रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:55


नौ
सरला चली तो गई, लेकिन रघुनाथ का सुकून और चैन लिए गई।
रघुनाथ कई रातों तक सो नहीं सके! उन्हें नींद ही नहीं आ रही थी! जाने किन जन्मों का पाप था जो इस जन्म में भोग रहे थे। बच्चों को ऐसे संस्कार कहाँ से मिले - यह उनकी समझ से बाहर था। संजय को कोई नहीं मिली - न ठाकुर, न बामन, न भूमिहार; मिली तो लाला की लड़की! फिर भी वे इस लायक थे कि मुँह दिखा सकें! लेकिन यह सरला? वे किसे मुँह दिखाएँगे! कहाँ मुँह दिखाएँगे?
लड़की के अपने तर्क थे जिन्हें वह जाते-जाते सुना गई थी! जो भी गलत काम करता है, उसके पक्ष में तर्क गढ़ लेता है! उसने भी गढ़े थे - आप दूसरों की शर्तों पर शादी कर रहे थे, यहाँ मैं करूँगी लेकिन अपनी शर्तों पर; आप मेरी 'स्वाधीनता' दूसरे के हाथ बेच रहे थे, यहाँ मेरी 'स्वाधीनता' सुरक्षित है; आप 'अतीत' और 'वर्तमान' से आगे नहीं देख रहे थे, हाँ मैं 'भविष्य' देख रही हूँ जहाँ 'स्पेस' ही स्पेस है।
स्पेस ही स्पेस, हुँह! स्पेस माने क्या? 'आरक्षण' और 'कोटा' के सिवा भी इसका कोई मतलब है? यही न कि न होता आरक्षण तो यही भारती किसी न किसी का हल जोत रहा होता या पढ़ने-लिखने के बावजूद नगर में रिक्शा खींच रहा होता! तुम्हीं कहती थीं कि एकदम गधा है, कुछ नहीं समझता। आज पी.सी.एस. हो गया तो उस जैसा कोई नहीं?
वे अपने मन की भड़ास निकालने के बाद हलका महसूस कर ही रहे होते कि पीछे से किसी की आवाज सुनाई पड़ती - 'अरे मास्साब! दामाद जी का क्या हाल है?' और धीरे-धीरे उन्हें लगता कि यह आवाज सिर्फ पीछे से नहीं, आगे से भी - बाएँ-दाएँ से भी, ऊपर-नीचे से भी आ रही है! चारों ओर से! गाँव-घराना, पास-पड़ोस, जान-पहचान का हर आदमी उनके दामाद के लिए चिंतित है और उनसे मसखरी कर रहा है! इसी बीच जाने किधर से किसी बच्चे की किलकारी सुनाई पड़ती और वह चहकता हुआ उनकी ओर अपनी नन्ही-नन्ही बाँहें फैला देता - 'नाना! यह देखो, क्या है?' वे उसके हाथ से एक कागज लेते जो उनकी गैरहाजिरी में चमटोल से झूरी दे गया था। यह निमंत्रण-पत्र था झूरी की पोती की शादी का! .... तो अब यही उनकी बिरादरी और भवद्दी है! न्यौता-हँकारी और खान-पान अब उन्हीं के साथ होना है, गया अपना कुनबा।
निश्चय किया रघुनाथ ने कि अब वे 'वालंटरी रिटायरमेंट' ले लेंगे! उन्होंने शीला से अपनी यह इच्छा जाहिर की कि अब इसकी - नौकरी की - जरूरत नहीं! यह नहीं बताया कि उन्हें 'वी.आर.एस.' और 'सस्पेंशन' में से एक चुनना है और इनमें से यही ठीक है जो वे करने की सोच रहे हैं।
चाँदनी रात थी अगहन की।
आकाश साफ था। आधा आँगन चाँदनी में था, आधा उसकी छाया में। चाँद सीधे रघुनाथ के चेहरे को देख-देख कर मुसकरा रहा था। वे उसके जल्दी खिसक जाने की उम्मीद कर रहे थे लेकिन वह अपनी जगह से हटने का नाम नहीं ले रहा था। वे उसे एकटक देखते रहे और उन्हें लगने लगा - जैसे चाँद दर्पण हो और उसमें दिखाई पड़नेवाले धब्बे उन्हीं के चेहरे की झाइयाँ!
गाँव के छौरे के पार से ही शुरू हो जाते थे ईख और अरहर के खेत जहाँ से सियारों ने एकसाथ हुआँ-हुआँ शुरू किया।
गाँव से कुत्तों ने भी उसी भाव से जवाब दिया और बता दिया कि वे भी सोए नहीं हैं।
शीला की खटिया रघुनाथ के बगल में ही थी और वह सो रही थी!
पिछले कई दिनों से - कहिए रातों से यही हो रहा था। रघुनाथ रतजगा करते थे और शीला बातें करते-करते सो जाती थी।
रघुनाथ उठ कर बैठ गए। अँजोरिया में उसके चेहरे को देखा! भरा-भरा गोल गोरा चेहरा और नाक की कील पर चमकती हुई चाँद की किरन। इससे पहले उन्होंने उसे हमेशा लेटते हुए देखा था, सोते हुए नहीं। वे एकटक निहारते रहे उसे। वह करवट लेटी थी और उसका चेहरा उन्हीं की ओर था! उनसे सात साल छोटी, मगर उम्र ने उसे भी नहीं छोड़ा था। उनके भीतर प्यार उमड़ आया - हाँ, अब भी खूबसूरत थी उनकी पत्नी! उन्हें लगा, उन्होंने कभी ठीक से प्यार नहीं किया उसे। जब भी जरूरत हुई, उसके साथ लेटे जरूर लेकिन प्यार नहीं किया कभी! उन्होंने हाथ बढ़ा कर उसके ब्लाउज का एक बटन खोला - चुपके से, फिर दूसरा, फिर तीसरा। सोई हुई छातियाँ जैसे नींद से जाग गईं, कुनमुनाईं और उन्हें घूरने लगीं! बिस्तरे पर झुकीं-झुकीं! उनमें जान बाकी थी।
वे उठे और उसके बगल में लेट गए! शीला ने जगह बनाई उनके लिए और आँखें बंद किए-किए खुद को उनके हवाले कर दिया! आँखें खोलने की जरूरत ही नहीं थी, उनकी उँगलियाँ देह के हर कोने-अँतरे से परिचित थीं। वे बहुत देर तक एक-दूसरे की देह के अंदर उस 'चीज' को ढूँढ़ते रहे जो जाने कब अपना बसेरा छोड़ कर चली गई थी! रघुनाथ को लग रहा था कि नहीं, कहीं नहीं गई है - कहीं न कहीं इस या उस देह में है जरूर - मगर अगर वह सचमुच होती तो और कहाँ जाती? परेशान हो कर, थक कर उन्होंने अपना मुँह शीला की छातियों के बीच धँसा दिया और शांत पड़ गए।
'मन न कर रहा हो तो छोड़ो।' शीला फुसफुसाई!
थोड़ी देर तक रघुनाथ कुछ नहीं बोले, फिर एक हिचकी ली!
शीला को महसूस हुआ कि उसकी बाईं छाती से सरकती हुई जो गरम चीज बिस्तर पर टपक रही है, वह आँसू है। रघुनाथ के आँसू! उसने उनकी नंगी पीठ सहलाई - आहिस्ता!
'मन तो कर रहा है, शरीर ही साथ नहीं दे रहा है!' टूटी साँसों के साथ रघुनाथ ने कहा!
'तो इसमें दुःखी होने की कौन-सी बात है? होता है ऐसा कभी-कभी!'
'नहीं, यह कभी-कभी जैसी बात नहीं लग रही है, शीला!'
'बहुत तनाव में रहे हो इस बीच! इसलिए ऐसा है!'
'नहीं! नहीं, झूठी तसल्ली मत दो! मैं उस पगडंडी को पहचान गया हूँ जिससे चल कर वह देह में घुसता है।'
'कौन वह?'
'बुढ़ापा।' रघुनाथ बोले और फूट-फूट कर रोने लगे!
शीला ने उन्हें पकड़ कर बिठाया और सांत्वना में कहा - 'ऐसा कुछ नहीं है दिमागी फितूर के सिवा। बेमतलब सोचते रहते हो रात-दिन! मैंने कोई शिकायत की है कभी? और क्या चाहते हो? हमेशा जवान ही रहोगे? ऐसे, यह सब बेटी-बेटों के लिए छोड़ो। हमारी-तुम्हारी उमर थोड़े ही है यह सब करने की?'...
अगले चौथे या पाँचवें दिन शाम जब रघुनाथ कालेज से लौटे तो शीला ने खबर दी कि टेस्ट दे कर धनंजय आ गया है! ऐसे, अगर वह खबर न देती, तब भी बरामदे में खड़ी बाइक देख कर वे समझ गए थे! कपड़े बदल कर जब वह बाहर आए तो धनंजय को देखा! पूछा - 'अब की कैसे हुए पर्चे?'
'बहुत अच्छा। निकाल लूँगा इस बार!'
'पाँच साल से यही सुन रहा हूँ! हर बार निकाल लेते हो!'
'एस.सी., एस.टी.कोटा और घटी सीटों पर तो मेरा बस नहीं। उसके लिए मैं क्या करूँ!'
रघुनाथ ने उसका कोई जवाब नहीं दिया। इसी बीच शीला बाप-बेटे के लिए चाय ले कर आई। चुपचाप चाय पीते रहे! चुप्पी तोड़ी राजू ने ही - 'सुना है, आप समय से पहले ही 'रिटायरमेंट' लेनेवाले हैं?'
'लेनेवाले नहीं, ले लिया। आज ही चिट्ठी दे दी!'
'ऐसा क्यों किया आपने?'
'यह मुझसे नहीं, अपने भाई संजय से पूछो!' शीला की ओर देखते हुए रघुनाथ बोले!
'संजय तो है नहीं, हूँ मैं - कोई फैसला लेने से पहले आपको हमसे बताना तो चाहिए था?'
'बताते तो क्या करते तुम?' उनका चेहरा थोड़ी देर के लिए तन गया - 'एक की 'हाँ' देख ली, दूसरे की 'ना' नहीं सुनना चाहता! और अभी वह दिन नहीं आया है कि मैं तुम्हारी सलाह पर चलूँ!'
धनंजय उन्हें देखता रहा! फिर माँ की ओर देखा। शीला सिर झुकाए बैठी रही, कुछ नहीं बोली! 'आपको निर्णय लेते समय मेरे बारे में सोचना चाहिए था। अभी अधर में लटका है मेरा भविष्य!'
'यही सोचते-सोचते मैं बूढ़ा हो गया। तुम बालिग हो अब, अपना खुद देखो!' रघुनाथ ने बहुत बेरुखी से कहा।
इस उत्तर से धनंजय कसमसा कर रह गया! उसने इस उम्मीद में माँ की ओर देखा कि शायद वह कुछ कहें।
'आपको यह बुद्धि दीदी और संजय के समय क्यों नहीं आई थी, मेरे ही समय क्यों आ रही है?' शीला को बुरा लगा। उसने टोका - 'चुप रह राजू, कब क्या बोलना चाहिए, समझते नहीं क्या?'
'सब समझता हूँ माँ, इतना नासमझ नहीं हूँ! पता नहीं क्यों, मुझसे ही चिढ़े रहते हैं ये! तुम जानती हो कि टेस्ट का कोई भरोसा नहीं, यही सोच कर मैंने नोएडा के एक 'मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट' का पता किया। इंस्टीट्यूट तो और भी कई हैं लेकिन उनके रेट बहुत हाई हैं। यही है जो अच्छा भी है और अपनी सीमा का भी! दूसरों से डोनेशन तीन लाख लेकिन मुझसे ढाई ही ले रहा है! सब मिला कर एक साल का खर्च छह लाख पड़ रहा है! और अब? जब मेरा मामला आया है तो ये रिटायर हो कर घर बैठ रहे हैं! अपने को मेरी स्थिति में रख कर सोचो ना?'
रघुनाथ सुनते हुए चुपचाप बैठे रहे!
शीला ने उन्हें देखा और उन्होंने शीला को। कोई किसी से नहीं बोला।
रघुनाथ उठ कर अंदर गए और थोड़ी देर बाद नोटों की गड्डियों के साथ बाहर आए।
'ये लो साढ़े चार लाख! बाकी के छह महीने में ले जाना!' उन्होंने गड्डियाँ उसके आगे फेंक दीं और वहाँ से हट गए!
