रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

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रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:49

रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!
शाम तो मौसम ने कर दिया था वरना थी दोपहर! थोड़ी देर पहले धूप थी। उन्होंने खाना खाया था और खा कर अभी अपने कमरे में लेटे ही थे कि सहसा अंधड़। घर के सारे खुले खिड़की दरवाजे भड़ भड़ करते हुए अपने आप बंद होने लगे, खुलने लगे। सिटकनी छिटक कर कहीं गिरी, ब्यौंड़े कहीं गिरे जैसे धरती हिल उठी हो, दीवारें काँपने लगी हों। आसमान काला पड़ गया और चारों ओर घुप्प अँधेरा।
वे उठ बैठे!
आँगन और लान बड़े बड़े ओलों और बर्फ के पत्थरों से पट गए और बारजे की रेलिंग टूट कर दूर जा गिरी - धड़ाम! उसके बाद जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो वह पानी की बूँदें नहीं थीं - जैसे पानी की रस्सियाँ हों जिन्हें पकड़ कर कोई चाहे तो वहाँ तक चला जाए जहाँ से ये छोड़ी या गिराई जा रही हों। बादल लगातार गड़गड़ा रहे थे - दूर नहीं, सिर के ऊपर जैसे बिजली तड़क रही थी; दूर नहीं, खिड़कियों से अंदर आँखों में।
इकहत्तर साल के बूढे रघुनाथ भौंचक! यह अचानक क्या हो गया ? क्या हो रहा है?
उन्होंने चेहरे से बंदरटोपी हटाई, बदन पर पड़ी रजाई अलग की और खिड़की के पास खड़े हो गए!
खिड़की के दोनों पल्ले गिटक के सहारे खुले थे और वे बाहर देख रहे थे।
घर के बाहर ही कदंब का विशाल पेड़ था लेकिन उसका पता नहीं चल रहा था - अँधेरे के कारण, घनघोर बारिश के कारण! छत के डाउन पाइप से जलधारा गिर रही थी और उसका शोर अलग से सुनाई पड़ रहा था!
ऐसा मौसम और ऐसी बारिश और ऐसी हवा उन्होंने कब देखी थी? दिमाग पर जोर देने से याद आया - साठ बासठ साल पहले! वे स्कूल जाने लगे थे - गाँव से दो मील दूर! मौसम खराब देख कर मास्टर ने समय से पहले ही छुट्टी दे दी थी। वे सभी बच्चों के साथ बगीचे में पहुँचे ही थे कि अंधड़ और बारिश और अँधेरा! सब ने आम के पेड़ों के तने की आड़ लेना चाहा लेकिन तूफान ने उन्हें तिनके की तरह उड़ाया और बगीचे से बाहर धान के खंधों में ले जा कर पटका! किसी के बस्ते और किताब कापी का पता नहीं! बारिश की बूँदें उनके बदन पर गोली के छर्रों की तरह लग रही थीं और वे चीख चिल्ला रहे थे। अंधड़ थम जाने के बाद - जब बारिश थोड़ी कम हुई तो गाँव से लोग लालटेन और चोरबत्ती ले कर निकले थे ढूँढ़ने!
यह एक हादसा था और हादसा न हो तो जिंदगी क्या ?
और यह भी एक हादसा ही है कि बाहर ऐसा मौसम है और वे कमरे में हैं।
कितने दिन हो गए बारिश में भींगे ?
कितने दिन हो गए लू के थपेड़े खाए
कितने दिन हो गए जेठ के घाम में झुलसे ?
कितने दिन हो गए अँजोरिया रात में मटरग़श्ती किए ?
कितने दिन हो गए ठंड में ठिठुर कर दाँत किटकिटाए ?
क्या ये इसीलिए होते हैं कि हम इनसे बच के रहें ? बच बचा के चलें? या इसलिए कि इन्हें भोगें, इन्हें जिएँ, इनसे दोस्ती करें, बतियाएँ, सिर माथे पर बिठाएँ?
हम इनसे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये हमारे शत्रु हैं! क्यों कर रहे हैं ऐसा ?
इधर एक अर्से से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब वे नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएगी! वे चले जाएँगे और इस धरती का वैभव, इसका ऐश्वर्य, इसका सौंदर्य - ये बादल, ये धूप, ये पेड़ पौधे, ये फसलें, ये नदी नाले, कछार, जंगल, पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा! वे यह सारा कुछ अपनी आँखों में बसा लेना चाहते हैं जैसे वे भले चले जाएँ, आँखें रह जाएँगी; त्वचा पर हर चीज की थाप सोख लेना चाहते हैं जैसे त्वचा केंचुल की तरह यहीं छूट जाएगी और उसका स्पर्श उन तक पहुँचाती रहेंगी!
उन्हें लग रहा था कि बहुत दिन नहीं बचे हैं उनके जाने में! मुमकिन है वह दिन कल ही हो, जब उनके लिए सूरज ही न उगे। उगेगा तो जरूर, लेकिन उसे दूसरे देखेंगे - वे नहीं! क्या यह संभव नहीं कि वे सूरज को बाँध के अपने साथ ही लिए जायँ - न वह रहे, न उगे, न कोई और देखे! लेकिन एक सूरज समूची धरती तो नहीं, वे किस किस चीज को बाँधेंगे और किस किस को देखने से रोकेंगे?
उनकी बाँहें इतनी लंबी क्यों नहीं हो जातीं कि वे उसमें सारी धरती समेट लें और मरें या जिएँ तो सबके साथ!
लेकिन एक मन और था रघुनाथ का जो उन्हें धिक्कारे जा रहा था - कल तक कहाँ था यह प्यार? धरती से प्यार की यह ललक? यह तड़प? कल भी यही धरती थी। ये ही बादल, आसमान, तारे, सूरज चाँद थे! नदी, झरने, सागर, जंगल, पहाड़ थे। ये ही गली, मकान, चौबारे थे! कहाँ थी यह तड़प? फुरसत थी इन्हें देखने की? आज जब मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पाँव कमरे में आ रही है तो बाहर जिंदगी बुलाती हुई सुनाई पड़ रही है?
सच सच बताओ रघुनाथ, तुम्हें जो मिला है उसके बारे में कभी सोचा था? कभी सोचा था कि एक छोटे से गाँव से ले कर अमेरिका तक फैल जाओगे? चौके में पीढ़ा पर बैठ कर रोटी प्याज नमक खानेवाले तुम अशोक विहार में बैठ कर लंच और डिनर करोगे?
लेकिन रघुनाथ यह सब नहीं सुन रहे थे। यह आवाज बाहर की गड़गड़ाहट और बारिश के शोर में दब गई थी। वे अपने वश में नहीं थे। उनकी नजर गई कोने में खड़ी छड़ी और छाता पर! जाड़े की ठंड यों भी भयानक थी और ऊपर से ये ओले और बारिश। हिम्मत जवाब दे रही थी फिर भी उन्होंने दरवाजा खोला। खोला या वे वहाँ खड़े हुए और अपने आप खुल गया! भीगी हवा का सनसनाता रेला अंदर घुसा और वे डर कर पीछे हट गए! फिर साहस बटोरा और बाहर निकलने की तैयारी शुरू की! पूरी बाँह का थर्मोकोट पहना, उस पर सूती शर्ट, फिर उस पर स्वेटर, ऊपर से कोट। ऊनी पैंट पहले ही पहन चुके थे। यही सुबह जाड़े में पहन कर टहलने की उनकी पोशाक थी! था तो मफलर भी लेकिन उससे ज्यादा जरूरी था - गमछा! बारिश को देखते हुए! जैसे जैसे कपड़े भीगते जाएँगे, वे एक एक कर उतारते और फेंकते चले जाएँगे और अंत में साथ रह जाएगा यही गमछा!
वे अपनी साज सज्जा से अब पूरी तरह आश्वस्त थे लेकिन नंगे बिना बालों के सिर को ले कर दुविधा में थे - कनटोप ठीक रहेगा या गमछा बाँध लें।
ओले जो गिरने थे, शुरू में ही गिर चुके थे, अब उनका कोई अंदेशा नहीं!
उन्होंने गमछे को गले के चारों ओर लपेटा और नंगे सिर बाहर आए!
अब न कोई रोकनेवाला, न टोकनेवाला। उन्होंने कहा - हे मन! चलो, लौट कर आए तो वाह वाह! न आए तो वाह वाह!
बर्फीली बारिश की अँधेरी सुरंग में उतरने से पहले उन्होंने यह नहीं सोचा था कि भीगे कपड़ों के वजन के साथ एक कदम भी आगे बढ़ना उनके लिए मुश्किल होगा।
वे अपने कमरे से तो निकल आए लेकिन गेट से बाहर नहीं जा सके!
छाता खुलने से पहले जो पहली बूँद उनकी नंगी, खल्वाट खोपड़ी पर गिरी, उसने इतना वक्त ही नहीं दिया कि वे समझ सकें कि यह बिजली तड़की है या लोहे की कील है जो सिर में छेद करती हुई अंदर ही अंदर तलवे तक ठुँक गई है! उनका पूरा बदन झनझना उठा। वे बौछारों के डर से बैठ गए लेकिन भीगने से नहीं बच सके। जब तक छाता खुले, तब तक वे पूरी तरह भीग चुके थे!
अब वे फँस चुके थे - बर्फीली हवाओं और बौछारों के बीच। हवा तिनके की तरह उन्हें ऊपर उड़ा रही थी और बौछारें जमीन पर पटक रही थीं! भीगे कपड़ों का वजन उड़ने नहीं दे रहा था और हवा घसीटे जा रही थी! उन्हें इतना ही याद है कि लोहे के गेट पर वे कई बार भहरा कर गिरे और यह सिलसिला सहसा तब खत्म हुआ जब छाते की कमानियाँ टूट गईं और वह उड़ता हुआ गेट के बाहर गायब हो गया। अब उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे हवा जगह जगह से नोच रही हो और पानी दाग रहा हो - जलते हुए सूजे से!
अचेत हो कर गिरने से पहले उनके दिमाग में ज्ञानदत्त चौबे कौंधा - उनका मित्रा! उसने दो बार आत्महत्या करने की कोशिश की - पहली बार लोहता स्टेशन के पास रेल की पटरी पर नगर से दूर निर्जन जहाँ किसी का आना जाना नहीं था! समय उसने सामान्य पैसेंजर या मालगाड़ी का नहीं, एक्सप्रेस या मेल का चुना था कि जो होना हो, खट' से हो, पलक झपकते, ताकि तकलीफ न हो। वह पटरी पर लेटा ही था कि मेल आता दिखा! जाने क्यों, उसमें जीवन से मोह पैदा हुआ और उठ कर भागने को हुआ कि घुटनों के पास से एक पैर खचाक्‌।
यह मरने से ज्यादा बुरा हुआ! बैसाखियों का सहारा और घरवालों की गालियाँ और दुत्कार! एक बार फिर आत्महत्या का जुनून सवार हुआ उस पर! अबकी उसने सिवान का कुआँ चुना! उसने बैसाखी फेंक छलाँग लगाई और पानी में छपाक्‌ कि बरोह पकड़ में आ गई! तीन दिन बिना खाए पिए भूखा चिल्लाता रहा कुएँ में - और निकला तो दूसरे टूटे पैर के साथ!
आज वही ज्ञानदत्त - बिना पैरों का ज्ञानदत्त - चौराहे पर पड़ा भीख माँगता है। मरने की ख्वाहिश ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा! मगर यह कमबख्त। ज्ञानदत्त उनके दिमाग में आया ही क्यों? वे मरने के लिए तो निकले नहीं थे? निकले थे बूँदों के लिए, ओले के लिए, हवा के लिए। उन्होंने नतीजा निकाला कि जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिए।
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:50

दो
पहाड़पुर में रघुनाथ एक ही थे।
वैसे कहने को तो रामनाथ, शोभनाथ, छविनाथ, शामनाथ, प्रभुनाथ वगैरह वगैरह भी थे लेकिन वे रघुनाथ नहीं थे।
और रघुनाथ का यह था कि वे जब कभी जहाँ कहीं नजर आ जाते, गाँव घर के लोग जल भुन कर एक ठंडी आह भरते - वाह! क्या किस्मत पायी है पट्ठे ने!
