मेरा पता कोई और है /कविता

User avatar
kunal
Platinum Member
Posts: 1438
Joined: 10 Oct 2014 21:53

Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Post by kunal » 24 Sep 2017 16:15

6

नसीमा सुनती रही थी बार-बार इधर-उधर से उस लड़की के बारे में। लोग बाग उसे घेर-घूर कर बतलाना चाहते यह, तरह-तरह से। जिसमें रिश्तेदार भी थे और दोस्त भी...। पर वह हनीफ मियाँ के चेहरे से कभी कुछ नहीं पढ़ पाती। न वह उनकी तरफ से रिश्ते को निभाने में कोई कोताही देखती और न ही गर्मजोशी का अभाव।
लोग जब-जब कहते वह एक बार फिर परखना चाहती अपने उस रिश्ते को। एक-एक पल निगाह रखती उन पर। पर वे जस के तस... वही बच्चों को बेहद प्यार करनेवाले पिता... उसके लिए लबालब प्यार से भरे पति। ठीक था कि हनीफ मियाँ घर की दूसरी जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह थे, पर वह इसलिए कि उसने खुद ओढ़ ली थी सारी जिम्मेदारियाँ... अब दिन भर वह घर में करे भी तो क्या... बच्चे भी तो बड़े हो गए थे। और फिर आम घरेलू औरतों की तरह इधर-उधर का बतियाने या फिर टीवी सीरियल्स देखने में उसका मन नहीं लगता था। कुछ औरतों के बीच जो थोड़ा बहुत बैठती थी उससे भी वह इसलिए कतराने लगी थी कि जब बैठो घूम फिर कर वे उसी एक बात पर आ जाती, इशारों में, कनफूसियों में या कि सीधे-सीधे। और फिर ये काम भी तो अपने ही थे, उसी के अपने घर के... लेकिन घर की जिम्मेदारियों से वे चाहे जितने भी लापरवाह रहे हों, उसकी खातिर कभी कोई लापरवाही उन्होंने नहीं की। उसकी हल्की सी सर्दी हो या दाँत का छोटा-मोटा दर्द, वे बुरी तरह परेशान हो जाते। बेसाख्ता डॉक्टरों के चक्कर लगाना शुरू कर देते। चाहे जैसा बन पड़ता खुद ही पकाते और बच्चों को भी खिलाते। वह समझ नहीं पाती थी कि वह उनसे कहे भी तो क्या, खास कर तब जब अम्मी और भाई उसे तरह-तरह से समझाते, दवाब देते उस पर कि वह हनीफ मियाँ से बात करे... वह दिन-रात तलाशती रहती वह सिरा जहाँ से अपनी बात शुरू कर सके। पर वह कोई एक सिरा जैसे हनीफ उसके हातों में आने ही नहीं दे रहे थे...। वह अगर एक बार कभी कहती - हमलोगों को साथ बाहर गए कितने दिन हो गए तो हनीफ मियाँ उसकी ख्वाहिश को हाथोंहाथ लेते हुए कई दिनों का प्रोग्राम बना देते... वे उसकी कोई भी ख्वाहिश अधूरी नहीं रहने देना चाहते थे... और सबसे बड़ी बात तो यह कि ऐसा करते हुए उसके लिए उनकी चाहत, उनकी गर्मजोशी बिल्कुल वैसी ही थी...। वे टूट कर प्यार करते उसे... इस तरह जैसे कि पहली बार मिले हों, वह भी तब जब वसीम सयाना हो चुका था। कभी-कभी तो वह खुद भी शर्मा उठती उनके चाहत की इस ललक से। वह सोचती बार-बार... झूठ ही कहते हैं सब। अगर हनीफ मियाँ की जिंदगी में कोई दूसरी औरत होती तो यह ललक कहाँ बनी रहनेवाली थी। उसे भरोसा नहीं होता था इस बात पर कि पेट यदि भरा हो तो कोई इस ललक से टूट सकता है सामने परोसी थाली देख कर। जैसे पेट एक ही होता है उसी तरह मन भी एक। जब कोई भीतर से भरा हो कहाँ जुड़ सकता है किसी दूसरे से। इसीलिए उसने लोगों की बात पर ध्यान देना छोड़ दिया था...। इसी कारण बाहर निकलना भी। अब जब निकलो यही एक बात। अगर वह खुश है अपनी जिंदगी से फिर दूसरों को क्या दिक्कत है, कौन सी परेशानी? उसे लगता लोगबाग जलते हैं उसके रिश्तों में अभी तक बची गर्माहट को देख कर। और हनीफ मियाँ भी तो और हैं, कोई सी भी जगह हो, कितने भी लोग... उनकी निगाहें लगातार उस पर ही लगी रहती हैं। उसे कोई परेशानी तो नहीं... वह असहज तो नहीं दिख रही। उसे तो कभी-कभी यह भी लगता कि उसके प्रति उनकी यह ललक दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है...।
वह सोचती, होगी कोई लड़की जिसकी कुछ मदद कर दी होगी इन्होंने। बताते तो हैं वो उसे मकान दिलवा दिया है, पढ़ाई में भी मदद करनी होती है... और लोगों के ले उड़ने के लिए बस इतना ही काफी हो गया होगा। अब इनकी तो आदत ही ठहरी लोगों की मदद करने की। वक्त-बेवक्त, जगह-बेजगह... फिर कुछ भी कहाँ खयाल रह जाता है इन्हें... अब उनकी आदतों को कैसे बदल दे वह...। पर हाँ, पिछले ही दिनों जब वे बाहर थे उन्होंने वहाँ से फोन किया था - वसीम को कहना कि थोड़ा वक्त निकाल कर एक बार नंदिता को देख आए, अकेली है और बीमार भी। कोई दवा तक ला देनेवाला नहीं है उसके पास... तो पहली बार चिहुँकी थी वह... वसीम क्यों जाने लगा वहाँ... बुला ले किसी को फोन कर के, कोई न कोई तो होगा ही, सहेली, साथी... कोई रिश्तेदार। आप बाहर गए फिर भी... जो कुछ वह सामने रहते नहीं कह पाई थी कभी, फोन पर कह गई थी उस दिन... मन जैसे हल्का हुआ था कुछ... उधर से आती हनीफ मियाँ की आवाज में फिर भी एक इल्तिजा थे... कोइ गुस्सा या कि बेअदबी किए जाने का कोई दुख तक नहीं। कोई नहीं है तभी तो कह रहा हूँ, बुखार में है... और करना ही क्या है। जा कर देख लेगा एक बार। जरूरत हुई तो डॉक्टर को दिखला देगा नहीं तो दवाएँ भर लानी होंगी बस। नसीमा को लगा उसके किसी कहे को कहाँ कभी इन्कार करते हैं हनीफ। उसे हैरत हो रही थी कैसे इतनी कड़ी हो गई है वह, लोगों के कहे-सुने में आकर... उसे उनकी बात तो माननी चाहिए थी। उसने कहा ठीक है...
और तब से वह वसीम की राह तक रही थी कि वह आए और उससे वह उस लड़की के पास जाने की बात कह सके। उसे लगा यह ठीक भी है। वसीम उससे बता सकेगा उस लड़की के बारे में... घर देख कर तो बहुत कुछ समझ में आ जाता है, और वसीम भी तो कोई बच्चा नहीं रह गया है अब... कुछ न कुछ तो सुना होगा उसने भी... आखिर देखूँ वह क्या कहता है।
वसीम आया और चला गया था। उसे हैरत हुई कि उसने कोई इन्कार नहीं किया था। पर तब से जैसे घड़ी की सुइयाँ जैसे रुक गई हों। वक्त खिसकने का नाम ही नहीं ले रहा था। उफ, ये वसीम भी न... गया तो अपना डेरा-डंडा भी वहीं जमा लिया। अपने बाप का ही तो बेटा है। गुस्से में उसने सोचा जरूर पर गुस्सा थम गया था यह सोच कर कि उसी का लाड़ला है वह... उसकी हर बात माननेवाला। उसका खयाल रखनेवाला। और वह वहाँ गया भी तो उसी के कहने पर है। उससे हर बात बताए बगैर जिसका दिन अभी भी पूरा नहीं होता, छोटे बच्चे की नाई... वह आएगा तो कहेगा ही सब कुछ। बाहर शाम गहराती जा रही थी। बेमन से ही सही उसने खाना पकाना शुरू कर दिया था...। वह आएगा तो भूख लगी होगी उसे। सब्जी बना लेने के बाद जब उसने चखा तो पता लगा उसमें नमक ही नहीं है, सालन भी बिल्कुल गाढ़ा। उसने नमक और पानी मिलाया। रोटियाँ भी उतनी मुलायम नहीं हो सकी थी, हमेशा की तरह। कुछ कड़ी, चीमड़, मोटी-मोटी सी। उसने रोटियों पर घी थपका। ऐसी रोटियाँ तो उसने कभी नहीं पकाई, कौन खा पाएगा इन्हें। बेखयाली के आलम में यह क्या-क्या कर डाला उसने। थोड़ी मुलायम हो जाएँगी ऐसे। हनीफ होते तो ऐसा नहीं कर पाती वह। घी लगी रोटियाँ नहीं खाते वे। वे नहीं खाते इसलिए और सब भी...। पर उसे आज कुछ अलग कर के अच्छा लगा। फिर रोटियों को कपड़े में लपेट कर उसे डलिया में डाला। फिर सोचने लगी वह पता नहीं वसीम कब तक आएगा...। पता नहीं इतनी देर क्यों लगा रहा है वह। रोटियाँ ठंडी हो जाएँगी रखे-रखे। फिर वक्त काटने के लिए उसने सेवइयों का डब्बा खोला। सूखी-भूनी सेवइयाँ निकाली और उबलते दूध में छोड़ दिया। ताजा दही निकाल कर आलू का रायता बनाया। हनीफ और वसीम दोनों को पसंद आता है यह रायता। वह सोच रही थी कि अपनी तरह का यह अकेला मुसलमान परिवार होगा जहाँ महीने में चार दिन भी गोश्त नहीं पकता... उसके मायके तो मांस के पकवानों के बिना तो खाना पूरा माना ही नहीं जाता। हनीफ मियाँ गोश्त नहीं खाते, अंडे खाते हैं सिर्फ सो पकना भी लगभग जैसे बंद हो गया है...। वह वसीम के लिए पकाती है बस... उसने सोचा कल कहेगी वह उससे कि गोश्त ले आए, अब्बू तो वैसे भी लौट नहीं रहे कल।
उसे याद आया शुरू-शुरू में हनीफ मियाँ खाते तो थे गोश्त पर हर निवाले के साथ उनका बोलना यूँ चलता रहता जैसे कोई प्रायश्चित... यह कहाँ का नियम है... कहाँ का शौक... अपना पेट भरने के लिए किसी मासूम जानवर की जान ले किसी का परिवार खत्म कर दो... किसी का बच्चा, किसी की बीवी, किसी का शौहर... उसका कौर भी जहाँ का तहाँ थम जाता... गले का गले में अटकने लगता फिर। मुँह में जो कुछ भी होता बेमजा हो जाता अचानक। वह उठ जाती थाली से। वे खाते-खाते बतियाते रहते खुद से ही वही अल्ल-बल्ल। उसने पूछा था एक दिन, आप कहें तो मांस-मछली न पके इस घर में... उसकी आवाज में जरूर कहीं गुस्सा रहा होगा। वे झेंप से गए थे, शर्मिंदगी उनकी आवाज पर तारी थी... मैने ऐसा कब कहा? मैं तुम लोगों को नहीं रोकूँगा। रोकूँ भी क्यों... पर हाँ मुझे मत परोसा करो...। नसीमा प्लीज मेरी बातों को समझने की... उस दिन से गोश्त जब भी पका उनके लिए, सूखी सब्जियाँ पकी, सालन पके। उसमें यह दोहरी मिहनत हिकारत भरती। फिर उसने यह सब तभी पकाना शुरू किया जब हनीफ मियाँ घर पर नहीं हों। और महीने में तीन-चार दिन तो ऐसे हो ही जाते थे... उसे इतनी रस्साकस्सी करने की जरूरत भी नहीं पड़ती...। हाँ अंडे वे खाते थे अब भी। अंडे उन्हें पसंद थे और वह जानती थी इन्हें खाने के लिए कोई न कोई तर्क तलाश लिया होगा उन्होंने।
रात धीरे-धीरे पसरती जा रही थी और वसीम... उसने समझाया खुद को, दिल्ली की सड़कें इतनी खाली तो होती नहीं है, ऊपर से शाम का वक्त। कहीं डॉक्टर से भी दिखलाना न पड़ा हो... उसे इंतजार ही नहीं करना चाहिए, वह आएगा ही वक्त होने पर... वह इतनी बेसब्र क्यूँ हुई जा रही है... वह बिस्तर पर आ कर लेट गई थी... टी.वी. चलाया था और फिर ऑफ कर दिया था। जबकि सामने चलता धारावाहिक उसका पसंदीदा प्रोग्राम था और कहानी भी आज एक नया रुख लेनेवाली थी...। वह बिस्तर पर ही बैठी रही चुपचाप, पता नहीं कब तक कि घंटी बजी थी। उसने जैसे झपट कर दरवाजा खोल था... देर कर दी बहुत... हाँ हो गई... बुखार ज्यादा था उन्हें... डॉक्टर के यहाँ तो नहीं जाना पड़ा...? वह देख कर जा चुका था पर दवाइयाँ लानी थी। वह वसीम का चेहरा बहुत गौर से देख रही थी। पर वह तो कोरे कैनवस की तरह बेरंग था... चेहरे पर कोई भाव तक नहीं। अब कैसी है... बुखार कम तो था तब, अब पता नहीं। वैसे मैंने अपना मोबाइल नंबर उसे दे दिया है... उसे अजीब लगा, हालाँकि जैसा वह समझती है वह वसीम की ही हमउम्र होगी। पर वसीम का उसे तुम कहना, कुछ अजीब सा लगा... क्यों... वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी। पर इस अजीब लगने को वह बुरा लगना भी नहीं कह पा रही थी। चलो खाना लगाती हूँ। वे दोनों खाने पर बैठ गए थे पर खाया भी उन्होंने बिल्कुल चुपचाप। वह इंतजार ही करती रही कि वसीम उसे कुछ बताएगा, उस लड़की के बाबत... उसके घर उससे मुलाकात के बाबत... वह वसीम जो कहीं से भी लौट कर एक-एक घटना उसे तसल्ली से बताता था, छोटी से छोटी बात भी... हनीफ कहते भी इसे जरा खुद से दूर करो अब... औरतों की तरह बतियाने लगा है। पर आज जो वसीम था वह कोई दूसरा ही था...। पर नहीं, थोड़ी देर बाद समझ में आया उसे, सामने बैठा शख्स वसीम था ही नहीं, जैसे हनीफ मियाँ ही थे अपने गुरु-गंभीर अंदाज में। और फिर हमेशा की तरह सवाल सब उसके चुप हो गए थे। जिद तो वह वसीम से करती है, सवाल भी पूछने का हक भी उसका उसी से है, इस हनीफ मियाँ की परछाई से नहीं...
खाना खत्म हो गया था, वे दोनों उठ कर अपने कमरे की तरफ चल दिए थे। पता नहीं क्यों उसे लगा बिल्कुल अकेली हो चली है वह... वसीम की इस छोटी से चुप्पी ने झकझोरा था उसे।
देर रात तक सोचती रही थी वह... अगर कुछ गलत या बुरा लगता उसे वहाँ तो उसे वसीम जरूर बताता। वसीम चुप था मतलब वैसी कोई बात ही नहीं थी बताने की। उसे तो निश्चिंत होना चाहिए पर वह बेकार ही परेशान हुई जा रही है। उसने तकिए को खींचा था। उसे लगा हनीफ की हथेलियाँ है उसके सिर के नीचे। दूसरा तकिया उसके समानांतर था ठीक उनकी जगह पर। उसने मुँह छुपा लिया था उसमें। मेरे सिवा और कोई तो नहीं है आपकी जिंदगी में... उसके स्वर में लाड़ था, अधिकार भी... मैं तुम्हारी जगह किसी और को नहीं दे सकता... कभी भी, किसी भी हाल में। तुम बेफिक्र रहा करो नसीमा। नसीमा के माथे पर उस चुंबन की मिठास जैसे फिर से चिपक आई। वह तकिए में समा गई थी फिर... वह हनीफ मियाँ में समा गई थी... वह उनकी पनाहों में थी और सुरक्षित-संरक्षित भी... वह बेकार डरती रहती है लोगों की बात सुन कर। वह कैसे भूल उठती है यह सब कुछ। वह तकिए से लगी-लगी निश्चिंत सो गई थी।
Image

Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Sponsor

Sponsor
 

User avatar
kunal
Platinum Member
Posts: 1438
Joined: 10 Oct 2014 21:53

Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Post by kunal » 24 Sep 2017 16:15

