रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 20:00

.................................................खंड - 3
..............................................एक
वह घर जिसे राँची के प्रोफेसर राजीव सक्सेना ने रिटायर होने के बाद अपने रहने के लिए बनारस में बनवाया था और जिसे अपनी बेटी सोनल के नाम कर दिया था, वह 'अशोक विहार' में था।
बनारस में मुहल्ले थे, नगर, विहार और कालोनियाँ नहीं। इनका निर्माण शुरू हुआ 1980-1990 के आसपास जब पूर्वांचल और बिहार में भू-माफियाओं और बाहुबलियों का उदय हुआ! उन्होंने नगर के दक्खिन, पच्छिम और उत्तर बसे गाँव के गाँव खरीदे और उनकी 'प्लाटिंग' करके बेचना शुरू किया! देखते-देखते पंद्रह-बीस वर्षों के अंदर गाँव के वजूद खत्म हो गए और उनकी जगह नए-नए नामों के साथ नगर, कालोनियाँ और विहार बस गए!
यह नया बनारस था - महानगरों की तर्ज का।
मुहल्लों में रहनेवाले मुहल्लों और महलों में ही रहे - अपने पुश्तैनी काम-धंधों, दुकानों, रोजगारों और घाटों के साथ लेकिन इन कालोनियों में बसनेवाले ज्यादातर नए नागरिक थे!
ये बाहर से आए थे। आसपास के जनपदों से! जिलों से! सौ पचास किलोमीटर की दूरी से! इनके अपने गाँव थे, थोड़ी बहुत जमीन थी, खेती बारी थी। उन्हें समय-समय पर बनारस आना ही पड़ता था - कभी कोर्ट कचहरी के काम से, कभी अस्पताल के काम से, कभी तीरथ-बरत के लिए, कभी शादी ब्याह की खरीददारी के लिए, कभी बच्चों के ऐडमीशन और पढ़ाई के लिए। बार-बार आ कर लौटने से बेहतर था कि यहाँ ठहरने और रुकने का एक स्थायी ठिकाना हो, एक डेरा हो।
लेकिन ऐसा सिर्फ उन्हीं के लिए संभव था जिनके पास अपनी कोई छोटी मोटी नौकरी हो; और अगर वह नौकरी काफी न हो तो बेटों में से कम से कम एक बाहर कमा रहा हो जिसके बच्चे गाँव में बोर होते हों और वहाँ नहीं रहना चाहते, शहर के आदी हो गए हों और अपना हित उधर ही देखना चाहते हों।
हालाँकि गाँव में वह सब पहुँच रहा था धीरे धीरे, जो शहर में था - बिजली भी, नल भी, फ्रिज भी, फोन भी, टी.वी. भी, अखबार भी लेकिन वह मजा नहीं था जो शहर में था। मजा था भी तो उनके लिए जिनके पास ट्रैक्टर था, थ्रेशर था, पंपिंग सेट था, बोलेरो या सफारी थी, जो खेती पेट के लिए नहीं, व्यवसाय के लिए कर रहे थे, जो एक नहीं, एक ही साथ सभी राजनीतिक पार्टियों के हमदर्द और मददगार थे!
ऐसे लोगों की कालोनियाँ भी दूसरी-दूसरी थीं - लंबे चौड़े प्लाटोंवाली!
लेकिन 'अशोक विहार' उनकी कालोनी थी जो अध्यापक थे, बाबू थे, दोयम दर्जे के सरकारी गैर-सरकारी कर्मचारी थे और इससे भी खास बात यह कि जो या तो रिटायर हो चुके थे या निकट भविष्य में रिटायर होनेवाले थे!
न तो अखबारों में कोई विज्ञापन था, न किसी नुक्कड़ पर इस आशय की होर्डिंग कि इस कालोनी के प्लाट उन्हीं को बेचे जाएँगे जो पचास-पचपन से ऊपर के होंगे और जल्दी ही रिटायर होंगे लेकिन जाने यह कैसे हुआ कि जब कालोनी तैयार हुई तो पाया गया कि यह बूढ़ों की कालोनी है! ऐसे बूढ़े-बूढ़ियों की जिनके बेटे-बेटी अपनी बीवी और बच्चों के साथ परदेस में नौकरी कर रहे हैं - कोई कलकत्ता है, तो कोई दिल्ली, कोई मुंबई तो कोई बंगलौर और कइयों के तो विदेश में।
इनका दुःख अपरंपार था। इन्होंने बेटे-बेटियों के लिए अपने गाँव छोड़े थे - अपनी जन्मभूमि - कि यह हमारे लिए तो ठीक, चाहे जैसे रह लें लेकिन उनके लिए नहीं। न बिजली, न पानी, न लिखने-पढ़ने, न आने-जाने की सुविधा! घर हो तो ऐसी जगह जहाँ से खेती-बारी पर भी नजर रखी जा सके और बेटों-बेटियों को भी असुविधा न हो! वे अपनी जगह-जमीन, रिश्ते-नाते, संगी-साथी, बाग-बगीचे, ताल-तलैया छोड़ कर जिन संतानों के लिए आए, वे ही बाहर। इतने तक तो गनीमत थी। लेकिन अब हालत यह है कि जो जहाँ सर्विस कर रहा है, वह उसी नगर में रम गया है और वहाँ से लौट कर यहाँ नहीं आना चाहता। अगर वह आना भी चाहता है तो उसके बच्चे नहीं आना चाहते!
लीजिए यह नई मुसीबत!
जिनके लिए बेघर हुए उन्हीं के अपने अलग घर!
यह नई मुसीबत न उन्हें जीने दे रही थी, न मरने दे रही थी। गाँव पर पुश्तैनी जमीन-जायदाद। बाप-दादों की धरोहर। न देखो तो कब दूसरे कब्जा कर लें, कहना मुश्किल। पुरखों ने तो एक-एक कौड़ी बचा कर, पेट काट कर, जोड़-जोड़ कर जैसे-तैसे जमीनें बढ़ाई ही, चार की पाँच ही कीं - तीन नहीं होने दीं और यहाँ यह हाल! जरा-सा गाफिल हुए कि मेड़ गायब! महीने दो-महीने में कम से कम एक बार गाँव का चक्कर लगाते रहो। देख लें लोग कि नहीं हैं; ध्यान है। हाल-चाल लेते रहो, कुशल-मंगल पूछते रहो, खुशी-गमी में जाते रहो, सब से बनाए रखो। अधिया या बँटाई पर खेती करो तब भी। दिया-बाती और घर-दुआर की देख-रेख के लिए कोई नौकर-चाकर रखो तब भी!
उनके बेटों के बचपन गाँव में बीते थे। नगर में पढ़ाई के दौरान भी वे आते-जाते रहते थे गाँव पर। उन्होंने खेती भले न की हो लेकिन उन्हें इतना पता था कि उनके खेत कहाँ-कहाँ हैं, कौन-कौन से हैं - धान के, गेहूँ के, दलहन के? उन्हें थोड़ी-बहुत जानकारी थी। खेल या कुतूहल में ही सही, बाप-चाचा के साथ लगे रह कर उन्होंने अगोर की थी, बुआई-कटाई देखी थी। लोग भी जानते थे कि यह फलाने का बेटा या भतीजा है। गाँव-घर से माया-मोह के लिए इतना कम नहीं था लेकिन उनके बच्चे? वे तो दादा-दादी को छोड़ कर पहचानते ही किसको हैं? और दादा-दादी को भी कितना पहचानते हैं? चिंता उसकी होती है जिससे मोह होता है, प्रेम होता है; जिससे प्रेम ही नहीं, परिचय और संबंध ही नहीं, उसकी क्या चिंता? खेत भी उसे पहचानते हैं जो उनके साथ जीता- मरता है। वे खेतों को क्या पहचानेंगे, खेत ही उन्हें पहचानने से इनकार कर देंगे!
ये सारी बातें बेटों की नजर में 'बुढ़भस' थीं। आप माटी में ही पैदा हुए और एक दिन उसी माटी में मिल जाएँगे! कभी उससे छूटने या ऊपर उठने या आगे बढ़ने की बात ही आपके दिमाग में नहीं आई - क्योंकि उसमें भी गोबर नहीं तो माटी ही थी। क्या कर लिया खेती करके आपने? कौन सा तीर मार लिया? खाद महँगी, बीज महँगा, नहर में पानी नहीं, मौसम का भरोसा नहीं, बैल रहे नहीं, भाड़े पर ट्रैक्टर समय पर मिले, न मिले, हलवाहे और मजूरे रहे नहीं - किसके भरोसे खेती करो? और खेती भी तब करो जब हाथ में बाहर से चार पैसे आएँ? क्या फायदा ऐसी खेती से?
असल चीज पैसा है! अगर हाथ में पैसा हो तो वे सारे जिंस बिना कुछ किए बाजार में मिल जाते हैं जिनके लिए आप रात दिन खून पसीना एक करते हैं। बिना कुछ किए, बिना कहीं गए।
सारी जिच और सारा झगड़ा और सारा बवाल बेटों से उनका चल ही रहा था गाँव को ले कर, कि अब एक नई मुसीबत - 'अशोक विहार' के मकान का क्या होगा? वे जहाँ हैं, वहाँ से आना नहीं चाहते!
ये हैं कि इनसे न गाँव छूट रहा है, न अशोक विहार - दुनिया भले छूट जाए!
दो
इसी छोटे से-अशोक विहार के लेन नं. 4 के डी-1 में अमेरिका से आई सोनल सक्सेना रघुवंशी।
तीन साल बाद।
उसके डैडी आए थे सोनल की 'सैंट्रो' पहुँचाने और विश्वविद्यालय में ज्वाइन कराने। इतना ही नहीं किया उन्होंने, हफ्ते भर रह कर घर ठीक-ठाक किया, उसे सजाया, सँवारा, सुबह-शाम बेटी को चाय पिलाई, उसकी दिनचर्या निर्धारित की और विदा होने से पहले उसे सलाह दी - 'संजू के पापा-मम्मी को बुला लो, वे काम आएँगे। घर भी देखेंगे और तुम्हारी भी मदद होगी!'
यही कहा था संजय ने भी अमेरिका से विदा करते समय - 'हम दोनों भाई बाहर हैं, पापा-मम्मी गाँव पर अकेले हैं। इस उमर में उन्हें सहारे की जरूरत है, उन्हें साथ रखना!'
यह पहली रात थी जब वह घर में अकेली थी। देर तक वह अपने बेडरूम में संगीत सुनती रही - एक कैसेट के बाद दूसरा कैसेट। शास्त्रीय से ऊबती तो अर्धशास्त्रीय, इससे भी ऊबती तो फिल्मी गाने! पढ़ती भी रहती, सुनती भी रहती! बिजली गुल करके सोने की आदत थी! बेडरूम को छोड़ कर बाकी कमरों की बत्तियाँ जली छोड़ दीं और लेट गई।
सन्नाटे की भी अपनी आवाज होती है और वह सुहानी कम, डरावनी ज्यादा होती है! यही नहीं, ये आवाजें सुनाई ही नहीं, दिखाई भी पड़ती हैं। उसके घर के सामने ही पार्क था - बड़ा-सा। पूरे मुहल्ले या कह लो, कालोनी का। जब से आई थी, तब से सुबह-शाम देख रही थी! वह तीन साल से ऐसी दुनिया में रह कर आई थी जहाँ अँधेरा नहीं होता था, जहाँ बूढ़े नहीं रहते थे, जहाँ हर चीज दौड़ती-भागती उछलती-कूदती नजर आती थी, जिसमें लपक चमक और कौंध थी, जहाँ जवान और जवानियाँ और तरह-तरह के रंग थे, जहाँ कुछ भी अपनी जगह खड़ा और स्थिर नहीं दिखाई पड़ता था - और अब यह पार्क और यह कालोनी?
बूढों, अपंगों और विकलांगों का यह विहार!
फरवरी के इस महीने में खिड़कियों और दरवाजों पर थाप देती बसंती हवा और पार्क में घिसटते, उड़ते सूखे, झड़े, बेजान पत्तों की मरमर-चरमर!
मान लो, किसी के घर में कोई चोर घुस आए - किसी के क्या, मेरे ही घर में चोर घुस आए और वह भी अकेले, बिना किसी साथी के, औजार के; डाकू घुस आए बिना राइफल-बंदूक के अकेले, रात-बिरात तो छोड़ो, खड़ी दोपहर में; कोई बलात्कारी ही घुस आए दिन दहाड़े और मुझे उठा कर ले जाए पार्क में और मैं चिल्लाऊँ कि बचाओ! बचाओ! तो कौन सुनेगा? (ज्यादातर बूढ़े या तो बहरे हैं या ऊँचा सुनते हैं), कौन दौड़ेगा (ज्यादातर घुटनों और जोड़ों के दर्द से परेशान हैं), कौन देखेगा (ज्यादातर मोतियाबिंद का आपरेशन कराके आँख पर हरी पट्टी बाँधे हैं), यह सब न कर सकें तो खड़ा हो कर चिल्लाएँ तो सही (ज्यादातर की कमर झुकी है और मुँह में दाँत नहीं है, वे गुगुआ तो सकते हैं, चिल्ला नहीं सकते)।
इन खयालों से सोनल के रोंगटे खड़े हो गए! वह किसी अनजाने डर से सिहर-सी उठी!
फिर सहसा ध्यान गया कुत्तों की ओर! कुत्ते बहुत थे कालोनी में - हर सड़क पर, प्रायः गेट के बाहर बैठे या घूमते दिखाई पड़ते थे लेकिन - यहाँ भी एक 'लेकिन' था। इतने दिनों में उसने किसी को भूँकते हुए नहीं सुना। उसी के मकान डी-१ के गेट पर ही एक भूरा बैठा रहता है लेकिन जब भी आओ, कहीं से आओ - गेट से चुपचाप हट जाता है और दूसरी जगह थोड़ी दूर पर बैठ जाता है!
कालोनी के बाशिंदों के सिवा किराएदार भी हैं - प्रायः हर घर में! नीचे मालिक, ऊपर किराएदार! कुछ में देसी, कुछ में विदेशी - ज्यादातर जापानी, कोरियाई या थाई। विद्यार्थी या टूरिस्ट अपने काम से काम रखनेवाले। इनके सिवा वे सरकारी कर्मचारी हैं जिनका किसी भी समय तबादला हो सकता है! यानी वे जिनके दिमाग में मकान कब्जा करने की बात न आए! ऐसे लोगों को मुहल्ले के लोगों से क्या लेना-देना, उन्हें खुद से ही फुरसत नहीं।
इस तरह तो उसी का घर क्यों, कालोनी का कोई भी घर - यहाँ तक कि कालोनी की कालोनी दिन-दहाड़े लूट के कोई ले जाए, रोकने-टोकनेवाले नहीं मिलेंगे।
सोचते-सोचते उसे लगा कि यह सिर्फ एक खयाल नहीं है - एक 'हॉरर' फिल्म है जो उसकी आँखें देख रही हैं! वह खुद पार्क में फटते चिथड़ा होते जा रहे साड़ी ब्लाउज में इधर से उधर भाग रही है - चीख चिल्ला रही है लेकिन कोई भी अपने घर से नहीं निकल रहा है! किसी को सुनाई ही नहीं दे रहा है तो निकलेगा कहाँ से?
उठ कर झटके से उसने बत्ती जलाई और फिल्म खत्म। राहत की साँस ली उसने और कैसेट लगाया। बदकिस्मती से कैसेट वह निकला जिसे न वह सुनना चाहती थी, न सुने बगैर रहना चाहती थी -
वक्त ने किया , क्या हसीं सितम
तुम रहे न तुम , हम रहे न हम
यह कैसेट सोनल को समीर ने प्रजेंट किया था - तीन साल पहले। शादी के रिसेप्शन के दिन। तब उसने न इसे देखने की जरूरत महसूस की थी, न सुनने की! उसने हमेशा इसे अपने साथ रखा लेकिन कभी नहीं सुना। आज सुनते हुए उसे लगा कि कितना बदल गया है उसी गाने का मतलब आज? उसने संजय की कोई चर्चा नहीं की अपने डैडी से जान-बूझ कर। वे दिल के मरीज, उन्हें ठेस लगती! अगर विश्वविद्यालय की सर्विस न मिली होती और वह अमेरिका में ही रह गई होती तो क्या होता?
गलती कहाँ हुई और किससे हुई - वह समझ नहीं सकी!
आरती गुर्जर - उसके लैंडलार्ड की बेटी। उसी काल सेंटर में काम करती थी जिसमें संजय करता था! साथ आना-जाना उसी की कार से होता था। दिन-रात का साथ! आश्चर्य यह था कि आरती के माँ-बाप उन्हें एक दूसरे के करीब आते देख रहे थे फिर भी चुप थे! आश्चर्य यह भी था कि उसकी भी आँखों के सामने वे छेड़छाड़ करते थे - बेशर्मी की हद तक - और टोकने पर हँसने लगते थे। और इससे भी बड़ा आश्चर्य यह था कि आरती का पति जब कभी न्यू यॉर्क से आता था तो वह अपनी पत्नी से उसके 'ब्यायफ्रेंड' के बारे में बातें करता था और उन्हें डिनर पर ले जाता था! जाती तो साथ में वह भी थी - लेकिन उसे हमेशा लगता था कि न जाती तो ज्यादा अच्छा रहा होता!
