मेरा पता कोई और है /कविता

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kunal
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Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Post by kunal » 24 Sep 2017 16:18

1914 में वे एनी बेसेंट से मिलीं और उनकी प्रिय सहेली बन गईं। उन्होंने रेशमी कपड़ों की होली जलाई और खुरदुरी खादी की साड़ी पहनने लगी। और सिर्फ इतना ही नहीं खादी के कपड़ों की गठरी उठाकर वे गली-गली घूम-घूम कर बेचतीं भी। उनके भाषण जोश जगानेवाले होते। नशाबंदी के पक्ष में वे शराब के दुकानों के आगे धरना देतीं। उनके सारे कदम सरकार द्वारा लगाई गई रोकों के खिलाफ थे। 1934 में वे कैद कर ली गईं और उन्हें बेलौर जेल में रखा गया। इस जेल में कई तरह की महिला कैदी तरह-तरह की अपराधों की सजा भुगत रही थीं। उन्होंने उनके जीवन को आधार बना कर भी उपन्यास लिखा। उनका जीवन-काल 1901 से 1960।
नंदिता नोट्स लिखने के साथ-साथ सोच रही थी लिखना अपने आप में कितना महान कार्य होता है। किसी उद्देश्य के लिए, समाज को बेहतर बनाने के लिए लिखना... कोदैबनायकी ने अपनी इस क्षमता का कितना बेहतर उपयोग किया... और एमी भी तो रात-रात भर जाग कर लिखती रहती है... बेचैन सी। और वह बेवकूफ निहारती रहती थी उसे बस। उसे कोई जरूरत न पड़ जाए इस आशा में जागती सी। वह तब भी कहती एमी से... काश, मैं भी लिख पाती तुम्हारी तरह... लिखना कितना अच्छा लगता होगा न।
एमी हँसती, कहानी लिख सकती है तू... कोशिश तो करके देख... पर उसे हमेशा लगता एमी उसका दिल रखने के लिए कह रही है... बस।
हनीफ सर जाने को खड़े हुए थे। हमेशा की तरह न नंदी उन्हें रोकना चाहती थी न वे रुकना। बस मन उनका बहुत खाली-खाली सा हो चला था। वे सोच रहे थे खुद... आखिर क्या हुआ है ऐसा... वे सोच रहे थे इतने दिनों से। नंदिता से उन्हें धीरे-धीरे एक दूरी बनानी है... उसका थीसिस पूरा हो जाए बस। पर ऐसा करते हुए... याकि जब सचमुच ऐसा हो रहा है वे उदास क्यों हैं इतने आखिर। ... जैसे कोई चीज छूट रही है उनके हाथों से। जैसे खरगोश का कोई नन्हा बच्चा उनकी हथेलियों की कैद से आजाद हो कर भागने की तैयारी में हो। और उसे यूँ आजाद होते देखना उसे पसंद न हो...
नंदी ने भी तय कर लिया है, जाएगी वह हनीफ सर के साथ और वहीं कहेगी उनसे सब कुछ सच-सच... आगे... आगे सर की मर्जी... उसने देखा, खिड़की से जाते हुए सर ने एक बार भी पलट कर नहीं देखा उसकी तरफ... वह उदास नहीं होना चाहती थी पर कुछ खाली-खाली सा तैरने लगा था उस सूनेपन में। नंदिता ने सर की दी किताब उठा ली थी। उलट-पुलट कर देखा था उसे... कितनी कितनी बार... पर एक पिंड था समय का जो न आगे खिसक रहा था न पीछे। अपनी जगह पर जड़ा-अड़ा सा बैठा था। मनाने की चाह में रूठ कर बैठे बच्चे की तरह... उसका मन भारी-भारी हो आया था।



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जब दरवाजे की घंटी बजी तो नंदिता के मन में हठात यह प्रश्न उगा था, कौन हो सकता है इस वक्त? आखिर कौन? वह जानती थी हनीफ सर तो बिल्कुल भी नहीं हो सकते। जाने के एक दिन पहले तो वह कभी भी उसके घर नहीं आएँगे। यह वक्त उनके हिसाब से उनकी पत्नी और उनके परिवार के लिए होता है। और वह भी तब जब उन्हें दस दिनों के लिए बाहर जाना हो। तो क्या वसीम...? उसने खुद को बरजा था। वह क्यों चाहती है कि वसीम उस तक आए। उसने खुद ही तो उसे यहाँ आने से मना किया है... फिर उसका इंतजार क्यों?... उसने जैसे खुद को ही झुठलाया वह क्यों करेगी उसका इंतजार...? उसे वसीम से क्या मतलब? जैसे आया था अचानक उसकी जिंदगी में उसे उसी तरह चले भी जाना होगा। उसके भीतर बसी किसी दूसरी मैं ने कहा था... क्या सचमुच...?
इसी ताने-बाने में उलझी वह दरवाजे तक आ चुकी थी। उसने एक बार अपने बालों में उँगलियों से कंघी की फिर उन्हें पीछे की तरफ सहेजा। सबके सब चेहरे पर फिसले आ रहे थे। चेहरे पर फिसलना एक मुहावरा हो सकता है लेकिन अनायास ही उसके इस प्रयोग से उसे फिर वसीम की याद हो आई... उसके बीमार चेहरे पर फिसलती उसकी उँगलियाँ, उसका ताप हरती उँगलियाँ... क्या यह सब कुछ एक चेहरे को देख कर फिसलने जैसा था... बस देख कर मर मिट जाने जैसा कुछ... और नहीं तो क्या? कितना जानता है वह उसके बारे में... वही कुछ न जितना उसने बताया होगा भावोद्रेक के क्षणों में... कितने समय से... पर दावे इतने बड़े-बड़े... बातें इतनी गहरी। यह सब कुछ सिवाय क्षणिक आकर्षण के और क्या...
उसने चलते-चलते फिर खुद को बरजा था। दरवाजे पर कोई है। उसने अपने टॉप को पीछे से खींच कर सीधा किया, पाजामे के नाड़े को अंदर समेटा और फिर दरवाजा खोलने को उद्धत हुई। उद्धत होने की इस प्रक्रिया में कुछ क्षण जरूर बीते होंगे। अचानक उसे खयाल आया बेल एक बार बजने के बाद दुबारे नहीं बजी। क्या सामनेवाला व्यक्ति लौट चुका है। पर नहीं। खिड़की पर कोई आड़ी-तिरछी परछाई बन रही थी... जड़ जैसी, बिना हिल डुल। उसे सामनेवाले व्यक्ति के धैर्य पर आश्चर्य हो आया था...
सामने कोई चालीस-पैंतालीस वर्ष की महिला थी, घुँघराले बाल, मृदु चेहरा, शहद सा रंग। कुल मिला कर सब कुछ बहुत मीठा और सहज सा। वह हैरत में खड़ी की खड़ी है। कौन है यह, क्यों मिलने आई है उससे। गलत पते पर तो नहीं आ गई... उसने जुबान को जबरन सहेजा है... जी आप? जवाब में कोई उत्तर नहीं मिला है। दो निगाहें जो देख रही हैं उसे... पहचान-परख रही है बड़े प्यार से। इसीलिए तो उनका यूँ एकटक देखना भी उसे घूरना नहीं लगता... उत्तर में भी एक प्रतिप्रश्न ही... तुम नंदिता हो, है न? हाँ, वह सिर्फ इतना कह कर चुप हो जाती है। जबकि वह जानती है कि उस औरत की जगह कोई और होता तो वह जरूर कहती ... आपको क्या लगता है? या आप किससे मिलने आई हैं। उसने सोचा क्षण भर को, इस औरत में कुछ तो है ऐसा जो दूसरे के मन की कटुता और तीतेपन को भी प्रभावित करता है। क्या प्रभामंडल इसे ही कहते हैं, उसने गौर से देखा था। कोई आभा, कोई प्रभा नहीं थी उसके चारों तरफ। थी तो बस एक सहज सी मिठास। उसी मिठास से बंध कर कहा था उसने अंदर आइए... भीतर आ कर बातें करते हैं, आराम से। वह सरक कर उसके ठीक बगल से भीतर को आ रही थी और वह सोच रही थी ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ कि बिना नाम-परिचय जाने हुए उसने किसी को घर के भीतर घुसने दिया हो। यह कोई सेल्स गर्ल हुई तो... या फिर... नाम पता तो कहीं से मालूम किया जा सकता है। औरत ने शायद उसके पशोपेश को भाँपा था... मैं वसीम की अम्मी हूँ। उसने यह नहीं कहा था कि मैं हनीफ मियाँ की पत्नी हूँ। ऐसा उसने जान बूझ कर किया था। पर नंदिता को लगा जैसे उसने कहा हो, मैं हनीफ मियाँ की पत्नी हूँ। वह चौंक पड़ी थी अचानक। अपने पर कोई काबू नहीं रह गया था उसका... उठ कर खड़ी हो चली थी यूँ ही। फिर यह सोचा था कि वह उठी क्यों, तो सिकुड़ती-सिमटती सी बैठ गई थी अपने आप में। यह जानते हुए भी कि यूँ सिकुड़ना-सिमटना उसकी फितरत नहीं है।
उन्होंने कहा था नंदिता से... वसीम तुम्हारी बहुत बातें करता है। उसने फिर सुना... हनीफ मियाँ तुम्हें इतना पसंद क्यों करते हैं... चुप रहने के सिवा कोई दूसरा उत्तर नहीं था उसके पास, कहे और अनकहे दोनों प्रश्नों के जवाब में।
उन्होंने फिर पूछा था तबीयत कैसी है तुम्हारी...? ...उसने सुना था तुमने वसीम को भी इसी तबीयत के बहाने छीन लिया न मुझसे...? उसे अजीब सी बेचैनी हो रही थी; एक सकपकाहट जो उसने पहले कभी नहीं महसूस किया था। जैसे कोई चोर हो मन में। ...यह सब अहसास नंदिता के लिए नया-नया था। वरना उसने हमेशा जो भी किया था सीना तान कर किया, उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सच माना... और जो भी निर्णय लिए दिल की बात को सुनते हुए ही... कहते हैं दिल की आवाज कभी गलत नहीं होती। ...तो अब क्यों हो रही थी... नंदिता अपराधी सी किसी के सामने आखिर कैसे? क्या सच्चाई व्यक्ति सापेक्ष भी होती है, समय और समाज सापेक्ष की तरह। सामनेवाले व्यक्ति की चुप्पी, उसका सदाचार, उसकी सहिष्णुता तुलनात्मक रूप से उसे छोटा बना रहे थे; कुछ-कुछ ओछा भी। वरना नंदी को भी गर्व था अपने पर और और वह भी बेतरह। नंदी अब तक लगातार चुप ही चुप थी। वह समझ भी नहीं पा रही थी कि बोले भी तो क्या बोले। वह पानी लाने के बहाने उठी थी कि इसी बहाने वह अपने व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को संयमित कर सके... यह तय कर सके कि उसे किस तरह से पेश आना है...
नंदिता जब उठकर पानी लाने गई नसीमा यही सोच रही थी कि यह लड़की उतनी सहज-सरल नहीं। इससे कुछ भी अपने मन का कुबूल करवा लेना इतना आसान नहीं जितना कि वह सोच कर निकली थी। उन्हें कल की रात लगता रहा था कि वसीम इतना परेशान क्यूँ है। ऐसी तो कोई बात हुई ही नहीं। दुनिया की कौन सी लड़की होगी जो इतना प्यार करनेवाले लड़के और वह भी जब वह शक्ल-सूरत से भी माशाअल्लाह इतना खूबसूरत हो, उसे मना कर सकती है। पर वह ताब-आब है इस लड़की में। एक अजीब सी तटस्थता, वीतराग जैसे अपने उम्र से बहुत-बहुत बड़ी और समझदार हो वह। उसने सोचा वह एक माँ की तरह सोच रही थी। आखिरकार उसका कलेजा भी तो एक माँ का ही था। 'भी' उसने इसलिए सोचा कि 'ही' सोचते हुए उसका मन और ज्यादा काँप रहा था...। खुद अपनी खातिर ही नहीं वसीम की खातिर भी। उसने पूछा था वसीम से कि वह तो उसे पसंद करता है, पर क्या नंदिता... जवाब में वसीम के हर तरफ बस एक लंबी सी चुप्पी थी। उस अंतहीन चुप्पी से घबराकर उसने बातों का रुख दूसरी तरफ कर लिया था... वह चुप्पी उसे अब परेशान कर रही थी। और फिर कल रात का सपना रह-रह के उसकी आँखों को गड़ने लगता था। वसीम से बात होने के बाद जो सपना कहीं अतल कोहरे में गुम हो गया था अभी मुँह उठाकर इस चेत में भी दिखने लगा। वसीम पर उस दिन उसे बहुत प्यार आया था। हमेशा से भी ज्यादा। उसके लाड़ले बेटे ने उसकी सारी परेशानियाँ खत्म कर दी। वह जानता है क्या कि एक ही चिंता है उसकी अम्मी को, कहे कि न कहे मुँह से वह? और उसने अपनी पूरी ताकत से उस परेशानी की जड़ को ही उखाड़ फेंकने की कोशिश की थी। ऐसे ही वह वसीम को अपना लाड़ला बेटा नहीं मानती थी...
...और चली जाना हो तो रातोंरात चली जाए वह वसीम की जिंदगी से। एक से एक खूबसूरत और सलीकेमंद लड़कियाँ मिल जाएँगी उसके वसीम की खातिर। वह तो...
पल भर को वह स्वार्थी हो चली थी। पर जब वसीम के जर्द चेहरे पर उसकी नजर गई तो फिर वे ऐसा नहीं सोच सकीं। उनका लाड़ला बेटा... उसे उसकी चाही हुई हर चीज मिले दुनिया में। और इसके लिए उन्हें भी चाहे जो कुछ करना पड़े करेंगी।
नंदिता जितनी देर लगा रही थी, उन्हें उतनी ही राहत थी। वे तैयार कर सकती हैं इस बीच खुद को। कैसे कहेंगी वे उससे कुछ? क्य कहेंगी?... नंदिता ने भी ट्रे में नमकीन, बिस्किट, पानी सजाते-सजाते खुद को तैयार कर लिया था, हर सवाल, हर स्थिति के लिए। नंदिता जब उनके सामने आई उन्होंने फिर एक बार गौर से देखा। नंदिता का चेहरा सपने में देखी गई नंदिता के चेहरे से मिलता है क्या? उन्हें राहत मिली उसका चेहरा उस नंदिता से बिल्कुल नहीं मिलता। उन्होंने फिर गौर से देखा और एक बार फिर राहत की साँस खींची। सच सामनेवाला वह चेहरा कुदैशा बेगम की जवानी की पुरानी तस्वीर जैसा था। लेकिन फिर कुछ खटका और गड़ा भीतर तेजी से... वो नंदिता की बेधती हुई आँखें थी... ठीक सपनेवाली नंदिता जैसी... उससे पूछती हुई... हनीफ सर ने अगर मुझसे प्यार किया, वसीम ने अगर मुझे पसंद किया तो इसमें मेरा क्या कुसूर?
नसीमा बी के सारे प्रश्न, सारी समझाइशें बिना कहे-सुने अपने आप में सकुचा गई थीं। वे झुँझला उठीं खुद पर। अब एक बार खुद को नए सिरे से सजाओ, तैयार करो... पर तैयार करने की जरूरत ही नहीं पड़ी उन्हें खुद को। हड़बड़ाहट ने अपनी तरफ से एक सवाल दाग ही दिया था, और उन्हें सँभालना था अब सब कुछ उसी सिरे को पकड़ कर... वसीम तुम्हें कैसा लगता है... कैसा मतलब? नंदिता सचेत थी अब यूँ ही निरस्त होनेवाली नहीं...। कैसा मतलब कैसा...। उसने फिर पूछा कैसा क्या...? वे चुप हो गई थीं... वे क्या कहें, जैसे उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था... फिर नंदी ने ही बात आगे बढ़ाई... एक अच्छा शरीफ इनसान, एक अच्छा दोस्त... वे सँभल चुकी थीं थोड़ी-थोड़ी... उस दोस्त या कि अच्छे इनसान के लिए इतना प्यार है मन में कि उसके साथ जिंदगी गुजारने की सोच सको...? क्या कहा आपने... जैसे उसने ठीक-ठीक सुना न हो ऐसे आहत स्वरों में पूछा था। जैसे ऐसे सवाल की अपेक्षा उसे सामनेवाले से बिल्कुल ही न हो। नसीमा बी पहली बार सकुचाई थीं... देखो, वसीम तुमसे प्यार करता है... वह तुम्हारे साथ जिंदगी गुजारने के सपने देखता है और तुम्हारी बेरुखी से टूटा हुआ है बुरी तरह। एक माँ होने के नाते मैं साफ करने आई हूँ सब कुछ। क्या तुम्हें भी उससे प्यार है... नहीं। नंदिता बिल्कुल साफ थी। फिर मैं पूछना चाहती हूँ तुमसे, वसीम को आखिर यह भरम हुआ तो कैसे... थोड़ी देर की चुप्पी के बाद नंदिता ने कहा था - दोस्ती को प्यार समझने की गलती दुनिया में हजारों लोग करते हैं अगर यह गलती उससे भी हुई तो इसमें मैं क्या कर सकती हूँ... नसीमा बी बिल्कुल झुँझला उठी थी। कितनी ढीठ लड़की है यह। सामनेवाले की भावनाओं का इसे जरा भी खयाल नहीं... अब इससे पूछे कोई कि...
नंदी रौ में थी और वह झिझकी नहीं थी सच कहने से... अगर यह सब आप उस रात की घटना के कारण कहने आई हैं तो सुनिए, उस रात के घट जाने से मेरे जीवन में कुछ भी नहीं बदला... और वह मेरे लिए किसी नए रिश्ते का कारण नहीं हो सकता। उसे घटना था, घट गया; उसके घटने में मैंने वसीम को भी दोषी नहीं माना है, वर्ना दोस्त के दर्जे से भी कहीं दूर ले जा कर फेंकती वह नाम। पर नहीं... माना कि देह अहम होता है एक स्त्री-पुरुष के रिश्ते के बीच... पर महज देह की खातिर कोई रिश्ता बन सकता है क्या... और जहाँ देह नहीं वहाँ कोई रिश्ता ही नहीं हो यह भी तो जरूरी नहीं...
नसीमा बी भौंचक थीं... यह बित्ते भर की लड़की कैसी बातें कर रही है... 'उस रात' से इसका मतलब? क्या वसीम के रुकने भर से या कि कुछ और भी अहम्... उँह... नहीं... यह तो देह-देह जैसा कुछ कह रही है। नसीमा बी ने जैसे खुद को सहेजने की कोशिश कि... वे सकते में थीं। कैसी है यह लड़की... आजकल की लड़कियाँ तो... वसीम ने तो अपनी तरफ से उसे कुछ भी नहीं कहा था; इतने करीब होने के बावजूद और यह लड़की तो चीख-चीख कर कहे जा रही है... उसने खुद के बारे में भी सोचा... वह तो किसी से न कह पाए ऐसा कुछ... और कोई क्या, उसने तो आज तक हनीफ मियाँ से भी... आखिर यह लड़की इशारों-इशारों में ही उसे बताना चाहती है तो क्या... पर वे मुँह नहीं खोलेंगी उन मुद्दों पर, खासकर उससे तो हर्गिज नहीं... अपने भरोसे पर उन्हें भरोसा है, और उसे थामे रहना है उन्हें बिना किसी शक-सुबहा के... उन्हें भरोसा है अपने भरोसे पर क्योंकि सिवाय उस भरोसे के उनके पास चारा भी कहाँ है कोई दूसरा। रात का सपना फिर उन्हें मुँह चिढ़ा रहा था। अपना वह यकीन भी, जिसे वे अपने साथ ले कर आई थीं और जिसके सहारे वसीम के आँसू पोंछे थे उन्होंने...
उन्होंने अंतिम बार कहा था नंदिता से, और निर्णय के स्वरों में - मुझे कोई जल्दी नहीं है, सोच लो तुम, तुम्हें जितना भी वक्त लेना है... उनकी उम्मीद के अनुसार पहली बार नंदिता ने यह नहीं कहा था - 'मैं सोच चुकी हूँ अच्छी तरह, या कि मेरा निर्णय अंतिम है'... अब चाहे तो इसे ही अपना अंतिम सहारा मान उठ चलती वो संतोष से... पर नहीं, संतोष उन्हें नहीं था, बिल्कुल भी नहीं। वह इस लड़की से फिर-फिर हार गई थीं।
नंदिता ने नसीमा बी के जाने के बाद भी देखा वह कुर्सी खाली नहीं थी, वे अब भी वहाँ थीं, लगातार... अपनी इच्छाओं, सवालों के साथ... उसने नजरें चुराने की खातिर सामने पड़ी पुस्तकों को देखा था। हवा से फड़फड़ा कर खुले उस पन्ने पर लिखा था 'सप्तभंगवाद'... उसने ध्यान से पढ़ा - विरोधी दृष्टिकोण पर भी विचार करना चाहिए। कई बार जो बातें विरोधी मालूम पड़ रही है, उन्हें विचार करने के बाद तुम अपनी बातों के समान ही पाओगे। अपने चित्त से संकीर्ण विचारों को निकालो। दूसरों के दृष्टिकोण और समझ को सहानुभूति पूर्वक देखो...
