शादी की रात

Jemsbond
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शादी की रात

Postby Jemsbond » 05 Jul 2016 17:38

शादी की रात

शाम पाँच बजे, नोयडा सिटी सेन्टर माॅल
‘बोल वन्दना क्या आफत आ गई? बार बार क्यों फोन कर रही है?’, पूर्वा ने झल्लाये स्वर में फोन पर कहा।
‘तू बार-बार फोन क्यों काट रही थी? कहीं स्पेषल तैयार हो रही है क्या?’
‘मैं मूवी देख रही हूं। तेरा बार-बार फोन आ रहा था इसलिए बाहर आई हूं और ये स्पेषल तैयार क्या है? तेरी बारात आ रही है क्या?’
‘मेरी क्यों आयेगी? और……’
‘तो?’, पूर्वा ने बात काटी।
‘…..और तू मूवी देख रही है! आज बेला की षादी है और तू मूवी देख रही है?’, वन्दना का आष्चर्यमिश्रित स्वर उसके कानों में पड़ा।
‘दोबारा बोल, किसकी षादी हो रही है?, पूर्वा ने उलझनपूर्ण स्वर में पूछा।
‘बेला की। बेला की षादी हो रही है। तेरी बड़ी बहन की। तुझे नहीं पता क्या?’
‘दिमाग खराब हो गया क्या तेरा। दोपहर में वोदका मत पिया कर, दिमाग खराब हो जाता है।’
‘वोदका, रम, बीयर सारी चीजें तू पी के बैठी है, जो तुझे नहीं पता कि आज बेला की षादी है।’, वन्दना की तीव्र आवाज उसके कानों में पड़ रही थी।
‘तू सच कह रही है क्या?’, पूर्वा धीमे और अनिष्चय स्वर में बोली।
‘मैं तुझसे क्यों झूठ बोलूंगी। मैं बेला के साथ आई हूं ब्यूटी पार्लर में। वो अन्दर तैयार हो रही है।’, वन्दना अभी भी हैरानी से बोल रही थी, ‘तुझे सचमुच नहीं पता कि आज उसकी षादी है?’
पूर्वा से कुछ कहा नहीं गया लेकिन उसने इन्कार में गर्दन हिलायी। उसे ये भी ध्यान नहीं था कि उसकी हिलती गर्दन वन्दना को नहीं दिखाई देगी।
‘पूर्वा?……पूर्वा? सुन रही है?’, वन्दना का व्याकुल स्वर उसे सुनाई दिया।
‘मैं तेरे से बाद में बात करती हूं……….’, उसका स्वर रुआंसा सा हो गया और उसने फोन काट दिया।
उसे एकाएक समझ नहीं आया कि वह क्या करे? सिनेमा हाॅल के बन्द दरवाजे के पास वह खड़ी थी। वह गौतम के साथ ‘बदलापुर’ मूवी देखने आई थी। उसने एक बार बन्द दरवाजे को देखा और फिर बाहर की ओर चल दी। सिनेमा हाॅल के बाहर माॅल के काॅरिडोर की रेलिंग के पास जाकर वह रुक गई। उसे गहरा आघात लगा था। उसे सूझ नहीं रहा था कि वह सबसे पहले किसे फोन करे? बेला को? अपनी मां को या पिता को? वे लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं कि आज उसकी बहन की षादी हो रही है और उसे बताया तक नहीं। वन्दना, जो उसकी कजन है, तक को पता है यानि सबको पता है सिर्फ उसे छोड़कर। माॅल की तीसरी मंजिल से वह नीचे की चहल-पहल को देखते हुए भी नहीं देख रही थी। आखिरकार, उसने बेला को फोन लगाया। घण्टी जाती रही, जाती रही लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। गुस्से और निराषा ने उसके चेहरे पर अपना अधिकार जमा लिया। फिर उसने अपनी मां को फोन लगाया। मां ने भी फोन नहीं उठाया।
‘अब पापा को करूं?’, वह खुद से बोली।
उसने फोन की स्क्रीन अपनी आँखों के आगे की ही थी कि गौतम का फोन आ गया। वह अभी उससे बात करने की स्थिति में नहीं थी, उसने फोन काट दिया।
उसने वापस वन्दना को फोन लगाया।
‘हां बोल?’, उसे वन्दना की आवाज सुनाई दी।
‘अभी दीदी कहां है?’
‘उसका मेकअप चल रहा है।’
‘षायद तभी मेरा फोन नहीं उठा रही है। तूने उसे बता दिया कि तेरी मेरी बात हुई है?’
‘नहीं। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि नहीं बताना चाहिए।’
‘तू मेरी उससे बात करा सकती है?’, पूर्वा ने संयत स्वर में कहा।
दूसरी ओर खामोषी रही।
‘क्या हुआ?’
‘यार, मैं सोच रही हूं कि बात कराना ठीक रहेगा क्या? ऐसे तो उसे पता चल जायेगा कि मैंने तुझे षादी के बारे में बताया है तो…..तो मेरा क्या होगा? पता नहीं उन लोगों ने क्या सोचा हुआ है?’, वन्दना का चिन्तित स्वर उसे सुनाई दिया।
‘तू सही कह रही है। रहने दे।’, उसने कहा।
‘वैसे, ये तो गलत बात है कि सगी बहन की षादी है और तुझे न बताया गया और न बुलाया गया। एंगेजमेन्ट वाली कहानी रिपीट न हो षायद इसलिए तो नहीं……..। तू कहां है अभी, नोयडा में?’
‘हां, और कहां होऊंगी?’, उसका स्वर हल्का सा रुआंसा हो गया।
‘अब तू आ रही है क्या?’, वन्दना ने षायद उसके रुआंसेपन को महसूस किया क्योंकि उसकी आवाज भी भीगने लगी थी।
‘पता नहीं। वैसे षादी हो कहां रही है? घर पर या कहीं और?
‘कापसहेड़ा के एक फार्म हाउस में। नाम मुझे ध्यान नहीं है। मैं बाद में तुझे वेन्यु मैसेज कर दूंगी।’
‘ओके पर ये सीक्रेट रहेगा कि तेरी मेरी बात हुई है।’
‘बिल्कुल। और मैं क्यों कहूंगी?’, वन्दना ने आष्वासनपूर्ण स्वर में कहा। उसकी चैन भरी सांस भी पूर्वा को सुनाई दी।
जब पूर्वा ने फोन काटा तो गौतम उसके सामने खड़ा था। उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर वह धीरे से बोला, ‘क्या हुआ? एनीथिंग सीरियस?’
पूर्वा ने सहमति में गर्दन हिलाई।
‘क्या?’, कहते हुए उसने ढेर सारी बातें सोच ली।
आज बहुत दिनों की कोषिष के बाद गौतम पूर्वा को राजी कर पाया था। पहले मूवी का प्रोग्राम था फिर उसके बाद वह उसे अपने फ्लैट में ले जाने वाला था जहां उसने सिर्फ दोनों के लिए पार्टी का इन्तजाम किया हुआ था और आखिर में उसे रात को रुकने के लिए भी राजी कर लिया था। उसे सिर्फ रात का इन्तजार था मगर अब ‘क्या’ कहते हुए उसे लग रहा था कि प्रोग्राम खटाई में पड़ चुका है।
‘मुझे अभी घर जाना पड़ेगा?’, पूर्वा ने अपराधी भाव से कहा।
‘और पार्टी का क्या होगा?’ और इस फिल्म का?’, गौतम झल्लाते हुए बोला।
‘मैं रुक नहीं सकती, बहुत अरजेन्ट है यार।’, उसका स्वर रुआंसा हो उठा।
‘कुछ बतायेगी?’, गुस्से को मुष्किल से काबू करते हुए उसने पूछा।
‘लम्बी कहानी है, मैं तुझे आकर बताउंगी। मुझे जल्दी से हाॅस्टल छोड़ दे।’
‘यार, मूवी तो देख ले। बहुत इन्ट्रस्टिंग मूवी है।’
‘अरे नहीं रुक सकती। अगली बार मैं तुझे दिखा दूंगी। अब चल जल्दी।’, पूर्वा एस्केलेटर की ओर बढ़ी।
गौतम ने कुछ नहीं कहा और मरी हुई चाल से उसके पीछे चलने लगा। साला, लक ही खराब है। यहां टिकट के पैसे और वहां दारू के पैसे सब बरबाद गये।
‘क्विक यार।’, पूर्वा उसकी ओर मुड़कर चिल्लाई।
षाम सवा पाँच बजे, राजौरी गार्डन, दिल्ली
रीता अपना फोन चैक कर रही थी। तीन मिस काॅल थी जिनमें एक पूर्वा की थी। तो क्या उसे पता चल गया? उसका दिल जोर से धड़का। वह फौरन बाहर की ओर भागी। बाहर बरामदे में आकाष फेरों पर दिया जाने वाला सामान पैक करा रहा था।
‘सुनो।’, रीता विचलित स्वर में आकाष से बोली।
‘बोलो।’, बिना रीता की ओर देखे आकाष ने कहा।
‘पूर्वा की मिस काॅल है मेरे फोन पर।’, रीता आगे को झुकी और इतने धीमे स्वर में कहा कि वहां मौजूद अन्य लोग न सुन सकें।
पूर्वा का नाम सुनते ही आकाष रुक गया। ‘तुम अन्दर चलो मैं आता हूं।’, आकाष ने भी धीमे स्वर में कहा।
कुछ क्षण बाद।
‘हमें उसे बता देना चाहिए था। मुझे लगता है उसे मालूम हो गया है।’, रीता व्याकुल स्वर में बोली।
‘कैसे मालूम हो गया? सिर्फ काॅल आने से?’, आकाष ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता।’
‘मैं बुला लूं अब उसे? तुम्हें कुछ कहे न कहे मुझे सारी जिन्दगी कहेगी वो। मां जो हूं।’
‘देखो, इस बारे में हम पहले ही फैसला कर चुके हैं। दूध का जला हूं मैं, पता है न पिछली दो बार क्या हुआ था। पूर्वा को देखते ही दो रिष्ते टूट गये थे और एक तो ऐन सगाई के समय। मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। और तो और अब तो खुद बेला भी नहीं चाहती कि पूर्वा आये।’, आकाष दृढ़ता से बोला।
रीता असहाय थी। पूर्वा के कारण बेला के दो रिष्ते टूट गये थे। लड़के वाले पूर्वा को देखते ही पूर्वा की बात करने लग जाते थे। बेला को कोई पसन्द ही नहीं करता था। इसलिए कुछ मौकों पर पूर्वा को बिना बताये बेला की दिखाई की जाती थी। पूर्वा को नोयडा पढ़ने भेजना भी रणनीति का हिस्सा था। दूर रहेगी तो कोई अड़चन नहीं आयेगी।
पिछली बार जिस दिन बेला की सगाई थी, पूर्वा को उसी दिन बुलाया गया था। मगर पूर्वा का परिचय मिलते ही बेला के होने वाले पति ने उसी दिन रिष्ता तोड़ दिया क्योंकि उसका कहना था कि उसके साथ धोखा हुआ है, पूर्वा को पहले क्यांे नहीं दिखाया गया। पूर्वा भी हैरान थी लेकिन क्या करे? अगर चारों भाई बहनों को एक साथ खड़ा कर दिया जाये तो वह अलग ही एलियन की तरह लगेगी या टाट में मखमल की तरह। उसकी खूबसूरती ही सबकी दुष्मन बन गयी थी।
‘अब…………..?’, रीता के मुँह से धीरे से निकला।
‘दिल पे पत्थर रखो। उसे कल बता देंगे।’, आकाष ने समझाने वाले भाव से कहा।
‘और अगर वह आ गई तो?’