रघुनाथ पहाड़पुर गाँव के अकेले लिखे पढ़े आदमी। डिग्री कालेज में अध्यापक। दुबले पतले लंबे छरहरे बदन के मालिक। शुरू के दस वर्षों तक साइकिल से आते जाते थे, बाद में स्कूटर से। पिछली सीट पर कभी बेटी बैठती थी, बाद के दिनों में बेटे। कभी एक, कभी दोनों। आखिर पाँच छह मील का मामला था।
हर सुखी और सफल आदमी की तरह रघुनाथ ने भी अपने जीने, आगे बढ़ने और ऊँचाइयाँ छूने के कुछ नुस्खे ईजाद कर लिए थे! सच पूछिए तो उन्होंने ईजाद नहीं किए थे, उनकी प्रकृति में ही थे, बस वे समझ गए थे और उन्हें अपने नित्य व्यवहार का अंग बना लिया था। वे पतले और लंबे थे, इसलिए थोड़ा झुक कर चलते थे। कहीं आते जाते समय, किसी से मिलते जुलते बोलते बतियाते समय थोड़ा झुके रहते थे। पहली बार उन्होंने अपने संदर्भ में किसी दूसरे से बात करते समय प्रिसिपल साहब के मुँह से 'विनम्रता' शब्द सुना। ऐसा उनकी प्रशंसा में कहा गया था। जिस झुके रहने पर वे शर्म महसूस करते थे, वही उनकी खूबी है - यह नया बोध हुआ। इसमें उन्होंने आगे चल कर दो खूबियाँ और जोड़ दीं - मुसकान और सहमति। कोई कुछ कहे, वे मुसकराते रहते थे और समर्थन में सिर हिलाते रहते थे। यह तभी संभव है जब आप अपनी तरफ से कम से कम बोलें।
इस तरह रघुनाथ ने विनम्रता, मितभाषिता और मुसकान के साथ जीवन की यात्रा शुरू की थी।
और इसे संयोग ही कहिए कि वे कभी असफल नहीं रहे! इसी संयोग को दूसरे 'किस्मत' कहा करते थे! और इस पर विश्वास कर लिया था रघुनाथ ने भी!
हुआ यह कि एक बार वे कालेज से साइकिल से घर लौटने को हुए तो पाया - चेन टूट गई है। उन्होंने साइकिल कालेज में ही छोड़ दी और पैदल चल पड़े। गर्मी का मौसम, धूप तेज, हवा का नाम नहीं, बदन पसीने से तर-ब-तर। रास्ते में कहीं पेड़ पालो नहीं। आकाश में बादल थे लेकिन दूर। उनके मन ने कहा - काश! वे बादल उनके सिर के ऊपर होते छाते की तरह। और देखिए, एक फर्लांग ही आए होंगे कि बादल सचमुच उनके सिर के ऊपर। और यही नहीं, वे उनके साथ साथ छाया किए हुए गाँव तक आए!
अगले दिन ने यह साबित कर दिया कि वह मात्रा भ्रम नहीं था। वे क्लास लेने के लिए रजिस्टर ले कर जैसे ही चले, वैसे ही ध्यान गया कि कलम नहीं है। या तो घर छूट गई या रास्ते में गिर गई। वे अभी क्लास में पहुँचे भी नहीं थे कि सामने घास में गिरी एक कलम दिखी - धूप में चमकती हुई।
ऐसी बातें औरों के साथ भी होती होंगी लेकिन जाने क्यों, उन्हें लगने लगा कि दीनदयालु परमपिता की उन पर विशेष कृपा है। वह उनकी हर सुविधा असुविधा का ध्यान रखते हैं। इसीलिए वे जो चाहते हैं, वह देर सबेर हो कर रहता है।
और देखिए कि उन्होंने जब जब चाहा, जो जो चाहा सब होता गया।
उन्हें कुछ करना नहीं पड़ा, अपने आप होता गया।
पढ़ाई खत्म करने के बाद रघुनाथ रिसर्च कर रहे थे और उनका मन नहीं लग रहा था। आिरर कब तक करते रहेंगे रिसर्च? कहीं नौकरी मिल जाती तो जान बचती!
और बहुत दिन नहीं बीते कि नौकरी मिल गई।
इसका श्रेय उन्होंने हाल में जनमी अपनी बेटी को दिया। बेटी लक्ष्मी होती है। वही अपने साथ और अपने लिए उनकी नौकरी ले कर आई थी। लेकिन अब इसके बाद एक बेटा चाहिए। यह उन्होंने नहीं, उनके दिल ने कहा।
और देखिए, चार साल बाद बेटा भी आ गया। उसके बाद एक और बेटा - बस!
इस तरह एक बेटी, दो बेटे, शीला और रघुनाथ - सब मिला कर पाँच जनों का परिवार। छोटा परिवार, सुखी परिवार! परिवार सुखी रहा हो या न रहा हो - रघुनाथ सुखी नहीं थे। जिंदगी उनके लिए पहाड़पुर की धूल धक्कड़ और हँसी खेल नहीं थी। पैदा ही होना था तो स्वयं कीड़े मकोड़े की योनि में क्यों नहीं पैदा हुए? वे वहाँ भी पैदा हो सकते थे लेकिन नहीं, ईश्वर ने यदि उन्हें ऋषियों मुनियों के लिए दुर्लभ योनि में पैदा किया है तो इसके पीछे उसका कोई मकसद रहा होगा - कि जाओ, साठ सत्तर साल का मौका देते हैं तुम्हें; जाओ, धरती को सुंदर और सुखी बनाओ। धरती सुंदर और सुखी तभी होगी जब तुम्हारे बच्चे सुखी, सुंदर और संपन्न होंगे। तुम्हें जो बनना था, वह तो बन चुके; अब बच्चे हैं जिनके आगे सारी जिंदगी और दुनिया पड़ी है। वही तुम्हारे भी भविष्य हैं। जियो तो उन्हीं की जिंदगी, मरो तो उन्हीं की जिंदगी।
और रघुनाथ ने यही किया। उनकी सारी शक्ति और सारी बुद्धि और सारी पूँजी उन्हें ही सँवारने में लगी रही!
उन्होंने चाहा - सरला पढ़ लिख कर नौकरी करे।
सरला पढ़ लिख कर नौकरी करने लगी।
उन्होंने चाहा - संजय साफ्टवेयर इंजीनियर बने।
संजय साफ्टवेयर इंजीनियर ही नहीं बना, अमेरिका पहुँच गया!
उन्होंने चाहा - मैनेजर समधी बनें!
संजय ने यह नहीं चाहा! उसने वह किया जो उसने चाहा!
रघुनाथ का चाहा रह गया। दयानिधान कोई मदद नहीं कर सके उनकी! उन्हें अफसोस इस बात का था कि मैनेजर ने इसे बाप बेटे की मिलीभगत समझा था! वे काफी मानसिक तनाव में चल रहे थे। लेकिन कालेज के उनके सहयोगियों ने उन्हें बधाइयाँ दे कर राहत पहुँचाई - कि अच्छा हुआ, एक अंधी खाई में गिरने से बच गए! इसमें प्रिंसिपल का रोल और अच्छा था। उसने लगभग तीस साल पहले रघुनाथ के साथ ही ज्वाइन किया था कालेज! दोनों का याराना-सा था! जब भी मिलते, हँसी मजाक और हाहा हूहू करते! उसने एक दिन धीरे से कहा - 'रघुनाथ, मुझे आश्चर्य है कि इतनी-सी बात तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आई? वह तुम्हारी ही बेटी के बदले तुम्हारे बेटे को खरीद रहा था!'
इस तरह रघुनाथ सहज हो ही रहे थे कि एक दिन घर पर उन्हें प्रिंसिपल के हस्ताक्षर से नोटिस मिली। आरोप दो थे - 'नेग्लिजेंस ऑफ ड्यूटी' और 'इनसबॉर्डिनेशन'! ऐसा कोई संकेत अपनी बातों में नहीं दिया था उसने। पहले कभी!
ये दोनों आरोप निराधार! इसे रघुनाथ ही नहीं, सहयोगी भी जानते थे और प्रिंसिपल भी। सबकी सहानुभूति उनके साथ थी, लेकिन साथ देने को कोई तैयार नहीं था! उन्होंने उत्तर दे दिया था मगर जानते थे कि इससे कोई लाभ नहीं। वे बदहवास-से यहाँ से वहाँ दौड़ते रहे। आजिज आ कर प्रिंसिपल से मिले और उससे सलाह माँगी। उसने कहा - 'देखो रघुनाथ, चाहे तुम जितनी दौड़ धूप करो, निलंबन का मन बना चुका है मैनेजर! उसकी शक्ति और पहुँच को जानते हो तुम! इसके बाद तुम कचहरी जाओगे, मुकदमा लड़ोगे, वह कब तक चलेगा कोई नहीं जानता। हो सकता है, फैसला होने के पहले ही तुम मर जाओ! हाँ, जब तक मुकदमा चलेगा, तब तक पेंशन रुकी रहेगी। यह सब देख कर मेरी तो सलाह है कि तुम वी.आर.एस. (वालंटरी रिटायरमेण्ट स्कीम) ले लो!
रघुनाथ बहुत देर तक चुप रहे! उनसे कुछ बोला नहीं गया!
'ठीक है लेकिन मेरी एक मदद करें आप!'
'बोलो, क्या कर सकता हूँ मैं?'
'निलंबन आप तब तक लटकाए रखें जब तक बेटी की शादी न हो जाए! फिर तो वही करूँगा जो आपने कहा है!'
मनुष्यता का तकाजा था ऐसा करना! प्रिंसिपल ने चिंतित हो कर कहा - 'जाओ, कोशिश करूँगा लेकिन कहीं कहना मत!'
आखिरकार प्रिंसिपल कब तक इंतजार करता?
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:51

तीन
ऐसी मुसीबत में रघुनाथ को किसी और ने नहीं, उन्हीं के बेटों ने डाला था!
बेटों में भी संजय ने! खास तौर से संजय ने!
और यह लंबी कहानी है - राँची से केलिफोर्निया तक फैली।
संजय ने प्यार किया था सोनल को! यह प्यार किसी सड़कछाप टुच्चे युवक का दिलफेंक प्यार नहीं था, इसमें गुणा भाग भी था और जोड़ घटाना भी! जितना गहरा था, उतना ही व्यापक! सोनल संजय के प्रोफेसर सक्सेना की इकलौती बेटी थी! थ्रूआउट फर्स्ट क्लास, नेट और दर्शन से पीएचडी। नौकरी तो पक्की थी बनारस के विश्वविद्यालय में जहाँ उसके मामा कुलपति थे - लेकिन उसमें अभी देर थी; तब तक शादी का इंतजार था!
शादी के आड़े आ रहे थे उसके ओठों से बाहर आ गए दाँत और चिपटी नाक जिनकी क्षतिपूर्ति वह अपने सर्टिफिकेट से करती थी! रही सही कसर पूरी कर रही थी सक्सेना की फैलाई हुई यह अफवाह - कि उन्हें एक ऐसे जहीन साफ्टवेयर इंजीनियर युवक की जरूरत है जो एक अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी के तीन साल के कंट्रैक्ट पर केलिफोर्निया जा सके। इस जरूरत का मतलब पूरा इंस्टीट्यूट समझता था।
संजय फाइनल की परीक्षा दे चुका था, रिजल्ट की घोषणा बाकी थी!
इधर कई बार माँ बाप का संदेश आया था कि आओ, लड़की देख जाओ!
लड़की क्या देखना, वह देखी भाली थी! रघुनाथ जिस कालेज में पढ़ाते थे, उसी के मैनेजर और पूर्व विधायक की बेटी थी! गोरी, लंबी, सुंदर, आकर्षक। एम.ए.। अच्छी हाउसवाइफ! मैनेजर पुराने जमाने के जमींदार, अथाह संपत्ति के स्वामी! रघुनाथ की कोई हैसियत नहीं थी उनके आगे। न कायदे का घर दुआर, न जमीन जायदाद। आठ बीघे खेत और एक हल की खेती! बचपन और जवानी तंगहाली में गुजारी थी। बच्चों को पढ़ाया भी तो खेत रेहन रख कर और कालेज से लोन ले कर। जाहिर है, मैनेजर ने 'साफ्टवेयर इंजीनियर' देखा था, अपने कालेज के मास्टर रघुनाथ को नहीं।
यह संबंध सपने से भी आगे की चीज था रघुनाथ के लिए। फायदे ही फायदे थे इससे! जनपद में पहचान और प्रतिष्ठा जो मिलती, सो अलग! वे क्या से क्या होने जा रहे थे!
तो, गाँव आने से पहले सक्सेना सर से विदा लेने गया था संजय!
इसे यों भी कह सकते हैं कि उसे डिनर पर बुलाया था सक्सेना सर ने!
गर्मी की शाम! अपने लान में सक्सेना बेंत की कुर्सी पर चुपचाप बैठे थे। माली गमलों में पानी दे रहा था। बँगले के अंदर की बत्तियाँ जल रही थीं। किसी कमरे से संगीत की धुन आ रही थी! रिटायरमेंट के करीब, दिल के मरीज प्रो. सक्सेना संजय की मौजूदगी से बेखबर चुपचाप बैठे थे और सामने देख रहे थे। काफी देर बाद उन्होंने पूछा - 'कौन-सा इंस्ट्रुमेंट है?'
संजय ने नासमझी में सिर हिलाया!
'और राग? कौन-सा राग है?'
संजय निरुत्तर, फिर सिर हिलाया!
वे मुसकराए और ऊँची आवाज में पुकारा - 'सोनू!'
जींस की पैंट और टी शर्ट में उछलती हुई सोनल आई - ' हाँ, पापा!'
