हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:25

अब चुप रहने की मेरी पारी आई। उसके लगाये हुए अभियोग के मूल में युक्तियों द्वारा न्याय-विचार भी चल सकता था, सफाई देने के लिए नज़ीरों की भी शायद कमी नहीं पड़ती, परन्तु यह सब विडम्बना-सी मालूम हुई। उसकी सच्ची, अनुभूति के आगे मुझे मन-ही-मन हार माननी पड़ी। अपनी बात को वह ठीक तरह से कह भी नहीं सकी, परन्तु संगीत की जो अन्तरतम मूर्ति सिर्फ व्यथा के भीतर से ही कदाचित् आत्म-प्रकाश करती है, वह करुणा से अभिषिक्त सदा जाग्रत चेतना ही मानो राजलक्ष्मी के इन दो शब्दों के इंगित में रूप धारण करके सामने दिखाई दी। और उसके संयम ने, उसके त्याग ने, उसके हृदय की शुचिता ने फिर एक बार मानो मेरी ऑंखों में अंगुली देकर उसी का स्मरण करा दिया।
फिर भी, एक बात उससे कह सकता था। कह सकता था कि मनुष्य की परस्पर सर्वथा-विरुद्ध प्रवृत्तियाँ किस तरह एक साथ पास-ही-पास बैठी रहती हैं, यह एक अचिन्तनीय रहस्य है। नहीं तो मैं अपने हाथ से जीव-हत्या कर सकता हूँ, इतना बड़ा परमाश्चर्य मेरे ही लिए और क्या हो सकता है? जो एक चींटी तक की मृत्यु को नहीं सह सकता, खून से लथ-पथ बलि के यूप-काष्ठ की सूरत ही कुछ दिनों के लिए जिसका खाना-पीना-सोना छुड़ा देती है, जिसने मुहल्ले के अनाथ आश्रयहीन कुत्ते-बिल्लियों के लिए भी बचपन में कितने ही दिन चुपचाप उपवास किये हैं उसका जंगल के पुश-पक्षियों पर कैसे निशाना ठीक बैठता है, यह तो खुद मेरी समझ में नहीं आता। और क्या ऐसा सिर्फ मैं ही अकेला हूँ? जिस राजलक्ष्मी का अन्तर-बाहर मेरे लिए आज प्रकाश की तरह स्वच्छ हो गया है वह भी इतने दिनों तक साल पर साल किस तरह 'प्यारी' का जीवन बिता सकी!
मन में आने पर भी मैं यह बात मुँह से न निकाल सका। सिर्फ उसे बाधा न देने की गरज़ ही नहीं, बल्कि सोचा, ''क्या होगा कहने से? देव और दानव दोनों कन्धे मिलाकर मनुष्य को कहाँ और किस जगह लगातार ढोये लिये जा रहे हैं, इसे कौन जानता है? किस तरह भोगी एक ही दिन में त्यागी होकर निकल पड़ता है, निर्मम निष्ठुर एक क्षण में करुणा से विगलित होकर अपने को नि:शेष कर डालता है, इस रहस्य का हमने कितना-सा संधान पाया है? किस निभृत कन्दरा में मानवात्मा की गुप्त साधना अकस्मात् एक दिन सिद्धि के रूप में प्रस्फुटित हो उठती है, उसकी हम क्या खबर रखते हैं? क्षीण प्रकाश में राजलक्ष्मी के मुँह की ओर देखकर उसी को लक्ष्य करके मैंने मन-ही-मन कहा, ''यह अगर मेरी सिर्फ व्यथा पहुँचाने की शक्ति को ही देख सकी हो, व्यथा ग्रहण करने की अक्षमता को स्नेह के कारण अब तक क्षमा करती चली आई हो, तो इसमें मेरे रूठने की ऐसी कौन-सी बात है?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''चुप क्यों रह गये?''
मैंने कहा, ''फिर भी तो इस निष्ठुर के लिए ही तुमने सब कुछ त्याग दिया!''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''सब कुछ क्या त्यागा! अपने को तो तुमने नि:सत्व होकर ही आज मुझे दे दिया, उसे तो मैं 'नहीं चाहिए' कहकर त्याग न सकी!''
मैंने कहा, ''हाँ, नि:सत्व होकर ही दिया है। मगर तुम तो अपने आपको देख नहीं सकोगी इसलिए, वह उल्लेख मैं न करूँगा!''
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पश्चिम के शहर में प्रवेश करने के पहले ही समझ में आ गया कि बंगाल के मलेरिया ने मुझे खूब ही मज़बूती के साथ पकड़ लिया है। पटना स्टेशन से राजलक्ष्मी के घर तक मैं लगभग बेहोशी की हालत में लाया गया। इसके बाद के महिने में भी मुझे ज्वर, डॉक्टर और राजलक्ष्मी लगभग हर वक्त ही घेरे रहे।
जब बुखार छूट गया तब डॉक्टर साहब ने घर-मालकिन को साफ तौर से समझा दिया कि यद्यपि यह शहर पश्चिम-प्रदेश में ही शामिल है और स्वास्थ्यप्रद स्थान के रूप में इसकी प्रसिद्धि है, फिर भी मेरी सलाह है कि रोगी को जल्दी ही स्थानान्तरित करना चाहिए।
फिर बाँध-बूँधी शुरू हो गयी, मगर अबकी बार जरा धूम-धाम के साथ। रतन को अकेला पाकर मैंने पूछा, ''अबकी बार कहाँ जाना होगा, रतन?''
देखा कि वह इस नवीन यात्रा के बिल्कुलल ही खिलाफ है। उसने खुले दरवाजे की तरफ निगाह रखते हुए आभास और इशारे से फुस-फुस करके जो कुछ कहा, उससे मेरा भी जैसे कलेजा-सा बैठ गया। रतन ने कहा, ''वीरभूम जिले में एक छोटा-सा गाँव है गंगामाटी। जब इस गाँव का पट्टा लिया था तब मैं सिर्फ एक मुख्तार साहब किसनलाल के साथ वहाँ गया था। माँ जी खुद वहाँ कभी नहीं गयीं। यदि कभी जाँयगी तो उन्हें भाग आने की राह भी ढूँढे न मिलेगी। समझ लीजिए कि गाँव में भले घर हैं ही नहीं-सिर्फ छोटी जातिवालों के ही घर हैं। उन्हें न तो छुआ ही जा सकता है और न वे किसी काम आ सकते हैं।''
राजलक्ष्मी क्यों इन सब छोटी जातों में जाकर रहना चाहती है, इसका कारण मानो मेरी समझ में कुछ आ गया। मैंने पूछा, ''गंगामाटी है कहाँ?''
रतन ने जताया, ''साँइथिया या ऐसी ही किसी स्टेशन से करीब दस-बारह कोस बैलगाड़ी में जाना पड़ता है। रास्ता जितना कठिन है उतना ही भयंकर। चारों तरफ मैदान ही मैदान है। उसमें न तो कहीं फसल ही होती है और न कहीं एक बूँद पानी है। कँकरीली मिट्टी है, कहीं गेरुआ और कहीं जली-हुई-सी स्याह काली।'' यह कहकर वह जरा रुका, और खास तौर से मुझे ही लक्ष्य करके फिर कहने लगा, ''बाबूजी, मेरी तो कुछ समझ ही में नहीं आता कि आदमी वहाँ किस सुख के लिए रहते हैं। और जो ऐसी सोने की सी जगह छोड़कर वहाँ जाते हैं, उनसे मैं और क्या कहूँ।''
भीतर-ही-भीतर एक लम्बी साँस लेकर मैं मौन हो रहा। ऐसी सोने की-सी जगह छोड़कर क्यों उस मरु-भूमि के बीच निर्बान्धव नीच आदमियों के देश में राजलक्ष्मी मुझे लिये जा रही है, सो न तो उससे कहा जा सकता है और न समझाया ही जा सकता है।
आखिर मैंने कहा, ''शायद मेरी बीमारी की वजह से ही जाना पड़ रहा है, रतन। यहाँ रहने से आराम होने की कम आशा है, सभी डॉक्टर यही डर दिखा रहे हैं।''
रतन ने कहा, ''लेकिन बीमारी क्या यहाँ और किसी को होती ही नहीं बाबूजी? आराम होने के लिए क्या उन सबको उस गंगामाटी में ही जाना पड़ता है?''
मन-ही-मन कहा, ''मालूम नहीं, उन सबको किस माटी में जाना पड़ता है। हो सकता है कि उनकी बीमारी सीधी हो, हो सकता है कि उन्हें साधारण मिट्टी में ही आराम पड़ जाता हो। मगर हम लोगों की व्याधि सीधी भी नहीं है और साधारण भी नहीं; इसके लिए शायद उसी गंगामाटी की ही सख्त जरूरत है।''
रतन कहने लगा, ''माँजी के खर्च का हिसाब-किताब भी तो हमारी किसी की समझ में नहीं आता। वहाँ न तो घर-द्वार ही है, न और कुछ। एक गुमाश्ता है, उसके पास दो हज़ार रुपये भेजे गये हैं एक मिट्टी का मकान बनाने के लिए! देखिए तो सही बाबूजी, ये सब कैसे ऊँटपटाँग काम हैं! नौकर हैं, सो हम लोग जैसे कोई आदमी ही नहीं हैं!''
उसके क्षोभ और नाराजगी को देखते हुए मैंने कहा, ''तुम वहाँ न जाओ तो क्या है रतन? जबरदस्ती तो तुम्हें कोई कहीं ले नहीं जा सकता?''
मेरी बात से रतन को कोई सान्त्वना नहीं मिली। बोला, ''माँजी ले जा सकती हैं। क्या जाने क्या जादू-मन्त्र जानती हैं वे! अगर कहें कि तुम लोगों को यमराज के घर जाना होगा, तो इतने आदमियों में किसी की हिम्मत नहीं कि कह दे, 'ना!'' यह कहकर वह मुँह भारी करके चला गया।
बात तो रतन गुस्से से ही कह गया था, पर वह मुझे मानो अकस्मात् एक नये तथ्य का संवाद दे गया। सिर्फ मेरी ही नहीं सभी की यह एक ही दशा है। उस जादू-मंत्र की बात ही सोचने लगा। मन्त्र-तन्त्र पर सचमुच ही मेरा विश्वास है सो बात नहीं, परन्तु घर-भर के लोगों में किसी में भी जो इतनी-सी शक्ति नहीं कि यमराज के घर जाने की आज्ञा तक की उपेक्षा कर सके, सो वह आखिर है कौन चीज़!
इसके समस्त सम्बन्धों से अपने को विच्छिन्न करने के लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया! लड़-झगड़कर चल दिया हूँ, सन्यासी होकर भी देख लिया, यहाँ तक कि देश छोड़कर बहुत दूर चला गया हूँ जिससे फिर कभी मुलाकात ही न हो, परन्तु मेरी समस्त चेष्टाएँ किसी गोल चीज पर सीधी लकीर खींचने के समान बारम्बार केवल व्यर्थ ही हुई हैं। अपने को हजार बार धिक्कारने पर भी अपनी कमजोरी के आगे आखिर मैं पराजित ही हुआ हूँ, और इसी बात का खयाल करके अन्त में जब मैंने आत्म-समर्पण कर दिया तब रतन ने आकर आज मुझे इस बात की खबर दी, ''राजलक्ष्मी जादू-मन्त्र जानती है!''
बात ठीक है। लेकिन इसी रतन से अगर जिरह करके पूछा जाय तो मालूम होगा कि वह खुद भी इस बात पर विश्वास नहीं करता।
सहसा देखा कि राजलक्ष्मी एक पत्थर की प्याली में कुछ लिये हुए व्यस्त भाव से इधर ही से नीचे जा रही है। मैंने बुलाकर कहा, ''सुनो तो, सभी कहते हैं कि तुम जादू-मन्त्र जानती हो!''
वह चौंककर खड़ी हो गयी और बोली, ''क्या जानती हूँ?''
मैंने कहा, ''जादू-मन्त्र!''
राजलक्ष्मी ने मुँह बिचकाकर जरा मुस्कराते हुए कहा, ''हाँ, जानती हूँ।''
यह कहकर वह चली जा रही थी, सहसा मेरे कुरते को गौर से देखकर उद्विग्न कण्ठ से पूछ उठी, ''यह क्या? कल का वही बासी कुरता पहने हुए हो क्या?''
अपनी तरफ देखकर मैंने कहा, ''हाँ, वही है। मगर रहने दो, खूब उजला है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''उजले की बात नहीं, मैं सफाई की बात कह रही हूँ।'' इसके बाद फिर जरा मुस्कराकर कहा, ''तुम बाहर के इस दिखावटी उजलेपन में ही हमेशा गर्क रहे! इसकी उपेक्षा करने को मैं नहीं कहती, मगर भीतर पसीने से गन्दगी बढ़ जाती है, इस बात पर गौर करना कब सीखोगे?'' इतना कहकर उसने रतन को आवाज दी। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। कारण, मालकिन की इस तरह की ऊँची-मीठी आवाज का जवाब देना इस घर का नियम नहीं, बल्कि चार-छह मिनट के लिए मुँह छिपा जाना ही नियम है।
आखिर राजलक्ष्मी ने हाथ की चीज नीचे रखकर बगल के कमरे में से एक धुला हुआ कुरता लाकर मेरे हाथ में दिया और कहा, ''अपने मन्त्री रतन से कहना, जब तक उसने जादू-मन्त्र नहीं सीख लिया है, तब तक इन सब जरूरी कामों को वह अपने हाथों से ही किया करे।'' यह कहकर वह प्याली उठाकर नीचे चली गयी।
कुरता बदलते वक्त देखा कि उसका भीतरी हिस्सा सचमुच ही गन्दा हो गया है। होना ही चाहिए था, और मैंने भी इसके सिवा और कुछ उम्मीद की हो, सो भी नहीं। मगर मेरा मन तो था सोचने की तरफ, इसी से इस अतितुच्छ चोले के भीतर-बाहर के वैसे दृश्य ने ही फिर मुझे नयी चोट पहुँचाई।
राजलक्ष्मी की यह शुचिता की सनक बहुधा हम लोगों को निरर्थक, दु:खदायक और यहाँ तक कि 'अत्याचार' भी मालूम हुई है; और अभी एक ही क्षण में उसका सब कुछ मन से धुल-पुछ गया हो, सो भी सत्य नहीं; परन्तु, इस अन्तिम श्लेष में जिस वस्तु को मैंने आज तक मन लगाकर नहीं देखा था, उसी को देखा। जहाँ से इस अद्भुत मानवीकी व्यक्त और व्यक्त जीवन की धाराएँ दो बिल्कुचल प्रतिकूल गतियों में बहती चली आ रही हैं, आज मेरी निगाह ठीक उसी स्थान पर जाकर पड़ी। एक दिन अत्यन्त आश्चर्य में डूबकर सोचा था कि बचपन में राजलक्ष्मी ने जिसे प्यार किया था उसी को प्यारी ने अपने उन्माद-यौवन की किसी अतृप्त लालसा के कीचड़ से इस तरह बहुत ही आसानी से सहस्र दल-विकसित कमल की भाँति पलक मारते ही बाहर निकाल दिया! आज मालूम हुआ कि वह प्यारी नहीं है, वह राजलक्ष्मी ही है। 'राजलक्ष्मी' और 'प्यारी' इन दो नामों के भीतर उसके नारी-जीवन का कितना बड़ा इंगित छिपा था, मैंने उसे देखकर भी नहीं देखा; इसी से कभी-कभी संशय में पड़कर सोचा है कि एक के अन्दर दूसरा आदमी अब तक कैसे जिन्दा था! परन्तु, मनुष्य तो ऐसा ही है! इसी से तो वह मनुष्य है!
प्यारी का सारा इतिहास मुझे मालूम नहीं, मालूम करने की इच्छा भी नहीं। और राजलक्ष्मी का ही सारा इतिहास जानता होऊँ, सो भी नहीं; सिर्फ इतना ही जानता हूँ कि इन दोनों के मर्म और कर्म में न कभी किसी दिन कोई मेल था और न सामंजस्य ही। हमेशा ही दोनों परस्पर उलटे स्रोत में बहती गयी हैं। इसी से एक की निभृत सरसी में जब शुद्ध सुन्दर प्रेम का कमल धीरे-धीरे लगातार दल पर दल फैलाता गया है तब दूसरी के दुर्दान्त जीवन का तूफान वहाँ व्याघात तो क्या करेगा, उसे प्रवेश का मार्ग तक नहीं मिला! इसी से तो उसकी एक पंखुड़ी तक नहीं झड़ी है, जरा-सी धूल तक उड़कर आज तक उसे स्पर्श नहीं कर सकी है।
शीत-ऋतु की संध्यार जल्दी ही घनी हो आई, मगर मैं वहीं बैठा सोचता रहा। मन-ही-मन बोला, ''मनुष्य सिर्फ उसकी देह ही तो नहीं है! प्यारी नहीं रही, वह मर गयी। परन्तु, किसी दिन अगर उसने अपनी उस देह पर कुछ स्याही लगा भी ली हो तो क्या सिर्फ उसी को बड़ा करके देखता रहूँ, और राजलक्ष्मी जो अपने सहस्र-कोटि दु:खों की अग्नि-परीक्षा पार करके आज अपनी अकलंक शुभ्रता में सामने आकर खड़ी हुई है उसे मुँह फेरकर बिदा कर दूँ? मनुष्य में जो पशु है, सिर्फ उसी के अन्याय से और उसी की भूल-भ्रान्ति से-मनुष्य का विचार करूँ? और जिस देवता ने समस्त दु:ख, सम्पूर्ण व्यथा और समस्त अपमानों को चुपचाप सहन और वहन करके भी आज सस्मित मुख से आत्म-प्रकाश किया है, उसे बिठाने के लिए कहीं आसन भी न बिछाऊँ? यह क्या मनुष्य के प्रति सच्चा न्याय होगा?' मेरा मन मानो आज अपनी सम्पूर्ण शक्ति से कहने लगा, ''नहीं-नहीं, हरगिज नहीं, यह कदापि नहीं होगा, ऐसा तो हो ही नहीं सकता।'' वह कोई ज्यादा दिन की बात नहीं जब अपने को दुर्बल, श्रान्त और पराजित सोचकर राजलक्ष्मी के हाथ अपने को सौंप दिया था, किन्तु, उस दिन उस पराभूत के आत्म-त्याग में एक बड़ी जबरदस्त दीनता थी। तब मेरा वही मन मानो किसी भी तरह अनुमोदन नहीं कर रहा था; परन्तु आज मेरा मन मानो सहसा जोर के साथ इसी बात को बार-बार कहने लगा, ''वह दान दान ही नहीं, वह धोखा है। जिस प्यारी को तुम जानते न थे उसे जानने के बाहर ही पड़ी रहने दो; परन्तु, जो राजलक्ष्मी एक दिन तुम्हारी ही थी, आज उसी को तुम सम्पूर्ण चित्त से ग्रहण करो। और जिनके हाथ से संसार की सम्पूर्ण सार्थकता निरन्तर झड़ रही है, इसकी भी अन्तिम सार्थकता उन्हीं के हाथ सौंपकर निश्चिन्त हो जाओ।''
नया नौकर बत्ती ला रहा था, उसे बिदा करके मैं अंधेरे में ही बैठा रहा और मन-ही-मन बोला, ''आज राजलक्ष्मी को सारी भलाइयों और सारी बुराइयों के साथ स्वीकार करता हूँ। इतना ही मैं कर सकता हूँ, सिर्फ इतना ही मेरे हाथ में है। मगर, इसके अतिरिक्त और भी जिनके हाथ में है, उन्हीं को उस अतिरिक्त के बोझे को सौंपता हूँ।'' इतना कहकर मैं उसी अन्धकार में खाट के सिरहाने चुपचाप अपना सिर रखकर पड़ रहा।
पहले दिन की तरह दूसरे दिन भी यथा-रीति तैयारियाँ होने लगीं, और उसके बाद तीसरे दिन भी दिन-भर उद्यम की सीमा न रही। उस दिन दोपहर को एक बड़े भारी सन्दूक में थाली, लोटे-गिलास, कटोरे-कटोरियाँ और दीवट आदि भरे जा रहे थे। मैं अपने कमरे में से ही सब देख रहा था। मौका पाकर मैंने राजलक्ष्मी को इशारे से अपने पास बुलाकर पूछा, ''यह सब हो क्या रहा है? तुम क्या अब वहाँ से वापस नहीं आना चाहतीं, या क्या?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''वापस कहाँ आऊँगी?''
मुझे याद आया, यह मकान उसने बंकू को दान कर दिया है। मैंने कहा, ''मगर, मान लो कि वह जगह तुम्हें ज्यादा दिन अच्छी न लगे तो?''
राजलक्ष्मी ने जरा मुस्कराते हुए कहा, ''मेरे लिए मन खराब करने की जरूरत नहीं। तुम्हें अच्छा न लगे, तो तुम चले आना, मैं बाधा न डालूँगी।''
उसके कहने के ढंग से मुझे चोट पहुँची, मैं चुप हो रहा। यह मैंने बहुत बार देखा है कि वह मेरे इस ढंग के किसी भी प्रश्न को मानो सरल चित्त से ग्रहण नहीं कर सकती। मैं किसी को निष्कपट होकर प्यार कर सकता हूँ, या उसके साथ स्थिर होकर रह सकता हूँ, यह बात किसी भी तरह मानो उसके मन में समाकर एक होना नहीं चाहती। सन्देह के आलोड़न में अविश्वास एक क्षण में ही ऐसा उग्र होकर निकल पड़ता है कि उसकी ज्वाला दोनों ही के मन में बहुत देर तक लप-लप लपटें लिया करती है। अविश्वास की यह आग कब बुझेगी। सोचते-सोचते मुझे इसका कहीं ओर-छोर ही नहीं मिलता। वह भी इसी की खोज में निरन्तर घूम रही है। और, गंगामाटी भी इस बात का अन्तिम फैसला कर देगी या नहीं, यह तथ्य जिनके हाथ में है वे ऑंखों के ओझल चुप्पी साधे बैठे हैं।
सब तरह की तैयारियाँ होते-होते और भी तीन-चार दिन बीत गये; उसके बाद और भी दो एक दिन गये शुभ साइत की प्रतीक्षा में। अन्त में, एक दिन सबेरे हम लोग अपरिचित गंगामाटी के लिए सचमुच ही घर से बाहर निकल पड़े। यात्रा में कुछ अच्छा नहीं लगा, मन में जरा भी खुशी नहीं थी। और, सबसे बुरी बीती शायद रतन पर। वह मुँह को अत्यन्त भारी बनाकर गाड़ी के एक कोने में चुपचाप बैठा ही रहा, स्टेशन पर स्टेशन गुजरते गये, पर उसने किसी भी काम में ज़रा भी सहायता नहीं की। मगर, मैं सोच रहा था, बिल्कु्ल ही दूसरी बात। जगह जानी हुई है या अनजानी, अच्छी है या बुरी, स्वास्थ्यकर है या मलेरिया से भरी, इन बातों की तरफ मेरा ध्याहन ही न था। मैं सोच रहा था; यद्यपि अब तक मेरा जीवन निरुपद्रव नहीं बीता; उसमें बहुत-सी गलतियाँ बहुत-सी भूलें-चूकें, बहुत-सा दु:ख-दैन्य रहा है, फिर भी, वे सब मेरे लिए अत्यन्त परिचित हैं। इस लम्बे अरसे में उनसे मेरा मुकाबिला तो हुआ ही है, साथ ही एक तरह का स्नेहा सा पैदा हो गया है। उनके लिए मैं किसी को भी दोष नहीं देता, और अब मुझे भी और कोई दोष देकर अपना समय नष्ट नहीं करता। परन्तु, यह जीवन क्या जाने कहाँ को किस नवीनता की ओर निश्चित रूप से चला जा रहा है और इस निश्चितता ने ही मुझे विकल कर दिया है। 'आज नहीं कल' कहकर और देर करने का भी रास्ता नहीं। और मज़ा यह कि न तो मैं इसकी भलाई को जानता हूँ और न बुराई को। इसी से इसकी भलाई-बुराई कुछ भी, किसी हालत में, अब मुझे अच्छी नहीं लगती। गाड़ी ज्यों-ज्यों तेजी के साथ गन्तव्य स्थान के निकट पहुँचती जाती है, त्यों-त्यों इस अज्ञात रहस्य का बोझ मेरी छाती पर पत्थर-सा भारी होकर मज़बूती से बैठता जाता है। कितनी-कितनी बातें मन में आने लगीं, उनकी कोई हद नहीं। मालूम हुआ, निकट भविष्य में ही शायद मुझको ही केन्द्र बनाकर एक भद्दा दल संगठित हो उठेगा। उसे न तो ग्रहण कर सकूँगा और न अलग फेंक सकूँगा। तब क्या होगा और क्या न होगा, इस बात को सोचने में भी मेरा मन मानो जमकर बरफ हो गया।
मुँह उठाकर देखा, तो राजलक्ष्मी चुपचाप बैठी खिड़की के बाहर देख रही है। सहसा मालूम हुआ कि मैंने कभी किसी दिन इससे प्रेम नहीं किया। फिर भी इसे ही मुझे प्रेम करना पडेग़ा। कहीं किसी तरफ से भी निकल भागने का रास्ता नहीं है। संसार में इतनी बड़ी विडम्बना क्या कभी किसी के भाग्य में घटित हुई है? और मज़ा यह कि एक ही दिन पहले इस दुविधा की चक्की से अपनी रक्षा करने के लिए अपने को सम्पूर्ण रूप से उसी के हाथ सौंप दिया था। तब मन-ही-मन जोर के साथ कहा था कि तुम्हारी सभी भलाई-बुराइयों के साथ ही तुम्हें अंगीकार करता हूँ लक्ष्मी! और आज, मेरा मन ऐसा विक्षिप्त और ऐसा विद्रोही हो उठा। उसी से सोचता हूँ, संसार में 'करूँगा' कहने में और सचमुच के करने में कितना बड़ा अन्तर है!
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साँइथिया स्टेशन पर जब गाड़ी पहुँची तब दिन ढल रहा था। राजलक्ष्मी के गुमाश्ता काशीराम स्वयं स्टेशन पर नहीं आ सके, वे उधर के इन्तज़ाम में लगे हुए हैं। मगर दो आदमियों को उन्होंने चिट्ठी लिखकर भेज दिया है। उनके रुक्के से मालूम हुआ कि ईश्वर की इच्छा से 'अब', अर्थात् उनके घर में और उनकी गंगामाटी में सब तरह से कुशल है। आज्ञानुसार स्टेशन के बाहर चार बैलगाड़ियाँ तैयार खड़ी मिलेंगी जिनमें से दो तो खुली हुई हैं और दो छाई हुई। एक पर बहुत-सा सूखा घास और खजूर की पत्तियों की चटाई बिछा दी गयी है और वह स्वयं मालकिन साहबा के लिए है। दूसरी में मामूली थोड़ा-सा घास डाल दिया गया है, पर चटाई नहीं है वह नौकर-चाकर आदि अनुचरों के लिए है। खुली हुई दो गाड़ियों पर असबाब लादा जायेगा। और 'यद्यपि स्यात्' स्थानाभाव हो, तो पियादों को हुक्म देते ही वे बाजार से और भी एक गाड़ी लाकर हाज़िर कर देंगे। उन्होंने और भी लिखा है कि भोजनादि सम्पन्न करके संध्याब से पूर्व ही रवाना हो जाना वांछनीय है। अन्यथा मालकिन साहबा की सुनिद्रा में व्याघात हो सकता है। और इस विषय में विशेष लिखा है कि मार्ग में भयादि कुछ नहीं है, आनन्द से सोती हुई आ सकती हैं।
मालकिन साहबा रुक्का पढ़कर कुछ मुसकराईं। जिसने उसे दिया उससे भयादि के विषय में कोई प्रश्न न करके उन्होंने पूछा, ''क्यों भाई, आसपास में कोई तलाव-अलाव बता सकते हो? एक डुबकी लगा आती।''
''है क्यों नहीं, माँ जी। वह रहा वहाँ...''
''तो चलो भइया, दिखा दो'' कहती हुई वह उस आदमी को और रतन को साथ लेकर न जाने कहाँ की एक अनजान तलैया में स्नानादि करने चली गयी। बीमारी आदि का भय दिखाना निरर्थक समझकर मैंने प्रतिवाद भी नहीं किया। ख़ासकर इसलिए कि अगर वह कुछ खा-पी लेना चाहती हो, तो इससे वह भी आज के लिए बन्द हो जायेगा।
लेकिन, आज वह दसेक मिनट में ही लौट आई। बैलगाड़ी पर असबाब लद रहा है और मामूली-सा एक बिस्तर खोलकर सवारी वाली गाड़ी में बिछा दिया गया है। मुझसे उसने कहा, ''तुम क्यों नहीं इसी वक्त कुछ खा-पी लेते? सभी कुछ तो आ गया है।''
मैंने कहा, ''दो!''
पेड़ के नीचे आसन बिछाकर एक केले के पत्ते पर मेरे लिए वह खाना परोस रही थी और मैं निस्पृह दृष्टि से सिर्फ उसकी ओर देख रहा था। इतने में एक मूर्ति ने आकर और सामने खड़े होकर कहा, ''नारायण!''
राजलक्ष्मी ने अपने भीगे बालों पर बायें हाथ से धोती का पल्ला खींचते हुए मुँह उठाकर ऊपर देखा और कहा, ''आइए।''
अकस्मात् यह नि:संकोच निमन्त्रण का शब्द सुनकर मुँह उठाकर देखा, तो, एक साधु खड़ा है। बहुत ही आश्चर्य हुआ। उसकी उमर ज्यादा नहीं थी, वह शायद बीस-बाईस के भीतर ही होगा, मगर देखने में जैसा सुकुमार वैसा ही सुन्दर! चेहरा कृशता की ओर ही जा रहा है, शायद कुछ लम्बा होने के कारण ही ऐसा मालूम हुआ, मगर रंग तपे-सोने जैसा। ऑंखें, भौहें, चेहरा और ललाट की बनावट निर्दोष। वास्तव में, पुरुष का इतना रूप मैंने कभी देखा हो, ऐसा नहीं मालूम हुआ। उसका गेरुआ परिधान-वस्त्र जगह-जगह फटा हुआ है, गाँठें बँधी हुई हैं। बदन पर गेरुआ ढीला कुरता है, उसकी भी यही दशा है; पैरों में पंजाबी जूता है, उसकी हालत भी वैसी ही है। खो जाने पर उसके लिए अफसोस करने की जरूरत नहीं। राजलक्ष्मी ने ज़मीन से सिर टेककर प्रणाम करके आसन बिछा दिया। फिर मुँह उठाकर कहा, ''मैं जब तक भोजन परोसने की तैयारी करूँ, तब तक आपको मुँह-हाथ धोने के लिए जल दिया जाय।''
साधु ने कहा, ''हाँ हाँ, लेकिन आपके पास मैं दूसरे ही काम के लिए आया था।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''अच्छी बात है, आप भोजन करने बैठिए, और बातें पीछे होंगी। पर लौटने के लिए टिकट ही चाहिए न? सो मैं खरीद दूँगी।'' इतना कहकर उसने मुँह फेरकर अपनी हँसी छिपा ली।
साधुजी ने गम्भीरता के साथ जवाब दिया, ''नहीं, उसकी जरूरत नहीं। मुझे खबर मिली है कि आप लोग गंगामाटी जा रहे हैं। मेरे साथ एक भारी बॉक्स है, उसे अगर आप अपनी गाड़ी में ले चलें तो अच्छा हो। मैं भी उसी तरफ जा रहा हूँ।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इसमें कौन-सी बड़ी बात है; मगर आप खुद?''
''मैं पैदल ही जा सकता हूँ। ज्यादा दूर नहीं, छै-सात कोस ही तो होगा।''
राजलक्ष्मी ने और कुछ न कहकर रतन को बुला के जल देने के लिए कहा और खुद ढंग के साथ अच्छी तरह साधुजी के लिए भोजन परोसने में लग गयी। यह राजलक्ष्मी की खास अपनी चीज है, इस काम में उसका सानी मिलना मुश्किल है।
साधु महाराज खाने बैठे, मैं भी बैठ गया। राजलक्ष्मी मिठाई के बर्तन लिये पास ही बैठी रही। दो ही मिनट बाद राजलक्ष्मी ने धीरे-से पूछा, ''साधुजी, आपका नाम?''
साधु ने खाते खाते कहा, ''वज्रानन्द।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''बाप रे बाप! और पुकारने का नाम?''
उसके कहने के ढंग से मैंने उसकी तरफ देखा तो उसका सारा चेहरा दबी हुई मुस्कराहट से चमक उठा था, मगर वह हँसी नहीं। मैंने भोजन करने में मन लगाया। साधुजी ने कहा, ''उस नाम के साथ तो अब कोई सम्बन्ध नहीं रहा। न अपना रहा और न दूसरों का।''
राजलक्ष्मी ने सहज ही हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ''हाँ, सो तो ठीक है।'' परन्तु क्षण-भर बाद वह फिर पूछ बैठी, ''अच्छा साधुजी, आपको घर से भागे कितने दिन हुए?''
प्रश्न बहुत ही अभद्र था। मैंने निगाह उठाकर देखा, राजलक्ष्मी के चेहरे पर हँसी तो नहीं है, पर जिस प्यारी के चेहरे को मैं भूल गया था, इस समय राजलक्ष्मी की तरफ देखकर निमेष-मात्र में वही चेहरा मुझे याद आ गया। उन पुराने दिनों की सारी सरसता उसकी ऑंखों, मुँह और कण्ठ-स्वर में मानो सजीव होकर लौट आई है।
साधु ने एक कौर नीचे उतारकर कहा, ''आपका यह कुतूहल ही अनावश्यक है।''
राजलक्ष्मी जरा भी क्षुण्ण नहीं हुई, भले मानसों की तरह सिर हिलाकर बोली, ''सो तो सच है। लेकिन, एक बार मुझे बहुत भुगतना पड़ा था, इसी से...'' कहते हुए उसने मेरी ओर लक्ष्य करके कहा, ''हाँ जी, तुम अपना वह ऊँट और टट्टू का किस्सा तो सुनाना! साधुजी को जरा सुना तो दो, अरे रे, भगवान भरोसा! घर में शायद कोई याद कर रहा है।''
साधुजी के गले में, शायद हँसी रोकने में ही, फन्दा लग गया। अब तक मेरे साथ उनकी एक भी बात नहीं हुई थी, मालकिन महोदय की ओट में मैं कुछ-कुछ अनुचर-सा ही बना बैठा था। अब साधुजी ने फन्दे को सँभालते हुए यथासाध्या गम्भीरता के साथ मुझसे पूछा, ''तो आप भी शायद एक बार सन्यासी...''
मेरे मुँह में पूड़ी थी, ज्यादा बात करने की गुंजाइश न थी, इसलिए दाहिने हाथ की चार उँगलियाँ उठाकर गरदन हिलाते हुए मैंने कहा, ''उँहूँ...एक बार नहीं, एक बार नहीं...''
अब तो साधुजी की गम्भीरता न टिक सकी, वे और राजलक्ष्मी दोनों खिल-खिलाकर हँस पड़े। हँसी थमने पर साधुजी ने कहा, ''लौट क्यों आये?''
मैं अब तक पूड़ी का कौर लील न सका था, सिर्फ इशारे से राजलक्ष्मी को दिखा दिया।
राजलक्ष्मी ने मुझे डाँट-सा दिया, कहा, ''हाँ, सो तो ठीक है! अच्छा, एक बार मान लिया मेरे लिए ही, सो भी ठीक सच नहीं है, असल में जबरदस्त बीमारी की वजह से ही।- मगर और तीन बार?''