रीता के इस कठोर प्रष्न का उत्तर उसके पति के पास नहीं था। वह बिना कुछ कहे बाहर चला गया।
षाम साढ़े पाँच बजे, एमिटी विष्वद्यिालय, नोयडा
पूर्वा चाहती थी कि गौतम उसके साथ दिल्ली उसके घर चले लेकिन पूर्वा ने उसे साथ चलने के लिए कहा नहीं। उसे तब और दुख हुआ जब गौतम ने भी कुछ नहीं कहा। क्या भाग्य है, आज तो कोई भी उसके साथ नहीं है। उसे मालूम है, गौतम काफी हद तक सैलफिष लड़का है। अभी वह उसके साथ मौज मस्ती करने के लिए राजी हो जाये तो चाँद तक भी जाने के लिए तैयार हो जायेगा। अपने मतलब बिना षायद वह कहीं नहीं जायेगा। फिर भी वह उसे पसन्द करती है, फिर भी वह उससे जुड़ी हुई है।
यहां उसके पास दो ही अच्छे फाॅरमल सूट थे। उसने एक पहन लिया। वह दुखी भी थी और उत्साहित भी। हालांकि पहले वह जीन्स पहनकर जाना चाह रही थी मगर षादी के माहौल के हिसाब से उसे ठीक नहीं लगा।
वार्डन को सूचित करने के बाद वह हाॅस्टल से बाहर निकली। वह एमिटी विष्वविद्यालय, नोयडा से फैषन डिजाइन का कोर्स कर रही है और अभी दूसरे वड्र्ढ मेें है। वह यहीं के हाॅस्टल में रहती है और हफ्ते दो हफ्ते में अपने घर राजौरी गार्डन दिल्ली में एक दो रातों के लिए रहने चली जाती है।
अभी वह कुछ दूर ही चली थी कि उसे विषेड्ढ दिखाई दिया। विषेड्ढ उसका सहपाठी है। विषेड्ढ ने भी उसे देख लिया और वह तेजी से चलता हुआ उसके पास आया।
‘क्या बात है आज तो बड़ा षानदार सूट पहना है। कहीं पार्टी है क्या?’, विषेड्ढ ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘तुझे चलना है पार्टी में?’, पूर्वा हल्का सा मुस्कुराई।
‘तू ले चलेगी?’
उसने सहमति में सिर हिलाया और कहा, ‘पार्टी नहीं है षादी है।’
‘क्या फर्क पड़ता है। तू रुक, मैं अभी दो मिनट में तैयार होकर आता हूं।’, वह उत्साहित स्वर में बोला। आज तो उसकी मन की मुराद पूरी हुई है। पूर्वा के साथ तो वह कहीं भी, कभी भी जाने के लिए तैयार है।
‘सुन, तू बाइक या कार का इन्तजाम कर सकता है क्या?’
‘हो जायेगा। तू बस पन्द्रह-बीस मिनट रुक। मैं तुझे तेरे हाॅस्टल के गेट पर मिलता हूं। ओके?’, विषेड्ढ ने जल्दी से कहा। उसे डर था कि कहीं पूर्वा अपना इरादा ना बदल दे।
‘हमें दिल्ली जाना पड़ेगा।’, पूर्वा ने हिचकते हुए कहा।
‘मुम्बई भी होता तो भी कोई प्राब्लम नहीं। बस, आइम कमिंग।’, उसने अंगूठा ऊपर उठाते हुए कहा और अपने हाॅस्टल की ओर चल पड़ा।
पूर्वा कुछ देर अनिष्चित सी खड़ी रही और वह भी वापस चलने लगी। विषेड्ढ से सिर्फ वह सहपाठी होने के नाते ही बात करती है लेकिन वह जानती है वह कहीं न कहीं एडवान्टेज लेने की कोषिष करता रहता है। यहां सब उसे मैंढक जैसी आँखों वाला लड़का कहते हैं क्योंकि उसकी आँखे बड़ी-बड़ी और बाहर को निकली हुई हैं जैसी मैंढक की निकली होती हैं। पूर्वा को न जाने क्यों हमेषा भय लगा रहता है कि अगर कभी विषेड्ढ अधिक उत्तेजित या क्रोधित हुआ तो उसकी आँखें बाहर टपक पड़ेगीं।
षाम सवा छह बजे
कार दिल्ली की तरफ दौड़ रही थी। पहले वह बाइक ला रहा था पर सर्दी में बाइक पर बुरा हाल हो जाता है। वैसे बाइक पर उसे पूर्वा का लगातार स्पर्ष मिलता रहता मगर दोनों के कपड़ों और चेहरों का सत्यानाष हो जाता। इसके विपरीत कार में हुलिया और कपड़े सही सलामत रहते है और सर्दी से भी बचाव हो जाता है, साथ ही बातचीत भी बेरोकटोक चलती रहती है जो बाइक पर सम्भव नहीं हो पाती।
‘एक बात पूछूं?’
‘क्या?’ पूर्वा ने सामने सड़क पर देखते हुए कहा।
‘तू उदास क्यों हैं आज?’
‘हां उदास तो हूं। अगर वजह बताउंगी तो तू हिल जायेगा।’, पूर्वा ने खाली आँखों से उसे देखा।
विषेड्ढ ने उसकी खाली आँखें देखी। देखने के साथ ही हल्का सा उसका हाथ चक्के पर काँपा। कितना कुछ था इन खाली आँखों में। वह तो पहले ही हिल गया।
‘मैंने ये बात किसी से षेयर नहीं की। हमेषा खुद ही भीतर घुटती रही। पर आज हालात ऐसे बन गये हैं कि आज षेयर करना चाहती हूं। तुझसे।’
‘और अगर गौतम होता तो?’, उसे पूर्वा और गौतम की नजदीकियां मालूम हैं। काॅलेज में ये सब चलता है। एक दूसरे की गर्लफ्रैन्ड काटने का मजा ही कुछ और है। वैसे उसे मालूम है कि पूर्वा उससे सिर्फ सहपाठी होने के नाते ही बातचीत करती है। पर आज………….
‘षायद…………षायद उसे नहीं बताती।’, पूर्वा ने कुछ क्षण रुककर कहा।
विषेड्ढ ने कुछ कहा नहीं पर उसके चेहरे पर एक सूक्ष्म मुस्कान छप गई।
‘कुछ किस्से ऐसे होते हैं जिनकी षुरूआत नहीं होती। घटनाएं घटती रहती हैं और किस्से बनते रहते हैं और हम कब उन किस्सों के हिस्से बन जाते हैं, एक मजबूत हिस्से, हमें मालूम ही नहीं होता।’, पूर्वा को समझ नहीं आ रहा था कि वह कहां से बताना षुरू करे लेकिन भूमिका उसने अच्छी बना दी। और विषेड्ढ को कुछ पल्ले नहीं पड़ा। वह भावहीन चेहरा बनाये कार चलाता रहा।
‘अच्छा विषेड्ढ, एक बात बता? क्या मैं बहुत सुन्दर हूं? ब्यूटीफुल?’, उसने ब्यूटीफुल पर बहुत जोर देते हुए पूछा।
‘रियली यू आर मोस्ट ब्यूटीफुल।’, विषेड्ढ ने बेहिचक कहा।
‘यही मेरा दुर्भाग्य है। खूबसूरत होना ही मेरी सजा है…………।’
‘क्या बकवास कर रही है तू?’ विषेड्ढ उलझनपूर्ण स्वर में बोला।
‘सच, सच कह रही हूं मैं। हम दो भाई और दो बहनें है। मैं सबसे छोटी हूं और सबसे गोरी, सबसे सुन्दर। मेरे बाकी भाई बहन साँवले या काले है और सुन्दर भी नहीं हैं। पैदा होने के कुछ समय बाद से ही मेरा दुर्भाग्य षुरू हो गया था। मेरे पूज्य पिताजी मुझसे नफरत करते थे। वे समझते थे कि मैं उनकी औलाद ही नहीं हूं क्योंकि मैं तीनों से अलग थी बल्कि मेरे मां बाप को मिलाकर पाँचों से अलग थी। उनके षक का कीड़ा इतना भयंकर था कि उन्होंने डीएनए टैस्ट भी करवाया। विज्ञान ने घोड्ढित कर दिया था कि मैं उनकी ही सन्तान थी लेकिन फिर भी सभी के मन में कोई काँटा चुभा रह गया…………।’
‘एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानेगी?’
पूर्वा ने इन्कार में गर्दन हिलाई।
‘एक जोक था जो मुझे याद आ गया। बिल्कुल………..’
‘यहां मैं इतनी सीरियस बात कर रही हूं और तुझे जोक याद आ रहा है।’, उसने असहाय भाव से उसकी बात काटते हुए कहा।
‘यार, जोक नहीं सुना रहा। मैं सिर्फ ये कहना चाह रहा था कि क्या तेरे पापा ने बाकी भाई बहनों का भी डीएनए टैस्ट कराया था?’