संजय खड़ा हो गया। सक्सेना मुसकराए, पहले संजय को देखा, फिर सोनल को! सोनल भी मुसकराई। संजय सोनल से मिला तो कई बार था, लेकिन देखा पहली बार। उसे लगा कि किसी लड़की को टुकड़ों में नहीं, 'टोटैलिटी' में देखना चाहिए! कितना फर्क पड़ जाता है? साथ ही लड़की और पत्नी को एक ही तरह से नहीं देखना चाहिए। रूप रंग, हाव भाव, नाज नखरे लड़की में देखे जाते हैं, पत्नी में नहीं! ये सब पुराने कंसेप्शन हुए - हमारे पापा मम्मी के जमाने के, हमारे नहीं!
सक्सेना ने चुप्पी तोड़ी - 'यह है सोनल! जिसमें मेरे प्राण बसते हैं। सितार, सरोद, संतूर - माने सोनल। सोनल माने संगीत। चीपनेस इसे पसंद नहीं। फिल्मी गानों को संगीत नहीं मानती! शायद इसलिए कि खुद कथक की डांसर रही है! खैर, तो क्या खिला रही हो हम लोगों को भाई?'
'वह तो तभी पता चलेगा जब खाएँगे!' सोनल शरमा कर भाग गई!
'बैठो संजू!' कहते हुए सक्सेना भी बैठ गए - सिर झुकाए। कुछ सोचते! भर्राए स्वर में बोले - 'कैसे रहूँगा इसके बगैर? रहूँगा कैसे, समझ में नहीं आता। चौदह साल की थी जब माँ गुजरी थी इसकी!'
इसके बाद उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे - 'तीन चार साल से लगातार आते रहे हैं लड़के। एक से एक। तुम्हारे सीनियर भी, क्लासफेलो भी! लेकिन बेटा, भारी संकट में हूँ। तुम्हीं उबार सकते हो इससे! पिछले साल ही कहा था इसने कि शादी करूँगी तो संजय से। नहीं तो जरूरी नहीं है शादी। अपने अंदर छिपाए रहा इस बात को। आज कह रहा हूँ वह भी इसलिए कि फैसले की घड़ी आ गई है! तीन ही चार महीने का समय है केलिफोर्निया जाने का। इसी बीच शादी है, एयर टिकट है, पासपोर्ट है, वीजा है, सारी तैयारियाँ हैं। सोनल अमेरिका और हनीमून को ले कर उत्साहित है।'
उन्होंने आँखें पोंछीं और संजय को देखा - 'हर बाप के सपने होते हैं। मेरे भी हैं। न होते तो सैंट्रो कार क्यों लेता? अपने लिए फिएट तो थी ही! नई घर गृहस्थी के सामान क्यों जुटाता? तुम्हारे ही नगर में एक कालोनी है - 'अशोक विहार'। उसमें एक छोटा-सा बँगला बनवाया है! सब कुछ कंप्लीट है, बस फिनिशिंग बाकी है। सोचा था कि यहाँ से रिटायर करूँगा तो 'काशी वास' करूँगा! हर आदमी यह चाहता है। तुम्हारे पापा मम्मी भी चाहते होंगे। लेकिन सोचता हूँ कल सोनल विश्वविद्यालय में ज्वाइन करेगी, तो कहाँ रहेगी? मेरा तो सारा जीवन राँची में बीता, सारे दोस्त-मित्र, रिश्ते-नाते यहीं हैं, वहाँ जा कर क्या करेंगे? सो, बँगला उसी के नाम ट्रांसफर कर दे रहा हूँ।'
संजय चिंतित। उसकी आँखों में पापा मम्मी के चेहरे घूम रहे थे। उसे लगने लगा था कि उसने उन्हें 'हाँ' करने में जल्दी कर दी थी! बोला - 'बहुत देर कर दी सर, सोनल का मन बताने में!'
'देर सबेर कुछ नहीं होता संजू, हर चीज का समय होता है! अब यही देखो, मेरे साले प्रो. अस्थाना को बनारस में ऐसे ही वक्त पर कुलपति क्यों होना था जब सोनल थीसिस जमा कर रही थी!' उन्होंने सिगरेट सुलगाई - 'ऐसे तो सिगरेट मना है लेकिन कभी-कभी एक दो कश ले लेता हूँ!.... तो तुम्हारे पापा, उनकी परेशानियाँ समझ सकता हूँ। बताते रहे हो उनके बारे में। अभी तक बहन अविवाहित है, परेशान हैं उसकी शादी को ले कर। छोटा भाई है तुम्हारा, पिछले तीन चार साल से 'कैट' 'मैट' दे रहा है, लोक सेवा आयोग के टेस्ट दे रहा है और किसी में नहीं आ रहा है - उसकी परेशानी! बाई द वे, मेरी तो सलाह है कि वह फ्रस्ट्रेटेड हो कर कुछ कर बैठे इससे पहले किसी मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में एडमीशन करा दो। ऐसे नहीं, तो डोनेशन दे कर! अरे, कितना लगेगा - डेढ़ लाख? दो लाख? और क्या? तुमने बताया था कि तुम्हारी पढ़ाई के लिए लोन भी लेते रहे हैं, रेहन भी रखे हैं खेत - इन सारी परेशानियों से निपटने के लिए कितने की जरूरत होगी उन्हें? उनसे बतिया कर तो देखो। क्या चाहते हैं वे? कितना चाहते हैं? देखो, बारात, धूम-धाम, बाजा-गाजा - ये सब फालतू की चीजें हैं। कोई जरूरत नहीं इस दिखावे और तमाशे की। शादी के लिए कोर्ट है और दोस्त मित्रों के लिए रिसेप्शन। यह मैं कर ही दूँगा, फिर? .....ऐसे एक बात बता दूँ, जिस कंपनी में और जिस कंट्रैक्ट पर अमरीका जाना है, उससे तीन साल में कोई भी इतना कमा लेगा कि अगर उसका बाप चाहे तो गाँव का गाँव खरीद ले। समझे?
'सवाल यह नहीं है सर, पिता जी लोक-लाज, जात-पात में विश्वास करनेवाले जरा पुराने खयालों के आदमी हैं'|
सक्सेना गंभीर हो गए। कुछ देर तक चुप रहे। इसी बीच सोनल साड़ी में आई - खाने पर बुलाने - 'देखो संजू! 'ला आफ ग्रेविटेशन' का नियम केवल पेड़ों और फलों पर ही नहीं लागू होता, मनुष्यों और संबंधों पर भी लागू होता है। हर बेटे बेटी के माँ बाप पृथ्वी हैं। बेटा ऊपर जाना चाहता है - और ऊपर, थोड़ा सा और ऊपर, माँ बाप अपने आकर्षण से उसे नीचे खींचते हैं। आकर्षण संस्कार का भी हो सकता है और प्यार का भी, माया मोह का भी! मंशा गिराने की नहीं होती, मगर गिरा देते हैं! अगर मैंने अपने पिता की सुनी होती तो हेतमपुर में पटवारी रह गया होता! तो यह है! मुझे जो कहना था, कह चुका। तुम्हें जो ठीक लगे, करो! हाँ, जाने से पहले सोनल से भी बात कर लेना!'
चार
जुलाई में शादी हो गई चिरंजीवी संजय और आयुष्मती सोनल की - कोर्ट में।
न बारात, न बाजा-गाजा!
प्रीतिभोज के लिए न्यौता आया था रघुनाथ के नाम भी, पर वे नहीं गए!
ऐसी चोट लगी थी रघुनाथ और शीला को जिसे न वे किसी को दिखा सकते थे, न किसी से छिपा सकते थे। ऐसी जगहों पर जाना उन्होंने बंद कर दिया था जहाँ दो चार लोग बैठे हों। उन्होंने मान लिया था कि दो बेटों में से एक बेटा मर गया। जब माँ-बाप की प्रतिष्ठा की चिंता नहीं तो मरा ही समझिए!
सितंबर में वे अमेरिका जाएँ चाहे जहन्नुम - इससे कोई मतलब नहीं।
इसी दिन के लिए उन्होंने पाल पोस कर बड़ा किया था, पढ़ाया-लिखाया था, पेट काटे थे, कर्जे लिए थे, खेत रेहन रखे थे और दुनिया भर की तवालतें सही थीं!
इनके लाख मना करने के बावजूद राजू गया था। राजू यानी संजय का भाई धनंजय! लौटा तो हाथ में एक ब्रीफकेस था रघुनाथ के लिए जिसे सक्सेना ने भिजवाया था।
रघुनाथ कालेज की तैयारी कर रहे थे। बेमन से ब्रीफकेस को देखा और कहा - 'रख दो!'
'अरे? ऐसे कैसे रख दूँ? अपने संदूक में रखिए!'
बाबा आदम के जमाने की संदूक जिसमें जाने क्या-क्या रखते थे रघुनाथ और उसकी ताली किसी को नहीं देते थे। बिना कुछ बोले उन्होंने उसकी ओर ताली फेंक दी!
राजू ने ब्रीफकेस संदूक में रखा और ताली उन्हें पकड़ाते हुए कहा - 'और कुछ नहीं पूछिएगा?'
शीला उदास मन दरवाजे पर खड़ी थी, अंदर चली गई!
'आप लोग तो ऐसा सन्न मारे हुए हैं जैसे गमी हो गई हो!'
राजू हँसते हुए माँ के पीछे पीछे अंदर चला - 'बहू ऐसी कि लाखों में एक। माँ, चिंता न करो। सब करेगी वो जो संजू बोलता था! हाथ पाँव दबाएगी वो, मूँड़ दबाएगी वो, बरतन माँजेगी वो, झाड़ू लगाएगी वो, खाना पकाएगी वो - जो जो चाहिए, सब करेगी! जरा अमेरिका से लौट तो आने दो। अभी तो हनीमून पर जा रही है दार्जिलिंग, वहाँ से दमदम एयरपोर्ट, फिर वहाँ से अमेरिका। बच गई तुम, अगर आई होती तो मुँहदिखाई देनी पड़ती। यल्लो। तुम्हारे लिए फोटो भिजवाया है रिसेप्शन का!'
राजू और भी न जाने क्या क्या बोलता रहा, वह सुनती भी रही, नहीं भी सुनती रही!
फोटो जोड़े का वहीं पड़ा था जहाँ वह बैठी थी। एक मन कह रहा था - 'देखो।' दूसरा कह रहा था - 'छोड़ो, जाने दो!'
सारी साधें धरी रह गई थीं।
रात ढल चुकी थी।
गाँव में सोता पड़ चुका था!
एक दिन पहले जम कर पानी बरसा था! सिवान गुलजार हो गया था। झींगुरों की झनकार से पूरा गाँव झनझना रहा था। बादल उसके बाद भी छाए रहे। दूर आकाश में बिजली भी चमकती रही। उधर कहीं बारिश हुई हो तो हुई हो, इधर नहीं हुई।
रघुनाथ का घर दुआर गाँव के बाहरी हिस्से में था! घर का अगला हिस्सा दुआर, पिछला घर। दुआर का मतलब दालान और बरामदा! इसी बरामदे में सोते थे रघुनाथ और राजू! राजू के सो जाने के बाद चुपके से आधी रात को रघुनाथ अंदर आए, ढिबरी जलाई और संदूक खोल कर ब्रीफकेस निकाला!
जब वे ढिबरी और ब्रीफकेस ले कर शीला के बगलवाली कोठरी में गए तो याद आया कि राजू ने इसकी चाबी नहीं दी है। उन्होंने धीरे से राजू को जगाया। राजू ने बताया कि वह ताली से नहीं, नंबर से खुलेगा - इन नंबरों से! और बड़बड़ाते हुए सो गया!
रघुनाथ ने ब्रीफकेस खोला तो भाव विभोर! बेटे संजय के प्रति सारी नाराजगी जाती रही! रुपयों की इतनी गड्डियाँ एक साथ एक ब्रीफकेस में अपनी आँखों के सामने पहली बार देख रहे थे और यह कोई फिल्म नहीं, वास्तविकता थी।
रघुनाथ की छवि गाँववालों की नजर में झंगड़ा झंझट से दूर रहनेवाले जितने शरीफ आदमी की थी उतनी ही सोंठ आदमी की - एक रुपैया में आठ अठन्नी भुनानेवाले आदमी की। लोग यह भी कहने लग गए थे कि बहुत लोभ न किया होता तो यह दिन उन्हें न देखना पड़ता।
रघुनाथ ने मेज को पास खींचा - पहले सौ सौ के नोटों की गड्डियाँ गिनना शुरू किया! वे एक एक बंडल की संख्या नोट करते जाते। फिर पाँच-पाँच सौ की गड्डियाँ उठाईं और अलग नोट करना शुरू किया। गिनते गिनते आधी रात हो गई और टोटल किया तो चार लाख साठ हजार!
उनका दिल धड़का! चिंता हुई। अगर गिनने में गलती भी हुई हो तो इतनी कैसे? वे उठ कर गए और दुबारा संदूक में झाँक आए। आते समय रसोई से कटोरी में पानी ले रहे थे तो शीला जाग गई। उन्होंने नए सिरे से उँगली भिगो-भिगो कर फिर गिनना शुरू किया। अबकी फिर टोटल किया तो वही - चार और साठ!
उन्होंने सिर को हाथों में थाम लिया।
'क्या बात है?' शीला ने पूछा!
'पाँच लाख में कम हैं चालीस हजार! किसी ने संदूक तो नहीं खोला था?'