7
वसीम के लिए वह सुबह जैसे बिल्कुल नई-नई थी, आम सुबहों से बिल्कुल अलग। एक दम नई-नकोर, बिल्कुल धुली-धुली सी। हवा की खुनक में पिछली रात की यादें हों जैसे। उसका रोम-रोम वे वैसे ही तो सिहरा रही थी। उसका मन बहुत हल्का-हल्का था। बीत चुके न जाने कितने वर्षों के बाद एक बार फिर... वगरना तो वह एक बोझ सिर पर लादे रहता चौबीस घंटे। और वह बोझ अम्मी को न दिखे इसके लिए जबरन बोलता बकवास करता रहता उनके आगे।
उसे लगा जैसे अचानक बड़ा और जिम्मेदार हो उठा है वह सब के लिए...। अम्मी, अब्बू और उसके लिए भी...। उसके घर से अपने घर तक का सफर जैसे उसने हवा में उड़ते हुए पूरा किया। सुबह अभी-अभी हुई ही थी। ट्रैफिक और भीड़ नहीं थी सड़कों पर उतनी। वह बाइक को जैसे उड़ा ले जा रहा था। हालाँकि ऐसा करते हुए उसे खुद हैरत हो रही थी...। वह हमेशा एक जिम्मेदार चालक रहा है, जिम्मेदार बेटे और जिम्मेदार नागरिक की तरह। उसका मन हो रहा था वह उड़ कर अम्मी के पास पहुँच जाए और उन्हें सब बता दे... सब कुछ। हाँ दोस्त बहुत रहे हैं उसके पर अम्मी से बड़ा दोस्त नहीं रहा कोई उसका। वह सारी बातें अम्मी को न बता ले जब तक चैन कहाँ मिलता है उसे... अभी तक भी। अब्बू इसीलिए उसे अम्मी का बच्चा बताते हैं सबको। बताते रहें उसे परवाह नहीं कोई।
उसे अम्मी का उस दिन का चेहरा याद आया जिस दिन उन्होंने उसे नंदिता को देखने जाने को कहा था, अब्बू के कहने पर... उनका वह चेहरा जो लौटने पर न जाने कितने सवाल लिए उसके सामने खड़ा था पर जवाब कुछ नहीं था उसके पास। और अम्मी का न जाने कितनी बार का उतरा चेहरा... जबकि जानता था वह अम्मी में बर्दाश्त करने की हिम्मत बहुत ज्यादा है। भरोसे की माटी से गढ़ी गई हैं वह। फिर भी उनका मन कभी-कभी तो डोलता ही थी। और जब डोलता परछाइयों की तरह तकलीफ उनके चेहरे से आती-जाती गुजरती दिखती। वे अपने आप में उतनी नहीं होती तब। वह कुछ भी पूछ लेता वे हाँ-हूँ में जवाब दे देतीं कुछ भी समझे बगैर... और उसे बेतरह दुख होता। उससे भी ज्यादा तब जब वह खुद कुछ सुन के आता अब्बू के बारे में। वह अम्मी को इस दुख से बचाए रखना चाहता था इसीलिए सुरक्षा कवच बन कर तैनात रहना चाहता हर वक्त उनके साथ। पर यह असंभव जैसा था, उसकी पढ़ाई, घर के काम। रिश्तेदारों-दोस्तों का आना-जाना। उसकी कोशिशें कई बार नाकाम हो उठतीं और फिर परिणाम... उसे अच्छा लगा अम्मी कहीं जाती-आती नहीं थी ज्यादा। खुद को घर में समेटे रहती... बल्कि अब तो उसे लगने लगा था वह और ज्यादा खुद को घर में कैद किए जा रही थी, वह भी गैर इरादतन नहीं। वह सिर्फ देख-समझ ही पा रहा था सब कुछ...। कुछ भी कर पाना उसके लिए मुश्किल हुआ जा रहा था। ऐसे में उसे उस लड़की पर बेपनाह गुस्सा आता, क्या चाहती है वह आखिर? क्यों घुसपैठ कर रही है वह उनकी जिंदगी में इस तरह। क्या मिलेगा उसे ऐसा कर के? वह सोचता रहता पर किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाता...
उस दिन जब वह नंदिता के घर पहुँचा तो भरा हुआ था भीतर से। उसने हामी भरी थी तो किसी दयाभाव के तहत नहीं, बल्कि वह तो यह सोच कर गया था कि जा कर पूछेगा वह उससे कि यह सब कर के क्या हासिल होनेवाला है उसे? क्यों कर रही है वह ऐसा? ...पर जब पहुँचा था वह, और बेल बजाने के बाद जिस लड़की ने दरवाजा खोला था, कुछ भी... कुछ नहीं कह पाया था वह उस लड़की से। वह बहुत कमजोर सी दिख रही थी, कई-कई दिनों के ज्वर के बाद अमूमन लोग जैसे दिखने लगते हैं। पर उसकी कमजोरी जैसे उसके नक्श को और ज्यादा उभार रही थी। बेहद खिंची-खिंची दो आँखें, सामान्य से खिंचे हुए होठ, बहुत तीखी नाक। सामान्य से ज्यादा लंबे, घने और काले बाल... उसने गौर किया था। उसने यह भी नोटिस किया कि उस लड़की में कुछ भी सामान्य या साधारण सा नहीं है। एक तेज था उसमें पर उसके साथ एक ऐसा दीन-हीन सा भाव भी जिसमें अपने वजूद के लिए कोई चेत न हो... उसे लगा यह सारे निष्कर्ष वह जबरन ही थोप रहा है उसके व्यक्तित्व पर। कैसी-कैसी बातें सोच लेता है वह। एक नामालूम सा तेज... जैसे अपने प्रति कोई चेत, कोई सजगता ही नहीं... भला दोनों कैसे हो सकते हैं एक ही साथ... यह उसकी कल्पना है और क्या। वह जानता है कि उसके अब्बू पर यह निर्भर है... इसीलिए इस तरह सोच रहा है वह...
...पर ऐसा सोच रहा है वह तो आखिर क्यों? निर्भर होने का कोई कारण तो उसे दिख नहीं रहा है... पढ़ी-लिखी लड़की है, जहीन और खूबसूरत भी। बातचीत करने का सलीका, तौर-तरीके, रहन-सहन सब उम्दा... फिर क्या वजह हो सकती है कि वह अब्बू पर निर्भर हो... सिवाय प्यार और चाहत के... वसीम को उस पल लगा और खूब-खूब लगा कि जुड़ने-निर्भर होने का कारण यही और बस एक यही तो हो सकता है... और इस पर किसी का क्या बस... यह तो लाचारगी हो सकती है। इनसान का अपने पर काबू न रह जाना; किसी के लिए प्यार महसूसना और ऐसे महसूसना कि उसके लिए कुछ भी कर गुजरना... किसी भी सीमा से परे जाकर। मुहावरे में कहें और अगर अम्मी के लफ्जों में ही कहें तो ...अपना कलेजा निकाल कर रख देना। इसमें इस मासूम सी लड़की की क्या गलती... इसमें इसका क्या दोष...
वह भूल गया था वह नंदिता से क्या कहने आया था। वह पानी देने के लिए झुकी ही थी कि उसने उसे रोक कर पानी खुद ही निकाल लिया था, उसके लिए भी और अपने लिए भी। उसे पानी निकालने से रोकने के लिए उसने उसे कंधे से पकड़ कर रोका था और रोक कर जैसे खुद से लजा गया था वह। आज तक अम्मी के सिवा वह किसी स्त्री के इतना करीब नहीं हुआ। उसने लड़कियों से बात जरूर की थी लेकिन कोई लड़की उसकी उतनी नजदीकी दोस्त नहीं रही। को-एड में पढ़ने के बावजूद। बल्कि यूँ कहें कि कभी उसकी इच्छा ही नहीं हुई किसी के भी इस कदर नजदीक जाने की। उसके लिए कुछ या कुछ भी कर जाने की... अपना कलेजा निकाल कर रख देने की। वही चाहत उसके जिस्म को ऐंठ रही थी, मरोड़-मरोड़ कर बाहर हो जाना चाह रही थी। कैसे... कितना और क्या कर दे वह इस लड़की के लिए। वह भी इस तरह कि उसे कुछ भी अजीब महसूस न हो। उसे अभी यह सोच कर भी अजीब लग रहा था कि अब्बू उसके पास ऐसे ही आते होंगे और बैठते भी। वह नजरें चुराता फिर रहा था कमरे से कि उसे अब्बू की मौजूदगी का कोई निशान न दीख जाए। और उसे राहत थी। अब्बू का कोई भी सामान उसे कहीं नहीं दिख रहा था कमरे में। वह जानता था वह सच्चाई से आँखें मोड़ रहा है... पर यह जानते हुए भी उसने राहत की एक साँस ली थी। उसने कहा था, डॉक्टर के यहाँ चलिए... डॉक्टर आ कर जा चुका है... दवाएँ लानी है और खाने के लिए कुछ ब्रेड वगैरह भी। मैं प्रेस्क्रिप्शन और पैसे देती हूँ। उसने धीमे से कहा था... सिर्फ प्रेस्क्रिप्शन, पता नहीं उसने यह सुना भी था या नहीं। वह कॉट से उठी थी दीवार में बने आलमारी तक जाने के लिए। उसके पैर डगमग हुए थे... शायद कमजोरी से... उसने इशारे से कहा जगह बताइए मैं खुद ले लूँगा... उसने दरवाजा खोला था और उस अप्रत्याशित से अचानक ही उसकी मुठभेड़ हो गई थी जिससे वह लगातार बचना चाह रहा था। सलीके से टँगे नंदिता के कपड़ों के बीच दो कुर्ते पाजामे भी थे। उसे लगा जैसे किसी बिच्छू ने डंक मार दिया हो उसे, पर जो उसके हाथों को छू गए थे वे शायद उसके अब्बू के कपड़े थे...
वह समझा रहा था खुद को कि ये कपड़े नंदिता के पिता के, भाई के या किसी और के भी हो सकते हैं... कोई तो आता होगा ही उसके पास... पर वह जानता था, ऐसा सोच कर वह खुद को झुठला रहा है। पर क्यों... वह खुद से पूछ रहा था। ऐसा क्या था जो वह नहीं जानता था। और जब वह पहले से जानता ही था तो फिर यह बेचैनी क्यों? उसने प्रेस्क्रिप्शन निकाल कर दरवाजा बंद कर दिया था। पैसे के लिए उसने तकिया हटा कर पर्स निकाला था... पर नहीं किताब थी वह। वही किताब जो अब्बू पढ़ते रहे थे पिछले दिनों। जिसके बारे में उससे चर्चा करते रहे थे और उसे भी पढ़ने को कहा था। पर इस बार वह चकित नहीं था। वह सँभाल रहा था खुद को। वह सोचना चाह रहा था सिर्फ अम्मी की खातिर... वह अम्मी को लेकर शॉक्ड हुआ। पर वह जानता था कि वह जो समझा रहा है खुद को वह एक झूठ है, एक दिलफरेब झूठ। ...बस।
पर इस सब के बावजूद दवा और सामान ला देने के बाद भी वसीम रुका था वहाँ देर तक। उससे बोलता-बतियाता रहा था न जाने कितनी बातें। वह हैरत में था, वह उठ कर चला क्यों नहीं गया आखिर... और तो और वह उसके बाद भी कई रोज वहाँ आया अम्मी को बताए-बिना बताए भी। अब्बू का टूर ज्यादा लंबा खिंचने लगा था और नंदिता अभी ठीक नहीं हुई थी पूरी तरह से।
अम्मी ने जब दरवाजा खोला था उस दिन पहली बार समझ में नहीं आया था कि उनसे वह क्या कहे। हालाँकि उसने वहाँ आल्मारी में मर्दाने कपड़े देखे थे, उसके पास अब्बू की किताब भी थी। पर वह तो जानता ही था अब्बू वहाँ जाते हैं... और वह इससे आगे का कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था। कि तय करना नहीं चाह रहा था वह। नंदिता उसे बिल्कुल अछूती सी लगी थी, पाक, सुंदर और मासूम जिसको ले कर कोई बेतुकी कल्पना की ही नहीं जा सकती थी। उससे तो बिल्कुल भी नहीं। अब्बू वहाँ जाते हैं यह कौन नहीं जानता। वैसे भी अब्बू का क्या... पहले जब वह घर के बगलवाले इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे तब भी एक घंटे के अवकाश में भी जब घर आते कुर्ता-पाजामा पहन लेते थे। वह कहता भी इतनी मशक्कत किस लिए, थोड़ी देर वही कपड़े पहने रहते। आखिरकार लौटना ही तो है आपको... वो हँस देते। मैं शर्ट-पैंट में खुद को सहज नहीं महसूस पाता। बाहर जाना और पढ़ाना तो मजबूरी है वसीम... पर घर में... मुझे खाते-पीते, उठते-बैठते यह अहसास सालता रहता है कि आजाद नहीं हूँ मैं, कैद में हूँ जैसे। जैसे उठ कर चल देना हो अभी तुरत कहीं... मैं घर में घर में होने के अहसास के साथ जीना चाहता हूँ... अब्बू इसी सहजता के लिए पहन लेते होंगे उसे पढ़ाते-समझाते वक्त कुर्ता-पाजामा ताकि आराम महसूस कर सकें। कभी बात-बात में कह दिया होगा उन्होंने और उसने रख लिया होगा खरीद कर...। वह घर में होने पर घर में होने के अहसासवाले खयाल को परे धकेलता रहा। इसी कश्मकश में वह अम्मी को कुछ भी नहीं कह पा रहा था। सब कुछ उसे ठीक-ठाक लगा था और जो थोड़े बहुत किंतु-परंतु थे वह उन्हें परे ही रखना चाहता था। उसने तय कर लिया था वह अपनी तरफ से कुछ भी नहीं कहेगा अम्मी से। अगर पूछेंगी भी तो उतना ही जो कि उसे लगा था कि जो उसका मन मानता है... पर अम्मी ने कुछ भी नहीं पूछा था उससे। बस उसके चेहरे में न जाने क्या-क्या ढूँढ़ती रही थी... एकटक... उसने राहत की साँस ली थी उस दिन।
उसके बाद भी कई रोज नंदिता के कमरे पर वह गया था, अक्सर दिन में ही। जाता और दवाएँ तथा जरूरत के सामान ला देता। कुछ देर संग बैठ-बतिया लेता। उसे अच्छा लगता... और उसे भी। एकाध बार उसने अम्मी को कहा भी था कि वह आज नंदिता को डॉक्टर से दिखलाने गया था या कि उसकी दवा ला देने। अम्मी अक्सर कुछ नहीं कहती थीं, बस एक दिन कहा था - अभी तक ठीक नहीं हुई वो...? यह एक साधारण सा सवाल था पर उसे लगा जैसे यह एक सवाल भर नहीं था एक निषेध था। मनाही जैसा कुछ। उनकी आवाज के पीछे जो कुछ छिपा था वह यह था कि बस भी करो अब, बहुत हुआ। वह अम्मी का मतलब समझ गया था... उसने खुद को भी कहा था - बस, बहुत हुआ। ठीक तो हो चुकी है वह लगभग ... पर उसे याद आया उसने कहा था नंदिता से आज के लिए कि आज वह दिन में आएगा और वह जहाँ कहेगी उसे घुमा लाएगा। दर असल घर मे पड़े-पड़े वह बहुत बोर हो रही थी और उसने कहा था कल वह जरूर बाहर निकलेगी। थोड़ा घूम-फिर आएगी तो मन ठीक होगा उसका। यूँ पड़े-पड़े... बुखार पिछले दो दिनों से नहीं आ रहा था उसे। पर अभी भी वह बेइंतहा कमजोर थी... उसे डर लगा था... अकेले गई और ... यह उसका डर था या कि उसके साथ होने को एक और बहाना ढूँढ़ रहा था। खुले आसमान के नीचे। दरोदीवार के साये से दूर। अब्बू के अहसासों की पहुँच से बाहर। क्या उसे सिर्फ अपनी नंदिता की तलाश थी... अपने हिस्से की नंदिता की जिससे किसी का साया इस कदर लिपटा हुआ न हो...
