हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:43

कमललता नीचे बरामदे में बैठकर गौहर का संवाद पूछ रही थी। राजलक्ष्मी चाय ले आयी, चेहरा बहुत भारी हो रहा है, सामने के स्टूल पर प्याली रखकर बोली, ''देखो, तुमसे हजार दफा कह चुकी कि वन-जंगलों में मत घूमा करो- आफत आते कितनी देर लगती है? गले में ऑंचल डाल और हाथ जोड़कर तुमसे प्रार्थना करती हूँ कि मेरी बात मानो।''
अब तक चाय बनाते-बनाते राजलक्ष्मी ने शायद यही सोचकर स्थिर किया था। 'बहुत जल्दी' का दूसरा क्या अर्थ हो सकता है?
कमललता ने आश्चर्य के साथ कहा, ''वन-जंगलों में गुसाईं कब गये थे?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''कब गये, क्या यह मैं देखा करती हूँ दीदी? मुझे क्या दुनिया में और कोई काम नहीं है?''
मैंने कहा, ''देखा कभी नहीं है, सिर्फ अन्दाज है। ज्योतिषी बेटा अच्छी आफत में डाल गया!''
सुनकर रतन दूसरी ओर मुँह फेर जल्दी से चला गया।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''ज्योतिषी का क्या दोष है, वह जो देखेगा वही तो बतायेगा? संसार में विपत्ति-योग नाम की क्या कोई चीज ही नहीं है? आफत में क्या कभी कोई नहीं पड़ता?''
इन सब प्रश्नों का उत्तर देना फिजूल है। राजलक्ष्मी को कमललता ने भी पहिचान लिया है, वह भी चुप रही।
चाय की प्याली अपने हाथों में लेते ही राजलक्ष्मी ने कहा, ''दो-चार फल और थोड़ी-सी मिठाई ले आऊँ?''
कहा, ''नहीं।''
''नहीं क्यों?'' 'नहीं' छोड़कर 'हाँ' कहना क्या भगवान ने तुम्हें सिखाया ही नहीं?'' पर मेरे मुँह की ओर देखकर सहसा अधिकतर उद्विग्न कण्ठ से प्रश्न किया, ''तुम्हारी दोनों ऑंखें इतनी लाल क्यों दिखाई दे रही हैं? नदी के सड़े पानी में नहाकर तो नही आये हो?''
''नहीं, आज स्नान ही नहीं किया।''
''और वहाँ खाया क्या?''
''कुछ भी नहीं खाया। इच्छा भी नहीं हुई।''
जाने क्या सोचकर नजदीक आकर उसने मेरे सिर पर हाथ रक्खा, फिर वही हाथ कुर्ते के भीतर मेरी छाती के नजदीक डालकर कहा, ''जो सोचा था ठीक वही है। कमल दीदी, देखो तो इनका शरीर गरम मालूम नहीं पड़ रहा है?''
कमललता व्यस्त होकर उठी नहीं। बोली, ''जरा-सा गरम हो गया तो क्या हुआ राजू-डर क्या है?''
वह नामकरण करने में अत्यन्त पटु है। यह नया नाम मेरे कानों में भी पड़ा।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इसके मानी ज्वर जो है दीदी!''
कमललता ने कहा, ''अगर ज्वर ही हो तो तुम लोग पानी में नहीं आ पड़ी हो? हमारे पास आई हो, हम ही इसकी व्यवस्था कर देंगे बहन- तुम्हें फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं।''
अपनी इस असंगत व्याकुलता में दूसरे के अविचलित शान्त कण्ठ ने राजलक्ष्मी को प्रकृतिस्थ कर दिया। शर्मिंदा होकर उसने कहा, ''अच्छी बात है दीदी, पर एक तो यहाँ डॉक्टर-वैद्य नहीं हैं, फिर हमेशा देखा है कि यदि इन्हें कुछ हो जाता है, तो जल्दी आराम नहीं होता- बहुत भोगना पड़ता है। फिर जलमुँहा ज्योतिषी ने जाने कहाँ से आकर डर दिला गया...''
''दिला जाने दो।''
''नहीं दीदी, मैंने देखा है कि इनकी अच्छी बातें तो नहीं फलतीं, पर अशुभ बातें ठीक निकल जाती हैं।''
कमललता ने स्मित हास्य से कहा, ''डरने की बात नहीं राजू, इस क्षेत्र में उसकी बात ठीक न होगी। सबेरे से ही गुसाईं धूप में घूमते रहे हैं, ठीक वक्त पर स्नान-आहार नहीं हुआ, शायद इसी कारण शरीर कुछ गर्म हो गया है- कल सुबह तक नहीं रहेगा।''
लालू की माँ ने आकर कहा, ''माँ, रसोईघर में ब्राह्मण-रसोइया तुम्हें बुला रहा है।''
''जाती हूँ,'' कहकर कमललता की तरफ कृतज्ञ दृष्टिपात करके वह चली गयी।
मेरे रोग के सम्बन्ध में कमललता की बात ही फली। ज्वर ठीक सुबह ही तो नहीं गया, पर एक-दो दिन में ही मैं स्वस्थ हो गया। किन्तु इस घटना से कमललता को हमारी भीतर की बातों का पता चल गया, शायद एक और व्यक्ति को भी पता चला- स्वयं बड़े गुसाईंजी को।
जाने के दिन कमललता ने हम लोगों को आड़ में बुलाकर पूछा, ''गुसाईं, तुम्हें अपनी शादी का साल याद है?'' निकट ही देखा कि एक थाली में देवता का प्रसाद, चन्दन और फूलों की माला रखी है।
प्रश्न का जवाब दिया राजलक्ष्मी ने, कहा, ''इन्हें क्या खाक मालूम होगा, मुझे याद है।''
कमललता ने हँसते हुए कहा, ''यह कैसी बात है कि एक को तो याद रहे और दूसरे को नहीं?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''बहुत छोटी उम्र थी न, इसीलिए। इन्हें तब भी ठीक ज्ञान न था।''
''पर उम्र में तो यही बड़े हैं, राजू?''
''ओ: बहुत बड़े हैं! कुल पाँच-छह साल। मेरी उम्र तब आठ-नौ साल की थी। एक दिन गले में माला पहनाकर मैंने मन-ही-मन कहा, आज से तुम मेरे दूल्हा हुए! दूल्हा! दूल्हा!'' कहकर मुझे इशारे से दिखाते हुए कहा, ''पर ये देवता उसी वक्त मेरी माला को वहीं खड़े-खड़े खा गये!''
कमललता ने आश्चर्य से पूछा, ''फूलों की माला किस तरह खा गये?''
मैंने कहा, ''फूलों की माला नहीं, पके हुए, करोदों की माला थी। जिसे दोगी वही खा जायेगा।''
कमललता हँसने लगी। राजलक्ष्मी ने कहा, ''पर वहीं से मेरी दुर्गति शुरू हो गयी। इन्हें खो बैठी। इसके बाद की बातें मत जानना चाहो दीदी- पर लोग जो कल्पना करते हैं सो बात भी नहीं है- वे तो न जाने क्या-क्या सोचते हैं। इसके बाद बहुत दिनों तक रोती-पीटती भटकती फिरी और तलाश करती रही। आखिर भगवान की दया हुई, और जैसे एक दिन खुद ही देकर एकाएक छीन लिया था, वैसे ही अकस्मात् एक दिन हाथोंहाथ लौटा भी दिया।'' कहकर उसने भगवान के उद्देश्य से प्रणाम कर लिया।
कमललता ने कहा, ''उन्हीं भगवान की माला बड़े गुसाईं ने भेजी है, आज जाने के दिन तुम दोनों एक-दूसरे को पहना दो।''
राजलक्ष्मी ने हाथ जोड़कर कहा, ''इनकी इच्छा ये जानें, पर इसके लिए मुझे आदेश न करो। बचपन की मेरी वह लाल रंग की माला आज भी ऑंखें बन्द करने पर इनके उसी किशोर गले में झूलती हुई दिखाई देती है। भगवान की दी हुई मेरी वही माला हमेशा बनी रहे दीदी।''
मैंने कहा, ''पर वह माला तो खा डाली थी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हाँ जी देवता, इस बार मुझे भी खा डालो।'' कहकर हँसते हुए उसने चन्दन की कटोरी में अंगुलियाँ डुबोकर मेरे मस्तक पर छाप लगा दी।
हम सब मिलने के लिए द्वारिकादास के कमरे में गये। वे न जाने किस ग्रन्थ का पाठ करने में लगे हुए थे, आदर से बोले, 'आओ भाई, बैठो।''
राजलक्ष्मी ने जमीन पर बैठकर कहा, ''बैठने का वक्त नहीं है गुसाईं। बहुत उपद्रव किया है, इसलिए जाने के पहले नमस्कार कर आपसे क्षमा की भिक्षा माँगने आई हूँ।''
गुसाईं बोले, ''हम बैरागी आदमी हैं, भिक्षा ले तो सकते हैं, दे नहीं सकते। लेकिन फिर कब उपद्रव करने आओगी बताओ दीदी? आश्रम में तो आज अन्धकार हो जायेगा।''
कमललता ने कहा, ''सच है गुसाईं- सचमुच में यही मालूम होगा कि आज कहीं भी बत्ती नहीं जली है, सब जगह अन्धकार हो रहा है।''
बड़े- गुसाईं ने कहा, ''गान, आनन्द और हास-परिहास के कारण इन कई दिनों से ऐसा लग रहा था कि मानो हमारे चारों ओर विद्युत के दीपक जल रहे हैं-यह और कभी नहीं देखा। मैंने सुना कमललता ने तुम्हारा नाम 'नये गुसाईं' रक्खा है, और मैंने इन्हें नाम दिया है आनन्दमयी...''
इस बार उनके उच्छ्वा स में मुझे बाधा देना पड़ी। कहा, ''बड़े गुसाईं, विद्युत का दीपक ही आप लोगों की ऑंखों ने देखा है, पर जिनके कर्ण-रन्धरों में उसकी कड़कड़ ध्व नि दिन-रात पहुँचती रहती है, उनसे तो जरा पूछिए। आनन्दमयी के सम्बन्ध में कम-से-कम रतन की राय...''
रतन पीछे खड़ा था, भाग गया।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इनकी बातें तुम न सुनो गुसाईं, मुझसे ये दिन-रात ईष्या करते हैं।'' फिर मेरी ओर देखकर कहा, ''इस बार जब आऊँगी तो इस रोगी और अरसिक आदमी को कमरे में ताला लगाकर बन्द कर आऊँगी, इसके मारे मुझे कहीं चैन नहीं मिलती!''
बड़े गुसाईं ने कहा, ''नहीं आनन्दमयी, नहीं बनेगा, छोड़कर नहीं आ सकोगी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''अवश्य आ सकूँगी। बीच-बीच में मेरी ऐसी इच्छा होती है गुसाईं, कि मैं जल्दी मर जाऊँ।''
बड़े गुसाईं जी बोले, ''यह इच्छा तो वृन्दावन में एक दिन उनके मुँह से भी निकली थी बहिन, पर वैसा हो नहीं सका। हाँ आनन्दमयी, तुम्हें क्या वह बात याद नहीं?-
सखी, दे जाउँ मैं किसको कन्हैयालाल की सेवा।
वे जानें क्या बताओ तो...''
कहते-कहते वे मानो अन्यमनस्क हो गये। बोले, 'सच्चे प्रेम के बारे में हम लोग कितना-सा जानते हैं? केवल छलना में अपने को भुलाये रखते हैं। पर तुम जान सकी हो बहिन, इसीलिए कहता हूँ कि तुम जिस दिन यह प्रेम श्रीकृष्ण को अर्पण कर दोगी, आनन्दमयी...''
सुनकर राजलक्ष्मी मानो सिहर उठी, व्यस्त होकर बाधा देते हुए बोली, ''ऐसा आशीर्वाद मत दो गुसाईं, मेरे भाग्य में ऐसा न घटे। बल्कि यह आशीर्वाद दो कि इसी तरह हँसते-खेलते इनके समक्ष ही एक दिन मर जाऊँ।''
कमललता ने बात सँभालते हुए कहा, ''बड़े गुसाईं तुम्हारे प्रेम की बात ही कर रहे हैं राजू, और कुछ नहीं।''
मैंने भी समझ लिया कि अन्य भावों के भावुक द्वारिकादास की विचार-धारा सहसा एक और पथ पर चली गयी थी, बस।
राजलक्ष्मी ने शुष्क मुँह से कहा, ''एक तो यह शरीर और फिर एक न एक रोग साथ लगा ही रहता है- एकांगी आदमी, किसी की बात सुनना नहीं चाहते-मैं रात-दिन किस तरह डरी-सहमी रहती हूँ दीदी, किसे बताऊँ?''
अब तो मैं मन-ही-मन उद्विग्न हो उठा। जाते वक्त बातों-ही-बातों में कहाँ का पानी कहाँ पहुँच गया, इसका ठिकाना ही नहीं। मैं जानता हूँ कि मुझे अवहेलना के साथ बिदा करने की मर्मान्तक आत्मग्लानि लेकर ही इस बार राजलक्ष्मी काशी से आई है और सर्व प्रकार के हास-परिहास के अन्तराल में न जाने किस अनजान कठिन दण्ड की आशंका उसके मन में बनी रहती है जो किसी तरह मिटना ही नहीं चाहती। इसी को शान्त करने के अभिप्राय से मैं हँसकर बोला, ''लोगों के आगे मेरे दुबले-पुतले शरीर की तुम चाहे जितनी निन्दा क्यों न करो लक्ष्मी, पर इस शरीर का विनाश नहीं है। तुम्हारे पहले मरे बिना मैं मरने का नहीं, यह निश्चित है।''
उसने बात खत्म भी न करने दी, धप से मेरा हाथ पकड़कर कहा, ''तब इन सबके सामने मुझे छूकर तीन बार कसम खाओ। कहो कि यह बात कभी झूठ न होगी!'' कहते-कहते उद्गत ऑंसू उसकी दोनों ऑंखों से बह पड़े।
सबके-सब अवाक् हो रहे। लज्जा के मारे उसने मेरा हाथ जल्दी-से छोड़ दिया और जबरदस्ती हँसकर कहा, ''इस जलमुँहे ज्योतिषी ने झूठमूठ ही मुझे इतना डरा दिया कि...''
यह बात भी वह खत्म न कर सकी, और चेहरे की हँसी तथा लज्जा की बाधा के होते हुए भी उसकी ऑंखों से ऑंसुओं की बूँदें दोनों गालों पर ढुलक पड़ीं।
एक बार फिर सबसे एक-एक करके विदा ली गयी। बड़े गुसाईं ने वचन दिया कि इस बार कलकत्ते जाने पर वह हमारे यहाँ भी पधारेंगे और पद्मा ने कभी शहर नहीं देखा है, इसलिए वे भी साथ में आयेगी।
स्टेशन पर पहुँचते ही सबसे पहले वही 'जुलमुँहा' ज्योतिषी नजर आया। प्लेटफार्म पर कम्बल बिछाकर बड़ी शान से बैठा है और उसके आसपास काफी लोग जमा हो गये हैं।
पूछा, ''यह भी साथ चलेगा क्या?''
राजलक्ष्मी ने दूसरी ओर देखकर अपनी सलज्ज हँसी छिपा ली। पर सिर हिलाकर बताया कि ''हाँ, जायेगा।''
कहा, ''नहीं, नहीं जायेगा।''
''लेकिन जाने से कुछ भला न होगा तो बुरा भी तो न होगा। साथ चलने दो न?''
