हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:21

अभया चुप हो रही। शुरू से आखिर तक अन्नदा जीजी की सारी कथा कहकर मैंने ऑंख उठाकर देखा कि अभया काठ की मूर्ति की तरह स्थिर होकर बैठी है, उसकी दोनों ऑंखों से पानी झर रहा है। कुछ देर इसी तरह बैठी रहकर उसने जमीन पर सिर लगाकर नमस्कार किया और वह उठकर बैठ गयी। फिर ऑंचल से ऑंखों को पोंछते हुए बोली, ''उसके बाद?''
मैंने कहा, ''उसके बाद का हाल कुछ मालूम नहीं। अब प्यारी बाई की कथा सुनो। जब उसका नाम राजलक्ष्मी था तब से वह एक आदमी को चाहती थी। वह चाहना किस तरह का था सो आप जानती हैं? रोहिणी बाबू आपको जिस तरह चाहते हैं उसी तरह। यह मैंने अपनी ऑंखों देखा है, इसीलिए तुलना कर सका। इसके उपरान्त बहुत दिनों के बाद दोनों की मुलाकात हुई। तब वह 'राजलक्ष्मी' नहीं रही थी, 'प्यारी बाई' हो गयी थी। किन्तु यह बात उस दिन प्रमाणित हो गया कि राजलक्ष्मी मरी नहीं है, बल्कि प्यारी के ही भीतर चिरकाल के लिए अमर हो गयी है।''
अभया उत्सुक होकर बोली, ''उसके बाद?''
बाद की घटनाएँ एक के बाद एक विस्तार के साथ सुनाकर कहा, ''इसके बाद एक दिन ऐसा आ पड़ा कि जिस दिन प्यारी ने अपने प्राणाधिक प्रियतम को चुपचाप दूर हटा दिया।''
अभया ने पूछा, ''उसके बाद क्या हुआ, जानते हैं?''
''जानता हूँ। पर अब नहीं कहूँगा।''
अभया ने एक नि:श्वास छोड़कर कहा, ''आप क्या यह कहना चाहते हैं कि मैं अकेली ही नहीं हूँ- चिरकाल से ही स्त्रियों को ऐसे दुर्भाग्य का भोग करना पड़ रहा है और इस दु:ख को सहन करते रहने में ही उनके जीवन की चरम सफलता है?''
मैंने कहा, ''मैं यह कुछ भी नहीं कहना चाहता। आपको मैं केवल इतना ही जतला देना चाहता हूँ कि स्त्रियाँ मर्द नहीं हैं। दोनों के आचार-व्यवहार एक ही तराजू से नहीं तौले जा सकते; और तौले भी जाँय तो कोई लाभ नहीं।''
''क्यों नहीं है, कह सकते हैं?''
''नहीं, सो भी नहीं कह सकता। इसके सिवाय आज मेरा मन कुछ ऐसा उद्भ्रान्त हो रहा है कि इन सब जटिल समस्याओं की मीमांसा करना सम्भव ही नहीं। आपके प्रश्न पर मैं और एक दिन विचार करूँगा। फिर भी, आज मैं आपसे यह कहे जा सकता हूँ कि मैंने अपने जीवन में जो थोड़े से महान नारी-चरित्र देखे हैं उन सबने दु:ख के भीतर से गुजरकर ही मेरे मन में ऊँचा स्थान पाया है। मैं शपथपूर्वक कह सकता हूँ कि मेरी अन्नदा जीजी अपने दु:ख का सारा भार चुपचाप सहन करने के सिवाय और कुछ न कर सकतीं। यह भार असह्य होने पर भी वे अपने पथ से हटकर कभी आपके पथ पर पैर रख सकतीं, यह बात सोचने से भी शायद दु:ख के मारे मेरी छाती फट जायेगी।''
कुछ देर चुप रहकर कहा, ''और वह राजलक्ष्मी? उसके त्याग का दु:ख कितना बड़ा है सो तो मैं स्वयं अपनी नजर से देख आया हूँ। इस दु:ख के जोर से ही उसने आज मेरे समस्त हृदय को परिव्याप्त कर रक्खा है...''
अभया ने चौंककर कहा, ''तो फिर क्या आप ही उसके...''
मैंने कहा, ''यदि ऐसा न होता तो वह इतनी स्वच्छन्दता से मुझे इतनी दूर न पड़ा रहने देती, खो जाने के डर से प्राणपण से खींचकर अपने पास ही रखना चाहती।''
अभया बोली, ''इसके मानी यह कि राजलक्ष्मी जानती है कि उसे आपके खोए जाने का डर ही नहीं है?''
मैंने कहा, ''केवल डर ही नहीं, राजलक्ष्मी जानती है कि मैं खोया जा ही नहीं सकता। इसकी सम्भावना ही नहीं है। पाने और खोने की सीमा से बाहर जो एक सम्बन्ध है, मुझे विश्वास है कि उसने उसे ही प्राप्त कर लिया है और इसीलिए मेरी भी इस समय उसे जरूरत नहीं है। देखो, मैंने स्वयं भी इस जीवन में कुछ कम दु:ख नहीं उठाया है। उससे मैंने यही समझा है कि 'दु:ख' जिसे कहते हैं वह न तो अभावरूप ही है और न शून्य रूप। भयहीन जो दु:ख है, उसका उपभोग सुख की तरह ही किया जा सकता है।''
अभया देर तक स्थिर रहकर धीरे से बोली, ''आपकी बात समझती हूँ श्रीकान्त बाबू! अन्नदा जीजी, राजलक्ष्मी- इन दोनों ने जीवन में दु:ख को ही सम्बल रूप से प्राप्त किया है। किन्तु, मेरे हाथ तो वह भी नहीं। पति के समीप मैंने पाया है केवल अपमान। केवल लांछना और ग्लानि लेकर ही मैं लौट आई हूँ। इस मूल-धन को लेकर ही क्या आप मुझे जीवित रहने के लिए कहते हैं?''
सवाल बड़ा ही कठिन है। मुझे निरुत्तर देखकर अभया फिर बोली, ''इनके साथ मेरे जीवन का कहीं भी मेल नहीं है श्रीकान्त बाबू। संसार के सभी स्त्री-पुरुष एक साँचे में ढले नहीं होते, उनके सार्थक होने का रास्ता भी जीवन में केवल एक नहीं होता। उनकी शिक्षा, उनकी प्रवृत्ति और मन की गति एक ही दिशा में चलकर उन्हें सफल नहीं बना सकती। इसीलिए, समाज में उनकी व्यवस्था रहना उचित है। मेरे जीवन पर ही आप एक दफे अच्छी तरह शुरू से आखिर तक नजर डाल जाइए। मेरे साथ जिनका विवाह हुआ था उनके समीप आए बिना कोई उपाय नहीं था और आने पर भी कोई उपाय नहीं हुआ। इस समय उनकी स्त्री, उनके बाल-बच्चे, उनका प्रेम, कुछ भी मेरा खुद का नहीं है। इतने पर भी उन्हीं के समीप उनकी एक रखेल वेश्या की तरह पड़े रहने से ही क्या मेरा जीवन फल-फूलों से लदकर सफल हो उठता श्रीकान्त बाबू? और उस निष्फलता के दु:ख को लादे हुए सारे जीवन भटकते फिरना ही क्या मेरे नारी जीवन की सबसे बड़ी साधना है? रोहिणी बाबू को तो आप देख ही गये हैं। उनका प्यार तो आपकी दृष्टि से ओझल है नहीं। ऐसे मनुष्य के सारे जीवन को लँगड़ा बनाकर मैं 'सती' का खिताब नहीं खरीदना चाहती श्रीकान्त बाबू।''
हाथ उठाकर अभया ने ऑंखों के कोने पोंछ डाले और फिर रुँधे हुए कण्ठ से कहा, ''न कुछ एक रात्रि के विवाह-अनुष्ठान को, जो कि पति-पत्नी दोनों के ही निकट स्वप्न की तरह मिथ्या हो गया है, जबर्दस्ती जीवन-भर 'सत्य' कहकर खड़ा रखने के लिए इतने बड़े प्रेम को क्या मैं बिल्कुसल ही व्यर्थ कर दूँ? जिन विधाता ने प्रेम की यह देन दी है, वे क्या इसी से खुश होंगे? मेरे विषय में आपकी जो इच्छा हो वही धारणा कर लें; मेरी भावी सन्तान को भी आप जो चाहें सो कहकर पुकारें, किन्तु जीती रहूँगी श्रीकान्त बाबू, तो मैं निश्चयपूर्वक कहे रखती हूँ कि हमारे निष्पाप प्रेम की सन्तान संसार में मनुष्य के लिहाज से किसी से भी हीन न होगी और मेरे गर्भ से जन्म ग्रहण करने को वह अपना दुर्भाग्य कभी न समझेगी। उसे दे जाने लायक वस्तु उसके माँ-बाप के समीप शायद कुछ न होगी; किन्तु, उसकी माता उसको यह भरोसा अवश्य दे जायेगी कि वह सत्य के बीच पैदा हुई है, सत्य से बढ़कर सहारा उसके लिए संसार में और कुछ नहीं है। इस वस्तु से भ्रष्ट होना उसके लिए कठिन होगा- ऐसा होने पर वह बिल्कुछल ही तुच्छ हो जाँयगी।''
अभया चुप हो रही, किन्तु सारा आकाश मानो मेरी ऑंखों के सामने काँपने लगा, मुहूर्त-भर के लिए मुझे भास हुआ कि इस स्त्री के मुँह की बातें मानो मूर्त्त रूप धारण करके बाहर हम दोनों को घेर कर खड़ी हो गयी हैं। हाँ, ऐसा ही मालूम हुआ। सत्य जब सचमुच ही मनुष्य के हृदय से निकलकर सम्मुख उपस्थित हो जाता है तब मालूम होता है कि वह सजीव है- मानों उसके रक्त-मांसयुक्त शरीर है और मानो उसके भीतर प्राण भी है- 'नहीं' कहकर अस्वीकार करने पर मानो वह चोट करके कहेगा, ''चुप रहो, मिथ्या तर्क करके अन्याय की सृष्टि मत करो!''
सहसा अभया एक सीधा प्रश्न कर बैठी; बोली, ''आप स्वयं भी क्या हमें अश्रद्धा की नजर से देखेंगे श्रीकान्त बाबू? और अब क्या हमारे घर न आवेंगे?''
उत्तर देते हुए मुझे कुछ देर इधर-उधर करना पड़ा। इसके बाद मैं बोला, अन्तर्यामी के समीप तो शायद आप निष्पाप हैं- वे आपका कल्याण ही करेंगे; किन्तु, मनुष्य तो मनुष्य का अन्तस्तल नहीं देख सकते- उनके लिए तो प्रत्येक के हृदय का अनुभव करके विचार करना सम्भव नहीं है। यदि वे प्रत्येक के लिए अलहदा नियम गढ़ने लगें तो उनके समाज की सबकी सब कार्य-श्रृंखला ही टूट जाय।''
अभया कातर होकर बोली, ''जिस धर्म में- जिस समाज में हम लोगों को उठा लेने योग्य उदारता है-स्थान है- क्या आप हम लोगों से उसी समाज में आश्रय ग्रहण करने के लिए कहते हैं?''
इसका क्या जवाब दूँ, मैं सोच ही न सका।
अभया बोली, ''अपने आदमी होकर भी अपने ही आदमी को आप संकट के समय आश्रय नहीं दे सकते? उस आश्रय की भीख माँगनी होगी हमें दूसरों के निकट? उससे क्या गौरव बढ़ता है श्रीकान्त बाबू?''
प्रत्युत्तर में केवल एक दीर्घश्वास के सिवाय और कुछ मुँह से बाहर नहीं निकला।
अभया स्वयं भी कुछ देर मौन रहकर बोली, ''जाने दीजिए। आप लोगों ने जगह नहीं दी, न सही, मुझे सान्त्वना यही है कि जगत में आज भी एक बड़ी जाति है जो खुले तौर पर स्वच्छन्दता से स्थान दे सकती है।''
उसकी बात से कुछ आहत होकर बोला, ''क्या हर हालत में आश्रय देना ही भला काम है, यह मान लेना चाहिए?''
अभया बोली, ''इसका प्रमाण तो हाथों-हाथ मिल रहा है श्रीकान्त बाबू। पृथ्वी में कोई अन्याय-कार्य अधिक दिन तक नहीं फल-फूल सकता, यह बात यदि सत्य है तो क्या यह कहना पड़ेगा कि इसीलिए वे अन्याय को आश्रय देते हुए दिनों दिन ऊँचे बढ़ रहे हैं, और हम लोग न्याय-धर्म को आश्रय देकर प्रतिदिन क्षुद्र और तुच्छ होते जा रहे हैं? हम लोग तो यहाँ कुछ ही दिन हुए आए हैं, परन्तु, इतने दिनों में ही देखती हूँ कि मुसलमानों से यह सारा देश छाया जा रहा है। सुनती हूँ, ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ कम-से-कम एक घर मुसलमान का न हो और जहाँ पर एकाध मस्जिद तैयार न हो गयी हो। हम लोग शायद अपनी ऑंखों न देख जा सकें; किन्तु, ऐसा दिन शीघ्र ही आवेगा जिस दिन हमारे देश की तरह यह बर्मा देश मुसलमान-प्रधान देश बन जाएगा। आज सुबह ही जहाज-घाट पर एक अन्याय देखकर आपका मन खराब हो गया है। आप ही कहिए, किस मुसलमान बड़े भाई को धर्म और समाज के भय से ऐसे षडयन्त्र का- ऐसी नीचता का आसरा लेकर सुख-चैन की ऐसी गिरस्ती राख में मिलाकर भाग जाने की जरूरत पड़ती? बल्कि इससे उलटा, वह तो सभी को अपने दल में खींच लेकर आशीर्वाद देता और बड़े भाई के योग्य सम्मान और मर्यादा ग्रहण कर लौट जाता। इन दोनों में से किससे सच्चा धर्म बना रहता है श्रीकान्त बाबू?''
मैंने गहरी श्रद्धा से भरकर पूछा, ''अच्छा, आप तो गँवई-गाँव की कन्या हैं, आपने ये सब बातें किस तरह जानीं? मैं तो नहीं समझता कि इतने प्रशस्त-हृदय हम पुरुषों में भी अधिक हैं। आप जिनकी माता होंगी वह अभागी हो सकती है, इसकी कम-से-कम मैं तो किसी तरह कल्पना नहीं कर सकता।''
अभया अपने म्लान मुख पर जरा-सा हँसी का आभास लाकर बोली, ''तो फिर श्रीकान्त बाबू, मुझे समाज से बाहर कर देने से ही क्या हिन्दू समाज अधिक पवित्र हो उठेगा? इससे क्या किसी ओर से भी समाज को नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा?''
कुछ देर स्थिर रहकर और फिर कुछ जरा-सा हँसकर कहा, ''किन्तु मैं किसी तरह भी समाज के बाहर न होऊँगी; सारा अपयश, सारा कलंक, सारा दुर्भाग्य अपने सिर पर लेकर हमेशा आप लोगों की ही होकर रहूँगी। अपनी एक सन्तान को भी यदि किसी दिन मनुष्य की तरह मनुष्य बनाकर खड़ा कर सकूँ, तो मेरा यह सारा दु:ख सार्थक हो जाए- बस यही आशा लेकर मैं जीऊँगी। मुझे परीक्षा करके देखना होगा कि सचमुच का मनुष्य ही मनुष्यों में बड़ा है या उसके जन्म का हिसाब ही संसार में बड़ा है।''
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मनोहर चक्रवर्ती नामक एक प्राज्ञ सज्जन से मेरी मुलाकात हो गयी थी। दादा ठाकुर की होटल में एक हरि-संकीर्तन दल था। पुण्य बटोरने की इच्छा से बीच-बीच में वे उसी निमित्त वहाँ आते थे। किन्तु कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं- सो मैं कुछ नहीं जानता था। सिर्फ इतना ही सुना था कि उनके पास बहुत-सा रुपया है, और सब तरफ से वे अत्यन्त हिसाबी हैं।
न जाने क्यों, मुझसे बेहद प्रसन्न होकर वे एक दिन अकेले में बोले, ''देखो श्रीकान्त बाबू, तुम्हारी उम्र छोटी है- जीवन में यदि उन्नति प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें मैं कुछ ऐसे 'गुर' बतला सकता हूँ जिनका मूल्य लाख रुपया है। मैंने खुद जिनके समीप ये गुर प्राप्त किये थे उन्होंने संसार में कितनी उन्नति की थी, सुनोगे तो शायद अवाक् हो जाओगे, किन्तु बात बिल्कुनल सच है। वे केवल पचास रुपया महीना पाते थे, परन्तु मरते समय घर-बार ये बाग-बगीचा, तालाब, जमीन-जायदाद आदि के सिवाय दो हजार रुपये नकद छोड़ गये। कहो न... यह क्या कोई सहज बात है? अपने माँ-बाप के आशीर्वाद से मैं खुद भी तो...''
परन्तु, वे अपनी बात यहीं पर दबा देकर बोले, ''सुनता हूँ, तनखा तो खूब मोटी-सी पाते हो, भाग्य भी तुम्हारा बड़ा अच्छा है- बर्मा में आते ही किसी का ऐसा भाग्य खुलते नहीं सुना गया- किन्तु फिजूलखर्ची भी कितनी करते हो! है न यह बात? भीतर ही भीतर पता लगाने से दु:ख के मारे छाती फट जाती है। देखते ही तो हो कि मैं लोगों की किसी बात में नहीं पड़ता। किन्तु, मेरे माफिक, अधिक नहीं, दो बरस तो चलकर देखो। मैं कहता हूँ तुमसे, कि देश लौटकर अगर चाहोगे तो तुम अपना विवाह तक कर सकोगे।''
इस सौभाग्य के लिए भीतर ही भीतर मैं इस कदर लालायित हो उठा हूँ, यह तथ्य न मालूम उन्होंने किस तरह पा लिया- किन्तु, यह तो खुद ही प्रकट कर चुके थे कि वे भीतर ही भीतर पता लगाए बिना किसी की भी किसी बात में नहीं पड़ते।
जो हो, उनके उन्नति के बीच-मन्त्र-रूप सत्परामर्श के लिए मैं लुब्ध हो उठा। वे बोले, ''देखो, दान-वान करने की बात छोड़ दो-चोटी का पसीना एड़ी तक बहाकर रोजी कमानी होती है, कमर-भर मिट्टी खोदने पर भी पैसा नहीं मिलता। अपने खून को जलाकर पैदा की हुई कौड़ी गैरों को बख्श दे, आजकल की दुनिया में ऐसा पागल और भी कोई है? अपने स्त्री-बच्चों और परिवार के लिए रख छोड़ा जाय, तब न दूसरों को दान किया जाय? इस बात को बिल्कु्ल ही छोड़ दो, यह मैं नहीं कहता- किन्तु देखो, जिसके घर में पैसे की खींचतान हो उस आदमी को कभी प्रश्रय न देना। अधिक नहीं दो-चार दिन की आमद-रफ्त के बाद ही वह अपनी गिरस्ती की कष्ट-कहानी सुनाकर दो-चार रुपये माँग बैठेगा। जो दिये सो तो दिये ही, और बाहर का झगड़ा घर में खींच लाये सो अलग। रुपयों की ममता वैसे कोई सचमुच में तो छोड़ सकता नहीं-तकाजा करना ही पड़ता है, और तब दौड़-धूप झगड़ा-बखेड़ा। भला हमें इसकी जरूरत ही क्या पड़ी है?'' मैंने गर्दन हिलाकर कहा, ''जी हाँ, आप बिल्कुील सही कहते हैं।''
वे उत्तेजित होकर बोले, ''तुम अच्छे घर के लड़के हो, इसलिए चट से बात समझ गये; किन्तु इन छोटी जात के लोहा पीटनेवाले सालों की तो समझाओ देखूँ! हरामजादे सात जन्म में भी नहीं समझेंगे। सालों के पास खुद का एक पैसा नहीं, फिर भी, पराए घर से कर्ज लाकर दूसरों को दे आयँगे। ये छोटे लोग ऐसे ही अहमक होते हैं!''
कुछ देर चुप रहकर बोले, ''तब हों, देखो, कभी किसी को भी रुपये उधर मत देना। कहेंगे, ''बड़ा कष्ट है।'' तुम्हें कष्ट है भाई, तो हमें क्या? और यदि सचमुच में ही कष्ट है तो दो तोले सोना लाकर रख जाओ न, अभी देता हूँ दस रुपये उधार? क्यों भइए, है न ठीक?''
मैंने कहा, ''जी हाँ, ठीक तो है!''
वे बोले, ''एक दफे नहीं, सौ दफे ठीक है! और देखो, झगड़े-बखेड़े की जगह कभी मत जाना। किसी का खून हो जाये तो भी नहीं। हमें उससे मतलब? यदि किसी को बचाने जाओगे तो दो-एक चोटें अपने पर भी आ पड़ेंगी। सिवाय इसके कोई एक पक्ष अपना गवाह मान बैठेगा। तब फिर मुफ्त में करो दौड़ा-दौड़ अदालतों तक। बल्कि, लड़ाई-झगड़ा जब खत्म हो जाय तब, यदि जी चाहे तो घूम आओ- एक दफे वहाँ तक, और दो बातें भली-बुरी सलाह की दे आओ। पाँच आदमियों में तुम्हारा नाम हो जाएगा। है न बात ठीक?''
कुछ देर चुप रहकर फिर उन्होंने कहना शुरू किया, ''और फिर इन लोगों के रोग-शोक के समय तो भइया मैं इनके महल्ले में भी पैर नहीं रखता। उसी समय कह बैठते हैं कि ''भाई, मैं मर रहा हूँ, इस विपत्ति में दो रुपया देकर जरा सहायता करो!'' पर भइया, मनुष्य के मरने-जीने की बात तो कुछ कहीं नही जा सकती, इसलिए, उसे रुपया देना और पानी में फेंक देना एक ही बात है- बल्कि पानी में फेंक देना कहीं भला है, परन्तु उस जगह नहीं। और कुछ नहीं तो शायद यही कह बैठते हैं, ''जरा रत-जगा करने आ बैठना।'' बहुत खूब! मैं जाऊँ उनकी बीमारी में रत-जगा करने, किन्तु इस दूर परदेश में मुझे ही कुछ-न करें माता शीतला, कान पकड़ता हूँ माँ!'' यों कहकर उन्होंने जीभ को दाँतों-तले दबा लिया तथा अपने कान अपने ही हाथों ऐंठकर और नमस्कार कर कहा, ''हम लोग सभी तो उनके चरणों में पड़े हैं- किन्तु, बताओ भला, ऐसी विपत्ति में मेरी खबर कौन लेगा?''
अबकी मैं हाँ में हाँ न मिला सका। मुझे मौन देखकर वे मन ही मन शायद कुछ दुविधा में पड़कर बोले, ''देखो न साहब लोगों को। वे क्या कभी ऐसे स्थानों में जाते हैं? कभी नहीं। अपना एक कार्ड-भर पठा दिया, बस हो गया। इसीलिए देखो न उनकी उन्नति को! उसके बाद अच्छे होने पर फिर वैसा ही मेलजोल-ठीक उसी तरह। सो भइया, किसी के झगड़े-झंझट में कभी न पड़ना चाहिए।''
ऑफिस का समय होते देख मैं उठ खड़ा हुआ। इन प्रज्ञ महाशय की भली सलाह से इतनी उम्र में मेरी अधिक मानसिक उन्नति होना सम्भव हो, सो बात नहीं उससे मन के भीतर, और तो क्या, हलचल भी कुछ अधिक नहीं मची। क्योंकि, इस किस्म के अनुभवी व्यक्तियों का देहात में बिल्कुंल अभाव नहीं देखा। तथा उनकी और चाहे जितनी बदनामी हो किन्तु, सलाह देने में वे कंजूसी करते हों, उनके बारे में यह अपवाद भी कभी नहीं सुना गया। और देश के लोगों ने मान भी लिया है कि यह सलाह भली सलाह है- जीवन-यात्रा के कार्य में निस्संदिग्ध सज्जनोचित उपाय है- फिर भले ही पारिवारिक जीवन में यह उतनी कारगर न हो जितनी कि सामाजिक जीवन में। बंगाली गृहस्थ का कोई लड़का यदि अक्षरश: इसके अनुसार चले, तो उसके माँ-बाप असन्तुष्ट होंगे- बंगाली माता-पिताओं के विरुद्ध इतनी बड़ी झूठी बदनामी फैलाते हुए पुलिस के सी.आई.डी. के आदमियों का विवेक भी बाधा डालेगा। सो चाहे जो हो, किन्तु इस तरह की प्रतिज्ञा के भीतर कितना बड़ा अपराध था, यह दो हफ्ते भी न गुजरने पाए कि भगवान ने इन्हीं के द्वारा मेरे निकट प्रमाणित कर दिया।
तब से मैं अभया के घर की ओर नहीं गया था। यह सत्य है कि मैं उसकी सारी अवस्था के साथ उसकी बातों का मिलान करके शुरू से अन्त तक के इस व्यापार को ज्ञान के द्वारा एक तरह से देख सकता था। यह भी ठीक है कि उसके विचारों की स्वाधीनता, उसके आचरण की निर्भीक सावधानता, उनका परस्पर का सुन्दर और असाधारण स्नेह- यह सब मेरी बुद्धि को उसी ओर निरन्तर आकर्षित करते थे, किन्तु फिर भी, मेरे जीवन-भर के संस्कार किसी तरह भी उस ओर मुझे पैर नहीं बढ़ाने देते थे। मन में केवल यही आता था कि मेरी अन्नदा जीजी यह कार्य न करतीं। वे कहीं भी दासी-वृत्ति करके लांछना, अपमान और दु:ख के भीतर से गुजरते हुए अपना बाकी जीवन काट देतीं, किन्तु, ब्रह्माण्ड के सारे सुखों के बदले में भी जिसके साथ उनका विवाह नहीं हुआ उसके साथ गिरस्ती करने को राजी न होतीं। मैं जानता हूँ, उन्होंने भगवान के चरणों में एकान्त भाव से अपने आपको समर्पित कर दिया था। अपनी उस साधना के भीतर से उन्होंने पवित्रता की जो धारणा और कर्त्तव्य का जो ज्ञान-प्राप्त किया था, सो अभया की सुतीक्ष्ण बुद्धि की मीमांसा के समीप क्या एकबारगी ही बच्चों का खेल था?
हठात् अभया की एक बात याद आ गयी। तब भलीभाँति तह तक पहुँचने का मुझे अवकाश नहीं मिला था। उसने कहा था, ''श्रीकान्त बाबू, दु:ख का भोग करने में भी एक किस्म का नाशकारी मोह है। मनुष्य ने अपनी युग-युग की जीवन-यात्रा में यह देखा है कि कोई भी बड़ा फल किसी बड़े भारी दु:ख को उठाए बिना नहीं प्राप्त किया जा सकता। उसका जन्म-जन्मान्तर का अनुभव इस भ्रम को सत्य मान बैठा है कि जीवनरूपी तराजू में एक तरफ जितना ही अधिक दु:ख का भार लादा जाय, दूसरी ओर उतना ही अधिक सुख का बोझा ऊपर उठ आता है। इसीलिए तो, मनुष्य जब संसार में अपनी सहज और स्वाभाविक प्रकृति को अपनी इच्छा से वर्जित करके यह समझकर निराहार घूमता फिरता है कि 'मैं तपस्या करता हूँ।' तब, इस सम्बन्ध में कि उसके खाने के लिए कहीं पर उससे चौगुना आहार संचित हो रहा है, न तो उसके ही मन में तिल-भर सन्देह उठता है और न किसी और के ही मन में। इसीलिए, जब कोई सन्यासी निदारुण शीत में गले तक जल-मग्न होकर और भीषण गर्मी की भयंकर धूप में धूनी रमाए जमीन पर सिर और ऊपर पैर करके अवस्थित रहता है तब उसके दु:ख-भोग की कठोरता देखकर दर्शकों के दल केवल दु:ख का ही अनुभव नहीं करते, बल्कि उस पर एकबारगी मुग्ध हो जाते हैं। भविष्य में उसे मिलने वाले आराम के भारी और असम्भव हिसाब की खतौनी करके उनका प्रलुब्ध चित्त ईष्या से व्यस्त हो उठता है और वे कहने लगते हैं कि वह नीचे सिर और ऊपर पैर रखने वाला व्यक्ति ही संसार में धन्य है, मनुष्य-देह धारण करके करने योग्य कार्य वास्तव में वही कर रहा है, हम लोग तो कुछ भी नहीं कर रहे हैं- व्यर्थ ही जीवन गवाँ रहे हैं। इस तरह अपने आपको हजारों धिक्कार देते हुए वे मलीन मन से घर लौट आते हैं। श्रीकान्त बाबू, सुख प्राप्त करने के लिए दु:ख स्वीकार करना चाहिए, यह बात सत्य है किन्तु इसीलिए, यह स्वत: सिद्ध नहीं हो जाता कि जिस तरह भी हो बहुत-सा दु:ख भोग लेने से ही सुख हमारे कन्धों पर आ बैठेगा। यह इहलोक में भी सत्य नहीं है और परलोक में भी नहीं।''
मैंने कहना शुरू किया, ''किन्तु, विधवा का ब्रह्मचर्य...''
अभया ने मुझे बीच में टोककर कहा, ''विधवा का 'आचरण' कहिए- उसके साथ 'ब्रह्म' का बिन्दुमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। विधवा का चाल-चलन ही ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय है, यह मैं नहीं मानती। वास्तव में वह तो कुछ भी नहीं है। कुमारी, सधवा, विधवा-सभी अपने-अपने मार्ग से ब्रह्म-लाभ कर सकती हैं। विधवा का आचरण ही इसके लिए रिजर्व नहीं कर रक्खा गया है।''
मैंने हँसकर कहा, ''बहुत ठीक, ऐसा ही सही। उसका आचरण ब्रह्मचर्य न सही- नाम से क्या आता-जाता है?''
