रिसर्च प्रपोज़ल

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Kamini
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रिसर्च प्रपोज़ल

Post by Kamini » 07 Jul 2017 15:41

रिसर्च प्रपोज़ल


आनन्द कुमार

छुट्टी की घंटी बजने में थोड़ी ही देर थी। बच्चे जोश में अपने अपने बस्ते सम्भाल रहे थे। क्या बच्चे, क्या टीचर, सभी के मन में स्कूल के बाद की मस्ती या कामों की तैयारियाँ चल रही थीं । तभी खड़-खड़ की आवाज़ें आनी शुरू हुईं। टीचर ने क्रोध में अपने काम से आँखें उठाईं और अवाक रह गईं। मेज़ें, कुर्सियाँ, और खिड़कियों के पल्ले, सभी हिल रहे थे। इन आवाज़ों से अन्जान, बच्चे बेफ़िक्र बस्ते बाँध रहे थे या आपस में बातें कर रहे थे। टीचर को अचानक विचार कौंधा – अरे, यह तो भूकम्प है। तुरन्त चिन्ता हुई कि बच्चों को सुरक्षित मैदान में कैसे पहुँचाया जाये। अगर बता दिया तो भगदड़ मच जायेगी, नहीं बताया तो बच्चे अपनी मस्ती में मन्थर गति से नीचे उतरेंगे। इस देरी में बिल्डिंग का कोई हिस्सा बच्चों पर गिर गया तो? स्कूल की सभी टीचरों के मन में ऐसे खयाल आ रहे थे। बच्चों से कहा गया कि शान्ति से कतार बना कर नीचे उतरना है। बच्चे परेशान कि यह कौन सी नयी एक्टिविटी टीचर को सूझ गयी है।
यह नज़ारा, महानगर, लखनऊ में गोल मार्केट से थोड़ी दूरी पर स्थित वीरेन्द्र स्वरूप पब्लिक स्कूल का था। यह CBSE पद्धति वाला एक इंग्लिश मीडियम को-एड स्कूल है। स्कूल में बड़ा खेल का मैदान है, अपनी बसें हैं, और मध्यम वर्गीय बच्चे यहाँ पढ़ने आते हैं। सामने ब्लू बेल्स स्कूल, बगल में दयानन्द कन्या विद्यालय और सौ कदम पर मौन्टफ़ोर्ट कॉलेज (जो पहले महानगर बाॉए्ज़ के नाम से जाना जाता था)।
मालती अपने चौके में सब्ज़ी भून रही थीं कि एकाएक उन्हें लगा कि कड़ाही हिल रही है। साथ ही साथ अपने पैरों के नीचे कुछ गुदगुदी सी, कुछ अनजानी सी सिहरन महसूस हुई। बगल में देखा तो खूँटी पर टँगी करछुल, छन्नी, वगैरह पेण्डुलम की तरह से हिल रहे थे। वो अचम्भित खड़ी सोचती रहीं, कि क्या हो रहा है – ‘कोई प्रेत बाधा है, या उन्हें चक्कर आ रहे हैं’? जब यह सब कुछ नहीं रुका तो एकाएक मालती को कौंधा कि ‘यह तो भूडोल है’। तब तक पड़ोस से आवाज़ें आईं – ‘भूचाल आया, बाहर भागो’।
हड़बड़ा कर मालती बाहर भागीं। मैक्सी थोड़ी गन्दी, बाल उलझे, पर मालती को इस सब की कोई चिन्ता नहीं थी। बस बाहर निकलते निकलते कुर्सी पर पड़ा दुपट्टा खींचा और ओढ़ लिया। ताला लगाने की सुध किसे ? हाँफती और हदसी हुई जब सड़क पर पहुँचीं, तब वहाँ पर पहले से ही मजमा लगा हुआ था। सभी के चेहरे सहमे हुए, आँखें फैली हुईं, और हँफनी चल रही थी। छोटे बच्चों को गोद में लिए, उनका सिर अपने कंधे पर दबाए, कुछ औरतें। बुज़ुर्ग औरतें, जो अपने घुटनों के दर्द कि वजह से चल नहीं पाती थीं, अपने को घसीटते हुए सड़क पर लाईं। नादान बच्चे, जो कि ज़बरदस्ती बाहर खींचे जा रहे थे, चिल्ला रहे थे – ‘क्या हुआ? हमको बाहर नहीं जाना। हमको क्यों ले जा रहे हैं’?