मैंने कहा, ''वह भी लगभग ऐसे ही कारण से, मच्छड़ों के मारे। मच्छड़ों का काटना चमड़े से बरदाश्त नहीं हुआ। अच्छा...''
साधु ने हँसकर कहा, ''मुझे आप वज्रानन्द ही कहा कीजिएगा। आपका नाम...''
मुझसे पहले राजलक्ष्मी ने ही जवाब दिया। बोली, ''इनके नाम से क्या होगा। उमर में ये बहुत बड़े हैं, इन्हें आप भइया कहा कीजिएगा। और मुझे भी भाभी कहें तो मैं नाराज न हूँगी। मैं भी तो उमर में तुमसे चार-छै साल बड़ी ही हूँगी।''
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:26

साधुजी का चेहरा सुर्ख हो उठा। मैंने भी इतनी आशा नहीं की थी। आश्चर्य के साथ मैंने देखा कि वही है। वही स्वच्छ, सरल, स्नेहातुर, आनन्दमयी। वही जिसने मुझे किसी भी तरह श्मशान में नहीं जाने दिया और किसी भी हालत में राजा के संसर्ग में नहीं टिकने दिया,- यह वही है। जो लड़का अपने कहीं के स्नेह-बन्धन को तोड़कर चला आया है, उसकी सम्पूर्ण अज्ञात वेदना ने राजलक्ष्मी के समस्त हृदय को मथ डाला है। किसी भी तरह इसे वह फिर से घर लौटा देना चाहती है।
साधु बेचारे ने लज्जा के धक्के को सँम्हाजलते हुए कहा, ''देखिए, भइया कहने में मुझे ऐसी कोई आपत्ति नहीं, मगर हम सन्यासी लोगों को किसी को इस तरह नहीं पुकारना चाहिए।''
राजलक्ष्मी लेशमात्र भी अप्रतिभ ने हुई। बोली, ''क्यों नहीं! भइया की बहू को सन्यासी लोग कोई मौसी कहकर तो पुकारते नहीं, और बुआ कहते हों सो भी नहीं, इसके सिवा मुझे तुम और क्या कहकर पुकार सकते हो?''
लड़का निरुपाय होकर अन्त में सलज्ज हँसते हुए चेहरे से बोला, ''अच्छी बात है। छै-सात घण्टे और भी हूँ आपके साथ, इस बीच में अगर जरूरत पड़ी तो वही कहूँगा।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तो कहो न एक बार!''
साधु हँस पड़े, बोले, ''जरूरत पड़ेगी तो कहूँगा, झूठमूठ पुकारना ठीक नहीं।''
राजलक्ष्मी ने उसकी पत्तल में और भी चार-पाँच 'सन्देश' और बरफी परोसकर कहा, ''अच्छा, उसी से मेरा काम चल जायेगा। मगर जरूरत पड़ने पर मैं क्या कहकर तुम्हें बुलाऊँ, सो कुछ समझ में नहीं आता।'' फिर मेरी तरफ इशारा करके कहा, ''इन्हें तो बुलाया करती थी। 'सन्यासी महाराज' कह के। सो अब हो नहीं सकता, घुटाला हो जायेगा। अच्छा, तो मैं तुम्हें 'साधु देवर' कहा करूँ, क्या कहते हो?''
साधुजी ने आगे तर्क नहीं किया, अत्यन्त गम्भीरता के साथ कहा, ''अच्छा, सो ही सही।''
वे और बातों में चाहे जैसे हों, पर देखा कि खाने-पीने के मामले में उन्हें काफी रसज्ञता है। पछाँह की उमदा मिठाइयों की वे कदर करते हैं, और यही वजह है कि किसी वस्तु का उन्होंने असम्मान नहीं किया। एक तो बड़े जतन और परम स्नेह के साथ एक के बाद एक चीज परोसती जाती थी, और दूसरे सज्जन चुपचाप बिना किसी संकोच के गले के नीचे उतारते जाते थे। मगर मैं उद्विग्न हो उठा। मन-ही-मन समझ गया कि साधुजी पहले चाहे कुछ भी करते रहे हों, परन्तु, फिलहाल इन्हें ऐसी उपादेय भोज्य सामग्री इतनी ज्यादा तादाद में सेवन करने का मौका नहीं मिला है। परन्तु, कोई अगर अपनी दीर्घकाल व्यापी त्रृटि को एक ही बार में एक साथ दूर करने का प्रयत्न करे, तो उसे देखकर दर्शकों के लिए धैर्य की रक्षा करना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो जाता है। लिहाजा राजलक्ष्मी के और भी कई पेड़े और बरफी साधुजी की पत्तल में रखते ही अनजान में मेरी नाक और मुँह से एक साथ इतना बड़ा दीर्घ नि:श्वास निकल पड़ा कि राजलक्ष्मी और उसके नये कुटुम्बी दोनों ही चौंक पड़े। राजलक्ष्मी मेरे मुँह की ओर देखकर झटपट कह उठी, ''तुम कमजोर आदमी हो, चलो उठकर मुँह-हाथ धो लो। हम लोगों के साथ बैठे रहने की क्या जरूरत है?''
साधुजी ने एक बार मेरी तरफ, और फिर राजलक्ष्मी की तरफ और उसके बाद मिठाई वाले बरतन की तरफ देखकर हँसते हुए कहा, ''गहरी साँस लेने की तो बात ही है भाई, कुछ भी तो नहीं बचा!''
''अभी बहुत है'' कहकर राजलक्ष्मी मेरी ओर क्रुद्ध दृष्टि देखकर रह गयी।
ठीक इसी समय रतन पीछे आकर खड़ा हो गया और बोला, ''चिउड़ा तो बहुत मिलता है, पर दूध या दही कुछ भी तुम्हारे लिए नहीं मिला।''
साधु बेचारे अत्यन्त लज्जित होकर बोले, ''आप लोगों के आतिथ्य पर मैंने बड़ा अत्याचार किया है,'' यह कहकर वे सहसा उठना ही चाहते थे कि राजलक्ष्मी व्याकुल होकर कहने लगी, ''मेरे सर की कसम है लालाजी, अगर उठे। कसम खाती हूँ, मैं सब उठा के फेंक दूँगी।''
साधु क्षण-भर तो विस्मय से शायद यही सोचते रहे कि यह कैसी स्त्री है जो दो घड़ी की जान-पहिचान में ही इतनी गहरी घनिष्ठ हो उठी। राजलक्ष्मी की प्यारी का इतिहास जो नहीं जानता उसके लिए तो यह आश्चर्य की बात है ही।
इसके बाद वह जरा हँसकर बोले, ''मैं सन्यासी आदमी ठहरा, खाने-पीने में मुझे कोई हिचक नहीं है; मगर आपको भी कुछ खाना चाहिए। मेरी कसम खाने से तो पेट भर नहीं जायेगा?''
राजलक्ष्मी ने दाँतों-तले जीभ दबाकर गम्भीरता के साथ कहा, ''छि छि, ऐसी बात औरतों से नहीं कहना चाहिए, लालाजी। मैं यह सब कुछ नहीं खाती, मुझसे बरदाश्त नहीं होता। नौकर, तो उनके लिए काफी है। आज रात-भर की ही बात है, जो कुछ मिल जाय, मुट्ठी-भर चिउड़ा-इउड़ा खाकर जरा पानी पी लेने से ही मेरा काम चल जायेगा। लेकिन, तुम अगर भूखे उठ गये, तो थोड़ा-बहुत जो कुछ मैं खाती हूँ सो भी न खाऊँगी। विश्वास न हो तो इनसे पूछ लो।'' इतना कहकर उसने मुझसे अपील की। मैंने कहा, ''यह बात सच है, इसे मैं हलफ उठाकर कहने को तैयार हूँ। साधुजी, झूठमूठ बहस करने से कोई लाभ नहीं। भाई साहब, बन सके तो बर्तन को औंधा करके उड़ेलवाने तक सेवन करते चले जाओ; नहीं तो, फिर यह किसी काम में ही नहीं आयेगा। यह सब सामान रेलगाड़ी में आया है। लिहाजा भूखों मर जाने पर भी कोई इन्हें तिल-भर भी नहीं खिला सकता। यह ठीक बात है।''
साधु ने कहा, ''मगर यह मिठाई तो गाड़ी की छुई हुई नहीं मानी जाती!''
मैंने कहा, ''इसकी मीमाँसा तो मैं इतने दिनों में भी खतम न कर सका भाई साहब, तब तुम क्या एक ही बैठक में फैसला कर डालोगे? इससे तो बल्कि हाथ का काम खतम करके उठ बैठना अच्छा, नहीं तो सूरज डूब जाने पर शायद चिउड़ा पानी भी गले से नीचे उतारने की नौबत न आयेगी। मेरा कहना है कि दो-चार घण्टे तो तुम साथ में हो ही, शास्त्र का विचार समझा सको तो रास्ते में समझा देना, उससे काज न होगा ता कम-से-कम अकाज न बढ़ेगा। इस वक्त जो हो रहा है, वही होने दो।''
साधु ने पूछा, ''तो क्या दिन-भर से इन्होंने कुछ खाया ही नहीं?''
मैंने कहा, ''नहीं। इसके सिवा कल भी क्या जाने क्या था, सुन रहा हूँ कि दो-चार फल-फूल के सिवा कल भी और कुछ मुँह में नहीं दिया है।''
रतन पीछे ही खड़ा था, गरदन हिलाकर क्या जाने क्या कहते-कहते, शायद मालकिन की ऑंख के गुप्त इशारे से सहसा रुक गया।
साधु ने राजलक्ष्मी की ओर देखकर कहा, ''इससे आपको कष्ट नहीं होता?''
उत्तर में राजलक्ष्मी सिर्फ जरा हँस दी, परन्तु मैंने कहा, ''इस बात को आप प्रत्यक्ष और अनुमान किसी तरह भी नहीं जान सकते। हाँ, ऑंखों से जो कुछ देखा है उसमें, शायद, दो-एक दिन और भी जोड़े जा सकते हैं।''
राजलक्ष्मी ने प्रतिवाद करते हुए कहा, ''तुमने देखा है ऑंखों से?- कभी नहीं।''
मैंने इसका जवाब नहीं दिया, और साधुजी ने भी फिर कोई प्रश्न नहीं किया। समय की तरफ खयाल करके वे चुपचाप भोजन समाप्त करके उठ बैठे।
रतन और उसके साथी दो जनों को खाते-पीते बहुत देर हो गयी। राजलक्ष्मी ने अपने लिए क्या व्यवस्था की, सो वही जाने। हम लोग गंगामाटी के लिए जब रवाना हुए तब शाम हो चुकी थी। एकादशी का चाँद अब तक उज्ज्वल न हुआ था, और अन्धकार भी कहीं कुछ न था। असबाब की दोनों गाड़ियाँ सबसे पीछे, राजलक्ष्मी की गाड़ी बीच में और हम लोगों की गाड़ी अच्छी होने के कारण सबसे आगे थी। साधुजी को पुकारकर मैंने कहा, ''भाई साहब, पैदल तो चलते ही रहते हो, इसकी तुम्हें कोई कमी नहीं, आज-भर के लिए, न हो तो, मेरी ही गाड़ी पर आ जाओ।''
साधु ने कहा, ''साथ ही तो चल रहे हैं, न चल सकूँगा तो बैठ लूँगा, मगर अभी जरा पैदल ही चलूँ।''
राजलक्ष्मी ने मुँह निकालकर कहा, ''तो तुम मेरे बॉडी-गार्ड होकर चलो लालाजी, तुम्हारे साथ बातचीत करती हुई चलूँगी।'' यह कहकर उसने साधुजी को अपनी गाड़ी के पास बुला लिया। सामने ही मैं था। बीच-बीच में गाड़ी, बैल और गाड़ीवानों के सम्मिलित उपद्रव से उनकी बातचीत के किसी-किसी अंश से वंचित होने पर भी अधिकांश सुनता हुआ चला।
राजलक्ष्मी ने कहा, ''घर तुम्हारा इधर नहीं है, हमारे ही देश की तरफ है, सो तो मैं तुम्हारी बात सुनकर ही समझ गयी थी, मगर आज कहाँ चले हो, सच्ची-सच्ची बताना भाई।''
साधु ने कहा, ''गोपालपुर।''
राजलक्ष्मी ने पूछा, ''हमारी गंगामाटी से वह कितनी दूर है?''
साधु ने जवाब दिया, ''आपकी गंगामाटी भी मुझे नहीं मालूम, और अपने गोपालपुर से भी वाकिफ नहीं; लेकिन हाँ, होंगे दोनों पास ही पास। कम-से-कम सुना तो ऐसा ही है।''
''तो फिर इतनी रात में कैसे तो गाँव पहिचानोगे, और कैसे उनका घर ढूँढ़ निकालोगे जिनके यहाँ जा रहे हो?''
साधुजी ने जरा हँसकर कहा, ''गाँव पहिचानने में दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि रास्ते पर ही शायद एक सूखा तालाब है, उसके दक्खिन कोस-भर चलने से ही वह मिल जायेगा। और घर ढूँढ़ने की तो तकलीफ उठानी ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि सभी अनजान हैं। मगर हाँ, पेड़ के नीचे तो जगह मिल ही जायेगी, इसकी पूरी उम्मीद है।''
राजलक्ष्मी ने व्याकुल होकर कहा, ''ऐसे जाड़े की रात में पेड़ तले? इस जरा-से कम्बल पर भरोसा रखके? इसे मैं हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकती, समझे लालाजी!''
उसके उद्वेग ने मानो मुझ तक को चोट पहुँचाई। साधु कुछ देर चुप रहकर धीरे-से बोले, ''मगर हम लोगों के तो घर-द्वार नहीं है, हम लोग तो पेड़ तले ही रहा करते हैं, जीजी।''
अबकी बार राजलक्ष्मी भी क्षण-भर मौन रहकर बोली, ''सो जीजी की ऑंखों के सामने नहीं। रात के वक्त भाई को मैं निराश्रय नहीं छोड़ सकती। आज मेरे साथ चलो, कल मैं खुद ही तैयारी करके भेज दूँगी।''
साधु चुप रहे। राजलक्ष्मी ने रतन को बुलाकर कह दिया कि बिना उनसे पूछे गाड़ी की कोई चीज स्थानान्तरित न की जाय। अर्थात् सन्यासी महाराज का बॉक्स आज रात-भर के लिए रोक रक्खा गया।
मैंने कहा, ''तो फिर क्यों झूठमूठ को ठण्ड में तकलीफ उठा रहे हो भाई साहब, आ जाओ न मेरी गाड़ी में।''
साधु ने जरा कुछ सोचकर कहा, ''अभी रहने दो। जीजी के साथ ज़रा बातचीत करता हुआ चल रहा हूँ।''
मैंने भी सोचा कि ठीक है और ताड़ गया कि अभी साधु बाबा के मन में नये सम्बन्ध को अस्वीकार करने का द्वन्द्व चल रहा है। मगर फिर भी, अन्त तक बचाव न हो सका। सहसा, जबकि उन्होंने अंगीकार कर ही लिया, तब बार-बार मेरे मन में आने लगा कि जरा सावधान करके उनसे कह दूँ, 'महाराज, भाग जाते तो अच्छा होता। अन्त में कहीं मेरी-सी दशा न हो!'
लेकिन, मैं चुप ही रहा।
दोनों की बातचीत धड़ल्ले से होने लगी। बैलगाड़ी के झकझोरों और ऊँघाई के झोंकों में, बीच-बीच में उनकी बातचीत का सूत्र खोते रहने पर भी, कल्पना की सहायता से उसे पूरा करते हुए रास्ता तय करने में मेरा समय भी बुरा नहीं बीता।
शायद मैं जरा तन्द्रा-मग्न हो गया, सहसा सुना, पूछा जा रहा है, ''क्यों आनन्द, तुम्हारे उस बॉक्स में क्या-क्या है, भाई?''
उत्तर मिला, ''कुछ किताबें और दवा-दारू है जीजी।''
''दवा-दारू क्यों? तुम क्या डॉक्टर हो?''
''मैं तो सन्यासी हूँ। अच्छा, आपने क्या सुना नहीं जीजी, आपके उस तरफ हैजा फैल रहा है?''
''नहीं तो। यह बात तो हमारे गुमाश्ते ने नहीं जताई। अच्छा, लालाजी, तुम हैजे को आराम कर सकते हो?''
साधुजी ने जरा मौन रहकर कहा, ''आराम करने के मालिक तो हम लोग नहीं दीदी, हम लोग तो सिर्फ दवा देकर कोशिश कर सकते हैं। मगर इसकी भी जरूरत है, यह भी उन्हीं का आदेश है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''सन्यासी भी दवा दिया करते हैं, ठीक है, मगर सिर्फ दवा देने ही के लिए सन्यासी नहीं बना जाता। अच्छा आनन्द, तुम क्या सिर्फ इसीलिए सन्यासी हुए हो भइया?''
साधु ने कहा, ''सो मैं ठीक नहीं जानता जीजी, मगर हाँ, देश की सेवा करना भी हम लोगों का एक व्रत है।''
''हम लोगों का? तो शायद तुम लोगों का एक दल होगा न, लालाजी?''
साधु कुछ जवाब न देकर चुप बने रहे। राजलक्ष्मी ने फिर पूछा, ''लेकिन सेवा करने के लिए सो सन्यासी होने की जरूरत नहीं होती, भाई। तुम्हें यह मति बुद्धि दी किसने, बताओ तो?''
साधुजी ने इस प्रश्न का शायद उत्तर नहीं दिया, क्योंकि, कुछ देर तक किसी की कोई बात सुनने में नहीं आई। दसेक मिनट बाद कान में भनक पड़ी, साधुजी कह रहे हैं, 'जीजी, मैं बहुत ही क्षुद्र सन्यासी हूँ। मुझे यह नाम न भी दिया जाय तो ठीक है। मैंने तो सिर्फ अपना थोड़ा-सा भार फेंककर उसकी जगह दूसरों का बोझ लाद लिया है।''
राजलक्ष्मी कुछ बोली नहीं, साधुजी कहने लगे, ''मैं शुरू से ही देख रहा हूँ कि आप मुझे बराबर घर लौटाने की कोशिश कर रही हैं। मालूम नहीं क्यों, शायद जीजी होने की वजह से ही। परन्तु जिनका भार लेने के लिए हम घर छोड़कर निकल आये हैं वे कितने दुर्बल, कितने रुग्ण, कैसे निरुपाय और कितनी संख्या में हैं, यह अगर किसी तरह एक बार जान जातीं, तो उस बात को फिर मन में भी ला नहीं सकतीं।''
इसका भी राजलक्ष्मी ने कुछ उत्तर नहीं दिया; परन्तु मैं समझ गया कि जो प्रसंग छिड़ा है, उसमें अब दोनों के मन और मत के भेद होने में देर नहीं होगी। साधुजी ने भी ठीक जगह पर ही चोट की है। देश की आभ्यन्तरिक अवस्था और उसके सुख, दु:ख, अभाव को मैं खुद भी कुछ कम नहीं जानता; मगर ये सन्यासी कोई भी क्यों न हों, इन्होंने अपनी इस थोड़ी-सी उमर में मुझसे बहुत ज्यादा और घनिष्ठ भाव से सब देखा-भाला है और बहुत विशाल हृदय से उसे अपनाया है। सुनते-सुनते ऑंखों की नींद ऑंसुओं में परिवर्तित हो गयी और सारा हृदय क्रोध, क्षोभ, दु:ख और व्यथा से मानो मथा जाने लगा। पीछे की गाड़ी के अंधेरे कोने में अकेली बैठी हुई राजलक्ष्मी ने एक प्रश्न तक नहीं किया, इतनी बात में से एक भी बात में उसने साथ नहीं दिया। उसकी नीरवता से साधु महाराज ने क्या सोचा होगा सो वे ही जानें; परन्तु, इस एकान्त स्तब्धता का सम्पूर्ण अर्थ मुझसे छिपा न रहा।
'देश' के मानी हैं वे गाँव जहाँ देश के चौदह आने नर-नारी वास करते हैं। उन्हीं गाँवों की कहानी साधु कहने लगे। देश में पानी नहीं है, प्राण नहीं हैं, स्वास्थ्य नहीं है, जंगल की गन्दगी से जहाँ मुक्त प्रकाश और साफ हवा का मार्ग रुका हुआ है- जहाँ ज्ञान नहीं, जहाँ विद्या नहीं, धर्म भी विकृत और पथभ्रष्ट है : मृतकल्प जन्म-भूमि के इस दु:ख का विवरण छापे के अक्षरों में भी पढ़ा है और अपनी ऑंखों से भी देखा है, परन्तु यह न होना, कितना बड़ा 'न होना' है, इस बात को, मालूम हुआ कि, आज से पहले जानता ही न था। देश की यह दीनता कितनी भयंकर दीनता है, आज से पहले मानो उसकी धारणा भी मुझे न थी। सूखे सूने विस्तृत मैदान में से हम लोग गुजर रहे हैं। सड़क की धूल ओस से भीगकर भारी हो गयी है। उस पर गाड़ी के पहियों और बैलों के खुरों का शब्द कदाचित् ही सुनाई दे रहा है। आकाश की चाँदनी पाण्डुर होकर जहाँ तक दृष्टि जाती है वहाँ तक फैल रही है। इसी के भीतर के शीतऋतु के इस निस्तब्ध निशीथ में हम लोग अज्ञात की ओर धीर मन्थर गति से लगातार चल रहे हैं; अनुचरों में से कौन जाग रहा है और कौन नहीं, सो भी नहीं मालूम होता, सभी कोई शीत-वस्त्रों से अपना सर्वाक्ष् ढके हुए चुपचाप पड़े हैं। सिर्फ अकेले सन्यासीजी ही हमारे साथ सजग चल रहे हैं और इस परिपूर्ण स्तब्धता में सिर्फ उन्हीं के मुँह से देश के अज्ञात भाई-बहनों की असह्य वेदना का इतिहास मानो लपटें ले-लेकर जल-जलकर निकल रहा है। यह सोने की भूमि किस तरह धीरे-धीरे ऐसी शुष्क, ऐसी रिक्त हो गयी, कैसे देश की समस्त सम्पदा विदेशियों के हाथ में पड़कर धीरे-धीरे विदेश में चली गयी, किस तरह मातृ-भूमि के समस्त मेद-मज्जा और रक्त को विदेशियों ने शोषण कर लिया, इसके ज्वलन्त इतिहास को मानो वह युवक ऑंखों के सामने एक-एक करके उद्धाटित करके दिखलाने लगा।
सहसा साधु ने राजलक्ष्मी को सम्बोधन करके कहा, ''मालूम होता है, तुम्हें मैं पहिचान सका हूँ जीजी। मन में आता है, तुम जैसी बहिनों को ले जाकर तुम्हारी अपनी ऑंखों के सामने तुम्हारे उन सब भाई-बहनों को दिखलाऊँ।''
राजलक्ष्मी से पहले तो कुछ बोला न गया, बाद में रुँधे हुए गले से वह बोली, ''मुझे क्या ऐसा मौका मिल सकता है, आनन्द? मैं जो औरत हूँ, इस बात को मैं कैसे भूलूँ, भइया?''
साधु ने कहा, ''क्यों नहीं मिल सकता बहन? और, तुम औरत हो, इस बात को ही यदि भूल जाओगी तो कष्ट उठाकर तुम्हें वह सब दिखाने से मुझे लाभ ही क्या होगा?''
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साधु ने पूछा, ''गंगामाटी क्या तुम्हीं लोगों की जमींदारी है, जीजी?'' राजलक्ष्मी ने जरा मुसकराकर कहा, ''देखते क्या हो भाई, हम एक बड़े भारी जमींदार हैं।''
अबकी बार जवाब देने में साधु भी जरा हँस पड़ा। बोला, ''बड़ी भारी जमींदारी, लेकिन, बड़ा भारी सौभाग्य नहीं है, जीजी।'' उसकी बात से उसकी पार्थिव अवस्था के सम्बन्ध में मुझे एक तरह का सन्देह उत्पन्न हुआ, परन्तु राजलक्ष्मी उस दिशा की ओर नहीं गयी। उसने सरल भाव से तत्क्षण स्वीकार करते हुए कहा, ''बात तो सच है आनन्द। यह सब जितनी ही दूर हो जाय, उतना अच्छा।''
''अच्छा जीजी, वे अच्छे हो जाँयगे तो फिर तुम अपने शहर को लौट आओगी?''
''लौट जाऊँगी? मगर वह तो बहुत दूर की बात है भाई!''
साधु ने कहा, ''बन सके तो अब मत लौटना, जीजी। इन सब गरीब अभागों को तुम लोग छोड़कर चली गयी हो, इसी से तो इनका दु:ख कष्ट चौगुना बढ़ गया है। जब पास थीं तब भी तुमने इन्हें कष्ट न दिया हो सो बात नहीं, मगर दूर रहकर इतना निर्मम दु:ख उन्हें न दे सकी होगी। तब जैसे दु:ख दिया है; वैसे दु:ख बँटाया भी है। जीजी, देश का राजा अगर देश ही में रहे तो देश का दु:ख-दैन्य शायद इस तरह गले तक न भर उठा करे। और, इस 'गले तक भरने' का मतलब क्या है और तुम लोगों को शहर-वास के लिए सर्व प्रकार आहार-विहार का सामान जुटाने का अभाव और अपव्यय क्या है, इस चीज को अगर एक बार ऑंखें पसारकर देख सकतीं जीजी...''
''क्यों आनन्द, घर के लिए तुम्हारा मन चंचल नहीं होता?...''
साधु ने संक्षेप में कहा, ''नहीं।''
वह बेचारा समझा नहीं, परन्तु मैं समझ गया कि राजलक्ष्मी ने उस प्रसंग को दबा दिया, महज इसलिए कि उससे सहा नहीं जाता था।
कुछ देर मौन रहकर राजलक्ष्मी ने व्यथित कण्ठ से पूछा, ''घर पर तुम्हारे कौन-कौन हैं?''
साधु ने कहा, ''मगर घर तो मेरा अब रहा नहीं।''
राजलक्ष्मी फिर बहुत देर तक नीरव रहकर बोली, ''अच्छा आनन्द, इस उमर में सन्यासी होकर क्या तुमने शान्ति पाई है?''
साधु ने हँसकर कहा, ''अरे बाप रे! सन्यासी को इतना लोभ! नहीं जीजी, मैंने तो दूसरों के दु:ख का थोड़ा-सा भार लेना चाहा है, और सिर्फ वही पाया है।''
राजलक्ष्मी फिर चुप रही। साधु ने कहा, ''वे शायद सो गये होंगे, लेकिन अब जरा उनकी गाड़ी में जाकर बैठूँ। अच्छा जीजी, कभी दो-चार दिन के लिए अगर तुम लोगों का अतिथि बनकर रहूँ तो क्या वे नाराज होंगे?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''वे कौन? तुम्हारे भाईसाहब?''
साधुजी ने जरा हँसकर कहा, ''अच्छा, यही सही।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''और मैं नाराज हूँगी या नहीं, सो तो पूछा ही नहीं। अच्छा, पहले चलो तो एक बार गंगामाटी, उसके बाद इस बात का विचार किया जायेगा।''
साधुजी ने क्या कहा, सुन न सका, शायद कुछ कहा ही नहीं। थोड़ी देर बाद मेरी गाड़ी में आकर पुकारा, ''भाई साहब, आप जाग रहे हैं?''
मैं जाग ही रहा था, पर कुछ बोला नहीं! फिर वे मेरे पास ही थोड़ी-सी जगह निकालकर अपना फटा कम्बल ओढ़कर पड़ रहे। एक बार तबियत तो हुई कि जरा खिसककर बेचारे के लिए थोड़ी-सी जगह और छोड़ दूँ, परन्तु हिलने-डुलने से कहीं उन्हें शक न हो जाय कि मैं जाग रहा हूँ या मेरी नींद उचट गयी है और इस गम्भीर निशीथ में फिर एक बार देश की सुगम्भीर समस्या की आलोचना होने लगे, इस डर से मैंने करुणा प्रकट करने की चेष्टा तक न की।
गाड़ी ने गंगामाटी में कब प्रवेश किया मुझे नहीं मालूम; मुझे तो तब मालूम हुआ जब गाड़ी नये मकान के दरवाजे पर जा खड़ी हुई। तब सबेरा हो चुका था। एक साथ चार बैलगाड़ियों के विविध और विचित्र कोलाहल से चारों तरफ भीड़ तो कम नहीं मालूम हुई। रतन की कृपा से पहले ही सुन चुका था कि गाँव में मुख्यत: छोटी जात ही बसती है। देखा कि नाराजगी में भी उसने बिल्कुचल झूठ नहीं कहा था। ऐसे जाड़े-पाले में तड़के ही पचास-साठ नाना उमर के लड़के-लड़कियाँ, नंग-धड़ंग और उघड़े बदन, शायद हाल ही सोते से उठकर तमाशा देखने के लिए जमा हो गये हैं। पीछे से बाप-महतारियों का झुण्ड भी यथा-योग्य स्थान से ताक-झाँक रहा है। उन सबकी आकृति और पहनावा देखकर उनकी कुलीनता के बारे में और किसी के मन में चाहे हुछ भी हो, मगर, रतन के मन में शायद संशय की भाप भी बाकी न रही। उसका सोते से उठा हुआ चेहरा निमेष-मात्र में विरक्ति और क्रोध से बर्रों के छत्ते के समान भीषण हो उठा। मालकिन के दर्शन करने की अतिव्यग्रता से कुछ लड़के-बाले कुछ आत्म-विस्तृत होकर सटते आ रहे थे। देखते ही रतन ने ऐसे बिकट-रूप से उन्हें धर-खदेड़ा कि सामने अगर दो गाड़ीवान न होते तो वहीं एक खून-खराबी हुई धरी थी। रतन को जरा भी लज्जा का अनुभव न हुआ। मेरी तरफ देखकर बोली, ''दुनिया की छोटी जात सब यहीं आकर मरी है! देखी बाबूजी, छोटी जात की हिमाकत? जैसे रथ-यात्रा देखने आए हों! हमारे यहाँ के भले आदमी क्या यहाँ आकर रह सकते हैं बाबूजी? अभी सब छू-छा करके एकाकार कर देंगे।''
'छू-छा' शब्द सबसे पहले पहुँचा राजलक्ष्मी के कानों में। उसका चेहरा अप्रसन्न-सा हो गया।
साधुजी अपना बॉक्स उतारने में व्यस्त थे। अपना काम खतम करके वे एक लोटा निकालकर आगे बढ़ आये और पास ही जिस लड़के को पाया उसका हाथ पकड़कर बोले, ''अरे लड़के, जा तो भइया, यहाँ कहीं अच्छा-सा तालाब-आलाब हो हो तो एक लोटा पानी तो ले आ, चाय बनानी है।'' यह कहकर उन्होंने लोटा उसके हाथ में थमा दिया, फिर सामने खड़े हुए एक अधेड़ उमर के आदमी से कहा, ''चौधरी, आसपास किसी के यहाँ गाय हो तो बता देना भइया, छटाक-भर दूध माँग लाऊँ। गाँव की ताजी खालिस चीज ठहरी, चाय का रंग ऐसा बढ़िया आयेगा जीजी...'' फिर उन्होंने एक बार अपनी जीजी के चेहरे की तरफ देखा। मगर 'जीजी' ने इस उत्साह में जरा भी साथ नहीं दिया। अप्रसन्न मुख से जरा मुसकराकर कहा, ''रतन, जा तो भइया, लोटा माँजकर जरा पानी तो ले आ।''
रतन के मिजाज का संवाद पहले ही दे चुका हँ। उसके बाद जब उस पर ऐसे जाड़े-पाले में न जाने कौन एक अनजान साधु के लिए, मालूम नहीं कहाँ के तालाब से, पानी लाने का भार पड़ा, तब वह अपने को न रोक सका। एक ही क्षण में उसका सारा गुस्सा जाकर पड़ा, उससे भी जो छोटा था, उस अभागे लड़के पर। वह उसे एक जोर की धमकी देकर बोला, ''पाजी बदमाश कहीं का, लोटा क्यों छुआ तूने? चल हरामजादे, लोटा माँजकर पानी में डुबो देना।'' इतना कहकर मानो वह सिर्फ अपनी ऑंख-मुख की चेष्टा से ही लड़के को गरदनियाँ देता हुआ ले गया।
उसकी करतूत देखकर साधु हँस पड़े, मैं भी हँस दिया। राजलक्ष्मी ने खुद भी जरा सलज्ज हँसी हँसकर कहा, ''गाँव में तुमने तो उथल-पुथल मचा दी आनन्द, साधुओं को शायद रात बीतने के पहले ही चाय चाहिए?''
साधु ने कहा, ''गृहस्थों के लिए रात नहीं बीती तो क्या हम लोगों के लिए भी नहीं बीतेगी? खूब। लेकिन दूध की तजवीज तो होनी चाहिए। अच्छा, घर में घुसकर देखा तो जाय, लकड़ी-बकड़ी, चूल्हा-ऊल्हा कुछ है या नहीं। ओ चौधरी, चलो न भइया, किसके यहाँ गाय है, चलके जरा दिखा दो। जीजी, कल के उस बर्तन में बरफी-अरफी कुछ बची थी न? या गाड़ी ही में अंधेरे में उसे खतम कर दिया!
राजलक्ष्मी को हँसी आ गयी। मुहल्ले की जो दो-चार औरतें दूर खड़ी देख रही थीं, उन्होंने मुँह फेर लिया।
इतने में गुमाश्ता काशीराम कुशारी महाशय घबराये हुए आ पहुँचे। साथ में उनके तीन-चार आदमी थे; किसी के सिर पर भर-टोकनी शाक-सब्जी और तरकारी थी, किसी के हाथ में भर-लोटा दूध, किसी के हाथ में दही का बर्तन और किसी के हाथ में बड़ी-सी रोहू मछली। राजलक्ष्मी ने उन्हें नमस्कार किया। वे आशीर्वाद के साथ, अपने आने में जरा देर हो जाने के लिए, तरह-तरह की कैफियत देने लगे। आदमी तो मुझे अच्छा ही मालूम हुआ। उमर पचास से ज्यादा होगी। शरीर कुछ कृश, दाढ़ी-मूछें मुड़ी हुईं और रंग साफ। मैंने उन्हें नमस्कार किया, उन्होंने भी प्रति-नमस्कार किया। परन्तु, साधुजी इस सब प्रचलित शिष्टाचारों के पास से भी न फटके। उन्होंने तरकारी की टोकनी अपने हाथ से उतरवाकर उसमें से एक-एक का विश्लेषण करके विशेष प्रशंसा की। दूध खालिस है, इस विषय में अपना नि:संशय मत जाहिर किया और मछली के वजन का अनुमान करके उसके आस्वाद के विषय में उपस्थित सभी को आशान्वित कर दिया।
साधु महाराज के शुभागमन के विषय में गुमाश्ता साहब को पहले के कुछ खबर नहीं मिली थी; इसलिए, उन्हें कुछ कुतूहल-सा हुआ। राजलक्ष्मी ने कहा, ''सन्यासी को देखकर आप डरें नहीं कुशारी महाशय, ये मेरे भाई हैं।'' फिर जरा हँसकर मृदु कण्ठ से कहा, ''और बार-बार गेरुआ वसन छुड़वाना मानो मेरा काम ही हो गया है!''