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:57

.......................................................खंड 2
एक
काफी समय लग गया रघुनाथ को घर पर रहने की आदत डालने में। वे रहे तो गाँव में ही, लेकिन गाँव के नहीं रहे।
गाँव ही वह नहीं रहा तो वह गाँव के क्या रहते ? पहाड़पुर जाना जाता था अपने बगीचों, बँसवार और पोखर के कारण - जहाँ चिड़ियों की चहचहाहट और गायों-भैंसों के रँभाने और बैलों की घंटियों की टनटनाहट से बस्तियाँ गूँजती रहती थीं लेकिन अब पेड़ कट गए थे, बँसवार साफ हो गई थी और पोखर धान के खंधों में बँट गई थी! बगीचे के बीच से एक नहर गई थी जिसके किनारे प्राइमरी स्कूल खुल गया था। उसी के बगल में दवाखाना के लिए जमीन भी घेर ली गई थी।
आंबेडकर गाँव हो जाने के बाद पहाड़पुर तेजी से बदल रहा था! गाँव में बिजली आ गई थी, केबुल की लाइनें बिछ गई थीं, अखबार ले कर हाकर आने लगे थे। कुछ घरों में टी.वी., पंखे और फोन भी लग गए थे! छौरे पर खड़ंजा बिछा दिया गया था। खपरैलों के कुछ ही मकान रह गए थे, बाकी सब पक्के थे। जो पक्के नहीं थे, उनके आगे ईंटें गिरी नजर आती थीं।
रघुनाथ खुद को टी.वी. और अखबार में व्यस्त रखते थे। शौक तो उपन्यास पढ़ने का था लेकिन उपन्यास कालेज के पुस्तकालय में थे जहाँ जाना उन्होंने बंद कर दिया था! हाँ, वे ही उपन्यास दुबारा पढ़ रहे थे, जिन्हें कभी पढ़ चुके थे! महीने में एकाध बार नगर में पेंशन आफिस का चक्कर जरूर लगा लेते थे।
गाँव में वे न किसी के यहाँ जाते थे, न उनके यहाँ कोई आता था। वे लड़कों- बच्चों की लिखाई-पढ़ाई के ही काम के आदमी समझे जाते थे, बाकी मामलों में फालतू। मगर सम्मान सब करते थे - छोटे-बड़े सभी। बल्कि अगड़ों से ज्यादा पिछड़े और दलित! इसलिए कि रघुनाथ उनके किताब-कापी से ले कर दाखिले और फीस माफी तक जो भी कर सकते थे, अब भी करते थे! वे गाँव घर के प्रपंचों और लफड़ों से निर्लिप्त बड़े सीधे, सरल और सज्जन आदमी के रूप में सबके प्रिय थे!
लेकिन वे सबके प्रिय नहीं थे। ठकुरान के - जिसे वे अपना घराना बोलते थे उसके, लड़के उन्हें नापसंद करते थे और इसके कारण थे -
एक तो, जब 'मंडल आयोग' लागू किया गया था तो उसका स्वागत करनेवालों में कालेज में अकेले अगड़े अध्यापक रघुनाथ थे!
दूसरे, जब-जब चमटोल के हलवाहे हड़ताल की धमकी देते थे, वे मानते थे कि यह वाजिब है और उनका हक है!
'उपाय क्या है, यह बताओ!'
'उपाय है! या तो उनकी माँगों पर सहानुभूति के साथ विचार करें या फिर एक ट्रैक्टर खरीदें! और चूँकि हममें से कोई एक इस हैसियत में नहीं है कि अकेले खरीद सके इसलिए हल पीछे दाम बाँध दें। सब लोग मिल कर खरीदें!'
ये बातें हुई थीं बब्बन कक्का के दरवाजे पर जब घराने के सभी बड़े-छोटे जुटे थे!
'चलाएगा कौन? ड्राइवर के साथ हेल्पर चाहिए, खलासी चाहिए......'
'अपने ये लड़के जो पिछले सात-आठ साल से कंपटीशन के नाम पर गाँव से नगर और नगर से गाँव मोटरसाइकिल पर मटरगश्ती कर रहे हैं! जब नौकरी का कोई ठिकाना नहीं तो यही करें।' रघुनाथ बोल तो गए लेकिन उन्हें तुरंत एहसास हुआ कि गलती हो गई!
लड़कों के चेहरे तमतमा उठे! आँखे लाल हो गईं! लेकिन सामने बुजुर्ग थे - वे कसमसा उठे! उनमें से कुछ रिसर्च कर रहे थे, कुछ कोचिंग कर रहे थे, कुछ के अंतिम चांस थे कंपटीशन के, कुछ कंपटीशन के इंटरव्यू की तैयारी कर रहे थे - वे बीच में किसी तरह की कोई बाधा नहीं चाहते थे! इस तरह का प्रस्ताव ही अपमानजनक था उनके लिए! यह तो कोई नहीं जानता कि किसके भाग्य में क्या लिखा है? और क्या कहेंगे लोग कि यही ट्रैक्टर चलाने के लिए किया था एम.ए. और एम.एस.सी. और पीएच.डी.? इन्हें जो कहेंगे सो तो कहेंगे - आप को क्या कहेंगे? आप तो बाप हैं! सब लाज-शरम घोल कर पी गए हैं क्या?
लेकिन उनमें से कोई बोले, उसके पहले ही आहत स्वर में बब्बन कक्का ने कहा - 'रग्घू! जाने दो, क्या कहें तुमसे? तुम्हारे बेटे इनकी हालत में होते तो आज ऐसा न बोलते!'
रघुनाथ उठे और घर चले आए - चुपचाप!
उन्हें दुःख यह था कि उन्होंने वहाँ वही बात की थी जो उन लड़कों के बाप खुद उनसे या आपस में या अपने बेटों से ही झल्ला कर कहते थे - निठल्ले! कामचोर! यह भी किसी से छिपा नहीं था कि 'कोचिंग', 'फार्म', 'टेस्ट' उनमें से कइयों के लिए नगर के दोस्तों से मिलने-जुलने के बहाने थे! इसे रघुनाथ ही नहीं, उनके गार्जियन भी समझते थे कि 'कोटा' या 'आरक्षण' एक ऐसा कवच मिल गया है उन्हें, जिसका इस्तेमाल वे अपनी असफलताएँ छिपाने के लिए करते हैं! लेकिन इन्हीं मुश्किलों का हल उन्होंने सुझाया तो बेटे ही नहीं बाप भी बुरा मान गए!
इसके बाद से न तो कभी किसी ने रघुनाथ को बुलाया, न उनसे पूछा और न उन्होंने सलाह दी! हाँ, उनके यहाँ एकमात्र आनेवाले रह गए थे छब्बू पहलवान। वे क्यों आते थे और वह भी शुरू से - इसका उत्तर न छब्बू के पास था, न रघुनाथ के पास! किसी के पूछने पर बस इतना कहते थे - 'अच्छा लगता है', 'शांति मिलती है' । वे जब भी आते थे - आते थे गाँजा, भीगी साफी, चिलम, रस्सी के टुकड़े और माचिस के साथ! अकेले इतमीनान से दम लगाते और खटिया पर लेट रहते! इधर कुछ सधुआ गए थे। जबतब बोल उठते - 'मास्टर कक्का, पता नहीं काहें अब जीने का मन नहीं करता!' एक बार उन्हें चुप और उदास देख कर रघुनाथ ने पूछा - 'क्या बात है छब्बू! इस तरह क्यों लेटे हो?' छब्बू ने आँखे बंद किए हुए ही कहा - 'कक्का, आज भोरहरी में सपने में बजरंगबली आए थे। बोले, छब्बू! तुम जो पाप कर रहे हो, उसका प्रायश्चित भी तुम्हीं को करना होगा, दूसरे को नहीं।'
'जब तुम जानते हो कि पाप है तो क्यों करते हो?'
'मैं देखते ही बेबस हो जाता हूँ मास्टर कक्का, क्या बताऊँ आपसे?'
रघुनाथ दिसा फरागत के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे, बोले - 'लेकिन छब्बू, मैं एक बात तुमसे कह रहा हूँ, याद रखना। जब तक उनकी हड़ताल चल रही है तब तक भूल कर भी चमटोल में कदम मत रखना! कोई भरोसा नहीं है किसी का!'
'बात तो सही कह रहे हैं कक्का, लेकिन एक बात मेरी भी सुन लीजिए! अगर ढोला बुलाएगी तो पत्थर पड़े चाहे बज्जर गिरे, मैं न सुनूँगा, न देखूँगा - चल दूँगा!'
'जब तुम्हें किसी की मानना ही नहीं, तो जो इच्छा हो, करो!' रघुनाथ बड़बड़ाते हुए सिवान की तरफ चले गए जिधर बब्बन सिंह का पपिंग सेट था!
यह हड़ताल का सातवाँ दिन था!
असाढ़ शुरू हो गया था और अबकी पानी जम कर बरसा था।
हलवाहों ने हड़ताल की थी ऐसे ही वक्त पर - खेत के जोत, बन्नी और केड़ा को ले कर। हड़ौरी ( हल जोतने की मजूरी) और खलिहानी को ले कर। बाबा आदम के जमाने से चले आ रहे रेट पर काम करने से इनकार कर दिया था हलवाहों ने। बीच-बीच में भी हड़तालें की थीं उन्होंने, लेकिन ठाकुरों ने थोड़ा-बहुत बढ़ा कर और उन्हें समझा-बुझा कर ठीक कर लिया था। लेकिन अबकी आर-पार की लड़ाई थी! इसमें गोबर पाथनेवाली उनकी औरतें और लड़कियाँ भी शामिल थीं। नतीजा यह कि खेतों से लेव का पानी सूखने लगा था, चरनी पर बँधे मवेशी गोबर-मूत में ही उठ-बैठ रहे थे और पूरा ठकुरान गंदगी से बजबजा रहा था!
इस बार की हड़ताल को समझने में ठाकुर गच्चा खा गए थे! हलवाहे न थक- हार कर आए, न गिड़गिड़ाए, न उनके चूल्हे बुझे। जरूरत भी पड़ी तो अहिरान गए, इधर नहीं आए! पूरे इलाके की चमटोलों का भविष्य पहाड़पुर की हड़ताल पर टिका था - इसे वे समझ गए थे!
ठाकुर रात भर बब्बन सिंह के दरवाजे पर पंचाइत कर रहे थे और मुंसफ, जज, मजिस्ट्रेट, कलक्टर, एस.पी., इंजीनियर, डाक्टर न हो सकनेवाले उनके बेटे उन्हीं के पंपिंग सेट पर बैठक! वे रोज शाम को सात-आठ बजे वहीं जुटते, कभी गाँजे का दम लगाते, कभी दारू की बोतलें खोलते और चमटोल को हमेशा-हमेशा के लिए ठीक कर देने की योजना बनाते। कैसे ठीक किया जाए, कब ठीक किया जाए, ठीक करने का तरीका क्या हो - ये सारी समस्याएँ थीं जिनके बारे में वे गंभीरता से विचार करना शुरू करते और तीसरे गिलास तक पहुँचते ही कोरस गाने लगते - 'गाए चला जा, गाए चला जा, एक दिन तेरा भी जमाना आएगा!' जैसे ही यह खत्म होता वैसे ही 'इंटरनेशनल' शुरू हो जाता - 'मन में है विश्वास! हो हो मन में है विश्वास! हम होंगे कामयाब एक दिन!'
इस दौरान राम भरोसे दुबे - जो पड़ोसी गाँव के थे और भंग के लती थे और उसे छोड़ कर इस मंडली के नियमित सदस्य बने थे - पंचांग खोल कर मुहूर्त देखते रहते कि ठीक करने की तिथि कौन-सी हो? उन्होंने समय तो बता दिया था - कृष्णपक्ष की अमावस्या की रात; लेकिन किस महीने की अमावस्या हो, इस बारे में वे आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे!
इधर हड़ताल खिंचती हुई चली जा रही थी और खरीफ के फसल की उम्मीदें खत्म हो रही थीं। कि इसी दरम्यान एक दिन नहर के रास्ते एक ट्रैक्टर धड़-धड़ करता हुआ आया और अहिरान में दशरथ राउत के दरवाजे पर खड़ा हो गया!
उसे ले कर आनेवाला और कोई नहीं, जसवंत था - दशरथ का बेटा!
दशरथ के चार बेटे थे - दो गाँव पर और दो मध्य प्रदेश के कोरबा में। गाँववाले दूध और खोवा का व्यवसाय करते थे और कोरबावालों में बलवंत कोलियरी में ठेके पर लेबर सप्लाई करता था और जसवंत देसी दारू की भट्ठी चलाता था!
जसवंत जब तक गाँव पर था, लुच्चा, लफंगा और लतखोर माना जाता था। भागा भी था तो बाप से मारपीट करके। शुरू-शुरू में मध्य प्रदेश से पुलिस भी आई थी एक- दो बार उसे ढूँढ़ते हुए लेकिन बाद में सुधर गया था धीरे-धीरे। इधर जब भी गाँव आता था, 'भैया', 'बाबू', 'कक्का' से नीचे किसी को बोलता नहीं था। कहा करता था कि परदेश में सब कुछ है, इज्जत नहीं है! चाहे जितना कमा लो, रहोगे दो नंबर के ही आदमी। दो नंबर माने दो कौड़ी। अब वह सारा कुछ छोड़-छाड़ कर गाँव-जबार की सेवा करना चाहता था। संयोग ही ऐसा था कि वह पिछले एकदो बार से जब-जब आया, गाँव हड़ताल की ही चपेट में रहा। वह न इधर था, न उधर! उसका उठना-बैठना दोनों के बीच था - ठाकुरों के भी, हलवाहों के भी। उसने अपनी ओर से दोनों के बीच सुलह-समझौते की पूरी कोशिश की, लेकिन नजदीक आने के बजाय दोनों एक-दूसरे के खिलाफ और दूर होते चले गए!
जसवंत ने उन दोनों को जवाब दिया ट्रैक्टर ला कर, जो चिढ़ाते रहते थे कि अहीरों की बुद्धि उनके घुटनों में होती है (शायद इसलिए कि वे घुटनों के बीच बाल्टी दबा कर गाय या भैंस दुहते हैं)।
ट्रैक्टर खलिहान में खड़ा था - ट्राली, कल्टिवेटर, हार्वेस्टर और थ्रेशर के साथ! गेंदे की मालाएँ पहने। उसके बगल में खटिया पर डंडे के साथ दशरथ बैठे थे। गाँव के बच्चे उसे घेरे थे - कुछ छू कर देखना चाहते थे, कुछ ट्राली पर चढ़ना चाहते थे। दशरथ खीझ रहे थे और डंडा पटक-पटक कर उन्हें भगा रहे थे!