‘षायद……….कराया हो, मुझे पक्का नहीं पता।’, पूर्वा अनिष्चय स्वर में बोली, ‘लेकिन मेरा तो कन्फर्म है। मेरे भाई बहन मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं करते। अगर सीधे और साफ षब्दों में कहा जाये तो मुझसे नफरत करते हैं क्योंकि मैं उनसे अलग हूं, सुन्दर हूं। दूसरे लोग उनकी अपेक्षा मुझे अधिक पसन्द करते हैं और षायद यही वजह है जो मैं यहां नोयडा में हूं। उनसे दूर।’
विषेड्ढ ने पूर्वा को देखा। वह कहीं खो गई थी। इस समय वह बिल्कुल अजनबी लग रही थी। कार चलाते-चलाते वह कभी सामने देखता तो कभी पूर्वा को।
‘पता है, आज किसकी षादी है?’
विषेड्ढ ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला पर तुरन्त ही बन्द कर लिया और इन्कार में सिर हिलाया।
‘मेरी बहन की।’ पूर्वा ने उसकी ओर देखते हुए कहा।
वह कुछ समझ तो गया था लेकिन फिर भी आष्चर्य प्रकट करता हुआ बोला, ‘अच्छा! कमाल है, घर में मैरिज है और तुझे षामिल भी नहीं किया। यार, इतनी नफरत तो नहीं होनी चाहिए।’
पूर्वा खामोष सामने देखती रही।
‘अब किसने बताया तुझे?’
‘मेरी कजन ने।’
‘घरवालों को पता है तू आ रही है?’
‘नहीं।’, पूर्वा की आँखों में आंसू आ गये।
‘कूल यार। सब ठीक हो जायेगा।’, वह आष्वासनपूर्ण स्वर में बोला, ‘वैसे क्यों नहीं बताया तुझे?’
‘बताया तो, मैं बहुत खूबसूरत जो हूं। बड़ी अजीब बात है कि दीदी को जो भी देखने आता था वह मुझे देखते ही मेरे पीछे पड़ जाता था। एक बार तो मैं लड़ भी पड़ी थी। इस वजह से दीदी में काॅम्पलैक्स आ गया था और वह मुझसे हमेषा चिड़ी रहती थी। मेरे दोनों भाई भी ऐसे ही हो गये। पर मेरे साथ तो और भी महाभारत है न कि मेरे मां बाप भी मेरे नहीं है……………।’
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Postby Jemsbond » 05 Jul 2016 17:39

कितने दर्द छिपा के बैठी है ये लड़की। विषेड्ढ सोच रहा था। इसके साथ कितना कुछ घट रहा है, कितना सहन कर रही है। इसके लिए वह कुछ भी कर देगा, कुछ भी।
इस समय कार अक्षरधाम मन्दिर के सामने से गुजर रही थी। वे दिल्ली में आ चुके थे।
‘हमें कहां चलना है?’, विषेड्ढ ने पूछा।
‘कापसहेड़ा जाना है। फार्चून फार्महाउस। तुझे कापसहेड़ा का रास्ता मालूम है?’
‘गुड़गावं साइड न।’
‘हां।’
‘ठीक है फिर। रिंग रोड़ पकड़ते है। धौला कुआं फिर बार्डर।’, विषेड्ढ ने सिर हिलाते हुए कहा।
‘वैसे मैं ठीक कर रही हंू न?’
‘अरे यार, बिल्कुल ठीक कर रही है। तू अपने आप को ठीक रख बाकी सब ठीक हो जायेगा। देख, जहां तक मुझे समझ आया है तेरे पैरेन्टस चाहते है कि तेरी बहन की षादी बिना किसी पंगे के हो जाये। उन्हें आषंका है कि तेरे वहां होने से उसकी षादी में प्राब्लम हो जायेगी और इसलिए उन्होंने तुझे बुलाया नहीं। ये आषंकाएं बड़ी खतरनाक होती हैं। ये जोंक की तरह हमसे चिपकी रहती है और खून पीती रहती हैं, चुपचाप, खामोष। हम खुद का नुकसान करते रहते हैं और किसी को पता भी नहीं चलता…….।’
पूर्वा उसकी षक्ल देख रही थी।
‘आज तो पूरी फिलाॅसफी चालू है।’, आज षाम की दूसरी मुस्कराहट उसके चेहरे पर थी।
मैंढक जैसी आँखें चमक उठीं।
षाम पौने सात बजे, राजौरी गार्डन, दिल्ली
घर रुके लगभग सभी रिष्तेदार कापसहेड़ा विवाह स्थल के लिए निकल चुके थे। आकाष भी बड़े बेटे कुष के साथ जा चुका था। रीता और दो चार लोग बचे थे जो निकलने वाले थे। बेला को उसका भाई भव्य ब्यूटीपार्लर से ही सीधा कापसहेड़ा ले जायेगा।
श्रीगंगानगर वाली चाची अपने बेेटे के साथ अभी एक घण्टे पहले ही यहां पहुँची थीं रीता जिनका बेसब्री से इन्तजार कर रही थी। वह उन्हें मां की तरह मानती है और वे मां की तरह ही उन्हें अच्छी बातें और सलाहें देती हैं। उन्होंने आते ही पूर्वा के बारे में पूछा था। रीता उन्हें सारे हालात बता चुकी थी।
‘जो भी हालात रहे हों मगर आज उसे बुला लेना चाहिए था।’, बूढ़ी चाची ने समझाते हुए कहा, ‘ऐन षादी के दिन उसे देखकर दुल्हे की हिम्मत नहीं होनी कि वह षादी से इन्कार कर दे। इतनी अन्धेरगर्दी थोड़ी न है। इस स्टेज पर लड़का आनाकानी नहीं कर सकता। मजाक थोड़ी न है। फिर पूर्वा बेटी है तेरी। अपनी कोख से जना है तूने उसे, कहीं से उठाकर थोड़ी लाई है। तुम लोगों को कभी माफ नहीं करेगी वो। कब से दुख झेल रही है। उसकी नफरत के वारिस मत बनो। बुला ले, अभी भी देर नहीं हुई है। खुष हो जायेगी।’
‘आकाष नहीं मान रहे हैं, कहते है मैं कोई रिस्क नहीं ले सकता और इस समय तो बिल्कुल भी नहीं।’, रीता करुण स्वर में बोली।
‘तुम लोगों की मर्जी पर बच्ची का दिल बहुत दुखेगा। किसने सोचा था सगा बच्चा भी इतना भेदभाव सहेगा। कहते है सुन्दरता भगवान की नेमत होती है लेकिन उसके लिए और तुम लोगों के लिए षाप बन गई है।’, बूढ़ी का दिल भर आया।
‘चाची, बेला की षादी की ही दिक्कत है बाकी षादियों में तो वो षामिल रहेगी ही। बड़ी मुष्किल से तो इसकी षादी हो रही है। बहुत खर्चा करना पड़ रहा है। क्या बताऊं चाची, जी खोलकर खर्चा कर रहे हैं ये। सारा धन इसी षादी में लुटा रहे हैं। लड़के ने होण्डा सिटी मांगी है सबसे ऊंचा माॅडल। और भी मुँह फाड़ फाड़कर मांग की है। हम तो सच में लुट रहे है पर क्या करें। पिछली सगाई की चोट अलग। इसीलिए चाहते हैं ये षादी निपट जाये किसी तरह।’
‘प्रभू भली करेंगे। इतना करने के बाद लड़की सुखी रहे बस।’, चाची ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
‘हां, भली तो करनी चाहिए ही। उसी का आसरा है।’, रीता आष्वासनपूर्ण स्वर में बोली।
‘उससे मिलने का बड़ा मन था, पता नहीं फिर उसे देख पाउंगी या नहीं।’
‘अरे क्या बात कर रही हो चाची। बिल्कुल देख पाओगी और कई बार देख पाओगी। सौ बरस जिओगी। चिन्ता मत करो।’
बूढ़ी के गम्भीर चेहरे पर मुस्कान आ गई।
‘चलो चलें। काफी दूर जाना है।’
षाम साढ़े सात बजे, फार्चून फार्महाउस, कापसहेड़ा, दिल्ली
फार्चून फार्महाउस।
फार्महाउस की पार्किंग में अभी कुछेक ही गाडि़यां खड़ी थीं। विषेड्ढ ने एक किनारे कार पार्क कर दी।
‘अभी तो कोई नहीं आया है।’, विषेड्ढ बोला।
पूर्वा बाकी खड़ी गाडि़यों में घर की कार खोज रही थी। एक मिली पर वो चाचा की कार थी।
‘क्या करें?’, विषेड्ढ ने पूछा।
‘यहां चाचा की कार तो खड़ी है। अभी वेट करें क्या?’, पूर्वा जैसे खुद से बोली।
विषेड्ढ ने हां में सिर हिलाया और कहा, ‘मुझे तो साथ नहीं चलना न?’
‘क्यों? पागल है, तू मेरे साथ रहेगा।’
‘ठीक रहेगा?’
‘अब तू मेरे साथ आया है तो पूरी फिल्म तो देखनी पड़ेगी। तू भी देख मेरे घरवालों का क्या रिएक्षन होता है।’, पूर्वा गम्भीर थी और उसके चेहरे पर तनाव था।
विषेड्ढ चुप रहा।
‘वन्दना से अपडेट लेती हूं।’, उसने कहा और मोबाइल फोन पर वन्दना को काॅल लगाई।
वन्दना ने देर तक घण्टी जाने के बाद फोन उठाया। उसने बताया कि दोनों लगभग तैयार हो चुकी हैं, थोड़ी ही देर में वो लोग निकल जायेंगे। भव्य उन्हें लेने आया हुआ है। बाकी लोग भी पहुँचे है या नहीं उसे नहीं मालूम और बेला को नहीं मालूम कि उन दोनों की कोई बात हुई है और न ही बेला ने उसके बारे में वन्दना से पूछा।
‘दुनिया में सबसे बुरी चीज जो है उसे इन्तजार कहते हैं।’, वह जैसे अपने आप से बोली।
‘ठीक कह रही है।’, विषेड्ढ ने उसे प्रोत्साहित करते हुए कहा।
‘अभी अन्दर जाना बेकार है, क्या करें?’