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Post by kunal » 24 Sep 2017 16:18

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एमीलिया को खुद भी पता नहीं था, वह वसीम को इस तरह बार-बार फोन करती थी तो क्यों; वह उससे आज मिलने जा रही थी तो क्यों। मिलना तो उसे नंदिता से चाहिए था। पर उसे उस पर क्रोध आ रहा था, बेतरह। इस लिए जब उसका एसएमएस आया 'हम मिल सकते हैं क्या' तो उसने झूठ ही लिख दिया था कि वह आनंदवन में है। जबकि आनंदवन से वह परसों ही लौटी थी और खूब थक लेने के बाद थकान उतारने की खातिर दो-तीन दिन घर में ही आराम करना चहती थी। नंदी ने पूछा था 'फिर मैं भी आ जाऊँ? बच्चों के सथ भला लगेगा मुझे।' एमी ने फिर जवाब दिया था, फोन किए बगैर... यहाँ से मुझे कहीं और निकलना है और तुम्हें भी देर हो जाएगी आते-आते। फिर मिलते हैं किसी दूसरे दिन... वह जानती थी कि यह दूसरा दिन जल्दी नहीं आनेवाला था। नंदी कल ही चली जाएगी शायद हनीफ सर के साथ... वसीम ने ऐसा ही तो कुछ बतया है उसे... फिर भी... उसे जबकि खुद नंदिता को बुलाकर समझाना था... उसने खुद से कहा - फायदा नहीं कोई... वह अड़ी रहेगी अपनी जिद पर। ऐसा ही तो करती रही है वह। और खुद नसीमा बी भी तो गई थीं उस तक... फिर उसने खुद से ही कहा था, नसीमा बी और उसमें फर्क है। नंदी के लिए तो और भी ज्यादा... उसकी बात... वह फिर भी नहीं मिलने गई... और अब मिलने जा भी रही है तो वसीम से... क्यों...क्या कर लेगा वह रोता बिलखता बच्चा। उसे थपकियाँ दे कर सुला पाएगी क्या...? पर उसके लिए भी उसकी माँ है उसके पास...
बिना तर्क के, बेमकसद काम वह ज्यादा करने लगी है आजकल। कुछ वैसे ही काम जिसके लिए नंदी को पहले अक्सर चिढ़ाया करती थी। बारिश की गीली फुहारों में खुद को भींगने देना। अकेले में खुद से बतियाना। कोई न कोई भूली-बिसरी धुन गुनगुनाते रहना। ठोस बातें और ठोस चीजें जैसे अपना अस्तित्व ही खोने लगी हों। पिछले पंद्रह दिनों में उसने एक भी लेख नहीं लिखा। कभी खिड़की के पल्ले से सिर टिकाए बैठती है तो कभी बेड पर बैठते-बैठते धम्म से नीचे... खयालों की किस रुमानी दुनिया में डूबी हुई है वह इन दिनों उसे खुद पता नहीं। वो-वो ही नहीं रह गई हो जैसे... उस वसीम को जिसे कभी उसने देखा तक नहीं, नंदी से जिसका जिक्र भर सुना है और जिससे फोन पर बातें भर हुई है उसकी... उसके लिए मन में न जाने कितना कुछ उमड़ता-घुमड़ता पाती है। उसकी तकलीफ उससे सही नहीं जाती। जी तो बस यही चाहता है कि किसी तरह वह उसके सारे के सारे दुख ले लेती... कि बन सकती उसकी किसी खुशी का वायस तो जिंदगी जैसे सार्थक हो जाती उसकी। अपने बचपन की दोस्त नंदिता को इस सबके लिए कसूरवार मानने लगी है वो... जबकि वह जानती है कि वसीम ही उससे प्यार करता है, बेपनाह... फिर भी... उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उसे... वह नंदिता होने से खुद को रोकती रही थी उम्र भर... कि उसने अपना वह हिस्सा दबाकर रखा था... पर वही हिस्सा उफान मार-मार कर ऊपर आने लगा है इन दिनों। ...वह आज समझ पा रही है एक-एक कर सबको... पिता, पहली एमीलिया, हनीफ सर और नंदिता को भी। उनकी यातना अब उसे समझ में आ रही है... कौन चाहता है वह किसी से प्यार करे और यूँ टूटकर करे कि खो दे अपना आपा ही। पर होता तो ऐसा ही है... अपनी सुधबुध, अपना सुख चैन खोकर प्यार मिलता है क्या किसी को...? पर हम करते हैं प्यार, यह मान कर भी कि दूसरों की जिंदगी में शायद हम कहीं न हों, कहीं भी नहीं... फिर भी। नंदी, एमीलिया और अब हनीफ सर के बाद वह खुद भी तो... किसी असुरक्षाबोध, किसी कल की चिंता रह-रह कर सताती है तो सताए... वह सिरे से माफ कर देना चाहती है सबको... हाथ जोड़-जोड़ कर माफी माँग लेना चाहती है सबसे... सबसे पहले पिता से फिर नंदी से... सबसे ज्यादा ज्यादतियाँ तो उसने इन्हीं दोनों के साथ की है, फिर हनीफ सर से भी कभी... पर वह यह सब करे भी तो कैसे... कहे भी तो क्या... यह कि उसे प्यार हो गया है... और दूसरों की मजबूरी, दूसरों की भावना को अब वह भी समझ सकती है... हाँ, वह यह भी चाहती है कि वह चीख-चीख कर सबसे कहे यह बात। पर सबसे कहने से पहले उसे खुद दिल से इस सच्चाई को स्वीकारना होगा और फिर... यह सब कुछ वसीम से कहना होगा... क्या सोचेगा वह, यह सब सुनकर... कभी मिले तक नहीं दोनों और उसे प्यार हो गया है... किस बात से, कैसे... कैसे कह पाएगी वह... उसने वसीम को बुला तो लिया है... वह और ज्यादा परेशान हो उठी थी सोच-सोच कर...
उसने आल्मारी खोली तो लगा उसके पास तो कपड़े ही नहीं हैं बिल्कुल। नंदी के जैसे अच्छे और सहेज कर रखे तो बिल्कुल भी नहीं। वह साथ होती थी तो दो-तीन सूट जिद करके ही सही उसे भी दिलवा देती। उसके कपड़े खुद ही सहेज कर रखती... पर वह नहीं थी तो कपड़े यूँ ही आधे-अधूरे, पुराने बेढंगे से... साबुत और अपेक्षाकृत कुछ अच्छे जोड़ों को चुनकर निकाला था उसने... यही कपड़े पहन कर तो वह हर जगह जाती-आती रही है। उसे कभी झेंप नहीं हुई; न ही शर्म आई... फिर आज क्या नया हो गया था कि... उसने सोचा वह एक-दो जोड़े कपड़े तो जरूर बनवा लेगी। फिर उसने उनमें से ही जो ढंग का लगा एक जोड़ा निकाल लिया। फिर दूसरी दिक्कत... इस दिक्कत को वह आज पहली बार महसूस कर रही थी... उसके कपड़ों में कभी दुपट्टे शामिल ही नहीं रहे, बस जींस-कुर्ता या कि चूड़ीदार-कुर्ता। पता नहीं क्यों उसे लगा कि वसीम के सामने उसका यूँ बिना दुपट्टे के जाना, वह भी पहली-पहली बार कुछ ठीक नहीं लगेगा। यह जानते हुए भी कि वसीम प्रगतिशील है, वह परेशान हो रही थी... पता नहीं उसने यह धारणा कहाँ से बना ली... क्या सिर्फ उसके मुस्लिम होने से... उसे खुद पर खीज आ रही थी... खैर जो भी हो, उसे आज जाना तो था ही। और ऐसे जाना था कि वसीम की नजर में उसकी छवि सँवरे, बिगड़े नही... उसने अचानक से नंदीवाले कपड़ों की आल्मारी खोली थी जिसमें उसके कुछ पुराने से कपड़े पड़े थे यूँ ही। उसमें उसे एक चुन्नी भी मिली, बँधेज की... रंग हालाँकि कुछ उचाट हो गए थे उसके, पर... उसे याद आया उस दिन दिल्ली हाट में नंदी ने उसे कितनी बार कहा था... दो-एक चुन्नी तो ले ले... देख कितनी प्यारी है... मल्टी कलर्ड हैं... किसी भी कपड़े पर चल जाएँगे ये... वैसे भी धूप-गर्मी में बौराती फिरती रहती है तू, सिर पर रखेगी तो... एमी ने तब झिड़क ही दिया था उसे... तू ही ले, मुझे कोई जरूरत नहीं इनकी... मुझे नहीं पसंद है ढाई मीटर का यह ओढ़ना... ऐसा क्या है हमारे शरीर में जिसे ढाँकने की जरूरत पड़े, जिस पर हमें शर्मिंदा होना पड़े... जब हमें ईश्वर ने ऐसे ही... और फिर एक अतिरिक्त खर्च नहीं है यह... जिसके बिना भी हमारा काम चल जाए... नंदी जानती थी, एमी कभी नहीं खरीदेगी दुपट्टा या फिर नेल पॉलिश... उसके तर्क उसकी जगह वाजिब भी थे पर खुद का क्या करे नंदिता जो रंग-बिरंगे दुपट्टे या फिर नेल पॉलिश देखकर चहक उठती है... खुद तो लेती ही है, एमी से भी इसरार कर बैठती है...
उसने सबसे ढंग का एक सूट निकाला था, प्रेस किया था... दुपट्टे को मैच कराके देखा... चल ही जाएगा इस पर... और फिर तैयार होने लगी।
उसका भी जी हुलसा था, आज नंदी की तरह वह भी मैचिंग नेल पॉलिश लगा ले... हल्की सी लिप्स्टिक और थोड़ा सा फेस पाउडर भी। यानी वह सब कुछ जिसे करने से अब तक परहेज करती रही है वह। एमी वह सब कुछ कर लेना चाहती थी जो उसे खूबसूरत बना दे, वसीम की नजर में। पर वह जानती थी कि नंदी की आल्मारी में कोई लिप्स्टिक या नेलपॉलिश नहीं छूती, पुरानी-धुरानी भी नहीं।
...फिर उसने खुद को ही बरजा था... यह सब क्या पागलपन कर रही है वह... वह जैसी है वैसी ही भली... जिसे पसंद करना होगा, स्वीकारना होगा उसे, वैसे ही स्वीकार लेगा... और स्वीकार ही लेगा इसकी क्या गारंटी है... अभी तो नंदी के प्यार में सिर से पाँव तक डूबा हुआ है वह... उसे दिखेगा भी तो कौन और क्यों... वही है कि बेवजह जान दिए जा रही है अपना... बस उसे सुकून है तो एक... नंदी प्यार नहीं करती उससे, बिल्कुल भी नहीं। नहीं तो... पहले तो वही कहती रही उसे जबरन दवाब देकर वसीम को अपना ले वह... फिर जब वसीम से मन जुड़ने लगा था तो अपने को रोकने और उसके मन को टटोलने की खातिर... फिर अचानक ही चुप लगा गई थी वह... वह क्या करे अगर नंदी वसीम से प्यार नहीं करती तो... इसमें वह क्या कर सकती है... अब किसी के मन को किसी दूसरे के साथ जबरन बाँध तो नहीं सकते न... कोई खुद भी चाहे तो ऐसा कहाँ कर पता है... अब उसके पापा को ही देखो, दो टूक हो कर चल दिए थे उस एमीलिया की खातिर सबसे... बाद में उसके मोह से बंध कर चले भी आए वापस उसकी माँ के पास, तो मन बंध पाया कभी उन दोनों का... किसी मजबूरी के तहत...
वह एक बार फिर अपने होने को लेकर संतप्त और शर्मिंदा थी। पर इस बार माँ या माँ के जीवन के लिए नहीं, उस अज्ञात एमीलिया के लिए। उसके होने ने उससे उसका सब कुछ छीन लिया था, उसका प्यार तक... और जिंदगी से किसी के प्यार का निकल जाना क्या होता होगा, कैसा होता होगा उसका दर्द वह अभी समझ पा रही थी... जब खुद के नकारे जाने का भय... खुद के अस्तित्व को झुठला दिए जाने का खतरा उसके इर्द-गिर्द लगातार मँडरा रहा था, एक अज्ञात सी शक्ल में। तैयार होते-होते उसकी आँखों के कोरों तक आँसू की कुछ बूँदें छलछला आई थीं, चुपचाप। और हद तो यह कि उसके पास उस भावाभिव्यक्ति के लिए कोई शब्द ही नहीं था... कोमल मुलायम सा कोई शब्द। उसका पूरा वजूद किसी खास ठोस धातु का सा था, सख्त-चीमड़ जिसके भीतर तप्त सा कुछ बहने लगा था अब, जिसे वह महसूस तो कर रही थी पर उसे अभिव्यक्त कैसे करे उसे पता नहीं था। नंदी जैसी कोमल-मुलायम भाषा उसके पास कहाँ थी, न वैसा कोमल-मुलायम व्यक्तित्व ही। वह गलत ही सोचती थी अब तक कि अपने भीतर की नंदी जैसी को कहीं जबरन दबा और सुला रखा है उसने... पर उसे आज महसूस हो रहा था वह तो वह थी, सिर्फ वह...
उसने देखा, बाहर पिघलती हुई धूप थी। उसने दुपट्टे को अपने सिर पर रख लिया था, धूप से बच सकेगी इस तरह... उसे हैरत हुई थी, धूप की परवाह कब से होने लगी उसे... और ऐसा करते-करते चुपके से आईने में देखा था... वह कोई और ही हो गई थी... भोली, मासूम, प्यारी... कुछ-कुछ नंदी जैसी... नहीं, नंदी जैसी नहीं... बिल्कुल एक नई-नकोर एमीलिया। उसने संशोधित किया था खुद को... और अपने संशोधित 'मैं' को लेकर बाहर निकल पड़ी थी वह, एक नई मंजिल की तरफ... उसकी तलाश में।
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ट्रेन कब चल दी थी उसे पता नहीं चला था। चौंककर जब उसने देखा तो हनीफ सामान सहेजने में लगे थे। वे उसके स्लीपर को भी ठिकाने पर जमा रहे थे, उसे अजीब लगा। वह औचक हो कर उठी थी; ठीक कर दे वह खुद ही, पर तब तक चप्पल ठिकाने रखे जा चुके थे। वह फिर भी उठती कि उसकी फोन की घंटी टिनटिनाई थी, संक्षिप्त सी। कौन हो सकता है उसने सोचा... पर सोचने-सोचने में ही मैसेज खुल चुका था... तो क्या वसीम को पता है कि वह उसके अब्बू के साथ कहीं बाहर जा रही है। वह सोचती रही, पता हुआ तो कैसे...? और गर नहीं पता तो यह मैसेज...? आज कई दिनों के बाद... उसने चुप्पी लगा ली थी। पिछले कई दिनों से इधर-उधर रहने पर वह दौड़ कर आती कुछ देर बाद, कोई एसएमएस तो नही आया... या कि कभी-कभी फोन की घंटी बजी कि दौड़ कर... आम तौर पर तो फोन कंपनी के ही मैसेज होते... रिंगटोन डाउनलोड करने या कि अलाने-फलाने स्कीम की खातिर। कभी-कभार किसी दूसरे का मैसेज भी... यूँ ही फारवर्ड कर दिया गया हुआ... औचित्य और अर्थ ढूँढ़ना यहाँ बेमानी ही था... कभी कोई हाल-चाल भी पूछ लेता। पर यह एसएमएस अब आया था, इतने इंतजार के बाद... अब जबकि वह इसे बार-बार देखना चाहते हुए भी देख नहीं पा रही थी। क्या कहना चाहता है वह... हमेशा की तरह इस बार भी वह पूछ रही थी खुद से... फिर चुपके से उसने उसे एक बार फिर पढ़ा था...'तू मेरी जान मुझे हैरतो हसरत से न देख / हममें कोई भी जहाँनूर-जहाँगीर नहीं। तू मुझे छोड़के ठुकरा के भी जा सकती है, तेरे हाथों में मेरे हाथ हैं, जंजीर नहीं।' उसने फिर खुद से ही सवाल किया था, ऐसा क्या है इस में जिसे वह समझ नहीं पा रही। मोबाइल उसने ऑफ कर देना चाहा था... कोई और मैसेज... और अगर हनीफ सर ने पूछा तो क्या कहेगी वह... और हनीफ सर ने पूछ ही लिया था... किसका मैसेज था? मोबाइल ऑफ क्यों कर रही हो...? बस सोना चाहती हूँ... प्रश्न के पूर्वार्द्ध का जवाब अब भी नदारद था। पर बार-बार पूछने या कोंचने की आदत उनकी थी नहीं... उन्होंने प्लेट में कुछ बिस्किट और थोड़े से नमकीन नंदी की तरफ बढ़ाए थे। हड़बड़ी में बस यही रख सका। नसीमा तो रास्ते का खाना भी बना रही थी पर मैंने ही... बोलकर वो बीचमबीच रुक गए थे जैसे कि नसीमा का नाम यहाँ, इस पल में लेकर उनसे कोई गलती हो गई हो... नंदिता कुछ भी नहीं बोली थी प्रतिक्रिया में; बस हाथ धुलने के लिए उठ गई थी और वे उसके चेहरे के भावों को नहीं देख पाए थे।
नंदी हाथ धोकर आ गई थी पर सच पूछो तो आई नहीं थी, अभी-अभी बाहर से, कि घर से ही वो तय नहीं कर पा रहे थे। वह इतनी चुप थी कि उसके न होने का वहम उन्हें लगातार होता रहा। वे बीच-बीच में बोलकर सच्चाई को जानना चाहते। पर उसके छोटे-छोटे हाँ-हूँ से कुछ भी नहीं तय हो पा रहा रहा था। न उसका होना न उसका न होना। उन्होंने हार कर कुछ भी तय करने की कोशिश ही छोड़ दी थी। बिना जवाब के इंतजार की चाहत में उन्होंने कहा था सोना चाहती हो... और चादर पायताने से उठा कर उसके कंधों पर डाल दिया था। बिना उसकी स्वीकारोक्ति के उन्होंने लाइट भी बुझा दी थी। ... शायद इस तरह सचमुच सोच सकें कि वे नंदिता के साथ नहीं हैं।
नंदी को अच्छा लगा था अँधेरा किया जाना। इस तरह वह मुक्त थी, हनीफ सर की उपस्थिति से, उनके प्रश्नों से, जवाब देने की गैरजरूरी जरूरत से... वह मुक्त हो कर सोच सकती थी, अँधेरे में वह सब कुछ, तय कर सकती थी जो कुछ भी वह तय करना चाह रही थी। और उसे यह भय अब बिल्कुल नहीं था; सामने बैठा व्यक्ति उसके चेहरे की रेखाओं की जासूसी कर रहा है, पढ़ रहा है बहुत कुछ अनकहा भी। ...वह कहना चाहती थी उससे बहुत कुछ पर अपने तरीके से, अपने तयशुदा ढंग से... ऐसे-वैसे तो बिल्कुल भी नहीं... वर्ना इतना वक्त तो नहीं ही लगना था।
हाँ, वक्त गुजर गया था इस बीच कई दिनों का। हनीफ सर को लौटे पूरे दस दिन बीत गए थे और वह नहीं कह पाई थी कुछ भी। बार-बार तय करने के बावजूद... शब्द ही चुकने लगते उसके... तयशुदा शुरुआत का सिरा ही गुम हो जाता कहीं और वह फिर से बिला आवाज।
पर एक बात वह अच्छी तरह से समझ पाई थी गुजरे दस दिनों में। जिस बिना पर वह इन्कारती रही थी वसीम को। खुद वसीम, उसकी अम्मी और एमी से... वह वजह तो कहीं थी ही नहीं कि हनीफ सर के न होने पर जिस बंधन से वह खुद को जुड़ा पा रही थी, बँधा हुआ सा। उनके आते ही उसे लगा वह तो कोई गाँठ थी ही नहीं। एक धागा था जो उलझा हुआ था, यूँ हीं कहीं; जो अपने आप में ही सुलझ गया। बची थी बात नैतिकता की जिसके बंधन में बँधी हुई थी वह... वह चाहती तो खारिज कर देती इसे भी... पर उसने इसे खारिज नहीं किया था। अगर बरसों बरस साथ चला कोई रिश्ता यूँ ही सा हो गया था, तो क्षण के निमित्त बने रिश्ते का क्या ठिकाना। और वह तो तब तक वह खिंचाव भी नहीं महसूस कर पा रही थी वसीम के लिए, जो हनीफ सर के लिए दिनों-बरसों तक महसूसती रही थी वह। भले ही एमी उसे उम्र का तकाजा कह देती रही हो। वह तौलना चाहती थी वक्त के तराजू पर खुद को, अपने हर रिश्ते को... अपने से जुड़े हर व्यक्ति को। और इसके लिए उसे हिम्मत चाहिए थी, वक्त चाहिए था और अनुकूल परिस्थितियाँ भी।
उसने तय किया था तो बस इतना कि उसे कह देना होगा सब कुछ, फिर आगे उनकी मर्जी...
पर तय कर लेने भर से तो सब कुछ तय नहीं हो जाता न। बड़ी अजीब सी बात थी यह जब हनीफ सर नहीं थे, वसीम था साथ में तो वह हर पल हनीफ सर को याद करती रही थी। पर आज जब वो साथ थे, उनके होने न होने से उसे कोई भी फर्क नहीं पड़ रहा था। उसने देखा था चुपके से हनीफ सर सचमुच सो गए क्या और जब उसे सचमुच उनके सो जाने का भरोसा हो गया तो उसने मोबाइल ऑन कर के वसीम के मैसेज पढ़ने शुरू कर दिए थे... 'अगर मैंने किसी के होठ के पाटल कभी चूमे'... 'न आज लुत्फ कर इतना कि कल गुजर न सके'... 'गर बाजी इश्क की बाजी हो'... और अब... 'तू मेरी जान मुझे हैरतो हसरत से न देख...'