सड़क के दोनों तरफ़, सी टाइप प्लाट पर बने हुए घर। कुछ एक मंज़िले, कुछ दो मंज़िले। ज़्यादातर लोग या तो रिटायर हो चुके, या रिटायर होने वाले, कुछ अधेड़ उम्र के। कई किरायेदार नौजवान, और छोटे बच्चों के साथ। इन ही घरों में से एक में गर्ल्स होस्टल, जिसमें प्रतियोगिताओं की तैयारी करती लड़कियाँ रहती थीं।अलीगंज, लखनऊ में रोज़ गार्डेन के नज़दीक इस मुहल्ले के लोग एक दूसरे को बरसों से जानते थे, पर एक दूसरे से मिलते कम थे।
गर्ल्स होस्टल में से लड़कियाँ सरपट भागती हुई सड़क पर पहुँचीं। तेज़ कदमों से, पर एक दूसरे से बातें करती हुई, दिखावटी हँसी हँसती हुई। यह पहला मौका था, जब यह सब मुहल्ले वालों से रूबरू हो रहीं थीं। नहीं तो सिर्फ़ आती और जाती दिखती थीं। किस्मत ने भी क्या मौका चुना था इन्हें मुहल्ले वालों के साथ लाने का। कोई पायजामे में, तो कोई स्कर्ट में। किसी की टी-शर्ट गहरी कटी हुई, तो कोई बिना बाँह की। सभी के कपड़े सिलवटों वाले, कुछ मैले, कुछ बेतरतीब। अपना अलग गोल बना कर एक दूसरे से बातें कर रही थीं।
सड़क पर चर्चा शुरू हुई:
‘इतना तेज़ और लम्बा भूचाल आज तक तो हमने लखनऊ में ना देखा ना सुना’।
‘हाँ, हमारी पैंसठ साल की उमर हो गई, पर ऐसा तो पहले कुछ भी महसूस नहीं किया’।
‘और कितना लम्बा चला। भगवान की कृपा है कि अपने मुहल्ले में किसी का घर गिरा या टूटा हुआ नहीं लगता’।
कुछ ही क्षणों में लोगों ने अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मोबाइल पर बातें करनी शुरू कर दीं।
‘हमारे यहाँ तो बहुत ज़ोर का भूकम्प आया था। पूरा मुहल्ला बिल्कुल नाव के जैसे हिलने लगा था। वो तो कहिये कि हम लोगों के घर यहाँ पर बहुत मज़बूत बने हैं। नहीं तो कितना नुक्सान होता, कितनी जानें जातीं’।
‘क्या कहा, आपके यहाँ भी ज़ोर का भूकम्प आया था? आपके यहाँ की भी सारी बिल्डिंगें नींव से हिल गईं? पर आपके यहाँ इतने ज़ोर का नहीं आया होगा। यहाँ तो हम लोगों के पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। वो तो कहिये कि भगवान की बड़ी दया है कि कुछ नुक्सान नज़र नहीं आ रहा है’।
शर्मा जी बोल पड़े – ‘अरे ज़रा देखिये, टीवी पर क्या खबर है’?
‘हाँ हाँ, देखिये टीवी पर क्या है। कुछ पता तो चले’।
सब एक दूसरे का मुँह देखते रहे। जाए कौन? होस्टल की लड़कियों ने अपने स्मार्ट फ़ोन पर ABP News का एप्प चलाया और बताया कि भूकम्प का केन्द्र नेपाल में था, और पूरे उत्तर भारत में इसके झटके महसूस किए गए। अभी और झटकों की आशंका है।
यह बातचीत चल ही रही थी कि तभी सबके पैरों के नीचे ज़मीन, फिर हिलती हुई सी लगी। सबने एक दूसरे को देखा और पूछा – ‘आपको झटके महसूस हुए कि नहीं’?