'ताली तो तुम्हारे पास थी, खोलेगा कौन?'
'कोई और तो नहीं आया था घर में?'
'तुम्हीं और राजू आए गए, और तो कोई नहीं।'
थोड़ी देर बाद जाने क्या सोच कर वे उठे और राजू को जगा कर ले आए! राजू आँखें मलते हुए आया!
'ब्रीफकेस किसने दिया था तुम्हें?' संजू ने कि सक्सेना ने?
'क्यों, क्या बात है?'
'बताओ तो! कम हैं पाँच लाख में?'
राजू हँसा - 'मँगनी की बछिया के दाँत नहीं गिनते! संतोष कीजिए, जितना मिल गया मुफ्त का समझिए!'
वे एकटक राजू को देखते रहे - 'तुमने तो कुछ इधर उधर नहीं किया!'
'मैं जानता था यही शक करेंगे आप! स्वभाव से ही शक्की हैं।'
'चुप्प!' शीला ने झिड़का 'यही तमीज है बाप से बात करने की!'
'समझ गया। इसी ने चुराया है, बताया नहीं!'
'पहले ही समझ जाना चाहिए था। चोर कभी बताता है कि चोरी उसी ने की है?' राजू बोला।
रघुनाथ ने आश्चर्य से देखा उसकी ओर - 'क्या हो गया है इस लौंडे को? इसका भाई कंप्यूटर इंजीनियर! उसने कभी इस तरह से बातें नहीं कीं अपने बाप से?'
'बातें नहीं कीं, इसीलिए तो चुपके से शादी कर ली और बाप को खबर तक नहीं दी।'
झनझना उठे क्रोध से रघुनाथ। मन हुआ - उसे घर से निकल जाने को कहें लेकिन जाने क्या सोच कर खुद ही उठे और आँगन में आ गए। कोने में बँसखट पड़ी थी, उसी पर बैठ गए। उन्होंने ईश्वर के लिए सिर उठाया आसमान की तरफ।
आसमान धुला-धुला और उजला-उजला लग रहा था - जैसे भोर होने को हो!
'देखो माँ! मैं साल डेढ़ साल से कहता रहा हूँ इनसे कि मोटरबाइक ले दो। घराने के सभी लड़कों के पास है, एक मेरे ही पास नहीं है। इनका कहना था कि हाथ पाँव तोड़ना है क्या? सिर फोड़ना है क्या? चोरी चकारी और लफंगई करनी है क्या? डाके डालने हैं क्या? किसका हाथ पैर टूटा है बोलो तो? तो संजू ने मुझसे पूछा - तुम्हें भी कुछ चाहिए? जब हम वहाँ से आने लगे तब! मैंने कहा - 'हाँ, मोटरबाइक! उसने मुझे रुपए थमा दिए। उसने ब्रीफकेस में से दिया या कहाँ से दिया मुझे नहीं पता!'
'सरासर झूठ! यह जानता है कि संजय अब नहीं आनेवाला। हम नहीं पूछ पाएँगे उससे।' रघुनाथ को यह झूठ बर्दाश्त न हुआ!
शीला खड़ी-खड़ी ढिबरी की मद्धिम रोशनी में सुबक रही थी। वह अपने बेटे के इस रूप से अनजान थी!
'और बताएँ! हमारे बापजान के दो बेटे - संजू और मैं! इन्होंने एक आँख से हमें देखा ही नहीं। सारी मेहनत और सारा पैसा इन्होंने उस पर खर्च किया। पढ़ाया, लिखाया, कंप्यूटर इंजीनियर बनाया और मेरे लिए? कामर्स पढ़ो। जिसे पढ़ने में न यह मेरी मदद कर सकते थे, न मेरा मन लगता था! किसी तरह बीकाम किया तो कोचिंग करो, ये टेस्ट दो, वह टेस्ट दो! मैं थक गया हूँ टेस्ट देते देते! इनसे कहो, ये रुपए कहीं इधर उधर खर्च न करें, डोनेशन के लिए रखें। बिना डोनेशन के कहीं एडमीशन नहीं होनेवाला! साफ-साफ बता दे रहा हूँ।'
'अगर डोनेशन के पैसे न दूँ तो?'
'तो कभी मत पूछिएगा कि यह क्या कर रहे हो? क्यों कर रहे हो?'
'क्या करोगे? डाका डालोगे? तस्करी करोगे? गाँजा हेरोइन बेचोगे? कत्ल करोगे?'
'क्या बक-बक कर रहे हैं आप? फालतू?' झल्ला कर शीला बोली - 'और तू चुप रह? अनाप-शनाप बोल रहा है बाप से।'
राजू ने कमरे से बाहर निकलते हुए पिता को देखा - 'बस कह दिया।'
'सुनो-सुनो! भागो मत! अपने ही बारे में सोचते हो या कभी अपनी बहन के भी बारे में सोचा? जब होता है तभी जाते हो हजार पाँच सौ मार लाते हो उससे? उसकी शादी के बारे में भी सोचते हो कभी?'
'देख रही हो इनका?' वह माँ की ओर मुड़ा - 'जिससे कहना था, उससे नहीं कहा; कह मुझसे रहे हैं जो अभी पढ़ाई कर रहा है। डोनेशन की बात आई तो दीदी याद आ रही है। पहले तो इनसे कहो कि ये कंजूसी और दरिद्रता छोड़ें अब! हँसी उड़ाते हैं लोग। यह ढिबरी और लालटेन छोड़ें और दूसरों की तरह तार खिंचवा के - कम से कम आँगन और दरवाजे पर लट्टू लगवा लें। रोशनी हो घर में! इसके साथ फोन भी लगवा रहे हैं लोग। घर में फोन होगा तो संजू भी जब चाहेगा, बात कर लेगा। तुम भी सरला दीदी से बातें कर लिया करोगी! दीदी से ही क्यों, भाभी से भी!'
माथा पीटते हुए फिर बैठ गए रघुनाथ - 'हाय रे किस्मत। जिनके लिए कंजूसी की, उन्हीं के मुँह से यह सुनना बदा था।'
'और एक बात कह दें तुमसे भी और इनसे भी। फिर ऐसी बेवकूफी न करें जैसी संजू के समय की थी। दीदी से साफ-साफ बात कर लें कि वह इनकी तय की हुई शादी करेंगी भी या नहीं। यह तो भाग-दौड़ करके कहीं तय कर आएँ और वह कह दें कि मुझे नहीं करनी। फिर भद पिटे इनकी!'
'यह तुम कैसे कह रहे हो?'
'इसलिए कि मैंने एक आदमी को अक्सर उनके साथ देखा है! कौन है वह, नही जानता!'
'देखा? इसे शरम नहीं अपनी बहन के बारे में इस तरह बात करते हुए?' रघुनाथ ने दाँत पीसते हुए वहीं से कहा!
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:52

पाँच
सरला दुविधा में थी - ब्याह करे या न करे?
पक्का सिर्फ इतना था कि उसे वह शादी नहीं करनी है जो पापा तय करेंगे!
कई लोचे थे उसकी दुविधा में!
अब से कोई सात आठ साल पहले। उसने अपने अंदर कुछ अजब सा बदलाव महसूस किया था - मन उखड़ा-उखड़ा सा रहता था, कुछ खोया-खोया सा था, बेबात पर हँसी आती थी, किताब कापी कहीं रखती थी, ढूँढ़ती कहीं थी, हरदम गुनगुनाए जाने को जी चाहता था, बाहर आने पर सहेलियाँ हँसने लगी थीं - देखो, देखो। पैरों की चप्पलें - दो डिजाइनों की! क्लास कहानी का, किताब कविता की हाथ में! यही वे दिन थे जब नगर में आनेवाली कोई फिल्म उससे नहीं छूटती थी!
ऐसे ही में जाने कैसे कौशिक सर चुपके से आए और उसके दिल में आ बैठे!
कौशिक सर कविता के अध्यापक। बहुत गंभीर और चुप्पे और सिद्धांतवादी। पतले, लंबे, आकर्षक! अधेड़ और तीन बच्चों - बल्कि युवाओं के पिता! अद्भुत 'सेंस आफ ह्यूमर' के मालिक! उन्हें प्यार करने में कोई खतरा नहीं था! न खतरा, न किसी तरह का संदेह। उसने बहुत समझदारी और विवेक से काम लिया था अपना 'ब्वायफ्रेंड' चुनने में। लड़के लड़कियों में 'गासिप' की भी आशंका नहीं।
कौशिक सर कृतज्ञ और अभिभूत! अस्तप्राय जीवन का अंतिम प्यार - वह भी सरला जैसी सुंदर लड़की का! पचास पचपन की उमर में तो कोई सोच भी नहीं सकता था ऐसे भाग्य के बारे में!
सरला का मन बेचैन, देह बेचैन! महज प्यार भरी बातें और तड़प! और कुछ नहीं। यही तो सहेलियों के साथ भी हो रहा है। कुछ तो अलग हो - कौशिक सर विद्यार्थी थोड़े हैं! ऐसी ही इच्छा कौशिक सर की भी थी लेकिन नगर में ऐसी कोई जगह नहीं, जहाँ कोई उन्हें जानता न हो!
निश्चित हुआ कि कौशिक सर एक दिन टैक्सी से 'अमुक जगह' पहुँचेंगे, वहीं से सरला को 'पिकअप' करेंगे और दो चार घंटे के लिए सारनाथ! फिर वहीं सोचा जाएगा 'एकांत' और 'निर्जन' के बारे में!
प्यार बंद और सुरक्षित कमरे की चीज नहीं। खतरों से खेलने का नाम है प्यार। लोगों की भीड़ से बचते बचाते, उन्हें धता बताते, उनकी नजरों को चकमा देते जो किया जाता है - वह है प्यार! शादी से पहले यही चाहती थी सरला। शादी के बाद तो यह विश्वासघात होगा, व्यभिचार होगा, अनैतिक होगा। जो करना है, पहले कर लो। अनुभव कर लो एक बार। मर्द का स्वाद! एक ऐडवेंचर! जस्ट फार फन!
सरला रोमांचित थी। नर्वस थी और उत्तेजित भी!
जिस दिन जाना था उससे पहले की रात। वह सो नहीं सकी ठीक से। नींद ही नहीं आ रही थी! कई तरह की बातें, कई तरह के खयाल, कई तरह की गुदगुदियाँ! अपने आप लजाती, अपने आप हँसती। उसने सोच लिया था कि अवसर मिलने पर भी इतना आगे नहीं बढ़ने देना है कौशिक सर को कि वे उसे गलत समझ बैठें! यह तो शुरुआत है...
अभी जाने कितनी मुलाकातें बाकी हैं! नहीं, अब कहाँ मुलाकातें? 'फेयरवेल' हो चुका है। दो चार दिन और चल सकते हैं क्लासेज, उसके बाद तो इम्तहान! फिर कहाँ संभव हैं भेंट? कौन सा बहाना रहेगा मिलने का?
कौशिक सर लोकप्रिय आदमी! विश्वविद्यालय के ही नहीं, नगर के भी! जाननेवाले बहुत-से। तरह तरह के लोग! इस बात का गर्व भी था सरला को कि वह जिसे प्यार करती है, वह कोई सीटी बजानेवाला, लाइन मारनेवाला सड़कछाप विद्यार्थी नहीं, विद्वान है!
कौशिक सर ने बड़ी सावधानी बरती थी - छुट्टी का दिन न हो, स्कूल कालेज खुले हों, ताकि छात्र-छात्राएँ पढ़ने में और अध्यापक पढ़ाने में व्यस्त हों, पिकनिक या भ्रमण का कार्यक्रम न बनाएँ, सारनाथ का मेला भी न हो उस रोज!
इसी सावधानी के साथ कौशिक सर सरला के साथ टैक्सी से पहुँचे चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़क के किनारे पहाड़ीनुमा ढूह के ऊपर खँडहर जैसा टूटा फूटा स्तूप! खड़े हो जाओ तो पूरा सारनाथ ही नहीं, दूर-दूर तक के गाँव-गिराँव और बाग-बगीचे नजर आएँ! खाली पड़ा था स्तूप! नीचे चौकीदार, सिपाही, माली अपने अपने काम में लगे थे! एकदम निर्जन अकेला खड़ा था स्तूप! 'हिमगिरि के उत्तुंग शिखर' की तरह। कोई दर्शनार्थी नहीं!
मनु ने श्रद्धा को देखा!
श्रद्धा ने मनु को देखा!
दोनों ने टैक्सी सड़क के एक किनारे खड़ी की और चल पड़े। घुमावदार रास्ते से चक्कर काटते हुए! आगे-पीछे नहीं, अगल-बगल। साथ-साथ। हाथ में हाथ लिए! सरला अकेले में कौशिक सर को 'मीतू' बोलती थी। उस दिन वे सचमुच मीतू हो गए थे। सरला - जो हमेशा समीज-सलवार और दुपट्टे में रहती थी - वही सरला हरे चौड़े बार्डर की बासंती साड़ी में गजब ढा रही थी! बार्डर के रंग का साड़ी से मैच करता बलाउज और माथे पर छोटी-सी लाल बिंदी! हवा उड़ाए ले जा रही थी आँचल को जिसे वह बार बार सँभाल रही थी!