दरअसल उसे इच्छा तो यही हो रही थी कि वह वसीम की आवाज सुन पाए, देख पाए उसे। पर एसएमएस की तरह उसकी आवाज कहीं कैद नहीं थी उसकी मोबाइल में। उसकी इच्छा हुई थी वह वसीम को फोन लगाए और बात करे उससे। पर सामने हनीफ सर थे जो जाग भी सकते थे उसकी बातचीत से। दूसरे, मोबाइल में सिगनल भी बार-बार गायब हो जा रहा था सिरे से। उसने फिर खुद से ही कहा... और अगर सिगनल हो ही तो कौन सा बात कर ही लेती वह। कितनी-कितनी बार तो उसका मन हुआ है इस बीच कि वह वसीम को फोन करे, पर उसने किया कभी नहीं...। फिर आज... इसी सब से घबड़ाकर तो वह निकल पड़ी थी, चाहे हनीफ सर के साथ ही... कि अपना मन पहचान सके... अपनी इच्छा और खुशी जान सके...। पर वहाँ भी अभी सिर्फ घटाटोप था। - 'स्यादस्ति, स्यानास्ति, स्यादस्तिनास्ति, स्यादवक्तव्य, स्यादस्ति अवक्तव्य, स्यानास्ति अवक्तव्य, स्यादस्तिनास्ति अवक्तव्य... यानि संभवतः है, संभवतः नहीं है। संभवतः है, नहीं है। संभवतः कहा नहीं जा सकता, संभवतः है, कहा नहीं जा सकता, संभवतः नहीं है, कहा नहीं जा सकता। संभवतः है, नहीं है, कहा नहीं जा सकता। उसे वे पंक्तियाँ याद आईं जो उसने पिछले दिनों उस जैन धर्म की पुस्तक में पढ़ी थी। स्यादवाद या फिर 'सप्तभंगवाद' के नाम से। और वह फिर से उलझ गई थी शायद है, शायद नहीं है के इसी घटाटोप में।
रात पूरी गुजर गई थी इसी उहापोह में... जब हनीफ मियाँ सो कर उठे तो देखा नंदिता पहले से जागी हुई है। फिर थोड़ी देर बाद गौर किया उन्होंने, आँखें बिल्कुल लाल हैं उसकी... क्या सोई नहीं वह... क्या जागी रही सारी रात। उफ वे भी बहुत स्वार्थी हैं, उन्हें देखना तो चाहिए था जागकर कि नंदिता सोई कि नहीं... पर वे तो निश्चिंत हो कर सोते रहे... बहुत दिनों बाद उन्हें इतनी अच्छी नींद आई थी। एक तो बहुत थके हुए थे वे पिछले कई दिनों से। दूसरे नंदी को ले कर के एक अनजाना सा डर हमेशा बना रहता उनके मन में, जैसे कुछ बहुत बुरा होनेवाला हो, जैसे खो देनेवाले हों वे उसे... बहुत अजीब सी बात थी, नंदी से रिश्ते को जितने दिन-बरस हुए हों, वे लगातार यह सोचते रहते थे कि उन्हें नंदी से, इस रिश्ते से आजाद होना है और उतने ही आवेग से बँधते जाते थे इस बंधन में। न जाने कितनी बार उन्होंने यह तय किया होगा और कितनी बार... फिर हारकर उन्होंने यह सब सोचना ही छोड़ दिया था... फिर लौटे तो उसके विहेव से त्रस्त भी हुए थे और थोड़ा खुश भी... चलो वह खुद दूरी बना रही है। पर यह खयाल भी बस एक पल का ही था और फिर वे नंदी को खो देने के डर से सहम उठे थे। इसी डर से डरते हुए उन्होंने सोचा था कि अबकि नंदिता को अपने साथ ही ले चलेंगे। जब कहीं पीछे नहीं छूटी होगी वह तो शायद इतना डर भी नहीं हो उन्हें कि पता नहीं सब कुछ ठीक भी है या नहीं, पिछली बार की तरह। और वह बीमार भी तो पड़ जाती है। उन्होंने खुद से ही पर्दादारी करनी चाही... वही नंदिता उनके साथ थी तो फिर कैसी चिंता, सो बहुत गहरी नींद सोए थे ट्रेन में और बिल्कुल तरोताजा और बहुत खुश महसूस कर रहे थे खुद को। जबकि हमेशा उन्हें ट्रेन में नींद आती ही नहीं थी। जयपुर आने ही वाला था। उन्होंने नंदी से कहा था, जाओ फ्रेश हो आओ।
नंदी जब चली गई थी तो हौले से उन्होंने उसका मोबाइल उठाया था; रात पता नहीं किसने एसएमएस किया था। उन्हें उम्मीद थी एमीलिया ने ही किया होगा कुछ उलटी-सीधी पट्टी पढ़ाने की खातिर और नंदी इसीलिए सारी रात रोती या फिर जागती रही होगी। ...उन्हें एमी के बर्ताव से खीज होती। आखिर क्यों करती है वह ऐसी हरकतें... अब और कितने दिन। सब कुछ तो कर चुकी है वह उन लोगों को अलग करने की खातिर। फिर भी थकती तक नहीं वह... उन्होंने एसएमएस खोला था और निराश हुए थे, वे एमी के नहीं थे। पर निराशा के साथ एक गहरी चिंता भी समा गई थी उनके मन में। उनके मन के सारे ताजापन को ढकते हुए... निःसंदेह यह एमी नहीं थी, फिर इस तरह के एसएमएस भेजनेवाला और कौन था नंदी की जिंदगी में। और इनका मतलब... बात साफ थी सब कुछ एकतरफा है। मैसेज तो ऐसा ही कह रहे थे...। पर कौन और कब... वसीम पर जो हल्का-फुल्का अंदेशा था वह मिटने लगा था। वसीम इतना गंभीर, बाअदब और बाइल्म हो ही नहीं सकता। यही तो दुख था उनका कि वसीम उनके बिरसे का ही हकदार न हो, इल्म का भी हो... कौन-कौन... वे सोचते और परेशान होते रहे थे... उन्होंने तय किय था आखिरकार, नंदिता से पूछना बिल्कुल ठीक नहीं होगा... उसका मूड उखड़ जाएगा। और नंदिता खुद बता दे तो ठीक...
स्टेशन आ गया था। उन्होंने नंदिता से जबरन लेते हुए सारा सामान खुद उठा लिया था। उसकी चुप्पी की जिद को भी ठुकराते हुए। नंदिता देखे तो, अब भी उनमें कितनी ताकत है... कितने पौरुष से भरे हुए हैं वे, इस उम्र में भी...
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Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Post by kunal » 24 Sep 2017 16:19

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अम्मा ने एमीलिया का बदला हुआ चेहरा देखा था। दमक और ताजगी से भरा हुआ और वे डर गई थीं। यह भी अब... यूँ एमीलिया उनके बुलाने से आ तो गई थी पर आई भी तो ऐसे जैसे आई ही न हो। कुछ करने का जोश जो एमीलिया के स्वभाव की विशेषता थी वह गायब थी बिल्कुल सिरे से। वह खोई-खोई सी थी, बिल्कुल अपने आप में डूबी हुई। हरे-नीले-पीले रंगों से भरा उसका शरीर जैसे किसी और का हो चला था। उनकी एमी तो... वह जल्दबाजी में थी, बहुत-बहुत जल्दबाजी में। एमी तो यहाँ जब भी आती थी पूरे इत्मीनान से आती थी, कि यहाँ के लिए उसके पास हमेशा वक्त होता था। वही एमी आज...
वे डर गई थीं और सचमुच बहुत ज्यादा डर गई थीं...। वे एमी के भविष्य के लिए सहम गई थीं भीतर से... जबकि उन्हें तो खुश होना चाहिए था उसके चेहरे की दमक और जीवन में रंगों के इस आगमन पर... पर वे खुश होने के बजाय डर रही थीं तो आखिर क्यों... क्या इसलिए कि इस उम्र में उन्हें सारी जिम्मेदारियाँ खुद सँभालनी होंगी, कि अकेली पड़ जाएँगी वे, बिल्कुल अकेली। कि एमी अब उस दुनिया के दरवाजे पर जा खड़ी हुई है जहाँ के भीतर का तिलस्म उसे कैदी बना लेगा उसी दुनिया का। कि वह हँसे या रोए कि जीना होगा उसे उस चौखटे के भीतर ही... कि स्वार्थी हो चली थीं अम्मा इस उम्र में आकर। उन्हें क्षण भर को सारे विचारों से बिलगते हुए हँसी आई खुद के लिए खुद के इस संबोधन पर। कि अब तो खुद भी वो खुद को पुकारने लगी हैं इस संबोधन से... नाम जो कभी था उनका और अब लगभग गुम हो चला था - सिद्धा... नाम से मधुर लगता उन्हें यही संबोधन 'अम्मा'। वे आदी हो चली थीं अपने इस नए नाम की... अम्मा ने एमीलिया से कहा था तू रुक तो सकेगी दो-तीन दिन यहाँ, मुझे फंड के लिए कहीं बाहर जाना है। लौट आऊँगी दो-तीन दिनों में... एमीलिया ने बड़ी शाइस्तगी और सलीके से सिर हिलाया था - 'ना'। इस तरह कि अम्मा को बुरा न लगे... अम्मा जवाब पहले से ही जानती थी फिर भी एक क्षण को बुत सी हो गई थीं वो... फिर-फिर सोचा खुद को उबारने की खातिर। उनका एमीलिया पर अधिकार ही क्या है? किस हक से कह रही थी वो उसे यहाँ रुक जाने के लिए। उसके व्यक्तिगत काम भी तो हो सकते हैं और वो मना भी कर सकती है। यह सोच कर उन्हें तकलीफ क्यों होती है... वह यहाँ आई थी अपनी इच्छा से और आज जा भी सकती है... उन्हें धन्य मानना चाहिए कि इतना महत्व देती है वो उन्हें कि बुलाने पर चली आई... पर ये सब दिमाग के द्वारा दिए गए तर्क थे जो अम्मा के गले नहीं उतर रहे थे। बिल्कुल न चाहते हुए भी उन्होंने पूछा क्या कोई पर्सनल काम... एमीलिया ने फिर सिर हिला कर ही कहा था - 'हाँ'। उन्होंने रोका था जबरन खुद को यह पूछने से कि क्या काम... यह उनके हिस्से का सवाल नहीं है, बिल्कुल भी नहीं। और अगर उन्होंने पूछ ही लिया और एमीलिया चुप ही रह जाए तो... तो तू जाएगी अभी... कहते हुए उन्हें लगा था, एमीलिया कम से कम शाम तक तो रुकेगी ही हमेशा की तरह। बच्चों से हँसे-बोलेगी; अपनी पसंद का खाना बनवा कर खाएगी। और उसे देख-देख वे... पर नहीं एमी तो उठ खड़ी हुई थी। वे उसे जाते हुए देखती रही थीं चुपचाप... उसके जाने में किसी और के जाने की भी स्मृति थी... अपने अकेले पड़ जाने की वही पुरानी स्मृति। किसी पुराने गंध की तरह चिरपरिचित, चारों तरफ से उन्हें घेरती-घूरती।
उन्हें एमीलिया के जाने से उसके आने की याद आई थी। कभी एमीलिया आई थी अपने पत्रकार मित्रों की टोली के साथ। उन पर फीचर करने के लिए। तरह-तरह के सवालों से घिर गई थीं वे, जैसे कटघरे में उन्हें खड़ा कर दिया गया हो। पर ज्यादा सवाल व्यक्तिगत घेरे को छेड़ते-तोड़ते हुए। उनकी साँस सवालों के इस घेरे में घिर कर गले में ही जैसे तड़फड़ाने लगी थी। जरूर उनके चेहरे पर पसीने की बूँदें तैर आई होंगी। वह चुप सी दिखनेवाली लड़की बोली थी अचानक। उसी ने ही टोका था उन्हें। हम लोग ये करने नहीं आए। हमें फीचर करना था 'आनंदवन' पर न कि सिद्धा देवी के व्यक्तिगत जीवन पर... उन्होंने एमीलिया के वहाँ होने से सुकून की साँस ली थी... एमीलिया तभी से आने लगी थी वहाँ... पहले छठे-छमाहे फिर बराबर। फिर खुद ही बढ़कर उसने सारे हक अपना लिए थे और धीरे-धीरे बहुत सारे दायित्व भी। अम्मा के न होने पर तो वह उनके सारे दायित्व सँभालती ही होने पर भी बहुत सारे छिटपुट काम और निर्णय भी... बच्चे उनसे बहुत घुले-मिले हुए थे... जैसे कि उनकी बड़ी बहन या फिर दोस्त हो वह... अम्मा को चैन की साँस ही मिलती... खुश होतीं कि वे अकेली नहीं है, कोई है उनके साथ कि उनके बाद भी कोई हो सकता है उनका वारिस। वंशज न सही तो न सही... शायद वे स्वार्थी हो रही थीं, संकीर्ण भी, एमीलिया को लेकर... पर ऐसा था तो था... वही एमीलिया आज... उन्होंने ही कैसे सोचा था सब कुछ इतनी सहजता से। जो खुद आया था खुद जा भी तो सकता था। ऐसा क्यों नहीं सोच पाई थी वो। ऐसा उन्हें सोचना तो चाहिए था, पर एमीलिया ने कभी सोचने ही न दिया...
एमीलिया को जाते-जाते गुस्सा आ रहा था, खुद पर... यह कैसे पहरे लगा लेती है खुद वह अपने वजूद पर। पहले पापा... खैर वह उसके पिता थे उनका तो हक बनता था। पर जब उस कैद से जान छुड़ा कर वह भागी तो खुद ही लाद लिया सिर पर एक और बोझ नंदिता... और नंदिता के जाते-जाते यह अम्मा... इन्होंने तो जैसे उसे इस तरह लिया कि अपना कोई काम, अपनी कोई जिंदगी ही न हो उसकी। जब चाहा बुला लिया, जब चाहा काम थमा दिया। कभी पल भर को भी यह नहीं सोचा कि वह इतनी दूर से आती है उनके बुलाने पर थकी-हारी। उसके पास आने तक के पैसे भी हैं या नहीं...
यह उनका सिरदर्द थोड़े ही है... उनके हाथ उनके पिता की लंबी-चौड़ी संपत्ति है। अकेली वारिस हैं वो उसकी... पर वह... डॉक्टर पिता ने बमुश्किल उसके लिए एक फ्लैट खरीदा था... कुढ़-काढ़ कर कि वहाँ रहने की जरूरत ही क्या है...पर इसी से उसका बोझ कुछ कम गया था, चिंताएँ भी... और इतना सब करने के बाद भी उनकी खिट-पिट। यह काम तो बचा ही रह गया... वह तो बिल्कुल हुआ ही नहीं... क्या समझती हैं वे उसे।
उसी की गलती है, कहने को नए जमाने की एक आजाद खयाल लड़की है वो... पर कोई न कोई बंधन, कोई न कोई आश्रय चाहिए ही। अब होते-होते यह आश्रय भले ही ऐसा हो ले, इतना बड़ा कि उसकी छाँव के बजाय पक्षी आश्रयी को ही अपना घर मानने लगे। एमीलिया को अपने इस बेतुके उपमान पर खुद ही हँसी आ गई थी। ... कैसे ऊलजलूल सोचती है वह भी। और वह तो ऐसा नहीं सोचती थी कभी। ऐसे तो नंदी बोलती थी और सोचती भी। तो क्या नंदी की वेश-भूषा अख्तियार करते ही वह नंदी जैसी हो ली है। कि प्रेम में ऐसे ही हो जाते हैं लोग... स्वार्थी और अंधे।
उसने कैसे कह दिया अम्मा से कि नहीं रुकेगी वह। नंदी के चले जाने के बाद का सारा सूनापन वह यहीं आनंदवन में ही तो धोती थी। अम्मा की आँखों के प्यार और वात्सल्य, बच्चों के बीच के खेलकूद और धमाचौकड़ी में। अम्मा ने कभी लगने ही नहीं दिया कि वह उनकी बच्ची नहीं है। और वह... वसीम से आज ही तो मिली थी वह, और अगर दो-तीन दिन बाद मिल लेती तो क्या होता... पर नहीं उसे तो जैसे लत सी हो गई है कि वसीम से मिलना है, उसे सांत्वना-स्नेह देना है। कि इसी बहाने जगह बनानी है अपने लिए उसके दिल में।
अम्मा का उतरा हुआ चेहरा बार-बार उसकी निगाहों में आ रहा था और खुद पर शर्मिंदा हुई जा रही थी वह... क्यों चाहती है वह वसीम से मिलना। अपने लिए उसके दिल में जगह बनाना। जबकि जानती है वह कि वसीम नंदी को चाहता है बेपनाह... फिर भी... क्या वह इस तरह नंदी से बदला लेना चाहती है, खुद को छोड़े जाने का बदला... कि वह उसे जैसे हनीफ सर के लिए छोड़कर चल दी थी उसे अकेला करके, वह भी वैसे ही... अपने खयालों के आग से उसका कंठ जलने लगा था। जैसे कोई आग का गोला अटका हो वहाँ। जिसे वह न निगल पा रही हो न उगल। उसने पर्स खोला था। पानी का बोतल खाली था। आसपास कोई दुकान तक नहीं थी... वह जैसे किसी तर्क की तलाश में थी, जिससे वह खुद के द्वारा खुद पर लगाए गए इन इल्जामों से मुक्ति पा सके। ... वह पूरी ताकत से ढूँढ़ रही थी सारे कारणों को...
ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वह अतीत के उस टीले पर आ पहुँची थी जहाँ एक कारण तो था। पता नहीं यह कारण था कि महज एक मनबहलाव। पर जैसे-जैसे याद आ रहा था सब कुछ उसका सूखा कंठ हल्का-हल्का गीला होने लगा था। जैसे किसी ने तरावट की एक हल्की परत बिछा दी हो उसमें, चारों ओर।
अम्मा को लगा था जैसे एमी नहीं शिखा जा रही हो और वे उसे रोक पाने में असमर्थ हों बिल्कुल... तो क्या आज भी वही... चारा क्या रह गया है। क्या एमीलिया भी पलट कर नहीं देखेगी उनके और आनंदवन के भीतर शिखा की ही तरह...? उसकी जिंदगी में सब ऐसे अचानक ही क्यों आते हैं और फिर चल भी देते हैं अचानक... बच्चे जब जाते हैं या कि जब उन्हें गोद लेने वालों को देती हैं वे तब भी बरसों तक कलेजा कचोटता रहता है उनका। उनकी एक-एक स्मृति... कहती है 'दो ही मत किसी को, वापस ले आओ उन्हें' पर उनका विवेक उन्हें रोकता है। बच्चों के आँसुओं की अनदेखी कर जाती हैं वे तो कैसे, यह सिर्फ वे ही जानती हैं... अपनी उम्र... पैसों या फिर फंड की कमी... वे ही जानती हैं कैसे मैनेज कर रही हैं वे सब कुछ... उनके बाद...? वे डर जाती हैं यह सोचकर... और एक बच्चे के भविष्य के लिए निश्चिंत होने की सोच से... और बच्चे ही क्या... सुगंध का चले जाना... जिसे चले जाना भी क्या कहें उससे पहले तो वे ही चली आई थीं सुगंध की जिंदगी से... फिर भी... वही अकेलापन... तिल-तिल का अकेलापन। विदेह होना चाहती हैं वे... पहले भी होना चाहती थी पर पहली बार सुगंध ने... फिर शिखा ने... और अब एमीलिया ने उनके उस अभेद्य घेरे को तोड़ा था... और फिर-फिर चल दिए थे सब... उनकी कमजोरी पर हँसते हुए...
सुगंध के लिए पिता से लड़ी थीं वे... उस पिता से जिसकी जान उन्हीं में बसती थी। पिता जमींदार घराने से थे और उन्हें एक संगीत शिक्षक कैसे भा सकता था अपनी बच्ची के लिए। उस बच्ची के लिए जिसके लिए बड़े-बड़े सपने देखे थे उन्होंने। मृदु-मधुर सा वह शिक्षक कौन सी सुरक्षा दे पाएगा... कौन सा संरक्षण... पिता अक्सर कहते थे... पर उन्होंने कब माना था पिता का कहा... एक दिन मंदिर में छिप-छिपा कर शादी की और पिता से आशीर्वाद लेने चली आई थी। पिता निकले ही नहीं थे अपने कमरे से। वे बहुत घबड़ाई थी पिता ने कुछ कर लिया तो... वे पिता से मिले बगैर नहीं जाना चाहती थीं पर जाना पड़ा था उन्हें। सुगंध गुस्से में थे। मृदु-मधुर सुगंध गुस्से में... अब और कितना इंतजार करोगी? वे उनका हाथ खींचकर निकल पड़े थे... तभी जाना था उन्होंने लड़की होने का सही अर्थ... कि तभी समझी थी उन्होंने पराएपन की वह परिभाषा जो एक लड़की को बचपन से सुननी पड़ती है।
वे जी ही तो रही थी बरस-दर-बरस पिता से मिले बगैर भी... पर पिता की कमी थी तो थी। वे पिता जो जीवन में हर कदम पर तो क्या घर मे हर कदम पर उसके सामने खड़े होते थे उसे समझाने, सहलाने और थामने के लिए... 'सिद्धि ऐसे कैसे चलती हो, गिर जाओगी', ' सिद्धि पढ़ाई करो'... 'सिद्धि बारिश में भीगो मत, बीमार पड़ जाओगी'... पर अब कहाँ थे पिता... कहाँ था कोई उसकी परवाह करनेवाला... सुगंध थे, प्यार भी करती थे उससे बहुत। पर वे पति थे, पिता नहीं... उसने खुद भी अपनी परवाह छोड़ दी थी... विदेह होना है उसे, उसने तभी पहली बार सोचा था। इसीलिए तो खासकर कि एक बच्चे के लिए जो चीख-पुकार मची रहती थी उस घर में उसे न सुनाई पड़े... बिल्कुल नहीं। उसकी ऊपरी खोल से ही टकराकर लौट जाए। वह नहीं कहना चाहती थी किसी से। सुगंध खुद ही बच्चे थे भीतर से... फिर बच्चा कहाँ से लाए वह। वह प्यार करती थी फिर भी सुगंध, से इसीलिए और भी नहीं कह पाती थी कुछ किसी से। पर ऐसे में उसे अक्सर लगता पिता जानते-समझते थे क्या यह सब कुछ... नहीं तो पिता तो बहुत संवेदनशील थे, कला-साहित्य का सम्मान करनेवाले फिर उन्हें सुगंध से परेशानी थी तो क्यों...?
