हिन्दी उपन्यास – रंगभूमि – लेखक – मुंशी प्रेमचंद

Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – रंगभूमि – लेखक – मुंशी प्रेमचंद

Post by Jemsbond » 02 Jan 2017 22:38


इंदु-मुझे क्या खबर थी कि बोर्ड में क्या हो रहा है। आपने भी तो कहा था कि उस प्रस्ताव के पास होने की सम्भावना नहीं है।
राजा-कुछ नहीं, तुम मेरा अपमान करना चाहती हो।
इंदु-आप उस दिन सूरदास का गुण-गान कर रहे थे। मैंने समझा, चंदे में कोई हरज नहीं है। मैं किसी के मन के रहस्य थोड़े ही जानती हूँ। आखिर वह प्रस्ताव पास क्योंकर हो गया?
राजा-अब मैं यह क्या जानूँ, क्योंकर पास हो गया। इतना जानता हूँ कि पास हो गया। सदैव सभी काम अपनी इच्छा या आशा के अनुकूल ही तो नहीं हुआ करते। जिन लोगों पर मेरा पूरा विश्वास था, उन्हीं ने अवसर पर दगा दी, बोर्ड में आए ही नहीं। मैं इतना सहिष्णु नहीं हूँ कि जिसके कारण मेरा अपमान हो, उसी की पूजा करूँ। मैं यथाशक्ति इस प्रतिमा-आंदोलन को सफल न होने दूँगा। बदनामी तो हो ही रही है, और हो, इसकी परवा नहीं। मैं सरकार को ऐसा भर दूँगा कि मूर्ति खड़ी न होने पाएगी। देश का हित करने की शक्ति अब चाहे न हो, पर अहित करने की है, और दिन-दिन बढ़ती जाएगी। तुम भी अपना चंदा वापस कर लो।
इंदु-(विस्मित होकर) दिए हुए रुपये वापस कर लूँ?
राजा-हाँ, इसमें कोई हरज नहीं।
इंदु-आपको कोई हरज न मालूम होता हो, मेरी तो इसमें सरासर हेठी है।
राजा-जिस तरह तुम्हें मेरे अपमान की परवा नहीं, उसी तरह यदि मैं भी तुम्हारी हेठी की परवा न करूँ, तो कोई अन्याय न होगा।
इंदु-मैं आपसे रुपये तो नहीं माँगती?
बात-पर-बात निकलने लगी, विवाद की नौबत पहुँची, फिर व्यंग्य की बारी आई, और एक क्षण में दुर्वचनों का प्रहार होने लगा। अपने-अपने विचार में दोनोें ही सत्य पर थे, इसलिए कोई न दबता था।
राजा साहब ने कहा-न जाने वह कौन दिन होगा कि तुमसे मेरा गला छूटेगा। मौत के सिवा शायद अब कहीं ठिकाना नहीं है।
इंदु-आपको अपनी कीर्ति और सम्मान मुबारक रहे। मेरा भी ईश्वर मालिक है। मैं भी जिंदगी से तंग आ गई। कहाँ तक लौंडी बनूँ अब हद हो गई।
राजा-तुम मेरी लौंडी बनोगी! वे दूसरी सती स्त्रिायाँ होती हैं, जो अपने पुरुषों पर प्राण दे देती हैं। तुम्हारा बस चले, तो मुझे विष दे दो, और दे ही रही हो, इससे बढ़कर और क्या होगा!
इंदु-यह विष क्यों उगलते हो? साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि मेरे घर से निकल जा। मैं जानती हूँ, आपको मेरा रहना अखरता है। आज से नहीं, बहुत दिनों से जानती हूँ। उसी दिन जान गई थी, जब मैंने एक महरी को अपनी नई साड़ी दे दी थी और आपने महाभारत मचाया था। उसी दिन समझ गई थी कि यह बेल मुढ़े चढ़ने की नहीं। जितने दिन यहाँ रही, कभी आपने यह न समझने दिया कि यह मेरा घर है। पैसे-पैसे का हिसाब देकर भी पिंड नहीं छूटा। शायद आप समझते होंगे कि यह मेरे ही रुपये को अपना कहकर मनमाना खर्च करती है, और यहाँ आपकी एक धोला छूने की कसम खाती हूँ। आपके साथ विवाह हुआ है, कुछ आत्मा नहीं बेची है।
महेंद्र ने ओठ चबाकर कहा-भगवान् सब दु:ख दे, बुरे का संग न दे। मौत भले ही दे दे। तुम-जैसी स्त्राी का गला घोंट देना भी धार्म-विरुध्द नहीं। इस राज्य की कुशल मनाओ कि चैन कर रही हो। अपना राज्य होता, तो यह कैंची की तरह चलनेवाली जबान तालू से खींच ली जाती।
इंदु-अच्छा, अब चुप रहिए, बहुत हो गया। मैं आपकी गालियाँ सुनने नहीं आई हूँ, यह लीजिए अपना घर, खूब टाँगें फैलाकर सोइए।
राजा-जाओ, किसी तरह अपना पौरा तो ले जाओ। बिल्ली बख्शे, चूहा अकेला ही भला!
इंदु ने दबी जबान से कहा-यहाँ कौन तुम्हारे लिए दीवाना हो रहा है!