जब तक कथा और हवन नहीं हो जाता तब तक लोगों की नजर से बचाए रखना था इसे!
भगवंत उर्फ भग्गू के जिम्मे दूसरा काम था। वे कापी और कलम के साथ इधर से उधर भाग दौड़ कर रहे थे। किसानों के लिए सबसे मुश्किल और परेशानी के थे ये महीने! अगहनी के खेत तैयार थे, खेती पिछड़ रही थी, जल्दी से जल्दी जुताई और बुवाई करनी थी, इसके बाद तो रबी का नंबर लगना था। बड़े मौके से आया था ट्रैक्टर। तारीखों की लूट मची थी, भाड़ा चाहे जो लो - बीघे के हिसाब से! और भाड़ा भी क्या लेना था - वही जो रेट बाँध दिया था दो कोस दूर इकबालपुर के काशी सिंह ने अपने ट्रैक्टर का!
कथा के अभी तीन दिन बाकी थे कि अगले तीन महीने के लिए सारी तारीखें बुक!
दशरथ जिन्हें कभी कोई पूछता तक नहीं था, उनकी 'बल्ले-बल्ले' थी! उन्हें पूछनेवाले वे थे जो नए घर और दुआर बनवा रहे थे - माटी और खपरैल के मकान गिरा कर! जब बिजली आ गई थी तो उसके स्टैंडर का घर चाहिए - दीया-बाती और लालटेनवाला नहीं। ऐसे लोगों में सिर्फ पहाड़पुर के ही नहीं, पास-पड़ोस के भी थे। किसी को ईंटें चाहिए, किसी को सीमेंट, किसी को बालू, किसी को गिट्टी, किसी को लोहा-लक्कड़। गन्ने भी तैयार हो रहे थे शुगर मिल के लिए। जब ट्राली थी तो सौ काम थे!
दशरथ सबकी सुनते और सब्र रखने के लिए कहते - सब होगा! धीरे-धीरे होगा! लेकिन सबका काम होगा!
ठाकुर भौंचक! सदमे में थे! वे हमेशा उन्हें अपने से नीचा समझते थे लेकिन अब उनकी चिरौरी के दिन आ गए थे! उन्हें अफसोस हो रहा था कि यही बात जब रघुनाथ ने कही थी तो उन्होंने क्यों नहीं सुनी तब ?
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:57

दो
रात घिर आई थी। गाँव में सन्नाटा पसरा था। हलकी-हलकी झीसियाँ पड़ रही थीं! सिवान मेढकों की टर्र-टर्र और झींगुरों के झन्न्‌-झन्न्‌ से गूँज रहा था।
ट्रैक्टर के काम शुरू कर देने के बावजूद ठाकुर हारा हुआ महसूस कर रहे थे क्योंकि चमटोल में किसी तरह की कोई बेचैनी नहीं थी! फर्क आया था तो यह कि हलवाहे अब गाँव में और गाँव के रास्ते आने-जाने लगे थे - सिर झुकाए, आराम से, बिना बोले और दुआ-सलाम के! ठाकुरों को लगता कि वे छाती उतान करके उन पर हँसते हुए आ जा रहे हैं।
रघुनाथ सोने के पहले बत्ती गुल करने ही जा रहे थे कि सर पर बोरा रखे पानी में भीगता गनपत बरामदे में आया! गनपत उनका हलवाहा था, हलवाही के सिवा घर-दुआर के काम भी देखता था! रघुनाथ ने उसके बेटे को अपने कालेज से बी.ए. कराया था, उसके बाद उससे एक फार्म भरवाया था जिसके कारण वह 'बाट माप इंस्पेक्टर' बना था! इस एहसान को गनपत कभी नहीं भूलता! इस समय उसका वह बेटा एम.राम मिर्जापुर में पोस्टेड था!
- 'अरे गनपत तुम? किसी ने देखा तो नहीं?'
'नहीं मास्टर साहेब!' उसने बोरा खंबे के पास रखा और मचिया खींचा - 'एक बात बता दें। मैं आपको छोड़ूँगा नहीं, भले आप छोड़ दें! हाँ, यह समय थोड़ा खराब है!'
'जानता हूँ, आए कैसे, यह बोलो!'
'गया था मगरू के यहाँ मिर्जापुर! सोमारू भी तो वहीं है न! मगरू उसे आटाचक्की पर वहीं काम दिला दिया है और वह पक्का हो गया है इस काम में!'
'तो?'
'तो मगरू कहा कि जाँता ओखरा, मूसर, ढेंकी, चक्की तो कोई चलाता नहीं आज और आटा पिसाने के लिए जाना पड़ता है लोगों को एक डेढ़ कोस दूर - डेढ़गावाँ या कमालपुर; ऐसे में अगर गाँव पर आटाचक्की बिठाई जाए तो कैसा रहेगा? सोमारू काफी है सँभालने के लिए!'
'बिठाओगे कहाँ?'
'सरकार चमटोल और गाँव के बीच में जो ऊसर जमीन दिया है न, उसी पर! और किसी काम की तो है नहीं वह!'
रघुनाथ कुछ देर सोचते रहे।
'पूछना यह भी था कि ठाकुरों के लिए छूत तो रोटी और भात में ही है, आटा और चावल में तो है नहीं?'
रघुनाथ हँसने लगे - 'यह सब मत सोचो! शुरू में भले बिदकें, देर-सबेर सब जाएँगे और पिसाएँगे! यही नहीं, आस-पास के गाँवों से भी आएँगे लोग। जब चक्की गाँव में ही रहेगी तो उतनी दूर कौन जाएगा? बस देर मत करो! ... और बताओ, कै दिन रहे मिर्जापुर?
'रहे दस दिन! एक दिन तो पूछते-पाछते गुड़िया बेटी के इस्कूल चले गए थे। बड़ी खुस हुईं! घर ले गईं। अपने हाथ से खाना पकाया, खिलाया, आपका और मालकिन का हाल-चाल पूछती रहीं, चलने लगा तो बीस ठो रुपैया भी जबरदस्ती पकड़ाय दिहिन! बिल्कुल नहीं बदली हैं।'
'बहुत दिन रह गए मगरू के पास?'
'नहीं मास्टर साहेब, सब दिन वहीं नहीं रहे! तीन दिन तो फूआ के हियाँ रहे! फूआ का जो सबसे छोट बेटवा है, वह उहाँ का डिपटी मजिस्टरेट है - यस.डी.यम.! बहुत बड़ी कोठी है, उसके सामने बगीचा भी बहुत बड़ा है। जीप है, पुलिस है, ड्राइवर है, नौकर-चाकर है। ऊ साधारण आदमी थोड़े हैं? इजलास लगाता है। सब कोई नहीं मिल सकता! फूआ से ही कई कई दिन भेंट नहीं होती! हम तो देखे ही नहीं थे उत्ता बड़ आदमी? वहीं रह गए तीन दिन! फूआ रोक लीं!'
रघुनाथ थोड़े गंभीर हो गए - 'नाम क्या है उनका?'
'हम लोग तो सुद्धू सुद्धू बोलते हैं लेकिन नाम सुदेस भारती है! राम नहीं लिखते।'
रघुनाथ को काटो तो खून नहीं। यही वह सुदेश भारती था जिसका जिक्र सरला ने किया था! इसी से उसने शादी करने की बात की थी! अगर वह सचमुच कर ले तो गनपत जो उनका हल जोतता है और उनके आगे खड़ा रहता है या मचिया पर बैठता है, उनका रिश्तेदार होगा! खरपत जो गनपत का बाप है, उनका समधी होगा और गले मिलेगा! उनके साथ खटिया पर बैठेगा और दामाद के बाप की हैसियत से ऊँचा होगा उनसे! उनका मन हुआ कि शीला को आवाज दे कर बुलाएँ और कहें कि सुनो, गनपत क्या कह रहा है?
'बाकी सबके अपने अपने दुःख हैं मास्टर साहेब! उसका बियाह छुटपन में ही हो गया था! वह अपनी मेहर को छोड़ दिया है। उसका लफड़ा चल रहा है आजकल किसी मास्टरनी से! वह ऊँची जात की है। कभी कहती है कि बियाह करेंगे तो तुम्हीं से, कभी कहती है - नहीं करेंगे। माँ-बाप नहीं चाहते। इसी में उसे लटकाए चल रही है! फूआ बड़ा दुःखी रहती है।'
'तुम जाओ, देर हो रही है!'
'ऊ मास्टरनी के साथ इहाँ-उहाँ जाता है, होटल भी जाता है, दूसरे सहर में भी घूमता है, खूब ऐयासी करता है बाकी फूआ से नहीं मिलाता। फूआ बोलीं भी कि हमको दिखा दो एक बार, हम बतियाएँगे उससे कि काहे नहीं कर रही बियाह? लेकिन मिलाए तब न?'
'कहा न जाओ, नींद आ रही है! और वह बत्ती बुझा दो!'
'अच्छा साहेब!' गनपत उठ खड़ा हुआ, 'लेकिन साहेब, एक बार समझा देते उसे कि मेहर को छोड़ के काहें ऐसा कर रहा है? मेहरिया तो कहीं चली जाएगी या किसी न किसी को रख ही लेगी, लेकिन बदनामी किसकी होगी? उसी की न?'
'तुम जाओगे कि नहीं, दिमाग मत चाटो!'
'आप नहीं जाना चाहें तो कहिए किसी बहाने हमी उसे ले आएँ!'
रघुनाथ क्रोध से काँपने लगे। उन्होंने उठ कर झटके से बत्ती बुझा दी और उसे ठेल कर बाहर कर दिया! गनपत ने सिर पर बोरा रखते हुए कहा - 'साहेब, जो कहने आया था, वह तो भूल ही गया।' सहसा उसकी आवाज फुसफुसाहट में बदल गई, 'देखिए रहे हैं कि हवा खराब है। नहीं, एक बात कह रहे हैं। ऐसी कोई बात नहीं है लेकिन पहलवान को समझा दें कि जब तक हवा खराब है चमटोल की ओर न देखें। और देखना क्या, जाएँ ही नहीं उधर।...'
रघुनाथ का ध्यान ही नहीं था उसकी फुसफुसाहट की ओर! उनकी चिंता और बेचैनी का कारण दूसरा था - कि कहीं इसे सरला और भारती के संबंधों की जानकारी न हो? जब रिश्तेदार हैं तो कभी न कभी मगरू जरूर मिलता होगा भारती से, हो सकता है भारती ने चर्चा की हो? और न भी की हो तो मगरू ने दोनों को कभी साथ देखा हो? जब एक ही शहर है तो कैसे संभव है कि उसे पता ही न चला हो अब तक?
'शीला!' आखिरकार उनसे रहा न गया और उन्होंने दूसरी हाँक लगाई - गुस्से में।
तीन
पहलवान माने छब्बू पहलवान।
पहाड़पुर के ही दक्खिनी हिस्से में घर था बजरंगी सिंह का। वे छब्बू पहलवान के नाम से जाने जाते थे इलाके में। गाँव का नाम दूर-दूर तक रोशन किया था उन्होंने! दंगलों में जहाँ-जहाँ गए, पछाड़ कर ही लौटे इनाम के साथ। 'टँगड़ी' और 'धोबियापाट' उनके प्रिय दाँव थे। लंबाई ही नहीं, बला की ताकत और फुर्ती भी थी उनमें! किसी को पकड़ लें तो छुड़ाना मुश्किल, दाब दें तो उठना मुश्किल, पट पड़ के मिट्टी पकड़ लें तो चित करना मुश्किल। भैंस को केहुनी से मार दें तो पसर जाए और उठ न सके!
लेकिन उनके बड़े भाई - जिनके चलते वे पहलवानी कर रहे थे - जब असमय ही अचानक चल बसे तो उन्होंने लंगोट खूँटी पर टाँग दिया और घर की जिम्मेदारी सँभाल ली!
छब्बू की शादी नहीं हुई थी। जब उम्र थी तब की नहीं अखाड़े के जोश में और जब करनी चाही, तो उमर नहीं रही! कोई आया भी नहीं! इस तरह परिवार के नाम पर उनके दस साल का भतीजा था और बेवा भौजी! भौजी रातदिन पूजा-पाठ और धरम-करम में लगी रहतीं और भतीजा स्कूल आता-जाता। खेती-बारी छब्बू सँभालते और सँभालते क्या - हलवाहे झूरी के जिम्मे छोड़ कर निश्चिंत रहते!
लेकिन यह निश्चिंतता उनकी किस्मत में नहीं थी! एक दिन उनकी नजर पड़ गई झूरी की औरत ढोला पर! दो बच्चों की माँ लेकिन सिर्फ कहने को। वह कलेवा ले कर आई थी अपने मरद के लिए! छब्बू ने उसे पहले भी देखा था - जाने कितनी बार! लेकिन अबकी नजर पड़ी नहीं, गड़ी! उन्होंने उसे आते हुए देखा, बैठते हुए देखा, चलते हुए देखा - क्या छरहरा बदन, क्या लोच, क्या गदराए कूल्हे। गड़ गई आँखों में! कहाँ यह हड़ियल झूरी और कहाँ यह गाँजे की कली! बस एक सुट्टा लग जाए तो उड़ जाओ आसमान में और फिर उड़ते ही रहो। जमीन पर लौटने की नौबत ही न आए!