वह एक ऐसे समाज में आ गई थी जिसमें डालर को छोड़ कर किसी और चीज जैसे प्यार के लिए ईर्ष्या करना पिछड़ापन और गँवरपन था!
वह जब भी संजय से उसकी हरकतों की शिकायत करती, वह खीझ उठता - 'तुम देश और काल के हिसाब से अपने को बदलना सीखो, चलना सीखो। न चल सको तो चुपचाप बैठो या लौट जाओ!'
'लौटूँगी तो अकेले क्यों? तुम्हें साथ ले कर!'
'मैं तो डियर, परदेस को ही अपना देस बनाने की सोच रहा हूँ!' मुसकराते हुए उसने आँख मार कर कहा - 'तुम भी क्यों नहीं ढूंढ़ लेती एक ब्यायफ्रेंड?'
'अच्छा लगेगा तुम्हें?' उसने सीधे संजय की आँखों में देखा!
'अच्छा की कहती हो? निश्चिंत हो जाऊँगा हमेशा के लिए! हा हा हा...'
सोनल ने संजय की आँखों में गौर से देखा - वे आँखे ही थीं या दिल? यह बात उसने जबान से कही थी या दिल से? वह कहीं सोनल से सचमुच की मुक्ति तो नहीं चाह रहा है? वह देख रही थी कि अमेरिका आने के बाद से उसमें तेजी से बदलाव आया है - एक-दो सालों के अंदर! यह उसकी तीसरी नौकरी है! वह एक शुरू करता है कि दूसरी की खोज में लग जाता है - पहले से उम्दा, पैसों के मामले में। उसमें सब्र नाम की चीज नहीं है। वह जल्दी से जल्दी ऊँची से ऊँची ऊँचाइयाँ छूना चाहता है! जैसे ही एक ऊँचाई पर पहुंचता है, थोड़े ही दिनों में वह नीची लगने लगती है! इसे वह महत्वाकांक्षा बोलता है! अगर यही महत्वाकांक्षा है तो फिर लालच क्या है?
लालच ? आरती गुर्जर के साथ संजय की दोस्ती के पीछे सिर्फ आरती गुर्जर है या उसके एन.आर.आई. माँ-बाप जिनका 'गुजराती हस्तशिल्प' का चमकदार व्यवसाय है, जिनकी वह इकलौती संतान है? आरती से संजय का रिश्ता उसकी समझ से बाहर था!
यहाँ रहते हुए सोनल भी कमाई कर सकती थी! किसी विश्वविद्यालय में, कालेज में, लाइब्रेरी में, कहीं भी! कंप्यूटर में भी अच्छी-खासी गति थी! लेकिन संजय ने जब भी सोचा, खुद के बारे में सोचा, सोनल के बारे में सोचने की फुरसत ही नहीं थी! उसने सोनल को 'हाउसवाइफ' से ज्यादा नहीं होने दिया और वह भी तो बनारस के इंतजार में 'आज कल परसों' करती रह गई थी।
सोनल की आँखें भर आई थीं। उसी दम उसने निर्णय लिया था कि अब नहीं रुकना यहाँ! वह बहाने की खोज में ही थी कि राँची से पापा का ई-मेल - तुरंत आ जाओ, 15 को तुम्हारा इंटरव्यू है! उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा! यह उसकी आत्मा की पुकार थी जो विश्वविद्यालय तक पहुँची थी!
आज भोर के उजाले में खिड़की से फिर पुकार आ रही थी सोनल की आत्मा - संजय को नहीं, समीर को - सुनो, और चले आओ!
(¨`·.·´¨) Always

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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 20:00

तीन
ज्यादा नहीं, हफ्ते दस दिन लगे सोनल को इस घर के एकांत और सन्नाटे के हिसाब से खुद को ढालने में! और जब ढल गई तब मजा आने लगा! अपने 'अकेलेपन' को एंज्वाय करने लगी।
वह डेढ़-दो बिस्वे की रियासत की रानी थी - मालकिन! जब चाहे सोए, जब चाहे जागे, जहाँ चाहे उठे बैठे, जैसे चाहे वैसे रहे घर में, ब्रा और चड्ढी में, लुंगी में, गाउन में, नंगी नहाए, उछले कूदे - न कोई देखनेवाला, न सुननेवाला! जब चाहे - जैसा चाहे खाना पकाए न पकाए, उपास करे, उसकी मर्जी! अगर साथ में यही सास-ससुर हों - तो यह करो, वह करो, ऐसे करो, वैसे न करो! दुनिया भर के लफड़े, टोका-टोकी और बंदिशें!
टेपरेकार्डर है, टी.वी. है, कंप्यूटर है, मोबाइल है, फोन है - अगर खुद को व्यस्त ही रखना चाहो तो इनके सिवा भी किताबें हैं, क्लास की तैयारियाँ हैं, कार है! ज्यादा नहीं, शाम को फ्रेश होने के बाद सिर्फ आधे घंटे की ड्राइव पर निकल जाओ और लौट कर आओ तो बीयर या जिन का एक छोटा पैग और सिगरेट (यह केलिफोर्निया की आदत है जिसे देर-सबेर छोड़नी पड़ेगी इस सड़े-गले नगर में - इसे वह जानती है)।
'लेकिन समीर कहाँ है?' उसने पापा को फोन किया - 'कुछ खास नहीं, बस ऐसे ही!'
जब वह रिसर्च कर रही थी इतिहास में, तभी समीर से परिचय हुआ था। एक तेज-तर्रार आकर्षक युवक। अच्छे खाते-पीते घर का। उससे दो साल सीनियर और राजनीति में पीएच.डी.! नौकरी मिल रही थी लेकिन उसने अपने हित को न देख कर किसानों मजदूरों के हित को देखा! उसमें देश और दुनिया और समाज के हर मुद्दे पर लंबी बहस करने और विश्लेषण करने की दक्षता थी! उसने राजनीतिक 'ऐक्टिविस्ट' होना पसंद किया। उस समय बिहार में ऐसे कई ग्रुप थे! वह उनमें से एक से जुड़ गया और सक्रिय हो गया! वह हफ्ते में एक बार पटना आता और पूरा दिन सोनल के साथ बिताता! उसका सपना था कि वे शादी करेंगे और अपना जीवन किसानों की खुशहाली के लिए समर्पित कर देंगे - साथ-साथ! सोनल ने जब डैडी से बताया तो उन्होंने समझाते हुए कहा कि यह जुनूनी दिमाग का फितूर है! बीवी की कमाई और नौकरीपेशा लोगों के चंदे पर क्रांति करनेवाले ऐसे लोगों की भरमार है बिहार में! वे जल्दी ही नाश्ते और चाय-पानी के लिए दूसरों को ढूँढ़ते सड़क पर दिखाई पड़ने लगते हैं। ऐसे बहकावे में मत आओ। और उन्हीं के समझाने-बुझाने पर उसने संजय से शादी तो कर ली लेकिन समीर को दिल से नहीं निकाल सकी! यहाँ तक कि अमेरिका में भी जब संजय ने उससे 'ब्वायफ्रेंड' की बात की तो वह डर गई कि कहीं उसे समीर की दोस्ती की खबर तो नहीं है?
उसी समीर की याद आ रही थी उसे यहाँ आने के बाद से ही!
वह सुबह छत पर टहल रही थी कि डी-4 के सामने सड़क पर पुलिस वैन दिखाई पड़ी!
उसकी नजर जाने के पहले से खड़ी थी वह वैन!
कुछ लोग थे जो भीतर-बाहर आ जा रहे थे! लेन के एक नुक्कड़ पर उसका डी-1 और दूसरे नुक्कड़ पर डी-4। उसके दो ही मकान बाद! बरतन माँजने और झाडू-पोंछा करनेवाली दाई उसी कालोनी की थी। जैसे ही वह आई, उसने पूछा!
दाई गीता ने जो कुछ बताया, वह भयानक था! यह उस कालोनी की तीसरी घटना थी! इस साल की पहली!
डी-4 राय साहब का बँगला था! राय साहब बागबानी के बेहद शौकीन! उनके लान में मखमली घास क्या थी, हरे रंग का गलीचा था। उसमें जूते-चप्पल पहन कर न वह जाते थे, न दूसरों को जाने देते थे। गलीचे के चारों तरफ फूलों और रंग-बिरंगी पत्तियोंवाले गमले थे! वे दिन भर कैंची-चाकू लिए लान में ही नजर आते थे - काटते-छाँटते हुए। हरे रंग की दीवानगी ऐसी कि बँगले पर भी हरा डिस्टेंपर। यही हरियाली उनके झुर्रियोंदार चेहरे पर भी रहती थी - हमेशा!
एक दिन एक फोन आया राय साहब के नाम - 'इतनी जल्दी क्या है मकान बेचने की, थोड़ा रुक जाते!'
राय साहब 'हलो, हलो' करते रह गए, लेकिन फोन कट गया था!
उस दिन उन्हें आश्चर्य हुआ लेकिन हँसी भी आई!
फिर हर तीसरे-चौथे रोज या तो कोई न कोई फोन आता या कोई न कोई मकान के बारे में जानकारी करने चला आता। फोन करनेवाला कौन है, कहाँ से कर रहा है, मकान बिकने की बात उसे किसने बताई - राय साहब को पता नहीं चल सका! आनेवालों को वे डाँट कर भगा देते, फाटक के अंदर घुसने ही न देते! वे कहते-कहते थक गए कि खबर गलत है, उन्हें बेचना ही नहीं है फिर भी, ये सिलसिले खत्म नहीं हुए!
वे परेशान! लगा कि पागल हो जाएँगे! वे नींद के लिए तरस कर रह जाते और नींद नहीं आती! दोस्तों-मित्रों की सलाह पर उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट की कि उनके पास कैसे-कैसे फोन आते हैं, कैसे-कैसे लफंगे आते हैं, और कैसी-कैसी बातें कर जाते हैं?
चौथे दिन जो आदमी मकान की बाबत उनसे पूछने आया, उसकी बातों से राय साहब को लग गया कि पुलिस रिपोर्ट की उसे जानकारी है - लेकिन इसका न उसे डर है, न खौफ!
जिस मानसिक तनाव और बेचैनी में वे जी रहे थे, उससे उन्हें उस दिन मुक्ति मिली, जिस दिन अचानक उनके बचपन के मित्र राजाराम पांडे उर्फ भुटेले गुरू आए। भुटेले गुरू अब तो नगर के जाने-माने रईस थे लेकिन थे उनके पड़ोसी गाँव के! हाई स्कूल तक उनके साथ गाँव पर ही पढ़ चुके थे! कई मुहल्लों में कई मकान थे उनके! वे इधर से गुजर रहे थे कि उन्हें राय साहब की याद आई और पूछते पाछते डी-4 में चले आए!
'यार, बड़ा शानदार भवन है सुरेश!' उन्होंने गेट के अंदर घुसते ही कहा!
राय साहब ने उत्साह से उन्हें घर दिखाया! वे पहली बार आए थे। उन्होंने घर- आँगन की तारीफ करते हुए बताया कि इस दौरान भेंट भले न हुई हो, दोनों बेटियों की शादी और भाभी के आकस्मिक स्वर्गवास की खबर उन्हें मिली थी! ड्राइंग रूम में लौटते हुए उन्होंने पूछा - 'सुरेश! तुम्हारा वह बेटा कहाँ है आजकल, जिसका इलाज करा रहे थे?'
भुटेले जैसे ही सोफे पर बैठे, राय साहब उनके आगे बैठ कर - फूट-फूट कर रोने लगे। भुटेले भी सोफे से नीचे आ गए और सुरेश राय को बाँहों में भर कर सामने दीवान की ओर देखते रहे - दीवान पर गठरी की तरह एक युवक लेटा था। वह टुकुर-टुकुर कुतूहल से उन्हें ताक रहा था। दाढ़ी-मूँछ बेतरतीब बढ़ी हुई थी! सिर्फ चेहरा खुला था, शरीर ढँका था! एक सूखी बेजान बाँह लकड़ी की तरह बिस्तर पर पड़ी थी! लगता ही नहीं था कि धड़ के नीचे कुछ है!
'यह बोलता तो उस वक्त भी नहीं था, लेकिन यह याद नहीं कि समझता भी था या नहीं!' भुटेले ने पूछा!
राय साहब बगैर बोले हिचकी लेने लगे।
भुटेले ने सांत्वना देते हुए उन्हें उठाया और सोफे पर अपने बगल में बैठाया। थोड़ी देर बाद राय साहब उठे और अंदर चले गए। जब वे चाय के साथ लौटे तो सहज थे! चाय पीते हुए उन्होंने बताया कि कैसे पेट काट कर, गाँव की जमीनें बेच कर, बैंक से कर्ज ले कर किसी तरह यह घर खड़ा किया और दो साल पहले, रिटायर होने के बाद इसमें आया! मैंने कभी सोचा ही नहीं कि किसके लिए घर? बस यह था कि अपना एक घर हो! इसके खड़ा होते-होते पत्नी भी चल बसीं। लेकिन लगा रहा मैं बिना सोचे कि घर हो तो किसके लिए? ... देख रहे हो इस बेटे को? न चल-फिर सकता है, न सुन सकता है, न बोल सकता है! क्या होगा इसका जब मैं नहीं रहूँगा! जाने किस जनम के पाप की सजा दे रहा है भगवान!
'मैं हूँ न! चिंता काहे करते हो?' भुटेले ने उनके कंधे पर हाथ रखा!
'चिंता का तो ये है भुटेले कि छह-सात महीनों से सोया नहीं। जाने कहाँ-कहाँ से, कैसे-कैसे लोगों के रात-बिरात फोन आते रहते हैं - धमकी भरे! पता नहीं किसने उड़ा दिया है कि सुरेश राय अपना घर बेच रहे हैं! नतीजा यह कि गुंडे-मवाली तक घर के अंदर घुसे चले आ रहे हैं और सलाह दे रहे हैं कि जितने में बेचोगे उतने में दो कमरों का फ्लैट भी ले सकते हो और बाकी के सूद से बीस-पच्चीस साल चैन से काट भी लोगे! पूछो कि तुम हो कौन? तो कहते हैं - 'प्रापर्टी डीलर'! प्रापर्टी हमारी; डील तुम कर रहे हो! बिना यह पूछे कि तुम बेच भी रहे हो या नहीं? दलाल साले! हिम्मत तो देखो उनकी! अगर आज नरेश सही होता तो यह नौबत नहीं आती!'
भुटेले गंभीरता से सब कुछ सुनते रहे और सोचने-विचारने के बाद बोले - 'ऐसा है सुरेश! मैं दो तीन दिन के अंदर एक दरबान या आदमी भेज देता हूँ। बड़े भरोसे का आदमी! वह तुम्हारी सारी समस्याएँ दूर कर देगा! ठीक?'
तीसरे दिन सचमुच आदमी आया और राय साहब की चिंता खत्म हो गई!
न कभी फोन आया और न गुंडे-मवालियों का साहस हुआ कि आस पास कहीं दिखाई पड़ें!
लेकिन जो होनी थी, वह हो कर रही। तीन महीने बाद! रात-दिन पूरे घर की देखभाल करनेवाला दरबान रात भर की छुट्टी ले कर भतीजी की शादी में अपने गाँव गया था और इधर उसी रात यह हादसा हो गया! उसी पलंग पर लेटा राय साहब का बेटा टुकुर-टुकुर ताकता रहा और उनका कतल हो गया!
भुटेले गुरु इस हादसे के दो दिन पहले से अस्पताल में थे - रूटीन चेकअप के लिए। दरबान ने ही उन्हें खबर की थी! वे अस्पताल से सीधे अपनी गाड़ी में आए! दरवाजे पर खड़ी भीड़ को वहाँ से हटाया-बढ़ाया, डाँटा-डपटा और अंदर जा कर पुलिस से जानकारी ली! फिर उस कमरे में गए जहाँ बिस्तर पर राय साहब लेटे थे। वहीं बगल में एक तख्त पर उनका बेटा भी था जो निश्चल पड़ा था। मूक दर्शक। हादसे का चश्मदीद बेबस गवाह! वे पुलिस के साथ अंदर गए थे, उसी के साथ लौट भी आए!
बाहर अटकलों की कानाफूँसी चल रही थी - या तो मुँह और नाक पर तकिया दबा कर मारा गया है या गला दबा कर! शरीर पर कहीं चोट का निशान नहीं। हाथापाई का कोई चिह्न नहीं। बिस्तर पर कोई सिलवट नहीं! तकिए पर महज खून का छोटा-सा धब्बा था जो नाक और मुँह से निकला था।
लाश जब पोस्टमार्टम के लिए जा रही थी, सोनल अपने गेट पर खड़ी उसे जाते हुए देख रही थी! कालोनी में मकान कब्जा करने की तीसरी घटना! घर में तो वह भी अकेली थी। विश्वविद्यालय आने-जाने का समय अनिश्चित। किसी दिन दोपहर से पहले क्लासेज, किसी दिन दोपहर बाद। घर में कोई नहीं। दिन में तो चोरियाँ ही हो सकती हैं लेकिन रात में तो हत्या तक संभव है। इस कल्पना से ही उसे कँपकपी छूट आई! आँखों में उतरनेवाली सिहरन पूरे बदन में फैल गई! वह इसी उधेड़बुन में पूरे दिन पड़ी रही! नौकर न मिल रहे थे, न रखना मुनासिब था! नौकरानी झाड़ू बुहारू पोंछा से आगे के लिए तैयार नहीं। बार-बार उसका ध्यान जा रहा था ससुराल पर।
रात में उसने पहाड़पुर का कोड ढूँढ़ा और फोन किया - 'पापा! मैं सोनल। आ रही हूँ कल आप दोनों को लेने के लिए! तैयार रहिए। नहीं, कुछ नहीं सुनूँगी। मम्मी को फोन दीजिए!...'