वे चढ़ाई खत्म करके स्तूप के पास पहुँचे और चारों तरफ नजर दौड़ाई - दोनों के मुँह से एक साथ निकला - 'जैसे अछोर, अनंत, असीम हरियाली का समुद्र! और उसमें पीले फूले हुए सरसों के जहाँ तहाँ खेत - ऐसे लग रहे हैं जैसे पालवाली हिलती-डुलती डोंगियाँ!' 'और हम?' सरला ने पूछा! कौशिक सर मुसकराए! बोले - 'मस्तूलवाले बड़े जहाज के डेक पर!'
स्तूप के इस तरफ छाया थी और उस तरफ कुनकुनी धूप! छाया लंबी होती हुई वहाँ तक चली गई थी जहाँ माली काम कर रहे थे। वे उस तरफ गए धूप में, जिधर समुद्र था और हिलती-डुलती पीली डोंगियाँ।
वे स्तूप से सटी साफ-सुथरी जगह पर बैठ गए - चुपचाप! वे चुप थे लेकिन उनके दिल बोल रहे थे - अपने आप से भी, और एक दूसरे से भी! उनके पास तो रह ही क्या गया था कहने-सुनने को? साल डेढ़ साल से यही तो हो रहा था - बातें, बातें, सिर्फ बातें। बातों से वे थक भी चुके थे ओर ऊब भी! सरला बगल में बैठी लगातार कौशिक सर को देखे जा रही थी और वे उसके देखने को देखते हुए दूब नोच रहे थे! फिर सहसा दिलीप कुमार स्टाइल में मुसकरा कर बोले - 'ऊँ? क्या कहा?' हँसते हुए सरला ने अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया - 'बहुत कुछ? सुनो तब तो!'
वे दिल जो अब तक खँडहर के पीछे गुटर गूँ कर रहे थे, कुकड़ू कूँ करने लगे थे भरी दुपहरिया में! कौशिक सर ने सरला की पीठ के पीछे से हाथ बढ़ा कर उसकी सुडौल गोलाई मसल दी! सरला के पूरे बदन में एक झुरझुरी हुई और वह शरमाती हुई उनकी गोद में ढह गई!
अबकी कौशिक सर ने जरा जोर से मसला।
चिहुँक कर सीत्कार कर उठी सरला और आँखें बंद कर लीं - 'जंगली कहीं के!'
कौशिक सर ने सिर झुका कर उसकी आँखों को चूम लिया!
'यह क्या हो रहा है चाचा?' अचानक यह कड़कती आवाज और सामने खड़ा ऐतिहासिक धरोहर का पहरेदार या सिपाही खाकी वर्दी में!
दोनों के चेहरे फक्क्‌। काटो तो खून नहीं। कौशिक सर ने झटपट आँचल के नीचे से हाथ खींचा और सरला उठ बैठी - बदहवास। उनकी समझ में नहीं आया कि यह क्या हो गया, कैसे हो गया? जरा-सी भी आहट मिली होती तो यह नौबत न आती!
घबड़ाए हुए कौशिक सर उस पहरेदार को ताकते रहे!
'देख क्या रहे हो, उठो; यह रंडीबाजी का अड्डा नहीं है! आओ!' वह मुड़ गया।
सरला आँचल में मुँह ढाँप कर रो रही थी! कौशिक सर ने किसी तरह उसे खड़ा किया और अपने पीछे आने का इशारा किया।
'अरे उधर नहीं, इधर! थाने पर!'
'थाने पर क्यों, ऐसा क्या किया है हमने?' हिम्मत जुटाई - कौशिक सर ने!
'वहीं पता चलेगा चाचा कि क्या किया है तुमने? कहाँ से फाँसा है इस लौंडिया को?'
अब तक 'चाचा' और 'रंडीबाजी' - ये अपमानजनक शब्द थे जो कौशिक सर के कानों में गूँज रहे थे लेकिन अब यह 'थाना' - 'थाना' माने बहुत कुछ! जलालत। हवालात। अखबारों की सुर्खियाँ। युनिवर्सिटी में चर्चे। समाज का कोढ़। नौकरी से सस्पेंशन। किस मुँह से परिवार में जाएँगे? और यह सरला? इसका क्या होगा? किस मुसीबत में आ फँसे उसके चक्कर में?
सरला सुबकना बंद कर के एक किनारे खड़ी थी और पहरेदार हाते के गेट के पास! थाना ले चलने की मुद्रा में। चौकीदार और माली भी उसके पास आ गए थे और रोक रहे थे - अरे, छोड़ो भई। जाने दो! उमर देखो चाचा की। काहे पानी उतार रहे हो एक बुर्जुग का! कह भी रहे थे और मजा भी ले रहे थे।
कौशिक सर घबड़ाये हुए सरला के पास आए - 'परेशान न हो! अभी देखते हैं। सब ठीक हो जाएगा।' सरला गुस्से में। उसकी नजरें पहरेदार और मालियों पर टिकी थीं।
कौशिक सर गेट पर खड़े पहरेदार को अलग ले गए और फुस फुस बातें करने लगे। बीच बीच में वह उखड़ जाता और हाथ छुड़ा कर भागने लगता! कौशिक सर ने उसे सौ सौ के दो नोट पकड़ाए जिन्हें उसने फेंक दिया और मालियों की ओर इशारा करते हुए पाँच उगलियाँ दिखाईं - 'नहीं चाचा, नहीं होगा इससे। थाने चलिए?'
'बस्स! बहुत हो चुका यह नाटक!' सरला लगभग दौड़ती हुई उन दोनों के पास पहुँची - 'कैसे ये रुपए? तुम हमसे बात करो अब?'
उसने अचकचा कर कौशिक सर को देखा - 'इनका सुनो चाचा।'
'चाचा होंगे तुम्हारे, मेरे दोस्त हैं, प्रेमी हैं। हमने प्रेम किया, चूमा अपनी मर्जी से। किसी ने किसी के साथ बलात्कार नहीं किया, किसलिए थाने?'
'चलो तो वहीं बताते हैं।' वह चल पड़ा।
आगे खड़ी हो गई सरला रास्ता रोक कर - 'कोई नहीं जाएगा थाने-वाने! न तुम, न हम। एस.पी., कलक्टर, आई.जी. - जिसे बुलाना हो यहीं बुलाओ! समझ क्या रखा है तुमने?'
वह हक्का-बक्का। ताकता रहा कभी कौशिक सर को, कभी सरला को। माली और चौकीदार भी आ गए इस बीच।
'किसने देखा इश्क लड़ाते हुए? यह चौराहा है? बाजार है यह जहाँ रेप हो रहा था? फँसाना चाहते हो रुपयों के लिए? तुम हमें क्या ले जाओगे, हम ले चलेंगे तुम्हें!'
मामले के इस नए पेच को देखते हुए माली बीच-बचाव में आए और उन्होंने निष्कर्ष दिया कि गलतियाँ इनसान से ही होती हैं इसलिए छोड़िए, हटाइए और अपना-अपना काम देखिए!
कौशिक सर जब तक गिरे हुए रुपए उठाते रहे तब तक सरला टैक्सी में बैठ चुकी थी! कौशिक सर उसके बगल में बैठते हुए बोले - 'मैं नहीं जानता था कि इतनी बहादुर हो तुम?'
'मैं भी नहीं जानती थी कि इतने डरपोक और कायर हैं आप!'
टैक्सी वापस लौटी। दोनों एक दूसरे से रास्ते भर नहीं बोले।
यह एक डरावना दुःस्वप्न था - जिसने एक लंबे समय तक पीछा नहीं छोड़ा सरला का।
दुःस्वप्न में पहरेदार का चेहरा ही नहीं था केवल, हथेलियों की छुअन और मसलन भी थी।
छह
सरला के इस दुःस्वप्न को और भी बदरंग बना दिया था उसकी पड़ोसिनों ने!
वह जिस बहुमंजिली इमारत के प्रथम तल के किराए के फ्लैट में रहती थी, उसके अगल बगल भी दो दो छोटे कमरों के फ्लैट थे। उनमें उसी के स्कूल की अध्यापिकाएँ रहती थीं - बाईं तरफ मीनू तिवारी और दाईं तरफ बेला पटेल। मीनू स्कूल की वाइस-प्रिंसिपल थी और वह उसका अपना फ्लैट था - खरीदा हुआ! उसी ने सरला को अपने बगल में दिलवाया था किराए पर!
मीनू बलकट्टी थी - कंधों तक छोटे-छोटे बाल! एकदम लाल मेहँदी से रँगे! उम्र चालीस से ऊपर। स्वभाव से सीरियस और रिजर्व्ड। एक हद तक असामाजिक! किसी के शादी ब्याह में तो नहीं ही जाती थी, आयोजनों में भी शामिल होने से बचती थी। घर से स्कूल, स्कूल से घर, बस यही आना-जाना था। मजबूरी में ही हँसती थी। सहेली भी नहीं थी कोई जिसके साथ उठना-बैठना हो! उम्र के बावजूद उसका गोरा सुडौल बदन आकर्षक था।
वह कुमारी थी। अकेली रहती थी। उसके दो पामेरियन कुत्ते थे - एक काला, दूसरा सफेद! बेटे या बेटियाँ कहिए - ये ही थे। इन्हें ले कर वह दिन में दो बार बाहर निकलती थी, टहलाने या नित्य कर्म कराने। पिंजरे में एक तोता भी था जो किसी के घर में घुसने और जाने के समय बोलता था। उसके इस टें टें को वह 'सुस्वागतम' और 'टा टा' बताती थी। उसकी सारी चिंताएँ इन्हीं को ले कर थीं। 'क्या बताएँ, आज पम्मी दिन भर से गुमसुम है!' 'आज टूटू की नाक बह रही है।' 'पम्मी का पेट खराब है।' 'दोनों में बातचीत बंद है।' 'टूटू पम्मी से किस बात पर नाराज है, बता नहीं रहा है!' 'दोनों मेरे पास सोने के पहले झगड़ा करते हैं, पता नहीं क्यों?' इसी तरह की चिंताएँ। कातिक के पहले से ही वह उनके लिए परेशान होना शुरू हो जाती थी और तब तक रहती थी जब तक पिल्ले नहीं हो जाते थे और जब हो जाते थे तो कई रोज सोहर के कैसेट बजाती थी और फिर नई परेशानियाँ ......
मीनू के घर बाहर से आने वाले सिर्फ दो मर्द थे - एक उसका भाई। वह मीनू से बड़ा था और वकालत करता था! वकालत चलती थी या नहीं - ठीक-ठीक नहीं मालूम! वह हर महीने के पहले सप्ताह में आता था और जब आता था तो देर तक भाई-बहन में चख-चख होती थी। उसके जाने के दो तीन दिनों बाद तक मीनू का मूड खराब रहता था!
दूसरे थे पशुओं के डाक्टर। वे मीनू की ही उमर के या उससे थोड़े बड़े थे। काफी टिप-टाप से रहते थे, बाल डाई करते थे और सफारी सूट पहनते थे! वे गर्मी की छुट्टियों में दोपहर में आते थे जब प्रायः लोग बाहर निकलने से बचते हैं। वे आते और शाम पाँच बजे से पहले चले जाते! जाड़े के मौसम में कभी-कभी मीनू के घर रात के भोजन पर आते। जब वे जाने लगते तो मीनू बालकनी पर खड़ी हो कर देर तक हाथ हिलाती रहती!
इसी बालकनी के बगल में सरला की बालकनी थी जहाँ कभी-कभी खड़ी हो कर दोनों पार्क का नजारा लेती थीं। मीनू की इच्छा के अनुसार सरला उसे स्कूल में मैडम कहती थी और घर पर दीदी! दीदी उसे सल्लो बोलती थी!
वे बालकनी में खड़ी हो कर जो देख रही थीं, वह हफ्ते भर से देख रही थीं!
हर शाम छह बजे के करीब सोलह-सत्तरह साल का एक लड़का पार्क में आता था - गुलदाउदी का बड़ा-सा खिला हुआ फूल ले कर और बैठ कर उसकी पँखुड़ियों पर कुछ लिखता था और इंतजार करता था बी ब्लाक की बालकनी में एक लड़की के आने का! वह शायद दक्षिण भारतीय लड़की थी! वह ब्लाउज और स्कर्ट में आ कर खड़ी हो जाती - लहरदार बालों में एकदम फ्रेश जैसे नहा कर निकली हो! लड़का घूमता, पीठ उसकी तरफ करता और उछल कर पैर से ऐसी किक मारता कि फूल उसकी बालकनी में गिरता! लड़की लाल पोलीथिन में लिपटा फूल उठाती और अपनी गोलाइयों के बीच ब्लाउज के अंदर रख लेती!
घास पर चित गिरा लड़का उठता और उसकी ओर 'किस' उछालता!
जवाब में लड़की मुसकराती, लजाती और होंठों से चुंबन लहरा देती!