ऐसे में ही नन्हीं शिखा को कोई डाल गया था दरवाजे। वह हुलस पड़ी थी, उसका परिवार पूरा हुआ। उसकी हुलस में सुगंध भी हुलसे थे। पर जब घर में कोहराम मचने लगा, वे किनारे जा खड़े हुए थे, हमेशा की तरह। उसे बहुत ज्यादा खला था यह सब कुछ... इतना ज्यादा तो पहली बार। जब लोग उसे बच्चा न होने के लिए ताना देते और सुगंध चुपचाप सुनते यह सब कुछ तो उसे उतना बुरा नहीं लगता था। उनकी मजबूरी जानती थी वह। पर आज... क्यों वे उसे हमेशा अकेला छोड़ देते थे सब के बीच खासकर के, जबकि उन्हीं के लिए तो छोड़कर आई थी वह सब कुछ। घर, परिवार, पिता, पैसा सब... वह उनके भीतर के कलाकार पर रीझ गई थी। उस अल्हड़पन में ही जब वे उसे संगीत सिखाने आते थे... लोगबाग सच ही कहते हैं क्या कि कलाकार होना स्त्रैण होना होता है; स्त्रैण मतलब कमजोर होना, हिम्मत न दिखाना। स्त्रैण होना गर गाली है तो स्त्री होना भी...। उसने सोचा वह तो कतनी हिम्मत से जूझती-झेलती रही है सब कुछ।; पिता के घर हल्की सी ठेस भी लग जाने पर आसमान सिर पर उठा लेनेवाली लड़की। वह स्त्री होने को कमजोर और शक्तिहीन होना नहीं मानना या बनाना चाहती थी। वह उस नन्हीं सी बच्ची शिखा को लेकर पिता के घर चली आई थी। सब चिल्लाते रह गए थे... पर सुगंध... वे तब भी चुप थे।
और तब से न सिर्फ शिखा को पाला-प्यार किय था। दादा के द्वारा अनाथालय और स्कूल को दी गई जमीन जो तब जमींदारी प्रथा टूटने पर जमीन को बचाने के लिए दी गई थी, में आनंदवन विधिवत और बड़े स्तर पर चला कर भी। जिम्मेदारियाँ बढ़ गई थीं अचानक; नन्हीं शिखा, बूढ़े पिता, स्कूल और आनंदवन... पर आनंदवन में जो कि तब सिर्फ अनाथालय था, बच्चे नाम के ही थे। वह तो उसके प्यार और देखभाल का असर है कि...
बच्चों की संख्या बढ़ी थी स्कूल में, पर पहले सुगंध चले गए थे। फिर पिता उस शोक में डूबी को छोड़कर। फिर उसके कुछ दिनों के बाद ही शिखा... प्रेम में ऐसा ही होता है; उतावली इतनी कि देखना-सुनना सब बंद हो जाए। तुरंत की तुरंत घर में हुइ दो-दो मौतें भी उसे सब्र नहीं करने दे रही थी थोड़ा, माँ का अकेलापन भी नहीं। उसने खुद-ब-खुद शिखा को विदा कर दिया था कि उसकी तरह न जाए वह... उसकी तरह ही न कट जाए अपने पुराने घर से... उसने शिखा से कहा था - शिखा, मेरे बाद यह सब तुम्हारी जिम्मेदारी है। कहो कि तुम मुझसे या इस सबसे एकदम से नाता नहीं तोड़ लोगी... कि निकालोगी कुछ समय हमारे लिए भी... रोती आँखों और हँसते चेहरेवाली शिखा ने कहा था - कैसी बात करती हो माँ, यह भी कोई कहने की बात है...
पर वह कहना कहना ही रह गया था... शिखा घर आना तो दूर उसके सामने पड़ने से भी कतराने लगी थी। वे जिस शादी-ब्याह में भी जाती शिखा वहाँ नहीं आती। उनके पूछने और अपने हाँ कहने के बावजूद... वे कुछ भी नहीं कहती थीं... वे जानती थी सब... शिखा के चेहरे में उन्हें अपना पुराना चेहरा दिख जाता था, विवश सा। चाहते न चाहते... हालाँकि वे खुद से ही कहती थी बार-बार, भरोसा दिलाती रहती अपने आपको... वह सुखी है... बहुत सुखी। पर हर बार मन न जाने इस बात को मानने से क्यों इन्कार कर देता...
17
वे जब ट्रेन से उतरे सुबह होने-होने को ही थी। लोगबाग की आमदरफ्त बहुत धीमी-धीमी। नंदिता ने सोचा दिल्ली तो इस वक्त तक... फिर उसने पल भर को सोचा दिल्ली सोती ही कब है... सोते-सोते वक्त तक वही हलचल और आँख खुलते-खुलते वही शोरगुल... शहर ऊँघा-ऊँघा सा था। पहाड़ों के पाँव में थककर सोया जयपुर ऐसा लगा उसे मानो किसी बच्चे को घुघुआ मन्ना करते-करते ही नींद आ गई हो और थकी हारी माँ की आँखें भी झिप गई हों थोड़ी देर को। उसे अभी-अभी ध्यान आया हनीफ सर कुछ कह रहे थे। उसने मन को एकाग्र किया...'तीन ओर से विशाल पहाड़ियों से घिरे राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगरी जयपुर को सवाई जयसिंह द्वितीय ने बनवाया था। सवाई जयसिंह एक चतुर प्रशासक, कुशल योद्धा और ज्योतिर्विज्ञानी भी थे। उनकी इच्छा थी कि वो एक ऐसे नगर का की स्थापना कर सकें अपनी राजधानी के रूप में जो पूरे विश्व में अद्वितीय हो। इसीलिए उन्होंने जयपुर का निर्माण करते वक्त अनेक यूरोपीय नगरों के नक्शों का अध्ययन किया था। और फिर उसी सुनियोजितता से इस नगर का निर्माण भी कराया। पूरा का पूरा शहर चारों तरफ से लगभग 20 फीट ऊँचे और 9 फीट चौड़े परकोटे से घिरा है। हालाँकि आजादी के बाद अन्य शहरों की तरह इस शहर का भी कायापलट हुआ और अब इस परकोटे के बाहर भी नई-नई कालोनियां विस्तार ले रही हैं। लेकिन अब भी यह शहर मूलतः नौ आयताकार खंडों में विभक्त है। इस शहर में प्रवेश करने के लिए आठ प्रवेश द्वार हैं जिनमें मुख्य हैं - अजमेरी गेट, सांगनेरी दरवाजा, चाँद पोल और पाट दरवाजा।
नंदिता सुन रही थी चुपचाप। हनीफ सर खुद में डूबे हुए से बता रहे थे उसे पर उसने आज पहली बार सोचा था कि यह आदमी ज्ञानी हो सकता है पर उससे भी ज्यादा यह अपने ज्ञान का आतंक या कहें कि रोब दूसरों पर जमाना चाहता है... नंदी ने झटके में सोच लिया था यह सब। सोच पर उसका वश नहीं था बिल्कुल। पर सोच कर ही खुद पर शर्मसार हो चली थी वह। इतने नम्र और विनीत हैं हनीफ सर और उनके बारे में किस-किस तरह से सोचने लगी है वह। क्या जब प्यार मरने लगे ऐसा ही महसूसने लगते हैं हम...? तो क्या सचमुच मर रहा था उनका प्यार... पर अपनी तरफ से वह हर कोशिश करना चाहती थी उसे जिंदा रखने के लिए...। यह आखिरी कोशिश भी। इसी खातिर तो वह चुपचाप चली आई थी। शादी प्रतिबद्धता हो सकती है, प्यार नहीं। और प्रतिबद्ध नहीं होना शायद सबसे बड़ी प्रतिबद्धता है। इसी प्रतिबद्धता से बँधी हुई वह वसीम के वजूद से भी इन्कारती रही है, प्यार तो बहुत दूर की बात है।
होटल आ गया था। हनीफ सर ने एक बार फिर सारे सामान खुद ही उठा लिए। सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते डरी थी वह, सर ने कहीं एक ही कमरा तो बुक नहीं करवाया... फिर उसे खुद पर हँसी आई थी। एक ही कमरा है उसका, जहाँ वह उनके साथ घंटों रहती आई है, बंद किंवाड़ और खिड़कियोंवाले जाड़े के धुर ठंडे दिनों में भी... और यह तो मार्च का महीना था। सीजन के कारण होटल की लाबी में भी लोग ही लोग दिख रहे थे। वह न चाहे तो... फिर उसने खुद ही सोचा था पहले जैसी बात होती तो वह मनाती, ईश्वर करें कमरा एक ही हो... पर कमरे दो थे। गलियारे में पहुँच कर सर ने उसे उसके कमरे की चाबी थमा दी थी। फ्रेश हो लो फिर बातें करते हैं... आज तो वैसे भी सेमिनार में काफी वक्त लगेगा। तुम चाहो तो आराम कर सकती हो, या फिर कुछ और शॉपिंग-वॉपिंग... जैसी तुम्हारी इच्छा। मैं खाना-नाश्ता सबके लिए कहता जाऊँगा। कल हम लोग जयपुर घूमेंगे। और... कल तो मुझे बस दो घंटों का काम है... और फिर उसके बाद तो एक सप्ताह हम यही हैं। आराम से घूमेंगे, खूब बातें करेंगे... उन्होंने उसके बालों को हौले से सहलाया था और मुड़ गए थे अपने कमरे की तरफ।
उसे अच्छा लगा था, आज दिन भर तो नहीं झेलना पड़ेगा उसे सर को। 'झेलना' शब्द कब और कहाँ से आ गया था उनके बीच, वह जानती तो थी पर मानना नहीं चाहती थी... अब सब कुछ तो तभी सहज हो सकता है जब वह सर को सब बता दे... और सर...
अपने कमरे में बिछावन पर वह पसर सी गई है। रात की जागी आँखें उनींदी सी हैं। बदन इतना टूट क्यों रहा है आखिर... वह उठकर दरवाजा लॉक करने की हिम्मत तक नहीं कर पा रही। ...वेटर आया था, नाश्ता ले कर। काली कॉफी, चीज सैंडविच और पाश्ता... उसने भर नजर देखा था। इतनी सारी चीजें और वह भी नाश्ते में। सर ने ही ऑर्डर किया होगा उसके लिए। उसकी पसंद की चीजें... कितना खयाल रखते हैं वह उसका... उसने अभी उठने की कोशिश ही की थी कि एक बार फिर घंटी बजी, सामने सर थे... फ्रेश, ताजादम... सेमिनार के लिए बिल्कुल रेडी... तुम अभी तक तैयार नहीं हुई... चलो नाश्ता तो कर लो वरना ठंडा हो जाएगा सब कुछ। हाथ मुँह धो कर आ जाओ। वे प्लेट में उसके लिए नाश्ता निकालने लगे तो उसे उठना ही पड़ा... वे फिर से बोल रहे थे... पहले जैसे दुलार के शब्दों में ही... सो लेना, यह नाश्ता भी फिनिश हो जाएगा और मैं भी चला जाऊँगा अभी-अभी... फिर सारा दिन जो चाहो सो करो। वे सामने बैठे-बैठे उसे खाते देख रहे हैं। उसे देख-देख तृप्त हो रहे हैं। उनके चेहरे की रेखाएँ कह रही हैं यह... नंदी झेंप उठती है... झेंप कर प्लेट ढककर रहना चाहती है... वे फिक्रमंद होकर टोकते हैं, अरे नाश्ता तो पूरा खत्म करो... प्लेट में कुछ भी नहीं छोड़ते... नंदी ने आगे अनकहा ही सुन लिया... 'बैड मैनर'... जैसे किसी बच्चे को फुसलाकर खिला रहे हों वो... वसीम और नसीम को शायद ऐसे ही समझाते रहे हों वे छुटपन में... नंदी से तो भी कुछ ऐसे ही ट्रीट किया करते हैं... फिर तो नंदी को सब कुछ खाना ही था जबरन।
नंदी का जी हल्का हुआ था उनके चले जाने से। सबसे पहले वह सचमुच सोना चाहती थी। उसने कमरा अंदर से लॉक किया, बत्ती बुझाई और सोने के उपक्रम में लग गई। थकान थी, सचमुच बहुत थी पर घंटों लेटे रहने के बाद उसने महसूस किया नींद कहीं भी नहीं थी उसकी आँखों के इर्द-गिर्द। कुछ उलझाव, कुछ बेचैनियाँ घेरा डाले थीं उसके चारो तरफ, जो न जाने कब जानेवाली थी। उसने एक बार फिर वसीम के सारे एसएमएस को पढ़ा, पढ़ती रही... फिर सोचा यूँ इन्हें पढ़-पढ़ कर भी क्या कर लेगी वह, वसीम ने उसे एक बार भी फोन नहीं किया, उस दिन के बाद। और कल रात से तो उसका कोई मैसेज भी नहीं आया। उसने मन बदलने के लिए जैन धर्मवाली किताब निकाली। इसे ही पढ़ेगी वह, शायद इसी में वक्त कट जाए। उसके पिता भले ही जैन रहे हों पर माँ तो पंडित थी... और घर में तो माँ का ही प्रभाव था। वहाँ पूजा-पाठ होते। यज्ञ-हवन होते। पिता न तो इसके लिए कभी माँ को मना ही करते न उसमें सम्मिलित ही होते। अन्य दंपत्तियों की तरह उसने माँ और पिता को कभी साथ-साथ बैठ कर पूजा-पाठ करते नहीं देखा था। माँ अकेली ही बैठतीं। उपवास अकेला उन्हीं का होता। माँ ने भी पिता को कभी इस सब के लिए बाध्य नहीं किया। अगर कोई सार्वजनिक अनुष्ठान हुआ तो पिता अन्य जिम्मेदारियाँ और आनेवालों को सँभालते। उसे छुटपन में यह अजीब लगता। पर उन दोनों के बीच का यह सामंजस्य और एक दूसरे को अपने ढंग से जिंदगी जीने की आजादी देने का यह भाव आज उसे बहुत भला लगता।
हाँ, उसने अपने पिता को कभी-कभी कुछ किताबें पढ़ते द्देखा था। तीर्थंकरों की मूर्तियाँ भी थी उनके कमरे में। पर इतना ही। इसीलिए उसका झुकाव पिता की तरफ ज्यादा रहा। वह माँ के कहने पर सिर जरूर झुका लेती, पर व्रत, पूजा, उपवास और दूसरे आडंबर उसको भाए नहीं... हाँ अब, जब उसने जैन धर्म में दिलचस्पी लेना शुरू किया तो हनीफ सर ने ये किताबें उसको लाकर थमाई थी।
उसने किताब खोल ली थी और यूँ ही पहले की तरह उसे जहाँ-तहाँ से उलट रही थी। कहीं तो मन थमे... रम जाए... उसने पढ़कर यह महसूस किया कि जैन धर्म में व्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर है। इस धर्म के अनुसार संसार में प्रत्येक व्यक्ति (नर और नारी) मोक्ष (सर्वोच्च) का हकदार है। वैदिक धर्म की तरह यहाँ नारी हीन या दलित नहीं... इस धर्म में स्त्रियों ने प्रमुख पद भी प्राप्त किए हैं। महासती चंदना स्त्रियों के जैन संघ की अध्यक्षा हुई और मगध साम्राज्ञी चेलन्ना श्राविका संघ की नेत्री बनीं। श्रावक-श्राविका यानि गृहस्थ धर्म में रहते हुए बगैर भिक्षु बने भी जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति का रास्ता। उसने फिर पन्नों को आगे-पीछे पलट कर देखना शुरू किया।
इस धर्म ने ब्राह्मणों की सर्वोच्चता का विरोध किया जिसमें यज्ञों की उपयोगिता और कर्मकांडों के उद्देश्यों पर भी गंभीर चोट किया गया था। निवृत्ति की भावना यहाँ मुख्य थी। निवृत्ति अर्थात विषय-वासना, धन, शक्ति, इच्छाओं का त्याग। यही सर्वोच्च को पाने की सीढ़ी थी। उसने फिर खुद से साफ किया ईश्वर यहाँ नहीं थे, गुरु या कि तीर्थंकर थे। सृष्टि अनादिकाल से ऐसे ही चली आ रही है और एक शाश्वत नियम के अनुसार वह चलती है। जिसमें उत्थान-पतन का चक्र चलता रहता है। इसके नियंता की खोज व्यर्थ है। आत्मवादिता जैन धर्म का मूल है। आत्मा अजर है, अमर है, सत्य है। इसका सृष्टिकर्ता नहीं। व्यक्ति वही परम है जो काम, लोभ, क्रोध और अन्य वासना और ईच्चाओं से ऊपर उठ जाए। वैदिक धर्म के विरुद्ध जैन धर्म कहता है सजीव-निर्जीव सब में आत्मा है। और आत्मा शरीर से भिन्न होती है। आत्मा किसी परमसत्ता का अंश नहीं। वैदिक के ब्रह्म के अंश के खंडन में वे कहते हैं और निवृत्ति यानी परम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जो रास्ता है वह जैन धर्म के त्रिरत्नों सम्यक विश्वास, सम्यक ज्ञान सम्यक आचरण होकर जाता है।
उसने सोचा था पल भर को, कितनी विरोधी पृष्ठभूमि के थे दोनों - उसके माता-पिता यानी इशिता पंडित और आनंद जैन... फिर भी कितनी मजबूत थी उनके प्यार की डोर; कितना मीठा और सुचारु सा चलता उनका जीवन था... क्या उनके संस्कार, उनकी जीवन पद्धतियाँ और उनके सोच आपस में टकराते नहीं थे...? नहीं टकराते थे तो आखिर क्यों? क्या प्रेम वह डोर होती है जो बाँध लेती है हमें एक-दूसरे से उसकी अच्छाइयों-बुराइयों, कमी-खूबी और उसकी पूर्णसत्ता से... क्या वह और हनीफ सर कभी एक साथ जीते तो वैसे ही जीते...? हालाँकि यह कल्पना बेकार थी। उनके रिश्ते में साथ जीने-मरने का वायदा कभी आया ही नहीं था। तो वसीम... वह सिर झटक कर उस विचार को ही परे फेंकती है... और एक नई सोच, एक नया तर्क ढूँढ़ती है मनफेर के लिए। यदि प्रेम में ऐसा ही होता तो फिर दिन-रात के क्लेश... कितने-कितने लोगों को तो देखा है उसने... लड़ाई-झगड़े, तलाक और दूरियों के ये कितने किस्से रोज-रोज कहाँ से पैदा होते हैं... वह किताब बंद कर देती है, बस इतना ही। वह उठ खड़ी होती है, ऊब चुकी है वह बैठे-बैठे। थोड़ा घूम-फिर कर ही आती है। अकेले...? तो क्या हुआ... कब वह अपनी सोच से उबरेगी। वह चेंज ही कर रही होती है कि तभी दरवाजे की घंटी बजती है... खाना है... पर उसे तो खाने की तनिक भी इच्छा नहीं। वह मना कर देती है। पूछती है वेटर से... पास में कोई अच्छा बाजार है...? हाँ, मार्केट पास ही है, बापू बाजार। सारी चीजें मिल जाएँगी वहाँ। आप चाहें तो पैदल भी जा सकती हैं, नहीं तो रिक्शा कर लें। बमुश्किल एक किलोमीटर है, सांगनेरी गेट... रिसेप्शन पर कमरे की चाबी रखते हुए वह निकल पड़ी थी।
बाजार बहुत खुशरंग और खुशनुमा दिख रह था। तरह-तरह के मन ललचाते सामान। उसका मन उकसाने के लिए तो बहुत सारी चीजें... बँधेज के सलवार-कमीज के पीस, दुपट्टे। सूती और जरीदार लहँगे-काँचली। गोटा-किनारियाँ। लाख और लकड़ी के कड़े। हाथी दाँत और लाख के खिलौने... कढ़ाईवाली जूतियाँ, कपड़े और चमड़े के पर्स... उसे दिल्ली के जनपथ और सरोजिनी नगर जैसी जगहों की याद हो आई, लेकिन याद भर ही। साथ में उसे यह भी लगा कि दोनों जगहें इतनी खुली-खुली और तरतीबवार नहीं है। उसे यह भी अच्छा लगा कि चीजों की कीमतें भी वाजिब थीं। वहाँ की तरह मोल-भाव की भी जरूरत नहीं। ऐसा पहली बार हुआ था कि नंदिता किसी ऐसी जगह पर थी और खरीदने से ज्यादा देखने में दिलचस्पी ले रही थी... बहुत सोच-समझ कर एमी के लिए उसने कुछ कुर्ते लिए। खुद के लिए बंधेज की कुछ सलवार-कमीजें राजस्थानी काम के कपड़े के बने दो पर्स भी, जो उन कपड़ों और उसकी जींस के साथ भी जँचे। अपने और एमी के लिए दो मोजरी भी। खरीदारी से अब उसका मन भर चुका था। कारण कि उसका पर्स अब काफी हल्का हो चुका था। वैसे भी यह महीने का अंतिम सप्ताह था और घर से आए पैसे लगभग खत्म होने को थे। हमेशा की तरह इस खूबसूरत बाजार में आ कर भी उसका मन पहले की तरह हल्का नहीं हुआ था। शायद पहले की तरह कुछ भी नहीं रह गया था उसकी जिंदगी में... एक दुविधा, एक परेशानी हमेशा चलती रहती उसके साथ-साथ जो निश्चिंतता से उसे जीने नहीं देती थी किसी भी पल।
वह लौटी तो बस दिन के ढाई ही बजे थे। उसने सोचा अभी से ही उसे अकेलापन सहना होगा,। पर चारा भी नहीं था कोई और वह बहुत थक चुकी थी। चाभी ले कर अभी उसने सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू ही की थी कि ऊपर से कुर्ते-पायजामे में उतरते हनीफ सर उसे दिखे थे। उसका मन अचानक खुशी से छलक पड़ा। उसे अपनी इस खुशी पर खुद ही हैरत हो रही थी। इसमें खुश होने की ऐसी कौन सी बात थी। कई बार कुछ बातें अकारण भी होती या घटती हैं... पर यह अकारण घटी कोई घटना नहीं थी... सच तो यह होता है कि कई बार हम खुद को समझने में भी गलती कर जाते हैं। हम जो सोचते हैं कि हम हैं वैसे होते नहीं। कि चीजें भी वैसी हमें नहीं लगती जैसी वे ठीक-ठीक होती हैं... सर को देख कर उसे ऐसा ही लगा था उस वक्त... उसने हनीफ सर को फिर गौर से देखा था। उनके हाथ में कुछ किताबें थीं, जिन पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था - मेवाड़, बूंदी और किशनगढ़ शैली... सर इस वक्त कहाँ जा रहे थे... वह सोच ही रही थी कि उन्होंने पूछा था, तुमने खा लिया... नहीं... तो चलो... और वे डाइनिंग हॉल की तरफ बढ़ चले थे... खाते वक्त ही तय हुआ था, अभी वक्त है और वे लोग कहीं घूम कर आ सकते हैं... खाते-खाते तय हुआ था, 'आमेर का किला'... 'हवा महल' और 'जल महल' भी रास्ते में ही पड़े शायद।
हमेशा की तरह सर उसे रास्ते में बताते रहे थे - आमेर जयपुर रियासत की पुरानी राजधानी है; राजधानी जयपुर के शहर में तब्दील होने के पहले की राजधानी। शहर से 11 किमी दूर का भव्य पहाड़ी क्षेत्र काली खोह नामक पहाड़ी श्रृंखला से घिरा हुआ है। इसका निर्माण राजा मानसिंह ने करवाना प्रारंभ किया था और लगभग सौ वर्षों के बाद सवाई जयसिंह ने पूरा करवाया। इसकी भव्यता का अंदाजा इस से भी लगाया जा सकता है कि इसे पूर्ण होने में 100 वर्ष लग गए। वह थोड़ी निश्चिंत सी हो चुकी थी। टैक्सी में लगभग हनीफ सर से सट कर बैठी वह, अपना सिर उनकी कुहनियों पर डाले सब सुन रही थी, पहले की ही तरह निश्छल भाव से। कि जैसे बीच के समय का सब कुछ मिट चुका था अचानक। यह कैसे वह नहीं जानती थी। पर जो कुछ था उसे बहुत अच्छा लग रहा था। ऐसा पहले सिर्फ उसने अपनी कल्पनाओं में देखा या चाहा था। कल्पनाओं का सच हो जाना किसे अच्छा नहीं लगता, सो उसे भी लग रहा था। अपने कमरे से बाहर वह हनीफ सर के साथ कभी इस तरह नहीं रही। यह एक सुखद अहसास था।
रास्ते में जब हवा महल आया उसने टैक्सी रुकवा ली थी। देर हो जाएगी कल फिर... कहते-कहते भी सर उतर ही चुके थे उसके पीछे-पीछे। यह सम्मोहन था उसका या कि फिर उस महल का। पर वह उदास हुई थी यह जान कर कि महल इन दिनों बंद है... यहाँ सुधार का काम चल रहा है...। वह निराश सी गाड़ी में आकर बैठी तो सर ने उसका सिर सहलाया था बिल्कुल बच्चों की तरह... कोई बात नहीं... आगे फिर कभी... हम अंतिम बार थोड़े ही आए हैं...