और फिर इसके बाद ही शुरू हुई छब्बू पहलवान के सुट्टा मारने की कहानी!
लेकिन कहानी रफ्तार पकड़ती इसके पहले ही भौजी को अंदेशा हो गया। भतीजे मुन्ना ने माँ से बताया कि उसने चच्चा और ढोला को दालान में छुपाछुपी खेलते हुए देखा था! भौजी रोने लगी। उसने छब्बू से कहा - 'छब्बू! मेरी एक बिनती है! भैया तो रोकने-टोकने के लिए हैं नहीं, तुम करोगे अपने मन की ही। लेकिन चाहे जो करो, करो घर के बाहर! इसे साफ-सुथरा रहने दो!' इशारा समझ गए छब्बू! इसके बाद से ही छब्बू की चमटोल में आवाजाही बढ़ी!
हलवाही के लिए हो या रोपनी कटिया के लिए - बुलाने के लिए चमटोल में जाना ठाकुर अपनी बेइज्जती समझते थे! जरूरी ही हुआ तो वे बच्चों को भेजते थे! लेकिन छब्बू ऐसे मान-अपमान से परे थे। अगर वे गाँव में नहीं दिखाई पड़ते, बगीचे और नहर पर भी नहीं दिखाई पड़ते, खेत-खलिहान में भी नहीं दिखाई पड़ते तो लोग मान लेते कि वे चमटोल में होंगे - ढोला के संग! यह चमटोल भी जानती थी और गाँव भी! गुस्सैल इतने थे कि उनसे सीधे कुछ कहने की हिम्मत किसी में नहीं थी!
सभी अगड़ों ने बारी-बारी से मिल कर घराने के सबसे मानिंद बब्बन कक्का पर दबाव बनाया कि वे अपने स्तर पर जो कुछ कर सकें, करें। समझाएँ या घौंस दें या जात बाहर करें। ऐसा कहनेवालों में अगल-बगल के गाँवों के लोग भी थे! शिकायतों से तंग आ कर कक्का ने छब्बू को बुलवाया। छब्बू ने उनकी बातें बहुत ध्यान से सुनीं और अंत में बोले - 'बात तो ठीक है कक्का मगर किसको-किसको निकालिएगा जात बाहर? किसी-किसी का ढँका-तुपा है और किसी-किसी का जगजाहिर! लेकिन बचा तो कोई नहीं है मेरी जानकारी में! अगर कोई है तो बताइए उसका नाम? फिर मैं बताऊँ उसके बारे में! रही मेरी बात तो आप से छिपाऊँगा नहीं? मैं सब कुछ करता हूँ लेकिन मुँह से मुँह नहीं सटाता! अपने धर्म और जात को नहीं भूलता!'
कक्का सिर झुकाए बैठे रहे, कुछ नहीं बोले!
छब्बू थोड़ी देर बाद उठ कर चले गए!
लोग मजाक में कहा करते थे कि सिवान में झूरी पहलवान का खेत जोतता है और पहलवान चमटोल में उसका खेत!
और झूरी का यह था कि जब वह खेत जोत कर लौटता तो छब्बू घर में; बुवाई करके आता तो छब्बू घर में; बाजार से लौटता तो छब्बू घर में! वह उनके होने की आहट मिलते ही उलटे पाँव वापस!
उसने एक बार हिम्मत की। हाथ जोड़ कर कहा - 'मालिक! मेरी नहीं तो कम से कम अपनी इज्जत का तो खयाल कीजिए। लोग क्या-क्या कहते हैं आपके बारे में?' इसका नतीजा यह हुआ कि वह पखवारे भर हल्दी-प्याज बदन पर पोत कर घर में पड़ा रहा!
बेबस ढोला। मुहाल हो गया जीना! नरक हो गई थी उसकी जिंदगी! रात भर झूरी की छाती से लग कर सुबकती रहती और गुस्से में फनफनाती रहती!
सबसे बड़ी बात यह कि ग्राम प्रधान चमटोल का, उसी की जाति का, पहलवान के साथ गाँजे का सुट्टा लगाता था और जब कहो तो बोलता था - 'कलेजा कड़ा रखो, बस थोड़ा इंतजार करो!' कब तक इंतजार करो!
सावन शुरू हो गया था! इसी महीने में पचैयाँ (नागपंचमी) पड़ती थी! पहाड़पुर में पचैयाँ छब्बू पहलवान का पर्व था! उस दिन तीन बाल्टियों में भिगोये हुए चने लाए जाते, परात भर के मिठाइयाँ आतीं, बताशे आते, बजरंग बली की पूजा की जाती, छब्बू पहलवान लंगोट पहन कर अखाड़े की मेड़ पर बैठते और अपने चेलों की कलाइयों में रक्षा बाँधते! वे उस्ताद के आशीर्वाद के साथ अखाड़े में उतरते! उनकी कई जोड़ियाँ होतीं और दोपहर बाद तक पट्ठे अखाड़े में जोर आजमाइश करते रहते! सबसे आखिर में छब्बू उतरते - बड़ों के पाँव छू कर और छोटों को हाथ जोड़ कर। यह प्रदर्शन कुश्ती होती। वे अपने दाँव और करतब दिखाते - पहलवानी छोड़ देने के बावजूद!
इस अवसर पर चमटोल से डफले और नगाड़ेवाले भी आते और झूम कर बजाते! अहिरान के बनेठीवाले भी होते और एक-दूसरे से खेलते हुए पसीने-पसीने हो जाते!
दूसरे गाँवों में पचैयाँ मात्र धार्मिक त्यौहार रह गई थी लेकिन पहाड़पुर में अभी चल रही थी - रस्म के रूप में ही सही! लेकिन यह भी सब जानते थे कि यह तभी तक है जब तक छब्बू हैं! ऐसे भी ठाकुरों की नई पीढ़ी के लिए देह बनाना, वर्जिश और रियाज करना, कुश्ती लड़ना फालतू चीज थी। एकदम मूर्खता! तमंचा के आगे मजबूत से मजबूत कद-काठी का भी क्या मतलब? इसीलिए उनके चेलों में ज्यादातर अहिर, कहार, लुहार, गड़रिया थे, ठाकुर-बामन नहीं।
लेकिन अबकी बुरा हाल था पचैयाँ का। पानी सुबह से ही बरस रहा था - कभी मद्धिम, कभी तेज! अखाड़ा एक दिन पहले ही गोड़ कर तैयार किया था खुद छब्बू ने। यह काम चेलों में से किसी को नहीं करने देते थे वे! लेकिन वह कीचड़ हो चुका था - धान के खंधे की तरह! मिठाइयाँ और बताशे आ चुके थे। चने फूल कर अँखुआ गए थे! इंतजार था बारिश थमने का! छब्बू बोल गए थे कि तुम लोग तैयारी रखना; जैसे ही मौसम ठीक होगा, मैं आ जाऊँगा!
मगर न मौसम ठीक हुआ, न छब्बू लौटै!
बारिश तब थमी जब शाम ढली। आसमान साफ हुआ और जहाँ-तहाँ छिटपुट तारे नजर आए! इसी वक्त पुलिस की जीप आई गाँव में और पता चला - छब्बू का कतल हो गया है! जनपद के सबसे दिलेर और बहादुर और ताकतवर आदमी का कतल!
यह खबर नहीं, बिजली थी जो बदरी छँटने के बाद तड़तड़ा कर ठाकुरों के टोले पर गिरी थी! वह चाहे जो था, जैसा था - ठाकुर था और उसके रहते किसी में इस टोले की तरफ आँखें उठा कर देखने की हिम्मत नहीं थी! और अब?
अब, चमटोल के बाहरी हिस्से में एक झोंपड़े के आगे कीचड़ में चारों खाने चित पड़ा था वह। मरा हुआ। खुले आसमान के नीचे। एक लालटेन उसके सिर के पास थी, दूसरी पैरों की ओर। दोनों ईंटों की ऊँचाई पर - ताकि लाश पर नजर रखी जा सके। लाश खुद कीचड़ और माटी में लिथड़ी पड़ी थी। पैर इस तरह छितराए हुए पड़े थे जैसे बीच से चीर दिए गए हो! जननांग काट दिया गया था और उसकी जगह खून के थक्के थे जिन पर मक्खियाँ छपरी हुई थीं, उड़ और भिनभिना रही थीं। पुलिस परेशान थी उस जननांग के लिए - कटा तो गया कहाँ? वह लाश के आसपास कहीं नहीं था। वह लालटेन और टार्च की रोशनी में उसे ढूँढ़ रही थी! जमीन समतल नहीं थी - गड्ढा-गुड्ढी बहुत थे और सबमें पानी भरा था! उसे जहाँ कहीं संदेह होता, लाठी से कुरेद कर देख लेती, भले वह माटी का ढेला हो। एक डर भी था कहीं भीतर कि ऐसा न हो कि कुत्ते आए हों और माँस का लोथड़ा समझ कर किसी दूसरी जगह ले गए हों या खा गए हों!
यह खोज देर रात तक चलती रही!
पुलिस अपनी तरफ से पूरी तैयारी के साथ आई थी लेकिन जिस आशंका से आई थी, वैसा कुछ नहीं हुआ - न कोई बलवा हुआ, न चमटोल फूँकी गई, न बदले की कार्रवाई हुई!
झूरी के झोंपड़े के बाहर ताला लटक रहा था और चमटोल में सन्नाटा था। एक भी मर्द नहीं। सारे मर्द बस्ती छोड़ कर जाने कहाँ चले गए थे। पुलिस के आने के पहले से ही! सिर्फ औरतें और बच्चे थे जो अपने घरों में बंद थे।
हत्या एक ऐसे आदमी की हुई थी जिसके घर कोई एफ.आई.आर. दर्ज करानेवाला भी नहीं था। हत्या किसने की, कब की, कैसे की, क्यों की - इसका कोई चश्मदीद गवाह भी नहीं था।
कयास जरूर लगाए जा रहे थे लेकिन वे कयास भर थे - कि छब्बू सुबह-सुबह अपनी देह की आग बुझाने झूरी के घर पहुँचे! आहट लगते ही झूरी दूसरी कोठरी में छिप गया। ढोला चाँचर खोल कर उन्हें अंदर ले गई! बेसब्र छब्बू लुंगी खोल कर जैसे ही उसके साथ सोने को हुए कि वह उनका फोता पकड़ कर झूल गई! वे उसे मारते-पीटते चीखते-चिल्लाते हुए बेहोश हो कर गिर पड़े। उसी समय झूरी हँसुआ ले कर आया और उसने उनका जननांग काट कर फेंक दिया। दोनों बाहर आ गए कोठरी बंद करके और उनके तड़पने-छटपटाने और मरने तक इंतजार करते रहे! बाद में घसीट कर बाहर कर दिया।
कि वे धान का बीज छीटने बीयढ़ में गए थे उन दोनों के साथ। मारा वहीं, लेकिन केस (बलात्कार) बनाने के लिए दरवाजे के सामने ला पटका।
कि निहत्थे होने के बावजूद पहलवान दो-चार को तो कच्चा चबा जाएँ! दो-चार के मान के नहीं थे वे। चमटोल को पता था कि वे किधर दिसा फरागत होने जाते हैं। पूरी चमटोल ने उधर ही घेर कर अरहर के खेत में मारा जैसे वे सुअर को चारों ओर से घेर कर मारते हैं और झूरी के घर के आगे ला कर फेंक दिया! सिवान में चीखे-चिल्लाएँ भी तो किसे सुनाई दे बादलों की गड़गड़ाहट में ?
इस तरह के चर्चे। अलग अलग कयास, अलग अलग आदमी के! सच्चाई का किसी को पता नहीं। लाश के पास कोई फटका ही नहीं तो पता कैसे? पुलिस ने ही फटकने नहीं दिया!
लेकिन एक बात धीरे-धीरे साफ हुई कि जो कुछ हुआ था, 'अचानक' और 'संयोगवश' नहीं हुआ था। इसके पीछे महीनों से चल रही तैयारी थी! इस तैयारी में अकेले पहाड़पुर की चमटोल नहीं, आस-पास के बीस-पच्चीस गाँवों की चमटोलें शामिल थीं। कतल से पहले और बाद खर्चे ही खर्चे हैं - थाने के सी.ओ. को चाहिए, मुंशी को चाहिए, पोस्टमार्टमवाले डाक्टर को चाहिए, पैरवीकार को चाहिए, वकील को हर तारीख पर चाहिए, गवाहों को चाहिए - ढेर सारे खर्चे। यह कहाँ से करेगा झूरी? सो, सभी चमटोलों के हलवाहों ने चंदे जुटाए थे! दूसरे, उन्हें इंतजार था अपनी जाति के किसी पुलिस अधिकारी का जो धानापुर थाना सँभाले और आ गए थे दो महीने पहले भगेलू यानी बी. राम। साथ ही अक्टूबर में चुनाव था विधान सभा का और कोई ऐसी पार्टी नहीं जिसे अनुसूचित जातियों के वोट की दरकार न हो! तीसरे, चमटोलें जानती थीं कि छब्बू के मसले पर ठाकुर बिरादरी बँट जाएगी, कभी एक न होगी!
और जल्दी ही यह साबित हो गया।
चार
छब्बू के मारे जाने का सदमा जिसे सबसे ज्यादा था, वह रघुनाथ थे!
