीद थी कि इधर जो पढ़ाई नियम से चल रही थी, वह वैसी ही चलेगी। 'आनन्दमठ' लगभग खत्म हो चला है। गिने-चुने कुछ अध्याेय रह गए थे। यों जितनी भी निर्दयी हो विनोदिनी, ये बाकी अध्यादय वह ज़रूर पढ़कर सुनाएगी। लेकिन शाम हो गई और महेन्द्र को कुछ हासिल न हुआ तो वह सोने चला गया। सजी-सँवरी शरमाई आशा धीरे-धीरे कमरे में आई। देखा, महेन्द्र बिस्तर पर सोया है। वह यह न सोच पाई कि किस तरह से आगे बढ़े। जुदाई के बाद ज़रा देर के लिए एक नई लज्जा होती है- जहाँ पर से जुदा होते हैं, दोनों, ठीक वहाँ पर मिलने से पहले एक-दूसरे को नए सम्भाषण की उम्मीद होती है। अपनी उस चिरपरिचिता सेज़ पर आशा आज बेबुलाए कैसे जाय? दरवाज़े के पास देर तक खड़ी रही। महेन्द्र की कोई आहट न मिली। धीमे-धीमे पग-पग बढ़ी। अचानक किसी गहने की आवाज़ हो उठती तो मारे शर्म के मर-सी जाती। धड़कते हृदय से वह मच्छरदानी के पास जा खड़ी हुई। लगा, महेन्द्र सो गया है। उसका सारा साज-शृंगार उसे सर्वांग के बन्धन-सा लगा। उसकी यह इच्छा होने लगी कि बिजली की गति से भाग जाय और जाकर और कहीं सो रहे।
अपने जानते भरसक चुपचाप संकुचित होकर आशा बिस्तर पर गई। फिर भी इतनी आवाज़ ज़रूर हुई कि महेन्द्र अगर सचमुच ही सोया होता, तो जग पड़ता। लेकिन आज उसकी ऑंखें न खुलीं, क्योंकि दरअसल वह सो नहीं रहा था। वह पलंग के एक किनारे करवट लिये पड़ा था। लिहाज़ा आशा उसके पीछे लेट गई। पड़ी-पड़ी आशा ऑंसू बहा रही थी। उधर मुँह करके सोने के बावजूद महेन्द्र को इसका साफ़ पता चल रहा था। अपनी बेरहमी से वह चक्की की तरह कलेजे को पीसकर दुखा रहा था। लेकिन वह क्या कहे, कैसे स्नेह जताए- यह उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था।
लेकिन आशा ने खुद ही उसकी यह मुसीबत भगा दी। वह तड़के ही अपमानित साज-शृंगार लिये उठकर चली गई। वह भी महेन्द्र को अपना मुँह न दिखा सकी।
32
आशा सोचने लगी- 'लेकिन ऐसा क्यों हुआ है?' मैंने क्या किया? लेकिन असली आफत जहाँ थी, वहाँ उसकी नजर न पड़ी। महेन्द्र विनोदिनी को प्यार कर सकता है, इसकी सम्भावना तक उसके मन में न आ सकी थी। दुनिया के अनुभव उसे कुछ थे नहीं। उसके सिवा विवाह के कुछ ही दिन बाद से महेन्द्र को जैसा समझ लिया था, वह उसके सिवा भी कुछ हो सकता है, इसकी उसने कल्पना भी न की थी। महेन्द्र आज कुछ पहले ही कॉलेज गया। कॉलेज जाते वक्त आशा सदा खिड़की के पास आ खड़ी होती और महेन्द्र गाड़ी में से एक बार झाँक लेता- यह उसका सदा का नियम था। इसी आदत के मुताबिक यन्त्रवत वह खिड़की के सामने आ खड़ी हुई। अभ्यासवश महेन्द्र ने भी एक बार निगाह उठाकर ताका। देखा, आशा खिड़की पर खड़ी है- देखते ही महेन्द्र नज़र झुकाकर अपनी गोद में रखी किताबें देखने लगा। ऑंखों में वह नीरव भाषा कहाँ थी, कहाँ थी वह बोलती हुई मुस्कान!
गाड़ी निकल गई। आशा वहीं ज़मीन पर बैठ गई। यह दुनिया, यह गिरस्ती- सबका स्वाद फीका पड़ गया। अचानक आशा को लगा- 'हाँ, समझी। बिहारी बाबू काशी गए थे, यही सुनकर शायद वे नाराज़ हैं। इसके सिवा और तो कोई अप्रिय घटना इस बीच नहीं घटी। मगर इसमें मेरा क्या कसूर!'
सोचते-सोचते एक बार अचानक मानो उसके दिल की धड़कन बन्द हो गई। उसे सन्देह हुआ, शायद महेन्द्र को यह शंका हो गई कि बिहारी के काशी जाने में उसकी भी साँठ-गाँठ थी। राम-राम! ऐसी शंका! शर्म की हद!
महेन्द्र अचानक गाड़ी से झाँककर आशा का जो मलिन करुण मुखड़ा देख गया, उसे वह दिन-भर अपने मन से न मेट सका। कॉलेज के लेक्चरों, छात्रों की कतारों में वह खिड़की, आशा का वह सूखा-रूखा चेहरा, बिखरे बाल, मैली धोती और वह आकुल-व्याकुल दृष्टि बार-बार साफ़ लकीरों में खिंच-खिंच आने लगी।
कॉलेज का काम खत्म करके वह गोलदिग्घी के किनारे टहलने लगा। शाम हो गई। वह फिर भी तय न कर सका कि आशा से कैसा बर्ताव किया जाए- दयापूर्ण छल या कपटरहित निष्ठुरता, कौन-सा उचित है? विनोदिनी का वह त्याग करे, या न करे यह बात ही मन में न आई। दया और प्रेम-दोनों का दावा वह कैसे करे?
आखिर उसने यह कहकर अपने मन को समझाया कि आज भी आशा के प्रति उसका जो प्रेम है, वह बहुत ही कम स्त्रियों को नसीब होता है। वह स्नेह, वह प्रेम मिलता रहे, तो आशा सन्तुष्ट क्यों न रहेगी? विनोदिनी और आशा, दोनों को जगह देने की योग्यता महेन्द्र के प्रशस्त हृदय में है। विनोदिनी से उसका सम्बन्ध जिस पवित्रा प्रेम का है, उससे दाम्पत्य में किसी तरह की ऑंच न आएगी।
मन को इस तरह समझाकर उसने एक भार उतार फेंका। 'दोनों में से किसी को छोड़े बिना दो चन्द्रमा वाले ग्रह की तरह वह मजे में जीवन के दिन काट लेगा', यह सोचकर उसका जी खिल उठा। यह सोचकर वह तेजी से क़दम बढ़ाता हुआ घर की ओर चल पड़ा कि आज जरा पहले ही वह बिस्तर पर जा लेटेगा और स्नेह-जतन से, मीठे वचन से आशा के मन की सारी वेदना धो देगा।
उसके खाने के समय आशा मौजूद न थी-' लेकिन सोने तो आएगी ही,' यह सोचकर महेन्द्र बिस्तर पर लेट गया। लेकिन उस सन्नाटे में सूनी सेज पर किस स्मृति ने महेन्द्र के मन को छा लिया? 'विषवृष' के लिए विनोदिनी से उस दिन की छीना-झपटी याद आई। साँझ के बाद विनोदिनी 'कपालकुण्डला' पढ़कर सुनाना शुरू करती- धीरे-धीरे रात हो आती, घर के सारे लोग सो जाते, सूने कमरे की स्तब्ध निर्जनता विनोदिनी की आवाज़-आवेश से मानो धीमी हो आती, रुँध-सी जाती; अचानक वह अपने को जब्त करके उठ खड़ी होती, किताब रख देती- महेन्द्र कहता, "चलो, मैं तुम्हें सीढ़ी तक छोड़ आऊँ।" ये बातें याद आने लगीं और सर्वांग में सिहरन होने लगी। रात क्रमश: ज़्यादा होने लगी- महेन्द्र को रह-रहकर आशंका होने लगी, अब आशा आएगी, अब आएगी। लेकिन वह न आई। महेन्द्र ने सोचा, मैं तो अपने कर्तव्य के लिए तैयार था, अब अगर वह नाहक ही नाराज होकर न आए तो मैं क्या करूँ? और गहरी रात में उसने विनोदिनी के ध्याहन को गाढ़ा कर लिया।
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Postby Jemsbond » 20 Jun 2016 13:42

जब एक बज गया, तो महेन्द्र से न रहा गया। मसहरी हटाकर वह बाहर निकला। छत पर गया। देखा, चाँदनी रात बड़ी ही सुहानी हो रही है। महेन्द्र की जमाने से रुकी पड़ी आकांक्षा अब अपने-आपको न रोक सकी। जब से आशा आई, विनोदिनी की झलक भी न दिखाई दी। चाँदनी से उमगी सूनी रात महेन्द्र को मोह से आच्छन्न करके विनोदिनी की तरफ ठेलकर ले जाने लगी। महेन्द्र नीचे उतरा। विनोदिनी के कमरे के पास गया। देखा, कमरा बन्द नहीं है। अन्दर गया। सेज बिछी थी, उस पर कोई सोया न था। कमरे में आहट पाकर दक्खिन वाले खुले बरामदे से विनोदिनी ने पूछा- "कौन है?" रुँधे हुए गीले स्वर से महेन्द्र बोला- "मैं हूँ, विनोद।"
और महेन्द्र सीधा बरामदे में पहुँच गया।
गर्मी की रात। बरामदे में चटाई डालकर विनोदिनी के साथ राजलक्ष्मी सोई थीं। उन्होंने कहा- "महेन्द्र, इतनी रात को तू यहाँ कैसे?"
अपनी काली घनी भौंहों के नीचे से विनोदिनी ने महेन्द्र पर वज्र-कटाक्ष डाला। महेन्द्र ने कोई जवाब न दिया। तेजी से वहाँ से चला गया।
33
दूसरे दिन सुबह से ही घटा घुमड़ी रही। कुछ देर बेहद गर्मी थी, फिर काले-काजल से मेघों में से झुलसा आकाश जुड़ गया। आज महेन्द्र समय से पहले ही कॉलेज चला गया। बदले हुए कपड़े फर्श पर पड़े थे। आशा गिन-गिनकर कपड़े धोबी को देने लगी। हिसाब लिखकर रखने लगी।
महेन्द्र ज़रा लापरवाह है। इसी से आशा को हिदायत थी कि धोबी को कपड़े देते वक्त जेब ज़रूर देख लिया करे। आशा ने उसके एक कुरते की जेब में हाथ डाला कि एक चिट्ठी मिली। वह चिट्ठी अगर ज़हरीला नाग बनकर उसी क्षण आशा की उँगली को काट खाती, तो अच्छा था, क्योंकि तीखा ज़हर शरीर में फैल जाता और कुछ ही मिनटों में शायद उसका काम तमाम कर देता; लेकिन ज़हर मन में फैलता है तो मौत की पीड़ा तो होती है, मौत नहीं होती।
खुली चिट्ठी। निकालकर देखा तो विनोदिनी की लिखावट। पलक मारते आशा का चेहरा पीला पड़ गया। उस चिट्ठी को उसने बगल के कमरे में ले जाकर पढ़ा। "कल रात तुमने जो हरकत की, उससे भी जी न भरा? आज फिर तुमने नौकरानी के हाथ छिपाकर मुझे पत्र भेजा। छि:, उसने मन में क्या समझा होगा! दुनिया में मुझे किसी को भी मुँह दिखाने लायक़ नहीं रहने दोगे तुम?
"मुझसे तुम क्या चाहते हो? प्यार! यह भिखमंगी क्यों आखिर? जन्म से तुम प्यार-ही-प्यार पाते आ रहे हो, फिर भी तुम्हारे लोभ जगह का कोई हिसाब नहीं!
"मेरे प्रेम करने और प्रेम पाने की संसार में कोई जगह नहीं- इसीलिए मैं खेल में प्यार के खेद को मिटाया करती हूँ। जब तुम्हें फुर्सत थी, तुमने भी उस झूठे खेल में हाथ बँटाया था। लेकिन खेल की छुट्टी क्या खत्म नहीं होती? अब गर्द-गुबार झाड़-पोंछकर वापस जाओ? मेरा तो कोई घर नहीं, मैं अकेली ही खेला करूँगी- तुम्हें नहीं बुलाऊँगी।
"तुमने लिखा है, तुम मुझे प्यार करते हो। खेल-कूद में यह बात मान ली जा सकती है- मगर सच कहना हो तो इस पर यकीन नहीं करती! कभी तुम यह सोचते थे कि आशा को प्यार करते हो। वह भी झूठा है। असल में तुम सिर्फ खुद को प्यार करते हो।
"प्यार की प्यास से मेरी छाती तक सूख गई है और वह प्यास मिटाने का सहारा तुम्हारे हाथ में नहीं, यह मैं अच्छी तरह देख चुकी हूँ। मैं बार-बार कहती हूँ, मुझे छोड़ दो, मेरे पीछे मत पड़ो, बेशर्म होकर मुझे शर्मिन्दा न करो! मेरे खेल का शौक़ भी पूरा हो चुका, अब पुकारोगे भी तो जवाब नहीं मिलेगा। खत में तुमने मुझे निर्दयी लिखा है- शायद यह सच हो, लेकिन मुझमें थोड़ी दया भी है, इसलिए आज मैंने दया करके तुम्हें त्याग दिया। कहीं तुमने मेरे इस पत्र का जवाब कोई दिया, तो समझूँगी कि यहाँ से भागे बिना तुमसे बचने का कोई उपाय नहीं।"
चिट्ठी का पढ़ना था कि लमहे-भर में आशा के चारों तरफ के सहारे टूट गिरे, शरीर की सारी शिराएँ मानो एकबारगी थम गईं, साँस लेने के लिए हवा तक मानो न रही- सूरज ने उसकी ऑंखों के सामने से जैसे सारी रोशनी समेट ली। आशा ने पहले दीवार थामी, फिर अलमारी, और फिर कुर्सी पकड़ते-पकड़ते ज़मीन पर गिर पड़ी।
अन्त में कलेजा दबाकर उसाँसें भरती हुई बोल पड़ी-"मौसी!"