उदास हो रही नंदिता को जैसे बहला रहे थे वे... जानती हो, हवा महल को देखकर एविन एर्निल्ड ने कहा था 'अलादीन का जादुई चिराग भी इससे शानदार महल नहीं बना सकता था। लाल पत्थर से बना यह भवन शिल्पकला के लिए भी एक चुनौती है। पिरामिड के आकार के बने इस पाँचमंजिला भवन में अर्द्ध अष्टकोण में बाहर निकलती हुई वो जो जालीदार खिड़कियाँ देख रही हो न तुम वो रानियों-राजकुमारियों के लिए बनी थीं कि वे उससे ही सही राजोत्सव और राजा की सवारी का निकलना देख सकें। उसे याद आया लाल किले के मीना बाजार में वसीम का यह कहना कि - 'उन पर किसी दूसरे पुरुष की छाया भी न पड़ सके... कि उनकी सारी भौतिक जरूरतें उनकी बंद दुनिया में ही पूरी हो जायँ...' एक क्षण को उसका मन विचलित हो उठा था, वह तनकर बैठ गई थी, हनीफ सर की पहुँच से अलग। विचलन किस बात से था वह तय नहीं कर पा रही थी... यूँ वसीम की स्मृति से या कि उसकी स्मृति के साथ अपने प्रेम में कैदी और गुलाम हो जाने की स्मृति से...
जल महल आ गया था। टैक्सी धीमी हुई थी वहाँ। हनीफ सर ने उसके कंधों को छुआ था। देखो इसे... चारों तरफ से जल से घिरा यह महल स्थापत्यकला का अद्भुत नमूना है जो कभी ग्रीष्मकाल में जयपुर के राजाओं का निवास स्थल था... उसने क्षण भर को यह कल्पना किया कि वह और हनीफ सर एक साथ हैं उस महल में... और इस कल्पना के साथ ही खुद से एक वायदा भी कि सपनों की तरह गुजरते इस दिन में किसी कल, किसी स्मृति और किसी भी शख्स को वह घुसपैठ नहीं करने देगी अब, बिल्कुल भी नहीं।
और अपने आप को निढाल छोड़ दिया था उसने हनीफ सर की बाजुओं पर। शायद इस बीच सो भी ली थी वह एक नींद... वही नींद जो कल से लाख चाहतों और कोशिशों के बावजूद उसके आसपास भी नहीं फटकी थी। उसका मन हल्का हो आया। मन जब हल्का हो जाए तो शरीर भी हल्का हो जाता है। आमेर के किले में वह फर्र-फर्र सीढ़ियाँ चढ़-उतर रही थी। हनीफ सर देखते ही रह जाते उसका इस तरह इत-उत फुर्र-फुर्र आना-जाना। दीवाने आम, शीश महल, जय मंदिर, सुहाग मंदिर... एक एक कर के... उन्हें लगा वे बूढ़े हो रहे हैं शायद... नंदिता के आगे कमजोर भी। वरना शिलामाता के मंदिर में वे वह तो नहीं कह जाते जो उन्होंने कहा था। उस पर से नंदिता की चुप्पी... आमेर के किले में घुसते ही जब शिलामाता का भव्य मंदिर आया तो फुसफुसाकर हनीफ सर ने उससे कहा था; नंदिता मैं तुमसे ब्याह करना चाहता हूँ। हम यहीं शादी कर लें तो... और वह दौड़कर भाग ली थी उस जगह और उस पल से। शर्म या झिझक से नहीं, खुद कमजोर न पड़ जाए इस से। बिना कुछ बताए... यह संभव कैसे हो सकता था। वह ऐसा होने भी नहीं देना चाहती थी। वर्ना बरसों बरस वह... उसने भले कुछ न कहा हो पर सुने हुए शब्द उसके शरीर में हुलस रहे थे। उमंग बन कर बाहर आ रहे थे और वह उसी में उमगी सी दौड़ रही थी, उड़ रही थी इत-उत। हनीफ सर समझे तो वह क्या कहना चाहती है... बिना यह समझे कि यह दीए के बुझने से पहले की ज्योति है... एक दम से रौशन और शफ्फाक, किसी भी कल्पना और उपमा से परे...
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Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Post by kunal » 24 Sep 2017 16:19

लौटने में सर ने कहा था... थक गई हो बहुत... नहीं... सचमुच... हाँ, सचमुच और आप... बिल्कुल भी नहीं... तो चलें एक और जगह कि यह दिन अमर हो जाए अपने हर पल की स्मृति में... ऐसी कौन सी जगह है जो दिन को अमर बना दे। दिन को स्मृतियों में अमर इनसान बनाते हैं कि जगह... उसके स्वर में चुलबुला रोमांस था, मजाक का एक हल्का सा पुट भी... उन्होंने ड्राइवर से कहा था - चोखी ढाणी...
वह गाँव न हो कर राजस्थान के एक गाँव (आदर्श गाँव) का मॉडेल था। एक बृहत क्षेत्र में बिखरा फैला हुआ। खाट, झोपड़ी, दीए, झोपड़ी के भीतर बाजरे की रोटी, लहसुन की चटनी और गुड़ देती महिला नृत्य-गायन में डूबे राजस्थानी लोक कलाकार, मदारी, नट, छोटे-छोटे दुकानदार... सब के सब लोगों को अपने पास आने के लिए आमंत्रित करते हुए... आवो सा, पधारो सा... उन दोनों ने गोइठे पर सेंकी गई उस रोटी का स्वाद एक साथ चखा; और एक ही साथ उनके मुँह से निकला था अद्भुत... उसने ऊँट की सवारी भी की बिल्कुल उनसे चिपक कर, उन्हें कंधे से कस कर पकड़े हुए... वे घूमते हुए हँस रहे थे। इतना डरती हो तुम, मुझे तो हमेशा लगता रहा बहुत बहादुर हो तुम... लोक कलाकारों ने जब उन्हें पगड़ी पहनाई तो और से और हो गए हनीफ मियाँ... नंदिता को लगा जैसे उसका दूल्हा ही है सामने, लाल राजस्थानी कुर्ता, लाल ही पगड़ी, साफ गंदुमी रंग, तीखे नक्श। हनीफ मियाँ सज गए थे बिल्कुल। हुलास में नंदिता भी खूब नाची उन नर्तकियों के संग उन्हीं की संदलवाली चुनरी ओढ़कर। ऐसी ही महकती, उमगती, इतराती, बलखाती दुल्हन उनके सपनों में आती थी जवानी के दिनों में। पर नफीसा तो इसके बिल्कुल उलट थी... गंभीर, संजीदा, जिम्मेदार... उनका मन हुआ था वे दौड़कर जाएँ और अपनी बाँहों में उठाकर ले आएँ नंदिता को किसी क्षत्रिय राजकुमार की तरह हर कर।
दीपकों की लौ ऐसे जल रही थी झोपड़ियों में जैसे कभी बुझती या कि भुकभुकाती ही नहीं होंगी; नंदिता ने सोचना नहीं चाहा था कि ये बुझेंगी... ये जलती रहे हमेशा, उसने मन से कहा था... वे दोनों एक दूसरे का हाथ थामे घूमते रहे थे देर तक, ऐसे जैसे कभी वे जुदा नहीं थे... ऐसे जैसे वे कभी जुदा नहीं होंगे।
नंदिता उन दीपकों के पास गई थी। दीयों में तेल नहीं बल्ब थे, छोटे-छोटे टिमटिमाते से। उसका मन जैसे थोड़ा बुझ सा गया था...। कितना सुखद और सुंदर है सब कुछ। लेकिन यह सब किसी सपनों के बेचे जाने जैसा है। है तो यह गाँव जैसा ही, लेकिन गाँवों का मूल जैसे सिरे से गायब हैं यहाँ... भूख, गरीबी, सूखा, बाढ़, किसानों की आत्महत्याएँ और न जाने बहुत कुछ...। नहीं यह गाँव नहीं हो सकता... यह तो गाँव का आभास देती एक चमकीली दुनिया दुनिया भर है जो एक कॉन्सेप्ट की तरह बिकती है। आखिर क्या कहा जाय इसे सपना या कि छद्म...? हनीफ सर ने जैसे उसके मन का बुझना समझ लिया था...। उसने हौले से उनकी हथेलियाँ दबाई थी, जैसे कह रही हो जाने भी दीजिए सर... हम तो कुछ पल की शांति और आनंद के लिए यहाँ आए हैं, इतना भी क्या सोचना...?
नंदिता ने उन छोटी-छोटी झोपड़ियों को हसरत भरी निगाहों से देखा था... हनीफ सर ने वहाँ रात में रुकने की कीमत पता की थी... एक रात का टैरिफ सुन कर नंदिता जैसे सकते में आ गई थी... खुले तारोंवाले आकाश के नीचे टिमटिमाती सी एक झोपड़ी... सब कुछ सपनों जैसा जादुई... पर हर सपने की कीमत... कितनी ज्यादा...। हनीफ ने सोचा था वह अपनी नंदी के लिए कुछ भी कर सकते हैं... उस नंदी के लिए जिसने आज तक उससे कुछ नहीं चाहा अपने प्यार के एवज में... यह कीमत तो बहुत छोटी है उसकी खुशियों के आगे...
चलो खाना खाते हैं... दाल-बाटी-चूरमा, केर और सांगरी की साग, फाफड़े... घी में चुपड़ी बाजरे की रोटी... कितनी-कितनी मिठाइयाँ... इतना सब कुछ और इतनी तरह का... नंदिता की भूख तो जैसे थाली देख कर ही चली गई थी।
रात सपनोंवाली ही थी, वही झोपड़ी, खाट, खुला आकाश और वे दोनों... रात कट रही थी सपनों जैसी। अधलेटे हनीफ सर की गोद में लेती थी नंदिता, आँखें जैसे मुँदी हुई, इस अनुपम सुख में। सर उसके बाल सहला रहे थे हौले-हौले... रात अधिया रही थी। वे लेट चुके थे समानांतर।, एक दूसरे को जकड़े हुए... जैसे कभी-कहीं छूटकर जाने नहीं देंगे एक दूसरे को... हनीफ सर की उँगलियाँ टटोल रही थीं नंदिता का चेहरा... रोशनी की लौ अब कम हो चली थी... टटोलती उँगलियाँ जैसे फिर से तराश रही हों उसका एक-एक नक्श।
एक सधा हुआ चुंबन उसकी सारी उलझनें पोंछ देना चाहता था पेशानी से... वह भी भूल जाना चाहती थी पिछला सब कुछ... तपते होंठ धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे थे... गला, कंधा, छाती... कि छाती तक उमड़ आया था कुछ उबकाई और रुलाई सा... नंदिता ने उन बढ़े हुए होंठों को रोक दिया था... गड़ा दिया था उनकी छाती में सिर और हिलक-हिलक कर रो उठी थी... वसीम...
वह रात उतर आई थी उन दोनों के बीच... और बीच में पसर कर लेट गई थी, उन्हें अलगाती हुई। हनीफ सर जैसे छिटक कर दूर खड़े हो गए थे... उसे अजीब सी निगाहों से घूरते हुए... तारों की टिमटिमाहट थम गई थी... दीए बुझ चुके थे... सुबह होने को थी पर होने से पहले ही जैसे थम गई थी...
18
जब नंदिता का मैसेज आया वे और वसीम दोनों चाय पी रहे थे, वसीम के कॉलेज-कैंटीन में। वसीम का कहना था कि वहाँ की चाय बहुत लाजवाब होती है, वह कभी आई तो उसे वहाँ की चाय जरूर पिलाएगा। और वह मौका तुरंत ही आ गया था।
अब एमीलिया के सिवा यह कोई दूसरा थोड़े ही जानता था कि उसने यह मौका पहली बार छीना है किसी से। जबरन थोप लिया है अपने सिर कि वह वसीम से मिल सके... दरअसल यह रिपोर्ट किसी और की जिम्मेदारी थी, उसे तो विधवाओं पर एक फीचर करने के लिए काशी और बृंदावन जाना था। वह जानती थी कि यह एक महत्वपूर्ण काम है। इसे करने से उसकी पहुँच और पूछ दोनों ही बढ़ेंगे और यह कि उसकी काबिलियत को देखते हुए बॉस उसे हमेशा बेहतर ही काम थमाते हैं। फिर भी... उसने दीपा से कहा था कि उसे उज्र न हो तो वह उसका काम निबटा दे... दरअसल उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही और दूसरे काम के लिए उसे शहर से बाहर जाना होगा... वह खुशी-खुशी तैयार हो गई थी... और फिर उसने इस संदर्भ में बॉस से बात भी कर ली थी।
उसने देखा वसीम की आँखों में एक खास चमक थी उसे अपने दोस्तों से मिलवाते हुए। उसे अच्छा लगा था। पर वह यह तय करना चाहती थी कि वसीम उसे लेकर इतना खुश है या कि दोस्तों से यह जता कर कि एक पत्रकार उसकी करीबी है, मित्र है। यह तय करना बहुत मुश्किल था, ठीक पहले दिन की मुलाकात की तरह। जब वह बिल्कुल भी तय नहीं कर पा रही थी कि वह उससे मिलकर खुश है या दुखी। वह बात-बात पर हँस रहा था और बात-बेबात उसकी आँख आँखें नम भी हो आतीं। उस दिन भी यह तय करना मुश्किल था कि वह उससे यानी एमीलिया से मिलकर प्रसन्न है या वह उसमें नंदिता की ही परछाईं तलाश रहा है।
उसे पता है उम्र का यह दौर बहुत भावुक होता है। उसने देखा तो है नंदिता को उस दौर से गुजरते हुए। और खुद को सहेजती सँभालती भी रही है नंदिता के उदाहरण से... पर अब... अब क्यों नहीं सँभाल पा रही वह खुद को... आखिर वसीम में ऐसा क्या है... वह इसी सोच में तल्लीन थी कि नंदिता का मैसेज आया था... 'एमी कुछ पैसे होंगे तुम्हारे पास? जरूरत है। फिर लौटा दूँगी, पापा के पैसे भेजने पर। अभी उनसे नहीं कहना चाहती। वे दस सवाल करेंगे... क्यों... किसलिए...
वह चाहती थी वसीम न पूछे कुछ इस बाबत। पर उसने उसके चेहरे के उड़ते रंगत को देख पूछ ही लिया था - क्या बात हुई... एमीलिया चाहकर भी झूठ नहीं बोल पाई थी... कि इतनी तेजी से उसका दिमाग कोई झूठा किस्सा नहीं गढ़ सका था... कि झूठ बोलने की उसकी आदत बिल्कुल ही नहीं थी... नंदिता का मैसेज है... वसीम के चेहरे पर एक लौ कौंधी थी और फिर थिर हो गई थी... क्या बात हुई... पता नहीं, पर उसे कुछ पैसे चाहिए... मैं चलती हूँ बैंक जाना जाना होगा... देर हो जाएगी।
क्या बात है फोन करके पूछो उससे। वह ठीक तो है न...। एमीलिया ने सँभलते हुए उससे कहा था यह ठीक नहीं होगा। अगर उसे फोन करना होता तो उसने जरूर किया होता। मेरे कुछ पूछने पर वह ठीक महसूस नहीं करेगी... थोड़ा ठहर कर कहा था उसने, तो इसीलिए अब्बू जल्दी लौट कर आ रहे हैं, आज हीं... उसके चेहरे पर चिंता की रेखाएँ आ-जा रही थीं। नंदिता के लिए वह परेशान था, एमी को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था... वह उठकर अपने कपड़े की सिलवटें निकालने लगी थी।
...वसीम के चेहरे पर जैसे निर्णय की रेखाएँ कौंधी थीं... चलो मैं ही फोन करता हूँ उसे... एमीलिया ने चौंककर अप्रत्याशित तेजी से कहा था। चलो फोन मैं कर लेती हूँ, तुम फोन रखो... वसीम ने चौंक कर फोन काट दिया था...
कैसी हो नंदी...? उधर से एक चुप्पी के बाद जवाब आया था - ठीक हूँ...। क्या हुआ... कुछ खास नहीं, बस मैं कुछ दिन और रुकना चाहती हूँ यहाँ... घूमना चाहती हूँ आसपास की जगहें... कुछ दिन एकांत में रहकर सोचना चाहती हूँ अपने बारे में। मम्मी-पापा से यह सब कहा तो वे बेमतलब परेशान होंगे... बस इसीलिए... अगर परेशानी हो तो... कैसी बात कर रही है तू, मैंने तो बस तुम्हारा हाल चाल जानने के लिए फोन किया था... अभी ही बैंक जा रही हूँ... हनीफ सर... वे लौट गए आज ही... दोनों तरफ एक लंबी चुप्पी थी...।
एमी को कहना चाहिए था, एमी ने एक पल को सोचा भी था वह कहे - तू भी लौट आ नंदी... पर उसने ऐसा कहा नहीं था। उसने कहा तो बस यह था... ठीक है, तू आराम से आ, जो मन हो वही कर और पैसे की कोई चिंता मत करना... फोन कट गया था। उसने देखा वसीम का मुँह खुला हुआ था। वह बिल्कुल भी तय नहीं कर पाई कि वह नंदिता से कुछ कहना चाह रहा था या कि उसका मुँह हैरत में खुला हुआ था कि उसने ऐसी बात कैसे कही थी।
वसीम जिद पर अड़ गया था कि पैसे वह उससे ले ले। एमी हार कर चुप हो गई थी। उसके अकाउंट में सिर्फ तीन हजार रुपए थे। नौकरी बिल्कुल नई थी। नंदी न जाने कितने दिन तक बाहर रहे... उसे तो ज्यादा पैसों की जरूरत होगी।
दस हजार रुपए वसीम ने नंदी के अकाउंट में डाले थे, पर दुखा एमी का कलेजा था। कितना प्यार करता है वह उससे... अपनी पूरी जमा पूँजी खर्च करने में भी उसने एक बार नहीं सोचा। स्कॉलरशिप के पैसे उसने नंदी की एक इच्छा को पूरा करने की खातिर... यह जानते हुए भी कि नंदी उससे प्यार नहीं करती... यह जानते हुए भी कि नंदी उसके अब्बू के साथ...
वह दफ्तर न जा कर कमरे पर लौट आई थी। उसने बॉस को फोन किया था - तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही, मैं रिपोर्ट फैक्स कर दूँगी शाम तक... कमरे में वह बैठी थी चुपचाप... अकेली... पर कोई था उसके पास... वह जो छिन गया था उससे। वह भी तब जब छिनने और खोने का अर्थ भी नहीं जानती थी वह...। और प्यार के बारे में भी उसे पता नहीं था। जिंदगी के उन मासूम वर्षों में जब सब कुछ खुशनुमा था, सब कुछ सुंदर। तब जब माँ-पापा के बीच की दूरी का भी उसे पता नहीं था। तब जब माँ गई नहीं थी उसकी जिंदगी से और तब जब नंदी भी नहीं आई थी उसकी जिंदगी में... बस उसका साथ उसे अच्छा लगता, बहुत-बहुत अच्छा। वे दोनों जितना वक्त मिल सकता एक साथ बिताते। गर्मी की छुट्टियों में पुराने ढंग के बड़े-बड़े पलंगों के नीचे उनकी गृहस्थी सजती थी। किचेन, स्टडी और ड्राइंग रूम... चादरों से घेर-घूर कर वे अलग-अलग कमरे तैयार करते थे। वह ऑफिस जाता... वह उसके लिए माँ से फल... मिठाइयाँ जैसी चीजें माँग कर उन्हें पकाने का अभिनय करती... शाम को उसका इंतजार करती। छोटे-छोटे गुड्डे-गुड़िया जो उसके बच्चे बनते थे को सजाती-सँवारती, खिलाती-पिलाती और उसके दफ्तर से आने का इंतजार करती... दफ्तर वह जो कि कुर्सियों को घेर कर उनमें चादर डाल कर तैयार किया जाता। उन दोनों की दुनिया एक-दूसरे के होने से ही भर जाती थी।
और भी खेल वे सब साथ खेलते। बुढ़िया कबड्डी में वह उसे बुढ़िया बनाकर रख लेता और पहरेदारी करता रहता उसकी कि कोई और उसे छू न पाए। आइस-पाइस में वे एक दूसरे को ही ढूँढ़ते पहले और खेल जैसे उन तक ही सिमट जाता मानो दूसरे बस यूँ ही हों...