उसने खुद को समझाया बस आज भर। आज के लिए तो उसने खुद से हाँ की थी। नहीं जाना ठीक नहीं होगा। फिर आज के बाद कभी नहीं। परसों तक यूँ भी अब्बू आ जाएँगे। फिर अपने इस बोझ से छुटकारा पा सकेगा वह। उसने 'बोझ' शब्द पर मन ही मन जोर दिया था और उसके पक्ष में खुद को ही एक तर्क भी - और नहीं तो क्या, अब्बू के कारण ही तो वह इस जंजाल में फँसा... और फँसा तो इस कदर फँसा कि नंदिता के हर अच्छे-बुरे में वह अच्छाई ही ढूँढ़ने लगा है। उसका कुछ भी अब उसे बुरा नहीं लगता क्यों...। इस क्यों का न तो कोई जवाब ही उसके पास था और ना ही उसकी कोई वजह ही। इस क्यों की तरह ही एक बेमानी सा अल्फाज - बस यूँ ही। इस यूँ ही में वह बुरी तरह फँसा जा रहा था। भँवर की तरह गोल-गोल घूमता... पर जाना तो आखिरकार उसे था ही और वह गया भी...
जगह चुनने की बात उसने नंदिता पर छोड़ दी थी, आज का दिन उसका... फिर जाने कब... उसने उदासी से पूछा... अगले ही पल उसने अपनी इस उदासी से पूछा - दो दिन के इस पहचान को पीछे छोड़ देने की इच्छा या मजबूरी से यह उदासी क्यों...?
नंदिता मुख्य दरबार पर अभी पहुँची ही थी कि उसे याद आया - जानती हो यह दरवाजा लाहौरी गेट क्यों कहा जाता है? नंदिता ने ना ही में सिर हिलाया था... इसलिए कि इसका रुख लाहौर की तरफ है... इसके अलावे भी यहाँ दो और गेट हैं। दिल्ली दरवाजा और हाथी दरवाजा। पर आजकल अंदर जाने के लिए बस यही इस्तेमाल में लाया जता है। शाहजहाँ द्वारा लाल पत्थर से बनाया गया यह किला देश के सर्वश्रेष्ठ किलों में से एक है। यह उसने 17वीं शताब्दी में बनवाया था जब उसने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली लाई थी। यह पूरे दो किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसका आकार अष्टकोणीय है, पर समान रूप से अष्टकोणीय भी नहीं...। किले के चारों तरफ जो खाई तुमने देखी न वह 75 फुट चौड़ी और 30 फुट गहरी है जिसे युद्ध के समय सुरक्षा के लिहाज से पानी से भर दिया जाता था...
वह सोचती रही, वसीम के साथ आज वह बाहर क्यों आई है... क्या इसलिए कि उसका साथ उसे अच्छा लगने लगा है। या सिर्फ इसलिए कि वह हनीफ सर का बेटा है... उस हनीफ सर का... वह माने न माने वसीम का साथ उसे अच्छा लगता है... पर एक सच्चाई यह भी कि वह इस सच से गुरेज करती है। उसे यह मानते तकलीफ होती है कि हनीफ सर के अलावे किसी और के आने से भी उसे खुशी हो सकती है... उसके व्यवहार में एक सच्चाई होती है, सहजता-सरलता जैसा कुछ। वे किसी भी विषय पर बातें कर सकते हैं घंटों... हनीफ सर की विद्वता के आगे दबी-झुकी नतमस्तक सी वह वसीम के साथ बराबर की होती है। वे दोनों साधारण से विषयों पर भी बातें कर पाते हैं। नई लगी पिक्चर, खेल और तमाम ऊलजलूल विषयों पर भी... वो सारी बातें भी जो वह हनीफ सर के सामने करने से कतराती है, डरती है। या कि फिर वे बातें जो वह सिर्फ एमी के साथ खुल के कर सकती है। उसने गौर किया वसीम धीरे-धीरे उसकी जिंदगी में वह जगह घेर रहा है जो कभी एमी की थी। एमी थी उसकी जिंदगी में, कहीं गई नहीं थी पर वह उसके साथ-साथ अब औरों की भी हो चली थी, उसने यह हाल-फिलहाल ही जाना था। एमी का यूँ विस्तृत-विशाल हो जाना उसे अच्छा भी लगता है जैसे वह भी कहीं कुछ बड़ी हो गई हो। बड़प्पन के बोध से भर-भर उठती है वह यह सोच के पर उसके व्यक्तित्व के इस तरह विस्तार पा लेने से कुछ छोटी तो हो ही गई है वह। मन का एक कोना अब खाली सा हो गया है जो एमी के होने से भरा-भरा था। खालीपन हमें हमेशा डराता है। कोई भी जगह कभी खाली नहीं रहती कि उसे खाली नहीं रहने देते हम। और इसी खालीपन से डर कर उसने इतने कम समय में वसीम को अपनी जिंदगी में जगह लेने दिया था।
सोचती रही वह बार-बार कि इस बात पर क्यों जोर देना चाह रही है कि वसीम ने एमी की जगह ली है उसकी जिंदगी में। क्या वसीम के होने की आश्वस्ति के साथ-साथ कोई खतरा भी मँडराता रहता है उसके आस-पास जिसे वह तरजीह नहीं देना चाहती तर्क दे कर। यूँ बहला-फुसला कर धोखे में रखना चाहती है खुद को...। इससे पहले तो कोई उसकी जिंदगी में नहीं आया...। इतने-इतने लोग... स्कूल-कॉलेज सब जगह चुप्पा सी रही है वह, घरघुस्सू भी। गिने-चुने लोग ही रहे हैं उसकी जिंदगी में। पहले माँ-बाप के कठोर सुरक्षा-संरक्षण में, पुनः एमी की और अब खुद की, जो जगह थी उसकी जिंदगी में वह हनीफ सर के आने से पूर चुकी... वसीम आया तो इसलिए आया कि हनीफ सर का बेटा है वह और उसे हमेशा यह याद रखना चाहिए।
वह एक लंबी बहस में उलझ गई थी खुद से ही, इतनी कि परेशानी की लंबी-लंबी रेखाएँ खिंच रही होंगी उसके माथे पर, चेहरे पर। उसने देखा आस-पास खड़े लोग उसे गौर से देख रहे थे। उसने सोचा उसे इन सब चिंताओं-परेशानियों से निकलना पड़ेगा। वसीम आता ही होगा अभी-अभी टिकट ले कर। और यूँ भी तो वह घूमने निकली है, जी हल्का करने, लंबी बीमारी के अवसाद से उबरने। यह अलग बात है कि घूमने के लिए अब उसे किले, मकबरे, आर्ट गैलरियाँ और ऐतिहासिक जगहें ही समझ में आती हैं, हनीफ सर के उसकी जिंदगी में आने के बाद। पर इसमें बुरा ही क्या है... चीजों को, जिंदगी को एक नए नजरिए से देखना तो उन्होंने सिखाया ही है उसे।
वह सहज होना चाहती थी...। वह सहज होने लगी थी वसीम के आने तक, उत्साह और स्फूर्ति से भरी-पूरी। मुख्य द्वार जिस बंद सी गली मे खुला वह हमेशा उसे चौंधियाता है। वह ठगी सी खड़ी हो गई थी थम कर उस मीना बाजार के आगे... चमकदार रंगों और उनकी दीप्ति से अपनी ओर खींचती एक अलग ही दुनिया। वसीम को उसका यूँ बच्चों की तरह चकित होना, ठिठकना, मचलना भाया था। उसने पूछा था कुछ लेना है आपको... उसने कहा था, नहीं। बस देखना अच्छा लगता है... एमी को बहुत पसंद हैं ये कलात्मक चीजें, गहने, एंटिक पीसेज...। कुछ उसके लिए लेना है...। नहीं, कभी साथ हुई तब... 'मीना बाजार', यह शब्द ही चौंधियानेवाला होता है शायद... जानते हो मुगल काल में भी यह बाजार यहीं लगता था। तब यहाँ मीनाकारी की वस्तुएँ ज्यादा बिकती थीं, मीना बाजार नाम भी शायद इसीलिए पड़ा हो। और हाँ, तब यहाँ सिर्फ स्त्री विक्रेता ही हुआ करती थी, पुरुष नहीं... सोचो, तब की स्त्रियाँ भी आत्मनिर्भर होती थीं और हर क्षेत्र में...। वसीम ने बीच में ही कहा था, हाँ, सिर्फ आम महिलाएँ... यह बाजार ही शाही स्त्रियों के लिए था। कि बाहर जाने की जरूरत ही न पड़े उन्हें... कि किसी दूसरे मर्द की छाया भी न पड़े उन पर...। कि बाजार में भी कोई पुरुष दुकानदार न हो...
नंदिता चुप हो गई थी... उसे लगा जैसे हनीफ सर ही बोल रहे हों... पर हनीफ सर ने कभी नहीं कही थी यह बात उससे। कि उन्हीं से सुना-सुनाया तो दुहरा रही थी वह तब से। भूल चुकी थी कि वसीम भी हनीफ सर का ही बेटा है और फिर वह यह भी भूल गई थी कि वह कला का विद्वान भले ही न हो इतिहास का छात्र तो था ही।
उसने सोचा क्या हनीफ सर ने कभी नहीं सोचा होगा इस बिंदु पर... उन्होंने क्यों नहीं कही यह बात उससे? जैसे ज्ञान की हर बात पर हनीफ सर का कॉपीराइट हो... और उसका यह अधिकार कि वह उन्हीं से जाने। क्या वह भी किले में बंद उन रानी और राजकुमारियों की तरह थी जिन्हें राजा के किले में ही नजरबंद रहना पसंद था। उन्हीं की निगाह से खुद को और दुनिया को देखना था। हनीफ सर से प्रेम जैसे एक अभेद्य किला था और उसमें कैद हो गई थी वह।
फिर मन उचट गया था उसका। वसीम को भी लगा जैसे वह चंचल हिरणी गुम हो गई कहीं। अब एक थकी-हारी औरत चल रही थी उसके साथ, घिसटती-पिसटती और उसे नंदिता का यूँ बिला उम्र बुजुर्ग होना अच्छा नहीं लगा था। वह उसे बेउम्र बुजुर्ग नहीं होने देना चाहता था... वह बार-बार कोशिश करता रहा। नंदिता बोल ही नहीं रही थी कुछ अपनी तरफ से। उसकी कोशिश कभी-कभी रंग लाती कि वह लौट जाती क्षण भर में ही, और गुम हो जाती कहीं।
वे घूमते रहे थे फिर एक-एक कर... नौबतखाना, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, रंग महल, खास महल, मोती मस्जिद फिर संग्रहालय और युद्ध स्मारक भी। पर नंदिता इस बार बिल्कुल ही हतप्रभ नहीं हो पा रही थी। पिछली बार की तरह तो बिल्कुल ही नहीं। न रंग महल में सुनहरे फूलों से सजी छतों को देख कर जिसका बिंब तब नीचे बने तालाब में प्रतिबिंबित होता होगा न ही सम्राट के सिंहासन की अद्भुत पच्चीकारी से। वह मोती मस्जिद को देख कर सोचती रही इबादत के लिए भी औरतों के लिए अलग जगह... उस सृष्टि रचनेवाले के सामने भी भेद... उसी ने तो रचा है दोनों को एक दूसरे का पूरक बना कर। पर उसके इबादत में भी क्यों साथ-साथ खड़े नहीं हो सकते दोनों यही सोच-सोच कर संगमरमर से बना हुआ वह मस्जिद और उसका शाही सौंदर्य भी फीका हो चला था उसकी नजर में।
उसने सोचा वसीम भी यही सोच रहा होगा। वसीम ने जैसे पकड़ लिया था उसकी सोच का सिरा। उसने कहा - दरअसल इस्लाम में औरतों को मस्जिद में जाने की मनाही है, वे घर में ही नमाज अदा करती हैं। शायद उसका एक कारण पर्दा प्रथा हो। हालाँकि औरंगजेब एक कट्टर, धर्मभीरु और कठोर शासक के रूप में याद किया जाता है पर उसने यह एक नेक काम तो किया ही था। उसने अलग से ही सही शाही महिलाओं के लिए मस्जिद तो बनवा ही दिया, और सबसे खास बात, इसका रुख मक्का की तरफ है।
...उसे लगा बहुत थक गई है वह, मानो सदियों लंबी दूरी तय कर ली हो उसने। और उसके भीतर एक साथ ही न जाने कितना कुछ बन-टूट रहा हो। उसने सुना था कि कोशिकाएँ बनती टूटती रहती हैं हर पल...। पर क्या मनुष्य भी बनता-टूटता है उसके साथ। आखिर वह क्या था जो लगातार उसके भीतर टूट रहा था, बन रहा था। वह खुद भी इसे समझ नहीं पा रही थी।
उसे बहुत भूख महसूस हो रही थी, बहुत ज्यादा प्यास भी। क्या सिर्फ बीमारी की वजह से... नहीं, पिछले दिन उसकी जिंदगी में बहुत अलग किस्म के रहे हैं। पहले एमीलिया का लेख, फिर उसके बाद 'आनंदवन' जाना, मिली नामक उस बच्ची से मिलना, उसकी हालत देखना... जैसे जीवन कोई खेल खेल रहा था उसके साथ या कि जीवन का यह कोई नया चक्र था। वह बैठ सी गई थी वहीं थक कर जहाँ वह खड़ी थी। वसीम चौंक पड़ा था... वह दौड़ कर गया था दूसरी तरफ जहाँ रंगीन छतरियों के नीचे कुर्सियाँ थीं, टेबल थे। ठंडा पानी, बिस्कुट, नमकीन और चिप्स की दुकानें थीं। वह पानी का एक बोतल लेता आया था अपने साथ। उसने बोतल की ढक्कन खोल नंदिता की तरफ बढ़ाया था। अभी नंदिता ने कुछ घूँट पानी पिया ही था कि उसने सुना वसीम कुछ खाने-पीने के लिए कह रहा है। नंदिता ने मना कर दिया था... नहीं अब घर चलते हैं। बहुत थकान हो रही है मुझे। वसीम को लगा जिद करना सही नहीं रहेगा। अलबत्ता उसके उतरे चेहरे को देख कर उसे यह जरूर लगा कि शायद फिर बुखार चढ़ रहा है।
वसीम का डर सही निकला। नंदिता रास्ते में ही सिहरने लगी थी। हल्की कँपकँपाहट होते देख रहा था वह उसके पूरे बदन में। पर वह कर कुछ भी नहीं सकता था सिवाय गाड़ी की स्पीड कम कर देने के जिसे कम करते भी वह हिचक रहा था, जितनी जल्दी हो सके वह नंदिता को घर पहुँचा पाता...
वे घर पहुँच चुके थे। वसीम ने कंबल खोला था उसे ओढ़ाने के लिए, और ओढ़ा दिया था गर्दन तक। टेंप्रेचर लिया था 103.2 नंदिता बताती है इससे भी ज्यादा-ज्यादा बुखार हुआ है उसे इस बीमारी के दौरान। उसे इस तरह बेसुध देखकर सोचता रहा था वह कि किस तरह रही होगी वह इस हालत में। कैसे बीत होगा उतना सारा वक्त। नंदिता ने बताया था उसे बुखार अक्सर शाम के बाद ही बढ़ता है... पर आज तो दोपहर से ही। उसी की गलती है सब। उसने क्यों मानी नंदिता की बात। दो दिन बुखार नहीं हुए तो उसने क्यों सोच लिया कि अब ठीक हो चुकी है वह... थकान से ही हुई होगी उसकी यह हालत। उसने टेबल पर पड़े प्रेस्क्रिप्शन को उठा कर डाक्टर का नंबर देखा था और फोन लगाया था उन्हें। उधर से किसी महिला की आवाज आई थी... हलो, प्रशांत क्लीनिक... किससे बात करनी है...। सॉरी, डाक्टर तो बाहर गए हुए हैं... कोई इमरजेन्सी...? अगर जरूरत हो तो नर्सिंग होम में एडमिट करवा सकते हैं उन्हें। डॉक्टर कल दोपहर तक आ जाएँगे... उसने नंदिता से पूछा था इस बाबत। पर उसने नहीं में अपना कमजोर सिर हिलाया था। दवाइयों की तरफ इशार किया था, जैसे कह रही हो दे दो उन्हें, ठीक हो जाऊँगी।
वह किचेन से एक ग्लास पानी लेता आया था, थोड़े से बिस्किट भी, वहीं कहीं किसी डिब्बे से ढूँढ़-ढाँढ़ कर। उसने नंदिता को सहारा दे कर बैठाया था। वह तकिए के सहारे थोड़ी उठंग सी हुई थी। बिस्किट देखते ही उसने ना में गर्दन हिलाई थी लेकिन वसीम जबरन उसे छोटे-छोटे टुकड़े तोड़-तोड़ कर देता रहा... दवा खाली पेट नहीं लेते...