स्नेह के इस सम्भाषण के उमड़ते ही उसकी ऑंखों से ऑंसू छलकने लगे। रुलाई पर रुलाई, और फिर रुलाई-आखिर जब रुलाई थमी तो वह सोचने लगी- 'लेकिन इस चिट्ठी का क्या मैं करूँगी? कहीं उन्हें पता चल जाय कि यह चिट्ठी मेरे हाथ लग गई है तो! ऐसे में उनकी शर्मिन्दगी की याद करके आशा बेतरह कुंठित होने लगी। सोचकर आखिर यह तय किया कि चिट्ठी को उसी कुरते की जेब में रखकर उसे खूँटी पर लटका देगी- धोबी को न देगी।
इसी विचार से चिट्ठी लिये वह सोने के कमरे में गई। इस बीच मैले कपड़ों की गठरी से टिककर धोबी सो गया था। वह कुरते की जेब में चिट्ठी डालने की चेष्टा कर रही थी कि आवाज़ सुनाई दी- "भई किरकिरी!" चिट्ठी और कुरते को झटपट पलंग पर डालकर वह उस पर बैठ गई। विनोदिनी अन्दर आकर बोली- "धोबी कपड़े बहुत उलट-पुलट करने लगा है। जिन कपड़ों में निशान नहीं लगाए गए हैं, मैं उन्हें ले जाती हूँ।" आशा विनोदिनी की ओर देख न सकी। चेहरे के भाव से सब-कुछ ज़ाहिर न हो जाए, इसलिए खिड़की की ओर मुँह करके वह आसमान ताकती रही। हांठ-से-होठ दबाए रही कि ऑंखों से ऑंसू न बह आएँ। विनोदिनी ठिठक गई। एक बार आशा को गौर से देखा। सोचा, "ओ, समझी, कल का वाकया मालूम हो गया है। लेकिन सारा गुस्सा मुझी पर! मानो कसूर मेरा ही है।" उसने आशा से बात करने की कोशिश ही न की। कुछ कपड़े उठाकर जल्दी-जल्दी वहाँ से चली गई।
एक बार मिलाकर देखने की इच्छा हुई।
वह खत खोलने लगी कि इतने में लपककर महेन्द्र कमरे में आया। जाने क्या उसे याद आया कि लेक्चर के बीच से ही अचानक उठकर चला आया।
आशा ने पत्र ऑंचल में छिपा लिया। आशा को कमरे में देखकर महेन्द्र भी सहम गया। उसके बाद व्यग्र दृष्टि से कमरे के इधर-उधर देखने लगा। आशा ताड़ गई कि महेन्द्र क्या ढूँढ़ रहा है, लेकिन चिट्ठी को चुपचाप जहाँ थी, वहाँ रखकर वह कैसे भाग खड़ी हो, यह न समझ सकी।
महेन्द्र एक-एक करके मैले कपड़े उठा-उठाकर देखने लगा। महेन्द्र की उस बेकार कोशिश को देखकर आशा से न रहा गया। उसने कुरते और चिट्ठी को फर्श्श पर फेंक दिया और दाएँ हाथ से पलँग के डण्डे को थामकर मुँह गाड़ लिया। महेन्द्र ने बिजली की तेज़ी से चिट्ठी उठाई। एक पल को आशा की ओर कुछ न बोलते हुए लेकिन कुछ कहने के अन्दाज में उसने देखा मगर कुछ कहा नहीं। फिर तुरन्त आशा को सीढ़ियों पर उसके तेज क़दम की आहट मिली। इधर धोबी ने पुकरा- "माँ जी, कपड़े देने में और कितनी देर करेंगी? बड़ी देर हो गई, मेरा घर भी तो पास नहीं।"
34
राजलक्ष्मी ने आज सुबह से विनोदिनी को बुलाया नहीं। रोज़ की तरह विनोदिनी भण्डार में गई। राजलक्ष्मी ने सिर उठाकर उसकी ओर नहीं देखा।
यह देखकर भी उसने कहा- "बुआ, तबीयत ठीक नहीं है, क्यों? हो भी कैसे? कल रात भाई साहब ने जो करतूत की! पागल-से आ धामके। मुझे तो फिर नींद ही न आई।"
राजलक्ष्मी मुँह लटकाए रही। हाँ-ना कुछ न कहा।
विनोदिनी बोली- "किसी बात पर चख-चख हो गई होगी आशा से। कुछ भी कहो! बुआ, नाराज मत होना, तुम्हारे बेटे में चाहे हज़ारों सिफ्त हों, धीरज ज़रा भी नहीं। इसीलिए मुझसे हरदम झड़प ही होती रहती है।"
राजलक्ष्मी ने कहा- "बहू, झूठ बकती जा रही हो तुम, मुझे आज कोई भी बात नहीं सुहाती।"
विनोदिनी बोली- "मुझे भी कुछ नहीं सुहा रहा है, बुआ। तुम्हारे दिल को ठेस लगेगी, इसी डर से झूठ से मैं तुम्हारे बेटे का गुनाह ढकना चाहती थी। लेकिन इस हद को पहुँच गया है कि अब ढका नहीं रहना चाहता।"
राजलक्ष्मी- "अपने बेटे का गुण-दोष मुझे मालूम है, मगर तुम कैसी मायाविनी हो, यह पता न था।"
विनादिनी न जाने क्या कहने जा रही थी कि अपने को ज़ब्त कर गई।
बोली- "यह बजा है बुआ, कोई किसी को नहीं जानता; अपने मन को ही क्या सब कोई जानते हैं? कभी क्या तुम्हीं ने अपनी बहू से डाह करके इस मायाविनी के ज़रिये अपने बेटे का मन मोहने की कोशिश नहीं कराई थी? ज़रा सोचकर देखो!"
राजलक्ष्मी आग-सी दहक उठीं। बोलीं- "अभागिन, लड़के के लिए तू माँ पर ऐसा आरोप लगा सकती है? जीभ गलकर नहीं गिरेगी तेरी?"
विनोदिनी उसी अडिग भाव से बोली- "बुआ, हम हैं मायाविनी की जात- मुझमें कौन-सी माया थी मैं ठीक-ठाक नहीं जानती थी, तुम्हें पता था, तुममें भी क्या माया थी- इसका तुम्हें ठीक पता न था, मैं जानती थी। मगर माया ज़रूर थी, नहीं तो यह घटना न घटती। मैंने भी कुछ जानते और कुछ अजानते फन्दा डाला था। और फन्दा तुमने भी कुछ तो जानकर बिना जाने डाला था। हमारी जात का धर्म ही ऐसा है- हम मायाविनी हैं।"
क्रोध के मारे राजलक्ष्मी का कंठ जकड़ गया। वह तेजी से कमरे के बाहर निकल गईं।
विनोदिनी सूने कमरे में जरा देर स्थिर खड़ी रही। उसकी ऑंखों में आग जल उठी।
सुबह का काम-काज चुक गया तो राजलक्ष्मी ने महेन्द्र को बुलवा दिया। महेन्द्र समझ गया, कल रात की घटना के बारे में कहेंगी। इस बीच विनोदिनी से चिट्ठी का उत्तर पाकर मन बेकल हो गया। उसी आघात के प्रति-घात स्वरूप उसका लहराया हृदय विनोदिनी की ओर ज़ोरों से दौड़ रहा था। इस स्थिति में माँ से सवाल-जवाब करना उसके लिए कठिन था। वह खूब समझ रहा था जहाँ से माँ ने विनादिनी के बारे में उसे फटकार बताई कि वह विद्रोही की तरह सच बता देगा और सच कहते ही भीषण गृह-युद्ध शुरू हो जायेगा। लिहाज़ा इस समय कहीं बाहर जाकर सारी बातों पर ठीक से गौर कर लेना ठीक है। महेन्द्र ने नौकर से कहा- "माँ से जाकर कह दे, आज कॉलेज में मुझे विशेष काम से, जल्दी जाना है; लौटकर मिलूँगा।"
और तुरन्त कपड़े पहनकर बिना खाए-पिए वह भाग खड़ा हुआ। विनोदिनी की जिस सख्त चिट्ठी को वह आज सुबह से ही बारम्बार पढ़ता और जेब में लिये-लिये फिरता रहा- जल्दी में वह चिट्ठी कुरते में ही छोड़कर चला गया।
एक झमक बारिश हो गई, फिर घुमड़न-सी हो रही। विनोदिनी का मन आज खीझा हुआ था। उसका मन भी जब ऐसा होता है तो वह काम ज़्यादा करती है। इसीलिए आज घर भर में जितने भी कपड़े मिले सबको बटोरकर निशान लगा रही थी। आशा से कपड़े माँगने गई तो उसके चेहरे का भाव देखकर उसका मन और भी बिगड़ गया। संसार में अगर कसूरवार ही ठहरना है तो उसकी सारी ज़हमतें ही क्यों झेले, कसूर के सुखों से ही क्यों वंचित हां?
झमाझम बारिश शुरू हो गई। विनादिनी कमरे के फर्श पर आ बैठी। सामने कपड़ों का पहाड़ लगा था। नौकरानी एक-एक कपड़ा उसकी ओर बढ़ा रही थी और वह स्याही से उस पर हरफ उगा रही थी। महेन्द्र ने कोई आवाज़ न दी। दरवाज़ा खोलकर सीधा कमरे में दाखिल हो गया। नौकरानी घूँघट निकालकर वहाँ से भाग गई।
विनोदिनी ने अपनी गोद पर का कपड़ा उतार फेंका और बिजली-सी लपक खड़ी हुई। बोली- "जाओ, मेरे कमरे से चले जाओ!"
महेन्द्र बोला- "क्यों, मैंने क्या किया है?"
विनोदिनी- "क्या किया है! डरपोक, कायर! कुछ करने की जुर्रत ही कहाँ है तुममें! न प्यार करना आता है, न कर्तव्य का पता है। बीच में मुझे क्यों लोगों की नज़रों में गिरा रहे हो?" महेन्द्र- "तुम्हें प्यार नहीं किया, यह क्या कहती हो?"
विनोदिनी- "मैं यही कह रही हूँ- चोरी चुप-चुप, झोप-तोप, एक बार इधर तो एक बार उधर- तुम्हारी यह चोर- जैसी हरकत देखकर मुझे नफरत हो गई है। अब अच्छा नहीं लगता। तुम जाओ यहाँ से ।" महेन्द्र मुरझा गया। बोला- "तुम मुझसे नफरत करती हो, विनोद?"
विनोदिनी- "हाँ, करती हूँ।"
महेन्द्र- "अब भी प्रायश्चित्त करने का समय है। मैं अगर दुविधा न करूँ, सब-कुछ छोड़-छाड़कर चल दूँ तो तुम मेरे साथ चलने को तैयार हो?"
यह कहकर महेन्द्र ने ज़ोर से उसके दोनों हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लिया। विनोदिनी बोली-"छोड़ो, डर लगता है।"
महेन्द्र- "लगने दो। पहले बताओ कि तुम मेरे साथ चलोगी?"
विनोदिनी- "नहीं! नहीं! हर्गिज नहीं।"
महेन्द्र- "क्यों नहीं चलोगी? तुमने ही मुझे खींचकर सर्वनाश के जबड़े में पहुँचाया। अब आज तुम मुझे छोड़ नहीं सकतीं। चलना ही पड़ेगा तुम्हें।"
महेन्द्र ने बलपूर्वक विनोदिनी को अपनी छाती से लगाया और कसकर पकड़ते हुए कहा- "मैं तुम्हें ले जाकर ही रहूँगा और चाहे जैसे भी हो, प्यार तुम्हें करना ही पड़ेगा।"
विनोदिनी ने ज़बरदस्ती अपने को उसके शिंकजे से छुड़ा लिया। महेन्द्र ने कहा- "चारों तरफ आग लगा दी है, अब बुझा भी नहीं सकती, भाग भी नहीं सकती।"
कहते-कहते महेन्द्र की आवाज़ ऊँची हो आई। ज़ोर से बोला- "आखिर ऐसा खेल तुमने खेला क्यों, विनोद! अब इसे खेल कहकर टालने से छुटकारा नहीं। तुम्हारी और मेरी अब एक ही मौत है।" राजलक्ष्मी अन्दर आईं। बोलीं- "क्या कर रहा है, महेन्द्र?"