राजा ने क्रोधाोन्मत्ता होकर कहा-गालियाँ दे रही है! जबान खींच लूँगा।
इंदु जाने के लिए द्वार तक आई थी। यह धामकी सुनकर फिर लौट पड़ी और सिंहनी की भाँति बफरकर बोली-इस भरोसे न रहिएगा। भाई मर गया है, तो क्या गुड़ का बाप कोल्हू तैयार है। सिर के बाल न बचेंगे। ऐसे ही भले होते, तो दुनिया में इतना अपयश कैसे कमाते।
यह कहकर इंदु अपने कमरे में आई। उन चीजों को समेटा, जो उसे मैके में मिली थीं। वे सब चीजें अलग कर दीं, जो यहाँ की थीं। शोक न था, दु:ख न था, एक ज्वाला थी, जो उसके कोमल शरीर में विष की भाँति व्याप्त हो रही थी। मुँह लाल था, ऑंखें लाल थीं, नाक लाल थी, रोम-रोम से चिनगारियाँ-सी निकल रही थीं। अपमान आग्नेय वस्तु है।
अपनी सब चीजें सँभालकर इंदु ने अपनी निजी गाड़ी तैयार करने की आज्ञा दी। जब तक गाड़ी तैयार होती रही, वह बरामदे में टहलती रही। ज्यों ही फाटक पर घोड़ों की टाप सुनाई दी, वह आकर गाड़ी में बैठ गई, पीछे फिरकर भी न देखा। जिस घर की वह रानी थी, जिसको वह अपना समझती थी, जिसमें जरा-सा कूड़ा पड़ा रहने पर नौकरों के सिर हो जाती थी, उसी घर से इस तरह निकल गई, जैसे देह से प्राण निकल जाता है-उसी देह से जिसकी वह सदैव रक्षा करता था, जिसके जरा-जरा-से कष्ट से स्वयं विकल हो जाता था। किसी से कुछ न कहा, न किसी की हिम्मत पड़ी कि उससे कुछ पूछे। उसके चले जाने के बाद महराजिन ने जाकर महेंद्र से कहा-सरकार, रानी बहू जाने कहाँ चली जा रही हैं!
महेंद्र ने उसकी ओर तीव्र नेत्राों से देखकर कहा-जाने दो।
महराजिन-सरकार, संदूक और संदूकचे लिए जाती हैं।
महेंद्र-कह दिया, जाने दो।
महराजिन-सरकार, रूठी हुई मालूम होती हैं। अभी दूर न गई होंगी, आप मना लें।
महेंद्र-मेरा सिर मत खा।
इंदु लदी-फँदी सेवा-भवन पहुँची, तो जाह्नवी ने कहा-तुम लड़कर आ रही हो क्यों?
इंदु-कोई अपने घर में नहीं रहने देता, तो क्या जबरदस्ती है?
जाह्नवी-सोफिया ने आते-ही-आते मुझसे कहा था, आज कुशल नहीं है।
इंदु-मैं लौंडी बनकर नहीं रह सकती।
जाह्नवी-तुमने उनसे बिना पूछे चंदा क्यों लिखा?
इंदु-मैंने किसी के हाथों अपनी आत्मा नहीं बेची है।
जाह्नवी-जो स्त्राी अपने पुरुष का अपमान करती है, उसे लोक-परलोक कहीं शांति नहीं मिल सकती!
इंदु-क्या आप चाहती हैं कि यहाँ से भी चली जाऊँ? मेरे घाव पर नमक न छिड़कें।
जाह्नवी-पछताओगी, और क्या। समझाते-समझाते हार गई, पर तुमने अपना हठ न छोड़ा।
इंदु यहाँ से उठकर सोफिया के कमरे में चली गई। माता की बातें उसे जहर-सी लगीं।
यह विवाद दाम्पत्य क्षेत्रा से निकलकर राजनीतिक क्षेत्रा में अवतरित हुआ। महेंद्रकुमार उधार एड़ी-चोटी का जोर लगाकर इस आंदोलन का विरोधा कर रहे थे, लोगों को चंदा देने से रोकते थे, प्रांतीय सरकार को उत्तोजित करते थे, इधार इंदु सोफिया के साथ चंदे वसूल करने में तत्पर थी। मि. क्लार्क अभी तक दिल में राजा से द्वेष रखते थे, अपना अपमान भूले न थे, उन्होंने जनता के इस आंदोलन में हस्तक्षेप करने की कोई जरूरत न समझी, जिसका फल यह हुआ कि राजा साहब की एक न चली। धाड़ाधाड़ चंदे वसूल होने लगे। एक महीने में एक लाख से अधिाक वसूल हो गया। किसी पर किसी तरह का दबाव न था, किसी से कोई सिफारिश न करता था। वह दोनों रमणियों के सदुद्योग ही का चमत्कार था; नहीं शहीदों की वीरता की विभूति थी। जिनकी याद में अब भी लोग रोया करते थे। लोग स्वयं आकर देते थे, अपनी हैसियत से ज्यादा। मि. जॉन सेवक ने भी स्वेच्छा से एक हजार रुपये दिए, इंदु ने अपना चंदा एक हजार तो दिया ही, अपने कई बहुमूल्य आभूषण भी दे डाले, जो बीस हजार के बिके। राजा साहब की छाती पर साँप लोटता रहता। पहले अलक्षित रूप से विरोधा करते थे, फिर प्रत्यक्ष रूप से दुराग्रह करने लगे। गवर्नर के पास स्वयं गए, रईसों को भड़काया। सब कुछ किया; पर जो होना था, वह होकर रहा।