एकाएक मालती बोल पड़ीं – ‘झटके तो थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। हे भगवान, यह सब कभी रुकेगा भी कि नहीं’?
शोर मचाते बच्चे भी शान्त हो गए थे, और पूछ रहे थे कि यह क्या है? यह क्यों हो रहा है? जिन लोगों ने घर में जाने की बात सोची थी, उनकी हिम्मत छूट गई। सभी बाहर खड़े एक दूसरे से, या फ़ोन पर बात कर रहे थे। फ़ोन पर बात तो कम हो रही थी, कोशिश ज़्यादा हो रही थी, क्योंकि ज़्यादातर लोगों के फ़ोन लग नहीं पा रहे थे।
किसी ने बताया कि सवा बजे फिर से तेज़ झटके आने वाले हैं। पहले झटके पौने बारह के करीब आए थे। आधे घंटे से सब बाहर धूप में खड़े थे। अब एक घंटा और खड़ा रहना था। अप्रैल का आखिरी हफ़्ता, सूर्य भगवान अपनी गर्मी का खूब अहसास करवा रहे थे। बूढ़े लोगों के बैठने के लिए घरों से प्लास्टिक की कुर्सियाँ मंगवा ली गईं थीं। कुछ नौजवानों ने घरों में जाकर कुछ देर के लिए टीवी भी देख लिया था। भूकम्प के भय ने अनायास ही मुहल्ले की सड़क को पिकनिक स्थल बना दिया था। कोई मौसम नहीं, कोई प्रसंग नहीं, कोई तैयारी नहीं, लेकिन बच्चे-बूढ़े सब टाइम पास के लिए सड़क पर कुछ ना कुछ कर रहे थे – कुछ छोटे समूहों मे, कुछ बड़े समूहों में। तेज़ धूप में पेड़ों की छाया ही कुछ राहत दे रही थी। गप्पें चल रहीं थीं। लड़कियाँ अपने स्मार्ट फ़ोन पर ख़बरें देखकर सबको बता रही थीं। कुछ स्कूली बच्चे घर आने लगे थे। चर्चा के नये विषय मिल गए थे।
जब अभिषेक, पड़ोसी का बेटा घर आ गया, और सनीश, मालती का बेटा नहीं आया, तो मालती को चिन्ता हुई। अभिषेक और सनीश दोनों ही वीरेन्द्र स्वरूप पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे, पर अभिषेक सनीश से छोटा था। कुछ और समय बीता, और सनीश जब फिर भी नहीं लौटा तो सबकी परेशानी बढ़ गई। घबरायी हुई मालती ने सबसे पहले सनीश के पापा सुरेन्द्र को फ़ोन किया।
सुरेन्द्र उस समय जवाहर भवन के आँगन में खड़े तीसरे भूकम्प का इंतज़ार कर रहे थे। आँगन खचाखच लोगों से भरा था, और भरता ही जा रहा था। जिस समय भूकम्प आया था, उस समय जवाहर भवन के बारहों तलों के सरकारी दफ़्तरों में भगदड़ सी मच गयी थी। लोग हड़बड़ा कर उठे और भागे। काम जैसा था, वैसा ही छोड़ दिया। अगर गोपनीय फ़ाइल खुली थी, तो वो वैसी ही खुली पड़ी रही – अशक्त और अनाथ। कम लोगों को अपने कम्प्यूटर शट डाउन करने की सुध रही। मसाला खाकर गलियारों में गप मारने और टाइम-पास करने वालों में एक अद्भुत फुर्ती थी। एक विभाग में, छोटी अलमारी पर बेतरतीबी से रक्खी हुई खाली गिलासों की ट्रे झटके नहीं झेल पायी. और तेज़ आवाज़ के साथ नीचे गिरी। पहले से हदसे कर्मचारी अब तो काँपने लगे। हर तल पर, हर विभाग में शोर मच गया – भूकम्प आया, नीचे भागो। क्या अफ़सर, क्या कर्मचारी, सभी हुजूम में लिफ़्ट की तरफ तेज़ी से बढ़ रहे थे। कुछ लोग दौड़ने की कोशिश कर रहे थे, और नाकाम होकर झल्ला रहे थे – ‘अरे भाई, जाने दीजिये, आप को नहीं जल्दी है, तो ठीक है, पर औरों को तो जाने दीजिये’।
