एक अनोखा बंधन compleet

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rajaarkey
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Re: एक अनोखा बंधन

Postby rajaarkey » 13 Oct 2014 14:25

एक अनोखा बंधन--27

गतान्क से आगे.....................

प्यार हमें हर तरह के रंग दीखता है. लड़ाता भी है, हँसाता भी है, रुलाता भी है और कभी-कभी प्यारी सी नोक झोंक पैदा कर देता है रिश्ते में. प्यार का हर रंग अनमोल और अद्विद्या है. चुंबन का भी अपना ही महत्व है. चुंबन तो बस एक बहाना है प्यार का मकसद हमें ऐसी जगह ले जाना है जहा हम बस एक दूसरे में खो जायें. क्योंकि प्यार एक दूसरे में खो कर ही होता है…अपने आप में होश में रह कर नही………

आदित्य नहा कर चुपचाप दबे पाँव बाहर निकला वॉशरूम से. ज़रीना बिस्तर पर आँखे बंद किए पड़ी थी.

“खाने का ऑर्डर कर दिया क्या?”

“हां कर दिया…आता ही होगा?” ज़रीना ने कहा.

आदित्य ज़रीना के पास आकर बैठ गया और बोला, “क्या हुवा फिर से चेहरे पर 12 बजा रखे हैं…अब कौन सी नयी समस्या है तुम्हारी.”

“कुछ नही…बस सोच रही थी की सिमरन के घर वाले मान तो जाएँगे ना.”

“बातचीत करने से हर मसला हाल हो जाता है ज़रीना. हम एक कोशिस करेंगे बाकी भगवान की मर्ज़ी.”

“आदित्य तुम मुझे चिढ़ा क्यों रहे थे…तुम्हे शरम नही आती ऐसा बोलते हुवे. मैं तुमसे नाराज़ हूँ.”

“उफ्फ अभी तक नाराज़ हो. जाओ नहा कर आओ फटाफट… दीमाग ठंडा हो जाएगा. और किसी बात की चिंता मत करो सब ठीक होगा.” आदित्य ने कहा.

……………………………………………………………….

अगली सुबह आदित्य और ज़रीना मुंबई एरपोर्ट के लिए निकल पड़े. दोपहर 12 बजे वो देल्ही में थे. सिमरन कारोल बाग में रहती थी. उन्होने कारोल बाग में ही एक होटेल में रूम ले लिया.

कुछ घंटे रेस्ट करने के बाद ज़रीना को होटेल में ही छ्चोड़ कर आदित्य सिमरन के घर आ गया. सिमरन घर में सब कुछ बता चुकी थी इश्लीए आदित्य का कोई ख़ास स्वागत नही हुवा.

“तो तुम अब जले पर नमक छिड़कने आए हो” सिमरन के पापा ने कहा. सिमरन एक तरफ खड़ी सब सुन रही थी.

“जी नही मैं माफी माँगने आया हूँ. आप मुझे माफ़ कर दीजिए. सिमरन ने आपको सब कुछ बता ही दिया है. हम सभी के लिए यही अछा है कि हम बैठ कर आपस में ही इसका हल निकाल लें. कोर्ट जाने से हमारा वक्त ही बर्बाद होगा. मानता हूँ मेरा स्वार्थ है इसमें पर इसमें आप लोगो का भी भला ही है”

सिमरन के पापा कुछ बोले बिना उठ कर चले गये. सिमरन ने आदित्य को इशारा किया मैं समझाती हूँ इन्हे तुम चिंता मत करो.

आदित्य चुपचाप वही बैठा रहा. कोई एक घंटे बाद सिमरन सिमरन कमरे में दाखिल हुई.

“आप अभी जाओ…कल इसी वक्त आ जाना तब तक मैं पापा को मना लूँगी. वो मेरी बात नही टालेंगे.”

“ठीक है सिमरन…सॉरी तुम लोगो को डिस्टर्ब करने के लिए पर मेरे पास कोई चारा नही था. ये मामला कोर्ट में पता नही कब तक लटका रहेगा. तुम तो लॉ स्टूडेंट हो ये बात बखूबी समझ सकती हो.”

“हां मैं समझ रही हूँ. पापा भी समझ जाएँगे. कल से आगे नही जाएगी बात.”

“थॅंक यू सिमरन…चलता हूँ मैं.”

“ज़रीना कहा है?”

“साथ ही आई है. होटेल में छ्चोड़ कर आया हूँ. वो अकेले मुझे कही जाने ही नही देती.”

“ये तो अच्छी बात है ना. उसे देल्ही घूमाओ आप आज. कल आएँगे तो निराश नही जाएँगे यहा से.”

“जानता हूँ. आपके होते हुवे निराशा हो ही नही सकती. चलता हूँ मैं.” आदित्य घर से बाहर निकल आया.

अगले दिन जब आदित्य सिमरन के घर पहुँचा तो सिमरन के पापा ने उसे देख कर गहरी साँस ली और बोले, “ठीक है मैं कुछ लोगो को बुलाता हूँ. आज ही ये किस्सा निपटा देते हैं. और ये मैं तुम्हारे लिए नही बल्कि अपनी बेटी के लिए कर रहा हूँ. इसका भी इस बंधन से आज़ाद होना ज़रूरी है ताकि हम इसका घर बसाने की सोच सकें तुमने तो उजाड़ने में कोई कसर नही छ्चोड़ी.”

आदित्य ने चुप रहना ही सही समझा.जब आप मूह तक पानी में डूबे हों तो मूह बंद ही रखना चाहिए वरना दिक्कतें और ज़्यादा बढ़ सकती हैं. आदित्य ये बात बखूबी समझ रहा था.

कुछ लोग इकट्ठा हुवे उस घर में और स्टंप पेपर पर आदित्य और सिमरन को वैवाहिक संबंध से आज़ाद कर दिया. स्टंप पेपर की एक कॉपी सिमरन के पापा ने रख ली और एक आदित्य को थमा दी.

आदित्य अपनी खुशी छुपा नही पाया और सिमरन के पापा के पाँव छू लिए आगे बढ़ कर, “ये अहसान मैं जींदगी भर नही भूलूंगा.”

“हम भी तुम्हे जींदगी भर नही भूलेंगे.”

आदित्य को सिमरन कही दीखाई नही दे रही थी. वो उसे बाइ करना चाहता था जाने से पहले. उसने सिमरन के बारे में पूछना सही नही समझा क्योंकि माहॉल गरम था. वो स्टंप पेपर को लेकर चुपचाप बाहर आ गया.