विषेड्ढ चुप रहा।
‘वोदका है तेरे पास?’, पूर्वा ने उसे देखा।
नीम उजाले में विषेड्ढ के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभर आई। ‘हिम्मत के लिए दारू की जरूरत लड़कियों को भी पड़ती है क्या?’
‘लेक्चर मत दे, है या नहीं ये बता?’, वह झुंझला पड़ी।
‘नहीं। लेने चलें?’, उसने चाबी को हाथ लगाया, ‘करूं स्ट्रार्ट कार?’
उसने सहमति में गर्दन हिलाई।
पास ही एक मार्किट थी जहां वाइन षाॅप भी थी।
पूर्वा ने वोदका के दो तीन बड़े-बड़े घूंट लिये। नीट। विषेड्ढ ने उसे रोकने-टोकने की कोई कोषिष नहीं की। किसी आघात की पीड़ा अगर इससे कम होती है तो क्या बुराई है। सचमुच उसे हिम्मत तो चाहिए ही।
पूर्वा अपने भीतर मनन कर रही थी कि किस-किससे क्या-क्या कहना पड़ सकता है। वोदका से षायद उसे फोर्स मिल जायेगी कुछ भी कहने के लिए।
क्या आज का दिन उसे हमेषा याद रहेगा? 21 फरवरी 2015…………?
रात साढ़े आठ बजे
इस समय पार्किंग में कई पहचानी गाडि़यां आ चुकी थी जिनमें से एक उसके घर की कार भी थी।
‘रेडी?’, उसने विषेड्ढ से पूछा हालांकि वह पूछ अपने आप से रही थी।
‘तू रेडी है न?’, विषेड्ढ ने उसके मन को पकड़ लिया।
उसने सहमति में सिर हिलाया। दोनों कार से निकलकर प्रवेषद्वार की ओर चल दिये। बाहर ठण्ड थी। कार में उन्हें महसूस नहीं हो रहा था। पूर्वा ठण्ड से सिहर गई। उसने तो कोई गर्म कपड़ा भी नहीं पहना था। वोदका के षाट्स ने उसके भीतर थोड़ी गर्मी तो भर दी थी और दिमाग तरंगित। सर्दियों की षादी मेें यही दिक्कत होती है। साड़ी, सूट या लहंगे पर आप कोई गर्म कपड़ा नहीं पहन सकते। अगर पहनो तो उस ड्रेस की गे्रसनेस खत्म हो जाती है। …..तो ग्रेसनेस को बचाए रखने के लिए महिलाओं को सर्दी में ठिठुरना स्वीकार होता है।
‘बेला वेड्स हड्र्ढ’ का बोर्ड प्रवेषद्वार के ऊपर तेज रोषनी में चमक रहा था। प्रवेषद्वार पर दोनों ओर साड़ी पहने दो लड़कियां हाथों में गुलाब की पखुडि़यां लिये खड़ी थीं। उनके गुजरते ही दोनों ने स्वागत करते हुए उनपर कुछ पखुडि़यां बरसायीं। विषेड्ढ ने हल्का सा सिर झुकाते हुए अपने दायीं वाली लड़की को ‘थैंक्यू’ कहा। पूर्वा ने उसे जलते हुए नेत्रों से देखा। विषेड्ढ ने उसे भी देखते हुए हल्का सा सिर झुका दिया।
लाॅन के मुहाने पर जहां प्रवेषद्वार का काॅरीडोर खत्म होता है, वहां एक ओर सफेद रंग की नई नकोर होण्डा सिटी कार खड़ी थी और दूसरी ओर पूर्वा के पिताजी और चाचा जी मेहमानों के स्वागत में खडे़ थे। पिताजी किसी से बातचीत में व्यस्त थे। सबसे पहले पूर्वा की नजरें चाचा से मिली। चाचा हल्का सा सकपकाया और उसने धीरे से अपने भाई की कोहनी को हल्का सा छुआ। तब तक पूर्वा और विषेड्ढ उनके पास आ चुके थे।
‘नमस्ते चाचाजी।’, पूर्वा ने मुस्कराते हुए कहा।
चाचा हौले से मुस्कराया लेकिन पूर्वा ने उसकी मुस्कराहट नहीं देखी वह तो तेज धड़कते दिल के साथ अपने पापा को देख रही थी जो खुद उसे देख रहे थे। पूर्वा को लग रहा था कि बस वह अभी रो पड़ेगी। आकाष ने पूर्वा को कोहनी से पकड़ा और एक ओर ले गया। दूर खड़े फोटोग्राफर ने जैसे ही आकाष को किसी लड़की के साथ खड़े देखा वह लपककर फोटो लेने के लिए वहां पहुँचा। आकाष ने उसे देख लिया और उसे इषारे से मना करते हुए वहां से जाने के लिए कहा।
‘तुझे कैसे मालूम हुआ? और क्यों आई यहां? तुझे पता है न तेरी वजह से क्या से क्या हो जाता है।’, वह एक के ऊपर एक प्रष्न उस पर लादता हुआ रोड्ढपूर्ण स्वर में बोला। उसका काला चेहरा और काला लगने लगा।
‘पापा…………पापा मैं खुद को रोक नहीं पाई……….आखिर मेरी बहन……….की षादी…….’, वह रो पड़ी।
आकाष ने असहाय भाव से पूर्वा को देखा और फिर अपने छोटे भाई को पूर्वा की मां को बुलाकर लाने का इषारा किया।
‘यहां पर ड्रामा मत बना। मेहमान आने लग रहे है। समझी?’, वह धीरे पर कठोरता से बोला।
पूर्वा अभी भी धीमे धीमे रो रही थी।
‘चुप हो जा मैं कह रहा हूं।’, वह पूर्ववत् दबे स्वर में बोल रहा था।
पूर्वा ने अपने रुमाल से अपने आंसू और चेहरा पोंछा।
‘मम्मी कहां है? मुझे उनसे मिलना है……..।’, वह भरे गले से बोली।
‘तुझे आना नहीं चाहिए था। अगर तू सचमुच अपने मां बाप को प्यार करती होती तो तुझे यहां नहीं होना चाहिए था, वो भी उस हालात में जब बेला का एक रिष्ता होने के बाद भी टूट गया था – तेरे कारण।’, आकाष भीतर ही भीतर गुस्से से उबल रहा था लेकिन माहौल के अनुसार वह भरसक अपने पर काबू पाने का प्रयास कर रहा था और इस समय पूर्वा को सिर्फ समझा सकता था। पता नहीं ऐसा क्यों होता है कि पूर्वा को देखते ही उसका पारा चढ़ने लग जाता है। उसकी कोई भी हरकत, कोई भी काम उसे गलत लगता है, उसके गुस्से को भड़काने वाला काम करता है। उसे हमेषा से लगता है कि पूर्वा उसकी बेटी नहीं है। डीएनए टैस्ट से साबित होने के बावजूद वह अपनी औलाद नहीं लगती।
‘हमने इसी वजह से तुझे नहीं बताया था क्योंकि हम चाहते है कि षादी बिना किसी विघ्न के हो जाये। बहुत पैसा खर्च कर रहा हूं मैं इसमें। इसे मिट्टी नहीं करना चाहता।’
पूर्वा फिर सुबकने लगी।
‘तू यहां से चली जा।’, आकाष ने निर्दयतापूर्वक कहा।
विषेड्ढ दूर खड़ा ‘तू कौन मैं खामाखाह’ वाले भाव से उन दोनों को देख रहा था। फैमिली ड्रामा चल रहा था और वहां उसका कोई रोल नहीं था। वह सिर्फ दर्षक था, मूक दर्षक। अब एक महिला और पिक्चर में आ गई। ‘मां होगी’ उसने सोचा। अगर पूर्वा उसे सारी बातें नहीं बताती तो वो कभी यकीन नहीं करता कि वो कपल पूर्वा के माता पिता हैं। कहीं से भी वह उनकी बेटी नहीं लग रही थी।
पूर्वा ने जैसे ही अपनी मां को देखा वह उसकी और बढ़ी मगर उसे आकाष ने थाम लिया और उसे वहीं खड़े रहने का इषारा किया। रीता के चेहरे पर हैरानी और खुषी के मिलेजुले भाव थे। आकाष रीता को पूर्वा से थोड़ा दूर ले गया और उसे धीरे-धीरे बोलते हुए कुछ समझाने लगा। पूर्वा खाली नेत्रों से उन्हें देख रही थी। कुछ देर बाद रीता ने उसे घर के नाम से पुकारते हुए अपने पास आने का इषार किया, ‘बिन्नो।’
पूर्वा उनके पास पहुँची।
‘तेरी मम्मी तुझे सब समझा देगी। जा इसके साथ।’, आकाष ने कहा और उस तरफ चल पड़ा जहां वह अपने भाई के साथ पहले खड़ा था। विवाह में आने वाले मेहमानों के स्वागत में मगर अपनी बेटी के आगमन से वह परेषान हो गया था।
रीता ने पूर्वा का हाथ पकड़ा और एक ओर ले जाने लगी। विषेड्ढ अभी तक वहीं खड़ा था जहां पूर्वा ने उसे छोड़ा था। आकाष ने विषेड्ढ को देखा और पूर्वा को आवाज दी। मां बेटी दोनों रुकीं।
‘ये लड़का कौन है मैंढक सी आँखों वाला? ये तेरे साथ है?’, आकाष ने पास आते हुए पूछा।
पूर्वा के रोते हुए चेहरे पर आज षाम की तीसरी मुस्कुराहट आ गई। अगर विषेड्ढ को कोई अन्धा भी देखेगा तो यही कहेगा कि कौन है मैंढक सी आँखों वाला?।
‘ये मेरे साथ पढ़ता है। मैं लेकर आई हूं इसे।’
‘ठीक है तू जा, मैं इससे बात करता हूं।’
रात साढ़े नौ बजे
