प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

Jemsbond
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Re: प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

Post by Jemsbond » 28 Aug 2017 09:50


आधी रोटी


नेकनामी और पोशीदगी पर धब्बे का खतरा जहां आता दिखाई पड़ता है, वहां प्रेमी के प्रति
उनकी सारी वासनाएं तिरोहित हो जाती हैं। अपनी छबि बेदाग साबित करने तब सारा ठीकरा
वे अपने प्रेमी या प्रिय पुरुष के सर पर फोड़ना चाहती हैं।




वनमाला का संदेहास्पद व्यवहार और सब के बीच चुहल या अनियंत्रित आक्रोश में की गई व्यक्तिगत टिप्पणियों से प्रियहरि नाराज था। बल्कि उसने नाराजगी कम, क्षोभ ज्यादा था। वह देखता कि वनमाला खुद भी गुस्से मे की गई वैसी नादानियों पर बाद में पछताती थी। मौन की जमी हुई बर्फ को पहले कौन तोड़े यह सोचते वह और वनमाला एक-दो दिन अपने मौन में ही यह कहते आमने-सामने बैठे होते कि इतना भी गुमान क्या ? क्या तुम ही मौन नहीं तोड़ सकते ? आखिर एकांत के वैसे क्षणों में मुंह फुलाए सोच में डूबी बेरुख वनमाला के सामने आहें भरता प्रियहरि ही उस बर्फ को पिघलाता जो दीवार बनी तब तक उन दोनों के बीच अड़ी हुई होती। वह कहने से न चूकता कि वनमाला इतनी क्रूर क्यों है ? टिफिन का जिक्र कर प्रियहरि ताने देता कि उसे तो वनमाला से आधी रोटी की तलब थी, लेकिन वह इतनी कंजूस थी कि उसकी इतनी इच्छा भी वह पूरी न कर सकी।
एक दिन अपना टिफिन खोल कर बैठी वनमाला ने प्रियहरि के सामने ही सत्यजित से औपचारिक आग्रह किया - ''आप भी लीजिए।''
सौजन्य से सत्यजित ने प्रियहरि से आग्रह किया था - ''आइए न आप भी।''
प्रियहरि ने खीझ भरी उदासी से आच्छादित वनमाला के चेहरे को देखा और सत्यजित से कहा - ''आग्रह आप से किया गया है। मुझ से तो नहीं पूछा गया इसलिए नहीं लूंगा।''
प्रियहरि के वैसे जवाब पर वनमाला उस दिन बुझे-बुझे चेहरे और अपनी उदास आंखों से उसे देखती सिर झुकाए रह गई थी। वनमाला को प्रियहरि की वह बात याद रही आई होगी। एक दिन जब वे दोनों ही अकेले थे, वनमाला ने अपना टिफिन खोला और प्रियहरि को भी आग्रहपूर्वक अपने साथ शामिल होने कहा। प्रियहरि ने भिण्डी की सूखी सब्जी के साथ ठीक आधी रोटी ली थी। वह तो बात की बात थी। प्रियहरि के लिए वनमाला की रोटी का मतलब केवल वह साथ और मनुहार था जो वह वनमाला से चाहता था। अन्यथा तो वह शाकाहारी जीव इस आशंका से ही उसका खना छूने से परहेज करता था कि मांसाहार वालों के टिफिन का क्या भरोसा था ? न जाने कब क्या उसमें रहा आता होगा ? वनमाला के साथ टिफिन बांटने उस दिन भी वह लालायित न था। बावजूद इसके उसे वनमाला की आत्मीयता उस दिन अच्छी लगी।


आधी रोटी वाली घटना के ठीक बाद का दिन था न जाने क्यों वनमाला का मूड उखड़ा हुआ, चेहरा पशोपेश भरा उदास और खीझा हुआ था। प्रियहरि कभी न जान सका कि क्यों ऐसा होता था ? क्या फिर घर या बाहर से कोई छेड़-छाड़ हुई थी या किसी भद्‌दे मजाक से वह गुजरी थी ? या फिर उन नलिनजी के साथ परीक्षा में जोड़ दिये जाने का अफसोस उसे था, जिनसे उसे अपार चिढ़ और नफरत हुआ करती थी ? नलिनजी उस दिन नहीं थे। उनकी जगह प्रियहरि ही काम चलाघ् अफसर की तरह काम पर था। स्टॉफ रूम में भीड़-भाड़ थी। सारा स्टॉफ परीक्षाओं के कागज बनाने में लगा था और लड़कों की भारी भीड़ कालेज में दो-चार दिन बाद शुरू हो रही परीक्षाओं के प्रवेश पत्र लेने मौजूद थी। आफिस के मिश्रा बाबू को वनमाला ने अपना काम करने बिठा लिया था। प्रियहरि ने इसी बीच मिश्रा से कहा था कि वह जाए और प्रवेश पत्र का काम देखे क्योंकि लड़के समस्या पैदा कर रहे थे। वनमाला को प्रियहरि की बात पर आपत्ति थी। उसे सुबह के समय की परीक्षाओं में नलिनजी के साथ काम करना था। उसी की तैयारी में वह लगी थी। मिश्रा के उठकर जाते ही वनमाला को मनाते हुए प्रियहरि ने वे कागज काम करने के लिए खुद उठा लिये थे जो मिश्रा के पास थे। बमुश्किल दस मिनट का काम था। प्रियहरि ने काम पूरा कर वनमाला के सामने कागज रख दिये। वनमाला जानबूझकर प्रियहरि से उलझ गई। बिना इस बात का खयाल किये कि उस रोज प्रियहरि ही नलिनजी की जगह बकायदा उसका अफसर था वनमाला ने सारे कागज उठाकर उसकी ओर फेंक दिए। वह उससे यूं पेश आई जैसे किसी कीड़े-मकोड़े से पेश आ रही हो। गुस्से में गरजती वह चिल्लाई -
''नहीं चाहिए मुझे आपके ये पेपर। मैंने काम करने आपसे नहीं, क्लर्क मिश्रा से कहा था। आप उसे काम करने दीजिए। जो मेरा मातहत है वही मुझे सौंपेगा।'' वह विक्षिप्तों की तरह चिल्ला रही थी - ''मैने उसे बड़ी मुश्किल से बुलाया था, आपने उसे क्यों भेज दिया?''
वनमाला के मन में कारण अवश्य कोई और दबा था जिसका यह विस्फोट था। सारे स्टॉफ के सामने अपमानित प्रियहरि उस दिन दयनीयता और क्षोभ से गड़ गया। सब के सब वनमाला के व्यवहार पर अचंभित थे। होना तो यह था कि प्रियहरि वनमाला पर बरसता और उसे डांटता लेकिन उसके कायर मन ने अफसोस जाहिर करते हुए उल्टे वनमाला से माफी मांगी और उसके काम के लिए तैयार कागज फाड़ कर वहीं फेंक दिये। जाहिर है कि वनमाला के मन को पढ़ने में प्रियहरि असमर्थ था। वनमाला का मन उतना सरल नहीं था, जितना प्रियहरि की भावुकता उसे समझती थी। प्रियहरि की दीवानगी उसे दयनीय बना रही थी और वनमाला थी कि अहंकार से भरी जा रही थी।

औरतें अंदर से चाहे जैसी हो, उनमें स्वच्छंदता और मस्ती की चाहे जितनी लहरें हिलोरे लेती हों, वे अपने को कभी समाज में प्रकट नहीं होता देखना चाहतीं। छुई-मुई और जांघों के बीच छिपे हृदय को परम पवित्र दर्शाने वाली आम स्त्रियां इस मामले में कुछ ज्यादा ही सतर्क होती हैं। नेक-नामी और पोशीदगी पर धब्बे का खतरा जहां आता दिखाई पड़ता है, वहां प्रेमी के प्रति उनकी सारी वासनाएं तिरोहित हो जाती हैं। अपनी छबि बेदाग साबित करने तब सारा ठीकरा वे अपने प्रेमी या प्रिय पुरुष के सर पर फोड़ना चाहती हैं। तब उससे वे इस तरह किनारा काटती हैं जैसे उनसे कभी कोई मतलब उन्हें न रहा हो। अखबारों में यह पढ़ना कि घर से भागी हुई कोई लड़की या अमुख औरत इतने-इतने दिनों बाद अपने प्रेमी के साथ पकड़ी गई और फिर यह बयान कि उसमें औरत का कोई कुसूर न था, वह तो प्रेमी ही था जो उसे बहका ले गया और यौवन शोषण करता रहा जैसे समाचार ऐसी ही तस्वीर पेश करते हैं। आदमी कटघरे में खड़ा होता है और कथित रूप से मजबूर औरत जो दिनो-महीनों-जमानों से आदमी के साथ पूरी औरत होकर देह संबंधों के आनंद में शरीक थी, महज भोली-भाली और बेकसूर बनी आती है। लोग इसे जानते हैं और ईर्ष्या, स्पृहा, जुगुप्सा से तब दोहरे वेग से ऐसी ललनाएं हवा में उन पराग कणों को बिखराती हैं जो देहगंध में छिपाए न छिपतीं अब तक अनजान भौरों को उनकी ओर लुभाती है। वनमाला इसका अपवाद न थी। अब वह प्रचार से बचती अपने गर्व भरे सतीत्व के खजाने में छुईमुई की तरह सिमट अपनी ऐसी छवि पेश करने आतुर थी, जिससे वह औरों की निगाहों में ताजा-तरीन बनकर चढ़ सके। प्रियहरि था कि अपनी लाचार निष्ठा और विश्वास के साथ वनमाला की मजबूरी को मजबूरी की तरह देखता हालात के सुधरने की ना-उम्मीद उम्मीदों में कैद था।
पिछले कुछ अनुभवों ने प्रियहरि को अन्यमनस्क बना दिया था। उसका मन यह कहता था कि वनमाला से उसे दूर ही रहना चाहिए। ऐसी औरत से संबंध रखने का क्या मतलब था जिसे संबंधों की कद्र न हो, जो प्यार को महसूस न करती हो और उसी की जड़ खोदे जो उसकी शुभचिन्ताओं में डूबा रहता है। वनमाला और प्रियहरि में यह बहुत बड़ा फर्क था कि जहां वनमाला न जाने क्यों - चिढ़ से, नफरत से या अपनी तसल्ली दूसरों पर यह जाहिर करनेके लिये कि चाहे सारे लोग उसे कुछ न समझें, जिसकी सबसे ज्यादा कद्र है वही प्रियहरि उसे मानता है उससे प्यार करता है - वह खुद आपस की प्यार-मोहब्बत की बातों को, भावना भरी आत्मीयता के क्षणों को उजागर कर देती थी। यह उजागर करना बिगड़े मूड के क्षणों में तो सारी हदें पार करता लांछन के इशारों तक पहुंच जाता था। दूसरी तरफ प्रियहरि था कि वनमाला की इन हरकतों के बावजूद उससे सहानुभूति रखता था और भयंकर अपमान और पीड़ा के क्षणों में भी मौन का सहारा ले अवसाद के अंधेरों में डूब जाता था। प्रियहरि और वनमाला दोनों को एक-दूसरे का स्वभाव मालूम था। यह विचित्र था कि वनमाला प्रियहरि पर अपना अधिकार समझती थी और प्रियहरि से उसके बगैर रहा न जाता था, तब भी दोनो के बीच के संबंध ही असहज थे। जिसे वह अपना समझता था वही उससे शत्रुता रखती थी।



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निःशब्द पर्स से खंगाल एक टॉफी वनमाला की हथेली पर उजागर होती प्रियहरि के सामने यह कहती हुई पसर गई कि - ''लो, इसे मुंह में डालो। यहां मुंह बंद रखना पड़ता है।''