छ: महीने गुजर गए। सूरदास की प्रतिमा बनकर आ गई। पूना के एक प्रसिध्द मूर्तिकार ने सेवा-भाव से इसे रचा। पाँड़ेपुर में उसे स्थापित करने का प्रस्ताव था। जॉन सेवक ने सहर्ष आज्ञा दे दी। जहाँ सूरदास का झोंपड़ा था, वहीं मूर्ति का स्थापन हुआ। कीर्तिमानों की कीर्ति को अमर करने के लिए मनुष्य के पास और कौन-सा साधान है? अशोक की मूर्ति भी तो उसके शिला-लेखों ही से अमर है। वाल्मीकि और व्यास, होमर और फिरदौसी, सबको तो नहीं मिलते।
पाँड़ेपुर में बड़ा समारोह था। नगर-निवासी अपने-अपने काम छोड़कर इस उत्सव में सम्मिलित हुए थे। रानी जाह्नवी ने करुण कंठ और सजल नेत्राों से मूर्ति को प्रतिष्ठित किया। इसके बाद देर तक संकीर्तन होता रहा। फिर नेताओं के प्रभावशाली व्याख्यान हुए, पहलवानों ने अपने-अपने करतब दिखाए। संधया समय प्रीति-भोज हुआ, छूत और अछूत साथ बैठकर एक ही पंक्ति में खा रहे थे। यह सूरदास की सबसे बड़ी विजय थी। रात को एक नाटक-मंडली ने 'सूरदास' नाम का नाटक खेला, जिसमें सूरदास ही के चरित्रा का चित्राण किया गया था। प्रभुसेवक ने इंग्लैंड से यह नाटक रचकर इसी अवसर के लिए भेजा था। बारह बजते-बजते उत्सव समाप्त हुआ। लोग अपने-अपने घर सिधाारे। वहाँ सन्नाटा छा गया।
चाँदनी छिटकी हुई थी, और शुभ्र ज्योत्सना में सूरदास की मूर्ति एक हाथ से लाठी टेकती हुई और दूसरा हाथ किसी अदृश्य दाता के सामने फैलाए खड़ी थी-वही दुर्बल शरीर था, हँसलियाँ निकली हुई, कमर टेढ़ी, मुख पर दीनता और सरलता छाई हुई, साक्षात् सूरदास मालूम होता था। अंतर केवल इतना था कि वह चलता था, वह अचल थी; वह सबोल था, यह अबोल थी; और मूर्तिकार ने यहाँ वह वात्सल्य अंकित कर दिया था, जिसका मूल में पता न था। बस, ऐसा मालूम होता था, मानो कोई स्वर्ग-लोक का भिक्षुक देवताओं से संसार के कल्याण का वरदान माँग रहा है।
आधाी रात बीत चुकी थी। एक आदमी साइकिल पर सवार मूर्ति के समीप आया। उसके हाथ में कोई यंत्रा था। उसने क्षण-भर तक मूर्ति को सिर से पाँव तक देखा, और तब उसी यंत्रा से मूर्ति पर आघात किया। सड़ाक की आवाज सुनाई दी और मूर्ति धामाके के साथ भूमि पर आ गिरी और उसी मनुष्य पर, जिसने उसे तोड़ा था। वह कदाचित् दूसरा आघात करनेवाला था, इतने में मूर्ति गिर पड़ी, भाग न सका, मूर्ति के नीचे दब गया।
प्रात:काल लोगों ने देखा, तो राजा महेंद्रकुमार सिंह थे। सारे नगर में खबर फैल गई कि राजा साहब ने सूरदास की मूर्ति तोड़ डाली और खुद उसी के नीचे दब गए। जब तक जिए, सूरदास के साथ वैर-भाव रखा, मरने के बाद भी द्वेष करना न छोड़ा। ऐसेर् ईष्यालु मनुष्य भी होते हैं! ईश्वर ने उसका फल भी तत्काल ही दे दिया। जब तक जिए, सूरदास से नीचा देखा; मरे भी, तो उसी के नीचे दबकर। जाति का द्रोही, दुश्मन, दम्भी, दगाबाज और इनसे भी कठोर शब्दों में उनकी चर्चा हुई।
कारीगरों ने फिर मसालों से मूर्ति के पैर जोड़े और उसे खड़ा किया। लेकिन उस आघात के चिह्न अभी तक पैरों पर बने हुए हैं और मुख भी विकृत हो गया है।
इधार सूरदास के स्मारक के लिए चंदा जमा किया जा रहा था, उधार कुलियों के टोले में शिलान्यास की तैयारियाँ हो रही थीं। नगर के गण्यमान्य पुरुष निमंत्रिात हुए थे। प्रांत के गवर्नर से शिला-स्थापना की प्रार्थना की गई थी। एक गार्डन पार्टी होनेवाली थी। गवर्नर महोदय को अभिनंदन-पत्रा दिया जानेवाला था। मिसेज सेवक दिलोजान से तैयारियाँ कर रही थीं। बँगले की सफाई और सजावट हो रही थी। तोरण आदि बनाए जा रहे थे। ऍंगरेजी बैंड बुलाया गया था। मि. क्लार्क ने सरकारी कर्मचारियों को मिसेज सेवक की सहायता करने का हुक्म दे दिया था, और स्वयं चारों तरफ दौड़ते फिरते थे।
मिसेज सेवक के हृदय में अब एक नई आशा अंकुरित हुई थी। कदाचित् विनयसिंह की मृत्यु सोफिया को मि. क्लार्क की ओर आकर्षित कर दे, इसलिए वह मि. क्लार्क की और भी खातिर कर रही थीं। सोफिया को स्वयं जाकर साथ लाने का निश्चय कर चुकी थीं-जैसे बनेगा, वैसे लाऊँगी, खुशी से न आएगी, जबरदस्ती लाऊँगी, रोऊँगी, पैरों पड़ईँगी और बिना साथ लाए उसका गला न छोड़ईँगी।