बाहर आकर उसने पीछे मूड कर देखा तो पाया की सिमरन छत पर खड़ी थी. जैसे ही दोनो की नज़रे टकराई सिमरन ने हंसते हुवे हाथ हिला कर अलविदा कहा.
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Re: एक अनोखा बंधन

Postby rajaarkey » 13 Oct 2014 14:25

आदित्य की आँखे नम हो गयी सिमरन को देख कर. “मुझे माफ़ करना सिमरन. तुम्हारे सच्चे प्यार को ठुकरा दिया मैने. लेकिन कोई चारा नही था सिमरन. मेरे रोम-रोम में ज़रीना बस चुकी है. मैं चाहूं तो भी खुद को ज़रीना से जुदा नही कर सकता क्योंकि मर जाउन्गा उस से जुदा होते ही. यही दुवा करता हूँ की हमेशा खुस रहो तुम. जींदगी में कोई भी गम या दुख तुम्हारे पास भी ना भटक पाए. हे भगवान सिमरन को हमेशा खुश रखना.”

आदित्य आँखो में नमी लिए आगे बढ़ गया. होटेल तक पहुँचते-पहुँचते आँखो की नमी सूख चुकी थी और धीरे-धीरे उनमें एक अद्भुत चमक उभरने लगी थी. अब आदित्य और ज़रीना की शादी में कोई रुकावट नही थी. आदित्य ये बात सोच-सोच कर झूम रहा था. पाँव ज़मीन पर नही टिक रहे थे उसके.

आदित्य होटेल की तरफ बढ़ते हुवे ये गीत गुनगुना रहा था:

♫♫♫♫…….ऐसा लगता है मैं हवाओ में हूँ….आज इतनी ख़ुसी मिली है

आज बस में नही है मन मेरा…आज इतनी ख़ुसी मिली है……♫♫♫♫

आदित्य ने जब होटेल के कमरे की बेल बजाई. ज़रीना ने भाग कर दरवाजा खोला.

“क्या हुवा आदित्य?”

“तुम्हे क्या लगता है…”

“जल्दी बताओ ना प्लीज़…मेरी साँसे अटकी हुई हैं जान-ने के लिए.”

आदित्य ने जेब से निकाल कर स्टंप पेपर दिखाया और बोला, “अब हमारी शादी में कोई रुकावट नही है जान. हम जब जी चाहे शादी कर सकते हैं.”

“सच!” ज़रीना उछल पड़ी ये बात सुन कर.

“हां अब तुम जी भर कर खेलना मेरे होंटो से…जितना जी चाहे उतना झुलसा देना इन्हे अपने अंगरो से. मैं उफ्फ तक नही करूँगा. तुम्हारी किस का कोई जवाब नही.”

“आदित्य तुम मार खाओगे अब मुझसे.”

“अपने होने वाले पति को मारोगी तुम.”

“पागल हो क्या…मज़ाक कर रही हूँ.”

“पता है मुझे…अब ये बताओ कब बनोगी मेरी दुल्हनिया.”

“आज, अभी…इसी वक्त…बनाओगे क्या बोलो.”

“ख़ुसी-ख़ुसी……बस एक बात बात बताओ हिंदू रीति रिवाज से शादी करना चाहोगी या फिर मुस्लिम रीति रिवाज से.”

“उस से कुछ फरक पड़ेगा क्या?”

“बिल्कुल भी नही?”

“फिर क्यों पूछ रहे हो.”

“यू ही तुम्हारा व्यू लेना चाहता था इस बारे में.”

“मेरा कोई व्यू नही है इस बारे में सच कह रही हूँ मैं. तुम मुझे जैसे चाहो अपनी दुल्हन बना लो. वैसे तुम्हारे भगवान के मंदिर में शादी करना चाहती हूँ मैं तुमसे. तुम मुझे एक साल बाद मंदिर में ही तो मिले थे.”

“पक्का…”

“हां पक्का.”

“ठीक है फिर. हम देल्ही से ही शादी करके चलते हैं. तुम अब अपने घर में मेरी दुल्हन बन कर ही प्रवेश करोगी.”

“आज जाकर दिल को शुकून मिला है. अल्लाह अब कोई और मुसीबत ना डाले हमारी शादी में.”

“कोई मुसीबत नही आएगी. बी पॉज़िटिव. जींदगी में उतार चढ़ाव तो चलते रहते हैं. तुम्हारी मौसी को भी बुला लेंगे हम.”

“नही…नही मौसी को मत बुलाओ. किसी को वाहा भनक भी लग गयी तो तूफान मचा देंगे लोग. तुम नही जानते उन्हे. जीतने कम लोग हों उतना अच्छा है.”

“ह्म्म बात तो सही कह रही हो.”

“जान बस और वेट नही होता मुझसे. मैं अभी सब इंटेज़ाम करके आता हूँ. हम कल सुबह शादी कर लेंगे”

“हां आदित्या बस अब और नही. मुझे मेरा हक़ दे दो ताकि दुनिया के सामने सर उठा कर जी सकूँ.”

आदित्य निकल तो दिया होटेल से शादी का इंटेज़ाम करने के लिए पर उसे इस काम में बहुत भाग दौड़ करनी पड़ी. मंदिरों के पुजारी तैयार ही नही थे शादी करवाने के लिए.आदित्य दरअसल हर जगह ज़रीना का नाम ले कर ग़लती कर रहा था. ज़रीना का नाम सुनते ही पुजारी मना कर देते थे. लेकिन दुनिया में हर तरह के लोग रहते हैं. एक जगह पुजारी ना बल्कि तैयार हुवा शादी करवाने को बल्कि बहुत खुश भी हुवा हिंदू-मुस्लिम का ये प्यार देख कर.

“बेटा मैं तो शोभाग्य समझूंगा अपना ये शादी करवा कर. तुम लोग सुबह ठीक 11 बजे आ जाना यहा.”

“पंडित जी हम दोनो यहा किसी को नही जानते. कन्या दान कैसे होगा..कोन करेगा.”

“उसका इंटेज़ाम भी हो जाएगा. मेरे एक मित्र हैं वो ख़ुसी ख़ुसी कर देंगे ये काम. तुम चिंता मत करो बस वक्त से पहुँच जाना. दोपहर बाद मुझे एक पाठ करने जाना है.”