महेन्द्र की उन्मत्त निगाह पल-भर को माँ की ओर फिर गई। उसके बाद उसने फिर विनोदिनी की तरफ देखकर कहा- "मैं सब-कुछ छोड़-छाड़कर जा रहा हूँ, बताओ, तुम मेरे साथ चलती हो?" विनोदिनी ने नाराज राजलक्ष्मी के चेहरे की ओर एक बार देखा और अडिग भाव से महेन्द्र का हाथ थामकर बोली- "चलूँगी।"
महेन्द्र ने कहा- "तो आज-भर इन्तजार करो! मैं चलता हूँ। कल से तुम्हारे सिवा मेरा और कोई न होगा।"
कहकर महेन्द्र चला गया।
इतने में धोबी आ गया। विनोदिनी से उसने कहा-"माँ जी, अब तो जाने ही दीजिए। आज फुरसत नहीं है, तो मैं कल आकर कपड़े ले जाऊँगा।" नौकरानी आई- "बहू जी, साईस ने बताया है, घोड़े का दाना खत्म हो गया है।"
विनोदिनी इकट्ठा सात दिन का दाना अस्तबल में भिजवा दिया करती थी और खुद खिड़की पर खड़ी होकर घोड़ों के खाने पर नज़र रखती थी। नौकर गोपाल ने आकर खबर दी- बीबीजी, झाडूदार से दादाजी (साधुचरण) की झड़प हो गई है। वह कह रहा है, उसके तेल का हिसाब समझ लें तो वह दीवान जी से अपना लेना-देना चुकाकर नौकरी छोड़ देगा।" गृहस्थी के सारे काम-काज पहले की तरह चलते रहे।
35
बिहारी अब मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा था। ऐन इम्तहान के वक्त छोड़ दिया। कोई अचरज से पूछ बैठता, तो कहता- "पराई सेहत की बात फिर देखी जाएगी, पहले तन्दुरुस्ती का ख्याल जरूरी है।" असल में बिहारी के अध्यमवसाय की हद न थी, कुछ-न-कुछ किए बिना रहना उसके लिए मुश्किल था- हालाँकि यश की प्यास, दौलत का लोभ और गुजर-बसर के लिए कमाने-धमाने की उसे बिल्कुल ज़रूरत न थी। कॉलेज की डिग्री हासिल करने के बाद पहले वह इंजीनियरिंग सीखने के लिए शिवपुर में दाखिल हुआ था। उसे जितना सीखने का कौतूहल था और हाथ के जितने-भर हुनर की वह ज़रूरत महसूस करता था- उतना-भर हासिल कर लेने के बाद ही वह मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो गया। महेन्द्र साल-भर पहले डिग्री लेकर मेडिकल कॉलेज गया था। कॉलेज के लड़कों में इन दोनों की मैत्री मशहूर थी। मज़ाक से सब इन्हें जुड़वाँ कहा करते थे। पिछले साल महेन्द्र परीक्षा में लुढ़क गया और दोनों दोस्त साथ हो गए। अचानक यह जोड़ी टूट कैसे गई, संगी-साथियों की समझ में न आया। रोज़ जहाँ महेन्द्र से से भेंट अवश्यंभावी होती मगर पहले जैसी न हो पाती-वहाँ बिहारी हर्गिज न जा सका। सबको विश्वास था, बिहारी खूब अच्छी तरह पास होगा और सम्मान तथा पुरस्कार ज़रूर पाएगा लेकिन उसने इम्तहान ही न दिया। बिहारी के घर के पास ही एक झोंपड़े में राजेन्द्र चक्रवर्ती नाम का एक गरीब ब्राह्मण रहता था। छापेखाने में बारह रुपये की नौकरी करके अपनी रोटी चलाता था। बिहारी ने उससे कहा, "अपने लड़के को तुम मेरे ज़िम्मे कर दो, मैं उसे लिखाऊँगा-पढ़ाऊँगा।"
बेचारा ब्राह्मण तो मानो जी गया। उसने खुशी-खुशी अपने आठ साल के लड़के बसन्त को बिहारी के हाथों सौंप दिया।
बिहारी उसे अपने तरीके से शिक्षा देने लगा। बोला-"दस साल की उम्र तक मैं इसे किताब न छूने दूँगा-ज़बानी पढ़ाऊँगा। उसके साथ खेलने में, उसे लेकर मैदान, म्यूज़ियम, चिड़ियाघर, शिवपुर का बगीचा घूमने में बिहारी के दिन कटने लगे। ज़बानी अंग्रेजी सिखाता, कहानियों में इतिहास बताना, बालकों के मनोभाव का अध्य यन और विकास- बिहारी के पूरे दिन का यही काम था- अपने को वह पल-भर का भी अवकाश न देता।
उस दिन शाम को घर से निकलने की गुंजाइश न थी। दोपहर को बारिश थम गई थी, शाम को फिर शुरू हो गई। अपने दुमंजिले के बड़े कमरे में बत्ती जलाकर बिहारी बसन्त के साथ अपने नए ढंग का खेल खेल रहा था।
"अच्छा, कमरे में लोहे के कितने शहतीर हैं, जल्दी बताओ।"
"उँहूँ, गिनना नहीं होगा।"
बसन्त- "बीस।"
बिहारी- "हार गए। अट्ठारह हैं।"
बिहारी ने झट खिड़की की झिलमिली खोलकर पूछा-"कितने पल्ले हैं इसमें?"-और, झिलमिली उसने बन्द कर दी। बसन्त ने कहा- "छ:।"
"जीत गए।"
'यह बेंच कितनी लम्बी है, इस किताब का वज़न क्या होगा'- ऐसे सवालों से वह बसंत के दिमाग के विकास की चेष्टा कर रहा था कि बैरे ने आकर कहा-"बाबूजी, एक औरत...." उसका कहना खत्म भी न हो पाया था कि विनोदिनी कमरे में आ गई।
बिहारी ने अचरज से कहा- "यह क्या, भाभी?"
विनोदिनी ने पूछा- "तुम्हारे यहाँ अपनी सगी कोई स्त्री नहीं?"
बिहारी- "अपनी-सगी भी कोई नहीं- पराई भी नहीं। बुआ है, गाँव में रहती है।"
विनोदिनी- "तुम मुझे अपने गाँव वाले घर ले चलो।"
बिहारी- "किस नाते?"
विनोदिनी- "नौकरानी के नाते।"
बिहारी- "बुआ को कैसा लगेगा! उन्होंने नौकरानी की ज़रूरत तो बताई नहीं है। खैर। पहले यह तो बताओ, अचानक ऐसा इरादा कैसे? बसंत, तुम जाकर सो रहो।" बसंत चला गया।
विनोदिनी बोली- "बाहरी घटना से तुम अन्दर की बात ज़रा भी नहीं समझ सकोगे।"
बिहारी- "न समझूँ तो भी क्या, ग़लत ही समझ लूँ तो क्या हर्ज है।"
विनोदिनी- "अच्छी बात है, न हो ग़लत ही समझना। महेन्द्र मुझे प्यार करता है।"
बिहारी- "यह खबर कुछ नई तो है नहीं। और न कोई ऐसी ही खबर है कि दोबारा सुनने को जी चाहे।"
विनोदिनी- "बार-बार सुनाने की इच्छा भी नहीं अपनी। इसलिए तुम्हारे पास आई हूँ, मुझे पनाह दो।"
बिहारी- "इच्छा नहीं है? यह आफत आखिर ढाई किसने! महेन्द्र जिस रास्ते जा रहा था। उससे उसे डिगाया किसने?"
विनोदिनी- "मैंने डिगाया है। तुमसे कुछ नहीं छिपाऊँगी, यह सारी करतूत मेरी है। मैं बुरी हूँ या जो कुछ भी हूँ ज़रा मुझ- जैसे होकर मेरे मन की बात समझने की कोशिश करो। मैंने अपने जी की ज्वाला से महेन्द्र की दुनिया में आग लगाई है। एक बार ऐसा लगा कि मैं महेन्द्र को प्यार करती हँ, लेकिन ग़लत है।"
बिहारी- "अगर प्यार ही हो तो भला कोई ऐसी आग लगा सकती है?"
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Postby Jemsbond » 20 Jun 2016 13:42

विनोदिनी- "भाई साहब, यह सब आपके शास्त्र की बात है। ये बातें सुनने- जैसी मति अभी अपनी नहीं हुई। अपनी पोथी पटककर एक बार अंतर्यामी की तरह मेरे दिल की दुनिया में बैठो। आज मैं अपना भला-बुरा, सब तुमसे कहना चाहती हूँ।"
बिहारी- "पोथी क्या यों ही खोले बैठा हूँ, भाभी? हृदय को हृदय के क़ानून से समझने की ज़िम्मेदारी अंतर्यामी पर ही रहे, हम पोथी के अनुसार न चलें तो अंत में पार नहीं पड़ने का।" विनोदिनी- "बेहया होकर कहती हूँ सुनो, तुम मुझे लौटा सकते हो। महेन्द्र मुझे चाहता है, मगर वह अंधा है, मुझे नहीं समझता। कभी यह लगा था कि तुमने मुझे समझा है- कभी तुमने मुझ पर श्रद्धा की थी- सच-सच बताओ, आज इस बात को छिपाने की कोशिश मत करो!"
बिहारी- "सच है, मैंने श्रद्धा की थी।"
विनोदिनी- "तुमने ग़लती नहीं की थी भाई साहब! लेकिन जब समझ ही लिया, जब श्रद्धा की ही थी, तो फिर वहीं क्यों रुक गए? मुझे प्यार करने में तुम्हें क्या बाधा थी? आज मैं बेहया बनकर तुम्हारे पास आई हूँ और बेहया होकर ही तुमसे कहती हँ, तुमने भी मुझे प्यार क्यों नहीं किया? मेरी फूटी तकदीर! या तुम भी आशा की मुहब्बत में गर्क हो गए! न, नाराज़ नहीं हो सकते तुम! बैठो, आज मैं छिपाकर कुछ नहीं कहना चाहती। आशा को तुम प्यार करते हो, इस बात का जब खुद तुम्हें भी पता न था, मैं जानती थी। लेकिन मैं समझ नहीं पाती कि आशा में तुम लोगों ने देखा क्या है! बुरा या भला- उसके पास है क्या? विधाता ने क्या मर्दों को ज़रा भी अन्तर्दृष्टि नहीं दी है? तुम लोग आखिर क्या देखकर, कितना देखकर दीवाने हो जाते हो।"
बिहारी उठ खड़ा हुआ बोला- "आज तुम जो कुछ भी कहोगी, आदि से अंत तक मैं सब सुनूँगा, मगर इतनी ही विनती है, जो बात कहने की नहीं है, वह मत कहो।"
विनोदिनी- "तुम्हे कहाँ दुखता है, जानती हूँ भाई साहब। लेकिन मैंने जिसकी श्रद्धा पाई थी और जिसका प्रेम पाने से मेरी ज़िन्दगी बन सकती थी, लाज-डर, सबको बाला-ए-ताक धर कर उसके पास दौड़ी आई हूँ-कितनी बड़ी वेदना लेकर आई हूँ, कैसे बताऊँ? मैं बिलकुल सच कहती हूँ, तुम आशा को प्यार करते होते तो उसकी आज यह गत न हुई होती।"
बिहारी फक रह गया। बोला- "आशा को क्या हुआ? कौन-सी गत की तुमने।"
विनोदिनी- "अपना घर-बार छोड़कर महेन्द्र मुझे लेकर कल चल देने को तैयार है।"
बिहारी एकाएक चीख पड़ा- "यह हर्गिज नहीं हो सकता, हर्गिज नहीं।"
विनोदिनी- "हर्गिज नहीं? महेन्द्र को रोक कौन सकता है?"
बिहारी- "तुम रोक सकती हो।"
विनोदिनी ज़रा देर चुप रही, उसके बाद बिहारी पर अपनी ऑंखें रोककर कहा- "आखिर किसके लिए रोकूँ? तुम्हारी आशा के लिए? मेरा अपना सुख-दु:ख है ही नहीं? तुम्हारी आशा का भला हो, तुम्हारे महेन्द्र की दुनिया बनी रहे- यह सोचकर मैं अपने आज का अपना सारा दावा त्याग दूँ। इतनी भली मैं नहीं हूँ- इतना शास्त्र मैंने नहीं पढ़ा। मैं छोड़ दूँगी तो उसके बदले मुझे क्या मिलेगा?"
धीरे-धीरे बिहारी के चेहरे का भाव सख्त हो आया। बोला- "तुमने बहुत साफ-साफ कहने की कोशिश की है, अब मैं भी एक बात स्पष्ट बताऊँ। आज जो भी हरकत तुमने की है, और जो बेहूदा बातें कह रही हो, इसकी अधिकांश ही उस साहित्य से चोरी की हुई हैं, जो तुमने
पढ़ा है। इसका पचहत्तर फीसदी नाटक और उपन्यास है।"
विनोदिनी- "नाटक! उपन्यास!"
बिहारी- "हाँ, नाटक, उपन्यास। वह भी वैसे महत्व का नहीं। तुम सोचती हो, यह सारा कुछ तुम्हारा निजी है- बिलकुल ग़लत। यह सब छापेखाने की प्रतिध्व नि है। तुम अगर निहायत अबोध, सीधी-सादी बालिका होतीं, तो भी संसार में प्रेम से वंचित न होतीं- लेकिन नाटक की नायिका रंगमंच पर ही फबती है, उससे घर का काम नहीं चलता।"
कहाँ है विनोदिनी का वह तीखा तेज, दारुण दर्प! मंत्रबिद्ध नागिन-सी वह स्तब्ध होकर झुक गई। बड़ी देर के बाद बिहारी की ओर देखे बिना ही शांत और नम्र स्वर में बोली- "तो मैं क्या करूँ?" बिहारी बोला- "अनोखा कुछ न करो। एक सामान्य स्त्री के अच्छे विचार से जो आए, वही करो। अपने घर चली जाओ।"
विनोदिनी ने कहा- "कैसे जाऊँ?"
बिहारी- "गाड़ी में तुम्हें औरतों वाले डिब्बे में बिठाकर तुम्हारे घर के स्टेशन तक छोड़ आऊँगा मैं।" विनोदिनी- "आज की रात यहीं रहूँ?"