पढ़ते थे साथ-साथ... उन्हें किसी ट्यूटर की जरूरत नहीं थी, बिल्कुल नहीं। एक को जो न समझ आए उसे दूसरा समझ कर जरूर समझा देता। स्त्री-पुरुष सचमुच एक दूसरे के पूरक होते हैं या नहीं पता नहीं, पर वे दोनों बच्चे एक दूसरे के पूरक जरूर थे, और वह भी इस हद तक कि उन्हें देखकर बड़े बुजुर्गों को भी ईर्ष्या हो उठे।
... उसकी मम्मी कहती अगर तेरी दुल्हन एमी जैसी न हुई तो, तू तो जान ले लेगा मेरी... वह कहता धत और शरमा जाता।
पहले पहल सब हँसते थे मिलकर इस बात पर। सब मतलब, वे चारों। पापा, अम्मा, बस्सी की अमिया और उसके अब्बू। फिर धीरे-धीरे माँ इस मजाक से कुढ़ने लगी थी। बाद में वे पापा से कहतीं, उस पापा से जिससे जितना कम बोल कर वे काम चला सकती थी, चला लेती थी... देखिए जी ये यासमीन जो बोलती रहती है न हमेशा बच्चों के आगे मुझे अच्छा नहीं लगता बिल्कुल। बच्चे हैं, मन में गाँठ पड़ती जाएगी इस बात की। और बड़े भी तो हो रहे हैं वे... जो नामुमकिन हो उस बात को मजाक में भी क्यों कहना... पापा शुरुआत में अम्मा को डाँट देते... मजाक ही तो करती हैं वो। पड़ोसी हैं, अच्छी दोस्त हैं तुम्हारी और तुम हो कि मजाक की बातों को भी... पर धीरे-धीरे उनका चेहरा भी सख्त होने लगा था इस मजाक पर। पापा एक दिन कह रहे थे, वे लोग शायद इंटेंशनली कहते हैं यह सब... अब इनका मिलना-बैठना कम होना चाहिए... और बस्सी और एमी भी...
यह सब बातें उस बरस के पहले की बातें हैं। उस बरस से पहले तो यह दोस्ती चाह कर भी कम न हो सकी थी। बस्सी की अम्मी जो कुछ पकाती मांस-मछली-अंडे, पापा के लिए जरूर दे जातीं। बदले में मम्मी को भी कुछ न कुछ करना ही था। अगर वे महीने में दो बार खाने के लिए न्योतते तो माँ एक बार तो बुलाती ही न...
पर उस बरस अपने आप कमने लगा था यह सिलसिला। सब जैसे कतराने लगे थे एक-दूसरे से। मेल-जोल अपने संप्रदाय के लोगों तक ही सिमटने लगा था। गो कि उस कालोनी की आबादी आधी-आधी नहीं तो तीन-एक के अनुपात में तो जरूर रही होगी। पर एक तरह से देखें तो मुस्लिम बहुल जैसी ही थी। हिंदू बँटे हुए थे, जाति-गोत्र के नाम पर। लेकिन वे मेल-मुहब्बत रखते आपस में। शायद यह उनकी नीति थी। शायद यह अल्पसंख्यक होने की नीति थी। अगर टूट-टूट कर, बिखर-बिखर कर रहें तो...
पर उस बरस बिखरे-बिछड़े हिंदू एक हो आए थे। अजान से भी तेज स्वर में भजनों का सिलसिला शुरू हो गया था। प्रवचन-कथा के लिए आनेवाले साधु-महात्माओं की संख्या भी जैसे अचानक बढ़ने सी लगी थी... एक दिन अफवाह फैली थी और न जाने कैसी फैली थी कि सारे के सारे टंकियों का पानी सड़क पर गंगा जल बन कर बहने लगा था। ऊपर से मौसम भी बरसात का। गड्ढों, पोखरों और नालों तक में समाइश नहीं थी उनकी। हाँ उसके घर का पानी नहीं बहा था। बस्सी के अब्बू आए थे, पड़ोसी होने के नाते और कहा था अगर पानी टंकी में जहर होता तो मेरे घर के पानी में भी होता न। मेरे यहाँ तो खाना भी उसी पानी से पका है। और मैं आपके घर का पानी भी पी लेता हूँ। और उन्होंने गिलास में डालकर पानी भी पीया था। उन्होंने कहा था पापा से, हो सके तो रोको सबको ऐसा करने से। पानी बहुत बेशकीमती चीज है, उसे यूँ जाया करना... पापा ने कई लोगों को फोन भी किया था पर किसी ने मानी कहाँ थी उनकी बात... इससे चाहे जितनी मुसीबतें आई हो, हम दोनों को तो जैसे बहार ही हो गया था। स्कूल बेमौसम बंद थे उन दिनों... हाँ, चुपके-चुपके हम पानी में जरूर निकल जाते। पौधे, जोंक और मछलियाँ देखने को... बस्सी ने कई सारी मछलियाँ पकड़ी थी और मुझे भेंट की थी, जिन्हें अचार के एक पुराने मर्तबान में मैंने रखा था और रोज-रोज एक्वेरियम लाने की जिद करने लगी थी पापा से।
दूसरे दिन तक सारा पानी निकल चुका था लेकिन दहशत अभी भी बाकी थी लोगों के दिलों में। सब्जी बेचनेवाली कुंजड़िनें आती और लिए-लिए लौट जातीं हरी-हरी ताजी सब्जियाँ, कम से कम दाम रखने के बावजूद। आसपास की महिलाएँ बतियाती थीं आपस में... सारी की सारी मुसलमान हैं... सब्जी में भी अगर जहर हुआ तो... उस बरस आखिर ऐसा क्या हुआ था मैं अब भले ही जानती हूँ तब मुझे पता नहीं था...
पूरा बरस यूँ ही बीत गया था। उस खास दिन की बरसी आने तक... वह शहर, हमारे ही शहर में उतर आया था जैसे। फिर गली-मुहल्ले घूमता-घूमता हमारे घर में भी... वह शहर धधक रहा था, अतः हमारा घर भी... टीवी पर खबरें उस शहर की आतीं और इस शहर की हवा को धुआँती...। धुआँ-धुआँ हमारा शहर भी था और घर भी। ...मरे... मारा... बम फटे... हम बच्चे घरों में बंद कर दिए जाते। मैं और वस्सी दोनों अपने-अपने घर में... और तिस पर दुखड़ा यह कि माँ और पापा दोनों इस मुद्दे पर एकमत होते... हम दियासलाई और तारों को जोड़कर वस्सी के द्वारा बनाए गए यंत्र से एक-दूसरे को असफल संदेश भेजने की कोशिश करते रहते। मन नहीं लग रहा... मेरा भी नहीं... बाहर आओ न... कैसे आऊँ... कोई उपाय... देखता हूँ... दिन पर दिन बीत रहे थे उदास, अनमने...
लोगबाग आकर पापा से कहते, डॉक्टर साहब यह तो कोई तरीका ही नहीं हुआ... अपना शहर और फिर यह मुहल्ला भी साफ-साफ बँटा हुआ है कम्युनिटी के अनुसार। फिर यहाँ रहने का क्या तुक... आपने तो पड़ोस में... समझाते क्यों नहीं... यह मकान बेच दें... चले जाएँ अपने लोगों के बीच... वे भी चैन से रहेंगे और हम भी... स्वर में बुजुर्गियत थी उम्र की तरह ही... और नहीं गए तो हम भेजकर ही दम लेंगे... साम-दम-दंड-भेद जैसे हो... यह स्वर युवा और आक्रोशी था... जो चंदा माँगनेवालों में अग्रणी था उस बरस घर-घर से ईंट इकट्ठा करता हुआ। यह वही था जो मस्जिदों पर गेरुए झंडे लगाने की बात कर रहा था उस दिन और माँ चुपचाप सुन रही थी। आँखों में डर भर कर उन्होंने वस्सी और एमी को भीतर जाने को कहा था।
उस दिन फिर उनका फोन जुड़ गया था या कि उसका मन, जो दूर कहीं बैठकर भी एक-दूसरे के मन की आवाज सुन लेते थे। वस्सी की अम्मी सो रही थी, अब्बू कारखाने गए थे। अम्मा की तबीयत खराब होने के शुरुआती दिन थे शायद... वे बुखार चढ़ने के बाद दर्द और नींद की गोली खाकर सोई हुई थीं... टिन-टिन-टिन... यह बुलाहट की आवाज थी... टन-टन-टन उसने कहा था वह आ रही है... और चुपके से कुर्सी लगाकर पिछवाड़े की छिटकनी खोलकर निकल आई थी। वस्सी पहले से ही खड़ा था। वे खेलने लगे थे लुका-छिपी का खेल; धूल-धुएँवाली वह दोपहर बीतने को ही थी। छुपी वह थी... छुपने की बारी उसी की थी। उसे क्या पता था कि वस्सी छुपेगा और वह ढूँढ़ती फिरेगी उसे और वह कहीं नहीं मिलेगा उसे ताउम्र। उसे पता था वस्सी उसे ढूँढ़ लेगा। वह झाड़ियों में छिपी-छिपी देख रही थी उसकी राह कि उसकी तरफ आते वस्सी को कुछ लोगों ने घेर लिया था और उठा कर चलते बने थे। वह बहुत कसकर चीखी थी... पर चीख शायद उसके गले में ही अटकी रह गई थी, बुरे सपने में गोंगियाने जैसी कुछ-कुछ। वह जैसे घर का रास्ता भूल गई हो, झाड़ी में ही बैठ गई थी घबड़ा कर। पता नहीं कितनी देर बाद वह घर लौटी थी। पता नहीं कितनी कोशिशों के बाद उसने माँ को जगाया और बता पाई यह बात। बुखार में तपती माँ ने खिड़की-दरवाजे सब बंद कर लिए थे अच्छी तरह... और उसे कहा था वह किसी से न कहे यह बात।
माँ उसे किसी के सामने होने ही नहीं देती थी... जब तक वस्सी मिल न गया था वापस। पर अभी भी जो लौटा था वह उसका वस्सी नहीं था, उसका प्यारा दोस्त वस्सी। उसका सबसे ज्यादा खयाल रखनेवाला, उसके सारे राज जाननेवाला। वस्सी बेहोश था लंबे समय तक। घर से अस्पताल तक। वे लोग अपना घर बंद कर चले गए थे उस तरफ अपने रिश्तेदारों के पास। फिर वहाँ से कहीं और, वस्सी के इलाज की खातिर... और फिर वे कभी नहीं लौटे... उनका घर हमेशा बंद ही दिखा था, उसके दिल्ली आने तक। और वह उस बंद घर को देख कर बार-बार रो उठती थी अपने उस दोस्त की खातिर जो कभी लौटा ही नहीं; जो खो गया था। उस बरस के बीत जाने के बाद भी... वह एक बंद बड़ा सा ताला था जो दरवाजे से उठकर उसके सीने पर जड़ गया था।
...नंदिता आई थी और जगह घेर गई थी उसकी जिंदगी में पर वसीम की नहीं... इसीलिए नंदी इन दिनों जब-जब चर्चा करती वह ताला हिलता, कुछ सुगबुगाता, चिलकता उसके सीने में... वह सोचना चाहती सिर्फ नाम से क्या होता है... और उसका वसीम वसीम नहीं 'वस्सी' था। जैसे कि वह एमीलिया नहीं एमी थी उन दिनों... पर नाम भर से ही एक बेचैनी, एक चाहत, एक खुशी उभरने लगती उसके भीतर। सब एक साथ... सब गड्डमड्ड।
वह बहुत रोई थी उस वक्त, इतना कि रिपोर्टिंग की बात भी भूल चुकी थी... किसके लिए... अपने वस्सी उर्फ वसीम के लिए या कि इस वसीम के लिए जो चाहने पर भी उसका नहीं नंदी का ही था; उसकी लाख कोशिशों के बावजूद।
फोन की घंटी फिर बजी थी और उसे रिपोर्ट फैक्स करने की बात याद हो आई थी। उसने फोन बंद करके पहले रिपोर्ट टाइप किया फिर फैक्स। और फिर अपने धुआँए-उदास चेहरे के साथ बाल्कनी में कॉफी का मग ले कर बैठ गई थी। उसने बीच में उठकर रिकॉर्डर ऑन किया... 'आँख में क्यों नमी सी रहती है / जाने कैसी कमी सी रहती है / हँस लिए रो लिए जी-मर के, जीना सीखा है जीते जी भर के / साँस फिर भी थमी सी रहती है... वह सैडिज्म जिसके लिए कभी वह नंदी को डाँटती थी... जिसके लिए वह उसे आधुनिक मीरा और मीना कुमारी कहकर चिढ़ाती थी, आज उसके हिस्से था। और उसे उसका रंग इस घड़ी अच्छा लगा था। वह भी अपनी उस उदास सी आवाज में साथ-साथ गुनगुना उठी थी... जिंदगी अब कभी न रास आए। दफ्न कर दें हमें तो साँस आए / साँस ऐसे जमी सी रहती है...
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Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Post by kunal » 24 Sep 2017 16:20

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चोखी ढाणी से लौटते ही हनीफ ने अपना सामान पैक किया था। वे नंदिता के कमरे तक आए थे। वह उकड़ू बैठी हुई थी, घुटनों में अपना सिर रखे। उन्होंने पूछा था चलना नहीं है? वह चुप ही रही थी... तुम अभी तक ऐसे ही बैठी हुई हो... वह फिर भी बैठी ही रही थी जड़वत... देखो मैं निकलनेवाला हूँ... दो घंटे बाद फ्लाइट है। जल्दी से सामान पैक करो और फ्रेश हो लो। नंदी फिर भी चुप ही थी। हनीफ खीज उठे थे... सुनो ऐसा करो, अगर तुम्हें यहाँ रुकना है तो कोई बात नहीं, कमरे की बुकिंग पूरे एक सप्ताह की है, पर मैं आज ही जाऊँगा... मुझे कॉलेज से कुछ जरूरी काम के लिए वापस बुलवा लिया गया है... नंदिता ने जैसे पूरी शक्ति बटोरकर कहना चाहा था... और आपकी कॉन्फ्रेंस...? आवाज टूटती-फूटती सी निकली थी... कान्फ्रेंस... वह सारा काम कल ही खत्म हो गया था। नंदिता फिर भी नहीं उठी थी सामान पैक करने की खातिर। वे कमरे से चले गए थे... जबकि नंदिता को इंतजार था, वे खुद उसका सामान उठाएँगे और डाल देंगे सूटकेस में। उसे कंधों से झकझोर कर कहेंगे - उठो मुँह-हाथ धो लो। वे चले गए थे। और नंदी जो कुछ घटा था उस पर भरोसा करना चाहती हुई, बिस्तर पर ही थी।
नंदी ने पूछा था खुद से, अब? प्रत्युत्तर में उसके भीतर से एक सवाल ही आया था, अब? जैसे किसी अँधेरे खोह में हो वह और जहाँ अपनी आवाजों कीए गुंजन के सिवा और कुछ हो ही नहीं... रोशनी की एक किरण तक नहीं। हनीफ जाते वक्त आए थे और खड़े रहे थे कुछ पल दरवाजे पर, फिर उन्होंने कहा था मैं चलता हूँ। उन्होंने उसके सिर पर हमेशा की तरह हथेलियाँ रखी थी पर क्षण भर में हटा भी ली थी। उन्होंने उसके तरफ कुछ पैसे बढ़ाए थे... शायद तुम्हें जरूरत हो... वह छिटक गई थी... और इस छिटकने से पैसे भी छिटक कर गिर पड़े थे। उन्होंने बिखर पड़े नोटों को समेटा था और कुछ देर की स्तब्धता के बाद चल दिए थे।
पड़े-पड़े बहुत देर तक सोचने के बाद भी वह तय नहीं कर पाई थी कि क्या करे... उसने हनीफ सर की दी वह किताब खोल ली थी... महावीर के बताए त्रिरत्न - सम्यक विश्वास, सम्यक ज्ञान और सम्यक आचरण। तीर्थंकरों पर विश्वास, चूकि तीर्थंकर सत्य बोलते हैं... इस तरह सत्य पर विश्वास। तीर्थंकर अपने अनुभव और तप से संचित ज्ञान से ऐसे नियम बनाते थे जिससे सांसारिक भवसागर को पार कर मोक्ष अर्थात निर्वाण की प्राप्ति होती थी। सत्य पर विश्वास, संशय रहित विश्वास पर यह विश्वास अंधविश्वास नहीं हो।
एक पल को उसने सोचा जब विश्वास संशयरहित हो फिर अंधविश्वास कैसे नहीं होगा। जहाँ संशय नहीं हो अंधता वहीं होती है। उसे कभी हनीफ सर पर संशय नहीं हुआ, न हीं अपने प्रेम पर। उसका प्रेम अंधा था... तो क्या यही गलती हो गई उससे... संशयरहित होना था पर प्रेम में अंधा नहीं... संशयरहितता और अंधत्व क्या एक ही नहीं... वह बार-बार सोचती पर निस्तार नहीं पा रही थी...
आत्मा अमर है, अनश्वर है। सत्य है। परंतु शरीर आत्मा से भिन्न है, नश्वर है। आत्मा का परम लक्ष्य मोक्ष है। यह सिद्ध होगा सम्यक ज्ञान और आचरण से, तीर्थंकरों पर किए गए विश्वास से। क्यों कि जो ज्ञान हम पाना चाहते हैं उसकी प्राप्ति के लिए पर्याप्त साधना और उपाय हम कर नहीं पाते। तीर्थंकर वही ज्ञान प्राप्त कर हमारी मुक्ति का मार्ग आसान करते हैं। सदाचारयुक्त नैतिक आचरण, इंद्रिय, वाणी और कर्म पर पूर्ण नियंत्रण। इससे आत्मा पर बोझ नहीं बढ़ता। सम्यक अचरण दो तरह के हैं - पाँच अणुव्रत जो कि सिर्फ गृहस्थों के लिए हैं, जिन्हें श्रावक-श्राविका कहा जाता था - अहिंसा, सत्य वचन, अस्तेय अर्थत बिना अनुमति, चोरी और दिए जाने पर भी किसी की कोई चीज न लेना, अपरिग्रह अर्थात धन का त्याग, कामनाओं और आसक्तियों का संग्रह नहीं। माया लोभ और इच्छाओं का त्याग और अंतिम ब्रह्मचर्य।
उसने गौर किया उसकी जिंदगी पाँच अणुव्रतों के नियमों पर सही उतर सकती थी क्या... उसने मन ही मन सही किया, लगभग हाँ... सत्य वचन... लगभग हाँ... अस्त्रेय... लगभग हाँ... अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य... माया लोभ और इच्छाओं का त्याग... अभी तो वह ऐसा ही महसूस कर रही थी... और ब्रह्मचर्य का तात्पर्य यहाँ विवाह के परित्याग में नहीं... असंयम, कुव्यसनों और वासनाओं के त्याग से था। एक बृहत दर्शन धर्म का... एक बृहत सोच और उसे भी अपनी तरह से अपनाने की अंधानुकरण न करने की आजादी भी... यह धर्म उसका मन मोह रहा था।
या कि हनीफ सर से टूटे हुए दिल का उपचार भर था अनासक्ति और अनावलंब का यह रास्ता... वह सोच रही थी और सोचती ही रह गई थी देर तक।
उसने आगे पढ़ा था - पाँच अणुव्रतों के अलावा पाँच महाव्रत भी होते हैं जो श्रमन अर्थात भिक्षुओं के लिए होते थे - जहाँ नारी हो ऐसे घर में निवास नहीं करना। किसी नारी की ओर वासना से नहीं देखना। स्त्री से बातचीत तक की मनाही। स्त्री संसर्ग से विरक्ति। आरामगद्दों का परित्याग; कठोर स्थान पर शयन और अल्प भोजन। नंदिता ने किताब बंद कर दी थी। उसका मन क्षोभ से भर गया था। क्या मुक्ति की मार्ग में स्त्रियाँ ही खड़ी थी रोड़ा बनकर। हरेक धर्म घूम-फिर कर स्त्रियों को ही नर्क के द्वार तक ले जानेवाला क्यों मानता है। वह धर्म जो हर तरह की रूढ़ियों को तोड़ रहा था, इस रूढ़ि से क्यों बँधा रह गया। उसका मन और ज्यादा वितृष्णा से भर गया था। उसने सोचा, बहुत पढ़ ली उसने ये पुस्तकें।
उसने ठहरकर फिर सोचा था, समाज में ठहराव एक बड़ा कारण था जैन धर्म के उदय का। जो कुछ भी ठहरा या रुका हुआ था, सड़े हुए जल की तरह, जैन धर्म सब में गति संचालित करता है। चूँकि कृषि के लिए पशु आवश्यक थे वह पशुबलि पर रोक लगाता है। ब्राह्मणों के वर्चस्व से शूद्र और अन्य दूसरे वर्ण दुखी थे इसलिए उनके वर्चस्व को चुनौती देता है। स्त्रियाँ उपेक्षित थी, वे मोक्ष की अधिकरिणी नहीं थी अतः यह उन्हें भी ये सारे अधिकार देता है।
प्रभावती, पद्मावती, मृगावती, चेलन्ना और शिवा के अतिरिक्त महावीर की पत्नी यशोदा और उनकी पुत्री प्रियदर्शना और अर्णिज्या के अलावे जिन स्त्रियाँ ने जैन धर्म में बहुत महत्वपूर्ण स्थान बनाया है, वे हैं चेलन्ना की पुत्री चंदना जो प्रथम भिक्षुणी बनी। यह अजातशत्रु की बहन थी। और पार्श्वनाथ युग में पुष्यचूला जो महिला संघ की प्रधान हुई।
फिर पाँच महाव्रत... नंदिता ने सोचा सारे बदलाव एक ही बार नहीं आते। एक-एक सीढ़ी चढ़ कर ही हम ऊपर जाते हैं... फिर हर बदलाव क्रांति नहीं लाता। हाँ क्रांति का सूचक जरूर हो सकता है... जब आज तक स्त्रियाँ दुखी हैं, दलित हैं तब उस युग से क्या अपेक्षाएँ रखी जा सकती है... और क्या रखी जानी चाहिए...