“धन्यवाद पंडित जी. आप चिंता ना करें. हम वक्त से पहुँच जाएँगे.”

मंदिर में शादी का इंटेज़ाम करने के बाद आदित्य कपड़ो के शोरुम में घुस गया और ज़रीना के लिए लाल रंग की एक सारी खरीद ली. सारी लेकर वो ख़ुसी ख़ुसी होटेल की तरफ चल दिया.

होटेल पहुँच कर उसने ज़रीना को सारी दीखाई तो ज़रीना ने कुछ ख़ास रेस्पॉन्स नही दिया.

“क्या हुवा…क्या सारी पसंद नही आई?”

“मैं ये नही पहन सकती. ये शेड मुझे पसंद नही”

“हद है इतने प्यार से लाया हूँ मैं ज़रीना और तुम ऐसे बोल रही हो.” आदित्य सारी को बिस्तर पर फेंक कर वॉशरूम में घुस गया.

आदित्य वॉशरूम से बाहर आया तो ज़रीना उस से लिपट गयी.

क्रमशः...............................
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Re: एक अनोखा बंधन

Postby rajaarkey » 13 Oct 2014 14:26

Ek Anokha Bandhan--27

gataank se aage.....................

Pyar hamein har tarah ke rang deekhata hai. ladaata bhi hai, hansata bhi hai, rulaata bhi hai aur kabhi-kabhi pyari si nok jhonk paida kar deta hai rishte mein. Pyar ka har rang anmol aur advidya hai. chumban ka bhi apna hi mahatva hai. chumban to bas ek bahaana hai pyar ka maksad hamein aisi jagah le jaana hai jaha hum bas ek dusre mein kho jaayein. Kyonki pyar ek dusre mein kho kar hi hota hai…apne aap mein hosh mein rah kar nahi………

Aditya naha kar chupchaap dabe paanv baahar nikla washroom se. zarina bistar par aankhe band kiye padi thi.

“khaane ka order kar diya kya?”

“haan kar diya…aata hi hoga?” zarina ne kaha.

Aditya zarina ke paas aakar baith gaya aur bola, “kya huva phir se chehre par 12 baja rakhe hain…ab kaun si nayi samashya hai tumhaari.”

“kuch nahi…bas soch rahi thi ki simran ke ghar wale maan to jaayenge na.”

“baatcheet karne se har masla hal ho jaata hai zarina. Hum ek koshis karenge baaki bhagvaan ki marji.”

“aditya tum mujhe chidha kyon rahe the…tumhe sharam nahi aati aisa bolte huve. Main tumse naraaz hun.”

“uff abhi tak naraaz ho. Jaao naha kar aao fatafat… deemag thanda ho jaayega. Aur kishi baat ki chinta mat karo sab theek hoga.” Aditya ne kaha.

……………………………………………………………….

Agli subah aditya aur zarina mumbai airport ke liye nikal pade. Dopahar 12 baje vo delhi mein the. Simran karol bagh mein rahti thi. Unhone karol bagh mein hi ek hotel mein room le liya.

Kuch ghante rest karne ke baad zarina ko hotel mein hi chhod kar aditya simran ke ghar aa gaya. simran ghar mein sab kuch bata chuki thi ishliye aditya ka koyi khaas sawaagat nahi huva.

“to tum ab jale par namak chidakne aaye ho” simran ke papa ne kaha. Simran ek taraf khadi sab shun rahi thi.

“ji nahi main maafi maange aaya hun. Aap mujhe maaf kar dijiye. Simran ne aapko sab kuch bata hi diya hai. hum sabhi ke liye yahi acha hai ki hum baith kar aapas mein hi ishka hal nikaal lein. Court jaane se hamaara vakt hi barbaad hoga. Maanta hun mera swaarth hai ishmein par ishmein aap logo ka bhi bhala hi hai”

Simran ke papa kuch bole bina uth kar chale gaye. simran ne aditya ko ishaara kiya main samjhaati hun inhe tum chinta mat karo.

Aditya chupchaap vahi baitha raha. Koyi ek ghante baad simran simran kamre mein daakhil huyi.

“aap abhi jaao…kal ishi vakt aa jaana tab tak main papa ko mana lungi. Vo meri baat nahi taalenge.”

“theek hai simran…sorry tum logo ko disturb karne ke liye par mere paas koyi chaara nahi tha. ye maamla court mein pata nahi kab tal latka rahega. Tum to law student ho ye baat bakhubi samajh sakti ho.”

“haan main samajh rahi hun. Papa bhi samajh jaayenge. Kal se aage nahi jaayegi baat.”

“thank you simran…chalta hun main.”

“zarina kaha hai?”

“saath hi aayi hai. hotel mein chhod kar aaya hun. Vo akele mujhe kahi jaane hi nahi deti.”

“ye to atchi baat hai na. ushe delhi ghumaao aap aaj. Kal aayenge taha to niraash nahi jaayenge yaha se.”

“jaanta hun. Aapke hote huve niraasha ho hi nahi sakti. Chalta hun main.” aditya ghar se baahar nikal aaya.

Agle din jab aditya simran ke ghar pahuncha to simran ke papa ne ushe dekh kar gahri saans li aur bole, “theek hai main kuch logo ko bulaata hun. Aaj hi ye kissa nipta dete hain. Aur ye main tumhaare liye nahi balki apni beti ke liye kar raha hun. Ishka bhi ish bandhan se azaad hona jaroori hai taaki hum ishka ghar basaane ki soch sakein tumne to ujaadne mein koyi kasar nahi chhodi.”

Aditya ne chup rahna hi sahi samjha.jab aap muh tak paani mein dube hon to muh band hi rakhna chaahiye varna dikkatein aur jyada badh sakti hain. Aditya ye baat bakhubi samajh raha tha.

Kuch log ikkatha huve ush ghar mein aur stamp paper par aditya aur simran ko vaivahik sambandh se azaad kar diya. Stamp paper ki ek copy simran ke papa ne rakh li aur ek aditya ko thama di.

Aditya apni khussi chupa nahi paaya aur simran ke papa ke paanv chu liye aage badh kar, “ye ahsaan main jeendagi bhar nahi bhulunga.”

“hum bhi tumhe jeendagi bhar nahi bhulenge.”