''नहीं। भला-बुरा कुछ भी हो, वह साथ नहीं चलेगा। उसे जो कुछ देना हो दे- दिलाकर यहीं से बिदा कर दो। ग्रह शान्त करने की क्षमता और साधुता अगर उसमें हो भी, तो तुम्हारी ऑंखों की आड़ में ही वह करे।''
''तो यही कह देती हूँ,'' कहकर रतन को उसे बुलाने के लिए भेज दिया। नहीं जानता कि उसे क्या दिया, पर कई बार माथा हिलाकर और अनेक आशीर्वाद देकर हँसते हुए ही उसने बिदा ली।
थोड़ी देर बाद ही ट्रेन आकर हाजिर हुई और हम कलकत्ते को चल दिये।
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राजलक्ष्मी के एक प्रश्न के उत्तर में रुपयों की प्राप्ति का किस्सा बताना पड़ा। ''हमारे बर्मा ऑफिस से एक ऊँचे दर्जे के साहब बने घुड़दौड़ में सर्वस्व गँवाकर मेरे इकट्ठे किये हुए रुपये उधार ले लिये थे और खुद ही उन्होंने यह शर्त की थी कि सिर्फ सूद ही नहीं, बल्कि अगर अच्छे दिन आए तो मुनाफे का भी आधा हिस्सा देंगे। इस बार कलकत्ते लौटकर रुपये माँगने पर उन्होंने कर्ज का चौगुना रुपया भेज दिया। बस यही मेरी पूँजी है।''
''वह कितनी है?''
''मेरे लिए तो बहुत है, पर तुम्हारे निकट अतिशय तुच्छ।''
''सुनूँ तो कितनी?''
''सात-आठ हजार!''
''वह मुझे देनी होगी।''
डर से कहा, ''यह कैसी बात है! लक्ष्मी तो दान ही करती हैं, वे हाथ भी फैलाती हैं क्या?''
राजलक्ष्मी ने सहास्य कहा, ''लक्ष्मी अपव्यय सहन नहीं करतीं और अयोग्य समझकर सन्यासी फकीरों का विश्वास नहीं करतीं। लाओ रुपये।''
''क्या करोगी?''
''अपने खाने-कपड़े की व्यवस्था करूँगी। अब से यही होगा मेरे जीवित रहने का मूलधन।''
''पर इतने-से मूलधन से काम कैसे चलेगा? तुम्हारे झुण्ड के झुण्ड नौकर-नौकरानियों की पन्द्रह दिन की तनख्वाह भी तो इससे पूरी नहीं होगी। इसके अलावा गुरु-पुरोहित हैं, तैंतीस करोड़ देवता हैं, बहुत-सी विधवाओं का भरण-पोषण है- उनका क्या उपाय होगा?''
''इनके लिए फिक्र मत करो, उनका मुँह बन्द न होगा। मैं अपने ही भरण-पोषण की बात सोच रही हूँ। समझे?''
कहा, ''समझ गया। अब से अपने को एक माया में भुलाये रखना चाहती हो- यही न?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं, सो नहीं। वह सब रुपया दूसरे कामों के लिए है। मेरे भविष्य की पूँजी वही होगा, जो अब से तुम्हारे सामने हाथ पसारने पर मिलेगा। उसी से भरपेट खाऊँगी, नहीं तो उपवास करूँगी।''
''तो तुम्हारे भाग्य से यही लिखा है!''
''क्या लिखा है- उपवास?'' यह कहकर उसने हँसते हुए कहा, ''तुम सोच रहे हो कि साधारण-सी पूँजी है, पर वह विद्या मैं जानती हूँ कि साधारण ही किस तरह बढ़ाया जाता है। एक दिन समझोगे कि मेरे धन के बारे में तुम जो सन्देह करते हो वह सच नहीं है।''
''यह बात तुमने इतने दिनों से क्यों नहीं कही?''
''इसीलिए नहीं कही कि विश्वास नहीं करोगे। मेरा रुपया तुम घृणा के मारे छूते तक नहीं, पर तुम्हारी घृणा से मेरी छाती फट जाती है।''
व्यथित होकर कहा, ''अचानक आज ये सब बातें क्यों कह रही हो लक्ष्मी?''
राजलक्ष्मी क्षण-भर तक मेरे चेहरे की ओर देखती रही, फिर बोली, ''यह बात तुम्हें आज एकाएक खटकी है पर मेरी तो रात-दिन यही भावना रही है। तुम क्या यह समझते हो कि अधर्म की कमाई से ही मैं देवी-देवताओं की सेवा करती हूँ? उस धन का एक अणु भी अगर तुम्हारी चिकित्सा में मैं खर्च करती, तो तुम्हें बचा सकती? अवश्य ही मेरे पास से भगवान तुम्हें छीन लेते। इस बात को सत्य मानकर तुम कहाँ विश्वास करते हो कि मैं तुम्हारी ही हूँ।''
''विश्वास तो करता हूँ।''
''नहीं, नहीं करते।''
उसके प्रतिवाद का तात्पर्य नहीं समझा। वह कहने लगी, ''कमललता से तुम्हारा दो दिन का परिचय है, तो भी तुमने उसकी सारी कहानी मन लगाकर सुनी, उसकी सारी बाधाएँ मिट गयीं- वह मुक्त हो गयी। पर तुमने मुझसे कभी कोई बात नहीं पूछी, कभी तो नहीं कहा कि लक्ष्मी अपने जीवन की सारी घटनाएँ खोलकर बताओ। क्यों नहीं पूछा? तुम विश्वास नहीं करते मेरा और न विश्वास कर सकते हो अपने ऊपर!''
कहा, ''उससे भी नहीं पूछा, जानना भी नहीं चाहा। उसने खुद ही जबरदस्ती सुनाई है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तो भी सुनी तो है। वह पराई है इसलिए उसकी कहानी नहीं सुनना चाहते थे, क्योंकि जरूरत नहीं थी। पर मुझसे भी क्या यही कहोगे?''
''नहीं, यह नहीं कहूँगा। पर क्या तुम कमललता की चेली हो? उसने जो कुछ किया है, तुम्हें भी वही करना होगा?''
''इन बातों में मैं भूलने वाली नहीं। मेरी सारी बातें तुम्हें सुननी ही पड़ेंगीं!''
''यह तो बड़ी मुश्किल है। मैं सुनना नहीं चाहता तो भी सुननी पड़ेगी?''
''हाँ, सुननी पड़ेंगीं। तुम्हारा खयाल है कि सुनने पर शायद मुझे प्यार नहीं कर सकोगे, या मुझे बिदा देनी पड़ेगी।''
''तब तुम्हारी विवेचना के अनुसार यह क्या तुच्छ बात है?''
राजलक्ष्मी हँस पड़ी, बोली, ''नहीं, यह नहीं होगा, तुम्हें सुनना ही पड़ेगा। तुम पुरुष हो, तुम्हारे मन में क्या इतनी भी शक्ति नहीं है कि उचित मालूम होने पर मुझे दूर कर सको?''
इस अक्षमता को अत्यन्त स्पष्टता से कबूल करते हुए कहा, ''तुम जिन शक्तिशाली पुरुषों का उल्लेख करके मुझे अपमानित कर रही हो लक्ष्मी, वे वीर पुरुष हैं- नमस्कार करने योग्य हैं। उनकी पद-धूलि की योग्यता भी मुझमें नहीं। तुम्हें बिदा देकर मैं एक दिन भी नहीं रह सकूँगा, शायद उसी वक्त लौटा लाने के लिए दौड़ पडँगा और तुमने यदि 'ना' कह दिया तो मेरी दुर्गति की सीमा नहीं रहेगी! अतएव, सब भयावह विषयों की आलोचना बन्द करो।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तुम्हें मालूम है, बचपन में माँ ने मुझे एक मैथिल राजकुमार के हाथों बेच दिया था।''
''हाँ, और एक राजकुमार की ही जबानी यह खबर बहुत दिनों बाद सुनी थी। वह मेरा मित्र था।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हाँ, वह तुम्हारे मित्र का मित्र था। एक दिन नाराज होकर मैंने माँ को बिदा कर दिया और उन्होंने घर लौटकर मेरी मृत्यु की अफवाह फैला दी। यह खबर तो सुनी थी?''
''हाँ, सुनी थी।''
''सुनकर तुमने क्या सोचा था?''
''सोचा था, आह, बेचारी लक्ष्मी मर गयी।''
''यही? और कुछ नहीं?''
''और यह भी सोचा था कि काशी में मरने के कारण और कुछ न भी हो, सद्गति तो हुई ही। आह!''
''राजलक्ष्मी ने नाराज होकर कहा, ''जाओ, झूठी आह-आह करके दुख प्रकट करने की जरूरत नहीं। मैं कसम खाकर कह सकती हूँ कि तुमने एक बार भी 'आह' न की थी। लो, मुझे छूकर कहो तो।''
कहा, ''इतने दिनों पहले की बातें क्या ठीक-ठीक याद रहती हैं? की थी, यही तो याद आता है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''खैर, कष्ट करके इतनी पुरानी बातें अब याद करने की जरूरत कहीं, मैं जानती हूँ।'' फिर थोड़ी देर ठहरकर उसने कहा, ''और मैं? रोज सुबह विश्वनाथ से रो-रोकर कहती थी, भगवान, मेरे, भाग्य में तुमने यह क्या लिख दिया? तुम्हें साक्षी बनाकर जिसके गले में माला डाली थी क्या इस जीवन में उससे फिर कभी मिलना नहीं होगा? चिरकाल तक क्या ऐसी अपवित्रता में ही दिन बिताने पड़ेंगे? उन दिनों की बातें याद आते ही आज भी आत्महत्या करके मर जाने की इच्छा होती है!''
उसके चेहरे की ओर देखकर क्लेश बोध हुआ, पर यह सोचकर चुप ही रहा कि मेरा निषेध नहीं मानेगी।
इन बातों को उसने कितने दिनों तक मन-ही-मन कितनी तरह से उलट-पलटकर सोचा-विचारा है, उसके अपराध-भाराक्रान्त मन ने नीरव की कितनी मर्मान्तिक वेदना सहन की है, फिर भी इस डर से कि कुछ करते कुछ न हो जाय कुछ जाहिर करने का साहस नहीं किया है, इतने दिनों के बाद अब वह यह शक्ति कमललता से अर्जन कर पाई है। अपनी प्रच्छन्न कलुषिता को अनावृत्त करके वैष्णवी ने मुक्ति पा ली है। राजलक्ष्मी भी आज भय और झूठी मर्यादा की जंजीरों को तोड़कर उसी की तरह सहज होकर खड़ी होना चाहती है, फिर उसके भाग्य में कुछ भी क्यों न हो। यह विद्या उसे कमललता ने दी है। संसार में इस एक व्यक्ति के आगे इस दर्पिता नारी ने सिर झुकाकर अपने दु:ख के समाधान की भिक्षा माँगी है, यह बिना किसी संशय के समझ लेने पर मुझे बहुत सन्तोष मिला।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:44

कुछ देर दोनों ही चुप रहे। सहसा राजलक्ष्मी बोली, ''राजपुत्र एकाएक मर गया, पर माँ ने मुझे फिर बेचने का षडयन्त्र रचा...''
''इस बार किसके हाथ?''
''एक दूसरे राजकुमार के- तुम्हारे उन्हीं मित्ररत्न के साथ-जिनके साथ-साथ शिकार करने के लिए जाते हुए-क्या हुआ, याद नहीं है?''
''शायद नहीं। बहुत पुरानी बात है न। पर उसके बाद?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''यह षडयन्त्र चला नहीं। मैं बोली, ''माँ तुम घर जाओ।''
माँ ने कहा, ''हजार रुपये जो ले चुकी हूँ?'' कहा, ''वह रुपया लेकर तुम देश चली जाओ। दलाली का रुपया चाहे जैसे होगा मैं चुका दूँगी। आज रात की गाड़ी से तुम बिदा न होगी माँ, तो कल सबेरे ही मैं अपने को बेचकर गंगा-माता के पानी में डुबा दूँगी। मुझे तो तुम जानती हो माँ, झूठा डर नहीं दिखा रही हूँ।'' माँ बिदा हो गयीं। उन्हीं की जुबानी मेरी मौत की खबर सुनकर तुमने दु:ख प्रकट करते हुए कहा, ''आह! बेचारी मर गयी।'' यह कहकर वह खुद ही कुछ हँसी और बोली, ''सच होती तो तुम्हारे मुँह से निकलती हुई यह 'आह' ही मेरे लिए बहुत थी, पर अब जिस दिन सचमुच मरूँगी, उस दिन दो बूँद ऑंसू जरूर गिराना। कहना कि संसार में अनेक वर-वधुओं ने अनेक मालाएँ बदली हैं, उनके प्रेम से संसार पवित्र-परिपूर्ण हो रहा है, पर तुम्हारी कुलटा राजलक्ष्मी ने अपनी नौ वर्ष की उम्र में उस किशोर वर को एक मन से जितना ज्यादा प्यार किया था, इस संसार में उतना ज्यादा प्यार कभी किसी ने किसी को नहीं किया। कहो कि मेरे कानों में उस वक्त यह बात कहोगे? मैं मरकर भी सुन सकूँगी।''
''यह क्या, तुम तो रो रही हो?''
उसने ऑंखों के ऑंसू ऑंचल से पोंछकर कहा, ''तुम क्या सोचते हो कि इस निरुपाय बच्ची पर उसके आत्मीय स्वजनों ने जितना अत्याचार किया है, उसे अन्तर्यामी भगवान देख नहीं सके?- इसका न्याय वे नहीं करेंगे? ऑंखें बन्द किये रहेंगे?''
कहा, ''सोचता तो हूँ कि ऑंखें बन्द किये रहना उचित नहीं है, पर उनकी बातें तुम लोग ही अच्छी तरह जानती हो, मेरे जैसे पाखण्डी का परामर्श वे कभी नहीं लेते।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''मजाक!'' पर दूसरे क्षण गम्भीर होकर कहा, ''अच्छा, लोग कहते हैं कि स्त्री और पुरुष का धर्म एक न होने से काम नहीं चलता, पर धर्म-कर्म में तो मेरा और तुम्हारा सम्पर्क साँप और नेवले जैसा है। फिर भी हम लोगों का कैसे चलता है?''
''साँप नेवले की तरह की चलता है। इस जमाने में जाने से मार डालने में बड़ी झंझट है, इसलिए एक व्यक्ति दूसरे का वध नहीं करता, निर्भय होकर बिदा कर देता है,- तब जब कि यह आशंका होती है कि उसकी धर्म-साधना में विघ्न पड़ रहा है!''
''उसके बाद क्या होता है?''
हँसकर कहा, ''उसके बाद वह खुद ही रोते-रोते वापस आता है, दाँतों में तिनका दबाकर कहता है कि मुझे बहुत सजा मिल चुकी है, इस जीवन में अब इतनी बड़ी भूल नहीं करूँगा। गया मेरा जप-तप, गुरु-पुरोहित-मुझे क्षमा करो।''
राजलक्ष्मी भी हँसी, बोली, ''पर क्षमा मिल तो जाती है?''