बिहारी- "नहीं, अपने ऊपर मुझे इतना विश्वास नहीं।"
सुनते ही विनोदिनी कुर्सी से उतरकर ज़मीन पर लोट गई। बिहारी के दोनों पैरों को जी-जान से अपनी छाती से चिपकाकर बोली- "इतनी कमज़ोरी तो रखो भाई साहब! बिलकुल पत्थर के देवता- जैसे पवित्रा मत बनो। बुरे को प्यार करके ज़रा-सा बुरा तो बनो।"
कहकर विनोदिनी ने बिहारी के पाँवों को बार-बार चूमा। विनोदिनी के ऐसे आकस्मिक और अकल्पनीय व्यवहार से ज़रा देर के लिए तो बिहारी मानो अपने को ज़ब्त न कर सका। उसकी तन-मन की सारी गाँठें ढीली पड़ गईं। बिहारी की इस विह्नल दशा का अनुभव करके विनोदिनी ने उसके पैर छोड़ दिए, अपने घुटनों के बल ऊँची होकर उसने कुर्सी पर बैठे बिहारी की गर्दन को बाँहों से लपेट लिया। बोली- "मेरे सर्वस्व, जानती हूँ, तुम मेरे सदा के लिए नहीं, लेकिन आज एक पल के लिए तुम मुझे प्यार करो! फिर मैं अपने उसी जंगल मे चली जाऊँगी- किसी से कुछ भी न चाहूँगी। मरने तक याद रखने लायक़ एक कोई चीज़ दो।"
ऑंखें मूँदकर विनोदिनी ने अपने होठ बिहारी की ओर बढ़ा दिए। ज़रा देर के लिए दोनों सन्न रह गए, सारा घर सन्नाटा। इसके बाद धीरे-धीरे विनोदिनी की बाँहें हटाकर बिहारी दूसरी कुर्सी पर जा बैठा और रुँधी-सी आवाज़ साफ़ करके कहा- "रात को एक बजे एक पैसेंजर गाड़ी है।"
विनोदिनी ज़रा देर खामोश रही, फिर बोली- "उसी गाड़ी से चली चलूँगी।" इतने में नंगे पाँव, ख़ाली बदन अपना गोरा स्वस्थ शरीर लिये बसन्त बिहारी के पास आ खड़ा हुआ और गंभीर होकर विनोदिनी को देखने लगा।
बिहारी ने पूछा- "सोने नहीं गया, बसन्त?"
बसन्त ने कोई उत्तर न दिया। उसी तरह गंभीर खड़ा रहा। विनोदिनी ने अपने दोनों हाथ फैला दिए। बसन्त ने पहले तो ज़रा आगा-पीछा किया, फिर विनोदिनी के पास चला गया। विनोदिनी उसे छाती से लगाकर ज़ोर से रो पड़ी।
36
असंभव भी संभव हो जाता है, असह्य भी सह्य हो जाता है। ऐसा न होता तो उस दिन की रात महेन्द्र के घर में कटती नहीं। विनोदिनी को तैयार रहने का कहकर महेन्द्र ने रात ही एक पत्र लिखा था। वह पत्र डाक से सवेरे महेन्द्र के यहाँ पहुँचा। आशा उस समय बिस्तर पर ही थी। बैरे ने आवाज़ दी- "माँ जी, चिट्ठी।"
आशा के कलेजे पर लहू ने धक् से चोट की। पलक मारने भर की देर में हज़ारों आशा-आशंकाएँ एक साथ ही उसकी छाती में बज उठीं। झटपट सिर उठाकर उसने पत्र देखा, महेन्द्र के अक्षरों में विनोदिनी का नाम। तुरंत उसका माथा तकिए पर लुढ़क पड़ा। बोली कुछ नहीं। चिट्ठी बैरे को वापस कर दी। बैरे ने पूछा- "किसे दूँ?"
आशा ने कहा- "मैं नहीं जानती।"
रात के आठ बज रहे होंगे। महेन्द्र ऑंधी की तरह लपककर विनोदिनी के कमरे के सामने हाज़िर हुआ। देखा, कमरे में रोशनी नहीं है। घुप्प अंधेरा। जेब से दियासलाई निकालकर एक तीली जलाई। कमरा ख़ाली पड़ा था। विनोदिनी नहीं थी, उसका सरो-समान भी नदारद। दक्खिन वाले बरामदे में गया। वह भी सूना पड़ा था। आवाज़ दी- "विनोदिनी!" कोई जवाब नहीं।
'नासमझ! नासमझ हूँ मैं। उसी समय साथ ले जाना चाहिए था। माँ ने ज़रूर उसे इस बुरी तरह डाँटा-फटकारा है कि वह टिक न सकी।'
ध्याान में यही आया और अटल विश्वास बन गया। अधीर होकर वह उसी दम माँ कमरे में गया। रोशनी वहाँ भी न थी, लेकिन राजलक्ष्मी बिस्तर पर लेटी थीं- यह अंधेरे में भी दिखा। महेन्द्र ने रंजिश में कहा- "माँ, तुम लोगों ने विनोदिनी से क्या कहा।"
राजलक्ष्मी बोलीं- "कुछ नहीं।"
महेन्द्र- "तो वह कहाँ गई?"
राजलक्ष्मी- "मैं क्या जानूँ?"
महेन्द्र ने अविश्वास के स्वर में कहा- "तुम नहीं जानतीं? खैर उसे तो मैं जहाँ भी होगी, ढूँढ़ ही निकालूँगा।"
महेन्द्र चल पड़ा। राजलक्ष्मी झटपट उठ खड़ी हुई और उसके पीछे-पीछे चलती हुई कहने लगीं- "मत जा, मेरी एक बात सुन ले, ठहर।"
महेन्द्र दौड़कर एक ही साँस में घर से बाहर निकल गया। उलटे पाँवों लौटकर उसने दरबान से पूछा- "बहूजी कहाँ गईं?"
दरबान ने कहा- "हमें बताकर नहीं गईं। पता नहीं।"
महेन्द्र ने चीखकर कहा- "पता नहीं।"
दरबान ने हाथ बाँधकर कहा- "जी नहीं, नहीं मालूम।"
महेन्द्र ने सोचा, "माँ ने इन्हें पट्टी पढ़ा दी है।" बोला- "खैर।"
महानगरी के राजपथ पर गैस की रोशनी के मारे अंधेरे में बर्फ़ वाला बर्फ़ और मछली वाला मछली की रट लगा था। भीड़ की हलचल में घुसकर महेन्द्र ओझल हो गया।
37
रात के अंधेरे में बिहारी कभी अकेले ध्यामन नहीं लगाता। अपने लिए अपने को उसने कभी भी आलोच्य नहीं बनाया। वह पढ़ाई-लिखाई, काम-काज, हित-मित्रों में ही मशगूल रहता। अपने बजाय अपने चारों तरफ की दुनिया को प्रमुखता देकर वह मजे में था। लेकिन अचानक ज़ोर के धक्के से एक दिन उसका सब कुछ विच्छिन्न हो गया-प्रलय के अंधेरे में वेदना की आकाश-छूती चोटी पर उसे अकेले खुद को लेकर खड़ा होना पड़ा। उसी समय अपने निर्जन संग से उसे भूलकर भी अवकाश नहीं देना चाहता।
लेकिन आज अपने उस भीतर वाले को बिहारी किसी भी तरह से दूर न रख सका। कल वह विनोदिनी को उसके घर छोड़ आया, उसके बाद जो भी काम, जिस भी आदमी के साथ जुटा रहा है, उसका गुफा के अन्दर का वेदनामय हृदय उसे अपने गहरे एकांत की ओर लगातार खींच रहा था।
थकावट और अवसाद ने आज बिहारी को परास्त कर दिया। रात के ठीक नौ बजे होंगे। घर के सामने दक्खिन वाली छत पर गर्मी के दिन-ढले की हवा उतावली-सी हो उठी थी। वह अंधेरी छत पर एक आराम-कुर्सी पर बैठ गया।
आज शाम को उसने बसन्त को पढ़ाया नहीं- जल्दी ही वापस कर दिया। आज सांत्वना के लिए, संग के लिए, प्रेम-सुधा- सने अपने पिछले जीवन के लिए उसका हृदय मानो माँ द्वारा त्यागे गए शिशु की तरह संसार के अंधेरे में दोनों बाँहें फैलाकर न जाने किसे खोज रहा था! जिनके बारे में न सोचने की उसने कसम खाई थी- उसका अंतर्मन उन्हीं की ओर दौड़ रहा था- रोकने की शक्ति ही नहीं रह गई थी। छुटपन से छूट जाने तक महेन्द्र से उसकी मैत्री की जो कहानी रंगों में चित्रित, जल-स्थल, नदी-पर्वत में बँटी मानचित्र- जैसी उसके मन में सिमटी पड़ी थी, बिहारी ने उसे फैला दिया। लेकिन फिर भी यह बिछोह और वेदना अनोखी नेह-किरणों रंगी माधुरी से भरी-पूरी रही। उसके बाद जिस शनि का उदय हुआ, जिसने मित्र के स्नेह, दंपती के प्रेम घर की शांति और पवित्राता को एकबारगी मटियामेट कर दिया, उस विनोदिनी को बिहारी ने बेहद घृणा से अपने मन से निकाल फेंकने की कोशिश की। लेकिन गज़ब! चोट गोया निहायत हल्की हो आई, उसे छू न सकी। वह अनोखी ख़ूबसूरत पहेली अपनी अगम रहस्यभरी घनी काली ऑंखों की स्थिर निगाह लिये कृष्ण पक्ष के अंधेरे में बिहारी के सामने डटकर खड़ी हो गई। गर्मी की रात की उमगी हुई दक्खिनी बयार उसी के गहरे नि:श्वास-सी बिहारी को छूने लगी। धीरे-धीरे उन अपलक ऑंखों की जलती हुई निगाह मलिन हो आने लगी, प्यास से सूखी वह तेज नजर ऑंसुओं में भीगकर स्निग्ध हो गई और देखते-ही-देखते गहरे भावरस में डूब गई। अचानक उस मूर्ति ने बिहारी के कदमों के पास लौटकर उसकी दोनों जाँघों को जी-जान से अपनी छाती से पकड़ लिया। उसके बाद एक अनूठी मायालता की तरह उसने पल में बिहारी को लपेट लिया और फैलकर तुरन्त खिले सुगंधित फूल- जैसे चुम्बनोन्मुख मुखड़े को बिहारी के होठों के पास बढ़ा दिया। ऑंखें मूँदकर अपनी सुधियों की दुनिया से बिहारी उस कल्पमूर्ति को निर्वासित कर देने की चेष्टा करने लगा; लेकिन उस पर आघात करने को उसका हाथ हर्गिज न उठा! एक अधूरा अकुलाया चुंबन उसके मुँह के पास उत्सुक हो रहा- पुलक से उसने उसे आच्छन्न कर दिया।
छत पर के सूने अंधेरे में बिहारी और न रह सका। किसी और तरफ ध्या न बँटाने के ख्याल से वह जल्दी-जल्दी चिराग की रोशनी से जगमग कमरे में चला आया।
कोने में तिपाई पर रेशमी कपड़े में टँकी एक मढ़ी हुई तस्वीर थी। बिहारी ने कपड़ा हटाया, तस्वीर को लेकर रोशनी के पास बैठा और उसे अपनी गोद में रखकर देखने लगा।
तस्वीर महेन्द्र और आशा की थी- ब्याह के तुरंत बाद की। उसमें महेन्द्र ने अपने लेख में 'महेन्द्र भैया' और आशा ने 'आशा' लिख दिया था।
तस्वीर को अपनी गोद में रखकर धिक्कारते हुए बिहारी ने विनोदिनी को मन से दूर हटाना चाहा। लेकिन विनोदिनी की प्रेम-कातर, यौवन कोमल बाँहें बिहारी की जाँघों को जकड़े रहीं। बिहारी मन-ही-मन बोला- 'प्रेम की इतनी अच्छी दुनिया को तबाह कर दिया! लेकिन विनोदिनी का उमगा आकुल चुंबन- निवेदन उससे चुपचाप कहने लगा- 'मैं तुम्हें प्यार करती हूँ। सारी दुनिया में मैंने तुम्हीं को अपनाया है।' 'लेकिन यही क्या इसका उत्तर हुआ! एक उजड़ी हुई दुनिया की करुणाभरी चीख को यह बात ढक सकती है! पिशाचिन!'
पिशाचिन! यह बिहारी की निखालिस झिड़की थी या इसमें ज़रा स्नेह का सुर भी आ मिला था? जीवन में प्रेम के सारे अधिकारों से वंचित होकर जब वह निरा भिखारी-सा राह पर जा खड़ा हुआ, तब अनमाँगे अजस्र प्रेम के ऐसे उपहार को वह तहेदिल से ठुकरा सकता है! और इससे बेहतर उसे मिला भी क्या! अब तक तो वह अपने जीवन की बलि देकर प्रेम की अन्नपूर्णा ने महज़ उसी के लिए सोने की थाली में पकवान परोसकर भेजा है, तो किस संकोच से वह अभागा अपने को उससे वंचित करे ?
तस्वीर को गोद में रखे वह इसी तरह की बातों में डूबा हुआ था कि पास ही आहट हुई। चौंककर देखा, महेन्द्र आया है। वह हड़बड़ी में खड़ा हो गया। तस्वीर गोद से फर्श के कालीन पर लुढ़क पड़ी। बिहारी ने इसका ख्याल न किया।
महेन्द्र एकबारगी पूछ बैठा- "विनोदिनी कहाँ है?"
बिहारी ने ज़रा आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया। बोला- "महेन्द्र भैया, बैठ जाओ, अभी बातें करते हैं।"
महेन्द्र ने कहा- "मेरे पास बैठने और बात करने का वक्त नहीं है। तुम यह बताओ कि विनोदिनी कहाँ है?"
बिहारी ने कहा- "तुम जो पूछ रहे हो, एक वाक्य में जवाब नहीं दिया जा सकता। उसके लिए ज़रा बैठना पड़ेगा।" महेन्द्र ने कहा- "उपदेश दोगे? वे सारे उपदेश मैं बचपन में ही पढ़ चुका हूँ।"
बिहारी- "नहीं। उपदेश देने का न तो मुझे अधिकार है, न क्षमता।"
महेन्द्र- "तो धिक्कारोगे? मुझे पता है, मैं पापी हूँ, और तुम जो कहोगे, वह सब हूँ मैं। लेकिन सिर्फ इतना पूछना चाहता हूँ, विनोदिनी कहाँ है?" बिहारी- "मालूम है।"
महेन्द्र- "मुझे तो बताओगे या नहीं?"