वह नंदिता के सिरहाने एक स्टूल पर बैठ गया था, उसकी बालों में उँगली फिराता हुआ, उसकी हथेलियाँ सहलाता हुआ। उसे याद है उसे या नसीम को जब भी बुखार हुआ है अम्मी उसके पास ऐसे ही बैठती है... वह पल भर को भी नहीं सोच रहा था कि वह किसी लड़की के पास बैठा है... इतने एकांत में और इतना करीब। उसे अब यह भी याद नहीं था कि उसने सुबह मन ही मन अम्मी से और खुद से क्या वादा किया था। उसे बस नंदिता की चिंता थी; उसके सूखे हुए होंठों, उसके बुझे हुए चेहरे और ज्वर से थरथराते कमजोर हुए उसके शरीर की भी...
नंदिता के मोबाइल की घंटी बजी थी तभी। उसने फोन अपनी ओर बढ़ाने का इशारा किया था। उसने स्क्रीन पर नजर फेरी थी और फोन को बजने दिया था। वसीम ने इशारे से ही पूछा था किसका है... नंदिता ने क्षीण से स्वर में कहा था - मम्मी का है, घर से। फिर उठाती क्यों नही... उठाओ फोन... नहीं वो मेरी हालत जानेंगी तो चिंता में पड़ जाएँगी। भागे-भागे आ पहुँचेंगे दोनों और वह ऐसा नहीं चाहती। तुम मत बताना, फिर कैसे जान लेंगी... माँ हैं, वह आवाज पढ़ लेंगी... मैं बात करूँ? नहीं... नंदिता के धीमे स्वर का विरोध भी बहुत तगड़ा था। ...वह हँसा था इसी तरह बात किया तो वे कुछ नहीं समझ पाएँगी... उसने रूठने का अभिनय किया था, अपने पपड़ाए होंठों और बोझिल आँखों के साथ-साथ। उसने फोन बंद कर दिया था... वसीम से फिर नहीं रहा गया था... इस तरह तो... वह झुँझलाई थी, वे नहीं करेंगी चिंता-विंता। और करती हैं तो करती रहें। मुझे अपने हर एक पल का हिसाब नहीं देना उन्हें... नहीं देनी कोई सफाई। फिर उसके चेहरे को देखते हुए कहा था। मैं ठीक हो जाऊँगी तो बात कर लूँगी उनसे, तुम परेशान मत हो...। फिर उसे याद आया हो कुछ अचानक, उसने कहा था... रात होती जा रही है, तुम घर जाओ अपने...। वह कुछ भी नहीं कह सका था... नंदिता की मम्मी का फोन आने के बाद उसे भी याद हो आई थी अपनी मम्मी की, सुबह उनसे किए वायदे की भी। पर सामने लेटी हुई लड़की की आँखों में ऐसा क्या था। उसे छोड़ कर चले जाने को उसके पाँव उठ ही नहीं रहे थे। उसने जैसे कोई फैसला लिया था अचानक... मैं तुम्हें इस तरह छोड़ कर नहीं जा रहा, वह भी ऐसी हालत में। अब्बू ने ही मुझे तुम्हारी देख-भाल के लिए कहा था। हाँ, अम्मी को एक फोन जरूर करना चाहूँगा... वह यह कह कर बहार निकल पड़ा था बिना नंदिता के प्रतिरोध को सुने... मैंने तो पिछली कई रातें ऐसे ही...।
नंदिता भले ही वसीम को जाने को कहती रही हो पर उसके रुक जाने से उसे एक इत्मीनान मिला था। उसने जबरन जो चेत ओढ़ रखा था अपने ऊपर उसे ढीला छोड़ दिया था। उसकी बोलने की हिम्मत बिल्कुल चुकी जा रही थी। उसने काँपते हाथों से लिखा था वसीम की नोटबुक में - आल्मारी में कुर्ता पाजामा है, पहन लेना आराम मिलेगा। किचेन में तुम्हारा ही लाया ब्रेड-बटर है, खा जरूर लेना। आल्मारी के निचले खाने में थोड़ा-बहुत कुछ बिछावन जैसा है, निकाल कर सो सकते हो। स्टूल पर नींद नहीं आएगी। मैं अब आराम करना चाहती हूँ, पूरी तरह।
वसीम जब फोन कर के लौटा उसका मन बहुत उदास था। उसे बुरा लग रहा था मम्मी से झूठ बोल कर। उसे दुख हो रहा था कि अब्बू की गैरमौजूदगी में वह अम्मी और नसीम को यूँ अकेले छोड़ कर बाहर रह रहा है, वह भी रात में। अम्मी अब तक उसके इंतजार में बैठी थीं। वह उन्हें खा लेने को कह कर आ रहा है... उसने उनसे कहा था कि एक दोस्त की तबीयत खराब हो गई है अचानक, वह अकेला है और उसे रुकना पड़ रहा है। वह झूठ तो बोल रहा था पर कोशिश कर रहा था कि कम से कम बोले। बिना यह तय किए कि झूठ छोटा हो या कि बड़ा, कम या कि ज्यादा होता तो झूठ ही है...। या यूँ कि उसे सफाई से झूठ बोलना अभी आता ही नहीं है। अम्मी चुप हो गई थीं देर तक। क्या अम्मी ने सच्चाई समझ ली थी। नहीं, उन्हें उसके कहे पर भरोसा है।
लौट कर उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह करे तो क्या करे। नंदिता सोई हुई थी बेसुध और वह बुत की तरह खड़ा था। क्या उसे घर लौट जाना चाहिए था... क्या उसने रुक कर गलती कर दी कोई? वह अचानक खुद को बहुत उदास महसूस करने लगा था, बहुत बुझा-बुझा और टूटा हुआ भी। कि तभी सामने खुला पड़ा अपना नोट बुक दिख गया उसे। बस इतने से जुड़ाव से इतनी सी चिंता...? वह किचेन में गया था और ब्रेड निकाल कर खा लिया था ऐसे ही... अब सेंकने बटर लगाने की जहमत कौन उठाए। अम्मी ने तो उसकी आदतें यूँ बिगाड़ रखी है कि अपने लिए तो उससे कुछ होता ही नहीं है... फिर थोड़ी सी बिस्किट और नमकीन... और फिर कमरे में आ गया था वह। आल्मारी खोल कर उसने नीचेवाले रैक की तलाशी ली थी। बिछावन के नाम पर वहाँ जो था वह इस ठंड के मौसम में उसे नाकाफी लगा। एक पतली सी दरी, लगभग उतना ही पतला एक बिस्तर और चादर। वह खड़ा-खड़ा सोचता रहा कि क्या करे। उसने सोने के इरादे को दरकिनार किया। वह तो नंदिता की देखभाल की खातिर रुका है तो फिर सोना क्या? रात में उसका बुखार यदि और बढ़ा तो? रात में उसे किसी चीज की जरूरत पड़ी तो? वह स्टूल पर जा बैठा था। तभी उसे लगा, क्यों न वह कपड़े बदल ले, कम से कम बैठने में अराम तो मिलेगा। वह आल्मारी तक गया था। टँगे हुए कुर्ते-पाजामे को देखता रहा था देर तक, अनिर्णय की स्थिति में। फिर तात्कालिकता के दवाब में उसे खींच लिया था उसने झटके में कि ज्यादा सोचा-बिचारा तो...
दीवार से लगा हुआ स्टूल पर वह सो ही चुका था शायद कि उसे नंदिता की कमजोर सी आवाज सुनाई पड़ी। उस फुसफुसाहट को सुनने के लिए उसने अपना कान उसके चेहरे की तरफ किया और धीमे से पूछा था - पानी...? उसने सिर हिलाया था - नहीं... उसने इशारा किया था - कमरे की बत्ती की तरफ। रोशनी बुझा कर वह फिर अपनी जगह पर आ बैठा था... कि नंदिता के टटोलते हाथ उसकी हथेलियों तक आ गए थे। उस हाथों का ताप, उसकी जलन जैसे बेचैन कर गए उसे। अब तक इतना बुखार है... तभी तो बेसुध पड़ी है इस तरह। उसने उसकी हथेली को अपनी दोनों हथेलियों के बीच रखा था और हौले-हौले सहलाया था उसे। उन हथेलियों की तड़फड़ाहट वैसे ही थमी थी जैसे पानी से निकाल दी गई मछलियों को वापस पानी मिल गया हो। उसे जैसे सुकून मिला था, चलो नंदिता को उसने कुछ तो आराम दिया है। पर सुकून का यह टुकड़ा बहुत छोटा था। वह खुद बेचैन हो उठा था आखिर क्या करे वह कि नंदिता की तकलीफ दूर हो जाए... उसने उसके तपते माथे पर अपनी उँगलियाँ रख दी और सहलाता रहा धीरे-धीरे। उसकी उँगलियाँ जैसे तप गई थी। झटके से खीचा था उसने उन्हें और सहसा किसी आवेग के तहत अपने होंठ रख दिए थे उसके माथे पर। होंठों में शायद पानी था बहुत-बहुत। वे तपे नहीं थे, पुरसुकून से हल्के गुनगुने हुए थे बस। उसे अच्छा लगा। नंदिता के बुदबुदाते, काँपते से होंठों ने भी शायद यही कहा था... और फिर वह अपने होंठों को फिराता रहा था उसके पूरे माथे पर, चेहरे पर। न जाने कितनी देर तक, न जाने कितनी-कितनी बार... जैसे लम्हों में सदियाँ सिमट आई थी कि नंदिता ने ही धीरे से खींच लिया था उसे होंठों तक। जब नंदिता के होंठ उसके होंठों से मिले तभी उसे यह खयाल आया कि कैसे उसे इन सूखे, पपड़ी जमे होंठों की स्मृति नहीं हुई... कि उसे कैसे यह समझ में नहीं आया कि वह इस सूखे प्रदेश को फिर से हरा कर दे, जीवन से भरा हुआ... नंदिता के हाथ उसे नीचे और नीचे खींचते रहे थे...
वसीम को प्रकृति पसंद थी, मोहक, दीप्त और हरी-भरी... उसे खूबसूरती भाती थी हर शय में और वह दिल से झुक पड़ा था उस अद्भुत अरूप के कदमों में... इस तरह उसने उस अदृश्य का शुक्रिया भी किया था और उसकी इबादत भी। बुतपरस्ती उसे पसंद थी। मंदिर, मंदिर की घंटियाँ, कलश, कंगूरे सब उसे बचपन से ही खींचते थे अपनी तरफ। एक बार तो वह अपने एक दोस्त के साथ पहुँच भी गया था वहाँ तक। पर अम्मी की चेतावनी उसे याद आई... जो मना है, बस मना है... पकड़े गए तो...? और वह लौट आया था मन मार कर। पर आज लौटना नहीं था उसे... आज वह लौटना नहीं चाहता था, किसी भी डर से, किसी के आतंक से, वह भी तब जब मंदिर के कलश... कंगूरे अपने आकर्षण और भव्यता के साथ उसकी उँगलियों को खुद खींच रहे थे अपनी तरफ पूरे वेग और आवेग से...
पर हर ऊँचाई चढ़ लेने के बाद उतरना भी होता है। मंजिल तक पहुँच जाने के सुख को पाने के बाद लौटना भी... यही शाश्वत नियम है... चाहना न चाहना अब वश में कहाँ थे... वह फिसल रहा था जैसे अपने-आप। नीचे एक नदी थी और आवेग से भरी उसकी गुनगुनी धार लगातार बुला रही थी उसे और उस तक जाना उसमें डूब जाना ही जैसे उसकी नियति थी। वह रोके भी तो कैसे रोके खुद को... वह तैरना चाहता था पर डूब रहा था... ऊपर आने की हर कोशिश में और-और गहरे जाता... जैसे तैरने की उसकी सारी कोशिशें निष्फल और बेकार... उसने छोड़ दिया था खुद को डूबने की खातिर... कि डूबने का आनंद तभी समझ पाया था वह। डूबने के इस आनंद को महसूस ही रहा था वह, कि डूबना ही चाहता था वह इस डूबने के आनंद में कि अचानक उसे लगा वह तैरने लगा है... कि उसे तैरना आ गया है... कि हल्का हो गया है वह एकदम से...। और तैरने की कोशिश में डूबते और डूबने की कोशिश में तैरते वह खुश था कि दुखी वह खुद नहीं समझ पा रहा था। वह जैसे महसूस ही नहीं पा रहा था कुछ कि अचानक उसने महसूस किया जैसे नंदिता का बदन तापहीन हो गया है, बिल्कुल सामान्य और जाड़े के दिनों में जितना ठंडा हो सकता है उतना ही ठंडा। उसके मन में जैसे खुशी का ज्वार फूट पड़ा था।
नंदी ने सामने के स्टूल पर अपनी बेसुधी में भी वसीम को देखा था। पर उसकी नजरों में तो वसीम कहीं था ही नहीं... एक रुकी हुई रात थी जो वहीं आ कर रुक जाती थी हमेशा। उसके आगे बढ़ती ही नहीं थी कभी और वह उस लंबी-अंतहीन रात में छटपटाती रहती थी हमेशा। उसने सोच लिया था आज रात को बीतना होगा; वह अँधेरे का सफर तय कर लेना चाहती थी... कि आज रात को भी चलना था उसके संग-संग।
उसने देखा था अपनी क्षीण नजरों से... हनीफ सर हमेशा की तरह बैठे हैं उसी स्टूल पर। अब विदा लेना होगा उन्हें। कि यही हैं अंतिम हदें। कि इसके आगे हनीफ सर की निजी जिंदगी है... उनका परिवार। उसने देखा था उस अदृश्य लक्षमण रेखा को जो वे जाते-जाते खींच जाते थे उसके चारों तरफ। उन्होंने हमेशा की तरह उसके बालों में उँगलियाँ फिराई थी। बड़ी मासूम सी उँगलियाँ जिसमें समर्पण भी था और प्यार भी। जिसमें अपनापन भी था और खुद को बिसरा देने की इच्छा भी। वे पूरे स्नेह, पूरे आदर और पूरे अपनत्व से चूमेंगे उसका माथा और चल देंगे जैसे कि पूर्णविराम लगा दिया हो उसके आगे की हर इच्छा पर, उसके प्रश्नों पर, उसके मनुहारों पर। वह अवाक सी देखती रह जाएगी उन्हें जाते हुए, उसका शरीर जलता रहेगा उस मीठे चुंबन की आग में, वह तड़पती रहेगी पूरी रात, ऐंठता रहेगा उसका सारा जिस्म पर हनीफ सर को उसकी परवाह क्या। उनकी जिम्मेदारी तो उनकी पत्नी है, उनका परिवार है। शिकायत नहीं कर सकती है वह; शिकायत करने का हक नहीं है उसे। हनीफ सर इसी शर्त पर तो आए थे उसकी जिंदगी में। उसी ने मानी थी उनकी हर बात। वह तो सिर्फ उनका सामीप्य चाहती थी, पल दो पल का सुखद साथ... पर ये चाहनाएँ क्यों...? आजकल यूँ भी उसकी सोच और इच्छाओं के बीच कोई तालमेल नहीं रह गया। वह जितना ज्यादा सोचती उसका जिस्म एक अतृप्त चाहना में उतना ही ऐंठता रहता सारी रात...
आज उसने वह सब कुछ चाहा था जो उसके हिस्से का नहीं था और पूछा था खुद से पहली बार आखिर वह उसके हिस्से का क्यों नहीं है? उसे उसके हिस्से का भी होना होगा... इसलिए जब हनीफ सर ने विदा चिह्न अंकित किया था हमेशा की तरह उसके माथे पर, वह तड़प उठी थी। वह उसे ऐसे कैसे छोड़ कर जा सकते हैं। उसने उनका सिर थाम लिया था अपने दोनों हाथों में और खींच कर ले आई थी उन्हें सीमा-रेखा से बाहर जहाँ उन्होंने कभी दस्तक नहीं दी थी। वे दस्तक दें न दें उसकी इच्छा थी कि वह खींच ले उन्हें कपाट के भीतर। उसने उनके तपते होंठों को अपने होंठों तक खींच लिया था। उनके कुर्ते के बाँहों को मजबूती से थामे रखा था हर पल कि छूटते ही कहीं छिटक न लें वे उसकी पहुँच से। उस हर क्षण में भी कभी उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई थी, एक पल को भी नहीं। नंदिता को भले ही चेत नहीं था पर उसके शरीर को था। वह अपनी वर्षों लंबी थकन, अपनी जलन सब बिसरा देना चाहता था। वह हनीफ सर को अपनी हर तकलीफ हर पीड़ा तक खींच-खींच ले जाती रही। ताप मिटता रहा, तन हुलसता रहा, हरियाता रहा। उसने जैसे वर्षों की थकान, जलन सब पीछे छोड़ दी हो। शरीर बिल्कुल हल्का हो आया था उसका... अँधेरा खत्म हो चला था उसकी जिंदगी से हमेशा के लिए। उसे लगा रात का सफर तय हो चुका था...
Image