बात साधुजी के कानो में भी पड़ी। बोले, ''पर यह काम उतना आसान न होगा, जीजी।'' यों कहकर मेरी ओर कनखियों से देख के जरा हँसे। इसके मानी मैं भी समझ गया और राजलक्ष्मी भी। मगर प्रत्युत्तर में उसने सिर्फ जरा मुसकराकर कहा, ''सो देखा जायेगा।''
मकान के भीतर प्रवेश करके देखा गया कि कुशारी महाशय ने इन्तज़ाम कुछ बुरा नहीं किया है। बहुत ही जल्दी की वजह से उन्होंने खुद अन्यत्र जाकर पुराने कचहरी वाले मकान को थोड़ा-बहुत जीर्णोद्वार कराके खासा रहने- लायक बना दिया है। भीतर रसोई और भण्डार-घर के सिवा सोने के लिए दो कमरे भी हैं। कमरे हैं तो मिट्टी के ही और ऊपर है, मगर खूब ऊँचे और बड़े हैं। बाहर की बैठक भी बहुत अच्छी है। ऑंगन लम्बा-चौड़ा, साफ-सुथरा और मिट्टी की चहारदीवारी से घिरा हुआ है। एक तरफ छोटा-सा एक कुऑं है, और उसके पास ही दो-तीन तगर और शेफाली के पेड़ हैं। दूसरी तरफ बहुत-से छोटे-बड़े तुलसी के पौधों की पंक्ति है, और चार-पाँच जुही और मल्लिका के झाड़ हैं। कुल मिलाकर जगह बहुत अच्छी है, देखकर मन को तृप्ति हुई।
सबसे बढ़कर उत्साह देखा गया सन्यासी महाशय में। जो कुछ उनकी निगाह में पड़ा उसी पर वह उच्च कण्ठ से आनन्द प्रकट करने लगे, जैसे ऐसा और कभी उन्होंने देखा ही न हो। मैं, शोरगुल न मचाने पर भी, मन-ही-मन खुश ही हुआ। राजलक्ष्मी अपने भइया के लिए रसोई में चाय बना रही थी, इसलिए उसके चेहरे का भाव ऑंखों से तो नहीं दिखाई दिया, परन्तु मन का भाव किसी से छिपा भी न रहा। सिर्फ साथ नहीं दिया तो एक रतन ने। वह मुँह को उसी तरह फुलाए हुए एक खम्भे के सहारे चुपचाप बैठा रहा।
चाय बनी। साधुजी कल की बची हुई मिठाई के साथ चुपचाप दो प्याला चाय चढ़ाकर उठ बैठे और मुझसे बोले, ''चलिए न, जरा घूम-फिर कर गाँव देख आवें। बाँध भी तो ज्यादा दूर नहीं, उधर के उधर ही नहा भी आयेंगे। जीजी, आइए न, जमींदारी देखभाल आवें। शायद शरीफ लोग तो कोई होंगे नहीं, शरम करने की भी विशेष कोई जरूरत नहीं। जायदाद है अच्छी, देख के लोभ होता है।''
राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, ''सो तो मैं जानती हूँ। सन्यासियों का स्वभाव ही ऐसा होता है।''
हमारे साथ रसोइया ब्राह्मण तथा और भी एक नौकर आया था। वे दोनों रसोई की तैयारी कर रहे थे। राजलक्ष्मी ने कहा, ''नहीं महाराज, तुम्हारे हाथ ऐसी ताजी मछली सौंपने का हियाव नहीं पड़ता, नहा के लौटने पर रसोई मैं ही चढ़ाऊँगी।'' यह कहकर वह हमारे साथ चलने की तैयारी करने लगी।
अब तक रतन ने किसी बातचीत या काम में साथ नहीं दिया था। हम लोग जाने लगे तो वह अत्यन्त धीर-गम्भीर स्वर में बोला, ''माँ जी, उस बाँध या ताल, न जाने इस मुए देश के लोग क्या कहते हैं, उसमें आप मत नहाइएगा। बड़ी जबरदस्त जोंकें हैं उसमें, एक-एक, सुनते हैं, हाथ-हाथ भर की।''
दूसरे ही क्षण राजलक्ष्मी का चेहरा मारे डर के फक पड़ गया, ''कहता क्या है रतन, उसमें क्या बहुत जोंकें हैं?''
रतन ने गरदन हिलाकर कहा, ''जी हाँ, सुना तो ऐसा ही है।''
साधु ने डपटकर कहा, ''जी हाँ, सुन तो आया ही होगा! इस नाई ने सोच-सोचकर अच्छी तरकीब निकाली है!'' रतन के मन का भाव और जाति का परिचय साधु ने पहले ही से प्राप्त कर लिया था; हँस के कहा, ''जीजी, इसकी बात मत सुनो, चलो चलें। जोंकें हैं या नहीं, इस बात की परीक्षा न हो तो हम ही लोगों से करा लेना।''
मगर उनकी जीजी एक कदम भी आगे न बढ़ीं। जोंक के नाम से एकदम अचल होकर बोलीं, ''मैं कहती हूँ, आज न हो तो रहने दो, आनन्द, नयी जगह ठहरी, अच्छी तरह बिना जाने-समझे ऐसा दु:साहस करना, ठीक नहीं होगा। रतन, तू जा भइया, यहीं पर दो कलसे पानी कुऑं से ले आ।'' मुझे आदेश मिला, ''तुम कमजोर आदमी हो, सो कहीं किसी अनजान बाँध-ऑंध में नहा-नुहू मत आना। घर पर ही दो लोटा पानी डालकर आज का काम निकाल लेना।''
साधुजी ने हँसकर कहा, ''और मैं ही क्या इतना उपेक्षणीय हूँ जीजी, जो मुझे ही सिर्फ उस जोंकोंवाले तालाब में पठाए देती हो?''
बात कोई बड़ी नहीं थी, मगर इतने ही से राजलक्ष्मी की ऑंखें मानो सहसा डबडबा आईं। उसने क्षण-भर नीरव रहकर, अपनी स्निग्ध दृष्टि से मानो उन्हें अभिषिक्त करते हुए कहा, ''तुम तो भइया, आदमी के हाथ से बाहर हो। जिसने माँ-बाप का कहना नहीं माना, वह क्या कहीं की एक अनजान अपरिचित बहिन की बात रखेगा?''
साधुजी जाने के लिए उद्यत होकर सहसा जरा ठहरकर बोले, ''यह अनजान अपरिचित होने की बात मत कहो, बहिन। आप सब लोगों को पहिचानने के लिए ही तो घर छोड़कर निकला हूँ, नहीं तो मुझे इसकी क्या जरूरत थी, बताइए?'' इतना कहकर वे जरा तेजी से बाहर चले गये, और मैं भी धीरे से उनके साथ हो लिया।
हम दोनों ने मिलकर खूब घूम-फिर के गाँव देख-भाल लिया। गाँव छोटा है, और जिन्हें हम छोटी जात कहते हैं, उन्हीं का है। वास्तव में, दो घर तम्बोली और एक घर लुहार के सिवा गंगामाटी में ऐसा कोई घर नहीं जिसका पानी लिया जो सके। सभी घर डोम और बाउरियां के हैं। बाउरी लोग बेंत का काम और मजूरी करते हैं और डोम लोग टोकनी, सूप, डलिया वगैरह और पोड़ामाटी गाँव में बेचकर जीविका चलाते हैं। गाँव के उत्तर की तरफ पानी के निकास का जो बड़ा नाला है, उसी के उस पार पोड़ामाटी है। सुनने में आया कि वह गाँव बड़ा है, और उसमें ब्राह्मण, कायस्थ और अन्यान्य जातियों के भी बहुत-से घर हैं। अपने कुशारी महाशय का घर भी उसी पोड़ामाटी में है। मगर दूसरों की बात पीछे कहूँगा, फिलहाल अपने गाँव की जो हालत ऑंखों से देखी, उससे मेरी दृष्टि ऑंसुओं से धुँधली हो आई। बेचारों ने अपने-अपने घरों की जी-जान से छोटा बनाने की कोशिश करने में कुछ उठा नहीं रखा है, फिर भी इतने छोटे-छोटे घरों के छाने लायक सूखा घास भी इस सोने के देश में, उनके भाग्य से नहीं जुटता। बीता-भर जमीन तक किसी के पास नहीं, सिर्फ डलिया-टोकनी-सूप बनाकर और दूसरे गाँव में सद्गृहस्थों को पानी के मोल बेचकर किस तरह इन लोगों की गुजर होती है, मैं तो सोच ही न सका। फिर भी, इसी तरह इन अशुचि अस्पृश्यों के दिन कट रहे हैं और शायद इसी तरह हमेशा से कटे हैं, परन्तु किसी ने भी किसी दिन इसका जरा खयाल तक नहीं किया। सड़क के कुत्ते जैसे पैदा होकर कुछ वर्ष तक जैसे-तैसे जिन्दा रहकर न जाने कहाँ, कब कैसे मर जाते हैं-उनका जैसे कहीं कोई हिसाब नहीं रखता, इन अभागों का भी वही हाल है, मानो, देशवासियों से वे इससे ज्यादा और कुछ दावा ही नहीं कर सकते। इनका दु:ख इनकी दीनता, इनकी सब तरह की हीनता अपनी और पराई दृष्टि में इतनी सहज और स्वाभाविक हो गयी है कि मनुष्य के पास ही मनुष्य के इतने बड़े जबरदस्त अपमान से कहीं किसी के भी मन में लज्जा का रंच-मात्र भी संचार नहीं होता। मगर, साधुजी इधर जो मेरे चेहरे की तरफ देख रहे थे, सो मुझे मालूम ही नहीं हुआ। वे सहसा बोल उठे, ''भाई साहब, यही है देश की सच्ची तसवीर। लेकिन, मन में मलाल लाने की जरूरत नहीं। आप सोच रहे होंगे कि ये बातें इन्हें दिन-रात सताया करती हैं, मगर यह बात कतई नहीं।''
मैंने क्षुब्ध और अत्यन्त विस्मित होकर कहा, ''यह बात क्या कही साधुजी?''
साधुजी ने कहा, ''मेरी तरह आप भी अगर सब जगह घूमा-फिरा करते भाई साहब, तो समझ जाते कि मैंने लगभग सच बात ही कही है। असल में दु:ख भोगता कौन है भइया? मन ही तो? मगर वह बला क्या हम लोगों ने बाकी छोड़ी है इनमें?- बहुत दिनों से लगातार सिकंजे में दबा-दबाकर बिल्कु'ल निचोड़ लिया है बेचारों का मन। इससे ज्यादा चाहने का अब ये खुद ही अनुचित स्पर्धा समझते हैं। वाह रे वाह! हमारे बाप-दादों ने भी सोच-विचार कर कैसी उमदा मशीन ईजाद की है, क्या कहने!'' यह कहकर साधु अत्यन्त निष्ठुर की भाँति 'हा: हा:' करके हँसने लगे। मगर मैं न तो उनकी हँसी में ही शरीक हो सका, और न उनकी बात का ठीक-ठीक अर्थ ही ग्रहण कर सका, और इसलिए मन-ही-मन लज्जित हो उठा।
इस साल फसल अच्छी नहीं हुई, और पानी की कमी से हेमन्त ऋतु के धान लगभग आधे सूख जाने से अभी से अभाव की हवा चलने लगी। साधुजी ने कहा, ''भाई साहब, चाहे किसी बहाने ही सही, भगवान ने जब आपको अपनी प्रजा के बीच ढकेल-ढुकूलकर भेज ही दिया है, तब अचानक भाग न जाइएगा। कम-से-कम यह साल तो यहीं बिताकर जाइए। यह तो मैं नहीं सोचता कि आप विशेष कुछ कर सकेंगे, पर ऑंखों से देखकर प्रजा के दु:ख को बँटाना अच्छा है, इससे जमींदारी करने के पाप का बोझ कुछ हलका होता है।''
मैंने मन-ही-मन गहरी साँस लेकर सोचा-जमींदारी और प्रजा जैसे मेरी ही हो, परन्तु जैसे पहले जवाब नहीं दिया, अबकी बार भी मैं उसी तरह चुप रह गया।
छोटे से गाँव की प्रदक्षिणा करता हुआ नहा-धोकर जब वापस आया, तब बारह बज चुके थे। शाम की तरह आज भी हम दोनों को भोजन परोसकर राजलक्ष्मी एक तरफ बैठ गयी। सारी रसोई उसने खुद अपने हाथ से बनाई थी, लिहाजा मछली का मुँहड़ा और दही की मलाई साधु की पत्तल में ही पड़ी। साधुजी बैरागी आदमी ठहरे, किन्तु, सात्वि‍क, और असात्वि‍क, निरामिष और आमिष, किसी भी चीज में उनका रंचमात्र भी विराग देखने में नहीं आया, बल्कि इस विषय में उन्होंने ऐसे प्रबल अनुराग का परिचय दिया जो घोर सांसारिक में भी दुर्लभ है। चूँकि रसोई के भले-बुरे मर्म को समझने में मेरी ख्याति नहीं थी, इसलिए मुझे समझाने की तरह रसोईदारिन ने कोई आग्रह भी प्रकट नहीं किया।
साधुजी को कोई जल्दी नहीं; वे बहुत ही धीरे-सुस्ते भोजन करने लगे। कौर चाबते हुए बोले, ''जीजी, जगह सचमुच ही अच्छी है, छोड़कर जाने में ममता होती है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''छोड़ जाने के लिए तो हम लोग तुमसे आरजू-बिनती नहीं कर रहे हैं, भइया!''
साधुजी ने हँसकर कहा, ''साधु-सन्यासी को कभी इतना प्रश्रय न देना चाहिए जीजी- ठगाई जाओगी। खैर, कुछ भी हो, गाँव अच्छा है, कहीं भी कोई ऐसा नहीं दिखाई दिया जिसके हाथ का पानी पिया जा सके। और ऐसा भी एक घर नहीं देखा जिसके छप्पर पर एक पूला सूखा घास भी दिखाई दिया हो- जैसे मुनियों के आश्रम हों।''
आश्रम के साथ अस्पृश्य घरों का एक दृष्टि से जो उत्कृष्ट सादृश्य था, उसका खयाल करके राजलक्ष्मी ने जरा क्षीण हँसी हँसकर मुझसे कहा, ''सुनते हैं कि सचमुच ही इस गाँव में सिर्फ छोटी जात ही बसती है-किसी के एक लोटे पानी का भी आसरा नहीं। देखती हूँ, यहाँ ज्यादा दिन रहना नहीं हो सकेगा।''
साधु जरा हँसे, परन्तु मैं नीरव ही रहा। कारण राजलक्ष्मी जैसी करुणामयी भी किस संस्कार के वश इतनी बड़ी लज्जा की बात उच्चारण कर सकी, सो मैं जानता था। साधु की हँसी ने मुझे स्पर्श तो किया, किन्तु वह विद्ध न कर सकी। इसी से, मैं मुँह से तो कुछ नहीं बोला, मगर फिर भी मेरा मन राजलक्ष्मी को ही लक्ष्य करके भीतर कहने लगा, ''राजलक्ष्मी, मनुष्य का कर्म ही केवल अस्पृश्य और अशुचि होता है, मनुष्य नहीं होता। नहीं तो 'प्यारी' किसी भी तरह आज फिर 'लक्ष्मी' के आसन पर वापस न आ सकती। और वह भी सिर्फ इसीलिए सम्भव हुआ है कि मनुष्य की देह को ही मनुष्य समझने की गलती मैंने कभी नहीं की। इस बात में बचपन से ही बहुत बार मेरी परीक्षा हो चुकी है। लेकिन, ये बस बातें मुँह खोलकर किसी से कही भी नहीं जा सकतीं और कहने की प्रवृत्ति नहीं होती।''
दोनों भोजन समाप्त करके उठे। राजलक्ष्मी हम लोगों को पान देकर, शायद, खुद भी कुछ खाने चली गयी। परन्तु करीब घण्टे-भर बाद लौटकर जैसे वह खुद साधुजी को देखकर आसमान से गिरी-सी मालूम हुई, वैसे ही मैं भी विस्मित हो गया। देखा कि इसी बीच में न जाने कब वे बाहर से एक आदमी ले लाए हैं और दवाओं का भारी बॉक्स उसके सिर पर लादकर प्रस्थान के लिए तैयार खड़े हैं।
कल यही बात तो हुई थी, मगर आज हम उस हम बात को बिल्कुदल ही भूल गये थे। इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि इस प्रवास में राजलक्ष्मी के इतने आदर-जतन की उपेक्षा करके साधुजी अनिश्चित अन्यत्र के लिए इतनी जल्दी तैयार हो जाँयगे। स्नेह की जंजीर इतनी जल्दी नहीं टूटने की-राजलक्ष्मी के निभृत मन में शायद यही आशा थी। वह मारे डर के व्याकुल होकर कह उठी, ''तुम क्या जा रहे हो आनन्द?''
साधु ने कहा, ''हाँ जीजी, जाता हूँ। अभी से रवाना न होने से पहुँचने में बहुत रात हो जायेगी।''
''वहाँ कहाँ ठहरोगे, कहाँ सोओगे? अपना आदमी तो वहाँ कोई होगा नहीं।''
''पहले पहुँचूँ तो सही।''
''लौटोगे कब?''
''सो तो अभी नहीं कहा जा सकता। काम की भीड़ में अगर आगे न बढ़कर गया, तो किसी दिन लौट भी सकता हूँ।''
राजलक्ष्मी का मुँह पहले तो फक पड़ गया, फिर उसने जोर से अपना सिर झटककर रुँधे हुए कण्ठ से कहा, ''किसी दिन लौट भी सकते हो? नहीं, यह हरगिज नहीं हो सकता।''
क्या नहीं होगा सो समझ में आ गया, इसी से साधु ने प्रत्युत्तर में सिर्फ जरा म्लान हँसी हँसकर कहा, ''जाने का कारण तो आपको बता ही चुका हूँ।''
''बता चुके हो? अच्छा, तो जाओ'' इतना कहते-कहते राजलक्ष्मी प्राय: रो दी, और जल्दी से कमरे के भीतर चली गयी। क्षण-भर के लिए साधुजी स्तब्ध हो गये। उसके बाद मेरी तरफ देखकर लज्जित मुख से बोले, ''मेरा जाना बहुत जरूरी है।''
मैंने गर्दन हिलाकर सिर्फ इतना ही कहा, ''मालूम है।'' इससे ज्यादा और कुछ कहने को था भी नहीं। कारण, मैंने बहुत कुछ देखकर जान लिया है कि स्नेह की गहराई समय की स्वल्पता से हरगिज नहीं नापी जा सकती। और इस चीज की कवियों ने सिर्फ काव्यों के लिए ही शून्य कल्पना नहीं की- संसार में वास्तव में ऐसा हुआ करता है। इसीलिए, एक के जाने की आवश्यकता जितनी सत्य है, दूसरे का व्याकुल कण्ठ से मना करना भी ठीक उतना ही सत्य है या नहीं, इस विषय में मेरे मन में रंचमात्र भी संशय का उदय नहीं हुआ। मैं अत्यन्त सरलता से समझ गया कि इस बात को लेकर राजलक्ष्मी को शायद बहुत वेदना सहनी पड़ेगी।
साधुजी ने कहा, ''मैं चल दिया। उधर का काम अगर निबट गया, तो शायद, फिर आऊँगा; मगर अभी यह बात जताने की जरूरत नहीं।''
मैंने स्वीकार करते हुए कहा, ''सो सही है।''
साधुजी कुछ कहना ही चाहते थे कि घर की ओर देखकर सहसा एक गहरी उसाँस भरकर जरा मुसकराए; उसके बाद धीरे-से बोले, ''अजीब देश है यह बंगाल! इसमें राह चलते माँ-बहिनें मिल जाती हैं, किसमें सामर्थ्य है कि इनसे बचकर निकल जाय?''
इतना कहकर साधुजी धीरे-धीरे बाहर चले गये।
उनकी बात सुनकर मैंने भी एक गहरी साँस ली। मालूम हुआ, बात असल में ठीक है। जिसे देश की समस्त माँ-बहिनों को वेदना ने खींचकर घर से बाहर निकाला है, उसे सिर्फ एक ही बहिन स्नेह, दही की मलाई और मछली का मूँड़ देकर कैसे पकड़े रख सकती है?
साधुजी खुशी से चले गये। उनकी विहार-व्यथा ने रतन को कैसा सताया, यह उससे नहीं पूछा गया, सम्भवत: वह ऐसी कुछ सांघातिक न होगी। और एक व्यक्ति को मैंने रोते-रोते कमरे में घुसते देखा; अब तीसरा व्यक्ति रह गया मैं। उस आदमी के साथ पूरे चौबीस घण्टे की भी मेरी घनिष्ठता न थी, फिर भी मुझे ऐसा मालूम होने लगा मानो हमारी इस अनारब्ध गृहस्थी में वह एक बड़ा-सा छिद्र कर गया है। और जाते वक्त यह भी न बता गया कि आखिर यह अनिष्ट अपने आप ही ठीक हो जायेगा या स्वयं वही, फिर एक दिन इसी तरह अकस्मात् अपनी दवाओं की भारी पेटी लादे, इसे मरम्मत करने सशरीर आ पहुँचेगा। और मुझे स्वयं कोई भारी उद्वेग हो रहा हो, सो नहीं। नाना कारणों से, और खासकर कुछ दिनों से ज्वर में पड़े-पड़े मेरे शरीर और मन में ऐसा ही एक निस्तेज निरालम्ब भाव आ गया था कि एकमात्र राजलक्ष्मी के हाथ में ही सर्वतोभाव से आत्म-समर्पण करके दुनियादारी की सभी भलाई-बुराइयों से मैंने छुट्टी पा ली थी। लिहाजा, किसी बात के लिए स्वतन्त्र रूप से चिन्ता करने की न मुझे जरूरत थी और न शक्ति ही। फिर भी, मनुष्य के मन की चंचलता को मानो विराम है। ही नहीं- बाहर के कमरे में तकिए के सहारे मैं अकेला बैठा था कि न जाने कितनी इखरी-बिखरी चिन्ताएँ मेरे चक्कर लगाने लगीं-सामने के ऑंगन में प्रकाश की दीप्ति धीरे-धीरे म्लान होकर आसन्न रात्रि के इशारे से मेरे अन्यमनस्क मन को बार-बार चौंका देने लगीं- मालूम होने लगा, इस जीवन में जितनी भी रातें आईं और गयीं हैं, उनके सहित आज की इस अनागत निशा की अपरिज्ञात मूर्ति मानो किसी अदृष्टपूर्ण नारी के अवगुण्ठित मुख की तरह ही रहस्यमय है। फिर भी, इस अपरिचिता की कैसी प्रकृति है और कैसी प्रथा, इस बात को बिना जाने ही इसके अन्त तक पहुँचना ही होगा, मध्यप-पथ में इस विषय में कुछ विचार ही नहीं चल सकता। फिर, दूसरे ही क्षण मानो अक्षम चिन्ता की सारी साँकलें टूटकर सब कुछ उलट-पुलट जाने लगा। जब कि मेरे मन की ऐसी हालत थी, तब पास का दरवाजा खोलकर राजलक्ष्मी ने कमरे में प्रवेश किया। उसकी ऑंखें कुछ-कुछ सुर्ख हो रही थीं और कुछ फूली-सी। धीरे-से मेरे पास बैठकर बोली, ''सो गयी थी।''
मैंने कहा, ''इसमें आश्चर्य क्या है! जिस भार और जिस श्रान्ति को तुम ढोती चली जा रही हो, दूसरा कोई होता तो उससे टूट ही पड़ता- और मैं होता तो दिन-रात में मुझसे कभी ऑंखें भी न खोली जातीं-कुम्भकर्ण की नींद सो जाता।''
राजलक्ष्मी ने मुसकराते हुए कहा, ''लेकिन, कुम्भकर्ण को तो मलेरिया नहीं था। खैर, तुम तो दिन में नहीं सोए?''
मैंने कहा, ''नहीं, पर अब नींद आ रही है, जरा सो जाऊँ। कारण कुम्भकर्ण को मलेरिया नहीं था, इस बात का वाल्मीकि ने भी कहीं उल्लेख नहीं किया है।''
उसने घबराकर कहा, सोओगे इतने सिदौ से। माफ करो तुम-फिर क्या बुखार आने में कोई कसर रह जायेगी? यह सब नहीं होने का- अच्छा, जाते वक्त आनन्द क्या तुमसे कुछ कह गया है?''
मैंने पूछा, ''तुम किस बात की आशा करती हो?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''यही कि कहाँ-कहाँ जायेगा-अथवा...''
यह 'अथवा' ही असली प्रश्न है। मैंने कहा, ''कहाँ-कहाँ जाँयगे, इसका तो एक तरह से आभास दे गये हैं, मगर इस 'अथवा' के बारे में कुछ भी नहीं कह गये। मैं तो उनके वापस आने की कोई खास सम्भावना नहीं देखता।''
राजलक्ष्मी चुप बनी रही, परन्तु मैं अपने कुतूहल को न रोक सका, पूछा, ''अच्छा, इस आदमी को क्या तुमने सचमुच पहिचान लिया है जैसे कि मुझे एक दिन पहिचान लिया था?''
उसने मेरे चेहरे की तरफ कुछ देर तक चुपचाप देखकर कहा, ''नहीं।''
मैंने कहा, ''सच बताओ, क्या पहले कभी किसी दिन देखा ही नहीं?'' अब की बार राजलक्ष्मी ने मुसकराते हुए कहा, ''तुम्हारे सामने में सौगन्ध तो खा नहीं सकती। कभी-कभी मुझसे बड़ी गलती हो जाती है। तब अपरिचित आदमी को देखकर भी मालूम होता है कि कहीं देखा है, उसका चेहरा पहिचाना हुआ-सा मालूम होता है, सिर्फ इतना ही याद नहीं पड़ता कि कहाँ देखा है। आनन्द को भी शायद कभी कहीं देखा हो।''
कुछ देर तक चुपचाप बैठी रहने के बाद धीरे से बोली, ''आज आनन्द चला तो गया, पर अगर वह कभी वापस आया तो उसे अपने माँ-बाप के पास जरूर वापस भेजूँगी, यह बात तुमसे निश्चय से कहती हूँ।''
मैंने कहा, ''इससे तुम्हारी गरज?''
उसने कहा, ''ऐसा लड़का हमेशा बहता फिरेगा, इस बात को सोचते हुए भी मानो मेरी छाती फटने लगती है। अच्छा, तुमने खुद भी तो घर-गृहस्थी छोड़ी थी-सन्यासी होने में क्या सचमुच का कोई आनन्द है?''
मैंने कहा, ''मैं सचमुच का सन्यासी हुआ ही नहीं, इसलिए उसके भीतर की सच्ची खबर तुम्हें नहीं दे सकता। अगर किसी दिन वह लौट आवे, तो उसी से पूछना।''
राजलक्ष्मी ने पूछा, ''घर रहकर क्या धर्म-लाभ नहीं होता? घर बिना छोड़े क्या भगवान नहीं मिलते?''
प्रश्न सुनकर मैंने हाथ जोड़ के कहा, ''दोनों में से किसी के लिए भी व्याकुल नहीं हूँ लक्ष्मी, ऐसे घोरतर प्रश्न तुम मुझसे मत किया करो, इससे मुझे फिर बुखार आ सकता है।''
राजलक्ष्मी हँस दी, फिर करुण कण्ठ से बोली, ''मालूम होता है आनन्द के घर सब कुछ मौजूद है, फिर भी उसने धर्म के लिए इसी उमर में सब छोड़ दिया है। मगर तुम तो ऐसा नहीं कर सके?''
मैंने कहा, ''नहीं, और भविष्य में भी शायद न कर सकूँगा।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''क्यों भला?''
मैंने कहा, इसका प्रधान कारण यह है कि जिसे छोड़ना चाहिए वह घर-गृहस्थी मेरे कहाँ है, और कैसी सो मैं नहीं जानता, और जिसके लिए छोड़ी जाय उस परमात्मा के लिए भी मुझे रंचमात्र लोभ नहीं। इतने दिन उसके बिना ही कट गये हैं, और बाकी दिन भी अटके न रहेंगे, मुझे इस बात का पूरा भरोसा है! दूसरी तरफ, तुम्हारे ये आनन्द भाई साहब गेरुआ वसन धारण करने पर भी ईश्वर-प्राप्ति के लिए ही निकल पड़े हों; ऐसा मैं नहीं समझता। कारण यह कि मैंने भी कई बार साधुओं का संग किया है, पर उनमें से किसी ने भी आज तक दवाओं की पेटी लादे घूमने को भगवत्-प्राप्ति का उपाय नहीं बताया है। इसके सिवा उनके खाने-पीने का हाल तो तुमने ऑंखों से देखा ही है।''
राजलक्ष्मी क्षण-भर चुप रहकर बोली, ''तो क्या वह झूठमूठ को ही घर-गृहस्थी छोड़कर इतना कष्ट उठाने के लिए निकला है? सभी को क्या तुम अपने ही समान समझते हो?''
मैंने कहा, ''नहीं तो, बड़ा भारी अन्तर है। वे भगवान की खोज में न निकलने पर भी, जिसके लिए निकले हैं वह उनके आसपास ही मालूम होता है, अर्थात् अपना देश। इसलिए उनका घर-द्वार छोड़ आना ठीक घर-गृहस्थी छोड़ना नहीं है। साधुजी ने तो सिर्फ एक छोटी गृहस्थी छोड़कर बड़ी गृहस्थी में प्रवेश किया है।''
राजलक्ष्मी मेरे मुँह की ओर देखती रही, शायद ठीक से समझ न सकी। उसने फिर पूछा, ''जाते वक्त वह क्या तुमसे कुछ कह गया है?''
मैंने गरदन हिलाकर कहा, ''नहीं तो, ऐसी कोई बात नहीं कहीं।''
क्यों मैंने जरा-सा सत्य छिपाया, सो मैं खुद भी नहीं जानता। चलते समय साधु ने जो बात कही थी, वह अब तक मेरे कानों में ज्यों की त्यों गूँज रही थी। जाते समय वे कह गये थे, 'विचित्र देश है यह बंगाल! यहाँ राह-चलते माँ-बहिनें मिल जाती हैं- किसमें सामर्थ्य है जो इनसे बचकर निकल जाय!''
म्लान मुख से राजलक्ष्मी चुपचाप बैठी रही, मेरे मन में भी बहुत दिनों की बहुत-सी भूली हुईं घटनाएँ धीरे-धीरे झाँककर देखने लगीं। मैंने मन-ही-मन कहा, ''ठीक है! ठीक है! साधुजी, तुम कोई भी क्यों न हो, इतनी कम उमर में ही तुमने अपने इस कंगाल देश को अच्छी तरह देख लिया है। नहीं तो, आज तुम इसके यथार्थ रूप की खबर इतनी आसानी से इतने कम शब्दों से नहीं दे सकते। जानता हूँ, बहुत दिनों की त्रुटियों और अनेक विच्युतियों ने हमारी मातृभूमि के सर्वांग में कीचड़ लेप दिया है, फिर जिसे इस सत्य की परीक्षा करने का अवसर मिला है, वह जानता है कि यह कितना बड़ा सत्य है।''
इसी तरह चुपचाप दस-पन्द्रह मिनट बीत जाने पर राजलक्ष्मी ने मुँह उठाकर कहा, ''अगर यही उद्देश्य उसके मन में हो, तो मैं कहे देती हूँ कि किसी न किसी दिन उसे घर लौटना ही होगा। इस देश में एकमात्र पराया भला करने वालों की दुर्गति से शायद वह परिचित नहीं है। इसका स्वाद कुछ-कुछ मुझे मिल चुका है, मैं जानती हूँ। मेरी तरह एक दिन जब संशय बाधा और कटुवचनों से उसका सारा मन विरक्त रस से भर जायेगा, तब उसे भी वापस भागने को राह ढूँढे न मिलेगी।''
मैंने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ''यह कोई असम्भव बात नहीं, पर मुझे मालूम होता है कि इन सब दु:खों की बात वह अच्छी तरह जानता है।''
राजलक्ष्मी बार-बार सिर हिलाकर कहने लगी, ''कभी नहीं, हरगिज नहीं। जानने के बाद फिर कोई भी उस रास्ते पर नहीं जा सकता, मैं कहती हूँ।''
इस बात का कोई जवाब न था। बंकू के मुँह से सुना था कि ससुराल के गाँव में एक बार राजलक्ष्मी के अनेक साधु-संकल्पों और पुण्य कर्मों का अत्यन्त अपमान हुआ था। उसी निष्काम परोपकार की व्यथा बहुत दिनों से उसके मन में लगी हुई थी। यद्यपि और भी एक पहलू देखने का था, परन्तु उस अवलुप्त वेदना के स्थान को चिह्नित करने की मेरी प्रवृत्ति न हुई, इसलिए चुपचाप बैठा रहा। हालाँकि राजलक्ष्मी जो कुछ कह रही था वह झूठ नहीं है। मैं मन ही मन सोचने लगा, क्यों ऐसा होता है? क्यों एक की शुभ चेष्टाओं को दूसरी सन्देह की दृष्टि से देखता है? आदमी क्यों इन सबको विफल करके संसार में दु:ख का भार घटने नहीं देता? मन में आया कि अगर साधुजी होते या कभी वापस आते, तो इस जटिल समस्या की मीमांसा का भार उन्हीं को सौंप देता।
उस दिन सबेरे से पास ही कहीं नौबत की आवाज सुनाई दे रही थी। अब कुछ आदमी रतन को अग्रवती करके ऑंगन में आ खड़े हुए। रतन ने सामने आकर कहा, ''माँजी, ये आपको 'राज-वरण' देने आए हैं- आओ न, दे जाओ न!'' कहते हुए उसने एक प्रौढ़-से आदमी की ओर इशारा किया। वह आदमी वसन्ती रंग की धोती पहने था और उसके गले में लकड़ी की नयी माला थी। उसने अत्यन्त संकोच के साथ आगे बढ़कर बरामदे के नीचे से ही नये शाल-पत्तों पर एक रुपया और सुपारी राजलक्ष्मी के चरणों के उद्देश्य से रखकर जमीन पर माथा टेककर प्रणाम किया, और कहा, ''माता रानी, आज मेरी लड़की का ब्याह है।''
राजलक्ष्मी उठकर आई और उसे स्वीकार करके पुलकित चित्त से बोली, ''लड़की के ब्याह में क्या यही दिया जाता है?''
रतन ने कहा, ''नहीं माँजी, सो बात नहीं, जिसका जैसा सामर्थ्य होता है, उसी के माफिक जमींदार की भेंट करता है- ये छोटी जातवाले ठहरे, डोम, इससे ज्यादा ये पायेंगे कहाँ, यही कितनी मुश्किल से...''