''हाँ, मिल जाती हैं। पर तुम्हारी कहानी का क्या हुआ?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''कहती हूँ।'' क्षण-भर मेरी ओर निष्पलक नेत्रों से देखकर कहा, ''माँ देश चली गयीं। उन दिनों मुझे एक बूढ़ा उस्ताद गाना-बजाना सिखाता था। वह बंगाली था। किसी जमाने में सन्यासी था, पर इस्तीफा देकर फिर संसारी हो गया था। उसके घर में मुसलमान स्त्री थी। वह मुझे नाच सिखाने आती थी। मैं उसे बाबा कहती थी और मुझे सचमुच वह बहुत प्यार करता था। रोकर कहा, ''बाबा, तुम मेरी रक्षा करो, यह सब अब मुझसे न होगा।'' वह गरीब आदमी था। एकाएक साहस न कर सका। मैंने कहा कि मेरे पास बहुत रुपया है, उससे काफी दिनों तक चल जायेगा। फिर भाग्य में जो बदा होगा, वह होगा। पर अब चलो, भाग चलें। इसके बाद उसके साथ कितनी जगह घूमी- इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली, आगरा, जयपुर, मथुरा- अन्त में इस पटना में आकर आश्रय लिया। आधा रुपया एक महाजन की गद्दी में जमा करा दिया और आधे रुपये से एक मनिहारी और कपड़े की दुकान खोल ली। मकान खरीदकर बंकू को तलाश किया, उसे लाकर स्कूल में भर्ती करा दिया और जीविका के लिए जो कुछ करती थी, वह तो तुमने खुद अपनी ऑंखों से देखा है।''
उसकी कहानी सुनकर कुछ देर तक स्तब्ध रहा, फिर बोला, ''तुम कहती हो इसलिए अविश्वास नहीं होता, पर और कोई कहता तो समझता कि सिर्फ एक मनगढ़न्त झूठी कहानी सुन रहा हूँ।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''मैं शायद झूठ नहीं बोल सकती?''
कहा, ''शायद बोल सकती हो, पर मेरा विश्वास है कि मुझसे आज तक नहीं बोलीं।''
''यह विश्वास क्यों है?''
''क्यों? तुम्हें डर है कि झूठी प्रवंचना करने के कारण पीछे कहीं देवता रुष्ट न हो जाँय और तुम्हें दण्ड देने के लिए कहीं मेरा अकल्याण न कर बैठें।''
''मेरे मन की बात तुमने कैसे जान ली?''
''मेरे मन की बात भी तो तुम जान लेती हो?''
''मैं जान सकती हूँ, क्योंकि यह मेरी रात-दिन की भावना है, पर तुम्हारे तो वह नहीं है।''
''अगर हो तो खुश होओगी?''
राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा, ''नहीं होऊँगी। मैं तुम्हारी दासी हूँ, दासी को इससे ज्यादा मत समझना, मैं यही चाहती हूँ।''
उत्तर में कहा, ''तुम उस युग की मनुष्य हो- वही हजार वर्ष पुराने संस्कार हैं!''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''मैं ऐसी ही हो सकूँ और हमेशा ऐसी ही हूँ।'' यह कहकर क्षण-भर मेरी ओर देखा, फिर कहा, ''तुम सोचते हो कि इस युग की औरतें मैंने नहीं देखी हैं? बहुत देखी हैं बल्कि तुम्हीं ने नहीं देखी हैं और देखी भी हैं तो बाहर-से। इनमें से किसी के साथ मुझे बदल लो, तो देखूँ कि तुम कैसे रह सकते हो? अभी मुझसे मजाक करते हुए कहा था कि दाँतों में तिनका दबाकर आई थी, तब तुम दस हाथ दूर से दाँतों में तिनका दबाए आओगे।''
''पर जब इसकी मीमांसा हो ही नहीं सकती, जब झगड़ा करने से क्या फायदा? सिर्फ यही कह सकता हूँ कि उनके बारे में तुमने अत्यन्त अविचार किया है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''अविचार अगर किया हो तो भी कह सकती हूँ कि अत्यन्त अविचार नहीं किया। ओ गुसाईं, मैं भी बहुत घूमी हूँ, बहुत देखा है। तुम लोग जहाँ अन्धे हो, वहाँ भी हमारी दस जोड़ी ऑंखें खुली हुई हैं।''
''पर जो कुछ देखा है रंगीन चश्मे से देखा है, इसीलिए सब गलत देखा है। दस जोड़ी भी व्यर्थ हैं।''
राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, ''क्या कहूँ, मेरे हाथ-पैर बँधे हुए हैं, नहीं तो ऐसे आड़े हाथों लेती कि जन्म-भर न भूलते। पर जाने दो, जब मैं उस युग की तरह तुम्हारी दासी होकर ही रहती हूँ, तब तुम्हारी सेवा ही मेरे लिए सबसे बड़ा काम है। पर तुम्हें मैं अपने बारे में जरा भी नहीं सोचने दूँगी। संसार में तुम्हारे लिए बहुत काम हैं, अब से वे ही करने होंगे। इस अभागिनी के पीछे तुम्हारा काफी वक्त तथा और भी बहुत कुछ नष्ट हो गया है, अब मैं और नष्ट नहीं करने दूँगी।''
कहा, ''इसीलिए तो मैं जितनी जल्दी हो सके उसी पुरानी नौकरी पर जाकर हाजिर हो जाना चाहता हूँ।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''नौकरी मैं तुम्हें नहीं करने दूँगी।''
''पर मनिहारी की दुकान भी मैं नहीं चला सकूँगा।''
''क्यों नहीं चला सकोगे?''
''पहला कारण तो यह है कि चीजों का दाम मुझे याद नहीं रहता, दूसरे दाम लेना और फौरन ही हिसाब करके बाकी पैसा लौटा देना तो और भी असम्भव है। दुकान तो उठ ही जायेगी, अगर खरीददारों के साथ लाठी न चल जाय तो गनीमत है।''
''तो एक कपड़े की दुकान करो।''
''इससे अच्छा है कि जंगली शेर-भालुओं की एक दुकान करा दो, मेरे लिए उसे चलाना ज्यादा आसान होगा।''
राजलक्ष्मी हँस पड़ी। बोली, मन लगाकर इतनी आराधना करने के बाद भी अन्त में भगवान ने मुझे एक ऐसा अकर्मण्य मनुष्य दिया जिसके द्वारा संसार का इतना-सा भी काम नहीं हो सकता!''
कहा, ''आराधना में त्रुटि थी। उसे सुधारने का वक्त है, अब भी तुम्हें कर्मठ आदमी मिल सकता है- काफी सुन्दर, स्वस्थ, लम्बा-चौड़ा जवान; जिसे न कोई हरा सकेगा और न ठग ही सकेगा; जिस पर काम का भार देकर निश्चिन्त, हाथ में रुपया-पैसा सौंपकर निर्भय हुआ जा सकेगा। जिसकी खबरदारी नहीं करनी होगी, भीड़ में जिसे खो देने की व्याकुलता नहीं, जिसे सजाकर तृप्ति, भोजन कराकर आनन्द- 'हाँ' के अलावा जो 'ना' बोलना ही नहीं जानता...''
राजलक्ष्मी चुपचाप मेरे मुँह की तरफ देख रही थी, अकस्मात् उसके सारे शरीर में काँटे उठ आय। मैंने कहा, ''अरे यह क्या?''
''नहीं, कुछ नहीं।''
''काँप जो उठी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''मुँहज़बानी ही तुमने जो तसवीर खींची है, उसका अगर आधा भी सत्य हो तो शायद मैं मारे डर के ही मर जाऊँगी।''
''पर मेरे जैसे अकर्मण्य आदमी को लेकर तुम क्या करोगी?''
राजलक्ष्मी ने हँसी दबाकर कहा, ''करूँगी और क्या। भगवान को कोसूँगी और हमेशा जलती-भुनती रहकर मरूँगी। इस जन्म में और तो कुछ ऑंखों से दिखाई नहीं देता।''
''बल्कि इससे अच्छा तो यही है कि तुम मुझे मुरारीपुर के अखाड़े में भेज दो।''
''उन्हीं का तुम कौन-सा उपकार करोगे?''
''उनके फूल तोड़ दिया करूँगा और देवता का प्रसाद पाकर जितने दिन जिन्दा हूँ पड़ा रहूँगा। इसके बाद वे उसी बकुल के तले मेरी समाधि बना देंगे। पद्मा किसी दिन शाम को दीपक जला जायेगी- जिस दिन वह भूल जायेगी उस दिन दीप न जलेगा। सुबह के फूल तोड़कर उसके पास से कमललता जब निकलेगी तो कभी एक मुट्ठी मल्लिका के फूल बिखेर देगी और कभी कुन्द के फूल। यदि कभी कोई परिचित रास्ता भूलकर आ जायेगा तो उसे समाधि दिखाकर कहेगी, यहाँ हमारे नये गुसाईं रहते हैं- यहीं जो जरा ऊँची जगह है, जहाँ मल्लिका के सूखे और कुन्द के ताजे फूलों के साथ मिलकर झरे हुए बकुल के फूल छाये हुए हैं- यहीं।''
राजलक्ष्मी की ऑंखों में ऑंसू भर आये, पूछा, ''और वह परिचित व्यक्ति तब क्या करेगा।''
मैंने कहा, ''यह मैं नहीं जानता। हो सकता है कि बहुत-सा रुपया खर्च कर मन्दिर बनवा जाए...''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं, ऐसा न होगा। वह उस बकुल के तले को छोड़कर कहीं न जायेगा। पेड़ की हर डाल पर पक्षी कलरव करेंगे, गाना गायेंगे, लड़ेंगे-सैकड़ों सूखे पत्तो, सूखी हुई डालें गिरायेंगे- उन सबको साफ करने का भार उस पर रहेगा। सुबह चुनकर और साफ कर फूलों की माला गूँथेगा, रात को सबके सो जाने पर उन्हें वैष्णव कवियों के गीत सुनायेगा, फिर वक्त आने पर कमललता दीदी को बुलाकर कहेगा, हमें एकत्र करके समाधि देना, कहीं अन्तर रहने पाये, अलग-अलग न पहचाने जायें। और यह लो रुपये, इनसे मन्दिर बनवा देना, राधाकृष्ण की मूर्ति प्रतिष्ठित करना, पर कोई नाम मत लिखना, कोई चिह्न मत रखना- किसी को मालूम न होने पाए कि कौन हैं और कहाँ से आये।''
कहा, ''लक्ष्मी, तुम्हारी तसवीर तो हो गयी और भी मधुर और भी सुन्दर!''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''क्योंकि यह तसवीर सिर्फ बातों से नहीं गढ़ी गयी है गुसाईं, यह सत्य है जो है। और यहीं पर दोनों में फर्क है। मैं कर सकूँगी, पर तुमसे नहीं होगा। तुम्हारे द्वारा अंकित बातें की तसवीर सिर्फ बातें होकर ही रह जाँयगी।''
''कैसे जाना?''
''जानती हूँ। स्वयं तुमसे भी ज्यादा जानती हूँ। यह तो मेरी पूजा है, मेरा ध्याबन है। पूजा शेष करके किसके पैरों पर जल चढ़ाती हूँ? किसे पैरों पर फूल देती हूँ? तुम्हारे ही तो।''
नीचे से रसोइए की पुकार आयी, ''माँ, रतन नहीं है, चाय का पानी तैयार हो गया।''
''आती हूँ।'' यह ऑंखें पोंछकर वह उसी वक्त चली गयी।
कुछ देर बाद चाय की प्याली ले आयी और उसे मेरे सामने रखकर बोली, ''तुम्हें किताबें पढ़ना अच्छा लगता है, तो अब से वही क्यों नहीं करते?''
''उससे रुपये तो आयेंगे नहीं?''
रुपयों का क्या होगा? रुपया तो हम लोगों के पास बहुत हैं?''
कुछ रुककर कहा, ''ऊपर वाला यह दक्षिण का कमरा तुम्हारे पढ़ने का कमरा होगा। आनन्द देवर किताबें खरीदकर लायेंगे और मैं अपने मन के मुताबिक सजाकर रक्खूँगी। उसके एक बगल में मेरा सोने का कमरा रहेगा, और दूसरी ओर ठाकुरजी का कमरा। बस, इस जन्म में मेरा यही त्रिभुवन है- इसके बाहर मेरी दृष्टि कभी जाये ही नहीं।''
पूछा, ''और तुम्हारा रसोईघर ? आनन्द सन्यासी आदमी है, उधर नजर न रक्खोगी तो उसे एक दिन भी नहीं रक्खा जा सकेगा। पर उसका पता कैसे मिला? वह कब आयेगा?''
''राजलक्ष्मी ने कहा, ''कुशारीजी ने पता दिया है, कहा है कि आनन्द बहुत जल्दी आयेंगे। इसके बाद सब मिलकर गंगामाटी जायेंगे और वहीं कुछ दिन रहेंगे।''
कहा, ''समझ लो कि वहाँ चली ही गयीं; किन्तु उनके निकट जाते हुए इस बार तुम्हें शर्म नहीं आयेगी?''
राजलक्ष्मी ने कुण्ठित हास्य से सिर हिलाकर कहा, ''पर उनमें से तो कोई भी यह नहीं जानता कि काशी में बाल वगैरह कटाकर मैंने स्वाँग बनाया था। बाल अब बहुत कुछ बढ़ गये हैं, पता नहीं पड़ सकता कि कभी कटे थे, और फिर मेरे सारे अन्याय और सारी लज्जा दूर करने के लिए तुम भी तो मेरे साथ हो!''
कुछ ठहरकर बोली, ''खबर मिली है कि वह हतभागिनी मालती फिर लौट आई है और साथ लाई है अपने पति को। उसके लिए एक हार गढ़वा दूँगी।''
कहा, ''ठीक है, गढ़ा देना किन्तु वहाँ जाकर फिर अगर सुनन्दा के पल्ले पड़ जाओ...''
राजलक्ष्मी जल्दी से बोल उठी, ''नहीं जी नहीं, अब वह डर नहीं है, उसका मोह अब दूर हो गया है। बाप रे बाप, ऐसी धर्म-बुद्धि दी कि रात-दिन न तो ऑंखों के ऑंसू ही रोक सकी, न खाना ही खा सकी और न सो सकी। यही बहुत है कि पागल नहीं हुई।'' फिर उसने हँसकर कहा, ''तुम्हारी लक्ष्मी चाहे जैसी हो, लेकिन अस्थिर मन की नहीं है। उसने एक बार जिसे सत्य समझ लिया, फिर उसे उससे कोई डिगा नहीं सकता।'' कुछ क्षण नीरव रहकर फिर बोली, ''मेरा सारा मन मानो इस वक्त आनन्द में डूबा हुआ है। हर वक्त ऐसा लगता है कि इस जीवन का सब कुछ मिल गया है, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। यदि यह भगवान का निर्देश नहीं तो और क्या है, बताओ? प्रतिदिन पूजा कर देवता के चरणों में अपने लिए कुछ कामना नहीं करती, केवल यही प्रार्थना करती हूँ कि ऐसा आनन्द संसार में सबको मिले। इसलिए तो आनन्द देवर को बुला भेजा है कि उसके काम में अब से थोड़ी-बहुत सहायता करूँगी।''
''अच्छी बात है, करो।''
राजलक्ष्मी अपने मन में न जाने क्या सोचने लगी, फिर सहसा कह उठी- ''देखो, इस सुनन्दा के जैसे अच्छी, निर्लोभ और सत्यवादी और कोई दूसरी औरत मैंने नहीं देखी, पर जब तक उसकी विद्या की गरमी न जायेगी तब तक वह विद्या किसी काम नहीं लगेगी।''
''पर सुनन्दा को विद्या का घमण्ड तो नहीं है?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं, दूसरों की तरह नहीं है-और यह बात मैंने कही भी नहीं। वह कितने श्लोक, कितनी शास्त्र-कथाएँ, कितने उपाख्यान जानती है। उसके मुँह से सुन-सुनकर ही तो मेरी यह धारणा हुई थी कि मैं तुम्हारी कोई नहीं हूँ, हमारा सम्बन्ध झूठा है- और विश्वास भी तो यही करना चाहा था- पर भगवान ने मेरी गर्दन पकड़कर समझा दिया कि इससे बढ़कर मिथ्या और कुछ नहीं है। इसी से समझ लो कि उसकी विद्या में कहीं जबरदस्त भूल है। इसीलिए देखती हूँ कि वह किसी को सुखी नहीं कर सकती, सिर्फ दु:ख ही दे सकती है। उसकी जेठानी उससे बहुत बड़ी है। सीधी-सादी है, पढ़ना-लिखना नहीं जानती, पर दिल में दया-माया भरी हुई है। कितने दु:खी और दरिद्र परिवारों का वह लुक-छिपकर प्रतिपालन करती है- किसी को पता भी नहीं चलता। जुलाहे-परिवार के साथ जो एक सुव्यवस्था हो गयी, वह क्या कभी सुनन्दा के जरिए हो सकती थी? तुम क्या यह सोचते हो कि वह तेज दिखलाकर मकान छोड़कर चले जाने के कारण हुई है? कभी नहीं। यह तो उसकी बड़ी देवरानी ने अपने पति के पैरों पड़ और रो-धोकर किया है। सुनन्दा ने सारी दुनिया के सामने अपने बड़े जेठ को चोर कहकर छोटा कर दिया- यही क्या शास्त्र-शिक्षा का सुफल है? उसकी पोथी की विद्या जब तक मनुष्यों के सुख-दु:ख, भलाई-बुराई, पाप-पुण्य, लोभ-मोह के साथ सामंजस्य नहीं कर पाती तब तक पुस्तकों के पढ़े हुए कर्तव्य-ज्ञान का फल मनुष्य को बिना कारण छेदेगा, अत्याचार करेगा और तुम्हें बताये देती हूँ, कि संसार में किसी का भी कल्याण नहीं करेगा।''
ये बातें सुनकर विस्मित हुआ। पूछा, ''यह सब तुमने सीखा किससे?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''क्या मालूम किससे, शायद तुमसे ही। तुम कुछ करते नहीं, कुछ माँगते नहीं, किसी पर जोर नहीं डालते। इसीलिए तुमसे सीखना सिर्फ सीखना नहीं है, वह तो सत्यरूप में पाना है। हठात् एक दिन आश्चर्य के साथ सोचना पड़ता है कि यह सब कहाँ से आया? पर इसे जाने दो, इस बार जाकर बड़ी कुशारी-गृहिणी से मित्रता करूँगी और उस दफा उनकी अवहेलना करके जो गलती की है, अबकी बार उसे सुधारूँगी। चलोगे न गंगामाटी?''