नीलांजना का सहज साथ तो प्रियहरि को हमेशा ही उपलब्ध रहा है। मंजरी, वल्लरी, सुरंजना, मंजूषा, विराग और नंदिता वगैरह भी उसके अच्छे साथी और शुभचिन्तक थे । अंगनाओं से संबंधों में भावुक आकर्षण और पारस्परिक प्रशंसा तथा विश्वास का आलम हुआ करता और पुरुषों से संबंधों में ज्ञान और तर्क का माहौल बना रहता था। अब इन्हीं सब के बीच प्रियहरि का समय कटता था।
दुर्व्यवहार और अपमान की पिछली घटना के बाद प्रियहरि ने एक किस्म की बेरुखी वनमाला के प्रति ओढ़ ली थी। इस तरह के अलगाव वनमाला पर क्या असर होता था इसे कहा नही जा सकता। कभी-कभी आंखों से प्रश्नित उसकी शिकायत प्रियहरि की आंखों से टकराती लेकिन जहां सद्‌भावना और संबंधों की कोशिशें बिच्छू की तरह डंक मारतीं वहां प्रियहरि को कोई भविष्य नजर ही न आता था। प्रियहरि और करता भी क्या ? तब से दो-चार दिन बाद की बात है। प्रियहरि ने देखा वनमाला उसके ठीक सामने कुछ दूर बैठी काम कर रही है। प्रियहरि की उससे बोलचाल बंद थी। उसके पास भी ढेर सारे कागज थे।
प्रियहरि को काम के लिए साथी की जरूरत नहीं थी लेकिन प्रकट में वनमाला को वह ऐसा महसूस कराना चाहता था। वल्लरी से प्रियहरि के अच्छे संबंध थे। यह कोई जुलाई की बात होगी। वल्लरी मुस्कुराती वनमाला और प्रियहरि के बीच छाए मौन और खीझ को पढ़ रही थी। प्रियहरि ने बड़े प्यार और अधिकार से वल्लरी को आवाज दी -'अगर व्यस्त न हो तो मेरे पास आना, कुछ काम करा देना।'
वल्लरी प्रसन्न थी। अंदर-अंदर बगैर मेरे कुछ अतिरिक्त कहे ही आँखों ही आँखों में मेरा मकसद पढ़ लिया था। यानी यह कि वनमाला को उस वक्त चिढाने में उसकी रजामंदी शामिल थी।
''हां हां, क्यों नहीं ? बताइए जो भी काम हो, मैं साथ बैठकर कर दूंगी'' - कहती वल्लरी तुरंत प्रियहरि के पास आ बैठी। खुशी से उसका चेहरा चमक रहा था। आवाज में मुलामियत भरी प्यार की मिठास थी। इस मेल ने माकूल असर पैदा किया।
वनमाला की आंखें अचानक उठीं। उसकी आंखों में खीझ और गुस्सा था। उनमें लिखा था - ''अच्छा, तो ये बात है ? मैं नहीं, तो दूसरी सहीं ?''
प्रियहरि ने भी वनमाला को उसकी घूरती निगाहों से निगाहें मिलाते मानों यह जवाब दे दिया - ''तुम हीं नहीं, मेरे चाहने वाले और भी हैं।''
अपनी चिढ़ दिखाती, अपनी अकड़ लिए वनमाला ने कागज समेटा और तेजी से विरोध दर्शाती बाहर निकल गई। प्रियहरि ने वनमाला को जलाने के लिए जानबूझकर वैसा किया था। प्रियहरि और वल्लरी एक-दूसरे की आंखों में झांकते मुस्कुरा रहे थे।
जिस दिन की यह बात है स्टॉफ-रूम में अनुराधा, वनमाला और प्रियहरि - तीन बैठे थे। आंखों में उदासी, शिकायत, खीझ और अपने अकेलेपन के बावजूद चेहरे का अकड़ से फूला रहना वनमाला की स्थायी मुद्रा थी। घर में सुबह नाश्ता करना या खाना प्रियहरि की जीवनी में कभी शरीक नहीं रहा। उसने सेव के फल निकाले। आलमारी से चाकू निकाल उन्हें तराशा , काटा और कुछ टुकड़े अखबार पर रखकर अनुराधा की तरफ बढ़ा दिये। वनमाला से उसे उलझना न था लेकिन सौजन्य का संकोच भी था। प्रियहरि ने अनुराधा से कहा -
''अनुराधा, मैडम (वनमाला) को भी ये दे दीजिए।'' अनुराधा ने सेव के टुकड़ों से भरी हथेली वनमाला की ओर बढ़ाई। अपने स्वभाव के अनुरूप विनम्रता से उसने कहा - ''वनमाला-दी, आप भी लीजिए।''
वनमाला ने कनखियों से प्रियहरि पर नजर डाली और फिर सिर झुकाए ही एक नजर अनुराधा पर डाल धीरे से कह दिया - ''नहीं, मैं नहीं लूंगी। अभी मेरी इच्छा नहीं है।''
प्रियहरि उठा। टेबिल का चक्कर काट दूसरी तरफ से गुजकर वनमाला के सामने पहुंचा। बिना कुछ बोले सेव के टुकड़े अपने हाथों उसने वनमाला के सामने रख दिये। वनमाला ने इस बार फिर अनुराधा की ओर देखा। अब उसकी आंखों में चमक और होठों पर तिरछी मुस्कान थी। इधर अनुराधा के चेहरे पर इस बार आश्चर्य और खीझ भरे थे। वह वनमाला को देख रही थी। जैसे इससे पहले कुछ न हुआ हो, वनमाला बड़ी संजीदगी से एक टुकड़ा उठाए मुंह में बड़ी अदा से हौले-हौले चबाने लगी थी। ऐसे क्षणों में वह निहायत मासूम और भोली लगती थी। प्रियहरि उसे देखता और उसका मन सोचता रह जाता कि वनमाला आखिर क्या है ? उसके मन में भला क्या होगा ? वह तो अपना मन तार-तारकर वनमाला के सामने रख देता था लेकिन वह ? वह क्या चाहती थी ? कौन सी उलझन थी जो उसे खुलने न देकर बंद और रहस्यमय बना देती थी ? प्रियहरि के लिए वनमाला का ऐसा व्यवहार एक पहेली ही रहा आया।
सरकार के एक आदेश से सभी काम करने वालों के शैक्षिक योग्यता के प्रमाण-पत्र मंगाकर जांचे जा रहे थे। नीलांजना और वनमाला को काम दिया गया था कि मूल प्रतियों से फोटो कापियों का मिलान कर उसे दर्ज करें। भोलाबाबू का मामला रहस्यमय था। उसके कागज या तो - 'कोई और न जाने, न देखे की तरह' शामिल होते थे या फिर वे आते ही न थे। वह प्राचार्य का हमेशा मुंह लगा था इसलिए संरक्षित था। उस पर कोई दबाव डालने की हैसियत में न था। आफिस में अपने दस्तावेज नीलांजना-वनमाला को सौंपते प्रियहरि ने पूछा था कि क्या भोलाबाबू के दस्तावेज आ गए ?
नीलांजना बोली – “ना, वे तो यूं ही कापियों की झलक दिखाए बगैर कह गए कि सब ठीक है। उन्हें भला कौन कहेगा? वे तो प्रिंसिपल के खास हैं।“
प्रियहरि की आँखों से नीलांजना की मासूम झुकी नज़रें उठ मिली थीं लेकिन उसकी तल्ख़ प्रतिक्रिया का रुख वनमाला की तरफ था - ''हां भई, वे तो खास हैं। उनसे कोई क्या कहेगा ? एक मैं ही हूं जिससे सारी बहसें की जा सकती हैं।''
उसके ऐसा कहने के पीछे प्रसंग यह था कि पिछले दिन जब प्रियहरि ने मूल प्रतियों के बगैर दस्तावेज सौपे थे तो नीलांजना ने कह दिया था कि प्राचार्य के आदेश है कि मूल प्रतियां लानी है इसलिए उन्हें ले आइए।
प्रियहरि के अंदर कुछ था जो खीझ और उदासी से भरा था। वनमाला का चेहरा, जो उस दिन भी सदैव की तरह अनमनस्क, द्विधाग्रस्त, उदास था, और जिसमें होठों के बीच टॉफी का एक टुकड़ा पिघल रहा था, प्रियहरि की तरफ अचानक उठा। सूनी आंखों से उसने प्रियहरि के चेहरे में झांका। निःशब्द पर्स से खंगाल एक टॉफी वनमाला की हथेली पर उजागर होती प्रियहरि के सामने यह कहती हुई पसर गई कि - ''लो, इसे मुंह में डालो। यहां मुंह बंद रखना पड़ता है।''
ऐसा ही वह एक क्षण था जब कभी वनमाला से बेरुख प्रियहरि अपने उदास मन को बहलाता नीलांजना को बगल में बिठाए यू.जी.सी. का काम देख रहा था। वनमाला उपस्थित थी लेकिन नीलांजना और प्रियहरि के बीच आत्मीयता का ऐसा सहज, शांत राग छिड़ा था कि एक-दूसरे में डूबे उन्हें वनमाला की परवाह ही न थी। वही क्षण था जब कुछ देर उदास अकेली बैठी वनमाला की बेसब्र आवाज ने खलल डाली थी। प्रियहरि और नीलांजना के ठीक सामने पहुंच वह बड़े भोलेपन से निहारती पूछ रही थी - ''माफ कीजिएगा, मे आई डिस्टर्व यू प्रियहरि सर ?''
वनमाला की आंखों के उस मौन से, उसकी ऐसी अदा से प्रियहरि धराशायी हो जाता था। वनमाला रानी की अदा ही निराली थी। उसकी बातें उसके मौन में ही छिपी होती थीं और प्रियहरि से उसका प्यार वैसी सांकेतिक सवालिया वाणी में व्यक्त होता था। वनमाला से यूं टकराते प्रियहरि की सारी धारणाएं, सारे पूर्वाग्रह, सारी आशंकाएं, सारे भय, सारा गुस्सा - सब के सब ध्वस्त हो जाते थे। प्रियहरि ने वनमाला का वह काम कर दिया था, जो वर्षों से फाइलों में रखा था। सारे स्टॉफ ने उसका विरोध किया था कि वनमाला के पुराने मामले का निर्धारण के इस हालिया मामले से क्या संबंध है? आखिर क्यों अचानक प्रियहरि को वनमाला के पुराने मामले में दिलचस्पी हो आई है? सब नाराज हो उठे थे। सब की आशंका थी, आरोप था कि इस चक्कर में मामला उलझ जायेगा और दूसरे भी परेशान होंगे। समिति से प्रियहरि के इस मुआमले में इस कदर मतभेद थे कि तू-तू मैं-मैं की नौबत आ पहुंची थी। वनमाला के पक्ष में जिद्‌द पर अड़े प्रियहरि ने भी चुनौती देते हुए सार्वजनिक घोषणा कर दी थी कि लोग इसे चाहे जो समझें, यदि काम होगा तो वनमाला के पुराने मामले को हल करने के साथ ही होगा, अन्यथा किसी का भी वेतन नहीं निर्धारित होगा चाहे मामला महीनों पड़ा रहे। नौबत गाली-गलौच और गुस्से के प्रदर्शन तक पहुंच गई थी।
यह बाद की बात है कि किसी रोज कुटिलाक्ष ने प्रियहरि के रवैये पर ताने देते हुए उसे कहा था - '' प्रियहरि, आप भी अजीब बेवकूफ है। आप उसी औरत का पक्ष ले रहे हैं, जो पीठ पीछे आपकी बुराई करती, आपके लिए न जाने कितनी गंदी बातें कहती फिरती है। आप सा आदमी मैंने नहीं देखा।'' वह कहता जा रहा था - ''ऐसी-ऐसी गंदी बातें, जो मैं बताऊँ और आप सुन लें तो गश खाकर गिर पड़ेगें''?
कुटिलाक्ष की बातें जरूर सच रही होंगी। यह अजीब बात थी कि सब कुछ सुन और जानकर भी वनमाला ने प्रियहरि से बात करने की जरूरत तो समझी नहीं, बल्कि औरों के तानों से घबराकर न जाने क्या-क्या प्रियहरि के खिलाफ सब से बोल गई थी।
बहुत बाद में प्रियहरि ने वनमाला से उसके इस रवैये के प्रसंग में अपनी व्यथा कही थी तो उसे जवाब मिला था - ''आप बेकार इन लोगों से मेरे लिए क्यों लड़ पड़े थे ? यहां का माहौल क्या है, कैसी बातें लोग करते है, ताने देते है - यह आपको नहीं मालूम क्या ?'' वनमाला कहती चली गई थी - ''मैं करती भी क्या ? मुझे सारे लोग दोष दे रहे थे कि ये उनकी खास हैं न ! इन्हीं के कारण यह सब हो रहा है। ये किसी का भला न होने देंगी। न जाने क्या-क्या मुझे सुनना पड़ा था ? इसीलिए तंग आकर मुझे मजबूरन कहना पड़ा था कि मेरा आप से कोई संबंध नहीं है और मैने आप से अपने लिए वैसा करने कुछ नहीं कहा था।''
वनमाला में औरत का वह चेहरा प्रियहरि को बार-बार दिखाई पड़ रहा था, जो अविश्वसनीय था। वह ऐसा चेहरा था जो ऐन वक्त पर धोखा देता अपने बचाव के लिए पलट कर उसी को मार डालता है जो खुद उसके अपने दिल में छिपा हो। वनमाला ने अपने विभाग के एक और उत्साही साथी की योजना प्रियहरि के पास रखी थी। विश्व-व्यापार और भारत के आर्थिक हितों से संबंधित अंतर महाविद्यालयीन किसी निबंध प्रतियोगिता का वह प्रस्ताव था। पीछे कोई भी रहा हो, बातें, विचार-विमर्श और फिर निर्णय प्रियहरि और वनमाला ही मिलकर तसल्ली से करते थे। यह बात दूसरों को चुभती थी कि हर बात पर प्रियहरि की कसौटी बीच मे क्यों घसीट लाई जाती थी ? मानदेय की घोषणा सहित निबंधों की जांच के लिए प्रियहरि को भी परीक्षक और निर्णायक रखा गया था। एकाध बार वनमाला ने प्रियहरि को संकेत किया था कि निर्णायक के पुरस्कार पर एक पैकेट रखा हुआ है, जिसे वह ले लें। उसके अनुसार नलिनजी ने उसे प्रियहरि को देने कहा है। वनमाला का कहना ऐसा सहमा और संकोच-भरा होता कि जैसे उसमें उसकी इच्छा शामिल न थी और वह महज एक सूचना थी। प्रियहरि का मन दिखावे के इन प्रयासों से चिढ़ता था।

प्रियहरि ने सोचा यूं तो वनमाला उखड़ी-उखड़ी रहती है, बात तक करने से बेरुखी, हमेशा जड़ें खोदती है इसलिए भला क्यों मैं इस बेरुख उपहार से अपने को उपकृत करूं ? उसके लिए वनमाला के प्यार और संबंध की कामना इन औपचारिकताओं से अधिक थी । बाद में फिर शायद इनमें बातें हुई हों । प्राचार्य की पहल पर प्रयास यह हुआ कि बाकायदा उनकी उपस्थिति में ही प्रियहरि को वह सम्मान दिया जाए । वनमाला अपनी आलमारी से एक पैकेट निकाल ले आई थी । पीछे उसका विभागीय सहयोगी रहा था । वनमाला ने उपहार प्रियहरि को सौंपने अपने हाथ आगे बढ़ाये । प्रियहरि के मन में कटु स्मृतियां थी । यह वही चेहरा था जो उसे अपमानित करने में आनंद उठाता था । प्रियहरि ने मना कर दिया ।
उसने वनमाला से कहा -'' मैने अपना काम किया । मुझे पुरस्कार की कोई जरूरत नहीं । पुरस्कार से बड़ी चीज सद्‌भावना है । वह बनी रहे यही बहुत है ।''
विराग ने ठीक इसी वक्त वहां प्रवेश किया था। वनमाला के जाने के बाद जब उसने प्रियहरि को अकेला पाया तो कहा - '' वनमाला जैसी है, वैसी है । पर आप ने अच्छा नहीं किया । आप से सरोकार कुछ तो होगा, जो वनमाला आप की परवाह करती है ? लोक के भय से वह यूं ही अपने में सहमी-सिमटी होती है। अब जब वह यूं खुली तो आप ने आग्रह टाल औरों के सामने उसे यह बतलाने बेइज्जत कर दिया कि आप को उससे कोई मतलब नहीं । अपना अहंकार तो आप ने प्रदर्शित कर दिया पर अब जरा यह भी सोचियेगा कि वनमाला को भला आप के व्यवहार से कैसा लगा होगा ?


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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Post by Jemsbond » 28 Aug 2017 09:51




जलती हैं, साली सब झूठी हैं

''आप के पास आना मुश्किल है । कोई है ही नहीं । अकेले बैठे हैं, इसलिए आ गई । सोचा चलो बात करूं ।'' नेहा ने कहा ।
दुख के क्षणो में मरहम का काम करती नेहा की प्यारी आवाज को मैं सुन रहा था




