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Rohit Kapoor
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इट्स माई लाइफ

Postby Rohit Kapoor » 29 Sep 2016 20:51

इट्स माई लाइफ

हाँलीडे रिसोर्ट के बाहर युवा पीढ़ी कुछ रंग जमाने के मूड में थी। पिछले दो दिनों की लगातार बारिश ने सबको अपने कमरों में कैद रहने को बाध्य कर दिया था। आज शाम आसमान खुलते ही लड़कों ने सूखी लकड़ियाँ जमा करनी शुरू कर दी थीं। आज रात जम कर कैम्प- फ़ायर चलेगा। उनके उत्साह से साथ आए प्रौढ़ भी उत्साहित हो चले थे। पहाड़ी मौसम का क्या ठिकाना, जब आकाश खुले मौज मना लो वर्ना फिर वही डिप्रेसिंग वेदर उन पर हावी हो जाएगा।


कैम्प- फ़ायर की तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं। राँबिन ने जोरों से आवाज़ लगाई थी,


”हे, आँल आँफ़ यू कम आउट। लेट्स हैव म्यूजिक एण्ड डांस।“

रोहन ने म्यूजिक सिस्टम चालू कर दिया था। लड़के-लड़कियों और बच्चों ने संगीत पर झूम-झूमकर नाचना-गाना शुरू कर दिया । अचानक वो उदास शाम बहुत रंगीन हो उठी । बारिश से धुली प्रकृति बेहद खूबसूरत लगने लगी थी।

राँबिन जैसे सबका चहेता हीरो बन गया था। प्रभुदेवा की स्टाइल में नृत्य करते राँबिन ने जब जलती आग को पार किया तो बुजुर्गो ने डर से साँस रोक ली और युवा पीढ़ी ने जोरों से तालियाँ बजा, उसका अभिनंदन किया था। राँबिन को डांस करते देखना, सचमुच एक अनुभव था। आकर्षक व्यक्तित्व के साथ उसकी नृत्य मुद्राओं ने सबको विस्मय-विमुग्ध कर दिया था।

”अगर लड़के को फ़िल्म वाले देख लें तो तुरन्त ब्रेक मिल जाए। इसे तो फ़िल्म्स में ट्राई करना चाहिए।“ मिस्टर आजमानी ने राय दी थी।

”आप ठीक कह रहे हैं, मुझे तो डर है कहीं ये हमारी लड़कियों का मन न मोह ले। मुश्किल में पड़ जाएँगें सारे पापा लोग..........।“ रामदास जी की बात पर सब जोरों से हॅंस पड़े थे।

उस पहाड़ी क्षेत्र का वह हाँलीडे रिसोर्ट न केवल देशी बल्कि विदेशी पर्यटकों के भी आर्कषण का केन्द्र था। शहर से दूर एकान्त में स्थित उस हालीडे रिसोर्ट मे पर्यट्कों के लिए सारी सुख.सुविधाएं उपलब्ध थीं। हेल्थ केयर सेंटर, मसाज ब्यूटी पार्लर, स्केटिंग और डांसिंग फ्लोर के अलावा रोज की ज़रूरतों के लिए छोटी-सी मार्केट भी थी। रिसोर्ट की अपनी अलग ही दुनिया थी। भीड़भाड़ से दूर, शांति की खोज में आए पर्यटकों के लिए वो हाँलीडे रिसोर्ट स्वर्ग ही था।

युवा पीढ़ी ने सचमुच रंग जमा लिया था। राँबिन और उसके दोस्तों ने अपने रंग में बड़ो को भी शामिल कर लिया था।

”हे लिसिन एवरीबडी! डू यू नो हाऊ टु प्ले पिंक पायजामा?“

”नही.....ई ........“ समवेत स्वर गूंजा था।

”ओ.के. मैं एक्सप्लेन करता हूँ। पहले सब एक सर्कल में आ जाइए। अंकल-आंटी, यंग फ्रेंड्स सबको घेरे में आना है। कम आँन एवरी बडी.........“

राँबिन की पुकार पर सब घेरे में सिमट आये थे। तभी राँबिन की दृष्टि कोने में सिमटी खडी निकिता पर पड़ी थी। सबके उस सर्कल में चले जाने पर अकेली छूट गई निकिता जैसे घबरा-सी रही थी। तेजी से निकिता के पास पहुँचे राँबिन ने उसका हाथ पकड़, घेरे में खींचना चाहा था। निकिता के प्रतिरोध पर राँबिन हॅंस पड़ा था-

”कम आँन बेबी, लेट्स एन्ज्वाँय। अपने ग़म भूल जाओ...............“

निकिता को सर्कल में शामिल कर राँबिन ने गेम समझाना शुरू किया था-

”हाँ तो ये गेम ऐसे है, आपको अपने नेक्स्ट पर्सन के कान में किसी फ़िल्म का नाम देना है, वह व्यक्ति अपने अगले पर्सन को किसी दूसरी फ़िल्म का नाम देगा। बस ऐसे ही करते जाना है, समझ गए?“

”यस....।“ उत्साहपूर्ण स्वर उभरे थे।

”एक-दूसरे के कान में पिक्चर का नाम फुसफुसाते सर्कल पूरा हो गया था।

अब? राँबिन ने समझाया था, ”गेम इज वेरी सिम्पल। आपको जिस फ़िल्म का नाम बताया गया है, उसके आगे "इन पिंक पायजामा" जोड़कर फ़िल्म का नाम बोलते जाइए। नाउ दिस यंग लेडी विल स्टार्ट......“

”दिल देके देखो इन पिंक पायजामा.......... हॅंसी का दौर पड़ गया था।

”हम आपके हैं कौन, इन पिंक पायजामा...........“

अजीब समाँ बॅंध गया था, कुछ अजीबोगरीब नामों के साथ जुड़कर पिंक पायजामा बेहद सेक्सी बन गया था। निकिता की बारी आते ही मौन छा गया था। राँबिन उसके पास आया -

”हाय निकिता बेबी, बोलती क्यों नहीं?“ निकिता जैसे और सिमट गई थी।

”हे! व्हाँट इज राँग? तुम खेल समझ गई न?“

निकिता ने ‘हाँ’ में सिर हिलाया था।

”फिर बोलती क्यों नहीं?“

निकिता फिर चुप रही।

”अगर तुम नहीं बोलोगी तो हम गेम यहीं खत्म करते हैं, तुम्हारे लिए सबका मज़ा खत्म हो जाएगा।“

निकिता के मौन पर सबको नाराज़गी थी। मम्मी की तो नाक ही कट गई। इस लड़की की वजह से उन्हें कितनी शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है! निकिता के कंधे जोर से दबा उन्होंने अपना गुस्सा उतारा था-

”यू सिली गर्ल, अगर दिमाग नहीं है तो गेम मे शामिल क्यों हुई? अब बोल भी दे..........“

फुसफसाहट में कहे गए मां के शब्द निकिता को आतंकित कर गए, घर पर रोज उनके निर्देश-डाँट सुनती निकिता, अब क्या चुप रह सकती थी।

”सैक्सी गर्ल इन पिंक पायजामा“

हॅंसी के फौव्वारे छूट गए थे। सबकी दृष्टि निकिता की पिंक सलवार पर पड़ गई थी। व्हाँट ए कोइंसीडेंस! डनकी हॅंसी पर हथेलियों में मुँह छिपा निकिता अपने काँटेज की ओर दौड़ गई थी। दूर तक लोगों की हॅंसी उसका पीछा करती रही थी।

जब से मम्मी-पापा यू.के. से आए हैं, उसके शांत-स्थिर जीवन में व्यवधान पड़ गया था। दादी के संरक्षण में वह अपने को कितना सुरक्षित पाती थी।! बॅंधी-बॅंधाई दिनचर्या, रोज सुबह मंदिर में पूजा के बाद काँलेज जाना, शाम को दादी को रामायण पढ़कर सुनाना और रात में दादी से सटकर लेटी निकिता, गहरी नींद में डूब जाती। बाबा की मृत्यु पर आए मम्मी-पापा को दादी के एकान्तवास की चिन्ता थी। लाख कहने पर भी दादी लंदन जाने को तैयार नहीं हुई थीं। हाँ बेटे से ये जरूर कहा था,

”अगर मेरे अकेलेपन की इतनी ही चिन्ता है तो निक्की को छोड़ जा, मुझे देखने को घर के पुराने मुनीम जी और माली हैं ही, तुझे चिन्ता करने की जरूरत नही। ये पूरा कस्बा तेरे पिता का आभारी है।“

मम्मी ने राहत की साँस ली थी। दादी को साथ रखने में उन्हें कितनी असुविधाएँ झेलनी पड़तीं ! एक बार निकिता को छोड़ते मन हिचका था, पर पति ने समझाया था,

”वहाँ तुम्हारा इतना बिज़ी प्रोग्राम रहता है, तीन बच्चों में से एक यहाँ रह जाए तो कुछ बर्डेन कम होगा। माँ निक्की को अच्छी तरह देख सकती हैं। आखिर मैं भी तो उन्हीं की देखरेख में पला-बड़ा हुआ हूँ।“

पति की बातों में सच्चाई थी। वैसे भी अपने बच्चों में निकिता का सामान्य रंग-रूप, गौरी को अपने गोर-चिट्टे रंग का मज़ाक-सा उड़ाता लगता था। दूसरे दोनों बच्चे मनोज और नेहा, उन्हीं पर गए थे। निकिता का साँवला रंग, उसकी ददसाल की देन था, शायद इसीलिए मम्मी को निकिता से कभी भी ज्यादा लगाव नही रहा। इस बार भारत आने पर उन्हें लगा, निकिता की साँवली काया खिल आई थी। शायद यह उसकी उम्र का तकाजा था। सोलह साल की उम्र में तो हर लड़की मोहक दिखती है, पर उसके तौर-तरीकों ने गौरी को परेशान कर डाला था। लम्बे बालों को कसकर दो चोटियों में गूंथ, बालों की शोभा ही नष्ट हो गई थी। सुबह-शाम पूजा-पाठ करने वाली लड़की से यू.के. का कौन लड़का शादी करेगा?

रात में गौरी ने पति से कहा था, ”सुनो जी, इस बार निक्की को साथ ले जाना है, यहाँ रहकर यह निरी गॅंवार बन गई है।“

पत्नी की बात सुन निखिल परेशान हो उठे थे। कुछ ही दिनों में उन्होंने जान लिया था माँ और निक्की किस तरह एक-दूसरे से जुड़ गई थीं, उन्हें अलग करना, उनके प्रति अन्याय होगा। निकिता अब क्या लंदन के जीवन से साम्य बिठा सकेगी?

पति को सोच में डूबा देख गौरी झुझॅंला उठी थी, ”क्या सोच रहे हो! लड़की की जिन्दगी यूं खराब नहीं की जा सकती, कुछ तो करना ही होगा।“

”वही सोच रहा हूँ। ऐसा करते हैं हम सब किसी हिल स्टेशन पर चलते हैं, देखते हैं निक्की हमारे साथ रह सकेगी या नहीं।“

”क्या मतलब? हमारी बेटी हमारे साथ नहीं रह पाएगी, आखिर हमारा खून है वो।“

”तुमने देखा नहीं, माँ के साथ वह किस तरह जुड़ गई है। उन दोनों को अलग करना क्या आसान होगा?“

”इसमें तुम्हारी ही ग़लती है, मैंने तो पहले ही कहा था, उसे यहाँ छोड़ना ग़लती थी।“

”ठीक है, चलो इसी बहाने एक सप्ताह सब साथ एन्ज्वाँय कर लेंगे और मेरी बात की सच्चाई का भी टेस्ट हो जाएगा।“

अपने ही माँ-बाप, भाई-बहनों के साथ निकिता अपने को बेहद अजनबी पाती थी। दादी के साथ सब कुछ कितना सहज और सामान्य-सा लगता था। गौरी उसकी आदतों से परेशान थी। बार-बार निर्देश देती, वह झुँझला उठती-

”हे भगवान, ये तो एकदम जाहिल बन गई है। हाथ से दाल-भात खाती, कैसी तो लगती है!“

डर कर निकिता चावल खाना छोड़, रोटी कुतरने लगती। मनोज और नेहा उसे कौतुक से देखते, क्या सचमुच वो उनकी बड़ी बहन थी?

उसी निकिता को आज सबके सामने कैसे आशोभनीय शब्द दोहराने पड़े थे, ”सैक्सी गर्ल इन पिंक पायजामा।“

कमरे के पलंग पर औंधी पड़ी निकिता रोती जा रही थी, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई थी,
”मे आई कम इन..........“

निकिता घबरा उठी थी। जल्दी से आँसू पोंछ दरवाजा खोला था, सामने राँबिन खड़ा था।

”हे बेबी! व्हाँट इस दिस? आँसुओं में डूबी राजकुमारी, तुम्हें क्या तकलीफ़ है? क्या हुआ?“ राँबिन सचमुच कंसर्न दिख रहा था।

राँबिन की सहानुभूति पर निकिता के आँसू फिर बह चले थे। आश्चर्य से राँबिन ने उसकी ठोढ़ी उठा कर फिर पूछा था,

”कम आँन! क्या हुआ, निकिता बेबी?“

”कुछ नहीं..........“

”फिर रोती क्यों हो?“

”हमें ये सब गंदी बातें अच्छी नहीं लगतीं।“

राँबिन ठठाकर हॅंस पड़ा था।

”ओह गाँड! तुम खेल को सीरियसली लेती हो?“

”खेल में ऐसी बातें कही जाती हैं? सब क्या सोचते होंगे?“

”पागल......... सिम्पली मैड। अरे ये खेल है, कोई इन बातों को सीरियसली नहीं लेता। सच तो ये हैं तुम्हारी वहाँ से एबसेंस का भी किसी ने नोटिस नहीं लिया।“

”फिर तुम यहाँ कैसे आए?“

”क्योंकि मैंने तुम्हारी एबसेंस फील की थी, निक्की बेबी!“ अपनी बात खत्म करते राँबिन ने प्यार से निक्की के माथे पर झूल आई लट संवार दी । निकिता सिहर उठी ।

”आर यू फ़ीलिंग कोल्ड?........“

निकिता ने नहीं में सिर हिलाया था।

”अच्छा तो आज से हम दोनों दोस्त हुए, बोलो मंजूर है?“ राँबिन ने अपनी हथेली खोल आगे बढ़ा दी थी। निकिता उस खुले हाथ पर अपना हाथ देती हिचक रही थी। राँबिन ने उसका हाथ पकड़ जोर से दबाया था।

”अब हम दोस्त हैं, नाउ नो मोर क्राइंग। चलो एक कप काँफ़ी हो जाए।“

”हम काँफ़ी नहीं पीते।“

”फिर क्या दूध पीती हो?“ राँबिन शरारत में मुस्करा रहा था।

”हाँ।“ कहते निकिता को शर्म आई थी।

”चलो आज मैं काँफ़ी बनाता हूँ, टेस्ट करके देखोगी तो दूसरे के हाथ की काँफ़ी कभी नही पियोगी।“

निकिता असमंजस में पड़ गई थी। राँबिन उसको लगभग खींचता-सा अपनी काँटेज में ले गया था। निकिता को एक कुर्सी पर बैठा उसने दो कप काँफ़ी तैयार की थी। विस्मित निकिता उसे देखती रह गई थी। काँफ़ी का मग निकिता को थमा, उसने म्यूजिक सिस्टम आँन किया था। पहला-पहला प्यार है........ निकिता रोमांचित हो उठी थी। जैसे वह सपनों में जाग रही थी।

”तुम्हें डांस आता है?“

”नहीं.........।“

”सीखोगी?“

”हमें शर्म आती है.......“

”सिली गर्ल! किसी भी आर्ट को सीखने में शर्म क्यों? मैं डांस करता अच्छा नहीं लगता?“

निकिता चुप रह गई थी।

”मैं अच्छा नहीं लगता?“

”लगते हो.....।“ बहुत मुश्किल से कह पाई थी।

”तुम डांस करती बहुत अच्छी लगोगी, निक्की बेबी! शैल वी स्टार्ट?“

निकिता का हाथ पकड़ राँबिन ने उठाया था।

”नहीं, हमें शर्म आती है। हम डांस नहीं करेंगे..........“

”हम दोनों दोस्त हैं, अब एक-दूसरे से शर्म क्यों? देखना दो दिन में सीख जाओगी।“

निकिता की कमर में हाथ डाल, राँबिन ने स्टेप्स बताने शुरू किए थे। निकिता जैसे अपना होश खो बैठी थी। पाँवों को पंख लग गए थे, राँबिन के इशारों पर वह स्वप्नवत् नाचती गई थी।

”वैरी गुड। ये तुम्हारा पहला लेसन था, कल दूसरा लेसन शुरू होगा। आज के स्टेप्स अच्छी तरह याद कर लेना वर्ना मेरी डांस-पार्टनर कैसे बन पाओगी?“

”तुम्हारी डांस- .पार्टनर मैं..... राँबिन, तुमने यही कहा है न?“ खुशी में पगी निकिता बोल नहीं पा रही थी।

”हाँ। यही मेरा चैलेंज है, बोलो मेरा साथ दोगी न, निक्की?“ निकिता मुश्किल से सिर हिला सकी थी।

”तो पक्का रहा। चलो तुम्हें पहुँचा आऊं, देर हो रही है।“ राँबिन के साथ अपने काँटेज पहुंची निकिता जैसे सपने से जगा दी गई थी।

”ओ.के. निकिता, सी यू टुमारो, बाय-“ हाथ हिलाता राँबिन चला गया था।

मम्मी-पापा वगैरह अभी भी बाहर के प्रोग्राम में बिज़ी थे। निकिता डांस स्टेप्स का रिहर्सल कर रही थी, कल उसे राँबिन को चौंका देना था। उसके थककर सो जाने के बाद नेहा, मनोज के साथ ममी-पापा वापस आए थे। दूसरे दिन सबका पिकनिक स्पॉट्स देखने जाने का प्रोग्राम था। निकिता ने कहीं भी जाने से साफ़ मना कर दिया था। ठीक समय पर राँबिन आया था। आज काँफ़ी निकिता ने बनाई थी। डांस के स्टेप्स सिखाते राँबिन ने निकिता को न जाने कितनी बार अपने पास खींचा था। बार-बार रोमांचित होती निकिता सपने में जीती रही थी।

पाँच दिन बाद राँबिन ने सबके सामने उसे अपने साथ नृत्य के लिए आमंत्रित किया था। नेहा तो चौंक गई थीं डांस में एक्सपर्ट उतनी लड़कियों के रहते निकिता को बुलाकर राँबिन क्या उसका अपमान नहीं कर रहा था।

इट्स माई लाइफ़....गीत चल रहा था। राँबिन के बढ़े हाथ में अपना हाथ देती निकिता डांस-फ्लोर पर उतर आई थी। नेहा की आँखें विस्मय में फैल गई थी। पति की ओर देख, गौरी मुस्कराई थी।

डांस-फ्लोर पर निकिता सहज दिख रही थी। लोगों की दृष्टि मात्र से संकुचित होने वाली निकिता आज राँबिन के साथ डांस-फ्लोर पर थी। सब कुछ कितना अच्छा लग रहा था!