''किन्तु बर्मा? मेरी नौकरी?''
''फिर वही नौकरी? अभी तो कहा कि मैं तुम्हें नौकरी नहीं करने दूँगी।''
''लक्ष्मी, तुम्हारा स्वभाव खूब है। तुम कहती कुछ नहीं, चाहती कुछ नहीं, किसी पर जोर भी नहीं करतीं-विशुद्ध वैष्णव- सहनशीलता का नमूना सिर्फ तुम्हारे ही निकट मिलता है।''
''इसीलिए क्या जिसकी जो इच्छा होगी, उसी का अनुमोदन करना पड़ेगा? संसार में क्या और किसी का दु:ख-सुख नहीं है? तुम्हीं सब कुछ हो?''
''ठीक कहती हो, किन्तु अभया? उसने प्लेग का भय नहीं किया। अगर उस दुर्दिन में आश्रय देकर वह न बचाती तो शायद आज तुम मुझे पातीं ही नहीं। आज उसका क्या हुआ, यह क्या बिल्कु।ल ही न सोचूँ?''
राजलक्ष्मी क्षण-भर में ही करुणा और कृतज्ञता से बिगलित होकर बोली, ''तो तुम रहो, आनन्द देवर को लेकर मैं बर्मा जाती हूँ, पकड़कर उन लोगों को ले आऊँगी। यहाँ उनके लिए कोई प्रबन्ध हो ही जायेगा।''
''यह हो सकता है, किन्तु वे बहुत अभिमानिनी है। मैं न गया तो शायद वह न आयेगी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''आयेगी। यह समझेगी कि तुम्हीं उन लोगों को लेने आये हो। देखना, मेरा कहना गलत नहीं होगा।''
''पर मुझे छोड़कर जा तो सकोगी?''
राजलक्ष्मी पहले तो चुप रही, फिर अनिश्चित कण्ठ से धीरे से बोली, ''इसी का तो मुझे डर है। शायद नहीं जा सकूँगी। पर इससे पहले चलो न थोड़े दिनों तक गंगामाटी में चलकर रहें।''
''वहाँ क्या तुम्हें कोई विशेष काम है?''
''थोड़ा-सा है। कुशारीजी को खबर मिली है कि पास का पोड़ामाटी गाँव बिकने वाला है। सोचती हूँ कि वह खरीद लूँ। और उस मकान को भी अच्छी तरह से तैयार कराऊँ जिससे तुम्हें रहने में कष्ट न हो। उस दफा देखा कमरे के अभाव में तुम्हें बड़ा कष्ट होता था।''
''कमरे के अभाव की वजह से कष्ट नहीं होता था, कष्ट तो दूसरे कारण से होता था!''
राजलक्ष्मी ने जान-बूझकर ही इस बात पर कोई ध्यािन नहीं दिया। कहा, ''मैंने देखा है कि वहाँ तुम्हारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है। तुम्हें शहर में ज्यादा दिनों तक रखने का साहस नहीं होता, इसीलिए तो जल्दी से हटा ले जाना चाहती हूँ।''
''पर इस भंगुर शरीर के लिए अगर तुम क्षण-क्षण इतनी उद्विग्न होती रहोगी तो मन को शान्ति नहीं मिलेगी, लक्ष्मी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''यह उपदेश बहुत काम का है, पर यह मुझे न देकर यदि खुद ही जरा सावधान रहो, तो शायद थोड़ी-सी शान्ति पा सकूँ।'' सुनकर चुप रहा। क्योंकि, इस बारे में तर्क करना सिर्फ निष्फल ही नहीं, अप्रीतिकर भी होता है। स्वयं उसका अपना स्वास्थ्य अटूट है, पर जिसको यह सौभाग्य प्राप्त नहीं है बिना कारण भी वह बीमार हो सकता है, यह बात वह किसी तरह भी नहीं समझेगी। कहा, ''शहर में मैं कभी नहीं रहना चाहता। उस समय गंगामाटी मुझे अच्छी ही लगी थी। यह बात तुम आज भूल गयी हो लक्ष्मी कि, मैं वहाँ से अपनी इच्छा से चला भी नहीं आया था।''
''नहीं जी नहीं, भूली नहीं हूँ, सारी जिन्दगी नहीं भूलूँगी'' यह कहकर वह जरा हँसी। बोली, ''उस बार तुम्हें ऐसा लगता था मानो किसी अनजान जगह में आ गये हो, पर इस बार जाकर देखोगे कि उसकी आकृति-प्रकृति ऐसी बदल गयी है कि उसे अपना समझने में तुम्हें जरा भी अड़चन न होगी। और सिर्फ घर-बार और रहने की जगह ही नहीं, इस बार जाकर मैं बदलूँगी, स्वयं अपने को और सबसे ज्यादा तोड़-मोड़कर नये सिरे से गढ़ूँगी तुम्हें- अपने नये गुसाईंजी को, जिससे कमललता दीदी फिर पथ-विपथ में घूमने का साथी बनाने का दावा पेश न कर सकें।''
''शायद यही सब सोच-समझकर स्थिर किया है?''
राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, ''हाँ! तुम्हें क्या बिना मूल्य यों ही ले लूँगी- उसका ऋण नहीं चुकाऊँगी? और जाने के पहले, मैं भी तुम्हार जीवन में सचमुच ही आई थी, इस आने के चिह्न को न छोड़ जाऊँगी? ऐसी ही निष्फल चली जाऊँगी? नहीं, यह किसी तरह न होने दूँगी।''
उसके मुँह की ओर देखकर श्रद्धा और स्नेह से हृदय परिपूर्ण हो गया। मन-ही-मन सोचा, हृदय का विनिमय नर-नारी की अत्यन्त साधारण घटना है-संसार में नित्य ही घटती रहती है- विराम नहीं, विशेषत्व नहीं। फिर भी यह दाना और प्रतिग्रह की व्यक्ति-विशेष के जीवन का अवलम्बन कर ऐसे विचित्र विस्मय और सौन्दर्य से उद्भासित हो उठता है कि उसकी महिमा युग-युगान्त तक मनुष्य के हृदय को अभिषिक्त करती रहकर भी समाप्त नहीं होना चाहती। यही वह अक्षय सम्पत्ति है जो मनुष्य को बृहत् करती है, शक्तिशाली बनाती है और अकल्पित कल्याण द्वारा नया बना देती है। पूछा, ''तुम बंकू का क्या करोगी?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''वह अब मुझे नहीं चाहता। सोचता है कि यह आफत दूर हो जाय तो अच्छा है।''
''किन्तु वह तो तुम्हारा नजदीक का अपना है, उस तुमने बचपन से ही पाल-पोसकर आदमी जो बनाया है?''
''यह आदमी बनाने का सम्बन्ध ही रहेगा, और कुछ नहीं। वह मेरा नजदीक का अपना नहीं है।''
''क्यों नहीं है? अस्वीकार कैसे करोगी?''
'अस्वीकार करने की इच्छा मेरी भी न थी,'' फिर क्षण-भर तक चुप रहने के बाद बोली, ''मेरी सब बातें तुम भी नहीं जानते। मेरे विवाह की कहानी सुनी थी?''
''लोगों की जुबानी सुनी थी। पर उस वक्त मैं देश में न था।''
''हाँ, नहीं थे। दु:ख का ऐसा इतिहास और नहीं है, ऐसी निष्ठुरता भी शायद कहीं नहीं हुई। पिता माँ को कभी नहीं ले गये, मैंने भी उन्हें कभी नहीं देखा। हम दोनों बहिनें मामा के यहाँ ही बड़ी हुई, बचपन में ज्वर की वजह से हमारा चेहरा कैसा हो गया था, याद है?''
''है।''
''तो सुनो। बिना अपराध उस दण्ड के परिणाम को सुनकर तुम्हारे जैसे निष्ठुर आदमी को भी दया आ जायेगी। बुखार आता था, पर मौत नहीं आती थी। मामा खुद भी नाना तकलीफों से शय्यागत हो रहे थे। हठात् खबर मिली कि दत्त का ब्राह्मण रसोइया हमारी ही जाति का है, मामा की तरह ही असल कुलीन है। उम्र साठ के करीब है। हम दोनों बहिनों को एक साथ ही उसके हाथों सौंपा जायेगा। सबने कहा कि इस सुयोग को खो देने पर इनका कुँवारापन नहीं उतर सकेगा। उसने सौ रुपये माँगे, मामा ने थोक दर लगाई पचास रुपये। एक ही आसन पर, एक साथ और फिर मेहनत कम। यह उतरा पचहत्तर रुपये पर बोला, ''महाशय, दो-दो भानजियों को कुलीन के हाथ सौंपेंगे और एक जोड़ा बकरी के दाम भी न देंगे? भोर-रात्रि में लग्न थी, दीदी तो जागी थीं किन्तु मैं पोटली जैसी उठाकर लाई गयी और उत्सर्ग कर दी गयी! सुबह से ही बाकी पच्चीस रुपयों के लिए झगड़ा शुरू हो गया। मामा ने कहा, ''बाकी पच्चीस रुपये उधार रहे, अग्नि-संस्कार-क्रिया होने दो।'' वह बोला, ''मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ, इन सब मामलों में उधार-सुधार का काम नहीं।'' आखिर वह लापता हो गया। शायद उसने सोचा कि मामा कहीं न कहीं से रुपये लेकर देंगे और काम पूरा करेंगे। एक दिन हुआ, दो दिन हुए, माँ ने रोना-धोना शुरू किया, मुहल्ले के लोग हँसने लगे, मामा ने दत्त के यहाँ जाकर शिकायत की, किन्तु वह फिर नहीं आया। उसके गाँव में खोज की गयी, वहाँ भी वह नहीं मिला। हमें देखकर कोई कहता कलमुँही, कोई कहता करमफूटी-शर्म के मारे दीदी घर से बाहर नहीं होती थीं। उस घर से छह महीने बाद उन्हें बाहर किया गया श्मशान के लिए! और कोई छह महीने बाद कलकत्ते के किसी होटल से समाचार आया कि वहाँ खाना पकाते वर महोदय भी बुखार से मर गये। इस तरह ब्याह पूरा नहीं हुआ।''
कहा, 'पच्चीस रुपये में दूल्हा खरीदने से यही होता है!''
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:45

राजलक्ष्मी ने कहा, ''उसे तो मेरे हिस्से के पच्चीस रुपये मिल भी गये, पर तुम्हें क्या मिला था- सिर्फ एक करौंदों की माला। वह भी खरीदनी नहीं पड़ी, बन से तोड़ लाई थी।''
कहा, ''जिसके दाम न लगें उसे अमूल्य कहते हैं। और कोई दूसरा आदमी तो दिखाओ जिसे मेरी तरह अमूल्य धन मिला हो?''
''बताओ कि यह क्या तुम्हारे मन की सच्ची बात है?''
''पता नहीं चला?''
''नहीं जी नहीं, नहीं चला सचमुच ही नहीं चला।'' पर कहते-कहते ही वह हँस पड़ी, बोली, ''पता सिर्फ तब चलता है जब तुम सोते हो- तुम्हारे चेहरे की ओर देखकर। पर इस बात को जाने दो। हम दोनों बहिनों जैसा दण्ड इस देश की सैकड़ों लड़कियों को भोगना पड़ता है। और कहीं तो शायद कुत्ते-बिल्लियों की भी इतनी दुर्गति करने में मनुष्य का हृदय-काँपता है।'' यह कह क्षण-भर तक देखते रहने के बाद बोली, ''शायद तुम सोचते होगे कि मेरी शिकायत में अत्युक्ति है, ऐसे दृष्टान्त भला कितने मिलते हैं? उत्तर में यदि कहती कि एक हो तो भी सारे देश के लिए कलंक है, तो मेरा जवाब काफी हो जाता, पर मैं यह न कहूँगी। मैं कहती हूँ कि बहुत होते हैं। चलोगे मेरे साथ उन विधवाओं के पास जिन्हें मैं थोड़ी-बहुत सहायता करती हूँ? वे सबकी सब गवाही देंगी कि उनके घर के लोगों के उनके भी हाथ-पैर बाँधकर ऐसे ही पानी में फेंक दिया था।''
कहा, ''शायद इसी कारण उनके लिए इतनी दया-माया है?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तुम्हें भी होती अगर ऑंखें खोलकर हमारा दु:ख देखते। अब से मैं ही एक-एक कर तुमको सब दिखाऊँगी।''
''मैं नहीं देखूँगा- ऑंखें बन्द किये रहूँगा।''
''नहीं रह सकोगे। मैं अपने काम का भार एक दिन तुम पर ही डाल जाऊँगी। सब भूल जाओगे, पर यह कभी न भूल सकोगे।'' यह कह वह कुछ देर मौन रहकर अकस्मात् अपनी पहली कहानी के सिलसिले में कहने लगी, ''ऐसा अत्याचार तो होता ही है। जिस देश में लड़की की शादी न होने पर धर्म जाता है, जाति जाती है, शर्म से समाज में मुँह नहीं दिखाया जा सकता- गँवार, गूँगी, अन्धी, रोगिणी-किसी की भी रिहाई नहीं- लोग वहाँ एक को छोड़कर दूसरे की ही रक्षा करते हैं। इसके अलावा उस देश में मनुष्यों के लिए दूसरा उपाय ही क्या है, बताओ? उस दिन सब मिलकर यदि हम दोनों बहिनों को बलि न दे देते, तो दीदी शायद मरती नहीं और मैं इस जन्म में इस तरह शायद तुम्हें नहीं भी पाती, पर मेरे मन में तुम हमेशा इसी तरह प्रभु बनकर रहते। और, यही क्यों? मुझे तुम टाल नहीं पाते। जहाँ भी होते- चाहे जितने दिन हो जाते, तुम्हें खुद आकर ले ही जाना पड़ता।''
कुछ जवाब देने की सोच रहा था, हठात् नीचे से एक किशोर कण्ठ की पुकार आयी, ''मौसी?''
