काले चिराग -हिन्दी उपन्यास/इब्ने सफ़ी

Jemsbond
Super member
Posts: 4277
Joined: 18 Dec 2014 12:09

काले चिराग -हिन्दी उपन्यास/इब्ने सफ़ी

Post by Jemsbond » 07 Dec 2017 16:53

काले चिराग

दोस्तो इब्ने सफ़ी का एक उपन्यास काले चिराग पोस्ट कर रहा हूँ ये उपन्यास चार भागों में है



बारिश के शोर से कान फटे जा रहे थे. अंधेरे मे ये शोर ऐसा लग रहा था जैसे ये दुनिया की अंतिम रात हो......और अब कभी सूरज ना दिखाई देगा. ये सिलसिला चार बजे शाम से शुरू हुआ था और अब दस बज रहे थे. लेकिन इस बीच एक बार भी बारिश का तार नहीं टूटा था.

मिसेज़ जॅफर्री एक हल्की सी शॉल मे लिपटी हुई ईज़ी चेयर मे बैठी थीं. उनके चेहरे पर गहरी चिंता के भाव थे. ड्रॉयिंग रूम मे उनके अलावा चार व्यक्ति और भी थे.....जो डिन्नर के बाद से अब तक यहीं बैठे हुए थे. इस बीच कॉफी के काई दौर चल चुके थे.

जॅफर्री परिवार की बुज़ुर्ग अब मिसेज़ जॅफर्री ही थीं. हालाँकि वो जमील, शकील, ग़ज़ाला और रूही की सौतेली माँ थीं. लेकिन उनके रख-रखाव से सौतेलापन प्रकट नहीं होता था. चारों भाई बहन बच्चे ही थे जब वो इस घर मे आई थीं.....और दो साल के बाद खुद भी विधवा हो हो गयी थीं. वो उनकी जवानी ही का समय था. लेकिन उन बच्चों केलिए उन्हों ने खुद पर बुढ़ापा ओढ़ लिया.....और ये सच्चाई थी कि वो उनके लिए मर मिटी थीं.

अभी पिच्छले ही दिनों उन्होने बड़े बेटे जमील की शादी की थी. जब बहू घर आई तो उन्होने सारी व्यवस्था उसके हवाले कर दिया था. लेकिन जमील ने उसे स्वीकार नही किया......वो सब उनकी बुजुर्गि और गार्डीयनशिप हर मामले मे बनाए रखना चाहते थे. मिसेज़ जॅफर्री अक्सर सोचती कि क्या उनके अपने बच्चे भी इसी तरह उनसे प्यार करते.....जिस तरह ये चारों करते हैं? वो घंटों इस विषय पर सोचतीं.....लेकिन अंत मे उन्हें मानना पड़ता कि उनके अपने बच्चे नालायक़ भी साबित हो सकते थे. क्योंकि उनके सामने ऐसे कयि उदाहरण होते.

लेकिन आजकल वो काफ़ी दुखी थीं. क्योंकि उनके स्वर्ग मे एक बुरी-आत्मा घुस आई थी......और उसने उनका सुकून छीन लिया था. वैसे भी वो जमील की पत्नी की आँखों मे आँसू नहीं देख सकती थीं. उसके बाद ये बात भी उनके लिए बड़ी कष्ट-दायक थी कि जमील आज भी घर वालों के साथ डाइनिंग टेबल पर उपस्थित नहीं था. वो जमील की पत्नी का मुरझाया हुआ चेहरा देखतीं और दिल ही दिल मे कुढती रहतीं.

वो जमील जो कभी उनके सामने उँची आवाज़ मे बोलने की हिम्मत नहीं कर सकता था....आज ही उनकी हर बात का बराबरी से जवाब देता चला गया था. उसने कहा था कि वो अपनी मर्ज़ी का मालिक है......जो चाहे.....करेगा. मिसेज़ जॅफर्री हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं.

मिसेज़ जॅफर्री सन्नाटे मे आ गयी थीं. लेकिन फिर इस तरह खामोश हो गयी थी जैसे उनसे वास्तव मे कोई बड़ी ग़लती हो गयी हो. उस समय वो शकील को भी ऐसी नज़रों से देख रही थीं जैसे कल वो भी इसी तरह उनका दिल तोड़ देगा.

शकील जमील से छोटा था.....लेकिन उमरों मे दो साल से अधिक का अंतर नहीं था.

मिसेज़ जॅफर्री ने एक लंबी साँस ली और खिड़की से बाहर देखने लगीं. शकील, ग़ज़ाला, रूही और जमील की पत्नी रज़िया धीरे धीरे बातें कर रहे थे. बारिश के कारण शायद उनकी आवाज़ें मिसेज़ जॅफर्री तक नहीं पहुच रही थीं. उन्होने अचानक उनकी तरफ मूड कर कहा...."क्या आज तुम सब को नींद नहीं आ रही?"