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

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Postby Jemsbond » 05 Jul 2016 17:40

पूर्वा अपनी मां, दोनों भाई और दुल्हन बहन के साथ फार्महाउस के उस कमरे में मौजूद थी जो दुल्हन और उसके परिवार वालों के लिए बनाया हुआ था। उसी कमरे में फेरों के समय दिया जाने वाला सामान भी रखा था।
रीता ने पूर्वा को जो समझाया था वह उससे कतई राजी तो नहीं थी मगर मानने के लिए तैयार हो गई थी। बेला अभी दस मिनट पहले ही वहां पहुँची थी। भारी मेकअप में वह आंषिक रूप से सुन्दर दिख रही थी। पूर्वा को देखते ही वह नाराज हो गई।
स्टेज तैयार था और संवाद षुरू होने वाले थे। यहां तीसरी घण्टी की भी आवष्यकता नहीं थी।
‘मम्मी ये यहां से बाहर नहीं जानी चाहिए। कम से कम फेरों तक तो बिल्कुल भी नहीं।’, बेला जोर से कह रही थी।
‘हां। ये यहीं रहेगी। नहीं तो इसका जादू सब पर चल जायेगा।’, कुष बोला।
‘इसको खबर किसने दी, पहले उसकी खबर लेनी चाहिए।’, भव्य बोला।
पूर्वा को समझ नहीं आ रहा था कि सारे लोग इतना डरे हुए क्यों है? उसके प्रति इतनी नफरत क्यों पाली हुई है? सिर्फ इसलिए कि ये लोग खुद सुन्दर नहीं है और उसकी सुन्दरता और गोरा रंग उनकी आँखों में चुभता है। क्या उसके बाहर जाने से बेला की षादी टूट जायेगी? फिलहाल उसके पास किसी भी सवाल का जवाब नहीं था। वह तो सबके तीखे प्रहार झेल रही थी। कोई बड़ी बात नहीं कि तीनों मिलकर उसे मारने भी लग जायें।
‘तुम लोग जो मर्जी कहो, अगर मेरा मन करेगा तो मैं जरूर बाहर जाऊंगी। मैं तुम्हारी सगी बहन हूं, कोई गोद ली हुई लड़की नहीं।’, पूर्वा दृढ़ता से बोली।
‘अगर बहन का इतना ही ख्याल है तो तुझे आना ही नहीं चाहिए था। सगाई तो तुड़वा दी, अब षादी तुड़वाना चाहती है?’, बेला ने जहर बुझे स्वर में कहा। बोलते समय उसका चेहरा विकृत हो गया। हजारों रुपये का मेकअप भी उसकी विकृतता को नहीं छुपा पाया।
‘तो इसमें मेरी क्या गलती है? मैंने मम्मी पापा को एपलीकेषन दी थी कि मुझे पैदा करो, मुझे गोरा रंग और सुन्दरता दो। क्या तूने कहा था कि मुझे सुन्दरता नहीं चाहिए? बोल कहा था तूने? या भव्य ने कहा हो या कुष भइया ने? किसी ने नहीं कहा लेकिन ये मिला, ये अपने आप मिला है सबको। गलती न तेरी है न मेरी…………’, पूर्वा कमरे के बीचो बीच खड़े होकर किसी टीवी सीरियल की नायिका की तरह संवाद बोल रही थी और सब मुँह बाये उसे देख रहे थे। अगर यहां कैमरा होता तो एक-एक करके सबके चेहरों को दिखा रहा होता, ‘………गलती मम्मी और पापा की है। जब तू और कुष पैदा हो गये थे तो इन्हें और दो बच्चे पैदा करने की क्या जरूरत थी? किसे बच्चों की फौज दिखाना चाहते थे ये लोग……..। न मैं होती न ये बखेड़े होते…….।’
‘बि…..न्…….नो।’, रीता जोर से चिल्लाई।
पूर्वा खामोष हो गई। वोदका बहुत ही कमीनी चीज होती है, जुबान को कहीं भी मोड़ देती है।
‘देख लो मम्मी, कितना बोलना सीख गई।’, कुष कड़वे स्वर में बोला।
‘तू बाहर जा भइया। बाहर पापा अकेले हैं।’, पूर्वा कुष से आदेषात्मक स्वर में बोली।
कुष ने उसे खा जाने वाली नजरों से देखा।
‘कुष तू जा। मैं संभाल लूंगी इसे।’, रीता ने कहा, ‘टिंकू तू भी जा।’, उसने भव्य को भी कहा।
दोनों अंगारों पर लोटते हुए बाहर चले गये।
‘तुझे इतना समझाया तू समझती क्यों नहीं?’, रीता असहाय भाव से बोली।
‘क्या समझना है मम्मी, खड़ी तो हूं आपके सामने। नहीं तो मैं भी एक षानदार ड्रेस में होती, बहन की षादी की रौनक से दमदमा रही होती, बाहर लाॅन में अपने दोस्तों और रिष्तेदारों के साथ मस्ती कर रही होती, दीदी की चुटकी ले रही होती, जयमाला के समय होने वाली अठखेलियों के बारे में सोच रही होती, जीजा जी के जूते चुराने की योजनाएं बना रही होती, विभिन्न तरह के पोज बनवा-बनवाकर फोटो खिंचा रही होती………..’, उसकी रुलाई फूट पड़ी।
‘मैंने कहा था न मम्मी, ये पूरी फिल्मी है। इसे फैषन डिजाइनिंग का नहीं एक्टिंग का कोर्स करवाना चाहिए था।’, बेला कटु स्वर में कह रही थी।
‘मेरे पास बैठ बिन्नो।’, रीता ने उसे अपने पास आने का इषारा करते हुए कहा। पूर्वा सुबकते हुए उसके पास आकर बैठ गई।
‘जब सभी लोग हमारे विरूद्ध हों तो उसका विरोध करना या सामना करना हमेषा बहादुरी नहीं कहलाती, कभी-कभी चुप बैठ जाना भी समझदारी होती है।’, रीता फिलासफी वाले तरीके से उसे समझा रही थी। फिलासफी में मास्टर डिग्री आज काम आ रही थी। पूर्वा के सिर पर हाथ फेरते हुए वह कह रही थी, ‘पासे लगातार उल्टे पड़ रहे हों तो रिस्क लेना बेवकूफी है। अगर तू ठण्डे दिमाग से हमारी बातों पर ध्यान देगी तो तुझे सब ठीक लगेगा। पिछली बातों पर गौर करेगी तो हमारे कदम को तू गलत नहीं कहेगी। हमने भी तो दिल पर पत्थर रखा है। हमारे भी तो अरमान है कि हमारे घर की पहली षादी धूमधाम से हो और सभी षामिल हों। किसी मजबूरी की वजह से ही तो हमने तुझे रोका था, नहीं बताया था वर्ना ऐसा कहीं होता है जो हमारे घर में हो रहा है।’, वह सांस लेने केे लिए रुकी।
‘दीदी के ससुराल वालों को मेरे बारे में बताया भी है या नहीं?’, एक और ड्ढडयंत्र की आषंका से त्रस्त पूर्वा ने पूछा।
‘बता दिया है।’, रीता के बोलने से पहले ही बेला बोल पड़ी, ‘हमारे घर के वीआईपी मेम्बर के बारे में छुपा थोड़े ही सकते हैं।’
‘तो बहना तू ही बता दे, क्या बोला है मेरे बारे में होने वाले पतिदेव हड्र्ढ को?’, पूर्वा की वाणी फिर मुखर हो रही थी।
बेला ने कुछ कहने को मुँह खोला ही था कि कुछ लोग उस कमरे में दाखिल हुए जिनमें बेला के दोस्त भी थे। उनके पीछे पूर्वा की चाची थी।
‘दीदी, आप यहां बैठी है वहां सभी मेहमान आपको पूछ रहे हैं। चलो जल्दी।’, तभी उसकी नजर पूर्वा पर पड़ी, ‘अरे! बिन्नो आ गई।’
पूर्वा ने उसे नमस्ते किया। रीता तुरन्त उठ गई और चाची के साथ बाहर निकल गई मगर जाते-जाते इषारे से पूर्वा को वहीं रहने की हिदायत दे गई।
रात सवा दस बजे
इस समय कमरे में वह, बेला, बेला की एक दो सहेलियां और कुछ रिष्तेदार थे। अब तक तंरगित दिमाग ठिकाने लग चुका था। उसे सिर्फ अपने मां बाप की बातें याद आ रही थीं। बेला को देखकर उसे गुस्सा नहीं बल्कि तरस आ रहा था। षायद वह भी ऐसा ही व्यवहार करती अगर वह बेला की जगह होती तो। आज उसके जीवन का एक बड़ा उद्देष्य पूरा हो रहा था। ऐसे में कैसी भी बाधा कौन स्वीकार करेगा?
उसने विषेड्ढ को फोन किया। विषेड्ढ ने फौरन फोन उठाया।
‘खैरियत?’, उसने एक ही षब्द बोला।
‘अभी तक तो है। तू क्या कर रहा है?’
‘मैं तो ग्रैंड वैडिंग का मजा ले रहा हूं। खा पी रहा हूं।’, उसने चहकते हुए कहा।
‘साले, मैंने पानी तक नहीं पिया और तू मौज ले रहा है।’
‘पर पानी पिया ही कहां तूने? तू तो नीट ही पी गई।’, विषेड्ढ का मजाक भरा स्वर उसके कानों में उतरा।
‘षटअप।’, वह दबे स्वर में बोली, ‘अभी बची है न?’
‘उतनी ही है जितना तू छोड़कर आई थी। तू है कहां? मेरे पास आ ना या मैं तेरे पास आऊं?’