आश्चर्य से पूछा, ''यह कौन है?''
''उस मकान की मँझली बहू का लड़का है,'' कहकर उसने इशारे से पास का मकान दिखा दिया और जवाब दिया, ''क्षितीश, ऊपर आओ बेटा।'' दूसरे ही क्षण एक सोलह-सत्रह वर्ष के सुश्री बलिष्ठ किशोर ने कमरे में प्रवेश किया। मुझे देखकर पहिले तो वह संकुचित हुआ, फिर नमस्कार करके अपनी मौसी से बोला, ''आपके नाम मौसी, बारह रुपया चन्दा लिखा गया है।''
''लिख लो बेटा, पर होशियारी से तैरना, कोई दुर्घटना न हो।''
''नहीं, कोई डर नहीं मौसी।''
राजलक्ष्मी ने आलमारी खोलकर उसके हाथ में रुपये दिये, लड़का द्रुतवेग से सीढ़ी पर से उतरते-उतरते हठात् खड़ा होकर बोला, ''माँ ने कहा है कि छोटे मामा परसों सुबह आकर सारा 'एस्टीमट' बना देंगे।'' और तेजी के साथ चला गया।
प्रश्न किया, ''किस बात का एस्टीमेट?''
''मकान की मरम्मत नहीं करनी होगी? तीसरी मंजिल का जो कमरा उन्होंने आधा बनवाकर डाल रखा है, उसे पूरा नहीं करना होगा?''
''यह तो होगा, पर इतने आदमियों से तुमने पहिचान कैसे कर ली?''
''वाह, ये सब तो पास के मकान के ही आदमी हैं। पर अब नहीं, जाती हूँ- तुम्हारा खाना तैयार करने का वक्त हो गया।'' यह कहकर वह उठी और नीचे चली गयी।
एक दिन सुबह स्वामी आनन्द आ पहुँचे। रतन को यह पता न था कि उन्हें आने का निमन्त्रण दिया गया है। उदास चेहरे से उसने आकर खबर दी, ''बाबू, गंगामाटी का वह साधु आ पहुँचा है। बलिहारी है, खोज-खाजकर पता लगा ही लिया।''
रतन सभी साधु-सज्जनों को सन्देह की दृष्टि से देखता है। राजलक्ष्मी के गुरुदेव को तो वह फूटी ऑंख नहीं देख सकता। बोला, ''देखिए, यह इस बार किस मतलब से आया है। ये धार्मिक लोग रुपये लेने के अनेक कौशल जानते हैं।''
हँसकर कहा, ''आनन्द बड़े आदमी का लड़का है, डॉक्टरी पास है, उसे अपने लिए रुपयों की जरूरत नहीं।''
''हूँ, बड़े आदमी का लड़का है! रुपया रहने पर क्या कोई इस रास्ते पर आता है!'' इस तरह अपना सुदृढ़ अभिमत व्यक्त करके वह चला गया। रतन को असली आपत्ति यहीं पर है। माँ के रुपये कोई ले जाय, इसका वह जबरदस्त विरोधी है। हाँ, उसकी अपनी बात अलग है।''
वज्रानन्द ने आकर मुझे नमस्कार किया, कहा, ''और एक बार आ गया दादा, कुशल तो है? दीदी कहाँ हैं?''
''शायद पूजा करने बैठी हैं, निश्चय ही उन्हें खबर नहीं मिली है।''
''तो खुद ही जाकर संवाद दे दूँ। पूजा करना भाग थोड़े ही जायेगा, अब वे एक बार रसोईघर की तरफ भी दृष्टिपात करें। पूजा का कमरा किस तरफ है दादा? और वह नाई का बच्चा कहाँ गया- जरा चाय का पानी चढ़ा दे।''
पूजा का कमरा दिखा दिया। रतन को पुकारते हुए आनन्द ने उस ओर प्रस्थान किया।
दो मिनट बाद दोनों ही आकर उपस्थित हुए। आनन्द ने कहा, ''दीदी, पाँचेक-रुपये दे दो, चाय पीकर जरा सियालदा बाजार घूम आऊँ।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''नजदीक ही एक अच्छा बाजार है आनन्द, उतनी दूर क्यों जाओगे? और तुम ही क्यों जाओगे? रतन को जाने दो न!''
''कौन रतन? उस आदमी का विश्वास नहीं दीदी, मैं आया हूँ इसीलिए शायद वह छाँट-छाँटकर सड़ी हुई मछलियाँ खरीद लायेगा।'' कहकर हठात् देखा कि रतन दरवाजे पर खड़ा है। तब जीभ दबाकर कहा, ''रतन, बुरा न मानना भाई, मैंने समझा था कि तुम उधर चले गये हो, पुकारने पर उत्तर नहीं मिला था न!''
राजलक्ष्मी हँसने लगी, मुझसे भी बिना हँसे न रहा गया। रतन की भौंहें नहीं चढ़ीं, उसने गम्भीर आवाज में कहा, ''मैं बाजार जा रहा हूँ माँ, किसन ने चाय का पानी चढ़ा दिया है।'' और वह चला गया। राजलक्ष्मी ने कहा, ''शायद रतन की आनन्द से नहीं बनती?''
आनन्द ने कहा, ''हाँ, पर मैं उसे दोष नहीं दे सकता दीदी। वह आपका हितैषी है- ऐरों-गैरों को नहीं घुसने देना चाहता। पर आज उससे मेल कर लेना होगा, नहीं तो खाना अच्छा नहीं मिलेगा। बहुत दिनों का भूखा हूँ।''
राजलक्ष्मी ने जल्दी से बरामदे में जाकर कहा, ''रतन और कुछ रुपये ले जा भाई, क्योंकि एक बड़ी-सी रुई मछली लानी होगी।'' लौटकर कहा, ''मुँह-हाथ धो लो भाई, मैं चाय तैयार कर लाती हूँ।'' कहकर वह नीचे चली गयी।
आनन्द ने कहा, ''दादा, एकाएक तलबी क्यों हुई?''
''इसकी कैफियत क्या मैं दूँगा आनन्द?''
आनन्द ने हँसते हुए कहा, ''देखता हूँ कि दादा का अब भी वही भाव है- नाराजगी दूर नहीं हुई है। फिर कहीं लापता हो जाने का इरादा तो नहीं है? उस दफा गंगामाटी में कैसी झंझट में डाल दिया था! इधर सारे देश के लोगों का निमन्त्रण और उधर मकान का मालिक लापता! बीच में मैं- नया आदमी -इधर दौड़ूं, उधर दौड़ूं, दीदी पैर फैलाकर रोने बैठ गयीं, रतन ने लोगों को भगाने का उद्योग किया- कैसी विपत्ति थी! वाह दादा, आप खूब हैं!''
मैं भी हँस पड़ा, बोला, ''अबकी बार नाराजगी दूर हो गयी है। डरो मत।''
आनन्द ने कहा, ''पर भरोसा तो नहीं होता। आप जैसे नि:संग, एकाकी लोगों से मैं डरता हूँ और अकसर सोचता हूँ कि आपने अपने को संसार में क्यों बँधने दिया।''
मन ही मन कहा, तकदीर! और मुँह से कहा, ''देखता हूँ कि मुझे भूले नहीं हो, बीच-बीच में याद करते थे?''
आनन्द ने कहा, ''नहीं दादा, आपको भूलना भी मुश्किल है और समझना भी कठिन है, मोह दूर करना तो और भी कठिन है। अगर विश्वास न हो तो कहिए, दीदी को बुलाकर गवाही दे दूँ। आपसे सिर्फ दो-तीन दिन का ही तो परिचय है, पर उस दिन दीदी के साथ सुर में सुर मिलाकर मैं भी जो रोने नहीं बैठ गया सो सिर्फ इसलिए कि यह सन्यासी धर्म के बिल्कुशल खिलाफ है।''
बोला, ''वह शायद दीदी की खातिर। उनके अनुरोध से ही तो इतनी दूर आये हों?''
आनन्द ने कहा, ''बिल्कुकल झूठ नहीं है दादा। उनका अनुरोध तो सिर्फ अनुरोध नहीं है, वह तो मानो माँ की पुकार है, पैर अपने आप चलना शुरू कर देते हैं। न जाने कितने घरों में आश्रय लेता हूँ, पर ठीक ऐसा तो कहीं नहीं देखता। सुना है कि आप भी तो बहुत घूमे हैं, आपने भी कहीं कोई इनके ऐसी और देखी है?''
कहा, ''बहुत।''
राजलक्ष्मी ने प्रवेश किया। कमरे में घुसते ही उसने मेरी बात सुन ली थी, चाय की प्याली आनन्द के निकट रखकर मुझसे पूछा, ''बहुत क्या जी?''
आनन्द शायद कुछ विपद्ग्रस्त हो गया; मैंने कहा, ''तुम्हारे गुणों की बातें। इन्होंने सन्देह जाहिर किया था, इसलिए मैंने जोर से उसका प्रतिवाद किया है।''
आनन्द चाय की प्याली मुँह से लगा रहा था, हँसी की वजह से थोड़ी-सी चाय जमीन पर गिर पड़ी। राजलक्ष्मी भी हँस पड़ी।
आनन्द ने कहा, ''दादा, आपकी उपस्थित-बुद्धि अद्भुत है। यह ठीक उलटी बात क्षण-भर में आपके दिमाग में कैसे आ गयी?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इसमें आश्चर्य क्या है आनन्द? अपने मन की बात दबाते-दबाते और कहानियाँ गढ़कर सुनाते-सुनाते इस विद्या में ये पूरी तरह महामहोपाधयाय हो गये हैं।''
कहा, ''तो तुम मेरा विश्वास नहीं करती?''
''जरा भी नहीं।''
आनन्द ने हँसकर कहा, ''गढ़कर कहने की विद्या में आप भी कम नहीं हैं दीदी। तत्काल ही जवाब दे दिया, ''जरा भी नहीं।''
राजलक्ष्मी भी हँस पड़ी। बोली, ''जल-भुनकर सीखना पड़ा है भाई। पर अब तुम देर मत करो, चाय पीकर नहा लो। यह अच्छी तरह जानती हूँ कि कल ट्रेन में तुम्हारा भोजन नहीं हुआ। इनके मुँह से मेरी सुख्याति सुनने के लिए तो तुम्हारा सारा दिन भी कम होगा।'' यह कहकर वह चली गयी।
आनन्द ने कहा, ''आप दोनों जैसे दो व्यक्ति संसार में विरल हैं। भगवान ने अद्भुत जोड़ मिलाकर आप लोगों को दुनिया में भेजा है।''
''उसका नमूना देख लिया न?''
''नमूना तो उस पहिले ही दिन साँईथियाँ स्टेशन के पेड़-तले देख लिया था। इसके बाद और कोई कभी नजर नहीं आया।''
''आहा! ये बातें यदि तुम उनके सामने ही कहते आनन्द!''
आनन्द काम का आदमी है, काम करने का उद्यम और शक्ति उसमें विपुल है। उसको निकट पाकर राजलक्ष्मी के आनन्द की सीमा नहीं। रात-दिन खाने की तैयारियाँ तो प्राय: भय की सीमा तक पहुँच गयी। दोनों में लगातार कितने परामर्श होते रहे, उन सबको मैं नहीं जानता। कान में सिर्फ यह भनक पड़ी कि गंगामाटी में एक लड़कों के लिए और एक लड़कियों के लिए स्कूल खोला जायेगा। वहाँ काफी गरीब और नीच जाति के लोगों का वास है और शायद वे ही उपलक्ष्य हैं। सुना कि चिकित्सा का भी प्रबन्ध किया जायेगा। इन सब विषयों की मुझमें तनिक भी पटुता नहीं। परोपकार की इच्छा है पर शक्ति नहीं। यह सोचते ही कि कहीं कुछ खड़ा करना या बनाना पड़ेगा, मेरा श्रान्त मन 'आज नहीं, कल' कह-कहकर दिन टालना चाहता है। अपने नये उद्योग में बीच-बीच में आनन्द मुझे घसीटने आता, पर राजलक्ष्मी हँसते हुए बाधा देकर कहती, ''इन्हें मत लपेटो आनन्द, तुम्हारे सब संकल्प पंगु हो जायेंगे।''
सुनने पर प्रतिवाद करना ही पड़ता। कहता, ''अभी-अभी उस दिन तो कहा कि मेरा बहुत काम है और अब मुझे बहुत कुछ करना होगा!''
राजलक्ष्मी ने हाथ जोड़कर कहा, ''मेरी गलती हुई गुसाईं, अब ऐसी बात कभी जबान पर नहीं लाऊँगी।''
''तब क्या किसी दिन कुछ भी नहीं करूँगा?''
''क्यों नहीं करोगे? यदि बीमार पड़कर डर के मारे मुझे अधमरा न कर डालो, तो इससे ही मैं तुम्हारे निकट चिरकृतज्ञ रहूँगी।''
आनन्द ने कहा, ''दीदी, इस तरह तो आप सचमुच ही इन्हें अकर्मण्य बना देंगी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''मुझे नहीं बनाना पड़ेगा भाई, जिस विधाता ने इनकी सृष्टि की है उसी ने इसकी व्यवस्था कर दी है- कहीं भी त्रुटि नहीं रहने दी है।''
आनन्द हँसने लगा। राजलक्ष्मी ने कहा, ''और फिर वह जलमुँहा ज्योतिषी ऐसा डर दिखा गया है कि इनके मकान से बाहर पैर रखते ही मेरी छाती धक्-धक् करने लगती है- जब तक लौटते नहीं तब तक किसी भी काम में मन नहीं लगा सकती।''
''इस बीच ज्योतिषी कहाँ मिल गया? क्या कहा उसने?''
इसका उत्तर मैंने दिया। कहा, ''मेरा हाथ देखकर वह बोला कि बहुत बड़ा विपद्-योग है- जीवन-मरण की समस्या!''
''दीदी, इन सब बातों पर आप विश्वास करती हैं?''
मैंने कहा, ''हाँ करती हैं जरूर करती हैं। तुम्हारी दीदी कहती हैं कि क्या विपद्-योग नाम की कोई बात ही दुनिया में नहीं है? क्या कभी किसी पर आफत नहीं आती?''
आनन्द ने हँसकर कहा, ''आ सकती है, पर हाथ देखकर कोई कैसे बता सकता है दीदी?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''यह तो नहीं जानती भाई, पर मुझे यह भरोसा जरूर है कि जो मेरे जैसी भाग्यवती है, उसे भगवान इतने बड़े दु:ख में नहीं डुबायेंगे।''
क्षण-भर तक स्तब्धता के साथ उसके मुँह की ओर देखकर आनन्द ने दूसरी बात छेड़ दी।
इसी बीच मकान की लिखा-पढ़ी, बन्दोबस्त और व्यवस्था का काम चलने लगा, ढेर की ढेर ईंटें, काठ, चूना, सुरकी, दरवाजे, खिड़कियाँ वगैरह आ पड़ीं। पुराने घर को राजलक्ष्मी ने नया बनाने का आयोजन किया।
उस दिन शाम को आनन्द ने कहा, ''चलिए दादा, जरा घूम आयें।''
आजकल मेरे बाहर जाने के प्रस्ताव पर राजलक्ष्मी अनिच्छा जाहिर किया करती है। बोली, ''घूमकर लौटते-लौटते रात्रि हो जायेगी आनन्द, ठण्ड नहीं लगेगी?''