मुझे नहीं मालूम कि वनमाला को कैसा लगा होगा ? मैं जानता था कि उसे मुझे प्रसन्न करने ही सामने किया गया था, लेकिन वैसी प्रसन्नता किस काम की थी, जिसके पीछे मन का मैल छिपा हो । मुझे अपने निर्णय पर कोई पश्चाताप न था ।
इन सब के बावजूद वनमाला और मेरा साथ हमारी चाहत भी थी और मजबूरी भी । पास रहकर भी दूर अनबोले रहे आते लेकिन जब भीड़ से परे और बाधारहित होते तब बात करने के बहाने और काम के मौके निकल आते थे । न जाने क्यों पास रहकर भी एक अदृश्य तनाव, भय हमारे बीच छाया रहता कि कब यह निकटता बाधित हो जाएगी और न जाने फिर कब बैठने, बात करने का मौका मिलेगा। सारा कुछ अनिश्चित होता जा रहा था । प्रियहरि का मन खुला था । वह करुणा और असहायता की पीड़ा से ग्रस्त रहता । प्रियहरि हमेशा वनमाला के उदास घबराए, पशोपेश भरे मन में झांकने की कोशिश करता पूछना चाहता कि आखिर उसका मन इतना रहस्यमय क्यों लेकिन जब यत्नपूर्वक हमारे बीच ऐसे क्षण विकसित होते, समय और भीड़ दस्तक देने लगती और हमें काम छोड़कर अलग होने की विवशता आ जाती । क्या वह मेरी अतिशय दयनीयता और समर्पित दीवानगी थी जो दुनियादारी की चिंताओं से ग्रसित और भयभीत वनमाला को मुझसे विरक्त कर रही थी ? वक्त बेवक्त वह यूं ताने देती और व्यंग्य करती जैसे जितनी भी गलतियॉं हैं, मेरी ही हैं। दुर्दशा के हालात मेरे थे, चिताएं मेरी थीं, वनमाला तो अपनी छबि को साफ रखने औरों पर अपना रुतबा बरकरार रखने निकल पड़ती थी । होना यह चाहिये था कि तब मैं अलग-थलग पड़ जाता और वह लोकप्रिय नायिका की तरह स्वीकार की जाती, लेकिन नहीं । वैसा नहीं हो रहा था । वनमाला का प्रदर्शन उसकी छबि को और खराब करता रहा । दुचित्ता, सनकी, झगड़ालू काम-टालू और अहंकारी औरत के रूप में ही उसकी पहचान बनती गई । इस बार युवा-उत्सव के साहित्यिक सांस्कृतिक कार्य क्रम में उसे कलाकार छैला के रूप में लोकप्रिय कानन और अनुराधा के साथ रखा गया था । कलाकार कानन अपने बाहर के नाम, मान-सम्मानस, पैसे की उम्मीद में संस्था के कामों को तुच्छ और बटुकीय समझता था । वह काम इन पर टाल देता और राजाबाबू की तरह पेश आता था । कॉलेज में उसकी यह वृत्ति आम थी । परीक्षाओं में वह कमरे में घूमने-फिरने और जिम्मेदारियॉं निभाने की बजाय घंटों इस-उस कमरे या बाहर गप्पें लड़ाने में बिताता और साथी महिला या पुरुष खीझकर उसे कोसता रहता । फाइलें और कागज इधर से उधर खिसकते और युवा उत्सव धरा रह गया । ऐसे में जब तलब होती तो तीनों दोष एक-दूसरे पर डालते ।
स्टाफ में रचनात्मक रुझान और योग्यता वाले ऐसे ही न थे । जो दो चार थे, उनमें मैं ही ऐसा था जो हाथ में लिए काम पर दिन-रात मेहनत करता और कराता बेहतर और अनोखे ढंग से संपन्न करने की कोशिश करता । मुझमें ऐसा आत्मविश्वास और बड़प्पन था कि सारा काम खुद कर डालता, लेकिन श्रेय अपने साथियों नीलांजना, वनमाला या और कोई भी हो को देता था । साथी की यह भावना और वृत्ति अन्य में दुर्लभ थी । मुझे आश्चर्य है कि वैसा होने औरविशेषत:वनमाला को आगे बढ़ाने और उसकी तरक्की की प्रेरणा और कामना के बावजूद वह मुझे ही रौंदना चाहती थी । इसके विपरीत काम हो न हो, भाड़ में जाए की वृत्ति के साथ मजा लेने वाले चित्रकार व्यास को वे अपने वश में न कर पाती थीं । मौका मिलने पर भी वनमाला उसे मनाने के जतन करती थी । अपना सूजा मुंह और खीझ लिए बस कागज पलटाती और नोटिस निकलती नजर आती । काम जब न हुआ तो वनमाला ने चित्रकार व्यास पर आरोप मढ़ दिया कि सारे कागज फाइल वे धरे रहते थे, जिम्मेदारी उनकी थी पर काम नहीं किया । उधर चित्रकार व्यास कहता कि मैंने सब समझाया, किया, दिया । पर खुद ही ये अयोग्य थी तो क्या करती । अनुराधा के पीठ पीछे वनमाला खुन्नस निकालती कहती कि ये तो कॉलेज से गायब रहती हैं । कभी एकाध घंटे सूरत दिखी, बातें की और फिर इसका पता नहीं कब खिसक लेती है। वनमाला का आरोप होता कि छात्र-छात्राओं को खुद वह प्रेरित करती है और अनुराधा कुछ नहीं करती । इधर अनुराधा कहती कि वनमाला झूठ बोलती है । वनमाला को कुछ आता-जाता नहीं है, जबकि वह खुद दिन-दिन भर कॉलेज के बाहर में छात्रों के घर नृत्य का रिहर्सल कराती रही है ।
वनमाला का जवाब होता - '' साली झूठ बोलती है । मैने लड़कों-लड़कियों से पूछा है । न कहीं गई थी और न कुछ कराया है। ''
वहां क्या चल रहा था इसे मैं मौन देखता । मैं चाहता तो मदद कर सकता था, लेकिन नहीं वह मेरा क्षेत्र नहीं था । मुझे केवल वनमाला की दयनीयता पर तरस आता कि देखो, मैं तो उसे इतना महत्व देता हूं, उससे मेरे निजी संबंध हैं, उस पर जान देता हूं और जब भी हम मिलते हैं पूरी अन्तरंग लय के साथ । एक दूसरे में चित्त और हृदय से ऐसा काम करते हैं, जो दूसरों से संभव न हो, लेकिन यह वनमाला है कि वह शुभचिन्तक और प्रिय की अवमानना करती झगड़ा करती है और बाहर शुभचिन्तक ढूंढ़ती फिरती है । वनमाला खुद भी ठोकरें खाने के बाद इसे महसूस करती । नियति की मार कि जहाज के पंछी की तरह ठिकाना उसका फिर मेरे पास ही हो जाना था । एकांत के क्षणों में ही दिलों की जलन निकलती थी । हर हालत में मै वनमाला का पक्षधर ही होता था ।
वनमाला के विवादास्पद और चिड़चिड़े चेहरे के बरअक्स मैं सदैव निर्विवाद और विनम्र सहयोगी पूरे स्टाफ के बीच बना रहा । नीलांजना, मंजरी, रीमा, नई विभगीय लड़कियां सब की सब वनमाला की आलोचक थीं । उससे बात करना ही किसी को भी पसंद न था । उल्टे जब सुबह आने वाली नई महिलाएं मुझसे बातें करती प्रभावित होती निकट आती दीखतीं तो वनमाला की नाक और चढ़ जाती थी । न जाने उसके अंदर क्या था कि कोई उसे पूछता ना था और जो एक मैं उसके अंदर छिपी-दबी-लाचार वनमाला से प्यार करता था, उसे उसकी संभावनाओं तक पहुँचाने के स्वप्न देखता, उससे वह घमंड भरी जब-तब खराब तरह से पेश आती । बल्कि वैसा नहीं, अपने को पेश आता दिखाती प्रचारित करती थी । उसे समझना मुश्किल था कि वह क्या है ।
इस बार भी कालेज की पत्रिका का काम मुझे और वनमाला को ही दे दिया गया था। अपनी हताशा के कारण या किसी और झगड़े के बाद व्यंग्य, शिकायत, रूठना और मनाना छोटे-छोटे क्षणों में हम दोनों के बीच चलता रहा था । अक्सर मैं उसे घर में फोन कर बैठता। दोनो की उपस्थिति के परम एकांत में कभी आंखों की भाषा में, और कभी मौन के जुबान की भाषा में हमारी बातें होतीं।
औरतों की ईर्ष्या की परवाह वनमाला को कम थी। वह उन्हे तुच्छ और उपेक्षणीय समझती थी । इसीलिए औरतों में भी हमारे पीठ पीछे वनमाला की बिला-वजह अकड़ और उस जैसी उपेक्षणीया के प्रति मेरी दीवानगी को लेकर चर्चाएं चला करती थीं । वनमाला उनके परवाह के दायरे से बाहर थी। चिन्ता उन्हें मेरी हुआ करती जो वनमाला के चक्कर में व्यर्थ ही उससे पिसा जा रहा था। कुछ महिला-साथी स्पष्टतः कह भी जाती थीं । जैसे रीमा ने एक बार मुंह बिचकाकर कहा था कि इन बंगालियों से तो बच के ही रहना चाहिए । टोना-टोटका करती हैं । आप तो उसके चक्कर में मत पड़िए । शायद मेरे फोन से उत्पन्न घर के झगड़े या फिर संस्था में अपवाद के चर्चे वनमाला के मन में मेरे लिये उसकी खीझ और नफरत के कारण रहे होंगे । वनमाला को रूठा छोड़कर मेरा बाकी सब महिलाओं के साथ उठना बैठना भी शायद उसके भड़कने और भड़काए जाने का कारण रहा होगा । दुविधा के ऐसे ही अनबोले क्षणों में एक दिन मैं और वनमाला अकेले-अकेले बैठे थे । हमें नेहा ने उस तरह अनबोला उदास देख लिया था। एकांत में उसी हालत में छोड़ वह लौटने को उद्यत हुई, तो वनमाला उस खास दिन तुरंत उठ खड़ी हुई और साथ हो ली । दोनों महिलाओं की जैसी मुद्रा थी, उसने मुझे आहत किया । बेचारगी की निगाह से मुझे अकेला और उदास छोड़ वे चली गई थीं।
दूसरे दिन नेहा मौका निकाल मेरे पास घुस आई । तब मै संभवत कार्यालय-प्रमुख के चार्ज मे था और प्रिसिंपल के चेम्बर में बैठा था । गोरी-चिट्‌टी, नेहा अपने भरे-चौड़े चेहरे पर लहराते काले घने बाल और अपनी चंचल अदाओं के साथ चहकती उस वक्त मुझे लुभा रही थी । उसे पहली बार तब मैंने निकटता मे पाया था जब वह शुरू में आई-आई ही थी । मुझसे छोटी कद काठी थी पर संभाले न जाने वाले भारी नितंब को धारण किए उसकी जंघाएं पुष्ट थीं । वक्ष जबरदस्त विशाल, रस भरे, और नुकीली चूचियाँ छाती से बाहर आने को थी । अंदर जाती मेरी रस भरी आंख से जब आंखें टकराईं तो मेरे अंदर का कुछ उसमें भी बहने लगा था ।
उस दिन नेहा से मैने जब कहा- ''आह, आज तो तुम्हारी खूबसूरती मारे डाल रही है,'' तब उसने मेरी आंखों में झांकते कुछ लज्जा और ढ़ेर सी प्रसन्नता से चमकते चेहरे के साथ दोनों बाहें पीछे कर, छातियों को उभार ऐसी अंगडाई ली थी कि उसके आमंत्रण को तुरन्त स्वीकारने की चाहत जाग गई थी । नेहा बिन्दास थी और उन खुली जवानियों में थी, जिनसे मैं बेझिझक बतिया सकता था। वनमाला की याद दिला नेहा अपनी चंचलता में मुझे बहुत छेड़ा करती थी । वनमाला की चुगली करने में औरतों को संकोच होता था । उन्हे भय बना रहता था कि उनकी चुगली मेरे और वनमाला के अन्तरंग क्षणों में जिससे उन्हें स्पृहा थी, प्रकट न कर दी जाए । नेहा बिंदास और बेपरवाह थी। उसे किसी का भय नहीं था। नेहा ने बताया कि कल भी वह मेरे साथ बतियाने के मूड में आई थी लेकिन वनमाला को वहां पहले से मौजूद पा वह बैठने में संकोच कर गई थी। यह अलग बात थी कि वनमाला देवी उसके औपचारिक ''चलो न'' की दावत पर खुद ही उठकर तब उसके साथ चिपकी चली गई थीं।
''आप के पास आना मुश्किल है । कोई है ही नहीं । अकेले बैठे हैं, इसलिए आ गई । सोचा चलो बात करूं ।'' नेहा ने कहा ।
दुख के क्षणो में मरहम का काम करती नेहा की प्यारी आवाज को मैं सुन रहा था और उसके खूबसूरत चेहरे पर चमकती बड़ी काली आंखों में झांक रहा था । नेहा और मेरे बीच और वही क्यों, अन्य-स्त्रियों के साथ भी ऐसे क्षण सुलभ थे । नेहा तो नेहा ही थी। मुझसे दोस्त की तरह ज्यादा खुली हुई थी ।
''सुनाइये क्या हाल चाल है । आप तो हमेशा गंभीर और उदास लगते हैं न जाने कहां देखते रहते हैं । क्या सोचते रहते हैं । आना चाहती हूं लेकिन डर लगता है झिझकती हूं कि आप कुछ कह न दें।''
''प्यारी नेहा, तुम तो यार ताने न दो । मैने तो तुम्हें कभी रोका नहीं है । हमेशा करीब रही हो फिर काहे की झिझक ।''
''अरे आप नहीं जानते यहां कितने और कैसे-कैसे जलनखोर हैं ।'' चुप्पी के बाद नेहा ने फिर कहा- ''चलिए कुछ सुनाइये । क्या चल रहा है, क्या सोच रहे हैं । मेरे सामने तो आप इस कदर गंभीर न रहा कीजिये ।''
मैं उदास और अन्यमनस्क था । मेरी यही मुद्रा सामने वाले को मुझमें घुसने प्रेरित करती थी । बात करने की बात पर मैने कहा - ''मैं तो अकेला हूं, अलग-थलग रहता हूं । न जाने लोग क्या-क्या सोचते होंगे, बुराई करते होंगे ।'' एकदम व्यक्तिगत पर आकर मैने कह डाला-तुम्हीं बताओ मै तुम्हे कैसा लगता हूं, मै कितना अच्छा या बुरा हूं । आज मैं अपनी बुराइयां सुनना चाहता हूं । तुम्हारी ओर से कोई बात कहने को न हो तो यही कह डालो ।''
नेहा ने बड़ी अदा से चंचल आंखे मटकाते हुए लाड़ में कहा -''आप से बातें तो बहुत सी करना चाहती हूं लेकिन डर लगता है आप न जाने क्या समझें ?''
मैने नेहा को उकेरा ''कहो ना यार । जब मैने कह दिया तो क्यों नखरा करती हो । तुम्हारा मन खुला है, मेरे नजदीक हो इसलिए तो तुमसे कहा है। और तुम हो कि ऊँ-उूं की अदा से टाले जा रही हो ।'' उसने आश्वासन लिया कि मैं किसी से कहूंगा तो नहीं फिर हंसते हुए संकोच से कहा-''आप को मालूम है कि आप के पास अकेले बैठने से औरतें कतराती क्यों है ?''
मेरा चित्त वनमाला में डूबा था । मैं कह उठा-''शायद कुछ लोग भड़काते हों, या शायद इसलिए कि किसी को जलन होती हो कि मेरा अपना दूसरों के साथ क्यों बैठता बात करता है ।''
टोहने पर नेहा ने खुलासा किया-''कल जब मैं वनमाला को स्टाफ-रूम से अपने साथ बुलाकर ले गई तो वनमाला ने मुझे अन्य औरतों नीलांजना, अनुराधा वगैरह की उपस्थिति में धन्यवाद देते हुए कहा कि
''अच्छा किया रे तू मुझको वहां से उठा लाई । वहां बैठने से मुझे घुटन होती है । न जाने क्या-क्या बातें वो शुरू कर देते हैं ।''
नेहा ने बताया कि ''हां में हां मिलाती अनुराधा ने भी कहा था कि हां उनमें ये आदत तो हे, कभी-कभी ऐसा करने लगते हैं ।''
नेहा की सूचना से मैं स्तब्ध रह गया । मैने पूछा । ''तुम्हारा क्या कहना है ?'' नेहा ने कहा ''नहीं मेरे साथ ऐसी कोई बात नहीं । वैसा होता तो मैं आपके पास आती क्यों ?''
जिज्ञासावश बाद में नीलांजना से भी मैंने आत्मीय क्षणों में उस प्रसंग की टोह ली । उसने कहा –
''रहने दीजिए, सब जानते हैं कि वनमाला कैसी है । उसकी मत पूछिये उसकी तो आदत ही वैसी है ।
यह उसी वनमाला का उल्लेख था, जो बार-बार ''बाई गाड'' कह गला छूती मुझे यह आश्वस्त करती थी कि आप तो किसी की बातों पर न जाया कीजिये । जलती हैं, साली सब झूठी हैं ।
सच और झूठ के बीच वक्त गुजरता जा रहा था । वनमाला का मन वनमाला ही जान सकती थी। सहानुभूति बटोरने और अपने को बेदाग, बुद्धिमती, सुशीला सिद्ध करने की सारी चेष्टाओं के बाबजूद वह अलग-थलग ही की जाती रही । यूथ फेस्टिवल की जिम्मेदारियों के मामले में पारस्पिरिक आरोप-प्रत्यारोपों में अकर्मण्यता को लेकर कलाकार व्यास और अनुराधा वनमाला से खिन्न थे । दीगर औरतों से उसकी बोलबाल न के बराबर थी । पुरानी संगिनियों में एकाध को छोड़कर किसी ने भी शायद ही वनमाला की तारीफ की हो । उलटे इस दौरान मुझे फांसकर कभी अपना पुराना वेतन प्रकरण खुलवाने के बहाने पास मेरे निकट आ जाने और कभी मुझे औरों के हितों से काटते दूर कर रखने की वनमाला की मुहिम पर लोग उससे चिढ़ते थे ।