‘थोड़ी देर में आती हूं तेरे पास?’, कहकर उसने फोन काट दिया।
उसने अपनी मां से कह तो दिया था कि वह बाहर नहीं निकलेगी पर वह बाहर जाने को तड़प रही थी। बाहर का षोर, डीजे की आवाज आदि उसे बार-बार बाहर जाने को उकसा रहे थे। अब तो उसे भूख भी लग रही थी। हालांकि कमरे में भी पानी, कोल्ड डिंक्स और स्नैक्स सर्व हो गये थे मगर उसने कुछ नहीं खाया था। वह तो बाहर जाकर खाना चाहती थी।
इस समय बेला कुर्सी पर अकेली बैठी थी। दो बूढ़ी रिष्तेदार दरी पर बैठी आपस मंे बातें कर रही थीं। वह बेला के पास गई।
‘दीदी मैं टाॅयलेट जा रही हूं। परेषान मत होना, वैसे भी अभी बारात नहीं आई है और जब तेरे हड्र्ढ एण्ड कम्पनी ने मुझे देखा ही नहीं है तो जाहिर है उन्हें पता ही नहीं चलना कि मैं कौन हूं। ठीक है?’, उसने ठीक है पर ज्यादा जोर दिया।
बेला ने अनिष्चय ढंग से सिर हिलाया। पूर्वा के बाहर निकलते ही बेला अपने मोबाइल फोन पर अपनी मां से सम्पर्क करने लगी।
रात साढे़ दस बजे
ऐसा लगा जैसे वह कैद से बाहर आई हो। उसने एक छुटकारे की सांस ली। लाॅन में भीड़ हो गई थी। उसने सोचा, ये सारे लोग मेरे महान पिता द्वारा बुलाये गये थे। बारात अभी आई नहीं थी। दिल्ली की षादियों में यही समस्या है। यहां बारात हमेषा ग्यारह बजे के बाद ही आती है। दुल्हन, दुल्हा और उनके घरवाले रात एक-दो बजे खाना खाते है जब खाने की कोई तुक नहीं होती। सामने डीजे लगा हुआ था जहां पूर्वा की दूसरी कई कजन्स के साथ वन्दना नाच रही थी। वह उसके पास पहुँची। पूर्वा को देखते ही वह चिल्लाती हुई उससे गले मिली।
‘मुझे पता था तू रुकेगी नहीं। यू आर वेलकम डीयर।’, वन्दना के चेहरे की चमक ने जैसे उसके सारे अवसादों को फीका कर दिया।
‘कैसी बात कर रही है यार। अपनी बहन की षादी में कैसे नहीं आती।’, उसने तनिक उत्साह से मुस्कुराते हुए कहा। उसे लगा षाम से गिनती हो रही मुस्कुराहटें अब बढ़ती जायेंगी।
‘चल फिर डांस तो कर।’, वन्दना उसे डीजे फ्लोर पर ले गयी।
पूर्वा ने ‘बलम पिचकारी’ और ‘चिट्टिये कलाईयां’ पर अपनी कजन्स के साथ डांस किया। गाने के दौरान वन्दना ने उसे कहा कि उसके कपड़े दुल्हन की बहन के अनुरूप नहीं है लेकिन फिर भी वह बहुत खूबसूरत लग रही है। वन्दना को सगाई वाली बात मालूम है मगर वह जानबूझ कर अन्जान बनती है। पूर्वा को डांस करते हुए बहुत सी आँखों के साथ-साथ मैंढक जैसी आँखें भी देख रही थीं। पर इन आँखों का क्या करें? रीता को देखते ही वह डांस फ्लोर से उतरकर उसके पास आ गयी। उसकी मां मुस्करा रही थी।
‘बहुत दिनों बाद तेरा डांस देखा।’, रीता ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।
आषा के विपरीत षब्द सुनकर उसकी आँखें भर आयीं।
‘देख बेटा, बारात आने के बाद तू भीतर चली जाना। समझी न?’
पूर्वा ने सहमति में सिर हिलाया। हालांकि वह वही बात कहना चाहती थी जो बेला को कहकर आई थी मगर नहीं कहा क्योंकि मां का दिल पिघल रहा था।
‘आ तुझे सोमना चाची से मिलवाती हूं। तुझे बहुत याद कर रही थीं।’, वह रीता के साथ चल दी।
षादी का रंगीन माहौल। क्या-क्या सपने देखे थे उसने? सब स्वाहा। सचमुच जो हम सोचते है ऐन वैसा कभी नहीं होता…………। उसने उन्हें देखते ही नमस्ते नानी जी कहते हुए पैर छुए। बूढ़ी नानी ने आषीर्वादों की झड़ी लगा दी। जुग जुग जीये मेरी बेटी, मेरा चाँद का टुकड़ा, मेरा सोना आदि इत्यादि।
उन्होंने उससे जो जो पूछा उसने वैसे वैसे बता दिया। अभी का नाटकीय दृष्य भी, नायिका के दुखान्त संवादों सहित। उन्होंने सिर्फ एक बात कही, ‘धैर्य रख बिन्नो, एक दिन इन लोंगो को तुझ पर बहुत नाज होगा। तू दोड्ढरहित है। इनकी करनी इन्हें के आगे आयेगी।’
वह सिर्फ गम्भीरता से सिर हिलाती रही। उसे अब आदत हो गयी थी पर षादी छुपाने वाली बात से उसे आघात लगा था। रह रहकर उसकी आँखें विषेड्ढ को खोज रही थीं। वह जरूर किसी खाने के स्टाल पर होगा और ठूँस रहा होगा।
रात ग्यारह बजे
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Re: शादी की रात

Postby Jemsbond » 05 Jul 2016 17:41

आखिरकार, सहपाठी से दोस्त बने दो लोग आपस में मिले।
‘मैंने तुझे उन बूढ़ी अम्मा के साथ बैठे देख लिया था पर तू उठने का नाम ही नहीं ले रही थी।’, विषेड्ढ षिकायतपूर्ण स्वर में बोला।
‘वो मेरी बहुत स्वीट नानी हैं और वे बातें भी बहुत स्वीट करती हैं। मैं उनसे चार-पाँच साल बाद मिल रही थी इतना तो बनता ही है।’, वह उसे चिढ़ाने वाले भाव से बोली।
‘एक बात कहूं?’, विषेड्ढ हिचकता हुआ बोला।
उसने प्रष्नसूचक दृष्टि से उसे देखा।
‘अगर तू मुझे अपनी कहानी नहीं बताती तो मैं सोच भी नहीं सकता था कि वे लोग तेरे पैरेन्ट्स है। कहीं से भी तू उनकी बेटी नहीं लगती।
एक फीकी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर आई और चली गई।
‘अब क्या सीन है तेरा?’
‘बारात आ रही है…………। तुझे ढोल और बैण्ड की आवाजें सुनाई आ रही है न?’, पूर्वा का चेहरा हल्का सा मुरझा गया।
‘बारात तो आयेगी ही। तू चिन्ता क्यों कर रही है?’
‘मुझे फिर अन्दर जाना पड़ेगा। मैं जयमाला के बाद बाहर आऊंगी। वैसे आर्डर तो फेरों के बाद तक है। फेरों में तो तीन-चार बज जायेंगे।’
‘तो ये षर्त है?’
पूर्वा ने सहमति में सिर हिलाया।
‘तू उसी समय ही बाहर आ जाना। सब जयमाला देखने में बिजी होंगे तू दूर से देख लेना।’
पूर्वा ने इन्कार में सिर हिलाया। ‘ऐसे देखना तो और ज्यादा पीड़ादायक होगा। मैं कमरे में ही बैठी रहूंगी।’
‘अच्छा, कुछ खा तो ले।’
उसने मना कर दिया। पण्डाल में और भीड़ बढ़ने लगी थी। बाराती भीतर आ रहे थे। उसने अपने पापा को तलाष किया। वे कुष, भव्य और अन्य रिष्तेदारों के साथ प्रवेषद्वार पर ही थे। किसी एक के हाथ में फूलमालाओं का बण्डल था। मां भी अन्य महिलाओं के साथ खड़ी थी। आरती की थाली तैयार की जा रही थी। वन्दना तथा अन्य लड़कियां भी वहीं थी। नहीं थी तो सिर्फ वो। अपने घर की षादी की रस्मों को वह एक अजनबी की तरह देख रही थी।
रात साढ़े ग्यारह बजे
वह कमरे में अकेली थी। बेला दस मिनट पहले चली गई थी। जाते हुए बेला की आँखों में एक निरीह भाव था, एक याचना। वो याचना उसके लिए पर्याप्त थी उसे वहीं उस कमरे में रोके रखने के लिए। वह बेचैनी से कमरे में विचर रही थी। तभी उसके मोबाइल पर विषेड्ढ को फोन आया। उसने उसे बाहर आने का आग्रह किया। उसने मना किया। वह समझाने लगा। इसी समझाने मना करने के बीच ही विषेड्ढ कमरे में आ गया।
‘तू दिल पर पत्थर रखकर देख ले। देख तो ले।’, वह जोर देता हुआ बोला।
‘नहीं यार……….।’
‘यार तू तो ‘‘मेरा वचन गीता की कसम’’ वाली बात कर रही है। इतनी भीड़ में किसी का भी तेरी तरफ ध्यान नहीं जायेगा। देखकर फौरन वापस आ जाना।’
वह विचलित थी। जाना तो चाहती थी पर ऐन वक्त पर कोई बखेड़ा खड़ा हो गया तो? उसे लगा वह कभी दोड्ढरहित नहीं थी और न होगी।
‘तू थोड़ी वोदका और लगा ले। बाकी काम वही कर देगी तुझे सोचने समझने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।’, उसने बेषकीमती राय दी।
‘तूने पहले क्यों नहीं बताया? अब तो जयमाला षुरू हो गयी होगी।’, उसे इसी कमरे का वो दृष्य याद आ गया जब वह अपने मन की भड़ास निकाल रही थी।
‘तेरी बहन स्टेज की तरफ जा रही है। ये फोटोग्राफर लोग दुल्हन को इतने नाज नखरों से चलवाते हैं कि दस सेकेण्ड का रास्ता दस मिनट में तय होता है। एक काम करते हैं, तू मुझे कोल्ड ड्रिक्ंस जूस वाले स्टाल के पास मिल। मैं फटाफट जाकर गाड़ी में से वोदका निकाल लाता हूं। वहीं जूस में मिलाकर पीना और वहीं से देखती रहना। ठीक है?’