मि. जॉन सेवक कम्पनी का वार्षिक विवरण तैयार करने में दत्ताचित्ता थे। गत साल के नफे की सूचना देने के लिए उन्होंने यही अवसर पसंद किया। यद्यपि यथार्थ लाभ बहुत कम हुआ था, किंतु आय-व्यय में इच्छापूर्वक उलटफेर करके वह आशातीत लाभ दिखाना चाहते थे, जिसमें कम्पनी के हिस्सों की दर चढ़ जाए और लोग हिस्सों पर टूट पड़ें। इधार के घाटे को वह इस चाल से पूरा करना चाहते थे। लेखकों को रात-रात-भर काम करना पड़ता था और स्वयं मि. सेवक हिसाबों की तैयारी में उससे कहीं ज्यादा परिश्रम करते थे, जितना उत्सव की तैयारियों में।
किंतु मि. ईश्वर सेवक को ये तैयारियाँ, जिन्हें वह अपव्यय कहते थे, एक ऑंख न भाती थीं। वह बार-बार झुँझलाते थे, बेचारे वृध्द आदमी को सुबह से शाम तक सिर-मगजन करते गुजरता था। कभी बेटे पर झल्लाते, कभी बहू पर, कभी कर्मचारियों पर, कभी सेवकों पर-यह पाँच मन बर्फ की क्या जरूरत है, क्या लोग इसमें नहाएँगे? मन-भर काफी था। काम तो आधो मन ही में चल सकता था। इतनी शराब की क्या जरूरत? कोई परनाला बहाना है या मेहमानों को पिलाकर उनके प्राण लेने हैं? इससे क्या फायदा कि लोग पी-पीकर बदमस्त हो जाएँ और आपस में जूती-पैजार होने लगे? लगा दो घर मे आग या मुझी को जहर दे दो; न जिंदा रहूँगा, न जलन होगी। प्रभु मसीह? मुझे अपने दामन में ले। इस अनर्थ का कोई ठिकाना है, फौजी बैंड की क्या जरूरत? क्या गवर्नर कोई बच्चा है, जो बाजार सुनकर खुश होगा या शहर के रईस बाजे के भूखे हैं? आतिशबाजियाँ क्या होंगी? गजब खुदा का, क्या एक सिरे से सब भंग खा गए हैं? यह गवर्नर का स्वागत है या बच्चों का खेल? पटाखे और छछूंदरें किसको खुश करेंगी? माना, पटाखे और छूछूंदरें न होंगी, ऍंगरेजी आतिशबाजियाँ होंगी, मगर क्या गवर्नर ने आतिशबाजियाँ नहीं देखी हैं? ऊटपटांग काम करने से क्या मतलब? किसी गरीब का घर जल जाए, कोई और दुर्घटना हो जाए, तो लेने के देने पड़ें। हिंदुस्तानी रईसों के लिए फल-मेवे और मुरब्बे, मिठाइयाँ मँगाने की जरूरत? वे ऐसे भुक्खड़ नहीं होते। उनके लिए एक-एक सिगरेट काफी थी। हाँ, पान-इलायची का प्रबंधा और कर दिया जाता। वे यहाँ कोई दावत खाने तो आएँगे नहीं, कम्पनी का वार्षिक विवरण सुनने आएँगे। अरे, ओ खानसामा, सुअर, ऐसा न हो कि मैं तेरा सिर तोड़कर रख दूँ। जो-जो वह पगली (मिसेज सेवक) कहती है, वही करता है। मुझे भी कुछ बुध्दि है या नहीं? जानता है, आजकल 4 रुपये सेर अंगूर मिलते हैं। इनकी बिलकुल जरूरत नहीं। खबरदार, जो यहाँ अंगूर आए! सारांश यह कि कई दिनों तक निरंतर बक-बक, झक-झक से उनका चित्ता कुछ अव्यवस्थित-सा हो रहा था। कोई उनकी सुनता न था, सब अपने-अपने मन की करते थे। जब वह बकते-बकते थक जाते, तो उठकर बाग में चले जाते। लेकिन थोड़ी ही देर में फिर घबराकर आ पहुँचते और पूर्ववत् लोगों पर वाक्यप्रहार करने लगते। यहाँ तक कि उत्सव के एक सप्ताह पहले जब मि. जॉन सेवक ने प्रस्ताव किया कि घर के सब नौकरों और कारखाने के चपरासियों को एल्गिन मिल की बनी हुई वर्दियाँ दी जाएँ, तो मि. ईश्वर सेवक ने मारे क्रोधा के वह इंजील, जिसे वह हाथ में लिए प्रकट रूप से ऐनक की सहायता से, पर वस्तुत: स्मरण से पढ़ रहे थे, अपने सिर पर पटक ली और बोले-या खुदा, मुझे इस जंजाल से निकाल। सिर दीवार के समीप था, यह धाक्का लगा, तो दीवार से टकरा गया। 90 वर्ष की अवस्था, जर्जर शरीर, वह तो कहो, पुरानी हव्यिाँ थीं कि काम देती जाती थीं, अचेत हो गए। मस्तिष्क इस आघात को सहन न कर सका, ऑंखें निकल आईं, ओठ खुल गए और जब तक लोग डॉक्टर को बुलाएँ, उनके प्राण-पखेरू उड़ गए! ईश्वर ने उनकी अंतिम विनय स्वीकार कर ली, इस जंजाल से निकाल दिया! निश्चय रूप से नहीं कहा जा सकता कि उनकी मृत्यु का क्या कारण था, यह आघात या गृहदाह?