”कल मैं जा रहा हूँ बेबी.........।“ धीमे से राँबिन ने कहा था।

”क्या.......आ.........कहाँ..क्यों?“ निकिता जाग गई थी।

”घर। ....... तुम्हें भी तो जाना है न?“

”नहीं, तुम नहीं जाओ, राँबिन.........!“

”मैं एक जगह बॅंधकर नहीं रह सकता, बेबी। वैसे भी अब तुम्हें मेरी जरूरत नहीं है, यू नो डांसिंग......“

”नहीं राँबिन, हमें तुम्हारी जरूरत है। हमें छोड़कर नहीं जाओ।“ निकिता की आँखें भर आई थीं।

”कम आँन निकिता, तुम मैच्यूर लड़की हो, बच्चों की तरह नहीं रोते, सिली गर्ल......“

”तुमने हमसे दोस्ती क्यों की, राँबिन?“

”क्योंकि तुम एक अच्छी लड़की हो, दूसरी लड़कियों से बहुत अलग। तुम हमेशा याद रहोगी। नाऊ चियर अप निकिता- इट्स माई लाइफ़.........“

मस्ती में गीत गुनगुनाता राँबिन, निकिता को फ्लोर के बाहर पहुंचा, सामने खड़ी लड़की का हाथ पकड़े फ्लोर पर पहुंच गया था। लड़की को चक्कर दिलाते राँबिन को निकिता स्तब्ध ताकती रह गई थी।

”चल निक्की, देर हो रही है।“ गौरी ने स्नेह से उसके कंधे पर हाथ धरा था।

काँटेज पहुँचते ही नेहा शुरू हो गई थी,

”मम्मी, निक्की ने क्या सरप्राइज दिया! मैं तो इमेजिन भी नहीं कर सकती थी, शी कुड डांस सो वेल............“

”हूँह। इसे डांस सिखाने के पूरे पाँच हजार दिए हैं, वर्ना क्या ये डांस कर पाती?“

”किसे पाँच हजार दिए हैं, मम्मी?“ नेहा ताज्जुब में थी।

”अरे उसी डांसर........ राँबिन को। वो तो इसे सिखाने को तैयार ही नहीं था, कहता था इसे डांस सिखाने की जगह किसी पत्थर की मूरत को सिखा देगा, पर पाँच हजार पर मान गया। आज उसने डिमांस्ट्रेट किया था, बाकी रकम जो लेनी है।“

”नहीं...... तुम झूठ बोलती हो, वो हमारा दोस्त है...... हमारा दोस्त है।“ अपने सारे टूटे सपनों के साथ निकिता पलंग पर ढेर हो गई थी।
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फैसला

Postby Rohit Kapoor » 29 Sep 2016 20:54

फैसला


पिछले दो दिनों से अपना कमरा बंद किए पड़ी नीलांजना, अचानक दरवाजा खोल, बाहर आ खड़ी हुई थी-


”बाबूजी, मंैने फ़ैैसला कर लिया है, मैं काजल भाभी का साथ दॅूगी। अदालत में उनके पक्ष में गवाही दॅूगी।“

नीलांजना की घोषणा से पूरे घर में सन्नाटा खिंच गया । बड़े भइया की मृत्यु पर मातमपुर्सी करने आए रिश्तेदारों पर विजली-सी गिरी थी। अम्मा कपाल पर हाथ मार विलाप कर उठी । बाबूजी की आँखों से अंगारे बरस रहे थे-

”ये बात मॅुंह से निकालने के पहले तू मर क्यों न गई? सगे भाई की हत्यारिन का साथ देगी! इसी दिन के लिए बड़ा किया था तुझे?“

”न्याय और अन्याय की समझ देने के लिए आपकी आभारी हूँ बाबूजी! क्ुछ देर ठंडे दिमाग से सोच देखिए, उनकी जगह आपकी बेटी होती तब भी क्या आप ऐसा ही सोचते?“

”बेशर्म कहीं की, बाप के सामने ऐसी बातें करते तेरी जीभ नहीं जलती! दूर हो जा मेरी आँखों के सामने से वर्ना..........“

आवेश में बाबूजी हाँफने लगे थे। रिश्ते के चाचाजी ने उन्हें सम्हाला था। सुमित्रा ताई ने नीलांजना को हाथ से पकड़, जबरन पीछे खींच, बाबूजी के सामने से हटा दिया था।

”देखती नहीं माँ-बाप का क्या हाल है? जवान बेटे की मौत का सदमा लगा है उन्हें।“

”वो बेटा ज़िंदा ही कब था ताई? तुम्हीं तो कहा करती थी, काश सुरेश हमेशा को सो जाता..“ निलांजना की आखें भर आई थीं।

”वो बात ठीक है नीलू, पर माँ-बाप के लिए संतान कैसी भी हो, ममता तो उमड़ेगी ही। ऐसी बातें करके उनका दिल दुखाने से क्या फ़ायदा बेटी?“

”काजल भाभी भी तो किसी की बेटी हैं ताई.........“

”अरे उस अभागिन के माँ-बाप होते तो क्या इस नरक में उसे झोंकते? तू क्या समझती है मुझे उस पर तरस नहीं आ रहा, पर इस वक्त कुछ कहना ठीक नहीं।“

”ठीक क्यों नहीं है ताई? पिछले दो दिनों से भाभी पुलिस कस्टडी में हैं, उनके साथ न जाने क्या हो रहा होगा और हम सब इस साजिश में शामिल हैं।“ निलांजना सचमुच रो पड़ी थी।

”मैं तेरी बात समझती हूँ बिटिया। उस अभागिन के अपने चाचा भी तो उसे हत्यारिन कह, अपना पीछा छुड़ा गए। न जाने क्या-क्या सहना है उसकी किस्मत में। भगवान दुश्मन को भी ऐसी तकदीर न दे।“ ताई ने आँचल से आँसू पोंछ डाले थे।

कुर्सी पर निढाल पड़ी नीलांजना की आँखों से आँसू बह रहे थे। सारी बातें बार-बार याद आ रही थीं.........

बड़े भइया की शादी के बाद से उनके कामों का दायित्व काजल भाभी को सौंप, अम्मा निश्चिन्त हो गई थीं। पति को नहलाने-धुलाने से लेकर कपड़े पहनाना, खाना खिलाना पत्नी का ही कर्तव्य है, ये बात अम्मा ने उन्हें अच्छी तरह समझा दी थी। अम्मा उन्हें दो बार स्वयंसिद्धा पिक्चर दिखा लाई थीं। बार-बार समझातीं,

”पत्नी के प्यार और त्याग से पति ठीक हो सकता है। अब सुरेश को तुझे ही सम्हालना है बहू।“ भोली-भाली काजल भाभी मॅुंह नीचा किए निःशब्द अम्मा की सीख सुनती रहती थीं।

मातृ-पितृ-विहीन काजल ने चाचा के घर, नौकरानी की तरह काम कर दिन काटे थे। उस पर भी चाची को उसकी दो रोटियाँ भारी थीं। सबके खा-पी चुकने के बाद, बचा-खुचा उसके सामने फंेक दिया जााता था। माँ-पिता एक साथ रेल-दुर्घटना में उसे अनाथ बना, चाचा के सहारे छोड़ चले गए थे। तब वह सातवीं कक्षा में पढ़ती थी। बस वहीं, मेधावी काजल की शिक्षा को विराम लग गया था। चाचा के बच्चों को स्कूल जाता देख, काजल का मन मचल उठता था, पर भगवान ने उसे असीम धैर्य दिया था। अपनी स्थिति उसके सामने स्पष्ट थी। चचेरी बहन की पुस्तकों की झलक देख पाने के लिए काजल को उसकी हज़ार मिन्नतें करनी पड़ती थीं। अगर चाचाी की निगाह किताबों में आँख गड़ाए काजल पर पड़ती तो उसकी शामत आ जाती।

उसी काजल के लिए चाचा ने उपयुक्त घर-वर खोज, मृत भाई के प्रति अपना कर्तव्य पूर्ण कर, जग की वाहवाही पाई थी। सब कुछ जानते-समझते भी, जन्म से मानसिक रूप से विक्षिप्त भइया के साथ उन्होंने काजल को बाँध दिया था।

आँखों में कितने सपने सॅंजोए काजल इस घर में आई थी। चाचा के प्रति वह कितनी कृतज्ञ थी, उनकी कृपा से उसे इतना अच्छा घर-वर मिल सका था। आश्चर्य इसी बात का था कि उस दिन बड़े भइया असामान्य रूप में शान्त रहे। उनको शांत देख, नीलांजना को लगा था शायद अम्मा-बाबूजी के जिन शुभचिन्तकों ने उन्हंे समझाया था कि शादी के बाद भइया ठीक हो जाएँगे, वे सचमुच अनुभवी थे।

भइया की शादी का सबसे ज्यादा विरोध नीलांजना ने किया था। एम.ए. फाइनल में पढ़ रही नीलांजना, न्याय-अन्याय का अर्थ अच्छी तरह समझती थी। भइया का अभिशाप पूरे घर पर मॅंडराता था। बड़े भइया की जन्मजात विक्षिप्तता का कलंक झेलती अम्मा अपने आप में सिमट कर रह गई थीं। दादी हर समय बाबूजी को पट्टी पढ़ाती, उन्हें सुनाती रहती थीं,

”पगले को जन्म दिया है, ज़रूर इसके ख़ानदान में कोई पगला रहा होगा। तू ही समझ मनोहर बेटा, हमारे ख़ाानदान से न जाने किस जन्म का बदला लिया इसके बाप ने। हमें धोेखे में रख, शादी कर दी अपनी लाड़ली की। अब इस पाप का बोझा ढोने को हम रह गए हैं।“

अम्मा बताती हैं, पोता जन्मा है, सुनकर, वही दादी खुशी के मारे अम्मा की बलैयाँ लेते नहीं थकती थीं। भइया को सीने से चिपटाए, दादी अपनी किस्मत सराहती थीं। बचपन में बड़े भइया की अजीबोगरीब हरकतें, उनका असामान्य क्रोध, सबके मनोरंजन का कारण था। अम्मा के शब्दकोश में मानसिक विक्षिप्तता जैसा कोई शब्द ही नहीं था। जैसे-जैसे भइया बड़े होते गए उनकी असामान्यता स्पष्ट होती गई। अगर भइया बुद्धिहीन होते तो भी बात सही जा सकती थी, पर उन्हें गुस्से के ऐसे दौरे पड़ते कि घर-भर काँप जाता। हाथ में आई कोई भी चीज किसी के सिर दे मारना उनके लिए सामान्य बात थी। एक बात और, जब उन्हें ऐसे दौरे पड़ते तो चुन-चुन कर ऐसी अभद्र-अश्लील गालियाँ देते, जिन्हें अच्छेे घरों में सुनना भी पाप माना जाता। जैसे-जैसे वह जवान होते गए, गालियों के साथ अनकी लड़कियों की चाहत भी बढ़ती गई। डाँक्टर का कहना था, इस रोग में सेक्स के प्रति जबरदस्त आकर्षण होता है। शायद उनकी शादी कर देने में, बाबूजी के मन में यह बात भी रही हो।

बड़े बेटे की असमर्थता और विक्षिप्तता का ज़हर अम्मा जीवन-भर पीती रही थीं। ऐसे बेटे के साथ, कोख से और बच्चों को जन्म देने वाली अम्मा की हिम्मत पर नीलांजना को आश्चर्य होता है। अगर वह भी भइया जैसी ही होती तो? उस समय भी इस कल्पना से नीलांजना को कॅंपकॅंपी-सी आ गई। आठ बच्चों में से बस भइया और नीलांजना ही जीवित बचे थे। विधाता के इस क्रूर मजाक को अम्मा कभी नही भूल पातीं, काश उनका एक भी बेटा जीवित बच पाता जो दादी का सपना पूरा करता। दादी की बड़ी साध थी, उनकी अर्थी को उनका पोता कंधा दे। उन्हें विश्वास था उसके कंधे चढ़ वह सीधे स्वर्ग जाएँगी, पर उनकी मृत्यु के समय भी स्वर्ग जाती दादी को, बड़े भइया ने चुन-चुन कर कोसा था। पता नहीं दादी उन शब्दों पर सवार कहाँ पहुँची होंगी!

बचपन से भइया का चीखना-चिल्लाना सुनती नीलांजना बड़ी हुई थी। मुहल्ले-पड़ोस के लोगों के लिए भइया का अनर्गल प्रलाप मनोरंजन का साधन था। जिन एकाध दिनों घर में शांति रहती, पड़ोसी बालिका नीलांजना से कोंच-कोंच कर पूछते,

”क्या बात है नीलू, आज तुम्हारे घर में बड़ा सन्नाटा है? क्या सब लोग कहीं बाहर गए हैं?“

”नहीं तो, अम्मा खाना बना रही हैं और भइया सो रहे हैं।“ प्रायः दौरों के बाद भइया दो-एक दिन गहरी नींद सोया करते थे।

”अच्छा-अच्छा, शायद उन्हें डाँक्टर ने सोने की सुई दी होगी?“

”सुई क्यों देंगे, भइया तो अपने आप सोए हैं।“ भोली नीलांजना उनके अधरों की व्यंग्य-भरी मुस्कान का अर्थ नहीं समझ पाती थी।

”काश वह हमेशा के लिए सो जाए, इस नन्हीं जान को तो मुक्ति मिलती। उसका कलंक इसे भी खा जाएगा।“ मुहल्ले की सुमित्रा ताई बचपन से नीलांजना को बहुत प्यार करती थीं, पर भइया के लिए कही वैसी बातों पर नीलांजना मचल जाती,

”ऊॅंहूँ, तुम बहुत खराब हो ताई, भइया सोते रहेंगे तो हम किससे बात करेंगे?“ कभी-कभी भइया पर जब दौरे नहीं पड़ते, वे नीलांजना के साथ सचमुच ठीक बात करते थे।

”अरे मैं कोई उसकी दुश्मन थोड़ी हूँ बेटी, मैं तो तेरे भले की सोचती थी............“

ताई की उस बात का अर्थ अब नीलांजना अच्छी तरह समझती है। भइया के कारण, पूरे परिवार ने अपने को घर की चहारदीवारी के अन्दर कैद कर लिया था। ऐसे बेटे को लेकर किसी रिश्तेदारी में जाना भी संभव नहीं था। भइया के कारण नीलांजना ने भी कम अपमान नहीं झेला था। साथ की सहेलियाँ जब भी उससे पराजित होतीं तो ‘पगले की बहन पगली’ कहकर उससे अपनी पराजय का पूरा मूल्य चुका लेतीं। आँखों से आँसू ढलकाती नीलांजना भी अम्मा की गोदी में सिर छिपा उन्हें उलाहना दे डालती,

”तुम बहुत गन्दी हो अम्मा, इत्ता गन्दा भइया क्यों लाई? सबके भाई कित्ते अच्छे हैं। मेरा भाई गंदा है, वो पागल हैं.....“

”छिः बेटी, भाई को ऐसे नहीं कहा जाता। भगवान से प्रार्थना कर, तेरा भाई ठीक हो जाए, फिर वह तुझे खूब प्यार करेगा नीलू।“

अम्मा की उन बातों पर नीलांजना को कितना विश्वास था! भगवान से उसने कितनी विनती की कि वो उसके भइया को ठीक कर दें। उसके भइया को कोई पागल न कहे। पर भगवान ने उसकी कहाँ सुनी थी!

जैसे-जैसे नीलांजना बड़ी होती गई, भाई की विक्षिप्तता उसे विचलित करती गई। बचपन में भाई जब चीखता-चिल्लाता, वह कौतुक से उस दृश्य को देखती। कभी-कभी बाबूजी मोटा डंडा उठा उनकी पिटाई भी कर देते, उस समय उसका बाल-हृदय भाई के लिए करूणा से रो उठता। एक बार उसने बाबूजी के हाथ में अपने दाँत भी गड़ा दिए थे। बदले में बाबूजी का करारा थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा था।

समझदार होती नीलांजना के सामने स्थिति स्पष्ट होती गई थी। उसका परिवार औरों से अलग क्यों है? असामान्य भाई के लिए उसके मन में करूणा के साथ आक्रोश भी उभरता था। भइया के सामान्य रहने का अर्थ गाली-गलौज बन्द रहना होता था। किसी के प्रति उनके मन में प्यार या ममता जैसे भाव नहीं थे। युवा होती नीलांजना को भाई एक खतरनाक जीव-सा लगने लगा था। वह प्रायः उसके सामने पड़ने से कतराती।

एक दिन सुमित्रा ताई ने अम्मा से कहा था, ”बहू, नीलू को सुरेश के पास अकेले मत छोड़ना। तू तो सब समझती है। सुरेश में कोई समझदारी तो है नहीं....................“

उस दिन से अम्मा भी नीलांजना के प्रति विशेष रूप से सतर्क रहने लगी थीं। स्वयं नीलांजना कितना डर गई थी!