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'' काम करूंगी तो मैं इन्हीं के साथ, अन्यथा नहीं करूंगी ।
ये मेरे साथ रहें तो दुनिया का कोई काम नहीं जो मेरे लिए असंभव हो ।''


भोलाबाबू तो थे नहीं और सालाना जलसे के दिन पास थे । विश्वसनीय जानकर प्राचार्य ने मुझे उसकी योजना बनाने और काम करने अधिकृत कर दिया और वनमाला की रजामंदी से उसे कार्यक्रम प्रभारी बनाकर मुझसे जोड़ दिया। एक-दूसरे से चोट खाए होने के बाबजूद भी प्रियहरि और वनमाला को एक-दूसरे का सहारा था । मैं अपनी खुद की कमजोरी का मारा था ।
वनमाला से मैने कहा था- ''तुम मेरे साथ रहो । हम ऐसा काम करेंगे कि तुम्हारे सारे आलोचकों के मुंह बंद हो जाएं ।''
स्टाफ के रवैये से खीझी और अपने को अलग-थलग कर दिया महसूस करती वनमाला ने खुद भी प्राचार्य से कहा- '' काम करूंगी तो मैं इन्हीं के साथ, अन्यथा नहीं करूंगी । मुझे कोई नहीं चाहिए । ये मेरे साथ रहें तो दुनिया का कोई काम नहीं जो मेरे लिए असंभव हो ।'' वनमाला और मेरे बीच पहले ही एकान्तिक क्षणों में तय हो गया था कि काम करंगे तो हम दोनों साथ, अन्यथा करेंगे ही नहीं । हमने योजनाएं बनाई, सूचनाएं निकाली । विराग अधिकृत तौर पर छात्रसंघ का सहायक अधिकारी था । उसने देखा कि वनमाला को आगे किया जा रहा है तो बेहद नाराज हुआ ।
स्टाफ के और और लोगों की भी प्रतिक्रियाएं सुनने मिलीं । कलाकार व्यास और अनुराधा व्यवहारिक कामकाज और आयोजन में ज्यादा कुशल और निपुण थे । उन्होंने साफा तौर पर कह दिया कि वनमाला की हैसियत क्या थी कि उसके फरमान पर कोई काम करे ? अंततः हुआ यह कि मैं तो वरिष्ठ सलाहकार, योजनाकारों में शामिल हो गया और वनमाला को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर कर सामान्य सहायकों के कामकाज उसे सौंपे जाने लगे ।
सब कुछ हो गया । कार्यक्रम संपन्न हुए । वनमाला अवमानित रही । रंगमंच पर कब्जा अनुराधा और कलाकार व्यास का रहा जिन्हें वाहवाही मिली । वनमाला परदे के पीछे कलाकार लड़कों-लड़कियों को व्यवस्थित करने के काम में धकेल दी गई थी ।
भले ही वे शब्द, वह कौल खीझ और हताशा में निकले हों वनमाला मुझे इन शब्दों की स्मृति में कि- ''ये अगर मेरा साथ दें तो मुझे किसी की जरूरत नहीं, दुनिया का कोई भी काम मेरे लिए असंभव नहीं'' हमेशा याद रही आई ।''
वे दिन और महीने वनमाला के साथ यूं ही बीते । अंदर क्या था जो उसे बेचैन हुए रहता था ? उसकी गहरी उदासी और अन्यमनस्कता का रहस्य क्या था ? उसकी सूनी आंखों में कौन सी शिकायत थी ? वे क्या कहना चाहती थीं ? क्यों वह नाराज होती और खीझती मुझसे बेरुख हो जाती थी ? क्यों वह उन्माद-ग्रस्त हो मुझसे झगड़ती और भला-बुरा कहती थी ? और क्यों अचानक मेरी पीड़ा को सहलाती वह मेरे दिल के एकदम करीब आ जाती थी ? इसका रहस्य हमेशा मुझमें रहस्य ही बना रहा आएगा । मैं समझ नहीं पाता कि उन दिनों जो हुआ और आगे होता रहा, उसे मैं वनमाला रूपी रहस्य का प्रकट होना मानूं या उसे और अधिक गहराना, अबूझ होना जानूं ।



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खोजी निगाहें

फिर सिर झुकाए धीरे से वह आगे बोली -
''आप को तो कोई कुछ कहता नहीं । लोगों को हमारा साथ-उठना बैठना बुरा लगता है ।''



पिछली सफलता से उत्साहित इस बार भी कालेज की पत्रिका का भार मुझ पर और वनमाला पर ही डाल दिया गया था । अपनी हताशा के कारण या किसी और वजह से खिन्न मन मैने प्रिंसपल से कहा था- मैं अब ऊब गया हूं । इतना प्रेरित प्रोत्साहित कर श्रेय वनमाला को देता हूं और वह कि ड्रामा करती नजर आती है । मैने और नाम सुझा दिये थे नीलांजना, चित्रकार व्यास, वनमाला, वगैरह । उन्होंने कहा था- ''छोड़िए सब को, आप दोनों ही बने रहिए क्यों बीच में सब को लाते हो ।''
मेरी दुविधा पर उन्होंने कहा - ''चलिए ठीक है। आप चाहते हैं तो रख लीजिए औरों को, पर आप को तो रहना ही है । चाहकर भी नीलांजना का नाम हटाकर मैने कामथ का रख दिया क्यों कि वनमाला नीलांजना के नाम से ही चिढ़ती थी वनमाला, उसका चहेता चित्रकार, और कामथ । मैने सोचा कि वह उस चित्रकार पर रुझान रखती है, करेंगे दोनों । लेकिन नहीं, वनमाला ऐसी थी कि उसकी उससे पटती ही न थी । चित्रकार की आंख अनुराधा पर रहती थी । उसके पीछे वह वैसे ही दुम हिलाता था, जैसा वनमाला के पीछे मैं ।
अनुराधा बद्‌तमीजी से तो पेश नहीं आती थी, लेकिन यदा-कदा कलाकार पर खीझती थी । कहती- ''वो बेकार हैं सर, कुछ कामधाम करते नहीं । घूमते रहते हैं और दूसरों पर रौब गॉंठते हैं ।''
कुछ भी हो टीम बनी । बातें यदा-कदा काम पर सभी से होतीं । मार्गदर्शन मैं सभी का करता, लेकिन वनमाला पहले की तरह ही नखरों के बाबजूद आत्मीय करीब रही थी, हालॉंकि पिछले सालों सा माहौल अब नहीं रहा था । मैं भी भरोसा उसी का करता था । उसके फेरामोन्स मुझे लुभाते थे । काम चलता रहा, लेकिन ना-ना करके झगड़ा हो ही गया । प्रतियोगिता में जो निबंध आए थे, उनमें पहले नंबर का लेख अंग्रेजी में था । मैने वनमाला से कह दिया कि वही उसे हिन्दी में संक्षेप में लिखे । जहां अनुवाद न बने या दीगर कठिनाई हो, मैं साथ बैठ लूंगा । वनमाला उसके लिये तैयार न हुई।
''मुझसे अकेले यह काम भला कैसे हो पाएगा ? मेरी अंग्रेजी उतनी अच्छी नहीं है। हम साथ बैठेंगे। आप अनुवाद करते हिन्दी में बोलते चलिए मैं लिखती हूं ।''-वनमाला बोली।
दो-चार रोज वैसा हुआ । कभी स्टाफ रूम में, कभी कहीं हम घंटे-दो घंटे बैठते देखे गए । जब तक खोजी ईर्ष्यालु निगाहें न होतीं काम चलता रहता, लेकिन ज्यों ही खोजी निगाहों वाले आते वनमाला असहज हो संकोच में पड़ती खीझ पड़ती ।
''मुझसे नहीं होता यह भारी काम । किसी और को पकड़ लीजिए या आप खुद कर सकते हैं कर डालिए ।'' - आखिर एक दिन वनमाला ने कह ही दिया।
मेरे सामने तो कोई कुछ न कहता लेकिन बाद में अवश्य उसे मेरे साथ को लेकर ताने दिये जाते रहे होंगे। मैं समझ रहा था कि वनमाला की खीझ इन दिनों के दरम्यान बिचकाए गए उसके मन की है । वनमाला ने कह दिया कि मेरा ही होना जरूरी क्यों हो ? किसी और को साथ बिठाकर आप अनुवाद लिखा दीजिये। बहुत बाद में मुझे इसका आभास हुआ कि वनमाला के उस तरह मेरे साथ होने पर उसे उसका वह विभागीय सहकर्मी चिढ़ता और ताने देता था जिसे जाने या अनजाने वनमाला ने अपने करीब आ जाने का मौका दिया था। वनमाला की मनमर्जी वाले सुझाव मुझे अवमानित करने वाले थे। अधीनस्थ और कमतर होती भी वह मानों मुझे निर्देशित कर रही थी। मैं भी नाराज हो उठा।
दो टूक शब्दों में वनमाला से मैंने कहा- ''ठीक है तुम नहीं करना चाहतीं तो मैं भी नहीं करने का। रही तीसरे की बात, तो समझ लो कि कोई तीसरा नहीं बैठेगा । विषय तुम्हारा है, जिम्मेदारी तुम्हारी है । मैं बैठूंगा तो तुम्हारे लिए और तुम्हारे साथ ही ।''
वहां और-और दो-चार लोग थे । जैसे इशारों से शिकायत की हो, वनमाला ने दिलचस्पी से तमाशा देखते वहां खड़े अपने विभाग के एक खास चतुर साथी की ओर अर्थपूर्ण नजरों से ताकते कहा -
''देखा न ? देख लीजिए । मेरे बिना इनका काम हो ही नहीं सकता । बड़ी अजीब बात है ।''
मैने कागज वहीं छोड़े, उठा, और बाहर यह कहता निकल गया कि तुम जानो और तुम्हारा काम जाने । सारी जिम्मेदारियाँ मेरी ही नहीं हैं । बड़े साहब के सामने हम बैठे और इस समस्या पर बात चली ।
इस जगह आकर वनमाला का असली स्वर खुला । वह बोली -''वहां अटपटा लगता है । स्टाफ रूम में सब अपने काज-काम करते बैठते हैं। लोग न जाने कैसा तकते बैठते हैं । वहां डिस्टर्ब होता है और मैं थक जाती हूं ।''
जाहिर है कि वनमाला का मन मुझे चाहने के बावजूद औरों से डरता था । वह न उन्हें नाराज करना चाहती थी, न मुझे । यहां जो उसने कहा उससे यह बात प्रकट हो गई थी ।
डॉ. नलिन ने हॅंसते हुए कहा ''कोई बात नहीं, यहां बैठ जाया कीजिए मेरे कमरे में । यहां कोई परेशानी नहीं है ।''
दूसरे दिन हम सुबह-सुबह कार्यालय शुरू होने से पहले से कार्य करने बैठे । उस दिन मैने वनमाला से कहा -''तुम्हे जो कहना है साफ क्यों नहीं कहती मुझसे। तुमने जिस तरह इशारेबाजों से मुझे कल चिढ़ाने की कोशिश की वह क्या हमारे संबंधों के बीच ठीक था ।''

वनमाला ने सफाई दी -'' अरे वो तो मैने यूं ही कहा था । मैने किसी को इशारा नहीं किया । आप बेकार उसका बुरा मान बैठे। लगता है कि आप को गलतफहमी हुई है । फिर सिर झुकाए धीरे से वह आगे बोली -'' आप मेरी मुसीबत समझानेक की कोशिश क्यों नहीं करते ? मैं कैसे समझाऊँ ? आप को तो कोई कुछ कहता नहीं । लोगों को हमारा साथ-उठना बैठना बुरा लगता है ।''
उसकी बात ठीक थी । ज्यों ही कला और विज्ञान की कक्षाओं और आफिस के स्टाफ का आना शुरू हुआ वह चित्रकार संपादक-साथी आफिस में घुसता दिखाई पड़ा । उसने चुहल की - ''अच्छा तो आप लोगों की महफिल अब यहां जमने लगी है ,?''
जाहिर है कि खोजी निगाहें वनमाला और मेरे दिमाग में चुभने लगती थीं । जिस चोरी के लिए हमारे मन आतुर रहा करते, वह और निगाहों से पकड़ी जा रही थी । संकोच और खीझ से फिर हमने काम रोक दिया । आगे जो हुआ वह एक भयानक दुर्घटना ऐसी दुर्घटना, जो तूफान की तरह तब तक आगे बढ़ती रही जब तक उसने वनमाला और मुझे उन दो किनारों पर नहीं ला पटका, जहां से हम दोनों के पास आने की सारी संभवनाएं समाप्त हो चली थीं। उस तूफान के आवेग में कुछ भी समझ पाना मुश्किल था। सारा कुछ उजाड़ हो चुकने के बाद अब मैं यह समझा सकता हूं कि तब वनमाला की ओर से जो कुछ होता चला गया था उनमें एक किंकर्तव्य-विमूढ़ता में निर्विकल्प असहाय स्त्री की मजबूरियां छिपी थीं। अपनी असहिष्णुता और अधीरता में तब मैं इतना अंधा हो चला था कि बार-बार समझाने के बावजूद अपनी समझ के दरवाजे मैने बंद कर लिये थे।


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वह दिन मेरी नाराजगी का था

टूट गए दिखाई पड़ने पर भी जुड़ने-टूटने की दरम्यानी स्मृतियां कायम रहती है- एक अनन्त अफसोस से भरी पीड़ा के साथ ।