Aditya ko simran kahi deekhayi nahi de rahi thi. vo ushe bye karna chaahta tha jaane se pahle. Ushne simran ke baare mein puchna sahi nahi samjha kyonki maahol garam tha. vo stamp paper ko lekar chupchaap baahar aa gaya.

Baahar aakar ushne peeche mud kar dekha to paaya ki simran chatt par khadi thi. jaise hi dono ki nazre takraayi simran ne hanste huve haath hila kar alvida kaha.

Aditya ki aankhe nam ho gayi simran ko dekh kar. “mujhe maaf karna simran. Tumhaare sache pyar ko thukra diya maine. Lekin koyi chara nahi tha simran. Mere rom-rom mein zarina bas chuki hai. main chaahun to bhi khud ko zarina se juda nahi kar sakta kyonki mar jaaunga ush se juda hote hi. Yahi duva karta hun ki hamesa khus raho tum. Jeendagi mein koyi bhi gam ya dukh tumhaarev paas bhi na bhatak paaye. Hey bhagvaan simran ko hamesa khuss rakhna.”

Aditya aankho mein nami liye aage badh gaya. hotel tak pahunchte-pahunchte aankho ki nami sookh chuki thi aur dheere-dheere unmein ek adbhut chamak ubharne lagi thi. ab aditya aur zarina ki shaadi mein koyi rukaavat nahi thi. aditya ye baat soch-soch kar jhum raha tha. paanv jamin par nahi tik rahe the ushke.

Aditya hotel ki taraf badhte huve ye geet gunguna raha tha:

♫♫♫♫…….aisa lagta hai main havaao mein hun….aaj itni khusi mili hai

Aaj bas mein nahi hai man mera…aaj itni khusi mili hai……♫♫♫♫

Aditya ne jab hotel ke kamre ki bell bajaayi. Zarina ne bhaag kar darvaaja khola.

“kya huva aditya?”

“tumhe kya lagta hai…”

“jaldi bataao na please…meri saanse atki huyi hain jaan-ne ke liye.”

Aditya ne jeb se nikaal kar stamp paper deekhaya aur bola, “ab hamaari shaadi mein koyi rukaavat nahi hai jaan. Hum jab jee chaahe shaadi kar sakte hain.”

“sach!” zarina uchal padi ye baat shun kar.

“haan ab tum jee bhar kar khelna mere honto se…jitna jee chaahe utna jhulsa dena inhe apne angaro se. main uff tak nahi karunga. Tumhaari kiss ka koyi jawaab nahi.”

“aditya tum maar khaaoge ab mujhse.”

“apne hone wale pati ko maarogi tum.”

“paagal ho kya…majaak kar rahi hun.”

“pata hai mujhe…ab ye bataao kab banogi meri dulhaniya.”

“aaj, abhi…ishi vakt…banaaoge kya bolo.”

“khusi-khusi……bas ek baat baat bataao hindu riti rivaaj se shaadi karna chaahogi ya phir muslim riti rivaaj se.”

“ush se kuch farak padega kya?”

“bilkul bhi nahi?”

“phir kyon puch rahe ho.”

“yu hi tumhaara view lena chaahta tha ish baare mein.”

“mera koyi view nahi hai ish baare mein sach kah rahi hun main. Tum mujhe jaise chaaho apni dulhan bana lo. Vaise tumhaare bhagvaan ke mandir mein shaadi karna chaahti hun main tumse. Tum mujhe ek saal baad mandir mein hi to mile the.”

“pakka…”

“haan pakka.”

“theek hai phir. Hum delhi se hi shaadi karke chalte hain. Tum ab apne ghar mein meri dulhan ban kar hi parvesh karogi.”

“aaj jaakar dil ko shukun mila hai. allaah ab koyi aur musibat na daale hamaari shaadi mein.”

“koyi musibat nahi aayegi. Be positive. Jeendagi mein utaar chadhaav to chalte rahte hain. Tumhaari mausi ko bhi bula lenge hum.”

“nahi…nahi mausi ko mat bulaao. Kishi ko vaha bhanak bhi lag gayi to toofan macha denge log. Tum nahi jaante unhe. Jitne kam log hon utna acha hai.”

“hmm baat to sahi kah rahi ho.”

“jaan bas aur wait nahi hota mujhse. Main abhi sab intezaam karke aata hun. hum kal subah shaadi kar lenge”

“haan aditya bas ab aur nahi. Mujhe mera haq de do taaki duniya ke saamne sar utha kar jee sakun.”

Aditya nikal to diya hotel se shaadi ka intezaam karne ke liye par ushe ish kaam mein bahut bhaag daud karni padi. Mandiron ke pujari taiyaar hi nahi the shaadi karvaane ke liye.aditya darasal har jagah zarina ka naam le kar galti kar raha tha. zarina ka naam shunte hi pujari mana kar dete the. lekin duniya mein har tarah ke log rahte hain. Ek jagah pujari na balki taiyaar huva shaadi karvaane ko balki bahut khuss bhi huva hindu-muslim ka ye pyar dekh kar.

“beta main to shobhagya samjhunga apna ye shaadi karva kar. Tum log subah theek 11 baje aa jaana yaha.”

“pandit ji hum dono yaha kishi ko nahi jaante. Kanya daan kaise hoga..kon karega.”

“ushka intezaam bhi ho jaayega. Mere ek mitra hain vo khusi khusi kar denge ye kaam. Tum chinta mat karo bas vakt se pahunch jaana. dopahar baad mujhe ek paath karne jaana hai.”

“dhanyavaad pandit ji. Aap chinta na karein. Hum vakt se pahunch jaayenge.”

Mandir mein shaadi ka intezaam karne ke baad aditya kapdo ke showroom mein ghuss gaya aur zarina ke liye laal rang ki ek saree kharid li. Saree lekar vo khusi khusi hotel ki taraf chal diya.

Hotel pahunch kar ushne zarina ko saree deekhayi to zarina ne kuch khaas response nahi diya.

“kya huva…kya saree pasand nahi aayi?”

“main ye nahi pahan sakti. Ye shade mujhe pasand nahi”

“had hai itne pyar se laaya hun main zarina aur tum aise bol rahi ho.” Aditya saree ko bistar par fenk kar washroom mein ghuss gaya.

Aditya washroom se baahar aaya to zarina ush se lipat gayi.

kramashah...............................
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Re: एक अनोखा बंधन

Postby rajaarkey » 13 Oct 2014 14:27

एक अनोखा बंधन--28

गतान्क से आगे.....................