परन्तु निवेदन समाप्त होने के पहले ही डोम का रुपया सुनते ही राजलक्ष्मी ने झटपट उसे नीचे रखकर कहा, ''तो रहने दो, रहने दो, यह भी देने की जरूरत नहीं- तुम लोग ऐसे ही लड़की का ब्याह कर दो।''
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:27

इस भेंट लौटा देने के कारण लड़की का पिता और उससे भी अधिक रतन खुद बड़ी आफत में पड़ गया; वह नाना प्रकार से समझाने की कोशिश करने लगा कि इस राज-वरण के सम्मान के बिना मंजूर किये किसी तरह चल ही नहीं सकता। राजलक्ष्मी उस सुपारी समेत रुपये को क्यों नहीं लेना चाहती। इस बात को मैं कमरे के भीतर बैठे ही बैठे समझ गया था, और रतन किसलिए इतना अनुरोध कर रहा है, सो भी मुझसे छिपा न था। जहाँ तक सम्भव है दिया जानेवाला रुपया और भी ज्यादा पाने और गुमाश्ता कुशारी महाशय के हाथ से छुटकारा पाने के लिए ही यह कार्रवाई की गयी है; और रतन 'हुजूर' आदि सम्भाषण के बदले उनका मुखपात्र होकर अर्जी पेश करने आया है। वह काफी आश्वासन देकर उन्हें लाया होगा, इसमें तो कोई शक ही नहीं। उसका यह संकट अन्त में मैंने ही दूर किया। उठकर मैंने ही रुपया उठाया और कहा, ''मैंने ले लिया, तुम घर जाकर ब्याह की तैयारियाँ करो।''
रतन का चेहरा मारे गर्व के चमक उठा, और राजलक्ष्मी ने अस्पृश्य के प्रति-ग्रह के दायित्व से छुटकारा पाकर सुख की साँस ली। वह खुश होकर बोली, ''यह अच्छा ही हुआ, जिनका हक है खुद उन्हींने अपने हाथ से ले लिया।'' यह कहकर वह हँस दी।
मधु डोम ने कृतज्ञता से भरकर हाथ जोड़कर कहा, ''हुजूर पहर रात के भीतर ही लगन है, एक बार अगर हुजूर के पैरों की धूल गरीब के घर पड़ती...'' इतना कहकर वह एक बार मेरे और एक बार राजलक्ष्मी के मुँह की ओर करुण दृष्टि से देखता रहा।
मैं राजी हो गया, राजलक्ष्मी खुद भी जरा हँसकर नौबत की आवाज से अन्दाजा लगाकर बोली, ''नहीं है न तुम्हारा घर मधु ? अच्छा, अगर समय मिला तो मैं भी जाकर एक बार देख आऊँगी।'' रतन की तरफ देखकर बोली, ''बड़ा सन्दूक खोलकर देख तो रे, मेरी नयी साड़ियाँ आई हैं कि नहीं? जा, लड़की को उनमें से एक दे आ। मिठाई शायद यहाँ मिलती न होगी, बताशे मिलते हैं? अच्छा, सो ही सही। कुछ वे ही लेते जाना। अच्छा हाँ, तुम्हारी लड़की की उमर क्या है मधु? वर कहाँ का रहने वाला है? कितने आदमी जीमेंगे? इस गाँव में किनते घर हैं तुम लोगों के?''
जमींदार-गृहिणी के एक साथ इतने प्रश्नों के उत्तर में मधु ने सम्मान और विनय के साथ जो कुछ कहा, उससे मालूम हुआ कि उसकी लड़की की उमर नौ साल के भीतर ही है, वर युवक है, उमर तीस-चालीस से ज्यादा न होगी, वह चार-पाँच कोस उत्तर की तरफ किसी गाँव में रहता है- वहाँ उसके समाज का एक बड़ा हिस्सा रहता है, वहाँ जातीय पेशा कोई नहीं करता-सभी लोग खेती-बारी करते हैं- लड़की खूब सुख से रहेगी- डर है तो सिर्फ आज की रात का। कारण बारातियों की तादाद कितनी होगी और वे कहाँ क्या फसाद कर बैठेंगे, सो बिना सबेरा हुए कुछ कहा नहीं जा सकता। सभी कोई पैसे वाले ठहरे-कैसे उनकी मान-मर्यादा कायम रखकर शुभ-कार्य सम्पन्न होगा, इसी चिन्ता में बेचारा सूख के काँटा हुआ जा रहा है। इन सब बातों का विस्तार के साथ वर्णन करके अन्त में उसने कातरता के साथ निवेदन किया कि चिउड़ा, गुड़ और दही का इन्तजाम हो गया है, यहाँ तक कि आखिर में दो-दो बड़े बताशे भी पत्तलों में परोसे जाँयगे; मगर फिर भी अगर कोई गड़बड़ी हुई तो हम लोगों को रक्षा करनी होगी।
राजलक्ष्मी ने कुतूहल के साथ ढाँढ़स देकर कहा, ''गड़बड़ी कुछ न होने पायगी मधु, तुम्हारी लड़की का ब्याह निर्विध्न। हो जायेगा, मैं आशीर्वाद देती हूँ। तुमने खाने-पीने की इतनी चीजें इकट्ठी की हैं कि तुम्हारे समधी के साथी लोग खा-पीकर खुशी-खुशी घर जाँयगे।''
मधु ने जमीन से माथा टेककर प्रणाम करके अपने साथियों के साथ प्रस्थान किया, परन्तु उसका चेहरा देखकर मालूम हुआ कि इस आशीर्वाद के भरोसे उसने कोई खास सान्त्वना प्राप्त नहीं की; आज की रात के लिए लड़की के पिता के अन्दर काफी उद्वेग बना ही रहा।
शुभ कर्म में पैरों की धूल देने के लिए मधु को आशा दी थी; परन्तु, सचमुच ही जाना होगा, ऐसी सम्भावना शायद हममें से किसी के भी मन में न थी। शाम के बाद दिए के सामने बैठकर राजलक्ष्मी अपने आय-व्यय का एक चिट्ठा पढ़कर सुना रही थी, मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ ऑंखें मीचे कुछ सुन रहा था और कुछ नहीं सुन रहा था, किन्तु पास ही ब्याह वाले घर का शोरगुल कुछ देर से जरा असाधारण रूप से प्रखर होकर मेरे कानों में खटक रहा था। सहसा मुँह उठाकर राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, ''डोम के घर ब्याह है, मार-पीट होना भी उसका कोई अंग तो नहीं है?''
मैंने कहा, ''ऊँची जात की नकल अगर की तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। वे सब बातें याद तो हैं तुम्हें?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हाँ।'' उसके बाद क्षण-भर तक कान खड़े करके एक गहरी साँस लेकर कहा, ''वास्तव में, इस जले देश में हम लोग जिस तरह से लड़कियों को बहा देते हैं, उसमें छोटे-बड़े, भद्र-अभद्र सभी समान हैं। उन लोगों के चले जाने पर पता लगाया तो मालूम हुआ कि कल सबेरे वे उस बेचारी नौ साल की लड़की को न जाने किस अपरिचित घर-गृहस्थी में घसीट ले जाँयगे, फिर शायद कभी आने भी न देंगे। इन लोगों के यहाँ कायदा ही यही है। बाप एक कोड़ी चार रुपये में लड़की को आज बेच देगा। लड़की वहाँ एक बार मायके भेज देने का नाम तक भी नहीं ले सकती। ओहो, लड़की बेचारी कितनी रोयेगी बिलखेगी- ब्याह का वह अभी जानती ही क्या है, बताओ?''
ऐसी दुर्घटनाएँ तो मैं जन्म से ही देखता आ रहा हूँ। एक तरह से इसका आदी भी हो गया हूँ- अब तो क्षोम प्रकट करने की भी प्रवृत्ति‍ नहीं होती। लिहाजा जवाब में मैं चुप बना रहा।
जवाब न पाकर उसने कहा, ''हमारे देश में छोटी-बड़ी सभी जातियों में ब्याह सिर्फ ब्याह ही नहीं है, बल्कि एक धर्म है- इसी से, नहीं तो...''
मैंने मन में सोचा कि कह दूँ, ''इसे अगर धर्म ही समझ लिया है, तो फिर यह शिकायत ही किस बात की? और जिस धर्म-कर्म में मन प्रसन्न न होकर ग्लानि के भार से काला ही होता रहता है, उसे धर्म समझकर अंगीकार ही कैसे किया जाता है?''
परन्तु मेरे कुछ कहने के पहले ही राजलक्ष्मी स्वयं ही कह उठी, ''पर यह सब विधि-विधान जो बना गये हैं, वे थे त्रिकालदर्शी ऋषि; शास्त्र के वाक्य झूठ भी नहीं हैं, अमंगलकारी भी नहीं- हम लोग उसको क्या जानते हैं और कितना-सा समझते हैं!''
बस, जो कहना चाहता था सो फिर नहीं कहा गया। इस संसार में जो कुछ सोचने-विचारने की वस्तु थी, वह समस्त ही त्रिकालज्ञ ऋषिगण भूत, भविष्य और वर्तमान इन तीनों कालों के लिए पहले से ही सोच विचारकर स्थिर कर गये हैं, दुनिया में अब नये सिरे से चिन्ता करने को कुछ बाकी ही नहीं बचा। यह बात राजलक्ष्मी के मुँह से कोई नयी नहीं सुनी, और भी बहुतों के मुँह से बहुत बार सुनी है, और बार-बार मैं चुप ही रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि इसका जवाब देते ही आलोचना पहले तो गरम और फिर दूसरे ही क्षण व्यक्तिगत कलह में परिणत होकर अत्यन्त कड़वी हो उठती है। त्रिकालदर्शियों की मैं अवज्ञा नहीं कर रहा हूँ, राजलक्ष्मी की तरह मैं भी उनकी अत्यन्त भक्ति करता हूँ; मैं तो सिर्फ इतना ही सोचता हूँ कि वे दया करके अगर सिर्फ हमारे इस अंगरेजी शासन-काल के लिए न सोच जाते, तो अनेक दुरूह चिन्ता के दायित्व से वे भी छुटकारा पा जाते और हम भी सचमुच ही आज जीवित रह सकते।
मैं पहले ही कह चुका हूँ कि राजलक्ष्मी मेरे मन की बातों को मानो दर्पणवत् स्पष्ट देख सकती है। कैसे देख सकती है, सो नहीं जानता; परन्तु अभी इस अस्पष्ट दीपालोक में मेरे चेहरे की तरफ उसने देखा नहीं, फिर भी मानो मेरी निभृत चिन्ता के ठीक द्वार पर ही उसने आघात किया। बोली, ''तुम सोच रहे हो, 'यह बहुत ही ज्यादती है- भविष्य के लिए विधि-विधान कोई पहले से ही निर्दिष्ट नहीं कर सकता।' मगर मैं कहती हूँ, कर सकता है। मैंने अपने गुरुदेव के श्रीमुख से सुना है। यह काम अगर उनसे न होता, तो हम सजीव मन्त्रों के कभी दर्शन ही न कर पाते। मैं पूछती हूँ, इस बात को मानते हो कि हमारे शास्त्रीय मन्त्रों में प्राण हैं। वे सजीव हैं?''
मैंने कहा, ''हाँ।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तुम नहीं मान सकते हो, परन्तु फिर भी यह सत्य है। नहीं तो हमारे देश में यह गुड्डा-गुड़ियों का ब्याह ही संसार का सर्वश्रेष्ठ विवाह-बन्धन नहीं हो सकता। यह सभी तो उन्हीं सजीव मन्त्रों के जोर से होता है! उन्हीं ऋषियों की कृपा से! अवश्य ही, अनाचार और पाप और कहाँ नहीं हैं, सब जगह हैं, मगर हमारे इस देश के समान सतीत्व क्या तुम और कहीं भी दिखा सकते हो?''
मैंने कहा, ''नहीं।'' कारण, यह उसकी युक्ति नहीं, बल्कि विश्वास है। इतिहास का प्रश्न होता तो उसे दिखा देता कि इस पृथ्वीम पर सजीव मन्त्र-हीन और भी बहुत-से देश हैं, जहाँ सतीत्व का आदर्श आज भी ऐसा ही उच्च है। अभया का उल्लेख करके कह सकता था कि अगर यही बात है तो तुम्हारे सजीव मन्त्र स्त्री-पुरुष दोनों को एक ही आदर्श में क्यों नही बाँध सकते? मगर इन सब बातों की आवश्यकता न थी। मैं जानता था कि उसके चित्त की धारा कुछ दिनों से किस दिशा में बह रही है।
दुष्कृति की वेदना को वह अच्छी तरह समझती है। जिसे उसने अपने सम्पूर्ण हृदय से प्यार किया है, उसे बिना कलुषित किये इस जीवन में कैसे प्राप्त किया जाय, इस बात का उसे ओर-छोर ही नहीं मिल रहा है। उसका दुर्वश हृदय और प्रबुद्ध धर्माचरण- ये दोनों प्रतिकूलगामी प्रचण्ड प्रवाह कैसे किस संगम में मिलकर, इस दु:ख के जीवन में तीर्थ की भाँति सुपवित्र हो उठेंगे, इस बात का उसे कोई किनारा ही नहीं दीखता। परन्तु, मुझे दीखता है। अपने को सम्पूर्ण रूप से दान करने के बाद से दूसरे के छिपे हुए मनस्ताप पर प्रतिक्षण ही मेरी निगाह पड़ती रही है। माना कि बिल्कुाल स्पष्ट नहीं देख सकता, परन्तु फिर भी इतना तो देख ही लेता हूँ कि उसकी जिस दुर्दम कामना ने इतने दिनों से अत्युग्र नशे की भाँति उसके सम्पूर्ण मन को उतावला और उन्मत्त कर रक्खा था, वह मानो आज स्थिर होकर अपने सौभाग्य का, अपनी इस प्राप्ति का हिसाब देखना चाहती है। इस हिसाब के ऑंकड़ों में क्या है, मैं नहीं जानता, परन्तु अगर वह आज शून्य के सिवा और कुछ भी न देख सके तो फिर मैं अपने इस शत-छिन्न जीवन-जाल की गाँठें किस तरह कहाँ जाकर बाँधने बैठूँगा, यह चिन्ता मेरे अन्दर भी बहुत बार घूम-फिर गयी है। सोचकर कुछ भी हाथ नहीं लगा, सिर्फ एक बात का निश्चय किये हुए हूँ कि हमेशा से जिस रास्ते चलता आया हूँ, जरूरत पड़ने पर फिर उसी रास्ते यात्रा शुरू कर दूँगा। अपने सुख और सुभीते के लिए और किसी की समस्या को जटिल न बनाऊँगा। परन्तु परमाश्चर्य की बात यह हुई कि जिन मन्त्रों की सजीवता की आलोचना से हम दोनों में एक ही क्षण में क्रान्ति-सी मच गयी, उन्हीं के प्रसंग को लेकर पास ही के घर में उस समय मल्ल-युद्ध हो रहा था और इस संवाद से हम दोनों ही नावाकिफ थे।
अकस्मात् पाँच-सात आदमी दो-तीन लालटेनें लिए और बहुत शोरगुल मचाते हुए एकदम ऑंगन में आ खड़े हुए और व्याकुल कण्ठ से पुकार उठे, ''हुजूर! बाबू साहब!''
मैं घबराया हुआ बाहर आया और राजलक्ष्मी भी आश्चर्य के साथ उठकर मेरे पास आकर खड़ी हो गयी। देखा कि सब मिलकर एक साथ सम-स्वर में नालिश करना चाहते हैं। रतन के बार-बार डाँटने पर भी अन्ततोगत्वा कोई भी चुप न रह सका। कुछ भी हो, मामला समझ में आ गया। कन्यादान स्थगित हुआ पड़ा है; कारण, मन्त्रपाठ में गलती होने की वजह से वर पक्ष के पुरोहित ने कन्या पक्ष के पुरोहित के पुष्प-जल आदि उठाकर फेंक दिए हैं और उसका मुँह दबा रखा है। वास्तव में, यह बड़ा अत्याचार है। पुरोहित-सम्प्रदाय बहुत-से कीर्ति के काम किया करता है, परन्तु ऐसा मैंने कभी नहीं सुना कि दूसरे गाँव के आकर जबरदस्ती अपने ही एक सम-व्यवसायी की पूजा की सामग्री फेंक दी गयी हो और शारीरिक बल-प्रयोग से उसका मुँह दबाकर स्वाधीन और सजीव मन्त्रोच्चारण में बाधा पहुँचाई गयी हो। यह तो सरासर अत्याचार है!
राजलक्ष्मी क्या कहे, सहसा सोचकर कुछ तय न कर पाई। मगर रतन घर में जाने क्या कर रहा था, उसने बाहर निकलकर जोर से गरजकर कहा, ''तुम लोगों के यहाँ पुरोहित कैसा रे?'' यहाँ अर्थात् जमींदारी में आकर रतन गाँववालों से तू तड़ाक और 'रे' करके बात करने लगा, क्योंकि उसकी निगाह में इससे अधिक सम्मान के लायक यहाँ कोई है ही नहीं। बोला, ''डोम चमारों का कोई ब्याह में ब्याह है, जो पुरोहित चाहिए? यह क्या कोई ब्राह्मण-कायस्थों के यहाँ का ब्याह है जो पढ़ाने के लिए ब्राह्मण पुरोहित आयँगे?'' यह कहकर वह बार-बार मेरे और राजलक्ष्मी के मुँह की ओर गर्व के साथ देखने लगा। यहाँ इस बात की याद दिला देनी चाहिए कि रतन खुद जात का नाई है।
मधु डोम खुद नहीं आ सका था- वह कन्या दान के लिए बैठ चुका था, पर उसका सम्बन्धी आया था। उस आदमी ने जो कुछ कहा उससे मालूम हुआ कि यद्यपि उन लोगों में ब्राह्मण नहीं आते, वे खुद ही अपने 'पुरोहित' हैं, तथापि, राखाल पण्डित उनके लिए ब्राह्मण के ही समान है। कारण, उसके गले में जनेऊ है और वही उनके दसों कर्म कराता है। यहाँ तक कि वह इन लोगों के हाथ का पानी तक नहीं पीता। लिहाजा, इतनी जबरदस्त सात्वि‍कता के बाद, अब कोई प्रतिवाद नहीं चल सकता। अतएव, असली और खालिस ब्राह्मण में इसके बाद भी अगर कोई प्रभेद रह गया हो, तो वह बहुत ही मामूली-सा होगा।
खैर, कुछ भी हो, इनकी व्याकुलता और पास ही ब्याह वाले घर की प्रबल चीत्कार से मुझे वहाँ जाना ही पड़ा। राजलक्ष्मी से मैंने कहा, ''तुम भी चलो न, घर में अकेली रहकर क्या करोगी?''
राजलक्ष्मी ने पहले तो सिर हिलाया, पर अन्त में वह अपने कुतूहल को न रोक सकी और 'चलो' कहके मेरे साथ हो ली। वहाँ पहुँचकर देखा कि मधु के सम्बन्धी ने बिल्कुेल अत्युक्ति नहीं की है। झगड़ा भयंकर रूप धारण करता जा रहा है। एक तरफ वर पक्ष के करीब तीस-बत्तीस आदमी हैं और दूसरी ओर कन्या पक्ष के भी लगभग उतने ही होंगे। बीच में प्रबल और स्थूलकाय शिबू पण्डित दुर्बल और क्षीणजीवी राखाल पण्डित के हाथ पकड़े खड़ा है। हम लोगों को देखकर वह हाथ छोड़कर अलग हटके खड़ा हो गया। हम लोगों ने सम्मान के साथ एक चटाई पर बैठने के बाद शिबू पण्डित से इस अतर्कित आक्रमण का हेतु पूछा, तो उसने कहा, ''हुजूर, मन्तर का 'म' तो जानता नहीं यह बेटा और फिर भी अपने को कहता है, पण्डित हूँ! आज तो यह ब्याह ही की रेढ़ मार देता!'' राखाल ने मुँह बिचकाकर प्रतिवाद किया, ''हाँ, सो तो देता ही! पाँच-पाँच सराधा ब्याह करा रहा हूँ, और फिर भी मैं नहीं जानता मन्तर!''
मन में सोचने लगा, अरे, यहाँ भी वही मन्त्र है। घर में तो माना कि राजलक्ष्मी के सामने मौन रहकर ही तर्क का जवाब दे दिया जाता है, मगर, यहाँ अगर वास्तव में मध्येस्थता करनी पड़े तो आफत में फँस जाऊँगा! अन्त में बहुत वाद-वितण्डा के बाद तय हुआ कि राखाल पण्डित ही मन्त्र पढ़ेगा- हाँ, अगर कहीं कुछ गलती होगी तो उसे शिबू के लिए आसन छोड़ देना पड़ेगा। राखाल राजी होकर पुरोहित के आसन पर जा बैठा। कन्या के पिता के हाथ में कुछ फूल देकर और वर-कन्या के दोनों हाथ एकत्र मिलाकर उसने जिन वैदिक मन्त्रों का पाठ किया, वे मुझे अब तक याद हैं। वे सजीव हैं या नहीं, सो मैं नहीं जानता, मगर मन्त्रों के विषय में कोई ज्ञान न होने पर भी मुझे सन्देह है कि ऋषिगण वेद में ठीक ये ही शब्द न छोड़ गये होंगे।
राखाल पण्डित वर से कहा, ''बोलो, 'मधुडोमाय कन्याय नम:'।''
वर ने दुहराया, ''मधुडोमाय कन्याय नम:।''
राखाल ने कन्या से यहा, ''बोलो, 'भगवती डोमाय पुत्राय नम:'।''
बालिका वधू के उच्चारण में कहीं त्रुटि न रह जाय, इस खयाल से मधु उसकी तरफ से उच्चारण करना ही चाहता था कि इतने में शिबू पण्डित दोनों हाथ ऊपर को उठाकर वज्र-सा गरजता और सबको चौंकाता हुआ बोल उठा, ''यह मन्तर है ही नहीं! यह ब्याह ही नहीं हुआ!'' पीछे से कपड़ा खींचे जाने पर मैंने मुँह फेरकर देखा कि राजलक्ष्मी मुँह में ऑंचल दबाकर जी-जान से हँसी रोकने की कोशिश कर रही है और उपस्थित लोग अत्यन्त उद्वि‍ग्न हो उठे हैं। राखाल पण्डित ने लज्जित मुख से कुछ कहना भी चाहा, मगर उसकी बात पर किसी ने ध्या न ही न दिया, सभी कोई एक स्वर में शिबू से विनय करने लगे, ''पण्डितजी, मन्तर आप ही पढ़वा दीजिए, नहीं तो यह ब्याह ही न होगा- सब मिट्टी हो जायेगा। चौथाई दच्छिना उनको देकर बाकी बारह आना आप ही ले लीजिएगा, पण्डितजी।''
शिबू पण्डित ने तब उदासीनता दिखलाते हुए कहा, ''इसमें राखाल का कोई दोष नहीं, इधर असल मन्तर मेरे सिवा और कोई जानता ही नहीं है। ज्यादा दक्षिणा मैं नहीं चाहता। मैं यहाँ से मन्त्र पढ़ दूँगा, राखाल उनसे पढ़वा दे।'' यह कहकर वह शास्त्रज्ञ पुरोहित मन्त्रोच्चारण करने लगा और पराजित राखाल निरीह भलेमानस की तरह वर-कन्या से आवृत्ति कराने लगा।
शिबू ने कहा, ''बोलो, 'मधुडोमाय कन्याय भुज्यपत्रं नम:'।''
वर ने दुहराया , ''मधुडोमाय कन्याय भुज्यपत्रं नम:।''
शिबू ने कहा, ''मधु, अबकी बार तुम कहो, ''भगवती डोमाय पुत्राय सम्प्रदानं नम:।''
कन्या के साथ मधु ने भी इसे दुहरा दिया। सभी कोई नीरव स्थिर थे। दृश्य देखकर मालूम हुआ कि शिबू के समान शास्त्रज्ञ व्यक्ति ने इसके पहले कभी इस प्रान्त में पदार्पण ही नहीं किया था।
शिबू ने वर के हाथ में फूल देकर कहा, ''विपिन, तुम कहो, 'जितने दिन जीवनं उतने दिन भात-कपड़ा प्रदानं स्वाहा'।''
विपिन ने रुक-रुककर बहुत कष्ट से और बहुत देर से यह मन्त्र उच्चारण किया।
शिबू ने कहा, ''वर कन्या दोनों मिलकर कहो, 'युगलमिलनं नम:'।''
वर और कन्या की तरफ से मधु ने इसे दुहरा दिया। इसके बाद प्रबल हरि-ध्वकनि के साथ वर-वधू को घर के भीतर गोद में उठाकर ले जाया गया। मेरे चारों तरफ एक गूँज-सी उठ खड़ी हुई। सभी एक वाक्य से स्वीकार करने लगे कि 'हाँ, आदमी है तो शास्त्र का पूरा जानकार! मन्तर-सा मन्तर पढ़ा! राखाल पण्डित अब तक हम लोगों को धोखा देकर ही खा-पी रहा था।'
मैं जितनी देर वहाँ रहा, बराबर गम्भीर होकर बैठा रहा, और अन्त तक उसी गम्भीरता को कायम रखता हुआ राजलक्ष्मी का हाथ पकड़कर घर लौट आया। मैं नहीं जानता कि वहाँ वह अपने पर काबू रख चुपचाप कैसे बैठी रही, मगर घर के आते ही उसने अपनी हँसी के प्रवाह को इस तरह छोड़ दिया कि दम घुटने की नौबत आ पहुँची। बिस्तर पर लोट-पोट होकर वह बार-बार यही कहने लगी, ''हाँ, एक सच्चा महामहोपाधयाय देखा! राखाल तो अब तक उन्हें यों ही ठगता-खाता था।''
पहले तो मैं भी अपनी हँसी रोक न सका, फिर बोला, ''महामहोपाधयाय दोनों ही थे। फिर भी, इसी तरह तो अब तक इन लोगों की लड़कियों की माताओं और दादियों के ब्याह होते आए हैं! राखाल के मन्त्र चाहे जैसे हों, पर शिबू पण्डित के मन्त्र भी 'ऋषिरुवाच' नहीं मालूम होते। मगर फिर भी, इनका कोई मन्त्र-विफल नहीं गया! इनका जोड़ा हुआ विवाह-बन्धन तो अब तक वैसा दृढ़- वैसा ही अटूटहै!''
राजलक्ष्मी अपनी हँसी को दबाकर सहसा सीधी होकर बैठ गयी, और एकटक चुपचाप मेरे मुँह की ओर देखती हुई न जाने क्या-क्या सोचने लगी।

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सबेरे उठकर सुना कि कुशारी महाशय। मधयाह्न-भोजन का निमन्त्रण दे गये हैं। मैं भी ठीक यही आशंका कर रहा था। मैंने पूछा, ''मैं अकेला ही जाऊँगा क्या?''
राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, ''नहीं तो, मैं भी चालूँगी।''
''चलोगी?''
''चलूँगी क्यों नहीं!''
उसका यह नि:संकोच उत्तर सुनकर मैं अवाक् हो रहा। खान-पान हिन्दू-धर्म में क्या चीज है, और समाज उस पर कितना निर्भर है, राजलक्ष्मी इस बात को जानती है और मैं भी यह जानता हूँ कि कितनी बड़ी निष्ठा के साथ वह इसे मानकर चलती है; फिर भी, उसका यह जवाब! कुशारी महाशय के विषय में मैं ज्यादा कुछ नहीं जानता, पर बाहर से उन्हें जितना देखा है उससे मालूम हुआ है कि वे आचार-परायण ब्राह्मण हैं। और यह भी निश्चित है कि राजलक्ष्मी के इतिहास से वे वाकिफ नहीं हैं, उन्होंने तो सिर्फ मालिक समझकर ही निमन्त्रण किया है। परन्तु, राजलक्ष्मी आज वहाँ जाकर कैसे क्या करेगी, मेरी कुछ समझ में ही न आया। और मेरे प्रश्न को समझकर भी उसने जब कुछ नहीं कहा, तब भीतर के संकोच ने मुझे भी निर्वाक् कर दिया। यथासमय गो-यान आ पहुँचा। मैं तैयार होकर बाहर आया तो देखा कि राजलक्ष्मी गाड़ी के पास खड़ी है।''
मैंने कहा, ''चलोगी नहीं?''
उसने कहा, ''चलने ही के लिए तो खड़ी हूँ।'' यह कहकर वह गाड़ी के भीतर जाकर बैठ गयी।
रतन साथ जायेगा, वह मेरे पीछे था। उसका चेहरा देखते ही मैं ताड़ गया कि वह मालकिन की साज-पोशाक देखकर अत्यन्त आश्चर्यान्वित हो रहा है। मुझे भी आश्चर्य हुआ; परन्तु जैसे उसने प्रकट नहीं किया वैसे ही मैं भी चुप रह गया। घर पर वह कभी ज्यादा गहने नहीं पहिनती और कुछ दिनों से तो उसमें भी कमी करती जाती थी; परन्तु आज देखा कि उसके बदन पर उनमें से भी लगभग कुछ नहीं है। जो हार साधारणत: रोज ही उसके गले में पड़ा रहता है सिर्फ वही है और हाथों में एक-एक कड़ा। ठीक याद नहीं है, फिर भी इतना खयाल है कि कल रात तक जो चूड़ियाँ उसके हाथों में थीं उन्हें भी आज उसने जान-बूझकर उतार दिया है। साड़ी भी बिल्‍कुल मामूली पहिने थी, शायद नहाकर जो पहिनी थी वही होगी। गाड़ी में बैठकर मैंने धीरे से कहा, ''एक-एक करके सभी कुछ छोड़ दिया मालूम होता है। सिर्फ एक मैं ही बाकी रह गया हूँ!''
राजलक्ष्मी ने मेरे मुँह की तरफ देखकर जरा हँसते हुए कहा, ''ऐसा भी तो हो सकता है कि इस एक ही में सब कुछ रह गया हो। इसी से, जो बढ़ती था वह एक-एक करके झड़ता जा रहा है।'' यह कहकर उसने पीछे की तरफ मुँह करके देखा कि रतन कहीं पास ही तो नहीं है; उसके बाद उसने ऐसे धीमे और मृदु कण्ठ से कहा जिसे गाड़ीवान भी न सुन सके, ''अच्छा तो है, ऐसा ही आशीर्वाद दो न तुम। तुमसे बड़ा तो और कुछ मेरे लिए है नहीं, तुम्हें भी जिसके बदले में आसानी से दे सकूँ, मुझे वही आशीर्वाद दो।''
मैं चुप हो गया। बात एक ऐसी दिशा में चली गयी कि उसका जवाब देना मेरे बूते की बात नहीं रही। वह भी और कुछ न कहकर, मोटा तकिया अपनी तरफ खींचकर, सिमटकर मेरे पैरों के पास लेट गयी। गंगामाटी से पोड़ामाटी जाने का एक बिल्कु ल सीधा रास्ता भी है। सामने के सूखे-पानी के नाले पर जो बाँस का कम-चौड़ा पुल है उसके ऊपर होकर जाने से दस ही मिनट में पहुँचा जा सकता है; मगर बैलगाड़ी से बहुत-सा रास्ता घूमकर जाना पड़ता है और उसमें करीब दो घण्टे लग जाते हैं। इस लम्बे रास्ते में हम दोनों में फिर कोई बातचीत ही नहीं हुई। वह सिर्फ मेरे हाथ को अपने गले के पास खींचकर सोने का बहाना किये चुपचाप पड़ी रही।
गाड़ी जब कुशारी महाशय के द्वार पर जाकर ठहरी तब दोपहर हो चुका था। घर-मालिक और उनकी गृहिणी दोनों ही ने एक साथ निकलकर हमें अभ्यर्थना के साथ ग्रहण किया, और अत्यन्त सम्मानित अतिथि होने के कारण ही शायद बाहर की बैठक में न बिठाकर वे एकदम भीतर ले गये। इसके सिवा, थोड़ी ही देर में समझ में आ गया कि शहरों से दूर बसे हुए इन साधारण गाँवों में परदे का वैसा कठोर शासन प्रचलित नहीं है। कारण, हमारे शुभागमन का समाचार फैलते न फैलते ही अड़ोस-पड़ोस की बहुत-सी स्त्रियाँ कुशारी और उनकी गृहिणी को यथाक्रम से चचा, ताऊ, मौसी, चाची आदि प्रीति-पूर्ण और आत्मीय सम्बोधनों से प्रसन्न करती हुई एक-एक, दो-दो करके प्रवेश करके तमाशा देखनी लगीं, और उनमें सभी अबला ही नहीं थीं। राजलक्ष्मी को घूँघट काढ़ने की आदत नहीं थी, वह भी मेरी ही तरह सामने के बरामदे में एक आसन पर बैठी थी। इस अपरिचित रमणी के साक्षात से भी उस अनाहूत दल ने विशेष कोई संकोच अनुभव नहीं किया। हाँ, इतनी सौभाग्य की बात हुई कि बातचीत करने की उत्सुकता बिल्कुदल ही उनके प्रति न होकर मेरे प्रति भी दिखाई जाने लगी। घर-मालिक अत्यन्न व्यस्त थे और उनकी गृहिणी की भी वही दशा थी, सिर्फ उनकी विधवा लड़की ही अकेली राजलक्ष्मी के पास स्थिर बैठकर ताड़ के पंखें से धीरे-धीरे बयार करने लगी। और, मैं कैसा हूँ, क्या बीमारी है, कितने दिन रहूँगा, जगह अच्छी मालूम होती है या नहीं, जमींदारी का काम खुद बिना देखे चोरी होती है या नहीं, इसका कोई नया बन्दोबस्त करने की जरूरत समझता हूँ या नहीं, इत्यादि सार्थ और व्यर्थ नाना प्रकार के प्रश्नोत्तारों के बीच-बीच में से मैं कुशारी महाशय के घर की अवस्था को पर्यवेक्षण करके देखने लगा। मकान में बहुत-से कमरे हैं और सब मिट्टी के हैं; फिर भी मालूम हुआ कि काशीनाथ कुशारी की अवस्था अच्छी तो है ही, और शायद विशेष तौर से अच्छी है। प्रवेश करते समय बाहर चण्डी-मण्डप के एक तरफ, एक धान का बखार देख आया था, भीतर के ऑंगन में भी देखा कि वैसे और भी दो बखार मौजूद हैं। ठीक सामने ही, शायद रसोईघर था, उसके उत्तर में एक छप्पर के नीचे दो-तीन धान कूटने की ढेंकियाँ हैं, मालूम होता है अभी-अभी कुछ ही पहले उनका काम बन्द हुआ है। ऑंगन के एक तरफ एक जम्बीरी नींबू का पेड़ है, उसके नीचे धान उबालने के कई एक चूल्हे हैं जो लिपे-पुते चमक रहे हैं, और उस साफ-सुथरे स्थान पर छाया के नीचे दो हृष्ट-पुष्ट गो-वत्स गरदन टेढ़ी किये आराम से सो रहे हैं। उनकी माताएँ कहाँ हैं, ऑंखों से तो नहीं दिखाई दीं, पर यह साफ समझ में आ गया कि कुशारी परिवार में अन्न की तरह दूध- की भी कोई कमी नहीं। दक्षिण के बरामदे में, दीवार से सटी हुई, छै-सात बड़ी-बड़ी मिट्टी की गागरें कुँड़रियों पर रक्खी हुई हैं। शायद गुड़ की होंगी, या और किसी चीज की होंगी, मगर उनकी हिफाजत को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि वे रीती होंगी या उपेक्षा की चीज हैं- बहुत-सी खूँटियों से ढेर समेत सन और पटसन के गुच्छे बँधे हुए हैं- लिहाजा इस बात का अनुमान करना भी असंगत नहीं होगा कि घर में रस्सी-रस्सों की जरूरत पड़ती ही रहती है। कुशारी-गृहिणी, जहाँ तक सम्भव है, हमारे ही स्वागत के काम में अन्यत्र नियुक्त होंगी- घर-मालिक भी एक बार दर्शन देकर अर्न्तध्याकन हो गये थे; अब उन्होंने अकस्मात् व्यग्रता के साथ उपस्थित होकर राजलक्ष्मी को लक्ष्य करके दूसरी तरह से अपनी अनुपस्थिति कैफियत देते हुए कहा, ''बेटी अब जाऊँ, जप-आह्निक से छुट्टी पाकर इकट्ठा ही आकर बैठूँगी।''
पन्द्रह-सोलह वर्ष का एक सुन्दर और सबलकाय लड़का ऑंगन के एक तरफ खड़ा-खड़ा गम्भीर मनोयोग के साथ हमारी बातें सुन रहा था। कुशारी महाशय की उस पर निगाह पड़ते ही वे कह उठे, ''बेटा हरी, नारायण का नैवेद्य शायद अब तक तैयार हो गया होगा, एक बार जाकर भोग तो दे आओ बेटा। बाकी पूजा-आह्निक खतम करने में मुझे देर न लगेगी।'' फिर मेरी तरफ देखकर बोले, ''आज झूठमूठ को आप लोगों को कष्ट दिया- बड़ी अबेर हो गयी।'' कहते हुए, मेरे उत्तर की प्रतीक्षा बिना किये ही, पलक मारने के साथ खुद ही अदृश्य हो गये।
अब यथासमय, अर्थात् यथासमय के बहुत देर बाद, हमारे मधयाह्न-भोजन के लिए जगह ठीक करने की खबर आयी। जान में जान आयी। सिर्फ ज्यादा देर हो जाने के कारण नहीं, बल्कि अब आगन्तुकों के प्रश्न-वाणों का अन्त समझकर ही सुख की साँस ली। वे, भोजन की तैयारी होती देख, कम-से-कम कुछ देर के लिए, मुझे छुटकारा देकर अपने-अपने घर चले गये। मगर खाने बैठा मैं अकेला ही। कुशारी महाशय मेरे साथ न बैठे बल्कि सामने आकर बैठ गये। इसका कारण उन्होंने विनय और गौरव के साथ स्वयं ही व्यक्त किया। उपवीत धारण करने के दिन से लेकर आज तक भोजन-समय वे मौन ही रहते आए हैं, उस व्रत को आज तक भंग नहीं होने दिया; लिहाजा इस काम को वे अब भी अकेले ही एकान्त कोठरी में सम्पन्न किया करते हैं। मैंने भी कोई आपत्ति नहीं की। आज उसके भी कोई व्रत है और आज वह परान्न ग्रहण न करेगी, तब भी मुझे आश्चर्य न हुआ, परन्तु इस छल के कारण मैं मन-ही-मन क्षुब्ध हो उठा और इसकी क्या जरूरत थी, यह भी न समझ सका। परन्तु राजलक्ष्मी ने मेरे मन की बात फौरन ताड़ते हुए कहा, ''इसके लिए तुम रंज मत करो, अच्छी तरह खा लो। मैं आज नहीं खाऊँगी, ये लोग सभी जानते हैं।''
मैंने कहा, ''और, मैं ही नहीं जानता। लेकिन, अगर यही बात थी तो तकलीफ उठाकर यहाँ तक आने की क्या जरूरत थी?''