एक बात के लिए नीलांजना अम्मा-बाबूजी और दादी को कभी क्षमा नहीं कर सकती, उन्होंने भइया को मंेटल हाँस्पिटल में सबके लाख समझाने के बावजूद भर्ती क्यों नहीं कराया। शहर के डाँक्टर की दवा से उन्हें नींद भले ही आ जाती, पर उनकी विक्षिप्तता में कोई अन्तर नहीं आता। डाँक्टर का कहना था, भइया के मस्तिष्क की बनावट में जन्मजात जो कमी है, उसकी क्षति-पूर्ति संभव नहीं।

नीलांजना बाबूजी से बार-बार भइया को किसी मेंटल हाँस्पिटल में भर्ती कराने की विनय करती एपर अस्पताल मे भेजने के नाम पर ही अम्मा अन्न-जल त्याग, रोना शुरू कर देतीं। स्वयं बाबूजी की भी यही दलील थी कि लड़के को पागलखाने में भर्ती कराने से परिवार का सम्मान मिट्टी में मिल जाएगा। लोग क्या कहेंगे, मुख्तार साहब का बेटा पागलखाने में है। लड़की की शादी मुश्किल हो जाएगी। पता नहीं बाबूजी ये कैसे सोच पाते थे कि भइया के घर में रहने से नीलांजना की शादी आसान हो जाती। व्यंग्य की एक मुस्कान नीलांजना के ओठों पर तैर आई थी।

घर के असामान्य वातावरण, भइया के चीखते-चिल्लाने का आक्रोश नीलिमा के काँलेज की डिबेटों में उतर आता। विरोधी पक्ष की बात इस तरह काटती कि उनसे कोई जवाब ही न बन पाता।

ऊपर से बेहद सामान्य और शान्त दिखने वाली नीलांजना के अन्तर में अन्धड़-सा चलता रहता। बाबूजी जहाँ भी उसकी शादी के लिए जाते भइया का नाम वहाँ पहले पहुँच जाता। नीलांजना हमेशा सोचती, अम्मा के उन छह बच्चों की जगह भैया क्यों न चले गए! काश वह चले जाएँ......‘कभी-कभी नीलांजना बेवजह लोगों से उलझ पड़ती। सामान्य कही गई बातों में छिपे अर्थ पढ़ने की कोशिश करती। सबसे ज्यादा गुस्सा उसे भइया पर आता, स्वयं असामान्य होते हुए भी वह तो सामान्य जीवन जी रहे थे और सामान्य नीलांजना, असामान्य जीवन जीने को विवश थी। अनजाने ही नीलांजना अपने आप में कई काम्प्लेक्स डेवलप कर बैठी थी।’

अगर कभी किसी लड़के ने नीलांजना की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया, नीलांजना ने उसे झिड़क दिया। दोस्तों में सिर्फ उषा ही उसके निकट आ सकी थी। अपने मन की बात उषा से कह, नीलांजना हल्की हो जाती थी। बी.ए. के बाद नीलांजना ने एम.ए. में दाखिला ले लिया और उषा उसी शहर में नौकरी कर रही थी। उषा के पिता के स्वर्गवास के बाद उसके बड़े भाई ने घर को सम्हाला था। अब उषा भाई के हाथ मजबूत करने को दृढ़-प्रतिज्ञ थी। अपनी शादी की बात उसने भुला दी थी।

”जब तक बिना दहेज कोई शादी का प्रस्ताव नहीं आता, मैं विवाह नहीं करूँगी। भइया ने इस लायक बनाया यही क्या कम है नीलू, अब उन पर और बोझ डालना ठीक नहीं है न?“ कितनी बार नीलांजना सोचती, काश उसके भइया भी उषा के भाई जैसे होते!

दृढ़ निश्चय के साथ आँसू पोंछ, नीलांजना उठ खड़ी हुई थी। इस समय उषा की उसे सख्त जरूरत महसूस हो रही थी।

दरवाजा खोलते ही, उड़े-उड़े चेहरे, अस्त-व्यस्त वेशभूषा के साथ खड़ी नीलांजना को देख, उषा चैंक उठी थी-

”अरे नीलू...... क्या हुआ, तबियत तो ठीक है?“

”सब बताती हूँ, पहले अन्दर तो आने दो।“

नीलांजना को अन्दर आने की राह दे, उषा ने दरवाजा बन्द कर दिया था।

”एक कप चाय मिलेगी उषा?“

”अभी लाई...........“

नीलांजना को चाय थमाती उषा की सवाल पूछती निगाहें उसके मुख पर जमी हुई थीं। एक घूँट चाय गले से नीचे उतार नीलांजना ने उषा को जवाब दिया था,

”भइया नहीं रहे उषा!“

”क्या ......कब........कैसे?“

”बता पाना उतना आसान नहीं, तुझे मेरी मदद करनी होगी उषा।“

”तू बता तो सही, क्या हुआ नीलू?“

”काजल भाभी को पुलिस ले गई है।“

”क्या..........आ..........“

”हाँ उषा, भइया के बलात्कार से बचने के लिए उसने बाबूजी के डंडे से उनके सिर पर वार किया और भइया...........“

”हे भगवान, ये क्या किया भाभी ने!“

”वही, जो उन्हें बहुत पहले करना चाहिए था।“

”ये तू क्या कह रही है नीलू, होश में तो है?“

”पूरे होश में तो अब आई हूँ। पिछले दो दिनों से जो भी संशय थे, सब छंट गए हैए उषा। काजल भाभी को मुक्ति मिलनी ही चाहिए।“

”तेरे भाई की उन्होंने हत्या की है और तू.........?“

”हाँ उषा, उन्होंने हत्या नहीं की, अपनी असहनीय यातना का अन्त किया है। बलात्कार के विरूद्ध रक्षा का अधिकार स्त्री को है न?“

”छिः नीलू,एतू ये कैसी भाषा बोल रही है! पति अपनी पत्नी के साथ बलात्कार.....छिः छिः!“ उषा का मॅुंह विकृत हो उठा था।

”बलात्कार का मतलब जानती है न उषा? विवाह की प्रथम रात्रि काजल भाभी की दहशत-भरी चीखें सुनाई दी थीं। घर के सारे प्राणी जगते हुए भी सोने का बहाना किए पड़े रहे। मैंने उठने की कोशिश की तो अम्मा ने जबरन रोक दिया था, ऊपर से डाँट लगाई थी, ‘नए ब्याहलों के कमरे में तेरा क्या काम! खबरदार जो वहाँ गई।’“

”चाचाी ने हॅंसते हुए कहा था, ‘अरे भोली लड़की है, पहले-पहले ऐसा ही होता है बेटी, तू सो जा।’“

”तभी काजल भाभी हाँफती दौड़ी आई थीं, साँस घोंकनी-सी चल रही थी, साड़ी का आँचल पीछे घिसटता आ रहा था-

‘मुझे बचा लीजिए, मैं वहाँ नहीं जाऊॅंगी.... अम्मा जी, मुझे बचा लीजिए।’“

”भाभी के पीछे दहाड़ते आए भइया ने उन्हें दबोच लिया था। उनकी पकड़ में पंख कटी गौरैया-सी भाभी छटपटा रही थीं। मैंने भाभी को बचाना चाहा तो अम्मा न हाथ पकड़ खींच लिया था।“

”सुबह भाभी के पूरे शरीर में पड़ी खरोचें, टूटी चूड़ियों से बने जख्म-तब मैंने वैसा ही समझा था उषा, पर उसके बाद वे जख्म कभी नहीं भरे थे। हाँ भाभी ने उन्हें अपनी नियति मान स्वीकार कर लिया था। वैसे भी वह जा भी कहाँ सकती थी! डनके लिए तो सारे दरवाजे बन्द थे।“

”भइया की शादी क्यों की गई एनीलू?“ उषा सिहर उठी थी।

”अम्मा-बाबूजी को उनके कुछ शुभचिन्तकों ने सलाह जो दी थी कि भइया शादी के बाद ठीक हो सकते है। उन्होंने तो अनगिनत उदाहरण भी दे डाले थे। तू तो जानती है उषा, जिस देश में लड़कियाँ तीस-चालीस रूपयों में बेची जा सकती हैं वहाँ एक एक्सपेरिमेंट के लिए एक जीवन बलि चढ़ गया।“

”अफ़सोस यही है कि इस त्रासदी की साज़िश में मैं भी सहभागी हूँ। अपना विरोधी स्वर ऊॅंचा क्यों न उठा सकी! काश भाभी की शादी एक मजदूर से हो जाती तो वह कितनी सुखी होतीं!“

”उनके चाचा तेरे भइया की दिमागी हालत जानते थे एनीलू?“

”बहुत अच्छी तरह। उन्होंने अनाथ भाई की बेटी के लिए घर और वर दोनों दे दिए। धन्य हैं ऐसे चाचा। ऐसे ही धर्मात्मा लड़की को कोठे पर न भेज, शादी का लाइसेंस दिला, उस पर बलात्कार की खुली छूट देते हैं।“

”धिक्कार है ऐसे चाचा पर! मुझे मिल जाए तो जान से मार डालूँ, नीच-कमीना!“ उषा उत्तेजित हो उठी थी।

”कभी तो ऐसा लगता है उषा ये सारी दुनिया बलात्कारियों से भरी पड़ी है। शराफ़त के मुखौटे लगाए, ये समाज में खुले घूमते हैं, जहाँ मौका मिला नहीं कि मुखौटा उतार फेंकते हैं। तू ही सोच, अम्मा को आठ बच्चों की माँ बनाने में क्या बाबूजी ने उनकी खुशी-नाखुशी देखी होगी? न जाने कितनी बार उन्हें जबरन वो सब कुछ झेलना पड़ा होगा। एक अम्मा ही क्यों, घर-घर की यही कहानी है। औरत दिन-भर घर की चक्की में पिस चूर-चूर हो जाए, पर पति की इच्छा के आगे उसे समर्पण करना ही पड़ता है। इच्छा-विरूद्ध जबरदस्ती क्या बलात्कार नहीं हैए उषा?“नीलांजना की आँखें जल उठी थीं।

”सच नीलू, तेरी बातों से तो यही लगता है, कभी अपने घरवाले भी बलात्कार की साज़िश में शामिल होते हैं।“

”सामूहिक बलात्कार में असहनीय शारीरिक-मानसिक कष्ट होता है, पर जब पूरा परिवार ही अपनी साज़िश के तहत किसी लड़की पर बलात्कार की परमीशन दे दे, तब उस पीड़ा को क्या नाम देगी एउषा? काजल भाभी के साथ वही हुआ है।“

”उस दिन की बात बताएगी नीलू, जब काजल भाभी ने वो साहसी निर्णय लिया था?“

”पता नहीं भाभी का यह सोचा-समझा निर्णय था या सब कुछ अचानक घट गया। सच तो ये है, कई बार मेरे दिल में भी भइया को ख़त्म करने की बात आई थी, पर उस ख्याल को हमेशा जबरन परे कर दिया। शायद भाभी के मन में भी दुविधा रहती होगी।“

”उस दिन भइया को खाना खिलाने गई भाभी को भइया ने अपनी फौलादी बाँहों में जकड़ उनके शरीर को बुरी तरह दाँतों से काटना शुरू कर दिया था। भाभी का प्रतिरोध उनकी शक्ति के सामने ठहर नहीं सकता था। शायद पिछले दो-तीन दिनों से भइया के आक्रमणों से घबराकर, भाभी रात में बाहर से उनका कमरा बन्द कर, स्वयं बरामदे में सो जाती थीं। उस दिन शायद भइया उनसे पूरा बदला ले रहे थे। रातों में भइया की गालियों की बौछार सब सुनते थे-“

”‘कहाँ भाग गई स्साल्ली इधर आ। खोल मेरा कमरा।’“

”काजल भाभी के शरीर की चाहत में, वह जो कुछ कहते, बता पाना कठिन है एउषा। अम्मा ने भाभी को उनके कमरे में सोने को जब विवश करना चाहा तो मैं झल्ला पड़ी थी-“

”‘अम्मा, तुम लाख चाहो, भइया को भाभी ठीक नहीं कर सकतीं। पिक्चरों में दिखाई कहानियाँ हमेशा सच नहीं होती, समझी!’ अच्छा हो हम लोग उन्हें अकेला छोड़ दें। वह भइया की भलाई के लिए भी तो उन्हें अपने से अलग रख सकती हैं न?“

”हाँ, उस दिन काजल भाभी की दहशत-भरी चीखों पर जब तक सारा घर पहुँचा, खून से लथपथ भइया अंतिम साँसें ले रहे थे और बदहवास काजल भाभी ने दौड़ कर अपने को कमरे में बन्द कर लिया था। कुछ दिन पहले सुमित्रा ताई ने ठीक कहा था,

‘सुरेश के पास बहू को अकेले नहीं भेजना, किसी के साथ भेजो या सुरेश के हाथ बाँध कर रखो, वर्ना कुछ भी हो सकता है। मुझे तो उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं लगती नीलू की माँ।’“

”अम्मा को ताई की वो बात कितनी बुरी लगी थी, पर सच तो ये था कि भइया की दिन-ब-दिन खराब होती दिमागी हालत उन्होंने भाँप ली थी। हम लोग उन्हें झेलने के अभ्यस्त हो चुके थे शायद इसीलिए फ़र्क पता नहीं लगता था। सच कहूँ उषा, पिंजड़े में बन्द खॅूख्वार जानवर के सामने भाभी को हम सब परोसते रहे- इस उम्मीद में कि शायद भइया ठीक हो जाएँगे।“ नीलांजना का स्वर कडुआ आया था।

”काजल भाभी को पुलिस में किसने दिया है नीलू?“

”सब कुछ इतना अचानक घटा कि किसी को होश ही नहीं था। पड़ोस के रामलाल जी ने फ़ोन करके पुलिस बुला ली थी। उत्तेजित बाबूजी ने काजल भाभी के खिलाफ़ रिपोर्ट लिखा दी। कोख-जाए के लिए अम्मा-बाबूजी विकल थे। जिसकी ज़िंदगी मौत से बदतर थी, जिसके मरने की मन-ही-मन सब कामना करते थे। मौत के बाद वह कितना प्रिय हो उठा था, बता नहीं सकती........।“

”बेचारी काजल भाभी .... उनका क्या होगा?“

”उन्हीं की मदद हमें करनी है उषा। मैं भरी अदालत में भाभी के ऊपर हुए अत्याचारों को बताऊॅंगी। वे निर्दोष हैं। दोषी हम लोग हैं जिन्होंने उन्हें इस स्थिति तक पहुँचाय है।“

”एक बार फिर सोच ले, तेरे इस फैसले का अम्मा-बाबूजी पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। अच्छा हो उन्हें ही समझा, शायद गुस्सा ठंडा होने पर वे भाभी को माफ़ कर दें।“

”उन्हें समझा पाना असम्भव है एउषा! बेटे की मौत से वे बदले की आग में जल रहे हैं; पर मैं काजल भाभी को इस आग में नहीं जलने दॅूगी, ये मेरा पक्का फैसला है, भावुकता नहीं।“

”अगर अदालत ने उन्हें छोड़ भी दिया तो वे कहाँ जाएँगी नीलू?“

”दुनिया बहुत बड़ी है उषा, किसी महिला संस्था में कहीं-न-कहीं उन्हें शरण जरूर मिलेगी।“

”पर उनके माथे पर हत्या का कलंक लग गया है, समाज उन्हें जीने नहीं देगा।“

”लंदन में यही भारतीय स्त्री अत्याचारी पति को जलाकर मुक्ति पा सकती है, अपना नया जीवन जीने को स्वतंत्र है, फिर यहाँ वैसा क्यों संभव नहीं है उषा, इसीलिए न कि हम लड़कियों को बचपन से पति की क्रीत दासी का रोल निभाने की ट्रेनिंग दी जाती रही है? लड़कियों की इस भूमिका में बदलाव लाना है उषा। मैं उन्हें अपने पास रखॅूगी, उसके लिए किसी का भी विरोध सह सकती हूँ मैं, पर भाभी के प्रति प्रायश्चित तो करना ही है। वह अपने पाँवों पर खड़ी हो जाएँ यही मेरा उद्देश्य है। तू मेरा साथ देगी न उषा?“

”मैं तुझसे कब अलग रही हूँ नीलू, बता क्या करना होगा?“ उत्तेजित नीलांजना को मुग्ध दृष्टि से ताकती उषा के स्वर में दृढ़ निश्चय था।

”सबसे पहले हमें एक वकील करना है, भाभी को तुरन्त ज़मानत पर छुड़ाना जरूरी है। एक बात और, अभी मेरे पास भाभी को रखने की कोई जगह नहीं है, उन्हें अपने घर रख सकेगी उषा? मुझे काँलेज में जाँब मिल रहा है, वहीं क्वार्टर भी मिल जाएगा, तब तुझे परेशान नहीं करूँगी।“

”इसमें परेशानी की कोई बात नहीं नीलू, पर तेरी नौकरी पर काजल भाभी की वजह से कोई आँच न आ जाए?“ उषा शंकित थी।

”नहीं, उसके लिए मैं पूरी तरह से निश्चिन्त हूँ। काँलेज की प्राचार्या मेरे जीवन के इस कड़वे सत्य से अच्छी तरह परिचित हैं। सच कहूँ तो उन्होंने हमेशा मुझे हिम्मत दी है, वर्ना मैं अपनी कुंठाओं में जकड़, शायद कुछ न कर पाती। उन्होंने मेरी कुंठाएँ दूर कर, मुझे आत्मविश्वास दिया हैं।“

”तब क्यों न हम उन्हीं के पास चलें, वही किसी अच्छे वकील की व्यवस्था कर देंगी। उनका अनुभव हमारे लिए जरूरी है नीलू।“

”हाँ, यही ठीक रहेगा। वैसे भी अपने इस फैसले के बाद वापस घर तो लौट नहीं सकती। मेरे रहने की भी उन्हें ही व्यवस्था करनी होगी।“

मॅुंह पर आयी उत्साह की चमक के साथ नीलांजना प्राचार्या के घर जाने को उठ खड़ी हुई थी।
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उसका सच

Postby Rohit Kapoor » 29 Sep 2016 20:56

उसका सच


बाई आंटी और गाइड अंकल को हम बचपन से देखते आए थे। बाई आंटी जहाँ से आई थी, वहाँ स्त्रियों के लिए ‘बाई’ सम्मान-सूचक शब्द होता था, इसीलिए अम्मा उन्हें ‘बाई’ और हम उन्हें ‘बाई आंटी’ पुकारते थे। हमारे लिए बाई आंटी एक शापग्रस्त राजकुमारी थीं और गाइड अंकल वह राक्षस, जिसने उन्हें जबरन अपनी कैद में रख लिया था। उस बेमेल जोड़े को देख सब ताज्जुब करते थे-क्या सोच मेम-सी गोरी-चिट्टी, सुन्दर बाई जी को उनके मां-बाप ने काले-मोटे भूत-से गाइड साहब के साथ बाँध दिया था? एक दिन अम्मा से जब वही बात पूछी तो उन्होंने जोरों की डाँट लगाई थी,


”क्या रंग-रूप ही सब कुछ होता है? असली चीज़ आदमी का दिल होता है। गाइड साहब का सोने का दिल है। खबरदार जो फिर कभी उल्टी-सीधी बात की, समझ गई न?“