अभया ने बिगड़कर कहा, ''नाम ही तो सब कुछ है श्रीकान्त बाबू, नाम को छोड़कर दुनिया में और है ही क्या? गलत नामों के भीतर से मनुष्य की बुद्धि की विचारशीलता की और ज्ञान की धारा कितनी बड़ी भूलों के बीच बहाई जा सकती है, सो क्या आप नहीं जानते? इसी, नाम के भुलावे के कारण ही तो सब देश और सब काल विधवा के आचरण को सबसे श्रेष्ठ मानते आ रहे हैं। यह निरर्थक त्याग की निष्फल महिमा है श्रीकान्त बाबू, बिल्कुयल ही व्यर्थ बिल्कुील ही गलत। मनुष्य को इहलोक और परलोक दोनों में पशु बना देने वाली इससे बढ़कर जादूगरी और कोई हो ही नहीं सकती।''
उस समय और बहस न करके मैं चुप हो गया था। दरअसल उसे बहस में हरा देना एक तरह से असम्भव ही था। पहले-पहले जब जहाज पर उससे परिचय हुआ, डॉक्टर साहब केवल उसे बाहर से ही देखकर मजाक में बोले, ''औरत तो बड़ी ही 'फारवर्ड' है-परन्तु उस समय दोनों में से किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि, इस 'फारवर्ड' शब्द का अंत कहाँ तक पहुँच सकता है। यह रमणी अपने समस्त अन्तस्ल तक को किस तरह अकुण्ठित तेज से बाहर खींचकर सारे संसार के सामने खोलकर रख सकती है- लोगों के मतामत की परवाह ही नहीं करती, उस समय इसके सम्बन्ध में हमारी यह धारणा नहीं थी। अभया केवल अपने मत को अच्छा प्रमाणित करने के लिए ही वाग्वितण्डा नहीं करती- वह अपने कार्य को भी बलपूर्वक विजयी करने के लिए बाकायदा युद्ध करती है। उसका मत कुछ हो और काम कुछ और हो ऐसा नहीं है; इसलिए, शायद, बहुत दफे मैं उसके सामने उसकी बात का जवाब खोजे नहीं पाता था, कुछ अप्रतिभ-सा हो जाता था- परन्तु, लौटकर जब अपने डेरे पर पहुँचता था तब खयाल आता था- अरे यह तो उसका खूब करारा उत्तर था! खैर, जो भी हो उसके सम्बन्ध में आज भी मेरी दुविधा नहीं मिटी है। अपने आपसे मैं जितना ही प्रश्न करता कि इसके सिवाय अभया के लिए और गति ही क्या थी, उतना ही मेरा मन मानो उसके विरुद्ध टेढ़ा होकर खड़ा हो जाता। जितना ही मैं अपने आपको समझाता कि उस पर अश्रद्धा करने का मुझे जरा भी हक नहीं है- उतना ही अव्यक्त अरुचि से मानो अन्तर भर उठता।
मुझे खयाल आता है कि मन की ऐसी कुंठित अप्रसन्न अवस्था में ही मेरे दिन बीत रहे थे, इसीलिए, न तो मैं उसके समीप ही जा सकता था और न एकबारगी उसे अपने मन से दूर ही हटा सकता था।
ऐसे ही समय हठात् एक दिन प्लेग ने शहर के बीच आकर अपन घूँघट खोल दिया और अपना काला मुँह बाहर निकाला। हाय रे! उसे समुद्र-पार रोक रखने के लिए किये गये लक्ष कोटि जन्तर-मन्तर और अधिकारियों की अधिक से अधिक निष्ठुर सावधानी, सब मुहूर्त-भर में एकबारगी धूल में मिल गयी! लोगों में बेहद आतंक छा गया। शहर के चौदह आने लोग या तो नौकरपेशा थे या फिर व्यापार-पेशा। इस कारण, उनको एकबारगी दूर भाग जाने का भी सुभीता नहीं था। वही दशा हुई जैसी किसी सब ओर से रुद्ध कमरे के बीच आतिशबाजी की छछूँदर छोड़ देने पर होती है। भय के मारे इस महल्ले के लोग स्त्री-पुत्रों का हाथ पकड़े, छोटी-छोटी गठरियाँ कन्धों पर लादे उस महल्ले को भागते थे और उस महल्ले के लोग ठीक उसी तरह इस महल्ले को भागते आते थे! मुँह से 'चूहा' शब्द निकला नहीं कि फिर खैर नहीं। वह मरा है या जीता, यह सुनने के पहले ही लोग भागना शुरू कर देते! मालूम होता था लोगों के प्राण मानो वृक्ष के फलों की तरह पकड़कर डण्ठलों में झूल रहे हैं, प्लेग की हवा लगते ही रात-भर में उनमें से कौन कब 'टप' से नीचे टपक पड़ेगा, इसका कोई निश्चय ही नहीं।
शनीचर की बात है। एक साधारण से काम के लिए सुबह ही मैं बाहर चला गया था। शहर के बीचोंबीच एक गली के भीतर से बड़े रास्ते पर जाने के लिए जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाए चला जा रहा था कि देखा एक अत्यन्त जीर्ण मकान के दो- मंजिले के बरामदे में मनोहर चक्रवर्ती खड़े हुए बुला रहे हैं।
मैंने हाथ हिलाकर कहा, ''समय नहीं।''
वे अतिशय अनुनय-सहित बोले, ''दो मिनट के लिए एकदम ऊपर आइए, श्रीकान्त बाबू, बड़ी आफत में हूँ।''
आखिर बिल्कुील इच्छा न रहते भी ऊपर जाना पड़ा। मैं यही तो बीच-बीच में सोचा करता हूँ कि क्या मनुष्य की हर एक हरकत पहले से ही निश्चित की हुई होती है! नहीं तो, मेरा कोई ऐसा काम भी न था और न उस गली के भीतर इससे पहले कभी प्रवेश ही किया था, तब, आज सुबह ही मैं इस ओर आकर कैसे हाजिर हो गया?
नजदीक जाकर कहा, ''बहुत दिन से तो आप उस तरफ आए नहीं- आप क्या इसी मकान में रहते हैं?''
वे बोले, ''नहीं महाशय, मैं बारह-तेरह दिन हुए तभी यहाँ आया हूँ। एक तो महीने-भर से 'डिसेण्ट्री' (दस्त लगने की बीमारी) भुगत रहा हूँ, फिर उस पर हो गयी हमारे महल्ले में प्लेग। क्या करूँ महाशय, उठ तक नहीं सकता हूँ, फिर भी जैसे-तैसे जल्दी से भाग आया।''
मैंने कहा, ''बहुत ठीक किया।''
वे बोले, ''बहुत ठीक किया, यह कैसे कहूँ महाशय, मेरा, ''कम्बाइण्ड हैण्ड' बहुत ही बदजात है। बोलता है 'नहीं रहूँ, चला आऊँगा।'' जरा साले को अच्छी तरह धमका तो दीजिए।''
मुझे जरा अचरज हुआ। किन्तु, इसके पहले इस 'कम्बाइण्ड हैण्ड' नामक चीज की व्याख्या कर देना जरूरी है। क्योंकि जो लोग यह नहीं जानते कि 'हिन्दुस्तानी लोग' पैसे के लिए जो न कर सके दुनिया में ऐसा कोई काम ही नहीं है, वे लोग यह सुनकर विस्मित होंगे कि इस अंगरेजी शब्द का मतलब है दुबे, चौबे, तिवारी आदि हिन्दुस्तानी ब्राह्मण, जो यहाँ पर तो किसी के पास फटकते ही उछल पड़ते हैं, परन्तु, वहाँ जाकर रसोई बनाते हैं, जूठे बर्तन माँजते हैं, तम्बाकू भरते हैं और बाबू साहबों के ऑफिस जाते समय उनके बूट झाड़-पोंछकर साफ कर देते हैं- फिर वे बाबू चाहे किसी भी जाति के क्यों न हों। हाँ, यह बात अवश्य है कि दो-चार रुपये महीना अधिक देने पर ही ये त्रिवेदी, चतुर्वेदी आदि पूज्य लोग ब्राह्मण और शूद्र-दोनों का काम 'कम्बाइण्ड' तौर पर करते है। बेवकूफ उड़िया और बंगाली ब्राह्मण आज तक भी यह कार्य करने को राजी नहीं किये जा सके, किये जा सके तो सिर्फ ये ही। इसका कारण पहले ही कह चुका हूँ कि पैसा पाने पर सारे कुसंस्कारों को छोड़ने में 'हिन्दुस्तानी लोगों' को मुहूर्त-भर की भी देर नहीं लगती। मुर्गी पकाने के लिए चार-आठ आने महीने और अधिक देने पड़ते हैं; क्योंकि 'मूल्य के द्वारा सब कुछ शुद्ध हो जाता है-शास्त्र के इस वचनार्ध का यथार्थ तात्पर्य हृदयंगम करने तथा शास्त्रवाक्य में अविचलित श्रद्धा रखने में आज तक यदि कोई समर्थ हुए हैं तो यही हिन्दुस्तानी लोग- यह बात स्वीकार करनी ही होगी।
किन्तु, मनोहर बाबू के इस 'कम्बाइण्ड हैण्ड' को मैं किसलिए धमकी दूँ और वह भी क्यों मेरी धमकी सुनेगा, यह मैं नहीं समझ सका। और यह 'हैण्ड' भी मनोहर बाबू ने हाल ही रक्खा था। इतने दिन वे अपने कम्बाइण्ड 'हैण्ड' खुद ही थे, केवल 'डिसेण्ट्री' के खातिर कुछ दिनों के लिए इसे रख लिया था। मनोहर बाबू कहने लगे, ''महाशय, आप क्या कोई साधारण आदमी हैं; शहर भर के लोग आपकी बात पर मरते जीते हैं- सो क्या आप समझते हैं मैं नहीं जानता? अधिक नहीं, एक सतर ही यदि आप लाट साहब को लिख दें तो उसे चौदह साल की जेल हो जाय, सो क्या मैंने नहीं सुना? लगा तो दीजिए बच्चू को अच्छी तरह डाँट।''
बात सुनकर मैं जैसे दिग्भ्रमित-सा हो गया। जिन लाट साहब का नाम तक मैंने नहीं सुना था उनको अधिक नहीं, एक ही सतर लिख देने से चौदह साल के कारावास की सम्भावना- मेरी इतनी बड़ी अद्भुत शक्ति की बात इतने बड़े सुचतुर व्यक्ति के मुँह से सुनकर मैं क्या कहूँ और क्या करूँ, सोच ही न सका। फिर भी उनके बारबार के आग्रह और जबर्दस्ती के मारे जब और गति नहीं रही तब उस 'कम्बाइण्ड हैण्ड' को डाँट बताने रसोई-घर में घुसा। देखा, वह अन्धकूप की तरह अंधेरा है।
वह आड़ में खड़ा हुआ अपने मालिक के मुँह से मेरी क्षमता की विरदावली सुन चुका था, इसलिए रुँआसा होकर हाथ जोड़कर बोला, ''इस घर में 'देवता' हैं, यहाँ पर मैं किसी तरह भी नहीं रह सकता। तरह-तरह की 'छायाएँ' रात-दिन घर में घूमा करती हैं। बाबू यदि किसी और मकान में जाकर रहें तो मैं सहज ही उनकी नौकरी कर सकता हूँ; किन्तु, इस मकान में तो...''
भला ऐसे अंधेरे घर में 'छाया' का क्या अपराध! किन्तु, छाया ही नहीं, वहाँ एक बहुत बुरी सड़ांध भी, जब से मैं आया था तभी से, आ रही थी। पूछा, ''यह दुर्गन्ध काहे की है रे?''
''कम्बाइण्ड हैण्ड' बोला, ''कोई चूहा-ऊहा सड़ गया होगा।''
मैं चौंक पड़ा। ''चूहा कैसा रे? इस घर में चूहे मरते हैं क्या?''
उसने हाथ को उलटाकर अवज्ञा के साथ बतलाया कि रोज सुबह कम-से-कम पाँच-छ: मरे चूहे तो वह खुद ही उठाकर बाहर गली में फेंक दिया करता है।
मिट्टी के तेल की डिब्बी जलाकर खोज की गयी, किन्तु, सड़े हुए चूहों का पता नहीं लगा। फिर भी मेरा शरीर सन्-सन् करने लगा और जी खोलकर उस आदमी को किसी तरह भी यह सदुपदेश न दे सका कि रुग्ण मालिक को अकेला छोड़कर उसे भाग जाना उचित नहीं है।
सोने के कमरे में लौटकर देखता हूँ, मनोहर बाबू खाट पर बैठे मेरी राह देख रहे हैं। मुझे पास में बैठाकर वे इस मकान के गुणों का बखान करने लगे; इतने कम किराए में शहर के बीच इतना अच्छा मकान और कोई नहीं, ऐसा मकान-मालिक भी कोई नहीं और न ऐसे पड़ोसी ही सहज में मिल सकते हैं। पास के मकान में जो चार-पाँच मद्रासी क्रिस्तान 'मेस' चलाते हैं, वे जितने ही शिष्ट और शान्त हैं उतने ही मायालु हैं। उन्होंने अपना यह इरादा भी बतला दिया कि जरा कुछ चंगे होते ही उस साले बाम्हन को निकाल बाहर करेंगे। फिर एकाएक बोले, ''अच्छा महाशय, आप स्वप्न पर विश्वास करते हैं?''
मैं बोला, ''नहीं।''
वे बोले, ''मैं भी नहीं करता; किन्तु, कैसे अचरज की बात है महाशय, कल, रात को मैंने स्वप्न देखा कि मैं सीढ़ी पर से गिर पड़ा हूँ और जागकर देखा तो दाहिने पैर का कूल्हा सूज आया है। सच-झूठ आप मेरे शरीर पर हाथ धरकर देखिए महाशय, तकलीफ से ज्वर तक हो आया है।''
सुनने-मात्र से मेरा मुँह काला पड़ गया। इसके बाद कूल्हा भी देखा और शरीर पर हाथ रखकर ज्वर भी।
मिनट-भर मूढ़ की तरह बैठे रहने के बाद अन्त में बोला, ''डॉक्टर को अब तक आपने क्यों नहीं बुला भेजा? अब किसी को जल्दी भेजिए।''
वे बोले, ''महाशय, यह देश! यहाँ पर डॉक्टर की फीस भी तो कम नहीं है। उसे लाए नहीं कि चार-पाँच रुपये यों ही चले जाँयगे! सिवाय इसके फिर दवाई के दाम! करीब दो रुपये की दच्च इस तरह और लग जायेगी।''
मैंने कहा, सो लगने दीजिए, बुलाने भेजिए।''
''कौन जायेगा महाशय? तिवारी साला तो चीन्हता भी नहीं है। सिवाय इसके वह चला जायेगा तो खाना कौन पकाएगा?''
''अच्छा, मैं ही जाता हूँ,'' कहकर डॉक्टर को बुलाने बाहर चल दिया।
डॉक्टर ने आकर और परीक्षा करके आड़ में ले जाकर पूछा, ''ये आपके कौन होते हैं?''
मैंने कहा, ''कोई नहीं,'' और किस तरह सुबह यहाँ आ पड़ा सो भी मैंने खोलकर कह दिया।
डॉक्टर ने प्रश्न किया, ''इनका और भी कोई कुटुम्बी यहाँ पर है क्या?''
मैंने कहा, ''सो मुझे नहीं मालूम। शायद कोई नहीं है।''
डॉक्टर क्षण-भर मौन रहकर बोले, ''मैं एक दवा लिखकर दिए जाता हूँ। सिर पर बरफ रखने की भी जरूरत है; किन्तु सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि इन्हें प्लेग-हॉस्पिटल में पहुँचा दिया जाय। आप खुद भी इस मकान में न ठहरिए। और देखिए, मुझे फीस देने की जरूरत नहीं है।''
डॉक्टर चले गये। बड़े संकोच के साथ मैंने अस्पताल का प्रस्ताव किया। सुनते ही मनोहर रोने लगे और 'वहाँ पर जहर देकर रोगी मार डाले जाते हैं, और वहाँ जाकर कोई लौटकर नहीं आता!'' इस तरह बहुत कुछ बक गये।
दवाई लाने भेजने के लिए तिवारी को खोजता हूँ तो देखा कि ''कम्बाइण्ड हैण्ड' अपना लोटा-कम्बल लेकर इस बीच ही न मालूम कब खिसक गया है। जान पड़ता है, उसने डॉक्टर के साथ मेरी बातचीत किवाड़ की सन्धि में से सुन ली थी। हिन्दुस्तानी और चाहे कुछ न समझें किन्तु 'पिलेग' शब्द को खूब समझते हैं!
तब मुझे ही औषधि लेने जाना पड़ा। बरफ, आईसबैग आदि जो कुछ आवश्यक था सब मैंने ही खरीद लाकर हाजिर कर दिया। इसके बाद रह गया मैं और वे- वे और मैं। एक दफे मैं उनके सिर पर आइसबैग रखता था और एक दफे वे मेरे सिर पर रखते थे। इसी तरह उठा-धरी करते-करते जब करीब दो बज गये तब उन्होंने निस्तेज होकर शय्या ग्रहण कर ली। बीच-बीच में वे खूब होश-हवास की भी बात करते थे। शाम के लगभग क्षण-भर के लिए सचेतन से होकर मेरे मुँह की ओर देखकर बोले, ''श्रीकान्त बाबू, अब मैं न बचूँगा।''
मैं चुप हो रहा। इसके बाद बड़ी कोशिश करके कमर में से उन्होंने चाबी निकाली और उसे मेरे हाथ में देकर कहा, ''मेरे ट्रंक में तीन सौ गन्नियाँ रक्खी हैं-मेरी स्त्री को भेज देना। पता मेरे बॉक्स में लिखा रक्खा है जो खोजने से मिल जायेगा।''
मुझे एकमात्र हिम्मत थी पास के 'मैस' की। वहाँ की आहट, धीमा कण्ठस्वर, मैं सुन सकता था। संध्याम के बाद एक दफे कुछ अधिक उठा-धरी और गोलमाल सुन पड़ा। कुछ देर बाद ही जान पड़ा कि वे लोग दरवाजे में ताला लगाकर कहीं जा रहे हैं। बाहर आकर देखा, सचमुच दरवाजे में ताला लटक रहा है। मैंने समझा, वे लोग घूमने गये हैं, कुछ देर बाद ही लौट आयँगे। किन्तु फिर भी न जाने क्यों मेरा जी और भी खराब हो गया।
इधर वह रुग्ण आदमी उत्तरोत्तर जो-जो चेष्टाएँ करने लगा, उनके सम्बन्ध में इतना ही कह सकता हूँ कि वह अकेले बैठकर मजा लेने जैसी वस्तु नहीं थी। उधर रात के बारह बजने को हुए; किन्तु न तो पास के कमरे के खुलने की आहट ही मिली और न कोई शब्द ही सुनाई दिया। बीच-बीच में बाहर आकर देख जाता था- ताला उसी तरह लटक रहा है। एकाएक नजर पड़ी कि लकड़ी की दीवाल की एक सन्धि में से उस कमरे का तीव्र प्रकाश इस कमरे में आ रहा है। कुतूहल के वश होकर छिद्र पर ऑंख लगाकर उस तीव्र प्रकाश के कारण का पता लगाया, तो उससे मेरे सर्वांग का रक्त जमकर बरफ हो गया। सामने खाट पर दो जवान आदमी पास ही पास तकिये पर सिर रक्खे सो रहे हैं और उनके सिराने खाट के बगल में मोमबत्तियों की एक कतार जल-जलकर प्राय: समाप्त होने को आ गयी है। मुझे पहले से ही मालूम था कि रोमन कैथोलिक लोग मुर्दे के सिराने रोशनी जला देते हैं, अतएव, ऐसे हृष्टपुष्ट सबल शरीर लोगों की इस असमय की नींद का जो कारण था वह सब मुहूर्त मात्र में समझ में आ गया और मैं जान गया कि अब उन दोनों की नींद हजार चिल्लाने पर भी नहीं टूटेगी। इधर इस कमरे में भी हमारे मनोहर बाबू करीब दो घण्टे और छटपटाने के बाद सो गये! चलो, जान बची।
किन्तु, मजा यह कि जिन्होंने मुझे उस दिन बहुत-सा उपदेश दिया था कि जान-पहिचान के किसी भी आदमी की बीमारी की खबर पाकर उस मुहल्ले में पैर भी न रखना चाहिए, उन्हीं के मुदकी और गिन्नियों के बॉक्स की रखवाली करने के लिए भगवान ने मुझे नियुक्त कर दिया! नियुक्त तो कर दिया, किन्तु बाकी रात मेरी जिस तरह कटी, सो लिखकर बतलाना न तो सम्भव है और न बतलाने की प्रवृत्ति ही होती है। फिर भी, इस पर कोई पाठक अविश्वास न करेगा कि वह, मोटे तौर पर, भली तरह नहीं कटी।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:22

दूसरे दिन 'डेथ सर्टिफिकेट' लेने, पुलिस को बुलाने, तार देने, गिन्नियों का इन्तजाम करने और मुर्दे को बिदा करने में तीन बज गये। खैर, मनोहर तो ठेलागाड़ी पर चढ़कर शायद स्वर्ग की ओर रवाना हो गये- रहा मैं, सो मैं अपने डेरे पर लौट आया। पिछले दिन तो एकादशी की ही थी- आज भी शाम हो गयी। डेरे पर लौटने पर जान पड़ा कि जैसे दाहिने कान की जड़ में सूजन आ गयी है और दर्द हो रहा है। क्या जाने, सारी रात हाथ से छेड़-छेड़कर मैंने खुद ही दर्द पैदा कर लिया है अथवा सचमुच ही गिन्नियों का हिसाब देने मुझे भी स्वर्ग जाना पड़ेगा! एकाएक कुछ नहीं समझ सका। किन्तु यह समझने में देर नहीं लगी कि बाद में चाहे जो हो, फिलहाल तो होश-हवास दुरुस्त रहने की हालत में अपनी सब व्यवस्था खुद ही कर रखनी होगी। क्योंकि मनोहर की तरह आईस बैग लेकर उठा-धरी करना न तो ठीक ही मालूम देता है और न सुन्दर। निश्चय करते मुझे देर न लगी। क्योंकि, पल-भर में ही मैंने देख लिया कि इतने बड़े बुरे रोग का भार यदि मैं किसी पुण्यात्मा साधु पुरुष के ऊपर डालने जाऊँगा तो निश्चय ही बड़ा भारी पाप होगा। किसी भले आदमी को हैरान करना कर्त्तव्य भी नहीं है-अशास्त्रीय है! इसलिए उसकी जरूरत नहीं। बल्कि, इस रंगून के एक कोने में अभया नाम की जो एक महापापिष्ठा पतिता नारी रहती है- एक दिन जिसे घृणा करके छोड़ आया हूँ, उसी के कन्धों पर अपनी इस संघातिक बीमारी का गन्दा बोझ घृणा के साथ डाल देना चाहिए- मरना ही है तो वहीं मरूँ। शायद, इससे कुछ पुण्य-संचय भी हो जाय, यही सोचकर मैंने नौकर को गाड़ी लाने का हुक्म दे दिया।
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उस दिन जब मृत्यु का परवाना हाथ में लेकर मैं अभया के द्वार पर जा खड़ा हुआ, तब मुझे मरने की अपेक्षा मरने की लाज ने ही अधिक भय दिखाया। अभया का मुँह फक् सफेद पड़ गया। किन्तु, उसके सफेद होठों से केवल यही शब्द फूटकर बाहर निकले, ''तुम्हारा दायित्व मैं न लूँगी तो और कौन लेगा? यहाँ तुम्हारी मुझसे बढ़कर और किसे गरज है?'' दोनों ऑंखों में पानी भर आया, फिर भी मैंने कहा, मैं तो बस चल दिया। रास्ते का कष्ट मुझे उठाना ही होगा, उसे निवारण करने की शक्ति किसी में भी नहीं है। किन्तु जाते समय तुम्हारी इस नयी घर-गिरस्ती के बीच इतनी बड़ी विपत्ति डालने का अब किसी तरह भी मन नहीं होता। अभया, अभी गाड़ी खड़ी है, होश-हवास दुरुस्त हैं- अब भी अच्छी तरह प्लेग-हॉस्पिटल तक जा सकता हूँ। तुम केवल मुहूर्त-भर के लिए जी कड़ा करके कह दो, ''अच्छा जाओ।'' अभया ने कोई उत्तर दिये बिना हाथ पकड़ लिया और मुझे बिछौने में ले जाकर सुला दिया। अब, उसने अपने ऑंसू पोंछे और मेरे उत्तप्त ललाट पर धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए कहा, ''यदि तुमसे 'जाओ' कह सकती, तो नये सिरे से यह घर-गिरस्ती कायम न करती आज से मेरी नयी गिरस्ती सचमुच की गिरस्ती हुई।''
किन्तु, बहुत सम्भव है कि वह प्लेग नहीं था। इसीलिए, मृत्यु केवल जरा-सा परिहास करके ही चली गयी। दसेक दिन में मैं उठ खड़ा हुआ। किन्तु, अभया ने फिर मुझे होटल के डेरे में नहीं लौटने दिया।
ऑफिस जाऊँ या और भी कुछ दिन छुट्टी लेकर विश्राम करूँ, यह सोच ही रहा था कि एक दिन ऑफिस का चपरासी एक चिट्ठी दे गया। खोलकर देखी तो प्यारी की चिट्ठी है। बर्मा आने के बाद उसका यही एक पत्र मिला। जवाब न मिलने पर भी मैं कभी-कभी उसे पत्र लिख दिया करता था- आते समय यही शर्त मुझसे उसने करा ली थी। पत्र के प्रारम्भ में ही इसका उल्लेख करके उसने लिखा था, ''मेरे मरने की खबर तो तुम जरूर पाओगे। जीते-जी मेरा ऐसा कोई समाचार ही नहीं हो सकता जिसे जाने बिना तुम्हारा काम न चले। लेकिन, मेरे लिए तो ऐसा नहीं है। मेरे सारे प्राण तो मानो विदेश में ही निरन्तर पड़े रहते हैं। यह बात इतनी अधिक सत्य है कि तुम भी इस पर विश्वास किये बगैर नहीं रह सकते। इसीलिए उत्तर न पाने पर भी बीच-बीच में तुम्हें चिट्ठी देकर बतलाना पड़ता है कि तुम वहाँ अच्छी तरह हो।
''मैं इस महीने के भीतर ही बंकू का विवाह कर देना चाहती हूँ। तुम अपनी सम्मति लिखना। तुम्हारी इस बात को मैं अस्वीकार नहीं करती कि कुटुम्ब के भरण-पोषण की शक्ति हुए बगैर विवाह होना उचित नहीं है। बंकू में अभी तक यह क्षमता नहीं आई; फिर भी, क्यों मैं इसके लिए तुम्हारी सम्मति चाहती हूँ सो मुझे और एक बार अपनी ऑंखों देखे वगैर तुम नहीं समझोगे। जैसे भी बने यहाँ आ जाओ। तुम्हें मेरे सर की कसम है।''
पत्र के पिछले हिस्से में अभया की बात थी। अभया ने जब लौट आकर कहा था कि जिसे मैं चाहती हूँ- प्रेम करती हूँ, उसकी गिरस्ती बसाने के लिए मैं एक पशु का त्याग करके चली आई हूँ, और इसी विषय को लेकर सामाजिक रीति-नीति के सम्बन्ध में स्पर्धा के साथ उसने बहस की थी तब उससे मैं इतना विचलित हो उठा था कि प्यारी को बहुत-सी बातें लिख डाली थीं। आज उन्हीं का प्रत्युत्तर उसने दिया है-
''तुम्हारे मुँह से यदि वे मेरा नाम सुन चुकी हो तो अनुरोध है कि तुम उनसे एक बार मिलना और कहना कि राजलक्ष्मी ने तुम्हें सहस्र-कोटि नमस्कार लिखे हैं। उम्र में वे मुझसे छोटी हैं या बड़ी सो मैं नहीं जानती, जानना जरूरी भी नहीं है, वे केवल अपनी तेजस्विता के कारण ही मेरे समान स्त्री के द्वारा वन्दनीय हैं। आज मुझे अपने गुरुदेव के श्रीमुख की कुछ बातें बार-बार याद आती हैं। मेरे काशी के मकान में दीक्षा की सब तैयारियाँ हो गयी हैं, गुरुदेव आसन ग्रहण करके स्तब्ध भाव से कुछ सोच रहे हैं। मैं आड़ में खड़ी बहुत देर तक उनके प्रसन्न मुख की ओर एकटक देख रही हूँ। एकाएक भय के मारे मेरी छाती के भीतर उथल-पुथल मच गयी। उनके पैरों के पास औंधे पड़कर मैंने रोते हुए, 'बाबा, मैं मन्त्र नहीं लूँगी।'' वे विस्मित होकर मेरे सिर पर अपना दाहिना हाथ रखकर बोले, ''क्यों न लोगी?'
''मैंने कहा, 'मैं महापापिष्ठा हूँ।'
''उन्होंने बीच में ही रोककर कहा; 'ऐसा है, तब तो मन्त्र लेने की और भी अधिक जरूरत है बेटी।'
''रोते-रोते मैंने कहा, 'लाज के मारे मैंने अपना सच्चा परिचय नहीं दिया है, देती तो आप इस मकान की चौखट भी लाँघना पसन्द नहीं करते।'
''गुरुदेव मुस्कु'राकर बोले, 'नहीं, तो भी मैं लाँघता, और दीक्षा देता। प्यारी के मकान में भले ही न आता; किन्तु अपनी राजलक्ष्मी बेटी के मकान में क्यों न आऊँगा बेटी?'
''मैं चौंककर स्तब्ध हो गयी। कुछ देर चुप रहकर बोली, 'किन्तु, मेरी माँ के गुरु ने तो कहा था कि मुझे दीक्षा देने से पतित होना पड़ेगा- सो बात क्या सच नहीं थी?'
''गुरुदेव हँसे। बोले, 'सच थी इसलिए तो वे दे नहीं सके बेटी। किन्तु, जिसे वह भय नहीं है, वह क्यों नहीं देगा?'
''मैंने कहा, ''भय क्यों नहीं हैं?''
''वे फिर हँसकर बोले, 'एक ही मकान में जो रोग के कीटाणु एक आदमी को मार डालते हैं, वे ही कीटाणु दूसरे आदमी को स्पर्श तक नहीं करते- बतला सकती हो क्यों?'
''मैंने कहा, 'शायद स्पर्श तो करते हैं, किन्तु, जो लोग सबल हैं वे बच जाते हैं; जो दुर्बल होते हैं वे मारे जाते हैं।'
''गुरुदेव ने मेरे सिर पर पुन: अपना हाथ रखकर कहा, 'इस बात को किसी दिन भी मत भूलना बेटी। जो अपराध एक आदमी को मिट्टी में मिला देता है, उसी अपराध में से दूसरा आदमी स्वच्छन्दता से पार हो जाता है। इसलिए सारे विधि-निषेध सभी को एक डोरी में नहीं बाँध सकते।'''
''संकोच के साथ मैंने धीरे से पूछा, 'जो अन्याय है, जो अधर्म है, वह क्या सबल और दुर्बल दोनों के निकट समान रूप से अन्याय-अधर्म नहीं है? यदि नहीं है, तो यह क्या अविचार नहीं है?''