यही वो क्षण था जब उसे मना कर देना चाहिए था लेकिन उसने हां कह दिया। विषेड्ढ गोली की तरह बाहर भागा। कुछ चीजें सोच समझ कर नहीं होतीं, पता नहीं कहां से एक रेला आता है और उस रेले में चीजें अपने आप होने लग जाती हैं। हालांकि उसके जिम्मेदार हम ही होते हैं जो बहुत बाद में जाकर समझ आता है।
ये भी अच्छा था कि उसकी मां उसे इस कमरे की चाभी दे गई थी। उनका सारा कीमती सामान इस कमरे में रखा है। उसने झटपट कमरा लाॅक किया और बाहर आ गई और स्टेज से दूर दूर चलने लगी। बेला अभी स्टेज पर पहुँची नहीं थी। सचमुच फोटोग्राफर्स और विडियो वाले उसे स्लो मोषन से भी धीरे चलवा रहे थे। उसने हड्र्ढ को देखा जो स्टेज पर बैठा हुआ था। उसका रंग भी सांवला था और षरीर भारी। राम मिलाई जोड़ी। उसे लगा उसके मां बाप खामाखाह डर रहे हैं। वह किस हैसियत से उसे देखकर ये षादी तोड़ने की सोचगा? हड्र्ढ को देखकर उसका दिल कुछ हल्का हो गया। फिर भी अतिरिक्त सावधानी बरतने में कोई बुराई नहीं है।
खाने के स्टालों के पास पहुँचकर उसे भूख लगने लगी। दोपहर में उसने गौतम के साथ बस दो बर्गर खाये थे और अब आधी रात होने को है। उसने सबसे पहले जूस पिया और फिर एक आलू टिक्की ली। उसने महसूस किया कि कुछ जानकार लोग उसे विचित्र नजरों से देख रहे हैं। सोच रहे होंगे कि बहन जयमाला के लिए जा रही है और ये यहां चाट खा रही है।
अभी वह आधी टिक्की ही खा पाई थी कि विषेड्ढ आ गया।
‘खाना जरूरी है, नहीं तो बहुत जल्दी चढ़ती है।’ वह सिर हिलाता हुआ बोला।
‘यहां मेरे काफी पहचान वाले लोग हैं, ध्यान से।’
‘तू चिन्ता मत कर। मैं तुझे जूस का गिलास लाकर दूंगा। इतने तू कुछ और खा ले।’, कहकर वह स्टाल के पास चला गया।
वह सोच रही थी कि जो होना है वो हो ही रहा है और होगा ही, तो वो अपनी भूख क्यों मारे। पता नहीं उसे आखिर में पूरे परिवार के साथ खाने को मिले या नहीं। उसने स्टेज की ओर देखा। बेला स्टेज पर पहुँच चुकी थी। दुल्हा दुल्हन अपने-अपने दोस्तों रिष्तेदारों के झुण्ड में थे। दोनों को जयमाला पकड़ा दी गई थी। भीड़, षोरषराबा, कैमरे, विडियो, रोषनी सब जैसे वहीं फोकस हो गया था। वह खुद की भी वहां होने की कल्पना कर रही थी। वह वहीं खोई हुई थी कि विषेड्ढ ने जूस का गिलास उसकी ओर बढ़ाया। उसने गिलास थाम लिया। विषेड्ढ के हाथ में भी गिलास था। दोनों ने धीरे से ‘चियर्स’ बोला और एक बार में आधा-आधा गिलास खाली कर दिया।
‘पता है, जब दीदी का पिछला रिष्ता हुआ था तो मैंने न जाने कितने सपने बुन लिये थे कि मैं इस कलर का लहंगा पहनूंगी, ऐसे हेयर स्टाइल कराऊंगी, ढेर सारे फोटो खिंचाऊंगी, अपने सारे दोस्तों को बुलाऊंगी, थीम डांस करूंगी, ये करूंगी, वो करूंगी। पर ऐसा कुछ नहीं हो पाया। वह रिष्ता मेरी वजह से टूट गया। एंगेजमेन्ट पर बेला के होने वाले पति ने मुझे पहली बार देखा था क्योंकि उससे पहले मुझे सामने नहीं आने दिया गया था। वो कमीना वहीं फैल गया। कहने लगा मुझे पहले क्यों नहीं दिखाया। ये तो धोखा है, फरेब है और भी न जाने क्या क्या।’, वह कहे जा रही थी, ‘सच तो ये था कि वह सीधे-सीधे मुझ पर लार टपकाने लगा था। और कहने लगा वह षादी करेगा तो मुझसे वर्ना नहीं करेगा। बड़ा हंगामा हुआ। मैंने भी उसे खरी-खरी सुनाई पर उस रिष्ते का वहीं पर अन्त हो गया। वही एक घटना मेरे घरवालों के भीतर कांटा बनकर चुभ गई। एण्ड रैस्ट इज द हिस्ट्री………..’, वह मुस्कराकर बोली।
इस समय पूर्वा उसे दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की लगी।
बेला की वरमाला हड्र्ढ के गले में डल गयी। खूब षोर हुआ, फूल बरसाये गये। इसी खुषी में वह बाकी जूस भी पी गई।
‘कुछ खाने को लाऊं?’
‘दी……..दी, आई……….लव……यू।’, वह जोर से चिल्लाई।
वातावरण में षोर था इसलिए उसकी आवाज दूर तक नहीं जा पाई लेकिन आसपास खड़े लोग विचित्र निगाहों से उसे देख रहे थे। विषेड्ढ सकपकाया सा इधर-उधर देख रहा था।
‘मैं दीदी को सचमुच बहुत प्यार करती हूं। वो भी मुझसे प्यार करती थी। पर जबसे मेरे कारण उसके जीवन में समस्याएं होनी षुरू हुईं तो वह कटने लगी, नफरत करने लगी। आई होप, इस षादी के बाद सब कुछ ठीक हो जायेगा। आई लव माई सिस्टर वैरी मच………..।’, वह मुखर होने लगी थी। क्या वोदका का असर षुरू हो गया? विषेड्ढ ने सोचा।
और हड्र्ढ की वरमाला बेला के गले में डल गयी। फिर षोर, फिर फूलों की बरसात।
जयमाला सम्पन्न।
‘मैं जा रही हूं। तू यहीं रह, मैं थोड़ी देर में फिर आ जाउंगी।’’, उसने खाली गिलास पीछे स्टाल के काउन्टर पर रखा और पलटी।
‘पर अब क्या जरूरत है, जयमाला तो हो गई।’
‘उन्हें लगेगा कि मैं वहीं हूं। थोड़ी देर बाद मम्मी को बताकर या पूछकर आ जाउंगी। थैंक्यू सो मच टू यू। मेरे साथ आने के लिए।’
‘इसकी कोई जरूरत नहीं।’, विषेड्ढ मुस्कराकर बोला, ‘एनी टाइम।’
वह भी मुस्कराई और जाने के लिए मुड़ गयी। विषेड्ढ उसे जाते देखता रहा। न उसने और न पूर्वा ने नोटिस किया कि एक लड़का पूर्वा के पीछे चल रहा था।
आधी रात, बारह बजे
दारू का आखिरी दौर चल रहा था।
फार्महाउस की पार्किंग में पाँच छह लड़के एक कार के बाहर खड़े थे। वह कार बार में तब्दील थी। कुछ के हाथों में षराब के भरे-अधभरे गिलास थे और कुछ के कार के बोनट पर रखे थे। साथ ही स्नैक्स के कई दोने और प्लेट रखी थीं। उनकी बातचीत का मुख्य विड्ढय भाभी की बहन था।
‘तू सच कह रहा है न?’, गेहुएं रंगत वाले लम्बे युवक ने फिर पूछा। वह हड्र्ढ का छोटा भाई विवेक था।
‘भाई, तू अन्दर कन्फर्म कर ले। भाभी की बहन ही है वो। कतल है कतल।’, जिसने जवाब दिया वो वही था जो पूर्वा के पीछे गया था, ‘मैंने खुद अपने कानों से सुना था। कह रही थी मैं अपनी बहन को बहुत प्यार करती हूं और किसी समस्या की वजह से वह नाराज है। मगर षादी के बाद नाराजगी दूर हो जायेगी।’
‘पर जैसा तू उसका हुलिया बता रहा है उससे तो वो भाभी की बहन हो नहीं सकती। वैसे भाभी की एक छोटी बहन है तो। पर वो दूर कहीं पढ़ रही है इसलिए वह भाई की सगाई मे षामिल नहीं हुई थी। अगर उनकी बहन होती तो हण्ड्रैड परसेन्ट वरमाला के समय अपनी बहन के साथ होती। पता नहीं क्या चक्कर है?’