इसका जवाब राजलक्ष्मी ने नहीं दिया, बल्कि कुशारी-गृहिणी ने दिया। वे बोलीं, ''यह तकलीफ मैंने ही मन्जूर कारवाई है बेटा। ये यहाँ न खायँगी सो मैं जानती थी; फिर भी जिनकी कृपा से हमारा पेट पलता है, उनके पाँवों की धूल घर में पड़े, इस लोभ को मैं नहीं सँभाल सकी। क्यों बेटी, है न ठीक?'' यह कहकर उन्होंने राजलक्ष्मी के मुँह की तरफ देखा। राजलक्ष्मी ने कहा, ''इसका जवाब आज न दूँगी माँ, और किसी दिन दूँगी।'' यों कहकर वह हँसने लगी।
परन्तु मैं अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर कुशारी-गृहिणी के मुँह की ओर देखने लगा। गँवई-गाँव में, खासकर ऐसे सुदूर गाँव में, किसी स्त्री के मुँह से इस तरह की सहज-सुन्दर स्वाभाविक बातें सुनने की मैंने कल्पना भी न की थी। और कभी स्वप्न में यह बात भी न सोची थी अब भी, इस गँवई-गाँव में भी, इससे बढ़कर एक और बहुत आश्चर्य-जनक नारी का परिचय मिलना बाकी है। मेरे भोजन परोसने का भार अपनी विधवा कन्या पर सौंपकर कुशारी-गृहिणी पंखा हाथ में लिये मेरे सामने आकर बैठी थीं। शायद उमर में मुझसे बहुत बड़ी होने के कारण ही माथे पर पल्ले के सिवा उनके मुँह पर किसी तरह का परदा नहीं था। वह सुन्दर था या असुन्दर, मुझे कुछ मालूम नहीं, सिर्फ इतना ही मालूम हुआ कि वह साधारण भारतीय माता के समान स्नेह और करुणा से परिपूर्ण था। दरवाजे के पास कुशारीजी खड़े थे, बाहर से, उनकी लड़की ने पुकार कर कहा, ''बाबूजी, तुम्हारे लिए थाली परोस दी है।'' अबेर बहुत हो चुकी थी, और इसी खबर के लिए ही शायद वे साग्रह प्रतीक्षा कर रहे थे, फिर भी, एक बार बाहर और एक बार मेरी तरफ देखते हुए बोले, ''अभी जरा ठहर जा बिटिया, इनको जीम लेने दे।''
गृहिणी ने उसी दम बाधा देते हुए कहा, ''नहीं, तुम जाओ, झूठमूठ को अन्न मत बिगाड़ो। ठण्डा हो जाने पर तुम नहीं खा सकोगे, मैं जानती हूँ।''
कुशारीजी को संकोच हो रहा था, बोले, ''बिगड़ेगा क्या- ये जीम चुकें, बस।''
गृहिणी ने कहा, ''मेरे रहते भी अगर खिलाने में कसर रह जायेगी तो तुम्हारे खड़े रहने पर भी वह पूरी नहीं हो सकेगी। तुम जाओ- क्यों बेटा, ठीक है न? यह कहती हुई वे मेरी ओर देखकर हँसीं। मैंने भी हँसते हुए कहा, ''बल्कि और कमी रह जायेगी। आप जाइए कुशारीजी, ऐसे भूखे खड़े देखते रहने से दोनों में से किसी को भी फायदा न होगा।'' इस पर वे और कुछ न कहकर धीरे से चले गये, परन्तु मालूम हुआ, वे सम्मानित अतिथि के भोजन के समय पास न रहने के संकोच को साथ ही लेते गये। लेकिन, कुछ ही देर बाद मुझसे यह छिपा न रहा कि वह मेरी जबरदस्त भूल थी। उनके चले जाने पर उनकी गृहिणी ने कहा, ''निरामिष अरवा चावल का भात खाते हैं; ठण्डा हो जाने पर फिर खा नहीं सकते, इसी से जबरदस्ती भेज दिया है। लेकिन यह भी एक बात है बेटा, कि जो अन्नदाता हैं, उनसे पहले अपने मुँह में अन्न देना बड़ा कठिन है।''
उनकी इस बात से मन-ही-मन मुझे शर्म मालूम होने लगी, मैंने कहा, ''अन्नदाता मैं नहीं हूँ। और, अगर यह सच भी हो, तो वह इतना कम है कि छूट जाय तो शायद आपको मालूम भी न हो।''
कुशारी-गृहिणी कुछ देर तक चुप रहीं। मालूम हुआ कि उनका चेहरा धीरे-धीरे अत्यन्त म्लान-सा हो गया। उसके बाद वे बोलीं, ''तुम्हारी बात बिल्कुुल झूठ नहीं बेटा, भगवान ने हमें कुछ कम नहीं दिया है, पर अब मालूम होता है कि इतना अगर वे न भी देते तो, शायद, इससे उनकी ज्यादा दया ही प्रकट होती। घर में यही तो एक विधवा लड़की है- क्या होगा हमारे इन भर-भर कोठी धानों का, भर-कढ़ाई दूध और गुड़ की गागरों का? इन सबको भोगने वाले जो थे वे तो हमें छोड़कर ही चले गये।''
बात ऐसी कोई विशेष नहीं थी, पर कहते-कहते ही उनकी ऑंखें डबाडबा आयीं और ओंठ काँपने लगे। मैं समझ गया, उनके इन शब्दों में बहुत-सी गम्भीर वेदना छिपी हुई है। सोचा, शायद इनके किसी योग्य लड़के की मृत्यु हो गयी है और जिस लड़के को कुछ पहले देखा था, उसका अवलम्बन लेकर हताश्वास माता-पिता को कुछ सान्त्वना नहीं मिल रही है। मैं चुप बना रहा, और राजलक्ष्मी भी कोई बात न कहकर उनका हाथ अपने हाथों में लिये मेरी ही तरह चुपचाप बैठी रही। परन्तु, हमारी भूल भंग हुई उनकी बाद की बातों से। उन्होंने अपने आपको संवरण करके फिर कहा, ''पर हमारी तरह उनके भी तो तुम्हीं लोग अन्नदाता हो। इनसे कहा कि मालिक से अपने दु:ख-कष्ट की बात कहने में कोई शरम की बात नहीं, अपने बेटे और बहू को निमन्त्रण का बहाना करके एक बार घर ले आओ, मैं उनके सामने रो-धोकर देखूँ, शायद वे उसका कुछ किनारा कर सकें।'' यह कहकर उन्होंने ऑंचल उठाकर ऑंसूँ पोंछे। समस्या अत्यन्त जटिल हो उठी। राजलक्ष्मी के मुँह की ओर देखा तो वह भी मेरी ही तरह संशय में पड़ी हुई दिखाई दी। परन्तु पहले की तरह अब भी दोनों जनें मौन बने रहे। कुशारी-गृहिणी अब अपने दु:ख का इतिहास धीरे-धीरे व्यक्त करने लगीं। अन्त तक सुनकर बहुत देर तक किसी के मुँह से कोई बात न निकली; परन्तु इस विषय में कोई सन्देह न रहा कि इस बात के कहने के लिए ठीक इतनी ही भूमिका की जरूरत थी। राजलक्ष्मी परान्न ग्रहण न करेगी, यह सुनकर भी मधयाह्न-भोजन के निमन्त्रण से शुरू करके कुशारीजी को अन्यत्र भेज देने की व्यवस्था तक कुछ भी बाद नहीं दिया जा सकता था। खैर, कुछ भी हो कुशारी-गृहिणी ने अपने ऑंसू और अस्फुट वाक्यों में ठीक कितना व्यक्त किया यह नहीं जानता, और एक पक्ष की बात सुनकर इस बात का भी निश्चय करना कठिन है कि उसमें कितना सत्य है; परन्तु हमारी मध्य स्थता में जिस समस्या को हल करने के लिए आज उन्होंने इस तरह सानुरोध नि‍वेदन किया, वह जितनी आश्चर्यकारिणी थी उतनी ही मधुर और कठोर भी।
कुशारी-गृहिणी ने जिस दु:ख का वर्णन किया, उसका कुछ सार यह है कि घर में खाने-पहरने का काफी आराम होने पर भी उनके लिए घर-गृहस्थी ही सिर्फ विषतुल्य हो गयी हो सो बात नहीं, बल्कि दुनिया के आगे उनके लिए मुँह दिखाना भी दूभर हो गया है। और इन सब दु:खों की जड़ है उनकी एकमात्र देवरानी सुनन्दा। यद्यपि उनके देवर युदनाथ न्यायरत्न ने भी उनके साथ कम शत्रुता नहीं की है परन्तु असल मुकदमा है उसी देवरानी के विरुद्ध और वह विद्रोही सुनन्दा और उसका पति जब कि फिलहाल हमारी ही रिआया हैं तब, हमें जिस तरह बने, उन्हें काबू में लाना ही पड़ेगा। संक्षेप में बात इस तरह है- उनके ससुर और सास का जब स्वर्गवास हुआ था, तब वे इस घर की बहू थीं। यदुनाथ तब सिर्फ छै-सात साल का लड़का था। उस लड़के को पाल-पोसकर बड़ा करने का भार उन्हीं पर और उस दिन तक वे उस भार को बराबर सँभालती आई हैं। पैतृक सम्पत्ति में था सिर्फ एक मिट्टी का घर, दो-तीन बीघा धर्मादे की जमीन और कुछ जजमानों के घर। सिर्फ इसी पर निर्भर रहके उनके पति को संसार समुद्र में तैरना पड़ा है। आज यह बढ़वारी और सुख-स्वच्छन्दता दिख रही है, यह सब कुछ उनके पति के हाथ की ही कमाई का फल है। देवरजी जरा भी किसी तरह का सहारा नहीं देते हैं, और न उनसे किसी तरह के सहारे के लिए कभी प्रार्थना ही कि जाती है।
मैंने कहा, ''अब शायद वे बहुत ज्यादा का दावा करते हैं?''
कुशारी-गृहिणी ने गरदन हिलाते हुए कहा, ''दावा कैसे बेटा, यह सब कुछ उसी का तो है। सब कुछ वही तो लेता, अगर सुनन्दा बीच में पड़कर मेरी सोने की गृहस्थी मिट्टी में न मिला देती।''
मैं बात को ठीक से समझ न सका, मैंने आश्चर्य के साथ पूछा, ''पर आपका यह लड़का...''
वे पहले कुछ समझ न सकीं, पीछे समझने पर बोलीं, ''उस विजय की बात कह रहे हो? वह तो हमारा लड़का नहीं है बेटा, वह तो एक विद्यार्थी है। देवरजी के टोल में¹ पढ़ता था, अब भी वहीं पढ़ता है, सिर्फ रहता हमारे यहाँ है।'' यों कहकर वे विजय के सम्बन्ध में हमारी अज्ञानता को दूर करती हुई कहने लगीं, ''कितने कष्ट से मैंने देवर को पाल-पोसकर आदमी बनाया सो एक सिर्फ भगवान ही जानते हैं, और मुहल्ले के लोग भी कुछ-कुछ जानते हैं। पर खुद वह आज सब कुछ भूल गया, सिर्फ हम लोग नहीं भूल सके हैं।'' इतना कहकर फिर उन्होंने ऑंखों के किनारे पोंछते हुए कहा, ''पर उन सब बातों को जाने दो बेटा, बहुत-सी बातें हैं। मैंने देवर का जनेऊ करवाया, इन्होंने पढ़ने के लिए उसे मिहिरपुर के शिबू तर्कालंकार के टोल में भिजवाया। बेटा, लड़के को छोड़कर रहा नहीं गया तो मैं खुद जाकर कितने दिन मिहिरपुर रह आई, सो भी आज उसे याद नहीं आता। जाने दो, इस तरह कितने वर्ष बीत गये, कोई ठीक है भला। देवर की पढ़ाई पूरी हुई, वे उसे गृहस्थ बनाने के लिए लड़की की तलाश में घूमा किये; इतने में, न कुछ कहना न सुनना, अचानक एक दिन शिबू तर्कालंकार की लड़की सुनन्दा से ब्याह करके आप बहू घर ले आया। मुझसे न कहा तो न सही, पर अपने भइया तक से कोई राय न ली।''
मैंने धीरे से पूछा, ''राय न लेने का क्या कोई खास कारण था?''
गृहिणी ने कहा, ''था क्यों नहीं। वे हमारे ठीक बराबरी के न थे, कुल, शील और सम्मान में भी बहुत छोटे थे। इन्हें बहुत गुस्सा आया, दु:ख और लज्जा के मारे शायद महीने-भर तो किसी से बातचीत तक नहीं की; पर मैं गुस्सा नहीं हुई। सुनन्दा का मुँह देखकर मैं पहले से ही मानो पिघल-सी गयी। उस पर जब सुना कि उसकी माँ मर गयी और बाप उसे देवर के हाथ सौंपकर खुद सन्यासी होकर निकल गये हैं, तो उस नन्हीं-सी बहू को पाकर मुझे कितनी खुशी हुई सो मैं मुँह की बातों से नहीं समझ सकती। पर वह किसी दिन इस तरह का बदला लेगी,
सो कौन जानता था।'' इतना कहकर सहसा वे सुपुक-सुपुककर रोने लगीं। समझ गया कि वहीं पर व्यथा अत्यन्त तीव्र हो उठी है; मगर फिर भी चुप रहा। राजलक्ष्मी भी अब तक कुछ नहीं बोली थी; उसने धीरे से पूछा, ''अब वे कहाँ रहते हैं?''
¹ पुराने ढंग की संस्कृत की घरेलू पाठशाला।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:28

जवाब में उन्होंने गरदन हिलाकर जो कुछ व्यक्त किया, उससे समझ में आया कि अब तक वे इसी गाँव में बने हुए हैं! इसके बाद फिर बहुत देर तक कोई बातचीत नहीं हुई, उनके स्वस्थ होने में जरा ज्यादा समय लग गया। परन्तु असली चीज तो हम लोग अभी तक ठीक तौर से समझ ही न सके। उधर मेरा खाना भी करीब-करीब खत्म हो आया था, कारण रोना-धोना चलते रहने पर तो इस विषय में कोई विशेष विघ्न नहीं हुआ। सहसा वे ऑंखें पोंछकर सीधी होकर बैठीं और मेरी थाली की तरफ देखकर अनुतप्त कण्ठ से कह उठीं, ''रहने दो बेटा, सारे दु:खों की कहानी सुनाने लगूँ तो खतम भी न होगी, और तुम लोगों से धीरज के साथ सुनते भी न बनेगा। मेरी सोने की गृहस्थी जिन लोगों ने ऑंखों से देखी है, सिर्फ वे ही जानते हैं कि छोटी बहू मेरा कैसा सत्यनाश कर गयी है। सिर्फ उसी लंकाकाण्ड को संक्षेप में तुम लोगों से कहूँगी।'' इसके बाद वे कहने लगीं-
''जिस जायदाद पर हमारा सब कुछ निर्भर है वह किसी जमाने में एक जुलाहे की थी। सालभर पहले अचानक एक दिन सबेरे उसकी विधवा स्त्री अपने नाबालिग लड़के को साथ लेकर हमारे घर आ धमकी। गुस्से में न जाने क्या-क्या कह गयी, जिसका कोई ठीक नहीं। हो सकता है कि उसका कुछ भी सच न हो या सब कुछ झूठ ही हो- छोटी बहू नहाकर जा रही थी रसोईघर में उसकी बातें सुनकर उसे तो जैसे काठ मार गया। उसके चले जाने पर भी बहू का वह भाव दूर न हुआ। मैंने बुलाकर कहा, ''सुनन्दा, खड़ी क्यों हैं, अबेर नहीं हो रही है?'' पर, जवाब के लिए उसके मुँह की तरफ देखकर मुझे डर-सा लगने लगा। उसकी ऑंखों की चितवन में न जाने कैसी आग-सी चिनगारियाँ निकल रही थीं। उसका साँवला चेहरा एकदम फक पड़ गया- बिल्कु ल सफेद। जुलाहे की बहू की एक-एक बात ने मानो उसके सारे शरीर से एक-एक बूँद खून सोख लिया। उसने उस वक्त कोई जवाब नहीं दिया। वह धीरे-से मेरे पास आकर बैठ गयी और फिर बोली, ''जीजी, जुलाहे की बहू को उसके मालिक की जायदाद तुम वापस न कर दोगी? उसके नन्हें-से नाबालिग बच्चे को तुम उसकी सारी सम्पत्ति से वंचित रखकर जिन्दगी-भर के लिए राह का भिखारी बना दोगी?''
''मैं तो दंग रह गयी, मैंने कहा, ''सुनो इसकी बातें जरा। कन्हाई बसाक की सारी जायदाद कर्ज के मारे बिक जाने पर, इन्होंने उसे खरीद लिया है। भला, अपनी खरीदी हुई जायदाद को कौन किसी गैर के लिए छोड़ देता है छोटी बहू?''
छोटी बहू ने कहा, ''पर जेठजी के पास इतना रुपया आया कहाँ से?''
''मैंने गुस्से से आकर कह दिया, ''सो पूछ जाकर अपने जेठजी से- जिन्होंने जायदाद खरीदी है।'' यह कहकर मैं पूजा-आह्निक करने चली गयी।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''बात तो ठीक है। जो जायदाद नीलाम पर चढ़कर नीलाम हो चुकी, उसे फेर देने के लिए छोटी बहू कह कैसे सकती थी?''
कुशारी-गृहिणी ने कहा, ''बताओ तो बेटी!''
परन्तु यह कहते हुए भी उनके चेहरे पर लज्जा की मानो एक काली छाया-सी पड़ गयी। बोलीं, ''लेकिन, ठीक नीलाम होकर नहीं बिकी थी न, इसी से। हम लोग थे उसके पुरोहित वंश के। कन्हाई बसाक मरते समय इन्हीं पर सब भार दे गया था। पर तब तो यह जानते न थे कि वह अपने पीछे दुनिया-भर का कर्जा भी छोड़ गया है।''
उसकी बात सुनकर राजलक्ष्मी और मैं दोनों ही एकाएक मानो स्तब्ध-से हो गये। न जाने कैसी एक गन्दी चीज ने मेरे मन के भीतरी भाग को मलिन कर डाला। कुशारी-गृहिणी शायद इस बात को ताड़ न सकीं। बोलीं, ''जप-आह्निक सब खतम करके दो-ढाई घण्टे बाद आकर देखती हूँ तो सुनन्दा वहीं ठीक उसी तरह स्थिर होकर बैठी है। उसने कहीं को एक पैर तक नहीं बढ़ाया है। वे कचहरी का काम निबटाकर आ ही रहे होंगे, देवर बिनू को लेकर मेला देखने गये थे, उनके लौटने में भी देर नहीं थी, विजय नहाने गया था, अभी तुरन्त आकर पूजा करने बैठेगा- अब तो मेरे गुस्से की सीमा न रही, मैंने कहा, ''तू क्या रसोई में आज घुसेगी ही नहीं? उस बदमाश जुलाहे की बहू की गढ़ी-गुढ़ी बातें ही बैठी सोचती रहेगी?''
''सुनन्दा ने मुँह उठाकर कहा, ''नहीं जीजी, वह जायदाद अपनी नहीं है। उसे अगर तुम न लौटा दोगी तो मैं अब रसोई में घुसूँगी ही नहीं। उस नाबालिग लड़के के मुँह का कौर छीनकर अपने पति-पुत्र को भी न खिला सकूंगी, और ठाकुरजी का भोग भी मुझसे न बनाया जायेगा।'' यह कहकर वह अपनी कोठरी में चली गयी। सुनन्दा को मैं पहिचानती थी। यह भी जानती थी कि वह झूठ नहीं बोलती, और उसने अपने अध्याीपक सन्यासी बाप के पास रहकर बचपन से ही बहुत-से शास्त्र पढ़े हैं; पर वह औरत होकर ऐसी पत्थर की तरह कठोर होगी, तो मैं तब तक न जानती थी। मैं झटपट रसोई बनाने में लग गयी। मर्द जब घर लौटे, तो उनके खाते समस सुनन्दा दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गयी। मैंने दूर से हाथ जोड़कर कहा, ''सुनन्दा, जरा क्षमा कर उनका खाना हो जाने दे।'' पर उसने जरा-सा भी अनुरोध नहीं माना। कुल्लाज करके खाने बैठ ही रहे थे कि पूछ बैठी, ''जुलाहे की जायदाद क्या आपने रुपये देकर खरीदी है? यह तो आप ही लोगों के मुँह से बहुत बार सुना है कि बाबूजी तो कुछ छोड़ नहीं गये थे, फिर इतने रुपये मिले कहाँ से?''
जो कभी बात नहीं करती थी, उसके मुँह से यह प्रश्न सुनकर वे तो एकदम हत-बुद्धि हो गये, उसके बाद बोले, ''इन बस बातों के मानी क्या बेटी?''
''सुनन्दा ने कहा, ''इसके मानी अगर कोई जानता है तो आप जानते हैं। आज जुलाहे की बहू अपने लड़के को लेकर आई थी, उसकी सब बातों को आपके सामने दुहराना व्यर्थ है- आपसे कोई बात छिपी नहीं है। यह जायदाद जिसकी है उसे अगर आप वापस नहीं देंगे, तो, मैं जीते-जी इस महापाप के अन्न का एक दाना भी अपने पति-पुत्र को न खिला सकूँगी।''
''मुझे तो ऐसा मालूम हुआ बेटा, कि या तो मैं सपना देख रही हूँ या सुनन्दा पर भूत सवार हो गया है। जिन जेठजी की वह देवता की तरह भक्ति करती है, उन्हीं से ऐसी बात! वे भी कुछ देर तक बिजली के मारे-से बैठे रहे; उसके बाद जल-भुनकर बोले, ''जायदाद पाप की हो या पुण्य की, वह मेरी है; तुम्हारे पति-पुत्र की नहीं। तुम्हें न रुचे तो तुम लोग और कहीं जाकर रह सकते हो! पर बहू, अब तक तो मैं तुम्हें सर्वगुणमयी समझता था, ऐसा कभी नहीं सोचा था।'' इतना कहकर वे थाली छोड़कर चले गये। उस दिन, फिर दिनभर किसी के मुँह से दाना-पानी नहीं गया। रोती हुई मैं देवर के पास पहुँची; बोली, ''लालाजी तुम्हें तो मैंने गोद में लेकर पाला-पोसा है- उसका तुम यह बदला चुका रहे हो!'' लालाजी की ऑंखों में ऑंसू डबडबा आए, बोले, ''भाभी, तुम्हीं मेरी माँ हो, और भइया भी मेरे लिए पिता के समान हैं। पर तुम लोगों से भी एक बड़ी चीज है और वह है धर्म। मेरा विश्वास है कि सुनन्दा ने एक भी बात अनुचित नहीं कही है। साहजी ने सन्यास लेते समय उसे आशीर्वाद देते हुए कहा था कि बेटी, धर्म को अगर सचमुच चाहती हो, तो वही तुम्हें राह दिखाता हुआ ले जायेगा। मैं उसे इतनी-सी उमर से पहचानता हूँ भाभी, उसने हरगिज गलती नहीं की।''
''हाय री जली तकदीर! उसे भी कलमुँही ने भीतर भीतर इतना बस कर रक्खा था! अब मेरी ऑंखें खुलीं। उस दिन भादों की सँकराँत थी, आकाश में बादल उमड़ रहे थे, रह-रहकर झरझर पानी बरस रहा था, मगर अभागी ने एक रात के लिए भी मेरी बात न रक्खी, लड़के का हाथ पकड़कर घर से निकल गयी। मेरे ससुर के जमाने की एक रिआया थी जिसे मरे आज दो साल हो गये, उसी के टूटे-फूटे खण्डहर घर में एक कोठरी किसी तरह खडी थी; सियार, कुत्ते, साँप-मेंढकों के साथ जाकर, ऐसे बुरे दिनों में, वह उसी में रहने लगी। मैंने ऑंगन के बीच मिट्टी-पानी में लोटते हुए रो-रोकर कहा, ''सत्यानासिन, यही अगर तेरे मन में थी, तो इस घर में तू आई ही क्यों थी? बिनू तक को ले आई, तूने क्या ससुर-कुल का नाम तक दुनिया से मिटा देने की प्रतिक्षा की है?'' मगर उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने फिर कहा, ''खायगी क्या?'' जवाब मिला, ''ससुरजी जो तीन बीघा ब्रह्मोत्तर जमीन छोड़ गये हैं, उसमें से आधी हमारी है।'' उसकी बात सुनकर मेरी तो तबीयत हुई कि सिर पटककर मर जाऊँ। मैंने कहा, ''अभागी, उससे तो एक दिन की भी गुजर न होगी। तुम लोग माना, कि बिना खाये ही मर सकते हो, पर मेरा बिनू?'' बोली, ''एक बार कन्हाई बसाक के लड़के के बारे में तो सोच देखो जीजी। उसकी तरह एक छाक खाकर भी अगर बिनू जिन्दा रहे तो बहुत है।''
''आखिर वे चले गये। सारा घर मानो हाहाकार करके रोने लगा। उस रात को न तो घर में बत्ती जली न चूल्हा सुलगा; उन्होंने बहुत रात बीते घर लौटकर सारी रात उसी खूँटी के सहारे बैठे बिता दी। शायद बिनू मेरा न सोया होगा; शायद बच्चा मेरा भूख के मारे तड़फड़ाता होगा; सो सबेरा होते ही राखाल के हाथ गाय और बछिया भिजवा दी, पर उस राक्षसी ने लौटा दी और कहला भेजा, ''बिनू को मैं दूध नहीं पिलाना चाहती, उसे बिना दूध के ही जिन्दा रहने की शिक्षा देना चाहती हूँ।''
राजलक्ष्मी के मुँह से सिर्फ एक गहरी साँस निकली। गृहिणी की उस दिन की सारी वेदना और अपमान की स्मृति ने उबलकर उसका कण्ठ रोक दिया, और मेरे हाथ का दाल-भात सूखकर बिल्कुरल खाल-सा हो गया। कुशारीजी की खड़ाऊँ की आवाज सुनाई दी-उनका मधयाह्न-भोजन समाप्त हो गया था। मुझे आशा है कि उनके मौन-व्रत ने अक्षुण्ण अटूट रहकर उनके सात्वि‍क आहार में किसी तरह का विघ्न उपस्थित नहीं किया होगा। मगर, इधर की बात जानते थे, इस कारण ही शायद वे हमारी खोज लेने के लिए नहीं आये। गृहिणी ने ऑंखें पोंछकर, नाक और गला साफ करते हुए कहा, ''उसके बाद गाँव-गाँव में, मुहल्ले-मुहल्ले में, लोगों के मुँह कितनी बदनामी और कितनी फजीहत हुई बेटा, सो तुम्हें क्या बताऊँ! उन्होंने कहा, ''दो-चार दिन जाने दो तकलीफों के मारे आप ही लौट आएगी।'' मैंने कहा, ''उसे पहचानते नहीं हो तुम, टूट जायेगी पर नबेगी नहीं।'' और हुआ भी वही। एक के बाद एक आज आठ महीने बीत गये पर उसे न नबा सके। वे मारे फिकर के छिप-छिपकर रोते-रोते सूख के लकड़ी होने लगे। बच्चा उनको प्राणों से भी बढ़कर था और देवरजी को तो लड़के से भी ज्यादा प्यार करते थे। फिर सहा न गया तो आखिर लोगों के मुँह से कहलवाया कि जुलाहे की बहू का इन्तजाम किये देता हूँ जिससे उन लोगों को तकलीफ न हो। पर उस सत्यानासिन ने जवाब दिया कि ''उनका जो कुछ न्यायत: पावना है, सबका सब जब दे देंगे, तभी घर में घुसूँगी। उसका एक रत्ती-भर भी बाकी रहेगा, तो नहीं।'' यानी इसके मानो यह हुए कि हम अपनी निश्चित मौत बुला लें।''
मैंने गिलास के पानी में हाथ डुबोते हुए पूछा, ''अब उनकी गुजर कैसे होती है?''
कुशारी-पत्नी ने कातर होकर कहा, ''इसका जवाब मुझसे न पूछो बेटा, इसका जिकर कोई छेड़ता है तो कानों में अंगुली देकर भाग जाती हूँ- ऐसा मालूम होता है जैसे दम घुट रहा हो। इन आठ महीनों में इस घर में मछली तक नहीं आई, दूध-घी की कढ़ाई तक नहीं चढ़ी। सारे ही घर पर मानो वह मर्मान्तिक अभिशाप रख के चली गयी है।'' यह कहकर वे चुप हो गयीं, और बहुत देर तक हम तीनों जनें स्तब्ध होकर नीरव बैठे रहे।
घण्टे-भर बाद जब हम गाड़ी पर सवार हुए तो कुशारी-गृहिणी ने सजल कण्ठ से राजलक्ष्मी के कान में कहा, ''बेटी, वे तुम्हारी ही रिआया हैं। मेरे ससुर की छोड़ी हुई जमीन पर ही उनकी गुजर होती है, वह तुम्हारे ही गाँव में है- गंगामाटी में।''
राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा, ''अच्छा।''
गाड़ी चल देने पर उन्होंने फिर कहा, ''बेटी, तुम्हारे घर से ही दिखाई देता है उनका घर। नाले के इधर जो टूटा-फूटा घर दिखाई देता है, वही।''
राजलक्ष्मी ने उसी तरह फिर गरदन हिलाकर कहा, ''अच्छी बात है।''
गाड़ी धीमी चाल से आगे बढ़ने लगी। बहुत देर तक मैंने कोई बात नहीं की। राजलक्ष्मी की ओर देखा तो जान पड़ा वह अन्यमनस्क होकर कुछ सोच रही है। उसका ध्याैन भंग करते हुए मैंने कहा, ''लक्ष्मी, जिसके लोभ नहीं, जो कुछ चाहता नहीं, उसे सहायता करने जाना- इससे बढ़कर संसार में और कोई विडम्बना नहीं।''
राजलक्ष्मी ने मेरे मुँह की ओर देखकर कुछ मुसकराते हुए कहा, ''सो मैं जानती हूँ। तुमसे मैंने और कुछ लिया हो न लिया हो, इस बात की शिक्षा अवश्य ले ली है।''
अपने आपको विश्लेषण करने बैठता हूँ, तो देखता हूँ, जिन थोड़े-से नारी-चरित्रों ने मेरे मन पर रेखा अंकित की है, उनमें से एक है वही कुशारी महाशय के छोटे भाई की विद्रोहिनी बहू सुनन्दा। अपने इस सुदीर्घ जीवन में सुनन्दा को मैं आज तक नहीं भूला हूँ। राजलक्ष्मी मनुष्य को इतनी जल्दी और इतनी आसानी से अपना ले सकती है कि सुनन्दा ने यदि उस दिन मुझे 'भइया' कहकर पुकारा, तो उसमें आश्चर्य करने की कोई बात ही नहीं। अन्यथा, ऐसी आश्चर्यजनक लड़की को जानने का मौका मुझे कभी न मिलता। अध्यािपक यदुनाथ तर्कालंकार का टूटा-फूटा घर, हमारे घर के पश्चिम की तरफ, मैदान के एक किनारे पर है, ऑंखें उठाते ही उसी पर सीधी निगाह पड़ती है। और यहाँ जब से आया तभी से बराबर पड़ती रही है। मुझे सिर्फ इतना ही नहीं मालूम था कि वहाँ एक विद्रोहिनी अपने पति-पुत्र के साथ रहा करती है। बाँस का पुल पार होकर मैदान से करीब दस मिनट का रास्ता है; बीच में पेड़-पौधे कुछ नहीं हैं, बहुत दूर तक बिल्कुवल साफ दिखाई देता है। आज सबेरे बिछौने से उठते ही खिड़की में से जब उस जीर्ण और श्रीहीन खण्डहर पर मेरी निगाह पड़ी तो बहुत देर तक मैं एक तरह की अभूतपूर्व व्यथा और आग्रह के साथ उस तरफ देखता रहा। और जिस बात को बहुत बार बहुत कारणों से देखकर भी बार-बार भूल गया हूँ, उसी बात की याद उठ खड़ी हुई कि संसार में किसी विषय में सिर्फ उसके बाहरी रूप को देखकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। कौन कह सकता है कि वह सामने दिखाई देनेवाला टूटा-फूटा घर सियार-कुत्तों का आश्रय-स्थल नहीं है? इस बात का कौन अनुमान कर सकता है कि उस खण्डहर में कुमार-रघु-शकुन्तला-मेघदूत का पठन-पाठन हुआ करता है, और उसमें एक नवीन अध्यासपक छात्रों से परिवेष्टित होकर स्मृति और न्याय की मीमांसा और विचार में निमग्न रहा करते हैं? कौन जानेगा कि उसी में इस देश की एक तरुणी नारी अपने धर्म और न्याय की मर्यादा रखने के लिए, अपनी इच्छा से, अशेष दु:खों का भार वहन कर रही है?