''गुरुदेव बोले, ''नहीं बेटी, बाहर से चाहे जैसा दीखे, उनका फल समान नहीं है। यदि ऐसा होता तो संसार में सबल-दुर्बल में कोई अधिक भेद ही नहीं रहता। जो विष पाँच वर्ष के बच्चे के लिए घातक है, वही विष यदि इकतीस वर्ष के मनुष्य को न मार सके तो दोष किसे दोगी बेटी? किन्तु, यदि आज तुम मेरी बात पूरी तरह न समझ सको, तो, कम-से-कम इतना जरूर याद रखना कि जिन लोगों के भीतर आग जल रही है और जिनमें केवल राख ही इकट्ठी होकर रह गयी है- उनके कर्मों का वजन एक ही बाट से नहीं किया जा सकता। यदि किया जाए, तो गलती होगी।''
''श्रीकान्त भइया, तुम्हारी चिट्ठी पढ़कर आज मुझे अपने गुरुदेव की वही भीतर की आग वाली बात याद आ रही है। अभया को नजर से देखा नहीं है, फिर भी ऐसा लगता है कि उनके भीतर जो आग जल रही है उसकी ज्वाला का आभास चिट्ठी के भीतर से भी जैसे मैं पा रही हूँ। उनके कर्मों का विचार जरा सावधानी से करना। मेरे जैसी साधारण स्त्री के बटखरे लेकर उनके पाप-पुण्य का वजन करने न बैठ जाना।''
चिट्ठी को अभया के हाथ में देकर कहा, ''राजलक्ष्मी ने तुम्हें शत-सहस्र नमस्कार लिखा है, यह लो।''
अभया, जो कुछ लिखा था उसे दो-तीन बार पढ़कर और किसी तरह पत्र को मेरे बिछौने पर डालकर, तेजी से बाहर चली गयी। दुनिया की नजरों में उसका जो नारीत्व आज लांछित और अपमानित हो रहा है, उसी के ऊपर शत योजना दूर से एक अपरिचिता नारी ने सम्मान की पुष्पांजलि अर्पण की है, उसी की अपरि सीमा आनन्द-वेदना को वह एक पुरुष की दृष्टि से बचाकर चटपट आड़ में ले गयी।
करीब आधा घण्टे बाद अभया अच्छी तरह मुँह-ऑंखें धोकर लौट आई और बोली, ''श्रीकान्त भइया...''
मैंने रोककर कहा, ''अरे यह क्या! 'भइया' कब से हो गया?''
''आज से ही।''
''नहीं नहीं, 'भइया' नहीं। तुम सब लोक मिलकर सभी ओर से मेरा रास्ता बन्द न कर देना!''
अभया ने हँसकर कहा, ''मालूम होता है, मन ही मन कोई मतलब गाँठ रहे हो, क्यों?''
''क्यों, क्या मैं आदमी नहीं हूँ?''
अभया बोली, ''बेढब आदमी दीखते हो। बेचारे रोहिणी बाबू ने बीमारी के समय आसरा दिया; अब चंगे होकर, जान पड़ता है, उन्हें यही पुरस्कार देना निश्चय किया है। किन्तु, मेरी बड़ी भूल हो गयी। उस समय बीमारी का एक तार दे देती, तो आज उन्हें देख लेती।''
मैंने गर्दन हिलाकर कहा, ''आश्चर्य नहीं कि वह आ जाती।''
अभया क्षण-भर स्थिर रहकर बोली, ''तुम एकाध महीने की छुट्टी लेकर एक बार चले जाओ, श्रीकान्त भइया। मुझे जान पड़ता है, तुम्हारी उन्हें बड़ी जरूरत हो रही है।''
न जाने कैसे खुद भी मैं इस बात को समझ रहा था कि मेरी उसे बड़ी जरूरत है। दूसरे ही दिन ऑफिस को चिट्ठी लिखकर मैंने और एक महीने की छुट्ठी ले ली और आगामी मेल से यात्रा करने के विचार से टिकट खरीदने के लिए आदमी भेज दिया।
जाते समय अभया ने नमस्कार करके कहा, ''श्रीकान्त भइया, एक वचन दो।''
''क्या वचन दूँ बहिन?''
''पुरुष संसार की सभी समस्याओं की मीमांसा नहीं कर सकते। यदि कहीं अटको तो चिट्ठी लिखकर मेरी राय जरूर ले लोगे, बोलो?''
मैं स्वीकार करके जहाज-घाट जाने के लिए गाड़ी पर जा बैठा। अभया ने गाड़ी के दरवाजे के निकट खड़े होकर और एक दफे नमस्कार किया; बोली, ''रोहिणी बाबू के द्वारा मैंने कल ही वहाँ टेलीग्राम करा दिया है। किन्तु, जहाज पर कुछ दिन अपने शरीर की ओर जरा नजर रखना श्रीकान्त भइया, इसके सिवाय मैं तुमसे और कुछ नहीं चाहती।''
'अच्छा' कहकर मैंने मुँह उठाकर देखा कि अभया की ऑंखों की दोनों पुतलियाँ पानी में तैर रही हैं।
कलकत्ते के घाट पर जहाज जा भिड़ा देखा, जेटी के ऊपर बंकू खड़ा है। वह सीढ़ी से चटपट ऊपर चढ़ आया और जमीन पर सिर टेक प्रणाम करके बोला, ''माँ रास्ते पर गाड़ी में राह देख रही हैं। आप नीचे जाइए, मैं सामान लेकर पीछे आता हूँ।''
बाहर आते ही और भी एक आदमी झुककर पैर छूकर खड़ा हो गया। मैंने कहा, ''अरे रतन कहो, अच्छे तो हो?''
रतन कुछ हँसकर बोला, ''आपके आशीर्वाद से। आइए।'' यह कहकर उसने रास्ता दिखाते हुए गाड़ी के समीप लाकर दरवाजा खोल दिया। राजलक्ष्मी बोली, ''आइए, और रतन, तुम लोग एक और गाड़ी करके पीछे से आ जाना दो बज रहे हैं, अभी तक इन्होंने नहाया-खाया भी नहीं, हम लोग डेरे पर चलते हैं। गाड़ी हाँकने को कह दे।''
मैं गाड़ी पर बैठ गया। रतन ने 'जी, अच्छा' कहकर गाड़ी का दरवाजा बन्द कर दिया और गाड़ीवान को हाँकने के लिए इशारा कर दिया। राजलक्ष्मी ने झुककर पद-धूलि ली और कहा, ''जहाज में कष्ट तो नहीं हुआ?''
''नहीं।''
''तबीयत बहुत खराब हो गयी थी क्या?''
''तबीयत खराब तो जरूर हो गयी थी, परन्तु बहुत नहीं। किन्तु तुम भी तो स्वस्थ नहीं दीख पड़तीं। घर से कब आईं?''
''परसों। अभया के द्वारा तुम्हारे आने की खबर पाते ही हम लोग घर से चल दिये। आना तो था ही, इसलिए दो दिन पहले ही चले आए। यहाँ पर तुम्हें कितना काम करना है, मालूम है?''
मैं बोला, ''काम की बात फिर होगी- किन्तु तुम ऐसी क्यों दिखाई दे रही हो? तुम्हें क्या हुआ था?''
राजलक्ष्मी हँस दी। इस हँसी को देखकर ही आज खयाल आया कि न जाने कितने दिनों से यह हँसी नहीं देखी और साथ ही एक कितनी बड़ी अदम्य इच्छा को उस समय चुपचाप दमन कर डाला, सो उस अन्तर्यामी के सिवाय और किसी ने नहीं जाना। किन्तु, दीर्घ श्वास को मैं उससे छिपा नहीं सका। उसने विस्मित की तरह क्षण-भर तक मेरी तरफ ताकते रहकर फिर हँसकर पूछा, ''कैसी दिख पड़ती हूँ मैं-बीमार?''
एकाएक इस प्रश्न का उत्तर न दे सका। बीमार? हाँ, कुछ बीमार-सी जान पड़ती है। किन्तु नहीं, यह कुछ भी नहीं है। खयाल हुआ, मानो वह कितने ही देश-विदेश पैदल चलकर, तीर्थाटन करके, उसी समय लौट आई है- ऐसी मुरझाई-सी, ऐसी थकी-सी। अपना भार आप वहन करने की जैसे उसमें शक्ति ही नहीं है प्रवृत्ति भी नहीं है- इस समय वह केवल निश्चिन्त, निर्भय होकर ऑंखें मूँदकर सोने की जरा-सी जगह ढूँढ़ रही है। मुझे निरुत्तर देखकर बोली, ''क्यों, कहते क्यों नहीं?''
मैंने कहा, ''मत कहलवाओ।''
राजलक्ष्मी बच्चों की तरह जोर से सिर हिलाकर बोली, ''नहीं, कहना ही होगा। लोग तो कहते हैं कि देखने में बिल्कु।ल बदसूरत हो गयी हूँ। यह सच है?''
मैंने गम्भीर होकर कहा, ''हाँ सच है।''
राजलक्ष्मी हँस पड़ी, बोली, ''तुम आदमी को इस कदर अप्रतिभ कर देते हो कि बस-अच्छा, इसमें बुरा क्या है? अच्छा ही तो है! सुन्दरता लेकर अब मैं करूँगी क्या? तुम्हारे साथ मेरा सुन्दर-असुन्दर का-अच्छी-बुरी दीख पड़ने का तो सम्बन्ध है नहीं, जो मैं इसकी चिन्ता में मर जाऊँ!''
मैंने कहा, ''सो तो ठीक है, चिन्ता में मरने का कोई कारण नहीं है। एक तो लोग यह बात तुमसे कहते नहीं, इसके सिवाय, यदि वे कहें भी तो तुम विश्वास करनेवाली नहीं। मन ही मन समझती तो हो कि...''
राजलक्ष्मी गुस्से से बोल उठी, ''तुम अन्तर्यामी जो हो कि सबके मन की बात जानते हो। मैं कभी यह बात नहीं सोचती। तुम खुद ही सच-सच कहो, जब वहाँ शिकार करने गये थे तब तुमने जैसा देखा था, अब भी क्या मैं वैसी रही हूँ? तब से तो कितनी बदसूरत हो गयी हूँ।''
मैंने कहा, ''नहीं, बल्कि तबसे अच्छी दीख पड़ती हो।''
राजलक्ष्मी ने पल-भल में खिड़की के बाहर मुँह फेरकर अपना हँसता हुआ चेहरा शायद मेरी मुग्ध दृष्टि की ओर से हटा लिया और कोई उत्तर न देखकर चुप्पी साध ली। कुछ देर बाद परिहास के सब निशान अपने चेहरे पर से दूर करके उसने अपना चेहरा फिर इस ओर फेर लिया और पूछा, ''तुम्हें क्या बुखार आ गया था? उस देश का हवा-पानी माफिक नहीं आता?''
मैंने कहा, ''न आवे तो उपाय ही क्या है? जैसे बने वैसे माफिक ही कर लेना पड़ता है।'' मैं मन ही मन निश्चिन्त रूप से जानता था कि राजलक्ष्मी इस बात का क्या उत्तर देगी। क्योंकि, जिस देश का जल-वायु आज तक अपना नहीं हो सका, किसी सुदूर भविष्य में भी उसे अपने अनुकूल कर लेने की आशा के भरोसे वह किसी तरह भी मेरे लौट जाने पर सम्मत नहीं होगी, बल्कि घोर आपत्ति उठाकर रुकावट डालेगी-यही मेरा खयाल था। किन्तु, ऐसा नहीं हुआ। वह क्षण-भर मौन रहकर कोमल-स्वर से बोली, ''सो सच है। इसके सिवाय, वहाँ पर और भी तो बहुत-से बंगाली रहते हैं। उन्हें जब माफिक आता है तब तुम्हें ही क्यों न माफिक आवेगा? क्या कहते हो?''
मेरे स्वास्थ्य के सम्बन्ध में उसकी इस प्रकार की उद्वेगहीनता ने मुझे चोट पहुँचाई। इसीलिए, केवल एक इशारे-भर से 'हाँ' कहकर चुप हो गया। एक बात मैं बार-बार सोचता था कि अपनी प्लेग की कथा किस रूप में राजलक्ष्मी के कानों पर डालूँ। सुदूर प्रवास में जिस समय मेरे दिन जीवन-मृत्यु के सन्धि-स्थल में बीत रहे थे उस समय के हजारों तरह के दु:खों का वर्णन सुनते-सुनते उसके हृदय के भीतर कैसा तूफान उठेगा! दोनों नेत्रों को प्लावित करके कैसे ऑंसुओं की धारा बह निकलेगी। कह नहीं सकता कि इसे कितने रसों और कितने रंगों से भरकर मैं कल्पना के नेत्रों से दिन-प्रतिदिन देखता रहा हूँ। इस समय इसी कल्पना ने मुझे सबसे अधिक लज्जित किया; सोचा-छि:-छि: सौभाग्य से कोई किसी के मन की बात नहीं जानता। नहीं तो- परन्तु जाने दो उस बात को। मन ही मन कहा, और चाहे जो करूँ, अपनी उस मरने-जीने की कहानी इससे न कहूँगा।
बहूबाजार के डेरे पर आ पहुँचा। राजलक्ष्मी ने हाथ दिखाकर कहा, ''यह जीना है, तुम्हारा कमरा तीसरे मंजिल पर है। जरा जाकर सो रहो, मैं जाती हूँ।'' यह कहकर वह अपने रसोई-घर की ओर चल दी।
कमरे में घुसते ही देखा कि कमरा मेरे ही लिए सजाया गया है। प्यारी पटने के मकान से मेरी किताबें, और मेरा हुक्का तक लाना नहीं भूली है। सूर्यास्त का एक कीमती चित्र मुझे बहुत पसन्द था। वहाँ पर उसने उसे अपने कमरे में से निकालकर मेरे सोने के कमरे में टाँग दिया था। उस चित्र तक को वह कलकत्ते अपने साथ लाई है और ठीक उसी तरह उसी दीवाल पर टाँग दिया है। मेरे लिखने-पढ़ने का साज-सरंजाम, मेरे कपड़े, मेरी लाल मखमली चट्टियाँ, ठीक उसी तरह यत्नपूर्वक सजाकर रक्खी हुई हैं। वहाँ एक आराम-कुर्सी मैं सदा ही व्यवहार में लाता था। उसे शायद लाना सम्भव नहीं हुआ, इसीलिए, उसी तरह की एक नयी कुर्सी खिड़की के समीप रक्खी हुई है। धीरे-धीरे जाकर मैं उसी के ऊपर ऑंखें मूँदकर लेट गया। जान पड़ा, जैसे भाटे की नदी में ज्वार के जलोच्छ्वास का शब्द मुहाने के निकट फिर सुनाई दे रहा है।
नहा-खाकर थकावट के मारे दिन-दोपहर को ही सो गया। नींद टूटते ही देखा-पश्चिम की ओर की खिड़की से शाम की धूप मेरे पैरों के समीप आकर पड़ रही है और प्यारी एक हाथ के बल मेरे मुँह पर झुकी हुई दूसरे हाथ से ऑंचल के छोर से सिर, कन्धे और छाती पर का पसीना पोंछ रही है। बोली, ''पसीने से तकिये और बिछौने भीग गये हैं। पश्चिम की ओर खुला होने से यह कमरा बड़ा गरम है। कल दूसरे मंजिल पर अपने पास के कमरे में ही तुम्हारे बिस्तर कर दूँगी।'' यह कहकर मेरी छाती के बिल्कुहल निकट बैठकर पंखा उठाकर हवा करने लगी। रतन ने कमरे में आकर पूछा, ''माँ, बाबू के लिए चाय ले आऊँ?''
''हाँ, ले आ। और बंकू यदि मकान में हो तो उसे जरा भेज देना।'' मैंने फिर अपनी ऑंखें बन्द कर लीं। थोड़ी ही देर बाद बाहर से चट्टियों की आवाज सुन पड़ी। प्यारी ने पुकारकर कहा, ''कौन, बंकू? ''जरा इधर तो आ।''
उसके पैरों के शब्द से मालूम हुआ कि उसने अतिशय संकुचित भाव से अन्दर प्रवेश किया है। प्यारी उसी तरह पंखा झलते बोली, ''जरा कागज-पेन्सिल लेकर बैठ जा। क्या-क्या लाना है, उसकी फेहरिस्त बनाकर दरबान के साथ जरा बाजार जा बेटा, घर में कुछ है नहीं।''
मैंने देखा, यह एक बिल्कु'ल नया वाकया है। बीमारी की बात अलहदा पर उसे छोड़कर इसके पहले किसी दिन मेरे बिछौने के इतने समीप बैठकर उसने हवा तक नहीं की थी। किन्तु यह भी, न हो तो, मैं एक दिन सम्भव मान सकता। किन्तु, यह जो उसने रंच-मात्र भी दुविधा नहीं की, सब नौकर-चाकरों के, यहाँ तक कि बंकू के सामने भी दर्प के साथ अपने आपको प्रकट कर दिया- इसके अपूर्व सौन्दर्य ने मुझे अभिभूत कर डाला। मुझे उस दिन की बात याद आ गयी जिस दिन पटने के मकान से मुझे इसलिए बिदा लेनी पड़ी थी कि यह बंकू ही कुछ और खयाल न करने लगे। उस दिन के साथ आज के आचरण में कितना अन्तर है।
चीज-बस्त की फेहरिस्त बनाकर बंकू चला गया। रतन भी चाय-तमाखू देकर नीचे चला गया। प्यारी कुछ देर चुपचाप मेरे मुँह की ओर निहारती रही; फिर एकाएक बोली, ''तुमसे मैं एक बात पूछती हूँ- अच्छा, रोहिणी बाबू और अभया में से किसका प्यार अधिक है, बता सकते हो?''
मैंने हँसकर कहा, ''जो तुम पर पूरी तरह हावी हो गयी है, निश्चय से उस अभया का ही प्यार अधिक है।''
राजलक्ष्मी भी हँस पड़ी, बोली, ''यह तुमने कैसे जाना कि वह मुझ पर हावी हो गयी है?''
मैंने कहा, ''चाहे जैसे जाना हो, पर बात सच है या नहीं, यह बताओ?''
राजलक्ष्मी क्षण-भर स्थिर रहकर बोली, ''सो जैसे भी हो, किन्तु, अधिक प्यार तो रोहिणी बाबू ही करते हैं। दरअसल वे इतना प्यार करते थे, इसीलिए उन्होंने इतना बड़ा दु:ख अपने सिर पर उठा लिया। अन्यथा यह उनका कोई अवश्य कर्त्तव्य तो था नहीं। उनकी अभया को कितना सा स्वार्थ-त्याग करना पड़ा?''
उसके सवाल को सुनकर मैं सचमुच ही विस्मित हो गया। मैं बोला, बल्कि मैं तो ठीक इससे उलटा देखता हूँ। और उस हिसाब से जो कुछ कठिन दु:ख-भोग और त्याग है, वह सब अभया को ही करना पड़ा है। तुम इस अभ्रान्त सत्य को क्यों भूली जाती हो कि रोहिणी बाबू चाहे जो करें, समाज की नजरों में आखिर वे मर्द हैं।
राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा, ''मैं कुछ भी नहीं भूलती। उन्हें मर्द बतलाकर सहज में बच निकलने के जिस मौके की ओर तुम इशारा कर रहे हो वह अत्यन्त क्षुद्र और अधम पुरुषों के लिए है- रोहिणी बाबू सरीखे मनुष्य के लिए नहीं। शौक पूरा हो गया, अथवा कुछ सार न रहा, तो छोड़-छाड़कर फेंककर भाग सकते हैं और घर लौटकर फिर गण्य-मान्य भद्र मनुष्यों की तरह जीवन-यात्रा कर सकते हैं- यही न कहते हो? कर सकते हैं-ठीक है; किन्तु, क्या सभी कर सकते हैं? तुम कर सकते हो? तब, जो नहीं कर सकता उसके बोझ के वजन को तो जरा सोच देखो। उसे अपना निन्दित जीवन मकान के निराले कोने में काट डालने का भी सुभीता नहीं। उसे तो संसार के बीच द्वन्द्व-युद्ध में उतर आना होगा, अविचार और अपयश का बोझा चुपचाप अकेले ही वहन करना पड़ेगा। अपने एकान्त-स्नेह की पात्री को- भावी सन्तान की जननी को समाज के सारे अपमानों और अकल्याणों से बचाकर रखना होगा। तुम क्या इसे मामूली कष्ट समझते हो? और, सबसे बढ़कर दु:ख यह है कि जो अनायास ही इस दु:ख के बोझे को उतारकर खिसक सकता है, सर्वनाशी विकट प्रलोभन से अपने आपको रात-दिन बचाकर चलने का गुरुभार भी उसको ही लिये घूमना पड़ता है। दु:ख के तराजू में इस आत्मोत्सर्ग के साथ समतौलता बनाए रखने के लिए जिस प्रेम की जरूरत है, उसे यदि पुरुष अपने भीतर से बाहर न प्रकट कर सके, तो किसी भी स्त्री के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह उसे पूरा कर सके।''
इस बात को इस पहलू से, इस तरह, कभी सोचकर नहीं देखा था। रोहिणी का वह सीधा-सादा गुमसुम भाव और उसके बाद, अभया जब अपने पति के घर चली गयी तब उसके उसी शान्त मुखमण्डल के ऊपर अपरिसीम वेदना को चुपचाप सहन करने का जो चित्र मैंने अपनी ऑंखों देखा था, वही पल-भर में ज्यों का त्यों, प्रत्येक रेखा सहित मेरे मन में खिंच गया। किन्तु, मुँह से मैंने कहा, ''चिट्ठी में तो तुमने सिर्फ अभया के लिए ही पुष्पांजलि भेजी थी।''
राजलक्ष्मी बोली, ''उनका जो प्राप्त है वह आज भी उन्हें ही देती हूँ। क्योंकि, मेरा विश्वास है कि जो भी पाप या अपराध था उसने उनके आन्तरिक तेज से जलकर उन्हें शुद्ध-निर्मल कर दिया है। यदि ऐसा न होता, तो आज वे बिल्कुकल साधारण स्त्रियों के समान ही तुच्छ-हीन हो जाती।''
''हीन क्यों?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''खूब! पति-परित्याग के पाप की भी कोई सीमा है? उस पाप को ध्वंहस करने योग्य आग उनमें न होती तो आज वे...''
मैंने कहा, ''आग की बात जाने दो। किन्तु उनका पति कैसा नष्ट है, सो तो एक दफे सोच देखो।''
राजलक्ष्मी बोली, ''पुरुष जाति चिरकाल से ही उच्छृंखल रही है- चिरकाल से ही कुछ-कुछ अत्याचारी भी रही है; किन्तु, इसीलिए तो स्त्री के पक्ष में भाग खड़े होने की युक्ति काम नहीं दे सकती। स्त्री-जाति को सहन करना ही होगा; नहीं तो संसार नहीं चल सकता।''
बात सुनकर मेरे सारे विचार गड़बड़ा गये। मन ही मन बोला, ''यह स्त्रियों का वही सनातन दासत्व का संस्कार है! कुछ असहिष्णु होकर पूछा, ''तो फिर अभी तक तुम 'आग आग, क्या बक रही थीं?''
राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, ''क्या बक रही थी, सुनोगे? आज ही दो घण्टे पहले पटने के ठिकाने पर लिखी हुई अभया की चिट्ठी मिली है। आग क्या है, जानते हो? उस दिन 'प्लेग' कहकर जब तुम उनकी तुरंत की जमाई गिरस्ती के द्वार पर जा खड़े हुए तब जिस वस्तु ने तुम्हें निर्भयता से बिना किसी सोच-विचार के भीतर बुला लिया, मैं उसी को कहती हूँ उनकी 'आग'। उस समय उन्हें अपने सुख का खयाल नहीं था। जो तेज मनुष्य को कर्त्तव्य समझकर सामने की ओर ही ढकेलता है, दुविधा से पीछे नहीं हटने देता, अब तक मैं उसी को 'आग-आग' कह रही थी। आग का एक नाम 'सर्वभुक्' है, सो क्या तुम नहीं जानते? वह सुख और दु:ख- दोनों को खींच लेती है, उसे किसी तरह का भेद-विचार नहीं होता। उन्होंने एक और बात क्या लिखी है, जानते हो? वे रोहिणी बाबू को सार्थक कर देना चाहती हैं। क्योंकि उनका विश्वास है कि केवल अपने जीवन की सार्थकता के भीतर से ही संसार में दूसरे के जीवन में सार्थकता पहुँचाई जा सकती है; और व्यर्थता से सिर्फ अकेला ही जीवन व्यर्थ नहीं होता- वह अपने साथ और भी अनेक जीवनों को जुदा-जुदा दिशाओं से व्यर्थ करके व्यर्थ हो जाता है। बिल्कुनल सच है न?'' इतना कहकर वह एकाएक श्वास छोड़कर चुप हो रही। इसके बाद हम दोनों ही बहुत देर तक मौन रहे। जान पड़ता है, कहने को कुछ न होने के कारण ही अब वह मेरे सिर के रूखे बालों को अपनी अंगुलियों से व्यर्थ ही इधर-उधर विपर्यस्त करने लगी। उसका यह आचरण भी बिल्कु'ल नया था। सहसा बोली, ''वे खूब शिक्षिता हैं न? नहीं तो, इतनी तेजस्विता नहीं होती।''
मैंने कहा, ''हाँ, दरअसल वे एक शिक्षिता रमणी हैं।''
राजलक्ष्मी बोली, ''किन्तु, एक बात उन्होंने मुझसे छिपाई है। माँ होने के लोभ को वे चिट्ठी के अन्दर बार-बार दबा गयी हैं।''
मैंने कहा, ''क्या उन्हें यह लोभ है? कहाँ, मैं तो नहीं सुना?''
राजलक्ष्मी बोल उठी, ''जाओ,- यह लोभ भला किस स्त्री को नहीं है? किन्तु क्या इसलिए उसे मर्दों से कहते फिरना चाहिए? तुम तो खूब हो!'' मैंने कहा, ''तो फिर तुम्हें भी है, क्या?''
''जाओ!'' कहकर वह अकस्मात् लज्जा से लाल हो गयी और दूसरे ही क्षण अपने आरक्त मुख को छिपाने के लिए बिछौने पर झुक गयी। उसी समय अस्तोन्मुख सूर्य की किरणों ने पश्चिम की खुली हुई खिड़की से प्रवेश किया था। वह आरक्त आभा उसके मेघ के समान काले केशों पर विचित्र शोभा के साथ बिखर गयी। और, कानों के हीरे के दोनों लटकनों में नाना वर्णों की द्युति झिलमिल करती हुई खेलने लगी। क्षण-भर बाद ही अपने आपको सँभालकर और सीधे बैठकर उसने कहा, ''क्यों, क्या मेरे लड़के-बच्चे नहीं हैं जो लोभ होगा, लड़कियों का ब्याह कर चुकी हूँ, लड़के को ब्याहने आई हूँ,- एक-दो नाती-पोते हो जाँयगे, उनको लेकर सुख-स्वच्छता से रहूँगी,- मुझे अभाव किस बात का है?''
मैं चुप हो रहा। इस बात को लेकर बहस करने की प्रवृत्ति नहीं हुई।
रात को राजलक्ष्मी ने कहा, ''बंकू के ब्याह के लिए तो अब भी दस-बारह दिन की देर है; चलो न काशी चलें, तुम्हें अपने गुरुजी को दिखा लाऊँ।''
मैंने हँसकर कहा, ''मैं क्या कोई नुमाइशी चीज हूँ?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''यह सोचने का भार जो लोग देखते उन पर है, तुम पर नहीं।''
मैंने कहा, ''ऐसे ही सही, परन्तु, इससे मुझे ही क्या लाभ और तुम्हारे गुरुदेव को भी क्या लाभ होगा?''
राजलक्ष्मी ने गम्भीर होकर कहा, ''लाभ तुम लोगों को नहीं है, किन्तु मुझे है न हो, तो केवल मेरे लिए ही चले चलो।''
इसलिए मैं राजी हो गया। आगे बहुत समय तक लग्न न थी, इसीलिए उस समय जैसे चारों ओर से विवाहों की बाढ़ आ गयी थी। जब तक बैण्ड का कार्नेट और बैग-पाइप की बाँसुरी विविध तरह के वाद्य-भाडों के सहयोग से मनुष्य को पागल बना डालने की तजवीज कर रही थी। हम लोगों की स्टेशन-यात्रा के समय भी इस तरह की कुछ उत्तम आवाजों की झड़ प्रचण्ड वेग से बह गयी। वेग के कुछ कम हो जाने पर राजलक्ष्मी ने सहसा प्रश्न किया, अच्छा, तुम्हारे मत से यदि सभी लोग चलने लगें, तो फिर गरीबों का विवाह ही न हो और घर-गिरस्ती भी न बने। तब फिर सृष्टि कैसे रहे?''
उसकी असाधारण गम्भीरता देखकर मैं हँस पड़ा। बोला, ''सृष्टि-रक्षा के लिए चिन्ता करने की तुम्हें जरा भी जरूरत नहीं। क्योंकि हमारी तरह चलने वाले लोग दुनिया में अधिक नहीं हैं। कम से कम अपने इस देश में तो नहीं है; यह कहा जा सकता है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''न रहना ही भला है। केवल बड़े आदमी ही मनुष्य हैं? और क्या गरीब बेचारे संसार में कहीं से बह आए हैं? बाल-बच्चों को लेकर घर-गिरस्ती करने की साध क्या उन्हें नहीं होती?'' मैंने कहा, ''पर इसका क्या यह अर्थ है कि साध होती है इसलिए उसे प्रश्रय देना ही चाहिए?''
राजलक्ष्मी ने पूछा ''क्या नहीं मुझे समझा दो।''
कुछ देर चुप रहकर मैंने कहा, ''सभी दरिद्रों के सम्बन्ध में मेरा यह मत नहीं है। मेरा मत केवल दरिद्र भले आदमियों के सम्बन्ध में है और मेरा विश्वास है कि तुम उसका कारण भी जानती हो।''
राजलक्ष्मी ने जिद के स्वर में कहा, ''तुम्हारा यह मत गलत है।''
मुझ पर भी मानो जिद सवार हो गयी, मैंने कह डाला, ''हजार गलत होने पर भी कम से कम तुम्हारे मुँह से तो यह बात शोभा नहीं देती। बंकू के बाप ने सिर्फ बहत्तर रुपयों के लोभ से दोनों बहिनों को व्याह लिया था,- वह दिन अभी इतना पुराना नहीं हुआ है कि भूल गयी होओ। खैर मनाओ कि उस आदमी का पेशा ही यही था। नहीं तो, कल्पना करो, यदि वह तुम्हें अपने घर ले जाता, तुम्हारे दो-चार बाल-बच्चे हो जाते-तब एक दफे सोच देखो कि तुम्हारी क्या दशा होती?''