जवाहर भवन की लिफ़्टें अनुकूल समय में भी यात्रियों की धीरज की परीक्षा लेती हैं, फिर अब तो सारी दुनिया ही नीचे जा रही थी। बेचैनी बढ़नी शुरू ही हुई थी, कि यह पुकार तेज़ी से फैली: सीढ़ी से नीचे जाइये, लिफ़्ट से जाना खतरनाक है। सब ने सीढ़ियों की राह पकड़ी। जवाहर भवन की सीढ़ियों के दर्शन तो कई कर्मचारियों ने कभी किये ही नहीं थे। अगर हुजूम ना होता तो कइयों को सीढ़ियां ढूँढे से नहीं मिलतीं।
सीढ़ियों की दीवारें पान और मसाले की पीक से ज़रूर रंगी हुई थीं, पर सीढ़ियां बहुत गंदी नहीं थीं। पीक ज़्यादातर कोनों में ही थी और रेलिंग पर सिर्फ़ धूल ही जमी थी। कई लोग शुरू में तो बड़ी तेज़ी से उतरे, पर कुछ दूर बाद उनकी जांघें भर आईं और सारी तेज़ी ख़त्म हो गई। नियति आराम पसन्द लोगों का साथ नहीं दे रही थी। जिनकी बिल्कुल भी चलने की आदत नहीं थी, वह तो तकरीबन शुरु से ही, धीमे धीमे रेलिंग पकड़ कर उतर रहे थे। सभी के मन में दहशत थी और नीचे खुले में पहुँचने की हड़बड़ी भी, पर क्या करें इस समय ना तो मातहत का सहारा था, ना ही लिफ़्ट का। अपनी सुरक्षा का सारा भार अपने ही अकर्मण्य और आरामपसन्द शरीर पर था। और निकम्मा शरीर, दिमाग के हुकुम के खिलाफ़, विद्रोह में दर्द कर रहा था।
मालती बहुत समय तक तो सुरेन्द्र के मोबाइल से सम्पर्क ही नहीं साध पाईं। ‘इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं’ सुन सुन कर कान पक गये। एक तरफ़ तो बढ़ती हुई बेचैनी, और दूसरी तरफ़ बात ना हो पाना।
सुरेन्द्र को जैसे ही सनीश की सूचना मिली, उन्होंने मित्रों से और आस-पास खड़े लोगों से पूछना शुरु किया कि महानगर के किसी स्कूल की बिल्डिंग टूटने या गिरने की सूचना तो नहीं मिली है? तब तक लखनऊ में कहीं पर भी जान-माल के नुक्सान की ख़बर नहीं थी। बाराबंकी ज़िले में और दूसरे प्रदेशों में थी, पर लखनऊ में नहीं। यह सब जानकर सुरेन्द्र को ढाढ़स बंधा, पर फिर दूसरी चिंता बढ़ गयी। अगर भूकम्प में सनीश को कुछ नहीं हुआ, तो दूसरी कौन सी दुर्घटना हुई? उन्होंने मालती को फ़ोन कर यह सारी बातें बता दीं।
इधर मालती की चिंता और बेचैनी, जो पहले से ही काफ़ी थी, और भी बढ़ गयी। अनिष्ट सोचते हुए कई भयावह खयाल भी आने लगे। एक तरफ यह तनाव और दूसरी तरफ तमतमाती धूप में खड़े रहना। मालती को लगा कि एक बहुत भारी बोझ उन्हें दबा रहा है। सहारा लें तो किससे लें। सिर हाथ में पकड़ कर, पास खड़ी एक स्कूटर पर धसक कर बैठ गयीं। सनीश के वापस घर ना आने की चिंता अब सबको होने लगी थी।
मालती ने भगवान को याद किया और मदद की प्रार्थना की। फिर सिर से हाथ हटाया, आँखें खोलीं, और उठ कर खड़ी हुईं। सुरेन्द्र से जो बात हुई थी, वह लोगों को बतायी, और कहा कि लगता है कि सनीश का कहीं एक्सीडेंट हो गया है। यह सुनते ही सबका दिल बैठ गया। थोड़ी देर चर्चा के बाद यह तय हुआ कि लोग टोलियाँ बनाकर अलग-अलग दिशा मे ढूँढने निकलेंगे। मालती का, उनकी इच्छा के विपरीत, घर पर रहना तय हुआ ताकी वह अलग अलग टोलियों के साथ और सुरेन्द्र के साथ जानकारी लेने-देने के लिये एक केन्द्र का काम कर सकें।