अम्मा की डाँट ने दोबारा फिर वही सवाल भले ही न पूछने दिया था, पर अन्तर में वह प्रश्न हमेशा उमड़ता-घुमड़ता रहा। इन सबके बावजूद क्रिसमस के दिन हमें गाइड अंकल की सुबह से प्रतीक्षा रहती थी। उस दिन ढेर सारे फल-मिठाइयों की टोकरी के साथ बड़ा-सा केक लाते गाइड अंकल, हमें किसी देवदूत से कम नहीं लगते। उनके आते ही हम उन्हें ‘हैप्पी क्रिसमस अंकल’ की बौछारों से भिगो डालते। अपने इर्द-गिर्द जमा बच्चों को देखते ही उनके चेहरे पर स्नेहिल मुस्कान बिखर जाती। हमारी मनपसंद टाफियाँ पाँकेट से निकालते हॅंसते हुए हमें थमाते जाते, ”ये लो मुन्नी तुम्हारा लाली पाँप, और ये रहा मिल्क चाकलेट, हमारे अनुज बेटे के लिए।“

उस उम्र में हम कभी सोच भी न सके कि जो गाइड अंकल हम बच्चों पर जान छिड़कते थे उनका अपना घर बिन बच्चों के कितना सूना था। गाइड अंकल और बाई आंटी हमारे घर के हर दुख-सुख में शामिल थे, पर दादी के कारण उनकी पहॅुंच घर के बाहर तक ही थी। उनके अाने पर उन्हें अलग रखी प्लेटों में ही नाश्ता दिया जाता। बाई आंटी ने जान कर भी शायद उस बात को हमेशा अनदेखा किया था।

अपने दो कमरों के छोटे-से घर को बाई आंटी ने ऐसा सजा रखा था कि हम मुग्ध देखते रह जाते। गाइड अंकल के बनाए कागज के गुलाबों के लिए न कभी हमारी फ़र्माइश ख़त्म होती न उनके हाथ हमारे लिए फूल बनाते थकते। अपनी फ़र्माइशें पूरी कराते हम सोच भी नहीं पाते कि हमने उनका पूरा दिन अपने नाम करा लिया था।

गाइड अंकल का सामान खरीदने-बिकवाने की दलाली का काम उन दिनों जोरों से चल रहा था। अपना सामान बेचकर अंग्रेज परिवार अपने देश वापस जा रहे थे। उन दिनों उनके प्रति लोगों के मन में द्वेष भाव भले ही रहा हो, पर उनके सामान के लिए हिन्दुस्तानियों के दिल में बहुत मोह था। मुहल्ले का शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहाँ गाइड अंकल की मदद से कोई फ़र्नीचर, सजावटी सामान, परदे-गलीचे या क्राकरी न आ गई हो। उन चीजों को बिकवाने के लिए उन्हें अंग्रेजों से अच्छा कमीशन मिल जाया करता था। सामान बिकवाने में गाइडेंस के कारण ही अंग्रेजों ने उन्हे ‘मिस्टर गाइड’ का ख़िताब दिया था। बाद में यही नाम उनका परिचय बन गया था। उन दिनों उनके घर रोज चिकन-मीट पकता था। हमारे घर में उनके लिए अलग बर्तन रखे जाने का एक यह भी कारण था। अम्मा और दादी मीट देख भी नहीं सकती थीं।

अम्मा, जब अचानक ज्यादा बीमार पड़ गई तो हम सब घबरा गए थे। उस वक्त बाई आंटी ने पूरे घर और अम्मा को सम्हाला था। रात भर अम्मा के माथे पर पानी की पट्टी बदलती बाई आंटी, न जाने कब अपने घर के काम निबटाती। दीनू की मां से हमारे लिए चाय-नाश्ता बनवा, अम्मा की तरह प्यार से खिलाती थीं। अम्मा के किचेन में उनका प्रवेश निषिद्ध था, पर उन्होंने कभी इस बात का बुरा नहीं माना। अगर मन में कभी बुरा लगा भी तो कभी ज़ाहिर नहीं किया। अम्मा की उस बीमारी में भी बाई आंटी ने लक्ष्मण-रेखा नहीं लाँघी। अब सोचती हूँ तो समझ में नहीं आता अपने लिए किसी की घृणा को भी क्या उस तरह मान दिया जा सकता है? क्या वह इसी धरती पर जन्मीं थीं? अम्मा के पानी माँगने पर वह हममें से किसी को पुकारती थीं। खेल छोड़कर आने पर हमारी झुँझलाहट स्वाभाविक ही होती, ”भला यह भी कोई बात हुई, सारा काम कर सकती हैं, अम्मा के मुँह में दो बूँद पानी नहीं डाल सकतीं!“ हम झॅुंझलाते।

”नहीं डाल सकती बिटिया , वर्ना तुम्हारी अम्मा का धरम भ्रष्ट हो जाएगा।“ अपनी मजबूरी वह किस आसानी से बता जातीं।

बाई जी और गाइड साहिब क्रिस्तान थे, हम बच्चों ने उनकी बाजार से लाई मिठाई-मेवा खूब खाई, पर उन्होंने हमेशा यह ध्यान रखा उनके घर में पकाया खाना हम कभी न चखें। हालाँकि बाई आंटी अपने घर में बहुत अच्छा खाना बनातीं, पर हमें उसका अंश भी नहीं देतीं। कभी उनकी कंजूसी पर बेहद गुस्सा आता-

”अपने लिए इतना अच्छा खाना बनाती हैं, हमारे लिए रद्दी केक बाजार से लाती हैं। हम आपसे नहीं बोलेंगे।“

नन्हीं कविता को गोद में उठाती बाई आंटी की आँखें भर आती।

”नहीं बिटिया रानी, हम तो तुम्हारे लिए बाजार से सबसे बढ़िया केक लाए हैं, ये हमारा खाना तो एकदम खराब हैं। देख लेना जो हम इसे मॅुंह में भी डालें।“

शायद बाई आंटी उस दिन सचमुच खाना नहीं खाती थीं।

उम्र की सीढ़ियाँ फलाँगते हमारे जीवन में बाई आंटी और गाइड अंकल का महत्व कम होता गया। हमारे साथ अम्मा की भी व्यस्तताएँ बढ़ती गई। बड़ी दीदी की शादी फिर भइया का विवाह निपटाती अम्मा से बाई कब-कहाँ छूट गई, पता ही नहीं चला। शादी-ब्याह के मौकों पर पुराने विचारों वाले परिवार के सामने बाई आंटी का प्रवेश निषिद्ध-सा था। कभी आ जाने पर अम्मा जैसे घबरा-सी जातीं। बड़ी ताई, चचिया सास की तरेरती निगाहों से वह डर जातीं। जल्दी से उन्हें किसी बहाने वापस भेज, अम्मा चैन की साँस लेतीं। फिर भी चचिया सास बड़बड़ाती ही जाती, ”तुमने तो बहू हद ही कर दी, जात-कुजात कुछ नहीं देखती। हमारा भी धरम भ्रष्ट करोगी।“

अम्मा की विवशता बाई आंटी ने समझ ली थी, इसीलिए बड़ी दीदी की शादी में साड़ी का पैकेट दूर से थमा, वापस चली गई थीं। अम्मा खाने के लिए आग्रह करती ही रह गई थीं।

बड़ी दीदी की शादी के बाद घर में सन्नाटा छा गया था। बी0ए0 के लिए मुझे लखनऊ जाना पड़ा था। घर छोड़ते वक्त खूब रोई थी, पर काँलेज के जीवन ने जल्दी ही घर का बिछोह भुला दिया था। होस्टेल की दुनिया ही निराली थी। शुरू में रैगिंग का डर भले ही हावी रहा, बाद में अपने को एक बड़े भरे-पूरे परिवार का सदस्य बना पाया था। जूनियर्स की तकलीफ में सीनियर्स बड़ी बहन बन, सहायता करती थीं। काँलेज-होस्टेल की दुनिया में ऐसी रमी कि अम्मा को खत डालने में भी देरी होने लगी थी।

गर्मी की छुट्टियों में जब घर आई तो अम्मा ने उदास स्वर में कहा था, ”बाई को देख आना, बहुत बीमार हैं।“

बाई आंटी को देख बहुत बड़ा धक्का लगा था, उनका सजा-सॅंवरा घर अस्त-व्यस्त था। पहली दृष्टि में ही घर की विपन्नता स्पष्ट हो उठी थी। स्टील के चमचमाते बर्तन-क्राकरी की जगह अल्यूमिनियम के भगौने, कढ़ाही थी। गाइड अंकल अल्यूमिनियम के काले पड़े भगौने में खिचड़ी पका रहे थे। अन्दर कमरे में टूटी बाँध की खाट पर मैली दरी और चादर पर कृशकाय बाई आंटी पड़ी हुई थीं। उस स्थिति में नमस्ते करने की भी याद नहीं रह गई थी। पीछे से गाइड अंकल आए थे, ”जरा पहचानो तो देखो ये अपनी रागिनी बिटिया आई है।“

”कौन......... रागिनी........ इधर आ बेटी.........“

”ये आपको क्या हो गया है बाई आंटी?“ मेरा कंठ भर आया था।

हाथ जोड़, उन्होंने ऊपर की ओर संकेत कर दिया था। अचानक मेरी दृष्टि दीवार पर टूंगे राम-सीता के चित्र पर पड़ी थीं। ये क्या, बाई आंटी तो हमेशा ईसा को पूजती थीं। फिर आज............?

गाइड अंकल ने एक केन की कुर्सी खींच, मुझसे बैठने को कहा था।

”ये सब कैसे हो गया? आंटी कब से बीमार हैं अंकल?“

”मेरा बैड लक इसको खा गया बेटी!“

”छिः, ये कैसी बातें करते हैं! अगर आप न होते तो बीस साल पहले ही खत्म हो जाती। मेरा दुर्भाग्य आपको भी............“

न जाने वे दोनों अपनी कौन-सी पहेली बुझा रहे थे, पर एक बात ज़रूर थी, उन दोनों में अगाढ प्यार जरूर था। थोड़ी देर उनके पास बैठ, भारी मन से घर लौट आई थी।

”अम्मा, गाइड अंकल और बाई आंटी को क्या हो गया? उनका घर तो एकदम बदल गया है।“

”हाँ बेटी, सब कुछ बदल गया। बाई बेचारी को ये दिन भी देखने थे। अम्मा ने उसाँस छोड़ी थी।“

”पर उनके पास तो बहुत पैसा था अम्मा............“

”जितना कमाया उतना उड़ा दिया। दोनों ही के दिल बड़े थे। कभी सोचा ही नहीं कभी उनका काम ख़त्म भी हो सकता है..........“

”क्या गाइड अंकल का काम अब नहीं चलता अम्मा.........?“

”एक तो उम्र का तकाज़ा, उस पर अब नीलामी माल खरीदने में किसको उतनी रूचि रह गई है! वो ज़माना और था। बेचारे बहुत मुश्किल मे हैं उस पर बाई भी पड़ गई हैं। डाँक्टर बुलाने के लिए भी पैसे नहीं हैं।“

”उन्होंने सारे मुहल्ले के लिए इतना किया, क्या हम सब मिलकर उनका इलाज नहीं करा सकते?“

”उन दोनों का स्वाभिमान इस बात की इजाज़त नहीं देगा, दूसरे का एहसान याद रखने वाले लोग दुनिया में कम ही होते हैं। बहती गंगा में हाथ धो, सब उन्हें अकेला छोड़, अलग हो गएए मुन्नी।“

दूसरे दिन सुबह सूजी की खीर बना, बाई आंटी के पास जा बैठी थी। गाइड अंकल ने आँखें मूंदे पड़ी बाई जी को पुकारा था, ”आँखें खोलो गौरी, देखो हमारी बिटिया तुम्हारे लिए क्या लाई है।“

बाई जी को उनके नाम से पुकारते गाइड अंकल को उसी दिन सुना था। मुश्किल से आँखें खोलती बाई आंटी के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई थी।

”अब जल्दी से उठिए आंटी, ये खीर चखकर बताइए कैसी बनी है.........“

मैं उन्हें खीर खिलाने को आतुर थी।

”मेरी बेटी के हाथ का बनाया तो अमृत ही होगा............“

र्”सिर्फ़ बातों से नहीं मानूँगी आंटी, खाकर बताना पड़ेगा। अंकल, जरा इन्हें उठाइए तो........“

हाथ का सहारा दे, हमने उन्हें तकिए के सहारे बैठा-सा दिया था। चम्मच से खीर उनके मॅुंह तक ले गई तो उनकी आँखों से झर-झर आँसू झरने लगे थे।

”ये क्या, आप रो रही हैं एआंटी?“

गाइड अंकल ने आगे बढ़, प्यार से उनके आँसू पोंछे थे। अपनी नम आँखें छिपाने के लिए वे हमें अकेला छोड़ बाहर चले गए थे-

”तू कुछ देर तो बैठेगी न बिटिया, मैं अपने काम निबटा कर आता हूँ।“

”हाँ-हाँ अंकल, आप आराम से जाइए। मैं हूँ न आंटी के पास।“

मुश्किल से एक-दो चम्मच खीर गले से उतार बाई आंटी निढाल पड़ गई थी।

”उस जन्म में जरूर तू मेरी ही बेटी रही होगी...............“

”क्यों, इस जन्म में आपकी बेटी नहीं हूँ?“ मैंने मान दिखाया था।

”इस जनम की बेेटी न जाने कहाँ होगी....... कैसी होगी......“ उनकी आँखें फिर भर आई थी।

”आपकी कोई बेटी हैए आंटी?“

उन्हें निरूत्तर पा, मैंने जिद पकड़ ली थी, ”कहाँ है आपकी बेटी? इतने दिनों तक आप दोनों अकेले क्योें रहते रहे? बताइये न आंटी...........“

”क्या बताऊॅं, कैसे बताऊॅं बेटी, उन बातों को दुहरा पाना क्या आसान है?“

”न बताकर ही आपने अपनी ये हालत बना ली है बाई आंटी! जानती हैं मन में छिपाकर रखी गई बात नासूर बन जाती है।“

”ठीक कहती है बेटी, पर वे बातें दोहरा पाना आसान नहीं है बिटिया...........“

”आपकी बेटी हूँ, अपना दुख-दर्द मुझे सुना जरूर चैन पाएँगी, कोशिश तो कीजिए।“

”जो सुनाऊॅं, उसकी कहानी लिख सकेगीएमुन्नी?“ बाई आंटी की आँखें हल्के से चमक उठी थीं।

”पर मैंने तो कभी कोई कहानी नहीं लिखी आंटी.............“

”तब रहने दे, क्या करेगी सुनकर! जी चाहता है मेरी कहानी वह पढ़े, मेरे मन की बात जान ले। मेरी बेटी तो मेरा दुख समझेगी न मुन्नी- मेरी कहानी लिखेगी मुन्नी!“

”ठीक है आंटी, मैं आपकी कहानी ज़रूर लिखॅूगी, पर वह छपेगी या नहीं, इसका वादा नहीं कर सकती।“

”मेरे लिए इतना ही काफ़ी है बेटी, वर्ना इस दुनिया से जाने के बाद भी दिल का बोझ चैन नहीं लेने देगा।“

”ऐसा क्या था आंटी? समझ लीजिए इस वक्त आपके पास आपकी बेटी ही बैठी है।“

अपना दायाँ हाथ उठा बाई आंटी ने मेरे हाथ पर रख दिया था। दो पल आँखें मूंद, मानो वह शक्ति संचय कर रही थीं। धीमे स्वर में उन्होंने अपनी कहानी शुरू की थी-

”उस दिन सुबह-सुबह बा ने जगाया था, ‘जल्दी उठ गौरी, घर में त्योहार है, तू घोड़ा बेच सो रही है?’“

”बा की बात सुनते ही नींद गायब हो गई थी। अरे आज ही तो गणेश चतुर्थी है। पिछले कितने दिनों से शारदा दीदी हमारे नृत्य का रिहर्सल करा रही थीं। इस बार के समारोह मंे हमारे गरबा ग्रुप को सबकी वाहवाही पानी थी। जल्दी से नहा-धो, रंगोली सजाने बैठी थी। मेरी रंगोली हमेशा सबसे ज्यादा सुन्दर ठहराई जाती थी। आज भी मुझे ही बाजी जीतनी थी। बा तरह-तरह के पकवान बनाने में व्यस्त थीं। नृत्य के लिए बा ने मेरे लिए कीमती गुलाबी ज़री काम का लहॅंगा-सेट बनवाया था। लग रहा था कैसे जल्दी से रात आ जाए और मैं सितारों-जड़ी अपनी चुन्नी ओढ़ गरबा करूँ।“

”आखिर वह क्षण आ ही गया । तारों-भरे आकाश के साथ सितारों-जड़ी ओढ़नी ओढ़े, हम ढेर सारी लड़कियों के आगे चाँद भी शर्मा गया था। नृत्य के बाद थाल भर मिठाइयाँ सबको मुझे ही देनी थीं। उस दिन मैं गाँव के जमींदार की लाड़ली बेटी नहीं, सबकी दुलारी बिटिया बन आशीष पाती थी। इस परम्परा को बापू ने शुरू किया था। सबसे आशीर्वाद पाना मेरा गौरव था।“

”वहीं उस रात उसने मुझे देखा था। मिठाई के लिए न हाथ बढ़ाया, न कुछ कहा, बस अपलक मुझे निहारता रह गया । संकोच से मैं मर ही गई थी। धीमे से कहा था, ‘मिठाई लीजिए......’“

”‘मुझे मिठाई नहीं मिठाई वाली चाहिए।’ धीमे से कहे उसके शब्दों पर मैं रोमांचित हो उठी थी।“

”‘छिः......’हाथ का थाल पीछे खड़ी दासी को थमा, घर के अन्दर भाग गई थी। साँस धौंकनी-सी चल रही थी। बार-बार उसका सलोना मुखड़ा, आँखों के आगे नाच रहा था। कौन था वह, पहले तो उसे कभी नहीं देखा..........“

”जब से सोलह साल पूरे कर, सत्रहवें में आई थी, बा मेरी शादी के लिए चिन्तित हो उठी थीं। उन्हें मेरा नदी-सा उमड़ता रूप-यौवन डराता था, कहीं ऊॅंच-नीच हो गई तो ख़ानदान की नाक कट जाएगी, और मैं थी कि खुली बछेरी-सी इधर-उधर डोलती ही रहती।“

”सावन का झूला झुलाती सहेलियाँ गीत गाते-गाते अचानक रूक गई थीं।“

”‘क्या हुआ, गाती क्यों नहीं?’ झूले की ऊॅंची पेंग पर चढ़ी मैं आसमान छू रही थी।“

”खिल-खिल हॅंसती सहेलियों ने पीछे की ओर इशारा किया था। अरे ये तो वही था। न जाने कब, कहाँ से आकर, वह मुझे झुला रहा था! घबराकर ऊॅंची पेंग पर चढ़े झूले से नीचे कूद पड़ी थी। घुटने बुरी तरह छिल गए थे। आँखों में सावन उमड़ आया ।“