जाने क्या था कि छब्बू जब कभी बगीचे की तरफ आते, नहर या अखाड़े पर आते या अपनी भैंस के साथ उत्तरी सिवान में आते - रघुनाथ के दुआर को जरूर देखते - मास्टर साहब हैं या नहीं? हैं तो खाली बैठे हैं या काम कर रहे हैं? अगर रघुनाथ खाली होते तो छब्बू आ कर बैठ जाते! बोलते कुछ नहीं, बस बैठे रहते! पूछने पर बोलते कि कोई काम नहीं, बस आपके पास कुछ समय बिताना अच्छा लगता है मुझे! अच्छों की सोहबत मिलती ही कहाँ है?
वे जाते हर जगह, लेकिन बैठते यहीं।
वे रघुनाथ के कहे बगैर उनके हित-अहित का अपने आप ही ध्यान रखते। यह उनकी भावना थी जिसके पीछे कोई कारण नहीं था! ऐसा रघुनाथ दूसरों से ही सुनते, छब्बू से नहीं! अभी साल भर पहले की बात है - रघुनाथ के पिछवाड़े उनके चचेरे भाई का घर-दुआर है जिसके आगे तीन बिस्से के करीब उनकी जमीन है! उनकी यानी रघुनाथ की! भाई तक तो गनीमत थी। वे बँटवारे का सम्मान करते थे लेकिन भतीजों की नीयत खराब होने लगी। उन्हीं के घर के सामने दूसरे की जमीन! वे चार भाई थे और सब बालिग! बड़े को रघुनाथ ने ही पढ़ाया था और बिजली विभाग में नौकरी भी दिलाई थी! वह समय-समय पर कब्जा करने की तरकीबें और बहाने ढूँढ़ता रहता! उसने एक बार रात भर में रघुनाथ के पिछवाड़े एक ईंट की दीवार खड़ी कर दी और उनका रास्ता बंद कर दिया। रघुनाथ को सबेरे तब मालूम हुआ जब हल्ला-गुल्ला सुनाई पड़ा! वे पहुँचे तो देखा कि छब्बू लाठी लिए हुए दीवार गिरा रहे हैं और गलियाँ बरसाते हुए नरेश को ललकार रहे हैं - 'घरघुस्से, बाहर निकल और हिम्मत हो तो खड़ी कर दीवार! हम भी देखें! मास्टर को अकेला समझा है क्या? खसरा-खतौनी भी कोई चीज है कि नहीं?'
नरेश और उसके भाई घर में ही घुसे रहे, उनमें से किसी की हिम्मत नहीं हुई कि बाहर आए और छब्बू से लोहा ले!
सच्चाई यह है कि रघुनाथ को नौकरी जाने का जितना दुःख था उससे कम दुःख छब्बू के जाने का नहीं था! क्योंकि छब्बू थे तो रघुनाथ भी थे और उनके लिए पहाड़पुर भी! अब किसके बूते वे रहेंगे ?
छब्बू के मारे जाने के पहले गनपत ने रघुनाथ को इशारों में बता दिया था कि पहलवान कभी आप के यहाँ आएँ तो समझा दीजिए - चमटोल से दूर ही रहें! यह हम दोनों के बीच की बात, किसी तीसरे को न पता चले! बस दूर रहें! रघुनाथ ने एक बहाने से कहा भी था कि - 'छब्बू! अब बहुत हो गया, जाने दो!' छब्बू ने कहा - 'मास्टर साहब! छोड़ तो दूँ, लेकिन जाऊँ कहाँ? गाँव में तो सभी बेटियाँ हैं, बहुएँ हैं! और कहाँ जाऊँ?'
रघुनाथ ने उन्हें तरह-तरह से समझाने की कोशिश की लेकिन बेकार!
उन्होंने भी सोचा था कि अधिक से अधिक क्या होगा - यही होगा कि छब्बू बेइज्जत किए जाएँगे और झूरी-ढोला से संबंध हमेशा के लिए खतम! लेकिन यह तो छब्बू के दुश्मनों ने भी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा। वे यह कहते घूमते रहे कि यह एक ठाकुर की हत्या नहीं, पूरी बिरादरी की मर्दानगी को चुनौती है, उसे ललकारा गया है - लेकिन इस घटना को भुलाना और इसकी चर्चा न करना ही बेहतर समझा सबने!
थोड़ा वक्त लगा ठकुरान (ठाकुर टोला) को बदले हुए समय को समझने और उसके हिसाब से अपने को ढालने में! कई दिनों तक दुआर कूड़ा और कचड़े का ढेर बना रहा, कई दिनों तक चरनी और नाद के आसपास की जगहें गोबर से बजबजाती रहीं, कई दिनों तक बैल खूँटे से बँधे उठते-बैठते रहे, गाएँ-भैंसें रँभाती और पगुराती रहीं! लेटे-लेटे खटिया तोड़नेवाले ठाकुर कभी कोने में पड़ी कुदाल की ओर देखते, कभी फरसा की ओर, कभी फरुही, कूँचा और झाड़ू की ओर - और थक कर अंत में उस छौरे की ओर जिधर से हलवाहे आते थे!
लेकिन हलवाहे जो चमटोल से फरार हुए, वे नहीं लौटे!
एक हफ्ता बीता।
फिर दूसरा हफ्ता बीता।
फिर तीसरा हफ्ता बीता।
उनके जाने से ठाकुर जितने परेशान थे, दशरथ यादव उतने ही खुश! उनके बेटे जसवंत ने इस गाढ़े वक्त में ठाकुरों को सँभाल लिया था। उसने उन्हें हलवाहों की कमी खलने नहीं दी। उसने सबके खेत जोते भाड़े पर। एक दिन भी उसका ट्रैक्टर बैठा नहीं रहा। सबके हल जुआठ धरे रह गए! उसने सबको एहसास करा दिया कि बैल सिरदर्द और बोझ हैं, फालतू हैं, दुआर गंदा करते हैं, उन्हें हटाओ! उनके गोबर भी किस काम के? उनसे उपजाऊ तो यूरिया है!
कुछ बातें बाद में पता चलीं, उस समय नहीं। मसलन, जैसे उसने ठाकुरों को सँभाला, वैसे ही उसने चमटोल को भी सँभाल लिया! कुछ हलवाहे तो शहर चले गए - रिक्शा खींचने के इरादे से या दिहाड़ी पर काम करने के इरादे से लेकिन ज्यादा बड़ी संख्या कोरबा गई - जसवंत के छोटे भाई बलवंत के पास जो दिहाड़ी मजूरों का ठेकेदार था। उसने सबको खदान में काम दिलाया। और यह भी कि गाँव-घर का होने के कारण वह दूसरों से जितना लेता था, उससे कम लिया इनसे!
यही नहीं, जसवंत ने उनकी भी मदद की जो चमटोल में रह गए थे - खास तौर से औरतें! राशन-पानी की गरज से अनाज के लिए उन्होंने ठकुरान में जाना बंद कर दिया था और सूद पर जसवंत से या अहिरान से रुपए लेने लगीं! वे अब सीधे गज्जन साव की दुकान पर जातीं, नगद पैसे देतीं और सौदा-सुलुफ लेतीं!
गाँव धीरे-धीरे पहलेवाले ढर्रे पर लौटने लगा - नए बदलाव और नई व्यवस्था के साथ। फर्क इतना ही आया कि जो हलवाहे बाहर नौकरी करते थे और गाँव लौटते थे, वे ठकुरान में न जा कर अहिरान में जाना उठना-बैठना पसंद करते थे! शायद उन्हें वहाँ बराबरी का एहसास होता था।
रिटायरमेंट के बाद लोगों की देखा-देखी रघुनाथ ने भी अपनी खेती-बारी की दूसरी व्यवस्था की! उन्होंने अपने खेत सनेही को अधिया पर दे दिए! सनेही उनके कालेज का चपरासी था और सात मील दूर अपने गाँव से कालेज आता जाता था। जात का कोइरी! उसकी समस्या उसकी औरत और बाल-बच्चे थे! रघुनाथ ने उसके परिवार के लिए बरामदे का एक हिस्सा और बाहर का झोंपड़ा दे दिया! इस तरह वे भी खेती के झंझटों से निश्चिंत हो कर कहीं आने-जाने लायक हो गए! और कहीं आना-जाना भी क्या, मैनेजर और प्रिंसिपल ने पेंशन लटका रखी थी और वे उसी में लगे हुए थे। वे उसी चक्कर में दो-तीन दिन के लिए शहर गए हुये थे कि इधर उनके भतीजे नरेश ने घर के पिछवाड़े की जमीन दुबारा घेर ली - अबकी कँटीले तारों से।
इतना ही नहीं, नरेश ने पुरानी नाद उस जमीन पर गाड़ी और भैंस बाँध दी! चारों तरफ गोबर और कंडे फिंकवा दिए, जहाँ-तहाँ सनई और पुआल के पूले रखवा कर यह साबित करने की कोशिश की कि पिछले कई सालों से यह उसी के कब्जे में है।
गाँव में घुसते ही छौरे से रघुनाथ ने देख लिया और सीधे वहीं पहुँचे जहाँ नरेश भैंस को सानी दे रहा था। उसने हाथ पोंछ-पांछ कर चाचा के पैर छुए!
'यह सब क्या है?'
नरेश ने आश्चर्य से उन्हें देखा - 'कुछ भी तो नहीं, है क्या?'
क्रोध से थरथरा उठे रघुनाथ - 'गुंडई करते हुए - और वह भी अपने चाचा से - जरा भी शर्म नहीं आई तुम्हें? हटाओ यह सब खूँटा-सूँटा, तार-फार!'
नरेश के तीनों भाई भी घर के अंदर से बाहर आ गए! पड़ोसियों में से कोई नहीं आया। सभी अपने दरवाजे पर बैठे देख-सुन रहे थे!
'वह तो नहीं हटेगा चाचा। हमारे घर-दुआर के आगे की जमीन हमारे मसरफ की है और फालतू में फँसाए हैं आप! जबकि आपकी है भी नहीं, गाँव समाज की है!'
इतना सुनना था कि रघुनाथ के तन-बदन में जैसे आग लग गई। वे फनफना उठे और एक लात मारी नाद पर - 'ऐसी की तैसी तेरी और तेरे गाँव समाज की!' अभी मिट्टी कच्ची थी नाद की, वह एक तरफ लुढ़क गई!
इसी बीच गुस्से में तमतमाया और गलियाँ देता हुआ नरेश का छोटा भाई देवेश दौड़ा और धक्का मार कर रघुनाथ को गिरा दिया। वे सँभलें, इसके पहले ही उनकी छाती पर बैठ कर चीखा - 'साले बुड्ढे! टेंटुआ पकड़ कर अभी चाँप दें तो टें बोल जाओगे! हम जितनी ही शराफत से बात कर रहे हैं, उतना ही शेर बन रहे हो! जा, जो करना है, कर ले!' उठते हुए उसने उनकी कमर पर एड़ जमाई - 'साला बुड्ढा हरामजादा!'
रघुनाथ ने उठने की कोशिश की मगर नहीं उठ सके!
नाद के बगल में पड़े-पड़े उन्होंने चारों तरफ नजर दौड़ाई! घराना देख रहा था और अपने-अपने दरवाजे पर बैठा हुआ था!
थोड़ी देर बाद नरेश ने उन्हें खड़ा किया और घर की ओर ठेल दिया!
'पीस कर लगाने के लिए हल्दी-प्याज न हो तो कहना, भिजवा देंगे!' देवेश चिल्लाया!
क्या हो गया है गाँव को?
यहीं पैदा हुए, पले-बढ़े, पढ़े-पढ़ाया, सबकी मदद की - कभी किताब कापी से, कभी फीस माफी से, कभी रुपए पैसे से; कितने रिश्ते नाते हैं और रहेंगे - आज भी, कल भी, क्या हो गया गाँव को?
क्या इसलिए कि वे घराने की इस या उस पार्टी में नहीं रहे ?
क्या इसलिए कि रिटायर कर गए और किसी काम के नहीं रहे ?
क्या इसलिए कि कभी किसी के झगड़ों और झमेलों में नहीं पड़े ?
क्या इसलिए कि बेटे ने जात बाहर शादी की ?
क्या इसलिए कि बेटा अमेरिका में डालर कमा रहा है ?
क्या इसलिए कि दूसरा बेटा भी नोएडा में एम.बी.ए. कर रहा है ?
क्या इसलिए कि बँटाई पर खेती सनेही को दी - बाहरी आदमी को, इन्हें नहीं?
क्या हो गया अपने ही घराने को? रघुनाथ समझने में नाकाम रहे!
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:58

पाँच
रघुनाथ दालान में करवट लेटे थे!
'नहीं-नहीं' करने के बावजूद शीला कमर की उभरी हुई हड्डी के आसपास हल्दी प्याज चूना का घोल छोप रही थी! और मुँह के अंदर ही अंदर कुछ बुदबुदाती भी जा रही थी नाक सुड़कते हुए।
दो-दो मुस्टंड बेटे और दोनों परदेश!
एक भी यहाँ नहीं जो बाप के बगल में खड़ा होता!
रघुनाथ ने जिन अंडों को से कर बड़ा किया था, वे कोयल के नहीं कौवे के थे। वे खुद कौवा थे, वरना समझ गए होते।
वे अब तक जिस घर में रहते आए थे खपरैलों का था! मिट्टी की मोटी-मोटी दीवारों का। पुश्तैनी घर! पीछेवाली जमीन जान बूझ कर बँटवारे में ली थी उन्होंने - कि जब पैसा और सौंहर होगा तो पक्का घर बनाएँगे - छोटा-सा ही सही! यह जरूरी था - उनके लिए नहीं, बेटों के लिए। घर ही नहीं रहेगा तो वे आएँगे क्यों? आएँगे तो रहेंगे कहाँ? और जब आएँगे ही नहीं, रहेंगे ही नहीं तो गाँव घर को जानेंगे क्या? फिर बाप दादा की जमीन जायदाद का क्या होगा? कौन देखेगा-ताकेगा? खपरैल का घर तो ढह रहा है! कब बैठ जाएगा, कोई नहीं जानता!