वह तकरीबन मई का महीना रहा होगा और ऐन वनमाला के पृथ्वी पर अवतरण की तारीख, जब अंतिम रूपरेखा तय करने मैने पत्रिका की समिति की बैठक बुलाई थी । सुबह परीक्षाएं नहीं थीं ? दोपहर में लोगों की ड्‌यूटियां लगी थीं । खयाल यह था कि केवल वनमाला और प्रियहरि प्रिंसिपल के कमरे में मौजूद होंगे और इश्क फरमाएंगे । नाम के लिए पॉंच-दस मिनट को औरों को बुला लेंगे । मैंने सूचना जारी कर दी थी । सुबह दस बजे वनमाला आ गई थी कुछ लोग और आ गए थे । मुझे उम्मीद थी कि वनमाला दिलचस्पी दिखाएगी और पहल करेगी, लेकिन नहीं । वह आई, स्टाफ रूम में एक दो मिनट रही फिर इधर-उधर चली गई । चित्रकारजी नहीं आए थे । इंतजार काफी हो गया था मैंने एक सहायक कर्मी नारायण से वनमाला को खबर भिजवाई कि वे आ जाएं । दिलचस्प जवाब आया कि और लोग यानी चित्रकार व्यास जी वगैरह आ जाएं तो साथ बैठेंगे ।
दो-अढ़ाई घंटे बाद मुझसे किसी ने आकर कहा कि सब लोग यानी व्यास, कामथ और (रूठी रानी) वनमाला प्राचार्य-कक्ष में आप को बुला रहे हैं, इंतजार कर रहे हैं । मेरा मूड उखड़ा हुआ था । प्रिसिंपल के सामने पहुंचा और अनजाने की तरह तलब किया कि क्या उन्होनें बुलाया है ? किनारे बैठे स्वनाम-धन्य मेरे सहयोगियो में से चतुर चित्रकार जी की मासूम आवाज आई- ''हां न सर, हम लोग सब यहां बैठे इंतजार कर रहे हैं । जल्दी से काम निबटा देना है, फिर परीक्षा की कक्षाओं में लौटना होगा ।''
वह दिन मेरी नाराजगी का था । खोजी निगाहों को तसल्ली देने वनमाला ने जैसे मुझे अपमान का मोहरा बनाया था । मैने स्पष्ट और दो टूक जवाब दिया कि मीटिंग दस बजे से थी और मुझे इंतजार करने अढ़ाई घंटे हो गये हैं । मैडम को ग्यारह बजे मैने खबर भेजी, लेकिन उनका मूड नहीं था। चीजें जब यूं चलती हैं कि सहायक ही परामर्श-दाता और काम करने वाले संपादक को चलाते चलें, बेरुखी दिखाएं तो मेरे होने का कोई मतलब नहीं है। जहां किसी के मन में कटुता और दुर्भावना हो, वहां मैं काम नहीं करूंगा । आप जैसा बने खुद ही कर लें ।''
मेरा इशारा स्पष्टतः वनमाला की ओर था। जो बात की बात थी उसे वनमाला ने बखूबी, समझ लिया होगा । उसे उम्मीद न रही होगी कि संबंधों के आपसी मामले को लेकर वहां मैं उस तरह उससे पेश आऊँगा। वह केवल बड़ी-बड़ी पशोपेश भरी उदास आंखों से मुझे घूरती सुनती रही थी। उसके चेहरे पर शिकायत और पीड़ा की शिकन उतर आई थी। उसकी आंखें नम हो चली थीं। चित्रकारजी ने सफाई दी - ''नहीं सर, हममें से किसी ने भी ऐसा नहीं सोचा । आप नहीं रहेंगे तो फिर काम कैसे होगा ?''
उस दिन डॉ. नलिन से मैने वनमाला के व्यवहार पर दुख व्यक्त करते अपनी पीड़ा कह तो दी ही थी। वनमाला के व्यवहार से मुझे इस कदर वितृष्णा हुई कि मैने अभी हाल ही किसी पारिवारिक आयोजन पर स्टाफ की ओर से उपहार में भेंट किए सामूहिक चंदे से हिसाब लगाते हुए वनमाला का हिस्सा नलिनजी के हाथों में सौंप दिया। मैने कहा कि अब जब मैं किसी साथी के मन को अंदर तक झांक चुका हूं , तब उसकी झूठी सद्‌भावना और अहसान मैं नहीं कुबूल कर सकता। मेरा अब उनसे बात करने का भी ताल्लुक नहीं है इसलिये मिहरबानी करके यह उनका हिस्सा आप लौटा दीजिये।
वनमाला ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए मुझे यह समझाने की कोशिश की -''वह भेंट तो पारिवारिक है। उसे आप क्यों लौटा रहे हैं ? अगर कुछ है तो वह मेरे और आप के बीच है। गलतफहमियां दूर की जा सकती हैं। आपस की नाराजगी में आप चीजों को क्यों वहां तक ले जा रहे हैं ? वह अच्छा नहीं मालूम पड़ता। छोटी सी बात थी। मैं आप को कैसे समझाऊं ? आप ने न मुझसे बात की और न बात करने का मौका दिया। इतना बुरा आप क्यों मान गए ?''
बैठक से मैं बाहर निकल आया था । विग्रह और तनाव के उस दुखद परिदृश्य के बाद फिर डॉ. नलिन ने समझाने के लिए वनमाला को और मुझे बुलाया था । उनके सामने खुलकर बातें हुईं। मैने बताया कि ये आईं और बुलाने पर भी मेरे पास न आईं तो मुझे बुरा लगा था । वनमाला का जवाब था कि उसे किसी ने बताया नहीं । नारायण से बुलाने की बात की पुष्टि जब मैने उसी को बुलाकर की तो वनमाला ने दूसरा बहाना निकाला कि जब ये प्रियहरि खुद यहां थे तो क्या मुझसे बात नहीं कर सकते थे ? नारायण बाबू के हाथों खबर भिजवाने की भला क्या जरूरत थी ? क्या सचमुच नारायण के जरिए खबर भेजने से कोई गड़बड़ हुई ? क्या किसी ने उस पर से फिर वनमाला को छेड़ते हुए टिप्पणी की थी ? क्या उस संदेश की जानकारी किसी और की उपस्थिति में पाती हुई वनमाला पर किसी ने ताने कसे थे जिससे तिलमिलाती अपना गुस्सा वह मुझ पर उतार रही थी ? जो भी रहा हो, अपनी नाराजगी और विक्षोभ सरे आम वनमाला पर प्रदर्शित करता मैं कमरे से बाहर चला आया । वनमाला को आहत करते हुए बदले की तसल्ली के बावजूद मैं न जाने क्यों अपने आप में ही डरा हुआ और उदासी से भरा था ।

यह वही वनमाला थी जिसके लिए पिछले दिनों के उस खास पारिवारिक आयोजन के बाद वह मिठाइयां लेकर कालेज गया था । वनमाला के सम्मोह में खासतौर पर तैयार किये राजभोग का डिब्बा तब तक वहां उसने नहीं खोला था, जब तक वनमाला उसके रूबरू आकर खड़ी न हो गई थी । बड़े मनुहार के साथ पहला कौर उसने उसे वनमाला को यह बताते हुए खिलाया था कि मिठाई का वह डिब्बा तुम्हारी प्रतीक्षा में ही अब तक बंद रखा था । वह वही वनमाला थी जो मेरे आत्मीय बुलावे के बावजूद मेरे पारिवारिक आयोजन से बेरुख रही आई थी। वनमाला के लिये मेरा वैसा दीवानापन उसकी वैसी उपेक्षा के बावजूद रहा आया था।
मेरा चित्त अपार पीड़ा से व्यथित था । दुर्घटना का यह दिन उस प्रिया वनमाला का जन्मदिन था। उसे देखने, उससे मिलने और जाने कितनी-कितनी बातें उससे करने का मनोरथ लिये मैं कालेज में पहुंचा था। मैने कल्पना भी नहीं सोचा था कि यह दिन अचानक मनहूसियत की याद बनकर हमेशा के लिये कांटे की तरह मुझमें चुभन छोड़ जाएगा। वनमाला से विग्रह के बाद उस रोज़ सभी का चित्त उखड़ चला था। सभा भंग हो गई थी । सारा कुछ गुजर चला था लेकिन न जाने क्यों इस साहसपूर्ण झगड़े का मुझे मलाल था । वनमाला को चोट पहुंचाकर अफसोस से भरा मेरा मन रो रहा था । घटना के बाद जब होश आया तो न जाने किस प्रेरणा से मेरे कदम परीक्षा के कमरे में ड्‌यूटी पर तैनात वनमाला की ओर मुड़ गये थे । वनमाला को बाहर बुलाकर मैंने जन्मदिन की बधाई दी थी और उसे तकलीफ पहुंचाने माफी मांगी थी ।
वनमाला का मूड बिगड़ा हुआ था । ठीक अपने जन्मदिन पर अपना समझे जाने वाले प्रियहरि से कड़वे व्यवहार की उसे उम्मीद न रही होगी । अपने अपमान की चोट से आहत उसने प्रियहरि से बदला लिया -
''बस रहने दीजिए । सब के सामने आपका ड्रामा देख लिया । बच्चे नही हैं आप । आज सब के सामने आज मेरी इज्जत ले ली। ऐसा व्यवहार आप को शोभा नहीं देता। क्या करने आए हैं आप अब ? क्या और कुछ बाकी रह गया है ?''
मुझको ठंडा हुआ पाकर अब वनमाला की गर्मी शबाब पर आ चली थी। अपने अपमान का बदला अब उसी शैली में लेने वह उतारू हो आई थी जिसका प्रयोग दस मिनट पहले मैं कर गया था। वह धमका रही थी –
'' अब तो मेरा पीछा छोड़िए । समाज में आप की काफी इज्जत है। आप विद्वान हैं। बड़ा नाम है आप का। बचा रखिए उसे, अन्यथा एक दिन सब के सामने आप को मै भी नंगा कर दूंगी । जाइये आप, मुझे अब और कुछ नहीं सुनना है आप से ।''
दोनों के बीच इस दिन जो हुआ, उसपर कमरे में मौजूद उसके साथी परीक्षक उदयन का ध्यान गया होगा लेकिन बातें संभवतः सुनी नहीं गई थीं। अन्यथा प्रसारित जरूर होती। बहरहाल, खुली खटपट तो हो ही गई थी । उस दिन अपने को ''पत्रिका'' से मैने अलग कर लिया था। हां, -उससे ही, जिसे ''पत्रिका'' का अमूर्त नाम मैने आपसी प्यार से दिया था और जिसे मेरी वह पत्रिका बखूबी जानती थी।

संबंध क्या होते हैं मुझे मालूम नहीं, लेकिन यह मालूम है कि टूट गए दिखाई पड़ने पर भी जुड़ने-टूटने की दरम्यानी स्मृतियां कायम रहती है- एक अनन्त अफसोस से भरी पीड़ा के साथ । नलिनजी ने भी उसके बाद मुझसे कुछ न कहा । बाद में उनके व्यक्तिगत अनुरोध पर पत्रिका के लिए उनका प्रवचन और अपना संपादकीय चित्रकार साथी संपादक को सौंप दिया था । वनमाला पर से मेरा विश्वास टूट चुका था । मैने तय किया कि अब उस वनमाला के सामने भी नहीं पड़ूंगा, जिसे मेरा साथ तो क्या, शायद मेरे चेहरे से भी नफरत है । मैने भोलाबाबू से कहकर अगले साल के लिए अपनी कक्षाएं अब सुबह की जगह दोपहर के आसपास रखवाईं ताकि वनमाला के चले जाने के वक्त मेरा पहुंचना हो ।
भोलाबाबू बंगाल के कायस्थ थे । हर हाल में विनम्र रहना, झगड़े के बीच भी ठंडा दिमाग रखना और कुर्सी के प्रति श्वान की तरह वफादारी के गुण उसमें हैं । जहां और लोग केवल अपने सरकारी काम से मतलब रखते हैं वहां वह प्राचार्य के साथ चिपका रहकर दुनिया भर के काम बटोरते हैं और अपनी योग्यता और समझ के मुताबिक उन्हें निभा देते है । यह बात और है कि चापलूसी की उनकी वृत्ति और अतार्किक कार्य-पद्धति से स्टाफ के लोग, चाहे पुरुष हों या स्त्रियॉं, चिढ़ते थे । वनमाला के साथ संबंधों के अनुभव इस कदर कटु हो चले थे कि मुझे उनसे ही एक दिन कहना पड़ा था कि अगले साल का टाइम-टेबल इस प्रकार बनाए कि मुझे सुबह आना ही न पड़े, जिससे मैं नफरत और अजनबीपन के वातावरण से दूर रह सकूं । वनमाला कालेज छोड़ रही होगी तब मैं पहुंचूगा।
उस दिन भोला ने हंसकर मुझसे कहा था- ''तुम भी तो साले वैसे ही हो । मैने तो तुमको कई बार इशारा किया था, लेकिन तुम हो कि उसी से चिपके रहते हो । ये औरतें होती ही ऐसी हैं । पांव की जूती की तरह दबाए रखो तो ठीक रहती हैं । जितना ज्यादा मस्का लगाओगे और सर चढ़ेगीं । आखिर देख लिया न तुमने ? मै तो कहता हूं ऐसे लोगों से बात ही न करो । मैं तो जानता हूं इन लोगों को अच्छी तरह ।''
वह ठीक कह रहा था । इसीलिए शायद स्वार्थ के मौके पर छूट लेने महिलाएं प्रायः प्राचार्य से कुछ कहने की बजाय रियायत पाने भोला की खुशामद करना बेहतर समझती थी ।
मैने वनमाला से अपने को दरकिनार रखने का उस तरह इंतजाम तो कर लिया लेकिन तब भी क्या हुआ ? वह दूर सही, उसे देख लेने की मन में अभिलाषा तो बनी ही रही आई । रेल की जगह बस से ग्यारह बजे के करीब मैं पहुंचता इस मनःस्थिति के साथ कि-

हांफता हुआ भागता है मन
कि पहुंचूं
इससे पहले कि तुम निकल जाओ ।
महाविद्यालय मेरे लिए महज एक चेहरा है ।
जिसका नाम वनमाला है

प्रायः वनमाला के निकलते और मेरे पहुंचते मेरी आंख की पीड़ित करुणा और उसकी आंखों की शिकायत मौन की भाषा में मिलती रही और यूं दिन बीतते रहे । उस साल कालेज की पत्रिका से मैं गर्मियों के झगड़े के बाद अलग हो गया था । वनमाला से मेरे संबंध अब प्रायः नहीं रह गए थे । वह अनमनी अपने आपमें रही आती और अनमना मैं भी उससे दूर रहने की कोशिश करता । उससे तो कभी किसी की पटी नहीं, लेकिन मैं अपना गम छिपाये स्टाफ के दीगर मित्रों खासकर खूबसूरत स्त्रियों नीलांजना, मंजरी नेहा, वल्लरी, मंजूषा, सुरंजना अनुराधा से मिलता-घुलता रहा । यह बात और है कि उस मिलने और घुलने में भी अंदर-अंदर वनमाला ही दिलो-दिमाग में छाई होती ।
मेरे अंदर छिपी इस पीड़ा को सब जानती थीं । इसलिए पास आकर भी संभवतः इनके मन में वनमाला बीच में बनी रहती थी । न वे मेरे अंदर प्रवेश कर पा रही थी और न मेरा मन ठीक-ठीक उनमें रमता था । वनमाला एक थी, लेकिन सारी की सारी अन्य मेरे लिए एक सी थीं- मौका मिलने पर घायल हृदय की मरहम और मन के बदलाव की तरकीबें मात्र । वनमाला बोलती कुछ न थी, लेकिन उसे इस सब का आभास तो था । यदा-कदा वह औरों साथ मुझे घुलता, बातें करता देख प्रश्नवाचक दृष्टि से घूरती भर थी । एक मौन शिकायत कि मुझे तुम्हारी यह बात पसंद नहीं है । बातें तो उससे भी होती थी लेकिन न के बराबर और यदा-कदा ही, जिसमें न मैं ज्यादा खुल पाता था और न उसका दिल ।



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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: प्रेम की परिभाषा ( उपन्यास)

Post by Jemsbond » 28 Aug 2017 09:52




ईर्ष्या भी कितनी चमत्कारिक होती है?