”सबसे पहले उसी ने आकर उठाया था। हाथ जोड़ माफ़ी माँगी थी। घावों को इतने हल्के से सहलाया, मानो उसके हाथ नहीं, सेमल की रूई थी। सहेलियाँ न जाने कब खिसक लीं। उसके कंधे पर सिर रख, सिसक उठी थी।“

”नही गौरी नहीं, इन आँसुओं के लिए जो चाहे सज़ा दे दे, कसम है जो उफ़ भी करूँ।“

”तुम मुझे क्यों परेशान करते हो?“

”मैं तुमसे प्यार करता हूँ। इतना प्यार जिसमें सारे समुन्दर समा जाएँ।“

”पर मैं तुमसे नहीं करती। बा कहती हैं ये गन्दी बात होती है।“

”तुम्हारी बा गलत कहती हैं। वो तुम्हारे बापू को प्यार करती हैं, क्या ये गन्दी बात है?“

”बा की तो बापू से शादी हुई है।“

”मैं भी तुमसे शादी करूँगा।“ उसने दृढ़ स्वर में कहा था।

”हमें ऐसी बातें अच्छी नहीं लगतीं।“ शर्माकर हथेलियों में मॅुंह छिपा लिया था।

”फिर कैसी बातें अच्छी लगती हैं? वही करूँगा।“ वह हल्के-हल्के हॅंस रहा था।

”कैसी भी नहीं.........“ अपने को उसकी पकड़ से छुड़ा भाग गई थी, मेरे पीछे वह हॅंसता खड़ा रह गया था।

”बापू को अपने ब्राह्यणत्व का बहुत गर्व था। मेरा वर कुल-गोत्र में ऊंचा ही होना चाहिए। इकलौती बेटी के लिए उनके न जाने कितने सपने थे। कोई प्रस्ताव उन्हें भाता ही नहीं था।“

”उससे मेरी अक्सर मुलाकातें होने लगी थीं। सहेलियों को उसने न जाने कैसे मोहाविष्ट कर लिया था कि वे उसके गीत गाते न थकतीं। इन सबके बावजूद उससे मेरी शादी असम्भव थी। कुल-गोत्र, आर्थिक स्थिति, किसी भी तरह वह हमारे परिवार के बराबर नहीं बैठता था। बापू की ज़िद और क्रोध से पूरा खानदान डरता था। उनके सामने वह प्रस्ताव रखने की हिम्मत भी, दुस्साहस ही था। सब कुछ जानते हुए भी उसकी बुलाहट पर कोई न कोई बहाना बना, मैं पहॅुंच ही जाती। बा को शिकायत होने लगी थी, अब मैं उनके पास रहते हुए भी, सहेलियों के पास पहॅुंचने को व्याकुल रहती। बापू ने मेरे लिए घर-वर की जोरों से तलाश शुरू कर दी थी।“

”उस दिन घर में खूब तैयारियाँ हो रही थीं। बा उमगी-उमगी घर सजाने में व्यस्त थीं। मुझे अच्छे कपड़े पहन तैयार होने को कहा गया था। मेरे विस्मय पर बा ने प्यार से मेरी ठोढ़ी उठा, माथा चूम लिया था। मॅुंहलगी दासी कनिया ने कान में फुसफसाया था, ‘अरी दिदिया रानी, आज आपके ‘वो’ आ रहे हैं, समझ गई न?’“

”मैं सुन्न पड़ गई थी, अब क्या होगा? उससे बिछुड़ कर तो जीते जी मर जाऊॅंगी। बा से थोड़ी देर के लिए अपनी सहेली राधा से मिल आने का बहाना कर, घर से बाहर आ सकी थी। पूरी बात सुनते ही वह गम्भीर हो गया था।“

”आज हमारे इम्तिहान की घड़ी आ ही गई गौरी। अब इसी पल तुम्हें मुझे या अपने परिवार में से एक को चुनना है। बोलो तुम्हारा क्या फ़ैेसला है?“

”मुझे मौन खड़ा देख वह नाराज़ हो गया था-“

”अगर मुझे पता होता तुम्हारे मन में मेरे लिए इतनी-सी भी जगह नहीं, तो बहुत पहले ही ये गाँव छोड़ कहीं दूर चला गया होता। मैंने तुम्हारे प्यार में धोखा खाया हैए गौरी।“

”नहीं.... नहींकृमैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, तुम्हारे बिना मैं जी नहीं सकती...... तुम मुझे गलत समझ रहे होए मोहन.....“ मैं रो पड़ी थी।

”ठीक है, तो चलो अभी इस गाँव को छोड़, कहीं ऐसी जगह चले जाएँगे, जहाँ हमें कोई न खोज सके। चलोगी गौरी?“

”तुम बापू को नहीं जानते, वे हमें ज़िन्दा नहीं छोड़ेगे। अपने मान-सम्मान के लिए उन्हें किसी की चिन्ता नहीं है।“

”मेरे साथ डरने की ज़रूरत नहीं है गैरी, मुझ पर विश्वास है न?“

”पर ........ हम कहाँ जाएँगे?“

”पर-वर के लिए अब टाइम नहीं है, या तो अभी मेरे साथ चलो, वर्ना समझ लेना मै तुम्हार लिए मर चुका हूं।

ठीक हैए मै तुम्हारे साथ चलने को तैयार हॅूं।“ काँपते स्वर में मैं इतना ही कह सकी थी।

”उसने एक भरपूर नजर मुझ पर डाली थी। आने वाले अतिथियों को दिखाने के लिए बा ने ढेर सारे गहने पहनाए थे। नए कपड़ों में मैं शायद ज्यादा ही सुन्दर लग रही थी।“

”तो चलो, एक पल की देरी भी ठीक नहीं........“ मेरा हाथ पकड़ वह चल दिया था। उसके घर में दूसरा था ही कौन जिसके लिए वह सोचता, जिससे कुछ पूछता! निपट अकेले बचपन काट, जवानी की दहलीज़ पर मेरा साथ उसे मिला था। दूसरों की दया पर आश्रित बचपन, जवानी के आते ही फुफकार कर उठा था। उसे वो पराश्रयी ज़िन्दगी नहीं जीनी थी। गाँव के मुखिया से लड़, ऊपर तक जा पहॅुचा था। दूसरों के कब्ज़े से अपनी जमीन छुड़ाकर ही उसने दम लिया था। उसके जीवट की सब तारीफ़ करते थें। आज उस जमीन का मोह छोड़, वह उसके साथ अनजान पथ पर चल दिया था।

”रेलगाड़ी में बैठते ही मेरा मन बा और बापू के लिए हाहाकार कर उठा था, न जाने उनसे ये सदमा कैसे झेला जाएगा! आँखों से आँसुओं की धार बह चली थी। आसपास के मुसाफ़िर चैंक गए थे। तभी उसने बात बनाई थी,

‘शादी के बाद पहली बार माँ का घर छोड़ा है, इसीलिए माँ की याद आ रही है।’ दो चार स्त्रियों ने मुझे ढाढ़स भी बॅंधाया था,

‘अरे लड़की की जात को ये दुख झेलना ही पड़ता है। कहीं जन्म ले, कहीं और जा बसे। धीरज धर बेटी, बाद में यही पराया घर अपना लगने लगेगा।’“

”रेलगाड़ी की लम्बी दो रातें बिता हम इलाहाबाद के पास फूलपुर पहुँचे थे।“

”उसके पास जो पैसे थे उनसे दो-चार दिन धर्मशाला में कट गए, उसके बाद गहनों का नम्बर आया। इस बीच धर्मशाला के चैकीदार की मदद से एक सेठ के यहाँ उसे पहरेदारी का काम मिल गया। ज़िन्दगी चल पड़ी थी। कभी अपने घर की याद कर खूब रोती, पर जीवन के अभावों पर कभी नहीं रोई।“

”कुछ दिनों से पड़ोस की कोठरी में एक क्रिश्चियन परिवार आकर रहने लगा था। पुरूष एकदम काला भुच्च और पत्नी एकदम जैसे परी-कन्या। हम दोनों उस बेमेल जोड़ी पर खूब हॅंसते। पुरूष अपनी पत्नी की हर माँग पूरी करने मे ही जीवन को सार्थक करता। पत्नी भी उसके आते ही फ़र्माइशों की पिटारा खोल डालती। बेचारा थका-माँदा पति, फिर फ़र्माइशें पूरी करने मेें जुट जाता। उन्हें देख मोहन मुझे बाँहों में ले खूब प्यार करता, अपने भाग्य को सराहता जो उसे मुझ जैसी पत्नी मिली थी।“

”कुछ दिनों से सुबह-सुबह मितली आती देख, वह मुझे डाँक्टर के पास ले गया था। डाँक्टरनी ने मुस्कराते हुए बधाई दी थी, ‘अब तुम बाप बनने जा रहे हो, इसकी अच्छी तरह देखभाल करना।’“ खुशी से भर उसने मुझे ऊपर उठा लिया था।

”उन नौ महीनों उसने मुझे फूल-सा रक्खा था। पारो का जनम हम दोनों के लिए बहुत शुभ सिद्ध हुआ था। सेठ ने उसे तरक्की देकर अपना खास बाँडीगार्ड बना लिया था। तनख्वाह बढ़ जाने से घर में भी खुशहाली आ गई थी। रेडियो पर आने वाले फिल्मी गीत सुनने हमारी पड़ोसिन ट्रेसा भी आने लगी थी।“

”रेडियो के गीतों पर नाचती ट्रेसा नन्ही पारो को गोद में उठा उसे भी चक्कर खिलाती जाती। खिलखिल हॅंसती पारों का मॅुंह चूमती ट्रेसा, अपने को भूल जाती। ट्रेसा हमें बहुत अपनी लगने लगी थी। घरवालों से बिछुड़, वह मेरी बहन बन गई थी। मुझे दीदी पुकारने के कारण मोहन उसका ‘जीजा’ बन गया था। जीजा-साली की नोक-झोंक पर हम खूब हॅंसते।“

”जिन्दगी आराम से गुजर रही थी। कभी बा और बापू बहुत याद आते। जी चाहता उन्हें ख़त डाल माफ़ी माँग लूँ, पर बापू का डर आड़े आ जाता-कहीं यहाँ पहॅुंच उन्होंने मोहन को कुछ कर दिया तो? सोचती थी, एक बार अकेली पारो को ले, उनके पास अचानक पहॅुंच, पाँवों पड़, माफी माँग लूँगी। नातिन का मोह छोड़ पाना क्या आसान होगा? “

”पारो एक साल की हो गई थी। टेªसा की तो वह जान ही थी। अक्सर अनजान लोग उसे ट्रेसा की बेटी समझने की भूल कर बैठ्ते। ट्रेसा का मॅुंह गर्व से चमक उठता,

‘दीदी, ये तुम्हारी बेटी मैं ले लूँगी समझीं। अपने लिए एक और बेटी ले आओ।’“

”मुझसे एक और बेटी लाने को कह रही है, अपने लिए क्यों नहीं ले आती?“

”ला सकती हूँ, बशर्ते वह पारो जैसी गोरी-सी गुड़िया हो, अपने बाप-सी भुतनी नहीं........“

”छिः, पति को भला ऐेसे कहा जाता है! कितना प्यार करते हैं वह तुझे! “ बड़ी बहन की तरह उसे समझाती और वह हॅंसती रहती।

”उस साल इलाहाबाद में कुम्भ मेला लग रहा था। दूर-दूर से तीर्थयात्रियों से भरी रेलें इलाहाबाद पहॅुंच रही थीं। बापू हमेशा कुम्भ मेले पर गंगा-स्नान के लिए इलाहाबाद जाया करते थे। मन में बार-बार आता, क्या पता बापू और बा से वहीं मिलना हो जाए। उत्सुकता से मैं कुम्भ-स्नान की प्रतीक्षा कर रही थीं। पारो के लिए मेले में पहनाने के लिए नई फ्राकें खरीद कर रख ली थीं। उसे देख बापू-बा कितने खुश होंगे! क्ल्पनाओं में डूबी ये नहीं सोच पाती थी कि हजारों-लाखों लोगों में बापू-बा से मिल पाना क्या संभव होगा?“

”गंगा-स्नान के लिए जाते समय ट्रेसा भी हमारे साथ जाने को तैयार थी। मोहन ने चिढ़ाया था, ‘अगर गंगा में डुबकी लगा ली तो हिन्दू बनना होगा, बोलो है मंजूर?’“

”क्यों, क्या मैं हिन्दू नहीं हूँ? ये देखो अब तो मैं सिन्दूर भी लगाती हूँ।“

”मोहक मुस्कान के साथ कही उसकी बात पर मैं चैंक उठी थी। इतने बड़े परिवर्तन पर मेरी दृष्टि भी नहीं पड़ी थी। कब उसने मांग भर सिन्दूर लगाना शुरू कर दिया था? क्यों? उतनी बड़ी बात मैं देख भी न सकी। एक काँटा-सा गड़ा महसूस किया था मैंने। इधर साली-जीजा की नोक-झोंक, हॅंसी-मजाक कुछ ज्यादा ही होने लगा था। ठीक है आज घर लौट कर बात करनी ही होगी।“

”उत्साह कम हो गया था, पर मेले में तो जाना ही थी। मेले की रौनक में मन का अवसाद छंट-सा गया था। पिता के कंधे पर चढ़ी पारो ताली बजा हॅंस रही थी। गंगा में डुबकी लगा पास के हनुमान मन्दिर में प्रसाद चढ़ाने अकेले ही जाना पड़ा था। मन्दिर के भीतर जाने को टेªसा तैयार नहीं थी, उसके साथ मोहन को भी बाहर रूकना पड़ा था। भीड़ में पारो को साथ ले जाने की बात ही बेकार थी। उन दोनों को साथ छोड़ते न जाने क्यों अच्छा नहीं लग रहा था।“

”जल्दी-जल्दी पूजा कर बाहर आई थी। पूरे समय भगवान के ध्यान के साथ, उन दोनों का साथ याद आता रहा। बाहर वे कहीं नहीं थे। आँखें फाड़-फाड़कर चारों ओर देखती मैं पागल हो रही थी। शायद भीड़ में इधर-उधर हो गए हों। पारो का नाम ले, पागलों की तरह दौड़ते देख, मेले के स्वंय सेवकों ने पुलिस-केन्द्र तक पहॅुंचा दिया था। पूरी बात सुन पुलिस अधिकारी हॅंस पड़े थे,

‘बच्ची के साथ उसका बाप है फिर भी आप डर रही हैं! हमारी जीप आपको घर पहॅुंचा देगी। बच्ची के साथ आपके पति वहीं पहॅुंच जाएँगे। आप बेकार परेशान हो रही हैं।’“

”धक-धक करते दिल के साथ घर पहॅुंची थी। बन्द दरवाजे का ताला देख फिर रो पड़ी थी। तसल्ली दे पुलिस वाले चले गए थे। दोपहर से रात हो गई, पर आने वालों का पता नहीं। देर रात टेªसा के पति आए थे। उनका काम ही ऐसा था कि वह जल्दी घर नहीं लौट पाते, इसीलिए ट्रेसा का ज्यादा समय हमारे साथ बीतता था। सब देख-सुन कर वह भी घबरा गए थे। अपने कमरे का ताला खोलने के काफ़ी देर बाद वे फिर आए थे। हताशा-निराशा उनके चेहरे पर लिखी हुई थी।“

”‘अब उनकी खोज करना बेकार है। वे दोनों चले गए....... हमेशा के लिए.......’ सिर पकड़ वे पास पड़ी कुर्सी पर लुढ़क गए थे। अवाक् मैं उनका मॅुह ताकती रह गई थीं- ये क्या कह दिया उन्होंने!“

”सारे ज़े़वर और नगदी के साथ टेªसा उसके साथ चली गई। साथ में ले गई थी मेरा खून, मेरे ज़िगर का टुकड़ा पारो.............“

”पारो......“ चीखकर मैं जमीन पर गिर पड़ी थी। दिन और रातें कैसे बीतीं, याद नहीं, इतना जरूर था कि टेªसा के पति साइमन साया बन हर वक्त मेरे आसपास बने रहते। उन्हीं ने जबरन मुसम्मी का रस मॅंुह में डाल मुझे जीवित रखा था। होश में आने पर चारों ओर घना अॅंधेरा था। बा-बापू के साथ, उस स्थिति में नाता जोड़ पाना असम्भव था। ज़हर खा मर जाना चाहा था, पर हमेशा शान्त रहने वाले साइमन उस दिन दहाड़ उठे,

‘किसलिए मरना चाहती हो? कोई दो बूँद आँसू बहाने वाला भी है? ऐसी भी क्या मौत जिस पर कोई न रोए! मै तुम्हें यह मौत नहीं लेने दॅूगा।’

अवाक् उनका मॅुंह ताकती रह गई थी।

”‘तुमसे कभी कुछ नहीं चाहूँगा, पर क्या हम दो दोस्तों की तरह जिन्दगी नहीं काट सकते? इस ज़िन्दगी का बोझ अकेले ढो पाना मुझसे नहीं होगा..... नही होगा।’ हाथों में चेहरा ढाँप वह सिसक रहे थे। अपने को संयत कर उन्हें सम्हाला था।“

”वह शहर छोड़ हम यहाँ आ बसे। पुश्तैनी मोटर पार्ट्स का बिजनेस छोड़, साइमन मोटर कार बिकवाने वाले दलाल बन गए। मेरे लिए पक्की वैष्णवी रसोई की व्यवस्था कर उन्होंने संकोच से कहा था, ‘मैं बाहर खाना खा लिया करूँगा, आपके लिए ज़रूरी सामान मॅंगवा दिया है।’

”वाह ऐसे निभाएँगे दोस्ती? और हाँ, आज अपनी दोस्ती की शुरूआत हम जश्न मनाकर करेंगे।“

”साइमन का ताज्जुब ठीक ही था, हमेशा की शान्त गौरी उस दिन पहचानी नहीं जा सकती थी। ज़िद करके मैंने उस दिन चिकन पकाया था। साइमन परेशान दिख रहे थे। उन्हें खाना परोस अपने लिए परोसा था। प्लेट में चिकन डालते देख वह असहज हो उठे थे,

‘ये क्या, आप तो वेजीटेरियन हैं, प्याज भी नहीं खातीं, फिर.........“

”उनके सवाल का जवाब दिए बिना चिकन पीस मॅुह में डाल, पूरी ताकत से दबा डाला था। तू समझ सकती है बेटी, वो क्षण कितना कठिन रहा होगा! वर्षो के संस्कार-आस्था मिटा पाना क्या सहज होता है!“