चार
शीला को सोनल ने वह मान-सम्मान दिया जो कोई बहू क्या देगी अपनी सास को?
सुबह-शाम 'मम्मी', दोपहर-रात 'मम्मी', घर में 'मम्मी' बाहर 'मम्मी' - बस हर तरफ मम्मी की गूँज! जब कि शीला सोनल के साथ आई थी लोकलाज के कारण, इस कारण से कि न जाएँ तो बेटा उनके बारे में क्या सोचेगा? कि जिस बेटे के सहारे बुढ़ापा कटना है उसकी औरत की कैसे न सुनें? न सुनें तो वह उनकी क्यों सुनेगा? लोग अपने बच्चों का भविष्य क्यों सँवारते हैं? इसलिए कि उनके भविष्य में उनका अपना भविष्य भी छिपा रहता है! कायदे से देखा जाए तो वे उनका नहीं, अपना ही भविष्य सँवारते हैं! इसी सँवरे हुए भविष्य में कदम रखा था शीला ने और खुश थी! जिस लड़की से कोई पूर्व-परिचय नहीं, कोई रिश्ता-नाता नहीं, यहाँ तक कि न अपनी जात की, न कुल की, न संस्कार की - वह शीला के पीछे मरी जा रही थी - 'मम्मी, चाय पी?' 'मम्मी, नाश्ता किया?' 'मम्मी, नहा लिया?' 'मम्मी, खाना खाया?' 'मम्मी, कोई जरूरत?'
इतना ध्यान उनकी बेटी सरला ने भी नहीं दिया था उनका!
सोनल ने पहले उन्हें पूरा घर दिखाया - ड्राइंग रूम, उससे सटा अपना कमरा, आँगन, फिर वह कमरा जिसमें पापा-मम्मी रहेंगे, फिर किचेन और स्टोर, फिर पिछवाड़े का हिस्सा जिसमें नौकर-चाकर के लिए टिन के शेड का खुला कमरा। फिर ऊपर ले गई छत पर और देर तक मम्मी को टहलाती रही कि लोग देख और जान लें कि वह अकेली नहीं है घर में! यह घर और इस घर में वह सब कुछ था जिसके बारे में शीला ने सोचा नहीं था।
उसे रात भर नींद नहीं आई - कारण जो रहे हों! कारण नई जगह भी हो सकता है, चौड़ा डबल बेड भी, गद्देदार बिस्तर भी! वह सुख भी जो अचानक उसके जीवन में आ गया था। वह घर में आई नहीं थी, 'गृह प्रवेश' किया था। यही कहा था सोनल ने और अच्छी से अच्छी 'डिशेज' तैयार करके खिलाया था। शीला की खुशी बार-बार उसकी आँखों में छलक आ रही थी! और इन आँसुओं में और कुछ नहीं, पहाड़पुर का खपरैलोंवाला घर था, उसके बेटे-बेटी थे और वह दुःख थे जो उसने जीवन भर सहे थे।
सहसा उसे याद आया कि संजय के बारे में न उसने कुछ पूछा, न सोनल ने अपने से कुछ बताया, दूसरी-दूसरी ही बातें करती रही अब तक!
अगले दो-तीन दिनों में शीला ने अपनी दिनचर्या निश्चित कर ली! खाना बनानेवाली महराजिन अब तक नहीं मिली थी और वह बैठे-बैठे करती क्या दिन भर ? सुबह चाय और दोपहर रात का खाना उसने अपने जिम्मे ले लिया था! तकलीफ केवल इतनी थी कि बात करने के लिए अभी तक कोई नहीं मिला था। डी-4 की घटना ने हर कालोनीवासी को अपने-अपने घर में रोक रखा था - वे सभी शायद डरे हुए थे कि कहीं ऐसा न हो कि वे मकान छोड़ें तो लौट कर घुसना मुश्किल हो जाए! इन्हीं वजहों से पार्क भी खाली पड़ा था - न कोई औरत, न कोई मर्द! तीन-चार दिनों तक कोई भी अपने घर से बाहर नहीं निकला - सर्विस करनेवालों को छोड़ कर।
शीला झाड़ू-पोछा करनेवाली महरी के पीछे-पीछे घूमती रहती और बात करती रहती - कितने लड़के हैं? कितनी लड़कियाँ हैं? कितनों की शादी हुई है? दामाद क्या करते हैं? कितनी बहुएँ हैं? कौनवाली साथ रहती है? स्वभाव कैसा है? सेवा करती है या नहीं? बेटे ध्यान देते हैं या नहीं? अभी कोई पोता-पोती है कि नहीं? ... कुछ सुनती, कुछ अपना सुनाती! इस दौरान सोनल अपना काम करती, पढ़ती, लिखती और नहीं तो कंप्यूटर के माउस से ही खेलती या कुछ टाइप करती।
इस बीच शीला दो बार बहू से दुःखी हुई। वह जग जाती थी भोर में चार बजे और सोनल सोती रहती थी आठ बजे तक। उसने उसे जगाने का एक तरीका निकाला। उसने सुबह छह बजे चाय तैयार की और उसे जगाया। सोनल सोई रही और उठने पर ठंडी चाय सिंक में उड़ेल दी। फिर अपने लिए अलग से नींबू की चाय बनाई।
शीला देखती रही।
दूसरे दिन उसने नींबू की चाय बनाई - थोड़ी देर से! यानी सात बजे! उस दिन भी यही हुआ। सोनल ने कहा - 'मम्मी, मेरी चाय रहने दिया करें आप! जब उठूँगी, तब बना लूँगी मैं!'
उसे अच्छा नहीं लगा! अपनी आदत के खिलाफ वह किसी तरह जब्त करके रह गई। यहाँ तक तो गनीमत थी लेकिन एक दूसरे प्रसंग से तो जैसे उसका मन ही उचट गया! होता यह था कि शीला सुबह रात की बची रोटी या पराँठे और सब्जी का नाश्ता करती थी! सोनल ने देखा तो बिगड़ी - 'नहीं मम्मी, यह नहीं चलेगा। आप वह खाएँगी जो मैं खाऊँगी! टोस्ट बटर, दलिया, दूध, फल! वह सब नहीं!' ठीक! शीला के दिमाग में सवाल उठा कि रोज-रोज जो बासी रोटियाँ या पराँठे बच जाते हैं, उनका क्या हो? उसे महरी गीता की याद आई! वह भी आते ही शीला को 'माता जी माता जी' बोलती थी! काम-धाम खतम करके गीता जब जाने लगती थी वह रोक कर उसे खिला देती थी। सब्जी न रहने पर कभी चाय दे देती थी, कभी अचार! सोनल को पता चला, पता क्या चला उसने गीता को एक कोने बैठ कर खाते हुए देख लिया।
'मम्मी।' गीता के जाने के बाद सोनल बोली - 'आप क्यों आदत बिगाड़ रही हैं उसकी?'
शीला ने समझने की गरज से बहू की ओर देखा!
'उसकी शर्तों में चाय-नाश्ता नहीं था! पाँच सौ महीना और साल में दो बार साड़ियाँ - बस!'
'लेकिन मैं चाय नाश्ता कहाँ देती हूँ? जो कुछ बचा-खुचा रहता है, सधा देती हूँ! फेंकने या कुत्ता-बिल्ली को खिलाने से अच्छा है कि किसी के स्वारथ आ जाए!'
'यही तो! कुत्ते-बिल्ली को भले खिला दें, उसे न दें - यही कहना है मेरा?'
'अरे? यह कैसी बात कर रही हो तुम?' फटी आँखों बहू को ताकने लगी शीला!
'नहीं, बुरा मत मानिए। इसे ऐसे समझिए! मान लीजिए कल आप कहीं और चली जायं, यहाँ न रहें। वह हमसे भी यही उम्मीद करेगी और हम नहीं दे पाएँगे तो उसे बुरा लगेगा, ठीक से काम नहीं करेगी। है न?'
'सब ठीक! लेकिन यह बात मेरे गले नहीं उतर रही है कि कुत्ते-बिल्ली को खिला दें लेकिन उसे न खिलाएँ!'
'मम्मी, वह आपकी परजा नहीं है, नौकरानी है - प्रोफेशनल। उसका पेट रोटी पराँठे से नहीं, पैसे से भरेगा! यही नहीं, आप उससे बातें करेंगी और वह सिर चढ़ जाएगी! कल जब आप किसी बात के लिए उसे टोकेंगी, वह लड़ बैठेगी! उसे आप वही रहने दें जो है! आए, अपना काम करे और रास्ता नापे!'
शीला सिर झुकाए चुपचाप सुनती रही और उठ खड़ी हुई - 'लेकिन मैं अन्न का अपमान नहीं होने दूँगी! उसे नहीं खिलाऊँगी तो खुद खाऊँगी!'
'आप बुरा मान गईं। नहीं समझा मेरी बात को!'
'समझ लिया, कोई अपढ़ नहीं हूँ! मैं भी बी.ए. हूँ अपने समय की!'
'ठीक है लेकिन मैं बासी तो न खाने दूँगी! कल ही आप कहेंगी कि मुझको बासी खिलाती थी!'
'तो मेरा भी सुन लो, मैं अन्न को ऐसे फेंकने न दूँगी!'
यह बहस तभी खत्म हो सकती थी जब उन दोनों में से कोई चुप हो जाए या वहाँ से हट जाए!
आखिर सोनल किसी काम के बहाने वहाँ से चली गई!
शीला कुछ देर बैठी रही। उसे लगा कि बहू नकचढ़ी ही नहीं, सिरचढ़ी भी है! पैदा करती, तब उसे अनाज का मोल भी पता चलता। माँ-बाप की इकलौती औलाद, जात की लाला - खेत-खलिहान से मतलब नहीं; उसे क्या मालूम अपनी फसल का सुख-दुःख?
वह घर के पिछवाड़े गई जहाँ रघुनाथ बाहर से घूम कर आए थे और नहाने जा रहे थे! उसने जैसे ही शुरू किया वैसे ही रघुनाथ ने टोका - 'सही कहा उसने! बहू को सुनने और उसके साथ रहने की आदत डालो!'
'क्या? तुम्हारा भी यही कहना है!'
'नहीं, मेरा यह नहीं कहना है। मेरा यह कहना है कि जिसके घर में रहती हो, जिसका खाती हो, पहनती हो, उसे अनसुना मत करो। वह करो जो वह चाहती है!'
'राशन मैं लाई हूँ, चाय-नाश्ता मैं बनाती हूँ, खाना मैं पकाती हूँ, जो कोई आता है, उसे उठाती-बिठाती मैं हूँ - और मेरी कोई वकत ही नहीं?'
'अच्छा जाओ तुम यहाँ से, जो करना है करो!' झुँझला कर रघुनाथ बोले और बाथरूम में चले गए!
'मैं नहीं रहूँगी यहाँ! मुझे गाँव पहुँचा दो और नहीं पहुँचाओगे तो खुद चली जाऊँगी।'
बाथरूम के अंदर से ही रघुनाथ ने हँसते हुए कहा - 'अरे, बहू से तो पूछ लो। अपने से नहीं आई हो तुम, वही लाई है! ... कैसे है वह गाना।' उन्होंने नल खोल दिया और गाना शुरू किया -
अभी न जाओ छोड़ कर , कि दिल अभी भरा नहीं
अभी अभी तो आई हो , बहार बन के छाई हो
अभी जरा बहक तो लूँ , अभी जरा न नू न नू....

शाम को चार बजे के आसपास सरला का फोन आया - बहुत दिनों बाद! काफी दुःखी और शिकायती स्वर में! उठाया शीला ने ही। सोनल कालेज गई थी, घर पर वही थी! इससे पहले उसने दो-तीन बार गाँव पर फोन किया था, उसकी बदकिस्मती से रिसीवर उठाया था रघुनाथ ने और उसका नाम सुनते ही बिना पूछे या बोले रख दिया था! इसका चर्चा भी नहीं किया था शीला से!
'माँ, अब तो आ सकती हो मेरे यहाँ!'
'ऐसे क्यों बोल रही हो, सरला?' शीला रुआँसी हो उठी।
'मैंने शादी नहीं की माँ, पापा से भी बोल देना! चाहें तो वे भी आ सकते हैं।'
'उनकी बात नहीं जानती लेकिन मैं तो तैयार बैठी हूँ। जब कहो तब आ जाऊँगी!'
'ठीक है, अगले दस-पंद्रह दिनों के भीतर कोई व्यवस्था करती हूँ!'
'लेकिन तुमने शादी क्यों नहीं की? हम तो मान चुके थे कि हो गई होगी!'
'माँ, मैंने सोच लिया है! भगवान और ब्याह के बिना भी जिया जा सकता है, रहा जा सकता है! किसी बात की फिकर मत करना! ठीक?'
सरला ने रिसीवर रख दिया था। शीला जहाँ की तहाँ खड़ी! उसकी समझ में नहीं आया कि यह अच्छा हुआ या बुरा! उसने रघुनाथ को सूचना दी! रघुनाथ ने सिर्फ इतना कहा कि इससे तो अच्छा था कि वह शादी ही कर लेती!
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 20:01

........................................................पाँच
शीला सोनल के आग्रह पर तब तक रुकी रही जब तक खाना बनानेवाली नौकरानी की व्यवस्था नहीं हो गई।
जिस दिन शीला गई, उसी दिन सोनल ने गेट और घर की तालियों के 'डुप्लिकेट' बनवाए और उन्हें रघुनाथ को दे दिया। दोपहर को एक-डेढ़ घंटा छोड़ कर - जब नौकरानी खाना पकाने आए - रघुनाथ पूरी तरह आजाद थे! वे जब चाहें तब, जहाँ चाहें वहाँ, आ जा सकते थे, घूम सकते थे, मिल-मिला सकते थे; कोई पूछने-ताछनेवाला नहीं!
ऐसे भी रघुनाथ घर में रहते हुए एक तरह घर के बाहर ही थे। पिछवाड़े बाउंडरी वाल से लगी हुई एक ईंट की दो दीवारें थीं जिन पर अस्बस्टर पड़ा था! सोचा गया था कि अगर नौकर-चाकर या ड्राइवर हुआ तो उसी में रहेगा! रघुनाथ की व्यवस्था शीला के साथ उसी के कमरे में थी लेकिन उन्हें यह पसंद नहीं आया! घंटे-दो घंटे के लिए तो ठीक, इससे ज्यादा कभी वे बीवी के साथ सोए ही नहीं! आने के दिन ही उन्हें यह जगह जँच गई। इसी के बगल में नल भी था और शौचालय भी! और क्या चाहिए? नाश्ता- खाना घर में, बाकी सब बाहर!
शीला के साथ रघुनाथ के रिश्ते दांपत्य के ही रहे, प्यार के नहीं हो सके! यह भी कह सकते हैं कि वे शीला के साथ सो तो लेते थे, प्यार नहीं करते थे। और मानते थे कि इसकी जिम्मेदार खुद शीला है। वह ऐसी औरत थी जिसे प्रतिदिन प्यार का प्रमाण चाहिए - यह नहीं कि एक बार या दो बार या तीन बार आपने उसे आश्वस्त कर दिया कि आप किसी और को नहीं, उसी को प्यार करते हैं तो वह मान जाए! वह अगले दिन फिर परीक्षा लेना चाहेगी कि वह कहीं आकस्मिक तो नहीं था? यही नहीं, वह अपने प्यार को केवल शिकायतों में ही व्यक्त कर सकती थी - इसके सिवा उसके पास और कोई दूसरी भाषा नहीं थी! इन स्थितियों ने रघुनाथ में सिर्फ चिड़चिड़ाहट ही नहीं पैदा की थी, उन्हें उसकी ओर से उदासीन भी कर दिया था! शीला ने कभी उनकी रुचि या पसंद के हिसाब से अपने को बदलने की भी कोशिश नहीं की! मसलन, वे चाहते थे कि घर में कोई अच्छी बात हो तो शीला खुश हो, उल्लसित हो, उसमें उत्साह और जोश नजर आए, हँसे-गाए, कुछ भी करे! लेकिन उसका चेहरा ऐसा पथरीला था कि उस पर कोई भी कोमल भाव नहीं आ पाता था। यहाँ तक कि रघुनाथ जब खुशी के मारे उछलने-कूदने और बेचैन होने लगते थे तो वह उनका उपहास करती-सी निर्विकार खड़ी रहती थी।
खुशी उसके चेहरे पर उभरती भी थी तो अनचाहे धब्बे की तरह - फिर गायब हो जाती थी।
इसके सिवा उसमें खूबियाँ ही खूबियाँ थीं! वह अपने पति और पुत्रों के पद और प्रतिष्ठा से हमेशा खुद को अलग रखती थी। दूसरों के पास ऐसा बहुत कुछ होता था जो उसके पास नहीं था लेकिन उन्हें देख कर उसमें कभी ईर्ष्या नहीं होती थी! समभाव उसका स्वभाव था। वह तभी विचलित होता था जब वह किसी गरीब गुरबा को जरूरतमंद और कातर देखती थी! वह सब कुछ सह सकती थी मगर किसी की धौंस नहीं!