सोफिया ने यह शोक-समाचार सुना, तो मान जाता रहा। अपने घर में अब अगर किसी को उससे प्रेम था, तो वह ईश्वर सेवक ही थे। उनके प्रति उसे भी श्रध्दा थी। तुरंत मातमी वस्त्रा धाारण किए और घर गई। मिसेज सेवक दौड़कर उससे गले मिली और माँ-बेटी मृत देह के पास खूब रोईं।
रात को जब मातमी दावत समाप्त हो गई और लोग अपने-अपने घर गए, तो मिसेज सेवक ने सोफिया से कहा-बेटी, तुम अपना घर रहते हुए दूसरी जगह रहती हो, क्या यह हमारे लिए लज्जा और दु:ख की बात नहीं? यहाँ अब तुम्हारे सिवा और कौन वली-वारिस है! प्रभु का अब क्या ठिकाना, घर आए या न आए। अब तो जो कुछ हो, तुम्हीं हो। हमने अगर कभी कड़ी बात कही होगी, तो तुम्हारे ही भले की कही होगी। कुछ तुम्हारी दुश्मन तो हूँ नहीं। अब अपने घर में रहो। यों आने-जाने के लिए कोई रोक नहीं है, रानी साहब से भी मिल आया करो, पर रहना यहीं चाहिए। खुदा ने और तो सब अरमान पूरे कर दिए, तुम्हारा विवाह भी हो जाता, तो निश्ंचित हो जाती। प्रभु जब आता, देखी जाती। इतने दिनों का मातम थोड़ा नहीं होता, अब दिन गँवाना अच्छा नहीं। मेरी अभिलाषा है कि अबकी तुम्हारा विवाह हो जाए, और गर्मियों में हम सब दो-तीन महीने के लिए मंसूरी चलें।
सोफी ने कहा-जैसी आपकी इच्छा, कर लूँगी।
माँ-और क्या बेटी, जमाना सदा एक-सा नहीं रहता, हमारी जिंदगी का क्या भरोसा। तुम्हारे बड़े पापा यह अभिलाषा लिए ही सिधाार गए। तो मैं तैयारी करूँ?
सोफिया-कह तो रही हूँ।
माँ-तुम्हारे पापा सुनकर फूले न समाएँगे। कुँवर विनयसिंह की मैं निंदा नहीं करती, बड़ा जवाँमर्द आदमी था; पर बेटी, अपनी धार्मवालों में करने की बात ही और है।
सोफिया-हाँ, और क्या।
माँ-तो अब रानी जाह्नवी के यहाँ न जाओगी न?
सोफिया-जी नहीं, न जाऊँगी।
माँ-आदमियों से कह दूँ, तुम्हारी चीजें उठा लाएँ?
सोफिया-कल रानीजी आप ही भेज देंगी।
मिसेज सेवक खुश-खुश दावत का कमरा साफ कराने गईं।
मि. क्लार्क अभी वहीं थे। उन्हें यह शुभ सूचना दी। सुनकर फड़क उठे। बाँछें खिल गईं। दौड़े हुए सोफिया के पास आ गए और बोले-सोफी, तुमने मुझे जिंदा कर दिया। अहा! मैं कितना भाग्यवान हूँ! मगर तुम एक बार अपने मुँह से यह मेरे सामने कह दो। तुम अपना वादा पूरा करोगी?
सोफिया-करूँगी।
और भी बहुत-से आदमी मौजूद थे, इसलिए मि. क्लार्क सोफिया का आलिंगन न कर सके। मूँछों पर ताव देते, हवाई किले बनाते, मनमोदक खाते घर गए।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – रंगभूमि – लेखक – मुंशी प्रेमचंद

Post by Jemsbond » 02 Jan 2017 22:39


प्रात:काल सोफिया का अपने कमरे में पता न था! पूछ-ताछ होने लगी। माली ने कहा-मैंने उन्हें जाते तो नहीं देखा, पर जब यहाँ सब लोग सो गए थे, तो एक बार फाटक के खुलने की आवाज आई थी। लोगों ने समझा, कुँवर भरतसिंह के यहाँ गई होगी। तुरंत एक आदमी दौड़ाया गया। लेकिन वहाँ भी पता न चला। बड़ी खलबली मची, कहाँ गई!
जॉन सेवक-तुमने रात को कुछ कहा-सुना तो नहीं था?