''प्रियहरि, ये बताइये आप इतना अच्छा लिख कैसे लेते हैं ? मन को छू लेने वाले इतने मार्मिक शब्द आप लाते कहां से हैं । वनमाला की ओर एक निगाह डालती अनुराधा बोली- ''कोई चाहे कुछ भी कहे, मुझे तो पत्रिका में सब से अच्छा हिस्सा जो पढ़ने लायक है संपादकीय का ही लगा।''



महिलाएं इस बात पर आश्चर्य करतीं कि सनकी दिमाग वाली, अपनी अकड़ में औरों को तवज्जुह न देने वाली वनमाला से मेरी पटती कैसी है ? उनमें कहीं यह ईर्ष्या भी थी कि वनमाला से दिखने-सुनने, स्वभाव और आत्मीय व्यवहार में इनसे करीब रहकर भी वनमाला की ही मैं तारीफ क्यों करता हूं ? उसका सहारा ही क्यों लेता हूं ? वे यह बात मुझसे कहा भी करती थी लेकिन दिखाई पड़ते तकरार और मनमुटाव के बीच भी वनमाला और मेरी उपस्थिति के मौन क्षण और संक्षिप्त मुलाकातों के बीच साधारण सी दो चार शब्दों में हुई बातों का अंदाज ऐसा रहस्यमयी आत्मीयता का माहौल भर देता था कि हम दोनों के हृदय में उठ रही तरंगें औरों को शंकित कर देती थी । लोगों को यह समझने में देर न लगती कि कुछ न होने के बावजूद कुछ है । वह क्या है, इसे न प्रियहरि ठीक-ठीक जान सका न मेरी शुभचिन्तक ये कामिनियॉं कभी जान सकीं । पत्रिका छपकर कब तक वैसे ही पड़ी रही, इसका ठीक-ठीक अनुमान मुझे नहीं है । बस इतना याद है कि औपचारिक विमोचन के चक्कर में वह नवंबर तक लटकी रही । औपचारिक विमोचन के दौरान उस खास दिन मैने वनमाला को विशेषतः लक्ष्य करके द्वि-अर्थी संकतो में केवल चंद शब्द अपने वक्तव्य में कहे थे। बस इतना कि पत्रिका के विषय में मैं क्या कहूं ? अपनी पत्रिका के लिए जो कुछ मुझे कहना है वह मैने संपादकीय में कह दिया है । बात सामान्य ढंग से कही गई थी, लेकिन उसमें निहित संकेत क्या है यह वनमाला ही जान सकती थी । वह जानती थी कि प्यार में उसे मैने ''पत्रिका' 'का पर्याय बना दिया था ।
बातों-बातों में मैने कभी उससे पहले ही कह दिया था- ''प्यारी वनमाला, मेरी पत्रिका तो केवल तुम हो, जिसे मैं दिन रात पढ़ता हूं ।'' वनमाला के हृदय ने मेरा संदेश अच्छी तरह पकड़ लिया था । उसके बाद चाय के दौरान प्रिंसिपल के कमरे में जब मौजूद स्टाफ को पत्रिका के अंक बॉंटे गए तो मैने देखा कि वनमाला विस्मित प्रफुल्लता से संपादकीय के रूप् में अपने नाम लिखा मेरा प्रेमपत्र पढ़ रही थी ।
वनमाला से अब तक एक प्रकार का अबोलापन बरकरार था । वह अपनी रहस्यमय उदास अन्य-मनस्कता में क्या सोचा करती थी इसे जानना सदैव असंभव रहा है । यह जरूर है कि मेरी उदासी के साथ उसकी उदासी का सामना जब भी होता, समूचा माहौल दोहरी उदासी से भरकर मुझे और बेचैन कर देता था । मुझे अब ऐसा प्रतीत होता है कि वनमाला ही नहीं, वनमाला और मेरे बीच संबंधों पर नजर रखने वाले करीबी लोग भी उन शब्दों के अर्थ समझते थे जो मैने विमोचन के उस खास दिन कहे थे और जिनकी तफसील संपादकीय में थी । यह बात दो दिन बाद की है । स्टाफ रूम में केवल हम तीन थे, वनमाला, मैं और अनुराधा । मैं बाद में पहुंचा था अनुराधा और वनमाला पहले से आसपास बैठी थी । पहुंचकर मैं भी उन्हीं के पास खड़ा हो गया था । वनमाला न होती थी तो उसे देखने की बेताबी और प्रतीक्षा होती । सामने होती तो उसके रहस्यमय उदास मौन की यातना से मन भारी हो जाता । मैने देखा अनुराधा के हाथ में कालेज की पत्रिका थी । देखा कि अनुराधा का चेहरा उल्लास की स्मिति से भरा था । मेरी उपस्थ्ति से वह स्मिति चहक में बदल गई थी जो कतई बनावटी नहीं थी । मुक्त मन से मेरी तारीफ करती वह संपादकीय के शब्द दोहरा रही थी ।
जैसे छेड़ रही हो, अनुराधा ने मुग्ध भाव से मेरी तारीफ करनी शुरू कर दी। उसने कहा- ''वाह क्या बात है ?'' मुझसे मुखातिब होकर उसने पूछा - ''प्रियहरि, ये बताइये आप इतना अच्छा लिख कैसे लेते हैं ? मन को छू लेने वाले इतने मार्मिक शब्द आप लाते कहां से हैं । वनमाला की ओर एक निगाह डालती अनुराधा बोली- ''कोई चाहे कुछ भी कहे, मुझे तो पत्रिका में सब से अच्छा हिस्सा जो पढ़ने लायक है संपादकीय का ही लगा।''
अनुराधा के शब्दों को सुनती बगल ही उदास अन्यमनस्क खड़ी और वैसे ही पुस्तक के पन्ने पलटती वनमाला के चेहरे पर जल्दी-जल्दी कुछ भाव आए और गए । उसकी सूनी आंखें मुझे देख रही थी और मेरी आंखें उस क्षण उसकी आंखों के सूनेपन में झांक रही थीं। मुझे ऐसा कुछ आभास हुआ जैसे मेरे पहुचने से पहले अनुराधा और वनमाला के बीच कुछ निजी संवाद हुए हो सकते हैं।
मैने अनुराधा को धन्यवाद दिया । कहा -'' यह तो आप समझती हैं । जिन्हें समझना है, वे भी समझें तब तो।''
बाबजूद इसके कि अनुराधा का बीच में होना वनमाला और मेरे बीच पुल का काम कर रहा था या अनुराधा ही खुद जानबूझकर उस क्षण हमारे बीच पुल बनी हुई थी, मैने इसी में भलाई समझी कि गर वनमाला को मैं पसंद नहीं हूं, अगर वह अपनी अकड़ में अबोली है तो उसके अनप्रेडिक्टबल मूड को नहीं छेड़ना ही ठीक है । अबोलेपन की दूरी मैने बरकरार रखी और तुरन्त पुस्तकें उठाकर कक्षा में चला गया । मन में एक चीज फिर भी भर गई कि जिस पर मैं मरता हूं,, जिससे मैं प्यार करता हूं, जिसके लिए मेरे शब्द अर्पित हैं, वह कितना निष्ठुर है कि सारा कुछ जानकर भी उसके मुंह से बोल नहीं फूटते ।
कला की कक्षाओं का वह पहला घंटा था । अपनी कक्षा लेकर ज्यों ही मैं निकलने को हुआ वनमाला की कक्षा का एक छात्र मनोहर दरवाजे पर टकराया- ''आप को वनमाला मैडम ने बुलाने मुझे भेजा है ।''
मुझे अचरज हुआ और आश्चर्य से भरी खुशी भी कि आज कौन सा शुभ मुहर्त है, जो मेरा प्यारा दुश्मन मुझे संदेश भेजकर बुला रहा है । स्टाफ रूम में जाकर मैं अपनी जगह बैठ गया, लेकिन बात की पहल मैने फिर भी नहीं की । तभी बहुत दिनोंसे अबोली वनमाला अपनी जगह से उठ मेरे पास आ खड़ी हुई।
उसने कहा- ''एक चिट्‌ठी भेजनी है, आप मुझे लिखा दीजिए ।''
न जाने क्यों अच्छे क्षणों में भी वनमाला के अनिश्चित मूड की छाया बनी रहती है । क्या यह मेरा मान था कि दिल में अच्छा लगने पर भी मैने विनम्रता से उसे टाला-
''आप तो अच्छा लिख लेती हैं लिख लीजिए ना । कोई खास बात तो है नहीं इस विषय में''- मैंने कहा ।
वह जिद की मनुहार में बोली- ''नहीं आप ज्यादा अच्छा लिखते हैं । आप मुझे बोलिए मैं लिखूंगी।''
पत्र सामान्य संदर्भ में था । छात्र की किसी प्रतियोगिता के लिए छात्रों नाम भेजने थे । मैने लिखाया वनमाला ने लिखा । मैं वनमाला को निहारता रहा। कुछ भी तो नहीं बदला था। उसका वही गुमसुम उदास चेहरा । अनबोले भी बहुत कुछ कहतीं उन्हीं खोई आंखों की मुझमें समाई पड़ती वैसी ही भेदक दृष्टि। मैने सोचा कि ईर्ष्या भी कितनी चमत्कारिक होती है । अपना अबोलापन तोड़कर वनमाला का खुद ही मेरे पास चले आने की पहल मात्र मेरे लिखे संपादकीय के सांकेतिक प्रेमपत्र में निहित भावनाओं की अभिस्वीकृति थी । मैं चाहता था कि उसकी छाती पर सिर रखकर रोऊँ । लेकिन वैसा कर न सका । न जाने कितने द्वंदों से घिरी वनामाला उदास थी । संकेतों को जुबान वह न दे पाई । लिपि और ध्वनि रहित भाषा में उस दिन सारा कुछ छिपा कर भी वनमाला जैसे सारा कुछ कह गई थी और मैने सब सुन लिया था- ''तुम इतने उदास क्यों हो ? मुझे भी तुमसे उतना प्यार हैं, जितना तुम्हे मुझसे है । अनुराधा की बातों पर क्यों जाते हो ? तुम तो मेरे हो, केवल मेरे । मुझसे तुम्हें कोई नहीं छीन सकता । तुम मुझसे क्यों रूठ जाते हो । भले ही मैं तुमसे नहीं बात करती, मेरा दिल तो करता है । नादान पिया, तुम इतना तो समझा करो । मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ ? काश मेरी मजबूरियां तुम समझ पाओ।''

हां, यह भी वनमाला ही थी । वही वनमाला, जिसकी रहस्यमय खामोशी और अचानक प्रकट होनेवाली क्रूरता से मेरे प्राण निकल जा रहे थे । मुझे ऐसा अब लगता है कि उस दिन अनुराधा की मेरी तारीफ आकस्मिक नहीं थी । अवश्य मेरे पहुंचने से पूर्व वनमाला से अनुराधा की बात गुपचुप हुई होगी और वनमाला के ढ़ंडेपन के खिलाफ मेरे सामने ही मेरे लिखे की तारीफ सप्रयोजन की गई होगी । प्रयोजन या तो वनमाला के मन में ईर्ष्या जगाना रहा होगा या वनमाला के ठंडेपन को कोसना । रूठने और मनाने का यह खेल वनमाला के साथ मानो शाश्वत हो चला था । उसके दिल में क्या था यह समझना मुश्किल था । ऐसा लगता है जैसे स्त्री और पुरुष के बीच यह खेल प्रकृति से ही रचा गया है । स्त्री बचती है, भागती है, ठंडी बनी रहना चाहती है और पुरुष उसे समेटना चाहता है, उसका पीछा करता है और उसके गर्म होने का इंतजार करता हाय-हाय करता है । समाज का भय, नैतिक मर्यादाएं परिवार की उलझने चहारदीवारी की कैद, गर्भ का भय, और इन सब से ऊपर जॉंघो के बीच छिपी इज्जत को खजाने की तरह संभाल रखने की सीख स्त्री पर हमेशा हावी रहती है । यही कुछ होगे जो वनमाला के मन में बचाव और समर्पण के बीच द्वन्द और खीझ में समाए रहते थे । पशुओं के जगत में भी इसे आप ठीक वनमाला-वृत्ति के रूप में देख सकते हैं । मादा कभी पहल नहीं करती । कुत्तों और सांड़ों के झुंड अपनी मादाओं के पीछे भागते हैं । वे बचती हैं, भागती हैं, गुर्राती हैं, काटती हैं और बमुश्किल उन पर पीछे भागता नर सवार हो पाता है । मनुष्य की जात में समाज, परिवार और नैतिकता की बाधाएं हैं, लेकिन पशुओं के समाज में तो नहीं । फिर वैसा क्यों होता है ? शायद नर और मादा की प्रकृति के बीच यह भेद शाश्वत ही है ।
जब वनमाला अकेली होती, पकड़ में आती और घर के तनाव से मुक्त होती तब वह अच्छे से पेश आती । प्यार की बातों पर वह चुहल करती मजा लेती, तरसा-तरसा मन में और प्यास भरती थी । लेकिन जब अवसादग्रस्त और परेशान होती तो जुबान पर कोई नियंत्रण न रहता । इसी खेल के बीच एक रोज सुबह-सुबह मैं फिर फोन कर बैठा । किसी समारोह में एक रोज उसी के नगर रहकर ही लौटा था । वहां रहते ऐसा मन करता कि उसके घर घुस जाऊं, लेकिन ''मन का करना'' बस लाचारी ही है । न रहा गया तो दिल की बातें कहने की बेताबी में फोन लगा बैठा । मेरा अनुमान गलत था । वह घर से कालेज के लिए निकली तो न थी, लेकिन उसके मिस्टर घर पर ही थे । जरूर उसे फोन पर जाता देख उसने व्यंग्य किया होगा ।

वनमाला फोन पर जवाब देती एक दम मुझपर बरस पड़ी-'' बेकार फोन क्यों किया ? मैं कुछ सुनना नहीं चाहती पुरुषों से मित्रता में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं '',वगैरह ।
कालेज आती तो मेरे खीझे हुए मायूस चेहरे को उसकी आंखें शिकायत से घूरतीं । तुम ऐसी मूर्खता क्यों करते हो ? मेरे लिए मुसीबत क्यों खड़ी करते हो, मुझसे दूर क्यों नहीं हो जाते ? फिर दो-चार रोज में चीजें सामान्य हो जाती । संबंध यूं हो जाते कि जैसे कुछ हुआ ही न था ।



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नीलांजना ने फोन उठाया । कहा कि वनमाला मैडम आप को पूछ रही हैं, आप बात कीजिए ।
उस दिन मन में क्षीण सी इच्छा जागने पर भी मैने वनमाला से बात नहीं की ।