राजलक्ष्मी की ऑंखों में जैसे झगड़ने का भाव घना हो उठा; बोली, ''भगवान जिन्हें भेजते हैं, उनकी देख-भाल भी कर करते हैं। तुम नास्तिक हो, इसीलिए विश्वास नहीं करते।''
मैंने भी जवाब दिया, ''मैं नास्तिक होऊँ चाहे जो होऊँ परन्तु आस्तिक लोगों को भगवान की जरूरत क्या केवल इसीलिए है?- इन सब बच्चों को आदमी बनाने के लिए?''
राजलक्ष्मी ने क्रुद्ध कण्ठ से कहा, ''भले ही वे न बनावें। किन्तु मैं तुम्हारी तरह डरपोक नहीं हूँ। मैं द्वार-द्वार भिक्षा माँगकर भी उन्हें आदमी बनाती। और जो भी हो, नाचने-गाने वाली बनने की अपेक्षा वह मेरे हक में बहुत अच्छा होता?''
मैंने फिर और तर्क नहीं किया। आलोचना बिल्कुेल ही व्यक्तिगत और अप्रिय ढंग पर उतर आई थी, इसलिए, मैं खिड़की के बाहर रास्ते की ओर देखता हुआ बैठा रहा।
हमारी गाड़ी धीरे-धीरे सरकारी और गैर सरकारी ऑफिस क्वार्टर्स छोड़कर बहुत दूर आ पड़ी। शनिवार का दिन है, दो बजे के बाद अधिकांश दफ्तरों के क्लर्क छुट्टी पाकर ढाई की ट्रेन पकड़ने के लिए तेजी से चले आ रहे हैं। प्राय: सभी के हाथों में कुछ न कुछ खाद्य-सामग्री है। किसी के हाथ में एक-दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ, किसी के रूमाल में बकरे का मांस, किसी के हाथ में गँवई-गाँव में नहीं मिलने वाली हरी तरकारियाँ और फल। सात दिनों के बाद घर पहुँचकर उत्सुक बाल-बच्चों के मुँह पर जरा-सी आनन्द की हँसी देखने के लिए करीब-करीब सभी अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार थोड़ी-बहुत मिठाई चादर के छोर में बाँधकर भागे जा रहे हैं। प्रत्येक के मुँह पर आनन्द और ट्रेन पकड़ने की उत्कण्ठा एक साथ इस तरह परिस्फुटित हो उठी है कि राजलक्ष्मी ने मेरा हाथ खींचकर अत्यन्त कुतूहल के साथ पूछा, ''हाँ जी, ये सब लोग इस तरह स्टेशन की ओर क्यों भाग रहे हैं? आज क्या है?''
मैंने घूमकर कहा, ''आज शनिवार है। ये सब दफ्तरों के क्लर्क हैं, रविवार की छुट्टी में घर जा रहे हैं।''
राजलक्ष्मी ने गर्दन हिलाकर कहा, ''हाँ यही मालूम होता है। और देखो सब एक न एक खाने की चीज लिये जाते हैं। गँवई-गाँव में तो यह सब मिलता नहीं, इसलिए मालूम होता है, बाल-बच्चों को हाथ में देने के लिये खरीदे लिए जाते हैं, क्यों न?''
मैंने कहा, ''हाँ।''
उसकी कल्पना तेजी से दौड़ने लगी। इसीलिए, उसने उसी क्षण कहा ''आ:, लड़के-लड़कियों में आज कितना उत्साह होगा। कोलाहल मचाएँगे, गले से लिपटकर बाप की गोद में चढ़ने की चेष्टा करेंगे, माँ को खबर देने रसोईघर में दौड़ जाँयगे, घर-घर में आज मानो एक काण्ड-सा मच जायेगा। क्यों न?'' कहते-कहते उसका सारा मुँह उज्ज्वल हो उठा।
मैंने स्वीकार करते हुए कहा, ''खूब सम्भव है।''
राजलक्ष्मी ने गाड़ी की खिड़की में से और भी कुछ देर उनकी तरफ निहारते रहकर एकाएक एक गहरी नि:श्वास छोड़ दी और कहा, ''हाँ जी, उनकी तनखा कितना होगी?''
मैंने कहा, ''क्लर्कों की तनख्वाह और कितनी होती है,- यही बीस-पच्चीस तीस रुपये।
राजलक्ष्मी ने कहा- ''किन्तु, घर तो इनके माँ है, भाई-बहिन हैं, स्त्री हैं, लड़के-बच्चे हैं।''
मैंने इतना और जोड़ दिया, ''दो-एक विधवा बहिनें हैं: शादी-ब्याह, क्रिया-कर्म, लोक-व्यवहार, भलमंसी है; कलकत्ते का भोजन-खर्च है, लगातार रोगों का खर्चं है,-बंगाली क्लर्क-जीवन का सब कुछ इन्हीं तीस रुपयों पर निर्भर रहता है।''
राजलक्ष्मी की मानो साँस ही अटकने लगी। वह बहुत व्याकुल होकर बोल उठी,
''तुम नहीं जानते। इन लोगों के घर जमीन-जायदाद भी है, निश्चय से है।''
उसका मुँह देखकर निराश करते हुए मुझे वेदना हुई, फिर भी, मैंने कहा, ''मैं इन लोगों की घर-गिरस्ती का इतिहास खूब घनिष्ठता से जानता हूँ। मैं निश्चयपूर्वक जानता हूँ कि इनमें से चौदह आने लोगों के पास कुछ भी नहीं है। यदि नौकरी चली जाय तो या तो इन्हें भिक्षावृत्ति करनी होगी या फिर पूरे परिवार के साथ उपवास करना होगा। इन लोगों के लड़के-लड़कियों की कहानी सुनोगी?''
राजलक्ष्मी अकस्मात् दोनों हाथ उठाकर चिल्ला उठी, ''नहीं-नहीं, नहीं सुनूँगी,- मैं नहीं सुनना चाहती।''
यह बात मैं उसकी ऑंखों की ओर निहारते ही जान गया कि उसने प्राणपण से ऑंसुओं को रोक रक्खा है। इसीलिए मैंने और कुछ न कहकर फिर रास्ते की ओर मुँह मोड़ लिया। बहुत देर तक उसकी कोई आहट नहीं मिली। इतनी देर, शायद, अपने आपसे वकालत करके और अन्त में अपने कुतूहल के निकट ही पराजय मानकर उसने मेरे कोट का खूँट पकड़कर खींचा और पलटकर देखते ही करुण कण्ठ से कहा, ''अच्छा तो, कहो उनके लड़के-लड़कियों की कहानी। किन्तु तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ, झूठ-मूठ बढ़ाकर मत कहना। दुहाई है तुम्हारी!''
उसकी मिन्नत करने की भाव-भंगीमा देखकर हँसी तो छूटी, किन्तु, हँसा नहीं। बल्कि कुछ अतिरिक्त गम्भीरता से बोला, ''बढ़ाकर कहना तो दूर, तुम्हारे पूछने पर भी मैं नहीं सुनाता, यदि तुमने अभी कुछ ही पहले अपने सम्बन्ध में भीख माँगकर बच्चों को आदमी बनाने की बात न कही होती। भगवान जिन्हें भेजते हैं, उनकी सुव्यवस्था का भार भी वे लेते हैं, यह बात अवश्य है। इसे अस्वीकार करूँ तो शायद नास्तिक कहकर फिर भला-बुरा कहोगी; किन्तु सन्तान की जवाबदारी बाप के ऊपर कितनी है और भगवान के ऊपर कितनी है, इन दो समस्याओं की मीमांसा तुम खुद ही करो। मैं जो जानता हूँ केवल वही कहूँगा,- है न ठीक?''
यह देखकर कि वह चुपचाप मेरी ओर जिज्ञासु-मुख से निहार रही है, मैंने कहा, ''बच्चा पैदा होने पर उसे कुछ दिन छाती का दूध पिलाकर जिलाए रखने का भार, मैं समझता हूँ, उसकी माँ के ऊपर है। भगवान के ऊपर अचल भक्ति है, उनकी दया पर भी मुझे अन्धविश्वास है, किन्तु फिर भी, माँ के बदले इस भार को खुद अपने ऊपर लेने का उपाय उनके पास है कि नहीं,...''
राजलक्ष्मी नाराज होकर हँस पड़ी और बोली, ''देखो चतुराई रहने दो- यह मैं भी जानती हूँ।''
''जानती हो? तब जाने दो, एक जटिल समस्या की मीमांसा हो गयी। किन्तु, तीस रुपये के घर की जननी के दूध का स्रोत सूख जाने में देर क्यों नहीं लगती, यह जानना हो तो किसी तीस रुपये मासिक के घर की जच्चा के आहार के समय उपस्थित रहना आवश्यक होगा। किन्तु, तुमसे जब यह नहीं हो सकता तब इस विषय में न हो तो मेरी बात मान लो।''
राजलक्ष्मी मलीन मुख किये चुपचाप मेरी ओर ताकती रही।
मैं बोला, ''देहात में गो-दुग्ध का बिल्कुसल अभाव है, यह बात भी तुम्हें मान लेनी होगी।''
राजलक्ष्मी ने चट से कहा, ''सो तो मैं खुद भी जानती हूँ। घर में गाय हो तब तो ठीक, नहीं तो, आजकल सिर पटककर मर जाने पर भी किसी गाँव में एक बूँद दूध पाना कठिन है ढोर ही नहीं हैं, दूध कहाँ से हो?''
मैंने कहा, ''खैर और भी एक समस्या का समाधान हो गया। तब फिर बच्चों के भाग में रहा खालिस स्वदेशी ताल-तलैयों का जल और विदेशी डब्बों का खालिस बार्ली (जौ) का चूरा। अभागियों के भाग्य में अक्सर उनका स्वाभाविक खाद्य,- थोड़ा- बहुत माता का दूध भी, जुटा सकता है, किन्तु वह सौभाग्य भी इन सब घरों में अधिक दिनों तक टिकने का नियम नहीं। क्योंकि चारेक महीने के भीतर ही और एक नूतन आगन्तुक अपने आविर्भाव का नोटिस देकर अपने भाई के दूध का हक एकदम बन्द कर देता है। यह शायद तुम...''
राजलक्ष्मी लज्जा के मारे लाल होकर बोल उठी, ''हाँ हाँ, जानती हूँ, जानती हूँ। मुझे व्याख्या करके समझाने की जरूरत नहीं। तुम इसके बाद की बात कहो।''
मैंने कहा, ''इसके बाद धर दबाता है बच्चे को पेट का दर्द और स्वदेशी मलेरिया बुखार। तब बाप का कर्तव्य होता है विदेशी कुनैन और बार्ली का चूरा जुटाना। और माँ के सिर पर पड़ता है, जैसा कि मैंने पहले कहा, प्रसूतिगृह में पुन: भर्ती होने के बीच के समय की फुरसत में इन सबको खालिस देशी जल में घोलकर पिलाने का काम! इसके बाद यथासमय सूतिका-गृह का झगड़ा मिटने पर नवजात शिशु को गोद में लेकर बाहर आना और पहले बच्चे के लिए कुछ दिन तक रोना।''
राजलक्ष्मी नीली पड़कर बोली, ''रोना क्यों?''
मैंने कहा, ''अरे, यह तो माता का स्वभाव है! और ऐसा स्वभाव जो क्लर्क के घर में भी अन्यथा नहीं हो सकता जब कि भगवान दायित्व से मुक्त करने के लिए उस पहले बच्चे को अपने श्रीचरणों में बुला लेते हैं।''
इतनी देर बाहर की ओर ताकते रहकर ही बातें कर रहा था। अकस्मात् नजर घुमाकर देखा कि उसकी बड़ी-बड़ी ऑंखें अश्रु-जल में तैर रही हैं। मुझे अत्यन्त दु:ख मालूम हुआ। सोचा, इस बेचारी को व्यर्थ दु:ख देने से क्या लाभ? अधिकांश धनियों के समान जगत के इस विराट दु:ख की बाजू यदि इसके लिए भी अगोचर बनी रहती तो क्या हर्ज था! भयंकर दरिद्रता से पीड़ित बंगाल के क्षुद्र नौकरपेशा गृहस्थ-परिवार केवल अन्न के अभाव से ही, मलेरिया हैजा आदि के बहाने, दिन पर दिन शून्य होते जा रहे हैं,- यह बात अन्य बहुत-से बड़े आदमियों की तरह, न होता, यह भी न जानती। इससे क्या ऐसी कोई बड़ी भारी हानि हो जाती!
ठीक ऐसे ही समय राजलक्ष्मी ऑंखें पोंछते-पोंछते अवरुद्ध कण्ठ से बोल उठी, ''भले ही क्लर्क हों, फिर भी वे तुमसे कई दर्जे अच्छे हैं। तुम तो पत्थर हो! तुम्हें स्वयं कोई दु:ख नहीं है, इसीलिए इन लोगों के दु:ख कष्ट इस तरह आह्लाद के साथ वर्णन कर रहे हो। किन्तु मेरा तो हृदय फटा जाता है।''
यह कहकर वह ऑंचल से बार-बार ऑंखें पोंछने लगी। इसका मैंने कोई प्रतिवाद नहीं किया, क्योंकि, इससे कोई लाभ न होता। बल्कि नम्रता के साथ कहा, ''इन लोगों के सुख का हिस्सा भी तो मेरे भाग्य में नहीं है। घर पहुँचने की उनकी उत्सुकता भी तो एक सोचने-देखने की चीज है।''
राजलक्ष्मी का मुँह हँसी और ऑंसुओं से एक साथ दीप्त हो उठा। वह बोली, ''मैं भी तो यही कहती हूँ। आज पिता आ रहे हैं, इसलिए सारे बाल-बच्चे रास्ता देख रहे हैं। उन्हें कष्ट किस बात का है? उन लोगों की तनखा शायद कम हो, किन्तु वैसी बाबूगिरी भी तो नहीं है। किन्तु फिर भी क्या पचीस-तीस ही रुपया?-इतना कम? कभी नहीं। कम से कम सौ-डेढ़ सौ रुपये तो होंगे, मैं निश्चय से कहता हूँ।''
मैंने कहा, ''हो भी सकता है। मैं शायद ठीक-ठीक नहीं जानता।''
उत्साह पाकर राजलक्ष्मी का लोभ बढ़ गया। अतिशय क्षुद्र क्लर्क के लिए भी डेढ़ सौ रुपया महीना उसे नहीं जँचा। बोली, ''क्या तुम समझते हो कि केवल उसी मासिक पर ही उनका सारा दारोमदार है? ऊपर से भी तो कितना ही पा जाते हैं।''
मैंने कहा, ''ऊपर से? प्याला?''
अब उसने कुछ नहीं कहा। वह मुँह भारी करके रास्ते की ओर ताकती हुई बैठी रही। कुछ देर बाद बाहर की ओर दृष्टि रक्खे हुए ही उसने कहा, ''तुम्हें जितना ही देखती हूँ तुम्हारे ऊपर से मेरा मन उतना ही हटता जाता है। तुम जानते हो कि तुम्हें छोड़कर मेरी ओर कोई गति नहीं है, इसीलिए तुम मुझे इस कदर छेदते हो!
इतने दिनों बाद, आज शायद पहले ही पहल मैंने उसके दोनों हाथ जोर से अपनी ओर खींच लिये और उसके मुँह की ओर देखकर मानो कुछ कहना भी चाहा; किन्तु इतने में ही गाड़ी स्टेशन के समीप आकर खड़ी हो गयी। एक स्वतन्त्र डिब्बा रिजर्व कर लिया गया था, फिर भी, बंकू कुछ सामान लेकर दोपहर के पहले ही आ गया था। कोचबाक्स पर रतन को देखते ही वह दौड़ आया। मैं हाथ छोड़कर सीधा बैठ गया। जो बात मुँह पर आ गयी थी। वह चुपचाप अन्दर में जाकर छिप गयीं।
ढाई बजे की लोकल ट्रेन छूटने ही को थी। हमारी ट्रेन उसके बाद जाती थी। इसी समय एक प्रौढ़ अवस्था का दरिद्र भला आदमी एक हाथ में तरह-तरह की हरी तरकारियों की पोटली और दूसरे हाथ में डण्डी पर बैठा हुआ एक मिट्टी का पक्षी लिये, केवल प्लेटफार्म पर लक्ष्य रक्खे और सब दिशाओं के ज्ञान से शून्य होकर दौड़ता हुआ राजलक्ष्मी के ऊपर आ पड़ा। मिट्टी का खिलौना नीचे गिरकर चूर हो गया। वह हाय-हाय करके शायद उसे बटोरने जा रहा था कि पाण्डेजी ने हुँकार मारकर एक छलाँग में उसकी गर्दन धर दबाई और बंकू छड़ी उठाकर 'अन्धे' आदि कहकर मारने को तैयार हो गया। मैं कुछ दूरी पर अन्यमनस्क-सा खड़ा था,-घबड़ाकर रंगभूमि पर आ गया। वह बेचारा भय और शर्म के मारे बार-बार कहने लगा, ''देख नहीं पाया माँ, मुझसे बड़ा कसूर हो गया...''
मैंने उसे चटपट छुड़ा दिया और कहा, ''जो होना था सो हो गया, आप शीघ्र जाइए, आपकी गाड़ी छूट रही है।''
उस बेचारे ने फिर भी अपने खिलौने के टुकड़े इकट्ठा करने के लिए कुछ देर इधर-उधर किया और अन्त में दौड़ लगा दी। किन्तु अधिक दूर नहीं जाना पड़ा, गाड़ी चल दी। तब लौटकर फिर उसने एक दफा क्षमा माँगी और वह उन टूटे टुकड़ों को बटोरने में प्रवृत्त हो गया। यह देखकर मैंने जरा हँसकर कहा, ''इससे अब क्या होगा?''
उसने कहा, ''कुछ नहीं महाशय, लड़की बीमार है। पिछले सोमवार को घर से आते समय उसने कह दिया था- ''मेरे लिए एक खिलौना खरीद लाना।'' खरीदने गया तो बच्चू ने गरज समझकर दाम हाँके, ''दो आने-एक पैसा भी कम नहीं। खैर वही सही। रामराम करके किसी तरह पूरे आठ पैसे फेंककर ले आया। किन्तु देखिए दुर्भाग्य की बात कि ऐन मौके पर फूट गया, रोगी लड़की के हाथ में न दे सका। बिटिया रोकर कहेगी, ''बाबा, लाए नहीं!'' कुछ भी हो, टुकड़े ही ले जाऊँ, दिखाकर कहूँगा, बेटी, इस महीने की तनखा पाने पर पहले तेरा खिलौना खरीदूँगा, तब और काम करूँगा।''
इतना कहकर सारे टुकड़े बटोरकर और चादर के छोर में बाँधकर कहने लगा, ''आपकी स्त्री को शायद बहुत चोट लग गयी है, मैंने देखा नहीं- नुकसान का नुकसान हुआ और गाड़ी भी नहीं मिली। मिल जाती तो रोगी बिटिया को आधा घण्टे पहले पहुँचकर देख लेता।'' कहते-कहते वह फिर प्लेटफार्म की ओर चल दिया। बंग पाण्डेजी को लेकर किसी काम से कहीं अन्यत्र चला गया था। मैंने एकाएक पीछे की ओर घूमकर देखा, राजलक्ष्मी की ऑंखों से सावन की धारा की तरह ऑंसू बह रहे हैं। व्यस्त होकर निकट जाकर पूछा, ''ज्यादा चोट आ गयी क्या? कहाँ लगी है?''
राजलक्ष्मी ने ऑंचल से ऑंख पोंछकर कहा, ''हाँ, बहुत चोट लगी है- परन्तु लगी है ऐसी जगह कि तुम जैसे पत्थर न उसे देख उसे देख सकते हैं और न समझ सकते हैं!''
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:23

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श्रीमान् बंकू को बाध्ये होकर हमारे लिए स्वतन्त्र डब्बा क्यों रिज़र्व करना पड़ा उनसे जब मैं इस बात की पूछताछ कर रहा था तब राजलक्ष्मी कान लगाकर सुन रही थी। इस समय उनके जरा अन्यत्र जाते ही राजलक्ष्मी ने बिल्कुकल ही गले पड़कर मुझे सुना दिया कि अपने लिए फिजूल के खर्च करना वह जितना ही नापसन्द करती है उसके भाग्य से उतनी ही ये सब विडम्बनाएँ उपस्थित हो जाती हैं। वह बोली- ''यदि उन लोगों की तृप्ति सेकण्ड क्लास या फर्स्ट क्लास में जाने से ही होती हो तो ठीक है; पर मेरे लिए तो औरतों का डब्बा था। रेलवे कम्पनी को फिजूल ही इतने अधिक रुपये क्यों दिये जाँय?''
बंकू की कैफियत के साथ उसकी माँ की इस मितव्यय-निष्ठा का कोई विशेष सामंजस्य मैं नहीं देख पाया। किन्तु, ऐसी बातें स्त्रियों से कहने से व्यर्थ का कलह होता है। अतएव, चुपचाप मैं केवल सुनता रहा। कुछ बोला नहीं।
प्लेटफार्म की एक बेंच पर बैठकर पूर्वोक्त सज्जन ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। सामने से जाते हुए मैंने पूछा, ''आप कहाँ जाँयगे?''
वे बोले, ''बर्दवान।''
कुछ आगे जाते ही राजलक्ष्मी ने मुझसे धीरे से कहा, ''तो फिर वे अनायास ही अपने डब्बे में चल सकते हैं, न? किराया तो देना न होगा- फिर क्यों नहीं उन्हें बुला लेते!''
मैंने कहा, ''टिकट तो निश्चय से खरीद लिया गया है- किराए के पैसे नहीं बचेंगे।''
राजलक्ष्मी बोली- ''भले ही खरीद लिया गया हो-भीड़ के कष्ट से तो बच जाँयगे।''
मैंने कहा, ''उन्हें अभ्यास है, वे भीड़ की तकलीफ की परवाह नहीं करते।''
तब राजलक्ष्मी ने जिद करके कहा, ''नहीं-नहीं, तुम उनसे कहो। हम लोग तीन आदमी बातचीत करते हुए जाँयगे, इतना रास्ता मजे से कट जायेगा।''
मैंने समझ लिया कि इस समय उसे अपनी भूल महसूस हो रही है। बंकू और अपने नौकर-चाकरों की नजर में मेरे साथ अकेली अलहदा डब्बे में बैठने की खटक को वह किसी तरह कुछ हलका कर लेना चाहती है। फिर भी मैंने इसको और भी अधिक ऑंखों में अंगुली डालकर दिखाने के अभिप्राय से लापरवाही के भाव से कहा, ''जरूरत क्या है एक अनावश्यक आदमी को डब्बे में बुलाने की? तुम मेरे साथ जितनी चाहो उतनी बातें कर लेना- मजे से समय कट जायेगा।''
राजलक्ष्मी ने मुझ पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष निक्षेप करके कहा- ''सो मैं जानती हूँ। मुझे छकाने का इतना बड़ा मौका क्या तुम छोड़ सकते हो?''
इतना कहकर वह चुप हो रही। किन्तु ट्रेन के स्टेशन पर आते ही मैंने जाकर कहा, ''आप क्यों नहीं हमारे डब्बे में बैठ जाँय। हम दो को छोड़कर उसमें और कोई नहीं है। भीड़ की तकलीफ से आप बच जाँयगे।''
कहने की जरूरत नहीं, उन्हें राजी करने में कोई तकलीफ नहीं उठानी पड़ी। अनुरोध करने-भर की देर थी कि वे अपनी पोटली लेकर हमारे डब्बे में आ बैठै।
ट्रेन दो-चार स्टेशन ही पार कर पाई थी कि राजलक्ष्मी ने उनके साथ खूब बातचीत करना शुरू कर दिया और कुछ ही स्टेशनों को पार करते-करते तो उनके घर की खबरें, मुहल्ले की खबरें यहाँ तक कि आस-पास के गाँवों तक की खबरें कुरेद-कुरेदकर जान लीं।
राजलक्ष्मी के गुरुदेव काशी में अपने नाती पातिनों के साथ रहते हैं, उनके लिए वह कलकत्ते से अनेक चीजें लिये जा रही थी। बर्दवान नजदीक आते ही ट्रंक खोलकर उनमें से चुनकर एक सब्ज रंग की रेशमी की साड़ी बाहर निकाली और कहा, ''सरला को उसके खिलौने के बदले साड़ी दे देना।''
वे सज्जन पहले तो अवाक् हो रहे, बाद में सलज्ज भाव से जल्दी से बोले- ''नहीं बेटी, सरला को मैं अबकी दफे खिलौना खरीद दूँगा- आप साड़ी रहने दें। इसके सिवाय, यह तो बहुत बेशकीमती कपड़ा है बेटी!''
राजलक्ष्मी ने कपड़े को उनके पास रखते हुए कहा, ''बेशकीमती नहीं है और और कीमत कुछ भी हो, इसे उसके हाथ में देकर कहिएगा कि तुम्हारी मौसी ने अच्छे होने पर पहिरने के लिए दिया है!''
सज्जन की ऑंखें छलछला आईं। आधा घण्टे की बातचीत में ही एक अपरिचित आदमी की पीड़िता कन्या को एक मूल्यवान् वस्तु का उपहार देना, उन्होंने शायद अपने जीवन में और कभी नहीं देखा था। कहा, ''आशीर्वाद दीजिए कि वह अच्छी हो जाय; किन्तु, गरीबी का घर है, इतने कीमती कपड़े का वह क्या करेगी बेटी? आप उसे उठाकर रख लीजिए।'' इतना कहकर उन्हांने मेरी ओर भी एक दफे देखा। मैंने कहा, ''जब उसकी मौसी पहिरने के लिए दे रही है तब आपका ले जाना ही उचित है।'' फिर हँसकर कहा, ''सरला का भाग्य अच्छा है, हम लोगों की भी कोई मौसी-औसी होती तो बड़ा सुभीता होता! अबकी बार महाशय, आपकी लड़की, आप देखेंगे कि, चटपट अच्छी हो जायगीं
उस समय उस पुरुष के समस्त चेहरे से कृतज्ञता मानो उछल पड़ने लगी। और आपत्ति न करके उन्होंने उस वस्त्र को ग्रहण कर लिया। अब दोनों जनों में फिर बातचीत होने लगी। गृहस्थाश्रम की बातें, समाज की बातें, सुख-दु:ख की बातें, और न जाने क्या-क्या। मैं सिर्फ खिड़की के बाहर ताकता हुआ स्तब्ध होकर बैठा रहा और जो प्रश्न अपने आपसे बहुत बार पूछ चुका था वही इस छोटी-सी घटना के सूत्र के सहारे फिर मेरे मन में उठ खड़ा हुआ कि इस यात्रा का अन्त कहाँ है?
एक दस-बारह रुपये का वस्त्र दान कर देना राज्यलक्ष्मी के लिए कठिन बात थी और नयी। उसके दास-दासी शायद इस बात का कभी खयाल भी नहीं करते। किन्तु मेरी चिन्ता दूसरी ही थी। यह दी हुई चीज दान के हिसाब से उसके लिए कुछ न थी। यह मैं जानता था। किन्तु, मैं सोच रहा था कि उसके हृदय की धारा जिस ओर लक्ष्य करके अपने आपको नि:शेष करने के लिए उद्दाम के लिए गति से दौड़ी चली जा रही है, उसका अवसान कहाँ होगा और किस तरह?
समस्त रमणियों के अन्तर में 'नारी' वास करती है या नहीं, यह जोर से कहना अत्यन्त दु:साहस का काम है। किन्तु नारी की चरम सार्थकता मातृत्व में है, यह बात शायद खूब गला फाड़ करके प्रचारित की जा सकती है।
राजलक्ष्मी को मैंने पहिचान लिया था। यह मैंने विशेष ध्या नपूर्वक देखा था कि उसमें की प्यारी बाई अपने अपरिणत यौवन के समस्त दुर्दम्य मनस्तापों के साथ प्रति-मुहूर्त मर रही है। आज उस नाम का उच्चारण करने से भी वह मानो लज्जा के मारे मिट्टी में मिल जाती है। मेरे लिए एक यह समस्या हो गयी।
सर्वस्व लगाकर संसार का उपभोग करने का वह उत्तम आवेग राजलक्ष्मी में अब नहीं है; आज वह शान्त, स्थिर हैं उसकी कामना वासना आज उसी के मध्यप में इस तरह गोता लगा गयी है कि बाहर से एकाएक सन्देह होता है कि वह है भी या नहीं। उसी ने इस सामान्य घटना को उपलक्ष्य करके मुझे फिर स्मरण दिला दिया कि आज उसके परिणत यौवन के सुगम्भीर तल-देश से जो मातृत्व सहसा जाग उठा है, तुरन्त ही जागे हुए कुम्भकर्ण के समान उसकी विराट क्षुधा के लिए आहार कहाँ मिलेगा? उसके सन्तान होने पर जो बात सहज और स्वाभाविक हो सकती, उसी के अभाव में समस्या इस तरह एकान्त जटिल हो उठी है।
उस दिन पटने में उसके जिस मातृरूप को देखकर मैं मुग्ध और अभिभूत हो गया था, आज उसी मूर्ति का स्मरण करके अत्यन्त व्यथा के साथ मैं केवल यही सोचने लगा कि इतनी बड़ी आग को केवल फूंक मारकर नहीं बुझाया जा सकता। इसीलिए, आज पराए लड़के को पुत्र कल्पित करने के खिलवाड़ से राजलक्ष्मी के हृदय की तृष्णा किसी तरह भी नहीं मिट रही है। इसलिए आज एक मात्र बंकू ही उसके लिए पर्याप्त नहीं है, आज दुनिया में जहाँ जितने भी लड़के हैं उन सबका सुख-दु:ख भी उसके हृदय को आलोड़ित कर रहा है।
बर्दवान में वे महाशय उतर गये। राजलक्ष्मी बहुत देर चुपचाप बैठी रही। मैंने खिड़की की ओर से दृष्टि हटाकर पूछा, ''यह रोना किसके लिए हुआ? सरला के लिए, या उसकी माँ के लिए?''