शीला के जाने के बाद रघुनाथ ने राहत की साँस ली थी! वह उनसे बहू के बारे में कुछ नहीं बोलती थी, इसके बावजूद वे तनाव में रहते थे। इस तनाव से अब वे मुक्त हो गए थे!
शुरू-शुरू में रघुनाथ को 'अशोक विहार' पसंद नहीं आया। उन्होंने इतनी उजाड़ और उदास बस्ती देखी ही नहीं थी! देखना तो दूर, सोचा भी नहीं था। उनसे किसी ने बताया था कि यह पूरा इलाका कभी श्मशान हुआ करता था! हो सकता है, यही वजह हो कि उन्हें हर गली और हर मकान की हर खिड़की से आती हुई हवा में 'मृत्युगंध' घुली हुई लगती थी! यानी इधर से गुजरिए तो, उधर से गुजरिए तो नाक दबा कर या उस पर रुमाल रख कर!
आँखें बंद कर के देखिए तो पूरी बस्ती उस बंदरगाह की तरह थी जहाँ सभी यात्री 'महाप्रयाण' पर निकलने या 'उस पार' जाने की तैयारी में लगे हुए हों!
लेकिन एक सुबह - ऐसी सुबह रोज आती थी और इन्हीं आँखों से रघुनाथ देखा करते थे - उस सुबह ध्यान गया पार्क की ओर आते एक बूढ़े की ओर - लकवे का मारा हुआ, मुँह टेढ़ा, गरदन बेकाबू, बायाँ बाजू झूलता हुआ असहाय, घिसटता हुआ बेबस पाँव, दूसरी गली से निकलता एक दूसरा बूढ़ा जिसकी एक आँख खुली और दूसरी पर हरी पट्टी, उसके पीछे एक और बूढ़ा जिसके गले में कालर यानी, स्पांडिलाइटिस का पट्टा, तीसरी गली से भी एक बूढ़ा आ रहा है पार्क के गेट की तरफ - धीरे-धीरे। उसके एक हाथ में बोतल है और ट्यूब लुंगी के अंदर!
सूर्य जैसे-जैसे ऊपर उठता जाता है, वैसे-वैसे हर कोने से खरामाखरामा आनेवाले ऐसे ही बूढ़ों की तादाद बढ़ती जाती है!
रघुनाथ को लगा, ये बूढ़े नहीं हैं - यह जिंदगी की भूख है, जीवन की प्यास है, स्वयं जीवन है - जो बूँद-बूँद करके एक गड्ढे में जमा हो रहा है; वैसे ही जैसे किसी पहाड़ी की कई-कई दरारों से पानी की एक लकीर चलती है और किसी सोते से मिल कर कभी न सूखनेवाला - मीलों तक फुहियाँ उड़ानेवाला, शोर मचानेवाला धुआँधार 'फाल' बन जाती है!
जीवन का यह झरना हर सुबह रघुनाथ को अपनी ओर खींचता है - रग्घू, आओ! सुनो! भीगो! लेकिन रघुनाथ फुहियों में भीगने से बराबर बचते हैं।
क्यों बचते हैं रघुनाथ - इसे वे नहीं समझ पाते।
जब सभी बूढ़े अपनी मृत्यु के विरोध में बड़े मन और जतन से 'बाबा रामदेव' छेड़े रहते हैं, रघुनाथ सिर झुकाए चुपचाप पार्क के बाहर-बाहर से निकल जाते हैं!
उनकी पसंदीदा जगह यह नहीं, नहर थी! अशोक विहार से डेढ़ किलोमीटर दूर। नहर के पार उससे सटी हुई बगिया थी और बगिया के आगे 'संजय विहार' कालोनी। यह भी कोई गाँव रहा होगा जिसकी यह बगिया थी - आँवला, बेल और अमरूद के पड़ों से भरी और घनी। रघुनाथ नहर के पुल पर तब तक बैठते थे जब तक धूप सहने लायक रहती थी, उसके बाद बगिया में!
इसी पुल पर उनकी मुलाकात हुई थी एल.एन. बापट से! बापट बनारस के महाराष्ट्रियन थे! यहीं पढ़े लिखे, यहीं से नौकरी शुरू की और जौनपुर से डिप्टी जेलर हो कर रिटायर हुए थे! काफी मस्त आदमी थे - पुराने फिल्मी गानों के शौकीन। उनके दो ही शौक थे - पीना और गाना! गाते तभी थे जब पीने बैठते थे। उनके कोई संतान न थी - न बेटा, न बेटी। बीवी थी जिसे 'बुढ़िया' बोलते थे। उन्होंने संजय नगर में एक छोटा-सा फ्लैट लिया था जिसमें कभी कभी जबरदस्ती रघुनाथ को ले जाया करते थे! और जब भी ले जाते थे, 'किताबखोर' और 'जाँगरचोर' मास्टरों को गरियाते हुए जरा-सा चखा दिया करते थे।
सूर्य उनका शत्रु था। वे नियम से पाँच बजे शाम को ही पुलिया पर आ जाते थे और उसे गलियाँ देना शुरू कर देते थे - 'रघुनाथ, जरा देखो साले को! जान बूझ कर देर कर रहा है भोंसड़ी के डूबने में!' वे शाम होते ही बेचैन होने लगते थे और घर की ओर ऐसे भागते थे जैसे पुलिस की गिरफ्त से छूटते ही चोर!
हफ्ते भर से ऊपर हो गया था जब बापट रघुनाथ से नहीं मिले - न पुल पर, न बगिया में। वे रोज जाते थे और लौट आते थे!
वे उस दिन जल्दी लौट आए क्योंकि उमस ज्यादा थी और पानी बरसने के आसार थे!
कालोनी के ही मुहाने पर मकान था मन्ना सरदार का। बगैर पलस्तर के ईंटों का। खुला हुआ बड़ा-सा हाता जिसमें एक ओर लंबी-सी खटाल। बँधी हुई चार भैंसें, तीन गाएँ। यहीं सुबह-शाम दूध के बर्तनों की क्यू लगाते थे बूढ़े। यह कारोबार मन्ना सरदार का पोता या नाती देखता है, उनसे कोई वास्ता नहीं।
कहते हैं, यह कालोनी उन्हीं की जमीन पर बसी है।
पचहत्तर-अस्सी साल के मन्ना सरदार अपने जमाने के पहलवान। काले, मोटे, गठे हुए! पेट थोड़ा निकला हुआ। आज भी लाल लंगोट और छींट के गमछे में ही नंगे बदन रहते हैं और नियम से पच्छिम मुँह करके पचास डंड और पचास बैठक पेलते हैं। उन्हें बस एक ही शौक है और एक ही रोग! शौक अपने हाथों भाँग घोंटना, गोला जमाना, ऊपर से एक पुरवा मलाई और रबड़ी खाना और रोग - गठिया! उनसे डाक्टर ने कहा था कि अगर चाहते हो गठिया ठीक हो, तो भाँग छोड़ दो। इन्होंने जवाब दिया था - 'ए डाक्टर साहेब, आप कहोगे तो दुनिया छोड़ देंगे, बाकी भाँग नहीं।'
वे जवानी तक शहर में पक्का महाल या पियरी पर कहीं रहे थे और जो कोई पकड़ में आ जाता था उसे उन दिनों के किस्से सुनाया करते थे।
रघुनाथ उनकी पकड़ में आ गए उस दिन! वे जैसे ही मुड़े, वैसे ही सरदार ने पूछा - 'जै राम जी की मास्टर साहब! किधर के रहनेवाले हैं आप? क्या बताया था उस दिन?'
'धानापुर साइड के!'
'अरे, आपने बताया क्यों नहीं, उसी साइड के तो ग्रू (गुरु) थे।'
'ग्रू कौन?'
'छक्कन ग्रू! आप कैसे नहीं जानते उन्हें? यह तो आश्चर्य की बात है! आइए, बैठिए तो सही! पानी नहीं बरसेगा, चिंता मत कीजिए, देखिए पुरुवैया शुरू हो गई है! ... पीतांबर और खड़ाऊँ - बस यही धज था उनका, चाहे जहाँ रहें। क्या लंबाई थी और क्या छरहरा बदन! कबूतर पाला था उन्होंने। बस एक कबूतर - वह भी सुनहरे रंग का। उसे अपने हाथों किसमिश, बादाम, छुहाड़ा खिलाते थे! एक बार वह गायब हुआ हफ्ते भर के लिए। ग्रू चिंतित! कमबखत बिना बताए गया कहाँ? आठवें दिन लौटा तो चोंच एकदम लाल। हाँफ रहा था! ग्रू बोले - 'बे मन्ना, सूर्य देवता को चोंच मार कर आया है, जीभ और चोंच जल रही है उसकी, देखता नहीं? पहले पानी पिला!' तो ऐसा था ग्रू! एक बार शाम को भाँग घोंटी, उस पार गए, साफा पानी दिया, चंदन के तिलक पर रोली लगाई, कलाई में गजरा लपेटा और डाल की मंडई ( दालमंडी) में घुसे। मुन्नी बाई अपने बारजे से ही देख रही थी कि ग्रू आ रहे हैं। जैसे ही ग्रू उसके कोठे के पास पहुँचे कि वह अपने को सँभाल नहीं सकी और टप्‌ से चू गई। वाह रे ग्रू! ग्रू ने उसे अपने मुसुक ( मुश्क - कंधे और कुहनी के बीच की जगह) पर रोक लिया! देखिए यूँ, इसी पर लोक लिया और वह मुसुक पर खड़ी हो गई! ग्रू बोले - 'मुन्नी, आज इसी पर मुजरा होगा लेकिन इस गली में नहीं, चौक में। अकेले मैं नहीं देखूँगा, सारा नगर देखेगा!' और ग्रू उसे मुसुक पर खड़ी किए सचमुच ले आए चौक में। और फिर जो मुजरा हुआ उसे न पूछिए तो ही अच्छा! और आप को पता ही नहीं कि ग्रू कौन है?'
जब वे उठे तो आसमान साफ हो चला था और जहाँ-तहाँ छिटके तारे दिखाई पड़ रहे थे।
छह
रघुनाथ जब भी शाम को घूमते, टहलते या मिलने-जुलने बाहर जाते थे, कोशिश करते थे कि नौ बजे तक लौट आएँ! रात का खाना वे हमेशा सोनल के साथ खाते थे। यह सोनल की जिद थी! दोपहर को ऐसा तभी संभव हो पाता था जब उसकी छुट्टी हो। वरना नौकरानी खाना पका कर चली जाती थी और वह खुद ही निकाल कर खा लेते थे। नाश्ता इनका अलग था, सोनल का अलग। इन्हें अँखुवाये चने और दूध से मतलब था - बस!
शीला की गलतियों से इन्होंने बहुत कुछ सीखा था! ये अपने हिसाब से उसे नहीं चलाते थे, उसके हिसाब सें खुद चल रहे थे। इन्हें 'ससुर' के बजाय 'बाप' बन कर चलना ज्यादा सुविधाजनक लगा था। अव्वल तो तनाव का कोई मसला पैदा ही न होने दो और पैदा भी हो तो गम खा जाओ या टाल जाओ! दो जून खाने और सोने से मतलब - बाकी तुम जानो, तुम्हारा काम जाने! राशन गाँव का, सब्जी पेंशन की। और पेंशन इतनी मिल ही जाती है कि अपनी ही नहीं, दूसरे की भी छोटी-मोटी जरूरत पूरी हो जाए!
बेटे-बहू के साथ जीने का यही सलीका होना चाहिए कि न आप उनके मामले में दखल दें, न वे आपके मामले में! सह जीवन के लिए यह समझदारी जरूरी है!
इसी समझदारी ने ससुर और बहू को एक दूसरे का दोस्त बना दिया था! हो सकता है, इसके पीछे कहीं न कहीं उनका अपना 'अकेलापन' भी हो और 'ऊब' भी!
ऐसे, सोनल ने अपने व्यवहार से उनके भीतर की आशंका खत्म कर दी थी कि अपने पति के सिवा उसकी किसी में रुचि नही है। वह अकसर बातें करती थी - शीला से, सरला से। रघुनाथ को भी बीच-बीच में बात करने के लिए याद दिलाती रहती थी। बनारस से मिर्जापुर की दूरी ही कितनी है - जब चाहे जाओ, जब चाहे आओ! चाहो तो कई चक्कर लगाओ एक ही दिन में। जब सोनल के आग्रह पर पहली बार सरला आई थी 'अशोक विहार', तो वह सोनल के लिए दीदी के साथ ही ननद भी थी! विदा करते समय उसे सोने की चेन और अंगूठी के साथ दो साड़ियाँ उसके लिए और दो मम्मी के लिए दी थीं उसने! उसके बाद भी सरला कई बार आई और हर बार सोनल जो कर सकती थी करती रही - यानी घर की जो चीज सरला को पसंद आ जाए, वह सरला की! यह कभी नहीं सोचा कि सरला बड़ी है - देने का फर्ज उसका है।
शीला को भी अपनी गलती का एहसास हो गया - कि उसने बहू को समझने में भूल की!
यही नहीं, सोनल ने अपनी तरफ से बाप और बेटे - रघुनाथ और धनंजय के बीच की दूरियाँ भी कम करने की कोशिश की। यह अलग बात है कि वे दूरियाँ घटने के बजाय और बढ़ गईं - लेकिन इसमें उसका दोष कहाँ था?
उसने धनंजय को फोन करके कहा कि भैया, तुम तो हद कर रहे हो! अमेरिका से पैसे मँगाना होता था तो क्या-क्या नहीं बोलते थे? कितनी बातें करते थे कि यह जरूरत है, वह जरूरत है! और यहाँ इतने दिनों से हम आए हैं और एक बार भी देखने नहीं आए कि भाभी कैसी है? पापा को भी ठीक-ठीक पता नहीं कि तुमने एम.बी.ए. किया कि नहीं किया और कर लिया तो अब क्या कर रहे हो? तुम्हारी शादी के लिए आ रहे हैं लोग। पापा-मम्मी परेशान हैं! क्या चाहते हो, बताते तो सही! एक-दो दिन के लिए ही सही, आ तो जाओ!
इसी फोन का नतीजा था कि वह आया मगर ठहरा घर में नहीं, डायमंड होटल में! इसलिए कि अकेला नहीं था, साथ में एक महिला थी अपनी बच्ची के साथ!
सोनल ने उन्हें रात को खाने पर आमंत्रित किया।
जब रघुनाथ को यह खबर मिली तो वे उठे और चुपके से पहाड़पुर चले गए!
धनंजय को थोड़ी देर हो गई थी। वह टैक्सी से आया था। साथ में आनेवाली महिला महिला नहीं, लड़की थी - के. विजया। सोनल की ही उमर की या उससे थोड़ी बड़ी। नाक में हीरे की चमकती हुई कील, कानों में झूलती हुई रिंग, जूड़े में बेले के फूल। एकदम दक्षिण भारतीय लेकिन गोरी और सुंदर! बातों में पता चला कि वह दिल्ली में किसी कारपोरेट कंपनी में नौकरी करती है! उसी कंपनी में उसका पति भी काम करता था पहले से! उससे अच्छे पद और वेतन पर! वह अविवाहित था। इन्होंने शादी की और नोएडा में डुप्लेक्स फ्लैट लिया! बच्ची पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही एक सड़क दुर्घटना में उसकी मौत हो गई! घर, गाड़ी, नौकरी, बच्ची सब कुछ लेकिन वह बेसहारा। भावनात्मक रूप से टूट चुकी थी वह! ऐसे ही में धनंजय से मुलाकात हुई थी।
बच्ची का नाम रत्ना डी. था। वह धनंजय को पापा बोल रही थी!
सोनल सुनते हुए असमंजस में पड़ी रही कुछ देर, फिर इतना कहा - 'तुम लोगों को सीधे घर आना चाहिए था।'
धनंजय ने सफाई दी कि विजय के पास समय नहीं था। उसे बाबा विश्वनाथ का दर्शन करना है, गंगा नहाना है, घाट देखना है, सारनाथ जाना है - समय कहाँ है?
जिस समय अमेरिका के दिनों के अलबम देखने-दिखाने का कार्यक्रम चल रहा था, उसी समय डिनर की तैयारी के बहाने सोनल किचेन में आई और हेल्प करने के लिए धनंजय को बुलाया!
'राजू, इतनी बड़ी बात! न तुमने पापा को बताई, न मम्मी को, न हमें - यह क्या देख रही हूँ?'
'कौन-सी बात?'
'अरे यही कि तुमने शादी कर ली और किसी को खबर नहीं दी?'
'किसने कहा कि शादी कर ली?'
सोनल ने आश्चर्य से धनंजय को देखा - 'तुम दोनों एक ही छत के नीचे रह रहे हो जाने कब से और बच्ची पापा बोल रही है तुमको और शादी भी नहीं की - मामला क्या है?'