“नाराज़ क्यों होते हो आदित्य. मेरी ज़ींदगी का इतना बड़ा दिन है और मैं अपनी पसंद का कुछ पहन-ना चाहती हूँ तो क्या ये ग़लत है. ये दिन जींदगी भर याद रहेगा हमें. देखो याद रखो कोई लड़ाई नही करनी है हमें. लड़ाई का परिणाम देख चुके हैं हम.”

“लड़ाई तो बेसक करेंगे जान पर एक दूसरे को छ्चोड़ कर नही जाएँगे. अब हम शादी के बंधन में बँधने जा रहे हैं. ये बात गाँठ बाँध लेते हैं की कभी एक दूसरे का साथ नही छ्चोड़ेंगे. क्योंकि छ्चोड़ेंगे भी तो पछताना भी हमें ही पड़ेगा.”

“हां ये तो हम देख ही चुके हैं. दूसरी सारी ले लेते हैं ना आदित्य…प्लीज़.”

“अरे पागल प्लीज़ क्यों बोल रही हो. एनितिंग फॉर यू. चलो अभी लेकर आते हैं तुम्हारी मन पसंद सारी. मेरी ज़रीना दुल्हन बन-ने जा रही है कोई मज़ाक नही है”

“आदित्य बहुत खर्चा करवा रही हूँ तुम्हारा. शरम सी तो आती है पर क्या करूँ. 10 लाख की एफडी है मेरे नाम…वो दहेज में दे रही हूँ तुम्हे. पूरी भरपाई कर लेना.”

“ये क्या बकवास कर रही हो ज़रीना. तुम्हारा मेरा क्या अलग-अलग है.”

“मुझे ताना दिया गया था इस बात का आदित्य. बहुत बुरा लगा था मुझे. मैं कोई तुम्हारी दौलत के पीछे नही हूँ. तुम तो जानते ही हो ना, मेरे अब्बा का भी तो अच्छा बिज़्नेस था. दंगो ने सब तबाह कर दिया.”

“मैं जानता हूँ जान. दुनिया तो कुछ भी कहती है. सचाई तो हम जानते हैं ना. चलो अब तुम्हारे लिए प्यारी सी सारी लेकर आते हैं.”

“तुम भी तो कुछ नया खरीद लो ना. शादी में पुराने कपड़े नही पहने जाते.” ज़रीना ने कहा.

“ऐसा है क्या…चलो फिर मैं भी खरीद लेता हूँ.”

शादी हो रही थी दोनो की. ये बात सोच कर ही झूम उठते थे दोनो. बहुत मुश्किल से ये खुशी पाने जा रहे थे दोनो. एक लंबा इंतेज़ार किया था दोनो ने. ज़रीना ने अपनी मन पसंद सारी खरीदी. आदित्य ने भी अपने लिए एक नयी पॅंट शर्ट ले ली. ख़ुसनसीब थे दोनो जो की एक साथ अपनी शादी की शॉपिंग कर रहे थे. ये अवसर हमारे समाज में हर किसी को नही मिलता.

शॉपिंग करने के बाद वो जब होटेल की तरफ जा रहे थे तो एक अज़ीब सी सुंदर सी मुस्कुराहट थी दोनो के चेहरे पर. चेहरे के ये भाव उनके दिलो में बसी ख़ुसी का इज़हार कर रहे थे.

होटेल पहुँच कर दोनो बिस्तर पर गिर गये. आदित्य एक कोने पर था और ज़रीना दूसरे कोने पर. बहुत थक गये थे दोनो.

“ज़रीना!”

“हां आदित्य”

“आइ लव यू सूऊऊ मच.”

“आइ लव यू टू.”

“शादी तो कर रहा हूँ तुमसे मगर अब एक चिंता सता रही है.” आदित्य ने कहा.

ये सुनते ही ज़रीना के चेहरे पर चिंता की लकीरे उभर आई. वो आदित्य की तरफ मूडी और बोली, “कैसी चिंता आदित्य.”

“रहने दो तुम्हे बुरा लगेगा” आदित्य ने कहा.

“बोलो आदित्य प्लीज़…मेरा दिल बैठा जा रहा है.” ज़रीना ने कहा.

“उस दिन के चुंबन से मेरे होन्ट अभी तक झुलस रहे हैं. शादी के बाद मेरा क्या होगा ज़रीना. कैसे झेलूँगा मैं तुम्हारे अंगारों को. यही चिंता सता रही है.”

“आदित्य मैं मारूँगी तुम्हे तुमने दुबारा ऐसा मज़ाक किया तो. अब से कोई चुंबन नही होगा हमारे बीच.”

“क्यों नही होगा!...ऐसा क्यों बोल रही हो.”

“बोल दिया तो बोल दिया.”

आदित्य ने ज़रीना का हाथ थाम लिया और उसे अपने तरफ झटका दिया. दोनो बहुत करीब आ गये. चेहरे बिल्कुल आमने सामने थे. साँसे टकरा रही थी दोनो की.

“छ्चोड़ो मुझे आदित्य.”

“तुम्हारे होंटो के अंगारों से झुलस जाना चाहता हूँ मैं. रख दो ये अंगारे मेरे होंटो पर जान मैं फिर से उसी अहसास को जीना चाहता हूँ.”

“ना मेरे होन्ट अंगारे हैं और ना मैं इन्हे कही रखूँगी छ्चोड़ो मुझे.”

“उफ्फ गुस्से में तो तुम और भी ज़्यादा सुंदर लगती हो. मन तो कर रहा है तुम्हारे होंटो पर होन्ट रखने का पर तुम्हारी मर्ज़ी के बिना नही रखूँगा.”

“मेरी मर्ज़ी कभी नही होगी अब. तुम मज़ाक उड़ाते हो मेरा. छ्चोड़ो मुझे.”

“कभी सपने में भी नही सोचा था कि इस नकचाढ़ि को प्यार करूँगा और इसके होंटो पर अपने होन्ट रखूँगा. कॉलेज टाइम में ऐसा विचार भी आता तो मुझे उल्टी आ जाती. इतनी नापसंद थी तुम मुझे.”

“ये…ये..ये…तुम बड़े मुझे पसंद थे. सर फोड़ने का मन करता था तुम्हारा.उस वक्त तुमसे प्यार का सोचने से पहले स्यूयिसाइड कर लेती मैं. बहुत ज़्यादा बेकार लगते थे तुम मुझे.”