राजलक्ष्मी ने मुँह उठाकर कहा, ''मालूम होता है, तुम इतनी देर तक हम लोगों की बात चीत सुन रहे थे।''
मैंने कहा, ''यों ही अनायास। स्वयं बात न करने पर भी बाहर से बहुत-सी बातें मनुष्य के कानों में आ घुसती हैं। संसार में भगवान ने कम बोलने वालों के लिए इस दण्ड की सृष्टि कर रक्खी है। इससे बचने की कोई युक्ति नहीं। खैर जाने दो, किन्तु यह ऑंखों का पानी किसके लिए झरा, सो नहीं बताया?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''मेरी ऑंखों का पानी किसके लिए झरता है, यह जानने से तुम्हें कोई लाभ नहीं।''
मैंने कहा, ''लाभ की आशा नहीं करता- केवल नुकसान बचाकर ही चला जा सके तो काफी है। सरला अथवा उसकी माँ के लिए जितनी इच्छा हो ऑंसू बहाओ, मुझे कोई आपत्ति नहीं-किन्तु, उसके बाप के लिए बहाना मैं पसन्द नहीं करता।''
राजलक्ष्मी केवल एक 'हूँ' करके खिड़की के बाहर झाँकने लगी।
सोचा था कि यह दिल्लगी निष्फल नहीं जायेगी, अनेक रुँधे हुए झरनों के द्वार खोल देगी। किन्तु, सो तो हुआ नहीं; हुआ यह कि अब तक वह इस ओर देख रही थी सो दिल्लगी सुनकर उस ओर को मुँह फेरकर बैठ गयी।
किन्तु बहुत देर से मौन था- बातचीत करने के लिए भीतर ही भीतर एक आवेग उपस्थित हो गया था। इसलिए अधिक देर तक चुप न रह सका और बोला, ''बर्दवान से कुछ खाने को मोल ले लिया होता!''
राजलक्ष्मी ने कोई जवाब नहीं दिया, वह उसी तरह चुप बनी रही।
मैं बोला, ''दूसरे के दु:ख में रो-रोकर नद बहा दिया, और घर के दु:ख पर कान ही नहीं देतीं! तुमने यह विलायत से लौटे हुओं की विद्या कहाँ से सीख ली?''
राजलक्ष्मी ने इस दफे धीरे से कहा, ''देखती हूँ कि विलायत से लौटे हुओं पर तुम्हारी भारी भक्ति है!''
मैंने कहा, ''हाँ, वे लोग भक्ति के पात्र जो हैं!''
''क्यों, उन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?''
''अभी तक तो कुछ नहीं बिगाड़ा किन्तु, बाद में कहीं कुछ बिगाड़ न दें, इस डर से पहले ही भक्ति करता हूँ।''
राजलक्ष्मी ने क्षण-भर चुप रहकर कहा, ''यह तुम लोगों का अन्याय है। तुम लोगों ने उन्हें अपने दल से, जाति से, समाज से-सब ओर से बहिष्कृत कर दिया है। फिर भी, यदि वे लोग तुम्हारे लिए थोड़ा-सा भी कुछ करते हैं, तो उतने ही के लिए तुम्हें उनका कृतज्ञ होना चाहिए।''
मैंने कहा, ''हम लोग बहुत ज्यादा कृतज्ञ होते, यदि वे उस क्रोध के कारण पूरे-पूरे मुसलमान या क्रिस्तान हो जाते! उन लोगों में जो अपने को 'ब्राह्म' कहते हैं वे ब्राह्म-समाज को नष्ट करते हैं, जो 'हिन्दू' कहते हैं वे हिन्दू समाज को हैरान करते हैं। यदि वे पहले यह ठीक करके कि स्वयं कौन हैं दूसरों के लिए रोने बैठते तो उससे उनका खुद का कल्याण होता और जिनके लिए रोते हैं उनका भी शायद कुछ उपकार हो जाता।''
राज्यलक्ष्मी बोली, ''किन्तु, मुझे तो ऐसा नहीं जान पड़ता।''
मैंने कहा, ''नहीं जान पड़ता तो कोई विशेष हानि नहीं। किन्तु, जिसके लिए इस समय अटका हुआ हूँ वह अन्य बात है। कहाँ, उसका तो कोई जवाब ही नहीं दिया?''
इस दफे राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, ''अजी, उसके लिए अटकना नहीं पड़ेगा। पहले तुम्हारी भूख तो पक जाय, उसके बाद विचार किया जायेगा।''
मैंने कहा, ''तब विचार क्या होगा, जिस-किसी स्टेशन से जो कुछ मिलेगा वही निगलने को दे दोगी!-किन्तु, सो नहीं होगा, मैं कहे रखता हूँ।''
मेरा उत्तर सुनकर वह मेरे मुँह की ओर कुछ देर चुपचाप देखती रही और फिर कुछ हँसकर बोली, ''सो मैं कर सकती हूँ- तुम्हें विश्वास होता है?''
''मैंने कहा- ''खूब! इतना-सा भी विश्वास तुम पर नहीं होगा?''
''तो ठीक है!'' कहकर वह फिर अपनी खिड़की से बाहर झाँकती हुई चुपचाप बैठी रही।
अगले स्टेशन पर राजलक्ष्मी ने रतन को बुलाकर खाने के लिए जगह करा दी और उसे हुक्का लाने का हुक्म देकर थाली में समस्त खाद्य-सामग्री सजाकर सामने रख दी। देखा, इस विषय में कहीं बिन्दु-भर भी भूल-चूक नहीं हुई है- मुझे जो कुछ अच्छा लगता है वह सब चुन-चुन कर संग्रह करके लाया गया है।
बेंच पर रतन ने बिस्तर कर दिये। इतमीनान के साथ भोजन समाप्त करके गुड़गुड़ी की नली मुँह में डालकर आराम से ऑंखें मूँदने की तैयारी कर रहा था कि राजलक्ष्मी बोली, ''खाने की चीजें उठा ले जा रतन, इनमें से जो भावे सो खा लेना- और तेरे डिब्बे में और भी कोई खावे तो दे देना।''
किन्तु, रतन को अत्यन्त लज्जित और संकुचित लक्ष्य करके मैंने कुछ, अचरज के साथ पूछा, ''कहाँ, तुमने तो कुछ खाया नहीं?''
राजलक्ष्मी बोली, ''नहीं, मुझे भूख नहीं है। जा न रतन, खड़ा क्यों है? गाड़ी चल देगी जो!''
रतन लज्जा के मारे मानो गड़ गया। ''मुझसे बड़ी भूल हो गयी बाबू मुसलमान कुली से खाना छू गया है! कितना ही कहता हूँ- माँ, स्टेशन से कुछ खरीद लाने दो, किन्तु किसी तरह मानती ही नहीं।'' इतना कहकर उसने मेरे मुँह पर अपनी कातर-दृष्टि डाली जैसे मेरी ही अनुमति चाह रहा हो।
किन्तु मैं कुछ कहूँ, इसके पहले ही राजलक्ष्मी ने उसे धमकाकर कहा, तूँ जायेगा नहीं, खड़ा-खड़ा तर्क करेगा?''
रतन फिर कुछ न बोला और भोजन के बर्तन हाथ में लेकर बाहर चला गया। ट्रेन के चलते ही राजलक्ष्मी मेरे सिरहाने आ बैठी और सिर के बालों में धीरे-धीरे अंगुलियाँ चलाते-चलाते बोली, ''अच्छा देखो...''
बीच में ही टोककर बोला, ''देखूँगा फिर कभी। किन्तु...''
उसने भी मुझे उसी घड़ी टोककर कहा, ''तुम्हें 'किन्तु' से शुरू करके लेक्चर न देना होगा, मैं सब समझ गयी। मैं मुसलमान से घृणा नहीं करती; उसके छू लेने से भोजन नष्ट हो जाता है, सो भी नहीं मानती। यदि ऐसा होता तो तुम्हें अपने हाथों से वह भोजन न परोसती।''
''किन्तु, तुमने खुद क्यों नहीं खाया?''
''स्त्रियों को नहीं खाना चाहिए।''
''क्यों?''
''क्यों और क्या? स्त्रियों को खाने की मनाई है।''
''और पुरुषों के लिए मनाई नहीं है?''
राजलक्ष्मी ने मेरा सिर हिलाकर कहा- नहीं, मर्दों के लिए ये बँधे हुए आईन-कानून किसलिए? वे जो इच्छा हो खावें, जो इच्छा हो पहिनें, जैसे भी हो सुख से रहें- हम लोग आचार का पालन करती जावें, बस यही बहुत है। हम तो सैकड़ों कष्ट सह सकती हैं, किन्तु क्या तुम लोग सह सकते हो? यही देखो न शाम होते न होते ही भूल के मोर ऑंखों के आगे अंधेरा देखने लगे थे!''
मैंने कहा, ''हो सकता है, किन्तु, हम कष्ट नहीं सहन कर सकते, इसमें हम लोगों के लिए भी तो कोई गौरव की बात नहीं है।''
राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा- ''नहीं, इसमें तुम्हारा जरा भी अगौरव नहीं है। तुम लोग हम लोगों की तरह दासी की जाति नहीं हो जो कष्ट सहन करके जाओ। लज्जा की बात तो हमारे लिए है, यदि हम कष्ट न सहन कर सकें।''
मैंने कहा, ''यह न्याय-शास्त्र तुम्हें सिखाया किसने? काशी के गुरुजी ने?''
राजलक्ष्मी मेरे मुँह के अत्यन्त निकट झुककर क्षण-भर स्थिर हो रही, फिर मुस्कराकर बोली, ''मुझे जो कुछ शिक्षा मिली है सब तुम्हारे ही समीप- तुमसे बढ़कर गुरु मेरा और कोई नहीं।''
मैंने कहा, ''तब तो फिर, गुरु से तुमने ठीक उलटी बात सीख रक्खी है। मैंने किसी दिन नहीं कहा कि तुम लोग दासी की जाति हो। बल्कि, मैं तो यही बात चिरकाल से मानता हूँ कि तुम दासी नहीं हो। तुम किसी तरह भी हम लोगों की अपेक्षा तिल-भर छोटी नहीं हो।''
राजलक्ष्मी की ऑंखें छलछला आईं, बोली, ''सो मैं जानती हूँ। और जानती हूँ इसीलिए तो यह बात तुम्हारे समीप सीख पाई हूँ। तुम्हारी तरह यदि सभी पुरुष यही बात सोच सकते, तो फिर पृथ्वी-भर की समस्त स्त्रियों के मुँह से यही बात सुन पड़ती। कान बड़ा है और कान छोटा, यह समस्या ही कभी न उठती।''
''अर्थात्, यह सत्य बिना किसी विचार के सभी मान लेते?''
राजलक्ष्मी बोली, ''हाँ।''
तब मैंने हँसकर कहा, ''सौभाग्य से पृथ्वी-भर की स्त्रियाँ, तुम्हारे साथ सहमत नहीं हैं, यही खैरियत है। किन्तु, अपनी जाति को इतना हीन समझते तुम्हें लाज नहीं आती?''
मेरे उपहास पर राजलक्ष्मी ने ध्याकन दिया या नहीं, इसमें सन्देह है। यह बहुत ही सहज भाव से बोली, ''किन्तु, इसमें तो हीनता की कोई बात नहीं है।''
मैंने कहा, ''सो ठीक है, हम लोग मालिक हैं और तुम दासी, यह संस्कार इस देश की स्त्रियों के मन में इस तरह बद्धमूल हो गया है कि इसकी हीनता भी तुम्हारी नजर में नहीं आती। जान पड़ता है कि इसी पाप से पृथ्वी के सारे देशों की स्त्रियों की अपेक्षा तुम सचमुच ही आज छोटी हो गयी हो।''
राजलक्ष्मी एकाएक सख्त होकर बैठ गयी और दोनों नेत्रों को प्रदीप्त करके बोली, ''नहीं, इस कारण नहीं। तुम्हारे देश की स्त्रियाँ अपने आपको छोटा समझने के कारण छोटी नहीं हो गयीं। सच यह है कि तुम्हीं लोगों ने उन्हें छोटा समझकर छोटा बना दिया है, और तुम खुद भी छोटे हो गये हो।''
यह बात मुझे अकस्मात् कुछ नयी-सी मालूम हुई। इसमें जो कुछ गूढ़ अर्थ छिपा हुआ था वह धीरे-धीरे सुस्पष्ट-सा होने लगा। सचमुच ही इसमें बहुत-सा सत्य छिपा हुआ है जो अब तक मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुआ था।
राजलक्ष्मी बोली, ''तुमने तो उस भद्र पुरुष के सम्बन्ध में मजाक किया था किन्तु उसकी बात सुनकर मेरी ऑंखें कितनी खुल गयी हैं, सो तुम नहीं जानते।''
'नहीं जानता', यह स्वीकार करते ही वह कहने लगी, ''नहीं जानते इसके कारण हैं। किसी भी वस्तु को जानने के लिए जब तक मनुष्य के हृदय के भीतर एक तरह की व्याकुलता नहीं उठती तब तक सब कुछ उसकी नजर में धुँधला ही बना रहता है। इतने दिन तुम्हारे मुँह से सुनकर सोचा करती थी कि सचमुच कि सचमुच ही यदि हमारे देश के लोगों का दु:ख इतना अधिक है, सचमुच ही यदि हमारा समाज इतना अधिक अन्धा है, तो उसमें मनुष्य जीता ही क्योंकर है, और उसको मानकर ही क्यों चलता है?''
मैं चुपचाप सुन रहा हूँ, यह देखकर वह आहिस्ते-आहिस्ते कहने लगी, ''और तुम भी क्या समझोगे? कभी इन लोगों के बीच रहे नहीं, कभी इन लोगों के सुख-दु:ख भोगे नहीं; इसीलिए बाहर ही बाहर बाहर के समाज के साथ तुलना करके समझते हो कि इन लोगों के कष्टों की शायद कोई सीमा ही नहीं। धनी जमींदार पुलाव खाया करता है। वह अपनी किसी दरिद्र प्रजा को बासी भात खाते देखकर सोचता है कि 'इसके दु:ख की कोई सीमा नहीं है'- जिस तरह वह भूलता है उसी तरह तुम भूलते हो।''
मैंने कहा, ''तुम्हारा तर्क यद्यपि न्याय-शास्त्र के नियमानुसार नहीं चल रहा है, फिर भी पूछता हूँ कि तुमने कैसे जाना कि मुझे देश के सम्बन्ध में इससे अधिक ज्ञान नहीं है?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हो ही कैसे सकता है? दुनिया में तुम्हारे जैसा स्वार्थी कोई भी है क्या? जो केवल अपने ही आराम के लिए भागता फिरता है, वह घर की खबर जानेगा ही कहाँ से? तुम जैसे लोग ही तो समाज की अधिक निन्दा करते फिरते हैं जो समाज से कोई सम्बन्ध ही नहीं रखते, बल्कि उसकी ओर से सर्वथा उपेक्षित रहते हैं। तुम लोग न तो अच्छी तरह पराए समाज को जानते हो और न अच्छी तरह अपने ही समाज को।''
मैंने कहा, ''इसके बाद?''
राजलक्ष्मी बोली, ''इसके बाद बाहर रहकर बाहरी सामाजिक व्यवस्था देखकर तुम लोग सोच में मरे जाते हो कि हमारी स्त्रियाँ मकान में कैद रहकर दिन-रात काम किया करती हैं, इसलिए उनके समान दु:खी, उनके समान पीड़ित, उनके समान हीन, शायद और किसी देश की स्त्रियाँ नहीं हैं। किन्तु कुछ दिन हमारी चिन्ता छोड़कर केवल अपनी ही चिन्ता कर देखो, अपने को कुछ ऊँचा उठाने की चेष्टा करो!- यदि कहीं कुछ सचमुच का दोष होगा तो वह केवल उसी समय नजर आयेगा- उससे पहले नहीं।''
''इसके बाद?''
राजलक्ष्मी ने क्रुद्ध होकर कहा, ''तुम मुझसे मजाक कर रहे हो, यह मैं जानती हूँ। किन्तु, मैं मजाक की बात नहीं कर रही हूँ। घर की मालकिन सब लोगों से खराब खाती-पीती है, कभी-कभी तो नौकरों की अपेक्षा भी। बहुधा उसे नौकरों से भी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। किन्तु, तुम इस दु:ख से व्याकुल होकर रोते हुए मत फिरो; हम लोगों को दासी के समान ही बनी रहने दो, दूसरे देशों जैसी रानी बना डालने की चेष्टा मत करो;- मैं यही बात तुमसे कहती हूँ।''
मैंने, कहा, यद्यपि तुम तर्क-शास्त्र के गाथे पर पैर देकर उसे डुबा देने की तजबीज कर रही हो, किन्तु, फिर भी यह स्वीकार करता हूँ कि शास्त्रानुसार तर्क करने का रास्ता मुझे भी नहीं मिल रहा है।''
उसने कहा, ''इसमें तर्क करने- जैसा कुछ भी नहीं है।''
मैंने कहा, ''हो भी, तो वह शक्ति मुझमें नहीं है-बड़ी नींद आ रही है। किन्तु, ''तुम्हारी बात एक तरह से समझ रहा हूँ।''
राजलक्ष्मी जरा चुप रहकर बोली, ''हमारे देश में चाहे जिस कारण हो, छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, सभी लोगों में रुपयों का लोभ बहुत ही बढ़ गया है। कोई भी थोड़े में सन्तुष्ट होना नहीं जानता, चाहता भी नहीं। इससे कितना अनिष्ट हुआ है, इसका पता मैंने पा लिया है।''
''बात सच है, किन्तु तुमने पता किस तरह पाया?''
राजलक्ष्मी बोली, ''रुपयों के लोभ से ही तो मेरी यह दशा हुई है! किन्तु पूर्व काल में शायद इतना लोभ नहीं था।''
मैंने कहा, ''इस इतिहास को मैं ठीक-ठीक नहीं जानता।''
वह कहने लगी, ''इतना कभी नहीं था। उस समय माता रुपये के लोभ से अपनी बेटी को कभी इस रास्ते पर नहीं ढकेलती, उस समय धर्म का डर था। आज तो मेरे पास रुपयों की कमी नहीं है किन्तु मेरे समान दु:खी भी क्या कोई है? रास्ते का भिखारी भी, मैं समझती हूँ, मुझसे बहुत अधिक सुखी है।''
उसका हाथ अपने हाथ में मैं रखकर पूछा, ''तुम्हें सचमुच ही इतना कष्ट है!''
राजलक्ष्मी ने क्षण-भर मौन रहकर और एक बार ऑंचल से ऑंख-मुँह पोंछकर कहा, ''मेरी बात मेरे अन्तर्यामी ही जानते हैं।''
इसके बाद दोनों ही गुमसुम हो रहे। गाड़ी की रफ्तार कम होकर वह एक छोटे स्टेशन पर आकर खड़ी हो गयी। कुछ देर बाद उसने फिर चलना शुरू किया। मैंने कहा, ''क्या करने से तुम्हारा शेष जीवन सुख से कट सकता है, यह मुझे बतला सकती हो?''
राजलक्ष्मी बोली, ''यह मैंने सोच रक्खा है मेरा सारा धन यदि किसी तरह चला जाय, कुछ न बच रहे-एकबारगी निराश्रय हो जाऊं, तो...''
अब फिर बिल्कु'ल गुमसुम हो रहे। उसकी बात इतनी स्पष्ट थी कि सभी समझ सकते हैं, मुझे भी मसझने में देर न लगी। कुछ देर चुप रहकर पूछा, ''यह खयाल कब से आया तुम्हारे मन में?''
राजलक्ष्मी बोली, ''जिस दिन अभया की बात सुनी उसी दिन से।''
''मैने कहा, ''किन्तु, उन लोगों की जीवन-यात्रा तो बीच में ही खत्म हुई नहीं जाती। भविष्य में वे कितना दु:ख पा सकते हैं, सो तो तुम जानती नहीं।''
वह सिर हिलाकर बोली, ''नहीं, जानती नहीं, यह सत्य है; किन्तु वे चाहे कितना ही दु:ख क्यों न पावें, मेरे समान दु:ख किसी दिन न पावेंगे, यह मैं निश्चयपूर्वक कह सकती हूँ।''
और भी कुछ देर चुप रहकर मैंने कहा, ''लक्ष्मी, तुम्हारे लिए मैं अपना सर्वस्व त्याग कर सकता हूँ; किन्तु इज्जत का त्याग कैसे करूँ?''
राजलक्ष्मी बोली, ''मैं क्या तुमसे कुछ त्यागने को कहती हूँ? इज्जत ही तो मनुष्य की असली चीज है। उसका यदि त्याग नहीं कर सकते तो त्याग की बात ही क्यों मुँह पर लाते हो? तुमसे तो मैंने कुछ भी त्याग करने के लिए नहीं कहा।''
मैंने कहा, ''कहा नहीं, सो ठीक है; किन्तु, कर सकता हूँ। इज्जत जाने के बाद पुरुष का जीता रहना एक विडम्बना है। केवल इस इज्जत को छोड़कर तुम्हारे लिए मैं सभी कुछ विसर्जित कर सकता हूँ।''
राजलक्ष्मी ने सहसा हाथ खींच लिया और कहा, ''मेरे लिए तुम्हें कुछ भी विसर्जित करना पड़ेगा। किन्तु तुम क्या यह समझते हो कि केवल तुम लोगों के ही इज्जत है, हम लोगों की कोई इज्जत नहीं? हम लोगों के लिए उसका त्याग देना क्या इतना अधिक सहज है? फिर भी, तुम लोगों के लिए ही सैकड़ों-हजारों स्त्रियों ने इसे धूल की तरह फेंक दिया है, यह अवश्य ही तुम नहीं जानते, पर मैं जानती हूँ।''
मेरे कुछ बोलने की चेष्टा करते ही उसने रोकर कहा, ''रहने दो, अब और कुछ कहने की जरूरत नहीं। तुम्हें इतने दिन मैंने जो समझा था वह गलत था। तुम सो जाओ- अब इस सम्बन्ध में मैं भी कभी कोई ऐसी बात न कहूँगी, तुम भी न कहना।'' इतना कहकर वह उठी और अपनी बेंच पर जा बैठी।
दूसरे दिन ठीक समय पर काशी आ पहुँचा और प्यारी के मकान में ही ठहरा। ऊपर के दो कमरों को छोड़कर करीब सारा का सारा मकान जुदा-जुदा उम्र की विधवा स्त्रियों से भरा हुआ था।
प्यारी बोली, ''ये सब मेरी किराएदार हैं।'' इतना कहकर वह मुँह फिराकर कुछ हँस दी।
मैंने कहा, ''हँसी क्यों? शायद किराया अदा नहीं होता?''
प्यारी बोली, ''नहीं, बल्कि कुछ न कुछ और देना पड़ता है।''
''इसके मानी?''
प्यारी इस दफे हँस पड़ी और बोली, ''इसके मानी है, भविष्य की आशा पर मुझको ही इन्हें खाना-कपड़ा देकर जिलाए रखना है। जीती रहेंगी तभी तो बाद में देंगी, यह भी क्या नहीं समझ सकते?''
मैंने भी हँसकर कहा, ''समझता नहीं तो! इस तरह भविष्य की आशा पर कितने लोगों को तुम्हें गुपचुप अन्न-वस्त्र जुटाना-पटाना पड़ता होगा- मैं केवल वही सोच रहा हूँ!''
इनके सिवाय मेरी दो-एक रिश्तेदार भी हैं।''
''सो भी है क्या? किन्तु, मालूम कैसे हुआ तुम्हें कि रिश्तेदार हैं?''
प्यारी जरा सूखी हँसी हँसकर बोली, ''माँ के साथ आने पर इस काशी में ही तो मेरी 'मौत' हुई थी, शायद तुम्हें यह याद नहीं रहा। तब असमय में ही जिन्होंने मेरी 'सद्गति' की थी, उन लोगों का वह उपकार क्या प्राण रहते कभी भूला जा सकता है?''
मैं चुप हो रहा। प्यारी कहने लगी- ''इन लोगों का वह शरीर बड़ा ही दयापूर्ण है। इसीलिए, पास रखकर इन पर जरा कड़ी नजर रखती हूँ, जिससे इन्हें और अधिक उपकार करने का सुयोग न मिले।''
उसके चेहरे की ओर निहारते ही एकाएक मेरे मुँह से बाहर निकल गया, ''तुम्हारे हृदय के भीतर क्या है-बीच-बीच में उसे ही चीरकर देखने की इच्छा होती है राजलक्ष्मी!''
''मरने पर देखना। अच्छा, कमरे में जाकर सो जाओ। रसोई बन जाने पर उठा दूँगी।'' इतना कहकर और हाथ के इशारे से कमरा दिखाकर वह जीने से नीचे उतर गयी।
मैं वहीं पर कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा। यह नहीं कि आज मैंने उसके हृदय का कोई नया परिचय प्राप्त किया हो, किन्तु, मेरे खुद के हृदय में यह सामान्य कहानी एक नये चक्कर की सृष्टि कर गयी।
रात को प्यारी बोली, ''तुम्हें फिजूल कष्ट देकर इतनी दूर ले आई। गुरुदेव तीर्थाटन करने निकल गये हैं, उनसे नहीं मिला सकी।''
मैंने कहा, ''इसके लिए मैं जरा भी दु:खित नहीं हूँ। अब तो कलकत्ते लौट चलना होगा न?''
प्यारी ने गर्दन हिलाकर बताया, ''हाँ।''
मैंने कहा, ''क्या मेरा साथ चलना आवश्यक है? न हो तो मैं जरा और पश्चिम की ओर घूम आना चाहता हूँ।''
प्यारी ने कहा, ''बंकू के ब्याह में तो अब भी कुछ देर है। चलो न, मैं भी प्रयाग चलकर स्नान कर आऊँ।''
मैं जरा मुश्किल में पड़ गया। मेरे दूर के रिश्ते के एक चचा वहाँ नौकरी करते हैं। सोचा था कि वहीं जाकर ठहरूँगा। सिवाय इसके और भी कई परिचित मित्र दोस्त वहाँ रहते हैं।
प्यारी ने निमेष-मात्र में मेरे मन का भाव ताड़कर कहा, ''मैं साथ रहूँगी तो शायद कोई देख लेगा, यही न?'
अप्रतिभ होकर कहा, ''वास्तव में कलंक चीज ही ऐसी है कि लोग झूठे कलंक का भी भय किये बगैर नहीं रह सकते।''
प्यारी ने जबर्दस्ती हँसते हुए कहा, ''सो ठीक है। गत साल आरे में तो तुम्हें एक तरह से गोद में लिये ही लिये मेरे दिन-रात कटे हैं। सौभाग्य से उस दशा में किसी ने तुम्हें नहीं देखा। उस जगह शायद तुम्हारी जान-पहिचान का कोई बन्धु-बान्धव नहीं था।''
मैंने अतिशय लज्जित होकर कहा, ''मुझे ताना मारना वृथा है। मनुष्यता के लिहाज से मैं तुम्हारी अपेक्षा बहुत हीन हूँ, इस बात को मैं अस्वीकार करता नहीं।''
प्यारी तीक्ष्ण स्वर से बोल उठी, ''ताना! तुम्हें ताना मार सकूँगी, यही सोचकर शायद मैं वहाँ गयी थी, क्यों? देखो, मनुष्य के पीड़ा पहुँचाने की भी एक हद होती है- उसे मत लाँघ जाना।''
कुछ देर चुप रहकर फिर बोली, ''ठीक, कलंक ही तो है! यदि मैं होती तो इस कलंक को सिर पर लेकर लोगों को बुलाकर दिखाती फिरती, पर ऐसी बात मुँह से बाहर न निकाल सकती।''
मैंने कहा, ''तुमने मुझे प्राण-दान जरूर दिया है-किन्तु, मैं अत्यन्त छोटा आदमी हूँ राज्यलक्ष्मी, तुम्हारे साथ तुलना ही नहीं हो सकती।'' राजलक्ष्मी दर्पयुक्त स्वर में बोली, ''प्राण-दान यदि दिया है तो अपनी ही गरज से दिया है, तुम्हारी गरज से नहीं। उसके लिए तुम्हें रत्ती-भर भी अहसान मानने की जरूरत नहीं। किन्तु मैं तुम्हें छोटा-छोटी तबीयत का आदमी नहीं खयाल कर सकती। ऐसा होता तो आफत कटती, गले में फाँसी लगाकर सारी ज्वाला को जुड़ा सकती।'' इतना कहकर वह मेरे जवाब की राह देखे बगैर ही कमरे से बाहर चली गयी।
दूसरे दिन सुबह राजलक्ष्मी चाय देकर चुपचाप चली जा रही थी कि मैंने बुलाकर कहा, ''बात-चीत बन्द है क्या?''
वह पलटकर खड़ी हो गयी, बोली, ''नहीं तो, कुछ कहोगे?''
मैंने कहा, ''चलो, एक दफे प्रयाग घूम आवें?''
''ठीक तो है, जाइए।''
''तुम भी चलो।''
''अनुग्रह करते हो क्या?''
''नहीं चाहतीं?''
''नहीं। जरूरत होगी तब माँग लूँगी, इस समय नहीं।'' इतना कहकर वह अपने काम से चली गयी।
मेरे मुँह से केवल एक लम्बी साँस बाहर निकल गयी, किन्तु कोई बात नहीं निकली।
दोपहर को भोजन के समय मैंने हँसकर कहा, ''अच्छा लक्ष्मी, मुझसे बोलना बन्द करके क्या तुमसे रहा जायेगा जो इस असाध्यह-साधन की कोशिश कर रही हो?''
राजलक्ष्मी ने शान्त-गम्भीर मुद्रा से कहा- ''सामने होने पर किसी से नहीं रहा जाता- मुझसे भी नहीं रहा जायेगा। इसके सिवाय, यह मेरी इच्छा भी नहीं है।''
''तब फिर इच्छा क्या है?''
राजलक्ष्मी बोली, ''मैं कल से ही सोच रही हूँ कि इस खींच-तान को बन्द किये वगैर नहीं चल सकता। तुमने भी एक तरह से साफ-साफ जता दिया है और मैं भी एक तरह से खूब जान गयी हूँ। गलती मेरी ही हुई, यह मैं स्वीकार करती हूँ, किन्तु...''
उसे सहसा रुकते देख मैंने पूछा, ''किन्तु, क्या?''