बिहारी- "नहीं बताऊँगा।"
महेन्द्र- "तुम्हें बताना ही पड़ेगा। तुम उसे चुरा लाए हो और छिपाकर रखे हुए हो। वह मेरी है। मुझे लौटा दो।"
बिहारी कुछ क्षण ठगा-सा रहा। फिर दृढ़ता से बोला-"वह तुम्हारी नहीं है। मैं उसे चुराकर भी नहीं लाया- वह खुद-ब-खुद मेरे पास आई है।" महेन्द्र चीख उठा- "सरासर झूठ!"
और महेन्द्र ने बगल के कमरे के दरवाज़े पर धक्का देते हुए आवाज़ दी- "विनोद! विनोद!"
अन्दर से रोने की आवाज़ सुनाई पड़ी। बोला- "कोई डर नहीं विनोद, मैं महेन्द्र हूँ- मैं तुम्हें कोई कैद करके नहीं रख सकता।"
महेन्द्र ने ज़ोर से धक्का दिया कि किवाड़ खुल गया। दौड़कर अंदर गया। कमरे में अंधेरा था। धुंधली छाया-सी उसे लगी। न जाने वह किस डर के मारे काठ होकर तकिए से लिपट गया। जल्दी से बिहारी कमरे में आया। बिस्तर से बसंत को गोद में उठाकर दिलासा देता हुआ बोला- "डर मत बसंत, मत डर।"
महेन्द्र लपकर वहाँ से निकला। घर के एक-एक कमरे की खाक छान डाली। उधर से लौटकर देखा, अब भी बसन्त डर से रह-रहकर रो उठता था। बिहारी ने उसके कमरे की रोशनी जलाई। उसे बिछौने पर सुलाकर बदन सहलाते हुए उसे सुलाने की चेष्टा करने लगा।
महेन्द्र ने आकर पूछा- "विनोदिनी को तुमने कहाँ रखा है?"
बिहारी ने कहा- "महेन्द्र भैया, शोर न मचाओ। नाहक ही तुमने इस बच्चे को इतना डरा दिया की यह बीमार हो जाएगा। मैं कहता हूँ, विनोदिनी के बारे में जानने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं।"
महेन्द्र बोला- "महात्माजी, धर्म का आदर्श न बनो। मेरी स्त्री की तस्वीर अपनी गोद में रखकर इस रात को किस देवता के ध्याकन में किस पुण्य मन्त्र का जाप कर रहे थे? पाखंडी!"
कहकर महेन्द्र ने तस्वीर को जूते से रौंदकर चूर-चूर कर डाला और फोटो के टुकड़े-टुकड़े करके बिहारी पर फेंक दिया। उसका पागलपन देखकर बसन्त फिर रो पड़ा। गला रुँध आया बिहारी का। अंगुली से दरवाज़े का इशारा करते हुए वह बोला- "जाओ!"
महेन्द्र ऑंधी की तरह वहाँ से निकल गया।
38
रेल के औरतों वाले सूने डिब्बे में बैठी विनोदिनी ने खिड़की में से जब जुते हुए खेत और बीच-बीच में छाया से घिरे गाँव देखे, तो मन में सूने शीतल गाँव की ज़िंदगी ताज़ी हो आई। उसे लगने लगा, पेड़ों की छाया के बीच अपने-आप बनाए कल्पना के बसेरे में अपनी किताबों से उलझकर कुछ दिनों के इस नगर-प्रवास के दु:ख-दाह और जख्म से उसे शान्ति मिलेगी।
प्यासी छाती में चैन की वह उम्मीद ढोती हुई विनोदिनी अपने घर पहुँची। मगर हाय, चैन कहाँ! वहाँ तो केवल शून्यता थी, थी गरीबी। बहुत दिनों से बन्द पड़े सीले घर के भाप से उसकी साँस अटकने लगी। घर में जो थोड़ी-बहुत चीज़ थीं, उन्हें कीड़े चाट गए थे, चूहे कुतर गए थे, गर्द से बुरा हाल था। वह शाम को घर पहुँची- और घर में पसरा था बाँह- भर अंधेरा। सरसों के तेल से किसी तरह रोशनी जलाई- उसके धुएँ और धीमी जोत से घर की दीनता और भी साफ़ झलक उठी। पहले जिससे उसे पीड़ा नहीं होती थी, वह अब असह्य हो उठी-उसका बागी हृदय अकड़कर बोल उठा- "यहाँ तो एक पल भी नहीं कटने का। ताक पर दो- एक पुरानी पत्रिकाएँ और किताबें पड़ी थीं, किन्तु उन्हें छूने को जी न चाहा। बाहर सन्न पड़े-से आम के बगीचे में झींगुर और मच्छरों की तानें अंधेरे में गूँजती रहीं।"
विनोदिनी की जो बूढ़ी अभिभाविका वहाँ रहती थी, वह घर में ताला डालकर अपनी बेटी से मिलने उसकी ससुराल चली गई थी। विनोदिनी अपनी पड़ोसिन के यहाँ गई। वे तो उसे देखकर दंग रह गईं। उफ, रंग तो ख़ासा निखर आया है, बनी-ठनी, मानो मेम साहब हो। इशारे से आपस में जाने क्या कहकर विनोदिनी पर गौर करती हुईं एक-दूसरे का मुँह ताकने लगीं।
विनोदिनी पग-पग पर यह महसूस करने लगी कि अपने गाँव से वह सब तरह से बहुत दूर हो गई है। अपने ही घर में निर्वासित-सी। कहीं पल-भर आराम की जगह नहीं।
डाकखाने का बूढ़ा डाकिया विनोदिनी का बचपन से परिचित था। दूसरे दिन वह पोखर में डुबकी लगाने जा रही थी कि डाक का थैला लिये उसे जाते देख विनोदिनी अपने-आपको न रोक सकी। अगोछा फेंक जल्दी से बाहर निकलकर पूछा- "पंचू भैया, मेरी चिट्ठी है?"
बुङ्ढे ने कहा- "नहीं।"
विनोदिनी उतावली होकर बोली- "हो भी सकती है। देखूँ तो ज़रा।"
यह कहकर उसने चिट्ठियों को उलट-पलटकर देखा। पाँच-छ: ही तो चिट्ठियाँ थीं। मुहल्ले की कोई न थी। उदास-सी जब घाट पर लौटी तो उसकी किसी सखी ने ताना दिया- "क्यों री बिन्दी, चिट्ठी के लिए इतनी परेशान क्यों?"
दूसरे एक बातूनी ने कहा- "अच्छी बात है, अच्छी! डाक के ज़रिये चिट्ठी आए, ऐसा भाग कितनों का होता है? हमारे तो पति, देवर, भाई परदेस में काम करते हैं, मगर डाकिए की मेहरबानी तो कभी नहीं होती।" बातों-ही-बातों में मज़ाक साफ़ चि‍‍कोटी गहरी होने लगी। विनोदिनी बिहारी से निहोरा कर आई थी- निहायत ही रोज़-रोज़ लिखते न बने, तो कम-से-कम हफ्ते में दो बार तो दो पंक्तियाँ ज़रूर लिखे। आज ही बिहारी की चिट्ठी आए, यह उम्मीद नहीं के बराबर ही थी, लेकिन आकांक्षा ऐसी बलवती हो कि वह दूर सम्भावना की आशा भी विनोदिनी न छोड़ सकी। उसे लगने लगा, जाने कब से कलकत्ता छूट गया है! गाँव में महेन्द्र को लेकर किस क़दर उसकी निन्दा हुई थी, दोस्त-दुश्मन की दया से यह उसकी अजानी न रही। शांति कहाँ!
गाँव के लोगों से उसने अपने को अछूता रखने की कोशिश की। लोग-बाग इससे और भी बिगड़ उठे। पापिनी को पास पाकर घृणा और पीड़न के विलास सुख से अपने को वे वंचित नहीं रखना चाहते। छोटा-सा गाँव- अपने को सबसे छिपाए रखने की कोशिश बेकार है। यहाँ जख्मी हृदय को किसी कोने में दुबकाकर अंधेरे में सेवा-जतन की गुंजाइश नहीं- जहाँ-तहाँ से कौतूहल-भरी निगाह जख्म पर आकर पड़ने लगी। उसका अन्तर टोकरी में बन्द पड़ी ज़िन्दा मछली-सा तड़पने लगा। यहाँ आज़ादी के साथ पूरी तरह दु:ख भोग सकने की भी जगह नहीं।
दूसरे दिन जब चिट्ठी का समय निकल गया तो कमरा बन्द करके विनोदिनी पत्र लिखने बैठी- "भाई साहब, डरो मत, मैं तुम्हें प्रेम-पत्र लिखने नहीं बैठी हूँ। तुम मेरे विचारक हो, तुम्हें प्रणाम करती हूँ। मैंने जो पाप किया, तुमने उसकी बड़ी सख्त सज़ा दी। तुम्हारा हुक्म होते ही मैंने उस सज़ा को माथे पर रख लिया है। अफशोस इसी बात का है कि तुम देख नहीं सके कि यह सज़ा कितनी कड़ी है। देख पाते, कहीं जान पाते, तो तुम्हारे मन में जो दया होती, मैं उससे भी वंचित रही। तुम्हें याद करके, मन-ही-मन तुम्हारे पाँवों के पास माथा टेके मैं उसे भी बर्दाश्त करूँगी। लेकिन प्रभु, कैदी को क्या खाना भी नसीब नहीं होता? व्यंजन न सही, जितना-भर न मिलने से काम नहीं चल सकता, उतना भोजन तो उसका बँधा होता है? मेरे इस निर्वासन का आहार है तुम्हारी दो पंक्तियाँ- वह भी न बदा हो तो वह निर्वासन-दण्ड नहीं, प्राण-दण्ड है। सज़ा देने वाले मेरी इतनी बड़ी परीक्षा न लो। मेरे पापी मन में दम्भ की हद न थी- स्वप्न में भी मुझे यह पता न था कि किसी के आगे मुझे इस क़दर सिर झुकाना पड़ेगा। जीत तुम्हारी हुई प्रभो, मैं बगावत न करूँगी। मगर मुझ पर रहम करो, मुझे जीने दो। इस सूने जंगल में रहने का थोड़ा-बहुत सहारा मुझे दिया करना। फिर तो तुम्हारे शासन से मुझे कोई भी किसी भी हालत में डिगा न सकेगा। यही दुखड़ा रोना था। और जो बातें जी में हैं, कहने को कलेजा मुँह को आता है।- पर वे बातें तुम्हें न बताऊँगी, मैंने शपथ ली है। उस शपथ को मैंने पूरा किया। -तुम्हारी विनोदिनी।"
विनोदिनी ने पत्र डाक में डाल दिया। मुहल्ले के लोग छि:-छि: करने लगे। कमरा बन्द किए रहती है, चिट्ठी लिखा करती है, चिट्ठी के लिए डाकिए को जाकर तंग करती है- दो दिन कलकत्ता रहने से क्या लाज-धरम को इस तरह घोलकर पी जाना चाहिए!
उसके बाद के दिन भी चिट्ठी न मिली। विनोदिनी दिन-भर गुमसुम रही।
बिहारी का उसके पास कुछ भी न था- एक पंक्ति की चिट्ठी तक नहीं। कुछ भी नहीं। वह शून्य में मानो कोई चीज़ खोजती फिरने लगी। बिहारी की किसी निशानी को अपने कलेजे से लगाकर सूखी ऑंखों में वह ऑंसू लाना चाहती थी। ऑंसुओं में मन की सारी कठिनता को गलाकर, विद्रोह की भभकती आग को बुझाकर, वह बिहारी के कठोर आदेश को अन्तर के कोमलतम प्रेम-सिंहासन पर बिठाना चाहती थी। लेकिन सूखे के दिनों की दोपहरी के आसमान- जैसा उसका कलेज़ा सिर्फ जलने लगा।
विनोदिनी ने सुन रखा था, हृदय से जिसे पुकारो, उसे आना ही पड़ता है। इसीलिए हाथ बाँधे ऑंखें मूँदकर वह बिहारी को पुकारने लगी- 'मेरा जीवन सूना पड़ा है, हृदय सूना है, चारों ओर सुनसान है- इस सूनेपन के बीच तुम एक बार आओ। घड़ी-भर को ही सही- तुम्हें आना पड़ेगा। मैं तुम्हें हर्गिज़ नहीं छोड़ सकती।' हृदय से इस तरह पुकारने से विनोदिनी को मानो सच्चा बल मिला। उसे लगा, प्रेम की पुकार का यह बल बेकार नहीं जाने का।
साँझ का दीप-विहीन अंधेरा कमरा जब बिहारी के ध्यादन से घने तौर पर परिपूर्ण हो उठा, जब दीन-दुनिया, गाँव-समाज, समूचा त्रिभुवन प्रलय में खो गया तो अचानक दरवाज़े पर थपकी सुनकर विनोदिनी झटपट ज़मीन पर से उठ खड़ी हुई और दृढ़ विश्वास के साथ दौड़कर दरवाज़ा खोलती हुई बोली- "प्रभु, आ गए?" उसे पक्का विश्वास था कि इस घड़ी दूसरा कोई उसके दरवाज़े पर नहीं आ सकता। महेन्द्र ने कहा- "हाँ, आ गया विनोद!"