धनंजय मुसकराया - 'भाभी, मामला कुछ नहीं है! बात सिर्फ इतनी है कि उसे मेरी जरूरत है, और मुझे उसकी - जब तक जॉब नहीं मिल जाती!'
'क्या उसे इस बात का आभास है कि तुम उसके साथ तभी तक हो जब तक जॉब नहीं मिल रही है?'
'यह मैं नहीं जानता!'
'तुम उसके साथ रह रहे हो, उसका खा रहे हो, पी रहे हो, पहन रहे हो, उसकी गाड़ी और पेट्रोल पर घूम रहे हो, उसकी बच्ची तुम्हें पापा मानती है, तुम्हारे भरोसे घर और बच्ची छोड़ कर नौकरी कर रही है, तुम उसके रिश्तेदार और नौकर भी नहीं हो - फिर कौन-सा नाता है तुम्हारे-उसके बीच?'
झुँझला कर धनंजय ने कहा - 'भाभी, छोड़िए यह सब! चलिए खाया जाए!'
'अरे, ऐसे कैसे छोड़िए! तुम उसे धोखा दे रहे हो और बेवकूफ बना रहे हो! या फिर हमसे झूठ बोल रहे हो और छिपा रहे हो!'
'दिल्ली की लड़कियों को नहीं जानतीं आप? हो सकता है, बच्ची कल से स्कूल जाने लगे तो कान पकड़ कर बाहर कर दे!'
'एकदम कर देना चाहिए तुम्हारी चाल को देखते हुए।' सोनल ने उसकी टोह लेते हुए पूछा - 'एक बात बताओ, तुम्हारी नजर कहीं उसके धन-दौलत और सुख-सुविधा पर तो नहीं है?'
'अच्छा रहने दीजिए! अब आप हद कर रही हैं!'
'मैं इसलिए कह रही हूँ कि अगर हो, तब भी तुम्हें कर लेनी चाहिए! सुंदर है, समझदार है, जॉब में है, तुम्हें जॉब न मिले तब भी कोई हर्ज नहीं! मैं साथ हूँ तुम्हारे। समझा? चलो अब!'
सोनल ने विजया को आवाज दी। सभी किचेन से दोंगे, प्लेटें और तश्तरियाँ डाइनिंग रूम में ले गए - एक-एक कर के! सोनल ने रत्ना डी. को गोद में बिठाया, खाया-खिलाया और साढ़े दस ग्यारह बजे विदा किया!
विदा होने से पहले धनंजय भाभी को अलग ले गया - 'भाभी, क्या यह सच है कि भैया ने वहाँ कोई शादी की है?'
सोनल उसका मुँह देखने लगी!
'आरती नाम की कोई लड़की है क्या वहाँ?'
सोनल बगैर उन्हें विदा किए घर में भाग आई!
सात
रघुनाथ गाँव से लौटे लेकिन 'खुदगर्ज और कृतघ्न' बेटे के जाने के बाद!
यह उनकी राय थी अपने छोटे बेटे धनंजय के बारे में। उसे पता था कि इसी नगर के 'अशोक विहार' में उसकी भाभी के साथ बाप भी रहता है लेकिन ठहरा होटल में। माना कि साथ औरत थी - 'काशी दर्शन' के लिए आई होगी कि यह लड़के का गृहनगर है, आसानी होगी। करना यह था कि उसे होटल में ठहरा के तुम अपने घर आ जाते, यहीं रुकते लेकिन नहीं। रघुनाथ नाराज हुए, उन्हें दुःख भी हुआ। ये बातें वे बहू से नहीं कह सकते थे! दूसरी बात थी बाप का 'इगो'! देखना चाहते थे कि जो बेटा दिल्ली से बनारस आ सकता है, वह बाप से भेंट करने के लिए बनारस से डेढ़-दो घंटे दूर पहाड़पुर आ सकता है या नहीं!
शिकायतें तो उन्हें अपने बड़े बेटे संजय से भी थीं लेकिन परदेस की दूरी और उसके 'अकेले' पड़ जाने की कल्पना ने उनकी कठोरता को कम कर रखा था! वह ऐसे देश में था जहाँ माँ नहीं, पिता नहीं, पत्नी नहीं। उसकी क्या हालत होती होगी, ऐसे में - जब इनके लिए हूक उठती होगी! वे भूले नहीं थे कि अपने मन से विवाह करने के बावजूद उसने पिता की जरूरतों को याद रखा था! यही नहीं, वह जो डी-1 अशोक विहार में इतने दिनों से चैन की बंशी बजा रहे हैं और खटिया तोड़ रहे हैं - उसी के चलते! उसे उनकी एक और एकमात्र इच्छा की भी जानकारी है - एक तरह से पिता की अंतिम इच्छा कि वे आखिरी साँस पहाड़पुर में बने नए घर में छोड़ें! उन्होंने गाँव के पी.सी.ओ. से शुरू में दो-चार बार फोन कर के याद भी दिलाया कि कुछ भेजो, जितना बन पड़े उतना ही सही, कम से कम ढाँचा तो अपने रहते खड़ा कर दें। उसने भी आरंभ में उत्साह दिखाया लेकिन आखिरी बार झल्ला कर कहा कि रुपए क्यों बरबाद करने पर तुले हुए हैं, उसके सदुपयोग के बारे में सोचिए! उसके बाद से ही रघुनाथ रूठ गए! न इन्होंने फिर फोन किया, न उसने बात की!
सोनल जरूर बातें करती है - कंप्यूटर के आगे बैठ कर, कान में ईयर फोन लगा कर। महीने में कभी एक बार, कभी दो बार! रघुनाथ से भी कहती है कि पापा, आ जाएँ। आप भी बतिया लें! लेकिन जब संजय ही नहीं कहता तो सोनल के कहने और चाहने से क्या? इस तरह उनका रूठा रहना जारी है - वही बाप का 'इगो'! इतना जरूर है कि जब कभी संजय का फोन आता है - जो कम ही आता है, वे बुलाए जाने का इंतजार करते हैं जिसकी नौबत कभी नहीं आई!
संजय एक बार बोल गया था - झटके में। तब उसका भाई भी उसके साथ था। वह राँची में पढ़ रहा था उन दिनों! रघुनाथ मास्टर आदमी! किसी प्रसंग में 'कृतज्ञता' का मतलब समझा रहे थे उन्हें कि कोई तुम्हारे लिए जरा-सा भी कुछ करता है तो उसे भूलो मत, याद रखो और अवसर मिले तो उसके लिए जो कुछ कर सकते हो, करो। इसी जन्म में उऋण हो जाओ। इससे बड़ा सुख दूसरा नहीं! जब रघुनाथ चुप हो गए तो संजय बोला था - 'पापा, इसका तो मतलब हुआ कि तुम जहाँ हो, वहीं खड़े रह जाओ! बार-बार पलट कर देखोगे तो आगे कब बढ़ोगे? आप कृतज्ञ होने के लिए कह रहे हैं कि पैरों में बेड़ी पहनने के लिए!...' यह बात आई-गई हो गई लेकिन रघुनाथ के दिमाग से गई नहीं!
रघुनाथ भी चाहते थे कि बेटे आगे बढ़ें! वे खेत और मकान नहीं हैं कि अपनी जगह ही न छोड़ें! लेकिन यह भी चाहते थे कि ऐसा भी मौका आए जब सब एक साथ हों, एक जगह हों - आपस में हँसे-गाएँ, लड़ें-झगड़ें, हा-हा हू-हू करें, खायें-पिएँ, घर का सन्नाटा टूटे। मगर कई साल हो रहे हैं और कोई कहीं है, कोई कहीं। और बेटे आगे बढ़ते हुए इतने आगे चले गए हैं कि वहाँ से पीछे देखें भी तो न बाप नजर आएगा, न माँ!
कभी-कभी उन्हें लगता कि वे बापट की तरह बेऔलाद होते तो कहीं ज्यादा अच्छा होता। वे भी उनकी तरह दारू छान कर गाते हुए मस्त रहते!
गाँव से लौटने के बाद उन्होंने बहू से धनंजय के बारे में कुछ नहीं पूछा! बहू खुद ही उदास और बीमार लग रही थी! यह सोच कर कि 'औरतों को बहुत-सी ऐसी बीमारियाँ होती हैं जिनके बारे में न पूछना ही ठीक।' चुप लगा गए!
उनके बीच बातें होती थीं रात को खाने की मेज पर। रघुनाथ गाँव की स्मृतियों में जीते रहते थे, वे वहीं की बातें करते थे, बहू विश्वविद्यालय की, अपने विभाग की, लड़के-लड़कियों की, प्रशासन की। उसको अन्यमनस्क देख कर रघुनाथ ने ही शुरू किया पहाड़पुर में होनेवाले 'ग्रामसभा' चुनाव को ले कर - 'समझो, ऐसे वक्त पर गया था जब गहमागहमी थी चुनाव की। पहाड़पुर की ग्राम सभा है आरक्षित कोटे की! लड़ते हैं दलित जबकि निर्णायक होते हैं ठाकुर वोट जिनकी संख्या है साठ! ये साठ वोट जिसे चाहें उसे सभापति या प्रधान बना दें। खड़े हैं सोमारू राम और मगरू राम - मैं जिस दिन पहुँचा, उसी दिन शाम को ठाकुरों की बटोर थी बब्बन कक्का के यहाँ! तय हुआ कि यही मौका है जब वे पकड़ में आए हैं और यही मौका है बदला लेने का! जितना ऐंठना हो, ऐंठ लो वरना फिर हाथ नहीं आनेवाले! विचार हुआ कि दुनिया और देश इक्कीसवीं सदी में चला गया है और पहाड़पुर में मंदिर ही नहीं, जल चढ़ाने के लिए बस महादेव की पिंडी है! मंदिर बनवाने के लिए मतदान से पहले ही उनसे पैसे ले लिए जाएँ। कहा जाए कि जो एक लाख देगा, वोट उसी को दिए जाएँगे!
'अगर इसके लिए दोनों ही तैयार हों तब?' किसी ने बीच में टोका!
इस पर दो मत सामने आए! एक ग्रुप का कहना था कि ऐसी हालत में बोली बढ़ाते जाइए। एक का डेढ़, डेढ़ का दो - ऐसे। जो अधिकतम दे, वोट उसे दिये जाएँ! दूसरे ग्रुप का कहना था कि नहीं! यह मोल भाव है, नीलामी जैसी चीज है, अपनी जबान से पलटना है, हमारी प्रतिष्ठा और मर्यादा के अनुकूल नहीं है! दोनों से ही एक-एक लाख ले लिया जाए और वोट आधे-आधे बाँट दें! तीस एक को, तीस दूसरे को! बताया दोनों को न जाए। वे मान कर चलें कि साठों हमीं को जा रहे हैं!
नई पीढ़ी इन दोनों से असहमत थी! उसका कहना था कि आप लोग अपने मंदिर और महादेव को ले कर चाटिए, हमें हमारी दारू और मुर्गा चाहिए!
रघुनाथ को यह सब सुनाते हुए मजा आ रहा था लेकिन वे देख रहे थे कि सोनल न तो सुन रही है, न रस ले रही है। उसका मन कहीं और है। खाना खा चुकने के बाद जब वे हाथ धो कर आए तो देखा कि सोनल अपने बिस्तर पर औंधे मुँह पड़ी है और सुबक रही है। रघुनाथ उसके कमरे में खड़े हो कर कुछ देर समझने की कोशिश करते रहे - 'बेटा सोनल, क्या बात है?'
सोनल फफक पड़ी।
'बेटा, बोल तो सही, बात क्या है?' रघुनाथ ने खुद को सँभालते हुए पूछा!
'संजय ने दूसरी शादी कर ली, पापा!' सोनल ने हिचकियों के बीच कहा - 'मैंने कल फोन पर बात की, तब बोला। कम से कम मुझसे पूछ तो लिया होता!'
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 20:02

आठ
भ्रम और भरोसा - ये ही हैं जिंदगी के सोत! इन्हीं सोतों से फूटती है जिंदगी और फिर बह निकलती है - कलकल छलछल!
कभी-कभी लगता है कि ये अलग-अलग दो सोते नहीं है। सोता एक ही है - उसे भ्रम कहिए या भरोसा। यह न हो तो जीना भी न हो!
यही सोता रघुनाथ का जीवन था! जब अमेरिका से लौटने के बाद सोनल ने उनसे कहा कि पापा, मुझे लग रहा है, संजय वहीं बस जाना चाहता है। इंडिया आएगा तो जरूर लेकिन रहने के लिए नहीं, 'विजिट' के लिए। तो रघुनाथ उस पर व्यंग्य से मुस्कराए थे - कितना जानती हो संजय को? बाप यहाँ, माँ यहाँ, भाई यहाँ, बहन यहाँ, और तो और बीवी यहाँ। कितना जानती हो संजय को? उन्होंने कहा कुछ नहीं, सिर्फ मुसकराए थे - कि उसने बाप की दीनता और दरिद्रता देखी है। उन्हें दुखी और परेशान देख कर कभी-कभी बोलता था कि चिंता न करें, इतना कमाऊँगा - इतना कमाऊँगा कि घर में रखने की जगह नहीं रहेगी। लेकिन कमाने के इस रहस्य को न वे समझ पाए, न सक्सेना! आज उन्हें लग रहा था कि उसने सोनल से शादी सोनल के लिए नहीं, अमेरिका के लिए की थी!
रघुनाथ! जो जिंदगी तुम्हें जीनी थी, वह जी चुके! अब अपनी फजीहत कराने के लिए जी रहे हो!
यह कोई कह नहीं रहा था लेकिन उनके कान सुन रहे थे और यह मूक स्वर उनके दिल तक पहुँच रहा था!
वे भोजन के बाद घर के पिछवाड़े अपने ढाबे में नहीं गए थे उस शाम, ड्राइंग रूम में बैठे रह गए! सारी रात ऐसे ही काट दी - बैठे-बैठे! नींद आई ही नहीं! तरह-तरह की आशंकाएँ आ-जा रही थीं जिनमें सबसे प्रबल यह कि कहीं यह लड़की आवेश में कुछ कर-करा न ले!
यह कहने की जरूरत नहीं और इसमें भी दो राय नहीं कि इस समाचार से उन्हें एक तरह का 'खल सुख' मिला था - कि उससे विवाह करने के पहले तुमने मुझसे पूछा था? तुम्हारे बाप ने तो बात तक करने की जरूरत नहीं महसूस की थी? यहाँ तक कि निमंत्रण भी औपचारिकता के नाते दिया था। अब भुगतो! जो किया है, उसी का दंड मिला है यह। अब रो क्यों रही हो? मैं या दूसरा कोई क्या करेगा इसमें? ... लेकिन यह 'खल सुख' थोड़ी देर के लिए था। ऐसा सोचना उसके प्रति निष्ठुरता और अमानवीयता होती! उस हालत में तो और भी जब उसने अपने व्यवहार से उनका दिल जीत लिया था! ऐसा खयाल ही अपने आप में नीचता था। ऐसे वक्त में उसे हमदर्दी और प्यार चाहिए।
बिजली ड्राइंग रूम में भी जल रही थी और सोनल के कमरे में भी!
रघुनाथ को जरा सी-आहट मिलती तो दबे पाँव जाते और उसके कमरे में झाँक आते कि सब ठीक-ठाक तो है!
रात के डेढ़-दो के करीब सोनल हँसते हुए ड्राइंग रूम में आई - 'पापा, आत्महत्या नहीं करूँगी, निश्चिंत रहिए! जाइए, सो जाइए मम्मी के कमरे में या अपने ढाबे में!'
रघुनाथ शरमा गए - 'मैं इस डर से थोड़े बैठा हूँ भाई! मुझे नींद ही नहीं आ रही है!'
सोनल का ध्यान ड्राइंग रूम में टँगे उस बड़े फोटो पर गया जो उसके विवाह का था। शायद 'रिसेप्शन' के समय का! संजय-सोनल दो ऊँची मखमली - फूलों से सजी - कुर्सियों पर बैठे हैं और दोनों के सिर पर हाथ रखे सक्सेना साहब पीछे खड़े हैं!
'पापा, एक प्रार्थना है आपसे!'
'बोलो!'
'यह बात घर में ही रहे! आप, मम्मी और सरला दीदी के बीच! मेरे पापा को न मालूम हो!'
'क्यों?'
'वे बर्दाश्त न कर पाएँगे! दो बार अटैक हो चुका है उन्हें!'
रघुनाथ कुछ कहना चाहते थे लेकिन चुप रह गए! वे सोनल को बोलने देना चाहते थे - चाहते थे कि उसके मन में जो कुछ है, उड़ेल कर हलकी हो जाए। यही अच्छा है कि वे सिर्फ सुनें!