मेरी आकांक्षा थी कि वनमाला की कविता की शक्ल में बसी यादें मैं उसे सौंप दूं ताकि हमेशा वह याद रखे कि मैं उससे कितना प्यार करता हूं और उसने मुझे कितना तरसाया है । संग्रह तैयार हो छप चुका था उसका विमोचन विधिवत्‌ होना था । कालेज से बाहर जाकर मन बहले यह सोचकर रिसर्च के एक विशेष प्रोजेक्ट के बहाने इलाहाबाद जाने का मैने जुगाड़ कर किया था । इसलिए संकल्पपूर्वक मैं सुबह कालेज पहुंचा । ज्यों ही मिला, मैने वनमाला को कविताओं की वह पुस्तक सौंप दी । मैने उसे बता दिया कि यह तुम्हारी ही पुस्तक है- तुम्हारे लिए, जिसमें तुम ही हो । यह कि उसका विमाचन पहले मूलतः वह कच्ची पुस्तक के रूप में कर चुकी है और यह कि विधिवत विमोचन बाद में होगा । मैने उससे कहा कि यह मेरे प्यार का उपहार है । उसके नाम कविताओं की पहली प्रति है, जो सब से पहले मैं उसे ही अर्पित कर रहा हूं। पुस्तक में मैने चाहने के बाबजूद भेंट और प्यार के शब्द जानबूझकर नहीं लिखे थे क्यों कि तब उसे घर में पता चलने पर परेशा नी हो सकती थी । भूमिका सहित सारा कुछ ऐसे संकेतों में व्यक्त था जिसे वनमाला बखूबी समझती थी । हमारी आंखें मिलीं । उसके होठ खिले और एक झलक देखकर खुशी-खुशी वनमाला ने मेरा संग्रह अपने बड़े पर्स के हवाले कर दिया । उस दिन वह खुश थी । मैं अक्सर बड़े साहब की जगह प्रशासन के चार्ज में रहा करता था । शायद उस दिन भी ऐसा ही था । दो मिनट बाद भोला ने प्रवेश किया था । वनमाला ने एकाध वाक्य में उससे कामकाजी बात की होगी, लेकिन भोला को टालकर वह फिर बहानों से मुझसे बातों में मुखातिब हो गई थी । उसकी खुशी, उसके खिले चेहरे, उसके तृप्त मन से मैं रोमांचित भी था और दुखी भी । देर तक मैं सोचता रहा कि वनमाला के किस रूप पर मैं मुग्ध होऊँ और किस रूप पर दुखी ।
वनमाला के साथ प्यार और विग्रह, रूठने और मनाने का खेल बाधाओं के बावजूद चलता रहा था। फिर भी न जाने क्यों वनमाला का खिंचाव, उसका अप्रत्याशित चिड़चिड़ापन मुझमें मलाल पैदा कर रहा था। मेरे सारे गुणों, सारी अभिरुचियॉं, घरू संस्कारों के अकृत्रिम बीज उसी में हैं और वही मेरी संगिनी हो सकती है । फिर भी जब वह खुलकर सामने नहीं आ रही है, साथ देने तैयार नहीं होती तो क्यों न मैं भी उससे दूर रह अपनी पीड़ाओं से मुक्ति पा लूं ? मैं अक्सर सोचा करता कि प्यास मुझे उनकी ओर खींचती थी, लेकिन वनमाला हमेशा बीच में आ जाती थी । हम दोनों के भावनात्मक संबंध लगभग वैसे ही बन चले थे जैसे पति और पत्नी के होते हैं । हम सब- कुछ करेंगे- एक-दूसरे से नफरत, प्यार, झगड़ा, रूठना, मनाना लेकिन एक दूसरे पर अधिकार नहीं छोड़ेंगे, फिर चाहे कोई और कितने ही बीच में क्यों न आ जाएं । यह एक विचित्र बंधन था जो हमें बांधे था और जिसने हमेशा बांधे रखा था ।

संयोगवश उस खास अवसर पर मैं फिर प्रशासन के चार्ज में था जब की यह बात है । दूसरे दिन भादों के शुक्ल पक्ष की तीज का त्यौहार था। नीलांजना उस वक्त मेरे पास ठंडी बयार का सुख देती खड़ी थी । वनमाला का साथ जहां हमेशा उत्तेजना और बेचैनी छोड़ जाता था, वही नीलांजना का पास होना ओस की उन शीतल बूंदों का अहसास जगाता था जो दिल और दिमाग को राहत देती थी । नीलांजना से मेरा कभी पल भर के लिए भी मन मुटाव न हुआ । ऐसी बाल-सुलभ सरलता, ऐसा सहज खुलापन कि भावना और प्रेम के देखे-अदेखे संदेश भरी बातों के बावजूद कभी न उसे, और न मुझे यह अहसास हो पाता था कि हम एक-दूसरे को आकर्षित करने की चेष्टा में लगे हैं । इतनी सहज और अकृत्रिम चाहत जिसमें तनाव का कोसों दूर तक काम न था । हमने फोन पर न जाने जब-तब कितनी कैसी और कितनी देर तक बातें की होंगी । आटो रिक्शा में साथ-साथ चिपके बातें करते दूरियां तय की होंगी । भीड़ भारी बस की बोनट पर साथ चिपके और बतियाते रहे, कालेज में साथ बैठे घंटों काम किया, लेकिन हमेशा दिल और दिमाग को राहत देने वाली तसल्ली वहां हुआ करती थी । इसके विपरीत जिसे मैं दिल में बसाए था वह वनमाला प्रिया हमेशा न जाने क्यों मुझे केवल परेशान करती थी । वनमाला के मन को कभी मैं ठीक-ठीक नहीं पढ सका। उसे नीलांजना से भयंकर चिढ़ थी । पसंद तो वह किसी का भी मेरे पास फटकना नहीं करती थी लेकिन नीलांजना का मेरे साथ होना उसके लिए बर्दाश्त से बाहर था ।
उस दिन मेरे चैम्बर में भीड़-भाड़ नहीं थी । नीलांजना और मैं सहज नाम-मनुहार भरी बातें कर रहे थे । नीलांजना की बातों में ऐसी कशिश होती इतना सहज मनुहार होता कि अधिकार जैसा झगड़ा गायब हुआ करता था । उसका अनुरोध मैं या मेरा अनुरोध वह मान जाए या दिक्कतों के कारण नहीं माना जाए, तब भी ऐसी तसल्ली से चीजें खत्म होती कि न तो मैं रूठता था और न वह । अचानक फोन की घंटी बजी । नीलांजना से मैने कहा कि तुम ही फोन उठा लो । नीलांजना ने फोन उठाया । कहा कि वनमाला मैडम आप को पूछ रही हैं, आप बात कीजिए । उस दिन मन में क्षीण सी इच्छा जागने पर भी मैने वनमाला से बात नहीं की । मेरे मन ने कहा कि यूं सामान्य भी बात करना चाहूं तो सब के बीच वनमाला मुझे अनसुना कर देती है और अब फोन पर बात करने की अचानक सहज पहल ? मैने आश्चर्य प्रकट करते यह बात नीलांजना से साफ-साफ उजागर कर भी दी । उससे कहा कि तुम्हीं पूछ लो क्या बात है । नीलांजना के चेहरे पर झिझक आई । लेकिन मेरे इशारे पर उसी ने बात की । नीलांजना ने बताया कि वे पूछ रही है कि कल छुट्‌टी दे रहे हैं क्या ? उस समय बेरुखी दिखाता जवाब देना भी मैं टाल गया । मेरे मन को यह अनुभव कर राहत मिली कि मेरे निकट नीलांजना की कल्पना कर और मेरी तरफ से उसे फोन पर सुनकर जरुर वनमाला को ईर्ष्या हुई होगी । उसे यह अहसास होना चाहिए कि मैं उतना उपेक्षणीय नहीं हूं जितना वह समझती है । यह कि वनमाला नहीं तो क्या उसके अलावा मेरे साथ के लिए और भी हैं । वह अवसर इसका भी था कि नीलांजना पर यह प्रकट हो जाए कि वनमाला से मैं उतना बंधा नहीं हूं जैसा उसे लगता होगा ।
वनमाला के इरादे मेरे मन में न जाने क्यों संदेह भर रहे थे । मैं तब अक्सर सोचा करता और अब भी सोचता हूं कि यह कैसा खेल था, जिसमें एक दूसरे पर अधिकार की दावेदारी तो थी- लेकिन वह दावेदारी मेरी ओर से जहां प्यार और मनुहार में प्रकट होती थी, वहां वनमाला थी कि हमेशा विग्रह, रोष और ईर्ष्या से मुझे चोट पहुंचाकर तसल्ली पाती प्रकट करती थी । स्टाफ के बीच हमेशा मुझसे तो वह अबोली रहती , लेकिन सेवकों से प्रोफेसरों तक सभी से बातचीत में सहज और निर्द्वन्द हुआ करती थी ? वह इस तरह हुआ करता कि मेरे लिए उसकी प्रकट उपेक्षा और मुझसे संबंधों में उसकी कड़वाहट सारी भीड़ की नजरों में रही आती थी । संबंधों में मेधा में, विचारों और भावनाओं में वह सब से करीब मेरे थी, लेकिन मेरे सामने आकर खड़ी होती और छोटी-छोटी बात पर राय किसी और से लेती थी । मकसद ऐसा दिखाई पड़ता जैसे वह जानबूझकर लोगों पर प्रकट करना चाहती है कि इस आदमी से मुझे नफरत है, इससे मेरा कोई संबंध नहीं है, यह मेरे लिए उपेक्षणीय है । यह विचित्र बात है कि वनमाला ने कभी न सोचा कि उसके ऐसे बर्ताव से मेरे दिलो- दिमाग पर क्या गुजरती थी । उसके लिए में खिलौना था । जब चाहा खेला, जब चाहा तोड़ दिया । इन हालातों में अक्सर मेरे मन की कड़वाहट और ईर्ष्या अचानक जाग पड़ती थी । ऐसा ही उस दिन भी हुआ था। बाधाओं के बावजूद आंखों और भावनाओं के अदेखे-देखे संकेत समझौते की जो भाषा हममें बन रही थी वह अचानक और अनचाहे मेरी गलती से मेरे और वनमाला के बीच उग्र कटुता में बदल गई थी ।



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आप को तो बस हमेशा यूं ही डर लगा रहता है

क्या वनमाला का व्यंग्य उस उपेक्षा का प्रतिशोध था
जो पिछले दिनों पर बा-रास्ते नीलांजना फोन की डोरियों से वनमाला को भेज दी थी ?



हां, उस रोज गलती मैने ही की थी । परीक्षाएं चल रही थीं । मार्च का महीना था । यदा-कदा जहां अवकाश निकले सुबह के लोगों को शाम की परीक्षाओं में बुलाने की नीति बनी थी । सुबह वनमाला की एक झलक देखने का भी अवसर भी दुष्कर था । वह सुबह आती, मैं दोपहर को बाद में पहुंचता । यूं ही ड्‌यूटियों में यदा-कदा शाम उसकी झलक देखकर भी मेरे मन को राहत पहुंचती थी । उस दिन दोपहर बाद वह आई और मुझे अनदेखा कर मेरे सहायकों से मनुहार में लग गई कि अगले दिनों में उसकी शाम की ड्‌यूटी काटकर बदल दी जाए । वनमाला लोकभय से इतना सहमती थी कि बाधा समझे जाने वाले किसी गैर के सामने मुझसे आंख तक नहीं मिलाती थी फिर बात की बात तो दूर रही । पर न जाने क्यों तब मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो चली थी ?
मैं उस वक्त परीक्षा का सर्वोपरि अधिकारी था । मुझे अनदेखा कर, अबोला रख भोला और सत्यजित के सामने गिड़ागिड़ाकर वनमाला को अपनी जगह किसी जूनियर काम-चलाऊ लड़की का नाम रख देने का आग्रह उनसे करता पाकर मेरा अहंकार जाग उठा । हां, दरअसल वह मेरी उपेक्षा ही थी । भोला और सत्यजित उसे तसल्ली देते उससे सहानुभूति दर्शाते राजी हो ही रहे थे कि मैं बरस पड़ा । नाराजगी दिखाते हुए मैने कहा कि अधीक्षक मैं हूं और आश्वासन देते सहानुभूति बटोरनेवाले, ड्‌यूटी बदलने वाले बीच के ठेकेदार अन्य बन गए हैं । सीनियर की अपनी गारिमा है ड्‌यूटी सोच समझकर लगाई गई है । तुम क्यों नहीं आ सकतीं ? मैने कहा- तुम्हारे होने का अपना महत्व है, वह लड़की तुम्हारी जगह कैसे आएगी ?
मेरे बरसने में भी वनमाला के लिए प्रशंसा का भाव कायम था, लेकिन वनमाला के मन में तो कुछ और ही था । सहायकों की आंख में झांकती व्यंग्यपूर्वक उसने मुझ पर चोट किया ''गरिमामय उपस्थिति ! अच्छा ?'' मेरी ओर लक्ष्य कर उसने कहा ''मेरी ही उपस्थिति पर लोगों का ध्यान क्यों रहता है ? औरों पर क्यों नहीं ? यहां तो हमेशा ड्‌यूटियां दसों साल से बदली जाती हैं । मेरे साथ ही नई बात क्या हो गई ?''
क्षोभ से तिलमिला कर मैने भी व्यंगयपूर्वक पलटवार किया- ''हां हैं कुछ लोग जिनके कारण ही तो सारी व्यवस्था चौपट हो गई है । वही तो तुम्हारे शुभचिन्तक और परामर्शदाता हैं, मैं तो मूर्ख ही रहा आया।''
संकेतों में बेवफाई और चालूपन का मेरा ताना वनमाला को जा लगा । उसने मेरी ओर देखा । उसकी आंखों में शिकायत और आंसू की बूंदे थी । मेरे गुस्से ने सारा माहौल खराब कर दिया था । वनमाला की उपस्थ्ति पर मेरे आग्रह का अर्थ प्रकट हो चुका था । फिर किसी ने कुछ न कहा और वनमाला उसी तरह नम आंख के साथ यह कहती चली गई कि न जाने मेरे ही मामले में ये सब बातें क्यों उठती हैं ? सारा कुछ गुजर जाने के बाद मैं यह सोचता रहा कि क्या वनमाला का व्यंग्य उस उपेक्षा का प्रतिशोध था जो पिछले दिनों पर बा-रास्ते नीलांजना फोन की डोरियों से वनमाला को भेज दी थी ?