User avatar
kunal
Platinum Member
Posts: 1438
Joined: 10 Oct 2014 21:53

Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Post by kunal » 24 Sep 2017 16:16

8
अम्मा ने जब नंदिता को देखा तो जैसे देखती ही रह गई थीं। एमीलिया, वह भी उनकी पहलेवाली एमीलिया, जाते-जाते कैसे लौट आई थी। उन्हें भरोसा था, वह रास्ता लौटनेवाला नहीं है। और पीछे से आवाज देना उनकी फितरत नहीं रही है। पर जो सामने खड़ा था वो कोई बुत नहीं था, न ही कोई वहम...।
वह एमीलिया नही, नंदिता थी जिसे दूर से देखकर अम्मा को यह भ्रम हुआ था... जब वह सामने आई तो भरम मिटा था उनका... वह एमीलिया जैसी ही कोई थी... वह क्यों एमीलिया जैसी थी यह तो वे बाद में जान पाई थीं। पर कुछ उस दिन भी जाना था... उसके हाथों में कई कागजात थे, आनंदवन से जुड़े हुए... और एमीलिया की सगाई का न्योता भी। तभी वे जान पाई थीं कि नंदिता एमीलिया की बचपन की सहेली है... वे दोनों दिल्ली में भी बरसों साथ रही हैं शायद इसी खातिर...
उन्होंने पूछा था उससे आने में कोई परेशानी तो नहीं हुई... नंदिता ने कहा था वह पहले भी आ चुकी है यहाँ एमीलिया के साथ... वे चौंक सी गई थी... कब आई थी यह... उन्हें याद क्यों नहीं आ रहा...वे ढूँढ़ती इस सवाल का जवाब कि नंदी ने फिर चौंकाया था, मिली कहाँ है, कैसी तबीयत है उसकी... ठीक है अब... अम्मा ने खुद से उलझते हुए ही जवाब दिया। नंदिता समझ गई थी यह परेशानी। उसने हँस कर कहा था... जब मैं आई थी आप नहीं थी यहाँ, किसी काम से बाहर गई थीं...
अम्मा सामान्य हो आई थीं। नंदी ने उसी दिन पूछा था उनसे... क्या मैं आ सकती हूँ यहाँ, जब जी चाहे... अम्मा को लगा एमीलिया ही खड़ी है उनके आगे...। और उन्होंने उसे भी वही जवाब दिया था जो कभी एमीलिया को... फिर पूछा था, क्या कर रही हो बेटी... शोध कर रही हूँ... विषय... स्वतंत्रता संग्राम में महिलाएँ। कहाँ रहती हो... फिलहाल मुनिरका में... लेकिन दूसरी जगह तलाशनी है बहुत ही जल्दी... चाहो तो यहाँ रह सकती हो, शहर से दूर है पर... न जाने क्यों अम्मा अचानक ही कह उठी थीं। नंदिता खुश हो गई थी, जैसे उसके मन की...
उसने सबसे पहले प्रवीण को फोन किया था... मुझे रहने की नई जगह मिल गई है... शायद जीने की एक नई राह भी... मैं आनंदवन में अम्मा के साथ चली आई हूँ... बच्चों के साथ शायद जल्दी सहज हो जाऊँ...
... प्रवीण को भी सुनकर थोड़ी राहत मिली थी। वर्ना कल तो उसके फोन से घबड़ा ही उठा था वह... बच्ची की तरह सिसक रही थी वह... वसीम एमी से शादी कर रहा है और हनीफ सर उसे यूँ देखते हैं जैसे कभी जाना ही नहीं हो उसे... प्रवीण बेतरीके डर गया था उस क्षण... कैसे सँभालेगी यह खुद को... वे लोग भी तो नहीं हैं उसके पास कि... उसने उसी से सुनी एक कविता सुनाई थी - 'उड़ चल हारिल लिए हाथ में, एक अकेला ओछा तिनका। ऊषा जाग उठी प्राची में, कैसी बात भरोसा किनका?'
दूसरा फोन प्रवीण के पास अर्से बाद आया था... मैंने मिली को गोद ले लिया है... बाकायदा... आप खुश हो न...? उसने कहा था... बहुत। नंदिता की आवाज की चहक उसे अच्छी लगी थी... उसने कहा था सुनाऊँ कुछ... आजकल मैं भी तुम्हारी तरह कविताएँ पढ़ रहा हूँ... खासकर अज्ञेय की... 'यह दीप अकेला स्नेह भरा, है गर्व रहित मदमाता पर, इसको भी पंक्ति को दे दो।' नंदिता ने हँस कर कहा था... हाँ, मेरा मोक्ष भी यही है। मेरी मुक्ति का रास्ता... मेरे द्वारा खोजी हुई मेरी अपनी राह। मेरा अस्तेय-अपरिग्रह।
फिर तो अम्मा की सारी जिम्मेदारियाँ। स्कूल का सारा काम... बच्चों की देखभाल... नंदी ने कभी एमीलिया की कमी महसूस ही नहीं होने दी थी उन्हें... और उनकी चिंता जैसे जाती रही थी एक-एक कर... वे एमी को भूलने लगी थीं। याद करती भी तो वैसे ही जैसे कभी शिखा को याद करती हैं। एमीलिया भी आती तो... पर नंदी को इस तरह आनंदवन से जुड़ा देखकर लौट जाती।
वह आती थी अपने वादे का खयाल करके... अम्मा, नंदी और बच्चों का खयाल करके... कि तुम मुझे और आनंदवन से एकदम से नाता नहीं तोड़ लोगी न... कहो, कि कुछ समय निकलोगी तुम हमारे खातिर भी... भरी आँखों और मुस्कुराती होंठोंवाली एमीलिया ने भी कहा था... कैसी बात करती हैं अम्मा, यह भी कोई कहने-सुनने की बात है... उन्हें लगा था एमीलिया की आँखें शिखा की आँखें नहीं है, उनमें एक सच्चाई है। हमेशा की तरह... एमीलिया खुश होती, नंदी रम गई है इस जिंदगी में, एमीलिया खुश होती अम्मा को एक सहारा मिल गया था... एमीलिया खुश होती बच्चों के लिए... उसकी जगह खाली नहीं रह गई थी। एमीलिया खुश थी, नंदी ने वह कर दिखाया था जो कभी एमी का सपना था और वह पूरा नहीं कर पाई। रिसर्च पूरा कर लेने और लेक्चरर की नौकरी कर लेने के बाद भी नंदी ने अम्मा और आनंदवन को नहीं छोड़ा था। बल्कि उससे आगे बढ़ के मिली को गोद लेकर उसे नई जिंदगी दी थी। एक नई मिसाल कायम की थी उसने, अपनी जिंदगी आनंदवन और बच्चों को सौंपकर... किसी को गोद लेकर... इन सबकी खातिर शादी न करके। उसे रश्क होता नंदिता से... यह सब तो सारी उम्र वह चाहती रही थी फिर नंदी...
वर्ना जयपुर से लौटकर आई नंदी को देख उसका मन कसक उठा था... उसकी नंदी कहाँ गुम हो गई थी आखिर। एक-एक कुर्ता-जींस कई-कई दिनों तक पहने रहती। राजस्थान से खरीद कर लाए सारे शोख-चटक दुपट्टे और कपड़े उसे दे गई थी वह... बस खोई रहती अपने में ही कहीं... और एक अपराधबोध से भर जाती वह... उसी ने तो नहीं छीन लिया उससे उसका सब कुछ... नंदी ठहरकर सोचती तो शायद लौट आती। वसीम उसे हाथोंहाथ थाम लेता, जानती थी वह। फिर भी... क्यों किया उसने ऐसा। क्या नंदी से प्रतिशोध ले रही थी वह... उसे अकेले छोड़ कर जाने का प्रतिशोध... हनीफ सर की खातिर... क्या दोस्ती की आड़ में किसी मौके की ही तलाश थी उसे... और वह मौका खुद नंदी ने ही दे दिया था उसे...
9
एमीलिया की मोबाइल की घंटी उस दिन जब जोर-जोर से चिल्ला रही थी, वह सोई हुई थी गहरी नींद में। यूँ भी उसे देर तक सोने की आदत थी। नंदिता थी तो उसकी सुबह कभी नौ-साढ़े नौ बजे से पहले होती ही नहीं थी। वह भी उसके चीखने-चिल्लाने और बार-बार हल्ला मचाने के बाद... पर नंदी के जाने के बाद उसे मजबूरन इस आदत को बदलना पड़ा था... कभी दूधवाले की घंटी से, कभी अखबारवाले, ब्रेडवाले के...
वह सोचती है आदतें तो अब तक बदल जानी चाहिए थी। नंदी को गए हुए कितने बरस तो बीत चुके थे। पर नहीं, कुछ भी नहीं बदला था उसकी घरेलू जिंदगी में। वह सोई होती और दूधवाला आता तो कहती अधनींदी सी ही... जा ले ले न नंदी। रोज तो लेती है तू, फिर आज किस बात का नखरा...। फिर कच्ची नींद जैसे बिखर जाती। नंदी... नंदी कहाँ है अब यहाँ। वह तो चली गई कब की उसे छोड़कर... उसने एक पल को भी नहीं सोचा कि वह अकेली कैसे रहेगी। उसे नहीं याद आया वह वादा भी जो अपना घर और शहर छोड़ते वक्त दोनों ने एक-दूसरे से किया था... कि कैसे भी हालात हों, वे एक दूसरे का साथ कभी नहीं छोड़ेंगी...। कि कैसा भी दौर आए उनकी दोस्ती, उनके संबंधों में कभी भी कोई बदलाव नहीं आएगा... पर कोई भी वादा नहीं टिका था उस पल... वह हतप्रभ सी देखती ही रह गई थी तब...
लगातार बजती फोन की घंटी ने उसे परेशान कर दिया था। ऐसे भी कौन सा सो रही है वह। उठाकर खबर ले ही ले सामनेवाले की... यह कौन सा तरीका हुआ आखिर... कोई फोन नहीं उठा रहा है तो कोई तो बात होगी। थोड़ा सा सब्र तो किया ही जा सकता है... वह उठी थी झटके से कि रिंग आना बंद हो गया था। वह सेल उठा कर नंबर देखती ही कि डोरबेल चीखने लगा था और मजबूरन उसे दरवाजे की तरफ पलटना पड़ा था... हाँ, चीखना ही कहेंगे... पता नहीं नंदी कहाँ से ढूँढ़ कर लाई थी यह डोरवेल। वह कहती, कितनी यूनिक सी आवाज है और उसी आवाज की तासीर उसमें घबड़ाहट और बेचैनी भर देती। एक छोटे से बच्चे के जोर-जोर से रोने की आवाज; रोते-रोते चीखने लगा हो जैसे। वह कहती हर बार - तुझे यही मिला था... और भी तो... वह हँस देती... तभी तो उठेगी हड़बड़ाकर। वर्ना सोई रहेगी भीमपटास सी... वह सोचती है अब तो वह भी अभ्यस्त हो चली है इस कानफाड़ू रुदन की... पर यदि गहरी नींद में हो तो अब भी कभी-कभी परेशान हो उठती है।
वह चाहती तो नंदी के जाने के बाद इसे बदल सकती थी। पर चाह कर भी नहीं बदल पाई इसे...
कितनी देर लगा देती हैं आप दरवाजा खोलने में। नंदी बेबी थीं तो... कितना देर लगा दिया... तुम घंटी पर से हाथ हटाती ही नहीं हो... कोई बाथरूम में हो सकता है... कुछ भी करता हो सकता है... तुम हो कि समझती ही नहीं... काहे का बाथरूम और कैसा नहाना-धुलना... मुझे पता है आप सो रही होंगी अब तक... इसीलिए तो बजाती हूँ बेल जोर-जोर से इतना, नंदी बेबी...
यह नंदी बेबी-नंदी बेबी क्या लगा रखा है तुमने। वह होती थी तब न... वह चली गई यहाँ से कब की। और उसे गए जमाना हो चुका है। भूल क्यों नहीं जाती तुम उसे... वह शायद चीखी थी जोर से। नन्हू ताई घबड़ा गई थी उसके इस तरह चीखने से... हतप्रभ सी खड़ी रही थी देर तक। फिर आँसू बह निकले थे उनके... फिर उन्होंने पोंछा था इसे और चादर झाड़ने लगी थी... दूसरे बिछावन का चादर झाड़ते-झाड़ते वह बड़बड़ाई थी और बड़बड़ाने की तरह नहीं बल्कि कुछ जोर से। मैं नहीं भूलती... अरे खुद तो भूलो पहले... यह चादर क्यों बदलवाती हो अक्सर... यह बिछावन क्यों लगे रहने दिया है अब तक... रोज टेबुल पर झाड़न मारो... क्यों... मुझसे कहती है भूल क्यों नहीं जाती... नहीं भूलती मैं, तुम तो भूलो पहले... पता नहीं किस आस में... एमी की सुबह उदास हो चुकी थी। वह नन्हू ताई को कुछ कह नहीं सकती थी। और कहे भी तो क्या। अब वह इसी तरह बड़बड़ाती रहेगी पूरे दिन। वे दोनों जब नई-नई आई थी नन्हू ताई तब से काम कर रही है उनके यहाँ। चिड़चिड़ी तो हमेशा से रही है। किसी बात पर चिढ़ गई तो चिढ़ गई... नंदी सँभाल लेती थी इन्हें, मना ही लेती थी किसी न किसी तरह। उससे ये सब नखरे अमूमन उठाए नहीं जाते। पर जब से नंदी चली गई है उसकी भूमिका भी तो उसे ही करनी होती है... उसने पीछे से आकर उसे कंधे से पकड़ लिया था और फिर बाद में उसके कंधों पर अपना सिर डाल दिया था हौले से... उसे लगा उसका संताप कुछ कमा है। उसे माँ की याद हो आई थी। वह माँ के कंधे पर भी वैसे ही सिर डाल देती थी, जब भी नाराज होती थी वह। और तब वह मान भी जाती थी... हाँ, बीमारी के दिनों में झिड़कने लगी थीं वे उसे बेतरह। दुत्कार कर हटा देतीं... उसकी आँखों में सचमुच के आँसू आ गए थे... नन्हू ताई मुड़ी थी उसकी तरफ... अब रो क्यों रही हो... रोना नहीं बिल्कुल। मैं तो कहती हूँ, ये बिछावन, ये टेबुल ये कुर्सी सब निकाल फेंको कमरे से। कुछ जगह बन जाएगी, कमरा खुला-खुला लगेगा बिल्कुल। और वह नंदिता के टेबुल को उठाकर बाहर करने ही वाली थी कि वह फिर से चीखी थी शायद... तुम अपना काम क्यों नहीं करती, जाओ जा कर नाश्ता बनाओ... वह चली गई थी रूठ कर या यूँ ही, उसे नहीं पता। वह जानना चाहती भी नहीं थी... यह सब उसके बस का नहीं बिल्कुल। सँवारने की कोशिश में चीजें और-और बिगड़ जाती हैं उससे। वह नंदिता नहीं हो सकती... वह नंदिता होना चाहती भी नहीं... उसने चिढ़ कर कहा था खुद से और पैर पटकती हुई बाथरूम की तरफ बढ़ चली थी। वह पहुँची थी अभी बाथरूम तक कि मोबाइल की घंटी फिर टनटनाई थी। उसने मैसेज पढ़ा था - मैं मिलना चाहती हूँ तुमसे। अभी, इसी वक्त... बोलो कब और कहाँ... फोन क्यों नहीं उठा रही...? एमीलिया झुँझला उठी थी खुद पर... तो फोन नंदी कर रही थी और उसने उठाने की जहमत नहीं की। और उठाना तो दूर नन्हू ताई की बेमतलब की बातों मे उलझ कर फोन की बात तक भूल गई वह... उसने तुरंत फोन किया... क्या हुआ नंदी... बस तुमसे मिलना है... उसे आवाज उदास सी लगी थी, भर्राई भी... कोइ खास बात... तू ठीक तो है न... ठीक हूँ... फिर रुक कर... शायद नहीं भी... बस इसीलिए तुझसे मिलना है... मैं तो खुद आज आकर तुझसे मिलती। अभी रात को ही लौट कर आई हूँ... थकी थी इसलिए फोन का पता नहीं चला... वह एक छोटा सा झूठ बोल गई थी। तेरी तबीयत अब कैसी है... ठीक हूँ... बोलो कहाँ मिलें... कहाँ क्या मिलें... यहीं चली आ... क्या यहाँ नहीं आने की कोई कसम ली है तूने... नन्हू ताइ भी अभी-अभी तुम्हें ही याद कर रही थी... नंदी ने उसकी बात काटी थी, कहाँ... आ जाऊँ... फिर कुछ सोचते हुए... तुझे कोई जरूरी काम तो नहीं आज... बोल कब तक आऊँ... कोई काम नहीं है मुझे... अभी की अभी आजा चुपचाप... मैं आज घर में ही रहकर आराम करनेवाली हूँ पूरे दिन। नन्हू ताइ को तेरे लिए भी नाश्ता-खाना बनाने के लिए कह देती हू... फिर दिन भर बैठ कर गप्पें मारेंगे दोनों... तो फिर फ्रेश हो कर आती हूँ... फोन काट दिया था नंदिता ने... वह उसके इंतजार में जहाँ की तहाँ बैठ गई थी... नहाना-धोना कुछ भी याद नहीं रह गया था उसे, कुछ भी...