आनन्द ने कहा, ''गरमी से तो लोग मरे जा रहे हैं दीदी, ठण्ड कहाँ है?''
आज मेरी तबीयत भी बहुत अच्छी न थी। कहा, ''इसमें शक नहीं कि ठण्ड लगने का डर नहीं, पर आज उठने की भी वैसी इच्छा नहीं हो रही है आनन्द।''
आनन्द ने कहा, ''यह जड़ता है। शाम के वक्त कमरे में बैठे रहने से अनिच्छा और भी बढ़ जायेगी-चलिए, उठिए।''
राजलक्ष्मी ने इसका समाधान करने के लिए कहा, ''इससे अच्छा एक दूसरा काम करें न आनन्द। परसों क्षितीज मुझे एक अच्छा हारमोनियम खरीद कर दे गया है, अब तक उसे देखने का वक्त ही नहीं मिला। मैं भगवान का नाम लेती हूँ, तुम बैठकर सुनो- शाम कट जायेगी।'' यह कह उसने रतन को पुकारकर बक्स लाने के लिए कह दिया।
आनन्द ने विस्मय से पूछा, ''भगवान का नाम माने क्या गीत दीदी?''
राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर 'हाँ' की। ''दीदी को यह विद्या भी आती है क्या?''
''बहुत साधारण-सी।'' फिर मुझे दिखाकर कहा, ''बचपन में इन्होंने ही अभ्यास कराया था।''
आनन्द ने खुश होकर कहा, ''दादा तो छिपे हुए रुस्तम हैं, बाहर से पहिचानने का कोई उपाय ही नहीं।''
उसका मन्तव्य सुन लक्ष्मी हँसने लगी, पर मैं सरल मन से साथ न दे सका। क्योंकि आनन्द कुछ भी नहीं समझेगा और मेरे इनकार को उस्ताद के विनय-वाक्य समझ और भी ज्यादा तंग करेगा, और अन्त में शायद नाराज भी हो जायेगा। पुत्र-शोकातुर धृतराष्ट्र-विलाप का दुर्योधन वाला गाना जानता हूँ, पर राजलक्ष्मी के बाद इस बैठक में वह कुछ जँचेगा नहीं।
राजलक्ष्मी ने हारमोनियम आने पर पहले दो-एक भगवान के ऐसे गीत सुनाये जो हर जगह प्रचलित हैं और फिर वैष्णव-पदावली आरम्भ कर दी। सुनकर ऐसा लगा कि उस दिन मुरारीपुर के अखाड़े में भी शायद इतना अच्छा नहीं सुना था। आनन्द विस्मय से अभिभूत हो गया, मेरी ओर इशारा कर मुग्ध चित्त से बोला, ''यह सब क्या इन्हीं से सीखा है दीदी?''
''सब क्या एक ही आदमी के पास कोई सीखता है आनन्द?''
''यह सही है।'' इसके बाद उसने मेरी तरफ देखकर कहा, ''दादा, अब आपको दया करनी होगी। दीदी कुछ थक गयी हैं।''
''नहीं भाई, मेरी तबीयत अच्छी नहीं है।';'
''तबीयत के लिए मैं जिम्मेदार हूँ, क्या अतिथि का अनुरोध नहीं मानेंगे?''
''मानने का उपाय जो नहीं है, तबीयत बहुत खराब है।''
राजलक्ष्मी गम्भीर होने की चेष्टा कर रही थी पर सफल न हो सकी, हँसी के मारे लोट-पोट हो गयी। आनन्द ने अब मामला समझा, बोला, ''दीदी, तो सच बताओ कि आपने किससे इतना सीखा?''
मैंने कहा, ''जो रुपयों के परिवर्तन में विद्या-दान करते हैं उनसे, मुझसे नहीं भैया। दादा इस विद्या के पास से भी कभी नहीं फटका।''
क्षण भर मौन रहकर आनन्द ने कहा, ''मैं भी कुछ थोड़ा-सा जानता हूँ दीदी, पर ज्यादा सीखने का वक्त नहीं मिला। यदि इस बार सुयोग मिला तो आपका शिष्यत्व स्वीकार कर अपनी शिक्षा को सम्पूर्ण कर लूँगा। पर आज क्या यहीं रुक जाँयगी, और कुछ नहीं सुनायेंगी?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''अब वक्त नहीं है भाई, तुम लोगों का खाना जो तैयार करना है।''
आनन्द ने नि:श्वास छोड़कर कहा, ''जानता हूँ कि संसार में जिनके ऊपर भार है उनके पास वक्त कम है। पर उम्र में मैं छोटा हूँ, आपका छोटा भाई। मुझे सिखाना ही होगा। अपरिचित स्थान में जब अकेला वक्त कटना नहीं चाहेगा, तब आपकी इस दया का स्मरण करूँगा।''
राजलक्ष्मी ने स्नेह से विगलित होकर कहा, ''तुम डॉक्टर हो, विदेश में अपने इस स्वास्थ्यहीन दादा के प्रति दृष्टि रखना भाई, मैं जितना भी जानती हूँ उतना तुम्हें प्यार से सिखाऊँगी।''
''पर इसके अलावा क्या आपको और कोई फिक्र नहीं है दीदी?''
राजलक्ष्मी चुप रही। आनन्द ने मुझे उद्देश्य कर कहा, ''दादा जैसा भाग्य सहसा नजर नहीं आता।''
मैंने इसका उत्तर दिया, ''और ऐसा अकर्मण्य व्यक्ति ही क्या जल्दी नजर आता है आनन्द? ऐसों की नकेल पकड़ने के लिए भगवान मजबूत आदमी भी दे देता है, नहीं तो वे बीच समुद्र में ही डूब जाँय- किसी तरह घाट तक पहुँच ही न पायें। इसी तरह संसार में सामंजस्य की रक्षा होती है भैया, मेरी बातें मिलाकर देखना, प्रमाण मिल जायेगा।''
राजलक्ष्मी भी मुहूर्त-भर नि:शब्द देखती रही, फिर उठ गयी। उसे बहुत काम है।
इन कुछ दिनों के अन्दर ही मकान का काम शुरू हो गया, चीज-बस्त को एक कमरे में बन्दकर राजलक्ष्मी यात्रा के लिए तैयारी करने लगी। मकान का भार बूढ़े तुलसीदास पर रहा।
जाने के दिन राजलक्ष्मी ने मेरे हाथ में एक पोस्टकार्ड देकर कहा, ''मेरी चार पन्ने की चिट्ठी का यह जवाब आया है- पढ़कर देख लो।'' और वह चली गयी।
दो-तीन लाइनों में कमललता ने लिखा है-
''सुख से ही हूँ बहिन, जिनकी सेवा में अपने को निवेदन कर दिया है, मुझे अच्छा रखने का भार भी उन्हीं पर है। यही प्रार्थना करती हूँ कि तुम लोग कुशल रहो। बड़े ग़ुर्साईंजी अपनी आनन्दमयी के लिए श्रद्धा प्रगट करते हैं।
-इति श्री श्रीराधाकृष्णचरणाश्रिता, कमललता।''
उसने मेरे नाम का उल्लेख भी नहीं किया है। पर इन कई अक्षरों की आड़ में उसकी न जाने कितनी बातें छुपी रह गयीं। खोजने लगा कि चिट्ठी पर एक बूँद ऑंसू का दाग भी क्या नहीं पड़ा है? पर कोई भी चिह्न नजर नहीं आया।
चिट्ठी को हाथ में लेकर चुप बैठा रहा। खिड़की के बाहर धूप से तपा हुआ नीलाभ आकाश है, पड़ोसी के घर के दो नारियल के वृक्षों के पत्तों की फाँक से उसका कुछ अंश दिखाई देता है। वहाँ अकस्मात् ही दो चेहरे पास ही पास मानो तैर आये, एक मेरी राजलक्ष्मी का-कल्याण की प्रतिमा, दूसरा कमललता का, अपरिस्फुट, अनजान जैसे कोई स्वप्न में देखी हुई छवि।
रतन ने आकर ध्या न भंग कर दिया। बोला, ''स्नान का वक्त हो गया है बाबू, माँ ने कहा है।''
स्नान का समय भी नहीं बीत जाना चाहिए!
फिर एक दिन सुबह हम गंगामाटी जा पहुँचे। उस बार आनन्द अनाहूत अतिथि था, पर इस बार आमन्त्रित बान्धव। मकान में भीड़ नहीं समाती, गाँव के आत्मीय और अनात्मीय न जाने कितने लोग हमें देखने आये हैं। सभी के चेहरों पर प्रसन्न हँसी और कुशल-प्रश्न है। राजलक्ष्मी ने कुशारीजी की पत्नी को प्रणाम किया। सुनन्दा रसोई के काम में लगी थी, बाहर निकल आई और हम दोनों को प्रणाम करके बोली, ''दादा, आपका शरीर तो वैसा अच्छा दिखाई नहीं देता!''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''अच्छा और कब दिखता था बहिन? मुझसे तो नहीं हुआ, अब शायद तुम लोग अच्छा कर सको- इसी आशा से यहाँ ले आई हूँ।''
मेरे विगत दिनों की बीमारी की बात शायद बड़ी बहू को याद आ गयी, उन्होंने स्नेहार्द्र कण्ठ से दिलासा देते हुए कहा- ''डर की कोई बात नहीं है बेटी, इस देश के हवा-पानी से दो दिन में ही ये ठीक हो जायेंगे।'' मेरी समझ में नहीं आया कि मुझे क्या हुआ है और किसलिए इतनी दुश्चिन्ता है!
इसके बाद नाना प्रकार के कामों का आयोजन पूरे उद्यम के साथ शुरू हो गया। पोड़ामाटी को खरीदने की बातचीत से शुरू करके शिशु-विद्यालय की प्रतिष्ठा के लिए स्थान की खोज तक किसी भी काम में किसी को जरा भी आलस्य नहीं।
सिर्फ मैं अकेला ही मन में कोई उत्साह अनुभव नहीं करता। या तो यह मेरा स्वभाव ही है, या फिर और ही कुछ जो दृष्टि के अगोचर मेरी समस्त प्राण-शक्ति का धीरे-धीरे मूलोच्छेदन कर रहा है। एक सुभीता यह हो गया है कि मेरी उदासीनता से कोई विस्मित नहीं होता, मानों मुझसे और किसी बात की प्रत्याशा करना ही असंगत है। मैं दुर्बल हूँ, अस्वस्थ हूँ, मैं कभी हूँ और कभी नहीं हूँ। फिर भी कोई बीमारी नहीं है, खाता पीता और रहता हूँ। अपनी डॉक्टरी विद्या द्वारा ज्यों ही कभी आनन्द हिलाने-डुलाने की कोशिश करता है त्यों ही राजलक्ष्मी सस्नेह उलाहने के रूप में बाधा देते हुए कहती हैं, ''उन्हें दिक् करने का काम नहीं भाई, न जाने क्या से क्या हो जाय। तब हमें ही भोगना पड़ेगा!''
आनन्द कहता, ''आपको सावधान किये देता हूँ कि जो व्यवस्था की है उससे भोगने की मात्रा बढ़ेगी ही, कम नहीं होगी दीदी।''
राजलक्ष्मी सहज ही स्वीकार करके कहती, ''यह तो मैं जानती हूँ आनन्द, कि भगवान ने मेरे जन्म-काल में ही यह दु:ख कपाल में लिख दिया है।''
इसके बाद और तर्क नहीं किया जा सकता।
कभी किताबें पढ़ते हुए दिन कट जाता है, कभी अपनी विगत कहानी को लिखने में और कभी सूने मैदानों में अकेले घूमते। एक बात से निश्चिन्त हूँ कि कर्म की प्रेरणा मुझमें नहीं है। लड़-झगड़कर उछल-कूद मचाकर संसार में दस आदमियों के सिर पर चढ़ बैठने की शक्ति भी नहीं और संकल्प भी नहीं। सहज ही जो मिल जाता है, उसे ही यथेष्ट मान लेता हूँ। मकान-घर, रुपया-पैसा, जमीन-जायदाद, मान-सम्मान, ये सब मेरे लिए छायामय हैं। दूसरों की देखा-देखी अपनी जड़ता को यदि कभी कर्त्तव्य-बुद्धि की ताड़ना से सचेत करना चाहता हूँ तो देखता हूँ कि थोड़ी ही देर में वह फिर ऑंखें बन्द किये ऊँघ रही है- सैकड़ों धक्के देने पर भी हिलना-डुलना नहीं चाहती। देखता हूँ कि सिर्फ एक विषय में तन्द्रातुर मन कलरव से तरंगित हो उठता है और वह है मुरारीपुर के दस दिनों की स्मृति का आलोड़न। मानो कानों में सुनाई पड़ रहा है, वैष्णवी कमललता का सस्नेह अनुरोध- 'नये गुसाईं, यह कर दो न भाई!- अरे जाओ, सब नष्ट कर दिया! मेरी गलती हुई जो तुमसे काम करने के लिए कहा, अब उठो। जलमुँही पद्मा कहाँ गयी, जरा पानी चढ़ा देती, तुम्हारा चाय पीने का समय हो गया है गुसाईं।''
उन दिनों वह खुद चाय के पात्र धोकर रखती थी, इस डरसे कि कहीं टूट न जाँय। उनका प्रयोजन खत्म हो गया है, तथापि क्या मालूम कि फिर कभी काम में आने की आशा से उसने अब भी उन्हें यत्नपूर्वक रख छोड़ा है या नहीं, जानता हूँ कि वह भागूँ-भागूँ कर रही है। हेतु नहीं जानता, तो भी मन में सन्देह नहीं है कि मुरारीपुर के आश्रम में उसके दिन हर रोज संक्षिप्त होते जा रहे हैं। एक दिन अकस्मात् शायद, यही खबर मिलेगी। यह कल्पना करते ही ऑंखों में ऑंसू आ जाते हैं कि वह निराश्रय, नि:सबल पथ-पथ पर भिक्षा माँगती हुई घूम रही है, भूला-भटका मन सान्त्वना की आशा में राजलक्ष्मी की ओर देखता है, जो सबकी सकल शुभचिन्ताओं के अविश्राम कर्म में नियुक्त है-मानों उसके दोनों हाथों की दसों अंगुलियों से कल्याण अजस्र धारा से बह रहा है। सुप्रसन्न मुँह पर शान्ति और सन्तोष की स्निग्धा छाया पड़ रही है। करुणा और ममता से हृदय की यमुना किनारे तक पूर्ण हैं-निरविच्छिन्न प्रेम की सर्वव्यापी महिमा के साथ वह मेरे हृदय में जिस आसन पर प्रतिष्ठित है, नहीं जानता कि उसकी तुलना किससे की जाय।
विदुषी सुनन्दा के दुर्निवार प्रभाव ने कुछ वक्त के लिए उसे जो विभ्रान्त कर दिया था, उसके दु:सह परिताप से उसने अपनी पुरानी सत्ता फिर से पा ली है। एक बात आज भी वह मेरे कानों-कानों में कहती है कि ''तुम भी कम नहीं हो जी, कम नहीं हो! भला यह कौन जानता था कि तुम्हारे चले जाने के पथ पर ही मेरा सर्वस्व पलक मारते ही दौड़ पड़ेगा। ऊ:! वह कैसी भयंकर बात थी! सोचने पर भी डर लगता है कि मेरे वे दिन कटे कैसे थे। धड़कन बन्द होकर मर नहीं गयी, यही आश्चर्य है!'' मैं उत्तर नहीं दे पाता हूँ, सिर्फ चुपचाप देखता रहता हूँ।
अपने बारे में जब उसकी गलती पकड़ने की गुंजाइश नहीं है। सौ कामों के बीच भी सौ दफा चुपचाप आकर देख जाती है। कभी एकाएक आकर नजदीक बैठ जाती है और हाथ की किताब हटाते हुए कहती है, ''ऑंखें बन्द करके जरा सो जाओ न, मैं सिर पर हाथ फेरे देती हूँ। इतना पढ़ने पर ऑंखों में दर्द जो होने लगेगा।''
आनन्द आकर बाहर से ही कहता है, ''एक बात पूछनी है, आ सकता हूँ?''