"नहीं अम्मी," शकील बोला. "जब तक जमील भाई आपके पैरों पर नाक नहीं रगडेंगे मुझे नींद नहीं आएगी."

"मूर्खों जैसी बातें मत करो.....जाओ....सो जाओ."

"मुझे नींद नहीं आएगी अम्मी.....मेरा दिल चाहता है कि जमील भाई का गला घोंट दूं."

"क्या बकवास है." मिसेज़ जॅफर्री क्रोध भरे स्वर मे बोलीं...."ऐसी बेहूदगि मुझे पसंद नहीं है.....अगर तुमने उसके खिलाफ एक शब्द भी कहा तो मैं तुम से भी नाराज़ हो जाउन्गि. उसका क्या कसूर है? वो तो शायद होश मे ही नहीं है."

"आप उन्हें मुझ से अधिक नहीं जानती अम्मी."

"हां ठीक कहा.....तुम्ही ने तो उसको पाल पॉश कर इतना बड़ा किया है....तुम्ही क्यों नहीं जानोगे."

"आप मेरा मतलब नहीं समझी."

"मैं कुच्छ नहीं समझना चाहती.....जाओ सो जाओ."

तभी एक नौकर ने वहाँ प्रवेश किया......और शकील से बोला...."एक साहब आपको पुच्छ रहे हैं."

"इस समय?" मिसेज़ जॅफर्री ने हैरत से कहा. "कॉन है?"

"पता नहीं कॉन साहब हैं." नौकर ने कहा. "बे-मतलब बहस करते हैं.....कहने लगे मुशतरी मंज़िल यही है ना......यहाँ शकील साहब रहते हैं ना?......मैने कहा जी हां रहते हैं.....लेकिन ये जॅफर्री मंज़िल है.....कहने लगे नहीं मुशतरी मंज़िल है.....इस बात पर उन्होने झगड़ा शुरू कर दिया.....बोलने लगे तुम मुझ से अधिक विद्वान हो क्या? मैं एम ए, बी ए ना जाने क्या क्या हूँ."

"ओहू...." शकील उच्छल कर खड़ा हो गया....उसका चेहरा देखने लगा.....फिर उसने दरवाज़े की तरफ छलान्ग लगाई.....और मिसेज़ जॅफर्री के सवाल का उत्तर दिए बिना राह-दारी मे दौड़ता चला गया.

"क्या मुसीबत है...." मिसेज़ जॅफर्री बडबडाइ..."एक तरफ से सभी के दिमाग़ उलट'ते चले जा रहे हैं......अल्लाह रहेम करे..." फिर वो नौकर की तरफ देख कर बोलीं..."कॉन आया है?"

"पता नहीं बेगम साहिबा.....उन्होने अपना नाम बताया था.....लेकिन फिर एमए, बीए और ना जाने क्या क्या कहने लगे.....मैं नाम ही भूल गया.....बिना मतलब मुझसे लड़ने लगे थे कि नहीं ये मुशतरी मंज़िल है."

"जाओ." मिसेज़ जॅफर्री हाथ उठा कर बोलीं और नौकर चला गया.

रज़िया, रूही और ग़ज़ाला मे फिर फुसफुसाहट होने लगी थी. मिसेज़ जॅफर्री के चेहरे पर नज़र आने वाली तनाव पहले से अधिक बढ़ गया था.

"लड़कियो! आख़िर कब तक जागती रहोगी?"

"अभी नींद नहीं आएगी अम्मी....इस शोर मे.." ग़ज़ाला ने कहा. कुच्छ देर खामोशी रही....मिसेज़ जॅफर्री ने कहा "ये इतनी रात गये इस तूफान मे कौन आया है?.....मैं सच कहती हूँ ये दोनों लड़के मुझे पागल बना देंगे."

"अम्मी....आप बेकार परेशान हो रही हैं...." रूही बोली...."वो भैया के कोई दोस्त होंगे....उनके अधिकतर दोस्त ऐसे ही ऊट-पटांग किस्म के हैं."

"मेरे खुदा......ये जमील कितना अच्छा लड़का था." मिसेज़ जॅफर्री दुखी स्वर मे बोलीं...."किताबों का कीड़ा.....दुनिया की बुराई से उसे कोई उसे कोई मतलब नहीं था....अचानक उस चुड़ैल औरत ने ना जाने किस प्रकार उसका दिमाग़ उलट दिया."

"अम्मी.....वो औरत शैतानी शक्तियों की मालिक लगती है......आप उस से आँख मिला कर बात नहीं कर सकतीं...."

"मैं उसकी सूरत भी नहीं देखना चाहती." मिसेज़ जॅफर्री ने बुरा सा मुँह बना कर कहा.

"मैने इतनी सुंदर औरत आज तक नहीं देखी." ग़ज़ाला ने कहा.

"क्या सुंदरता है उसमे?" जमील की पत्नी रज़िया ने बुरा सा मूह बना कर कहा. "किसी लाश की तरह सफेद दिखती है."