मिसेज़ सेवक-रात को तो विवाह की बातचीत होती रही। मुझसे तैयारियाँ करने के लिए भी कहा। खुश-खुश सोई।
जॉन सेवक-तुम्हारी समझ का फर्क था। उसने तो अपने मन का भाव प्रकट कर दिया। तुमको जता दिया कि कल मैं न रहूँगी। जानती हो, विवाह से उसका आशय क्या था? आत्मसमर्पण। अब विनय से उसका विवाह होगा; यहाँ जो न हो सका, वह स्वर्ग में होगा। मैंने तुमसे पहले ही कह दिया था, वह किसी से विवाह न करेगी। तुमने रात को विवाह की बातचीत छेड़कर उसे भयभीत कर दिया। जो बात कुछ दिनों में होती, वह आज ही हो गई। अब जितना रोना हो, रो लो; मैं तो पहले ही रो चुका हूँ।
इतने में रानी जाह्नवी आईं। ऑंखें रोते-रोते बीरबहूटी हो रही थीं। उन्होंने एक पत्रा मि. सेवक के हाथ में रख दिया और एक कुर्सी पर बैठकर मुँह ढाँप रोने लगीं।
यह सोफिया का पत्रा था, अभी डाकिया दे गया था। लिखा था-पूज्य माताजी, आपकी सोफिया आज संसार से बिदा होती है। जब विनय न रहे, तो यहाँ मैं किसके लिए रहूँ? इतने दिनों मन को धौर्य देने की चेष्टा करती रही। समझती थी, पुस्तकों, में अपनी शोक-स्मृतियों को डूबा दूँगी और अपना जीवन सेवा-धार्म का पालन करने में सार्थक करूँगी। किंतु मेरा प्यारा विनय मुझे बुला रहा है। मेरे बिना उसे वहाँ एक क्षण चैन नहीं है। उससे मिलने जाती हूँ। यह भौतिक आवरण मेरे मार्ग में बाधाक है, इसलिए इसे यहीं छोड़े जाती हूँ, गंगा की गोद में इसे सौंपे देती हूँ। मेरा हृदय पुलकित हो रहा है, पैर उड़े जा रहे हैं, आनंद से रोम-रोम प्रमुदित है, अब शीघ्र ही मुझे विनय के दर्शन होंगे। आप मेरे लिए दु:ख न कीजिएगा, मेरी खोज का व्यर्थ प्रयत्न न कीजिएगा। कारण, जब तक यह पत्रा आपके हाथों में पहुँचेगा, सोफिया का सिर विनय के चरणों पर होगा। मुझे प्रबल शक्ति खींचे लिए जा रही है और बेड़ियाँ आप-ही-आप टूटी जा रही हैं।
मामा और पापा को कह दीजिएगा, सोफी का विवाह हो गया, अब उसकी चिंता न करें।
पत्रा समाप्त होते ही मिसेज सेवक उन्मादिनी की भाँति कर्कश स्वर से बोलीं-तुम्हीं विष की गाँठ हो, मेरे जीवन का सर्वनाश करनेवाली, मेरी जड़ों में कुल्हाड़ी मारनेवाली, मेरी अभिलाषाओं को पैरों से कुचलनेवाली, मेरा मान-मर्दन करनेवाली काली नागिन तुम्हीं हो। तुम्हीं ने अपनी मधाुर वाणी से, अपने छल-प्रपंच से, अपने कूट-मंत्राों से मेरी सरला सोफी को मोहित कर लिया और अंत को उसका सर्वनाश कर दिया। यह तुम्हीं लोगों के प्रलोभन और उत्तोजना का फल है कि मेरा लड़का आज न जाने कहाँ और किस दशा में है और मेरी लड़की का यह हाल हुआ। तुमने मेरे सारे मंसूबे खाक में मिला दिए।
वह उसी क्रोधा-प्रवाह में न जाने और क्या-क्या कहतीं कि मि. जॉन सेवक उनका हाथ पकड़कर वहाँ से खींच ले गए। रानी जाह्नवी ने इस अपमानसूचक, कटु शब्दों का कुछ भी उत्तार न दिया, मिसेज सेवक को सहवेदना-पूर्ण नेत्राों से देखती रहीं और तब बिना कुछ कहे-सुने वहाँ से उठकर चली गईं।
मिसेज सेवक की महत्तवाकांक्षाओं पर तुषार पड़ गया। उस दिन से फिर उन्हें किसी ने गिरजाघर जाते नहीं देखा, वह फिर गाउन और हैट पहने हुए न दिखाई दीं, फिर योरपियन क्लब में नहीं गईं और फिर ऍंगरेजी दावतों में सम्मिलित नहीं हुईं। दूसरे दिन प्रात:काल पादरी पिम और मि. क्लार्क मातमपुरसी करने आए। मिसेज सेवक ने दोनों को वह फटकार सुनाई कि अपना-सा मुँह लेकर चले गए। सारांश यह कि उसी दिन उनकी बुध्दि भ्रष्ट हो गई, मस्तिष्क इतने कठोराघात को सहन न कर सका। वह अभी तक जीवित हैं, पर दशा अत्यंत करुण है। आदमियों की सूरत से घृणा हो गई है, कभी हँसती हैं, कभी रोती हैं, कभी नाचती हैं, कभी गाती हैं। कोई समीप आता है, तो दाँतों काटने दौड़ती हैं।
रहे मिस्टर जॉन सेवक। वह निराशामय धौर्य के साथ प्रात:काल से संधया तक अपने व्यावसायिक धांधाों में रत रहते हैं। उन्हें अब संसार में कोई अभिलाषा नहीं है, कोई इच्छा नहीं है, धान से उन्हें निस्वार्थ प्रेम है, कुछ वही अनुराग, जो भक्तों को अपने उपास्य से होता है, धान उनके लिए किसी लक्ष्य का साधान नहीं है, स्वयं लक्ष्य है। न दिन समझते हैं, न रात। कारोबार दिन-दिन बढ़ता जाता है। लाभ दिन-दिन बढ़ता है या नहीं, इसमें संदेह है। देश में गली-गली, दूकान-दूकान, इस कारखाने के सिगार और सिगरेट की रेल-पेल है। वह अब पटने में एक तम्बाकू की मिल खोलने की आयोजन कर रहे हैं, क्योंकि बिहार प्रांत में तम्बाकू कसरत से पैदा होती है। उनकी धानकामना विद्या-व्यसन की भाँति तृप्त नहीं होती।