विनोदिनी बेहद खीझ से बोल उठी- "चले जाओ, चले जाओ, चले जाओ यहाँ से। अभी चल दो तुरन्त।" महेन्द्र को मानो काठ मार गया।
"हाँ री बिन्दी, तेरी ददिया सास अगर कल..." कहते-कहते कोई प्रौढ़ा पड़ोसिन विनोदिनी के दरवाज़े पर आकर सहसा 'हाय राम!' कहती हुई लम्बा घूँघट काढ़कर भाग गई।
39
टोले में एक हलचल-सी मच गई। देवी थान में इकट्ठे होकर बड़े-बूढ़ों ने कहा- "अब तो बर्दाशत के बाहर है। कलकत्ता के कारनामों को अनसुना भी किया जा सकता था- मगर इसकी यह हिम्मत! लगातार महेन्द्र को चिट्ठी, लिख-लिखकर उसे बुलाकर यहाँ ऐसा खुलकर खेलना, यह बेहयाई! ऐसी पापिन को गाँव में नहीं रहने दिया जा सकता।"
विनोदिनी को विश्वास था कि बिहारी का जवाब आज ज़रूर आएगा। लेकिन न आया। अपने मन में वह कहने लगी- 'बिहारी का मुझ पर अधिकार कैसा! मैं उसका हुक्म मानने क्यों गई? मैंने उसे यह क्यों समझने दिया कि वह जैसा कहेगा, सिर झुकाकर मैं वही मान लूँगी। उससे तो मेरा महज़ उतने ही भर का नाता है, जितना-भर उसकी प्यारी आशा को बचाने की ज़रूरत है। मेरा अपना कोई पावना नहीं, दावा नहीं, मामूली दो पंक्तियां की चिट्ठी भी नहीं- मैं इतनी तुच्छ हूँ?' डाह के ज़हर से विनोदिनी का कलेज़ा भर गया।
काठ की मूरत- जैसी सख्त बनी विनोदिनी जब कमरे में बैठी थी, उसकी ददिया सास दामाद के यहाँ से लौटीं और आते ही उससे बोलीं- "अरी मुँहजली, यह सब क्या सुन रही हूँ?" विनोदिनी ने कहा- "जो सुन रही हो, सब सच है।"
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Re: उपन्यास -आँख की किरकिरी /रविन्द्र नाथ टैगोर

Postby Jemsbond » 20 Jun 2016 13:43

ददिया सास बोलीं- "तो फिर इस कलंक का बोझा लिये यहाँ आने की क्या पड़ी थी- आई क्यों यहाँ?" रुँधे क्रोध से विनोदिनी चुप बैठी रही।
वह बोलीं- "मैं कहे देती हूँ, यहाँ तुम नहीं रह सकती। अपनी खोटी तकदीर, सब तो मर ही गए- वह दु:ख सहकर भी मैं ज़िन्दा हूँ- तुमने हमारा सिर झुका दिया। तुम तुरन्त यहाँ से चली जाओ।" इतने में बिना नहाया- खाया महेन्द्र रूखे- बिखरे बालों से वहाँ आ पहुँचा। तमाम रात जागता रहा था-ऑंखें लाल-लाल, चेहरा सूखा पड़ा। उसने संकल्प किया था कि मुँहअंधेरे ही आकर वह विनोदिनी को साथ ले जाने की फिर से कोशिश करेगा। लेकिन पहले दिन विनोदिनी में अभूतपूर्व घृणा देख उसके मन में तरह-तरह की दुविधा होने लगी। धीरे-धीरे जब वेला चढ़ आई, गाड़ी का समय हो आया, तो स्टेशन के मुसाफिरखाने से निकलकर, मन से सारे तर्क-वितर्क दूर करके वह गाड़ी से सीधा विनोदिनी के यहाँ पहुँचा। हया-शर्म छोड़कर दुस्साहस का काम करने पर आमादा होने से जो एक स्पर्धापूर्ण बल पैदा हो आता है, उसी बल के आवेश में महेन्द्र ने एक उदभ्रांत आनन्द का अनुभव किया- उसका सारा अवसाद और दुविधा जाती रही। गाँव के कौतुहल वाले लोग उस उन्मत्त दृष्टि में उसे काग़ज़ के निर्जीव पुतले-से लगे। महेन्द्र ने किसी तरफ नहीं देखा, सीधा विनोदिनी के पास जाकर बोला- "विनोद, इस लोकनिंदा के खुले मुँह में तुम्हें अकेला छोड़ जाऊँ, ऐसा कायर मैं नहीं हूँ। जैसे भी हो, तुम्हें यहाँ से ले ही जाना पड़ेगा। बाद में तुम मुझे छोड़ देना चाहो, छोड़ देना! मैं कुछ भी न कहूँगा। तुम्हारा बदन छूकर मैं कसम खाता हूँ, तुम जैसा चाहोगी, वही होगा। दया कर सको, तो जीऊँगा और न कर सको, तो तुम्हारी राह से दूर हट जाऊँगा। दुनिया में अविश्वास के काम मैंने बहुतेरे किए हैं। पर आज तुम मुझ पर अविश्वास न करो। अभी हम कयामत के मुँह पर खड़े हैं, यह धोखे का समय नहीं।" विनोदिनी ने बड़े ही सहज भाव से दृढ़ होकर कहा-"मुझे अपने साथ ले चलो। गाड़ी है?"
महेन्द्र ने कहा- "है।"
विनोदिनी की सास ने बाहर आकर कहा- "महेन्द्र, तुम मुझे नहीं पहचानते, मगर तुम हम लोगों के बिराने नहीं हो। तुम्हारी माँ राजलक्ष्मी हमारे ही गाँव की लड़की है, गाँव के रिश्ते से मैं उसकी मामी होती हूँ। मैं तुमसे पूछती हूँ, यह तुम्हारा क्या रवैया है! घर में तुम्हारी स्त्री है, माँ है और तुम ऐसे बेहया पागल बने फिरते हो? भले समाज में तुम मुँह कैसे दिखाओगे?"
महेन्द्र निरुत्तर हो गया तो बुढ़िया बोली- "जाना ही हो तो अभी चल दो, तुरन्त। मेरे घर के बरामदे पर खड़े न रहो- पल-भर की भी देर न करो। अब।"
कहकर बुढ़िया भीतर गई और अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर लिया। बे-नहाई, भूखी, गन्दे कपड़े पहने विनोदिनी ख़ाली हाथों गाड़ी पर जा सवार हुई। जब महेन्द्र भी चढ़ने लगा तो वह बोली- "नहीं, स्टेशन बहुत क़रीब है, तुम पैदल चलो।"
महेन्द्र ने कहा- "फिर तो गाँव के सब लोग मुझे देखेंगे।"
विनोदिनी ने कहा- "अब भी लाज रह गई है क्या?"
और गाड़ी का दरवाज़ा बन्द करके विनोदिनी ने गाड़ीवान से कहा- "स्टेशन चलो!" गाड़ीवान ने पूछा- "बाबू नहीं चलेंगे?"
महेन्द्र ज़रा आगा-पीछा करने के बाद जाने की हिम्मत न कर सका। गाड़ी चल दी। गाँव की गैल छोड़कर महेन्द्र सिर झुकाए खेतों के रास्ते चला।
गाँव की बहुओं को नहाना-खाना हो चुका था। जिन प्रौढ़ाओं को देर से फुरसत मिली, केवल वही अगोछा और तेल का कटोरा लिये बौराए आम के महमह बगीचे की राह घाट को जा रही थीं।
40
महेन्द्र कहाँ चला गया, इस आशंका से राजलक्ष्मी ने खाना-सोना छोड़ दिया। संभव-असंभव सभी जगहों में साधुचरण उसे ढूँढ़ता फिरने लगा- ऐसे में विनोदिनी को लेकर महेन्द्र कलकत्ता आया। पटलडाँगा के मकान में उसे रखकर वह अपने घर गया।
माँ के कमरे में जाकर देखा, कमरा लगभग अंधेरा है। लालटेन की ओट दी गई है। राजलक्ष्मी मरीज़- जैसी बिस्तर पर पड़ी है और पायताने बैठी आशा उनके पाँव सहला रही है। इतने दिनों के बाद घर की बहू को सास के पैरों का अधिकार मिला है।
महेन्द्र के आते ही आशा चौंकी और कमरे से बाहर चली गई। महेन्द्र ने ज़ोर देकर सारी दुविधा हटाकर कहा- "माँ, मुझे यहाँ पढ़ने में सुविधा नहीं होती, इसलिए मैंने कॉलेज के पास एक डेरा ले लिया है। वहीं रहूँगा।"
बिस्तर के एक ओर का इशारा करके राजलक्ष्मी ने कहा- "ज़रा बैठ जा।"
महेन्द्र सकुचाता हुआ बिस्तर पर बैठ गया। बोली-"जहाँ तेरा जी चाहे, तू रह। मगर मेरी बहू को तकलीफ मत देना!" महेन्द्र चुप रहा।
राजलक्ष्मी बोलीं- "अपना भाग ही खोटा है, तभी मैंने अपनी अच्छी बहू को नहीं पहचाना।"- कहते-कहते राजलक्ष्मी का गला भर आया- "लेकिन इतने दिनों तक समझता, प्यार करके तूने उसे इस तकलीफ में कैसे डाला?"
राजलक्ष्मी से और न रहा गया। रो पड़ीं।
वहाँ से उठ भागे तो जी जाय महेन्द्र। लेकिन तुरन्त भागते न बना। माँ के बिस्तर के एक किनारे चुपचाप बैठा रहा। बड़ी देर के बाद राजलक्ष्मी ने पूछा- "आज रात तो यहीं रहेगा न?"
महेन्द्र ने कहा- "नहीं।"
राजलक्ष्मी ने पूछा- "कब जाओगे?"
महेन्द्र बोला- "बस अभी।"
तकलीफ से राजलक्ष्मी उठीं। कहा- "अभी? बहू से एक बार मिलेगा भी नहीं? अरे बेहया, तेरी बेरहमी से मेरा तो कलेजा फट गया।" कहकर राजलक्ष्मी टूटी डाल-सी बिस्तर पर लेट गईं।
महेन्द्र उठकर बाहर निकला। दबे पाँव सीढ़ियाँ चढ़कर वह अपने ऊपर के कमरे की ओर चला। वह चाहता नहीं था कि आशा से भेंट हो।
ऊपर पहुँचते ही उसकी नज़र पड़ी, कमरे के सामने सायबान वाले बरामदे में आशा ज़मीन पर ही पड़ी थी। उसने महेन्द्र के पैरों की आहट नहीं सुनी थी, अचानक उसे सामने देख कपड़े सम्हालकर उठ बैठी। इस समय कहीं एक बार भी महेन्द्र ने चुन्नी कहकर पुकारा होता, तो वह महेन्द्र के सारे अपराधों को अपने सिर लेकर माफ की गई अपराधिनी की तरह उसके दोनों पैर पकड़कर जीवन-भर का रोना रो लेती। लेकिन महेन्द्र वह नाम लेकर न पुकार सका है।
आशा संकोची बैठी रही। महेन्द्र ने भी कुछ न कहा। चुपचाप छत पर टहलने लगा। चाँद अभी तक उगा न था। छत के एक कोने में छोटे-से गमले के अन्दर रजनीगंधा के दो डंठलों में दो फूल खिले थे। छत पर के आसमान के वे नखत, वह सतभैया, वह कालपुरुष, उनके जाने कितनी संध्यार के एकांत प्रेमाभिनय के मौन गवाह थे- आज वे सब टुकुर-टुकुर ताकते रहे।
महेन्द्र सोचने लगा- इधर के इन कई दिनों की इस विप्लव-कथा को इस आसमान के अंधेरे से पोंछकर ठीक पहले की तरह अगर खुली छत पर चटाई डाले आशा की बगल में उसी सदा की जगह में सहज ही बैठ पाता! कोई सवाल नहीं, कोई जवाबदेही नहीं; वही विश्वास, वही प्रेम, वही सहज आनन्द! लेकिन हाय, यहाँ उतनी-सी जगह को फिर लौटने की गुंजाइश नहीं। छत की चटाई पर आशा के पास की जगह का वह हिस्सा महेन्द्र ने खो दिया है। अब तक विनोदिनी का महेन्द्र से एक स्वाधीन संबंध था, प्यार करने का पागल सुख था, लेकिन अटूट बन्धन नहीं था। अब वह विनोदिनी को खुद समाज से छीनकर ले आया है, अब उसे कहीं भी रख आने की, कहीं भी लौटा आने की जगह नहीं रही- महेन्द्र ही अब उसका एक-मात्र अवलंब है। अब इच्छा हो या न हो, विनोदिनी का सारा भार उसे उठाना ही पड़ेगा।
लम्बी उसाँस लेकर महेन्द्र ने एक बार आशा की ओर देखा। मौन रुलाई से अपनी छाती भरे आशा तब भी उसी तरह बैठी थी- रात के अंधेरे ने माँ के दामन की तरह उसकी लाज और वेदना लपेट रखी थी। न जाने क्या कहने के लिए महेन्द्र अचानक आशा के पास आकर खड़ा हुआ। सर्वांग की नसों का लहू आशा के कान में सिमटकर चीखने लगा- उसने ऑंखें मूंद लीं। महेन्द्र सोच नहीं पाया कि वह आखिर क्या कहने आया था- कहने को उस पर है भी क्या? लेकिन, बिना कुछ कहे अब लौट भी न सका। पूछा- "कुंजियों का झब्बा कहाँ है?"
कुंजियों का झब्बा बिस्तर के नीचे था। आशा उठकर कमरे में चली गई। महेन्द्र उसके पीछे-पीछे गया। बिस्तर के नीचे से कुंजियाँ निकालकर आशा ने बिस्तर पर रख दीं। झब्बे को लेकर महेन्द्र अपने कपड़ों की अलमारी में एक-एक कुंजी लगाकर देखने लगा। आशा रह न सकी। बोल पड़ी- "उस अलमारी की कुंजी मेरे पास न थी।"
कुंजी किसके पास थी, यह बात उसकी ज़बान से न निकल सकी, लेकिन महेन्द्र ने समझा। आशा जल्दी-जल्दी कमरे के बाहर निगल गई; उसे डर लगा, कहीं महेन्द्र के पास ही उसकी रुलाई न छूट पड़े। अंधेरी छत की दीवार के एक कोने की तरफ मुँह फेरकर खड़ी-खड़ी उफनती हुई वह रुलाई दबाकर रोने लगी।
लेकिन रोने का ज़्यादा समय न था। एकाएक उसे याद आ गया, महेन्द्र के खाने का समय हो गया। तेज़ी से वह नीचे उतर गई। राजलक्ष्मी ने आशा से पूछा- "महेन्द्र कहाँ है, बहू?"