'पापा, मैं चाहूँ तो उसे कोर्ट में घसीट सकती हूँ, जलील कर सकती हूँ। मैं भाग कर नहीं आई हूँ, उसे छोड़ कर भी नहीं आई हूँ! आई हूँ उसकी रजामंदी से। मैं ही नहीं, वह भी चाहता था कि मैं 'हाउसवाइफ' न रहूँ। नौकरी करूँ और वह भी अपने देश में! और यहाँ आने के बाद भी तुम मीठी-मीठी बातें करते रहे। एक बार भी नहीं बताया कि तुम्हारे मन में क्या है? ऐसा भी नहीं कि मुझे बुलाया हो और मैंने आने से इनकार किया हो।'
'हद है!' सोनल क्रोध से बिफर उठी - 'तुम समझते क्या हो अपने आपको? अरे, तुमने डाइवोर्स के लिए पूछा होता, 'हाँ' कर देती मैं। तुम नहीं देते, कहते तो - मैं दे देती! पूछा तक नहीं, इशारा तक नहीं किया! बगैर डाइवोर्स के शादी कर रहे हो? अपमानित करके मुझे? बिना किसी गलती के, कसूर के? और बेशर्मी यह कि पूछने पर मुसकराते हुए बताते हो कि हाँ, भई! कर ली! करनी पड़ी! मूर्ख समझते हो मुझे? जैसे मैं तुम्हें जानती ही न होऊँ? जैसे तुम्हारी हरकतों से अनजान रही हूँ? मैं तो बच्चू, तुम्हारी खटिया खड़ी कर देती लेकिन क्या बताऊँ? लोग यही समझेंगे कि मैं यह सब गुजारा भत्ता के लिए कर रही हूँ जबकि मैं थूकती हूँ तुम्हारी कमाई पर! ... क्या समय हो रहा है पापा? चार? साढ़े चार? रुकिए, आप को चाय पिला रही हूँ!'
वह उठी और किचेन में चली गई!
ठंड ज्यादा थी! रघुनाथ पाँव समेटे रजाई में लिपटे सोफे पर पड़े थे! उन्हें यह तो अच्छा लग रहा था कि सोनल का मूड बदल गया है लेकिन यह अच्छा नहीं लग रहा था कि वह उनसे ऐसे बात करे जैसे वही संजय हों! गलती उनके बेटे ने की थी लेकिन अपराधबोध से ग्रस्त वे थे! वह भीतर से डरे और सहमे हुए भी थे!
वे कहते किसी से नहीं थे लेकिन गाँव उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गया था! बेटों को गाँव गए कई साल हो गए थे। उनकी कोई दिलचस्पी ही नहीं रह गई थी गाँव में! घराने के लोग सनेही को ठीक से काम नहीं करने दे रहे थे! तारीख पहले 'बुक' करने के बावजूद जसवंत उनके खेत तब जोतता जब सबके जुत जाते और यही हाल सिंचाई का था। सनेही के खड़े होने और रोकने के बावजूद उसकी नाली बंद कर पानी पहले अपने खेत में ले जाते थे लोग। उसकी खेती हर बार पिछड़ रही थी! बाहरी आदमी - लोगों से झगड़ा मोल ले कर एक दिन भी टिकना मुश्किल था! रघुनाथ खुद कहते थे हर बार - गम खा जाओ, सह लो, मगर झंझट न करना! दयादों की नजर उनके खेतों पर आ लगी थी - यह बात उनसे छिपी नहीं रही! गाँव जाने पर उनका सम्मान सभी करते थे लेकिन यह 'सम्मान' उन्हें काफी रहस्यपूर्ण लगता था।
नरेश ने अपने घर के आगे उनकी जमीन में खूँटा गाड़ कर भैंस बाँधना फिर शुरू कर दिया था। रघुनाथ देख कर भी अनदेखा करके चल देते थे! कौन रोज-रोज किचकिच करे?
इस बार तो सनेही ने जो सूचना दी, उससे वे और भी हदस गए! एक दिन - उनके गाँव जाने के तीन दिन पहले की बात है यह - मोटरसाइकिल से दो लड़के आए थे उनके दरवाजे। पैंट-शर्ट में। वे उतरे और बरामदे में पड़ी खटिया पर लेट गए! सनेही को बुलवाया, पूछा कि मास्टर रघुनाथ का यही घर है? फिर पूछा - वे कब-कब आते हैं? कितने दिन रहते हैं? कब जाते हैं? शहर में कहाँ रहते हैं - तरह-तरह के प्रश्न! जाते-जाते यह भी कहा कि उनका दिमाग तो ठिकाने है? सनेही ने बताया कि वे अच्छे लड़के नहीं थे! इससे पहले उन्हें कभी देखा नहीं था! जो चुप था और लेटा था उसके शर्ट के नीचे पिस्तौल या रिवाल्वर जैसी चीज थी! सनेही की रिपोर्ट का असर यह हुआ कि उन्होंने झुटपुटा होते ही घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था! वे कारण समझने की कोशिश करते रहे थे लेकिन नहीं समझ सके!
शीला की तरह रघुनाथ का भी अजब हाल था! वे यहाँ रहते तो गाँव के लिए चिंतित रहते, वहीं की बातें करते और लौटने का बहाना ढूँढ़ते रहते लेकिन अबकी जैसे संकेत मिले थे, उससे वहाँ के बारे में सोचने से भी डरने लगे थे! अबकी आते वक्त ही उन्होंने तय कर लिया था कि बहुत जरूरी हुआ तो बात दूसरी है, वरना अपने अशोक विहार का ढाबा ही बहुत है! वह बना रहे, उन्हें और कुछ नहीं चाहिए! मगर यहाँ? यहाँ संजय ने उनके लिए एक दूसरी ही समस्या खड़ी कर दी थी! अब वे पूरी तरह से सोनल की मर्जी पर थे। वह चाहे तो रहने दे, चाहे तो निकाल बाहर करे! भई, आप तभी तक मेरे ससुर थे जब तक आप का बेटा मेरा पति था! जब वह पति नहीं, तो आप ससुर कैसे? किस बात के? यह कोई सराय या धर्मशाला है कि पड़े-पड़े रोटी तोड़ रहे हैं? मुफ्त की? चलिए यहाँ से, अपना रास्ता नापिए!
उन्हें भलमनसाहत यही लग रही थी कि वह कुछ कहे, इसके पहले वही कहें कि बेटी, बहुत हो गया, अब आज्ञा दो!
(यह वह समझते थे कि यह कहने का लाभ उन्हीं को मिलेगा। हो सकता है, वह पिघल जाए और मना कर दे)
सोनल चाय ले कर आ गई - दो बड़े मग! एक मग उनके आगे रखते हुए बोली - 'पापा, आपने ऐसा बेटा क्यों पैदा किया जो वह नहीं देखता जो उसके पास है; हमेशा उधर ही देखता है जो दूसरे के पास है - लार टपकाते हुए! पता है, उसने आरती गुर्जर से क्यों की शादी?'
रघुनाथ ने चाय सुड़की! वे किसी और सोच में डूबे थे!
'इसलिए कि वह इकलौती संतान है करोड़पति एन.आर.आई. व्यवसायी की! एक्सपोर्ट-इंपार्ट कंपनी 'आरती इंटरप्राइजेज' के मालिक की!'
'बेटा, हम यह सब नहीं सुनना चाहते! हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि अपने पापा को बुला लो और अब मेरी छुट्टी करो।'
'क्या? क्या कहा आपने? जरा फिर तो सुनूँ?' सोनल की आवाज सहसा ऊँची हो गई!
रघुनाथ बिना उसकी ओर देखे चाय सुड़कते रहे! सोनल ने उनके हाथ से मग छीन लिया - 'जी नहीं, कान पकड़िए और कहिए कि ऐसी बात फिर कभी नहीं करूँगा!'
रघुनाथ ने कातर और निरीह आँखों से उसे देखा!
वह रोती हुई रघुनाथ की गोद में लुढ़क गई - 'पापा! संजय ने छोड़ दिया, कोई बात नहीं; आप तो मुझे न छोड़िए!'
नौ
रघुनाथ अपने जीवन की लंबाई नापते थे अपने पैरों से - उसकी चाल और ताकत से; फेफड़ों में आती-जाती साँसों से। एक समय था जब वे पंद्रह-सोलह मील चले जाते थे ननिहाल। धूप में! बिना थके, बिना कहीं बैठे - और तरोताजा रहते थे! फिर यह लंबाई घटनी शुरू हुई - आठ मील, फिर छह मील, फिर चार मील, फिर एक मील और अब वह ढाबे में आ कर सिमट गई थी! अगर कहीं निकलना भी होता था तो अब दो पैर काफी नहीं होते थे, एक तीसरा पैर भी लगाना पड़ता था और वह तीसरा पैर था - छड़ी!
अब वह तिपहिया मनुष्य थे!
संतोष था तो यही कि उनकी तरह के तिपाए-चौपाए मनुष्यों से कालोनी भरी पड़ी थी। जीने का सबब यही संतोष था कि वे अकेले नहीं हैं। उनके जैसे बहुत हैं! कई तो उनसे भी बदतर हैं। जिन्होंने जमीनी हिस्सा किराए पर दिया है और खुद रहने के लिए पहली मंजिल चुनी है, वे वहीं अटके पड़े हैं। किसी तरह बालकनी में आते हैं और वहीं बैठे-बैठे पूरे दिन लोगों को आते-जाते देख कर अपने जीवित होने का एहसास करते हैं।
रघुनाथ किसी तरह पार्क और नहर तक तो हो आते थे, गाँव नहीं जा पाते थे। यहाँ से थ्री व्हीलर या टेंपो लेना, बस अड्डे जाना, बस में धक्कामुक्की के बीच चार घंटे बैठे रहना, नहर पर उतरना, फिर वहाँ से पैदल डेढ़-दो किलोमीटर गाँव जाना मुश्किल हो गया था। जोड़ों में दर्द भी रहने लगा था अब। लेकिन जैसे-जैसे गाँव जाना कम होता गया था, वैसे-वैसे वहाँ की जमीन-जायदाद की चिंताएँ बढ़ती ही गई थीं!
सोनल ने उन्हें ढाबे से हटा कर घर के 'गेस्ट रूम' में रख दिया था! वे ठंड से तो बच गए थे लेकिन खिड़की के पास बैठ कर रात भर अपने गाँव और खेतों में घूमते रहते और सनेही को सलाह देते रहते! थक जाते तो बाकी समय यह सोचने में लगाते कि आखिर सोनल उनकी कौन है - न बहू, न बेटी - कि उसके घर में बैठे हुए हैं? जो उनके हैं, वे जाने कहाँ कहाँ हैं? उन्हें तो फिकर भी नहीं है इनकी! पूरा कुनबा - जिसकी एक-एक ईंट उन्होंने जोड़ी थी - बिखर चुका है! शीला - यहाँ तक कि शीला को भी अपनी बेटी के घर बैठ कर झाड़ू लगाना और खाना बनाना मंजूर, लेकिन बहू के यहाँ मंजूर नहीं! और अब तो यह बहू भी कहाँ रह गई है? शीला या जिसे भी पता चलेगा, दस बात उन्हीं को सुनाएगा उलटे कि किस हैसियत से वहाँ हैं आप?
यही बेचैनी एक सुबह उन्हें कालोनी के शर्मा पी.सी.ओ. ले गई! उन्हें सर्दी-जुकाम था! कई दिनों से बाहर नहीं निकल रहे थे! सोनल ही नहीं निकलने देती थी! लेकिन अपने दोनों बेटों से फाइनल बातें करने के इरादे से खिसक आए थे - चुपचाप!
सबसे पहले संजय को उन्होंने फोन किया - यही आठ-साढ़े आठ का समय होता था जब सोनल कंप्यूटर पर बैठती थी!
हलो, मैं बनारस से रघुनाथ!
(संजय)
अपने पास रखो यह चरण स्पर्श! शर्म आती है अपने को बाप कहते हुए मुझे! जो कमीनापन दिखाया तुमने, उसमें मुझे बात नहीं करनी चाहिए, लेकिन....
(संजय)
बकवास बंद करो! सुनो, मैं अशक्त हो गया हूँ! जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं, कब क्या हो? अब खेती मुझसे नहीं होगी। या तो आ कर सँभालो या बताओ क्या करूँ गाँव की जमीन-जायदाद का?
(संजय)
धनंजय से तो पूछूँगा ही, लेकिन बड़े हो तुम! मालिक हो! तुम क्या कहते हो?
(संजय)
नहीं, नहीं, हम वह सब करेंगे जो आप कहेंगे। कहिए तो। सुझाव दीजिए अपना!
(संजय)
हूँ। तो सब बेच दें! उस पैसे से एक-डेढ़ कमरे का बनारस में फ्लैट ले लें। बाकी जमा कर दें और उसके सूद से दोनों परानी जिएँ खाएँ!
(संजय)
हाँ-हाँ, पेंशन तो रहेगी ही! लेकिन सुनिए, यह काम अपने माँ-बाप के लिए आप ही कीजिए! यह मुझसे न होगा!
(संजय)
इसलिए कि यह पाप मैं अपने हाथों नहीं करूँगा! इसलिए कि वह पुरखों की चीज है, उनकी धरोहर है। दूसरे की चीज बेचने का हक मुझे नहीं है!
(संजय)
नहीं, मैं बिल्कुल सेंटिमेंटल नहीं हूँ। लेकिन मेरे खेत जमीन नहीं है। इन्हें जिंस या माल मानने के लिए तैयार नहीं हूँ! और सुनो, अपनी सलाह अपने पास रखो! साले! नमकहराम!
उन्होंने फोन रख दिया!
कुछ देर सोचते रहे कि दूसरा फोन करें या नहीं! आखिरकार लगा ही दिया नंबर!
हलो, धनंजय है क्या?
(महिला स्वर)
मैं रघुनाथ! उनका पिता!
(धनंजय)
हलो राजू, तुम बनारस आए लेकिन गाँव पर नहीं आए। मैं इंतजार ही करता रह गया।
(धनंजय)
मौका नहीं मिला तो नहीं मिला जाने दो। ऐसा है बेटा कि मैं अब किसी लायक नहीं रहा। काम-धाम होता नहीं। समस्या है खेतों की! उनका क्या करूँ?
(धनंजय)
नहीं, वह तो ठीक है लेकिन सनेही कब तक देखेगा? उसे लोग करने नहीं दे रहे हैं। उनकी आँखें लगी हैं हमारे खेतों पर!
(धनंजय)
लेकिन फायदा आज बेचने में नहीं है! अभी भाव चढ़ रहे हैं जमीन के! समझो पाँच साल में ही दुगुने हो जाएँगे!
(धनंजय)
तो अभी रुक जाएँ ? मान लो, रुक जाएँ लेकिन उसके पहले ही मैं चल बसूँ तो? संजय भी बाहर, तुम भी बाहर, फिर कौन...
(धनंजय)
ठीक है, बेच देता हूँ लेकिन उतने पैसों का कुछ करना पड़ेगा न? क्या करूँ उनका?
(धनंजय)
आधा-आधा बाँट दूँ तुम दोनों भाइयों में ? फिर मेरा और तुम्हारी माँ का क्या होगा? हम क्या खाएँगे? अच्छा सुनो, यह बताओ तुम क्या कर रहे हो इन दिनों?
(धनंजय)
अब तक नहीं मिली नौकरी? कितने दिन लगेंगे अभी? तुम्हीं क्यों नहीं आ जाते? मैनेजमेंट के ज्ञान का उपयोग खेती के ही बिजनेस में नहीं हो सकता?
(धनंजय ने फोन काट दिया)
'हरामखोर!' रघुनाथ पी.सी.ओ. के बाहर आ गए! साले, डोनेशन से पढ़ोगे तो पूछेगा कौन? न काबिलियत है न सिफारिश - चले हैं मैनेजर बनने!
वे घर न जा कर सीधे पार्क में गए और लकड़ी की बेंच पर बैठ गए!
पार्क के बगलवाली लेन में घर था पारसनाथ शर्मा का और तीन-चार नौकरानियाँ उनसे उलझी हुई थीं! हफ्ते में एक-दो बार कालोनी के किसी न किसी घर के सामने ऐसे सीन हो जाते थे! क्यों होते थे ऐसे सीन, इसे सब जानते थे इसलिए उसे महत्व भी नहीं देते थे!
था यह कि हर घर में बांग्लादेशी नौकरानियाँ थीं - सोलह-सत्तरह की उमर से ले कर पैंतीस-चालीस साल की! बूढ़ों में से किसी न किसी की 'बुढ़िया' अपने बेटे-पतोह के पास बाहर चली जाती थी कुछ महीनों के लिए। रहती भी थी तो राग-द्वेष से मुक्त हो चुकी होती थी या बुढ़ऊ को इतनी-सी छूट दे रखती थी! बूढ़ों में शायद ही ऐसा कोई बूढ़ा था जिसे अपने जवान होने का भ्रम न हो और वो समय-समय पर यह 'परीक्षण' न करना चाहता रहा हो कि उसमें अभी 'कुछ' बचा है कि नहीं? तृष्णा का मारा हर बूढ़ा प्यार, दुलार, पुचकार के नाम पर ऐसी छूट ले लेता था और नौकरानियाँ भी साबुन, तेल, नेलपॉलिश, लिपस्टिक या पंद्रह-बीस रुपए बख्शीश पा कर संतोष कर लेती थीं। वे उनके यहाँ काम करते हुए अकुंठ भाव से सुरक्षित महसूस करती थीं। समस्या वहाँ खड़ी होती थी जहाँ बूढ़ा अपनी नौकरानी की सेवा के मुताबिक बख्शीश देने में आनाकानी करता था! यह प्रणय कलह जैसा मामला होता था जिसमें किसी तीसरे को दखल देने या बीच-बचाव करने की जरूरत नहीं पड़ती थी! (विस्तृत जानकारी के लिए पत्रकर सुशील त्रिपाठी की 'स्टोरी' पढ़िए - आखिर 'अशोक विहार' के ही प्रवेश द्वार पर 'मर्दाना कमजोरी एवं सिसनोत्थान की समस्या निवारण का जड़ी बूटियों वनौषधियों से शर्तिया इलाज' का पीला तंबू साल भर क्यों तना रहता है?)