राजलक्ष्मी बोली, ''किन्तु, कुछ भी नहीं। यह जो एक निर्लज्ज वाचाल की तरह याचना करती तुम्हारे पीछे-पीछे घूमती फिरती हूँ,'' इतना कहकर उसने एकाएक अपना मुँह मानो घृणा से सिकोड़ लिया और कहा, ''लड़का ही क्या सोचता होगा, नौकर-चाकर ही मन ही मन क्या कहते होंगे! राम, राम, मानो मैंने इसे एक हँसी का व्यापार बना डाला है।''
कुछ देर ठहर कर फिर कहने लगी, ''बुढ़ापे में यह क्या मुझे सोहता है? तुम इलाहाबाद जाना चाहते थे, जाओ। फिर भी यदि हो सके तो बर्मा रवाना होने के पहिले एक दफे भेंट कर जाना।'' इतना कहकर वह चली गयी।
साथ ही साथ मेरी भूख भी गायब हो गयी। उसका मुँह देखकर आज मुझे पहले ही पहल ज्ञात हुआ कि यह सब मान-मनौवल का मामला नहीं है, सचमुच ही उसने कुछ न कुछ सोचकर स्थिर कर लिया है।
संध्याष के समय आज एक हिन्दुस्तानी दासी जल-पान आदि सामग्री लेकर आई तो उससे कुछ अचरज के साथ प्यारी का हाल पूछा। जवाब सुनकर मैंने और भी अचरज के साथ जाना कि प्यारी मकान में नहीं है, वह साज-सिंगार करके फिटन पर कहीं गयी है। फिटन कहाँ से आई, उसे साज-सिंगार करके कहाँ जाने की जरूरत पड़ गयी- सो कुछ भी न समझा। तब स्वयं उसी के मुँह की वह बात याद आ गयी कि वह काशी में ही एक दिन 'मरी' थी।
यह सच है कि कुछ भी समझ में न आया, फिर भी, इस खबर से सारा मन बेस्वाद हो गया।
शाम हुई, घर-घर में दीए जले, किन्तु राजलक्ष्मी नहीं लौटी।
चादर कन्धों पर डालकर जरा घूम आने के लिए बाहर निकल पड़ा। रास्ते-रास्ते चक्कर काटता, बहुत देखता-सुनता, रात के दस बजे के बाद मकान पर लौटा, तो सुना कि प्यारी तब भी लौटकर नहीं आई है। मामला क्या है? कुछ डर-सा मालूम होने लगा। सोच ही रहा था कि रतन को बुलाकर सारा संकोच दूर करके इस सम्बन्ध का पता लगाऊँ या नहीं कि एक भारी जोड़ी के घोड़ों की टापों का शब्द सुनाई दिया। खिड़की में से झाँका तो देखता हूँ एक बड़ी भारी फिटन मकान के सामने आकर खड़ी है।
प्यारी उतरकर आई। ज्योत्स्ना के आलोक में उसके सर्वांग के जेवर झलमला उठे। जो दो भले आदमी फिटन में बैठे थे वे धीमे स्वर से जान पड़ा, प्यारी को सम्बोधन कर कुछ कह रहे हैं जिसे मैं सुन न सका। वे बंगाली हैं या बिहारी, सो भी न जान सका। चाबुक खाकर घोड़े पलक मारते न मारते ऑंखों के ओझल हो गये।

000

राजलक्ष्मी ने मेरी खबर लेने के लिए उसी साज-सिंगार के साथ मेरे कमरे में प्रवेश किया।
मैं उछलकर और उसकी ओर दाहिना हाथ पसारकर थिएटरी गले से बोला, ''अरी पाखण्डिनी रोहिणी1! तू गोविन्द2 लाल को नहीं पहचानती? अहा! आज यदि मेरे पास एक पिस्तौल होती, या एक तलवार ही होती!''
राजलक्ष्मी ने सूखे कण्ठ-स्वर से कहा, ''तो क्या करते?- खून?''
हँसकर बोला, ''नहीं प्यारी, मुझे इतना बड़ा नवाबी शौक नहीं है। इसके सिवाय इस बीसवीं शताब्दि में ऐसा निष्ठुर राक्षस धाम कौन है जो संसार की इतनी
बड़ी आनन्द की खान को पत्थर से मूँद दे? बल्कि, आर्शीवाद देता हूँ कि हे बाई-कुल-शिरोमणि! तुम दीर्घजीवी होओ- तुम्हारा सुन्दर रूप त्रिलोक विजयी हो, तुम्हारा कण्ठ-स्वर वीणा-विनिन्दित हो, तुम्हारे इन दोनों चरण कमलों नृत्य उर्वशी-तिलोत्तमा का गर्व खर्व कर दे, और मैं दूर से तुम्हारा जय-गान करके धन्य होऊँ!''
प्यारी बोली, ''इन सब बातों का अर्थ?''
मैंने कहा, ''अर्थमनर्थम्-! उसे जाने दो। मैं इसी एक बजे की गाड़ी से बिदा होता हूँ। अभी तो प्रयाग जाता हूँ, इसके बाद जाऊँगा बंगालियों के परमतीर्थ चाकरिस्तान- अर्थात् बर्मा को। यदि समय और सुयोग होगा, तो मिलकर जाऊँगा।''
''मैं कहाँ गयी थी, यह सुनना भी आवश्यक नहीं समझते?''
''नहीं, बिल्कुतल नहीं।''
''यह बहाना पाकर क्या तुम एकदम चले जा रहे हो?''
मैंने कहा, ''इस पापी मुँह से अब भी कुछ नहीं कह सकता। इस गोरख-धन्धे से यदि पार हो सकूँ तो...''
प्यारी कुछ देर चुपचाप खड़ी रही और बोली, ''तुम क्या मुझ पर जो जी चाहे वही अत्याचार कर सकते हो?''
मैं बोला, ''जो जी चाहे? बिल्कुनल नहीं। बल्कि, जान-अनजान में यदि बिन्दुमात्र अत्याचार किया हो तो उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।''
''इसके माने, आज रात को ही तुम चले जाओगे?''
''हाँ।''
''मुझे बिना अपराध दण्ड देने का तुम्हें अधिकार है?''
1-2. बंकिमबाबू के 'विषवृक्ष' नामक उपन्यास के दो पात्र।
''नहीं, तिल-भर भी नहीं। किन्तु, यदि मेरे जाने को ही तुम 'दण्ड देना' समझती हो, तो वह अधिकार मुझे जरूर है।''
प्यारी ने हठात् कोई जवाब नहीं दिया। मेरे मुँह की ओर कुछ क्षण चुपचाप देखते रहकर कहा, ''मैं कहाँ गयी थी, क्यों गयी थी- नहीं सुनोगे?''
''नहीं, मेरी सम्मति लेकर तो तुम वहाँ गयी नहीं थी, जो लौट आकर उसका हाल सुनाओगी। सिवाय इसके; उसके लिए मेरे पास न समय है और न इच्छा।''
प्यारी चोट खाई हुई सर्पिणी की तरह एकाएक फुंकार उठी, ''मेरी भी सुनाने की इच्छा नहीं है। मैं किसी की खरीदी हुई बाँदी नहीं हूँ जो कहाँ जाऊँ और कहाँ न जाऊँ, इसकी अनुमति लेती फिरूँ! जाते हो, जाओ!'' यों कहकर रूप और अलंकारों की एक हिलोर-सी उठाकर वह तेजी के साथ कमरे से बाहर हो गयी।
आदमी गाड़ी बुलाने गया। कोई घण्टे-भर बाद सदर दरवाजे पर एक गाड़ी के खड़े होने का शब्द सुनकर बैग हाथ में लेकर जा ही रहा था कि प्यारी आकर पीछे खड़ी हो गयी। बोली, ''इसे क्या तुम बच्चों का खिलवाड़ समझते हो? मुझे अकेली छोड़कर चले जाओगे, तो नौकर-चाकर क्या सोचेंगे? तुम क्या इन लोगों के सामने भी मुझे मुँह दिखाने योग्य न रक्खोगे?''
पलटकर खड़े होकर कहा, ''अपने नौकरों के साथ तुम निपटती रहना- मेरा उससे कोई ताल्लुक नहीं।''
''वह न हो न सही, किन्तु लौटकर मैं बंकू को ही क्या जवाब दूँगी?''
''यही जवाब दे देना कि वे पश्चिम को घूमने चले गये हैं।'',
''इस पर क्या कोई विश्वास करेगा?
''जिस पर विश्वास किया जा सके ऐसी ही कोई बात बनाकर कह देना।''
प्यारी क्षण-भर मौन रहकर बोली, ''यदि कुछ अन्याय ही कर बैठी हूँ तो क्या वह माफ नहीं हो सकता? तुम क्षमा न करोगे तो और कौन करेगा?''
''मैं बोला, ''प्यारी, यह तो एक बाँदी-दासी सरीखी बात हुई। तुम्हारे मुँह से तो नहीं सोहती।''
इस ताने का प्यारी सहसा कोई उत्तर न दे सकी। उसका मुँह लाल हो गया, वह चुपचाप खड़ी रही। यह साफ मालूम हो गया कि वह प्राणपण से अपने आपको सँम्हाालने की चेष्टा कर रही है। बाहर से गाड़ीवान ने चिल्लाकर देर का कारण पूछा। मेरे चुपचाप बैग हाथ में लेते ही प्यारी धप से पैरों के समीप बैठ गयी और रुद्ध स्वर में बोल उठी, ''मैं सचमुच का अपराध कभी कर ही नहीं सकती, यह जानते हुए भी यदि तुम दण्ड देना चाहते हो तो अपने हाथ से दो, किन्तु, घर-भर के लोगों के समीप मेरा सिर नीचा मत करो। यदि आज तुम इस तरह चले जाओगे तो मैं अब किसी के समीप कभी अपना मुँह ऊँचा करके खड़ी न हो सकूँगी।''
हाथ का बैग नीचे रखकर एक चौकी पर बैठ गया और बोला- ''अच्छा आज तुम्हारे-हमारे बीच अन्तिम फैसला हो जाय। तुम्हारा आज का आचरण मैंने माफ कर दिया। किन्तु, मैंने बहुत विचार करके देखा है कि हम दोनों का मिलना-जुलना अब नहीं को सकेगा।''
प्यारी ने अपना अत्यन्त उत्कण्ठित मुँह मेरे मुँह की ओर उठाकर डरते हुए पूछा, ''क्यों?''
मैं बोला, ''अप्रिय सत्य सह सकोगी?''
प्यारी गर्दन हिलाकर अस्फुट स्वर में कहा, ''हाँ, सह सकूँगी।''
किन्तु, किसी आदमी के व्यथा सहने को तैयार हो जाने से ही कुछ व्यथा देने का कार्य सहज नहीं हो जाता। मुझे बहुत देर तक चुपचाप बैठकर सोचना पड़ा। फिर भी मैंने स्थिर कर लिया कि आज किसी तरह भी अपना इरादा नहीं बदलूँगा और इसीलिए अन्त में मैंने धीरे से कहा, ''लक्ष्मी, तुम्हारा आज का व्यवहार माफ करना कितना ही कठिन क्यों न हो, मैंने माफ कर दिया। किन्तु, तुम स्वयं इस लोभ को किसी तरह नहीं छोड़ सकोगी। तुम्हारे पास बहुत धन-दौलत है- बहुत-सा रूप-गुण है। बहुतों पर तुम्हारा असीम प्रभुत्व भी है। संसार में इससे बढ़कर लोभ की वस्तु और कोई नहीं है। तुम मुझे प्यार कर सकती हो, किन्तु इस मोह को किसी तरह भी नहीं काट सकोगी।''
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:24

राजलक्ष्मी ने मृदु कण्ठ से कहा, ''अर्थात् इस तरह का काम मैं बीच-बीच में करूँगी ही?''
जवाब में मैं केवल मौन हो रहा। वह खुद भी कुछ देर चुप रहकर बोली, ''उसके बाद?''
''उसके बाद एक दिन ताश के मकान की तरह सब गिर पड़ेगा। उस दिन की उस हीनता से तो यही भला है कि आज मुझे हमेशा के लिए रिहाई दे दो-तुम्हारे समीप मेरी यही प्रार्थना है।''
प्यारी बहुत देर तक मुँह नीचा किये चुपचाप बैठी रही। इसके बाद जब उसने मुँह उठाया तब देखा, उसकी ऑंखों से पानी गिर रहा है। उसे ऑंचल से पोंछकर पूछा, ''क्या मैंने कभी तुम्हें कोई छोटा काम करने के लिए प्रवृत्त किया है?''
इस गिरती हुई अश्रु-धारा ने मेरे संयम की भीत पर चोट पहुँचाई; किन्तु, बाहर से मैंने उसे किसी तरह प्रकट नहीं होने दिया। शान्त दृढ़ता के साथ कहा, ''नहीं, किसी दिन नहीं। तुम स्वयं छोटी नहीं हो। छोटा काम तुम स्वयं कभी कर नहीं सकती और दूसरों को भी नहीं करने दे सकतीं।''
फिर कुछ ठहरकर कहा, ''किन्तु दुनिया तो मनसा पण्डित की पाठशाला की उस राजलक्ष्मी को पहिचानेगी नहीं। वह तो पहिचानेगी सिर्फ पटना की प्रसिद्ध प्यारी बाई को। तब दुनिया की नजरों में कितना छोटा हो जाऊँगा, सो तुम क्या नहीं देख सकती? बतलाओ, तुम उसे किस तरह रोकोगी?''
राजलक्ष्मी ने एक लम्बी साँस छोड़कर कहा, ''किन्तु, उसे तो सचमुच में छोटा होना नहीं कहते?''
मैंने कहा, ''भगवान की नजर में न हो, किन्तु, संसार की ऑंखें भी तो उपेक्षा करने की चीज नहीं है लक्ष्मी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''किन्तु, उन्हीं की नजर को ही तो सबसे पहले मानना उचित है।''
मैंने कहा, एक तरह से यह बात सच है। किन्तु, उनकी नजर तो हमेशा दीख नहीं पड़ती और फिर जो दृष्टि संसार में दस आदमियों के भीतर से प्रकाश पाती है, वह भी भगवान की ही दृष्टि है राजलक्ष्मी, इसे भी अस्वीकार करना अन्याय है।''
''इसी डर से तुम मुझे जन्म-भर के लिए छोड़कर चले जाओगे?''
मैं बोला, ''फिर मिलूँगा। तुम कहीं भी क्यों न होओ, बर्मा जाने के पहले मैं एक दफे और भी तुमसे मिल जाऊँगा।''
राजलक्ष्मी तेजी के साथ सिर हिलाकर रूँआसे स्वर से कह उठी, ''जाते हो तो जाओ। किन्तु तुम मुझे चाहे जैसा क्यों न समझो, मुझसे बढ़कर अपना तुम्हारा और कोई नहीं। पर उसी से मुझको त्याग कर जाना दस आदमियों की निगाह में धर्म है, यह बात मैं कभी स्वीकार नहीं करूँगी।'' इतना कहकर वह तेजी से कमरा छोड़कर चली गयी।
घड़ी निकालकर देखा, अब भी समय है, अब भी शायद एक बजे की गाड़ी मिल जाय। चुपचाप बैग उठाकर धीरे से उतरकर मैं गाड़ी में जा बैठा।
इनाम के लोभ से गाड़ीवान ने प्राणपण से दौड़कर स्टेशन पहुँचा दिय। किन्तु उसी क्षण पश्चिम की ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़ दिया। पूछने से मालूम हुआ कि आधा घण्टे बाद ही एक ट्रेन कलकत्ते की ओर जायेगी। सोचा, चलो, यही अच्छा है; गाँव का मुँह बहुत दिन से नहीं देखा- उस जंगल में ही जाकर बाकी के कुछ दिन काट दूँ।
इसलिए, पश्चिम के बदले पूर्व का टिकट खरीद कर आधा घण्टे के बाद एक विपरीत-गामिनी भाफ की गाड़ी में बैठकर काशी से चल दिया।


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बहुत दिनों बाद फिर एक दिन शाम को गाँव में आकर प्रवेश किया। मेरा मकान उस समय सगे-सम्बन्धी रिश्तेदारों तथा उनके भी रिश्तेदारों से भरा हुआ था। बड़े मजे से सारे घर को घेरकर उन्होंने अपनी घर-गिरस्ती फैला रक्खी थी, कहीं सुई रखने के लिए भी जगह नहीं थी।
मेरे एकाएक आ पहुँचने और वहाँ रहने के इरादे को सुनकर आनन्द के मारे उनका चेहरा स्याह हो गया। वे कहने लगे, ''आहा, यह तो बड़े आनन्द की बात है। इस बार ब्याह करके संसारी बन जाओ श्रीकान्त, हम लोग देखकर अपनी ऑंखें ठण्डी करें।''
मैंने कहा, ''इसीलिए तो आया हूँ। इस समय कम से कम मेरी माँ का कमरा खाली कर दो, मैं अपने हाथ-पाँव फैलाकर जरा लेट रहूँ।''
मेरे पिता की ममेरी बहिन अपने पति-पुत्र के साथ कुछ दिन से रह रही थी। वे आकर बोलीं, ''ठीक तो कहते हो!''
मैंने कहा, ''अच्छा, न हो तो मैं बाहर के कमरे में पड़ रहूँगा।''
जाकर देखा, कोने में सुर्खी, और एक कोने में चूने का ढेर लगा हुआ है। उसके भी 'मालिक' बोले, ''ठीक तो है। देखता हूँ कि वे सब चीजें तो जरा देख-सुनकर हटानी पड़ेंगी। पर कमरा तो छोटा नहीं है, तब तक न हो तो इस किनारे एक तख्त-पोश बिछाकर- क्या कहते हो श्रीकान्त?''
मैंने कहा, ''अच्छा रात-भर के लिए न हो तो यही सही।''
वास्तव में मैं इतना थक गया था कि मालूम होता था जहाँ भी हो जरा-सी सोने को जगह भर मिल जाय तो जान में जान आ जाय। बर्मा की उस बीमारी के बाद से अब तक शरीर पूरी तौर से स्वस्थ और सबल न हो पाया था। भीतर ही भीतर एक तरह का अवसाद प्राय: भी अनुभव होता था। इसी से शाम के बाद जब माथा दुखने लगा तब विशेष अचरज नहीं हुआ।
नयी बनी हुई बहिन ने आकर कहा- ''अरे यह तो जरा गर्मी-सी चढ़ गयी है भात खाकर सोने से ही चली जायेगी।''
तथास्तु। वही हुआ। गुरुजन की आज्ञा शिरोधार्य करके गर्मी दूर करने के लिए भात खाकर शय्या ग्रहण कर ली। पर सुबह नींद टूटी खूब अच्छी तरह बुखार लिये हुए!
दीदी ने शरीर पर हाथ रखकर कहा, ''कुछ नहीं, यह तो मलेरिया है, इसमें भोजन किया जाता है।''
किन्तु अब हाँ में हाँ न मिला सका। बोला, ''नहीं जीजी, मैं अब तक तुम्हारे मलेरिया-राज की प्रजा नहीं बना हूँ। उनकी दुहाई देकर अत्याचार किया जाना शायद मैं सहन नहीं कर सकूँ। आज मेरी लंघन है।''
सारी रात गुजरी, दूसरा दिन गुजरा, उसके बाद का दिन भी कट गया, किन्तु बुखार ने पीछा नहीं छोड़ा। बल्कि, उसे अधिकाधिक चढ़ते देख मन ही मन व्याकुल हो उठा। गोविन्द डॉक्टर इस बेला उस बेला देखने आने लगे। नाड़ी, पकड़कर, जीभ देखकर, पेट ठोककर 'सुस्वादु' ओषधियों की योजना कर केवल 'लागत के दाम' भर लेने लगे, किन्तु एक-एक दिन करके सारा सप्ताह इसी तरह गुजर गया। मेरे पिता के मामा, मेरे बाबा आकर बोले, ''इसीलिए तो भइया, मैं कहता हूँ कि वहाँ खबर पठा दो, तुम्हारी फुआ को आ जाने दो। बुखार तो जैसे...''
बात पूरी न होने पर भी मैं समझ गया कि बाबा कुछ मुश्किल में पड़ गये हैं। इस तरह और भी चार-पाँच दिन बीत गये, किन्तु, बुखार में कोई फर्क नहीं हुआ। उस दिन सुबह गोविन्द डॉक्टर ने आकर यथारीति दवाई देकर तीन दिन के बाकी 'लागत के दाम' माँगे। शय्या में पड़े-पड़े किसी तरह हाथ बढ़ाकर अपना बैग खोला- देखा तो मनी-बैग गायब है! अतिशय शंकित होकर मैं उठ बैठा। बैग को औंधा करके हर एक चीज अलग-अलग करके खोज की; किन्तु जो नहीं था सो नहीं मिला।
गोविन्द डॉक्टर मामला समझकर चिन्तित होकर बार-बार सवाल करने लगे, ''कुछ चला गया है क्या?''
मैंने कहा, ''नहीं, कुछ भी तो नहीं गया।''
किन्तु उनकी दवा का मूल्य जब मैं न दे सका तब वे समझ गये। स्तम्भित की तरह कुछ देर खड़े रहकर उन्होंने पूछा, ''थे कितने?''
''कुछ थोड़े-से।''
''चाबी को जरा सावधानी से रखना चाहिए भइया। खैर, तुम पराए नहीं हो, रुपये की चिन्ता मत करना। अच्छे हो जाओ, उसके बाद जब सुभीता हो भेज देना। इलाज में कोई कसर न होगी।'' इतना कहकर डॉक्टर साहब गैर होकर भी परम आत्मीय से भी अधिक सान्त्वना देकर चले गये। उनसे कह दिया कि ''यह बात कोई सुन न पावे।''
डॉक्टर साहब बोले, ''अच्छा, अच्छा, देखा जायेगा।''
देहात में विश्वास पर रुपये उधर देने की चाल नहीं है। रुपया ही क्यों, एक चवन्नी भी खाली हाथ उधार माँगने पर लोग समझते हैं कि यह आदमी खालिस दिल्लगी कर रहा है। क्योंकि, इस बात की देहात के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि संसार में इतना नासमझ भी कोई है जो खाली हाथ उधार चाहता है, अतएव, मैंने यह कोशिश भी नहीं की। पहले से ही स्थिर कर लिया था कि इसकी सूचना राजलक्ष्मी को नहीं दूँगा। जरा स्वस्थ हो जाऊँ तब जो हो सकेगा करूँगा। मन में सम्भवत: यह संकल्प था कि अभया को पत्र लिखकर रुपये मँगाऊँगा। किन्तु, इसके लिए समय नहीं मिला। सहसा सेवा-शुश्रूषा का सुर भी 'तारा' से 'उदारा' में उतर पड़ते ही समझ गया कि मेरी विपत्ति की बात मकान के भीतर छिपी नहीं रही है।
परिस्थिति को संक्षेप में जताकर राजलक्ष्मी को एक चिट्ठी लिखी अवश्य, किन्तु उसमें मैं अपने आपको इतना हीन, अपमानित, महसूस करने लगा कि किसी तरह भी उसे न भेज सका- फाड़कर फेंक दिया। दूसरा दिन इसी तरह कट गया। किन्तु, इसके बाद के दिन ने किसी तरह भी कटना न चाहा। उस दिन किसी ओर से कोई रास्ता न देख पाकर अन्त में एक तरह से जान पर खेलकर ही कुछ रुपयों के लिए राजलक्ष्मी को पत्र लिखकर पटना और कलकत्ते के ठिकाने पर भेज दिए।
वह रुपये भेजेगी, इसमें जरा भी सन्देह नहीं था, फिर भी, उस दिन सुबह से ही मानो एक प्रकार के उत्कण्ठित संशय से पोस्टमैन की आशा में सामने की खुली खिड़की में से रास्ते के ऊपर अपनी दृष्टि बिछाए हुए उन्मुख पड़ा रहा।
समय निकल गया। आज अब उसकी आशा नहीं है। ऐसा सोचकर करवट बदलने की तैयारी कर रहा था कि उस समय दूर पर एक गाड़ी के शब्द से चकित होकर तकिये पर भार देकर उठ बैठा। गाड़ी आकर ठीक सामने ही खड़ी हो गयी। देखता हूँ, कोचवान के बगल में रतन बैठा है। उसके नीचे उतरकर गाड़ी का दरवाजा खोलते ही जो दिखाई दिया उस पर सत्य मानकर विश्वास करना कठिन हो गया।
प्रकट रूप से दिन के समय इस गाँव के रास्ते पर राजलक्ष्मी आकर खड़ी हो सकती है, यह मेरी कल्पना के भी परे की बात थी।
रतन बोला- ''ये हैं बाबूजी।''
राजलक्ष्मी ने केवल एक बार मेरे मुँह की ओर देखा। गाड़ीवान बोला- ''माँ, देर लगेगी? घोड़ा खोल दूँ?''
''जरा ठहरो।'' कहकर उसने अविचिलित धीर पद रखते हुए मेरे कमरे में प्रवेश किया। प्रणाम करके, पैरों की धूलि मस्तक पर लगाकर और हाथ से मस्तक और छाती का उत्ताप देखकर कहा, ''इस समय तो अब बुखार नहीं है। उस जून सात बजे की गाड़ी से जाना हो सकेगा? घोड़े छोड़ देने को कह दूँ?''
मैं अभिभूत की तरह उसके मुँह की ओर निहार रहा था। बोला, ''दो दिन से बुखार आना तो बन्द है, क्या मुझे आज ही ले चलना चाहती हो?''
राजलक्ष्मी बोली, ''न हो तो आज रहने दो। रात में चलने की जरूरत नहीं, सर्दी लग सकती है, कल सुबह ही चलेंगे।''
इतनी देर में जैसे मैं होश में आ गया। बोला, ''इस गाँव में इस मुहल्ले के बीच तुम आई किस साहस से? तुम क्या सोचती हो कि यहाँ तुम्हें कोई भी न पहिचान सकेगा?''
राजलक्ष्मी ने सहज में ही कहा, ''भले ही पहिचान लें। यहीं तो पैदा हुई और बड़ी हुई और यहीं पर लोग मुझे पहिचान न सकेंगे? जो देखेगा वही पहिचान लेगा।''
''तब?''
''क्या करूँ बताओ? मेरा भाग्य! नहीं तो तुम यहाँ आकर बीमार ही क्यों पड़ते?''
''आई क्यों? रुपये मँगाए थे, रुपये भेज देने से ही तो चल जाता!''
''सो क्या कभी हो सकता है? ऐसी बीमारी की खबर सुनकर क्या केवल रुपये भेजकर ही स्थिर रह सकती हूँ?''
मैंने कहा, ''तुम तो शायद स्थिर हो गयीं, किन्तु मुझे तो बहुत ही अस्थिर कर दिया। अभी ही यहाँ जब सब आ पड़ेंगे तब तुम अपना मुँह किस तरह दिखाओगी, और मैं ही क्या जवाब दूँगा?''
राजलक्ष्मी ने जवाब में केवल एक बार और अपने ललाट को छूकर कहा, ''जवाब और क्या दोगे- मेरा भाग्य!''
उसकी बेपरवाही और उदासीनता से अत्यन्त असहिष्णु होकर बोला, ''भाग्य तो ठीक है! किन्तु लाज-शर्म को एकबारगी ही चाट बैठी हो? यहाँ मुँह दिखाते भी तुम्हें हिचकिचाहट नहीं हुई?''
राजलक्ष्मी ने वैसे ही उदास कण्ठ से जवाब दिया, ''मेरी लाज-शरम जो कुछ है सो इस समय बस तुम ही हो।''
इसके बाद अब मैं और कहूँ ही क्या! सुनूँ भी क्या? ऑंखें मूँदकर चुपचाप लेट रहा।
कुछ देर बाद पूछा, ''बंकू का विवाह निर्विघ्न हो गया?''
राजलक्ष्मी बोली, ''हाँ।''
''अभी कहाँ से आ रही हो?- कलकत्ते से?''
''नहीं पटने से। वहीं पर तुम्हारी चिट्ठी मिली थी।''
''मुझे कहाँ ले जाओगी?- पटने?''
राजलक्ष्मी ने कुछ सोचकर कहा, ''एक बार तो वहाँ तुम्हें जाना ही पड़ेगा। पहले कलकत्ते चलें, वहाँ पर तुम्हें दिखा लूँ, उसके बाद तन्दुरुस्त होने पर...''
मैंने सवाल किया, ''किन्तु, उसके बाद भी मुझे पटना क्यों जाना पड़ेगा?''
राजलक्ष्मी बोली, दान-पत्र की तो वहीं रजिस्टरी करानी पड़ेगी। लिखा-पढ़ी एक तरह से सब कर आई हूँ; किन्तु तुम्हारे हुक्म के बिना तो कुछ हो न सकेगा।''
अत्यन्त अचरज के साथ पूछा, ''क्या बात का दान-पत्र? किसके नाम?''
राजलक्ष्मी बोली, ''मकान तो दोनों बंकू को दिये हैं। केवल काशी का मकान गुरुदेव को देना विचारा है। और कम्पनी के कागज, गहने वगैरह का हिस्सा-बाँट भी अपनी समझ-बूझ के अनुसार एक तरह से कर आई हूँ। अब तुम्हारे कहने- भर की...''
मेरे अचरज की सीमा नहीं रही, बोला, ''ऐसी अवस्था में अब तुम्हारा खुद का और क्या रह गया? बंकू यदि तुम्हारा भार न ले तो? अब उसकी खुद की गिरस्ती हो गयी, अन्त में यदि वह भी तुम्हें खाने को न दे तो?''
''क्या मैं वह चाहती हूँ? निज का सब कुछ दान करके क्या उसी के हाथ का दिया खाऊँगी? तुम भी खूब हो!''
धीरज को और न सँम्हाील सकने के कारण मैं उठकर क्रुद्ध कण्ठ से बोला, ''हरिश्चन्द्र के समान यह दुर्बुद्धि तुम्हें दी किसने? खाओगी क्या? बुढ़ापे में किसकी गल-ग्रह बनने जाओगी!''