नंदी आनेवाली थी। आज उसने नन्हू ताई को उसकी पसंद का नाश्ता-खाना बनाने को कहा था - नाश्ते में पोहा और खाने में कढ़ी-चावल। उसे याद आया अंतिम खाना जो नंदी छोड़कर चली गई थी प्लेट में वह कढ़ी-चावल ही था। नन्हू ताई बड़बड़ाई थी... पहले से कुछ बताते नहीं और अचानक फरमाइश... अब दही कहाँ से लाऊँ... नंदी बेबी थीं तो सप्ताह भर का मेन्यू तय कर के रख देती थीं। कभी कोई परेशानी नहीं... अरे मैं अपने लिए नहीं, तुम्हारी उसी लाड़ली नंदी बेबी के लिए कह रही हूँ... चौकवाली दुकान से लेती आओ न, कितना वक्त लगेगा। खिड़की पर रखे एक चॉकलेट के डब्बे से पैसे निकाल कर वह बाहर चली गई थी, बुदबुद करती हुई... नंदिता को याद आया खुले पैसे रखने की यह जगह नंदिता ने ही बनाई, तय की थी। चॉकलेट का यह डिब्बा कभी उसके पापा लाए थे... नंदी को चॉकलेट भी बहुत पसंद हैं...
छोटी-छोटी कितनी सारी चीजें, किचेन के दरवाजे से टँगी डायरी और पेन जो नंदिता के चले जाने के बाद से अब तक वैसे ही टँगे हैं, भले ही उसमें कोई नई रेसेपी नहीं जुड़ी तब से... न ही साप्ताहिक मेन्यू लिखा गया उसके जाने के बाद। किचेन में रुई, बरनॉल, डिटॉल, कैंची... अपने और उसके दोनों के टेबल पर स्केल, इरेजर, पेंसिल, कलर पेंसिल, पिन, स्केच, स्टेपलर, मार्कर, गम... सब उसी ने जमाए थे। हालाँकि काम ज्यादा एमीलिया के ही आती थी ये चीजें, खासकर नंदी से तो ज्यादा ही। बड़ी आलमारी में उसके और अपने दोनों के कपड़े प्रेस करवा कर तरतीबवार रखना। ये छोटे-छोटे पर महत काम नंदी ही तो करती थी। उसके जाने के बाद उससे बाहर निकलकर एकमुश्त कपड़े प्रेस करवा लेना कभी नहीं हो सका। घर से निकलते हुए हड़बड़ी में खुद से दाएँ-बाएँ मार लेती है प्रेस। ज्यादा देर हुई तो वह भी नहीं... उतारे कपड़े पहन कर ही चल देती है वह। एमीलिया ने उठकर दोनों के पेन स्टैंड से खत्म हुई रीफिलें, टूटे पेन, खराब और सूखे स्केच निकाल कर बाहर किए। उसने अगर इन्हें देखा तो...
वह आ रही थी, और वह उसके आने की तैयारी में थी... पर उसके जाने का दिन जाने क्यों टँगा आ रहा था उसकी स्मृतियों में... उसकी जुठाकर छोड़ी गई कढ़ी-चावल की प्लेट... बाथरूम में उसका गीला पड़ा तौलिया, अलगनी पर टँगी रह गई उसकी सलवार-कमीज... रैक में लगी उसकी पसंदीदा किताबें... और भी न जाने कितना कुछ... सब कुछ तो छूटा रह गया था उसका यहीं। या कि जान-बूझ कर वह छोड़कर चली गई थी उन्हें...
नंदिता चली गई थी अचानक, पर क्या सचमुच अचानक ही गई थी वह... कमरा अचानक ही नहीं मिल जाता... एकाएक तो कुछ भी नहीं हुआ होगा... हाँ, अचानक तो शायद कुछ भी घटित नहीं होता जिंदगी में, वह सब भी, जिसे हम सोचते हैं अचानक ही घटित हो गया। भूमिकाएँ तैयार होती हैं पहले हर घटना की। वह समझे न समझे, नंदिता उसके पहरों से ऊबने लगी थी। उपदेशों से तो नफरत उसे पहले से ही थी... और वह समझती थी कि अंकल-आंटी के पीछे उसी की तो जिम्मेदारी है नंदी। वह उसे सही-गलत नहीं बताएगी तो और कौन बताएगा। खासकर हनीफ सर के सिलसिले में... वह जितना कहती, जितना चिढ़ती, नंदी उतनी ही वेग से उनसे जुड़ती चली गई... भूल उसी की थी शायद, उसे भूलना नहीं चाहिए था। नंदी हमेशा से आजादी की आग्रही थी। दम घुटता था हमेशा उसका माँ-पिता के संरक्षण में। वह तो जानती थी यह सब, फिर कैसे भूल गई इतनी जरूरी बात?
हर दिन की तरह उस दिन भी वह नंदी के इंतजार में बैठी हुई थी। पहले आठ, फिर साढ़े आठ, नौ, साढ़े नौ, फिर दस... वह सोचने लगी थी, हद होती है इंतजार की भी... कल उसका पेपर था पर पढ़ने में भी मन कहाँ लग रहा था... पता नहीं क्या बात हुई इतनी देर तो कभी भी नहीं करती... हाँ देर से आती है वह पर हद से हद आठ -साढ़े आठ तक। उसके हाथ चिंता से पसीजने लगे थे। माथे की नसें तड़क रही थीं हौले-हौले। हथेलियों को उसने बेसिन की धार के नीचे धर दिया था और खड़ी रही थी चुपचाप...
पहले तो नंदिता पर उसकी बातों का असर होता था। उसने कहा था और उसने आर्ट क्लासेज जाना बंद कर दिया था। बीमार हो चली थी वह पर उसने अपने कहे को निबाहा था, बस 15 दिन बाकी थे उन हॉबी क्लासेज के जब वह खींच कर फिर उसे लेती गई थी दुबारा। ऐसे तो मर जाएगी। वह है उसके साथ फिर नंदिता कैसे कुछ गलत कर सकती है। क्या हो जाएगा इन पंद्रह दिनों में...
पर शायद वह गलती वहीं कर गई थी, वह देखती वे दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल भी बात नहीं करते हैं, पर वह देखती उनकी आँखें गुपचुप-गुपचुप मौका मिलते ही बतिया लेती हैं... न जाने कितनी बातें, कितने कॉल रोज किए जाते रहें और वह देखती रही अवाक। वह रोकती भी तो उन्हें कैसे और कहती भी तो क्या।
उसने रोका था नंदिता को और पूरे हक से रोका था, जब वह बीए में थी उसने हनीफ सर का विषय यानी कला चुनना चाहा था, उसने जोर दे कर कहा था नंदी उबरने की कोशिश कर इस सब से। बिना कोशिश किए यह कहना बेकार है कि हाय मैं तो डूब ही गई... दूर रह कर देखो उनसे, शायद उन्हें भूल पाओ। हो सकता है आकर्षण हो, सिर्फ आकर्षण... हमारी उम्र भी तो...
और नंदिता ने उसकी बात मान ली थी। उसने अपना विषय इतिहास चुना था। उसने जब यह बात अंकल-आंटी को बताई तो वे खुश हुए, न सही डॉक्टर, आईएएस की तैयारी तो कर ही सकती है अब। नंदिता ने भी जी जान से खुद को पढ़ाई में झोंक दिया था। वह अब पहलेवाली नंदिता हो चुकी थी, वही स्कूलवाली। बस एक चीज गायब होती उसके चेहरे से, सुकून... खुशी। एमी के लिए यह कोई चिंतावाली बात नहीं थी। पहले भी वह जब किसी लक्ष्य के लिए जुट जाती तो ऐसे ही होती थी किसी तड़पती हुई मछली की तरह बेचैन, जैसे पानी का भान भी न हो उसके आस पास। पर एमीलिया जब साथ होती वह पुरसुकून हो लेती। हँसी-खुशी, बचपन जैसे सब लौट आता बस एक एमी के साथ भर से।
पर वही एमीलिया साथ थी और नंदिता खुश नहीं थी बिल्कुल। उसके दुखों का कारण भी शायद वही थी, सिर्फ वही... वह नंदिता को हर तरह से बहलाना चाहती थी, पर वह बहलती नहीं एक पल को भी। बल्कि तुर्शी से कहती अब क्या चाहिए तुम्हें... अब और क्या करूँ तुम्हारी खुशी के लिए...
... पर अचानक उठा यह बवंडर धीरे-धीरे सतह पर आने लगा था। पिछले दो-ढाई महीने से नंदिता फिर खुश रहने लगी थी। उसे अच्छा भी लगा था। यही तो चाहती थी वो। उसका थोड़ी देर से आना उसे बिल्कुल भी नहीं खटका था। हाँ उसे पता था क्लास साढ़े पाँच बजे समाप्त हो जाती है... उसकी आँखों की उदासी कमी थी, आवाज की तुर्शी भी। वह जो भी कहती उसे बड़े चैन से सुनती वह। गुनगुनाना फिर शुरू हो गया था उसका। खुश हो कर गले भी लग जाती पहले की तरह कभी-कभी... और जब गुनगुनाना शुरू हुआ उसका ध्यान तभी खींचा था नंदी के बदलावों ने... पर यह शगुन नहीं था। हनीफ सर जब मिले थे पहले पहल यूँ ही उड़ती-पड़ती, गुनगुनाती फिरती थी हर पल...। वह कुछ पूछती न पूछती कि उसने देख लिया था एक दिन खिड़की पर खड़ी-खड़ी नंदिता को उनकी कार से उतरकर घर तक आते हुए।
फिर वह कहती रहती बार-बार और नंदिता सुन-सह लेती सब चुपचाप। वह जब ज्यादा झल्लाती, चीखती-चिल्लाती वह बड़े संयत ढंग से कहती और इतना कहती, मैं हार चुकी हूँ खुद से... मैंने तुम्हारे सारे कहे पर अमल किया... पर मैं नहीं जी सकती उनसे मिले बगैर। वह निरुत्तर हो जाती, हर बार। पर फिर-फिर वही कोशिश... एक और कोशिश... नंदी शायद इन कोशिशों से ही झल्ला उठी थी। उसने कहा होगा शायद हनीफ सर से सब कुछ। उन्होंने मकान ढूँढ़ना शुरू कर दिया था शायद पहले ही... तभी तो उसने नंदी से जब कहा और वह भी चुपचाप दरवाजा खोलने, उसके हाथ-मुँह धोने और उसका पसंदीदा कढ़ी-चावल गरम करके परोसने के बाद... नंदी यह भी कोई आने का वक्त है... तुम जानती हो मेरा पेपर है, मुझे चिंता होती रहती है तुम्हारी... पता नहीं... क्या कुछ... कि चीख ही पड़ी थी वह... मुझे मेरी जिंदगी जीने दो, मत लगाओ मेरी साँसों पर भी पहरे... चिंता होती है तुम्हारी... कौन होती हो तुम मेरी चिंता करनेवाली... होती कौन हो आखिर? थाली झटके से खिसका दी थी उसने। हाथ धोया था झपाटे से और एक एयर बैग में सामान ठूँसने लगी थी। जो सामने दिख जाए। जो कुछ छूटे, छूट जाए, उसी ने कहा था क्या कर रही हो नंदी... देख तो रही हो... कहाँ जा रही हो मुझे अकेली छोड़कर... अकेले तो हम अब भी हैं। हम वही हम हैं क्या... और मुझे नहीं रहना है तुम्हारे साथ अब। उसने जबरन उसके हाथों को थाम लिया था... नहीं नंदी, प्लीज... अब से कुछ नहीं कहूँगी, कुछ भी नहीं। तुम जब चाहे जहाँ चाहे आओ-जाओ... ऐसे इतनी रात को कहाँ चली जाओगी... नंदी ठंढे दिमाग से सोचो जरा... पर पलटी नहीं थी वह। एक बार भी मुड़कर नहीं देखा था उसने...। और उसने देखा था खिड़की से हनीफ सर की गाड़ी का दरवाजा खुला था, नंदी ने बैग डाला था, खुद को भी... और गाड़ी चल पड़ी थी...
वह खुद को छला हुआ महसूस कर रही थी... तो क्या सब कुछ तय था। पक्के ढंग से प्लान किया हुआ। तो क्या इसीलिए नंदी और ज्यादा देर से लौटी थी, रोज से भी... उसे पता था कि वह रिएक्ट करेगी ही करेगी... तो क्या हनीफ सर इसीलिए खड़े थे अब तक...
उसके भीतर जैसे बहुत कुछ टूट गया था एक बारगी। वह बिछावन पर बैठ गई थी धम्म से...
उसने देखा था खिड़की से, नीली सलवार-कमीज में एक लड़की को आते। उसने गौर किया वह नंदी ही थी। नंदी का पीला दुपट्टा उड़-उड़ कर उसके चेहरे के सामने आ रहा था। वह उसे दूर फेंक रही थी, पीछे की तरफ। उस दुपट्टे की रोशनी में सूरज की किरणें कुछ और पीली हो गई थीं, कुछ और चमकीली... उसे लगा नंदी के चेहरे पर भी एक पीलापन था उदासी का। उसने सोचा चाहे बात जो भी हो, चाहे कारण जो भी, उसे नंदी के चेहरे से उदासी की ये परतें हटानी होंगी। नंदी उसी तक तो आ रही थी अपनी बात कहने। आज भी तो उसे सबसे अपनी वही लगी थी... उसने भी पिछली यादों को दूर फेंक दिया था, पीछे कहीं... वह बिछावन से उठ खड़ी हुई थी। उसने कढ़ी की कराही फिर से चूल्हे पर चढ़ा दी थी।
Image