दक्षिण के जंगल से मकान के भीतर निगाह गयी तो मालूम हुआ कि ऑंगन में कुछ हो रहा है- रतन आपत्ति कर रहा है और राजलक्ष्मी उसका खण्डन कर रही है। पर गले की आवाज उसी की कुछ जोर की है। मैं उठकर वहाँ पहुँचा तो वह कुछ शरमा-सी गयी। बोली, ''नींद उचट गयी मालूम होती है? सो तो उचटेगी ही। रतन, तू अपने गले को जरा धीमा कर भइया, नहीं तो मुझसे तो अब पेश नहीं पाया जाता।''
इस तरह के उलझनों और शिकायतों से सिर्फ रतन ही अकेला नहीं, घर-भर के हम सभी अभ्यस्त हो गये थे; इसलिए, वह भी जैसे चुप रह गया मैं भी वैसे ही कुछ नहीं बोला। देखा कि एक बड़ी टोकनी में चावल-दाल-घी-तेल आदि तथा दूसरी एक छोटी डलिया में नाना प्रकार की भोज्य सामग्री सजाई गयी है। मालूम होता है कि इनके परिमाण और इनके ढोने की शक्ति-सामर्थ्य के विषय में ही रतन प्रतिवाद कर रहा था। ठीक यही बात निकली। राजलक्ष्मी ने मुझे मध्य्स्थ मानते हुए कहा, ''सुनो इसकी बात। इससे इतना-सा बोझ ले जाते न बनेगा! इतना तो मैं भी ले जा सकती हूँ, रतन!'' यह कहते हुए उसने खुद झुककर उस बोझे को आसानी से उठा लिया।
वास्तव में, बोझ के लिहाज से एक आदमी के लिए- और तो क्या रतन के लिए भी उसका ले जाना कोई कठिन न था; पर कठिन थी एक दूसरी बात। इससे रतन की इज्जत में बट्टा जो लगता! पर शरम के मारे मालिक के सामने उस बात को वह मंजूर नहीं कर सकता। मैं उसका चेहरा देखते ही बड़ी आसानी से ताड़ गया। मैंने हँसकर कहा, ''तुम्हारे यहाँ तो काफी आदमी हैं, रिआया की भी कमी नहीं-उन्हीं में से किसी को भेज दो। रतन, न हो तो उसके साथ-साथ चल जायेगा रीते-हाथ।''
रतन नीचे को निगाह किये खड़ा रहा। राजलक्ष्मी एक बार मेरी तरफ और एक बार उसकी तरफ देखकर हँस पड़ी; बोली, ''अभागा आधे घण्टे तक झगड़ता तो रहा, पर मुँह से बोला नहीं कि माँ, ये सब छोटे काम रतन बाबू नहीं कर सकेंगे! अब जा, किसी को बुला ला।''
उसके चले जाने पर मैंने पूछा, ''सबेरे उठते ही यह सब क्या शुरू कर दिया?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''आदमी के खाने की चीजें सबेरे ही भेजी जाती हैं।''
''मगर भेजी कहाँ जा रही हैं? और उसकी वजह भी तो मालूम हो?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''वजह? आदमी खाएँगे, और जा रही हैं ब्राह्मण के घर।''
मैंने कहा, ''वह ब्राह्मण है कौन?''
राजलक्ष्मी मुसकराती हुई कुछ देर चुप रही, शायद सोचने लगी कि नाम बताऊँ या नहीं। फिर बोली, ''देकर कहना नहीं चाहिए, पुण्य घट जाता है। जाओ, तुम हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदल आओ- तुम्हारी चाय तैयार है।''
मैं, फिर कोई प्रश्न बिना किये ही, बाहर चला गया।
लगभग दस बजे होंगे। बाहर के कमरे में तख्त पर बैठा, कोई काम न होने से, एक पुराने साप्ताहिक पत्र का विज्ञापन पढ़ रहा था। इतने में एक अपरिचित कण्ठ-स्वर का सम्भाषण सुनकर मुँह उठाकर देखा तो आगन्तुक अपरिचित ही मालूम हुए। वे बोले, ''नमस्कार बाबूजी।''
मैंने हाथ उठाकर प्रति-नमस्कार किया और कहा, ''बैठिए।''
ब्राह्मण का अत्यन्त दीन वेश था, पैरों में जूता नदारद, बदन पर कुरता तक नहीं, सिर्फ एक मैली चादर-सी पड़ी थी। धोती भी वैसी ही मलिन थी, ऊपर से दो-तीन जगह गाँठें बँधी हुईं। गँवई-गाँव के भद्र पुरुष के आच्छादन की दीनता कोई आश्चर्य की वस्तु नहीं है, और सिर्फ उसी पर से उसकी गार्हस्थिक अवस्था का अनुमान नहीं किया जा सकता। खैर, वे सामने बाँस के मूढ़े पर बैठ गये और बोले, ''मैं आपकी एक गरीब प्रजा हूँ- इसके पहले ही मुझे आना चाहिए था, बड़ी गलती हो गयी।''
मुझे जमींदार समझकर यदि कोई मिलने आता तो मैं भीतर-ही-भीतर जैसे लज्जित होता था वैसे ही झुँझला भी उठता था। खासकर ये लोग ऐसी-ऐसी प्रार्थनाएँ और शिकायतें लाया करते हैं, और ऐसे-ऐसे बद्धमूल उत्पातों और अत्याचारों का प्रति‍कार चाहते हैं कि जिन पर हमारा कोई काबू ही नहीं चलता। यही कारण है कि इन महाशय पर भी मैं प्रसन्न न हो सका। मैंने कहा, ''देर से आने के कारण आप दु:खित न हों; कारण, बिल्कुंल ही न आते तो भी मैं आपकी तरफ से कुछ खयाल न करता- ऐसा मेरा स्वभाव ही नहीं। मगर आपको जरूरत क्या है?''
ब्राह्मण ने लज्जित होकर कहा, ''असमय में आकर शायद आपके काम में विघ्न पहुँचाया है, मैं फिर किसी दिन आऊँगा।'' यह कहते हुए वे उठ खड़े हुए।
मैंने झुँझलाकर कहा, ''मुझसे आपको काम क्या था, बताइए तो सही?''
मेरी नाराजगी को वे आसानी से ताड़ गये। जरा मौन रहकर शान्त भाव से बोले, ''मैं मामूली आदमी हूँ, जरूरत भी मामूली-सी है। माँजी ने मुझे याद किया था, शायद उन्हें जरूरत हो- मुझे चाहिए तो कुछ नहीं।''
जवाब कठोर था, पर था सत्य। और मेरे प्रश्न के देखते हुए असंगत भी न था। पर यहाँ आने के बाद से ऐसा जवाब सुनाने वाला कोई आदमी ही नहीं मिला, इसी से ब्राह्मण के उत्तर से सिर्फ आश्चर्य ही नहीं हुआ बल्कि क्रोध भी आ गया। यों मेरा मिजाज रूखा नहीं है और कहीं होता तो शायद कुछ खयाल भी न करता; परन्तु ऐश्वर्य की क्षमता इतनी भद्दी चीज है कि दूसरे से उधार ली हुई होने पर भी उसके अपव्यवहार प्रलोभन को आदमी आसानी से नहीं टाल सकता। अतएव, अपेक्षाकृत बहुत ही ज्यादा रूढ़ उत्तर मेरी जबान पर आ गया, परन्तु उसकी तेजी निकलने के पहले ही देखा कि बगल का दरवाजा खुल गया है और राजलक्ष्मी अपना पूजा-पाठ अधूरा छोड़कर उठ आई है। वह दूसरे बड़े विनय के साथ प्रणाम करके बोली, ''अभी से मत चले जाइए, बैठिए आप। आपसे मुझे अभी बहुत-सी बातें करनी हैं।''
ब्राह्मण ने पुन: आसन ग्रहण किया और कहा, ''माँजी, आपने तो मेरे घर की बहुत दिनों की दुश्चिन्ता दूर कर दी, उससे तो हम लोगों की लगभग पन्द्रह दिन की गुजर चल जायेगी। पर अभी तो कोई समय नहीं है, व्रत-नियम-पर्व कुछ भी तो नहीं है। ब्राह्मणी आश्चर्य में आकर यही पूछ रही थी...''
राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, ''आपकी ब्राह्मणी ने सिर्फ व्रत-नियमों के ही दिन-वार सीख रखे हैं, मगर पड़ोसियों की भेंट-सौगात लेने के दिन-वार का विचार वे अभी मुझसे सीख जाँय, कह दीजिएगा।''
ब्राह्मण ने कहा, ''तो इतना बड़ा सीधा क्या...''
प्रश्न को वे खतम न कर सके, या फिर उन्होंने जान-बूझकर ही नहीं करना चाहा, परन्तु मैंने इस दाम्भिक ब्राह्मण के अनुक्त वाक्य का मर्म सम्पूर्ण रूप से हृदयंगम कर लिया। फिर भी भय हुआ कि कहीं मेरी ही तरह बिना समझे राजलक्ष्मी को भी कोई कड़ी बात न सुननी पड़े। इस आदमी का एक तरफ का परिचय अभी तक अज्ञात रहने पर भी दूसरी तरफ का परिचय पहले ही मिल चुका था, लिहाजा ऐसी इच्छा न हुई कि मेरे सामने फिर उसकी पुनरावृत्ति हो। साहस की बात सिर्फ इतनी ही थी कि राजलक्ष्मी को कभी कोई आमने-सामने निरुत्तर नहीं कर सकता था। ठीक हुआ भी यही। इस असुहावने प्रश्न से भी वह बाल-बाल बचकर साफ निकल गयी, बोली, ''तर्कालंकार महाशय, सुना है आपकी ब्राह्मणी बहुत ही गुस्सैल हैं- बिना निमन्त्रण के पहुँच जाने से शायद खफा हो जाँयगी। नहीं तो मैं इस बात का जवाब उन्हें ही जाकर दे आती।''
अब समझ में आया कि ये ही यदुनाथ कुशारी हैं। अध्याैपक आदमी ठहरे, प्रियतमा के मिजाज का उल्लेख होते ही अपना मिजाज खो बैठे; 'हा: हा:' करके उच्च हास्य से घर भर दिया और प्रसन्न चित्त से बोले, ''नहीं माँ, गुस्सैल क्यों होने लगी, बहुत ही सीधी-साधी स्त्री है। हम लोग गरीब ठहरे, आप जायेंगीं तो आपके योग्य सम्मान नहीं कर सकेंगे, इसीलिए वही आ जायेगी। समय मिलने पर मैं ही उसे अपने साथ ले आऊँगा।''
राजलक्ष्मी ने पूछा, ''तर्कालंकार महाशय, आपके छात्र कितने हैं?''
कुशारीजी ने कहा, ''पाँच हैं। इस देश में अधिक छात्र मिलते ही कहाँ हैं- अध्याेपन तो नाममात्र है।''
''सभी को क्या खाने-पहरने को देना पड़ता है?''
''नहीं। विजय तो भइया के यहाँ रहता है, और दूसरा एक गाँव ही का रहने वाला है। सिर्फ तीन छात्र मेरे यहाँ रहते हैं।''
राजलक्ष्मी जरा चुप रहकर अपूर्व स्निग्ध कण्ठ से बोली, ''ऐसे दु:समय में यह तो सहज बात नहीं है तर्कालंकार महाशय।''
ठीक इसी कण्ठ-स्वर की आवश्यकता थी। नहीं तो अभिमानी अध्याोपक के गरम होकर उठ जाने में कोई कसर नहीं थी। पर मज़ा यह हुआ कि अबकी बार उनका मन कतई उधर होकर नहीं निकला। बड़ी आसानी से उन्होंने घर के दु:ख और दैन्य को स्वीकार कर लिया। कहने लगे, कैसे गुजर होती है सो हम ही दोनों प्राणी जानते हैं। परन्तु फिर भी भगवान का उदयास्त रुका नहीं रहता माँ। इसके सिवा उपाय ही क्या है अपने हाथ में? अध्य यन अधयापन तो ब्राह्मण का कर्त्तव्य ठहरा। आचार्य देव से कुछ मिला है, वह तो केवल धरोहर है जो किसी न किसी दिन तो लौटा ही देनी पडेग़ी।'' जरा ठहर कर फिर बोले, ''किसी समय इसका भार था भू-स्वामियों पर, परन्तु अब तो जमाना ही बदल गया। वह अधिकार भी उन्हें नहीं है और वह दायित्व भी चल गया है। प्रजा का रक्त-शोषण करने के सिवा उनके करने लायक और कोई काम ही नहीं। अब तो उन्हें भू-स्वामी समझने में भी घृणा मालूम होती है।''
राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, ''मगर उनमें से अगर कोई कुछ प्रायश्चित करना चाहता है तो उसमें आप अड़ंगा न डालें!''
कुशारी लज्जित होकर खुद भी हँस दिए बोले, ''अन्यमनस्क हो जाने से आपकी बात का मुझे खयाल ही नहीं रहा, पर अडंग़ा क्यों डालने लगा! सचमुच ही तो यह आप लोगों का कर्तव्य है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हम लोग पूजा-अर्चना करती हैं, पर एक भी मन्त्र शायद शुद्ध नहीं बोल सकतीं,-लेकिन, यह भी आपका कर्तव्य है, सो भी याद दिलाए देती हूँ।''
कुशारी महाशय ने हँसते हुए कहा, ''सो ही होगा माँ।'' यह कहकर वे अबेर का खयाल करके उठ खड़े हुए। राजलक्ष्मी ने उन्हें जमीन से माथा टेककर प्रणाम किया और जाते समय मैंने भी किसी तरह एक नमस्कार करके छुट्टी पा ली।
उनके चले जाने पर राजलक्ष्मी ने कहा, ''आज तुम्हें जरा सिदौसे नहा-खा लेना पड़ेगा।''
''क्यों भला?''
''दोपहर को सुनन्दा के घर चलना पड़ेगा।''
मैंने कुछ विस्मित होकर कहा, ''मगर मुझे क्यों? तुम्हारा वाहन रतन तो है।''
राजलक्ष्मी ने माथा हिलाते हुए कहा, ''उस वाहन से अब गुजर न होगी। तुम्हें बगैर साथ लिये अब मैं एक कदम भी कहीं को नहीं हिलने की।''
मैंने कहा, ''अच्छा, सो ही सही।''
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पहले ही कह चुका हूँ कि एक दिन सुनन्दा ने मुझसे 'भइया' कह के पुकारा था, और उसे मैंने परम आत्मीय के समान अपने बहुत नजदीक पाया था। इसका पूरा विवरण यदि विस्तृत रूप से न भी दिया जाय तो भी उस पर विश्वास न करने को कोई कारण नहीं। मगर,
हमारे प्रथम परिचय के इतिहास पर विश्वास दिलाना शायद कठिन होगा। बहुत-से तो यह सोचेंगे कि यह बड़ी अद्भुत बात है; और शायद, बहुत से सिर हिलाकर कहेंगे कि ये सब बातें सिर्फ कहानियों में ही चल सकती हैं। वे कहेंगे, ''हम भी बंगाली हैं, बंगाल में ही इतने बड़े हुए हैं, पर साधारण गृहस्थ-घर में ऐसा होता है, यह तो कभी नहीं देखा!'' हो सकता है; परन्तु इसके उत्तर में मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि ''मैं भी इसी देश में इतना बड़ा हुआ हूँ, और एक से ज्यादा सुनन्दा इस देश में मेरे भी देखने में नहीं आईं। फिर भी यह सत्य है।''
राजलक्ष्मी भीतर चली गयी, मैं उन लोगों की टूटी-फूटी दीवार के पास खड़ा होकर खोज रहा था कि कहीं जरा छाया मिले। इतने में एक सत्रह-अठारह साल का लड़का आकर बोला, ''आइए, भीतर चलिए।''
''तर्कालंकारजी कहाँ हैं? आराम कर रहे होंगे शायद?''
''जी नहीं, वे पेंठ करने गये हैं? माताजी हैं, आइए।'' कहता हुआ वह आगे हो लिया, और काफी दुवि‍धा के साथ मैं उसके पीछे-पीछे चला। कभी किसी जमाने में इस मकान में सदर दरवाजा भी शायद कहीं रहा होगा, पर फिलहाल उसका निशान तक बिला गया है। अतएव, भूतपूर्व ढेंकी-शाला में होकर अन्त:पुर में प्रवेश करके निश्चय ही मैंने उसकी मर्यादा की उल्लंघन नहीं कि‍या। प्रांगण में उपस्थित होते ही सुनन्दा को देखा। उन्नीस-बीस वर्ष की एक साँवली लड़की है, इस मकान की तरह ही बिल्कुलल आभरण-शून्य। सामने के कम-चौड़े बरामदे के एक किनारे बैठी मूडी¹ भून रही थी- और शायद राजलक्ष्मी के आगमन के साथ-ही-साथ उठकर खड़ी हो गयी है- उसने मेरे लिए एक फटा-पुराना कम्बल का आसन बिछाकर नमस्कार किया। कहा, ''बैठिए।'' लड़के से कहा, ''अजय, चूल्हे में आग है, जरा तमाखू तो सुलगा दे बेटा।'' फिर राजलक्ष्मी बिना आसन के पहले ही बैठ गयी थी, उसकी तरफ देखकर जरा मुसकराते हुए कहा, ''लेकिन आपको मैं पान न दे सकूँगी। पान घर में है ही नहीं।''
हम लोग कौन हैं, अजय शायद इस बात को जान गया था। वह अपनी गुरु-पत्नी की बात पर सहसा अत्यन्त व्यस्त होकर बोल उठा, ''नहीं हैं? तो पान शायद आज अचानक निबट गये होंगे माँ?''
सुनन्दा ने उसके मुँह की तरफ क्षण-भर मुसकराकर देखते हुए कहा, ''पान आज अचानक निबट गये हैं, या सिर्फ एक दिन ही अचानक आ गये थे अजय?'' यह कहकर वह खिलखिलाकर हँस पड़ी, फिर राजलक्ष्मी से बोली, ''उस रविवार को छोटे महन्त महाराज के आने की बात थी, इसी से एक पैसे के पान मँगाए गये थे- उसके हो गये करीब दस दिन। यह बात है, इसी से हमारा अजय एकदम आश्चर्य-चकित हो गया, पान चटसे निबट कैसे गये?'' इतना कहकर वह फिर हँस दी। अजय अत्यन्त अप्रतिभ होकर कहने लगा, ''वाह, ऐसा है! सो होने दो न- निबट जाने दो...''
राजलक्ष्मी ने हँसते हुए सदय कण्ठ से कहा, ''बात तो ठीक ही है, बहिन, आखिर यह ठहरे मर्द, ये कैसे जान सकते हैं कि तुम्हारी गिरस्ती में कौन-सी चीज़ निबट गयी है?''
अजय कम-से-कम एक आदमी को अपने अनुकूल पाकर कहने लगा, ''देखिए तो! और माताजी सोचती हैं कि...''
सुनन्दा ने उसी तरह हँसते हुए कहा, ''हाँ, माँ सोचती तो है ही! नहीं जीजी, हमारा अजय ही घर की 'गृहिणी' है- यह सब जानता है। सिर्फ एक बात मंजूर नहीं कर सकता कि यहाँ कोई तकलीफ है और बाबूगीरी तक नदारद है!''
''क्यों नहीं कर सकता! वाह, बाबूगीरी क्या अच्छी चीज है! वह तो
हमारे...'' कहते-कहते वह रुक गये और बात बिना खतम किये ही शायद मेरे लिए तमाखू सुलगाने बाहर चला गया।
सुनन्दा ने कहा, ''ब्राह्मण-पण्डित के घर अकेली हर्र ही काफी है, ढूँढ़ने पर शायद एक-आध सुपारी भी मिल सकती है- अच्छा, देखती हूँ...'' यह कहकर वह जाना ही चाहती थी कि राजलक्ष्मी ने सहसा उसका ऑंचल पकड़कर कहा, ''हर्र मुझसे नहीं बरदाश्त होगी बहिन, सुपारी की भी जरूरत नहीं। तुम मेरे पास जरा स्थिर होकर बैठो, दो-चार बातें तो कर लूँ।'' यह कहकर उसने एक प्रकार से जबरदस्ती ही उसे अपने पास बिठा लिया।
¹ चावलों का नमकीन पानी में भिगोकर बालू में भूना हुआ चबैना।
आतिथ्य के दायित्व से छुटकारा पाकर क्षण-भर के लिए दोनों ही नीरव हो रहीं। इस अवसर पर मैंने और एक बार सुनन्दा को नये सिरे से देख लिया। पहले तो यह मालूम हुआ कि यदि इसे कोई स्वीकार न करे तो वास्तव में यह 'दरिद्रता' वस्तु संसार में कितनी अर्थहीन और निस्सार प्रमाणित हो सकती है! यह हमारे साधारण बंगाली घर की साधारण नारी है। बाहर से इसमें कोई भी विशेषता नहीं दीखती, न तो रूप है और न गहने-कपड़े ही। इस टूटे-फूटे घर में जिधर देखो उधर केवल अभाव और तंगी ही की छाया दिखाई देती है। परन्तु फिर भी यह बात भी साथ ही साथ दृष्टि से छिपी नहीं रहती कि सिर्फ छाया ही है, उससे बढ़कर और कुछ भी नहीं। अभाव के दु:ख को इस नारी ने सिर्फ अपनी ऑंखों के इशारे से मना करके दूर रख छोड़ा है- इतनी उसमें हिम्मत ही नहीं कि वह जबरदस्ती भीतर घुस सके। और तारीफ यह कि कुछ महीने पहले ही इसके सब कुछ विद्यमान था- घर-द्वार, स्वजन-परिजन, नौकर-चाकर-हालत अच्छी थी, किसी बात की कमी नहीं थी- सिर्फ एक कठोर अन्याय का तत्वोसधिक प्रतिवाद करने के लिए अपना सब कुछ छोड़ आई है- जीर्ण वस्त्र की तरह सब त्याग आई है। मन स्थिर करने में उसे एक पहर भी समय नहीं लगा। उस पर भी मज़ा यह कि कहीं भी किसी अंग में इसके कठोरता का नामो-निशान तक नहीं।
राजलक्ष्मी ने सहसा मेरी ओर मुखातिब होकर कहा, ''मैं समझती थी कि सुनन्दा उमर में खूब बड़ी होगी। पर हे भगवान, यह तो अभी बिल्कुंल लड़की ही है!''
अजय शायद अपने गुरुदेव के हुक्के पर ही तमाखू भर के ला रहा था, सुनन्दा ने उसकी ओर इशारा करते हुए कहा, ''लड़की कैसे हूँ! जिसके इतने बड़े-बड़े लड़के हों, उसकी उमर कहीं कम होती होगी!'' यह कहकर वह हँसने लगी। खासी स्वच्छन्द सरल हँसी थी उसकी। अजय के यह पूछने पर कि मैं खुद ही चूल्हे से आग ले लूँ या नहीं, उसने परिहास करते हुए कहा, ''मालूम नहीं किस जात के लड़के हो तुम बेटा, जरूरत नहीं तुम्हें चूल्हा छूने की।'' असल में बात यह थी कि लड़के के लिए जलता अंगारा चूल्हे में से निकालना कठिन था, इससे उसने खुद ही जाकर ऑंच उठाके चिलमपर रख दी, और चेहरे पर वैसी ही हँसी लिए हुए वह फिर अपनी जगह पर आकर बैठ गयी। साधारण ग्राम्य-रमणी-सुलभ हँसी-मसखरी से लेकर बातचीत और आचरण तक कहीं किसी बात में उसकी कोई विशेषता नहीं पकड़ी जा सकती, फिर भी, इतने ही अरसे जो मामूली-सा परिचय मुझे मिला है वह कितना असाधारण है! इस असाधारणता का हेतु दूसरे ही क्षण में हम दोनों के समक्ष परिस्फुट हो उठा। अजय ने मेरे हाथ में हुक्का देते हुए कहा, ''माताजी, तो अब उसे उठाकर रख दूँ?''
सुनन्दा के इशारे से अनुमति देने पर उसकी दृष्टि अनुसरण करके देखा कि पास ही एक लकड़ी के पीढ़े पर बड़ी भारी एक मोटी पोथी इधर-इधर बिखरी पड़ी है। अब तक किसी ने भी उसे नहीं देखा था। अजय ने उसके पन्ने सँभालते हुए क्षुण्ण स्वर से कहा, ''माताजी, 'उत्पत्ति-प्रकरण' तो आज भी समाप्त नहीं हुआ, न जाने कब तक होगा! अब पूरा नहीं होने का।''
राजलक्ष्मी ने पूछा, ''वह कौन-सी पोथी है, अजय?''
''योगवासिष्ठ।''
''तुम्हारी माँ मूड़ी भून रही थी और तुम सुना रहे थे?''
''नहीं, मैं माताजी से पढ़ता हूँ।''
अजय के इस सरल और संक्षिप्त उत्तर से सुनन्दा सहसा मानो लज्जा से सुर्ख हो उठी, झटपट बोल उठी, ''पढ़ाने लायक विद्या तो इसकी माँ के पास खाक-धूल भी नहीं है। नहीं जीजी, दोपहर को अकेली घर का काम करती हूँ, वे तो अक्सर रहते नहीं, ये लड़के पुस्तक लेकर क्या-क्या बकते चले जाते हैं, उसका तीन-चौथाई तो मैं सुन ही नहीं पाती। इसको क्या है, जो मन में आया सो कह दिया।''
अजय ने अपने 'योगवासिष्ठ' को लेकर प्रस्थान किया, और राजलक्ष्मी गम्भीर मुँह बनाए स्थिर होकर बैठी रही। कुछ ही क्षण बाद सहसा एक गहरी साँस लेकर बोली, ''आसपास ही कहीं मेरा घर होता तो मैं भी तुम्हारी चेली हो जाती, बहिन। एक तो कुछ जानती ही नहीं, उस पर आह्निक-पूजा के शब्दों को भी ठीक तौर से बोल सकती; सो भी नहीं।''
मन्त्रोच्चारण के सम्बन्ध में उसका संदिग्ध मानसिक खेद मैंने बहुत बार सुना है। इसका मुझे अभ्यास हो गया था। परन्तु सुनन्दा ने पहले-पहल सुनकर भी कुछ नहीं कहा। वह सिर्फ जरा-सा मुसकराकर रह गयी। मालूम नहीं, उसने क्या समझा। शायद सोचा कि जिसका तात्पर्य नहीं समझती, प्रयोग नहीं जानती, उसे सिर्फ अर्थहीन पाठ-मात्र की शुद्धता पर इतनी दृष्टि क्यों? हो सकता है कि यह उसके लिए भी कोई नयी बात न हो, अपने यहाँ के साधारण हिन्दू घराने की स्त्रियों के मुँह से ऐसी सकरुण, लोभ और मोह की बातें उसने बहुत बार सुनी हैं- इसका उत्तर देना या प्रतिवाद करना भी वह आवश्यक नहीं समझती। अथवा यह सब कुछ भी न हो। सिर्फ स्वाभाविक विनय-वश ही मौन रही हो। फिर भी इतना तो बिना खयाल किये रहा ही न गया कि उसने अगर आज अपने इस अपरिचित अतिथि को निहायत ही साधारण औरतों के समान छोटा करके देखा हो, तो फिर एक दिन उसे अत्यन्त अनुताप के साथ अपना मत बदलने की जरूरत पड़ेगी।
राजलक्ष्मी ने पलक मारते ही अपने को सँभाल लिया। मैं जानता हूँ कि कोई मुँह खोलता है तो वह उसके मन की बात जान जाती है। फिर वह मन्त्र-तन्त्र के किनारे होकर भी नहीं निकली। और थोड़ी देर बाद ही उसने खालिस घर-गृहस्थी की और घरेलू बातें शुरू कर दीं। उन दोनों के मृदु कण्ठ की सम्पूर्ण आलोचना न तो मेरे कानों में ही गयी, और न मैंने उधर कान लगाने की कोशिश ही की बल्कि मैं तो तर्कालंकार के हुक्के में अजयदत्त की सूखी और कठोर तमाखू को खतम करने में ही जी-जान से जुट गया।
दोनों रमणियाँ मिलकर अस्पष्ट मृदु भाव से संसार-यात्रा के विषय में किस जटिल तत्व का समाधान करने लगीं, सो वे ही जानें, किन्तु उनके पास हुक्का हाथ में लिये बैठे-बैठे मुझे मालूम हुआ कि आज सहसा एक कठिन प्रश्न का उत्तर मिल गया। हमारे विरुद्ध एक भद्दी शिकायत है कि स्त्रियों को हमने हीन बना रक्खा है। यह कठिन काम हमने किस तरह किया है, और कहाँ इसका प्रतिकार है, इस बात पर मैंने अनेक बार विचार करने की कोशिश की है, परन्तु, आज सुनन्दा को यदि ठीक इस तरह अपनी ऑंखों न देखता तो शायद संशय हमेशा के लिए बना ही रह जाता। मैंने देश और विदेश में तरह-तरह की स्त्री-स्वाधीनता देखी है। उसका जो नमूना बर्मा मुल्क में पैर रखते ही देखा था, वह कभी भूलने की चीज नहीं। तीन-चारेक बर्मी सुन्दरियों को जब मैंने राजपथ पर खड़े-खड़े धौरे-दुपहर एक हट्टे-कट्टे जवान मर्द को ईख के टुकड़ों से पीटते हुए देखा था तब मैं उसी दम मारे गुदगुदी के रोमांचित होकर पसीने से तर-ब-तर हो गया था। अभया ने मुग्ध दृष्टि से निरीक्षण करते हुए कहा था, 'श्रीकान्त बाबू, हमारी बंगाली स्त्रियाँ अगर इसी तरह...'
मेरे चचा साहब एक बार दो मारवाड़ी महिलाओं के नाम नालिश करने गये थे। उन लोगों ने रेलगाड़ी में मौका पाते ही चचा साहब के नाक-कान की प्रबल पराक्रम के साथ मलाई कर दी थी। सुनकर मेरी चाची अफसोस करके बोली थीं, ''अच्छा होता यदि अपने बंगालियों में घर-घर इस बात का चलन होता!'' होता तो मेरे चाचा साहब उसका घोरतर विरोध करते। परन्तु, इससे नारी-जाति की हीन अवस्था का प्रति-विधान हो जाता, सो निस्सन्देह नहीं कहा जा सकता। मैं आज सुनन्दा के भग्न-गृह के छिन्न आसन पर बैठा हुआ चुपचाप और निस्सन्देह रूप से अनुभव कर रहा था कि यह कहाँ और क्यों कर हो सकता है। सिर्फ एक 'आइए' कहकर अभ्यर्थना करने के सिवा उसने मेरे साथ दूसरी कोई बातचीत ही नहीं की, और राजलक्ष्मी के साथ भी ऐसी किसी बड़ी बात की चर्चा में वह लग गयी हो, सो भी नहीं; परन्तु, उसने जो अजय के मिथ्याडम्बर के उत्तर में हँसते हुए जता दिया कि इस घर में पान नहीं है और खरीदने का सामर्थ्य भी नहीं-यही वह दुर्लभ वस्तु है। उसकी सब बातों के बीच में यह बात मानो मेरे कानों में गूँज ही रही थी। उसके संकोच-लेश-शून्य इतने से परिहास से दरिद्रता की सम्पूर्ण लज्जा ने मारे शरम के न जाने कहाँ जाकर मुँह छिपा लिया, फिर उसके दर्शन ही नहीं मिले। एक ही क्षण में मालूम हो गया कि इस टूटे-फूटे मकान, फटे-पुराने कपड़ों, टूटी-फूटी घर की चीजों और घर के दु:ख-दैन्य-अभावों के बीच इस निराभरण महिला का स्थान बहुत ऊँचा है। अध्याजपक पिता ने देने के नाम यही दिया कि अपनी कन्या को बहुत ही जतन के साथ धर्म और विद्या दान करके उसे श्वसुर-कुल में भेज दिया; उसके बाद वह जूते-मोजे पहनेगी या घूँघट हटाकर सड़कों पर घूमेगी, अथवा अन्याय का प्रतिवाद करने के लिए पति-पुत्र को लेकर खण्डहर घर में रहेगी और वहाँ मूड़ी भूनेगी या योगवासिष्ठ पढ़ाएगी, इस बात की चिन्ता उसके लिए बिल्कु्ल ही सारहीन थी। महिलाओं को हमने हीन बनाया है या नहीं, यह बहस फिजूल की है, परन्तु इस दिशा में अगर हम उन्हें वंचित रखते हैं तो उस कर्म का फल भोगना अनिवार्य है।
अजय अगर 'उत्पत्ति-प्रकरण' की बात न कहता तो सुनन्दा की शिक्षा के विषय में हम कुछ जान भी न सकते। उसके मूड़ी भूनने से लेकर सरल और मामूली हँसी-मजाक तक किसी भी बात में 'योगवासिष्ठ' की तेजी ने उझकाई तक नहीं मारी। और साथ ही, पति की अनुपस्थिति में अपरिचित अतिथि की अभ्यर्थना करने में भी उसे कहीं से कुछ बाधा नहीं मालूम हुई। निर्जन घर में एक सत्रह-अठारह वर्ष के लड़के की इतने सहज-स्वभाव और असानी से वह माँ हो गयी है कि शासन और संशय की रस्सी-अस्सी से उसे बाँध रखने की कल्पना तक उसके पति के दिमाग में कभी नहीं आई। हालाँकि कि इसी का पहरा देने के लिए घर-घर न जाने कितने पहरेदारों की सृष्टि होती रहती है!
तर्कालंकार महाशय लड़के को साथ लेकर पेंठ करने गये थे। उनसे मिलकर जाने की इच्छा थी, मगर इधर अबेर हुई जा रही रही थी। इस गरीग गृहलक्ष्मी का न जाने कितना काम पड़ा होगा, यह जानकर राजलक्ष्मी उठ खड़ी हुई, और विदा लेकर बोली, ''आज जा रही हूँ, अगर नाखुश न होओ तो फिर आऊँगी।''
मैं भी उठ खड़ा हुआ, बोला, ''मुझे भी बात करने के लिए कोई आदमी नहीं, अगर अभय-दान दें तो कभी-कभी चला आया करूँ।''
सुनन्दा ने मुँह से कुछ नहीं कहा, पर हँसते हुए गरदन हिला दी। रास्ते में आते-आते राजलक्ष्मी ने कहा, ''बड़े मजे की स्त्री है। जैसा पति वैसी ही पत्नी। भगवान ने इन्हें खूब मिलाया है।''
मैंने कहा, ''हाँ।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''इनके उस घर की बात आज नहीं छेड़ी। कुशारी महाशय को अब तक अच्छी तरह पहिचान न सकी, पर ये दोनों देवरानी-जिठानी बड़ी मजे की हैं।''
मैंने कहा, ''बात तो ऐसी ही है। मगर तुममें तो आदमी को वश करने की अद्भुत शक्ति है, देखो न कोशिश करके अगर इनमें मेल करा सको।''
राजलक्ष्मी ने जरा दबी हँसी हँसकर कहा, ''शक्ति हो सकती है, पर तुम्हें वश कर लेना उसका सुबूत नहीं। कोशिश करने पर वह तो और भी बहुतेरी कर सकती हैं।''
मैंने कहा, ''हो भी सकता है। मगर, जब कि कोशिश का मौका ही नहीं आया, तो बहस करने से भी कुछ हाथ न आएगा।''
राजलक्ष्मी ने उसी तरह मुसकराते हुए कहा, ''अच्छा जी, अच्छा। यह मत समझ लो कि दिन बीत ही चुके हैं।''
आज दिन-भर से न जाने कैसी बदली-सी छाई हुई थी। दोपहर का सूर्य असमय में ही एक काले बादल में छिप जाने से सामने का आकाश रंगीन हो उठा था। उसी की गुलाबी छाया ने सामने के कठोर धूसर मैदान और उसके एक किनारे के बाँसों के झाड़ और दो-तीन इमली के पेड़ों पर सोने का पानी फेर दिया था। राजलक्ष्मी के अन्तिम आरोप का मैंने कोई जवाब नहीं दिया, परन्तु भीतर का मन मानो बाहर की दस दिशाओं के समान ही रंगीन हो उठा। मैंने कनखियों से उसके मुँह की ओर ताककर देखा कि उसके ओठों पर की हँसी अब तक पूरी तौर से बिलाई नहीं है। विगलित स्वर्ण-प्रभा में वह अतिशय परिचित मुख बहुत ही अपूर्व मालूम पड़ा। हो सकता है कि वह सिर्फ आकाश ही का रंग न हो; हो सकता है कि जो प्रकाश मैं और एक नारी के पास से अभी-अभी हाल ही चुरा लाया हूँ, उसी की अपूर्व दीप्ति इसके भी हृदय में खेलती फिर रही हो। रास्ते में हम दोनों के सिवा और कोई नहीं था। उसने सामने की ओर अंगुली दिखाते हुए कहा, ''तुम्हारी छाया क्यों नहीं पड़ती, बताओ तो?'' मैंने गौर से देखा कि पास ही दाहिनी ओर हम दोनों की अस्पष्ट छाया एक होकर मिल गयी है। मैंने कहा, ''चीज होती है तो छाया पड़ती है- शायद अब वह नहीं है।''
''पहले थी?''