तो पिछले दिनों जब 'प्रोविडेंट फंड' के पैसे मिले थे तभी नए घर में हाथ लगाने का फैसला कर लिया था उन्होंने! अब यह नई मुसीबत!
उन्हें छब्बू की कमी खल रही थी - लगातार!
ये नई नस्लें पैदा हुई थीं गाँव में - तभी से जब से गाँव में बिजली के खंबे, केबुल, ट्यूबवेल, पंपिंग सेट, दवाखाने आए थे, जातियों की पार्टियाँ आई थीं, हर तीसरे घर से फौज में किसी न किसी की भर्ती हुई थी। सवर्णों में एक नस्ल रिसर्च और कोचिंग करनेवाले लड़कों की थी जो शहर से या किसी फौजी के घर से बोतल हासिल करते और रात पंपिंग सेट पर बिताते!
दूसरी नस्ल नरेश और उसके भाइयों की थी! नरेश बिजली मैकेनिक था! सरकारी कर्मचारी था! लेकिन खंबे से तार खींच कर घरों में अवैध कनेक्शन देता था और अच्छी खासी कमाई करता था। उसके तीनों भाइयों की दिलचस्पी पालिटिक्स में थी! देवेश सपा का कार्यकर्ता था, रमेश बसपा का, और महेश भाजपा का। यही पार्टियाँ पिछले बीस सालों से सत्ता में आ जा रही थीं और क्षेत्र में विधायक और सांसद भी इन्हीं पार्टियों के हो रहे थे! तीनों ने बड़ी समझदारी से किसी न किसी नेता को पकड़ रखा था! वे अपने अपने नेता के साथ रहते, घूमते, खाते-पीते और जनता की सेवा करते - यानी ट्रांसफर करवाने या रुकवाने का काम करते! छोटी-मोटी नौकरी से यह बड़ा और सम्मान का धंधा था! लोगों पर रौब भी रहता और दबदबा भी! इनके पास हर मंत्री के साथ उठने-बैठने और खाने-पीने के किस्से होते!
वे जब कभी चार-पाँच दिन गायब रह कर गाँव आते तो सीधे लखनऊ से या किसी महारैली से या 'हल्ला बोल' से ही आते!
इन भाइयों की पहुँच और पैसे की ताकत का बोध रघुनाथ को तब हुआ जब उन्हें दस बारह दिन दौड़ना पड़ा - कभी लेखपाल के पास, कभी थाने पर, कभी एस.डी.एम. के ऑफिस में। कुर्सी सबने दी, सम्मान सबने किया, ध्यान से सुनी उनकी बातें और अंत में कहा - 'मास्साब! आप विद्वान हैं, शरीफ हैं, आपकी सब बातें सही हैं लेकिन किस झमेले में अपने को डाल रहे हैं? वे सब अच्छे आदमी हैं क्या?' मुँह से बोल कर तो कुछ नहीं कहा, इशारों से जरूर समझा दिया कि कर तो सकते हैं कुछ न कुछ, लेकिन बातों से तो सिर्फ बातें ही कर सकते हैं न।
उसी दौरान उन्हें यह भी पता चला कि घराने के आठों परिवारों में से हर परिवार को चुप रहने के लिए नरेश ने दो-दो हजार दिए थे!
रघुनाथ दौड़ लगाते-लगाते थक गए थे! यह उमर भी ऐसे कार्यों के लिए नहीं रह गई थी। अब पहले जैसा दमखम भी नहीं रह गया था। घुटनों में भी दर्द रहता था और गरदन में भी। शीला अलग मरीज थी दमा और गैस की! जब भी रघुनाथ के सामने आती, डकार लेती हुई ही आती। और पिछले दिनों की घटना और पति की परेशानी ने तो उसे और भी नर्वस और निराश कर दिया था।
रघुनाथ दोपहर के खाने के बाद नीम के नीचे लेटे थे और सोच रहे थे कि अब क्या करें ? एकमात्रा रास्ता उन्हें दिखाई पड़ रहा था - कचहरी! लेकिन वह रास्ता बहुत लंबा था। वह जानते थे कि तारीख पर तारीख पड़ती जाएगी। इसी तरह एक दिन वे आते-जाते मर जाएँगे और फैसला नहीं होगा!
इसी बीच शीला आई। उसने कहा - 'अजीब आदमी हैं आप? अकेले चिंता में मरे जा रहे हैं, जिन्हें यह सारा कुछ सँभालना है, उनसे सलाह क्यों नहीं ले रहे हैं? पूछिए तो उनसे?'
'किनसे - बेटों से?'
'हाँ, माना कि एक दूर है लेकिन दूसरा तो पास है!'
'बिल्कुल सही कह रही हो।' उन्होंने राहत की साँस ली - 'बताओ भला! इस ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया था!'
वे उठे और शीला के साथ फोन पर जुट गए। शीला उन्हें बार-बार हिदायत देती रही कि धकियाने, पटकने, मारने-पीटने की बात का जिक्र नहीं करना है वरना परेशान हो जाएगा और पढ़ाई छोड़ कर बीच में ही चल देगा! लाइन मिली रात को दस बजे के बाद! स्वर पर संयम रखते हुए, रघुनाथ ने विस्तार से सब कुछ बताते हुए उससे राय माँगी। यह भी कहा कि यहाँ से केलिफोर्निया की लाइन नहीं मिलती, संजू से भी सलाह ले कर बताना!
राजू ने सुनते ही बीच में टोक कर कहा - 'क्यों मरे जा रहे हैं जमीन को ले कर? छोड़िए उसे और सुनिए, भाभी बनारस से आ गई हैं अशोक नगर में। ज्वाइन कर लिया है यूनिवर्सिटी में। आप माँ को ले कर चले जाइए और वहीं रहिए और सुनिए .....'
सुनने से पहले ही फोन रख दिया रघुनाथ ने! वे माथा पकड़ कर वहीं बैठ गए!
'क्यों, क्या हुआ?' शीला ने पूछा!
'हुआ क्या? अब सँभालो उसे। उड़ कर आ रहा है हवाई जहाज से! आते ही गोली मार देगा नरेश को! वह सब बर्दाश्त कर लेगा, बाप की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं करेगा....'
'अरे रोको, रोको उसे!'
'उसे तो रोक देंगे, संजय को कैसे रोकेंगे? वह तो वहीं से मिसाइल मारेगा उसके घर पर?'
शीला को संदेह हुआ अपनी समझ पर और वह चुप हो कर उन्हें देखने लगी!
'सालो!' कहते कहते उन्होंने सिर उठा कर शीला को देखा - 'मुझे डर था इसीलिए मैं बात नहीं कर रहा था लेकिन तुम्हारे कहने पर की। मैं इतना बेवकूफ नहीं था कि मेरे दिमाग में न आया हो। लेकिन तुम्हारी जिद पर किया! जाने कहाँ से इतने नालायक और निकम्मे लड़के पैदा हो गए - साले! पिछले जनम के पाप! .... मैंने तीस पैंतीस साल नौकरी की, लाखों कमाए और आज हाथ में एक पैसा नहीं! इस हाथ आए, उस हाथ गए। पूछो कि कहाँ गए तो नहीं बता सकता। और यह जमीन? आज भी जहाँ की तहाँ है! रत्ती भर भी टस से मस नहीं हुई अपनी जगह से! इसने तुम्हारे आजा को खिलाया, दादा परदादा को खिलाया, बाप को खिलाया, तुम्हें खिलाया, यही नहीं, तुम्हारे बेटों और नाती पोतों को भी खिलाएगी! तुम करोड़ों कमाओगे लेकिन रुपैया और डालर नहीं खाओगे। भगवान न करे कि वह दिन आए जब बैंक चावल दाल के दाने बाँटे।' उन्होंने जाँघ पर मुक्का मारा शीला की ओर ताकते हुए - 'साले, तुम लोग बड़े हुए हो अपनी माँ का दूध पी कर। और तुम्हारी माँ की महतारी है यह जमीन। चावल, दाल, गेहूँ, तेल, पानी, नमक इसी जमीन के दूध हैं। और बोलते हो कि हटाइए उसे? छोड़िए उसे?'
गुस्से में रघुनाथ क्या-क्या बोलते रहे, उन्हें खुद कुछ पता नहीं।
किसी तरह शीला ने उन्हें सँभाला और पकड़ कर आँगन में ले गई - 'जाओ, सो जाओ। सोचो मत।'
छह
इन्हीं दिनों रघुनाथ को एक इलहाम हुआ।
कि 'शरीफ' इंसान का मतलब है निरर्थक आदमी; भले आदमी का मतलब है 'कायर' आदमी। जब कोई आपको 'विद्वान' कहे तो उसका अर्थ 'मूर्ख' समझिए, और जब कोई 'सम्मानित' कहे तो 'दयनीय' समझिए।
उन्हें हर जगह यही कहा गया और उनका कोई काम नहीं किया गया! उन्हें हर जगह 'हट-हट' और 'दुर-दुर' किया गया। वे उस 'बकरी' या 'गाय' की तरह हैं जो सिर्फ 'में-में' या 'बाँ-बाँ कर सकती है, मार नहीं सकती! यही उनकी छवि है सबके आगे - मिमियाने घिघियानेवाले मास्टर की। यह उनकी छवि नहीं है - यही हैं वे।
वे इस छवि को तोड़ने की सोच ही रहे थे कि बब्बन सिंह ने वह अवसर दे दिया!
उस समय रघुनाथ अपने खलिहान में थे। वे मचिया पर बैठे थे और सामने सनेही अपने और उनके हिस्से का गेहूँ तौल रहा था। बगल से गुजरते हुए बब्बन खड़े हो गए! गाँव के सबसे बुजुर्ग और मानिंद। गाँव ही नहीं, पास पड़ोस में भी कहीं विवाद होता तो एक पंच के रूप में किसी न किसी पार्टी की ओर से वह भी होते! यह अलग बात है कि वे मामला सुलझाने के बजाय और उलझा कर आते! यह उन्हें अच्छा नहीं लगा था कि रघुनाथ जाने कहाँ-कहाँ दौड़े, उनके पास नहीं आए! रघुनाथ ने उन्हें देखा लेकिन कोई भाव नहीं दिया!
'मास्टर!' उन्होंने आवाज दी!
रघुनाथ पास गए और प्रणाम किया!
'जमीन तुम्हारी है, गाँव समाज या नरेश का उससे क्या लेना देना? दूसरा कोई कैसे कब्जा कर लेगा?'
'इतना तो मैं भी जानता हूँ!'
'जानते हो तो विधायक जी से क्यों नहीं मिलते?'
'किस विधायक से?'
'अरे वही, अपने कालेज के मैनेजर?'
माथा ठनका रघुनाथ का। इसका मतलब इस पूरे मामले के तार वहाँ से भी जुड़े हैं। संजय की शादी से! उसे उन्हें रिटायर करने और पेंशन रुकवाने से ही संतोष नहीं हुआ - और ये हैं घराने के सबसे बुजुर्ग और मानिंद जो नरेश को न समझा कर मुझे समझा रहे हैं? और समझा नहीं रहे हैं उसमें 'रस' ले रहे हैं! इसी समय रघुनाथ के दिमाग में एक 'खल' विचार आया!
'कक्का!' वे बब्बन का हाथ पकड़ कर थोड़ी दूर ले गए - 'आप से एक सलाह लेना चाहता था कई दिनों से! जब आप मिल ही गए हैं तो कहिए यहीं पूछ लूँ?'
'बोलो, बोलो!'
'मन तो नहीं बनाया है लेकिन कभी-कभी सोचता हूँ वह जमीन ही बेच दूँ!'
बब्बन उन्हें आश्चर्य से देखते रहे - 'तुम्हें पता है कितनी कीमती है वह जमीन? आबादी के अंदर की? कितने काम की? उसे बेचना सोना बेचने जैसा है! और बेचोगे क्यों?'
'सिरदर्द रखने से क्या फायदा?'
'यही तो चाहता है नरेश।'
'लेकिन उसे नहीं बेचना है। उसने जो किया है मेरे साथ, उसे कैसे भूल सकता हूँ?'
'तो फिर?'
'फिर क्या? अभी तो यही सोचा है कि उसे नहीं देना है, बाकी तो घर है, गाँव है, आप चाहेंगे तो आप भी हैं। देखा जाएगा, कोई जल्दी थोड़े है?'
बब्बन थोड़े गंभीर हुए - 'और उसके कब्जे का क्या करोगे?'
'कब्जे का क्या, खूँटा है। और कुछ नहीं तो जो उखाड़ कर फेंक देगा, उसे भी दे सकता हूँ। मैनेजर साहब भी तो खोलना चाहते हैं बच्चों के लिए अंग्रेजी स्कूल? इसी इलाके में कहीं? यहीं खोलें?'
'अरे, गाँव-घर के लोग मर गए हैं क्या कि बाहर के आदमी को दोगे?'
'नहीं, एक बात कह रहा हूँ! अभी कुछ तय थोड़े है!' रघुनाथ ने धीरे से कहा - 'मैं दान तो कर नहीं रहा हूँ किसी को? जब वाजिब और सही मिलेगा तभी न?'