उन गर्मियों में परीक्षा के बाद फिर बड़े साहब के छुट्‌टी पर जाने पर मैं उनकी जगह काम करता रहा । बाहर मेरे काम से, व्यवहार से, कहीं भी यह प्रकट न होता था कि मेरा मन कितना टूटा हुआ है और दुखी है । पुरुष हों या स्त्रियॉं स्टाफ में मेरी छबि मिहनत और लगन से काम करने वाले की थी । एक-दो को छोड़ मुझसे सभी के संबंध अच्छे थे । वनमाला ही थी जिसके व्यवहार और जिसकी मुद्राओं से, उसकी उपस्थिति से मैं अचानक सब से कटा और अवमाननित महसूस करता था । निश्चयतः हमारे संबंधों के बीच उठती-गिरती तरंगों को लोग भी पढ़ और देख रहे थे, लेकिन वह शायद मर्यादा ही थी जो लोगों को मुझसे सीधे इस बारे में बात करने से रोकती थी । जून के आखिर में मेरा इरादा चंद लोगों को उनकी छुटि्‌टयों से पहले बुलाने का था ताकि नए सत्र में छात्रों की प्रवेश संबंधी कुछ तैयारियां पूरी हो जाएं । संभावित चंद लोगों में वनमाला मेरे ध्यान में सर्वोपरि थी । उससे मेरे संबंध पारस्परिक अधिकार-भावना और प्यार से जुड़े थे । सार्वजनिक रूप में जो घटता था, वह निजी एकांतिक मुलाकातों में बेहद आत्मीय और व्यक्तिगत में बदल जाता था । मैं चाहता था कि हफ्ते दो हफ्ते सही हम निर्विघ्न भयमुक्त होकर साथ बैठें और प्यार की बातों से झगड़ों की भरपाई करें । वनमाला से इन दिनों कभी मैने यह बात कह भी दी थी । अचानक एक दिन फोन की वह खास घंटी बजी जिसके लिए मैं तरसता था । दोपहर का समय था । वनमाला की आवाज में संकोच रहित खनक थी । जरूर मूड अच्छा रहा होगा और फोन पर लाइन क्लीयर थी । उसने पूछा- ''आप ने छुट्‌टी से एक हफ्ता पहले बुलाने की बात कही थी । आज मैं आप के बुलावे का इंतजार कर रही थी, लेकिन आप की तरफ से न कोई संकेत न सूचना । बुला रहे हैं ना ?''
मैने कहा- ''हां, मैं चाहता था कि अपने विश्वास के खास एक दो लोगों को बुलाऊँ जो वनमाला और मेरे बीच बाधा न बने । बेमतलब की भीड़ का मैं क्या करूंगा ? लेकिन फिर डर लगता है कि खास तौर पर तुम्हें मेरे साथ पाकर लोगों की उंगली न उठे ।''
''आप को तो बस हमेशा यूं ही डर लगा रहता है'', वनमाला ने कहा ।
मैने वनमाला को सुझाया- ''तुम तो ऐसे ही किसी बहाने यहां आ जाओ । तुरन्त आदेश बना लिया जाएगा और छुट्‌टी का लाभ मिल जाएगा ।''
नखरों का जखीरा वनमाला के पास था । मुझे प्रतीत होता है कि इन तत्वों का पुरुषों को खीचने में अपना महत्व होता है । शायद इसीलिए मैं वनमाला के प्यार की डोर से बंध गया था। ऐसा नहीं कि नीलांजना यह जानती नहीं थी । उसे अच्छी तरह आभास था कि मैं उसका साथ चाहता हूं, उससे प्यार करता हूं । लेकिन वह थी कि बजाय मुझसे रुठने, झगड़ने, मुंह फुलाने के खुद ही मैदान छोड़कर मुझे वनमाला की ओर ढकेलकर भाग जाती थी । अक्सर अपने और मेरे बीच दखल देती रोष भरी आंखों से धमकाती वनमाला को अनेक अवसरों पर नीलांजना ने देखा है- लेकिन एक विवश, मौन उदासी के अलावा जो क्षणिक हुआ करती थी, नीलांजना ने कभी चेष्टा नहीं कि वह अपने वर्षों साथ निभाते पुराने खिचड़ी-पार्टनर को छीन ले । नीलांजना की इस सहज समर्पित सरलता पर मुझे अफसोस रहा है और हमेशा रहा आएगा । अगर वह अपनी शिकायत को स्वर दे सकती तो शायद यह कहानी न बनती जो मेरे लिए दर्द की दास्तान बन गई ।
वनमाला के साथ दिल की डोर इस कदर बंध गई थी की उसकी गांठ को खोल पाना मेरे लिए असंभव था और हमेशा रहेगा । उसके पीछे का कारण यह था कि एक दूसरे के दिलों में चाहत की भाषा हम दोनों में बाकायदा संवाद बन चुकी थी । निम्न-मध्यवर्ग की पारिवारिक पृष्ठभूमि, घर के संबंधों की टीस, दिल और दिमाग में अद्‌भुत समानता, प्रतिभा का मिलन और फिर प्रथम दृष्टि से ही बंधे प्रेम और साथ की यादें ऐसे पुल का काम करती थी जो परिस्थितियों और चित्त में छाई घनघोर घटा के बीच बिजली की तरह कौंध-कौंध कर हमें जगा देती थीं । यही वह रहस्य है जिसने विपरीत परिस्थितियों और कड़वाहट के बीच भी प्यार ही प्यास हममें जगाए रखी है । मैं जानता हूं कि जब दिलों पर छुपी यह गाथा कागज पर उतर रही है, तब भी वनमाला के मन की तरंगों को वह उसी तरह उद्वेलित कर रही है जिस तरह मैं उन्हें प्रतिपल संजोए हुए हूं । बहरहाल होनी में जो लिखा था, वह हुआ । मैं निरंतर देख रहा था कि वनमाला के मुझसे संबंधों में वह गरमी नजर नहीं आती थी जो तब थी, जब हम दोने झगड़ कर अलग हुए थे । दोनों में अद्‌भुत अपार स्वाभिमान कि न वह झुकेगी और न मैं झुकूंगा, भले हम टूट क्यों न जाएं । दोनों को यह आभास कि भौतिक दूरियों के बावजूद हमारे दिल एक-दूसरे को छोड़कर नहीं जा सकते । उसे मालूम था कि हमारे साथ का, खासकर मेरे लिए उसके साथ का विकल्प कोई और हो ही नहीं सकता । फर्क केवल इतना कि वह निःशर्त समर्पण और एकाधिकार चाहती थी और मैं था कि उसे सहज समर्पित था । उसमें इस बात को लेकर गहरी ईर्ष्या थी कि मैं औरों के आकर्षण और प्रशंसा का केन्द्र क्यों कर बन जाता हूं ? औरों को मेरे निकट आता देख वह अपनी वितृष्णा, अपना गुस्सा कभी न छिपा पाई । उसे इस बात का विश्वास कभी नहीं रहा कि मैं उसी का और केवल उसी का हूं ।
बावजूद इसके कि सुबह के दौरे से अलग हुए लंबा अरसा बीत चला था और मैने बहुत देर से पहुंचना शुरू कर दिया था, मैं बस से रोज इसी उम्मीद से ग्यारह बजे कॉलेज पहुंचता कि दूरी के संबंध सही, अपनी प्रिया की एक झलक देखकर ही मेरा दिन कृतार्थ हो जाएगा । वैसा होता भी । दोनों की रहस्यमयी नजरें उठतीं, मिलतीं और गिनतीं, लेकिन होठ सिले रहते । फिर मैने पाया कि धीरे-धीरे उनमें कहीं शिकायत, रोष और वितृष्णाकी छाया भी शामिल होने लगी हैं । वह यूं मुह बनाती कि जैसे उससे मुझे कोई मतलब नहीं है । अक्सर यूं होता कि समुदाय में अकेले चहचहाने के बीच यदि हममे से दूसरा पहुंच जाता तो होंठों पर चुप्पी के उदास ताले लग जाते थे । वनमाला के रुख मे इस कदर बदलाव की कल्पना भी मेरे लिये दुष्कर थी। मैं विस्मित था।



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मेरे और भी दीवाने हैं, कद्रदां हैं । अपना प्रेम लेकर तुम बैठे रहो


मेरे मन में होलिका, तेरे दिल में रंग।
मेरी आंखें ग़मजदा, तुझमें भरा उमंग॥
सांस तरसती चीखती, मुझे लगा लो अंग ।
जानम तुम्हें पुकारता जनम-जनम का संग ॥ -मौलिक



अचानक वह दिन आया जब मैंने जाना कि क्या हो गया हैं वे नये साल में परीक्षाओं के दिन थे । फरवरी का अंतिम सप्ताह था । परीक्षाएं हौले-हौले आरंभ हो चुकी थीं, लेकिन होली के कारण दो-तीन दिन छुटि्‌यों जैसे माहौल के थे क्योंकि उन दिनों परीक्षाएं नहीं थीं । शनिवार का दिन था और दूसरे रोज होली जलनी थी । रंग, गुलाल और फिर धड़ल्ले से बिकती शराब के बदरंग माहौल के भय से लोग खासकर स्त्रियॉं अघोषित छुटि्‌यॉं मार लेती थी । घर में मेरा मन न लगता था और कालेज मेरे लिए वनमाला का पर्याय था । इस ना-उम्मीद संभावना से कि शायद वनमाला आए, मैं अपने समय से कालेज पहुंच गया । वनमाला की यादों में मैं दिन-रात खोया रहता था । अदृश्य ईश्वर से मैं मनाया करता कि उससे एकांत में मुलाकात के अवसर मुहय्या कराये ताकि दिल की बातें तफसील में हो सकें । मेरी उदास आंखें विस्मित चमक से भर उठीं जब मैने पाया कि उस दिन शिक्षकों में अकेली वनमाला पहुंच बंद खिड़कियों की अधनीम रौशनी में वनमाला बैठी हुई हैं । उसने मुझे आता देखा, मुझसे नजरें मिली और एक हल्की सी मुस्कुराहट उसके होठों के एक कोने पर उभरी । उस दिन मैने लक्ष्य किया कि उस मुस्कुराहट में स्वागत का उल्लास नहीं था, केवल एक विद्रूप भाव था । मैने बातों की पहल की ही थी कि वह ‘हां-हूं’ करती अपने बड़े काले पर्स से कपियों के लाइन वाला दोपन्ना निकालकर नजरें दौड़ाने लगी । उसकी आंखों में वह चमक और मुस्काराहट अब मैने देखी जिसकी पहले मैने ख्वाहिश की थी ।
मैने पूछ ''क्या पढ़ रही हो ? कुछ विशेष है क्या ?
''कुछ नहीं बस यूं ही''- उसने कहा ।
जैसे इस भय से कि मैं उसे बातों में न लगा लूं, अचानक उसने वे पन्ने पर्स में डाले और पर्स उठा दफ्तर में जाकर बैठ गई । आहत मन अपनी तकदीर को उसकी बेरुखाई पर कोसता किं-कर्तव्यविमूढ़ अकेला बैठा रहा । मुझे उम्मीद थी कि शायद कोई छोटा-मोटा काम हो और वह यहां लौट आएगी । लेकिन नहीं, दफ्तर में मजबूरी में पहुंचे दो-तीन बाबू-चपरासियों और एकाध अन्य के बीच तकरीबन आधा घंटा बैठकर वनमाला लौटी । मैने बाहर निगाह डाली तो पाया कि उसके विषय का सहकर्मी विपुल अपने बच्चे को साथ लिए स्कूटर से उतरा था । उसने मुझे देखकर भी जैसे न देखा था। वनमाला से औपचारिक एक-दो, न करने के बराबर बातें की और जैसे आंखों के संकेत हुए, बच्चे को अपनी अंगुली थमाए विपुल और अपना पर्स उठाए उसके पीछे-पीछे वनमाला चल चली । कैम्पस के बाहरी गेट तक के सौ कदम स्कूटर ठेलते विपुल और उसके विपुल पीछे चलती वनमाला ने तय किए । सड़क पर आकर पहले स्कूटर यूं मुड़ा जैसे विपुल पीछे अपने घर लौटने को हो । लेकिन नहीं, अचानक स्कूटर ने पल तकरीबन आधा घंटा कर वनमाला की राह की दिशा में रुख कर लिया। सामने बच्चे को खड़ा किए, पीछे वनमाला को बिठाए विपुल का स्कूटर फुर्र हो गया था। वनमाला की बेरुखी का रहस्य मेरे सामने उजागर हो गया था । उसकी आंखों में लाचार उदासी में बोलती वफादारी अब बेशर्म बेवफाई में बदल गई थी । मेरी आंखों में अतीत के दृश्य एक-एक कर आए और चले गए । यह वही आदमी था, जिसे अपने घर और मेरे प्यार के बीच पशोपेश में फंसी वनमाला ने भय से विश्वास में लेकर मेरे दीवानगी भरे फोन की बात कह दी थी । यह वही आदमी था जिसने नीलांजना के प्रसंग में वनमाला से मेरी झूठी शिकायत कर भड़काया था । यह वही आदमी था, जो सुबह का दौर छोड़ने से पहले ही वनमाला के मन में इस बात से जहर भर रहा था कि मेरा वनमाला से तआल्लुक दिखावा है और दरअसल तो मैं नीलांजना और दीगर औरतों के चक्कर में पड़़ा रहता हूं । यह वही आदमी था, जो वनमाला को यह पढ़ा रहा था कि उसे मुझसे कैसे दूर रहना चाहिए ? यह कि वनमाला मेरी ओर देखना किस तरह टाल दे ? यह कि जहां मैं रहूं वहां से उठकर वह किस तरह चली जाए ? यह कि मेरे साथ वह काम न करे । यह कि जहां मेरे रहने की संभावना भी हो, वह कामों से कैसे मुंह मोड़ जाए या ड्‌यूटियाँ बदलवा लें । यह वही था जिसने मेरे और वनमाला के बीच दरार पैदा करने की मुहिम चलाई और बाकायदा मुझे काम की सुबह की पाली छोड़ने बाध्य किया था । मुझे अनुराधा की कही बात भी याद आई कि आप इन्हें जानते नहीं। ये लोग खुाद हम कला-संकाय वालों की बुराई करते हैं और लड़कों-लड़कियों को अपनी कक्षाओं के बाद भगा देते हैं । यही वह था, जो वनमाला के ही नहीं छात्रों के मन में भी मेरे विरुद्ध जहर भरा करता था। उस दिन यह साबित हो गया कि वह अपना काम कर चुका था । वनमाला के मन में मेरे विरुद्ध जहर भरने का उसका मकसद पूरा हो चुका था । मुझे भयानक सदमा लगा । यह वही आदमी था, जिसे वनमाला नाकाबिल और चालू किस्म का व्यापारी दिमाग वाला समझ जिसकी बुराइयाँ करती, उसके खिलाफ मुझसे सलाह मॉंगा करती थी ।
उस रोज मुझे अनदेखा करती वनमालां बेझिझक उठकर, उस आदमी के पीछे इस तरह चली गई थी, जैसे अब तक उसी की प्रतीक्षा में वह बैठी रही आई थी। सब-कुछ जैसे पूर्व नियत था । यह वही वनमाला थी, जिसकी आंखें हजारों झगड़ों और घर के संकटों से उभरे रोष और नाराजगी के बावजूद मुझसे मिलते ही उदास संकोच और शिकायत से टकराया करती थी और भारी भीड़ के बावजूद मुझसे बातें करती थी । उस दिन उन आंखों में संकोच और पशोपेश की वजह बेहयाई और घमंड था । मानों उनमें अलिखित संदेश छिपा था-
''तुम अपने आप को समझते क्या हो ? तुम्हें पूछता कौन है ?'' उस दिन मेरी पीड़ा का मजा लेती उन आंखों में मानो खास तौर पर ईर्ष्या भरा अहंकार छिपा था, जो कह रहा था- '' अच्छी तरह देख लो कि मेरे और भी दीवाने हैं, कद्रदां हैं । अपना प्रेम लेकर तुम बैठे रहो ।''
उस खास दिन जब मैं चुटकी भर चूड़ी (होली का लाल रंग) रंग ले गया था कि अगर मौका मिला तो वनमाला की मांग में आज उसे इस तरह बिखेर दूंगा कि नहाने के वक्त उसका पूरा शरीर मेरे प्यार के रंग से रंग जाए । मैं उससे साफ तौर पर कहूंगा कि रुठी रानी, मेरे प्यार का रंग अब भी वैसा है, तुम बेरुख क्यों हो ? तुम्हारे सारे संदेह बेबुनियाद हैं और यह कि मेरे दिल की रानी तुम्हीं हो, तुम्हारे रंग के सिवा मेरी आंखों में किसी का रंग नहीं चढ़ता-लेकिन नहीं, उस दिन उस रंग को प्रिया वनमाला मेरे प्यार की होली की राख बनाकर छोड़ चली थी ।
मुझसे निगाह फेरती निगाहों में उस दिन मानों प्रतिशोध में विजय का गर्व छिपा था, जिसमें यह संदेश था कि देख लो, अब मुझे प्यार के सहारे की जरुरत ही नहीं है । मैं तुम्हारे बगैर अकेली नहीं हूं । दूसरा सहारा खुद मुझे ढूंढ़ता चला आया है । मैं कम नहीं, कमजोर नहीं । यह संदेश था कि अब तुम अतीत पर आंसू बहाते अपनी आकांक्षाओं की राख मले मेरी प्रतीक्षा करते बैठे रहो, मैं चली और अब लौटकर नहीं आने वाली हंी । भयावह उपेक्षा, निराशा और अवसाद से मेरे चित्त में उठती तरंगों में अतीत की स्मृतियों के अनेक रंग एकबारगी उठते-मिलते-मिटते गड्‌डमगड्‌ड हो रहे थे । अब यह तय हो गया था कि जो दुर्घटनाएं मेरे साथ घट रही थी, उनमें केवल उस विपुल का हाथ ही नहीं था, उसके साथ वनमाला की प्रेरणा और इच्छा
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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