फिर भी किताब उसने दुबारे नहीं छुआ था। अपना जीवन दर्शन वह खुद गढ़ेगी... अपने मन, सोच और विचार के अनुकूल... उसे जो जँचे... जो सही लगे वही...
पर किताब रख देने के बाद एक खालीपन था और था तो अपनी पूरी व्यापकता में था, उसे घेरता हुआ... सवाल करता हुआ। उसे अचानक लगा जैसे भूख लगी है... वह खाने के लिए उठना ही चाह रही थी कि उसे खयाल आया, नहीं अब यहाँ खाना उचित नहीं होगा। सर कहकर गए थे कि रूम का बिल पेड है... खाना तो... और वह... उसे तो बाहर निकलकर ही खाना चाहिए, जेब में बचे पैसे के अनुकूल...
जेब और पैसे की बात याद आते ही अपना खाली हाथ उसे परेशान करने लगा। उसने अटैची खोल कर पैसे निकाले थे बाहर, पर्स और डायरी में रखे हुए... उसने गिना था उन्हें, कुल 830 रुपए... दिल्ली में होती तो शायद काम चल जाता।, महीने के बचे सिर्फ सात दिन... फिर पैसे घर से आ ही जाने थे। पर अभी जब लौटने का मन वह बिल्कुल भी नहीं बना पा रही... उसने सब सोच समझ कर एमी को मैसेज किया था... पर एमी के फोन से ठीक पहले वसीम का फोन आना और कट जाना... उसे बहुत अजीब सा लगा यह। तो क्या वह भी एमीलिया के आसपास था, आसपास क्या बिल्कुल साथ ही... अगर था तो यह उसे अजीब क्यों लग रहा है...? उसे तो अच्छा लगना चाहिए था... कोई तो है जो वसीम को उसके दिए झटके से उबारने की कोशिश में है... पर सच कहें तो उसे यह अच्छा नहीं लगा था। दुख रहा था कहीं कुछ भीतर जिसे मानने से उसे इन्कार था... वह सोचने की कोशिश कर रही थी, एमीलिया वसीम से कहीं उसी के संदर्भ में बतिया रही हो, कहीं इंतजार करने की कोई हिदायत... उसने खुद को बरजा था वह ऐसा क्यों सोचना चाहती है और एक शाकाहारी हिंदू होटल में जा कर 65 रुपए की थाली का ऑर्डर दे दिया था... ये पैसे उसकी जेब के हिसाब से कुछ कम नहीं थे पर बहुत ज्यादा भी नहीं। खाना बुरा नहीं लगा उसे, खास कर के अपने बजट को देखते हुए।
होटल में आई तो फिर वही एक सवाल... अब क्या करना है... क्या सातों दिन इसी होटल में बैठी रहेगी और आठवें दिन लौट जाएगी... उसने खुद से कहा... नहीं...
उस रात उसने राजस्थान गाइड पढ़कर कुछ जगहों की एक सूची बनाई। ये वे जगहें थी जहाँ जैन धर्म से जुड़ा कुछ-न-कुछ था। इस सूची में माउंट आबू, जैसलमेर और उदयपुर व अहमदाबाद के बीच का एक स्थान ऋषभदेवली मुख्य थे।
वह फिर-फिर सोचती रही ऐसा क्यों... फिर उसे याद आया... हनीफ सर ही तो कहते थे, हम अपने या अपने इतिहास को जानते ही कितना हैं... तभी तो बुरे लोग वहाँ से जो कुछ भी चाहे उसे जैसे भी उठाकर इस्तेमाल कर लेते हैं और हम देखते रहते हैं चुपचाप... चूँकि हमारे पास देखने के सिवा और कोई चारा नहीं होता। कि हमने उसे पढ़ा और जाना ही कितना है... और वह जानना चाहती थी सब कुछ अपने तई। सही-गलत सब। परखना चाहती थी उसे अपने दिल और दिमाग के तराजू पर।
उसने दूसरी लिस्ट उस किताब से ही बनाई, उन जगहों की जो जैन मूर्तियों, कलात्मक वस्तुओं और स्मारकों से जुड़ी थी। वह नोट कर रही थी - मथुरा, पार्श्वनाथ पहाड़, पवापुरी, गिरनार, पालीथाने (सौराष्ट्र), उज्जैन, बड़वानी (मध्य भारत), बुंदेल (हिमाचल प्रदेश)... खजुराहो में घंटाई आदिनाथ जैन मंदिर, हाथी गुफा, अलोरा में इंद्रसभा गुफा, उदयगिरि में सिंहगुफा, श्रवनबेलगोला के समीप बाहिबली की विशाल गोमतेश्वर प्रतिमा जो 70 फीट ऊँची है और मध्य प्रदेश में बड़वानी नगर में 84 फीट ऊँची जैन तीर्थंकर की प्रतिमा।
उसने पहली लिस्ट को टेबुल पर रखा और दूसरी को अपनी ब्रीफकेस में जहाँ वह अपनी महत्वपूर्ण चीजें रखती थी... आगे फिर कभी, जब समय मिला तो... उसने अपने आप से कहा और आज के लिए रिसेप्शन पर फोन मिलाया... जैसलमेर, आबूरोड और ॠषभदेवली जाने के लिए सुविधाजनक तरीका... तरीका उसने नोट कर लिया था।
पहले वह जैसलमेर के लिए निकली थी। दो दिनों तक होटल में रहने और सोचने के बाद। यह बड़ी अजीब सी बात थी कि उसने एक बार भी यह नहीं सोचा था कि वह जयपुर घूम ले, आई है तो... कारण... उसे खुद नहीं पता। यूँ तो हनीफ सर के चले जाने के बाद भी कितनी ही जगहें बची थी, वहाँ घूमने के लिए और आसपास भी। पर पता नहीं क्यों उसका मन जयपुर से उठ गया था... इस उठ चुकने के बाद भी उसने पूरे तीन दिन उसी जयपुर में बिताए थे, चाहे होटल के कमरे में कैद हो कर ही सही। और अब वह एक और दिन नहीं बितानेवाली थी। जैसलमेर से लौटने और माउंट आबू जाने के बीच का एक दिन। नंदिता जानती थी उसके पास पैसे बहुत कम हैं और उसे इसी में अपना वक्त गुजारना है, कितना वक्त... कितना ज्यादा या कितना कम यह अभी तय नहीं था इसलिए भी वह सोच समझ कर खर्च करना चाहती थी। चूँकि होटल का बिल पेड था... नंदिता ने सोचा था जब उनके दिए पैसे से उसे इन्कार था तो फिर उनके लिए कमरे में रहना... पर उसकी व्यावहारिक बुद्धि ने जैसे उसे तर्क दिया... पैसे उसके हाथ में दिए जा रहे थे और... होटल का बिल उसके अनजाने में दिए गए थे... सब कुछ खत्म होने से पहले... फिर नासमझी ही होगी कि...
वह अटक रही थी भीतर भी और बाहर भी। घूम रही थी तीर्थ-तीर्थ अपनी ही तलाश में। उसको चाहिए क्या था... वह क्या सोचती है... वह खुद भी जानना चाहती थी। उसे याद आया माँ जब भी तीर्थ पर जाने की बात करती तो पिता मजाक में कहते, बूढ़ी हो गई क्या... कि बहुत पाप कर डाले हैं...? नंदी ने पूछा था खुद से... बहुत पाप कर लिए क्या जो जैन तीर्थों की पूरी लिस्ट बना ली इसी उम्र में। पापा का उसे पता नहीं था, पर आईना देखने पर उसे लगा कि वह असमय ही बुढ़ी जरूर हो गई थी... कब... कैसे... उसे भी नहीं पता... वह नंदिता कहीं खो सी गई थी जो व्यवस्थित थी, सुंदर थी... जिसकी आँखें कभी सपनीली होती थी और कपड़ों में अनगिन रंग। उसने गौर किया, कई दिनों से उसने कपड़ा भी नहीं बदला था... होटल में आकर नाइट सूट डाल लेती और बाहर निकलते वक्त वही एक कुर्ता-जींस। उसे एमीलिया याद हो आई इसी तरह अपनी ही दुनिया में मस्त एमीलिया। इतने तेज सुर्ख दुपट्टे जो उसने यहाँ खरीदे थे, सब के सब पड़े थी अनछुए। पहलेवाली नंदिता ऐसा कर सकती थी क्या... नए कपड़े और यूँ ही पड़े रहें अनछुए ही... असंभव।
जैसलमेर के जैन मंदिर को देख कर वह हतप्रभ रह गई। पार्श्वनाथ, ॠशभदेव, संभवनाथ की प्रतिमाओं और स्थापत्य के अलावा जिस चीज ने उसे सबसे ज्यादा प्रभावित किया या मोहा वे थीं संभवनाथ के मंदिर में भूमि तल पर स्थित भद्रासुरि ज्ञान आगार, जहाँ देश के अनेक भागों से एकत्र की गई पांडुलिपियाँ थी। जैन साहित्य, वैदिक, बौद्ध, न्यायशास्त्र, अर्थशास्त्र, वैदक, दर्शनशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र और भाषाकोश भी, जो प्राकृत से ले कर मागधी, संस्कृत, अपभ्रंश और ब्रजभाषा में लिखी गई थीं। जिनमें से 1226 ताड़पत्रों पर लिखी हुई थी और 2257 कागज पर। वे वक्त के साथ कमजोर और पीली जरूर हो गई थीं पर उनकी सोंधी गमक खींचती थी अपने ओर... मुझे छुओ, मुझे पढ़ो।
नंदिता ऐसा चाहती भी थी। किताबों की गमक हमेशा उसे अपनी ओर खींचती रही है, बचपन से ही... खासकर पुरानी किताबों की... पर वक्त... उसे आगे जाना था। उसने सोचा आगे जाना भी तो लौटने के लिए ही होता है। जब जिंदगी लौट रही है अपनी धुरी की तरफ... वह भी लौटेगी एक दिन... जरूर।
वह बस से आबू रोड के लिए निकली थी जयपुर से... जब वह पहुँची सुबह होने-होने को थी। वह सीधे-सीधे शिखर पर्यटक बँगला पहुँची थी... जयपुर से होटलवालों ने ही वहाँ बात कर रखी थी, वर्ना सीजन में जगह मिलने की संभावना कम ही होती है... वे बता रहे थे...
नहा-धो कर वह घूमने के लिए निकल पड़ी थी, और वह इत्मीनान से घूमना चाहती थी। किसी हड़बड़ाहट या जल्दबाजी में नहीं, जैसलमेर की तरह। उसने एक गाइड कर लिया था...। क्यों, क्या इस डर से कि हनीफ सर की कमी महसूस करेगी वह... हनीफ सर ऐसी जगहों पर उसे लगातार बताते-समझाते रहते हैं... कला और इतिहास के प्रति दूसरों से अलग सोच रखनेवाले सर। उनका साथ न होना उसे खला था...
खुद पर ही हँस पड़ी थी वह। गाइड की पुरानी आदत जो रही है उसे। पहले माता-पिता का मोह संरक्षण, फिर एमीलिया और उसके बाद हनीफ सर... उसे राह बतानेवाला, दिशानिर्देश देनेवाला कोई चाहिए ही चाहिए... उसने तय किया उसे इस आदत से निजात पाना होगा। जब अकेले ही रहना है तो... ऑटो चली जा रही थी हरी-भरी वादियों और पहाड़ियों से गुजरती हुई। साथ बैठा व्यक्ति लगातार बोल रह था अरावली पर्वतमाला की श्रृंखला के दक्षिण-पश्चिम में 400 फीट ऊँची पहाड़ी पर मनोरम और मनमोहक घाटी में स्थित है राजस्थान का यह एक मात्र पहाड़ी तीर्थ जो कि पर्वतों के ठीक मध्य में स्थित है 'माउंट आबू'। उत्तर में हिमाच्छादित हिमालय और दक्षिण में भव्य नील गिरि के बीच के मध्य सबसे ऊँची 5653 फुट की चोटी गुरु शिखर यहीं स्थित है। यहाँ को लेकर अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं... कि यह सतयुग में भी विद्यमान था... कि यह हिमालय का पुत्र है... कि यह वशिष्ठ मुनि का प्रिय रहा है और इतिहास में भी इसके पुरातन होने के प्रमाण उपलब्ध हैं। चंद्रगुप्त के शासन काल में आए मेगास्थनीज जो कि यूनान के राजदूत थे ने भी लगभग 410 वर्ष ई.पू. इसका उल्लेख किया है।
नंदिता को गाइड का बोलना भला लग रहा था... किसी कमी को पूरता हुआ। पर मन तो लगा हुआ था सुहावने हरे-भरे जंगलों, गहरी खाइयों और काले पत्त्थरों के विशाल चट्टानों को देखने में। ठंडी हवा उसके बालों को उड़ा रही थी। हमेशा खुले रहनेवाले बाल आज बंद होने पर भी क्लचर से निकल-निकल कर उसकी आँखों और चेहरे को ढाँपने लगते। वह उन्हें कानों में लपेटती और सिर बाहर निकाल लेती, ड्राइवर और गाइड के बार-बार मना करने के बाद भी। चोट लग सकते है इस तरह... पहाड़ से चट्टान निकले होते हैं और बृक्षों की टहनियाँ भी, उस पर से रास्ता भी घुमावदार वह क्षण भर को उनके बात मन लेती पर फिर देखने का और जी भर के देखने का मोह... देखते-देखते राह बीत गई थी...
बिना मीटरवाली वह ऑटो रुकी थी। जगह थी, दिलबाग जैन मंदिर... गाइड कह रहा था आज आबू पर्वत जिस चीज के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है वह है, पत्थरों की खुदाई कर के बना भव्य दिलबाग जैन मंदिर। दिलबाग जैन मंदिर भारतीय शिल्पकला का एक अभूतपूर्व उदाहरण है। यह 12वीं शताब्दी की बात है, श्वेत संगमरमर पर सूक्ष्म-कलात्मक खुदाई बहुत ही कौशलपूर्वक की गई है। यह विश्वप्रसिद्ध मंदिर पाँच मंदिरों का समूह है जिसमें विमलबसही और लूणबसही मुख्य है। अन्य तीन मंदिर हैं रिषभदेव, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी के।
सन 1931 में 18 करोड़ 53 लाख रुपए की लागत से गुजरात के महाराजा भीम के मंत्री विमलशाह द्वार निर्मित उन्हीं के नाम पर नामाकृत यह मंदिर प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है। यह जो मुख्य मंदिर क मंडप आप देख रही हैं, ध्यान पूर्वक देखिए, यह अष्टकोणीय है जिसमें 48 स्तंभ हैं। लहरदार मेहरावें एक-दूसरे से मिल रही हैं संगमरमर के ग्यारह छल्लों द्वारा निर्मित इस छत पर जो मूर्तियाँ देख रही हैं आप वे मानव, हाथी व अन्य प्राणियों की चेतना बोधक मूर्तियाँ हैं और मंडप के चारों ओर तीर्थंकरों की ये मूर्तियाँ... धूप नहीं थी फिर भी उसने रुककर पानी पिया था... गला सूख रहा था उसका शायद बोल-बोलकर। इस सुहावने मौसम में भी कनपटी से निकल कर बहती पसीने की बूँदें... कोई भी काम आसान कहाँ होता है... उसने अब जा कर गौर किया, गाइड की उम्र भी हनीफ सर के जितनी ही होगी। पर उनसे कुछ ज्यादा गहरा रंग, कुछ ज्याद पके बाल और उम्र का वह बोध जो खुद हो तो चेहरे पर भी छाने लगता है। सब कुछ पका-तपा सा। जिंदगी आसान कहाँ। चेहरा तक पक-तप जाता है। उसने देखा था एक-एक सैलानी पर टूट पड़नेवाली गाइडों की भीड़... मोल-तोल... गिड़गिड़ाना-रिरियाना। पर वह अलग लगा था उस भीड़ में। जैसे शर्मिंदगी हो रही हो उसे इन सारी बातों से... और उसने निराश नहीं किया था उसे। उसमें समझाने की कला थी, कहने का अंदाज था और आवाज मीठी और तीखी के बीच की एक कड़ी... सोंधी, सधी थोड़ी कच्ची... थोड़ी पकी...। वह सोचती रही थी देर तक उसकी आवाज का अपना प्रभाव...
वह खुद चल कर गई थी उस तक। उसके चेहरे पर एक तृप्ति आई थी। नंदिता भी खुश थी। किसी को खुशी देकर ऐसी ही तृप्ति मिलती है... यह उसने आज कोई पहली बार नहीं जाना था। पर हर बार जानकर भी यह अनुभव नया और अनजाना ही था। अब चलें... इस स्वर ने उसे खींचा था अपनी तरफ... वह चल पड़ी थी उसके पीछे-पीछे।
वस्तुपाल और तेजपाल ने अपने मृत भाई की स्मृति में इसे बनवाया था। इसे तेजपाल मंदिर भी कहते हैं। यह मंदिर नेमिनाथ को समर्पित है। यह मंदिर विमल वसही के तुलना में छोटा जरूर है पर भीतर से उसी की तरह भव्य है। इसके सुंदर स्तंभ, तोरण, गुंबद और भीतरी प्रकोष्ट की नक्काशी देखिए... वे दोनों गुरु शिखर की तरफ चल पड़े थे। उस हिमालय और नीलगिरि के मध्य की सबसे ऊँची चोटी से जब नंदिता ने नीचे देखा तो जैसे देखती ही रह गई। नीचे बच्चों के जैसे छोटे-छोटे घर थे, नदियाँ, पानी सारा का सारा आबू पर्वत और उसके आसपास की जगह। गाइड बता रहा था यह चोटी समुद्रतल से 5653 फीट ऊँची है। उसने उस पीतल के घंटे को छू कर देखा था जिस पर अंकित था सन 1411। फिर नीचे जाती उस नागिन सी पक्की सड़क को जिस पर से उसकी सवारी ऊपर तक आई थी।
नीचे उतरते-उतरते वह थक गई थी। गाइड ने आशा भरी नजरों से उसे देखते हुए पूछा था... कल होटल ही आ जाऊँ...? उसने कुछ सोच कर कहा था... मैं फोन कर लूँगी और उसने उसका नंबर सेव कर लिया था।
उसने तय किया, आगे के दिनों में वह अकेली ही घूमेगी। अपने हिसाब से रुककर, ठहरकर... अपनी तरह से इन जगहों को देखेगी... कथाओं, किंवदंतियों और इतिहास को पीछे छोड़कर, अपनी कल्पना और मन की निगाहों से... हालाँकि ऐसा सोचते वक्त लगातार उस गाइड की नजरें उसका पीछा करती लगी थी... उसने खुद को बहलाने की खातिर सोचा था... उसे कोई दूसरा पर्यटक मिल ही जाएगा।
रात उसे फिर से अकेली कर गई थी... वही एकांत, वही उजड़ापन। शिखर पर्यटक बँगला बिल्कुल शांत और निचाट हो चुका था। थके हारे पर्यटक, ऊँघता चौकीदार और सो चुकी रसोई... उसे लगा उसे कुछ खा-पी कर ही लौटना था।
थकान से उसे नींद आ रही थी पर भूख उसे परेशान किए हुए थी। उसने भूख से ध्यान हटाने के लिए सोचा, आत्मा की पवित्रता के लिए जैन धर्म व्रत-उपवास पर जोर देता है। अल्प भोजन पाँच महाव्रतों में से एक है। तप के दोनों प्रकारों बाह्य और आभ्यांतर में से बाह्य तप अर्थात काया क्लेश, रस का परित्याग, अनशन व्रत उपवास।
वह जितना उपदेशित करती है खुद को, इच्छाएँ और भूख उतना ही परेशान करती है उसे। भागते फिरो बाहर लेकिन लौटना तो होगा कभी एकांत में। एकांत में वही दुख वही यादें, वही क्लेश...
हनीफ सर एक छोटा सा सच नहीं स्वीकार सके... जबकि उसने उनके प्यार में सब कुछ स्वीकार किया था। अपना एकांत। अपना अपमान... उनकी पत्नी, उनका परिवार, उनके बच्चे बचा-खुचा जो कुछ था वही उसका था और उसने उसी में संतुष्ट होना सीख लिया था। कैसा प्यार था उनका... जबकि उसने कहा भी था यह एक दुर्घटना भर थी इच्चा-अनिच्छा जैसी कोई बात ही नहीं थी वहाँ।
और वह वसीम... उसने लाख उपेक्षित किया हो उसे, यह जानते हुए भी कि वह उसके पिता से प्यार करती है, जुड़ा रहा उससे... प्यार करता रहा उससे... प्यार ऐसा ही होता है शायद... उसमें और वसीम में यहाँ तो समानता थी ही, पर वह नकारती रही उसे; और फिर छटपटाती रही उसकी खातिर... जो रोकता रहा उसे क्या वह सिर्फ एकनिष्ठ न कहलाने का भय था... पर अब जब वह कभी फोन या मैसेज नहीं करता, वह बार-बार दौड़ती है मोबाइल तक...
वह घूम रही है हर कहीं। बगैर इच्छा... कुछ भी तो क्षणांश के बाद उसे बाँधता नहीं... सब कुछ फीका... सब उदास... इसीलिए धर्मस्थलों की शरण में चली आई थी वह... यहाँ आकर शायद मुक्ति मिले उन तकलीफदेह यादों से... पर नहीं, वह कामनाओं से मुक्त नहीं... उन्हें दमित करना नहीं आता उसे। कामनाओं-आसक्तियों से जिस त्याग की बात धर्म करता है, वह उससे संभव ही नहीं। फिर क्यों मारी-मारी फिर रही है वह। ...वह श्रमणी तो क्या श्राविका भी कहलाने योग्य नहीं। वह धर्म के चरणों में भी समर्पित नहीं कर सकती खुद को, फिर... शायद कोई पुकार ले इस आशा में। पर कोई नहीं पुकारता उसे। पुकारे भी कौन... हनीफ सर... वह तो उसे छोड़कर चले गए थे... वसीम और उसके प्यार को तो वह जैसे झुठलाकर ही निकली थी... एमीलिया... उसका साथ तो उसने कब का त्याग दिया था, हनीफ सर की खातिर... फिर और दूसरा कौन... कौन है उसका...? क्या मम्मी-पापा से कहे वह सब कुछ... वह सचमुच ले चलेंगे उसे अपने साथ घर... उसने पूछा खुद से वह घर लौटना चाहती है... जवाब फिर भी नहीं ही था, न जाने क्यों...