कुँवर विनयसिंह की वीर मृत्यु के पश्चात रानी जाह्नवी का सदुत्साह दुगुना हो गया। वह पहले से कहीं ज्यादा क्रियाशील हो गईं। उनके रोम-रोम में असाधारण स्फूर्ति का विकास हुआ। वृध्दावस्था की आलस्यप्रियता यौवन-काल की कर्मण्यता में परिणत हो गई। कमर बाँधी और सेवक-दल का संचालन अपने हाथ में लिया। रनिवास छोड़ दिया, कर्म-क्षेत्रा में उतर आईं और इतने जोश से काम करने लगीं कि सेवक-दल को जो उन्नति कभी न प्राप्त हुई थी, वह अब हुई। दान का इतना बाहुल्य कभी न था, और न सेवकों की संख्या ही इतनी अधिाक थी। उनकी सेवा का क्षेत्रा भी इतना विस्तीर्ण न था। उनके पास निज का जितना धान था, वह सेवक-दल को अर्पित कर दिया, यहाँ तक कि अपने लिए एक आभूषण भी न रखा। तपस्विनी का वेश धारण करके दिखा दिया कि अवसर पड़ने पर स्त्रियाँ कितनी कर्मशील हो सकती हैं।
डॉक्टर गांगुली का आशावाद भी अंत में अपने नग्न रूप में दिखाई दिया। उन्हें विदित हुआ कि वर्तमान अवस्था में आशावाद आत्मवंचना के सिवार और कुछ नहीं है। उन्होंने कौंसिल में मि. क्लार्क के विरुध्द बड़ा शोर मचाया, पर यह अरण्य-रोदन सिध्द हुआ। महीनों का वाद-विवाद, प्रश्नों का निरंतर प्रवाह, सब व्यर्थ हुआ। वह गवर्नमेंट को मि. क्लार्क का तिरस्कार करने पर मजबूर न कर सके। इसके प्रतिकूल मि. क्लार्क की पद-वृध्दि हो गई। इस पर डॉक्टर साहब इतने झल्लाए कि आपे में न रह सके। वहीं भरी सभा में गवर्नर को खूब खरी-खरी सुनाईं, यहाँ तक कि सभा के प्रधान ने उनसे बैठ जाने को कहा। इस पर वह और अधिाक गर्म हुए और प्रधान की भी खबर ली। उन पर पक्षपात का दोषारोपण किया। प्रधान ने तब उनको सभा-भवन से चले जाने का हुक्म दिया और पुलिस को बुलाने की धामकी दी। मगर डॉक्टर साहब का क्रोधा इस पर भी शांत न हुआ। वह उत्तोजित होकर बोले-आप पशु-बल से मुझे चुप कराना चाहते हैं, इसलिए कि आपमें धार्म और न्याय का बल नहीं है। आज मेरे दिल से यह विश्वास उठ गया, जो गत चालीस वर्षों से जमा हुआ था कि गवर्नमेंट हमारे ऊपर न्यायबल से शासन करना चाहती है। आज उस न्याय-बल की कलई खुल गई, हमारी ऑंखों से पर्दा उठ गया और हम गवर्नमेंट को उसके नग्न, आवरणहीन रूप में देख रहे हैं। अब हमें स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि केवल हमको पीसकर तेल निकालने के लिए, हमारा अस्तित्व मिटाने के लिए, हमारी सभ्यता और हमारे मनुष्यत्व की हत्या करने के लिए हमको अनंत काल तक चक्की का बैल बनाए रखने के लिए हमारे ऊपर राज्य किया जा रहा है। अब तक जो कोई मुझसे ऐसी बातें कहता था, मैं उससे लड़ने पर तत्पर हो जाता था, मैं रिपन, ह्यूम और बेसेंट आदि की कीर्ति का उल्लेख करके उसे निरुत्तार करने की चेष्टा करता था। पर अब विदित हो गया कि उद्देश्य सबका एक ही है, केवल साधानों में अंतर है।
वह और न बोलने पाए। पुलिस का एक सार्जेंट उन्हें सभा-भवन से निकाल ले गया। अन्य सभासद भी उठकर सभा-भवन से चले गए। पहले तो लोगों को भय था कि गवर्नमेंट डॉक्टर गांगुली पर अभियोग चलाएगी, पर कदाचित् व्यवस्थाकारों को उनकी वृध्दावस्था पर दया आ गई, विशेष इसलिए कि डॉक्टर महोदय ने उसी दिन घर आते ही अपना त्याग-पत्र भेज दिया। वह उसी दिन वहाँ से रवाना हो गए और तीसरे दिन कुँवर भरतसिंह से आ मिले। कुँवर साहब ने कहा-तुम तो इतने गुस्सेवर न थे, यह तुम्हें क्या हो गया?
गांगुली-हो क्या गया! वही हो गया, जो आज से चालीस वर्ष पहले होना चाहिए था। अब हम भी आपका साथी हो गया। अब हम दोनों सेवक-दल का काम खूब उत्साह से करेगा।
कुँवर-नहीं डॉक्टर साहब, मुझे खेद है कि मैं आपका साथ न दे सकूँगा। मुझमें वह उत्साह नहीं रहा। विनय के साथ सब चला गया। जाह्नवी अलबत्ताा आपकी सहायता करेंगी। अगर अब तक कुछ संदेह था, तो आपके निर्वासन ने उसे दूर कर दिया कि अधिाकारी-वर्ग सेवक-दल से सशंक है और यदि मैं उससे अलग न रहा तो मुझे अपनी जाएदाद से हाथ धाोना पड़ेगा। अब यह निश्चय है कि हमारे भाग्य में दासता ही लिखी हुई है...