'सल्लो! बहुत दिन हो गए तुम्हें काफी पिलाए! आओ न!' एक दिन मीनू ने सरला से कहा! यह वह दिन था जब लड़की ने चुंबन के उत्तर से ही संतोष नहीं किया, गुनगुना कर भी जवाब दिया किन्हीं वक्तों के गाने से - 'छोटी सी यह दुनिया, पहचाने रास्ते हैं, तुम कभी तो मिलोगे, कहीं तो मिलोगे तो पूछेंगे हाल।'
सरला जब पहुँची तो मीनू किचेन में थी। वह थोड़ी देर बाद काफी के दो मग के साथ ड्राइंग रूम में आई - चुप और संजीदा! गई और एक शीशी भी ले आई ब्रांडी की जिसे डाक्टर छोड़ गए थे उसके लिए। उसने एक चम्मच इसमें और एक चम्मच उसमें ब्रांडी डाली और उसका लाभ बताया। इसी समय टूटू आई और मीनू की गोद में बैठ गई। मीनू उसे देर तक सहलाती और प्यार करती रही - 'देखना, एक न एक दिन मार दिया जाएगा यह लड़का! इतना प्यारा लड़का!'
'यह कैसे कह सकती हैं आप?'
मीनू चुप रही, फिर सुबकने लगी - 'नहीं, सल्लो, यही होता है - यही होगा!'
'यह भी तो हो सकता है कि लड़की किसी दूसरे के घर चली जाए या लड़का किसी और को घर बिठा ले! और यह भी तो हो सकता है कि दोनों शादी कर लें।'
'यह तो और बुरा होगा!'
'क्यों?'
'अपने ही बगल में बेला को देख लो! उसने प्रेम विवाह ही किया था न उस पटेल से? पी.सी.ओ. चलाता था और रहता ऐसे था जैसे लाट साहब का नाती! उस पर पागल हो गई थी बेला! ऐसा भी सुना है कि शादी के लिए जहर खाया था उसने! शादी हुई और देखो - रोज-रोज किच-किच, गाली-गलौज, मार-पीट, रोना-पीटना। किसी मर्द से कहीं हँस कर बोल-बतिया ले तो जीना मुश्किल! स्कूल भी देखे, तीनों बच्चों की जिम्मेदारी भी उठाए और पटेल को भी खुश रखे! देखा होता पाँच-सात साल पहले उसे, क्या फिगर थी और क्या निखार था!'
'सिर्फ एक बेला के आधार पर तो यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता दीदी!'
'एक बात गाँठ बाँध लो सल्लो, तुम दोनों एक साथ कर ही नहीं सकतीं। यह समाज ही ऐसा है। प्रेम करो या विवाह करो। और जिससे प्रेम करो उससे ब्याह तो हरगिज मत करो! ब्याह की रात से ही वह प्रेमी से मर्द होना शुरू कर देता है। अगर मुझसे पूछो तो मैं हर पत्नी को एक सलाह दे सकती हूँ। वह अपने पति को अपने से बाहर - घर से बाहर - अगर वह पति का प्यार पाना चाहती है तो - घर से बाहर प्रेम करने की छूट दे; उकसाए उसके लिए! क्योंकि वह कहीं और किसी को प्यार करेगा, तो उसके अंदर का कड़वापन रूखापन भरता रहेगा और इसका लाभ उसकी बीवी को भी मिलेगा! बीवी ही नहीं, बच्चों को भी मिलेगा! समझी?'
'और पत्नी भी ऐसा ही करे तो?'
'तो जीवन भर नर्क भोगने के लिए तैयार रहे! पति तो पति, बच्चे तक माफ नहीं करेंगे इसके लिए!'
सरला कहीं न कहीं इन बातों के आईने में अपने भविष्य का रास्ता ढूँढ़ रही थी, मीनू को नहीं मालूम!
'रुको जरा एक मिनट।' मीनू उठी, 'मिट्ठू देर से टाँय-टाँय कर रहा है। उसके डिनर का समय हो गया है!' उसने कटोरी से भिगोए चने, हरी मिर्च, रोटी का टुकड़ा लिए और पिंजड़े में डाल दिए। तोता मारे खुशी के उछलता और शोर मचाता रहा इस बीच। पम्मी और टूटू ने सिर उठा कर एक बार देखा और फिर अपनी अपनी कुर्सी पर सो गए!
'बैठो, जा कहाँ रही हो?' सरला को खड़ी देख कर मीनू बोली!
'बैठ कर क्या करूँगी, आप बताएँगी तो है नहीं!'
'क्या?'
'यही कि आपने शादी क्यों नहीं की? इस उमर में भी जब आप ऐसी हैं तो पंद्रह साल पहले? सिर्फ सुनती हूँ लोगों से - तरह-तरह की बातें....'
'छोड़ो, जाने दो। कुछ नहीं रह गया है बताने को।' मीनू सिर झुकाए बुदबुदाई। गले से एक लंबी साँस निकली, और आँखों के सहारे छत के पंखों पर जा टिकी। वह हलके से मुसकराई और सूनी आँखों सरला को घूरती रही - 'प्यार कोई क्यों करेगा? क्या करेगा? जब तक जाति और धर्म है तब तक कोई क्या करेगा प्यार? इसी नासमझी का नतीजा भोगा मैंने। लेकिन अपने को रोकना अपने वश में था क्या? हम छह लड़कियाँ थीं और एक साथ किराए पर कमरे ले कर रहती थीं। एक कमरे में दो दो। वहीं से जाती थी कालेज पैदल! बीच में पड़ता था एक मिशनरी हास्पिटल! उसी के गेट के पास खड़ा रहता था माइकेल कर्मा। लंबा पतला। ताँबई रंग। नीग्रो जैसे उभरे कूल्हे और चीते जैसी कमर। टी शर्ट और जींस में। ठोढ़ी पर थोड़ी-सी दाढ़ी और सिर पर खड़े बाल! नगर में सबसे अलग।'
उसने फिर उसाँस छोड़ी और अपने पैरों की - फर्श की तरफ देखने लगी - चुप! उसकी आँखें भर आईं - 'मर्द की देह का भी अपना संगीत होता है। राग होता है! उसके खड़े होने में, मुड़ने में, चलने में, देखने में। बोले न बोले, सुनो तो सुनाई पड़ता है! उस राग को तुम्हारा मन ही नहीं सुनता, तुम्हारे ओठ भी सुनते हैं, बाँहें भी सुनती हैं, कमर भी, जाँघें भी, नितंब भी - यहाँ तक कि छातियाँ भी। 'निपुल्स' कभी-कभी ऐसे क्यों अपने आप तन जाते हैं जैसे कान लगा कर सुन रहे हों - बिना उसकी देह को छुए? वह तीन महीने तक वहीं खड़ा रहा मेरे आते-जाते समय! और जैसे सुबह सुबह अचानक पत्ते पर ओस की बूँद थरथराती और चमकती दिखाई पड़ती है, वैसे ही मैं थी पत्ते की तरह! कब इतनी ओस गिरी कि मैं भीग कर तरबतर हुई - मुझे पता नहीं! सिर्फ इतना पता है कि मैं तो सिर्फ भीगी थी, माइकेल तो डूब चुका था!'
एक दिन सहसा मैंने खुद को उसकी मोटरबाइक के पीछे बैठा पाया। पूछा - 'कहाँ जा रहे हो?' उसने कहा - 'मालूम नहीं!' मैं बैठी नहीं थी, उड़ रही थी उसके डैनों के सहारे! वह आदिवासी - जंगल का पत्ता-पत्ता उसे जानता था, हर पगडंडी उसे पहचानती थी। उसने एक बाजरे के खेत में बाइक खड़ी कर दी - 'उतरो, मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ।' मैं कुछ कहूँ, रोकूँ-टोकूँ इसके पहले ही उसने मेरी साड़ी खोल दी। बोला - 'ब्लाउज खोल दो, नहीं तो बटन टूट जाएँगे।' ब्रा उसी ने खोले - हठ करके! 'बस हिलो मत!' दो कदम पीछे हट गया उलटे पाँव और ऊपर से नीचे तक देखा। मैं अपने हाथों से खुद को ढँकने की कोशिश किए जा रही थी लेकिन बेकार! 'कहो तो छू भी लूँ जरा-सा।' हालत ऐसी थी कि कौन कहे और कौन सुने? थोड़ा-सा झुक कर उसने अपने ओठों से छातियों की खड़ी घुंडियों को बारी-बारी से दबाया, चूमा और सहलाया जीभ से और कहा - 'चलो, पहनो अब?'
'अब कहाँ?' उसने उत्तर दिया - 'विंढम फाल! कोई नहीं होगा इस वक्त! वहीं नहाएँगे!'
'कपड़े कहाँ लाए हैं?'
'नहाने के लिए कपड़ों की क्या जरूरत?'
मीनू बोलती भी रही, लजाती भी रही। कभी चेहरा लाल होता, कभी स्याह पड़ता। कभी आँखें झुकतीं, कभी खुलतीं, कभी बंद होतीं! वह आगे बताने से पहले हिचकिचाई थोड़ी - 'बाइक कहाँ छोड़ी, झरने के मुहाने पर कैसे पहुँचे - एक रहस्यलोक था मेरे लिए और वहाँ एक दिन एक रात रुक कर क्या-क्या किया, क्या-क्या हुआ यह न पूछो। वह सब जैसे पिछले जन्म की बातें हों। माइकेल के साथ ही हम आदिवासी नहीं, आदिमानव हो गए थे। आदमजात नंगधड़ंग। जंगलों में, नदियों के किनारे। पेड़ों के गिर्द गिलहरियों की तरह दौड़ते-भागते रहे। खरगोशों की तरह उछलते-कूदते रहे। झरने में मछलियों की तरह तैरते नाचते रहे। धारा के बीच पत्थरों पर मगर घड़ियाल के बच्चों की तरह धूप सेंकते रहे! क्या क्या नहीं किया हमने? कहते हुए शर्म आ रही है मुझे कि दूसरे दिन दोपहर से पहले ही उसी के शब्दों में कहूँ तो मेरा सोता रिसने लगा लेकिन उस हालत में भी नहीं छोड़ा उसने। इसे ऐसे समझो कि जब मैंने ही नहीं छोड़ा तो माइकेल क्यों छोड़ता? ..... तो वह एक दिन एक रात! बस वही मेरी जिंदगी है।'
सरला सिर झुकाए सुनती रही। मीनू के चुप हो जाने के बाद पूछा - 'फिर?'
'फिर क्या? गए तो दो बार और, लेकिन पिकनिक के सीजन में - भीड़भाड़ में और वही गलती हुई। जाने कैसे खबर लग गई पिता जी को। एक दिन वे आए और कहा - 'अब बहुत कर लिया बीएड., घर चलो!' रो-धो कर किसी तरह इम्तहान दिया और यही भाई था मेरा बाडीगार्ड, जो हर महीने रंगदारी टैक्स ले जाता है!'
'लेकिन शादी क्यों नहीं की उससे?'
'शादी जब पिता जी ने करनी चाही, तब मैंने नहीं की और जब मैंने करनी चाही तब काफी देर हो चुकी थी! और यह भाई! अगर कर लेती तो इसकी आय के स्रोत का क्या होता? नहीं होने दी इसने किसी न किसी बहाने।'
'नहीं, मैं यह पूछ रही हूँ कि माइकेल से क्यों नहीं की?'
'माइकेल!' वह उदास हो गई, 'सोचा था कि अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद करूँगी। और खड़ी भी हो गई पैरों पर! उसकी मानसिक हालत मुझसे भी बुरी थी और जल्दी मचा रहा था। हमने योजना बना ली, तारीख तय कर दी - पहले मंदिर, फिर चर्च, कि सुना - विंढम में उसने काफी ऊपर से छलाँग लगा ली! लोग छलाँग लगाते हैं स्विमिंग पूल में, नदी में, तालाब में - नुकीले चुखीले पत्थरों से पटे झरने में छलाँग लगाते कभी किसी को नहीं सुना! वह इतना मूर्ख भी नहीं था। यह रहस्य छोड़ गया वह जाते जाते कि वह छलाँग ही थी या कुछ और?'
'मान लीजिए अगर वह जीवित रहता और उससे शादी कर लेतीं तो?'
'तो?'
'तो संतुष्ट रहतीं, सुखी रहतीं?'
'देखो सल्लो, सवाल तो बेवकूफाना है। यह कौन बता सकता है कि ऐसा होता तो कैसा होता? जो हुआ ही नहीं, उसके बारे में क्या कहना? हाँ, यही सवाल पहले कभी किया होता तो उत्तर शायद दूसरा होता। समय के साथ सोच भी बदलती जाती है। आज मैं यही कह सकती हूँ कि प्यार को प्यार ही रहने दो। उसे ब्याह तक न ले जाओ या ब्याह का विकल्प मत बनाओ। अपने ही बगल में बेला पटेल से पूछो। उसने जिसे प्यार किया उसी से शादी की। अब पाँच साल बाद फिर प्यार के लिए क्यों बेचैन है?