User avatar
kunal
Platinum Member
Posts: 1438
Joined: 10 Oct 2014 21:53

Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Post by kunal » 24 Sep 2017 16:17

10
हनीफ जब लौटने के बाद नंदिता से मिलने पहुँचे थे, नंदिता लगातार सोचती रही थी आज कोई बंदी हो और सर उसके घर तक नहीं पहुँच पाएँ। कि ट्रैफिक जाम में ही फँस जाएँ वो। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ था। सर हमेशा की तरह अपने कहे हुए वक्त पर आ गए थे और दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे। देर तक वह सुन कर भी अनसुना करती रही थी जैसे उसके न सुनने भर से ही हनीफ सर अनुपस्थित हो जाएँगे। पर अनसुना करना जब बिल्कुल ही असंभव हो गया उसने दरवाजा खोला था और पलट कर बाथरूम में घुस गई थी। जैसे उसके इस तरह बैठे रहने से वे लौट जाएँगे अपने आप।
वह बैठी-बैठी सोचती रही थी... उसके ठीक भीतर बैठी एमी कह रही थी उसने ऐसा कौन सा अपराध किया है आखिर कि मुँह छिपाती फिर रही है वह। सर भी तो उसके होने के बावजूद अपनी बीवी से संबंध रखते हैं। और न सिर्फ संबंध बल्कि अपने परिवार के लिए उनका मोह भी जस का तस है। फिर उसकी जिंदगी में अगर एक कमजोर पल आ गया तो क्या हुआ। ...हाँ, हनीफ सर के उसकी जिंदगी में होने के बावजूद। जब नसीमा बी के होने के बावजूद सर उससे जुड़ सकते हैं तो... और उसने कोई जानबूझ कर भी कहाँ किया कुछ। वह एमी के दिए हिम्मत से भर चुकी थी। वह पिछले दिनों सोचती रही थी लगातार सर जब आएँगे वह सब कुछ बता देगी उन्हें साफ-साफ। फिर वे जो भी निर्णय लें... उसने भी तो स्वीकारा है उन्हें उनकी सारी मजबूरियों, कमियों और अतीत के साथ... अगर प्यार करते हैं वे उससे तो यह सब जानने के बाद भी उसे स्वीकारेंगे।
एमी ने कहा था उससे, परीक्षा उसकी नहीं हनीफ सर की है। वह क्यों जल रही है आत्मग्लानि में इस तरह... क्या हनीफ सर भी शर्मिंदा हुए हैं कभी उसके सामने आने पर...? लगभग हर रात सोकर - रहकर आते हैं वे अपनी पत्नी के साथ। गलती उसकी नहीं सिर्फ हनीफ सर की है। आखिर क्या चाहते हैं वे उससे। अपना सब कुछ बचाए-जोड़े रहने के बाद भी एक 'एडिशनल' सा कुछ। नंदी की जगह क्या है आखिर उनके जीवन में। आए, मन बहलाए कुछ देर और फिर चल दिए उठ कर। नंदी भी अब सोचे सब कुछ गंभीरता से... 'भूख' भी एक शाश्वत सत्य है और उस हाल में तो और ज्यादा वाजिब जब परोस-परोस कर थाली खींच ली जाए सामने से...
वह एमी के हनीफ सर को इस तरह भला-बुरा कहने से नाराज क्यों नहीं हो पा रही थी हमेशा की तरह। उसने सोचा था... क्यों नहीं प्रतिवाद कर पा रही वह हमेशा की तरह पुरजोर ढंग से। क्यों नहीं उठ कर जा रही वह उसी दिन की तरह... यह सोचकर उसने विरोध करना चाहा था पर आज आवाज बिल्कुल ढीली थी, हल्की और लचर सी। इसमें हनीफ सर की क्या...
गलती है और उन्हीं की है। मैं तो कहती हूँ अगर वसीम तुझे प्यार करता हो और अपनाए तो तू उसी की हो ले पर हनीफ सर की बिल्कुल नहीं... बोल... नंदी बोल न वह कैसा लगता है तुझे...?
नंदिता को क्रोध आया था और अबकि जोर से आया था। तू ही न कहती है नेचुरल है यह सब कुछ... भूख प्यास की तरह प्राकृतिक... फिर... फिर क्यों जुड़ने को कह रही है तू उससे, उस एक रात के घट जाने के एवज में। जबकि उसमें मेरी कोई गलती थी ही नहीं। मैं चैतन्य नहीं थी, वह था। मुझे होश नहीं था, उसे था। और उसे यह भी पता था कि उसके पिता को प्यार करती हूँ मैं। फिर भी उसने... उसकी गलती की सजा खुद को मैं क्यों दूँ...? बोल तू...।तू भी वही कह रही है जो सामान्यतः लोग कहते हैं। मैं प्यार नहीं करती उससे...। नंदी के स्वर में रोष था।
तो फिर हनीफ सर को बता दे सब कुछ... पर मुझे नहीं लगता... लाख प्रोग्रेसिव हों वो पर हैं तो इसी समाज से, जहाँ ससुर अगर बलात्कार करता है बहू से तो भी समाज का निर्णय उस बेचारी बहू के पक्ष में न जा कर उस बलात्कारी के पक्ष में ही जाता है कि अब वह लड़की अपने पति की माँ हो गई और उसका पति से रिश्ता नाजायज हो गया... और तेरे साथ तो नंदी बलात्कार जैसा भी कुछ घटित नहीं हुआ... मुझे डर है नंदी... हनीफ सर अब... उसके डर से नंदिता भी डर गई थी... उसने अपने डर को परे धकेलते हुए ढीठ हो कर कहा था... ऐसा नहीं होगा कुछ... मैं कहती हूँ ऐसा नहीं करेंगे वे... और वह हथेलियों में अपना चेहरा छिपाकर फफक-फफक कर रो उठी थी।
एमी ने थाम लिया था उसे कंधे से। फिर उसका सिर अपने कंधे पर डाल लिया था और रोने दिया था उसे फूट-फूट कर...। रो ले नंदी, जी भर के रो ले... मन हल्का हो जाएगा।
बहुत देर की चुप्पी के बाद न जाने क्या सोचते हुए एमी ने कहा था... वसीम ने तुम से फिर कोई संपर्क करने की कोशिश की...? चिढ़ी हुई नंदिता ने कहा था... की न, बार-बार फोन कर रहा था मुझे और अब एसएमएस... एमी ने पढ़ा था उन पंक्तियों को, नहीं, कविता-पंक्तियों को...
'अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे,
अगर मैंने किसी के नयन के बादल कभी चूमे,
महज इससे किसी का पुण्य मुझ पर पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?'
...बहुत ही ज्यादा इरीटेटिंग होता जा रहा है यह सब कुछ। आखिर वह मुझ से कहना क्या चाहता है। एमीलिया ने उसके नंबर को अपने दिमाग में बैठाते हुए कहा था यह तो वही बताएगा न... पर इसके लिए तुझे उससे बात करनी होगी... जो कि तू करेगी नहीं।
एमी फिर चुप हुई थी थोड़ी देर को... उसकी इस चुप्पी से नंदिता को डर लगता है, चेहरे के इस निर्मम तटस्थ भाव से भी। हमेशा लिखते-पढ़ते वक्त एमी का चेहरा यूँ ही होता है। खास कर लेख लिखते वक्त। यह चेहरा निर्णय करनेवाला चेहरा था, अपनी राय तटस्थ हो कर देनेवाला चेहरा, जहाँ कोई लाग लपेट न हो, ना ही कोई पूर्व भूमिका।
...वैसे एक बात कहूँ नंदी, वसीम के सिर सारे दोष मढ़ कर यूँ किनारे भी खड़ी नहीं हो सकती तू। तूने उसे उस रात रुकने ही क्यों दिया था अपने पास। उसके साथ यूँ वक्त बिताने, घूमने-फिरने क्यूँ लगी थी तू... तुझसे तो छिपी नहीं रही होगी उसकी चाहत...? फिर भी... सीधी सी बात यह है कि तुझे उसका साथ अच्छा लगने लगा था... अभी भले ही तू यह स्वीकार न करे पर यह सब करने के पीछे तेरे मन मे भी तो कोई चोर था ही न...बोलते-बोलते एमीलिया ने नंदिता का भक्क चेहरा गौर से देखा था और फिर भी हिम्मत जुटा ही ली थी यह सब कहने के लिए... तू कह रही थी बुखार उतर रहा था तब। बुखार चढ़ा भी तुझे उस दिन रोज से कम ही था, डेढ़-दो के बीच कहीं... इतना बुखार होश खोने के लिए काफी नहीं होता, वह भी दवा खा लेने के बाद उतरने की प्रक्रिया में। सीधी-सीधी बात यह नंदी कि भूख उसे थी पर तूने उसे उभारा, हावी होने दिया कि अपनी नजर में ही दोषी न हो जाऊँ कहीं... कि कसूरवार कहलाए भी तो वही। फिर अपने कमजोर शरीर और मन को दिया एक उड़ान... ऐसे में कल्पनाशक्ति बहुत तेज हो जाती है... सामने बैठा व्यक्ति वसीम नहीं हनीफ सर हैं... और फिर सब कुछ...
तिलमिला उठी थी नंदिता, इतनी कि कमजोरी से पीला हुआ चेहरा लाल-भभूका हो उठा था अचानक। उसने झटके से पर्स उठाया था और बगैर पीछे मुड़े चल दी थी उसी दिन की तरह... एमीलिया को लगा, तो क्या इसी पुनरावृत्ति की खातिर उसने उसे घर बुलाया था... उसने दौड़ कर नंदिता का कंधा पकड़ा था पीछे से... नंदी सुन तो... और मोड़ा था उसे अपनी तरफ... मुड़ते ही न जाने क्या घटित हुआ था कि नंदी के चेहरे की रेखाएँ पिघली थी और वह फूट-फूट कर रो पड़ी थी दुबारे...
उसे याद आया था वसीम के साथ का एक-एक पल। उसे याद आया था उसके साथ लाल किला में संग-संग घूमना... उसे याद आया था उसका खुल के हँसना बोलना... उसका उसके लिए लगाव... अस्वस्थता में हर पल उसके आसपास बने रहना। उसे सबसे ज्यादा याद आया था अपना वह गुस्सा जब वह सोचने लगी थी हनीफ सर ने उसे ये बातें क्यूँ नहीं बताई... उसे लगा था उस वक्त कि क्या वह भी हनीफ सर के किले में नजरबंद कोई राजकुमारी है जिसे उतनी ही रोशनी मिलती है जितनी कि वह उसे दे। या कि बंद महल में बने सुराखों से होकर आ सके... उसकी समझ विकसित हो तो उतनी ही जिससे कभी बगावत नहीं कर पाए वह। वह खुद हैरत में थी, खुद अपनी जिंदगी चुननेवाली, हनीफ सर के लिए सबसे बगावत करनेवाली वह ऐसा सोच पा रही थी तो कैसे... क्या यह वसीम के साथ का असर था? क्या इसीलिए हनीफ सर बचाए रखना चाहते थे उसे दुनिया की निगाहों से... कि नजर लग ही गई थी उनके रिश्ते को...
वह सोच रही थी, ठीक ही कह रही है एमीलिया शायद, उस रात का बीज तो उसी क्षण पैदा हो चुका था उसके भीतर... उस रात की यानि मुक्ति की कामना उसी क्षण पलने लगी थी शायद उसके लहू में। वह हनीफ सर के कैद से मुक्ति चाहती थी... अपनी तमाम अभिलाषाओं को जीना चाहती थी। वह उन प्रदेशों में भी जाना चाहती थी जो उसके लिए वर्जित थे। आखिरकार वह हव्वा की ही तो बेटी थी... और अंततः उसने चख ही लिया था उस वर्जित फल का स्वाद। वसीम तो शायद निमित्त मात्र था। वर्षों से थमी हुई रात उस पल चल पड़ी थी और फिर सुबह हुई थी दूसरी...
उसने सब कुछ कहना चाहा था एमी से पर बोलने के लायक स्थिति नहीं रह गई थी उसकी। आँसू के हिचकोले बोलने नहीं दे रहे थे उसे... बस बदन हिल रहा था उसका आवेग से और एमीलिया जिसे अपनी बाँहों में थामकर सामान्य स्थिति में लाने की कोशिश कर रही थी, लगातार।
...उसने दरवाजा खोला था और पूरे आवेग से खोला था, इंतजार कर के हनीफ सर कहीं चल तो नहीं दिए हों। उसे उन्हें बतानी है हर एक बात... उसे उन्हें सब कुछ सच-सच कह देना है...
Image