पूरे मुहल्ले में एक सनसनी सी फैल गयी थी। जो सम्बन्ध थोड़े ढीले भी थे, वह भी हरकत में आ गये। शर्मा परिवार से सुरेन्द्र और मालती की तीन महीना पहले काफ़ी कहा सुनी हो गयी थी। ओर तब से उनमें आपस में बोलचाल क्या, दुआ सलाम भी नहीं थी। इस चर्चा में शर्मा दम्पति पहले तो अलग रहे। सोचा कि ऐसे फ़ालतू लोगों को भगवान ने अच्छा सबक सिखाया। मगर थोड़ी देर बाद वह अपने आप को रोक ना सके और खोज में शामिल हो गये।
यह तय हुआ कि सभी टोलियाँ अलग-अलग रास्तों से स्कूल पहुँचेंगी। एक टोली कपूरथला और मन्दिर मार्ग होती हुई, दूसरी डंडहिया और महानगर होती हुई, तीसरी IT Crossing और निशातगंज होती हुई, और चौथी डंडहिया, ख़ुरर्म नगर, और पीएसी मुख्यालय होती हुई चल पड़ी। तब तक सुरेन्द्र भी जवाहर भवन से अपने एक मित्र के साथ स्कूल की तरफ चल पड़े थे।
सभी टोलियाँ जब निकल गयीं, तब मालती को ध्यान आया कि उन्होंने अपनी बेटी संगीता की ना तो खोज खबर ली, और ना ही उसे सनीश के बारे में बताया। संगीता, मालती सुरेन्द्र की बड़ी बेटी थी, और सनीश छोटा। सीधी, शरीफ़, बड़ों का आदर करने वाली, और पढ़ने में तेज़ – माता पिता को उस पर गर्व था। हाईस्कूल और इन्टर दोनों ही परीक्षाओं में उसे नब्बे प्रतिशत से अधिक नम्बर मिले थे। इस समय लखनऊ विश्वविद्यालय से एमएससी (Geology – भूगर्भ शास्त्र) कर रही थी। इस विभाग से कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक निकले थे, और इसका देश में काफ़ी नाम था। भूकम्प के समय संगीता एक प्रयोगशाला में काम कर रही थी। भूकम्प का एहसास होते ही सभी लोग एहतियातन बिल्डिंग से बाहर निकल आये। यह दो मंज़िली इमारत सौ साल से ज़्यादा पुरानी थी, और मज़बूत थी। फिर भी इतनी पुरानी इमारत पर भरोसा करना थोड़ा खतरनाक था। भूकम्प के झटके समाप्त होते ही, विभाग के सभी वैज्ञानिक और भावी वैज्ञानिक अपनी अपनी प्रयोगशालाओं में लौट गये। फ़िज़ा में एक उत्तेजक जिज्ञासा थी – भूकम्प कितना तीव्र था, उसका केन्द्र कहाँ था, इत्यादि। कई वर्षों से भूगर्भ वैज्ञानिको में एक विराट् हिमालयी भूकम्प की चर्चा गरम थी। क्या यह वही था? भूकम्प के स्वभाव, गुण, तीव्रता इत्यादि वगैरह को जानने के लिये सब लालायित थे। ऐसा तेज़ और लम्बा भूकम्प किसी कि याद में लखनऊ में महसूस नहीं किया गया था। अब यह उनके सामने घटा था, और प्रयोगशालायें निकट थीं। कोई इस मौके को चूकना नहीं चाहता था।