राजलक्ष्मी बोली, ''तुम्हें गुस्सा करने की जरूरत नहीं है, तुम लौट जाओ। जिसने मुझे यह बुद्धि दी है वही मुझे खाने को देगा। मैं हजार बूढ़ी हो जाऊँगी वह मुझे कभी गल-ग्रह नहीं समझेगा! तुम फिजूल सिर गर्म मत करो- शान्ति से लेट रहो।''
मैं शान्त होकर लेट रहा। सामने की खुली खिड़की से डूबते हुए सूर्य की किरणों से रँगा हुआ विचित्र आकाश दीख पड़ा। स्वप्नाविष्ट की तरह निर्निमेष दृष्टि से उसी ओर निहारते-निहारते जान पड़ने लगा- मानो एक अद्भुत शोभा और सौन्दर्य में सारा विश्व-ब्रह्माण्ड बहा जा रहा है। तीनों लोकों के बीच रोग-शोक, अभाव-अभियोग, हिंसा-द्वेष, अब कहीं भी कुछ नहीं है।
इस निर्वाक् निस्तब्धता में मग्न रहकर दोनों ने कितना समय बिता दिया, समझता हूँ, इसका किसी ने हिसाब ही नहीं किया। सहसा दरवाजे के बाहर मनुष्य के गले की आवाज सुनकर हम दोनों ही चौंक पड़े और राजलक्ष्मी के शय्या छोड़ने के पहले ही डॉक्टर साहब ने प्रसन्न बाबा को साथ में लिये अन्दर प्रवेश किया। किन्तु, उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही रुककर खड़े हो गये। बाबा जब दिवा-निद्रा ले रहे थे तब यह खबर उनके कानों में अवश्य पड़ गयी थी कि कोई बन्धु कलकत्ते से गाड़ी लेकर मेरे पास आया है, किन्तु वह कोई स्त्री हो सकती है, यह शायद किसी की कल्पना में भी नहीं था। इसीलिए, शायद अब तक घर की स्त्रियाँ भी बाहर नहीं आईं थीं।
बाबाजी अत्यन्त विलक्षण आदमी थे। उन्होंने कुछ देर राजलक्ष्मी के नीचे झुके हुए मुख की ओर देखकर कहा, ''यह लड़की कौन है श्रीकान्त? कुछ पहिचानी हुई-सी मालूम होती है।''
डॉक्टर साहब भी प्राय: साथ ही साथ कह उठे, ''छोटे काका, मुझे भी ऐसा लगता है जैसे इन्हें कहीं देखा है।''
मैंने तिरछी नजर से देखा, राजलक्ष्मी का सारा मुख-मण्डल जैसे मुर्दे की तरह फक हो गया है उसी क्षण जैसे कोई मेरे हृदय के भीतर से बोल उठा-''श्रीकान्त, इस सर्वस्व-त्यागिनी स्त्री ने केवल तुम्हारे लिए ही स्वेच्छा से यह दु:ख अपने सिर पर उठा लिया है।''
एकबारगी सारी देह रोमांचित हो उठी, मन ही मन बोला, मुझे सत्य से मतलब नहीं, आज मैं मिथ्या को ही सर पर धारण करूँगा और दूसरे ही क्षण उसके हाथ को जरा दबाकर कह बैठा, ''तुम अपने पति की सेवा करने आई हो। तुम्हें लाज किस बात की है राजलक्ष्मी? ये बाबा और डॉक्टर साहब हैं, इनको प्रणाम करो।''
पल-भर के लिए दोनों की चार ऑंखें हो गयीं; इसके बाद उसने उठकर जमीन पर सिर टेककर दोनों को प्रणाम किया।
एक दिन जिस भ्रमण-कहानी के बीच ही में अकस्मात् यवनिका डालकर बिदा ले चुका था, उसको फिर किसी दिन अपने ही हाथ से उद्धाटित करने की प्रवृत्ति मुझमें नहीं थी। मेरे गाँव के जो बाबा थे वे जब मेरे उस नाटकीय कथन के उत्तर में सिर्फ जरा-सा मुसकराकर रह गये, और राजलक्ष्मी के जमीन से लगाकर प्रणाम करने पर, जिस ढंग से हड़बड़ाकर, दो कदम पीछे हटकर बोले, ''ऐसी बात है क्या? अहा, अच्छा हुआ, अच्छा हुआ,- जीते रहो, खुश रहो!'' और फिर डॉक्टर को साथ लेकर बाहर चले गये, तब राजलक्ष्मी के चेहरे की जो तसवीर मैंने देखी वह भूलने की चीज नहीं, और न उसे कभी भूला ही। मैंने सोचा था कि वह मेरी है, बिल्कुसल मेरी अपनी- उसका प्रकाश बाहर की दुनिया में किसी दिन भी प्रकट न होगा; मगर, अब सोचता हूँ कि यह अच्छा ही हुआ जो बहुत दिनों से बन्द हुए उस दरवाजे क़ो मुझे ही आकर खोलना पड़ा। यह अच्छा ही हुआ कि जिस अज्ञात रहस्य के प्रति बाहर का क्रुद्ध संशय, अन्याय-अविचार का रूप धारण करके उस पर निरन्तर धक्के लगा रहा था, मुझे उसके बन्द दरवाजे को अपने ही हाथ से खोलने का मौका मिला।
बाबा चले गये, राजलक्ष्मी क्षण-भर स्तब्ध भाव-से उनकी तरफ देखती रही, और उसके बाद मुँह उठाकर निष्फल हँसी हँसने की कोशिश करके बोली, ''पैरों की धूल लेते समय मैं उन्हें छुए थोड़े ही लेती थी। मगर, तुम क्यों उस बात को कहने गये उनसे? उसकी तो कोई जरूरत न थी। यह तो सिर्फ-वास्तव में यह तो सिर्फ तुमने अपने आप ही अपनों का अपमान किया, जिसकी जरा भी जरूरत न थी। ये लोग विधवा-विवाह की पत्नी को बाज़ार की वेश्या की अपेक्षा ऊँचा आसन नहीं देते, लिहाजा इसमें मैं नीचे ही उतरी, किसी को जरा-सा भी ऊपर न उठा सकी...''
इस बात को राजलक्ष्मी फिर पूरा न कर सकी।
मैं सब कुछ समझ गया। इस अपमान के सामने बड़ी-बड़ी बातों की उछल-कूद मचाकर बात बढ़ाने की प्रवृत्ति न हुई। जिस तरह चुपचाप पड़ा था, उसी तरह मुँह बन्द किये पड़ा रहा।
राजलक्ष्मी भी बहुत देर तक और कुछ नहीं बोली, ठीक मानो अपनी चिन्ता में मग्न होकर बैठी रही; उसके बाद सहसा बिल्कुरल पास ही कहीं से किसी की बुलाहट सुनकर मानो चौंककर उठ खड़ी हुई। रतन को बुलाकर बोली, ''गाड़ी जल्दी तैयार करने को कह दे, रतन, नहीं तो फिर रात के ग्यारह बजे की उसी गाड़ी से जाना होगा। यदि ऐसा हुआ तो मुश्किल होगा- रास्ते में ठण्ड लग जायेगी।''
दस ही मिनट के अन्दर रतन ने मेरा बैग ले जाकर गाड़ी पर रख दिया और मेरे बिस्तर बाँधने के लिए इशारा करता हुआ वह पास आ खड़ा हुआ। तबसे अब तक मैंने एक भी बात नहीं की थी और न अब भी कोई प्रश्न किया। कहाँ जाना होगा, क्या करना होगा, कुछ भी बिना पूछे मैं चुपचाप उठकर धीरे-से गाड़ी में जाकर बैठ गया।
कुछ दिन पहले ऐसी ही एक शाम को अपने घर में प्रवेश किया था और आज फिर वैसी ही एक शाम को चुपचाप घर से निकल पड़ा। उस दिन भी किसी ने आदर के साथ ग्रहण नहीं किया था और आज भी कोई स्नेह के साथ बिदाई देने को आगे न आया! उस दिन भी, इसी समय, ऐसे ही घर-घर में शंख बजना शुरू हुआ था और इसी तरह वसु-मल्लिकों के गोपाल-मन्दिर से आरती के घण्टे-घड़ियाल का शब्द अस्पष्ट होकर हवा में बहा आ रहा था। फिर भी, उस दिन से आज के दिन का प्रभेद कितना ज़बर्दस्त है, इस बात को सिर्फ आकाश के देवताओं ने ही देखा।
बंगाल के एक नगण्य गाँव के टूटे-फूटे जीर्ण घर के प्रति मेरी ममता कभी न थी- उससे वंचित होने को भी मैंने इससे पहले कभी हानिकर नहीं समझा, परन्तु आज अब अत्यन्त अनादर के साथ गाँव छोड़कर चल दिया, और किसी दिन किसी भी बहाने उसमें फिर कभी प्रवेश करने की कल्पना तक को जब मन में स्थान न दे सका, तब यह अस्वास्थ्यकर साधारण गाँव एक साथ सभी तरफ से मेरी ऑंखों के सामने असाधारण होकर दिखाई देने लगा और जिससे अभी तुरन्त ही निर्वासित होकर निकल पड़ा था, उसी अपने पुरखों के टूटे-फूटे मलिन घर के प्रति मेरे मोह की सीमा न रही।
राजलक्ष्मी चुपके से आकर मेरे सामने के आसन पर बैठ गयी, और, शायद गाँव के परिचित राहगीरों के कुतूहल से अपने को पूरी तरह छिपाए रखने के लिए ही उसने एक कोने में अपना सिर रखकर ऑंखें मींच लीं।
जब हम लोग रेलवे-स्टेशन के लिए रवाना हुए तब सूरज छिप चुका था। गाँव के टेढ़े-मेढ़े रास्ते के किनारे अपने आप बढ़े हुए करौंदे, झरबेरी और बेंत के जंगल ने संकीर्ण मार्ग को और भी संकीर्ण बना दिया था और दोनों तरफ पंक्तिवार खड़े हुए आम-कटहर के पेड़ों की शाखाएँ सिर से ऊपर कहीं-कहीं ऐसी सघन होकर मिल गयी थीं कि शाम का अंधेरा और भी दुर्भेद्य हो गया था। उसके भीतर से गाड़ी जब अत्यन्त सावधानी के साथ बहुत ही धीमी चाल से चलने लगी तब मैं ऑंखें मींचकर उस निविड़ अन्धकार के भीतर से न जाने क्या-क्या देखने लगा। मालूम हुआ, इसी रास्ते से किसी दिन बाबा मेरी दीदी को ब्याह कर लाए थे, तब यह रास्ता बारातियों के कोलाहल और पैरों की आहट से गूँज उठा होगा; और, फिर किसी दिन जब वे स्वर्ग सिधारे, तब इसी रास्ते से अड़ोसी-पड़ोसी उनकी अरथी नदी तक ले गये होंगे। इसी मार्ग से ही मेरी मां ने किसी दिन वधू-वेश में गृह-प्रवेश किया था, और एक दिन जब उनके इस जीवन की समाप्ति हुई तब, धूल-मिट्टी से भरे इसी संकीर्ण मार्ग से अपनी माँ को गंगा में विसर्जित करके हम लोग वापस लौटे थे। उस समय यह मार्ग ऐसा निर्जन और दुर्गम नहीं हुआ था। तब तक शायद इसकी हवा में इतना मलेरिया और तालाबों में इतना कीचड़ और जहर इकट्ठा नहीं हुआ था। उस समय तक देश में अन्न था, वस्त्र थे, धर्म था, तब तक देश का निरानन्द शायद ऐसी भयंकर शून्यता से आकाशव्यापी होकर भगवान के द्वार तक नहीं पहुँचता था। दोनों ऑंखों में ऑंसू भर आए, गाड़ी के पहिए से थोड़ी-सी धूल लेकर जल्दी-से माथे और मुँह पर लगाकर मैंने मन-ही-मन कहा, 'हे मेरे पितृ-पितामह के सुख-दु:ख, विपद-सम्पद, और हँसने-रोने से भरे हुए धूल-मिट्टी के पथ, मैं तुम्हें बार-बार नमस्कार करता हूँ।' फिर अन्धकार में जंगल की ओर देखकर कहा, 'माता जन्मभूमि, तुम्हारी करोड़ों अकृती सन्तानों के समान मैंने भी तुम्हें हृदय से नहीं चाहा- और नहीं जानता किसी दिन तुम्हारी सेवा में, तुम्हारे काम में, तुम्हारी गोद में फिर वापस आऊँगा या नहीं। परन्तु आज इस निर्वासन के मार्ग में अंधेरे के भीतर तुम्हारी जो दु:ख की मूर्ति मेरे ऑंसुओं के भीतर से अस्पष्ट होकर प्रस्फुटित हो उठी है, उसे मैं इस जीवन में कभी नहीं भूल सकूँगा।'
ऑंख खोलकर देखा, राजलक्ष्मी उसी तरह स्थिर बैठी है। अंधेरे कोने में उसका चेहरा नहीं दिखाई दिया पर मैंने अनुभव किया कि ऑंखें मींचकर वह मानो चिन्ता में मग्न हो रही है और मन-ही-मन कहा, 'रहने दो ऐसे ही। आज से जब कि मैंने अपनी चिन्ता-तरणी की पतवार उसके हाथ सौंप दी है, तो इस अनजान नदी में कहाँ भँवरें हैं और कहाँ टापू, सो वही खोजती रहे।'
इस जीवन में अपने मन को मैंने अनेक दिशाओं में, अनेक अवस्थाओं में आजमाकर देखा है। उसके भीतर की प्रकृति मैं पहिचानता हूँ। किसी विषय में 'अत्यन्त' को वह नहीं सह सकता। अत्यन्त सुख, अत्यन्त स्वास्थ्य, अत्यन्त अच्छा रहना, उसे हमेशा पीड़ा देता है। कोई अत्यन्त प्रेम करता है; इस बात को जानते ही मन भागूँ-भागूँ करने लगता है, उसे मन ने आज कितने दु:ख से अपने हाथ से पतवार छोड़ दी है, इस बात को इस मन के सृष्टिकर्त्ता के सिवा और कौन जान सकता है?
बाहर के काले आकाश की ओर एक बार दृष्टि फैलाई- भीतर की अदृश्यप्राय निश्चल प्रतिमा की ओर भी एक बार दृष्टि डाली; उसके बाद हाथ जोड़कर फिर मैंने किसे नमस्कार किया, मैं खुद नहीं जानता। परन्तु, मन-ही-मन इतना जरूर कहा कि ''इसके आकर्षण के दु:सह वेग से मेरा दम घुट रहा है, बहुत बार बहुत मार्गों से भागा हूँ, परन्तु फिर भी जब गोरखधन्धे की तरह सभी मार्गों ने मुझे बार-बार इसी के पास लौटा दिया है, तो अब मैं विद्रोह न करूँगा-अबकी बार मैंने अपने को सम्पूर्ण रूप से इसी के हाथ सौंप दिया। और अब तक अपने जीवन को अपनी पतवार से चलाकर ही क्या पाया? उसे कितना सार्थक बनाया? हाँ, आज अगर वह ऐसे ही हाथ जा पड़ा हो जो स्वयं अपने जीवन को आकण्ठ डूबे हुए दलदल में से खींचकर बाहर निकाल सका है, तो वह दूसरे के जीवन को हरगिज़ फिर उसी में नहीं डुबा सकता।''
खैर, यह सब तो हुआ अपनी तरफ से। परन्तु, दूसरे पक्ष का आचरण फिर ठीक पहले की भाँति शुरू हुआ। रास्ते-भर में एक भी बात नहीं हुई यहाँ तक कि स्टेशन पहुँचकर भी किसी ने मुझसे कोई प्रश्न करना आवश्यक नहीं समझा। थोड़ी देर बाद ही कलकत्ते जानेवाली गाड़ी की घण्टी बजी, लेकिन रतन टिकट खरीदने का काम छोड़कर मुसाफिरखाने के एक कोने में मेरे लिए बिस्तर बिछाने में लग गया। अतएव समझ लिया, कि नहीं, हमें सवेरे की गाड़ी से पश्चिम की ओर रवाना होना होगा। मगर, उधर पटना जाना होगा या काशी या और कहीं, यह मालूम न होने पर भी इतना साफ समझ में आ गया कि इस विषय में मेरा मतामत बिल्कुकल ही अनावश्यक है।
राजलक्ष्मी दूसरी ओर देखती हुई अन्यमनस्क की तरह खड़ी थी, रतन ने अपना काम पूरा करके उसके पास जाकर पूछा, ''माँजी, पता लगा है कि जरा और आगे जाने से सभी तरह का अच्छा खाना मिल सकता है।''
राजलक्ष्मी ने ऑंचल की गाँठ खोलकर कई रुपये उसके हाथ में देते हुए कहा, ''अच्छी बात है, ले आ वहीं जाकर। पर दूध जरा देख-भालकर लेना, बासी-वासी न ले आना कहीं।''
रतन ने कहा, ''माँजी, तुम्हारे किये कुछ...''
''नहीं, मेरे लिए कुछ नहीं चाहिए।''
यह 'नहीं' कैसा है, इस बात को सभी जानते हैं। और शायद सबसे ज्यादा जानता है रतन खुद। फिर भी उसने दो-चार बार पैर घिसकर धीरे से कहा, ''कल ही से तो बिल्कुल...''
राजलक्ष्मी ने उत्तर दिया, ''तुझे क्या सुनाई नहीं देता रतन? बहरा हो गया है क्या?''
आगे और कुछ न कहकर रतन चल दिया। कारण, इसके बाद भी बहस कर सकता हो, ऐसी ताब तो मैंने किसी की भी नहीं देखी। और जरूरत ही क्या थी? राजलक्ष्मी मुँह से स्वीकार न करे, फिर भी, मैं जानता हूँ कि रेलगाड़ी में रेल से सम्बन्धित किसी के भी हाथ की कोई चीज खाने की ओर उसकी प्रवृत्ति नहीं होती। अगर यह कहा जाय कि निरर्थक कठोर उपवास करने में इसकी जोड़ का दूसरा कोई नहीं देखा, तो शायद अत्युक्ति न होगी। मैंने अपनी ऑंखों से देखा है, कितनी बार कितनी चीजें इसके घर आते देखी हैं, पर उन्हें नौकर-नौकरानियों ने खाया है, गरीब पड़ोसियों को बाँट दिया है- सड़-गल जाने पर फेंक दिया गया है, परन्तु जिसके लिए वे सब चीजें आई हैं उसने मुँह से भी नहीं लगाया। पूछने पर, मजाक करने पर, हँसकर कह दिया है, ''हाँ, मेरे तो बड़ा आचार है! मैं, और छुआ छूत का विचार! मैं तो सब कुछ खाती-पीती हूँ।''
''अच्छा, तो मेरी ऑंखों के सामने परीक्षा दो?''
''परीक्षा? अभी? अरे बाप रे! तब तो फिर जीने के लाले पड़ जाँयगे!''
यह कहकर वह जीने का कोई कारण न दिखाकर घर के किसी बहुत ही जरूरी काम का बहाना करके अदृश्य हो गयी है। मुझे क्रमश: मालूम हुआ कि वह मांस-मछली दूध-घी कुछ नहीं खाती, परन्तु यह न खाना ही उसके लिए इतना अशोभन और इतनी लज्जा की बात है कि इसका उल्लेख करते ही मारे शरम के उसे भागने को राह नहीं मिलती। इसी से साधारणत: खाने के बारे में उससे अनुरोध करने की मेरी प्रवृत्ति नहीं होती। जब रतन अपना मुरझाया-सा मुँह लेकर चला गया, तब भी मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद वह लोटे में गरम दूध और दोने में मिठाई वगैरह लेकर लौट आया, तब राजलक्ष्मी ने मेरे लिए दूध और कुछ खाने को रखकर बाकी का सब रतन के हाथ में दे दिया। तब भी मैंने कुछ न कहा और रतन की ऑंखों की नीरव प्रार्थना को स्पष्ट समझ जाने पर भी मैं उसी तरह चुप बना रहा।
अब तो कारण-अकारण और बात-बात में उसका न खाना ही मेरे लिए अभ्यस्त हो गया है। परन्तु एक दिन ऐसा था जब यह बात न थी। तब हँसी-दिल्लगी से लेकर कठोर कटाक्ष तक भी मैंने कम नहीं किये हैं। परन्तु, जितने दिन बीतते गये हैं, मुझे इसके दूसरे पहलू पर भी सोचने-समझाने का काफी अवसर मिला है। रतन के चले जाने पर मुझे वे ही सब बातें फिर याद आने लगीं।
कब और क्या सोचकर वह इस कृच्छ-साधना में प्रवृत्त हुई थी, मैं नहीं जानता। तब तक मैं इसके जीवन में नहीं आया था। परन्तु पहले-पहल जब वह जरूरत से ज्यादा भोजन-सामग्री के बीच में रहकर भी अपनी इच्छा से दिन पर दिन गुप्त रूप से चुपचाप अपने को वंचित करती हुई जी रही थी, तब वह कितना कठिन और कैसा दु:साध्यय कार्य था! कलुष और सब तरह की मलिनता के केन्द्र से अपने को इस तपस्या के मार्ग पर अग्रसर करते हुए उसने कितना न चुपचाप सहा होगा! आज यह बात उसके लिए इतनी सहज और इतनी स्वाभाविक है कि मेरी दृष्टि में भी उसकी कोई गुरुता, कोई विशेषता नहीं रह गयी है; इसका मूल्य क्या है, सो भी ठीक तौर से नहीं जानता, मगर फिर भी कभी-कभी मन में प्रश्न उठा है कि उसकी यह कठोर साधना क्या सबकी सब विफल हुई है, बिल्कुील ही व्यर्थ गयी है? अपने को वंचित रखने की यह जो शिक्षा है, यह जो अभ्यास है, यह जो पाकर त्याग देने की शक्ति है, अगर इस जीवन में उसके अलक्ष्य में न संचित हो पाती हो क्या आज वह ऐसी स्वच्छन्दता से, ऐसी सरलता के साथ अपने को सब प्रकार के भोगों से छुड़ाकर अलग कर सकती? कहीं से भी क्या कोई बन्धन उसे खींचता नहीं? उसने प्रेम किया है, ऐसे कितने ही आदमी प्रेम किया करते हैं, परन्तु सर्व-त्याग के द्वारा उसे प्रेम को ऐसा निष्पाप, ऐसा एकान्त बना लेना क्या संसार में इतना सुलभ है?
मुसाफिरखाने में और आदमी न था, रतन भी शायद आड़ में कहीं जगह ढूँढ़कर लेट गया था। देखा, एक टिमटिमाती हुई बत्ती के नीचे राजलक्ष्मी चुपचाप बैठी है। पास जाकर उसके माथे पर हाथ रखते ही उसने चौंककर मुँह उठाया, और पूछा, ''तुम सोये नहीं अभी?''
''नहीं, मगर तुम यहाँ धूल-मिट्टी में चुपचाप अकेली न बैठो, मेरे बिस्तर पर चलो।'' यह कहकर, और विरोध करने का अवसर बिना दिये ही मैंने हाथ पकड़कर उसे उठा लिया परन्तु अपने पास बिठा लेने पर फिर कहने को कोई बात ही ढूँढे नहीं मिली, सिर्फ आहिस्ते-आहिस्ते उसके हाथ पर हाथ फेरने लगा। कुछ क्षण इसी तरह बीते। सहसा उसकी ऑंखों के कोनों पर हाथ पड़ते ही अनुभव किया कि मेरा सन्देह बेबुनियाद नहीं है। धीरे-धीरे ऑंसू पोंछकर मैंने ज्यों ही उसे अपने पास खींचने की कोशिश की त्यों ही वह मेरे फैले हुए पैरों पर औंधी पड़ गयी और जोर से उन्हें दबाये रही। किसी भी तरह मैं उसे अपने बिल्कुरल पास न ला सका।
फिर उसी तरह सन्नाटे में समय बीतने लगा। सहसा मैं बोल उठा, ''एक बात तुम्हें अब तक नहीं जताई लक्ष्मी।''
उसने चुपके से कहा, ''कौन-सी बात?''
इतना ही कहने में संस्कारवश पहले तो जरा संकोच हुआ, मगर मैं रुका नहीं, बोला, ''मैंने आज से अपने को बिल्कुरल तुम्हारे ही हाथ सौंप दिया है, अब भलाई-बुराई का सारा भार तुम्हीं पर है।''
यह कहकर मैंने उसके मुख की ओर देखा कि उस टिमटिमाते हुए उजाले में वह मेरे मुँह की ओर चुपचाप एकटक देख रही है। उसके बाद जरा हँसकर बोली, ''तुम्हें लेकर मैं क्या करूँगी? तुम न तो तबला ही बजा सकते हो, न सारंगी ही बजा सकोगे और...''
मैंने कहा, '' 'और' क्या? पान-तम्बाकू हाज़िर करना? नहीं, यह काम तो मुझसे हरगिज़ नहीं हो सकता।''
''लेकिन पहले के दो काम?''
मैंने कहा, ''आशा दो तो शायद कर भी सकूँ।'' कहकर मैंने भी जरा हँस दिया।
सहसा राजलक्ष्मी उत्साह से बैठी और बोली, ''मज़ाक नहीं, सचमुच बजा सकते हो?''
मैंने कहा, ''आशा करने में दोष क्या है?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं बजा सकते।'' उसके बाद नीरव विस्मय से कुछ देर तक वह मेरी ओर एकटक देखती रही, फिर धीरे-धीरे कहने लगी, ''देखो, बीच-बीच में मुझे भी ऐसा ही मालूम होता है; परन्तु, फिर सोचती हूँ कि जो आदमी निष्ठुरों की तरह बन्दूक लेकर सिर्फ जानवारों को मारते फिरना ही पसन्द करता है, वह इसकी क्या परवाह करनेवाला है? इसके भीतर की इतनी बड़ी वेदना का अनुभव करना क्या उसके लिए साध्य् हो सकता है? बल्कि शिकार करने के समान चोट पहुँचा सकने में ही मानो उस आनन्द मिलता है? तुम्हारा दिया हुआ बहुत-सा दु:ख मैं यही सोचकर तो सह सकी हूँ।''
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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:25

अब चुप रहने की मेरी पारी आई। उसके लगाये हुए अभियोग के मूल में युक्तियों द्वारा न्याय-विचार भी चल सकता था, सफाई देने के लिए नज़ीरों की भी शायद कमी नहीं पड़ती, परन्तु यह सब विडम्बना-सी मालूम हुई। उसकी सच्ची, अनुभूति के आगे मुझे मन-ही-मन हार माननी पड़ी। अपनी बात को वह ठीक तरह से कह भी नहीं सकी, परन्तु संगीत की जो अन्तरतम मूर्ति सिर्फ व्यथा के भीतर से ही कदाचित् आत्म-प्रकाश करती है, वह करुणा से अभिषिक्त सदा जाग्रत चेतना ही मानो राजलक्ष्मी के इन दो शब्दों के इंगित में रूप धारण करके सामने दिखाई दी। और उसके संयम ने, उसके त्याग ने, उसके हृदय की शुचिता ने फिर एक बार मानो मेरी ऑंखों में अंगुली देकर उसी का स्मरण करा दिया।
फिर भी, एक बात उससे कह सकता था। कह सकता था कि मनुष्य की परस्पर सर्वथा-विरुद्ध प्रवृत्तियाँ किस तरह एक साथ पास-ही-पास बैठी रहती हैं, यह एक अचिन्तनीय रहस्य है। नहीं तो मैं अपने हाथ से जीव-हत्या कर सकता हूँ, इतना बड़ा परमाश्चर्य मेरे ही लिए और क्या हो सकता है? जो एक चींटी तक की मृत्यु को नहीं सह सकता, खून से लथ-पथ बलि के यूप-काष्ठ की सूरत ही कुछ दिनों के लिए जिसका खाना-पीना-सोना छुड़ा देती है, जिसने मुहल्ले के अनाथ आश्रयहीन कुत्ते-बिल्लियों के लिए भी बचपन में कितने ही दिन चुपचाप उपवास किये हैं उसका जंगल के पुश-पक्षियों पर कैसे निशाना ठीक बैठता है, यह तो खुद मेरी समझ में नहीं आता। और क्या ऐसा सिर्फ मैं ही अकेला हूँ? जिस राजलक्ष्मी का अन्तर-बाहर मेरे लिए आज प्रकाश की तरह स्वच्छ हो गया है वह भी इतने दिनों तक साल पर साल किस तरह 'प्यारी' का जीवन बिता सकी!
मन में आने पर भी मैं यह बात मुँह से न निकाल सका। सिर्फ उसे बाधा न देने की गरज़ ही नहीं, बल्कि सोचा, ''क्या होगा कहने से? देव और दानव दोनों कन्धे मिलाकर मनुष्य को कहाँ और किस जगह लगातार ढोये लिये जा रहे हैं, इसे कौन जानता है? किस तरह भोगी एक ही दिन में त्यागी होकर निकल पड़ता है, निर्मम निष्ठुर एक क्षण में करुणा से विगलित होकर अपने को नि:शेष कर डालता है, इस रहस्य का हमने कितना-सा संधान पाया है? किस निभृत कन्दरा में मानवात्मा की गुप्त साधना अकस्मात् एक दिन सिद्धि के रूप में प्रस्फुटित हो उठती है, उसकी हम क्या खबर रखते हैं? क्षीण प्रकाश में राजलक्ष्मी के मुँह की ओर देखकर उसी को लक्ष्य करके मैंने मन-ही-मन कहा, ''यह अगर मेरी सिर्फ व्यथा पहुँचाने की शक्ति को ही देख सकी हो, व्यथा ग्रहण करने की अक्षमता को स्नेह के कारण अब तक क्षमा करती चली आई हो, तो इसमें मेरे रूठने की ऐसी कौन-सी बात है?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''चुप क्यों रह गये?''
मैंने कहा, ''फिर भी तो इस निष्ठुर के लिए ही तुमने सब कुछ त्याग दिया!''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''सब कुछ क्या त्यागा! अपने को तो तुमने नि:सत्व होकर ही आज मुझे दे दिया, उसे तो मैं 'नहीं चाहिए' कहकर त्याग न सकी!''
मैंने कहा, ''हाँ, नि:सत्व होकर ही दिया है। मगर तुम तो अपने आपको देख नहीं सकोगी इसलिए, वह उल्लेख मैं न करूँगा!''
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पश्चिम के शहर में प्रवेश करने के पहले ही समझ में आ गया कि बंगाल के मलेरिया ने मुझे खूब ही मज़बूती के साथ पकड़ लिया है। पटना स्टेशन से राजलक्ष्मी के घर तक मैं लगभग बेहोशी की हालत में लाया गया। इसके बाद के महिने में भी मुझे ज्वर, डॉक्टर और राजलक्ष्मी लगभग हर वक्त ही घेरे रहे।
जब बुखार छूट गया तब डॉक्टर साहब ने घर-मालकिन को साफ तौर से समझा दिया कि यद्यपि यह शहर पश्चिम-प्रदेश में ही शामिल है और स्वास्थ्यप्रद स्थान के रूप में इसकी प्रसिद्धि है, फिर भी मेरी सलाह है कि रोगी को जल्दी ही स्थानान्तरित करना चाहिए।
फिर बाँध-बूँधी शुरू हो गयी, मगर अबकी बार जरा धूम-धाम के साथ। रतन को अकेला पाकर मैंने पूछा, ''अबकी बार कहाँ जाना होगा, रतन?''