'सुनो, प्यार एक अनवरत खोज है। खोज किसी और की नहीं, खुद की! हम स्वयं को दूसरे में ढूँढ़ते हैं, एक बिछड़ जाता है या छूट जाता है तो लगता है जिंदगी खत्म। जीने का कोई अर्थ नहीं रह जाता! आँखों के आगे शून्य और अँधेरा! हर चीज बेमानी हो जाती है। लेकिन कुछ समय बाद कोई दूसरा मिल जाता है और नए सिर से अँखुआ फूट निकलता है! यह दूसरी बात है कि दूसरा भी स्वयं को ढूँढ़ते हुए टकराता है! सच कहो तो प्यार की खूबसूरती हर बार उसके अधूरेपन में ही है! उसकी यानी प्यार की उम्र जितनी ही छोटी हो उतनी ही चमक और कौंध! अगर लंबी हुई तो सड़ाँध आने लगती है! यह जरूर है कि इसे छोटी या लंबी करना हमारे वश में नहीं होता।'
सरला का दिमाग चकराने लगा। बहुत देर से बैठे-बैठे या सुनते-सुनते जबकि शुरू इसी ने किया था। मीनू ने भाँपा और पूछा - 'क्या बात है? क्या सोच रही हो?'
सरला दयनीय हँसी के साथ बोली - 'कुछ नहीं! आपने बढ़ा दी मेरी उलझन!'
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:54

सात
जिस दिन मैनेजर कालेज आए उस दिन रघुनाथ गाजीपुर गए थे - सरला के लिए लड़का देखने!
बीसेक रोज बाद फिर मैनेजर कालेज आए, अबकी फिर रघुनाथ बाहर। आजमगढ़ गए थे लड़का देखने।
यह पाँचवाँ या छठा साल था! शादी हाथ में आते आते फिसल जाती थी! छह साल हो रहे थे लड़का ढूँढ़ते-ढूँढ़ते! जैसे-जैसे सरला की उमर बढ़ती जा रही थी, वैसे-वैसे उनकी परेशानी बेचैनी और दौड़-धूप भी बढ़ती जा रही थी! शुरू किया था आई.ए.एस. और पी.सी.एस. से लेकिन उनके रेट इतने हाई कि जल्दी ही ठंडे पड़ गए! पच्चीस लाख से ले कर एक करोड़ तक - यह रकम उन्होंने सपने में भी नहीं देखी थी। भरोसा था तो अपनी बेटी के रूप-गुण और योग्यता का जिसे न कोई पूछ रहा था, न देख रहा था!
इसी दौड़-धूप में उन्हें तो सिर्फ छह साल लगे थे लेकिन बेटी तीस से ऊपर चली गई थी! नौबत यहाँ तक आ पहुँची थी कि अब जो लड़के मिल रहे थे, उनकी उमर बेटी से कम।
बेटी उस इलाके की पहली एम.ए., बी.एड.। सर्विस में आ गई थी और जब से आई थी आत्मविश्वास से भरपूर थी! पापा-मम्मी की परेशानी देख कर कभी कभी माँ से मजाक में कहती - 'पापा मेरे लिए लड़का ऐसे ढूँढ़ रहे हैं जैसे कोई गाय के लिए साँड़ ढूँढ़ता है।' एक बार तो उसने माँ-बाप को मुँह लटकाए देख कर सीधे रघुनाथ से ही कहा - 'आप तो बाजार के नियम के विरुद्ध काम कर रहे हैं। जब कोई अपनी जिंस बेचता है तो बदले में खरीदार से उसकी कीमत वसूलता है। और आप हैं कि अपनी जिंस भी बेच रहे हैं और उसकी कीमत भी अदा कर रहे हैं।' जब रघुनाथ ने उसे डाँटा तो उसने कहा - 'पापा, आप खामखाह परेशान हैं, मुझे शादी ही नहीं करनी।'
हर लड़की ऐसा ही बोलती है - कभी माँ-बाप की चिंता देख कर, कभी शालीनता और संकोच में, कभी खिझलाहट में, कभी विवाह में देर होते देख कर - इससे रघुनाथ की परेशानी कम होने के बजाय बढ़ ही जाती थी!
ऐसे ही वक्त पर मैनेजर का प्रस्ताव आया था अपनी बेटी के लिए! जब वे निराश हो चले थे आजमगढ़वाली शादी को ले कर! लड़का सेल्स टैक्स अफसर लेकिन खर्च लगभग दस-ग्यारह लाख! उनके अपने इस्टीमेट से दुगुना। लेकिन मैनेजर की भलमनसाहत और बड़प्पन - कि मेरे रहते चिंता किस बात की? अपने बड़े बेटे के बरच्छा के नाम पर मुझसे दस लाख ले कर पहले बेटी की शादी कर लो, बेटे की बाद में कर लेना। ऐसे भी यह अच्छा नहीं लगता कि जवान बेटी घर में हो और बेटा शादी कर ले!
इसे कहते हैं बड़प्पन और इसी को कहते हैं भाग्य! कहाँ मैनेजर और कहाँ उन्हीं के कालेज के मास्टर रघुनाथ!
पूरे जनपद में फैल गई थी यह खबर और हर आदमी इस मुहूर्त का इंतजार कर रहा था - कि संजय ने सारा कुछ मटियामेट कर दिया!
अब रघुनाथ कौन-सा मुँह ले कर जाएँ मैनेजर के पास ?
उसी बेटे ने - जिस बेटे पर उन्हें भरोसा और गुमान था - उसी बेटे ने उनकी जुबान काट कर उस सक्सेना को दे दी जिससे उनकी न जान थी, न पहचान थी!
किसी तरह से साहस जुटा कर रघुनाथ गए मैनेजर के घर।
बँगले के सामने बने अपने नए कॉटेज में बिस्तर पर अधलेटे मैनेजर किसी से फोन पर बातें कर रहे थे! उन्होंने रघुनाथ की ओर कोई ध्यान नहीं दिया! मैनेजर आधे घंटे तक कभी इससे कभी उससे बातें करते रहे, फिर नहाने चले गए!
नहा-धो और पूजा-पाठ करके दो घंटे बाद आए तो रघुनाथ को बैठे हुए देखा।
'आए कैसे?'
'अपने स्कूटर से!'
'क्यों? कार कहाँ गई?'
'कार कहाँ है?'
'क्यों? उसे अमेरिका ले गया क्या बेटा?' हँसते हुए मैनेजर सोफा पर बैठ गए और टाँगें मेज पर फैला दीं - 'मास्टर, शादी तुम्हारे बेटे ने की, बधाइयाँ मुझे मिल रही हैं। सभी बोल रहे हैं कि कितना अच्छा हुआ कि घटिया आदमी का समधी होने से आप बाल-बाल बचे।'
रघुनाथ गुनहगार की तरह सिर झुकाए चुपचाप सुनते रहे।
'मास्टर, जो भी होता है, अच्छा होता है! शुरू से ही मेरे मन में हिचक थी! जो भी सुनता था, अचरज करता था और आपके भाग्य को सराहता था! कहते थे लोग कि क्या देख कर शादी की सोची है आपने? कोई तो मेल हो? कहीं तो मेल हो? सभी रिश्तेदार, दोस्त मित्र नाखुश! मैंने कहा - नहीं, संकट में है रघुनाथ! चाहे जैसा हो, है तो मेरे ही कालेज का। ऐसे वक्त पर मैं मदद नहीं करूँगा तो कौन करेगा? तो मैंने वह करना चाहा जो मेरे जमीर ने कहा। लेकिन तुम्हारी किस्मत ही खोटी थी तो मैं क्या करता?' वे रुक कर बाहर देखने लगे!
बाहर दरवाजे के सामने ही बोलेरो खड़ी थी और घुर्र-घुर्र कर रही थी! शायद कहीं जाना था मैनेजर को! उन्होंने ड्राइवर को डाँट कर गाड़ी चुप कराई।
बँगले और कॉटेज के बीच टिन का लंबा शेड था जिसके नीचे कार, ट्रैक्टर, ट्राली और मोटरबाइक साइकिलें खड़ी थीं। बोलेरो वहीं से लाई गई थी।
'रघुनाथ, गलती तुम्हारे बेटे ने की लेकिन मुझे क्रोध उस पर नहीं, तुम पर है! इसलिए कि तुमने मुझसे छिपाया। तुम जानते हो मैं कभी किसी का अहित नहीं करता! जहाँ तक बन पड़ता है मदद ही करता हूँ। बराबर ध्यान रखता हूँ कि अपनों को कोई तकलीफ न हो। लेकिन तुमने छिपाया और उसी का दुःख है और क्रोध भी है! तुम्हें बता देना चाहिए था कि तुम्हारा बेटा तुम्हारे कहने में नहीं है। यही नहीं, यह भी कह देने में कोई हर्ज नहीं था कि वह चरित्रहीन और भ्रष्ट है! यह घर की बात थी, मुझे बताने में किस बात का डर और संकोच? मैं तुम्हें खा तो नहीं जाता?'
रघुनाथ नीचे देखते हुए चुप रहे। उनमें यह साहस नहीं था कि कह दें - ये दोनों इलजाम सरासर गलत हैं! लेकिन यह कहने पर अनर्थ हो जाता। मैनेजर का क्रोध क्या रूप लेता, कहना कठिन था! उन्होंने जलील होने में ही अपनी भलाई समझी और मैनेजर उसी रौ में सुनाते रहे।
'अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है कि तुम्हारे बेटे ने तुम्हारे साथ क्या किया है? अपनी नासमझी में तुम्हें कितनी मुसीबत में डाल दिया है। तुम्हारी बेटी अभी कुँवारी है। ईश्वर न करे कि कुँवारी ही रह जाए! ऐसा अकारण नहीं कह रहा हूँ! तुम्हें तब पता चलेगा जब बेटी के लिए वर देखने निकलोगे! जहाँ जाओगे, और बातों से पहले लोग यही पूछेंगे कि आपके रिश्ते कहाँ-कहाँ हैं? बताना तो पड़ेगा ही कि बेटे ने कायथ लड़की से शादी की है, समधी लाला है! बताओगे या छिपा जाओगे? ऐसी बातें छिपतीं तो हैं नहीं! तुम छिपाओगे तो वे दूसरे से पता कर लेंगे! जानते ही हो, जो भी रिश्ता करता है, ठोंक-बजा के करता है!'
रघुनाथ उठ खड़े हुए और हाथ जोड़ दिए - ' ठीक है, चलता हूँ।'
'अरे बैठो। ऐसी क्या जल्दी?'
'नहीं, जरूरी काम है, अब देर हो रही है!'
'अच्छा, जाओ।' मैनेजर भी साथ में उठ खड़े हुए - 'अच्छा, यह बताओ, तुम्हारा रिटायरमेंट कब है?'
रघुनाथ चौंके और उन्हें देखने लगे!
'इसलिए पूछा कि प्रिंसिपल साहब ने बताया - तुम्हारा मन नहीं लग रहा है पढ़ाने में। अक्सर क्लास छोड़ रहे हो और बाहर ही रहते हो!'
'ऐसा तो नहीं है! जरूरत पड़ने पर एक्स्ट्रा क्लासेज लेता हूँ और कोर्स पूरा करता हूँ! रिजल्ट कभी खराब नहीं आता मेरे लड़कों का!'
'ठीक है! मगर मैं दो बार गया इस बीच और दोनों बार पाया गैरहाजिर! खैर, यह आप और प्रिंसिपल साहब के बीच की बातें हैं, हमसे क्या मतलब?' कहते हुए मैनेजर बोलेरो में बैठ गए!
रघुनाथ कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रहे!
गाड़ी के स्टार्ट होने के पहले मैनेजर ने नौकर को आवाज दी - 'भोलू! मास्टर साहब खाना चाहें तो खिला देना, हमें देर हो सकती है!'
रघुनाथ लौट पड़े। उन्हें बार-बार लग रहा था कि आ कर उन्होंने गलती की - नहीं आना चाहिए था!
आठ
सरला घर आई - छुट्टी के दिन। रविवार को।
पहले वह अकसर आती थी। शनिवार की शाम को आती थी, रविवार को रहती थी और सोमवार को तड़के चली जाती थी! मिर्जापुर से घर की दूरी है ही कितनी? बीच में बनारस में एक बस बदलनी पड़ती थी - बस! लेकिन साल दो साल से आना उसने एकदम से कम कर दिया था! इसलिए कि सरला को लगता था कि उसके आने पर माँ बाप खुश होने के बजाय चिंतित और परेशान हो उठते हैं, जैसे बेटी नहीं, समस्या आ गई हो; जैसे कह रही हो - लो, देख लो! बुढ़िया तो हो गई, अब भी नहीं तो कब करोगे शादी?
रघुनाथ गाजीपुर आजमगढ़ होते हुए सुबह ही लौटे थे!