”सच कहूँ तो उस वहशी पल ऐसा लगा था, वैसा कर मानो मैंने मोहन से अपना बदला ले लिया था। उसे अपने जीवन से दूर ढकेल, उसके साथ सारे रिश्ते तोड़, अपने को मुक्त कर लिया था...........“

अचानक वह बेहद थक गई थीं।

”एक घूँट पानी देगी मुन्नी...... कहानी तो पूरी कर दूँ।“ दो घूँट पानी गले से नीचे उतार जैसे उन्होंने शक्ति पा ली थी। धीमे-धीमे अपनी बात वह कहती गई थीं-

”सच तो ये है मुन्नी, साइमन के साथ बस दोस्ती-भर ही निभा सकी मैं। टेªसा ने जिस चेहरे से नफ़रत की, वह कितना खूबसूरत हैं, काश वह जान पाती! फिर भी कभी अपने को उन्हें सौंप न सकी। ऐसा नहीं कि हमारे बीच कभी कोई कमजोर क्षण न आया हो, पर उस पल मैं बर्फ़ बनी रह गई। साइमन ने कभी जबरन अपने को मुझ पर थोपने की कोशिश नहीं की। शायद मुझसे ज्यादा वह मेरे मन को जानते हैं। एक बार कोशिश की थी, उनका प्राप्य उन्हें दे दूँ, पर उन्होंने गम्भीर स्वर में कहा था,

‘तुम्हें साथ रखने में मेरा बहुत बड़ा स्वार्थ है, इसीलिए कभी बदले में वो कुछ देने की कोशिश मत करना, जो तुम मन से नहीं दे सकतीं। भीख मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।“ मेरे बोझ को ढोते रहने में उनका क्या स्वार्थ हो सकता है एमुन्नी? शायद मेरी तरह वह भी ट्रेसा को भुला नहीं सके। उन दोनों की यादों के शव, हम दोनों पूरे जीवन, अपने कंधों पर ढोते रह गए...... बस। उनकी भावनाओं की मौत के लिए मैं जिम्मेवार हूँ मुन्नी, क्यों नहीं उन्होंने किसी और का साथ चाहा? तू देख ही रही हैं, उम्र के साथ साइमन का काम कम होता गया है। हम दोनों ने जहाँ एक साथ एक-दूसरे का दुख बाँटा, वहाँ कुछ अच्छा समय भी साथ बिताया है। आज हम दोनों एक-दूसरे के पूरक बनकर भी अधूरे रह गए हैं।“

”गाइड अंकल आपको बहुत चाहते हैं एआंटी! एआप भी उन्हें इतना मान देती हैं। जीवन में इतना भी कितने लोगों को मिल जाता है?“ मैंने उन्हें तसल्ली देनी चाही थी।

”जाते-जाते यही दुःख तो मथ रहा है मुन्नी, साइमन को वो सब क्यों न दे सकी जो उस धोखेबाज को दे बैठी? क्या हक था साइमन का जीवन व्यर्थ करने का?“

”ऐसा क्यों सोचती हैं आंटी! आपने उनका साथ दिया है। आपके साथ इस घर में वह कितने खुश रहते थे..........“

”कुछ न पाकर उन्होंने अपना सब कुछ मुझे दिया है एमुन्नी! ट्रेसा के जाने के बाद वह वापस अपने घर लौट सकते थे, किसी और लड़की से शादी कर सकते थे, पर शायद मेरे प्रति टेªेसा के अपराध का वह इसी तरह प्रायश्चित्त करते रहें। वह बहुत महान हैं। जानती है, हमेशा वह मेरा मन पढ़ते रहे हैं। मेरी बीमारी में न जाने कब ईसा के चित्र की जगह, मेरे राम और सीता का चित्र यहाँ लगा दिया। वे जानते थे, सब कुछ बदल जाने पर भी भगवान के प्रति अपनी आस्था मैं नहीं बदल सकी। मेरे अन्तर्मन में हमेशा राम-सीता ही मेरे आराध्य रहे।“

कुछ रूककर फिर उन्होंने कहना शुरू किया था,

”इस जाती बेला ऐसा लग रहा है, पूरी ज़िन्दगी अपने को धोखा ही देती रही। अनजाने-अनचाहे साइमन को बहुत प्यार करती रही, पर मेरे संस्कारी मन ने कभी उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहा, न जुबान ने साथ दिया। आज बार-बार यही लग रहा है, मेरे बाद कैसे जिएँगे वह? कौन है उनका....... काश पारो जैसी एक बेटी उन्हें दे जाती तो छोड़ जाना आसान होता...... उन्हें यॅू अकेला छोड़ते कलेजे में हूक उठ रही है मुन्नी........“

बाई आंटी रो रही थी।

”आप ऐसी बातें मत कीजिए आंटी! आप कहीं नहीं जाएँगी...... कभी नहीं जाएंगी।“ उनके साथ मैं भी रो रही थी।

”अगर तेरी कहानी पढ़ कभी मेरी पारो तेरे पास आए तो उसे बता सकेगी न मुन्नी..... उसका पिता वो धोखेबाज नहीं, वह तो एक चोर है जो मेरी बेटी छीन ले भागा था। उसका पिता साइमन है, जिसने उसकी माँ को प्यार सम्मान और संरक्षण दिया है। बता मुन्नी मेरा ये काम कर सकेगी न?“

मेरा उत्तर पाने के लिए बाई आंटी व्याकुल थी।

नम आँखों के साथ उनके हाथ की पकड़ से मुश्किल से अपना हाथ छुड़ा सकी थी।

”आपका काम ज़रूर पूरा करूँगी आंटी! आपकी कहानी ज़रूर लिखूँगी......ज़रूर लिखॅूगी।“ दृढ़ शब्दों में अपनी बात दोहराती, घर वापस आई थी।

पूरी रात सोते-जागते, शायद सुबह गहरी नींद सो गई थी। बाई आंटी के मन की बात गाइड अंकल को बताने का निश्चय कर, मन हल्का हो आया था। अम्मा के झकझोरने पर चैंक कर उठी थी। उनकी आवाज बेहद घबराई हुई थी, ”उठ मुन्नी, बाई हमें छोड़कर हमेशा के लिए चली गई.....“

”क्या .......आ.....! कैसे अम्मा, कल शाम तो उन्हें ठीक ठाक छोड़कर आई थी!“

”न जाने कब रात में दिल का दौरा पड़ा, डाँक्टर बुलाने की भी मोहलत नहीं दी बाई ने। जिन्दगी-भर सबकी सेवा की, पर जाते समय किसी को आवाज भी नहीं दी। गाइड साहब का बुरा हाल है।“ अम्मा रो रही थी।

पीछे से आती अम्मा की पुकार अनसुनी कर, मैं बाई आंटी के घर की ओर दौड़ चली थी।
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उसका अंदाज़

Postby Rohit Kapoor » 29 Sep 2016 20:58

उसका अंदाज़


‘हलो’—फ़ोन की घंटी सुनते ही नेहल ने फ़ोन कान से लगाया था।
“कहिए, थ्री ईडियट’ फ़िल्म कैसी लगी? फिल्म पुरानी हो गई है, पर आपका उसके प्रति आकर्षण खत्म नहीं हुआ. कितनी बार देख चुकी हैं?”हल्की हंसी के साथ दूसरी ओर से आवाज़ आई थी.
“हलो, आप कौन?” नेहल को आवाज़ अपरिचित लगी थी.
“समझ लीजिए एक ईडियट ही पूछ रहा है।‘फिर वही हंसी।
“देखिए या तो अपना नाम बताइए, वर्ना इस दुनिया मे ईडियट्स की कमी नहीं है, उनमें से आपको पहचान पाना कैसे पॉसिबिल होगा। मैं फ़ोन रखती हूं।“
“नहीं –नहीं ऐसा गज़ब मत कीजिएगा, वैसे मेरे सवाल का जवाब नहीं मिला।“
“तुम्हारे सवाल का जवाब देने को मेरे पास फ़ालतू टाइम नही हैं। ईडियट कहीं का।“ नेहल फ़ोन पटकने ही वाली थी कि उधर से आवाज़ आई।
“सॉरी ग़लती कर रही हैं, जीनियस ईडियट कहिए । देखिए किस आसानी से आपका मोबाइल- नम्बर पता कर लिया।“
“इसमें कौन सी खास बात है, तुम जैसे बेकार लड़कों का और काम ही क्या होता है। दोस्तों पर रोब जमाने के लिए लड़कियों के नाम-पते जान कर उन्हें फ़ोन करके परेशान करते हो, पर एक बात जान लो अगर फिर फ़ोन किया तो पुलिस ऐक्शन लेगी, सारी मस्ती धरी रह जाएगी।“
गुस्से से नेहल ने फ़ोन लगभग पटक सा दिया।
एम ए फ़ाइनल की छात्रा, नेहल सौंदर्य और मेधा दोनों की धनी थी। ऐसा नहीं कि उसे देख लड़कों ने रिमार्क ना कसे हों या उसके घर तक उसका पीछा न किया हो, पर नेहल की गंभीरता का कवच उन्हें आगे बढने से रोक देता। उसे पाने और उसके साथ समय बिताने की आकांक्षा लिए न जाने कितने युवक आहें भरते थे, पर आज तक किसी ने उसे इस तरह का फ़ोन नहीं किया था। मां-बाप की एकलौती लाड़ली बेटी नेहल, अपने मन की बातें बस अपनी प्रिय सहेली पूजा के साथ ही बांटती थी। आज भी तमतमाए चेहरे के साथ जब वह यूनिवर्सिटी पहुंची तो पूजा देखते ही समझ गई आज नेहल का पारा बहुत हाई था। हंसते हुए पूछा-
“क्या बात है, नेहल आज तेरा गुलाबी चेहरा बीर-बहूटी क्यों बन रहा है?”
“मैं उसे ठीक कर दूंगी। अपने को हीरो समझता है। कहता है वो ‘जीनियस ईडियट,’है। सामने आ जाए तो दिमाग ठिकाने न लगा दूं तो मेरा नाम नेहल नहीं।“
“किसकी बात कर रही है, किसे ठीक करेगी?” पूजा कुछ समझी नहीं थी।
“था कोई, नाम बताने के लिए हिम्मत चाहिए। न जाने उसे कैसे पता लग गया, हम थ्री ईडियट्स देखने गए थे। पूछ रहा था फ़िल्म हमे कैसी लगी।“
“बस इतनी सी बात पर इतना गुस्सा? अरे बता देती तुझे फ़िल्म अच्छी लगी। रही बात उसे कैसे पता लगा, तो भई होगा कोई तेरा चाहने वाला। तुझे पिक्चर- हॉल में देखा होगा। इतना गुस्सा तेरी सेहत के लिए अच्छा नही, मेरी सखी। काश कोई मुझे भी फ़ोन करता,पर क्या करें भगवान ने सारी सुंदरता तुझे ही दे डाली।“ पूजा के चेहरे पर शरारत भरी मुस्कराहट थी।
“अच्छी बात है, अगली बार कोई फ़ोन आया तो तेरा नम्बर दे दूंगी। अब क्लास मे चलना है या आज भी कॉफ़ी के लिए क्लास बंक करेगी?”
“मेरी ऐसी किस्मत कहां, तू भला उस नेक काम में साथ देगी, नेहल? फिर उसी बोरिंग लेक्चर को सहन करना होगा। यार, ये हिस्ट्री सब्जेक्ट क्यों लिया हमने। रोज़ गड़े मुर्दे उखाड़ते रहो।“ पूजा के चेहरे के भाव देख नेहल हंस पड़ी।
“तेरा सोच ही ग़लत है, पूजा। अगर रुचि ले तो इस विषय मे न जाने कितना रोमांस और थ्रिल है। चल नहीं तो हम लेट हो जाएंगे।“
बेमन से पूजा नेहल के साथ चल दी।
रात में मोबाइल की घंटी ने नेहल की नींद तोड़ दी। दिल में घबराहट सी हुई कहीं घर से तो कोई फ़ोन नहीं आया है। जब से नेहल पढने के लिए उस शहर में आई थी, उसका मन घर के लिए चिंतित रहता था। शुरू-शुरू मे हॉस्टेल में रहना उसे अच्छा नहीं लगा था, पर पूजा से मित्रता के बाद उसे घर की उतनी याद नहीं आती थी।
“ज़रा अपनी खिड़की का परदा उठा कर देखिए मान जाएंगी क्या नज़ारा है। प्लीज़ इसे मिस मत कीजिए, मेरी रिक्वेस्ट है।“फिर वही परिचित आवाज़।
“दिमाग़ खराब है क्या जो रात के दो बजे बाहर का नज़ारा देखूं? रात में जागना तुम जैसे उल्लू को ही संभव है। लगता है तुम अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आओगे, अब कोई ऐक्शन लेना ही होगा।“
फ़ोन तो नेहल ने बंद कर दिया, पर सोच मे पड़ गई, आखिर वह उसे ऐसा क्या दिखाना चाहता है जिसके लिए आधी रात को उसे जगाया है। बिस्तर से सिर उठाकर जाली वाले झीने परदे से बाहर के नज़ारे को देखने का लोभ, वह संवरण नहीं कर सकी। बाहर पूर्णिमा का चांद अपने पूरे वैभव में साकार था। सारे पेड़-पौधे चांदनी में नहाए खड़े थे। नेहल मुग्ध हो उठी। बिस्तर से उठ खिड्की के पास आ खड़ी हुई। उसके अंतर की कवयित्री जाग उठी। कविता की कुछ पंक्तियां मन मे आई ही थीं कि मोबाइल फिर बज
“मान गईं, क्या तिलिस्मी नज़ारा है। ज़रूर कोई कविता लिख डालेंगी, पर उसका क्रेडिट तो मुझे मिलेगा,न?” फिर वही हंसी।
“अब तक कितनों की नींद खराब कर चुके हो? तुम्हारा नम्बर मेरे मोबाइल पर आ गया है, अब अपनी खैर मनाओ।“
“कमाल करती हैं, मै ने बताया है न मै जीनियस हूं, अगर मुझे पकड़ सकीं तो जो सज़ा देंगी मंज़ूर है। वैसे कल आसमानी सलवार-सूट मे आपका चेहरा देख कर ऐसा लगा, नीले आकाश मे चांद चमक रहा है। बाई दि वे आपका फ़ेवरिट कलर कौन सा है? नही बताएंगी तो भी मै पता कर लूंगा। इतनी देर बर्दाश्त करने के लिए थैंक्स एंड गुड-नाइट्।“
फ़ोन काट दिया गया।
बिस्तर पर लेटी नेहल की आंखों से नींद उड़ गई । उससे ऐसी ग़लती कैसे हो गई, किसी अजनबी के फ़ोन को तुरंत ही काट क्यों नहीं दिया, क्यों उसकी बातें सुनती रही, जवाब देती रही। वह उसके कपड़ों का भी नोटिस लेता है। ज़रूर उसके हॉस्टेल के आसपास रहने वाला कोई आवारा है। कल उसके नम्बर से पता करना होगा। काफ़ी देर बाद ही वह सो सकी। सुबह-सुबह माँ के फ़ोन से नींद टूटी थी।
“क्या हुआ माँ, घर में सब ठीक तो है?” नेहल डर गई थी।
“सब ठीक है, तुझसे एक ज़रूरी बात करनी थी। देख कुछ दिनों में एक इंद्रनील नाम का लड़का तुझसे मिलने आएगा। तू उससे अच्छी तरह से बात करेगी। उसके बारे में जो जानना चाहे पूछ लेना। अपना रोब जमाने की कोशिश मत करना।“
“क्यों माँ, क्या मैं किसी से ठीक से बात नहीं करती? वैसे वो मुझसे मिलने क्यों आ रहा है, कहीं तुम ने फिर मेरी शादी का सपना देखना तो शुरू नहीं कर दिया? मुझे अभी शादी नहीं करनी है।“
“बस नेहल, बहुत हो गया। तूने कहा था, पढाई पूरी करने के बाद शादी करेगी। तेरा एम ए फ़ाइनल दो महीने बाद ख़त्म हो जाएगा। अब अगर तूने मेरी बात नहीं मानी तो मैं तुझसे कभी बात नहीं करूंगी।“
“ठीक है माँ, पर ये इंद्रनील हैं क्या चीज़?
“अरे वो तो हीरा है। ऐसा प्यारा लड़का है कि क्या बताऊं। हमसे ऐसे मिला मानो बरसों से परिचित है। सबको हंसाना ही जानता है। आस्ट्रेलिया की एक बड़ी कम्पनी मे सॉफ़्ट्वेयर इंजीनियर की नौकरी पर जा रहा है। जाने के पहले उसकी मां उसकी शादी कर देना चाहती हैं। जब तू उससे मिलेगी तब मेरी बातों की सच्चाई जान सकेगी,बेटी।“
“इसका मतलब है कि उसकी माँ को डर है कहीं वह आस्ट्रेलियन बहू ना ले आए।“
“फिर तूने अपनी बकवास शुरू कर दी। बस इतना जान ले अगर तूने मेरा कहा नहीं माना तो मै भी तेरी कोई बात नहीं सुनूंगी।“इस बार माँ का स्वर तीखा था।
“ओके माँ, मै तुम्हारे इंद्रनील जी से ज़रूर मिल लूंगी और कोई ग़लती भी नही करूंगी। अब तो खुश? हां इतने लंबे नाम की जगह उसे कोई छोटा नाम नहीं मिला?
“शादी के बाद तू उसे चाहें जिस नाम से पुकार, मुझे कोई लेना-देना नहीं है। अब तेरे कॉलेज का टाइम हो रहा है, बस मेरी बातें याद रखना।“
“भला तुम्हारी बातें कभी भूली हूं माँ, बाबा को प्रणाम कहना।“
फ़ोन रख, नेहल तैयार होने बाथ-रूम में घुस गई। कौन है ये इंद्रनील जिसने माँ को इस तरह मोह लिया है। वैसे नेहल को शादी की कोई जल्दी नहीं है, पर माँ की बातों ने मन में उत्सुकता जगा दी, ज़रा देखें तो कौन हैं ये इंद्रनील। पूजा से बातें करने का निर्णय ले नेहल चल दी। माँ के फ़ोन की वजह से वह पूजा से कैंटीन मे भी नहीं मिल सकी थी। पूजा नेहल का इंतज़ार कर रही थी।
“क्या हुआ, आज कैंटीन में नहीं आई। कहीं तेरे उस नए आशिक का फ़ोन तो नहीं आ गया था?” पूजा के चेहरे पर हंसी थी।
“आया था, रात के दो बजे, चांद का दीदार कराने, पर सच वो दृश्य बड़ा सुंदर था। नही देख पाती तो इतनी सुन्दर चांदनी में नहाई प्रकृति को मिस करती, शायद, जनाब को शायरी करने का शौक है। ऐसा लगता है उसे मेरे बारे में बहुत कुछ मालूम है, यहां तक कि मैं कविता लिखती हूं।
“तब तो वह तेरा सच्चा आशिक है, नेहल।“
“सच्चे आशिक को अपना नाम- पता छिपाने की ज़रूरत नहीं होती, पूजा। वैसे एक बात है वह बातें बड़े अंदाज़ से करता है। पता नहीं कहां से छिपकर मेरे बारे मे सारी बातें पता कर लेता है। यहां तक कि मेरे पहिने हुए कपड़ों के रंग भी याद रखता है।“
“सच कह, नेहल तू उसकी बातें एन्ज्वाय करती है या नहीं।“
“जब उसका फ़ोन आता है तब तो गुस्सा आता है, पर बाद में उसकी बातों पर हंसी आती है। वैसे आज तक कभी उसने कोई अश्लील बात नही कही है, जैसे कि अक्सर सड़क-छाप लड़के कहते हैं।“
“मुझे तो वो कोई सच्चा प्रेमी लगता है, नेहल। सम्हल के रहना।“
“अरे,क्या मुझे पागल समझती है? ये बातें छोड़, आज माँ का फ़ोन आया था, मेरी शादी के लिए मुझसे मिलने कोई आने वाला है। समझ में नहीं आ रहा है क्या करूं? पता नहीं माँ-बाप को बेटियों की शादी की इतनी जल्दी क्यों होती है।“
“वाह यह तो गुड न्यूज़ है। कौन है वह खुश- किस्मत जो हमारी नेहल को ले जाएगा। काश, मेरी शादी यहां आने के पहले ही तय ना हो गई होती।“ पूजा ने आह भरी।
“क्यों क्या नितिन से कोई शिकायत है या किसी और पर दिल आ गया है?”नेहल ने पूजा को छेड़ा