आशा ने कहा- "ऊपर।"
राजलक्ष्मी- "और तुम उतर आई?"
आशा ने सिर झुकाकर कहा- "उनका खाना..."
राजलक्ष्मी- "खाने का इंतज़ाम मैं कर रही हूँ- तुम ज़रा हाथ-मुँह धो लो और अपनी वह ढाका वाली साड़ी पहनकर मेरे पास आओ- मैं तुम्हारे बाल सँवार दूँ।"
सास के लाड़ को टालना भी मुश्किल था, लेकिन साज-शृंगार के इस प्रस्ताव से वह शर्मा गई। मौत की इच्छा करके भीष्म जैसे चुपचाप तीरों की वर्षा झेल गए थे, उसी प्रकार आशा ने भी बड़े धीरज से सास का सारा साज सिंगार स्वीकार कर लिया।
बन-सँवरकर धीमे-धीमे वह ऊपर गई। झाँककर देखा, महेन्द्र छत पर नहीं था। कमरे के दरवाज़े से देखा, वह कमरे में भी न था- खाना यों ही पड़ा था।
कुंजी नहीं मिली, सो अलमारी तोड़कर महेन्द्र ने कुछ ज़रूरी कपड़े और काम की किताबें निकाल लीं और चला गया।
अगले दिन एकादशी थी। नासाज़ और भारी-भारी-सी राजलक्ष्मी बिस्तर पर लेटी थीं। बाहर घटाएँ घिरी थीं। ऑंधी-पानी के आसार। आशा धीरे-धीरे कमरे में गई। धीरे-से उनके पैरों के पास बैठकर बोली- "तुम्हारे लिए दूध और फल ले आई हूँ माँ, चलो, खा लो!"
करुणा-मूर्ति बहू की सेवा की चेष्टा, जिसकी वह आदी न थी, देखकर राजलक्ष्मी की सूखी ऑंखें उमड़ आईं। वह बैठीं। आशा ने अपनी गोद में खींचकर उसके गीले गाल चूमने लगीं। पूछा- "महेन्द्र कर क्या रहा है, बहू!"
आशा लजा गई। धीमे-से कहा- "वे चले गए।"
राजलक्ष्मी- "चला गया? मुझे तो पता भी न चला।"
आशा बोली- "वे कल रात ही चले गए।"
सुनते ही राजलक्ष्मी की कोमलता मानो काफ़ूर हो गई; बहू के प्रति उनके स्नेह-स्पर्श में रस का नाम न रह गया। आशा ने एक मौन लांछन का अनुभव किया और सिर झुकाए चली गई।
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रात को जब उसे पटलडाँगा के डेरे पर छोड़कर महेन्द्र अपने कपड़े और किताबें लाने घर चला गया, तो कलकत्ता के अविश्राम जन-स्रोत की हलचल में अकेली बैठी विनोदिनी अपनी बात सोचने लगी। दुनिया में पनाह की जगह काफ़ी तो उसे कभी भी न थी, इतनी ज़रूर थी कि अगर एक ओर गरम हो जाए, तो दूसरी तरफ करवट बदलकर सो सके। आज लेकिन निर्भर करने की जगह निहायत सँकरी हो गई थी। जिस नाव पर सवार होकर वह प्रवाह में बह चली है, उसके दाएँ-बाएँ किसी भी तरफ ज़रा झुक जाने से पानी में गिर पड़ने की नौबत। लिहाज़ा बड़ी सावधानी से पतवार पकड़नी थी- ज़रा-सी चूक, ज़रा-सा हिलना-डुलना भी मुहाल। ऐसी हालत में भला किस औरत का कलेजा नहीं काँपता। पराये मन को मुट्ठी में रखने के लिए जिस चुहल की जरूरत है, जितनी ओट चाहिए, इस सँकरेपन में उसकी गुंजाइश कहाँ! महेन्द्र के एकबारगी आमने-सामने रहकर सारी ज़िंदगी बितानी पड़ेगी। फ़र्क़ इतना ही है कि महेन्द्र के किनारे लगने की गुंजाइश है, विनोदिनी के लिए वह भी नहीं।
अपनी इस असहाय अवस्था को वह जितना ही समझने लगी, उतना ही उसे बल मिलने लगा। कोई-न-कोई उपाय करना ही पड़ेगा, ऐसे काम नहीं चलने का।
बिहारी को प्रेम-निवेदित करने के दिन से ही विनोदिनी के धीरज का बाँध टूट गया था। अपने जिस उमगे हुए चुंबन को वह उसके पास लौटाकर ले आई, संसार में और किसी के पास उसे उतारकर नहीं रख सकती। पूजा के चढ़ावे की तरह देवता के लिए उसे रात-दिन ढोने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। उसका मन कभी हथियार डाल देना नहीं जानता, निराशा वह नहीं मानती। उसका मन बार-बार उससे कह रहा था- "यह पूजा बिहारी को कबूल करनी ही पड़ेगी।"
उसके इस अदम्य प्रेम से उसकी आत्म-रक्षा की आकांक्षा आकर मिल गई। बिहारी के सिवाय उसके पास और कोई चारा नहीं। महेन्द्र को उसने अच्छी तरह समझ लिया था।- उस पर टिकना चाहो तो वह भार नहीं सह सकता- छोड़ने पर ही उसे पाया जा सकता है- पकड़ना चाहो कि भाग खड़ा होना चाहता है। लेकिन औरत के लिए जिस एक निश्चित, विश्वासी सहारे की नितांत आवश्यकता है, वह सहारा बिहारी ही दे सकता है। अब बिहारी को छोड़ने से उसका काम हर्गिज नहीं चल सकता।
यह सोचकर उसने खिड़की खोली और गैस की रोशनी से दमकते शहर की ओर देखने लगी, बिहारी अभी साँझ को इस शहर में ही है, यहाँ से एकाध रास्ते, दो-चार गलियाँ पार करके अभी-अभी उसके दरवाज़े पर मज़े में पहुँचा जा सकता है। द्वार के बाद ही नल वाला छोटा-सा अंगना, वही सीढ़ी, वही सज़ा-सजाया कमरा-सन्नाटे में बिहारी आराम-कुर्सी पर अकेला बैठा-शायद सामने खड़ा ब्राह्मण का वह लड़का, गोल-मटोल, गोरा-गोरा सुन्दर-सा वह लड़का नजर गड़ाये तस्वीरों वाली किसी किताब के पन्ने पलट रहा हो- एकाएक सारे चित्र को सुधि में लाकर स्नेह से, प्रेम से विनोदिनी का सर्वांग पुलकित हो उठा। जी चाहे तो अभी वहाँ पहुँच जाया जा सकता है। यह सोचकर विनोदिनी इस इच्छा को छाती से लगाए खेलने लगी। पहले की बात होती, तो शायद वह अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए लपक पड़ती, लेकिन अब आगे-पीछे बहुत सोचना पड़ता है। अब तो महज़ वासना पूरी करने का सवाल नहीं रहा, उद्देश्य की पूर्ति करनी है। विनोदिनी सोचने लगी- 'पहले यह देखूँ कि बिहारी जवाब क्या देता है, उसके बाद तय करूँगी कि किस रास्ते जाना है।' कुछ समझे बिना बिहारी को तंग करने के लिए जाने की हिम्मत न पड़ी।
इसी तरह सोचते-विचारते जब रात के नौ बज गए तो महेन्द्र लौटकर आ गया। ये कई दिन उसे भूखे-प्यासे, बदपरहेजी और उत्तेजना में कटे। आज कामयाब होकर विनोदिनी को वह अपने डेरे में ले आया; इसीलिए थकावट से मानो चूर-चूर हो गया। दुनिया से, अपने मन की हालत से लड़ने लायक़ बल उसमें नहीं रह गया था। भारों से लदे उसके भावी जीवन की थकावट ने मानो पहले से ही उसे दबोच लिया। बाहर से दरवाज़े के कड़े खटखटाने में महेन्द्र को बड़ी शर्म लगने लगी। जिस पागलपन में दुनिया का कोई ख्याल ही न किया, वह पागलपन कहाँ! रास्ते के अचीन्हे- अजाने लोगों की नज़र के सामने भी उसका सर्वांग सकुचा क्यों रहा है?
अन्दर नया नौकर सो गया था। दरवाज़ा खुलवाने के लिए बड़ा हंगामा करना पड़ा। अपरिचित नए डेरे के अंधेरे में पहुँचाने पर महेन्द्र का मन ढीला पड़ ही गया। माँ का लाड़ला महेन्द्र जिन विलास-उपकरणों- पंखे, कुर्सी, सोफे-का आदी रहा है, उसका अभाव यहाँ साफ़ दिख गया। इन कमी-खामियां को मिटाना ही पड़ेगा। डेरे के सारे इन्तज़ाम का भार उसी पर था। महेन्द्र ने आज तक कभी अपने या किसी के आराम के फ़िक्र नहीं की- आज से उसे एक नए और अधूरे संसार का तीली-तीली भार उठाना। सीढ़ी पर एक ढिबरी धुऑं उगलती हुई टिमटिमा रही थी; वहाँ के लिए एक लैम्प लाना पड़ेगा। बरामदे से सीढ़ी को जाने वाला रास्ता नल के पानी से चिपचिपाता रहता, मिस्त्री बुलाकर सीमेंट से उसकी मरम्मत करानी पड़ेगी। सड़क की तरफ के दो कमरे जूतों की दुकान वालों के जिम्मे थे, उन्होंने अभी तक उन्हें ख़ाली नहीं किया-मकान-मालिक से इसके लिए लड़ेगा। सारा काम खुद ही करना पड़ेगा- लम्हे-भर में यह बात दिमाग में आई और उसकी थकावट के भार पर और भी बोझ लद गया।
सीढ़ी पर कुछ देर खड़े रहकर महेन्द्र ने अपने को सँभाल लिया- विनोदिनी के प्रति जो प्रेम था, उसे उभारा। अपने-आपको समझाया कि आज तक सारी दुनिया को भूलकर उसने जो चाहा था, वह मिल गया- दोनों के बीच अब अड़चन की कोई दीवार नहीं- आज तो महेन्द्र की खुशी का दिन है। कोई अड़चन नहीं थी- लेकिन सबसे बड़ी अड़चन यही थी- आज वह आप ही अपनी बाधा था।
रास्ते में महेन्द्र को देखकर विनोदिनी ध्याअन के आसन से उठी। कमरे में रोशनी जलाई। सिलाई का काम लेकर नज़र झुकाए बैठ गई। सिलाई उसकी एक ओट- थी। उसकी आड़ में मानो उसका एक आश्रय था। कमरे में आकर महेन्द्र बोला- "यहाँ, ज़रूर तुम्हें बड़ी असुविधा हो रही है, विनोद!"
अपनी सिलाई में लगी-लगी बोली- "बिल्कुल नहीं।"
महेन्द्र बोला- "दो ही तीन दिनों में मैं सारा सामान ले आऊँगा। कुछ दिन तुम्हें थोड़ी तकलीफ होगी।"
विनोदिनी बोली- "नहीं, वह न होगा- तुम अब एक भी सामान और न लाओ- जो है, वही मेरे ज़रूरत से कहीं ज़्यादा है।" महेन्द्र ने कहा- "मैं अभागा भी क्या उससे कहीं ज़्यादा में हूँ?"
विनोदिनी- "अपने को उतना ज़्यादा लगाना ठीक नहीं, कुछ विनय रहनी चाहिए।"
दीये की जोत में सूने कमरे में सिर झुकाए विनोदिनी की उस आत्मतल्लीन मूर्ति को देखकर महेन्द्र के मन में फिर उसी मोह का संचार हुआ।
घर में होता तो दौड़कर विनोदिनी के पैरों में गिर पड़ता- मगर यह घर तो था नहीं, इसलिए वैसा न कर सका। आज विनोदिनी बड़ी बेचारी थी बिलकुल महेन्द्र की मुट्ठी में- आज अपने को संयत न रखे तो बड़ी कायरता होगी।
विनोदिनी ने कहा- "अपने किताब-कपड़े यहाँ क्यों ले आए?"
महेन्द्र ने कहा- "उन्हें मैं अपने लिए ज़रूरी सामान मानता हूँ- वे कहीं ज़्यादा वाले वर्ग में नहीं हैं..."
विनोदिनी- "मालूम है, मगर यहाँ क्यों?"
महेन्द्र- "ठीक है, आवश्यक चीज़ें यहाँ नहीं सोहतीं-विनोद, इन किताबों-विताबों को उठाकर रास्ते पर फेंक देना, मैं चूँ भी न करूँगा- केवल उनके साथ मुझे भी मत उठा फेंकना।" इतना कहकर महेन्द्र थोड़ा खिसक आया और कपड़ों में बँधी किताबों की गाँठ को विनोदिनी के पैरों के पास रख दिया।
उसी गंभीर भाव से सिलाई करती हुई विनोदिनी बोली- "भाई साहब, तुम यहाँ नहीं रहोगे।"
अपने उठते हुए आग्रह पर चोट पाकर महेन्द्र व्याकुल हो उठा। गद्गद स्वर में बोला- "क्यों, तुम मुझे दूर क्यों रखना चाहती हो? तुम्हारे लिए सब-कुछ छोड़ने का यही पुरस्कार है?" विनोदिनी- "अपने लिए मैं तुम्हें सब-कुछ न छोड़ने दूँगी।"
महेन्द्र कह उठा- "अब वह तुम्हारे हाथ की बात नहीं- सारी दुनिया मेरी चारों तरफ से खिसक पड़ी है-बस, एक तुम हो- तुम विनोद..." कहते-कहते विह्नल होकर महेन्द्र लौट पड़ा और विनोदिनी के पैरों को पकड़कर उन्हें बार-बार चूमने लगा।
पाँव छुड़ाकर विनोदिनी उठ खड़ी हुई। बोली- "याद नहीं, तुमने क्या प्रतिज्ञा की थी?"