“आज ऐसा क्या है ज़रीना कि हम एक साथ इस बिस्तर पर पड़े हैं एक दूसरे के इतने करीब.”

“तुमने ज़बरदस्ती रोक रखा है मुझे अपने करीब. कॉन तुम्हारे करीब रहना चाहता है.”

“चलो फिर छ्चोड़ दिया तुम्हारा हाथ. जाओ जहा जाना है.” आदित्य ने ज़रीना का हाथ छ्चोड़ दिया.

ज़रीना आदित्य के पास से बिल्कुल नही हिली. आँखे बंद करके वही पड़ी रही.

“क्या हुवा जान…जाओ ना. मैने तुम्हारा हाथ छ्चोड़ दिया है.”

ज़रीना ने आदित्य की छाती में ज़ोर से मुक्का मारा.

“आउच…इतनी ज़ोर से क्यों मारा.” आदित्य कराह उठा.

“तुम्हे पता है ना कि मैं तुमसे दूर नही रह सकती इश्लीए ये सब मज़ाक करते हो.” ज़रीना ने कहा.

“अफ जान निकाल दी मेरी. बहुत ख़तरनाक हो तुम.” आदित्य ने कहा.

ज़रीना ने आदित्य की छाती पर हाथ रखा और उसे मसल्ते हुवे बोली, “ज़्यादा ज़ोर से लगी क्या?”

“तुम जब मारती हो तो ज़ोर से ही मारती हो.”

“तुम मुझे यू सताते क्यों हो फिर. शरम भी आती है किसी को ये बाते सुन कर.”

“किसको शरम आती है? इस कमरे में तुम्हारे और मेरे शिवा भी कोई है क्या.”

“आदित्य तुम इतने शैतान निकलोगे मैने सोचा नही था.” ज़रीना ने कहा.
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Re: एक अनोखा बंधन

Postby rajaarkey » 13 Oct 2014 14:27

“ऐसा तो नही था कभी. तुमने दीवाना बना दिया मुझे जान. तुम मेरा पहला प्यार हो. तुमसे पहले ज़्यादा इनटरेक्षन नही रहा लड़कियों से.”

“जानती हूँ मैं. मेरा तो इंटेरेस्ट ही नही था किसी से दोस्ती करने में. मैं भी बस तुम्हे जानती हूँ. मेरा पहला और आखरी प्यार तुम ही हो.”

“इतनी प्यारी बात कर रही हो. एक प्यारी सी किस दे दो ना और जला दो मेरे होंटो को एक बार फिर से.”

“जल कर राख हो जाओगे रहने दो हिहिहीही.” ज़रीना ने हंसते हुवे कहा.

“तुम मुझे खाक में मिला दो तो भी चलेगा. तुम्हारे हुस्न की आग में जलना चाहता हूँ मैं.”

“अछा.”

“हां.”

“तुम कही झुटि तारीफ़ तो नही करते मेरी.”

“लो कर लो बात. कॉलेज में तुम मशहूर थी अपने हुस्न के लिए. तुम्हारी ही चर्चा हुवा करती थी हर तरफ लड़को में. ये बात और थी की तुम मुझे बिल्कुल पसंद नही थी.”

“क्या मैं इश्लीए पसंद नही थी कि मैं मुस्लिम थी?”

“ज़रीना कैसी बात कर रही हो.”

“बोलो ना आदित्य मैं नापसंद क्यों थी तुम्हे.”

“ये तो मैं भी पूछ सकता हूँ कि क्या तुम मुझसे नफ़रत इश्लीए करती थी क्योंकि मैं हिंदू था.”

“पहले मेरे सवाल का जवाब दो ना प्लीज़. पहले मैने सवाल किया है.”

“हां ज़रीना झूठ नही बोलूँगा. उस वक्त मुस्लिम लोगो से चिढ़ता था मैं. देश में कही भी टेररिस्ट अटॅक होता था तो बहुत गालिया देता था मैं. काई बार मन में ख़याल आता था कि मेरे पड़ोस में भी टेररिस्ट रह रहे हैं. तुम लोगो से लड़ाई और ज़्यादा नफ़रत पैदा करती थी तुम्हारे प्रति.”

“झूठ नही बोल सकते थे…इतना कड़वा सच बोलने की क्या ज़रूरत थी.” ज़रीना रो पड़ी बोलते-बोलते.

“जान…तुमने सवाल सच जान-ने के लिए किया था या फिर झूठ. अब तुम बताओ कि तुम क्यों नफ़रत करती तू मुझसे.”

“मुझे कभी किसी हिंदू के नज़दीक जाने की इच्छा नही होती थी, क्योंकि मुझे यही लगता था कि ये लोग हमें दबाते हैं इस देश में. माइनोरिटी होने के कारण हमारे साथ हर जगह भेदभाव होता है. कॉलेज में मेरे सभी मुस्लिम फ्रेंड्स ही थे. और हम लोगो के परिवारों का लड़ाई झगड़ा होने के कारण तुमसे नफ़रत और ज़्यादा बढ़ गयी थी.”

“शूकर है शादी होने से पहले ये राज खुल गये.” आदित्य ने कहा.

“तो क्या अब हम शादी नही करेंगे.” ज़रीना ने बड़ी मासूमियत से पूछा.

“तुम बताओ क्या इरादा है तुम्हारा?”

एक पल को खामोसी छा गयी दोनो के बीच. दोनो बहुत करीब पड़े थे एक दूसरे के. कुछ कहने की बजाए दोनो एक दूसरे की आँखो में झाँक रहे थे. कब उनके होन्ट मिल गये एक दूसरे से उन्हे पता ही नही चला. दोनो के होन्ट एक साथ हरकत कर रहे थे. 10 मिनिट तक बेतहासा चूमते रहे दोनो एक दूसरे को. जब उनके होन्ट जुदा हुवे तो बड़े प्यार से देख रहे थे दोनो एक दूसरे को.

“मिल गया जवाब.” आदित्य ने हंसते हुवे पूछा.

“हां मिल गया. यही कह सकती हूँ कि प्यार के आगे ये बातें कुछ मायने नही रखती.”