''ध्याहन से नहीं देखा, कुछ याद नहीं पड़ता।''
राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, ''मुझे याद पड़ता है-नहीं थी। थोड़ी उमर से ही उसे देखना सीख गयी थी।'' यह कहते हुए उसने परितृप्ति की साँस लेकर फिर कहा, ''आज का दिन मुझे बहुत ही अच्छा लगा है। मालूम होता है इतने दिनों बाद मुझे एक साथी मिला है।'' यह कहकर उसने मेरी ओर देखा। मैंने कुछ कहा नहीं, पर मन-ही-मन यह निश्चित समझ लिया कि उसने बिल्कुषल सच कहा है।
घर जा पहुँचा। पर पैर धोने की छुट्टी न मिली। शान्ति और तृप्ति दोनों ही एक साथ गायब हो गयी। देखा कि बाहर का ऑंगन आदमियों से भरा हुआ है; दस-पन्द्रह आदमी बैठे हैं जो हमें देखते ही उठ खड़े हुए। रतन शायद अब तक व्याख्यान झाड़ रहा था, उसका चेहरा उत्तेजना और निगूढ़ आनन्द से चमक रहा था। वह पास आकर बोला, ''माँजी, मैं बार-बार जो कहता था, वही बात हुई।''
राजलक्ष्मी ने अधीर भाव से कहा, ''क्या कहता था मुझे याद नहीं, फिर से बता।''
रतन ने कहा, ''नवीन को थाने के लोग हथकड़ी डालकर कमर बाँध के ले गये हैं।''
''बाँध के ले गये हैं? क्या किया था उसने?''
''मालती को एकदम मार डाला है।''
''कह क्या रहा है तू?''
राजलक्ष्मी का चेहरा एकबारगी फक पड़ गया।
मगर बात खतम होते न होते बहुत-से लोग एक साथ कह उठे, ''नहीं, नहीं माता-रानी एकदम मार नहीं डाला। खूब मारा तो जरूर है, पर जान से नहीं मारा।''
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: हिन्दी उपन्यास – श्रीकांत – लेखक – शरतचन्द्र

Post by Jemsbond » 11 Jan 2017 17:29


रतन ने ऑंखें तरेरकर कहा, ''तुम लोग क्या जानते हो? उसको अस्पताल भेजना होगा, लेकिन उसका पता नहीं, ढूँढे मिल नहीं रही है। न जाने कहाँ गयी। तुम सबके हाथ हथकड़ी पड़ सकती है, जानते हो?''
सुनते ही सबके मुँह सूख गये। किसी-किसी ने सटकने की भी कोशिश की। राजलक्ष्मी ने रतन की तरफ बड़ी निगाह से देखते हुए कहा, ''तू उधर जाकर खड़ा हो, चल। जब पूछूँ? तब बताना। भीड़ के अन्दर मालती का बूढ़ा बाप फक चेहरा लिये खड़ा था; हम सभी उसे पहिचानते थे, इशारे से उसे पास बुलाकर पूछा, ''क्या हुआ है विश्वनाथ सच-सच तो बताओ। छिपाने से या झूठ बोलने से विपत्ति में पड़ सकते हो।''
विश्वनाथ जो कुछ कहा, उसका संक्षिप्त सार यह है-कल रात से मालती अपने बाप के घर थी। आज दोपहर को वह तालाब में पानी भरने गयी थी। उसका पति नवीन वहीं कहीं छिपा हुआ था। मालती को अकेली पाकर उसने उसे खूब मारा- यहाँ तक कि सिर फोड़ दिया। मालती रोती हुई पहले यहाँ आई, पर हम लोगों से भेंट न हुई, तो वह गयी कुशारीजी की खोज में कचहरी। वहाँ उनसे भी मुलाकात न हुई, तो फिर वह सीधी चली गयी थाने में। वहाँ मारने-पीटने के निशान दिखाकर पुलिस को अपने साथ ले आई और नवीन को पकड़ा दिया। वह उस समय घर ही पर था, अपने हाथ से मुट्ठी-भर चावल उबालकर खाने बैठ रहा था, लिहाजा उसे भागने का भी मौका न मिला। दरोगा साहब ने लात मारकर उसका भात फेंक दिया, और फिर वे उसे बाँधकर ले गये।
हाल सुनकर राजलक्ष्मी के नीचे से लेकर ऊपर तक आग-सी लग गयी। उसे मालती जैसे देखे न सुहाती थी, वैसे नवीन पर भी वह खुश न थी। मगर उसका सारा गुस्सा आकर पड़ा, मेरे ऊपर। क्रुद्ध कण्ठ से बोली, ''तुमसे सौ-सौ बार कहा है कि इन नीचों के गन्दे झगड़ों में मत पड़ा करो। जाओ, अब सम्हालो जाकर, मैं कुछ नहीं जानती।'' इतना कहकर वह और किसी तरफ बिना देखे जल्दी से भीतर चली गयी। कहती गयी कि ''नवीन को फाँसी ही होनी चाहिए। और वह हरामजादी अगर मर गयी हो तो आफत चुकी!''
कुछ देर के लिए हम सभी लोग मानो जड़वत् हो रहे। फटकार खाकर मुझे ऐसा मालूम होने लगा कि कल इतने ही वक्त मध्यआस्थ होकर मैंने जो इनका फैसला कर दिया था, सो अच्छा नहीं किया। न करता तो शायद आज यह दुर्घटना न होती। परन्तु मेरा अभिप्राय तो अच्छा ही था। सोचा था कि प्रेमलीला का जो अदृश्य स्रोत भीतर-ही-भीतर प्रवाहित होकर सारे मुहल्ले को निरन्तर गँदला कर रहा है, उसे मुक्त कर देने से शायद अच्छा ही होगा। अब देखता हूँ कि मैंने गलती की थी। परन्तु इसके पहले सारी घटना को ज़रा विस्तार के साथ कह देने की जरूरत है। मालती नवीन डोम की स्त्री तो जरूर है, पर यहाँ आने के बाद से देखा है कि डोमों के मुहल्ले-भर में वह एक आग की चिनगारी-सी है। कब किस परिवार में वह आग लगा देगी, इस सन्देह से किसी भी स्त्री के मन में शान्ति नहीं। यह युवती देखने में जैसी सुन्दरी है, स्वभाव की भी उतनी ही चपल है। वह चमकीली बिं‍दी लगाती है, नींबू का तेल डालकर जूड़ा बाँधती है, चौड़ी काली किनारी की मिल की साड़ी पहिनती है, राह-घाट में उसका माथे का घूँघट खिसककर कन्धों तक उतर आता है- उसकी उसे कोई परवाह नहीं रहती। इस मुखरा अल्हड़ लड़की के मुँह के सामने किसी को कुछ परवाह नहीं रहती। इस मुखारा अल्हड़ लड़की के मुँह के सामने किसी को कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ती, मगर पीछे-पीछे मुहल्ले की स्त्रियाँ उसके नाम के साथ जो विशेषण जोड़ा करती हैं उनका यहाँ उल्लेख नहीं किया जा सकता। पहले तो सुनने में आया कि मालती ने नवीन के साथ घर-गिरस्ती करने से इनकार ही कर दिया था, और वह मायके में ही रहा करती थी। कहा करती थी कि वह मुझे खिलाएगा क्या? और इसी धिक्कार के कारण ही, शायद, नवीन देश छोड़कर किसी शहर को चला गया था और वहाँ पियादे का काम करने लगा था। साल-भर हुआ, वह गाँव को लौटा था। शहर से आते वक्त वह मालती के लिए चाँदी की पौंची, महीन सूत की साड़ी- रेशम का फीता, एक बोतल गुलाब-जल और टीन का ट्रंक साथ लेता आया था और उन चीजों के बदले वह स्त्री को अपने ही नहीं लाया, बल्कि उसके हृदय पर भी उसने अपना अधिकार जमा लिया। मगर, यह सब मेरी सुनी हुई बातें है। फिर कब उसे स्त्री पर सन्देह जाग उठा, कब वह तालाब जाने के रास्ते आड़ में छिपकर सब देखने लगा, और उसके बाद जो कुछ शुरू हो गया, सो मैं ठीक नहीं जानता। हम लोग तो जबसे आये हैं तभी से देख रहे हैं कि इस दम्पति का वाग्युद्ध और हस्त-युद्ध एक दिन के लिए भी कभी मुल्तबी नहीं रहा। सिर-फुड़ौवल सिर्फ आज ही नहीं; और भी दो-एक दफा हो चुका है-शायद इसीलिए आज नवीन मण्डल अपनी स्त्री का सिर फोड़ आने पर भी निश्चिन्त चित्त से खाने बैठ रहा था। उसने कल्पना भी न की थी कि मालती पुलिस बुलाकर उसे बँधवाकर चालान करवा देगी। की सबेरे ही प्रभाती रागिणी की तरह मालती के तीक्ष्ण कण्ठ ने जब गगन-वेध करना शुरू कर दिया, तब राजलक्ष्मी ने घर का काम छोड़कर मेरे पास आकर कहा, ''घर के ही पास रोज इस तरह का लड़ाई-दंगा सहा नहीं जाता- न हो तो कुछ रुपये-पैसे देकर इस अभागी को कहीं बिदा कर दो।''
मैंने कहा, ''नवीन भी कम पाजी नहीं है। काम-काज कुछ करेगा नहीं, सिर्फ जुल्फें सँवारकर मछली पकड़ता फिरेगा, और हाथ में पैसा आते ही ताड़ी पीकर मार-पीट शुरू कर देगा।'' कहने की जरूरत नहीं कि यह सब शहर से सीख आया था।
''दोनों ही एक-से हैं।'' कहकर राजलक्ष्मी भीतर चली गयी। कहती गयी, ''काम-काज करे तो कब? हरामजादी छुट्टी दे तब न!''
वास्तव में, असह्य हो गया था; इनकी गाली-गलौज और मार-पीट का मुकद्दमा मैंने और भी दो-एक बार किया है, पर जब कोई फल नहीं हुआ तब सोचा कि खाना-पीना हो जाने के बाद बुलवाकर आज आखिरी कर दूँगा। पर बुलाना न पड़ा, दोपहर को ही मुहल्ले के स्त्री-पुरुषों- से घर भर गया। नवीन ने कहा, ''बाबूजी, उसको मैं नहीं चाहता- बिगड़ी हुई औरत है। वह मेरे घर से निकल जाय।''
मुखरा मालती ने घूँघट के भीतर से कहा, ''वह मेरा साँखा-नोआ¹ खोल दे।''
नवीन ने कहा, ''तू मेरी चाँदी की पौंची लौटा दे।''
मालती ने उसी वक्त अपने हाथों से पौंची उतारकर फेंक दी।
नवीन ने उसे उठाकर कहा, ''मेरा टीन का बकस भी तू नहीं रख सकती।''
मालती ने कहा, ''मैं नहीं जानती।'' यह कहकर उसने ऑंचल से चाबी खोलकर उसे पैरों के पास फेंक दी।
नवीन ने इस पर वीर-दर्प के साथ आगे बढ़कर मालती के 'साँखा' पट-पट करके तोड़ दिये; और 'नोआ' खोलकर दीवार के उस तरफ फेंक दिया। बोला, ''जा, तुझे विधवा कर दिया।''
मैं अवाक् हो गया! एक वृद्ध ने तब मुझे समझाया कि ऐसा किये बिना मालती दूसरा निकाह जो नहीं कर सकती- सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है।
बातों ही बातों में घटना और भी विशद हो गयी। विश्वेश्वर के बड़े दामाद का भाई आज छै महीने से दौड़-धूप कर रहा है। उसकी हालत अच्छी है, विशू को वह बीस रुपये नगद देगा और मालती को उसने छड़े, चाँदी की चूड़ियाँ और सोने की नथ देने के लिए कहा है- यहाँ तक कि ये चीजें उसने विशू के हवाले कर भी दी हैं।
¹ शंख और लोहे की बनी एक प्रकार की चूड़ी जो बंगालियों में सुहाग का चिह्न समझी जाती है।
सुनकर सारी घटना मुझे बहुत ही भद्दी मालूम हुई। अब इसमें सन्देह न रहा कि कुछ दिनों से एक बीभत्स षडयन्त्र चल रहा है, और मैंने उसमें शायद बिना जाने मदद ही की है। नवीन ने कहा, ''मैं भी यही चाहता था। शहर में जाकर अब मजे से नौकरी करूँगा- तेरी जैसी बीसों शादी के लिए तैयार हैं। गंगामाटी का हरी मण्डल तो अपनी लड़की के लिए न जाने कब से खुशामद कर रहा है- उसके पैरों की धूल भी तू नहीं है।'' यह कहकर वह अपनी चाँदी की पौंची और ट्रंक की चाबी अण्टी में लगाकर चल दिया। इतनी उछल-कूद करने पर भी उसका चेहरा देखकर मुझे ऐसा नहीं मालूम हुआ कि उसकी शहर की नौकरी या हरी मण्डल की लड़की इन दोनों में से किसी की भी आशा ने उसके भविष्य को काफी उज्ज्वल कर दिया है।
रतन ने आकर कहा, ''बाबूजी, माँजी ने कहा है कि इन सब गन्दे झगड़ों को घर से निकाल बाहर कीजिए।''
मुझे करना कुछ भी न पड़ा, विश्वेश्वर अपनी लड़की को लेकर उठ खड़ा हुआ; और इस डर से कि कहीं वह मेरे चरणों की धूल लेने न आ जाय, मैं झटपट घर के भीतर चला गया। मैंने सोचने की कोशिश की कि खैर, जो हुआ सो अच्छा ही हुआ। जब कि दोनों का मन फट गया है, और दूसरा उपाय जबकि है, तब व्यर्थ के क्रोध से रोजमर्रा मार-पीट और सिर-फुड़ौवल करके दाम्पत्य निभाने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा हुआ।
परन्तु आज सुनन्दा के घर से लौटने पर सुना कि कल का फैसला कतई अच्छा नहीं हुआ। सद्य:-विधवा मालती पर से नवीन ने, अपना अधिकार पूर्णत: हटा लेने पर भी मार-पीट का अधिकार अब भी नहीं छोड़ा है। वह इस मुहल्ले से उस मुहल्ले में जाकर शायद सबेरे से ही छिपा हुआ बाट देख रहा होगा और अकेले में मौका पाते ही ऐसी दुर्घटना कर बैठा है। पर मालती कहाँ गयी?
सूर्य अस्त हो गया। पश्चिम के जंगल से मैदान की तरफ देखता हुआ सोच रहा था कि जहाँ तक सम्भव है, मालती पुलिस के डर के मारे कहीं छिप गयी होगी-मगर नवीन को जो उसने पकड़वा दिया, सो अच्छा ही किया।
राजलक्ष्मी संध्या-प्रदीप हाथ में लिये कमरे में आयी और कुछ देर ठिठककर खड़ी रही, पर कुछ बोली नहीं। चुपके से निकलकर बगल के कमरे की चौखट पर उसने पैर रखा ही था कि किसी एक भारी चीज के गिरने के शब्द के साथ-साथ वह अस्फुट चीत्कार कर उठी। दौड़कर पहुँचा, तो देखता हूँ कि एक बड़ी कपड़े की पोटली-सी दोनों हाथ बढ़ाकर उसके पैर पकड़े अपना सिर धुन रही है। राजलक्ष्मी के हाथ का दीआ गिर जाने पर भी जल रहा था, उठाकर देखते ही वही महीन सूत की चौड़ी काली किनारी की साड़ी दिखाई दी।
कहा, ''यह तो मालती है।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''अभागी कहीं की, शाम के वक्त मुझे छू दिया। ऐं! यह कैसी आफत है!''
दीआ के उजाले में गौर से देखा कि उसके माथे की चोट में से फिर खून गिर रहा है और राजलक्ष्मी के पैर लाल हुए जा रहे हैं, और साथ ही अभागिन का रोना मानो सहस्र धाराओं में फटा पड़ रहा है; कह रही है, ''माँजी बचाओ मुझे-बचाओ-''
राजलक्ष्मी ने कटु स्वर में कहा, ''क्यों, अब तुझे और क्या हो गया?''
उसने रोते हुए कहा, ''दरोगा कहता है कि कल सबेरे ही उसका चालान कर देगा- चालान होते ही पाँच साल की कैद हो जायेगी।''
मैंने कहा, ''जैसा काम किया है वैसी सजा भी तो मिलनी चाहिए!''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''हो न जाने दे उसे कैद, इससे तुझे क्या?''
लड़की का रोना मानो जोर की ऑंधी की तरह एकाएक छाती फाड़कर निकल पड़ा। बोली, ''बाबूजी कहते हैं तो उन्हें कहने दीजिए, पर माँजी ऐसी बात तुम मत कहो- उनके मुँह का कौर तक मैंने निकलवा लिया है।''
कहते-कहते वह फिर सिर धुनने लगी- बोली, ''माँजी, अबकी बार तुम हम लोगों को बचा लो, फिर तो कहीं परदेश जाकर भीख माँगकर गुजर करूँगी, पर तुम्हें तंग न करूँगी। नहीं तो तुम्हारे ही ताल में डूब के मर जाऊँगी।''
सहसा राजलक्ष्मी की दोनों ऑंखों से ऑंसुओं की बड़ी-बड़ी बूँदें टपकने लगीं; उसने धीरे से उसके बालों पर हाथ रखकर रुँधे हुए गले से कहा, ''अच्छा, अच्छा, तू चुप रह- मैं देखती हूँ।''
सो उसी को देखना पड़ा। राजलक्ष्मी के बकस से दो सौ रुपये रात को कहाँ गायब हो गये, सो कहने की जरूरत नहीं; पर दूसरे दिन सबेरे से ही नवीन मण्डल
या मालती दोनों में से किसी की भी फिर गंगामाटी में शकल देखने में नहीं आयी।
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उनके विषय में सभी ने सोचा कि जाने दो, जान बची। राजलक्ष्मी को ऐसे तुच्छ विषयों पर ध्या न देने की फुरसत न थी; वह दो ही चार दिन में सब भूल गयी; और याद भी करती तो क्या याद करती सो वही जाने। मगर इतना तो सभी ने सोच लिया कि मुहल्ले से एक पाप दूर हुआ, सिर्फ एक रतन ही खुश न हुआ। वह बुद्धिमान ठहरा, सहज में अपने मन की बात व्यक्त नहीं करता; पर उसके चेहरे को देखकर मालूम होता था कि इस बात को उसने कतई पसन्द नहीं किया। उसके हाथ से मध्यकस्थ बनने और शासन करने का मौका निकल गया, और मालकिन के घर से रुपया भी गया- इतना बड़ा एक समारोह-काण्ड एक ही रात में न जाने कैसे और कहाँ होकर गायब हो गया, पता ही न लगा। कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि इससे उसने अपने को ही अपमानित समझा; और यहाँ तक कि वह अपने को आहत-सा समझने लगा। फिर भी वह चुप रहा। और घर की जो मालकिन थीं, उनका तो ध्या न ही और तरफ था। ज्यों-ज्यों दिन बीतने लगे, उन पर सुनन्दा का और उससे मन्त्र-तन्त्र की उच्चारण-शुद्धि सीखने का लोभ सवार होता गया। किसी भी दिन वहाँ जाने में उसका नागा न होता। वहाँ वह कितना धर्म-तत्व और ज्ञान प्राप्त किया करती थी, सो मैं कैसे जान सकता हूँ? मुझे सिर्फ उसका परिवर्तन मालूम पड़ रहा था। वह जैसा दुरत था वैसा ही अचिन्तनीय। दिन का खाना मेरा हमेशा से ही जरा देर से हुआ करता था। यह ठीक है कि राजलक्ष्मी बराबर आपत्ति ही करती आई हैं, कभी उसने अनुमोदन नहीं किया- परन्तु उस त्रुटि को दूर करने के लिए मैंने कभी रंचमात्र कोशिश नहीं की। मगर आजकल इत्तिफाक से अगर किसी दिन ज्यादा देर हो जाती, तो मैं खुद ही मन-ही-मन लज्जित हो जाता। राजलक्ष्मी कहती, ''तुम कमजोर आदमी हो, इतनी देर क्यों कर लेते हो? अपने शरीर की तरफ नहीं देखते तो कम-से-कम नौकर-चाकरों की तरफ ही देख लेना चाहिए। तुम्हारे आलस से वे जो मारे जाते हैं!'' बातें पहले की सी ही हैं पर ठीक वैसी नहीं हैं। वह सन्देह प्रश्रय का स्वर मानो अब नहीं बजता- बल्कि अब तो विरक्ति की एक कटुता बजा करती है जिसकी निगूढ़ झनझनाहट को, नौकर-चाकरों की तो बात ही छोड़ दो, मेरे सिवा भगवान के कान तक भी पकड़ने को समर्थ नहीं। इसी से भूख न लगने पर भी नौकर-चाकरों का मुँह देखकर मैं झटपट किसी तरह नहा-खाकर उन्हें छुट्टी दे देता था। मेरे इस अनुग्रह पर नौकर-चाकरों का आग्रह था या उपेक्षा सो तो वे ही जानें; पर राजलक्ष्मी को देखता कि दस-पन्द्रह मिनट के अन्दर ही वह घर से निकल जाया करती है। किसी दिन रतन और किसी दिन दरबान उसके साथ जाता और किसी दिन देखता कि आप अकेली ही चल दी है; इनमें से किसी के लिए ठहरे रहने की उसे फुरसत नहीं। पहले दो-चार दिन तक तो मुझसे साथ चलने के लिए आग्रह किया गया; परन्तु उन्हीं दो-चार दिनों में समझ में आ गया कि इससे किसी भी पक्ष को सुविधा न होगी। हुई भी नहीं। अतएव मैं अपने निराले कमरे में पुराने आलस्य में, और वह अपने धर्म-कर्म और मन्त्र-तन्त्र की नवीन उद्दीपना में, निमग्न हो क्रमश: मानो एक दूसरे से पृथक होने लगे।
मैं अपने खुले जंगले से देखा करता कि वह धूप से तपे हुए सूखे मैदान के रास्ते से जल्दी-जल्दी कदम रखती हुई मैदान पार हो रही है। इस बात को मैं समझता था कि अकेले पड़े-पड़े मेरा सारा दोपहर किस तरह कटता होगा, इस ओर ध्या न देने का उसे अवकाश नहीं है, फिर भी जितनी दूर तक ऑंखों से उसका अनुकरण किया जा सकता है, उतना किये बिना मुझसे न रहा जाता। टेढ़ी-मेढ़ी पगडण्डियों से उसकी विलीयमान देह-लता धीरे-धीरे दूरान्तराल में जाकर कब गायब हो जाती-कितने ही दिन तो उस समय तक को मेरी ऑंखें न पकड़ पातीं, मालूम होता कि उसका वह एकान्त सुपरिचित चलना मानो तब तक खत्म नहीं हुआ- मानो वह चलती ही जा रही है। सहसा चेतना होती तब शायद ऑंखें पोंछकर और एक बार अच्छी तरह देखकर फिर बिस्तर पर पड़ रहता। किसी-किसी दिन कर्महीनता की दु:सह क्लान्ति के कारण सो भी जाता-नहीं तो ऑंखें मींचकर चुपचाप पड़ा रहता। पास के कुछ भौंड़ी सूरत के बबूल के पेड़ों पर घुग्घू बोला करते और उनके साथ-ही-साथ स्वर मिलाकर मैदान की गरम हवा आसपास के डोमों के बाँस-झाड़ों में फँसकर ऐसी एक व्यथा-भरी दीर्घ निश्वास लेती रहती कि मुझे भ्रम हो जाता कि शायद वह मेरे हृदय में से ही निकल रही है। डर लगता कि शायद इस तरह अब ज्यादा दिन न सहा जायेगा।
रतन घर रहता तो बीच-बीच में दबे पाँव मेरे कमरे में आकर कहता, ''बाबू, हुक्का भर लाऊँ?'' कितने ही दिन ऐसा हुआ है कि जागते हुए भी मैंने उसकी बात का जवाब नहीं दिया है, सो जाने का बहाना करके चुप रह गया हूँ; क्योंकि डरता था कि कहीं उसे मेरे चेहरे पर से मेरी इस वेदना का आभास न मिल जाय। रोज की तरह उस दिन भी राजलक्ष्मी जब सुनन्दा के घर चली गयी, तब सहसा मुझे बर्मा की याद आ गयी और बहुत दिनों बाद मैं अभया को चिट्ठी लिखने बैठ गया। तबीयत हुई कि जिस फर्म में मैं काम करता था उसके बड़े साहब को भी एक चिट्ठी लिखकर खबर मँगाऊँ। मगर क्या खबर मँगाऊँ, क्यों मँगाऊँ, और मँगाकर क्या करूँगा, ये सब बातें तब भी मैंने नहीं सोची। सहसा मालूम हुआ कि खिड़की के सामने जो स्त्री घूँघट काढ़े जल्दी-जल्दी कदम रखती हुई चली गयी है उसे जैसे मैं पहिचानता हूँ- जैसे वह मालती-सी है। उठ के झाँककर देखने की कोशिश की मगर, कुछ दिखाई नहीं दिया। उसी क्षण उसके ऑंचल की लाल किनारी हमारे मकान की दीवार के कोने में जाकर बिला गयी।
महीने-भर का व्यवधान पड़ जाने से डोमों की उस शैतान लड़की को एक तरह से सभी कोई भूल गये थे, सिर्फ मैं ही न भूल सका था। मालूम नहीं क्यों, मेरे मन के एक कोने में, उस उच्छृंखल लड़की के उस दिन शाम को निकले हुए ऑंसुओं का गीला दाग ऐसा बैठा गया था कि अब तक नहीं सूखा। अकसर मुझे खयाल हुआ करता कि न जाने वे दोनों कहाँ होंगे। जानने की तबीयत होती कि इस गंगामाटी के बुरे प्रलोभन और कुत्सित षडयन्त्र के वेष्टन के बाहर अपने पति के पास रहकर उस लड़की के कैसे दिन कट रहे हैं। चाहा करता कि यहाँ वे अब जल्दी न आवें। वापस आकर चिट्ठी खतम करने बैठ गया; कुछ ही पंक्तियाँ लिख पाया था कि पीछे से पैरों की आहट पाकर मुँह उठाकर देखा तो रतन है। उसके हाथ में भरी हुई चिलम थी, वह उसे गड़गड़े के माथे पर रखकर उसकी नली मेरे हाथ में देते हुए बोला, ''बाबूजी, तमाखू पीजिए।''
मैंने गरदन हिलाकर कहा, ''अच्छा।''
मगर वह वहाँ से उसी वक्त नहीं चला गया। कुछ देर चुपचाप खड़ा रहकर परम गम्भीरता के साथ बोला, ''बाबूजी, यह रतन परमानिक¹ कब मरेगा, सिर्फ इतना ही मैं नहीं जानता!''
उसकी भूमिका से हम लोग परिचित थे, राजलक्ष्मी होती तो कहती, ''जानता तो अच्छा होता, लेकिन बता क्या कहना चाहता है?'' मैं सिर्फ मुँह उठाकर हँस दिया। मगर इससे रतन की गम्भीरता में जरा भी फर्क न आया; बोला, ''माँजी से मैंने उस दिन कहा था न कि छोटी जात की बातों में न आइए, उनके ऑंसुओं से पिघलकर दो सौ रुपयों पर पानी मत फेरिए। कहिए, कहा था कि नहीं?'' मुझे मालूम है कि उसने नहीं कहा। यह सदभिप्राय उसके मन में हो तो विचित्र नहीं, पर मुँह से कहने की हिम्मत उसे तो क्या, शायद मुझे भी न होती। मैंने कहा, ''मामला क्या है रतन?''
रतन ने कहा, ''मामला शुरू से जो जानता हूँ, वही है।''
मैंने कहा, ''मगर मैं, जब कि अब भी नहीं जानता, तब जरा खुलासा ही बता दे।''
रतन ने खुलासा करके ही कहा। सब बातें सुनकर मेरे मन में क्या हुआ, सो बताना कठिन है। सिर्फ इतना याद है कि उसकी निष्ठुर कदर्यता और असीम वीभत्सता के भार से सम्पूर्ण चित्त एकबारगी तिक्त और विवश-सा हो गया। कैसे क्या हुआ, उसका विस्तृत इतिहास रतन अभी तक इकट्ठा नहीं कर पाया है, परन्तु जितना सत्य उसने छानकर निकाला है उससे मालूम हुआ कि नवीन मोड़ल फिलहाल जेल में सजा काट रहा है और मालती अपने बहनोई के उस छोटे भाई को जो बड़ा आदमी है, साथी बनाकर गंगामाटी में रहने के लिए कल अपने मायके लौट आई है। मालती को अगर अपनी ऑंखों से देखता तो शायद इस बात पर विश्वास करना ही कठिन हो जाता कि राजलक्ष्मी के रुपयों की सचमुच ही इस प्रकार सद्गति हुई है।
उसी रात को मुझे खिलाते वक्त राजलक्ष्मी ने यह बात सुनी। सुनकर उसने आश्चर्य के साथ सिर्फ इतना कहा, ''कहता क्या है रतन, क्या यह सच्ची बात है? तब तो छुकड़िया ने उस दिन अच्छा तमाशा किया। रुपये तो यों ही गये ही- और बेवक्त मुझे नहला मारा सो अलग- यह क्या, तुम्हारा खाना हो गया क्या? इससे तो खाने बैठा ही न करो तो अच्छा।''
इन सब प्रश्नों के उत्तर देने की मैं कभी व्यर्थ कोशिश नहीं करता- आज भी चुप रहा। मगर, एक बात का मैंने अनुभव किया। आज नाना कारणों से मुझे बिल्कुनल ही भूख न थी, प्राय: कुछ भी न खाया था- इसी से आज के कम खाने की ओर उसकी दृष्टि आकर्षित कर ली; नहीं तो, कुछ दिनों से जो मेरी खुराक, धीरे-धीरे घट रही थी; उस पर उसकी दृष्टि ही नहीं पड़ी थी। इससे पहले इस विषय में उसकी दृष्टि इतनी तीक्ष्ण थी कि मेरे खाने-पीने में यदि जरा-सी भी कमी-वेशी होती तो उसकी आशंका और शिकायतों की सीमा न रहती- परन्तु, आज, चाहे किसी भी कारण से हो, एक की उस श्येन-दृष्टि के धुँधली हो जाने से दूसरे की गम्भीर वेदना को भी सबके सामने हाय-तोबा करके लांछित कर डालूँ, ऐसा भी मैं नहीं। इसी से, उछ्वसित दीर्घ-निश्वास को दबाकर मैं बिना कुछ जवाब दिये चुपके से उठ खड़ा हुआ।
मेरे दिए एक ही भाव से शुरू होते हैं और एक ही भाव से खत्म होते हैं। न आनन्द है, न कुछ वैचित्रय है, साथ ही किसी विशेष दु:ख-कष्ट की शिकायत भी नहीं! शरीर मामूली तौर से अच्छा ही है।
दूसरे दिन सबेरा हुआ। दिन चढ़ने लगा। यथी-रीति स्नानाहार करके अपने कमरे में जाकर बैठा। सामने वही खुला जँगला, और वैसा ही बाधाहीन उन्मुक्त शुष्क मैदान। पत्रा में आज शायद कोई विशेष उपवास की विधि बताई गयी थी, इससे राजलक्ष्मी को आज उतना समय नष्ट न करना पड़ा- यथासमय के कुछ पहले ही वह सुनन्दा के घर की ओर रवाना हो गयी। अभ्यास के अनुसार शायद मैं बहुत देर से उसी तरह जँगले के बाहर देख रहा था। सहसा याद आई कि कल की उन अधूरी दोनों चिट्ठियों को पूरा करके आज तीन बजने के पहले ही डाक में छोड़ना है। अतएव झूठमूठ को समय नष्ट न करके शीघ्र ही उस काम में जुट गया। चिट्ठियों को समाप्त करके जब पढ़ने लगा, तब न जाने कहाँ एक व्यथा-सी होने लगी, मन में न जाने कैसा होने लगा कि कुछ न लिखता तो अच्छा होता; हालाँकि बहुत ही साधारण चिट्ठी लिखी गयी थी, फिर भी बार-बार पढ़ने पर भी, कहाँ उसमें त्रुटि रह गयी पकड़ न सका। एक बात मुझे याद है। अभया की चिट्ठी में रोहिणी भइया को नमस्कार लिखकर अन्त में लिखा था कि ''तुम लोगों की बहुत दिनों से कोई खबर नहीं मिली। तुम लोग कैसे हो, कैसे तुम लोगों के दिन बीतते हैं सिर्फ कल्पना करने के सिवा, यह जानने की मैंने कोई कोशिश नहीं की। शायद सुख-चैन से हो, शायद न भी हो; परन्तु तुम लोगों की जीवन-यात्रा के इस पहलू को एक दिन मैंने भगवान पर छोड़ दिया था। तब अपनी इच्छा से उस पर जो पर्दा खींच दिया था- वह आज भी, वैसे ही लटक रहा है- उसे किसी दिन उठाने की इच्छा तक मैंने नहीं की। तुम्हारे साथ मेरी घनिष्ठता बहुत दिनों की नहीं, किन्तु, जिस अत्यन्त दु:ख से भीतर से एक दिन हम दोनों का परिचय आरम्भ और एक और दिन समाप्त हुआ था, उसे समय के माप से नापने की कोशिश हममें से किसी ने भी नहीं की। जिस दिन भयंकर रोग से पीड़ित था, उस दिन उस आश्रयहीन सुदूर विदेश में तुम्हारे सिवा और किसी के यहाँ जाने का मेरे लिए कोई स्थान ही न था। तब एक क्षण के लिए भी तुमने दुविधा नहीं की- सम्पूर्ण हृदय से इस पीड़ित को तुमने ग्रहण कर लिया। हालाँकि यह बात मैं नहीं कहता कि किसी बीमारी में, और कभी किसी ने वैसी सेवा करके मुझे नहीं बचाया; परन्तु आज बहुत दूर बैठा हुआ दोनों के प्रभेद का भी अनुभव कर रहा हूँ। दोनों की सेवा में, निर्भरता में, हृदय की अकपट शुभ कामना में, और तुम लोगों के निबि‍ड़ स्नेह में गम्भीर एकता मौजूद है; किन्तु तुम्हारे अन्दर ऐसा एक स्वार्थ लेशहीन सुकोमल निर्लिप्त-भाव और ऐसा अनर्विचनीय वैराग्य था, जिसने सिर्फ सेवा करके ही अपने आपको रीता कर दिया है, मेरे आरोग्य में उसने अपना जरा-सा चिह्न रखने के लिए एक कदम भी कभी आगे नहीं बढ़ाया, तुम्हारी यही बात रह-रहकर मुझे याद आ रही है। सम्भव है कि अत्यन्त स्नेह मुझसे झिलता नहीं, इसलिए- अथवा यह भी सम्भव है कि स्नेह का जो रूप एक दिन तुम्हारी ऑंखों और मुखड़े पर देखा था, उसी के लिए-सम्पूर्ण चित्त उन्मुक्त हो गया है। फिर भी, तुम्हें और एक बार ऑंखों से बिना देखे ठीक तरह से कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।''
साहब की चिट्ठी भी खत्म कर डाली। एक बार सचमुच ही उन्होंने मेरा बड़ा उपकार किया था। इसके लिए उन्हें अनेक धन्यवाद दिए। प्रार्थना कुछ भी नहीं की, मगर एक लम्बे अरसे के बाद सहसा गले पड़कर चिट्ठी में इस तरह धन्यवाद देने का आडम्बर रचकर मैं अपने आप ही शरमाने लगा। पता लिखकर चिट्ठी लिफाफे में बन्द करते हुए देखा कि वक्त निकल गया। इतनी जल्दी करने पर भी चिट्ठियाँ डाक में नहीं डाली जा सकीं; पर इससे मन क्षुण्ण न होकर मानो शान्ति का अनुभव करने लगा। सोचने लगा, यह अच्छा ही हुआ कि कल फिर एक बार पढ़ लेने का समय मिल जायेगा।
रतन ने आकर जताया कि कुशारी-गृहिणी आई हैं, और लगभग साथ-ही-साथ उन्होंने भीतर प्रवेश भी किया। मैं जरा चंचल-सा हो उठा, बोला, ''वे तो घर पर हैं नहीं, उनके लौटने में शायद शाम हो जायेगी।''
''सो मुझे मालूम है'' कहते हुए उन्होंने जँगले के ऊपर से एक आसन उतारा और स्वयं ही उसे जमीन पर बिछाकर उस पर बैठ गयीं। कहने लगीं, ''शाम ही क्यों, लौटने में करीब-करीब रात ही हो जाती होगी।''
लोगों के मुँह से सुना था कि धनाढ्य स्त्री होने से वे अत्यन्त दाम्भिक हैं। यों ही किसी के घर जाती-आती नहीं। इस घर के विषयों में भी उनका व्यवहार लगभग ऐसा ही है- कम-से-कम इतने दिनों से घनिष्ठता बढ़ाने के लिए कोई उत्सुकता प्रकट नहीं की गयी। इसके पहले सिर्फ दो बार और आई थीं। मालिकों का घर होने से एक बार वे खुद ही चली आई थीं और एक बार निमन्त्रण में आई थीं। परन्तु आज वे कैसे और क्यों सहसा अपने आप आ पहुँचीं, सो भी यह जानते हुए कि घर में कोई नहीं है- मैं कुछ सोच न सका।
वे आसन पर बैठकर बोलीं, ''आजकल छोटी बहू के साथ तो एकदम एक आत्मा हो रही हैं।''
अनजान में उन्होंने मेरे व्यथा के स्थान पर ही चोट की, फिर भी मैंने धीरे से कहा, ''हाँ, अकसर वहाँ जाया करती हैं।'' उन्होंने कहा, ''अकसर? नहीं, रोज-रोज! प्रत्येक दिन! मगर छोटी बहू भी कभी आपके घर आती है? एक दिन के लिए भी नहीं! मान्य का मान रक्खे ऐसी लड़की ही नहीं है सुनन्दा!'' यह कहकर वे मेरे चेहरे की तरफ देखने लगीं। मैंने एक के नित्य जाने की बात ही सिर्फ सोची है, किन्तु दूसरे के आने की बात तो कभी मेरे मन में उठी तक नहीं; इसलिए उनकी बात से मुझे धक्का-सा लगा। मगर उसका उत्तर क्या देता? सिर्फ इतना ही समझ में आया कि इनके आने का उद्देश्य कुछ साफ हो गया और एक बार ऐसा भी मालूम हुआ कि झूठा संकोच और ऑंखों का लिहाज छोड़-छाड़कर कह दूँ कि ''मैं अत्यन्त निरुपाय हूँ, इसलिए इस अक्षम व्यक्ति को शत्रु-पक्ष के विरुद्ध उत्तेजित करने से कोई लाभ नहीं।'' कहने से, क्या होता सो नहीं जानता, परन्तु न कहने का नतीजा यह निकला कि सारा का सारा उत्ताप और उत्तेजना उनकी ऑंखों की पलकों पर प्रदीप्त हो उठी। और कब, किसके क्या हुआ था, और किस तरह वह सम्भव हुआ था, इसी की विस्तृत व्याख्या में वे अपने श्वशुर-कुल का दसेक साल का इतिहास लगभग रोजनामचे की तरह अनर्गल बकती चली गयीं।
उनकी कुछ बातें सुनने के बाद ही मैं न जाने कैसा अन्यमनस्य-सा हो गया था। इसका कारण भी था। मैंने सोचा था कि इनकी बातों में सिवा इसके कि एक तरफ अपने पक्ष का स्तुतिवाद-दया, दाक्षिण्य, तितिक्षा आदि जो कुछ भी शास्त्रोक्त सद्गुणावली मनुष्य-जन्म में सम्भव हो सकती है, उन सबकी विस्तृत आलोचना- और दूसरी तरफ उसके विपरीत जितना भी कुछ आरोप हो सकता है, सन्, तारीख, महीना और अड़ोसी-पड़ोसियों की गवाहियों के सहित उन सबका विशद वर्णन हो, ओर हो ही क्या सकता है? शुरू में थी भी यही बात- परन्तु सहसा उनके कण्ठ-स्वर के आकस्मिक परिवर्तन से उनकी तरफ मेरा ध्या न आकर्षित हुआ। मैंने ज़रा विस्मित होकर ही पूछा, ''क्या हुआ है?'' वे क्षण-भर मेरे चेहरे की तरफ देखती रहीं, फिर रुँधे हुए गले से कहने लगीं, ''होने को अब बाकी क्या रहा है बाबू? सुना है कि कल शायद देवरजी खुद हाट में जाकर बैंगन बेच रहे थे।''
बात पर ठीक से विश्वास नहीं हुआ और मन चंगा होता तो शायद हँस भी पड़ता। मैंने कहा, ''अध्याुपक आदमी ठहरे वे, अचानक बैंगन उन्हें मिल कहाँ से गये, और बेचने गये तो क्यों?''