देखा कि वह इस नवीन यात्रा के बिल्कुलल ही खिलाफ है। उसने खुले दरवाजे की तरफ निगाह रखते हुए आभास और इशारे से फुस-फुस करके जो कुछ कहा, उससे मेरा भी जैसे कलेजा-सा बैठ गया। रतन ने कहा, ''वीरभूम जिले में एक छोटा-सा गाँव है गंगामाटी। जब इस गाँव का पट्टा लिया था तब मैं सिर्फ एक मुख्तार साहब किसनलाल के साथ वहाँ गया था। माँ जी खुद वहाँ कभी नहीं गयीं। यदि कभी जाँयगी तो उन्हें भाग आने की राह भी ढूँढे न मिलेगी। समझ लीजिए कि गाँव में भले घर हैं ही नहीं-सिर्फ छोटी जातिवालों के ही घर हैं। उन्हें न तो छुआ ही जा सकता है और न वे किसी काम आ सकते हैं।''
राजलक्ष्मी क्यों इन सब छोटी जातों में जाकर रहना चाहती है, इसका कारण मानो मेरी समझ में कुछ आ गया। मैंने पूछा, ''गंगामाटी है कहाँ?''
रतन ने जताया, ''साँइथिया या ऐसी ही किसी स्टेशन से करीब दस-बारह कोस बैलगाड़ी में जाना पड़ता है। रास्ता जितना कठिन है उतना ही भयंकर। चारों तरफ मैदान ही मैदान है। उसमें न तो कहीं फसल ही होती है और न कहीं एक बूँद पानी है। कँकरीली मिट्टी है, कहीं गेरुआ और कहीं जली-हुई-सी स्याह काली।'' यह कहकर वह जरा रुका, और खास तौर से मुझे ही लक्ष्य करके फिर कहने लगा, ''बाबूजी, मेरी तो कुछ समझ ही में नहीं आता कि आदमी वहाँ किस सुख के लिए रहते हैं। और जो ऐसी सोने की सी जगह छोड़कर वहाँ जाते हैं, उनसे मैं और क्या कहूँ।''
भीतर-ही-भीतर एक लम्बी साँस लेकर मैं मौन हो रहा। ऐसी सोने की-सी जगह छोड़कर क्यों उस मरु-भूमि के बीच निर्बान्धव नीच आदमियों के देश में राजलक्ष्मी मुझे लिये जा रही है, सो न तो उससे कहा जा सकता है और न समझाया ही जा सकता है।
आखिर मैंने कहा, ''शायद मेरी बीमारी की वजह से ही जाना पड़ रहा है, रतन। यहाँ रहने से आराम होने की कम आशा है, सभी डॉक्टर यही डर दिखा रहे हैं।''
रतन ने कहा, ''लेकिन बीमारी क्या यहाँ और किसी को होती ही नहीं बाबूजी? आराम होने के लिए क्या उन सबको उस गंगामाटी में ही जाना पड़ता है?''
मन-ही-मन कहा, ''मालूम नहीं, उन सबको किस माटी में जाना पड़ता है। हो सकता है कि उनकी बीमारी सीधी हो, हो सकता है कि उन्हें साधारण मिट्टी में ही आराम पड़ जाता हो। मगर हम लोगों की व्याधि सीधी भी नहीं है और साधारण भी नहीं; इसके लिए शायद उसी गंगामाटी की ही सख्त जरूरत है।''
रतन कहने लगा, ''माँजी के खर्च का हिसाब-किताब भी तो हमारी किसी की समझ में नहीं आता। वहाँ न तो घर-द्वार ही है, न और कुछ। एक गुमाश्ता है, उसके पास दो हज़ार रुपये भेजे गये हैं एक मिट्टी का मकान बनाने के लिए! देखिए तो सही बाबूजी, ये सब कैसे ऊँटपटाँग काम हैं! नौकर हैं, सो हम लोग जैसे कोई आदमी ही नहीं हैं!''
उसके क्षोभ और नाराजगी को देखते हुए मैंने कहा, ''तुम वहाँ न जाओ तो क्या है रतन? जबरदस्ती तो तुम्हें कोई कहीं ले नहीं जा सकता?''
मेरी बात से रतन को कोई सान्त्वना नहीं मिली। बोला, ''माँजी ले जा सकती हैं। क्या जाने क्या जादू-मन्त्र जानती हैं वे! अगर कहें कि तुम लोगों को यमराज के घर जाना होगा, तो इतने आदमियों में किसी की हिम्मत नहीं कि कह दे, 'ना!'' यह कहकर वह मुँह भारी करके चला गया।
बात तो रतन गुस्से से ही कह गया था, पर वह मुझे मानो अकस्मात् एक नये तथ्य का संवाद दे गया। सिर्फ मेरी ही नहीं सभी की यह एक ही दशा है। उस जादू-मंत्र की बात ही सोचने लगा। मन्त्र-तन्त्र पर सचमुच ही मेरा विश्वास है सो बात नहीं, परन्तु घर-भर के लोगों में किसी में भी जो इतनी-सी शक्ति नहीं कि यमराज के घर जाने की आज्ञा तक की उपेक्षा कर सके, सो वह आखिर है कौन चीज़!
इसके समस्त सम्बन्धों से अपने को विच्छिन्न करने के लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया! लड़-झगड़कर चल दिया हूँ, सन्यासी होकर भी देख लिया, यहाँ तक कि देश छोड़कर बहुत दूर चला गया हूँ जिससे फिर कभी मुलाकात ही न हो, परन्तु मेरी समस्त चेष्टाएँ किसी गोल चीज पर सीधी लकीर खींचने के समान बारम्बार केवल व्यर्थ ही हुई हैं। अपने को हजार बार धिक्कारने पर भी अपनी कमजोरी के आगे आखिर मैं पराजित ही हुआ हूँ, और इसी बात का खयाल करके अन्त में जब मैंने आत्म-समर्पण कर दिया तब रतन ने आकर आज मुझे इस बात की खबर दी, ''राजलक्ष्मी जादू-मन्त्र जानती है!''
बात ठीक है। लेकिन इसी रतन से अगर जिरह करके पूछा जाय तो मालूम होगा कि वह खुद भी इस बात पर विश्वास नहीं करता।
सहसा देखा कि राजलक्ष्मी एक पत्थर की प्याली में कुछ लिये हुए व्यस्त भाव से इधर ही से नीचे जा रही है। मैंने बुलाकर कहा, ''सुनो तो, सभी कहते हैं कि तुम जादू-मन्त्र जानती हो!''
वह चौंककर खड़ी हो गयी और बोली, ''क्या जानती हूँ?''
मैंने कहा, ''जादू-मन्त्र!''
राजलक्ष्मी ने मुँह बिचकाकर जरा मुस्कराते हुए कहा, ''हाँ, जानती हूँ।''
यह कहकर वह चली जा रही थी, सहसा मेरे कुरते को गौर से देखकर उद्विग्न कण्ठ से पूछ उठी, ''यह क्या? कल का वही बासी कुरता पहने हुए हो क्या?''
अपनी तरफ देखकर मैंने कहा, ''हाँ, वही है। मगर रहने दो, खूब उजला है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''उजले की बात नहीं, मैं सफाई की बात कह रही हूँ।'' इसके बाद फिर जरा मुस्कराकर कहा, ''तुम बाहर के इस दिखावटी उजलेपन में ही हमेशा गर्क रहे! इसकी उपेक्षा करने को मैं नहीं कहती, मगर भीतर पसीने से गन्दगी बढ़ जाती है, इस बात पर गौर करना कब सीखोगे?'' इतना कहकर उसने रतन को आवाज दी। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। कारण, मालकिन की इस तरह की ऊँची-मीठी आवाज का जवाब देना इस घर का नियम नहीं, बल्कि चार-छह मिनट के लिए मुँह छिपा जाना ही नियम है।
आखिर राजलक्ष्मी ने हाथ की चीज नीचे रखकर बगल के कमरे में से एक धुला हुआ कुरता लाकर मेरे हाथ में दिया और कहा, ''अपने मन्त्री रतन से कहना, जब तक उसने जादू-मन्त्र नहीं सीख लिया है, तब तक इन सब जरूरी कामों को वह अपने हाथों से ही किया करे।'' यह कहकर वह प्याली उठाकर नीचे चली गयी।
कुरता बदलते वक्त देखा कि उसका भीतरी हिस्सा सचमुच ही गन्दा हो गया है। होना ही चाहिए था, और मैंने भी इसके सिवा और कुछ उम्मीद की हो, सो भी नहीं। मगर मेरा मन तो था सोचने की तरफ, इसी से इस अतितुच्छ चोले के भीतर-बाहर के वैसे दृश्य ने ही फिर मुझे नयी चोट पहुँचाई।
राजलक्ष्मी की यह शुचिता की सनक बहुधा हम लोगों को निरर्थक, दु:खदायक और यहाँ तक कि 'अत्याचार' भी मालूम हुई है; और अभी एक ही क्षण में उसका सब कुछ मन से धुल-पुछ गया हो, सो भी सत्य नहीं; परन्तु, इस अन्तिम श्लेष में जिस वस्तु को मैंने आज तक मन लगाकर नहीं देखा था, उसी को देखा। जहाँ से इस अद्भुत मानवीकी व्यक्त और व्यक्त जीवन की धाराएँ दो बिल्कुचल प्रतिकूल गतियों में बहती चली आ रही हैं, आज मेरी निगाह ठीक उसी स्थान पर जाकर पड़ी। एक दिन अत्यन्त आश्चर्य में डूबकर सोचा था कि बचपन में राजलक्ष्मी ने जिसे प्यार किया था उसी को प्यारी ने अपने उन्माद-यौवन की किसी अतृप्त लालसा के कीचड़ से इस तरह बहुत ही आसानी से सहस्र दल-विकसित कमल की भाँति पलक मारते ही बाहर निकाल दिया! आज मालूम हुआ कि वह प्यारी नहीं है, वह राजलक्ष्मी ही है। 'राजलक्ष्मी' और 'प्यारी' इन दो नामों के भीतर उसके नारी-जीवन का कितना बड़ा इंगित छिपा था, मैंने उसे देखकर भी नहीं देखा; इसी से कभी-कभी संशय में पड़कर सोचा है कि एक के अन्दर दूसरा आदमी अब तक कैसे जिन्दा था! परन्तु, मनुष्य तो ऐसा ही है! इसी से तो वह मनुष्य है!
प्यारी का सारा इतिहास मुझे मालूम नहीं, मालूम करने की इच्छा भी नहीं। और राजलक्ष्मी का ही सारा इतिहास जानता होऊँ, सो भी नहीं; सिर्फ इतना ही जानता हूँ कि इन दोनों के मर्म और कर्म में न कभी किसी दिन कोई मेल था और न सामंजस्य ही। हमेशा ही दोनों परस्पर उलटे स्रोत में बहती गयी हैं। इसी से एक की निभृत सरसी में जब शुद्ध सुन्दर प्रेम का कमल धीरे-धीरे लगातार दल पर दल फैलाता गया है तब दूसरी के दुर्दान्त जीवन का तूफान वहाँ व्याघात तो क्या करेगा, उसे प्रवेश का मार्ग तक नहीं मिला! इसी से तो उसकी एक पंखुड़ी तक नहीं झड़ी है, जरा-सी धूल तक उड़कर आज तक उसे स्पर्श नहीं कर सकी है।
शीत-ऋतु की संध्यार जल्दी ही घनी हो आई, मगर मैं वहीं बैठा सोचता रहा। मन-ही-मन बोला, ''मनुष्य सिर्फ उसकी देह ही तो नहीं है! प्यारी नहीं रही, वह मर गयी। परन्तु, किसी दिन अगर उसने अपनी उस देह पर कुछ स्याही लगा भी ली हो तो क्या सिर्फ उसी को बड़ा करके देखता रहूँ, और राजलक्ष्मी जो अपने सहस्र-कोटि दु:खों की अग्नि-परीक्षा पार करके आज अपनी अकलंक शुभ्रता में सामने आकर खड़ी हुई है उसे मुँह फेरकर बिदा कर दूँ? मनुष्य में जो पशु है, सिर्फ उसी के अन्याय से और उसी की भूल-भ्रान्ति से-मनुष्य का विचार करूँ? और जिस देवता ने समस्त दु:ख, सम्पूर्ण व्यथा और समस्त अपमानों को चुपचाप सहन और वहन करके भी आज सस्मित मुख से आत्म-प्रकाश किया है, उसे बिठाने के लिए कहीं आसन भी न बिछाऊँ? यह क्या मनुष्य के प्रति सच्चा न्याय होगा?' मेरा मन मानो आज अपनी सम्पूर्ण शक्ति से कहने लगा, ''नहीं-नहीं, हरगिज नहीं, यह कदापि नहीं होगा, ऐसा तो हो ही नहीं सकता।'' वह कोई ज्यादा दिन की बात नहीं जब अपने को दुर्बल, श्रान्त और पराजित सोचकर राजलक्ष्मी के हाथ अपने को सौंप दिया था, किन्तु, उस दिन उस पराभूत के आत्म-त्याग में एक बड़ी जबरदस्त दीनता थी। तब मेरा वही मन मानो किसी भी तरह अनुमोदन नहीं कर रहा था; परन्तु आज मेरा मन मानो सहसा जोर के साथ इसी बात को बार-बार कहने लगा, ''वह दान दान ही नहीं, वह धोखा है। जिस प्यारी को तुम जानते न थे उसे जानने के बाहर ही पड़ी रहने दो; परन्तु, जो राजलक्ष्मी एक दिन तुम्हारी ही थी, आज उसी को तुम सम्पूर्ण चित्त से ग्रहण करो। और जिनके हाथ से संसार की सम्पूर्ण सार्थकता निरन्तर झड़ रही है, इसकी भी अन्तिम सार्थकता उन्हीं के हाथ सौंपकर निश्चिन्त हो जाओ।''
नया नौकर बत्ती ला रहा था, उसे बिदा करके मैं अंधेरे में ही बैठा रहा और मन-ही-मन बोला, ''आज राजलक्ष्मी को सारी भलाइयों और सारी बुराइयों के साथ स्वीकार करता हूँ। इतना ही मैं कर सकता हूँ, सिर्फ इतना ही मेरे हाथ में है। मगर, इसके अतिरिक्त और भी जिनके हाथ में है, उन्हीं को उस अतिरिक्त के बोझे को सौंपता हूँ।'' इतना कहकर मैं उसी अन्धकार में खाट के सिरहाने चुपचाप अपना सिर रखकर पड़ रहा।
पहले दिन की तरह दूसरे दिन भी यथा-रीति तैयारियाँ होने लगीं, और उसके बाद तीसरे दिन भी दिन-भर उद्यम की सीमा न रही। उस दिन दोपहर को एक बड़े भारी सन्दूक में थाली, लोटे-गिलास, कटोरे-कटोरियाँ और दीवट आदि भरे जा रहे थे। मैं अपने कमरे में से ही सब देख रहा था। मौका पाकर मैंने राजलक्ष्मी को इशारे से अपने पास बुलाकर पूछा, ''यह सब हो क्या रहा है? तुम क्या अब वहाँ से वापस नहीं आना चाहतीं, या क्या?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''वापस कहाँ आऊँगी?''
मुझे याद आया, यह मकान उसने बंकू को दान कर दिया है। मैंने कहा, ''मगर, मान लो कि वह जगह तुम्हें ज्यादा दिन अच्छी न लगे तो?''
राजलक्ष्मी ने जरा मुस्कराते हुए कहा, ''मेरे लिए मन खराब करने की जरूरत नहीं। तुम्हें अच्छा न लगे, तो तुम चले आना, मैं बाधा न डालूँगी।''
उसके कहने के ढंग से मुझे चोट पहुँची, मैं चुप हो रहा। यह मैंने बहुत बार देखा है कि वह मेरे इस ढंग के किसी भी प्रश्न को मानो सरल चित्त से ग्रहण नहीं कर सकती। मैं किसी को निष्कपट होकर प्यार कर सकता हूँ, या उसके साथ स्थिर होकर रह सकता हूँ, यह बात किसी भी तरह मानो उसके मन में समाकर एक होना नहीं चाहती। सन्देह के आलोड़न में अविश्वास एक क्षण में ही ऐसा उग्र होकर निकल पड़ता है कि उसकी ज्वाला दोनों ही के मन में बहुत देर तक लप-लप लपटें लिया करती है। अविश्वास की यह आग कब बुझेगी। सोचते-सोचते मुझे इसका कहीं ओर-छोर ही नहीं मिलता। वह भी इसी की खोज में निरन्तर घूम रही है। और, गंगामाटी भी इस बात का अन्तिम फैसला कर देगी या नहीं, यह तथ्य जिनके हाथ में है वे ऑंखों के ओझल चुप्पी साधे बैठे हैं।
सब तरह की तैयारियाँ होते-होते और भी तीन-चार दिन बीत गये; उसके बाद और भी दो एक दिन गये शुभ साइत की प्रतीक्षा में। अन्त में, एक दिन सबेरे हम लोग अपरिचित गंगामाटी के लिए सचमुच ही घर से बाहर निकल पड़े। यात्रा में कुछ अच्छा नहीं लगा, मन में जरा भी खुशी नहीं थी। और, सबसे बुरी बीती शायद रतन पर। वह मुँह को अत्यन्त भारी बनाकर गाड़ी के एक कोने में चुपचाप बैठा ही रहा, स्टेशन पर स्टेशन गुजरते गये, पर उसने किसी भी काम में ज़रा भी सहायता नहीं की। मगर, मैं सोच रहा था, बिल्कु्ल ही दूसरी बात। जगह जानी हुई है या अनजानी, अच्छी है या बुरी, स्वास्थ्यकर है या मलेरिया से भरी, इन बातों की तरफ मेरा ध्याहन ही न था। मैं सोच रहा था; यद्यपि अब तक मेरा जीवन निरुपद्रव नहीं बीता; उसमें बहुत-सी गलतियाँ बहुत-सी भूलें-चूकें, बहुत-सा दु:ख-दैन्य रहा है, फिर भी, वे सब मेरे लिए अत्यन्त परिचित हैं। इस लम्बे अरसे में उनसे मेरा मुकाबिला तो हुआ ही है, साथ ही एक तरह का स्नेहा सा पैदा हो गया है। उनके लिए मैं किसी को भी दोष नहीं देता, और अब मुझे भी और कोई दोष देकर अपना समय नष्ट नहीं करता। परन्तु, यह जीवन क्या जाने कहाँ को किस नवीनता की ओर निश्चित रूप से चला जा रहा है और इस निश्चितता ने ही मुझे विकल कर दिया है। 'आज नहीं कल' कहकर और देर करने का भी रास्ता नहीं। और मज़ा यह कि न तो मैं इसकी भलाई को जानता हूँ और न बुराई को। इसी से इसकी भलाई-बुराई कुछ भी, किसी हालत में, अब मुझे अच्छी नहीं लगती। गाड़ी ज्यों-ज्यों तेजी के साथ गन्तव्य स्थान के निकट पहुँचती जाती है, त्यों-त्यों इस अज्ञात रहस्य का बोझ मेरी छाती पर पत्थर-सा भारी होकर मज़बूती से बैठता जाता है। कितनी-कितनी बातें मन में आने लगीं, उनकी कोई हद नहीं। मालूम हुआ, निकट भविष्य में ही शायद मुझको ही केन्द्र बनाकर एक भद्दा दल संगठित हो उठेगा। उसे न तो ग्रहण कर सकूँगा और न अलग फेंक सकूँगा। तब क्या होगा और क्या न होगा, इस बात को सोचने में भी मेरा मन मानो जमकर बरफ हो गया।
मुँह उठाकर देखा, तो राजलक्ष्मी चुपचाप बैठी खिड़की के बाहर देख रही है। सहसा मालूम हुआ कि मैंने कभी किसी दिन इससे प्रेम नहीं किया। फिर भी इसे ही मुझे प्रेम करना पडेग़ा। कहीं किसी तरफ से भी निकल भागने का रास्ता नहीं है। संसार में इतनी बड़ी विडम्बना क्या कभी किसी के भाग्य में घटित हुई है? और मज़ा यह कि एक ही दिन पहले इस दुविधा की चक्की से अपनी रक्षा करने के लिए अपने को सम्पूर्ण रूप से उसी के हाथ सौंप दिया था। तब मन-ही-मन जोर के साथ कहा था कि तुम्हारी सभी भलाई-बुराइयों के साथ ही तुम्हें अंगीकार करता हूँ लक्ष्मी! और आज, मेरा मन ऐसा विक्षिप्त और ऐसा विद्रोही हो उठा। उसी से सोचता हूँ, संसार में 'करूँगा' कहने में और सचमुच के करने में कितना बड़ा अन्तर है!
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साँइथिया स्टेशन पर जब गाड़ी पहुँची तब दिन ढल रहा था। राजलक्ष्मी के गुमाश्ता काशीराम स्वयं स्टेशन पर नहीं आ सके, वे उधर के इन्तज़ाम में लगे हुए हैं। मगर दो आदमियों को उन्होंने चिट्ठी लिखकर भेज दिया है। उनके रुक्के से मालूम हुआ कि ईश्वर की इच्छा से 'अब', अर्थात् उनके घर में और उनकी गंगामाटी में सब तरह से कुशल है। आज्ञानुसार स्टेशन के बाहर चार बैलगाड़ियाँ तैयार खड़ी मिलेंगी जिनमें से दो तो खुली हुई हैं और दो छाई हुई। एक पर बहुत-सा सूखा घास और खजूर की पत्तियों की चटाई बिछा दी गयी है और वह स्वयं मालकिन साहबा के लिए है। दूसरी में मामूली थोड़ा-सा घास डाल दिया गया है, पर चटाई नहीं है वह नौकर-चाकर आदि अनुचरों के लिए है। खुली हुई दो गाड़ियों पर असबाब लादा जायेगा। और 'यद्यपि स्यात्' स्थानाभाव हो, तो पियादों को हुक्म देते ही वे बाजार से और भी एक गाड़ी लाकर हाज़िर कर देंगे। उन्होंने और भी लिखा है कि भोजनादि सम्पन्न करके संध्याब से पूर्व ही रवाना हो जाना वांछनीय है। अन्यथा मालकिन साहबा की सुनिद्रा में व्याघात हो सकता है। और इस विषय में विशेष लिखा है कि मार्ग में भयादि कुछ नहीं है, आनन्द से सोती हुई आ सकती हैं।
मालकिन साहबा रुक्का पढ़कर कुछ मुसकराईं। जिसने उसे दिया उससे भयादि के विषय में कोई प्रश्न न करके उन्होंने पूछा, ''क्यों भाई, आसपास में कोई तलाव-अलाव बता सकते हो? एक डुबकी लगा आती।''
''है क्यों नहीं, माँ जी। वह रहा वहाँ...''
''तो चलो भइया, दिखा दो'' कहती हुई वह उस आदमी को और रतन को साथ लेकर न जाने कहाँ की एक अनजान तलैया में स्नानादि करने चली गयी। बीमारी आदि का भय दिखाना निरर्थक समझकर मैंने प्रतिवाद भी नहीं किया। ख़ासकर इसलिए कि अगर वह कुछ खा-पी लेना चाहती हो, तो इससे वह भी आज के लिए बन्द हो जायेगा।
लेकिन, आज वह दसेक मिनट में ही लौट आई। बैलगाड़ी पर असबाब लद रहा है और मामूली-सा एक बिस्तर खोलकर सवारी वाली गाड़ी में बिछा दिया गया है। मुझसे उसने कहा, ''तुम क्यों नहीं इसी वक्त कुछ खा-पी लेते? सभी कुछ तो आ गया है।''
मैंने कहा, ''दो!''
पेड़ के नीचे आसन बिछाकर एक केले के पत्ते पर मेरे लिए वह खाना परोस रही थी और मैं निस्पृह दृष्टि से सिर्फ उसकी ओर देख रहा था। इतने में एक मूर्ति ने आकर और सामने खड़े होकर कहा, ''नारायण!''
राजलक्ष्मी ने अपने भीगे बालों पर बायें हाथ से धोती का पल्ला खींचते हुए मुँह उठाकर ऊपर देखा और कहा, ''आइए।''
अकस्मात् यह नि:संकोच निमन्त्रण का शब्द सुनकर मुँह उठाकर देखा, तो, एक साधु खड़ा है। बहुत ही आश्चर्य हुआ। उसकी उमर ज्यादा नहीं थी, वह शायद बीस-बाईस के भीतर ही होगा, मगर देखने में जैसा सुकुमार वैसा ही सुन्दर! चेहरा कृशता की ओर ही जा रहा है, शायद कुछ लम्बा होने के कारण ही ऐसा मालूम हुआ, मगर रंग तपे-सोने जैसा। ऑंखें, भौहें, चेहरा और ललाट की बनावट निर्दोष। वास्तव में, पुरुष का इतना रूप मैंने कभी देखा हो, ऐसा नहीं मालूम हुआ। उसका गेरुआ परिधान-वस्त्र जगह-जगह फटा हुआ है, गाँठें बँधी हुई हैं। बदन पर गेरुआ ढीला कुरता है, उसकी भी यही दशा है; पैरों में पंजाबी जूता है, उसकी हालत भी वैसी ही है। खो जाने पर उसके लिए अफसोस करने की जरूरत नहीं। राजलक्ष्मी ने ज़मीन से सिर टेककर प्रणाम करके आसन बिछा दिया। फिर मुँह उठाकर कहा, ''मैं जब तक भोजन परोसने की तैयारी करूँ, तब तक आपको मुँह-हाथ धोने के लिए जल दिया जाय।''
साधु ने कहा, ''हाँ हाँ, लेकिन आपके पास मैं दूसरे ही काम के लिए आया था।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''अच्छी बात है, आप भोजन करने बैठिए, और बातें पीछे होंगी। पर लौटने के लिए टिकट ही चाहिए न? सो मैं खरीद दूँगी।'' इतना कहकर उसने मुँह फेरकर अपनी हँसी छिपा ली।
साधुजी ने गम्भीरता के साथ जवाब दिया, ''नहीं, उसकी जरूरत नहीं। मुझे खबर मिली है कि आप लोग गंगामाटी जा रहे हैं। मेरे साथ एक भारी बॉक्स है, उसे अगर आप अपनी गाड़ी में ले चलें तो अच्छा हो। मैं भी उसी तरफ जा रहा हूँ।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इसमें कौन-सी बड़ी बात है; मगर आप खुद?''
''मैं पैदल ही जा सकता हूँ। ज्यादा दूर नहीं, छै-सात कोस ही तो होगा।''
राजलक्ष्मी ने और कुछ न कहकर रतन को बुला के जल देने के लिए कहा और खुद ढंग के साथ अच्छी तरह साधुजी के लिए भोजन परोसने में लग गयी। यह राजलक्ष्मी की खास अपनी चीज है, इस काम में उसका सानी मिलना मुश्किल है।
साधु महाराज खाने बैठे, मैं भी बैठ गया। राजलक्ष्मी मिठाई के बर्तन लिये पास ही बैठी रही। दो ही मिनट बाद राजलक्ष्मी ने धीरे-से पूछा, ''साधुजी, आपका नाम?''
साधु ने खाते खाते कहा, ''वज्रानन्द।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''बाप रे बाप! और पुकारने का नाम?''
उसके कहने के ढंग से मैंने उसकी तरफ देखा तो उसका सारा चेहरा दबी हुई मुस्कराहट से चमक उठा था, मगर वह हँसी नहीं। मैंने भोजन करने में मन लगाया। साधुजी ने कहा, ''उस नाम के साथ तो अब कोई सम्बन्ध नहीं रहा। न अपना रहा और न दूसरों का।''
राजलक्ष्मी ने सहज ही हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ''हाँ, सो तो ठीक है।'' परन्तु क्षण-भर बाद वह फिर पूछ बैठी, ''अच्छा साधुजी, आपको घर से भागे कितने दिन हुए?''
प्रश्न बहुत ही अभद्र था। मैंने निगाह उठाकर देखा, राजलक्ष्मी के चेहरे पर हँसी तो नहीं है, पर जिस प्यारी के चेहरे को मैं भूल गया था, इस समय राजलक्ष्मी की तरफ देखकर निमेष-मात्र में वही चेहरा मुझे याद आ गया। उन पुराने दिनों की सारी सरसता उसकी ऑंखों, मुँह और कण्ठ-स्वर में मानो सजीव होकर लौट आई है।
साधु ने एक कौर नीचे उतारकर कहा, ''आपका यह कुतूहल ही अनावश्यक है।''
राजलक्ष्मी जरा भी क्षुण्ण नहीं हुई, भले मानसों की तरह सिर हिलाकर बोली, ''सो तो सच है। लेकिन, एक बार मुझे बहुत भुगतना पड़ा था, इसी से...'' कहते हुए उसने मेरी ओर लक्ष्य करके कहा, ''हाँ जी, तुम अपना वह ऊँट और टट्टू का किस्सा तो सुनाना! साधुजी को जरा सुना तो दो, अरे रे, भगवान भरोसा! घर में शायद कोई याद कर रहा है।''
साधुजी के गले में, शायद हँसी रोकने में ही, फन्दा लग गया। अब तक मेरे साथ उनकी एक भी बात नहीं हुई थी, मालकिन महोदय की ओट में मैं कुछ-कुछ अनुचर-सा ही बना बैठा था। अब साधुजी ने फन्दे को सँभालते हुए यथासाध्या गम्भीरता के साथ मुझसे पूछा, ''तो आप भी शायद एक बार सन्यासी...''
मेरे मुँह में पूड़ी थी, ज्यादा बात करने की गुंजाइश न थी, इसलिए दाहिने हाथ की चार उँगलियाँ उठाकर गरदन हिलाते हुए मैंने कहा, ''उँहूँ...एक बार नहीं, एक बार नहीं...''
अब तो साधुजी की गम्भीरता न टिक सकी, वे और राजलक्ष्मी दोनों खिल-खिलाकर हँस पड़े। हँसी थमने पर साधुजी ने कहा, ''लौट क्यों आये?''
मैं अब तक पूड़ी का कौर लील न सका था, सिर्फ इशारे से राजलक्ष्मी को दिखा दिया।
राजलक्ष्मी ने मुझे डाँट-सा दिया, कहा, ''हाँ, सो तो ठीक है! अच्छा, एक बार मान लिया मेरे लिए ही, सो भी ठीक सच नहीं है, असल में जबरदस्त बीमारी की वजह से ही।- मगर और तीन बार?''
मैंने कहा, ''वह भी लगभग ऐसे ही कारण से, मच्छड़ों के मारे। मच्छड़ों का काटना चमड़े से बरदाश्त नहीं हुआ। अच्छा...''
साधु ने हँसकर कहा, ''मुझे आप वज्रानन्द ही कहा कीजिएगा। आपका नाम...''
मुझसे पहले राजलक्ष्मी ने ही जवाब दिया। बोली, ''इनके नाम से क्या होगा। उमर में ये बहुत बड़े हैं, इन्हें आप भइया कहा कीजिएगा। और मुझे भी भाभी कहें तो मैं नाराज न हूँगी। मैं भी तो उमर में तुमसे चार-छै साल बड़ी ही हूँगी।''
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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