इस कलह कोलाहल से निरपेक्ष रघुनाथ बेंच पर धूप सेवन कर ही रहे थे कि उन्हें खोजते हुए पुराने मित्र जीवनाथ वर्मा आ पहुँचे! उनके साथ ही रिटायर हुए थे और रसायनशास्त्र के अध्यापक थे! नगर में बेटे-बहू के साथ साकेत विहार में रहते थे!
कार्यकाल के दिनों में कुछ लोग उन्हें पागल समझते थे और कुछ जीनियस! चना-चबेना पर जीवित रहनेवाली भारत की अस्सी प्रतिशत जनता उनकी चिंता का विषय थी! वे भी शौकीन थे भूँजा (भरसाँय में भुने गए चने, मटर, लाई, चूड़ा, भुट्टे) के। भारी मुसीबत थी आम आदमी की! कड़ाही जुटाओ, बालू या नमक का बंदोबस्त करो, चूल्हा जलाओ, उसके गरम होने और धधकने का इंतजार करो तब कहीं भूँजा तैयार हो! ऐसा नहीं हो सकता कि यह सब झंझट न पालनी पड़े? वर्षों के चिंतन-मनन के बाद उन्होंने एक प्रयोग किया! चूँकि यह राष्ट्रीय स्तर की समस्या थी जिसका समाधान उन्होंने ढूँढ़ा था इसलिए उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उद्घाटन वैज्ञानिक ए.पी.जे.अब्दुल कलाम करें। लेकिन अड़ंगा लगाया रघुनाथ ने। उन्होंने कहा कि प्रयोग अभी प्रक्रिया में है इसलिए आयोजन स्थानीय स्तर पर हो!
काफी खर्च किया वर्मा ने! घर के आगे तंबू लगाया, तीस अध्यापकों के लिए तीस कुर्सियाँ मँगवाईं, कैटरर से चालीस तश्तरियाँ मँगवाई, माइक लगवाया! सभी अध्यापकों की तश्तरी में चार-चार चने रखे, प्रिंसिपल जिन्हें उद्घाटन करना था, उनकी तश्तरी में पाँच! तालियों की गड़गड़ाहट के बीच प्रिंसिपल ने मुँह में पाँचों चने डाले और कूँचते ही थूक दिया। माइक पर सिर्फ एक वाक्य बोले - 'ये चने लोहे के हैं और जहर हैं।'
सभी अध्यापकों ने चखे बगैर ही प्लेटें फेंक दीं और चले गए!
उनके अनुसार वर्मा ने उनका अपमान किया था और वर्मा के अनुसार उन्होंने वर्मा का!
प्रयोग यों तो गोपनीय था, उसके बारे में बताया भी नहीं जा सकता था लेकिन रघुनाथ को जो जानकारी थी, वह यह - वर्मा ने झाड़-पोंछ कर जमीन पर एक किलो चना फैलाया, उस पर स्पिरिट छिड़का, तीली जलाई, लपक उठी और चने भुन गए! (छिलके जल गए, गूदे ज्यों के त्यों कच्चे रह गए)
यही भूँजा फेमवाले वर्मा कुछ देर दूर से उन्हें घूरते रहे और धीरे से बुदबुदाए - 'रघुनाथ!' रघुनाथ ने जब सिर उठाया तो वे लपके - 'अरे! यह सचमुच तुम हो? यार, क्या हो गया तुम्हें? ठोकर बैठ गया है, गाल धँस गए हैं, दाँत झड़ गए हैं, आँखें अंदर चली गई हैं - ऐसा कैसे हो गया? पहचान में ही नहीं आ रहे तुम!'
रघुनाथ हँसे, खड़े हुए, उन्हें बँहों में लिया और अपने साथ बिठाते हुए बोले - 'कैसे इधर?'
'कुछ नहीं यार, गए थे कल पेंशन आफिस। जब लौटने लगे तो बड़े बाबू ने पूछा - 'रघुनाथ जिंदा हैं कि गुजर गए?' मैंने पूछा - 'ऐसा कैसे बोल रहे हो?' उसने कहा - 'फाइल बंद पड़ी है उनकी! मई से पेंशन नहीं चढ़ी है।' 'क्यों?' उसने कहा कि उन्होंने 'लाइव सर्टिफिकेट' नहीं दिया है! तो मैं आज यही देखने आ गया कि मामला क्या है?
'बहुत अच्छा किया, इसी बहाने तुमसे भेंट हो गई!'
' लेकिन दिया क्यों नहीं तुमने? उसमें कुछ करना तो है नहीं! फारम भर कर रजिस्ट्रार को देना है। वह दस रुपए लेगा और प्रमाणित कर देगा। फिर साल भर की चिंता खतम!'
रघुनाथ ने बड़े बुझे मन से कहा - 'जीवनाथ! मुझे दस रुपए के जीवन में कोई रुचि नहीं है।'
वर्मा ने बड़ा मायूस हो कर रघुनाथ को देखा - 'यार, क्या बात है? तुम ऐसे तो न थे!'
'चलो घर! जाना ही हो तो शाम को जाना!' रघुनाथ के एक हाथ में छड़ी और दूसरे में वर्मा का कंधा - घर लौटे!
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 20:03

................................................दस
जीवनाथ वर्मा जाते-जाते एक नई मुसीबत खड़ी कर गए थे यह कहते हुए कि अपनों के लिए बहुत जी चुके रग्घू, अब अपने लिए जियो!
यह वह बात थी जो कभी उनके अपने दिमाग में ही नहीं आई! अपनों से अलग भी अपना कुछ होता है क्या? क्या बेटे अपने नहीं थे? बेटी अपनी नहीं थी? बीवी अपनी नहीं थी? खेत-खलिहान अपने नहीं थे? यह जरूर है कि इनमें से हर एक अपने लिए उनका जीवन चाहता था। किसी को इस बात की परवाह नहीं थी कि वे जी रहे हैं या मर रहे हैं? उसकी अपनी जरूरत सबसे ऊपर होती थी और नहीं चाहता था कि कोई उस पर सवाल उठाए! आप उसे अपने रास्ते जाने दें और जाने देने में मदद करें तो आप से अच्छा कोई नहीं!
लेकिन क्या उनकी जिंदगी ही रघुनाथ की अपनी जिंदगी थी?
नहीं; होनी चाहिए थी अपनी अलग से जो नहीं हुई! नहीं रही! और जीवनाथ वर्मा यह तब कह रहे हैं जब कान सुन नहीं सकते, आँखें देख नहीं सकतीं, जबड़े चबा नहीं सकते, कमर सीधी नहीं हो सकती! और यह सारा कुछ अपनों के प्रति पिता और पति के कर्तव्य की भेंट चढ़ गया! वे यह मानने के लिए हरगिज तैयार नहीं कि वे 'अपनों' के वेश में दूसरे थे! वे कहीं से टपके नहीं थे, अनचाहे भी नहीं थे। रघुनाथ स्वयं कृतज्ञ भाव से शीला को दूसरे के घर से लाए थे; यह उसका उन पर उपकार था कि उन्हें न जानते-पहचानते हुए भी उनके साथ आई थी और एक नई दुनिया रचने में उनका साथ दिया था।
आखिर किस उम्मीद से रघुनाथ शीला ने मिल कर रची थी यह दुनिया? वे इतने निःस्पृह और निःस्वार्थ तो नहीं थे और उनकी उम्मीद भी उनसे अलग नहीं थी जो गाँव- घर के थे। कि जब वे अशक्त हो जाएँगे तो ये बच्चे उनकी आँखें बनेंगे, उनके हाथ-पाँव बनेंगे। कि वे बीमार होंगे तो यही बच्चे उनकी सेवा करेंगे, दवा-दारू करेंगे, अस्पताल में भर्ती कराएँगे। कि मरने लगेंगे तो मुँह में गंगा जल, तुलसी दल डालेंगे, अर्थी सजाएँगे, श्मशान ले जाएँगे, क्रिया कर्म करेंगे!
लेकिन देखो तो इससे बड़ी मूर्खता क्या हो सकती है? अरे, मरने के बाद सड़ो- गलो, कौवे-चील खाएँ या कुत्ते - क्या फर्क पड़ता है?
लेकिन यही दुनिया का और दुनिया के चलते रहने का कायदा रहा है - कि जीना तुम्हारा कर्तव्य है। किसी ने यह नहीं पूछा खुद से कि किसके लिए जीना है! वह पैदा होने के बाद से जब तक जी रहा है, जीता रहता है! मरने के दिन तक। मरने के दिन बाप बेटे के हाथ वह सारा कुछ सौंप जाता है जो उसके पास रहता है कि लो, सँभालो अब। मैं चला!
रघुनाथ के पास गाँव की जमीन के सिवा कुछ नहीं था और उस जमीन को वे अनमोल समझते थे। बेटे उसे 'कैश' में भुना कर देखते थे और कह रहे थे कि इससे ज्यादा तो मेरी एक महीने की इनकम है।
संजय की इस टिप्पणी ने रघुनाथ के भीतर का सारा जीवन रस चूस लिया था। वे अपने कमरे में खिड़की के पास बैठे हुए कदंब के पत्तों के पार वह आसमान देख रहे थे जो सूर्यास्त के बाद मटमैला पड़ा था। वहाँ उनकी आँखों के सामने एक मद्धिम तारा था जो हिलते पत्तों की ओट कभी छिप जाता, कभी झाँकने लगता! यह तारा नहीं था उनके पिता थे जो उन पर मुसकराते थे और छिप जाते थे!
'अरे जीवनाथ सुनो, सुनो! अपने दिन तो नहीं बचे जीने के लिए लेकिन जिया है मैंने अपने लिए भी।' वे सहसा चिल्लाए जैसे जीवनाथ अभी गेट के बाहर खड़े हों।
तारा का तुक लारा। तारा ने उन्हें लारा की याद दिला दी, उस लारा की जो उनकी नितांत अपनी जिंदगी का गोपनीय हिस्सा थी।
जिन दिनों रघुनाथ अपने 'कैशोर्य' में दाखिल हो रहे थे उन्हीं दिनों उनसे टकरा गई थी लारा चड्ढा। एक अल्हड़ और मासूम-सी लड़की। अंडाकार चेहरेवाली सलोनी साँवली लड़की। सपनीली आँखें। नाक की नोक पर शरारत। ओठों के कोनों पर मुसकान। लहरों की देह पर जैसे हवा में थर-थर बुलबुले। कमी थी तो बस दो डैनों की जिनके सहारे वह जब चाहे तब उड़ सके।
रघुनाथ मामा के घर रह कर पढ़ाई कर रहे थे और वह सामने रहती थी बँगले में। बड़ी बहन हास्टल में थी और वह माँ-बाप के साथ! रघुनाथ से एक क्लास ऊपर थी! वह जब-तब शाम को बल्ब की रोशनी में पापा के साथ बैडमिंटन खेलती थी तो रघुनाथ अपने दरवाजे पर खड़े हो कर देखा करते थे!
एक दिन जब लारा के माँ-बाप किसी समारोह में बाहर गए थे; उसने इशारे से रघुनाथ को बुलाया। वह घर की ड्रेस में थी - स्कर्ट और ब्लाउज में। वह रघुनाथ के साथ कैरम खेलने बैठ गई और कुछ देर खेलती रही! कि अचानक उठी, दौड़ कर लान में गई, पीले गुलाब के फूल के साथ लौटी और बालों में लगा कर खड़ी हो गई - 'अब बोलो, कैसी लग रही हूँ?' भौंचक रघुनाथ देखते रहे और धीरे से बोले - 'अच्छी!'
'अरे, सिर्फ अच्छी?' लारा की आँखें फटी रह गईं।
रघुनाथ की समझ में नहीं आया कि आगे क्या बोलें?
लारा ने पैर से ठेल कर बोर्ड को एक किनारे किया और हाथ पकड़ कर खड़ा कर दिया रघुनाथ को! उसकी आँखें छलछला आईं, बोली - 'गोबर कहीं के! चाहती हूँ कि अच्छी सिर्फ तुम्हारी आँखें नहीं, तुम्हारे ओठ, तुम्हारी उँगलियाँ, तुम्हारी बाँहें, तुम्हारी पूरी देह बोले!' वह एक-एक करके उनकी कमीज और पैंट के बटन खोलती गई - 'अपना भी मैं ही खोलूँ कि तुम भी कुछ करोगे?' शरमाते हुए उनके कान में बुदबुदाई!
जैसे-जैसे वस्त्र उनकी देह से अलग होते गए, वैसे-वैसे एक अजानी, अदेखी, अकल्पित दुनिया खुलती चली गई उनके आगे - धीरे-धीरे! लेकिन यह 'धीरे-धीरे' असह्य हो गया रघुनाथ को! वे बेसब्र और बर्बर हो उठे! वे लारा के संयम पर चकित भी थे और मुग्ध भी! उसने उन्हें आहिस्ता बिछाया और उन्हीं पर बिछ गई - फूलों से रची हुई गाछ की तरह। उन्हें अपने अंदर लेने से पहले उनके कान में फुसफुसाई - 'बुद्धूराम! कभी मिटाना मत!' और उन्हें ढँके हुए जीभ की नोक से दाईं छाती पर लिखा - 'एल.ए.' जब बाईं छाती पर 'आर' लिख रही थी उसी समय 'कालबेल' बजी!
वह उछल कर खड़ी हो गई, बोली - 'पहनो और भागो पीछे से!'
फिर तो महीने भर बाद ही चड्ढा साहब का तबादला हो गया और वह चली गई!
इस बात को या तो रघुनाथ जानते हैं या लारा - तीसरा नहीं! ऐसी बहुत-सी बातें हैं उनकी जिंदगी की जिसे सिर्फ वही जानते हैं! क्या यह अपने लिए जीना नहीं था?
किसी को नहीं पता कि शुरू से ही रघुनाथ ने एक चोरी की जिंदगी जी है जो उनकी नजर आनेवाली जिंदगी से कहीं ज्यादा असली और अपनी रही है! न माँ-बाप को पता, न बीवी को, न बेटे-बेटियों को! इसी जिंदगी के भीतर एक दूसरी जिंदगी! जिसे लोग देखते और समझते रहे हैं, वह दूसरों के लिए और दूसरों के काम की भले रही हो - उनकी अपनी जिंदगी नहीं थी! मजे और जोखम उस जिंदगी में थे जो उनकी निजी थी और जो प्यार की खोज में गुजरी। जमाने से बच-बचा के, लोगों की आँखों से चुरा के, अपनों की आँखों में धूल झोंक के, उन्हें धोखा दे के। जिसे उनके सिवा सिर्फ उसे पता है जो उसमें भागीदार रहा है। उसकी भनक भले मिली हो किसी को, मुकम्मल जानकारी किसी को नहीं। बेटी को अलबत्ता रही है लेकिन हलकी-फुलकी।
मुकम्मल जानकारी तो तुम्हारे कमीनेपन की भी नहीं है किसी को रघुनाथ? वह भी चोरी का ही जीवन था तुम्हारा! तुम हास्टल में थे उन दिनों! तुम्हारा जिगरी दोस्त श्रीराम तिवारी भेंट करने आया था तुमसे! आया था तो अस्पताल अपनी माँ को ले कर - उसकी हालत सीरियस थी। माँ को अपने भाई के जिम्मे छोड़ कर तुमसे मुलाकात करने आ गया था! जब वह जाने लगा तो उसकी जेब से गिरे हुए धागे में बँधे नोट तुमने देखे और चुप रहे! बाद में गिने तो एक सौ तीन रुपए! माँ को दिखा कर घंटे भर बाद फिर आया - चिंतित, परेशान और घबड़ाया! आते ही वह - जहाँ बैठा था वहाँ, फिर चौकी के नीचे, मेज पर और उसके नीचे, कमरे में चारों ओर - देखता रहा! समझने के बावजूद तुमने उससे पूछा - 'क्या बात है?' 'कुछ रुपए थे दवा के लिए, मिल नहीं रहे! और कहीं तो गया नहीं। तुमने तो नहीं देखे?' और तुमने जवाब दिया था - 'अस्पताल की भीड़-भाड़ में सँभल कर रहना चाहिए था! वहाँ जितने पेशेंट आते हैं उतने ही चोर और जेबकतरे भी! यह आम शिकायत है!' 'नहीं यार, और कहीं गया ही नहीं। गिरा होगा तो यहीं और कहीं गिरने या जेब कटने का सवाल ही नहीं है!'
'तो देखो न! कहाँ है यहाँ पर?'
तो रघुनाथ! यह भी तुम्हीं थे! वही तुम्हारी निजी जिंदगी! अगर यह जिंदगी लोगों को पता चल गई होती तो तुम इतने 'आदरणीय' और 'गण्यमान' रह गए होते या नहीं, खुद सोचो!