'तुम तो गाँव में फौजदारी करा दोगे मास्टर!' चिंतित होते हुए बब्बन बोले!
'मैं क्या कराऊँगा? जब वे खुद ही करने पर उतारू हों तो कोई क्या कर सकता है?' रघुनाथ ने उनके कान के पास मुँह ले जा कर कहा - 'लेकिन ये बातें अपने तक रखने की हैं। दुनिया भर के लोग आते रहते हैं आपके पास! क्या फायदा कहने से? है न? तो चलें ...'
रघुनाथ खलिहान की ओर मुड़ गए। सनेही ने दूसरी बार पूछा था कि गेहूँ के गल्ले को बखार में आज ही रख दें या कल के लिए छोड़ें। शीला का कहना था कि अरहर और सरसों भी बँट जाएँ तो सभी बारी-बारी से रख दिए जाएँ। रघुनाथ ने निर्णय शीला पर छोड़ा और बरामदे में जा कर बैठ गए! शीला भी पीछे-पीछे आई - 'क्यों लसरिया रहे थे उनसे? सारी खुराफात की जड़ तो वही हैं।'
'तुम चुप रह कर तमाशा देखो! मैंने काफी मसाला दे दिया है उन्हें। अब कल से यहाँ बैठकी लगाना शुरू कर देंगे लोग!' रघुनाथ के चेहरे पर राहत और संतोष की चमक थी। शीला ने उखड़े मन से पूछा - 'तुम जमीन बेचने की बात कर रहे थे उनसे?' रघुनाथ हँसे - 'बात ही कर रहा था, बेच नहीं रहा था। बेचना भी नहीं है मुझे! मेरी अपनी कमार्ई चीज है भी नहीं कि बेचूँ! बाप दादा के पास और उनके पुरखों के पास भी कैसे आई होगी, वही जानते होंगे! लेकिन ये लोग न खुद चैन से रहेंगे, न कोई रहना चाहेगा तो रहने देंगे! ... अब यही देखो, मेरा अपना कसूर कहाँ है? संजय ने शादी की। वहाँ की, जहाँ चाहा, जहाँ उसे अपना हित दिखा, भविष्य दिखा! मुझे भी अच्छा नहीं लगा लेकिन उसकी अपनी पसंद और अपनी जिंदगी; हम क्या कर सकते थे? लेकिन उसकी सजा मैनेजर ने मुझे दी! फालतू में! मैंने भी कहा - ठीक है, गाँव पर रहेंगे - सुख और शांति से। न ऊधो का लेना, न माधो का देना! एक समय था कि खेत खलिहान के सिवा कुछ नहीं था यहाँ - न अखबार था, न बिजली थी, न फोन था, न टी.वी. थी। आज सब है और पैदावार भी इतनी है कि हम दो के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना है। रही बाकी जरूरतें तो आज नहीं, कल पेंशन मिलेगी ही, देर भले हो! फिर किस बात का गम? क्यों?'
रघुनाथ ने मुसकराते हुए शीला को देखा - 'और हर सुख दुःख में हमेशा साथ देनेवाली बीवी अभी जीवित है।' उन्होंने उसे खींचा और अपने पास बिठा लिया! वह शरमाते हुए उनके पास बैठी रही और वे उसे एकटक देखते रहे - 'शीला, इन सब चीजों के सहारे जिंदगी तो काटी जा सकती है, जी नहीं जा सकती!' सहसा उनकी आवाज भारी और उदास हो गई - 'शीला, हमारे तीन बच्चे हैं लेकिन पता नहीं क्यों, कभी-कभी मेरे भीतर ऐसी हूक उठती है जैसे लगता है - मेरी औरत बाँझ है और मैं निःसंतान पिता हूँ! माँ और पिता होने का सुख नहीं जाना हमने! हमने न बेटे की शादी देखी, न बेटी की! न बहू देखी, न होनेवाला दामाद देखा। हम ऐसे अभागे माँ-बाप हैं जिसे उनका बेटा अपने विवाह की सूचना देता है और बेटी धौंस देती है कि इजाजत नहीं दोगे तो न्यौता नहीं दूँगी। और अब तुम्हारी नजर टिकी है राजू पर - कि सारी साधें वही पूरा करेगा। निहाल कर देगा तुम्हें। ऐसा कोई भ्रम हो तो निकाल दो अपने दिमाग से। मुझे पता है कि वह इनसे भी आगे जा रहा है! उसने एक ऐसी विधवा लड़की ढूँढ़ निकाली है जिसके दो साल का बच्चा है। यही नहीं, वह कोई अच्छी खासी सर्विस भी कर रही है। उसी के पैसे से दिल्ली में ऐश कर रहा है। मोटरबाइक ले ही गया है मस्ती के लिए। बच्चा पालना और ऐश करना - दो ही काम है उसके। गए थे डोनेशन की रकम ले कर, आज तक पता नहीं चल सका कि ऐडमीशन लिया भी या नहीं।'
'तुम इतना सब जानते थे, कभी बताया क्यों नहीं?'
'क्या कर लेतीं तुम? क्या करता बता कर? शीला, मैं जानता हूँ उसे। पढ़ने में कभी दिलचस्पी नहीं रही उसकी! अपने बाप से किस तेवर में बातें करता है, इसे देखा है तुमने! वह 'शार्टकट' से बड़ा आदमी बनना चाहता है! उसके लिए बड़ा आदमी का मतलब है 'धनवान' आदमी। और वह भी बिना खून पसीना बहाए, बिना मेहनत के। वह महत्वाकांक्षी लड़का है लेकिन लालच को ही महत्वाकांक्षा समझता है! वह बहुत कुछ हासिल करना चाहता है - आनन-फानन में लेकिन बिना पढ़े-लिखे, बिना अच्छे नंबर लाए, डिवीजन लाए, बिना प्रतियोगिताएँ दिए, बिना खटे और नौकरी किए। मुझे नहीं पता, वह लड़की इसे कैसे मिली? कहाँ मिली? हो सकता है उसे भी किसी मर्द की तलाश रही हो। इतना पता जरूर है कि डेढ़ साल पहले किसी सड़क दुर्घटना में उसका पति मरा था! इस लड़की का अपना फ्लैट है, कार है, आफिस के काम से सिंगापुर, बैंकाक भी आती जाती रहती है और वह उसका बच्चा सँभालता है और घर अगोरता है। जैसे हम नहीं जानते, वैसे ही वह नहीं जानती कि इसके मन में क्या है, इसके इरादे क्या हैं?'
'तुम्हें इतना सब कैसे मालूम?'
'यह न पूछो। नोएडा में मेरे भी अपने आदमी हैं जो आते-जाते रहते हैं।'
शीला चिंतित हो उठी - 'सारे दुख इसी बुढ़ापे में देखने बदे थे क्या? एक बेटा परदेस में, पता नहीं, कब आएगा; दूसरा यहाँ लेकिन उसका भी वही हाल। बल्कि उससे भी खराब! और इधर बाप की अलग मुसीबत। गाँव छोड़ें तो जान बचे, नहीं मारे जाएँ। न कोई देखनेवाला, न सुननेवाला! जाने किस मनहूस की नजर लग गई है इस घर को?'
रघुनाथ को वहीं अकेला छोड़ कर वह चुपचाप अंदर गई और लेट गई!
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Re: रेहन पर रग्घू /काशीनाथ

Post by 007 » 09 Mar 2017 19:59

सात
घर में फोन अब जी का जंजाल हो गया था! जब रघुनाथ ने कनेक्शन लिया था तो राजू की जिद पर - कि संजू अमेरिका से जब बात करना चाहेगा तो कैसे करेगा? कोई संदेश ही देना हो तो? भाभी ही मम्मी से कुछ बोलना या पूछना चाहें तो? मुझे ही कोई सलाह लेनी हो तो? चिट्ठी-पत्री कौन लिखता है आज? किसके पास इतना फालतू समय है? और सरला दीदी भी तो हैं शहर में, उनसे नहीं बात करनी है क्या आप और मम्मी को?... तो हर हाल में जरूरी है यह। गाँव में ही बेमतलब थोड़े लिए हैं लोगों ने?
फोन लगा तो राजू के लिए। जब भी घर में रहता था, जुटा रहता था उस पर - कभी इस दोस्त को, कभी उस दोस्त को। संजू की तो लाइन ही नहीं मिलती थी! हाँ, कभी-कभी सरला जरूर मिल जाती थी! अब, जब राजू बाहर है तो फोन उसी तरह बेकार पड़ा था जैसे चरनी और खूँटा या हल और हेंगा!
इसीलिए रात में जब फोन की घंटी बजी तो रघुनाथ और शीला ने डर कर एक दूसरे को देखा! घंटी बज कर बंद हो गई, उनमें से किसी ने उत्साह नहीं दिखाया! जब दूसरी बार बजी तब रघुनाथ उठे और रिसीवर उठाया - 'हलो!'
दूसरी तरफ से स्वर सोनल का था। पहचाना उन्होंने। देर तक सुनते रहे फिर शीला को रिसीवर पकड़ा दिया! और माथे पर हाथ रख कर चुपचाप बैठ गए!
थोड़ी देर बाद दोनों तरफ से सुबकने की आवाज सुनाई पड़ी उन्हें!
वे उठे और अपने बिस्तर पर आ गए!
रिसीवर रख कर शीला भी आई और अपने बिस्तरे पर बैठ गई!
'वह कल आ रही है हमें ले जाने के लिए!'
'तुम्हें जाना हो जाओ, मुझे नहीं जाना!'
'बहुत रो रही थी! पूछ रही थी कि हमारी कौनसी ऐसी गलती है कि देखने के लिए आना तो दूर, आप लोगों ने फोन तक नहीं किया?'
'उसने किया फोन? हम सपना देख रहे हैं कि महारानी लौट आई हैं अपने देश? आकाशवाणी हुई थी उनके आगमन की?'
'यह तो न बोलो। राजू ने नहीं बताया था?'
'मैं किसी राजू-फाजू को नहीं जानता! उसने क्यों नहीं किया? बाप को कर सकती थी, ससुर को नहीं कर सकती? बाप को बुलाया, ज्वाइन किया, अशोक विहार आई, इतने दिन से रह रही है, बीच में पापा-मम्मी नहीं याद आए, आज याद आ रहे हैं! ऐसे ही तो नहीं याद आए हैं कोई बात होगी जरूर!
'रो-रो कर कह रही थी कि मैं पापा-मम्मी के बिना नहीं रह सकती!'
'झूठ बोलती है! फुसला रही है तुम्हें हमें। जानती ही कितना है हमें? न कभी देखा है, न मिली है, वह क्या जाने पापा-मम्मी को? मैं तो जानता भी नहीं कि मेरे कोई बहू है!'
'बहू न सही, बेटा तो है! न जाएँ तो वह क्या सोचेगा?'
'भाड़ में जाए बेटा बेटी बहू - दुनिया! सबकी चिंता करने के लिए हमीं हैं?' रघुनाथ खासे तनाव में आ गए!
'उसे तो चिंता है कि लोग क्या कहेंगे? सास-ससुर गाँव में पड़े हैं और बहू शहर में मजे कर रही है।'
'यह तुम कह रही हो - अपने मन से। समझा? कुछ कहलाओ मत मुझसे!' रघुनाथ उठे और आँगन में टहलने लगे।
नींद गायब हो चुकी थी उनकी! वे कोई निर्णय नहीं कर पा रहे थे। वे गाँव से आजिज भी आ गए थे लेकिन उसे छोड़ना भी नहीं चाहते थे! मन शहर और कालोनी की ओर बहक रहा था - जीवन के नएपन की ओर, नई जिंदगी की ओर, साफ सुथरे पक्के मकानों और कोलतार पुती सड़कों की ओर, गंगा के घाटों की ओर, अनजाने नए संबंधों की ओर। ये आकर्षण थे मन के लेकिन उधर जाने में हिचक भी रहा था मन कि कहीं ऐसा न हो कि पिछवाड़े की जमीन हाथ से निकल जाए, बिना रख-रखाव के मकान ढह जाए, सनेही चोरी और बेइमानी शुरू न कर दे, कहीं लोग हमेशा के लिए गाँव से गया न मान लें। और ऐसा कहनेवाले भी तो कम न होंगे कि देवेश ने एड़ क्या लगाई कि गाँव ही छोड़ कर भाग गए। इससे बड़ी जगहँसाई और क्या हो सकती है?
वे आँगन का चक्कर काटते हुए वहाँ खड़े हो गए जहाँ से खपरैलों से ऊपर उठता चाँद नजर आ रहा था। वे उसे ऐसे देखने लगे जैसे गाँव छोड़ने के बाद फिर नहीं दिखेगा - या उससे पूछ रहे हों कि तुम्हीं बोलो - क्या करना चाहिए?
यह चैत महीने की रात थी! दशरथ यादव ने अपने दरवाजे के सामने नया-नया शिव मंदिर बनवाया था! पिछले दस घंटे से वहाँ अखंड हरिकीर्तन चल रहा था। कीर्तनियों ने मंदिर के बगल में खड़े नीम के पेड़ पर लाउडस्पीकर बाँध रखा था और पूरा गाँव 'हरे राम, जै जै राम' से गूँज रहा था! यह एकरस और उबाऊ गूँज उनके मन को बोझिल बना रही थी!
'तुम जाओ, मैं यहीं रहूँगा अपने घर! सुना?' उन्होंने ऊँची आवाज में शीला से कहा!