गांगुली-यह आपको कैसे निश्चय हुआ?
कुँवर-परिस्थितियों को देखकर, और क्या। जब यह निश्चय है कि हम सदैव गुलाम ही रहेंगे, तो मैं आपकी जाएदाद क्यों हाथ से खोऊँ? जाएदाद बची रहेगी, तो हम इस दीनावस्था में भी अपने दुखी भाइयों के कुछ काम आ सकेंगे। अगर वह भी निकल गई, तो हमारे दोनों हाथ कट जाएँगे। हम रोनेवालों के ऑंसू भी न पोंछ सकेंगे।
गांगुली-आह! तो कुँवर विनयसिंह का मृत्यु भी आपके इस बेड़ी को नहीं तोड़ सका। हम समझा था, आप निर्द्वंद्व हो गया होगा। पर देखता है, तो यह बेड़ी ज्यों-का-त्यों आपके पैरों में पड़ा हुआ है। अब आपको विदित हुआ होगा कि हम क्यों सम्पत्तिाशाली पुरुषों पर भरोसा नहीं करता। वे तो अपनी सम्पत्तिा का गुलाम हैं। वे कभी सत्य के समर में नहीं आ सकते। जो सिपाही सोने की ईंट गर्दन मे बाँधाकर लड़ने चले, वह कभी नहीं लड़ सकते। उसको तो अपने ईंट की चिंता लगा रहेगा। जब तक हम लोग ममता का परित्याग नहीं करेगा, हमारा उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा। अभी हमको कुछ भ्रम था, पर वह भी मिट गया कि सम्पत्तिाशाली मनुष्य हमारा मदद करने के बदले उलटा हमको नुकसान पहुँचाएगा। पहले आप निराशावादी था, अब आप सम्पत्तिवादी हो गया।
यह कहकर डॉक्टर गांगुली विमन हो यहाँ से उठे और जाह्नवी के पास आए, तो देखा कि वह कहीं जाने को तैयार बैठी हैं। इन्हें देखते ही विहसित मुख से इनका अभिवादन करती हुई बोली-अब तो आप भी मेरे सहकारी हो गए। मैं जानती थी कि एक-न-एक दिन हम लोग आपको अवश्य खींच लेंगे। जिनमें आत्मसम्मान का भाव जीवित है, उनके लिए वहाँ स्थान नहीं है। वहाँ उन्हीं के लिए स्थान है, जो या तो स्वार्थ-भक्त हैं अथवा अपने को धाोखा देने में निपुण। अभी यहाँ दो-एक दिन विश्राम कीजिएगा। मैं तो आज की गाड़ी से पंजाब जा रही हूँ।
गांगुली-विश्राम करने का समय तो अब निकट आ गया है, उसका क्या जल्दी है। अब अनंत विश्राम करेगा। हम भी आपके साथ चलेगा।
जाह्नवी-क्या कहें, बेचारी सोफिया न हुई, नहीं तो उससे बड़ी सहायता मिलती।
गांगुली-हमको तो उसका समाचार वहीं मिला था। उसका जीवन अब कष्टमय होता। उसका अंत हो गया, बहुत अच्छा हुआ। प्रणय-वंचित होकर वह कभी सुखी नहीं रह सकता। कुछ भी हो, वह सती थी; और सती नारियों का यही धार्म है। रानी इंदु तो आराम से है न?
जाह्नवी-वह तो महेंद्रकुमार से पहले ही रूठकर चली आई थी। अब यहीं रहती है। वह भी तो मेरे साथ चल रही है। उसने अपनी रियासत के सुप्रबंधा के लिए एक ट्रस्ट बनाना निश्चय किया है, जिसके प्रधान आप होंगे। उसे रियासत से कोई सम्पर्क न रहेगा।
इतने में इंदु आ गई और डॉक्टर गांगुली को देखते ही उन्हें प्रणाम करके बोली- आप स्वयं आ गए, मेरा तो विचार था कि पंजाब होते हुए आपकी सेवा में भी जाऊँ।
डॉक्टर गांगुली ने कुछ भोजन किया और संधया समय तीनों आदमी यहाँ से रवाना हो गए। तीनों के हृदय में एक ही ज्वाला था, एक ही लगन। तीनों का ईश्वर पर पूर्ण विश्वास था।
कुँवर भरतसिंह अब फिर विलासमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं, फिर वही सैर और शिकार है, वही अमीरों के चोंचले, वही रईसों के आडम्बर, वही ठाट-बाट। उनके धार्मिक विश्वास की जडें उखड़ गई हैं। इस जीवन से परे अब उनके लिए अनंत शून्य और अनंत आकाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। लोक असार है, परलोक भी असार है, जब तक जिंदगी है, हँस-खेलकर काट दो। मरने के पीछे क्या होगा, कौन जानता है। संसार सदा इसी भाँति रहा है और इसी भाँति रहेगा। उसकी सुव्यवस्था न किसी से हुई है न होगी। बड़े-बड़े ज्ञानी, बड़े-बड़े तत्तववेत्ता, ऋषि-मुनि मर गए और कोई इस रहस्य का पार न पा सका। हम जीव मात्रा हैं और हमारा काम केवल जीना है। देश-भक्ति, विश्व-भक्ति, सेवा, परोपकार, यह सब ढकोसला है। अब उनके नैराश्य-व्यथित हृदय को इन्हीं विचारों से शांति मिलती है।







end
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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