फिर कौन बुलाएगा उसे, उसे जाना कहाँ है... यही तो वह तलाश रही है शायद... ढूँढ़ती फिर रही है एक ठौर; जहाँ यह मन रम जाए... जहाँ जाकर रुक और ठहर सके यह जिंदगी। संयम और नियम इसी से लगे हैं जीवन में। इसी से शायद मन भी बँधे... वह आरामदायक गद्दे और बिछावन से नीचे उतरती है और एक चादर बिछा लेती है... शायद अब नींद आ जाए उसे... पाँच महाव्रतों में से एक यह भी तो है... आरामदेह बिछावन का त्याग, कठोर स्थान पर शयन... कहीं किसी कीड़े-मकोड़े ने काट लिया तो... एमीलिया सोती थी कभी-कभी नीचे बिछावन डालकर और वह चिढ़ती थी। तब तक अड़ी बैठी रहती जब तक वह ऊपर न चली आए। वह जिद करती... नीचे कुछ काट लेगा... वह कहती... ऊपर भी काट सकता है, तू चैन से सो... तू ऊपर आती है कि नहीं... जिद करने और मनवाने में वह हमेशा से तेज रहे हैं। पहले मम्मी-पापा... फिर एमी... वसीम तक से भी... पर उसकी एक जिद धरी की धरी रह गई थी, सर ने पलटकर भी पीछे नहीं देखा था...
उसका मन रोने को हो आता है, जोर-जोर से। इतनी जोर से कि इस कमरे में इसकी आवाज गूँजे और कोई भी चला आए उसके पस... कोई तो आया है, एक छिपकली उतर कर आ लेटी है; उसके समानांतर... उसकी आँखों में आँखें डाल कर देखती हुई... वह डरी नहीं... आश्चर्य। सुबह उसे हैरत होती है, वह सचमुच जमीन पर ही सोई थी।, कोई सपना नहीं देखा था उसने... वह छिपकली को ढूँढ़ रही है... पर कोई छिपकली कहीं नहीं है…
वह निकलने को होती है कि उसे गाइड का फोन आता है रिसेप्शन से... वह परेशान होती है... होटलों के नंबर तो इनके पास होते ही है... मैडम, जब चलना ही है तो... वह चिढ़ के साथ नकार देती है। वह अकेली घूमना चाहती है, बिल्कुल अकेली...
वह खीज में देर तक नहीं निकलती कमरे से। जब निकलती है तो निकलते ही ऑटो ले लेती है जैसे कोई बिल्कुल पीछे खड़ा हो... ऑटो चलने के बाद पीछे मुड़ती है वह। पीछे कोई कहाँ था... उसे तो बस...
वह फिर अकेली घूमती है हर जगह। अचलेश्वर महादेव, अचलगढ़। उसने पहली बार देखा है, शिवमंदिर में शिवलिंग की जगह सिर्फ एक रुद्र है... उसे अच्छा लगता है वह आबू से कई किलोमीटर आगे तक चली आई पर कोई आवाज उसे परेशान नहीं कर रही। कोई पुरानी-धुरानी कहानी उसे कोई सूत्र नहीं थमा रही, ऐसे देखो, इस नजरिए से इस जगह को। ... वहाँ से अंचलगढ़ किला और जैन मंदिर... फिर अर्कदा देवी का मंदिर... पर यह बड़ी अजीब सी बात ही उसे अकेले देखकर पर्यटक भी आपस में कुछ बुदबुदाते, गाइड इशारा कर लेते आँखों-आँखों में एक दूसरे को... वैसे हीं जैसे शिखर पर्यटक बँगले के स्टाफ और वहाँ ठहरे सैलानी... सिर्फ वही गाइड नहीं हँसता था आँखों-आँखों में उसे देखकर... उसने गौर किया वह किसी भी पर्यटक टोली के साथ नहीं दिखा था... उसे अजीब तो लग रहा था यह सब पर वह ऐसे रहना सीख रही थी धीरे-धीरे... एमी होती तो... पर वह एमी नहीं थी और उसने यह भी सीखा तो अभी-अभी...
सनसेट प्वाइंट पर भी उसे एक भव्य विशाल सूर्य उतरता दिख रहा था धीरे-धीरे, विशाल और सुंदर मैदानों के बीच। सूरज का लाल-पीला गोला धीरे-धीरे अंधकार में विलीन हो रहा था, उस अंधकार को भी अपना रंग देता हुआ। दृश्य सचमुच अनुपम था। डूबना और बीत जाना भी इतना सुंदर... इतना आकर्षक... क्या तभी लोग मोक्ष या कि मुक्ति की कामना में अपना पूरा शरीर, अपना पूरा जीवन जला-गला देते हैं... क्या फिर मुक्ति भी इतनी ही खूबसूरत होते होगी... रिरियाती-गिड़गिड़ाती एक-एक साँस के लिए हाथ जोड़ती, कलपती हुई नहीं... आम लोगों की तरह। अगर ऐसा होता होगा तो सचमुच कितना भव्य होता होगा सब कुछ। क्या निर्वाण की परिकल्पना इसी से उपजी होगी... जैन धर्म तो कहता है हर जीव अपने आप में अलग है... सबकी आत्मा अलग-अलग... तो क्या मुक्ति के सच भी अलग-अलग होते होंगे सबके और उसे अपना तरीका ढूँढ़ना होगा। अपना बनाया एक अलग रास्ता... क्योंकि ये धर्म और ये नियम तो उससे बिल्कुल भी नहीं निभाए जाते। इच्छाओं को जितना परे फेंकती है वह उससे उतनी ही ज्यादा लिपटती जाती हैं वे... सबको पीछे छोड़ आई तो किसी के द्वारा बुला लिए जाने की आकांक्षा... नंदिता परेशान थी सर जैसे चकरा रहा हो उसका। वह जागी तो शिखर पर्यटक बँगले के कमरे में ही थी। पर जागना शब्द उसे उचित नहीं लगा। वह सोई ही कब थी...? वह तो सनसेट प्वाइंट पर थी... और अब... सामने वही चेहरा आ गया था जो दो दिन उसके साथ था और आज जिसके साथ को उसने उपेक्षित किया था। पर आज जो मृदुता वहाँ थी वह पहले कभी नहीं दिखी थी उसे। पानी दो इन्हें। उसके सामने दो-दो हाथ थे पानी का गिलास लिए हुए। उसने थाम लिया था। वे तीनों हँस दिए थे एक साथ। उस चेहरे ने जिसके पके हुए गंदुमी रंग से पहले उसे हनीफ सर की उम्र का समझा था आज हँसते हुए होने के कारण आज उतना बड़ा नहीं लगा... उसने कहा था, कुछ खिलाओ-पिलाओ इन्हें, वर्ना यहाँ की खूबसूरती में डूब कर सुध-बुध खो देंगी और इल्जाम हम आबूवालों के सिर पर होगा।
इतनी खूबसूरत है आपकी धरती... और नहीं तो क्या... और इतना प्यार है इससे... है, बिल्कुल है... होना नहीं चाहिए क्या... वह चुप हो गई थी और फिर वे सब समवेत स्वरों में हँस रहे थे।
...वह चिढ़ी होगी कुछ... पर उसने जो कहा था वह सच था... इस छोटी सी जगह में क्यों सड़ रहे हैं आप... आप पढ़े-लिखे लोग हैं, समझदार भी... बाहर निकलिए, देखिए कितना कुछ होगा आपके झोले में... आपके पास ज्ञान है। और आप तो रटी-रटाई बातें भी नहीं कहते...
उस शख्स के चेहरे पर स्वाभिमान की बूँदें कौंधी थी पर शायद मुरझा गई थीं। शायद इसीलिए आपको मैं गाइड के रूप में पसंद नहीं आया...
नहीं वह तो मैं अपनी दृष्टि से देखना चाह रही थी हर चीज; दरअसल मैं बस एकांत चाह रही थी... भीड़ भरी जगहों में एकांत खोजने आई हैं आप, कमाल है। वह अभी भी तुर्श था... नहीं अपने एकांत को भरने आई हूँ मैं... नहीं शायद यह भी नहीं... शायद...
...रहने दीजिए... खा लीजिए कुछ वर्ना फिर चक्कर आ जाएगा। दिमाग पर इतना जोर न डालिए
वह उठ खड़ी हुई थी, बगैर जाने कि वह कहाँ है और उसे जाना किधर है... वह डगमग कदमों से निकल ही पड़ती शायद कि उन हाथों ने बढ़कर उसे रोक लिया था, कहाँ?
वह रुक गई थी। रुकी तो धीरे-धीरे तनी प्रत्यंचा भी थम गई थी। तय यह भी हो गया था कि बची-खुची जगहें वह प्रवीण के साथ ही देखेगी।
देर रात तक प्रवीण बतियाता रहा था उससे। पर हैरत यह कि उसके बारे में उसने कुछ भी नहीं पूछा था, एक बार भी नहीं। जबकि वह चाह रही थी, प्रवीण पूछे कुछ भी और वह सब कुछ उगल दे। उसने पूछा था बस नंदी से कल यहाँ कहाँ घूमी थीं आप... नंदी ने कहा अचलेश्वर महादेव, अकंदा देवी और अंचल गढ़ का किला और जैन मंदिर। सन सेट प्वाईंट पर तो आप मुझे मिले ही थे। वह हँसा था, हाँ उन तीन विदेशी सैलानियों के साथ आप तब बेहोश हो कर गिर पड़ी थीं। कोई बढ़ ही नहीं रहा था आपको उठाने को... बहुत मुश्किल से मैंने मनाकर उन महिलाओं को दूसरे गाइड को सौंपा था, फिर आपको उठा कर यहाँ लेता आया... आपके पैसे उन्होंने दिए... थोड़ी देर चुप रहने के बाद प्रवीण ने कहा था... छोड़िए न इन बातों को... मैंने कह दिया था सारे पैसे उस दूसरे गाइड को... वह भौंचक सी उसका चेहरा देखती रह गई थी... बात बदलने की खातिर ही प्रवीण ने हिसाब लगना शुरू किया था... अब बचे रह गए हैं गौमुख, टाँड़ टाक, नक्खी तालाब व तालाब से लगा हुआ रघुनाथ जी का मंदिर। पूरे इत्मीनान से घूमें तो दो से तीन दिन... नहीं तो एक दिन में भी... प्रवीण का मोबाइल बज रहा था लगातार... चुप्पी तोड़ते हुए नंदी ने कहा था, कॉल लीजिए... नहीं बाद में। फिर पूछा था, वैसे आपके पास वक्त कितना है... उसने कहा था बस वक्त ही वक्त है, आप पूरे इत्मीनान से घुमाना मुझे। फिर भी... वह न चाहते हुए भी खीजने-खीजने को हो आई थी... कहा ना बहुत वक्त है... उतना, जितना कि आप निकाल सको, मुझे घुमाने की खातिर। या यों कहें कि उससे भी ज्यादा। वही चाहती थी कि वह कुछ पूछे और वह फूट पड़े... पर पहले सवाल से ही उसे परेशानी हो उठी थी... प्रवीण ने समझ ली थी शायद उसकी झिझक और कहा था। एक काम करते हैं, जहाँ जहाँ घूमना है हमें उन जगहों के बारे में संक्षेप में मैं आपको अभी ही बता देता हूँ। हालाँकि पूर्वाग्रह तो फिर भी निर्धारित हो जाएँगे पर उस वक्त की तल्लीनता में कोई बाधा नहीं होगी इससे... आपको यूँ भी घूमने देता था पर कल की घटना से थोड़ा डर गया हूँ मैं... मेरी इतनी चिंता क्यों हो रही है आपको? ...प्रवीण कुछ नहीं कहता, बस सोचता है... यह रहे-रहे इतनी तुर्श क्यों होने लगती है किसी से भी।
प्रवीण के मोबाइल की घंटी फिर बज रही है। बज-बज कर चुप हो गई फिर। नंदिता हँसी थी... पर प्रवीण सचमुच गंभीर था... और विषय पर भी... हँसने की बात नहीं है यह पर बाधा तो होती ही है इससे। आपकी सोच, आपकी कल्पना सब बाधित होती है इस तरह की कमेंट्री से... मैं भी मानता हूँ आपकी बात को... पर क्या करूँ मेरा पेशा ही ऐसा है...
इसीलिए तो कहती हूँ छोड़ दो यह पेशा, मेरे साथ दिल्ली चले चलो... सपरिवार। नंदिता ने बाद में जोड़ा था यह शब्द।
वह मैं कह नहीं सकता। इस जगह के मोह से बेतरह बँधा हुआ हूँ मैं। इसे छोड़ नहीं पाऊँगा। उन आँखों में एक बेचैनी थी, बेबसी थी... नंदिता ने साफ-साफ देखा था यह और चुप हो गई थी।
शायद बात बदलने के लिए ही उसने कहना शुरू किया होगा पर इस वक्त नंदिता पूरी दिलचस्पी से सुन रही थी - टांड और नन रॉक... टांड शब्द टोड (मेढकों की एक प्रजाति) से बना होगा शायद इस एक पत्थर की आकृति मेढक जैसी है और दूसरे की घूँघट निकाले स्त्री जैसी। ...यह नन रॉक क्यों कहा जाता है... ठीक-ठीक कह नहीं सकता क्योंकि ननों में घूँघट निकालने का प्रचलन तो है ही नहीं... शायद इसलिए कि यह स्त्री है।
नंदिता की आँखों में नींद उतर रही थी अपने आप... कई दिनों के बाद बिना किसी कोशिश के। वह फिर भी चेतन कर रही थी खुद को; उसे सुनकर जानना है सब कुछ... प्रवीण ने पूछा था, सोना चाहती हैं आप... नहीं... क्यों... क्या नींद नहीं आने की बीमारी आप को भी है... और दोनों हँस दिए थे। फिर हँसी थामकर नंदिता ने कहा था... थी नहीं इन दिनों हो चली है...
नींद न आने की बीमारी शायद उस ॠषि को भी थी... नंदिता चौंकी थी, किस ऋषि को... पर सवाल अभी जुबान तक पहुँचा नहीं था प्रवीण ने कहा था उसी ऋषि को जिसने नख से तालाब बनाया... या यू कहें कि उन सब लोगों को नींद नहीं आने की बीमारी होती है जिन्हें कभी प्रेम हुआ था या कि प्रेम है... बालम रिसयाँ नामक एक संत ने अपनी प्रेमिका को खुश करने अर्थात उसे पाने के लिए एक किंवदंती के अनुसार दिन-रात जुटकर अपने नाखूनों से यह तालाब खोदा था। इसीलिए इस तालाब का नाम नक्खी तालब पड़ा। यह अब हिंदुओं का एक पवित्र सरोवर है। इसके आस-पास हरा-भरा उद्यान है और उसमें एक महावीर स्तंभ भी। यहाँ नौका विहार भी होता है, झील के बीचोंबीच एक भव्य टापू भी बना है... प्रवीण ने रुककर पूछा था आपको बोटिंग का शौक है? नंदिता ने इतने दिनों बाद किलककर किसी से कहा था - हाँ... और फिर थम कर पूछा था... यह सच हो सकता है क्या कि कोई किसी के प्रेम में पूरा का पूरा तालाब अपने नाखून से खोद डाले... प्रवीण हमेशा की तरह गंभीर था... हाँ होता है, हो सकता है सब कुछ। प्रेम में असंभव कुछ भी नहीं होता आप अपने दुख में दुखी हो कर जो यह कह रही हैं वह बस इस क्षण का सच है... उसने सोचा था तो क्या प्रवीण समझता है उसकी मनोदशा को... इसीलिए अकेल नहीं छोड़ना चाहता उसे... इसीलिए बातों से बहलाता रहता है उसका मन... और फिर भी गलती से भी नहीं छेड़ना चाहता है उसकी दुखती रग... प्रवीण अभी भी कह रहा था... आप खुद से ही पूछो क्या यह संभव नहीं है... नंदिता ने देखा इस प्रश्न के साथ ही उसकी आँखों में एक चेहरा उतर आया था... वसीम का, हनीफ सर का नहीं, उसे आश्चर्य हुआ था... तो क्या उसकी मंजिल... उसने जैसे खुद से और इन बातों से भी कतराते हुए कहा था... और अब आगे कुछ नहीं... जम्हाई लेने के लिए उसने अपने मुँह पर हथेलियाँ रखी थी... प्रवीण चुपचाप उसके कमरे से बाहर निकल गया था...
वे इत्मीनान से घूमते, हँसते-बतियाते और रात को लौटकर होटल के उसी एकमात्र कमरे में पहुँच जाते। नंदिता को अब भूख भी अच्छी लगती थी और नींद भी अच्छी आने लगी थी...
उस दिन वह सबसे खुश थी। उस दिन ॠषभदेव जाने का प्लान था। इसके लिए उन्हें पहले उदयपुर लौटना था, फिर उदयपुर से 64 किमी की दूरी पर... प्रवीण उसके साथ उतनी दूर जाने को भी तैयार था...। नंदी ने पहली बार अपना मुँह खोला था... एक बात कहूँ अगर आपको बुरा न लगे तो... कहिए... मैं जाते-जाते मिलना चाहती हूँ उनसे... मतलब... मतलब उन्हीं बार-बार आपको कॉल करनेवाली और इतना उम्दा खाना बनानेवाली से... मेरी पत्नी... प्रवीण हँसा था... और हाँ एक बिटिया भी है मेरी छोटी सी... अगर वे दोनों तैयार हुई तो हम सब साथ-साथ ॠषभदेव चलेंगे।
...उस दिन वे सब साथ थे, प्रवीण की पत्नी, उसकी बच्ची, प्रवीण और खुद वह। उन लोगों ने उस दिन खूब मस्ती की थी। पिकनिक मनाया था और अंत्याक्षरी खेली थी जमकर। फिर बोटिंग... निशा तो बस चिपकी फिर रही थी उससे... पर प्रवीण की पत्नी कभी खुलती कभी बंद हो लेती अपने आप में। उसकी नजरों में कुछ था जिसे नंदिता भाँप नहीं पा रही हो ऐसा भी नहीं था। नंदिता कोशिश करती कि किसी भी तरह प्रवीण की पत्नी के दिल से वह वहम जाता रहे... पर इस वहम का जाना इतना आसान भी नहीं था और ना ही यह वहम अस्वाभाविक। नंदी सोचती, खुद में कोई भी औरत किसी गैर स्त्री को अपने प्रिय के इतने पास देखे तो शायद ऐसा ही सोचे, ऐसा ही महसूसे... वह भी शायद... इतना कन्सर्न्ड देख कर तो और भी। नंदिनी ने हार कर कोशिश छोड़ दी थी।
...और फिर उसे लगा था कोशिश छोड़ते ही वह थोड़ी सहज दिखने लगी। शायद उन दोनों की नजदीकी से भी ज्यादा परेशान वह नंदी के चौकन्नेपन और सफाईपरस्ती से थी।
उसी दिन प्रवीण ने बताया था उसे... वहाँ आदिनाथ जी की मूर्ति है... यहाँ प्रतिदिन उनकी मूर्ति को इतना केशर चढ़ जाता है कि शाम तक सारी मूर्ति ही केसरमय हो जाती है। इसीलिए लोग इन्हें केसरिया बाबा भी कहते हैं और इस ग्राम धुलेद के नाम पर धुले बाबा भी। सबसे हैरत की बत तो यह है नंदिता कि यह स्थान वैष्णव और जैन दोनों के लिए समान रूप से पूजनीय है।
नंदिता हुलसकर बोली थी तभी तो मैं यहाँ आई हूँ... जानते हो, मेरे पापा जैन हैं और मम्मी ब्राह्मण... यह जगह तो मेरे लिए घर जैसी ही हुई न... और सब ठठाकर हँस दिए थे।
हँसी उस दिन बहुत हो चुकी थी, इतना ज्यादा कि नंदिता अब हँसने से डर रही थी। इतना ज्यादा हँसना भी ठीक नहीं... मम्मी हमेशा कहती थी ज्यादा हँसो तो रोने की बारी आ जाती है... और शायद ठीक ही कहती थी वो... एमीलिया का मैसेज आया था अचानक... लौट आओ, जहाँ कहीं हो... परसों शाम तक तो जरूर ही... और लौटकर मेरे फ्लैट पर आने की बजाय वसीम के घर आना।
नंदिता को खुश होना चाहिए था। इसी बुलावे के इंतजार में थी वो कबसे... और अब तो बुलावा भी आ गया था। पर खुश बिल्कुल भी नहीं हो पा रही थी वह...। उसने फोन किया तो वह उठा ही नहीं रही थी। उसके होंठों पर आया... बदमाश...
आखिर उसे यूँ हड़बड़ी में बुलाए जाने का कारण क्या होगा, वह चाह कर भी तय नहीं कर पा रही थी। क्या एमी उसे फिर से जोड़ना चाहती है... वसीम या कि हनीफ सर से... हनीफ सर से तो बिल्कुल भी नहीं... कभी पक्षधर नहीं रही वह इस रिश्ते की... नहीं एमी ऐसा बिल्कुल भी नहीं कर सकती... निजी स्वतंत्रता की बातें वह तो जोर-शोर से करती है... फिर कैसे थोप सकती है अपनी इच्छा उस पर... बिना मिले वह एमी से ऐसा सोच भी रही है तो क्यों... कोई दूसरा भी तो कारण हो सकता है... फिर और क्या... वह टूटकर रो पड़ी थी... इतना कि सब चौंक पड़े थे...
अब जब कि उसने एक दुनिया ढूँढ़ ली थी खुशियों की... एक सांत्वना, एक मार्ग तलाश लिया था अपने लिए, उसे लौटना था... और वह भी किसलिए यह तक नहीं पता था उसे... वह प्रवीण की पत्नी के गले मिल कर रोई थी... निशा को कलेजे से लगा लिया था उसने... और ट्रेन की खिड़कियों को तब तक थामे रही थी जब तक प्रवीण की हथेलियाँ दिखती रही थी उसे। ट्रेन ने तेज गति पकड़ ली थी... और प्रवीण छूट गया था बहुत पीछे...
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