User avatar
kunal
Platinum Member
Posts: 1438
Joined: 10 Oct 2014 21:53

Re: मेरा पता कोई और है /कविता

Post by kunal » 24 Sep 2017 16:17

11
वसीम की जिंदगी के तीन दिन जैसे तीन युग हो चले थे। नंदिता को बगैर देखे, नंदिता को बगैर सुने और नंदिता के टेलीफोन के बगैर... उसकी इच्छा होती सुबह उठते-उठते वह नंदिता के घर जा पहुँचे, बेल बजाए और पाए कि वह उसके सामने है। पर चाह कर भी वह ऐसा नहीं कर पाता था। नंदिता अब स्वस्थ थी और अब्बू भी आ चुके थे। उसे गुस्सा आता, अब्बू को भी इतनी जल्दी लौट आना था... उसे गुस्सा आता था खुद पर... वह अगले ही दिन क्यों नहीं नंदिता से मिलने गया। किस ऊहापोह में फँसा रहा था वह। उसकी एक छोटी सी झिझक ने उसके सामने कई मुश्किलें पैदा कर दी थी। वह परेशान था बेतरह। आखिर करे भी तो क्या?
नसीम जब उससे कोई सवाल पूछने आया वह बेतरह झुँझला उठा था उस पर... मारने-मारने को हो आया था उसे। बेचारा नसीम भी हैरत में था, यह भाईजान को क्या हो गया। वह कितनी भी बेवकूफी करे, चाहे कितनी भी देर में समझे कोई बात, वसीम कभी उस पर झुँझलाया नहीं था आज तक, पीटने की तो बात ही दीगर है। उसे गुस्सा नहीं आ रहा था, फिक्र हो रही थी भाईजान के लिए। उसने अम्मी से कहा भी था, अम्मी भाईजान की तबीयत तो ठीक है न... क्यूँ, क्या हो गया? कुछ नहीं... बस ऐसे ही... ऐसे ही क्या... सुबह-सुबह पिटाई लगी इसलिए...? अम्मी हँसी थीं... अरे मैंने ही कहा था सख्ती बरते तेरे साथ। तेरे अब्बू घर पर रहते नहीं और वह तुझे बस लाड़ ही करता रहता है...। अरे तुझ पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। आठवीं की परीक्षा देनेवाला है और पढ़ाई में बिल्कुल भी जी नहीं लगाता। ऐसे कैसे चलेगा। तुझ पर कड़ाई तो करनी होगी न...
नसीम मूल सवाल के बीच में ही कही गुम हो जाने को देखता चुप रह गया था। आखिरकार वह था तो बच्चा ही। इससे ज्यादा चीजें न उसे समझ में आती थी और न ही इससे ज्यादा सवाल करने का हक ही उसे था। वह चुपचाप बाहर की तरफ निकल पड़ा।
नसीमा ने देखा था उस छोटे से बच्चे के चेहरे पर भाई को लेकर एक सवाल... इसी सवाल से जूझती रही थी वह पिछले कई दिनों से। उसका वसीम कहीं खो गया था। उसका वह बच्चा जो मेले-ठेले, भीड़-भाड़ में कहीं भी उसकी उँगलियाँ नहीं छोड़ता था कभी... अम्मी मैं अगर खो गया तो... अम्मी मैं आपसे अलग नहीं रह पाऊँगा, मुझे कभी खोने नहीं देना। और उसके आँसू भरे चेहरे को वह सीने से चिपका लेती... नहीं मेरे लाल... वही वसीम कहीं खो गया था और वह देख रही थी बस चुपचाप खड़ी-खड़ी। वही बच्चा जिसे सब कहते कि वह सिर्फ उसका बच्चा है। वह खोज रही थी अपने उस बच्चे को वापस। पर कोई छोर ही नहीं मिला रहा था उसे, कहीं से। ऐसे में उसने नसीम की परेशानी को भले ही हवा में उड़ा दिया था पर वह बवंडर गोल-गोल घूम रहा था उसी के इर्द-गिर्द। ऐसे में रात का वह सपना। रात का नहीं भोर का। वह खुद भी परेशान थी बेतरह। सब कुछ ठीक-ठाक होता तो चुपके से वसीम से ही बतियाती इस सपने के बाबत और बतिया लेने के बाद उसकी वह एक हँसी में भूल भी जाती शायद। पर उसकी हँसी भी कहीं गुम हो गई थी वसीम के साथ-साथ। वह देखती अब्बू के पीठ पीछे वह उनके कमरे और लाइब्रेरी में जाता है और ढेर की ढेर किताबें उठाकर ले आता है। फिर न जाने क्या पढ़ता रहता है दिन-रात। पहले तो उसने सोचा था पढ़ाई कर रहा होगा अपनी, पर नहीं उसे पता था इतिहास की किताबें उस कमरे में बहुत कम हैं। वह जानती थी वहाँ कला और साहित्य है बस। उर्दू-हिंदी शायरी और कविताएँ, कला संबँधी पुस्तकें, कुछ मनोविज्ञान और दर्शन की भी। ये वो किताबें थी जिसे झोंके में खरीद लिया था हनीफ मियाँ ने कभी। पर बाद में इन्हे छुआ तक नहीं। उन्होंने देखा था वसीम के कमरे में वो भी किताबें थी और उन्हें वहाँ देख कर हैरत तो होनी ही थी। पगला गया है क्या वसीम? उनके दिमाग में एक ही सवाल उठा था उस वक्त। परीक्षा के एक-दो दिन पहले ही किताब खोलनेवाला और उसमे ही ठीक-ठाक ढंग से पास होनेवाला वसीम अभी बेमौसम और बेमतलब की किताबों में डूबा पड़ा था, कि डूबने कि कोशिश कर रहा था। उसने सोचा, सारे काम निबटाने के बाद वह इत्मीनान से वसीम से बात करेगी आज। आखिर उसे क्या हुआ है? वह जरूर उसे सब कुछ बता देगा सच-सच। पर वह यह तय नहीं कर पा रही थी कि वसीम को अपने सपने की बाबत बताए या नहीं। उसने सोचा तब का तब देख लेंगी वह और फटाफट काम निबटाने में उलझ पड़ी थी।
वसीम फैज की शायरी में डूबा हुआ था। उसे कहीं चैन था तो बस इसी ठौर, इसी तरह। हालाँकि यह बात अलग है कि यह चैन उसे और बेचैन ही कर देता था। वह डूबा रहता किताबों में, न कोई कूल न कोई किनारा। उसे लगता जैसे सब कुछ उसी के लिए लिखा गया है... 'न आज लुत्फ कर इतना कि कल गुजर न सके / वो रात जो कि तेरे गेसुओं की रात नहीं। / ये आरजू भी बड़ी चीज है मगर हमदम / विसाल-ए-यार फकत आरजू की बात नहीं।' उसने आगे पढ़ा... 'गर बाजी इश्क की बाजी है / जो चाहे लगा दो डर कैसा? / गर जीत गए तो क्या कहना / हारे भी तो बाजी मात नहीं।' पहले की तरह डायरी में नोट करने या फिर उन्हें अंडरलाइन करने की बजाय, जो कि वह बहुत डर-डर के करता है कि अब्बू कहीं बिगड़ न पड़ें कि किताब का नाश कर दिया, उसने फटाफट एसएमएस टाइप किया था - 'एक बार मिलो नंदी। बस एक बार... मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ, केवल एक बार... तेरी नजरों को मुहब्बत की तमन्ना न सही / तेरी नजरें मेरी हमराज तो बन सकती हैं / चार दिन की तकलीफें मुरव्वत करके / एक नए दर्द का आगाज तो बन सकती हैं।' एसएमएस भेज कर वसीम एक नामालूम से इंतजार में डूब गया था यह जानते हुए भी कि उधर से कोई जवाब नहीं आनेवाला। वह एकटक मोबाइल की स्क्रीन पर देख रहा था जैसे उसके इस तरह देखने भर से ही कोई चमत्कार हो जाए शायद... घंटी बजी थी और वह लपका था जैसे कोई और न उठा ले उसका फोन, हालाँकि वह जानता था कि वह अकेले ही था उस कमरे में... उसने हिम्मत न हारते हुए दूसरा मैसेज टाइप किया था। अबकि साहिर की पंक्तियाँ थी... 'मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं / मेरे खयालों की दुनिया में मेरे पास हो तुम / ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ / मगर इतना तो बता दो कि क्यों उदास हो तुम / खफा न होना मेरी जुर्रते तखातुब पर / तुम्हें खबर हो मेरी जिंदगी की आस हो तुम' मैसेज भेजने के बाद वह वहाँ से उठ कर चलता बना था। जैसे यह कोई दूसरा टोटका हो कि उसके न होने से ही शायद जवाब आ जाए।
पर जवाब नहीं आना था और नहीं आया। वह नहाकर निकला और उसने खाना भी खा लिया था इस बीच। फिर वह चुपचाप आकर दर्शनशास्त्र की कि कोई किताब पलटने लगा था बेवजह।
हाँ, होने को इस बीच और भी कुछ नया हुआ था... एमीलिया के कई फोन आए थे उसके पास। यह उसी की दी हुई हिम्मत थी कि वह एक बार फिर नंदिता से संवाद स्थापित करना चाहता था... वरना उसके व्यवहार से तो वह हिम्मत हार ही चुका था। एमी ने ही कहा था उससे, नंदी को उससे बेहतर शायद ही कोई दूसरा जानता हो... उसने वसीम का नाम आते ही उन आँखों को चमकते देखा है, चाहे वह जितना भी इन्कार कर ले। नंदी भी पसंद करती है उसे पर उसकी जिद या कि झिझक उसे यह स्वीकार नहीं करने देते। तुम अपनी तरफ से कोशिश करते रहो। और हर दो-चार घंटे पर वह फोन कर ही डालती... क्या हुआ? कुछ नया? अब तो एमी के फोन से भी डरने लगा है वह, क्या कहे वह उससे कि हार रहा है वह धीरे-धीरे कि उसकी हिम्मत थकने लगी है अब। ...कहेगी वह - सिर्फ तीन दिनों में... तीन ही दिन तो बीते हैं इस बीच। पर उसके लिए तो ये तीन दिन नहीं जैसे तीन सदियाँ हो गईं...
...एमीलिया का फोन आने के कारण ही वह उठा था। सिग्नल कमजोर था भीतर, बात करते-करते वह बाहर तक चला आया था। अम्मी अभी तक किचेन समेटने में लगी थी... अब्बू के कमरे की खिड़की वहीं खुलती थी। उसने सुना अब्बू किसी से कह रहे थे... किस से... तैयारी पूरी कर के रखना। परसों सुबह की ट्रेन है... बस तीन-चार सूट रख लेना इतना काफी है। बाद की बाद में देखेंगे। वहाँ के कपड़े वैसे भी तुम्हें बहुत भाएँगे। खूब तेज चटकीले रंग... वसीम पर नजर पड़ते ही जैसे वे झिझक से गए थे अचानक और उन्होंने दूसरी तरफ के व्यक्ति से कहा था... मै बाद में बात करता हूँ। उसे तब तक कुछ भी नहीं लगा था। खला भी कुछ नहीं था लेकिन उसने अचानक सोचा कि अब्बू किस से बात कर रहे होंगे और दिमाग में एक नाम कौंधा - नंदिता। उसके बोल जैसे कहीं भीतर ही दुबक गए थे हठात। वह चुप हो गया था बिल्कुल। शब्द जैसे उसका साथ छोड़कर चल दिए थे कहीं...
12
हनीफ ने एक ही निगाह में देख लिया था, नंदिता बहुत कमजोर हो चली है। नंदिता जब बाथरूम से निकली हनीफ एक बारगी फिर चौंके थे। उन्होंने खुद को झिड़का... ऐसा कैसे संभव हो सकता है। उसने चेहरा धोया है अभी-अभी इसीलिए उसकी बारीक रेखाएँ भी साफ-साफ दिख रही हैं, आँखों के नीचे का स्याहपन भी। होंठों की रुखाई, कलाइयों का दुबलापन... चेहरे की कांति जैसे कहीं गुम सी हो गई है... उन्हें इस लड़की की चिंता हो आई, पहले से भी ज्यादा। लगता है बुखार का असर इस पर बहुत ज्यादा हुआ है। पर उन्होंने कहा कुछ भी नहीं। सिर्फ बैग खोला था अपना। कुछ किताबें और कुछ नोट्स उसके सामने रख दिए थे... तुम्हारे लिए।
नंदिता को इंतजार था कि सर उससे इतनी देर तक बाथरूम में रहने का कारण पूछेंगे और वह भीतर ही भीतर इसका जवाब तलाश रही थी। लेकिन सर ने कुछ नहीं पूछा था। हनीफ सर हमेशा कुछ न कुछ अप्रत्याशित सा जरूर करते हैं, उसकी सोच और धारणा के खिलाफ। इतने दिनों के बाद लौटने के बावजूद... इतना लंबा इंतजार... पर मुँह से एक शब्द भी नहीं। शिकायत करने की उनकी आदत ही नहीं है और वो तो सोच रही थी कि वे कुछ पूछें और वह फूट पड़े किसी बहाने से...। कह दे सब कुछ सच-सच और हल्की हो जाए।
उसके हाथ अब भी नहीं बढ़े थे तपाक से। सर ने ही कहा था कुछ नोट्स हैं, तुम्हारे काम आएँ शायद। और ये किताब... तुम्हीं ने कहा था न एक बार कि मैं कैसे जानता हूँ इतना सब कुछ अपने मजहब के बारे में। फिर मैंने कहा था तुमसे अपने मजहब को जानना खुद को जानना है। खुद को एक नई दृष्टि से परखना, पहचानना भी। अपने वजूद को एक नया आयाम और विस्तार देना... दर असल धर्म कभी गलत नहीं होता न ही छोटा, उसे हम अपनी कैंची-छेनी से काट-कूट कर, अपने मनोनुकूल कुछ खोज पहचान कर छोटा कर देते हैं। मैं ये किताबें इसलिए ढूँढ़ कर लेता आया कि तुम भी अपने मजहब के बारे में जान सको... तुम भी तो ऐसा ही चाहती थी न...? हालाँकि कभी सीधे-सीधे कहा नहीं था तुमने ऐसा पर मैं जान तो लेता ही हू न तुम्हारे मन की बात। हनीफ की हथेलियाँ उसकी हथेलियों पर आ थमी थी, कुछ तलाशती-ढूँढ़ती सी। पर उसे लगा यह स्पर्श बहुत नया था, अनपहचाना सा... वह सोचना चाहता था, ऐसा क्यों सोच रहा है वह, कि नंदिता ने उसकी सोच को पुख्तगी देते हुए अपनी हथेलियाँ उसकी हथेलियों के नीचे से सरका ली थी। वह हतप्रभ था, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। बल्कि जब भी कभी पढ़ाता होता वह, नंदिता हौले से अपनी हथेलियाँ उसकी हथेलियों पर डाल देती, भारहीन-दवाबहीन... और एक बारगी रुक जाता पढ़ने-पढ़ाने का क्रम... वे डूबे रहते एक दूसरे की आँखों में... वजूद में। पल छिन कब-कैसे गुजर जाते वह जान भी नहीं पाता। चेत तो कभी-कभी तब आता था जब कुछ न कुछ घटता अप्रत्याशित। कभी किचेन में दूध का उफन कर गिरना... कभी डोरबेल का बजना या कि घड़ी की घंटियाँ बज उठती टन...टन... समय के बीतने और इस कदर बीतने का संकेत देती हुई... पर नंदिता ने अपनी हथेलियाँ खींच ली थी आज... वह सोचता रहा था क्यों...। पर जवाब नहीं था कोई उसके पास। उसने गौर से नंदिता को देखा था, वह आज भी वैसी ही थी जैसी हमेशा होती है...। पर उसे लगा कुछ तो था उसके व्यक्तित्व में अलग सा जो पहले नहीं था। कुछ मजबूत - कड़ा सा जो नंदिता के भोलेपन और असमंजस के भाव को दबा रहा था, कुछ दृढ़, मजबूत और निर्णयात्मक। वे चौंक उठे थे। क्यों... वे यही तो चाहते थे हमेशा, नंदी ऐसी हो... पर आज जब नंदी वैसी दिख रही थी तो उनको यह झटका सा क्यूँ लगा था।
वे देख रहे थे इसी प्रकाश में सब कुछ। नंदी आते ही लपक कर उनके सीने से नहीं लगी थी... उसने आज उनके लिए पानी का गिलास भी नहीं रखा था...। बीते दिनों की सारी बातें नहीं सुनाई थी एक-एक कर के... और अब यूँ हथेलियों का खींच लेना।
वे चाहते थे दिल ही दिल में नंदी ऐसी हो जाए... वह मजबूत हो और इतनी हो कि चुपचाप दूर चली जाए उनसे। वे चाहते थे ऐसा हो, वे मनाते रहते थे ऐसा हो, खासकर के तब जब वे नसीमा के साथ होते थे... कि उन्हें कुछ नहीं करना पड़े... कि कोई इल्जाम उनके सिर पर नहीं आ सके।
उन्हें याद आया वसीम भी बहुत बदला-बदला लगा था उन्हें। कल वह उनकी स्टडी में था और उनकी किताबें पलट रहा था। उन्हें हैरत हुई थी, वसीम और कविता-शायरी की किताबें। वे हँस पड़े थे। तुम और ये किताबें... क्या करोगे तुम इनका... पढ़ूँगा। उसका स्वर दृढ़ और गंभीर था, हमेशा की तरह। वे फिर मुस्कुराए थे, अच्छी बात है। मैं तो पहले भी कहता था पोयट्री हमें इनसान बनाए रखती है, हमारे भीतर के भोलेपन और मासूमियत की परत को बचाए रखती है। वह फिर भी गंभीर था, हूँ...। और किताबों के उस जखीरे को लेकर अपने कमरे की तरफ चला गया था। उम्र है उसकी भावुक होने की, शायरी पढ़ने की, पर उस वक्त की तरह अब वे हँस नहीं पा रहे थे इन बातों पर...। क्या इस सब का तार कहीं नंदिता से जुड़ता है? क्या नंदिता तक उसे भेज कर उन्होंने कोई गलती कर दी? वे एक बारगी सिहर से उठे थे यह सोच कर ही। अगर गलती की भी तो... अब हैरत में नहीं पड़ेंगे वे। अगर नंदी और वसीम उनके भरोसे के योग्य नहीं हैं तो गलती उनकी होगी उनकी नहीं। पर यह सोच भी उन्हें सब्र नहीं दे पा रही थी। उन्होंने सोचा था यूँ ही कयास लगा रहे हैं वह... दिमागी घोड़े से इतनी कसरत कराने की जरूरत नहीं।
उन्होंने नंदिता से पूछा था, एक सेमिनार के सिलसिले में जयपुर और आगरा जा रहा हूँ, तुम भी चलोगी मेरे साथ? नंदिता अप्रत्याशित रूप से चुप रही थी कितने पलों तक। फिर कहा था सोच कर बताऊँगी... जल्दी तो नहीं है? उन्होने सोचा था नंदी किलक पड़ेगी, हुलस कर पूछेगी, कब... किस दिन...? और सामानों की फेहरिस्त तय करने लगेगी। पर ऐसा नहीं हुआ। पहले जैसा कुछ भी तो नहीं हो रहा था सुबह से... पर वे थे कि अपनी जिद पर अड़े थे। नंदी से कहा था। थीसिस निकालो, अनुक्रमणिका बताओ पढ़कर। नंदी ने पढ़ा था - लक्ष्मीबाई, कस्तूरबा गांधी, अरुणा आसफ अली, कुर्जाबाई देशमुख, कैप्टन लक्ष्मी, सरोजनी नायडू, रुक्मिणी लक्ष्मीपति...
हनीफ सर ने नंदिता को इशारे से रुकने को कहा था...। फिर थोड़ा रुक कर कहा था... बस सात चैप्टर... और अभी कितने लिखने हैं... कम से कम पाँच और। नंदी ने धीमे से कहा था। तुम्हें लगता है तुम पूरा कर लोगी इसे... नंदी चुप थी। इसीलिए तुम्हें कहा था विषय नहीं बदलो। कला में तुम्हारी अभिरुचि है, उसी में आगे की पढ़ाई करो। पर तुम्हें तो... तुम और तुम्हारी एमी। जाओ उसी से कहो कि मदद करे तुम्हारी। उन्हें उस वक्त नंदिता के साथ-साथ एमीलिया पर भी गुस्सा आया था... या कि ऐसा वे दिखाना चाह रहे थे सिर्फ।
उन्होंने कहा था नोटबुक खोलो... पर नंदी बैठी थी चुपचाप, जड़वत। उन्हें एक बार फिर सब कुछ अजनबीयत से भरा लगा। वे पहले ऐसे झिड़कते तो नंदी खिलखिला देती, दुलार से लदी चली आती उनके कंधे पर और उनका गुस्सा पल भर में काफूर हो जाता...। बल्कि कभी-कभी सोचते थे वे कि क्या वे इसीलिए गुस्से का अभिनय करते हैं कि नंदी उनके करीब आए, हँसे... खिलखिल...
अबकि वे ही गए थे उसके पास, हल्के से उसे कंधे से हिलाया था, नंदी... नंदी... क्या सोच रही हो... चुप क्यों हो गई आखिर...। तुम्हारे लिए ही तो कहता हूँ न... पीएचडी पूरी हो गई तो अपने पैरों पर खड़ी हो पाओगी तुम... और तुम हो कि...। बिल्कुल भी ध्यान नहीं देती...
नंदी ने चुपचाप नोटबुक खोल लिया था... वे बोल रहे थे... भीकाजी कामा, जीवनकाल 1861-1936, मुंबई। इस पारसी महिला ने भारत की स्वतंत्रता के लिए बहुत काम किया है। शुरुआती शिक्षा मुंबई के पारसी लड़कियों के लिए अलग बने पाठशाला में। फिर लंदन गईं और लंदन को ही अपना कर्मक्षेत्र बनाते हुए वहाँ रहनेवाले क्रांतिकारी युवकों की मदद की। वे हिंसा की पक्षधर नहीं थीं पर उनका यह विश्वास था कि यदि हम भीषण संग्राम नहीं करें तो अंग्रेजों की मजबूत पकड़ से हमारा छूटना मुश्किल है। क्रिसमस के तोहफे के रूप में उन्होंने भारतीय युवकों के लिए जो उपहार भेजतीं वह ऊपर से तो एक खिलौना होता था पर भीतर से पिस्तौल।
स्त्रियों को समान अधिकार मिले इस बात पर मैडम कामा का जोर बहुत ज्यादा था। वे कहती थीं 'पालना झुलानेवाले हाथों को बेकार या कमजोर मत समझो। इन्हीं हाथों ने तुम्हें शूर-वीर बनाया है। देश की स्वतंत्रता के लिए इन हाथों के योगदान को कम मत आँको... इनकी मृत्यु 13 अगस्त 1936 को अपनी जन्मभूमि मुंबई में हुई।
हनीफ सर कह रहे थे, जरूरी बातें मैने इनके संदर्भ में बता दी है, उम्मीद है तुम अब इसे विस्तार दे ही दोगी। दूसरी महिला हैं - वै.मु. कोदैनायकी... नंदिता ने इशारे से थोड़ी देर रुकने को कहा था। वह अपने विचारों से उलझ रही थी। कहीं इस बीच कुछ छूट चला तो... हनीफ सर कितना कुछ करते है उसके लिए। कहाँ-कहाँ से ढूँढ़-ढूँढ़ कर नोट्स लाना, किताबें लाना। उसे पढ़ाना और वह... फिर अचानक शर्मिंदगी का यह स्वरूप बदल गया था। हालाँकि शर्मिंदा अभी भी वह खुद से ही थी... लेकिन उसका मन हुआ था वह कुछ भी न लिखे, हनीफ सर का बताया-समझाया तो कुछ भी नहीं। वह इतनी कमजोर, दीन-हीन सी क्यों है? क्यों नहीं होता उससे खुद ही कुछ भी। थीसिस उसे लिखनी है, ढूँढ़े, मेहनत करे... आखिर हनीफ सर क्यों करें उसकी मदद... वह सोच रही थी और सोच-सोच कर और भी ज्यादा शर्मिंदगी में डूबी जा रही थी... इतने-इतने साल पहले की ये औरतें आजादी के संघर्ष में खुलकर सामने आई। मर्दों के कंधा से कंधा मिला कर लड़ीं... और वह, आज के जमाने की एक लड़की... उसे सब कुछ रेडीमेड चाहिए। धूप, धूल हवा सब से बचाए रखेगी अपने आप को और तुर्रा यह कि थीसिस भी पूरी करनी है। कोई दे दे थाली में उसे सब कुछ परोसकर...। उसने देखा वे सारी औरतें हँस रही थी उस पर... फिर उसे लगा वे उस पर नहीं खुद पर हँस रही हैं कि इन्हीं की खातिर... इन्हीं की आजादी के लिए... समानता के इसी अधिकार के लिए...
वह शर्मिंदा थी खुद पर और उसने इस शर्मिंदगी को कम करने के लिए खुद से कहा और सच्ची-मुच्ची दिल से कहा, अब इसके बाद किसी की भी हेल्प नहीं हनीफ सर, वसीम यहाँ तक कि एमी से भी नहीं...। सच्ची-मुच्ची... उसने मन ही मन अपना कान पकड़ा था...
पता नहीं क्या होता जा रहा है उसे... अल्ल-बल्ल सोचती रहती है हर वक्त... और इस सोचते रहने का परिणाम देख ही चुकी है वह... फिर उसने मन बदलने के लिए सोचना चाहा था... यह मैडम भीकाजी कामा रही कैसी होंगी... कुछ देर सोचती रही थी वह पर कोई नक्श ठीक-ठीक नहीं उभर के आया था उसके आगे। उसने कभी फ्रॉक पहने एक सुंदर सी महिला की कल्पना की, कभी साड़ी में लिपटा एक शालीन सा चेहरा। पर नक्श फिर भी उभर कर नहीं आ रहे थे ठीक-ठीक। अचानक उसे खुशी हुई चेहरा अब साफ हो चुका था। पर फिर वह जोर से हँस पड़ी थी... कल्पना में आया वह चेहरा एमीलिया का था। धत तेरे की, उसने सोचा... उसने अपनी दुनिया कितनी सीमित कर रखी है। गिने-चुने लोग... गिनी-चुनी जगहें, गिने-चुने पल। यह सच है कि एमी अपने तई क्रांतिकारी है, अपने आप में अलग सी... पर उसके सिवा कोई और भी... उसने अपने दिमाग की स्लेट से भीकाजी कामा का चेहरा मिटाया, इस तरह एमी का भी... उसने नोट्स लेने के लिए खुद को तैयार किया और उसे हतप्रभ देखते हनीफ सर से कहा, वह भी इशारे में ही 'सर, अब ठीक... आप बोलें'...
व.मु. कौदेनायकी गांधी जी के अहिंसा की पक्षधर थीं। वे मूल रूप में लेखिका थीं। उस जमाने में जब किसी महिला का लिखना तुच्छ या कि बुरी बात समझा जाता था उन्होंने सोलह उपन्यास लिखे। इसके अलावे बच्चों के लिए पत्रिका भी निकाली। पूरे 26 वर्ष तक 'जगतमोहिनी' नाम की इस पत्रिका को निकालकर उन्होंने यह साबित किया कि महिलाएँ भी अच्छी संपादक हो सकती हैं।
जिस हिम्मत से वे अपने लेखन के अधिकार के लिए लड़ी थी उसी हिम्मत से उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया। गांधीजी की प्रार्थना सभा में वे भक्ति गीत गाती थीं और आजादी के भी। उनकी लेखनी की तरह उनकी वाणी में ओज और मिठास का समन्वय था।
Image

Post Reply