“अरे नहीं, नितिन तो बहुत अच्छा है, बस कभी लगता है, मै प्रेम-विवाह करती। शादी के पहले के रोमांस का मज़ा ही और होता है।“
“प्रेम शादी के बाद कर लेना। हमारे देश मे कितनी लड़कियों को प्रेम-विवाह की अनुमति मिलती है। कोई ना कोई बात लेकर, अक्सर प्रेम का धागा तोड़ ही दिया जाता है। मेरी एक बात मानेगी, पूजा जब वह मुझसे मिलने आएगा, तब तू मेरे साथ रहेगी?”
“ना बाबा, मै क्यों कबIब मे हड्डी बनूं, और हर डिबेट में जीतने वाली नेहल किसी से डरे, असंभव। चल आज इस खुशी मे क्लास छोड़ ही दें, चाट चलेगी?”
“ठीक है, आज इन्द्रनील के नाम पर तेरी ही सही।“
शाम को लौटी नेहल कमरे में पहुंची ही थी कि मोबाइल बजा—
“क्लास बंक करना अच्छी बात नहीं है, ख़ासकर आप जैसी लड़की से तो कतई ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। क्या कोई ख़ास खुशी सेलीब्रेट की जा रही थी?”
“टु हेल विद यू। मै क्या करती हूं, कहां जाती हूं तुमसे मतलब? क्यों मुझे परेशान कर रहे हो, सामने क्यों नहीं आते?” नेहल नाराज़ हो उठी।
“सॉरी। आपको परेशान करना ,मेरा मक़सद नहीं था।“ कहते ही फ़ोन कट गया।
नेहल ने अपने मोबाइल पर आए नम्बरों से उस फ़ोन करने वाले का पता करना चाहा था, पर फ़ोन हर बार किसी नए पीसीओ से किया गया था। उसने ठीक कहा था उसे पकड़ पाना कठिन था। कभी नेहल को फ़िल्मों मे देखे गए कुछ पात्र याद आते जो पागल की तरह किसी लड़की के पीछे पड़, उस लड़की को परेशान कर देते थे। नेहल कभी सोचती कहीं वह भी वैसा ही इंसान तो नहीं, पर उसकी किसी भी बात से पागलपन नहीं झलकता था बल्कि बातों से वह पढा-लिखा व्यक्ति लगता था।
“आपसे कोई मिलने आए हैं। विज़िटर रूम में बैठे हैं।“ हॉस्टेल की दाई ने आकर नेहल को सूचित किया।
“ठीक है, मैं आती हूं।“ नेहल ने सरसरी नज़र अपने कपड़ों पर डाली। अब चेंज करने का सवाल नहीं था, निश्चय ही वह इंद्रनील ही होगा। बालों पर हाथ फेर वह विज़िटर्स-रूम की ओर चल दी।
विज़िटर्स-रूम मे एक सौम्य युवक उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। नेहल के प्रवेश करते ही वह खड़ा हो गया। एक नज़र मे ही नेहल समझ गई, उसके व्यक्तित्व से कोई भी प्रभावित हो जाएगा। स्लेटी सूट के साथ सफ़ेद शर्ट मे उसका व्यक्तित्व और भी निखर आया था। चेहरे की मुस्कान किसी को भी मोहित कर सकती थी।
“प्लीज़, बैठिए। मै नेहल और आप शायद इंद्रनील जी हैं।“ मीठी आवाज़ में नेहल बोली.
“ओह, तो आप मेरे बिग ब्रदर का इंतज़ार कर रही हैं, सॉरी उन्हें किसी ज़रूरी काम की वजह से शहर के बाहर जाना पड़ गया। आप उन्हें एक्स्पेक्ट करेंगी इसलिए उन्होंने आपको अप्रूव करने की ज़िम्मदारी मुझे दे दी है। हां, अपना परिचय देना तो भूल ही गया, मै नीलेश, इंद्रनील जी का छोटा भाई।“
“कमाल है आपके भाई ने अपनी जगह आपको भेजा है, कैसे हैं आपके सो कॉल्ड बिग ब्रदर?” नेहल के शब्दों मे व्यंग्य स्पष्ट था।
“अरे उनके गुणों के लिए तो शब्द कम पड़ जाएंगे। वह बेहद गंभीर, तेजस्वी, मेधावी, स्नेही, योग्य अधिकारी और न जाने क्या- क्या हैं। मुझ पर उन्हें अगाध विश्वास है। उनकी तुलना मे मै तो उनके पांवों की धूल भी नहीं हूं।“
“भले ही वह आपके शब्दों में गुणों की खान हों, पर जिसके साथ जीवन भर का साथ निभाना है, उससे मिलना भी ज़रूरी नहीं समझते। यह कैसा विश्वास है? शायद विवाह मे उनकी ज़्यादा रुचि नहीं है।“ नेहल ने स्पष्ट शब्दों में अपनी राय दे डाली.
“वह जानते हैं, आपकी हर तरह की परीक्षा लेने के बाद ही मै आपको अप्रूव करूंगा। वैसे मै दावे के साथ कह सकता हूं, आप उनके लिए बहुत उपयुक्त जीवन साथी हैं। बिग ब्रदर को भी यही बात समझाई है।“
“रुकिए, क्या कहा , आप मेरी परीक्षा लेंगे। आप मेरी परीक्षा लेने वाले होते कौन हैं?” नेहल का चेहरा तमतमा आया।
“परीक्षा तो हो चुकी, और आप उसमें पूरे अंक पा चुकी हैं।“ फिर वही हंसी।
उस हंसी ने नेहल को किसी और की हंसी और बात करने के तरीके की याद दिला दी। निश्चय ही यह वही था जो फ़ोन कर के उसे परेशान किया करता था। नेहल सोच मे पड़ गई, उस जैसी बुद्धिमान लड़की पहले ही उसे क्यों नहीं पहचान गई। अब शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी।
“तुम- -तुम वही हो ना जो मुझे फ़ोन करते थे? क्या यही सब करने को तुम्हारे धीर- गंभीर भाई ने इजाज़त दी थी। साफ़- साफ़ सुन लो मुझे तुम्हारे भाई या तुम्हारे साथ कोई भी रिश्ता मंज़ूर नहीं है।“ नेहल का चेहरा लाल हो उठा।
“भाई न सही, मेरे बारे में क्या राय है? आपकी कितनी डांट सुनी है। सच कहता हूं, ज़िंदग़ी भर आपका ग़ुलाम बन कर रहूंगा। अच्छी- भली नौकरी है, आपको ज़िंदग़ी की हर खुशी देने का वादा रहेगा।“
“अपने आदरणीय बिग ब्रदर को क्या जवाब दोगे? तुम पर उन्हें अगाध विश्वास है। उनका विश्वास तोड़ना क्या ठीक होगा। नहीं मिस्टर नीलेश, आप अपने भाई का दिल नहीं तोड़ सकते। सच कहूं तो मुझे उनसे हमदर्दी हो गई है। जो इंसान अपने भाई पर इतना विश्वास रखता है, वह अपनी पत्नी के तो सात खून भी माफ़ कर देगा। मुझे इंद्रनील जी के साथ अपना रिश्ता मंज़ूर है।
“शुक्रिया, आपने मेरी आंखें खोल दीं। मैं. सचमुच अपराध करने जा रहा था। अब
मेरा मक़सद पूरा हो गया। बिग ब्रदर तक आपकी स्वीकृति पहुंच जाएगी।“ फिर उसकी मीठी हंसी सुन नेहल जैसे चिढ गई।
“थैंक्स। मै इंद्रनील जी की प्रतीक्षा करूंगी और उनसे कहिएगा मै उनसे मिलने को उत्सुक हूं। नमस्ते।“ हाथ जोड़ नेहल ने अभिवादन किया।
नीलेश को और बात करने का अवसर न दे, नेहल तेजी से कमरे के बाहर चली गई। मुस्कराते चेहरे के साथ नेहल पूजा के कमरे मे जा पहुंची।
“हाय, नेहल कैसी रही तेरी मुलाकात? लगता है, बात जम गई।“पूजा ने उत्सुकता से पूछा।
“मुलाकात की छोड़, आज उस फ़ोन करने वाले का रहस्य खुल गया।“
“सच, कौन है वह्। उसे पुलिस के हवाले क्यों न कर दिया?”
“अरे वह तो मेरे लिए माँ द्वारा चुना गया उम्मीदवार इंद्रनील था। उसकी बातों से समझ गई थी, अपने भाई का नाम ले कर मेरी परीक्षा ले रहे थे, जनाब। मैने भी अच्छा जवाब दिया है। देखें अब उस दूसरे इंद्रनील को कहां से लाते हैं।
“वाह तेरी तो प्रेम-कहानी बन गई, नेहल। वैसे कैसा लगा अपना मजनूं?”
“मुझे तो यही खुशी है उसे करारा जवाब मिला है। वैसे देखने में ख़ासा हीरो दिखता है। बातें भी अच्छी कर लेता है, पर अब मज़ा आएगा, मुझे बनाने चले थे और खुद बन गए।“ नेहल के चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान थी।
“मुझे तो यकीन है उसने तेरा दिल चुरा लिया।“ पूजा हंस रही थी।
“जी नहीं, मेरा दिल यूं आसानी से चोरी नहीं हो सकता। चलती हूं, शायद माँ का फ़ोन आए।“ नेहा अपने कमरे मे जाने को उठ गई।
किताब खोलने पर नेहल का मन नहीं लग रहा था। नीलेश का चेहरा आंखों के सामने आ रहा था। उसका क्या रिऐक्शन होगा। कहीं वह निराश तो नहीं हो गया। शायद वो हर दिन की तरह फ़ोन करे और कहे- ‘आज आपने मायूस कर दिया। इतना बुरा तो नहीं हूं मै।‘ देर रात तक कोई फ़ोन न आने से नेहल ही निराश हो गई।
कल रविवार है, देर तक सोने के निर्णय के साथ न जाने कब सोई थी कि मोबाइल की बेल सुनाई पड़ी। ज़रूर उसी का फ़ोन होगा, पर दूसरी ओर से एक गंभीर पुरुष-स्वर सुनाई दिया।
“हलो, नेहल जी। मै इंद्रनील जयपुर से बोल रहा हूं। माफ़ कीजिएगा मै आपसे मिलने ख़ुद नहीं पहुंच सका, बहुत ज़रूरी काम था, टाला नहीं जा सकता था। आपके बारे मे नीलेश ने इतनी विस्तृत जानकारी दी है, मानो मैं स्वयं आपसे मिला हूं। नीलेश ने आपका संदेश दिया है, जल्दी ही आपसे मिलने पहुंचूंगा। मेरे बारे मे नीलेश ने बताया ही होगा। और कुछ जानना चाहें तो बेहिचक पूछ सकती हैं।“
“जी नहीं। आपके भाई ने आपकी बहुत प्रशंसा की है। एक बात पूछना चाहती हूं, आप अपने भाई पर इतना विश्वास रखते हैं कि अपनी जगह उसे भेज दिया, पर क्या आप जानते हैं कि आपकी जगह वो खुद मेरे साथ अपनी शादी के लिए उत्सुक थे?”
“अरे आप उसकी बातों को सीरियसली ना लें, मज़ाक करना उसका स्वभाव है। हां, आपने मेरे साथ अपनी शादी की सहमति दी है, उसके लिए आभारी हूं। जल्द ही हम ज़रूर मिलेंगे। नीलेश ने जयपुर से आपके मनपसंद रंग की साड़ी लाने को कहा है, वो ला रहा हूं। यहां से और कुछ चाहिए तो बताइए।“
“थैंक्स, पर मुझे कुछ नहीं चाहिए, बाय।“
फ़ोन बंद करते-करते नेहल का मन रोने-रोने का हो आया। यह क्या हो गया। फ़ोन जयपुर से ही आया था। कौन है यह इंद्रनील, उससे बिना मिले ,बिना बात किए उसके साथ शादी के लिए स्वीकृति दे बैठी। तभी माँ का फ़ोन आ गया-
“आज मेरी चिंता दूर हो गई, बेटी। इंद्रनील जैसा दामाद और तेरे लिए वर, भाग्य से ही मिलता है। उसने तुझसे होली के बाद मिलने की इजाज़त मांगी है। तेरी परीक्षा के पहले वाली प्रिपरेशन लीव मे ही पहुंचेगा।“
“माँ, मुझसे ग़लती हो गई, मैं इन्द्रनील से शादी नहीं कर सकती।“
“पागल मत बन। तूने खुद सहमति दी है, किसी ने ज़बर्दस्ती तो नहीं की है।“
“तुम नहीं समझोगी माँ। मैं किसी और से- ---“
“मुझे कुछ समझना भी नहीं है। बहुत मनमानी कर ली। हम तेरे दुश्मन तो नहीं हैं ,नेहल। इंद्रनील हर तरह से तेरे लिए उपयुक्त है। अब हमे परेशान मत कर,बेटी।
बचपना छोड़, किसी को वचन दे कर वचन तोडना अक्षम्य अपराध है। मेरा यकीन कर इंद्रनील के साथ तू बहुत सुखी रहेगी।“
नेहल की समझ मे नहीं आ रहा था, वह क्या करे? यह तो अपने पांव खुद कुल्हाड़ी मारने वाली बात हो गई। पूजा भी परेशान थी, पर उसका एक ही सुझाव था, फ़ोन पर इंद्रनील को सच्चाई बता दे। जयपुर से इंद्रनील वापस जा चुका था, अब तो उसके आने का इंतज़ार करना था।
प्रिपरेशन वीक की छुट्टियां शुरू हो गईं। नेहल का मन बेचैन था .इन्द्रनील उससे मिलने कभी भी आ सकता है, क्या वह उससे कह सकेगी की वह उससे नहीं उसके छोटे भाई से विवाह करना चाहती है.छुट्टी के तीन दिन बाद सुबह-सुबह कलावती दाई ने आकर कहा
“कोई नील बाबू आपसे मिलने आए हैं। उनका पहला नाम याद नहीं रहा।“
धड़कते दिल के साथ नेहल इंद्रनील से मिलने की हिम्मत जुटा पहुंची थी।
सामने खड़े व्यक्ति को देख वह चौंक गई। अपनी उसी मोहक हंसी के साथ नीलेश खड़ा था। नेहल समझ नहीं सकी वह क्या कहे,पर खुद नीलेश आगे बढ आया-
“कैसी हैं? चाहता तो था होली पर आकर आपको रंगता, पर आ नहीं सका .अब तो बस कहना चाहूंगा ज़िंदगी की सारी खुशियां आपके जीवन में रंग भरती रहें.”
“इन्द्रनील जी की जगह क्या आज फिर उनकी ओर से कोई नया संदेश लाए हैं?”
“नहीं, उन्होंने अपनी जगह हमेशा-हमेशा के लिए मुझे दे दी, आखिर बिग ब्रदर को इतना तो करना ही चाहिए। वैसे भी वो जान गए थे कि आप मुझे चाहती हैं। आपका पीछा करने के लिए पूरे दस दिन होम किए हैं, नेहल जी । सच कहिए, क्या मेरा फ़ोन करना आपको खराब लगता था? मुझे तो लगता है, आपको मेरे फ़ोन का इंतज़ार रहता था।“
“यह तुम्हारा भ्रम है, वैसे भी किसी के विकल्प-रूप में तुम्हें क्यों स्वीकार करूंगी? मै ने तो इंद्रनील से मिलने आने का अनुरोध किया था उनके विकल्प का नहीं—“
“अगर ऐसा है तो मिस नेहल, मैं किसी का विकल्प नहीं, स्वयं इंद्रनील हूं , अपने माता-पिता का बड़ा बेटा। अब कहिए ,क्या इरादा है? सॉरी, मैं चाह कर भी आपके पास किसी दूसरे इंद्रनील को नही ला सकता। अब तो यही नील चलेगा, नेहल।“
“तुम इतने बड़े चीट हो, इंद्रनील? तुमसे तो शादी करने में भी खतरा है.”
“फिर वही ग़लती कर रही हैं। मैं धोखेबाज़ नहीं, जीनियस ईडियट हूं और मैने कहा था मुझे आप पकड़ नहीं सकेंगी।“
“पर मैंने तो तुम्हें पकड़ ही लिया। तुम्हें पहले दिन ही पहचान लिया था, मुझे फोन करने वाले तुम ही थे.”।
“पर यह तो नहीं समझ सकी थीं कि मै ही इन्द्रनील था, वरना माँ से उस इंद्रनील से शादी न करने को क्यों कह रही थीं। धोखा खा गई थीं न? माँ को मुझे ही सच्चाई समझानी पड़ी थी, वर्ना तुमने तो उन्हें भी डरा दिया था।“
“मानती हूँ, इस जगह तो मैं धोखा खा ही गई, पर इसे मेरी हार मत समझना। तुमने मेरी माँ को अपने मोह- जाल में बांध लिया वर्ना—“
“तुम किसी बेचारे इन्द्रनील का ही इंतज़ार करती रहतीं। अब तुम्हारी इस ग़लती के बदले तुम्हें सजा देने का अधिकार तो मुझे मिलना ही चाहिए.”इन्द्रनील शरारत से मुस्कुराया.
“क्या सज़ा दोगे, नील. इतने दिनों तक फोन करके परेशान करते रहे, सज़ा तो तुम्हे मिलनी चाहिए”´नेहल ने मान भरे स्वर में कहा.
“अच्छा जी जैसे मै जानता नहीं था, मोहतरमा को फोन का कितना इंतज़ार रहता था.”
“यह तुम्हारा भ्रम है, अगर पकड़ पाती तो तुम्हारे हाथों में हथकड़ी ज़रूर पहिनवाती” नेहल के चहरे पर परिहास की हंसी खिल आई.
“तो अब सज़ा दे दो, पर लोहे की हथकड़ी की जगह तुम्हारे प्यार का बंधन मंजूर है।”
बात ख़त्म करते इंद्रनील ने नेहल के माथे पर स्नेह चुम्बन अंकित कर दिया. नेहल के गुलाबी चेहरे पर सिंदूरी आभा बिखर गई.
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पात्र