राजलक्ष्मी कहती हैं, ''आ सकते हो। तुम्हें आने की कहाँ मनाही है आनन्द?''
आनन्द कमरे में घुसकर आश्चर्य से कहता है, ''इस असमय में क्या आप इन्हें सुला रही हैं दीदी?''
राजलक्ष्मी हँसकर जवाब देती है, ''तुम्हारा क्या नुकसान हुआ? नहीं सोने पर भी तो ये तुम्हारी पाठशाला के बछड़ों को चराने नहीं जायेंगे!''
''देखता हूँ कि दीदी इन्हें मिट्टी कर देंगी।''
''नहीं तो खुद जो मिट्टी हुई जाती हूँ, बेफिक्री से कोई काम-काज ही नहीं कर पाती।''
''आप दोनों ही क्रमश: पागल हो जायेंगे।'' कहकर आनन्द बाहर चला जाता है।
स्कूल बनवाने के काम में आनन्द को साँस लेने की भी फुर्सत नहीं है, और सम्पत्ति खरीदने के हंगामे में राजलक्ष्मी भी पूरी तरह डूबी हुई है। इसी समय कलकत्ते के मकान से घूमती हुई, बहुत से पोस्ट-ऑफिसों में की मुहरों को पीठ पर लिये हुए, बहुत देर में, नवीन की सांघातिक चिट्ठी आ पहुँची- गौहर मृत्युशय्या पर है। सिर्फ मेरी ही राह देखता हुआ अब भी जी रहा है। यह खबर मुझे शूल जैसी चुभी। यह नहीं जानता कि बहिन के मकान से वह कब लौटा। वह इतना ज्यादा पीड़ित है, यह भी नहीं सुना-सुनने की विशेष चेष्टा भी नहीं की और आज एकदम शेष संवाद आ गया। प्राय: छह दिन पहले की चिट्ठी है, इसलिए अब वह जिन्दा है या नहीं-यही कौन जानता है! तार द्वारा खबर पाने की व्यवस्था इस देश में नहीं है और उस देश में भी नहीं। इसलिए इसकी चिन्ता वृथा है। चिट्ठी पढ़कर राजलक्ष्मी ने सिर पर हाथ रखकर पूछा, ''तुम्हें क्या जाना पड़ेगा?''
''हाँ।''
''तो चलो, मैं भी साथ चलूँ।''
''यह कहीं हो सकता है? इस आफत के समय तुम कहाँ जाओगी?''
यह उसने खुद ही समझ लिया कि प्रस्ताव असंगत है, मुरारीपुर के अखाड़े की बात भी फिर वह जबान पर न ला सकी। बोली, ''रतन को कल से बुखार है, साथ में कौन जायेगा? आनन्द से कहूँ?''
''नहीं, वह मेरे बिस्तर उठाने वाला आदमी नहीं है!''
''तो फिर साथ में किसन जाय?''
''भले जाय, पर जरूरत नहीं है।''
''जाकर रोज चिट्ठी दोगे, बोलो?''
''समय मिला तो दूँगा।''
''नहीं, यह नहीं सुनूँगी। एक दिन चिट्ठी न मिलने पर मैं खुद आ जाऊँगी चाहे तुम कितने ही नाराज क्यों न हो।'' '
अगत्या राजी होना पड़ा, और हर रोज संवाद देने की प्रतिज्ञा करके उसी दिन चल पड़ा। देखा कि दुश्चिन्ता से राजलक्ष्मी का मुँह पीला पड़ गया है, उसने ऑंखें पोंछकर अन्तिम बार सावधान करते हुए कहा, ''वादा करो कि शरीर की अवहेलना नहीं करोगे?''
''नहीं, नहीं, करूँगा।''
''कहो कि लौटने में एक दिन की भी देरी नहीं करोगे?''
''नहीं, सो भी नहीं करूँगा!''
अन्त में बैलगाड़ी रेलवे स्टेशन की तरफ चल दी।
आषाढ़ का महीना था। तीसरे प्रहर गौहर के मकान के सदर दरवाजे पर जा पहुँचा। मेरी आवाज सुनकर नवीन बाहर आया और पछाड़ खाकर पैरों के पास गिर पड़ा। जो डर था वही हुआ। उस दीर्घकाय बलिष्ठ पुरुष के प्रबलकण्ठ के उस छाती फाड़ने वाले क्रन्दन में शोक की एक नयी मूर्ति देखी। वह जितनी गम्भीर थी, उतनी ही बड़ी और उतनी ही सत्य। गौहर की माँ नहीं, बहिन नहीं, कन्या नहीं, पत्नी नहीं। उस दिन इस संगीहीन मनुष्य को अश्रुओं की माला पहनाकर विदा करनेवाला कोई न था; तो भी ऐसा मालूम होता है कि उसे सज्जाहीन, भूषणहीन, कंगाल वेश में नहीं जाना पड़ा, उसकी लोकान्तर-यात्रा के पथ के लिए शेष पाथेय अकेले नवीन ने ही दोनों हाथ भरकर उड़ेल दिया है।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:46

बहुत देर बाद जब वह उठकर बैठ गया तब पूछा, ''गौहर कब मरा नवीन?''
''परसों। कल सुबह ही हमने उन्हें दफनाया है।''
''कहाँ दफनाया?''
''नदी के किनारे, आम के बगीचे में। और यह उन्हीं ने कहा था। ममेरी बहिन के मकान से बुखार लेकर लौटे और वह बुखार फिर नहीं गया था।''
''इलाज हुआ था?''
''यहाँ जो कुछ हो सकता है सब हुआ, पर किसी से भी कुछ लाभ न हुआ। बाबू खुद ही सब जान गये थे।''
''अखाड़े के बड़े गुसाईंजी आते थे?''
नवीन ने कहा, ''कभी-कभी। नवद्वीप से उनके गुरुदेव आये हैं, इसीलिए रोज आने का वक्त नहीं मिलता था।'' और एक व्यक्ति के बारे में पूछते हुए शर्म आने लगी, तो भी संकोच दूर कर प्रश्न किया, ''वहाँ से और कोई नहीं आया नवीन?''
नवीन ने कहा, ''हाँ, कमललता आई थी।'',
''कब आई थी?''
नवीन ने कहा, ''हर-रोज। अन्तिम तीन दिनों में तो न उन्होंने खाया और न सोया, बाबू का बिछौना छोड़कर एक बार भी नहीं उठीं।''
और कोई प्रश्न नहीं किया, चुप हो रहा। नवीन ने पूछा, ''अब कहाँ जायेंगे, अखाड़े में?''
''हाँ।''
''जरा ठहरिए।'' कहकर वह भीतर गया और एक टीन का बक्स बाहर निकाल लाया। उसे मुझे देते हुए बोला, ''आपको देने के लिए कह गये हैं।''
''क्या है इसमें नवीन?''
''खोलकर देखिए'', कहकर उसने मेरे हाथ में चाबी दे दी। खोलकर देखा कि उसकी कविता की कॉपियाँ रस्सी से बँधी हुई हैं। ऊपर लिखा है, ''श्रीकान्त, रामायण खत्म करने का वक्त नहीं रहा। बड़े गुसाईंजी को दे देना, वे इसे मठ में रख देंगे, जिससे नष्ट न होने पावे।'' दूसरी छोटी-सी पोटली सूती लाल कपड़े की है। खोलकर देखा कि नाना मूल्य के एक बंडल नोट हैं, और उन पर लिखा है, ''भाई श्रीकान्त, शायद मैं नहीं बचूँगा। पता नहीं कि तुमसे मुलाकात होगी या नहीं। अगर नहीं हुई तो नवीन के हाथों यह बक्स दे जाता हूँ, इसे ले लेना। ये रुपये तुम्हें दे जा रहा हूँ।'' यदि कमललता के काम में आयें तो दे देना। अगर न ले तो जो इच्छा हो सो करना। अल्लाह तुम्हारा भला करे।-गौहर।''
दान का गर्व नहीं, अनुनय-विनय भी नहीं। मृत्यु को आसन्न जानकर सिर्फ थोड़े से शब्दों में बाल्य-बन्धु की शुभ कामना कर अपना शेष निवेदन रख गया है। भय नहीं, क्षोभ नहीं, उच्छ्वसित हाय-हाय से उसने मृत्यु का प्रतिवाद नहीं किया। वह कवि था, मुसलमान फकीर-वंश का रक्त उसकी शिराओं में था- शान्त मन से यह शेष रचना अपने बाल्य-बन्धु के लिए लिख गया है। अब तक मेरी ऑंखों के ऑंसू बाहर नहीं निकले थे, पर अब उन्होंने निषेध नहीं माना, वे बड़ी-बड़ी बूँदों में ऑंखों से निकलकर ढुलक पडे।
आषाढ़ का दीर्घ दिन उस वक्त समाप्ति की ओर था। सारे पश्चिम अकाश में काले मेघों का एक स्तर ऊपर उठ रहा था। उसके ही किसी एक संकीर्ण छिद्रपथ से अस्तोन्मुख सूर्य की रश्मियाँ लाल होकर आ पड़ीं, प्राचीर से संलग्न शुष्कप्राय जामुन के पेड़ के सिर पर। इसी की शाखा के सहारे गौहर की माधवी और मालती लताओं के कुंज बने थे। उस दिन सिर्फ कलियाँ थीं। मुझे उनमें से ही कुछ उपहार देने की उसने इच्छा की थी। लेकिन चींटियों के डर से नहीं दे सका था। आज उनमें से गुच्छे के गुच्छे फूले हैं, जिनमें से कुछ तो नीचे झड़ गये हैं और कुछ हवा से उड़कर इर्द-गिर्द बिखर गये हैं। उन्हीं में से कुछ उठा लिये- बाल्य-बन्धु के स्वहस्तों का शेषदान समझकर। नवीन ने कहा, ''चलिए, आपको पहुँचा आऊँ।''
कहा, ''नवीन, जरा बाहर का कमरा तो खोलो, देखूँगा।''
नवीन ने कमरा खोल दिया। आज भी चौकी पर एक ओर बिछौना लिपटा हुआ रक्खा है, एक छोटी पेन्सिल और कुछ फटे कागजों के टुकड़े भी हैं। इसी कमरे में गौहर ने अपनी स्वरचित कविता वन्दिनी सीता के दु:ख की कहानी गाकर सुनाई थी। इस कमरे में न जाने कितनी बार आया हूँ, कितने दिनों तक खाया-पीया और सोया हूँ और उपद्रव कर गया हूँ। उस दिन हँसते-हुए जिन्होंने सब कुछ सहन किया था, अब उनमें से कोई भी जीवित नहीं है। आज अपना सारा आना-जाना समाप्त करके बाहर निकल आया।
रास्ते में नवीन के मुँह से सुना कि गौहर ऐसी ही एक नोटों की छोटी पोटली उसके लड़कों को भी दे गया है। बाकी जो सम्पत्ति बची है, वह उसके ममेरे भाई-बहिनों को मिलेगी, और उसके पिता द्वारा निर्मित मस्जिद के रक्षणावेक्षण के लिए रहेगी।
आश्रम में पहुँचकर देखा कि बहुत भीड़ है। गुरुदेव के साथ बहुत से शिष्य और शिष्याएँ आई हैं। खासी मजलिस जमी है, और हाव-भाव से उनके शीघ्र विदा होने के लक्षण भी दिखाई नहीं दिये। अनुमान किया कि वैष्णव-सेवा आदि कार्य विधि के अनुसार ही चल रहे हैं।
मुझे देखकर द्वारिकादास ने अभ्यर्थना की। मेरे आगमन का हेतु वे जानते थे। गौहर के लिए दु:ख जाहिर किया, पर उनके मुँह पर न जाने कैसा विव्रत, उद्भ्रान्त भाव था, जो पहले कभी नहीं देखा। अन्दाज किया कि शायद इतने दिनों से वैष्णवों की परिचर्या के कारण वे क्लान्त और विपर्यस्त हो गये हैं, निश्चिन्त होकर बातचीत करने का वक्त उनके पास नहीं है।
खबर मिलते ही पद्मा आयी, उसके मुँह पर भी आज हँसी नहीं, ऐसी संकुचित-सी, मानो भाग जाए तो बचे।
पूछा, ''कमललता दीदी इस वक्त बहुत व्यस्त हैं, क्यों पद्मा?''
''नहीं, दीदी को बुला दूँ?'' कहकर वह चली गयी। यह सब आज इतना अप्रत्याशित और अप्रासंगिक लगा कि मन ही मन शंकित हो उठा। कुछ देर बाद ही कमललता ने आकर नमस्कार किया। कहा, ''आओ गुसाईं, मेरे कमरे में चल कर बैठो।''
अपने बिछौने इत्यादि स्टेशन पर ही छोड़कर सिर्फ बैग साथ में लाया था और गौहर का वह बक्स मेरे नौकर के सिर पर था। कमललता के कमरे में आकर, उसे उसके हाथ में देते हुए बोला, ''जरा सावधानी से रख दो, बक्स में बहुत रुपये हैं।''
कमललता ने कहा, ''मालूम है।'' इसके बाद उसे खाट के नीचे रखकर पूछा, ''शायद तुमने अभी तक चाय नहीं पी है?''
''नहीं।''
''कब आये?''
''शाम को।''
''आती हूँ, तैयार कर लाऊँ।'' कहकर वह नौकर को साथ लेकर चल दी और पद्मा भी हाथ-मुँह धोने के लिए पानी देकर चली गयी, खड़ी नहीं रही।
फिर खयाल हुआ कि बात क्या है?
थोड़ी देर बाद कमललता चाय ले आयी, साथ में कुछ फल-फूल, मिठाई और उस वक्त का देवता का प्रसाद। बहुत देर से भूखा था, फौरन ही बैठ गया।
कुछ क्षण पश्चात् ही देवता की सांध्यर-आरती के शंख और घण्टे की आवाज सुनाई पड़ी। पूछा, ''अरे, तुम नहीं गयीं?''
''नहीं, मना है।''
''मना है तुम्हें? इसके मानो?''
कमललता ने म्लान हँसी हँसकर कहा, ''मना के माने हैं मना गुसाईं। अर्थात् देवता के कमरे में मेरा जाना निषिद्ध है।''
आहार करने में रुचि न रही, पूछा ''किसने मना किया?''
''बड़े गुसाईंजी के गुरुदेव ने। और उनके साथ जो आये हैं, उन्होंने।''
''वे क्या कहते हैं?';'
''कहते हैं कि मैं अपवित्र हूँ, मेरी सेवा से देवता कलुषित हो जायेंगे।''
''तुम अपवित्र हो!'' विद्युत वेग से पूछा, ''गौहर की वजह से ही सन्देह हुआ है क्या?''
''हाँ, इसीलिए।''
कुछ भी नहीं जानता था, तो भी बिना किसी संशय के कह उठा, ''यह झूठ है- यह असम्भव है।''
''असम्भव क्यों है गुसाईं?''
''यह तो नहीं बतला सकता कमललता, पर इससे बढ़कर और कोई बात मिथ्या नहीं। ऐसा लगता है कि मनुष्य-समाज में अपने मृत्यु-पथ यात्री बन्धु की एकान्त सेवा का ऐसा ही शेष पुरस्कार दिया जाता है!''