सारी शक्ति लगाकर महेन्द्र ने अपने को ज़ब्त किया। कहा- "याद है मैंने शपथ ली थी कि तुम जो चाहोगी वही होगा, मैं कभी कोई एतराज़ न करूँगा। उस शपथ को मैं रखूँगा। बताओ, मुझे क्या करना है?" विनोदिनी- "तुम अपने घर पर रहोगे।"
महेन्द्र- "एक मैं ही क्या तुम्हारी अनिच्छा की वस्तु हूँ, विनोद! अगर यही बात है तो तुम मुझे खींच क्यों लाई? जो तुम्हारे भोग की चीज़ न थी, उसके शिकार की क्या ज़रूरत पड़ी थी? सच-सच बताओ, मैंने स्वेच्छा से तुम्हें पकड़ लि‍या या तुमने जानकर मुझे पकड़ा? मुझसे तुम इस तरह खिलवाड़ करोगी और यह भी मुझे सहना पड़ेगा? फिर भी अपनी शपथ मैं रखूँगा, जिस घर को मैं लात मारकर आया, वहीं जाकर रहूँगा।"
विनोदिनी ज़मीन पर बैठी फिर से सिलाई में जुट गई।
कुछ देर तक उसके मुँह की ओर एकटक देखकर महेन्द्र बोल उठा- "बेरहम! निर्दयी हो तुम, विनोद! मैं बड़ा ही अभागा हूँ कि मैंने तुम्हें प्यार किया।"
विनोदिनी से सिलाई में कोई गलती हो गई। रोशनी के पास बड़ी मेहनत से वह धागे को खोजने लगी। महेन्द्र के जी में आ रहा था कि विनोदिनी के संगदिल को अपनी मुट्ठी में लेकर पीस डाले। उसकी इस मौन निर्दयता और अडिग उपेक्षा को धक्का देकर बाहु-बल से शिकस्त देने को जी चाह रहा था।
महेन्द्र बाहर निकला और फिर-फिर लौट आया। बोला- "मैं न रहूँगा तो यह तुम्हारी हिफाज़त कौन करेगा?"
विनोदिनी- "उसकी तो तुम फ़िक्र ही न करो। बुआ ने उस छमिया नौकरानी को जवाब दे दिया है। आज से वह यहीं रहेगी। अन्दर से घर बन्द करके हम दोनों मज़े में यहाँ रह लेंगी।" भीतर-भीतर उस पर जितना ही गुस्सा आने लगा, विनोदिनी के लिए उसका उतना ही ज़बरदस्त खिंचाव होने लगा। उस टस से मस न होने वाली मूरत को वज्र की ताकत से छाती से चिपकाकर चूर-चूर कर देने की इच्छा होने लगी। अपनी उस प्रबल इच्छा के हाथों से छुटकारा पाने के लिए महेन्द्र दौड़कर कमरे से बाहर चला गया।
रास्ते से जाते हुए महेन्द्र प्रतिज्ञा करने लगा, उपेक्षा के बदले में वह विनोदिनी की उपेक्षा ही करेगा। संसार में महेन्द्र के सिवाय अब विनोदिनी का और कोई सहारा नहीं, ऐसी हालत में भी इस निडरता और अडिगता से उसे ठुकराना- किसी मर्द के नसीब में ऐसा भी अपमान कभी हुआ है। महेन्द्र का गर्व चूर-चूर होकर भी मटियामेट न हुआ- पीड़ित और दलित होता रहा। वह सोचने लगा- 'ऐसा नाचीज़ हूँ मैं! मेरे लिए ऐसी स्पर्धा उसके मन में कैसे आई? मेरे सिवाय इस समय उसका और है कौन?'
सोचते-सोचते अचानक याद आ गया- 'बिहारी'। सहसा उसके कलेजे का रक्त-प्रवाह थम गया। बिहारी को ही उसने अपना भरोसा माना है- मैं तो उपलक्ष्य-मात्र हूँ, उसकी सीढ़ी हूँ, पैर रखने की, कदम-कदम पर ठोकर मारने की जगह। इसी साहस पर मेरी ऐसी अवज्ञा।
महेन्द्र को शंका हुई कि विनोदिनी से बिहारी की चिट्ठी-पत्री चलती होगी और इसे कोई भरोसा मिला होगा। सोचा और उसी दम वह बिहारी के घर की ओर चल पड़ा। जब उसके घर पहुँचा, तो रात नहीं के बराबर बाकी रह गई थी। बड़ी मुश्किल से दरवाज़ा पीटते-पीटते बैरे ने दरवाज़ा खोलकर बताया- "बाबूजी घर पर नहीं हैं।"
महेन्द्र चौंक उठा। सोचा, 'मैं इधर नासमझ की तरह मारा-मारा फिर रहा हूँ और इस मौके का फ़ायदा उठाकर बिहारी विनोदिनी के पास गया है। इसीलिए उसने इस बेरहमी से मेरा अपमान किया और मैं भी मारकर भगाए गए गदहे की तरह भाग आया।'
महेन्द्र ने उस जाने-पहचाने पुराने बैरे से पूछा-"भज्जो, मालिक तुम्हारे घर से किस वक्त निकले हैं?" भज्जो ने कहा- "जी, चार-पाँच दिन हो गए। पछाँह की ओर कहीं घूमने गए हैं।"
महेन्द्र की मानो जान में जान आई। जी में आया, 'अब आराम से थोड़ी देर सो लूँ। तमाम रात भटकते रहने की अब हिम्मत नहीं है।' वह ऊपर गया और बिहारी के कमरे में सोफे पर सो गया।
जिस रात महेन्द्र ने बिहारी के घर जाकर ऊधम मचाया, उसके दूसरे ही दिन बिना कुछ तय किए बिहारी न जाने कहाँ चला गया। उसने सोचा, 'यहाँ रहने से जाने कब अपने दोस्त से ऐसा घिनौना संघर्ष हो जाए कि जन्म-भर पछताना पड़े।'
दूसरे दिन महेन्द्र जगा तो ग्यारह बज चुके थे। उठते ही उसकी निगाह सामने की तिपाई पर पड़ी। देखा, बिहारी का एक पत्र पड़ा था। ठिकाने के हरफ विनोदिनी के थे। लिफाफा पत्थर के पेपर-वेट से दबा था। महेन्द्र ने झपटकर उसे उठा लिया। लिफाफा खोला नहीं गया था। प्रवासी बिहारी के इन्तज़ार में बन्द पड़ा था। काँपते हाथों से महेन्द्र ने उसे फाड़ डाला और पढ़ने लगा। यही चिट्ठी विनोदिनी ने अपने गाँव से बिहारी को भेजी थी, जिसका उसे कोई जबाव नहीं मिला था।
चिट्ठी का एक-एक अक्षर महेन्द्र को काटने लगा। छुटपन से सदा ही बिहारी महेन्द्र की ही ओट में पड़ा था। प्रेम-स्नेह के नाते महेन्द्र-देवता के गले की उतरी माला ही उसे नसीब हुआ करती। आज महेन्द्र स्वयं प्रार्थी तथा बिहारी विमुख था, फिर भी विनोदिनी ने महेन्द्र को ठुकराकर बिहारी को अपनाया। विनोदिनी की चिट्ठियाँ महेन्द्र को भी दो-चार मिली थीं, मगर इसके मुकाबले वे निरी नकली हैं, नासमझ को फुसलाने का बहाना!
अपना नया ठिकाना बताने के लिए महेन्द्र को गाँव के डाकखाने में भेजने की व्याकुलता महेन्द्र को याद आई और अब उसका कारण उसकी समझ में आया। विनोदिनी बिहारी के पत्र का बेसब्री से इन्तजार कर रही है।
जैसाकि पहले किया करता था, मालिक की गैरहाजिरी में भज्जो ने महेन्द्र को बाज़ार से लाकर चाय-नाश्ता दिया। नहाना महेन्द्र भूल गया। तभी जैसे रेत पर राही जल्दी-जल्दी क़दम उठाकर चलता है, उसी तरह विनोदिनी की जलाने वाली चिट्ठी पर वह तेजी से नजर दौड़ाने लगा। वह प्रतिज्ञा करने लगा कि विनोदिनी से अब हर्गिज भेंट न करूँगा।फिर मन में आया, 'और दो-एक दिन में जब उसे बिहारी का जवाब न मिलेगा, तो वह बिहारी के यहाँ आएगी और तब सारा हाल जानकर उसे तसल्ली होगी।' यह संभावना महेन्द्र के लिए असह्य हो गई।
आखिर उस पत्र को अपनी जेब में डालकर वह पटलडाँगा पहुँचा। महेन्द्र की यह गत देखकर विनोदिनी को दया आ गई। वह समझ गई- हो न हो तमाम रात वह रास्ते के ही चक्कर काटता रह गया है। पूछा- "रात घर नहीं गए?"
महेन्द्र ने कहा- "नहीं।"
विनोदिनी ने परेशान होकर पूछा- "अभी तक खाया-पिया भी नहीं क्या?" कहकर सेवा-परायणा विनोदिनी ने उसके खाने का इन्तज़ाम करना चाहा। महेन्द्र बोला- "रहने दो, मैं खा चुका हूँ।"
विनोदिनी- "कहाँ खाया?"
महेन्द्र- "बिहारी के यहाँ।"
पलभर के लिए विनोदिनी का चेहरा पीला पड़ गया। ज़रा देर चुप रहकर उसने अपने को सँभाला और पूछा-"बिहारी बाबू कुशल से तो हैं न?"
महेन्द्र बोला- "कुशल से ही है। वह तो पछाँह चला गया।" महेन्द्र ने कुछ इस लहज़े से कहा मानो बिहारी आज ही गया है।
विनोदिनी का चेहरा फिर एक बार पीला पड़ गया। फिर अपने को सँभालकर बोली- "ऐसा डाँवाडोल आदमी तो मैंने नहीं देखा। उन्हें हम लोगों का सारा हाल मालूम पड़ गया है? खूब नाराज़ हो गए हैं क्या?" महेन्द्र- "नाराज़ न हुआ होता तो इस शिद्दत की गर्मी में भी कोई भला आदमी पछाँह घूमने जाता है!"
विनोदिनी- "मेरे बारे में कुछ कहा?"
महेन्द्र- "कहने को क्या है। यह उसकी चिट्ठी लो!"
चिट्ठी उसके हाथ में देकर महेन्द्र तीखी नज़र से उसके मुँह के भाव पर गौर करने लगा।
विनोदिनी ने झट से चिट्ठी लेकर देखी, खुली थी वह। लिफाफे पर उसी के हरफ में बिहारी का नाम लिखा था। अन्दर से चिट्ठी निकाली। वह उसी की लिखी वही चिट्ठी थी। उलटकर देखा, बिहारी का जवाब तो कहीं न मिला।
थोड़ी देर चुप रहकर विनोदिनी ने पूछा- "यह चिट्ठी तुमने पढ़ी है?"
विनोदिनी के चेहरे के भाव से महेन्द्र को डर लगा। वह झूठ बोल गया- "नहीं।"
विनोदिनी ने चिट्ठी फाड़ डाली। उसके टुकड़े-टुकड़े किए और खिड़की से बाहर फेंक दिए।
महेन्द्र बोला- "मैं घर जा रहा हूँ।"
विनोदिनी ने कोई जवाब न दिया।
महेन्द्र- "तुमने जैसा चाहा है, मैं वैसा ही करूँगा। सात दिन मैं वहीं रहूँगा। कॉलेज आते समय रोज़ नौकरानी की मार्फत यहाँ का सारा प्रबन्ध कर जाया करूँगा। तुमसे भेंट करके तुम्हें आजिज़ न करूँगा।" विनोदिनी महेन्द्र की कोई बात सुन भी पाई या नहीं, कौन जाने, मगर उसने कोई जवाब न दिया। खुली खिड़की से बाहर अंधेरे आसमान को ताकती रही। अपनी चीज़ें उठाकर महेन्द्र वहाँ से निकल पड़ा।
सूने कमरे में विनोदिनी बड़ी देर तक काठ की मारी-सी बैठी रही और अंत में मानो जी-जान से अपने को सजग करने के लिए छाती का कपड़ा फाड़कर अपने पर बेरहमी से चोट करने लगी। आवाज़ पाकर नौकरानी दौड़ी आई- "दादी जी, क्या कर रही हैं?"
"तू चली जा यहाँ से"- डपटकर विनोदिनी ने छमिया को कमरे से बाहर निकाल दिया। उसके बाद ज़ोरों से किवाड़ बंद करके दोनों हाथों से मुट्ठी बाँधकर ज़मीन पर लोट गई- तीर खाए जानवर जैसी रोने लगी। अपने को इस तरह विक्षत और श्रांत बनाकर विनोदिनी रात-भर खिड़की के पास नीचे पड़ी रही।
सुबह जैसे ही सूरज की किरणें कमरे में आईं विनोदिनी को अचानक ऐसा लगा, बिहारी गया नहीं होगा, कहीं उसे चकमा देने के लिए महेन्द्र ने यों ही झूठ कह दिया हो। उसने छमिया को बुलाकर कहा- "छम्मी, तू फौरन ज़रा बिहारी भाई साहब के यहाँ जा-उन लोगों का हाल पूछ आ।"
छमिया कोई घंटे-भर बाद लौटकर बोली- "उनके घर के सारे खिड़की-दरवाज़े बन्द हैं। दरवाज़ा पीटने पर अन्दर से बैरा निकला। बोला- 'वे घर पर नहीं हैं। वे घूमने के लिए पछाँह गए हैं'।" विनोदिनी के संदेह का कोई कारण ही न रहा।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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