“हां हम एक दूसरे के करीब आए तो हम जान पाए एक दूसरे को. वरना तो जींदगी भर नफ़रत बनी रहती. हम आस आ हुमन बिएंग एक दूसरे से नफ़रत नही करते थे. बल्कि डिफरेंट रिलिजन से होने के कारण एक दूसरे को नापसंद करते थे. हम एक महीना साथ रहे तो धरम की झूठी दीवार गिर गयी. दीवार गिरने के बाद हम उसके पीछे खड़े असली इंसान को देख पाए. काश इस देश में हर कोई ऐसा कर पाए. मैं अपने पहले के विचारों के लिए शर्मिंदा हूँ.”

“मैं भी शर्मिंदा हूँ आदित्य. अच्छा हुवा जो कि हमें प्यार हुवा और हम एक दूसरे को जान पाए. प्यार में बहुत ताक़त होती है ना आदित्य.”

“हां बहुत ज़्यादा ताक़त होती है. ये प्यार ज़रीना जैसी लड़की को भी किस करना सीखा देता है. ऑम्ग फिर से बहुत प्यारा चुंबन दिया तुमने.”

“हटो छोड़ो मुझे…तुम फिर से शैतानी पर उतर आए.”

आदित्य और ज़रीना बिस्तर पड़े हुवे प्यार के उस कोमल अहसास को पा रहे थे जिसके लिए ज़्यादा तर लोग जीवन भर तरसते हैं. दोनो की आँखों में बहुत सारे सपने थे आने वाली जींदगी के लिए और दिलों में ढेर सारी उमंग थी.

क्रमशः...............................
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Postby rajaarkey » 13 Oct 2014 14:28

Ek Anokha Bandhan--28

gataank se aage.....................

“naraaz kyon hote ho aditya. Meri zeendagi ka itna bada din hai aur main apni pasand ka kuch pahan-na chaahti hun to kya ye galat hai. ye din jeendagi bhar yaad rahega hamein. Dekho yaad rakho koyi ladaayi nahi karni hai hamein. Ladaayi ka parinaam dekh chuke hain hum.”

“ladaayi to besak karenge jaan par ek dusre ko chhod kar nahi jaayenge. Ab hum shaadi ke bandhan mein bandhne ja rahe hain. Ye baat gaanth baandh lete hain ki kabhi ek dusre ka saath nahi chhodenge. Kyonki chhodenge bhi to pachtaana bhi hamein hi padega.”

“haan ye to hum dekh hi chuke hain. Dusri saree le lete hain na aditya…please.”

“arey paagal please kyon bol rahi ho. Anything for you. Chalo abhi lekar aate hain tumhaari man pasand saree. Meri zarina dulhan ban-ne ja rahi hai koyi majaak nahi hai”

“aditya bahut kharcha karva rahi hun tumhaara. Sharam si to aati hai par kya karun. 10 lakh ki FD hai mere naam…vo dahej mein de rahi hun tumhe. Puri bharpaayi kar lena.”

“ye kya bakwaas kar rahi ho zarina. Tumhaara mera kya alag-alag hai.”

“mujhe taana diya gaya tha ish baat ka aditya. Bahut bura laga tha mujhe. main koyi tumhaari daulat ke peeche nahi hun. tum to jaante hi ho na, mere abba ka bhi to atcha business tha. dango ne sab tabaah kar diya.”

“main jaanta hun jaan. Duniya to kuch bhi kahti hai. sachaayi to hum jaante hain na. chalo ab tumhaare liye pyari si saree lekar aate hain.”

“tum bhi to kuch naya kharid lo na. shaadi mein purane kapde nahi pahne jaate.” Zarina ne kaha.

“aisa hai kya…chalo phir main bhi khareed leta hun.”

Shaadi ho rahi thi dono ki. Ye baat soch kar hi jhum uthte the dono. Bahut mushkil se ye khushi paane ja rahe the dono. Ek lamba intezaar kiya tha dono ne. zarina ne apni man pasand saree kharidi. Aditya ne bhi apne liye ek nayi pant shirt le li. Khusnasib the dono jo ki ek saath apni shaadi ki shoping kar rahe the. Ye avsar hamaare samaaj mein har kishi ko nahi milta.

Shoping karne ke baad vo jab hotel ki taraf ja rahe the to ek azib si shunder si muskuraahat thi dono ke chehre par. Chehre ke ye bhaav unke dilo mein basi khusi ka izhaar kar rahe the.

Hotel pahunch kar dono bistar par gir gaye. Aditya ek kone par tha aur zarina dusre kone par. Bahut thak gaye the dono.

“zarina!”

“haan aditya”

“I love you soooooo much.”

“I love you too.”

“shaadi to kar raha hun tumse magar ab ek chinta sata rahi hai.” aditya ne kaha.

Ye shunte hi zarina ke chehre par chinta ki lakire ubhar aayi. Vo aditya ki taraf mudi aur boli, “kaisi chinta aditya.”

“rahne do tumhe bura lagega” aditya ne kaha.

“bolo aditya please…mera dil baitha ja raha hai.” zarina ne kaha.

“ush din ke chumban se mere hont abhi tak jhulas rahe hain. Shaadi ke baad mera kya hoga zarina. Kaise jhelunga main tmhaare angaaron ko. Yahi chinta sata rahi hai.”

“aditya main maarungi tumhe tumne dubara aisa majaak kiya to. Ab se koyi chumban nahi hoga hamaare beech.”

“kyon nahi hoga!...aisa kyon bol rahi ho.”

“bol diya to bol diya.”

Aditya ne zarina ka haath thaam liya aur ushe apne taraf jhatka diya. Dono bahut karib aa gaye. Chehre bilkul aamne saamne the. Saanse takra rahi thi dono ki.

“chhodo mujhe aditya.”

“tumhaare honto ke angaaron se jhulas jaana chaahta hun main. Rakh do ye angaare mere honto par jaan main phir se ushi ahsaas ko jeena chaahta hun.”

“na mere hont angaare hain aur na main inhe kahi rakhungi chhodo mujhe.”

“uff gusse mein to tum aur bhi jyada shunder lagti ho. Man to kar raha hai tumhaare honto par hont rakhne ka par tumhaari marji ke bina nahi rakhunga.”

“meri marji kabhi nahi hogi ab. Tum majaak udaate ho mera. Chhodo mujhe.”

“kabhi sapne mein bhi nahi socha tha ki ish nakchadhi ko pyar karunga aur ishke honto par apne hont rakhunga. College time mein aisa vichaar bhi aata to mujhe ulti aa jaati. Itni naapasand thi tum mujhe.”