कुशारी-गृहिणी ने कहा, ''उसी अभागिनी की बदौलत। घर में ही शायद कुछ बैंगन पैदा हुए थे, इसी से उन्हें बेचने भेज दिया हाट में। इस तरह दुश्मनी निभाने से भला गाँव में कैसे टिका जा सकता है, बताइए?''
मैंने कहा, ''मगर इसे दुश्मनी निभाना क्यों कह रही हैं? वे तो आपकी किसी भी बात में हैं नहीं। तंगी आ गयी है, यदि अपनी चीज़ बेचने गये, तो इसमें आपको शिकायत क्यों हो?''
मेरी बात सुनकर वे विधल की भाँति मेरी ओर देखती रहीं, फिर बोलीं, ''अगर आपका यही फैसला है तो मुझे आगे कुछ भी कहने को नहीं है, और न मालिक के सामने मेरी कोई फर्याद ही है- मैं जाती हूँ।''
कहते-कहते अन्त में कण्ठ बिल्कुील रुक-सा आया, यह देखकर मैंने धीरे-से कहा, ''इससे तो बल्कि आप अपनी मालकिनजी से कहें तो ठीक हो, शायद आपकी बातें समझ भी सकेंगी, और आपका उपकार भी कर सकेंगी।''
वे सिर हिलाकर कह उठीं, ''अब मैं किसी से कुछ नहीं कहना चाहती, और किसी को मेरा उपकार करने की जरूरत भी नहीं।'' यह कहकर सहसा उन्होंने अपने ऑंचल से ऑंखों को पोंछते हुए कहा, ''शुरू-शुरू में वे कहा करते थे कि महीने-दो महीने बीतने दो, आप ही लौट आएगा। उसके बाद हिम्मत बँधाया करते थे कि बनी न रहो और दो-एक महीने चुपचाप, सब सुधर जायेगा-पर ऐसी ही झूठी आशा में यह दूसरा साल लगना चाहता है। लेकिन कल जब सुना कि ऑंगन में लगे हुए बैंगन तक बेचने की नौबत आ गयी, तब फिर किसी की बातों पर मुझे भरोसा न रहा। अभागी सारी गृहस्थी को तहस-नहस कर डालेगी, पर उस घर में पाँव न रक्खेगी। बाबू, औरत की जात ऐसी पत्थर-सी हो सकती है, यह मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।''
वे फिर कहने लगीं, ''वे उसे कभी नहीं पहिचान सके, मगर मैं पहिचान गयी थी। शुरू-शुरू मैं इसका उसका नाम लेकर छिपा-छिपाकर चीज़-वस्तु भेजा करती थी, वे कहा करते कि सुनन्दा जान-बूझकर ही लेती है- लेकिन ऐसा करने से उसका दिमाग़ ठिकाने न आएगा। मैंने भी सोचा कि शायद ऐसा ही हो। मगर एक दिन सब भ्रम दूर हो गया। न मालूम कैसे उसे पता लगा, सो मैंने जो कुछ भिजवाया था, सबका सब एक आदमी के सिर पर लादकर वह मेरे ऑंगन में फेंक गयी। मगर इससे भी उन्हें होश न आया- मैं ही समझी।''
अब आकर उनके मन की बात मेरी समझ में आई। मैंने सदय कण्ठ से कहा, ''अब आप क्या करना चाहती हैं?- अच्छा, वे क्या आप लोगों के विरुद्ध कोई बात या किसी तरह की शत्रुता निभाने की कोशिश कर रहे हैं?''
कुशारी-गृहिणी ने फिर एक बार रोकर अपनी तकदीर ठोकते हुए कहा, ''फूटी तकदीर। तब तो कोई उपाय भी निकल आता। उसने हम लोगों को ऐसा छोड़ दिया है कि मानो कभी उसने हम लोगों को ऑंखों से देखा तक न हो, नाम भी न सुना हो। ऐसी कठोर, ऐसी पत्थर है वह। हम दोनों को सुनन्दा अपने माँ-बाप से भी ज्यादा चाहती थी; पर जिस दिन से उसने सुना कि उसके जेठ की सम्पत्ति पाप की सम्पत्ति है, उसी दिन से उसका सारा हृदय जैसे पत्थर का हो गया। पति-पुत्र को लेकर वह दिन-पर-दिन सूख-सूख के मर जायेगी, पर उसमें से दमड़ी भी न छुएगी। लेकिन बताइए भला, इतनी बड़ी जायदाद क्या यों ही बहा दी जा सकती है बाबू? वह ऐसी दया-माया-शून्य है कि बाल-बच्चों के साथ बिना खाए-पिए भूखों भी रह सकती है, मगर हम तो ऐसा नहीं कर सकते।''
क्या जवाब दूँ, कुछ सोच न सका, सिर्फ आहिस्ते से बोला, ''अजीब औरत है।''
दिन उतरता जा रहा था, कुशारी-गृहिणी चुपचाप गरदन हिलाकर मेरी बात का समर्थन करती हुई उठ खड़ी हुईं। फिर सहसा दोनों हाथ जोड़कर कह उठीं, ''सच कहती हूँ बाबू, इनके बीच में पड़कर मेरी छाती के मानो टुकड़े हुए जा रहे हैं। लेकिन, इधर सुनने में आया है कि वह बहूजी का कहना बहुत मानती है, क्या कोई उपाय नहीं हो सकता? मुझसे तो अब नहीं सहा जाता।''
मैं चुप बना रहा। वे भी और कुछ न कह सकीं-उसी तरह ऑंसू पोंछते चुपचाप बाहर चली गयीं।
मनुष्य की परलोक की चिन्ता में शायद पराई चिन्ता के लिए कोई स्थान नहीं। नहीं तो, मेरे खाने-पहरने की चिन्ता राजलक्ष्मी छोड़ बैठी, इतना बड़ा आश्चर्य संसार में और क्या हो सकता है? इस गंगामाटी में आए ही कितने दिन हुए होंगे, इन्हीं कुछ दिनों में सहसा वह कितनी दूर हट गयी! अब मेरे खाने के बारे में पूछने आता है रसोइया और मुझे खिलाने बैठता है रतन। एक हिसाब से तो जान बची, पहले की सी जिद्दा-जिद्दी अब नहीं होती। कमजोरी की हालत में अब ग्यारह बजे के भीतर न खाने से बुखार नहीं आता। अब तो जो इच्छा हो वह, और जब चाहूँ तब, खाऊँ। सिर्फ रतन की बार-बार की उत्तेजना और महाराज की सखेद आत्म-भर्त्सना से अल्पाहार का मौका नहीं मिलता- वह बेचारा म्लान मुख से बराबर यही सोचा करता है कि उसके बनाने के दोष से ही मेरा खाना नहीं हुआ। किसी तरह इन्हें सन्तुष्ट करके बिस्तर पर जाकर बैठता हूँ। सामने वही खुला जँगला, और वही ऊसर प्रान्त की तीव्र तप्त हवा। दोपहर का समय जब सिर्फ इस छाया-हीन शुष्कता की ओर देखते-देखते कटना ही नहीं चाहता तब एक प्रश्न मुझे सबसे ज्यादा याद आया करता है, कि आखिर हम दोनों का सम्बन्ध क्या है? प्यार वह आज भी करती है, इस लोक में मैं उसका अत्यन्त अपना हूँ, परन्तु लोकान्तर के लिए मैं उसका उतना ही अधिक पराया हूँ। उसके धर्म-जीवन का मैं साथी नहीं हूँ- हिन्दू घराने की लड़की होकर इस बात को वह नहीं भूली है कि वहाँ मुझ पर दावा करने के लिए उसके पास कोई दलील नहीं, सिर्फ यह पृथ्वीा ही नहीं- इसके परे भी जो स्थान है, उसके लिए पाथेय सिर्फ मुझे प्यार करने से नहीं मिल सकेगा- यह सन्देह शायद उसके मन में खूब बड़े रूप में हो उठा है।

वह रही उन बातों को लेकर और मेरे दिन कटने लगे इस तरह। कर्महीन, उद्देश्यहीन जीवन का दिवारम्भ होता है श्रान्ति में, और अवसान होता है अवसन्न ग्लानि में। अपनी आयु की अपने ही हाथ से प्रतिदिन हत्या करते चलने के सिवा मानो दुनिया में मेरे लिए और कोई काम ही नहीं है। रतन आकर बीच-बीच में हुक्का दे जाता है, समय होने पर चाय पहुँचा देता है- बोलता-चालता कुछ नहीं। मगर उसका मुँह देखने से मालूम होता है कि वह भी अब मुझे कृपा की दृष्टि से देखने लगा है। कभी सहसा आकर कहता, ''बाबूजी, जँगला बन्द कर दीजिए, लू की लपट आती है।'' मैं कह देता, ''रहने दे।'' मालूम होता, न जाने कितने लोगों के शरीर के स्पर्श और कितने अपरिचितों के तप्त श्वासों का मुझे हिस्सा मिल रहा है। हो सकता है कि मेरा वह बचपन का मित्र इन्द्रनाथ आज भी जिन्दा हो, और यह उष्ण वायु अभी तुरन्त ही उसे छूकर आई हो। सम्भव है कि वह भी मेरी ही तरह बहुत दिनों के बिछुड़े हुए अपने सुख-दु:ख के बाल्य साथी की याद करता हो। और हम दोनों की वह अन्नीदा- जीजी! सोचता, शायद इतने दिनों में उसे समस्त दु:खों की समाप्ति हो गयी हो। कभी-कभी ऐसा मालूम होता कि इसी कोने में ही तो बर्मा देश है, हवा के लिए तो कोई रुकावट है नहीं, फिर कौन कह सकता है तक समुद्र पार होकर अभया का स्पर्श भी वह मेरे पास तक बहाती हुई नहीं ले आ रही है? अभया की बात याद आते ही कुछ ऐसा हो जाता है कि सहज में वह मेरे मन से निकलना ही नहीं चाहती। रोहिणी भइया शायद इस वक्त काम पर गये हैं और अभया अपने मकान का सदर दरवाजा बन्द करके सिलाई के काम में लगी हुई है। दिन में मेरी तरह वह सो नहीं सकती, शायद किसी बच्चे के लिए छोटी कँथड़ी, या उसकी तरह की किसी तकिये की खोल, या ऐसा ही कोई अपनी गृहस्थी का छोटा-मोटा काम कर रही है।
छाती के भीतर जैसे तीर-सा चुभ जाता। युग-युगान्तर से संचित संस्कार और युग-युगान्तर के भले-बुरे विचारों का अभिमान मेरे रक्त के अन्दर भी तो डोल-फिर रहा है- फिर कैसे मैं इसे निष्कपट भाव से 'दीर्घायु हो' कहकर आशीर्वाद दूँ! परन्तु, मन तो शरम और संकोच के मारे एकबारगी छोटा हुआ जाता है।
काम में लगी हुई अभया की शान्त प्रसन्न छवि मैं अपने हिये की ऑंखों से देख सकता हूँ। उसके पास ही निष्कलंक सोता हुआ बालक है। मानो हाल के खिले हुए कमल के समान शोभा और सम्पद से, गन्ध और मधु से, छलक रहा है। इस अमृत वस्तु की क्या जगत में सचमुच ही जरूरत न थी? मानव-समाज में मानव-शिशु का सम्मान नहीं, निमन्त्रण नहीं, स्थान नहीं, इसी से क्या घृणा भाव से उसको दूर कर देना होगा? कल्याण के धन को ही चिर-अकल्याण में निर्वासित कर देने की अपेक्षा मानव-हृदय का बड़ा धर्म क्या और है ही नहीं?
अभया को मैं पहचानता हूँ। इतना-भर पाने के लिए उसने अपने जीवन का कितना दिया है, सो और कोई न जाने, मैं तो जानता हूँ। हृदय की बर्बरता के साथ सिर्फ अश्रद्धा और उपहास करने से ही संसार में सब प्रश्नों का जवाब नहीं हो जाता। भोग! अत्यन्त स्थूल और लज्जाजनक देह का भोग! हो भी सकता है! अभया को धिक्कार देने की बात जरूर है!
बाहर की गरम हवा से मेरी ऑंखों के गरम ऑंसू पलक मारते ही सूख जाते। बर्मा से चले आने की बात याद आती। तब की बात जब कि रंगून में मौत के डर से भाई बहन को और लड़का बाप को भी ठौर न देता था, मृत्यु-उत्सव की उद्दण्ड मृत्यु-लीला शहर-भर में चालू थी- ऐसे समय जब मैं मृत्यु-दूत के कन्धों पर चढ़कर उसके घर जाकर उपस्थित हुआ, तब, नयी जमाई हुई घर-गृहस्थी की ममता ने तो उसे एक क्षण के लिए भी दुविधा में नहीं डाला। उस बात को सिर्फ मेरी आख्यायिका की कुछ पंक्तियाँ पढ़कर ही नहीं समझा जा सकता। मगर, मैं तो जानता हूँ कि वह क्या है! और भी बहुत ज्यादा जानता हूँ। मैं जानता हूँ, अभया के लिए कुछ भी कठिन नहीं है। मृत्यु!- वह भी उसके आगे छोटी ही है। देह की भूख, यौवन की प्यास- इन सब पुराने और मामूली शब्दों से उस अभया का जवाब नहीं हो सकता। संसार में सिर्फ बाहरी घटनाओं को अगल-बगल लम्बी सजाकर उससे सभी हृदयों का पानी नहीं नापा जा सकता।
काम-धन्धे के लिए पुराने मालिक के पास अर्जी भेजी है, भरोसा है कि वह नामंजूर न होगी। लिहाजा फिर हम लोगों की मुलाकात होगी। इस अरसे में दोनों तरफ बहुत-सा अघटन घट गया है। उसका भार भी मामूली नहीं, परन्तु उस भार को उसने इकट्ठा किया है अपनी असाधारण सरलता से और अपनी इच्छा से। और, मेरा भार इकट्ठा हुआ है उतनी ही बलहीनता से और इच्छा-शक्ति के अभाव से। मालूम नहीं, इसका रंग और चेहरा उस दिन आमने-सामने कैसा दिखाई देगा।
अकेले दिन-भर में जब मेरा जी हाँफने लगता, तब दिन उतरने के बाद जरा टहलने निकल जाता। पाँच-सात दिन से यह टहलना एक आदत में शुमार हो गया था। जिस धूल-भरे रास्ते से एक दिन गंगामाटी में आया था, उसे रास्ते से किसी-किसी दिन बहुत दूर तक चला जाता था। अन्यमनस्क भाव से आज भी उसी तरह जा रहा था, सहसा-सामने देखा कि धूल का पहाड़-सा उड़ाता हुआ कोई घुड़सवार दौड़ा चला आ रहा है। डरकर मैं रास्ता छोड़कर किनारे हो गया। सवार कुछ आगे बढ़ जाने के बाद रुका और लौटकर मेरे सामने खड़ा होकर बोला, ''आपका ही नाम श्रीकान्त बाबू है न? मुझे पहिचाना आपने?''
मैंने कहा, ''नाम मेरा यही है, मगर आपको तो मैं न पहिचान सका।''
वह घोड़े से उतर पड़ा। मैली-कुचैली फटी साहबी पोशाक पहने हुए उसने अपना पुराना सोले का हैट उतारते हुए कहा, ''मैं सतीश भारद्वाज हूँ। थर्ड क्लास से प्रमोशन मिलने पर सर्वे स्कूल में पढ़ने चला गया था, याद नहीं?''
याद आ गयी। मैंने खुश होकर कहा, ''कहते क्यों नहीं, तुम हमारे वही मेंढक हो! यहाँ साहब बने कहाँ जा रहे हो?''
मेंढक ने हँसकर कहा, ''साहब क्या अपने वश बना हूँ भाई! रेलवे कन्स्ट्रक्शन में सब-ओवरसियरी का काम करता हूँ, कुली चराने में ही जिन्दगी बीती जा रही है, हैट-कोट के बिना गुजर कहाँ? नहीं तो, एक दिन वे ही मुझे चराकर अलग कर दें। सोपलपुर में जरा काम था, वहीं से लौट रहा हूँ- करीब एक मील पर मेरा तम्बू है, साँइथिया से जो नयी लाइन निकल रही है, उसी पर मेरा काम है। चलोगे मेरे डेरे पर? चाय पीकर चले आना।''
नामंजूर करते हुए मैंने कहा, ''आज नहीं, और किसी दिन मौका मिला तो आऊँगा।''
उसके बाद मेंढक बहुत-सी बातें पूछने लगा। तबीयत कैसी रहती है, कहाँ रहते हो, यहाँ किस काम से आय हो, बाल-बच्चे कितने हैं, कैसे हैं, वगैरह-वगैरह।
जवाब में मैंने कहा, तबीयत ठीक नहीं रहती, रहता हूँ गंगामाटी में, यहाँ आने के बहुत से कारण हैं, जो अत्यन्त जटिल हैं। बाल-बच्चा कोई नहीं है, लिहाजा यह प्रश्न ही निरर्थक है।
मेंढक सीधा-साधा आदमी है। मेरा जवाब ठीक न समझ सकने पर भी, ऐसा दृढ़ संकल्प उसमें नहीं है कि दूसरे की सब बातें समझनी ही चाहिए। वह अपनी ही बात कहने लगा। जगह स्वास्थ्यकर है, साग-सब्जी मिलती है, मछली और दूध भी कोशिश करने पर मिल जाता है, पर यहाँ आदमी नहीं हैं, साथी-सँगी कोई नहीं। फिर भी विशेष तकलीफ नहीं, कारण शाम के बाद जरा नशा-वशा कर लेने से काम चल जाता है। साहब लोग कैसे भी हों, पर बंगालियों से बहुत अच्छे हैं- टेम्परेरी तौर पर एक ताड़ी का शेड खोला गया है-जितनी तबीयत आवे, पीओ। पैसे तो एक तरह से लगते ही नहीं समझ लो- सब अच्छा ही है- कन्स्ट्रक्शन में ऊपरी आमदनी भी है, और चाहूँ तो तुम्हारे लिए भी साहब से कह-सुनकर आसानी से एक नौकरी दिलवा सकता हूँ- इसी तरह की अपने-सौभाग्य की छोटी-बड़ी बहुत-सी बातें वह कहता रहा। फिर अपने गठियावाले घोड़े की लगाम पकड़े मेरे साथ-साथ वह बहुत दूर तक बकता हुआ चला। बार-बार पूछने लगा कि मैं कब तक उसके डेरे पर पधारूँगा, और मुझे भरोसा दिया कि पोड़ापाटी में उसे अकसर अपने काम से जाना पड़ता है, लौटते वक्त वह किसी दिन मेरे यहाँ गंगामाटी में जरूर हाजिर होगा।
इस दिन घर लौटने में मुझे जरा रात हो गयी। रसोइए ने आकर मुझसे कहा कि भौजन तैयार है। हाथ-मुँह धोकर कपड़े बदलकर खाने बैठा ही था कि इतने में राजलक्ष्मी की आवाज सुनाई दी। वह घर में आकर चौखट पर बैठ गयी, हँसती हुई बोली, ''मैं पहले से कहे देती हूँ, तुम किसी बात पर एतराज न कर सकोगे।''
मैंने कहा, ''नहीं, मुझे ज़रा भी एतराज नहीं।''
''किस बात पर, बिना सुने ही?''
मैंने कहा, ''जरूरत समझो तो कह देना किसी वक्त।''
राजलक्ष्मी का हँसता चेहरा गम्भीर हो गया, बोली, ''अच्छा।'' सहसा उसकी निगाह पड़ गयी मेरी थाली पर। बोली, ''अरे, भात खा रहे हो? जानते हो कि रात को तुम्हें भात झिलता नहीं- तुम क्या अपनी बीमारी न अच्छी करने दोगे मुझे, यही तय किया है क्या?''
भात मुझे अच्छी तरह ही झिल रहा था, मगर इस बात के कहने से कोई लाभ नहीं। राजलक्ष्मी ने तीव्र स्वर में आवाज दी, ''महाराज!'' दरवाजे के पास महाराज के आते ही उसे थाली दिखाते हुए राजलक्ष्मी ने पहले से भी अधिक तीव्र स्वर में कहा, ''यह क्या है? तुम्हें शायद हजार बार मना कर दिया है कि रात में बाबू को भात न दिया करो- जाओ, जुरमाने में एक महीने की तनखा कट जायेगी।'' मगर, इस बात को सभी नौकर-चाकर जानते थे कि रुपयों के रूप में जुर्माने के कुछ मानी नहीं होते, लेकिन फटकार के लिहाज़ से तो उसके मानी हैं ही। महाराज ने गुस्से में आकर कहा, ''घी नहीं है, मैं क्या करूँ?''
''क्यों नहीं है, सो मैं सुनना चाहती हूँ।''
उसने जवाब दिया, ''दो-तीन बार कहा है आपसे कि घी निबट गया है, आदमी भेजिए। आप न भेजें तो इसमें मेरा क्या दोष?''
घर-खर्च के लिए मामूली घी यहीं मिल जाता है, पर मेरे लिए आता है साँइथिया के पास के किसी गाँव से। आदमी भेजकर मँगाना पड़ता है। घी की बात या तो अन्यमनस्कता के कारण राजलक्ष्मी ने सुनी नहीं, या फिर वह भूल गयी। उससे पूछा, ''कब से नहीं है महाराज?''
''हो गये पाँच-सात दिन।''
''तो पाँच-सात दिन से इन्हें भात खिला रहे हो?''
रतन को बुलाकर कहा, ''मैं भूल गयी तो क्या तू नहीं मँगा सकता था? क्या इस तरह सभी मिलकर मुझे तंग कर डालोगे?''
रतन भीतर से अपनी माँजी पर बहुत खुश न था। दिन-रात घर छोड़कर अन्यत्र रहने और खासकर मेरी तरफ से उदासीन हो जाने से उसकी नाराजगी हद तक पहुँच चुकी थी। मालकिन के उलाहने के उत्तर में उसने भले आदमी का सा मँह बनाकर कहा, ''क्या जानूँ माँजी, तुमने सुनी-अनसुनी कर दी तो मैंने सोचा कि बढ़िया कीमती घी की शायद अब जरूरत न हो। तभी तो भला पाँच-छह दिन से मैं कमजोर आदमी को भात खाने देता?''
राजलक्ष्मी के पास इसका जवाब ही न था, इसलिए नौकर से इतनी बड़ी चुभने वाली बात सुनकर भी वह बिना कुछ जवाब दिये चुपके से उठकर चली गयी?
रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े बहुत देर तक छटपटाते रहने के बाद शायद कुछ झपकी-सी लगी होगी, इतने में राजलक्ष्मी दरवाजा खोलकर भीतर आई और मेरे पाँयते के पास बहुत देर तक चुपचाप बैठी रही; फिर बोली, ''सो गये क्या?''
मैंने कहा, ''नहीं तो।''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तुम्हें पाने के लिए मैंने जितना किया है, उससे आधा भी अगर भगवान के पाने के लिए करती तो अब तक शायद वे भी मिल जाते। मगर मैं तुम्हें न पा सकी।''
मैंने कहा, ''हो सकता है कि आदमी को पाना और भी कठिन हो।''
''आदमी को पाना?'' राजलक्ष्मी क्षण-भर स्थिर रहकर बोली, ''कुछ भी हो, प्रेम भी तो एक तरह का बन्धन है, शायद यह भी तुमसे नहीं सहा जाता-ऑंसता है।''
इस अभियोग का कोई जवाब नहीं, यह अभियोग शाश्वत और सनातन है। आदिम मानव-मानवी से उत्तराधिकार-सूत्र में मिले हुए इस कलह की मीमांस कोई नहीं है- यह विवाद जिस दिन मिट जायेगा उस दिन संसार का सारा रस और सारी मधुरता तीती जहर हो जायेगी इसी से मैं उत्तर देने की कोशिश न करके चुप हो रहा।
परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि, जीवन के लिए राजलक्ष्मी ने कोई आग्रह या जबरदस्ती नहीं की, जीवन के इतने बड़े सर्वव्यापी प्रश्न को भी वह मानो एक निमेष में अपने आप ही भूल गयी। बोली, ''न्यायरत्न महाराज किसी एक व्रत के लिए कह रहे थे-पर जरा कठिन होने से सब उसे कर नहीं सकते, और इतनी सुविधा भी कितनों के भाग्य में जुटती है?''
असमाप्त प्रस्ताव के बीच में मैं मौन रहा; वह कहने लगी, ''तीन दिन एक तरह से उपवास ही करना पड़ता है, सुनन्दा की भी बड़ी इच्छा है- दोनों का व्रत एक ही साथ हो जाता- पर...'' इतना कहकर वह खुद ही जरा हँसकर बोली, ''पर तुम्हारी राय हुए बिना कैसे...''
मैंने पूछा, ''मेरी राय न होने से क्या होगा?''
राजलक्ष्मी ने कहा, ''तो फिर नहीं होगा।''
मैंने कहा, ''तो इसका विचार छोड़ दो, मेरी राय नहीं है।''
''रहने दो- मजाक मत करो।''
''मज़ाक नहीं, सचमुच ही मेरी राय नहीं है- मैं मनाही करता हूँ।''
मेरी बात सुनकर राजलक्ष्मी के चेहरे पर बादल घिर आय। क्षण-भर स्तब्ध रहकर वह बोली, ''पर हम लोगों ने तो सब तय कर लिया है। चीज-वस्तु मँगाने के लिए आदमी भेज दिये हैं, कल हविष्य करके परसों से- वाह अब मनाही करने से कैसे होगा? सुनन्दा के सामने मैं मुँह कैसे दिखाऊँगी छोटे महाराज? वाह! यह सिर्फ तुम्हारी चालाकी है। मुझे झूठमूठ खिझाने के लिए- सो नहीं होगा, तुम बताओ, तुम्हारी राय है?''
मैंने कहा, ''है। मगर तुम किसी दिन भी तो मेरी राय गैर-राय की परवाह नहीं करती लक्ष्मी, फिर आज ही क्यों अचानक मजाक करने चली आईं? मेरा आदेश तुम्हें मानना ही होगा, यह दावा तो मैंने तुमसे कभी किया नहीं।''
राजलक्ष्मी ने मेरे पैरों पर हाथ रखकर कहा, ''अब कभी न होगा, सिर्फ अबकी बार खुशी मन से मुझे हुक्म दे दो।''
मैंने कहा, ''अच्छा। लेकिन तड़के ही शायद तुम्हें जाना पड़ेगा। अब और रात मत बढ़ाओ, सोने जाओ।''
राजलक्ष्मी नहीं गयी, धीरे-धीरे मेरे पैरों पर हाथ फेरने लगी। जब तक सो न गया, घूम-फिरकर बार-बार सिर्फ यही मालूम होने लगा कि वह स्नेह-स्पर्श अब नहीं रहा। वह भी तो कोई ज्यादा दिन की बात नहीं है, आरा स्टेशन से जिस दिन वह उठाकर अपने घर लाई थी तब इसी तरह पाँवों पर हाथ फेरकर मुझे सुलाना पसन्द करती थी। ठीक इसी तरह नीरव रहती थी, पर मुझे मालूम होता था कि उसकी दसों उँगलियाँ मानो दसों इन्द्रियों की सम्पूर्ण व्याकुलता से नारी-हृदय का जो कुछ है सबका सब मेरे इन पैरों पर ही उंड़ेले दे रही है। हालाँकि मैंने चाहा नहीं था, माँगा नहीं था, और इसे लेकर कैसे क्या करूँगा, सो भी सोचकर तय नहीं कर पाया था। बाढ़ के पानी के समान आते समय भी उसने राय नहीं ली, और शायद जाते सयम भी, उसी तरह मुँह न ताकेगी। मेरी ऑंखों से सहज में ऑंसू नहीं गिरते, और प्रेम के लिए भिखमंगापन भी मुझसे करते नहीं बनता। संसार में मेरा कुछ भी नहीं है, किसी से कुछ पाया भी नहीं है, 'दे दो' कहकर हाथ फैलाते हुए भी मुझे शरम आती है। किताबों में पढ़ा है, इसी बात पर कितना विरोध, कितनी जलन, कितनी कसक और मान-अभिमान-न जाने कितना प्रमत्त पश्चात्ताप हुआ करता है- स्नेह की सुधा गरल हो उठने की न जाने कितनी विक्षुब्ध कहानियाँ हैं। जानता हूँ कि ये सब बातें झूठी नहीं हैं, परन्तु मेरे मन का जो वैरागी तन्द्रराच्छन्न पड़ा था, सहसा वह चौंककर उठ खड़ा हुआ, बोला, ''छि छि छि!''
बहुत देर बाद मुझे सो गया समझकर, राजलक्ष्मी जब सावधानी के साथ धीरे से उठकर चली गयी तब वह जान भी न पाई कि मेरे निद्राहीन निमीलित नेत्रों से ऑंसू झर रहे हैं। ऑंसू बराबर गिरते ही रहे, किन्तु आज की वह आयत्तातीत सम्पदा एक दिन मेरी ही थी, इस व्यर्थ के हाहाकार से अशान्ति पैदा करने की मेरी प्रवृत्ति न हुई।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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