वे अपनी ओर से मन बना कर आए थे - दोनों में से एक; जिसे शीला और सरला 'हाँ' कर दें। वे दोनों के बारे में शीला से बात कर चुके थे। खर्च के मामले में दोनों महज बीस उन्नीस की शादियाँ थीं! आठ से दस लाख के बीच। वे साल भर से लगे हुए थे इनके पीछे और अब 'फाइनल' करने का समय आ गया था।
आजमगढ़ का लड़का 'सेल्स टैक्स अफसर' । फिलहाल इलाहाबाद में कार्यरत। खानदानी कुलीन स्वतंत्राता सेनानी वीर कुँवर सिंह का रिश्तेदार। पिता काशी ग्रामीण बैंक में खजांची। 'ईमानदारी' और 'मददगार' की छवि बनाए रखने के साथ पाँच साल के अंदर आजमगढ़ शहर में दुमंजिली कोठी! लड़के के दो छोटे भाई और दो छोटी बहनें। माँ जीवित। लड़का कुछ नहीं तो कम से कम एडीशनल कमिश्नर हो कर रिटायर करेगा। उसने अनौपचारिक रूप से लड़की देख ली थी और पसंद की थी।
लड़के की तरफ से मामला फँसा हुआ था लड़की की नौकरी को ले कर - कि दोनों में से नौकरी कोई एक ही करेगा। लड़की अगर नौकरी करना भी चाहे तो तब करे जब बच्चे स्कूल जाने लायक हो जाएँ! यह शर्त ऐसी थी जिसे सरला मानेगी - इसमें संदेह था रघुनाथ को।
कुछ बातों को ले कर शीला भी असमंजस में थी - लड़का सबसे बड़ा बेटा। दो देवर होंगे और दो ननदें। देवरों को पढ़ाने की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ सकती है भाभी को! ननदें स्वभाव से ही किचकिची होती हैं - जलनेवाली और एक न एक बखेड़ा खड़ी करनेवाली! झंझटिया! बड़ी होने के कारण उनके शादी ब्याह में कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा! सास भी अभी मरी नहीं है - झगड़ालू और हर बात में मीन-मेख निकालनेवाली हुई तो भारी मुसीबत! हो सकता है, बुढ़ौती बड़ी पतोह के साथ काटने की सोचे! सरला अलग नौकरी करती रहे तब भी ये झंझटें कम नहीं होनेवाली। उसने तय किया था कि बेटी से समझ बूझ कर ही फैसला करना ठीक होगा!
दूसरी शादी गाजीपुर की। इससे उलट। लड़का इलाहाबाद में पाँच साल से कोचिंग करते हुए लोक सेवा आयोग की परीक्षाएँ दे रहा था! आई.ए.एस. की भी और पी.सी.एस. की भी! पिछली बार इंटरव्यू तक जा कर छँटा था! गोरा, लंबा, खूबसूरत। देर सबेर कहीं न कहीं चयन निश्चित था। रघुनाथ दुबारा वह गलती नहीं दुहराना चाहते थे जो एक बार कर चुके थे। दो साल पहले! जब लड़का कंपटीशन दे रहा था तो शादी मुफ्त थी, बेरोजगार समझ कर नहीं की इन्होंने लेकिन जब तीन महीने बाद ही 'सेलेक्ट' हो गया तो कीमत पचास लाख! हाथ से निकल गई शादी।... तो इसे कुछ न कुछ बनना ही है देर सबेर! पिता जीवन बीमा निगम में उपप्रबंधक! बेटा इकलौता - न भाई, न बहन! पिता के एक बड़े भाई - वह भी नावल्द! उनकी भी संपत्ति इसी को मिलनी है!
शीला का झुकाव इसी शादी की ओर था! इससे भी छोटा परिवार क्या मिल सकता है किसी को ? न ननद की झंझट है, न देवर की। जहाँ चाहो, वहाँ रहो। जैसे चाहो, वैसे रहो! जो चाहो, वह करो। न कोई देखनेवाला, न रोकनेवाला। नर्सिंग होम और अस्पताल की जरूरत हुई तो सास हाजिर! बुढ़ऊ को छोड़ कर सास न जा पाए, तो माँ है ही! जितनी ससुराल, उतना ही मायका - दोनों तुम्हारे।
रघुनाथ का नजरिया कुछ और था! उन्हें आजमगढ़वाले की पक्की नौकरी और भरा-पूरा परिवार ज्यादा आकृष्ट कर रहा था! लेकिन उन्होंने निर्णय सरला पर छोड़ रखा था!
सरला ने पिता को देखा - इन्हीं चंद दिनों में कितने बदल गए पिता? गंजे हो गए हैं। सिर से बाल उड़ गए हैं - कनपटियों को छोड़ कर। सामने के दो दाँत जाने कब उखड़ गए! ठोकर बैठ गया है! थोड़ा और झुक गए हैं और बूढ़े की तरह चलने लगे हैं।
पिता ने भी बेटी को देखा - वह भी बदली-बदली-सी लग रही जाने क्यों? अबकी उन्हें वह कोई लड़की नहीं, युवती दिखाई पड़ी। उसे समीज-सलवार में देखने की आदत पड़ गई थी उन्हें - शायद! लेकिन उसका जो चेहरा इतना उदास और सूखा रहता था, वह इतना हरा-भरा और प्रसन्न क्यों? यही नहीं, दुबले-पतले शरीर में भी भराव और आकर्षण आ गया था। ऊबड़-खाबड़ समतल सीने पर गोलाइयाँ उभार के साथ पुष्ट नजर आ रही थीं! रघुनाथ का अनुभव बता रहा था कि ऐसा किसी मर्द के संसर्ग और हथेलियों के स्पर्श के बगैर संभव नहीं लेकिन मन कह रहा था कि ऐसा खाने-पीने की सुविधाओं और निश्चिंतताओं के कारण है! उन्होंने साड़ी-ब्लाउज में खड़ी अपनी बेटी को आजमगढ़वाले की नजर से देखने की कोशिश की।
सरला उन दोनों शादियों के बारे में गंभीरता से सुनती रही! देर तक।
'हाँ बोलो, इनमें से कौन पसंद है तुम्हें?' रघुनाथ ने अंत में पूछा।
'कोई नहीं! उनसे कहिए वे जहाँ चाहे, वहाँ करें मुझे नहीं करनी!'
'क्या?' रघुनाथ अवाक्‌! उनकी आँखे फटी रह गईं। वे एकटक देखते रहे - 'सात सालों से यही सुनने के लिए दौड़ता रहा?'
रघुनाथ निखहरी खटिया पर बैठे थे और शीला, सरला बगल में पड़ी प्लास्टिक की कुर्सियों पर। संध्या की छाया आँगन में उतर आई थी। सरला माँ-बाप की सबसे प्यारी दुलारी बेटी थी और मुँहलगी भी! रघुनाथ ने बेटों से दूरी बनाए रखी थी, लेकिन बेटी से नहीं! जो बातें किसी से नहीं कर पाते थे, वे भी बेटी से कर लेते थे। बेटी बाप का लिहाज तो करती थी लेकिन कुछ कहने-सुनने में संकोच नहीं करती थीं!
'मैंने तो कभी नहीं कहा कि आप दौड़ें! फालतू में दौड़ा करें तो इसके लिए मैं क्या करूँ? पूछिए माँ से, कई बार कहा है कि मुझे नहीं करनी शादी!'
'नहीं करनी है तो क्या अकेले रहना है - इसी तरह?'
'मैंने यह कब कहा है? मैंने सिर्फ यह कहा है कि मुझे ऐसी शादी नहीं करनी है जिसमें लेन-देन और मोल-भाव होता हो?'
'कौन सी शादी है जिसमें यह सब नहीं होता? क्या संजय में नहीं हुआ?'
'उसकी बात छोड़िए, वह तो शादी नहीं, सौदा था!'
'तुम कहना क्या चाहती हो आखिर?' रघुनाथ ने आँखें तरेर कर उससे पूछा और चुप देख कर खटिया पर पसर गए ! थोड़ी देर शांत रह कर उन्होंने कहा - 'शीला, समझाओ इस लड़की को! शहर में रह कर इसका दिमाग खराब हो गया है!'
शीला सिर झुकाए शुरू से ही लोर बहा रही थी। अपना नाम सुनने के बाद तो हिचकियाँ लेने लगी - 'तुम्हीं ने सिर चढ़ाया है, तुम्हीं भुगतो! जब इसने बी.ए. किया था तभी मैंने कहा था कि कर दो इसकी शादी! तो नहीं, अभी पढ़ेगी। एम.ए. किया तो फिर कहा कि बहुत हो गया, अब कर दो! तो नहीं, अपने पैरों पर खड़ी होगी हमारी बेटी! नौकरी करेगी। अब देखो इसका रंग-ढंग? मैंने कहा था तुमसे कि दुनिया का चक्कर लगाने से पहले पूछ लो अपनी लाड़ली से एक बार। नहीं पूछा, अब भोगो!'
'पापा, नाराज न हों तो मैं कुछ कहूँ।' सरला सहज थी। परेशान माँ-बाप थे, सरला नहीं - 'आप और माँ मेरी आँखें हैं जिनसे मैंने दुनिया देखना शुरू किया था। उन्हीं से मैंने देखा कि मर्द एक बैल है जिसे मुश्तकिल खूँटा चाहिए - अपने विश्राम के लिए! वह खूँटा आपके लिए माँ थी और सच-सच बोलिए, क्या माँ आपके लिए विवशता नहीं थी?'
'बंद करो यह बकवास?'
'पापा, मैंने आपकी वह जिंदगी भी देखी है जो सबने देखी है लेकिन मैंने थोड़ी- बहुत वह जिंदगी भी देखी है जो आपने चोरी से जी है। शायद हर आदमी इस तरह की दो जिन्दगियाँ जीता हो - एक वह जिसे दुनिया देखती है, दूसरी वह जिसे सिर्फ वह देखता है। चोरी की जिंदगी - जिसे केवल वही देखता और जानता है! मुझे लगता है कि आदमी की असल जिंदगी वही होती है जिसे वह चोरी से जीता है, दिखावेवाली नहीं। ... आज इतने दिनों बाद मैं समझ सकी हूँ कि जब मैं हाई स्कूल में थी तो मिसेज रेखा मैडम क्यों मुझे इतना प्यार करती थीं और आपके लिए चिंतित रहती थीं।' यह अंतिम वाक्य अंग्रेजी में और धीमे से बोली थी सरला जिसे शीला ने तो नहीं समझा या सुना लेकिन रघुनाथ गुस्से में उठ बैठे - 'बकवास बंद करो, साफ-साफ बताओ तुम्हें शादी करनी है या नहीं?'
'जब करनी होगी तो कर लूँगी, आप क्यों परेशान है?'
'इसलिए कि हम जिंदा हैं, मर नहीं गए !'
'आप नहीं कर पाएँगे पापा! हम जानते हैं आपको, इसलिए छोड़िए!'
'जब संजय को बर्दाश्त कर लिया तो तुम्हें भी कर लेंगे, बोलो तो!'
सरला थोड़ी देर चुप रही और रघुनाथ को देखती रही - 'किसी सुदेश भारती की याद है आपको?'
'एक तो वही है तुम्हारे मिर्जापुर का एस.डी.एम.!'
'कोई दूसरा भी है?'
रघुनाथ ने दिमाग पर जोर डाल कर कहा - 'एक कोई भारती भारती करके था जो तुम्हारे साथ एम.ए. में पढ़ता था।'
'और उसकी तारीफ करते थे आप! वही आपको ले कर बाजार जाता था!'
'हाँ, अच्छा लड़का था। मगर चमार था!'
'मिर्जापुर वाला वही भारती है! जिसे आप अच्छा कहते थे।'
'तो?' रघुनाथ विस्मय से उसे घूरते रहे!
'तो क्या? उसके साथ मेरी शादी करेंगे आप?'
रघुनाथ खटिया पर फिर पसरें, इसके पहले ही शीला फफक कर रोने लगी! रघुनाथ ने आकाश की ओर दोनों हाथ उठाए - 'हे भगवान! यह क्या कर रहे हो मेरे साथ! लाला तक गनीमत थी लेकिन अब? मैं क्या करूँ? किसे मुँह दिखाऊँ?' ... वे पागल की तरह अनाप-शनाप बक-झक करने लगे!
'इससे तो अच्छा है कि कुँवारी ही रह!' शीला ने रोते हुए कहा!
'माँ, ये तो सात साल से लोगों के दरवज्जे=दरवज्जे घिघियाते फिर रहे हैं और इतने ही सालों से वह मेरी आरजू-मिन्नत कर रहा है - पूरे सम्मान और इज्जत के साथ! कोटे में ही सही, लेकिन पी.सी.एस. है। देखने-सुनने में भी किसी से कम नहीं। मेरी नौकरी से भी उसे एतराज नहीं! कभी कोई बदतमीजी भी नहीं की मेरे साथ! कोई ऐसा-वैसा ऐब भी नहीं उसमें! मैंने अब तक 'हाँ' नहीं की है लेकिन सोच लिया है कि करूँगी तो उसी के साथ!'
'उसके बाद लौट कर कभी पहाड़पुर मत आना! अपना थोबड़ा मत दिखाना। यह याद रखो!' रघुनाथ खड़े हो गए - 'अब जाओ यहाँ से! कोई जरूरत नहीं तुम्हारी! मर गए माँ-बाप!'
'रात हो रही है। इस वक्त कहाँ जाएगी?' शीला बोली!
'चाहे जहाँ जाओ, जाओ!'
सरला मुसकराती बैठी रही - 'अभी कहाँ की है? अभी तो रह सकती हूँ।'
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