भूकम्प प्रयोगशाला के बाहर भीड़ लगी थी। कई भूकम्प सम्बन्धी आँकड़े बताये जा चुके थे, और कुछ का इंतज़ार था। वैज्ञानिकों और छात्रों के इस मिले जुले समूह में ज़ोर शोर से चर्चा हो रही थी। प्रश्न पूछे जा रहे थे, और जवाब दिये जा रहे थे, या अटकलें लगायी जा रहीं थीं। प्रश्न पूछने वाला, जवाब देने वाला, या अटकल लगाने वाला कोई भी हो सकता था – छात्र या शिक्षक। जनतांत्रिक माहौल में चर्चा आगे बढ़ रही थी। तब तक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं से भूकम्प के आँकड़े आने शुरू हो गये थे।
चर्चा और भी रोचक होती जा रही थी। समूह में सदस्य भी बढ़ रहे थे। धीमे धीमे अपने आप ही लोग अपनी रुचि के अनुसार छोटे छोटे समूहों में बँटते जा रहे थे। यह सभी छोटे समूह एक दूसरे से थोड़ी दूरी पर गलियारे में खड़े चर्चा कर रहे थे। तभी दोबारा झटके महसूस किये गये। स्वतः सभी इमारत से बाहर निकलने के लिये मुड़े, पर मुड़ते ही ठिठक कर रुक गये। दिमागों ने भय के ऊपर विजय हासिल की। याद आया कि पहले के बाद के झटके हमेशा कमज़ोर होते हैं। अगर इमारत पहले झटके झेल गई, तो बाद के झटके तो झेल ही लेगी।
अब आँकड़ों, उनके मतलब, और उनके निकट और दूरगामी परिणामों के बारे में एक नई जिज्ञासा पैदा हुई। चर्चाओं में फिर एक नया जोश आया। तभी भूकम्प प्रयोगशाला से संगीता के प्रोफेसर बड़ी प्रसन्न मुद्रा में बाहर निकले। आँखों में चमक, बाँछें खिली हुईं, और चाल में फुर्ती – उनकी निगाहें अपने कुछ दोस्तों को ढूँढ रही थीं।
दोस्तों से मिलते ही बोले – चलो अब तो हमारा रिसर्च प्रपोज़ल यकीनन स्वीकृत हो जायेगा। यह भूकम्प के झटके निर्णायक मण्डल को हमारे प्रपोज़ल की महत्ता और सामयिकता के बारे में आश्वस्त कर देंगे। यह झटके तो बड़े समय से आये, नहीं तो हम सालों एड़ियाँ रगड़ते रहते और निर्णायक मण्डल अपनी उहापोह में फंसा रहता।
इसी बीच संगीता का फोन बज उठा, और उठाने पर दूसरी तरफ़ से मालती की परेशान, उलझन भरी आवाज़ सुनाई पड़ी। उन्होंने संगीता की खोज-ख़बर ली।
संगीता ने चहक कर बताया कि वह बिल्कुल ठीक है, और बोली – ‘मम्मी, हम लोग यहाँ पर बहुत खुश हैं। इस भूकम्प की वजह से हमारी प्रयोगशाला का रिसर्च प्रपोज़ल अब निश्चित ही स्वीकृत हो जायेगा। तब हम लोग भूकम्पों पर बहुत रोचक काम कर सकेंगे।’
मालती – ‘यह तो बहुत अच्छी बात है। भगवान यह काम जल्दी पूरा कराये, और तुम लोगों को तरक्की दे। यहाँ पर हम लोग थोड़े चिन्तित हो गये हैं। स्कूल बन्द हुये दो घंटे हो रहे हैं, और सनीश अभी तक लौटा नहीं है। और सारे बच्चे घर आ गये हैं।’
संगीता – ‘ओह मम्मी! हम तो आपको बताना ही भूल गये। सनीश अपनी टीम के साथ गोमती किनारे लक्ष्मण मेला मैदान में क्रिकेट मैच खेलने गया है। दोपहर में तीन बजे तक लौटेगा। आप लोग परेशान मत होइयेगा, उसके कई पुराने दोस्त हैं उसके साथ। हमको बता गया था, पर यूनीवर्सिटी आने की हड़बड़ी में आपको बताना ही भूल गये।…। मम्मी, हम लोगों का यह रिसर्च प्रपोज़ल जब पास हो जायेगा तो कितना मज़ा आयेगा, ना।’




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