“ye…ye..ye…tum bade mujhe pasand the. Sar phodne ka man karta tha tumhaara.ush vakt tumse pyar ka sochne se pahle suicide kar leti main. Bahut jyada bekaar lagte the tum mujhe.”

“aaj aisa kya hai zarina ki hum ek saath ish bistar par pade hain ek dusre ke itne karib.”

“tumne jabardsati rok rakha hai mujhe apne karib. Kon tumhaare karib rahna chaahta hai.”

“chalo phir chhod diya tumhaara haath. Jaao jaha jaana hai.” aditya ne zarina ka haath chhod diya.

Zarina aditya ke paas se bilkul nahi hili. Aankhe band karke vahi padi rahi.

“kya huva jaan…jaao na. maine tumhaara haath chhod diya hai.”

Zarina ne aditya ki chaathi mein jor se mukka maara.

“ouch…itni jor se kyon maara.” Aditya karaah utha.

“tumhe pata hai na ki main tumse dur nahi rah sakti ishliye ye sab majaak karte ho.” Zarina ne kaha.

“uff jaan nikaal di meri. Bahut khatarnaak ho tum.” Aditya ne kaha.

Zarina ne aditya ki chaati par haath rakha aur ushe masalte huve boli, “jyada jor se lagi kya?”

“tum jab maarti ho to jor se hi maarti ho.”

“tum mujhe yu sataate kyon ho phir. Sharam bhi aati hai kishi ko ye baate shun kar.”

“kishko sharam aati hai? ish kamre mein tumhaare aur mere shiva bhi koyi hai kya.”

“aditya tum itne shaitaan nikloge maine socha nahi tha.” zarina ne kaha.

“aisa to nahi tha kabhi. Tumne deewana bana diya mujhe jaan. Tum mera pahla pyar ho. Tumse pahle jyada interection nahi raha ladkiyon se.”

“jaanti hun main. Mera to interest hi nahi tha kishi se dosti karne mein. Main bhi bas tumhe jaanti hun. mera pahla aur aakhrin pyar tum hi ho.”

“itni pyari baat kar rahi ho. Ek pyari si kiss de do na aur jala do mere honto ko ek baar phir se.”

“jal kar raakh ho jaaoge rahne do hihihihi.” Zarina ne hanste huve kaha.

“tum mujhe khaak mein mila do to bhi chalega. Tumhaare husn ki aag mein jalna chaahta hun main.”

“acha.”

“haan.”

“tum kahi jhuti taarif to nahi karte meri.”

“lo kar lo baat. College mein tum mashoor thi apne husn ke liye. tumhaari hi charcha huva karti thi har taraf ladko mein. Ye baat aur thi ki tum mujhe bilkul pasand nahi thi.”

“kya main ishliye pasand nahi thi ki main muslim thi?”

“zarina kaisi baat kar rahi ho.”

“bolo na aditya main naapasand kyon thi tumhe.”

“ye to main bhi puch sakta hun ki kya tum mujhse nafrat ishliye karti thi kyonki main hindu tha.”

“pahle mere sawaal ka jawaab do na please. Pahle maine sawaal kiya hai.”

“haan zarina jhut nahi bolunga. Ush vakt muslim logo se chidhta tha main. Desh mein kahi bhi terrorist attack hota tha to bahut gaaliya deta tha main. Kayi baar man mein khayaal aata tha ki mere padosh mein bhi terrorist rah rahe hain. Tum logo se ladaayi aur jyada nafrat paida karti thi tumhaare prati.”

“jhut nahi bol sakte the…itna kadva sach bolne ki kya jaroorat thi.” zarina ro padi bolte-bolte.

“jaan…tumne sawaal sach jaan-ne ke liye kiya tha ya phir jhut. Ab tum bataao ki tum kyon nafrat karti thu mujhse.”

“mujhe kabhi kishi hindu ke nazdik jaane ki icha nahi hoti thi, kyonki mujhe yahi lagta tha ki ye log hamein dabaate hain ish desh mein. Minority hone ke kaaran hamaare saath har jagah bhedbhaav hota hai. college mein mere sabhi muslim friends hi the. Aur hum logo ke parivaron ka ladaayi jhagda hone ke kaaran tumse nafrat aur jyada badh gayi thi.”

“shukar hai shaadi hone se pahle ye raaj khul gaye.” Aditya ne kaha.

“to kya ab hum shaadi nahi karenge.” Zarina ne badi maasumiyat se pucha.

“tum bataao kya iraada hai tumhaara?”

Ek pal ko khaamosi chaa gayi dono ke beech. Dono bahut karib pade the ek dusre ke. Kuch kahne ki bajaaye dono ek dusre ki aankho mein jhaank rahe the. Kab unke hont mil gaye ek dusre se unhe pata hi nahi chala. Dono ke hont ek saath harkat kar rahe the. 10 minute tak betahasa chumte rahe dono ek dusre ko. Jab unke hont juda huve to bade pyar se dekh rahe the dono ek dusre ko.

“mil gaya jawaab.” Aditya ne hanste huve pucha.

“haan mil gaya. yahi kah sakti hun ki pyar ke aage ye baatein kuch maayne nahi rakhti.”

“haan hum ek dusre ke karib aaye to hum jaan paaye ek dusre ko. Varna to jeendagi bhar nafrat bani rahti. Hum as a human bieng ek dusre se nafrat nahi karte the. Balki different religion se hone ke kaaran ek dusre ko naapasand karte the. Hum ek mahina saath rahe to dharam ki jhuti deewar gir gayi. Deewar girne ke baad hum ushke peeche khade asli insaan ko dekh paaye. Kaash ish desh mein har koyi aisa kar paaye. Main apne pahle ke vicharon ke liye sharminda hun.”

“main bhi sharminda hun aditya. Acha huva jo ki hamein pyar huva aur hum ek dusre ko jaan paaye. Pyar mein bahut taakat hoti hai na aditya.”

“haan bahut jyada taakat hoti hai. ye pyar zarina jaisi ladki ko bhi kiss karna seekha deta hai. omg phir se bahut pyara chumban diya tumne.”

“hato chodo mujhe…tum phir se shaitaani par utar aaye.”

Aditya aur zarina bistar pade huve pyar ke ush komal ahsaas ko pa rahe the jishke liye jyada tar log jeevan bhar taraste hain. Dono ki Aankhon mein bahut saare sapne the aane wali jeendagi ke liye aur dilon mein dher saari umang thi.

kramashah...............................
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