उसकी ऑंखों में ऑंसू आ गये। बोली, ''अब मुझे दु:ख नहीं है। देवता अन्तर्यामी हैं, उनके निकट तो डर नहीं था, डर था सिर्फ तुमसे। आज मैं निर्भय होकर जी गयी गुसाईं।''
''संसार के इतने आदमियों के बीच तुम्हें सिर्फ मुझसे डर था? और किसी से नहीं?''
''नहीं, और किसी से नहीं, सिर्फ तुमसे था।''
इसके बाद दोनों ही स्तब्ध रहे। एक बार पूछा, ''बड़े गुसाईंजी क्या कहते हैं?''
कमललता ने कहा, ''उनके लिए तो और कोई उपाय नहीं है। नहीं तो फिर कोई भी वैष्णव इस मठ में नहीं आयेगा।'' कुछ देर बाद कहा, ''अब यहाँ रहना नहीं हो सकता। यह तो जानती थी कि यहाँ से एक दिन मुझे जाना होगा, पर यही नहीं सोचा था कि इस तरह जाना होगा गुसाईं। केवल पद्मा के बारे में सोचने से दु:ख होता है। लड़की है, उसका कहीं भी कोई नहीं है। बड़े गुसाईंजी को यह नवद्वीप में पड़ी हुई मिली थी। अपनी दीदी के चले जाने पर वह बहुत रोएगी। यदि हो सके तो जरा उसका खयाल रखना। यहाँ न रहना चाहे तो मेरे नाम से राजू को दे देना- वह जो अच्छा समझेगी अवश्य करेगी।''
फिर कुछ क्षण चुपचाप कटे। पूछा, ''इन रुपयों का क्या होगा? न लोगी?''
''नहीं। मैं भिखारिन हूँ, रुपयों का क्या करूँगी-बताओ?''
''तो भी यदि कभी किसी काम में आयें।''
कमललता ने इस बार हँसकर कहा, ''मेरे पास भी तो एक दिन बहुत रुपया था, वह किस काम आया? फिर भी, अगर कभी जरूरत पड़ी तो तुम किसलिए हो? तब तुमसे माँग लूँगी। दूसरे के रुपये क्यों लेने लगी?''
सोच न सका कि इस बात का क्या जवाब दूँ, सिर्फ उसके मुँह की ओर देखता रहा।
उसने फिर कहा, ''नहीं गुसाईं, मुझे रुपये नहीं चाहिए। जिनके श्रीचरणों में स्वयं को समर्पण कर दिया है, वे मुझे नहीं छोड़ेंगे। कहीं भी जाऊँ, वे सारे अभावपूर्ण कर देंगे। मेरे लिए चिन्ता, फिक्र न करो।''
पद्मा ने कमरे में आकर कहा, ''नये गुसाईं के लिए क्या इसी कमरे में प्रसाद ले आऊँ दीदी?''
''हाँ, यहीं ले आओ। नौकर को दिया?''
''हाँ, दे दिया।''
तो भी पद्मा नहीं गयी, क्षण भर तक इधर-उधर करके बोली, ''तुम नहीं खाओगी दीदी?''
''खाऊँगी री जलमुँही, खाऊँगी। जब तू है, तब बिना खाये दीदी की रिहाई है?''
पद्मा चली गयी।
सुबह उठने पर कमललता दिखाई नहीं पड़ी, पद्मा की जुबानी मालूम हुआ कि वह शाम को आती है। दिनभर कहाँ रहती है, कोई नहीं जानता। तो भी मैं निश्चिन्त नहीं हो सका, रात की बातें याद करके डर होने लगा कि कहीं वह चली न गयी हो और अब मुलाकात ही न हो।
बड़े गुसाईंजी के कमरे में गया। सामने उन कॉपियों को रखकर बोला, ''गौहर की रामायण है। उसकी इच्छा थी कि यह मठ में रहे।''
द्वारिकादास ने हाथ फैलाकर रामायण ले ली, बोले, ''यही होगा नये गुसाईं। जहाँ मठ के और सब ग्रन्थ रहते हैं, वहीं उन्हीं के साथ इसे भी रख दूँगा।''
कोई दो मिनट तक चुप रहकर कहा, ''उसके सम्बन्ध में कमललता पर लगाए गये अपवाद पर तुम विश्वास करते हो गुसाईं?''
द्वारिकादास ने मुँह ऊपर उठाकर कहा, ''मैं? जरा भी नहीं।''
''तब भी उसे चला जाना पड़ रहा है?''
''मुझे भी जाना होगा गुसाईं। निर्दोषी को दूर करके यदि खुद बना रहूँ, तो फिर मिथ्या ही इस पथ पर आया और मिथ्या ही उनका नाम इतने दिनों तक लिया।''
''तब फिर उसे ही क्यों जाना पड़ेगा? मठ के कर्त्ता तो तुम हो, तुम तो उसे रख सकते हो?''
द्वारिकादास 'गुरु! गुरु! गुरु!' कहकर मुँह नीचा किये बैठे रहे। समझा कि इसके अलावा गुरु का और आदेश नहीं है।
''आज मैं जा रहा हूँ गुसाईं।'' कहकर कमरे से बाहर निकलते समय उन्होंने मुँह ऊपर उठाकर मेरी ओर ताका। देखा कि उनकी ऑंखों से ऑंसू गिर रहे हैं। उन्होंने मुझे हाथ उठाकर नमस्कार किया और मैं प्रतिनमस्कार करके चला आया।
अपराह्न बेला क्रमश: संध्याक में परिणत हो गयी, संध्याठ उत्तीर्ण होकर रात आयी, किन्तु कमललता नजर नहीं आयी। नवीन का आदमी मुझे स्टेशन पर पहुँचाने के लिए आ पहुँचा। सिर पर बैग रक्खे किसन जल्दी मचा कर कह रहा है- अब वक्त नहीं है- पर कमललता नहीं लौटी। पद्मा का विश्वास था कि थोड़ी देर बाद ही वह आएगी, पर मेरा सन्देह क्रमश: विश्वास बन गया कि वह नहीं आयेगी और शेष विदाई की कठोर परीक्षा से विमुख होकर वह पूर्वाह्न में ही भाग गयी है, दूसरा वस्त्र भी साथ नहीं लिया है। कल उसने भिक्षुणी वैरागिणी बताकर जो आत्म-परिचय दिया था, वह परिचय ही आज अक्षुण्ण रखा।
जाने के वक्त पद्मा रोने लगी। उसे अपना पता देते हुए कहा, ''दीदी ने तुमसे मुझे चिट्ठी लिखते रहने के लिए कहा है- तुम्हारी जो इच्छा हो वह मुझे लिखकर भेजना पद्मा।''
''पर मैं तो अच्छी तरह लिखना नहीं जानती, गुसाईं।''
''तुम जो लिखोगी मैं वही पढ़ लूँगा।''
''दीदी से मिलकर नहीं जाओगे?''
''फिर मुलाकात होगी पद्मा, अब तो मैं जाता हूँ।'' कहकर बाहर निकल पड़ा।
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ऑंखें जिसे सारे रास्ते अन्धकार में भी खोज रही थीं, उससे मुलाकात हुई रेलवे स्टेशन पर। वह लोगों की भीड़ से दूर खड़ी थी, मुझे देख नजदीक आकर बोली, ''एक टिकिट खरीद देना होगा गुसाईं।''
''तब क्या सचमुच ही सबको छोड़कर चल दीं?''
''इसके अलावा और तो कोई उपाय नहीं है।''
''कष्ट नहीं होता कमललता?''
''यह बात क्यों पूछते हो गुसाईं, सब तो जानते हो।''
''कहाँ जाओगी?''
''वृन्दावन जाऊँगी। पर इतनी दूर का टिकिट नहीं चाहिए। तुम पास की ही किसी जगह का खरीद दो।''
''मतलब यह कि मेरा ऋण जितना भी कम हो उतना अच्छा। इसके बाद दूसरों से भिक्षा माँगना शुरू कर दोगी, जब तक कि पथ शेष नहीं हो। यही तो?''
''भिक्षा क्या यह पहली बार ही शुरू होगी गुसाईं? क्या कभी और नहीं माँगी?''
चुप रहा। उसने मेरी ओर ऑंखें फिराकर कहा, ''तो वृन्दावन का टिकिट ही खरीद दो।''
''तो चलो एक साथ ही चलें?''
''तुम्हारा भी क्या यही रास्ता है?''
कहा, ''नहीं, यही तो नहीं है- तो भी जितनी दूर तक है, उतनी ही दूर तक सही।''
गाड़ी आने पर दोनों उसमें बैठ गये। पास की बेंच पर मैंने अपने हाथों से ही उसका बिछौना बिछा दिया।
कमललता व्यस्त हो उठी, ''यह क्या कर रहे हो गुसाईं?''
''वह कर रहा हूँ जो कभी किसी के लिए नहीं किया- हमेशा याद रखने के लिए।''
''सचमुच ही क्या याद रखना चाहते हो?''
''सचमुच ही याद रखना चाहता हूँ कमललता। तुम्हारे अलावा यह बात और कोई नहीं जानेगा।''
''पर मुझे तो दोष लगेगा गुसाईं।''
''नहीं, कोई दोष नहीं लगेगा- तुम मजे से बैठो।''
कमललता बैठी, पर बड़े संकोच के साथ। कितने गाँव, कितने नगर और कितने प्रान्तों को पार करती हुई ट्रेन चल रही थी। नजदीक बैठकर वह धीरे-धीरे अपने जीवन की अनेक कहानियाँ सुनाने लगी। जगह-जगह घूमने की कहानियाँ, मथुरा, वृन्दावन, गोवरधन, राधाकुण्ड-निवास की बातें, अनेक तीर्थ-भ्रमणों की कथाएँ, और अन्त में द्वारिकादास के आश्रय में मुरारीपुर आश्रम में आने की बात। मुझे उस वक्त उस व्यक्ति की विदा के वक्त की बातें याद आ गयीं। कहा, ''जानती हो, कमललता, बड़े गुसाईं तुम्हारे कलंक पर विश्वास न ही करते?'''
''नहीं करते?''
''कतई नहीं। मेरे आने के वक्त उनकी ऑंखों से ऑंसू गिरने लगे, बोले- ''निर्दोषी को दूर करके यदि मैं यहाँ खुद बना रहा नये गुसाईं, तो उनका नाम लेना मिथ्या है और मिथ्या है मेरा इस पथ पर आना।' मठ में वे भी न रहेंगे कमललता और तब ऐसा निष्पाप मधुर आश्रम टूटकर बिल्कुथल नष्ट हो जायेगा।''
''नहीं, नहीं नष्ट होगा, भगवान एक न एक रास्ता अवश्य दिखा देंगे।''
''अगर कभी तुम्हारी पुकार हो, तो फिर वहाँ लौटकर जाओगी?''
''नहीं।''
''यदि वे पश्चात्ताप करके तुमको लौटाया चाहें?''
''तो भी नहीं।''
''पर अब तुमसे कहाँ मुलाकात होगी?''
इस प्रश्न का उसने उत्तर नहीं दिया, चुप रही। काफी वक्त खामोशी में कट गया, पुकारा, ''कमललता?' उत्तर नहीं मिला, देखा कि गाड़ी के एक कोने में सिर रखकर उसने ऑंखें बन्द कर ली हैं। यह सोचकर कि सारे दिन की थकान से सो गयी हैं, जगाने की इच्छा नहीं हुई। उसके बाद फिर, मैं खुद कब सो गया, यह पता नहीं, हठात् कानों में आवाज आयी, ''नये गुसाईं?'' देखा कि वह मेरे शरीर को हिलाकर पुकार रही हैं। बोली, ''उठो, तुम्हारी साँईथिया की ट्रेन खड़ी है।''
जल्दी से उठ बैठा, पास के डिब्बे में किसन सिंह था, पुकारने के साथ ही उसने आकर बैग उतार दिया। बिछौना बाँधते वक्त देखा कि जिन दो चादरों से उसकी शय्या बनाई थी, उसने उनको पहिले से ही तहकर मेरी बेंच पर एक ओर रख दिया है। कहा, ''यह जरा-सा भी तुमने लौटा दिया- नहीं लिया?''
''न जाने कितनी बार चढ़ना-उतरना पड़े, यह बोझा कौन उठाएगा?''
''दूसरा वस्त्र भी साथ नहीं लायी, वह भी क्या बोझा होता? एक-दो वस्त्र निकालकर दूँ?''
''तुम भी खूब हो! तुम्हारे कपड़े भिखारिणी के शरीर पर कैसे फबेंगे?''
''खैर, कपड़े अच्छे नहीं लगेंगे, पर भिखारी को भी खाना तो पड़ता है? पहुँचने में और भी दो-तीन दिन लगेंगे, ट्रेन में क्या खाओगी? जो खाने की चीजें मेरे पास हैं, उन्हें भी क्या फेंक जाऊँ- तुम नहीं छुओगी?''
कमललता ने इस बार हँसकर कहा, ''अरे वाह, गुस्सा हो गये! अजी उन्हें छुऊँगी। रहने दो उन्हें, तुम्हारे चले जाने के बाद मैं पेटभर के खा लूँगी।''
वक्त खत्म हो रहा था, मेरे उतरने के वक्त बोली, ''जरा ठहरो तो गुसाईं, कोई है नहीं- आज छिपकर तुम्हें एक बार प्रणाम कर लूँ।'' यह कहकर, उसने झुककर मेरे पैरों की धूल ले ली।
उतरकर प्लेटफार्म पर खड़ा हो गया। उस वक्त रात समाप्त नहीं हुई थी, नीचे और ऊपर अन्धकार के स्तरों में बँटवारा शुरू हो गया था। आकाश के एक प्रान्त में कृष्ण त्रयोदशी का क्षीण शीर्ण शशि और दूसरे प्रान्त में उषा की आगमनी। उस दिन की बात याद आ गयी, जिस दिन ऐसे ही वक्त देवता के लिए फूल तोड़ने जाने के लिए उसका साथी हुआ था। और आज?
सीटी बजाकर और हरे रंग की लालटेन हिलाकर गार्ड साहब ने यात्रा का संकेत किया। कमललता ने खिड़की से हाथ बढ़ाकर प्रथम बार मेरा हाथ पकड़ लिया। उसके कम्पन में विनती का जो सुर था वह कैसे समझाऊँ? बोली, ''तुमसे कभी कुछ नहीं माँगा है, आज एक बात रखोगे?''
''हाँ रक्खूँगा।'' कहकर उसकी ओर देखने लगा।
कहने में उसे एक क्षण की देर हुई, बोली, ''जानती हूँ कि मैं तुम्हारे कितने आदर की हूँ। आज विश्वासपूर्वक उनके पाद-पद्मों में मुझे सौंपकर तुम निश्चिन्त होओ, निर्भय होओ। मेरे लिए सोच-सोचकर अब तुम अपना मन खराब मत करना गुसाईं, तुम्हारे निकट मेरी यही प्रार्थना है।''
ट्रेन चल दी। उसका वही हाथ अपने हाथ में लिये कुछ दूर अग्रसर होते-होते कहा, ''कमललता, तुम्हें मैंने उन्हीं को सौंपा, वे ही तुम्हारा भार लें। तुम्हारा पथ, तुम्हारी साधना निरापद हो- अपनी कहकर अब मैं तुम्हारा असम्मान नहीं करूँगा।''
हाथ छोड़ दिया, गाड़ी दूर से दूर होने लगी। गवाक्षपथ से देखा, उसके झुके हुए मुँह पर स्टेशन की प्रकाश-माला कई बार आकर पड़ी और फिर अन्धकार में मिल गयी। सिर्फ यही मालूम हुआ कि हाथ उठाकर मानो वह मुझे शेष नमस्कार कर रही है।
समाप्त
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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