पिछले तीन महीनों से दोनों के बीच अनबोला चल रहा था- ऐसा नहीं कि इसके पहले दोनों की बोलचाल बंद न हुई हो, पर इतने लंबे समय के लिए बातचीत कभी बंद नहीं हुई थी.एक और बात, पहले के झगड़ों के बाद पति कभी इतना अजनबी नहीं लगा था. इस बार तो जैसे वह उससे डरने लगी थी. हमेशा की तरह न वो चिल्लाया, न दहाड़ा, बस एकदम गुम हो गया. उसके मन में क्या चल रहा है, यह जानने के लिए जैसे कहीं कोई सूराख भी नहीं बच रहा था.
शादी के बाद जबसे उसे अपने दोनों के बीच किसी ‘तीसरी’ का पता लगा था, दोनों के बीच झगड़े शुरू हो गए थे. परिवार वाले इस सच्चाई से पहले से ही परिचित थे, शायद इसीलिए कुंतल को कभी वह जगह नहीं मिल सकी, जो घर की बहू की होती है. पति की उपेक्षिता को कौन सम्मान दे?अपने लिए की गई ज्यादती कुंतल सह भी जाती, पर बच्चों का तिरस्कार सह पाना कठिन हो जाता.पति ने उसे क्या दुत्कारा कि बच्चे भी पराए हो गए.दूसरी बहुओं के बच्चों का लाड-प्यार किया जाता और उसके बच्चे हर चीज़ को तरस कर रह जाते.
जब कभी भी उसने पति और ससुरालवालों के अन्याय के खिलाफ मुंह खोला, अंत हमेशा कलह-क्लेश के बाद अनबोले में हुआ.बार-बार की हार के बावजूद कुंतल को अक्ल नहीं आती. मौके-बेमौके वह वही बातें दोहरा जाती,जिन्हें सुनते ही पति का खून खौळ उठाता.उसकी तकलीफों को उसने शायद कभी महसूस ही नहीं किया, हमेशा लताड़ ही दिया-
“बढ़ा-चढ़ा के कहने की तुम्हारी पुरानी आदत है, इन बातों में ज़रा सी भी सच्चाई नहीं है.”
पति की वही बात उसे सिर से पैर तक तिलमिला जाती.क्या ये बात झूठी कि दूध पिलाने वाली कुतिया के आगे भी इंसान रोटी का टुकड़ा डाल देता है, पर उसे तो गिन-गिन कर रोटी दी जाती. भूख से कुलामुलाती आँतों के साथ बच्चे के लिए दूध क्या ख़ाक उतरता?बच्चे की दवा-दारू पर पैसे खर्च करना भी सास को अखरता.पति की उपेक्षिता उसकी स्थिति घर की नौकरानी से भी बदतर थी.
कभी जब पति खुश होता, उसका लाड-दुलार करता, उन क्षणों में वह चाहती, वो हमेशा ऐसा ही रहे.कभी तो प्यार से अपनी गलती मानकर, उसे दिलासा दे दे-
“इन बातों को भुला दे कुन्नी, तू तो मेरी रानी है.”
सच उसकी इतनी सी बात सुनने को उसके कान तरस गए, पर उसने कब अपनी गलती मानी?प्यार से कुन्नी पुकारी जाने वाली कुंतल अपने आप में सुलगती रही. वो दूसरी औरत ही पति के लिए सब कुछ थी. परिवार वाले भी उससे दबते और सच्चाई जान कर भी अनजान बने रहते. कुंतल ने सास से मदद मांगी तो उसकी शिकायत पति से कर दी गई. घर में पति की दहाड़ पर बच्चे डर कर कमरे में बंद हो जाते.उनको रोते देख कुंतल का दिल भर आता, क्या इसी दिन के लिए उसने बच्चे जाने थे?क्या-क्या सपने देखे थे उसने और उसे क्या मिला?
छोटी ही उम्र कहानियों के दुखद अंत उसे रुला देते. अम्मा उसके रोने से नाराज़ हो जातीं-
“देख, कुन्नी से कहानियां-उपन्यास पढने वाली कुंतल का भावुक मन और भी ज़्यादा संवेदनशील बन गया था. अम्मा उसके रोने से नाराज़ हो जातिन्न-
“देख कुन्नी, अगर सिर्फ रोने के लिए कहानियां पढती है तो आज से तेरा घर में किताबें लाना बंद. ज़िंदगी में इतना कुछ करने को है और एक तू है कि कहानियों में डूब अपने को भी भुला बैठती है.”
अम्मा की वो बातें कुन्नी को कितनी खराब लगती थीं. क्लास में उसका मन बढाने वाली उसकी सहेली गिरिजा ही थी. उसका लिखा पढ़ वह मुग्ध रह जाती.
“ई कुन्नी तू इतना अच्छा कैसे लिख पाती है? देख लेना ,एक दिन तू बड़ी नामी कहानीकार बनेगी.”
अम्मा के लाख मना करने के बावजूद कुंतल का पढ़ना बंद नहीं हुआ.कहानी के पात्रों के साथ जैसे उसका रिश्ता बन जाता.किशोरी कुन्नी के मन में अपने सपनों के राजकुमार की अस्पष्ट सी आकृति उभरने लगती. इंटर पास करते ही अम्मा को उसकी शादी की धुन सवार हो गई.जल्दी ही उसका रिश्ता ताऊ हो गया, आखिर कुन्नी में कमी ही क्या थी?
आंसू भारी आँखों के साथ अपना घर निहार, कुन्नी साजन के घर आ गई.पूरे रास्ते साथ बैठे व्यक्ति को कुंतल में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी.कुंतल का शरीर रोने से काँप-काँप जाता, पर एक बार भी उसकी पीठ पर हाथ धर प्यार से उसने तसल्ली नहीं दी. कुंतल का मन जैसे कहीं आहात हो गया था.
पहली रात की उसने ना जानेकितनी कल्पनाएँ कर रखी थी, ढेरों सपने देखे थे , पर उसकी छोटी ननद ने जो कहा उसे दहशत में डाल गया.
“हमारे भैया खराब नहीं हैं, पर वो औरत उन्हें अपने इशारों पर नचाती है. आज भी वो उन्हें अपने साथ ले गई है.”
कुन्नी संज्ञाशून्य सी बैठी रह गई.कहानियों में पढ़े जैसे सारे दयनीय पात्र उसमे जी उठे. अपने दोनों के बीच किसी तीसरी को कुन्नी बर्दाश्त नहीं कर सकती.
बहुत रात गए पति जब आए तो वह पत्थर बनी बैठी थी. उसे किसी के प्यार की जूठन स्वीकार नहीं.
“सॉरी , देर हो गई, असल में यार दोस्त छोड़ ही नहीं रहे थे.”सहज ढंग से उसने सफाई दी.
कुंतल मौन रह गई. पति ने जब प्यार दिखा कर उसका हाथ अपने होंठों से लगाना चाहा तो बरबस उसके मुंह से निकल गया-
“”तुम्हारे हाथ जूठे हैं, धो लो पहले.”
“क्या?’पति पूरी तरह से चौंक गया.”
“कुछ नहीं” वह सोच में पड़ गई थी.
पहली रात उसके मुंह से ये क्या निकल गया. उसे धैर्य रखना होगा. कहानियों की दुखी नायिका की तरह अपने प्यार से पति का मन जीतना होगा.
“सच कहो, क्यों कहा था तुमने वैसा?’
“ऐसे ही कुछ सोच रही थी.”
पति ने उसे अपनी ओर खींच लिया,. पति को अपना प्राप्य भले ही मिल गया, पर वह तो रीती ही रह गई.
घर में उसकी पीठ पीछे जो बातें होती थीं, कुंतल उनका अर्थ ना समझ पाए ऎसी मूर्ख नहीं थी.सबकी उपेक्षा सह वह जी रही थी.मन में जिद आ गई थी,पीटीआई को जीतने की, उसे पूरे का पूरा पा लेने की.
ससुराल में कोई ऐसा नहीं था, जिसके साथ अपना दुःख बाँट वह हलकी हो जाती.चुपके-चुपके वह अपना दुःख कागज़ पर उतारने लगी.कोरे कागजों से उसका रिश्ता बंध गया. अपने मन की बात खाली कागजों पर उतार वह हलकी हो जाती.अपने लिखने की बात उसने गिरिजा को लिख भेजी.जवाब में खूब लंम्बी सी चिट्ठी लख गिरिजा ने उसका मन बढाया था.
“अपना लिखा कहीं छपने को क्यों नहीं भेजती, कुन्नी?”
जब कुन्नी की एक कहानी किसी पत्रिका में छपी तो कुन्नी उत्साहित हो उठी. उसका लिखा छ्प भी सकता है, ये तो वह सोच भी नहीं पाई थी. अब तो उसे जब भी ज़रा सा वक्त मिलता,वह कुछ ना कुछ लिख डालती. उसकी कहानियां छपने लगीं. ताज्जुब तब हुआ जब उसकी कहानियों के लिए पाठकों के पत्र आने लगे.
एक ख़ास बात ये थी कि उसकी कहानियों और उनके के पात्रों के साथ पाठकों का सहज आत्मसाती- करण हो जाता. उसकी कहानियों में पाठक अपने को पा लेते.एक बार एक पाठक ने लिखा-
“आपकी कहानियों में इतना गहरा दुःख क्यों रहता है, मन अन्दर तक भीग जाता है.क्या आप सुखान्त कहानियां नहीं लिख सकतीं?’
कुंतल ने कोशिश की, पर सुखान्त कहानियां उसे बचकानी या कुछ हद तक फिल्मी लगीं.सप्रयास कहानी लिखना तो कहानी को खत्म कर देना है, वह अपने मन का ही लिखती रही.
दिल्ली से उसके एक पाठक ने लिखा था-
“आप अपने पात्रों के साथ बेहद सहानुभूति रखती हैं,. ताज्जुब होता है , जब खलनायक को भी आप सहानुभूति दिला जाती है, उसे तो पाठकों की घृणा मिलनी चाहिए ना?”
ऐसे पत्रों के साथ उसने अपनी कहानियों को गौर से पढ़ना शुरू किया तो उसे लगा उससे ज़्यादा तो उसके उस्पाथक कहानियों के पात्रों को पहिचानते हैं.कभी उसकी अपनी ही कहानियों की ऎसी समीक्षाएं मिलतीं कि वह विस्मित रह जाती, ऐसा सोचकर तो उसने नहीं लिखा था, पर उन पात्रों के बारे में पाठकों ने जो सोचावो एकदम सही ठहरता था.
बड़े होतेबच्चे उसके लेखन पर गर्व का अनुभव करते. गिरिजा तो उसकी हर कहानी पर्ल्न्बा सा खत भेज, उसका उत्साह बढाती.एक दिन तो पति ने भी उसके लिखे को पढ़ , तारीफ़ कर दी थी. उस दिन वह कितनी उमग आई थी.एक बात सच थी, उसने ज़िंदगी जैसे भी जी, पर अपने मन पर कभी काबू न पासकी.बहुत कोशिशों के बाव्जूद्क्प धो-पोंछ अपने से अलग न कर सकी.हमेशा कचोट बनी रही, अपना सब कुछ दे कर भी, वह अपना प्राप्य ना पा सकी.
शादी के बाद की अपनी उपेक्षा वह कभी ना भुला सकी. गिरिजा समझा कर लिखती, औरत की ज़िंदगी मेंमें इस तरह की बातें आम बातें हैं. उस दूसरी औरत को भुला दे, पर कुन्नी को शिकायत थी, अगर पति के जीवन में कोई और न होती तो क्या पति और ससुराल वाले उसका यूं तिरस्कार करते? अपना अपमान,उपेक्षा हमेशा उसके दिल में ताज़े घाव सी टीसती रही. ऐसा भी नहीं कि उसके लेखन ने उसकी प्रतिष्ठा ससुरालवालों के समक्ष बढ़ा दी थी. उस घर में पत्र-पत्रिकाएँ पढने का न किसी के पास समय था ना चाव. इतना ज़रूर था अब वह पाठकों द्वारा पहिचानी जाने लगी थी. उसकी हर कहानी पर प्रतिक्रियाएं आना ज़रूरी होगया था. एक ख़ास बात ये थी कि जिस समय वह कहानी लिखती , अपने आप में नहीं रहती. कभी कुछ सोच कर लिखना शुरू करती और अंत तक पहुंचाते-पहुँचते कहानी का अंत कुछ और बन जाता. जिस पात्र को नायक के रूपम मेंशुरू करती, अंत में उसकी जगह कोई और नायक बन जाता.वह खुद विस्मित रह जाती. उस जगह उसे कहानी के सन्दर्भ में पढ़ा वह कथन सच लगता कि लेखक का कहानी के पात्रों पर कोई वश नहीं चलता, पर वह क्या वैसी लेखिका बन सकती थी?
उस दिन जब पता लगा ऑफिस के काम से दौरे पर पर जाने का बहाना कर, पति फिर उसके साथ उदयपुर गया थातो वह अपने पर वश न रख सकी, जो जी में आया कहती गई.
पति की सहानुभूति पाने की जगह, उसे उसकी ताड़ना मिली थी.साफ़ शब्दों में उसने लताड़ दिया था-
“मेरे पास तुम्हारी बेकार की बातों के लिए टाइम नहीं है. तुम्हें जो करना है कर लो. मै जैसे रहता हूँ वैसे ही रहूंगा, जो जी चाहे करूंगा. ये मेरा घर है तुम्हारे बाप का नहीं जो तुम हुक्म चलाओगी.
धार-धार रोटी कुन्नी निरीह हो उठी.अपने मन का दुःख वह किसे सुनाए, उसके सिवा कौन है उसका, और वो भी अपना नहीं.
ओंठ सिकोड़ पति ने ताना दिया था वह तो बड़ी भारी कहानीकार है, पूरी दुनिया को अपनी दुःख-गाथा सूना सकती है, बस उसकी जान बख्श दे. उसके पास उसका रोना सुनाने के लिए वक्त नहीं है.
पति के व्यंग्य सने वाक्य ने कुंतल को उत्तेजित कर दिया.उसी रात उसने एक लंबी कहानी लिख डाली.कहानी पूरी कर छपने भी भेज दी.उस समय उसने और कुछ नहीं सोचा.कहानी अक्षरश:सच ही तो नहीं होती, उसमें कल्पना और अतिशयोक्ति भी आ सकती है. कहानी छप भी गई, पर कहानी लिखने और छपने के बीच दो वर्षों का लंबा अंतराल था. तब तक उसे यह भी याद नहीं रहा , उसकी कहानी में ऐसे बहुत से सच्चे तथ्य और घटनाएं हैं, जिनसे उसे और उसके पति को आसानी से पहिचाना जा सकता है.
प्रकाशित कहानी की प्रति हमेशा की तरहुसके घर भेजी गई थी.दो सप्ताह बाहर छुट्टियां बिता कर लौटते ही पत्रिका मिली थी. पूरी कहानी पढ़, पति सामान्य नहीं रह सका.पूरी दुनिया के सामने उसने पति को जिस रूप में प्रस्तुत किया, वो अक्षम्य था. पति परमेश्वर होता है,पर उसकी कहानी ने तो भ्रम तोड़ डाला. उसका दंभ झूठा था, वह बेहद आहत था.
पति का कहना था, उसने जानते-बूझते सुनियोजित तरीके से पति के चरित्र की ह्त्या की है. अब वह कभी सामान्य जीवन नहीं जी सकता.रिश्तेदारों के सामने ही नहीं, मित्र-बांधवों के सामने भी वह सर ऊंचा करके नहीं चल सकता. अब उसे जैसे जीना है, जी ले, पति से उसका कोई वास्ता नहीं.
पति की बातों में सच्चाई थी, सब कुछ जानते हुए भी पिछले दस वर्षों से उसने पति का सम्मान अक्षुण्ण रक्खा था. आपस में लड़-झगड़ कर भी उसने किसी से पति की शिकायत नहीं की. सबके सामने उसने हमेशा उसे पति और बच्चों के पिता का पूरा सम्मान दिया.क उसकी कमजोरियों के बावजूद उसे सच्चे दिल से प्यार किया. शायद अन्दर-अन्दर वह उसकी इस बात के लिए उसका आभार भी मानता रहा हो, पर इस कहानी के माध्यम से अनजाने ही पट-रूप में उसने एक ऐसा पात्र गढ़ दिया था, जिससे किसी की भी सहानुभूति असंभव थी.

वह फटी-फटी आँखों से ताकती रह गई, अपने पात्रों के प्रति बेहद संवेदनशील कही जाने वाली कुंतल ने अपने सबसे प्रिय पात्र की इस निर्ममता से ह्त्या कैसे कर डाली? शायद सच यही था. कहानी लिखते समय वह उसका पति नहीं एक पात्र बस एक पात्र बन गया था. अपने उस पात्र को वह वश में नहीं रख सकी, पर उसका वो सच क्या पति स्वीकार कर सकेगा?

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