‘यार क्यों चक्कर में पड़ रहे हो।’, तीसरा बोला, ‘ओ भास्कर। ऐसा कर उस लड़की के इसे दर्षन करा दे। ये अपने आप पूछ लेगा। आखिर विवेक के भाई की साली है। कुछ तो इसका भी हक है। क्यों?’ उसने विवेक को आँख मारते हुए कहा।
‘अबे, पहले दारू खत्म करते हैं, फिर सभी अन्दर चलते हैं। वो भाभी की बहन होगी तो ठीक है और न होगी तो और भी ठीक है।’, चैथा कुत्सित भाव से बोला।
‘सालों, तुम सारे मेरे साथ आओगे क्या?’, विवेक बोला।
‘कुछ तो हमारा भी हक है भाई।’, पाँचवा ने सुर मिलाते हुए बोला।
‘भास्कर ने उसका नखषिख वर्णन ही ऐसा किया है कि उसको देखना तो बनता ही है।’ छठा बोला।
‘अबे कमीनों, पहले मुझे तो देखने दो, चल भास्कर।’, कहकर विवेक ने अपना गिलास खत्म किया और उसे एक ओर फैंकता हुआ चल पड़ा। भास्कर पहले ही अपना गिलास खाली कर चुका था। वह साथ हो लिया।
‘विवेक, साली आधी घरवाली जीजा की होती है, जीजा के भाई की नहीं…..।’ विवेक के पीछे एक ठहाका गूंजा पर उसने मुड़कर नहीं देखा।
भास्कर और विवेक अन्दर पण्डाल में पहुँचे। भास्कर चारों तरफ देखता हुआ पूर्वा को खोजने लगा। एक स्थान पर उसकी नजरें रुकी।
‘वो देख स्काई ब्लू सूट में, हड्र्ढ भइया की सास के पास खड़ी है।’
विवेक ने देखा और देखता रह गया। अभी वह दूर से देख रहा था तो ये हालत थी और पास जाकर देखेगा तो………..। ‘तू रुक, मैं जरा मिलकर आता हूं।’
‘मैं भी चलता हूं।’, भास्कर बोला।
‘समझाकर साले। तुम सब को बाद में मिलाउंगा।’, विवेक ने कहा और तुरन्त उस तरफ चल पड़ा। इससे पहले वह अपनी मां के पास गया और उन्हें छोटी बेटी के बहाने से उनकी समधन के पास ले गया।
‘कोई षिकायत तो नहीं समधन जी।’, रीता ने चेहरे पर गहरी मुस्कान लाते हुए पूछा। उनकी मेल मुलाकात पहले ही हो चुकी थी।
‘नमस्ते आण्टी जी।’, विवेक ने षहद जैसे स्वर में कहा। उसकी नजरें पूर्वा पर जमी थीं। उसका दिल कह रहा था कि ये हसीन और परी लड़की इस सांवली बेढंगी औरत की नहीं होगी।
‘नहीं जी, कोई षिकायत नहीं। इतना बढि़या इन्तजाम किया है आपने तो। जी प्रसन्न हो गया हमारा तो। वो आपकी छोटी बिटिया नहीं आई बाहर से?’, विवेक का दिल खुष हो गया। मां ने तुरन्त और ऐन टाइम पर करोड़ रुपये का सवाल किया।
अब रीता को कोई खतरा नहीं लग रहा था इसलिए उसने पूर्वा को बाहर बुला लिया था। पूर्वा तब से उसके साथ थी। पूर्वा ने बेला को देखा था। उसके चेहरे पर अभी भी संषय था। रीता का इरादा ये था कि जब तक बेला की ससुराल वाले खुद न पूछें तब तक वह पूर्वा का किसी से भी परिचय नहीं करायेगी।
‘जी हां, आ गई। अभी थोड़ी देर पहले ही पहुँची है। ये है मेरी छोटी बेटी पूर्वा।’, उसने पूर्वा का हाथ पकड़ते हुए कहा।
‘नमस्ते आण्टी।’, कहते हुए पूर्वा ने उसके पांव छू लिये।
‘हाय, बिल्कुल चाँद का टुकड़ा है। वारी जाऊं, किसी की नजर न लगे। जुग जुग जिओ’, समधन आष्चर्य से बोली।
‘हैलो, मैं विवेक। आपके जीजाजी का छोटा भाई।’, विवेक ने तनिक सर नवाते हुए अपना हाथ पूर्वा की ओर बढ़ाया।
पूर्वा उसकी गहरी और घूरती नजरों से विचलित हो गई। उसने हाथ जोड़ दिये, ‘नमस्ते विवेक जी। मैं पूर्वा।
विवेक ने अपना हाथ वापस खींच लिया और उससे उसके बारे पूछने लगा। पूर्वा धैर्य से अपने बारे में बताने लगी। दोनों समधन भी आपस में बातचीत करने लगीं। पूर्वा को लगने लगा कि ये लड़का तो फैविकोल का जोड़ बन रहा है तो वह बातचीत करते हुए विषेड्ढ को खोजने लगी। विषेड्ढ तो उसके आसपास ही था। उसकी इच्छा हुई कि वह विषेड्ढ को यहां बुला ले लेकिन तुरन्त ही उसने इस इच्छा को मार दिया।
रीता नहीं चाहती थी कि लड़के वाले पूर्वा से ज्यादा बातचीत करें। ये क्रम तोड़ने के लिए वह पूर्वा से बोली, ‘चल बिन्नो, दीदी जीजाजी से तो मिल ले। समधन जी मैं आपके लिए कुछ भिजवाती हूं। आप आराम से वहां बैठिए।’
वो पूर्वा को लेकर चली। विवेक भी पीछे-पीछे चलने लगा। विषेड्ढ उसे जाते हुए देखता रहा। उसने एक आह भरी और एक कोने में जाकर बैठ गया।
रात पौने एक बजे
दोनों परिवारों के लिए खाने के लिए मेज कुर्सियां नये सिरे से लगनी षुरू हो रही थीं। मगर उससे पहले लड़के वालों की ओर से एक प्रस्ताव आया था जिसकी घोड्ढणा खाने के दौरान की जानी चाहिए। लड़की वालों ने समय मांगा था। इस समय दो गुट बने हुए थे।
आकाष, उसका पूरा परिवार, भाई का परिवार और कुछेक अन्य रिष्तेदार एक ओर खड़े विचार विमर्ष कर रहे थे।
‘मैंने पहले ही कहा था ये स्यापा डालेगी।’, आकाष फिर अपने चिरपरिचित गुस्से में आ गया था, ‘कहा था न चली जा यहां से…………। मैं न………..मैं इस लड़की का खून कर दूंगा…….।’
पूर्वा रोने लगी।
‘इसके स्टेज पर आते ही सबसे पहले मैंने हड्र्ढ का चेहरा देखा था। कैसा दीवानों की तरह इसे घूर रहा था और छोटा वाला तो पागल ही हो गया था।’, बेला कह रही थी, ‘कैसी चुडैल है ये, दोनों भाइयों को लट्टू बना दिया।’
‘मैं तो स्टेज पर आ ही नहीं रही थी, मम्मी लेकर आई थीं।’, पूर्वा रुआंसे स्वर में बोली।
‘मम्मी पापा, ये मेरी ससुराल में हरगिज नहीं आयेगी। नैवर।’, बेला रोड्ढपूर्ण स्वर में बोली।
‘तो हम कौन सा चाह रहे हैं। तुम दोनों पहले ही नफरत की तलवार थामे हुए हो बाद में जरूर मर्डर होंगे।’, चाचा बोला।
‘तो मैं कौन सा चाहती हूं।’, पूर्वा को भी गुस्सा आ गया। साला, हरामजादा। उसने विवेक को मन ही मन गाली दी। पन्द्रह मिनट की मुलाकात में षादी के लिए राजी हो गया। मैं क्या मुफ्त बँट रही हूं? कहते है खाने की टेबल पर रिष्ता एनाउंस कर दो, षादी चाहे दो-तीन साल बाद कर देना। बाप का राज है। उसे फिर से वोदका की जरूरत होने लगी थी। अगर थोड़ी सी मिल जाये तो जाकर इसका बैण्ड बजा दूं।
‘हमें उनसे माफी मांग लेनी चाहिए।’, सोमना चाची बोली, ‘कह देना कि हमारे यहां दोनांे बहनों को एक ही घर में देने का रिवाज नहीं है क्योंकि दोनों बहने कभी सुखी नहीं रहतीं। ज्यादा जोर दें तो एक दो काल्पनिक हवाले दे देना।’
‘चाची ठीक कह रही हैं, यही बहाना काम आयेगा।’, रीता आष्वस्तपूर्ण स्वर में बोली।
‘अगर ये जीजा का भाई नहीं होता तो साले का मुँह तोड़ देता।’, कुष आवेष से बोला।
‘मेरा भी यही मन कर रहा है कि उसका मुँह तोड़ दूं।’, पूर्वा के मुँह से निकला।
‘यहां हमारी जान अटकी हुई है और ये मार पिटाई की बात कर रहे हैं।’, आकाष बोला। अब उसका स्वर तीखा नहीं था। उसे भी लग रहा था कि सोमना चाची वाला आइडिया ठीक है।
‘यही ठीक रहेगा। मैं यही बोल दूंगा।’, वह निष्चयपूर्ण स्वर में बोला।
पूर्वा ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला लेकिन फिर चुप ही रही। उसकी कोई नहीं सुनेगा और इस समय तो बिल्कुल भी नहीं। लेकिन उसने किसी को सुनाना तो है।
तभी फोटोग्राफर वहां आया और दुल्हन से बोला, ‘मैडम, आप दोनों के कुछ कम्बाइन्ड फोटो रह गये हैं, वो करा लीजिए। जब तक खाना लगेगा तब तक पूरा हो जायेगा।’
बेला उसके साथ चल दी। गुट बिखर गया। पण्डाल में अब परिवार के लोगों के अलावा कुछेक लोग और थे। उनसे ज्यादा लोग तो कैटरिंग और वेटर वगैरह स्टाफ के थे। पूर्वा ने देखा विवेक उसको हसरत भरी निगाहों से देखता हुआ अपने दोस्तों के पास जा रहा था जो एक कोने मंे घेरा डालकर बैठे खाना खा रहे थे। विषेड्ढ भी उन सभी से दूर बैठा हुआ था और वह भी उसे देख रहा था। हसरतें तो उसके नेत्रों में भी थीं, पर पूर्वा को महसूस नहीं हो रही थी।
पूर्वा अनिष्चित थी। उसे लग रहा था कि पापा का जवाब इन लोगों के गले नहीं उतरेगा और ये किसी न किसी बहाने जोर देते रहेंगे। उसने खुद ही कुछ करने का निर्णय किया। अगर उसके कुछ करने से बात बन जाती है तो बढि़या वर्ना सबका टारगेट तो वह है ही। हर कोई उसके सीने में गोली मार रहा है। मुसीबत की बहुत बड़ी जड़। जड़ मुस्कुराई।
वह सधे कदमों से विवेक की ओर बढ़ी। जब वह वहां पहुँची तो सभी खाना छोड़कर उसे देखने लगे।
‘विवेक जी, जरा आप मेरे साथ आयेंगे?’, उसने संयत स्वर में कहा।
‘हां, हां क्यों नहीं।’, विवेक जो अभी कुर्सी पर बैठा ही था, उठ खड़ा हुआ। उसने एक नजर अपने दोस्तों पर डाली और पूर्वा के साथ हो लिया। पूर्वा उसे ऐसे स्थान पर ले गई जहां वह और विवेक सीधे सीधे उसके घरवालों को नहीं दिख सकते थे।
‘जी पूर्वा जी बतायें?’, वह उत्कण्ठापूर्ण स्वर मे बोला।
‘देखो, सीधी बात नो बकवास……….’, पूर्वा को एक विज्ञापन की लाइनें याद आयीं, ‘ये जो षादी हो रही है वही काफी है और मेरा अभी षादी करने का कोई इरादा भी नहीं है और न ही आने वाले समय में। और आपकी जानकारी के लिए……..वो जो नेवी ब्लू जैकेट में लड़का देख रहे हो जो वहां अकेला बैठा है, उसका नाम विषेड्ढ सहाय है। मैं जब भी षादी करूंगी, उससे ही करूंगी और ये बात मेरी मां को मालूम है। अगर आपने या और किसी ने मेरे मम्मी पापा पर ज्यादा दबाव डाला तो इसी मण्डप में मैं उससे षादी कर लूंगी। सारी आषिकी यहीं स्वाहा हो जायेगी……..। तो विवेक जी, प्लीज स्पेयर मी…….। अगर आप अपनी ये इच्छा, ये अरमान, पहले मुझसे डिस्कस कर लेते तो न मेरे घरवाले परेषान होते और न आपके………’
वह उसकी प्रतिक्रिया देखने के लिए नहीं रुकी और लम्बे कदम बढ़ाती हुई विषेड्ढ की ओर चल दी।

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