रघुनाथ ने सोचा और वर्मा की 'अपने लिए जियो' की सलाह पर अविचलित रहे! कि इस दगाबाज 'आदर' और 'प्रतिष्ठा' के मुकाबले आत्मा का यह नंगापन और खुलापन कहीं ज्यादा अच्छा है। अपने लिए भी और समाज के लिए भी! यह सिर्फ आदमी का नहीं, समाज की विसंगतियों का चेहरा है जो ढँका-तुपा है! समाज जाने कि अगर मैं कमीना हूँ तो इस कमीनेपन का गुनहगार अकेला मैं नहीं हूँ, वह भी है बल्कि कहिए कि उसी की वजह से मैं हूँ।
'पापा!' सोनल ने दरवाजे से आवाज दी - 'आप अभी तक अँधेरे में लेटे हैं?' उसने स्विच ऑन किया और कमरा रोशन हो गया!
रघुनाथ की आँखें चौंधियाईं, फिर फैल गईं - पहली बार सोनल के साथ एक नौजवान। लंबा, खूबसूरत, आँखों पर नहीं, माथे पर चश्मा, कंधे पर झोला, खादी के कुर्ते और जींस की पतलून में। एक हाथ में लिपटा हुआ अखबार! रघुनाथ उठ कर बिस्तर पर आ गए!
'पापा, यह है समीर! दैनिक भारत का उप-संपादक!'
रघुनाथ के पैर छुए समीर ने!
'मेरा कजिन है! मैंने बताया था आपको, भूल गए होंगे! जिन दिनों पटना में रिसर्च कर रही थी, उन दिनों यह भी वहीं था! आज अचानक सेमिनार में मिल गया। ले आई अपने साथ!'
'कहाँ रहते हो, बेटा?'
'यहीं पास में ही। संजय नगर में!'
'अरे, वहाँ तो मैं गया हूँ। अपने दोस्त बापट के यहाँ!'
'मैं उन्हीं के फ्लैट के नीचे रहता हूँ! अब तो उनके फ्लैट में उनका बेटा आ गया है बीवी-बच्चे के साथ!'
चौंके रघुनाथ - 'उनका बेटा? बेटा कहाँ था उनके?'
समीर ने सोनल को देखा! सोनल ने बताया कि उन दिनों पापा गाँव गए थे। उन्हें कुछ नहीं पता!
समीर ने कहा - 'पापा जी, क्या आप को खबर है कि बापट का मर्डर हो गया पिछले दिनों? नहर में उनकी लाश मिली थी? और आप आश्चर्य करेंगे कि एफ.आई.आर. इसी बेटे के नाम दर्ज हुई है। पेपर में आया था यह समाचार! इस बेटे को उन्होंने अनाथालय से एडाप्ट किया था जब वह बच्चा था! पढ़ाया-लिखाया था, कोई नौकरी भी दिला दी इसको। चूँकि इसका चाल-चलन अच्छा नहीं था इसलिए निकाल दिया था उन्होंने घर से! यह चाहता था कि अपने रहते फ्लैट उसके नाम लिख दें! शायद लिखवा भी लिया था इसने; इस शर्त पर कि वह इसमें तभी आएगा जब वह नहीं रहेंगे! ... कहना मुश्किल है कि कैसे क्या हुआ?'
रघुनाथ काठ की तरह बैठे रहे - बिना हिले-डुले! थोड़ी देर बाद चश्मा उतारा, गले में लिपटे मफलर से पोंछा, फिर लगा लिया! जैसे वे बापट को देखना चाहते हों। इस नगर में आने के बाद जो आदमी अकेला दोस्त हुआ था उनका वह बापट थे। उनके मुँह से आश्चर्य की तरह नहीं, एक 'आह' की तरह निकले ये वाक्य - 'यह क्या होता जा रहा है लोगों को! यह कैसी होती जा रही है दुनिया! हम बहुत अच्छे नहीं थे लेकिन इतने बुरे तो नहीं थे!'
'पापा, समीर से कह रही हूँ कि इसी नगर में जब अपना घर है तो वहाँ क्यों है? ऊपर तो एक कमरा खाली ही पड़ा है!'
रघुनाथ ने कातर हो कर हाथ जोड़े - 'जो करना हो करो, मुझे अकेला छोड़ दो! प्लीज!'
रघुनाथ ने बिना खाए-पिए रात गुजारी। नींद ही नहीं आई! वे कमरे की बत्ती बुझा कर सोते थे, लेकिन आज जलती हुई छोड़ दी। एक बजे रात तक उनकी आँखों के आगे बापट का चेहरा घूमता रहा और कानों में उनके गाने - हाये हाये ये जालिम जमाना । लेकिन इसके बाद - इसी के बाद उनके दिल ने कान में 'धक्‌-धक्‌' के बजाय 'कत्ल-कत्ल' धड़कना शुरू कर दिया तो रोशनी का रंग पीला से लाल होने लगा। फिर तो वे जिधर नजरें घुमाते, उधर ही फावड़ा, कुल्हाड़ा, हँसिया, चाकू, कटार, ईंट, पत्थर, तमंचा, उछलते-कूदते ललकारते दिखाई पड़ने लगे। थोड़ी ही देर में बल्ब से रोशनी नहीं जैसे खून के फव्वारे छूटने लगे और चारो दीवारें लाल हो गईं! वे उठ कर बैठ गए और खुद से बुदबुदाए - 'इसी दुनिया में कभी हरा रंग भी होता था भाई, वह कहाँ गया?'
ग्यारह
जनवरी की वह शाम कभी नहीं भूलेगी!
शाम तो मौसम ने कर दिया था वरना थी दोपहर! थोड़ी देर पहले धूप थी। उन्होंने खाना खाया था और खा कर अभी अपने कमरे में लेटे ही थे कि सहसा अंधड़। घर के सारे खुले खिड़की-दरवाजे भड़-भड़ करते हुए अपने आप बंद होने लगे - खुलने लगे। सिटकनी छिटक कर कहीं गिरी, ब्यौंड़े कहीं गिरे जैसे धरती हिल उठी हो, दीवारें काँपने लगी हों। आसमान काला पड़ गया और चारों ओर घुप्प अँधेरा।
वे उठ बैठे!
आँगन और लान बड़े-बड़े ओलों और बर्फ के पत्थरों से पट गए और बारजे की रेलिंग टूट कर दूर जा गिरी - धड़ाम! उसके बाद जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो वह पानी की बूँदें नहीं थीं - जैसे पानी की रस्सियाँ हों जिन्हें पकड़ कर कोई चाहे तो वहाँ तक चला जाए जहाँ से ये छोड़ी या गिराई जा रही हों। बादल लगातार गड़गड़ा रहे थे- दूर नहीं, सिर के ऊपर जैसे बिजली तड़क रही थी; दूर नहीं, खिड़कियों से अंदर आँखों में।
इकहत्तर साल के बूढे रघुनाथ भौंचक! यह अचानक क्या हो गया ? क्या हो रहा है?
उन्होंने चेहरे से बंदरटोपी हटाई, बदन पर पड़ी रजाई अलग की और खिड़की के पास खड़े हो गए!
खिड़की के दोनों पल्ले गिटक के सहारे खुले थे और वे बाहर देख रहे थे।
घर के बाहर ही कदंब का विशाल पेड़ था लेकिन उसका पता नहीं चल रहा था - अँधेरे के कारण, घनघोर बारिश के कारण! छत के डाउन पाइप से जलधारा गिर रही थी और उसका शोर अलग से सुनाई पड़ रहा था!
ऐसा मौसम और ऐसी बारिश और ऐसी हवा उन्होंने कब देखी थी ? दिमाग पर जोर देने से याद आया - साठ-बासठ साल पहले! वे स्कूल जाने लगे थे - गाँव से दो मील दूर! मौसम खराब देख कर मास्टर ने समय से पहले ही छुट्टी दे दी थी। वे सभी बच्चों के साथ बगीचे में पहुँचे ही थे कि अंधड़ और बारिश और अँधेरा! सबने आम के पेड़ों के तने की आड़ लेना चाहा लेकिन तूफान ने उन्हें तिनके की तरह उड़ाया और बगीचे से बाहर धान के खंधों में ले जा कर पटका! किसी के बस्ते और किताब कापी का पता नहीं! बारिश की बूँदें उनके बदन पर गोली के छर्रों की तरह लग रही थीं और वे चीख-चिल्ला रहे थे। अंधड़ थम जाने के बाद - जब बारिश थोड़ी कम हुई तो गाँव से लोग लालटेन और चोरबत्ती ले कर निकले थे ढूँढ़ने!
यह एक हादसा था और हादसा न हो तो जिंदगी क्या?
और यह भी एक हादसा ही है कि बाहर ऐसा मौसम है और वे कमरे में है।
कितने दिन हो गए बारिश में भीगे?
कितने दिन हो गए लू के थपेड़े खाए?
कितने दिन हो गए जेठ के घाम में झुलसे?
कितने दिन हो गए अँजोरिया रात में मटरगश्ती किए?
कितने दिन हो गए ठंड में ठिठुर कर दाँत किटकिटाए?
क्या ये इसीलिए होते हैं कि हम इनसे बच के रहें? बच-बचा के चलें? या इसलिए कि इन्हें भोगें, इन्हें जिएँ, इनसे दोस्ती करें, बतियाएँ, सिर-माथे पर बिठाएँ?
हम इनसे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे ये हमारे शत्रु हैं! क्यों कर रहे हैं ऐसा?
इधर एक अरसे से रघुनाथ को लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब वे नहीं रहेंगे और यह धरती रह जाएगी! वे चले जाएँगे और इस धरती का वैभव, इसका ऐश्वर्य, इसका सौंदर्य - ये बादल, ये धूप, ये पेड़-पौधे, ये फसलें, ये नदी-नाले, कछार, जंगल, पहाड़ और यह सारा कुछ यहीं छूट जाएगा! वे यह सारा कुछ अपनी आँखों में बसा लेना चाहते हैं जैसे वे भले चले जाएँ, आँखें रह जाएँगी; त्वचा पर हर चीज की थाप सोख लेना चाहते हैं जैसे त्वचा केंचुल की तरह यहीं छूट जाएगी और उसका स्पर्श उन तक पहुँचाती रहेगी!
उन्हें लग रहा था कि बहुत दिन नहीं बचे हैं उनके जाने में! मुमकिन है वह दिन कल ही हो, जब उनके लिए सूरज ही न उगे। उगेगा तो जरूर, लेकिन उसे दूसरे देखेंगे - वे नहीं! क्या यह संभव नहीं कि वे सूरज को बाँध कर अपने साथ ही लिए जाएँ - न वह रहे, न उगे, न कोई और देखे! लेकिन एक सूरज समूची धरती तो नहीं, वे किस-किस चीज को बाँधेंगे और किस-किस को देखने से रोकेंगे?
उनकी बांहें इतनी लंबी क्यों नहीं हो जातीं कि वे उसमें सारी धरती समेट लें और मरें या जिएँ तो सबके साथ!
लेकिन एक मन और था रघुनाथ का जो उन्हें धिक्कारे जा रहा था - कल तक कहाँ था यह प्यार? धरती से प्यार की यह ललक? यह तड़प? कल भी यही धरती थी। ये ही बादल, आसमान, तारे, सूरज चाँद थे! नदी, झरने, सागर, जंगल, पहाड़ थे। ये ही गली, मकान, चौबारे थे! कहाँ थी यह तड़प? फुरसत थी इन्हें देखने की? आज जब मृत्यु बिल्ली की तरह दबे पाँव कमरे में आ रही है तो बाहर जिंदगी बुलाती हुई सुनाई पड़ रही है?
सच-सच बताओ रघुनाथ, तुम्हें जो मिला है उसके बारे में कभी सोचा था? कभी सोचा था कि एक छोटे-से गाँव से ले कर अमेरिका तक फैल जाओगे? चौके में पीढ़े पर बैठ कर रोटी प्याज नमक खानेवाले तुम अशोक विहार में बैठ कर लंच और डिनर करोगे?
लेकिन रघुनाथ यह सब नहीं सुन रहे थे। यह आवाज बाहर की गड़गड़ाहट और बारिश के शोर में दब गई थी। वे अपने वश में नहीं थे। उनकी नजर गई कोने में खड़ी छड़ी और छाते पर! जाड़े की ठंड यों भी भयानक थी और ऊपर से ये ओले और बारिश। हिम्मत जवाब दे रही थी फिर भी उन्होंने दरवाजा खोला। खोला या वे वहाँ खड़े हुए और अपने आप खुल गया! भीगी हवा का सनसनाता रेला अंदर घुसा और वे डर कर पीछे हट गए! फिर साहस बटोरा और बाहर निकलने की तैयारी शुरू की! पूरी बाँह का थर्मोकोट पहना, उस पर सूती शर्ट, फिर उस पर स्वेटर, ऊपर से कोट। ऊनी पैंट पहले ही पहन चुके थे। यही सुबह जाड़े में पहन कर टहलने की उनकी पोशाक थी! था तो मफलर भी लेकिन उससे ज्यादा जरूरी था - गमछा! बारिश को देखते हुए! जैसे-जैसे कपड़े भीगते जाएँगे, वे एक-एक कर उतारते और फेंकते चले जाएँगे और अंत में साथ रह जाएगा यही गमछा!
वे अपनी साज-सज्जा से अब पूरी तरह आश्वस्त थे लेकिन नंगे बिना बालों के सिर को ले कर दुविधा में थे - कनटोप ठीक रहेगा या गमछा बाँध लें।
ओले जो गिरने थे, शुरू में ही गिर चुके थे, अब उनका कोई अंदेशा नहीं!
उन्होंने गमछे को गले के चारों ओर लपेटा और नंगे सिर बाहर आए!
अब न कोई रोकनेवाला, न टोकनेवाला। उन्होंने कहा - 'हे मन! चलो, लौट कर आए तो वाह-वाह! न आए तो वाह-वाह!'
बर्फीली बारिश की अँधेरी सुरंग में उतरने से पहले उन्होंने यह नहीं सोचा था कि भीगे कपड़ों के वजन के साथ एक कदम भी आगे बढ़ना उनके लिए मुश्किल होगा।
वे अपने कमरे से तो निकल आए लेकिन गेट से बाहर नहीं जा सके!
छाता खुलने से पहले जो पहली बूँद उनकी नंगी, खल्वाट खोपड़ी पर गिरी, उसने इतना वक्त ही नहीं दिया कि वे समझ सकें कि यह बिजली तड़की है या लोहे की कील है जो सिर में छेद करती हुई अंदर ही अंदर तलवे तक ठुँक गई है! उनका पूरा बदन झनझना उठा। वे बौछारों के डर से बैठ गए लेकिन भीगने से नहीं बच सके। जब तक छाता खुले, तब तक वे पूरी तरह भीग चुके थे!
अब वे फँस चुके थे - बर्फीली हवाओं और बौछारों के बीच। हवा तिनके की तरह उन्हें ऊपर उड़ा रही थी और बौछारें जमीन पर पटक रही थीं! भीगे कपड़ों का वजन उड़ने नहीं दे रहा था और हवा घसीटे जा रही थी! उन्हें इतना ही याद है कि लोहे के गेट पर वे कई बार भहरा कर गिरे और यह सिलसिला सहसा तब खत्म हुआ जब छाते की कमानियां टूट गई और वह उड़ता हुआ गेट के बाहर गायब हो गया। अब उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे हवा जगह-जगह से नोच रही हो और पानी दाग रहा हो - जलते हुए सूजे से!
अचेत हो कर गिरने से पहले उनके दिमाग में ज्ञानदत्त चौबे कौंधा - उनका मित्र! उसने दो बार आत्महत्या करने की कोशिशें कीं - पहली बार लोहता स्टेशन के पास रेल की पटरी पर नगर से दूर निर्जन जहाँ किसी का आना-जाना नहीं था! समय उसने सामान्य पैसेंजर या मालगाड़ी का नहीं, एक्सप्रेस या मेल का चुना था कि जो होना हो, 'खट्' से हो, पलक झपकते, ताकि तकलीफ न हो। वह पटरी पर लेटा ही था कि मेल आता दिखा! जाने क्यों, उसमें जीवन से मोह पैदा हुआ और उठ कर भागने को हुआ कि घुटनों के पास से एक पैर खचाक्‌।
यह मरने से ज्यादा बुरा हुआ! बैसाखियों का सहारा और घरवालों की गलियाँ और दुत्कार! एक बार फिर आत्महत्या का जुनून सवार हुआ उस पर! अबकी उसने सिवान का कुआँ चुना! उसने बैसाखी फेंक छलाँग लगाई और पानी में छपाक्‌ कि बरोह पकड़ में आ गई! तीन दिन बिना खाए-पिए भूखा चिल्लाता रहा कुएं में - और निकला तो दूसरे टूटे पैर के साथ!
आज वही ज्ञानदत्त - बिना पैरों का ज्ञानदत्त चौराहे पर पड़ा भीख माँगता है। मरने की ख्वाहिश ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा! मगर यह कमबख्त ज्ञानदत्त उनके दिमाग में आया ही क्यों? वे मरने के लिए तो निकले नहीं थे? निकले थे बूँदों के लिए, ओले के लिए, हवा के लिए। उन्होंने नतीजा निकाला कि जीवन के अनुभव से जीवन बड़ा है। जब जीवन ही नहीं, तो अनुभव किसके लिए।
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