'तुम्हें अकेला छोड़ कर? ना बाबा ना, पता नहीं क्या हो जाए यहाँ?' शीला वहीं से बोली - 'और वह भी तो घर ही है। संजू क्या कहता था? हम चाहते हैं कि पापा-मम्मी के अंतिम दिन काशी में बीतें। चैन से बीतें। जब समय आया है तो ना नुकुर कर रहे हो? सोनल पराई नहीं, बहू है हमारी!'
'तुम समझती क्यों नहीं? सोनल बहू है लेकिन घर बहू का है, हमारा नहीं! किस हैसियत से जाऊँ मैं? मेहमान बन कर? किराएदार बन कर? किस हैसियत से?'
इस ओर ध्यान नहीं गया था शीला का। वह थोड़ी देर के लिए तो अचकचाई, फिर बोली - 'ठीक है, उसका घर है मगर संजू तो है न? वह तो हमारा बेटा है। देर सबेर तो आना ही है उसे! राजू से उसी ने कहा था न कि पापा-मम्मी को भेज दो। और सोचो तो बहू का घर क्या हमारा घर नहीं है!'
रघुनाथ चुप रहे! कुछ नहीं बोले।
'देखो, हम चलें। ऐसा नहीं कि यह घर छोड़ कर जा रहे हैं। कभी भी लौट आएँगे इसमें! जब परेशानी होगी तो आ जाएँगे! खेती का जिम्मा दे ही दिया है सनेही को! रह गया है घर तो दस बिस्सा खेत और दे दो गनपत को। कमरे सब बंद करके दरवाजे की ताली उसे दे दो। साफ-सफाई और देखभाल करता रहेगा।'
शीला की बात में दम दिखाई पड़ा रघुनाथ को। उन्हें चार दिन बाद जाना भी था पेंशन के काम से। दिक्कत केवल यही थी कि गनपत मिर्जापुर गया था अपने बेटे के पास!
'तो ऐसा करो शीला, तुम तो सोनल के पास कल जाओ! मैं यहाँ की व्यवस्था करके पाँचवें दिन पहुँचूँगा! पेंशन आफिस में अपना काम निपटा कर सीधे अशोक नगर आ जाऊँगा! कोई जरूरी बात हो तो फोन पर खबर कर देना! अरे हाँ, फोन का कनेक्शन भी तो कटवाना पड़ेगा! खैर, अपनी तैयारी करो तुम - गेहूँ, चावल, दाल, घी, अचार। थोड़ा बहुत जो ले जा सको, ले जाओ!'


आठ
रघुनाथ ने कहा था पाँच दिन लेकिन लग गए पचास दिन!
इसमें उनका कोई दोष नहीं था। सोचा था कि जब जाना ही है तो यहाँ की सारी समस्याएँ निपटा कर जाएँ, यह न हो कि रहें वहाँ और मन लगा रहे यहाँ!
बहुत सोच-विचार कर उन्होंने फैसला किया कि रुकी हुई पेंशन हो या आबादी की जमीन जब इन दोनों की जड़ में मैनेजर ही हैं तो उनसे एक बार मिल लेने में हर्ज ही क्या है ? अगर इतने से ही उनका 'इगो' तुष्ट होता हो तो यह कहने में क्या बुरा है कि आज हम जो कुछ हैं, आप के ही कारण हैं, नौकरी न दी होती तो जाने कहाँ होते? जब बनाया है तो बिगाड़िए मत।
अब स्थितियाँ भी बदल गई थीं। मैनेजर की बेटी की शादी हो चुकी थी वन मंत्री के ठेकेदार बेटे से। वे पड़ोस के जिले के थे। मैनेजर से ऊँचे स्टेटस के। अब रघुनाथ से शिकायत की कोई वजह भी नहीं रह गई थी! वे मिठाइयों के पैकेट और सेब, संतरे और अंगूर के साथ जब पहुँचे तो मैनेजर - जिन्हें लोग 'सरकार' बोलते थे - अच्छे मूड में थे। रघुनाथ को देखते ही उन्होंने चुहल के अंदाज में कहा - 'मास्टर! तुम्हारी सेहत देख कर लगता है, तुम्हें शुरू से ही तनख्वाह न ले कर पेंशन ही लेनी चाहिए थी! जवानी तो अब आई है तुम पर!'
'सरकार!' रघुनाथ के मुँह से निकला और वे रो पड़े!
'क्यों? क्या हुआ? अब तक 'नो ड्यूज' क्लियर नहीं किया क्या?' मैनेजर ने चौंक कर पूछा और प्रिंसिपल को फोन किया, फिर कहा - 'जाइए, चिंता मत कीजिए, हो जाएगा? और कुछ?'
रघुनाथ ने नरेश और बब्बन सिंह का पूरा किस्सा बताया! वे चुपचाप सुनते रहे। थोड़ी देर बाद बोले - 'जब ये आपके घर के थे तो बँटाई पर इन्हें न दे कर बाहर के आदमी को क्यों दिया? गलती तो आप की भी है!'
रघुनाथ कुछ नहीं बोले। उनसे यह बताना बहुत मुनासिब नहीं लगा कि बाहर के आदमी को तो कभी भी हटाया या भगाया जा सकता है लेकिन इन्हें मुश्किल होता! उन्होंने इतना भर कहा - 'हाँ, गलती तो हो गई! अब कुछ किया भी तो नहीं जा सकता!'
'आप समस्याएँ खड़ी करते रहिए और मैं निपटारा करता रहूँ, यही न?' मैनेजर ने एस.डी.एम. को फोन किया और इशारे से कुछ समझाया!
रघुनाथ इस दौरान सिर झुकाए बैठे रहे!
'अब किस सोच में हैं? जाइए और बब्बन सिंह को भेज दीजिएगा!' वे उठे और बाथरूम में चले गए! जाते-जाते कहा - 'हो सकता है, एस.डी.एम. आफिस दौड़ना पड़े कुछ एक बार! दौड़ाए और आपसे कुछ कहे तो उसके आगे बहुत सिद्धांतवादी बनने की जरूरत नहीं है! सबकी कुछ न कुछ मजबूरियाँ होती हैं। ठीक?'
बीस-पच्चीस दिन के जद्दोजहद के बाद एक दिन एस.डी.एम. दो सिपाहियों और लेखपाल के साथ आया - जरीब और गाँव का नक्शा ले कर और सबके सामने जमीन की पैमाइश की! अबकी जमीन का वह हिस्सा भी रघुनाथ के हक में निकला जिसमें नरेश का घर-दुआर था! इसका मतलब था कि रघुनाथ चाहें तो नरेश का घर-दुआर गिरा दें या रहने दें या उतनी जमीन की कीमत वसूल करें।
इसे रघुनाथ की भलमनसाहत पर छोड़ दिया गया!
यह उनकी बड़ी सफलता थी - निश्चिंतता भी! पापड़ तो बहुत बेले लेकिन सम्मान लौट आया! अब वे बनारस जा सकते थे महीने दो महीने के लिए। अगर मन वहाँ लग गया तो संदेश और फोना-फोनी से भी काम चल जाएगा!
उन्होंने जाने की तैयारियाँ शुरू कर दीं और तैयारियाँ क्या करनी थीं - राशन फिलहाल के लिए चला ही गया था। दो छोटी-छोटी बोरियों में अलग-अलग आलू और प्याज! चार बजे की बस के लिए इसी की तैयारी कर रहे थे कि बाहर डाँट डपट की आवाज सुनाई पड़ी!
निकले तो देखा - जगनारायण यानी जग्गन। काफी उखड़े हुए और नाराज। उनके एक हाथ में कल्लू का कान है और दूसरे हाथ में दो अधपके आम! डरे हुए कल्लू को पकड़े हुए वे सनेही के झोंपड़े के आगे खड़े हैं - 'सनेही? सनेहिया रे!'
अंदर से सनेही की औरत निकली - 'क्या है मालिक?'
'तुम औरत जात! तुमसे क्या बात करें? सनेही को भेजो!'
उसने झपट कर कल्लू को खींचा, दो लप्पड़ और मुक्के मारे और धकियाते हुए अंदर ठेल दिया। वह चीखता-चिल्लाता अंदर चला गया!
मामला समझते देर नहीं लगी रघुनाथ को! घराने में सबके दरवाजों के आगे नीम के पेड़ हैं, अकेले वही हैं जिनके दरवाजे के सामने आम का पेड़ है। टिकोरे लगने से ले कर उसके पकने तक जिसकी नौबत शायद ही कभी आती हो - घराने के लड़के बच्चे हाथ में ढेले छिपाए उसके इर्द-गिर्द मँडराते रहते हैं और जग्गन तब तक उसके नीचे खटिया डाले पड़े रहते हैं जब तक गर्मी बर्दाश्त के लायक रहती है! घराने भर की चटनी-अचार का काम - उनके लाख एहतियात के बावजूद उसी से चलता है! इधर से ढेले चलते हैं, उधर से जग्गन पकड़ने की घात में रहते हैं। एक को पकड़ते हैं, तीन मौका पा जाते हैं। उनकी और बच्चों की यह व्यस्तताएँ कभी कभी डेढ़ दो महीने तक चल जाती हैं।
'आओ आओ जग्गन! हमसे बताओ क्या बात है?'
'काकी हैं ही नहीं, आएँ तो क्या आएँ आपके यहाँ?'
'आओ तो, बैठो तो सही!' उन्होंने जग्गन को सामने की खटिया पर बैठने का इशारा किया और आवाज दी झोंपड़े के आगे खड़ी सनेही की औरत को - 'जग्गन को सतुए का घोल तो पिलाओ। सुराही के पानी में बनाना!'
जग्गन थोड़े सहज हुए और बैठ गए, फिर अपनी लुंगी के फेंटे से सुर्ती की डिबिया निकाली और मलने लगे। बोले - 'मास्टर कक्का, आपने यह भारी गलती की! कोइरी-कहार को अपने बीच में बसा के आपने भारी गलती की!'
'इसमें गलती क्या है?'
'अरे? आपको दिखाई ही नहीं पड़ती है? इसी रास्ते हम दिन रात-आते-जाते हैं, ये बैठे हैं तो बैठे हैं; लेटे हैं तो लेटे हैं। बड़ों के बीच रहने का सहूर नहीं! और इनके बच्चे?...'
बीच में ही रघुनाथ ने टोक दिया - 'देखो जग्गन, फालतू हैं ये बातें। समय बहुत बदल गया है! आज मानसिक रूप से विकलांग ही ऐसी बातें करते हैं। किस बात के बड़े हैं हम-तुम? पुरखों की जमीन और जाति के भरोसे? छब्बू की हत्या के बाद भी यह भ्रम पाले हो तो पाले रहो! पिछले दिनों तुमने ही अपने खेत बेचे। ठाकुरों में ही किसी ने क्यों नहीं खरीदा? चाहते तो यही थे तुम, लेकिन तुम्हें नगद चाहिए था बेटी की शादी के लिए; क्यों नहीं खरीदा? खरीदा तो आखिर जसवंत ही ने! आज भी हमारी तुम्हारी खेती उसके भरोसे होती है, ट्रैक्टर उसके पास है, रुपए उसके पास हैं! विधायक उसके हैं, सांसद उसके हैं, सरकार उसकी है, वे आते भी उसी के पास हैं, किसी काम के लिए सिफारिश भी करवानी होती है तो आप उसी के पास जाते हैं। फिर भी बड़े हैं आप? ऐसी गलतफहमी पालनी है तो पाले रहो! हाँ, यह जरूर है कि वह दूसरे गाँव का है, पराया है, अधिया पर देना ही था तो उसके बजाय किसी अपने को देना चाहिए था। अब तुम्हीं बताओ, कौन अपना है जिसे देता?'
जग्गन पसोपेश में चुप रह गए। रघुनाथ का निकटतम पड़ोसी था नरेश - उन्हीं के भाई का बेटा जिसकी नजर बराबर पिछवाड़े की जमीन पर थी।
थोड़ी देर इंतजार के बाद रघुनाथ फिर बोले - 'देखो जग्गन, 'परायों' में अपने मिल जाते हैं लेकिन 'अपनों' में अपने नहीं मिलते। ऐसा नहीं कि अपने नहीं थे - थे लेकिन तब जब समाज था, परिवार थे, रिश्ते नाते थे, जब भावना थी! भावना यह थी कि यह भाई है, यह भतीजा है, भतीजी है, यह कक्का है, यह काकी है, यह बुआ है, भाभी है। भावना में कमी होती थी तो उसे पूरी कर देती थी लोक लाज कि यह या ऐसा नहीं करेंगे तो लोग क्या कहेंगे? धुरी भावना थी, गणित नहीं, लेन देन नहीं!' इसी बीच सत्तू का घोल दे गई सनेही की औरत, रघुनाथ चुप हो गए। उसके जाने के बाद फिर शुरू किया - 'अब तुम्हीं बताओ, नरेश से अधिक कौन अपना था? सोचा था, उसको दे कर निश्चिंत हो जाऊँगा। हालांकि उसकी नीयत पर शक था - बहुत पहले से। और उसे न दे कर अच्छा ही किया वरना वह दिन भी आता जब अपने खेत में क्या, गाँव में ही मुझे घुसने न देता। और कहने की जरूरत नहीं कि उस वक्त तुम भी मेरा नहीं, उसका साथ देते! ... हाँ, सनेही को मैं जानता हूँ। वह अपने काम से काम रखनेवाला आदमी है। तुम्हें या किसी को कोई शिकायत हो तो बताना! मौका ही नहीं देगा, बताओगे क्या?'
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