"खुदा उसे लाश ही मे बदल डाले." ग़ज़ाला ने कहा.....जो शायद ये सोच कर गडबडा गयी थी कि कहीं उसके इस रिमार्क्स रज़िया को दुख ना पहुचाया हो.

तभी शकील ने कमरे मे प्रवेश किया. उसका चेहरा लाल पड़ रहा था......और हँसी फूटी पड़ रही थी.

"अम्मी.....वो मेरा दोस्त है.......बहुत दूर से आया है...उसे पहले हमें सूचना देनी चाहिए थी. हम उसे स्टेशन लेने जाते." उसने कहा.

"ओह्हो....तुम्हें दोस्तों से इतना प्रेम कब से हो गया? तुम्हारा तो ये हाल था कि जहाँ किसी दोस्त के आने की खबर सुनी इस तरह होंठ सिकोड लिए जैसे वो सारी ज़िंदगी तुम्हारे साथ रहने केलिए आया हो."

"ये दोस्त उन सब से अलग है अम्मी....ये उन लोगों की तरह बोर नहीं करता.....बल्कि खुद ही दूसरों की दिलचस्पी का सामान बन जाता है. कहिए तो मैं उसे यहाँ लाउ?"

"वो थका हुआ आ रहा है......नहीं अब हम सुबह उस से मिलेंगे.....उसका खाना उसके कमरे मे जाएगा...."

"खाना....?" शकील मुस्कुरा कर बोला. "वो कहता है मैने पिच्छले हफ्ते से खाना नहीं खाया......और ना आइन्दा खाने का इरादा है."

(......जारी.)

Kaale Chiraag


Baarish ke shor se kaan phate jaa rahe the. Andhere me ye shor aisa lag raha tha jaise ye duniya ki antim raat ho......aur ab kabhi suraj na dikhayi dega. Ye silsila chaar baje shaam se shuru hua tha aur ab das baj rahe the. Lekin is bich ek baar bhi baarish ka taar nahin toota tha.

Mrs Jaffery ek halki si shawl me lipti huyi easy chair me baithi thin. Unke chehre par gahri chinta ke bhaaw the. Drawing room me unke alawa chaar vyakti aur bhi the.....jo dinner ke baad se ab tak yahin baithe huye the. Is bich coffee ke kayi daur chal chuke the.

Jaffery pariwar ki buzurg ab Mrs Jaffery hi thin. Halaaki wo Jamil, Shakil, Gajaalaa aur Ruhi ki sauteli maa thin. Lekin unke rakh-rakhaao se sautelapan prakat nahin hota tha. Charon bhai bahan bachche hi the jab wo is ghar me aayi thin.....aur do saal ke baad khud bhi vidhwa ho ho gayi thin. Woh unki jawaani hi ka samay tha. Lekin un bachchon keliye unhon ne khud par budhaapa odh liya.....aur ye sacchayi thi ki wo unke liye mar miti thin.

Abhi pichhle hi dinon unhone bade bete Jamil ki shadi ki thi. Jab bahu ghar aayi to unhone saari vyawastha uske hawaale kar diya tha. Lekin Jamil ne usay sweekar nahi kiya......wo sab unki buzurgi aur guardianship har maamle me banaaye rakhna chaahte the. Mrs Jaffery aksar sochti ki kya unke apne bachche bhi isi tarah unse pyar karte.....jis tarah ye charon karte hain? Wo ghanton is vishay par sochtin.....lekin ant me unhen maanna padta ki unke apne bachche nalayaq bhi saabit ho sakte the. Kyonki unke saamne aise kayi udaaharan hote.

Lekin aajkal wo kaafi dukhi thin. Kyonki unke swarg me ek buri-aatma ghus aayi thi......aur usne unka sukoon chheen liya tha. Waise bhi wo Jamil ki patni ki aankhon me aansu nahin dekh sakti thin. Uske baad ye baat bhi unke liye badi kasht-dayak thi ki Jamil aaj bhi ghar waalon ke sath dining table par upasthit nahin tha. Wo Jamil ki patni ka murjhaya hua chehra dekhtin aur dil hi dil me kudhti rahtin.

Wo Jamil jo kabhi unke saamne unchi awaaz me bolne ki himmat nahin kar sakta tha....aaj hi unki har baat ka barabari se jawab deta chala gaya tha. Usne kaha tha ki wo apni marzi ka maalik hai......jo chaahe.....karega. Mrs Jaffery hastakshep nahin kar saktin.

Mrs Jaffery sannaate me aa gayi thin. Lekin phir iss tarah khamosh ho gayi thin jaise unse vastav me koi badi galti ho gayi ho. Uss samay wo Shakil ko bhi aisi nazron se dekh rahi thin jaise kal wo bhi isi tarah unka dil tod dega.

Shakil Jamil se chhota tha.....lekin umron me do saal se adhik ka antar nahin tha.

Mrs Jaffery ne ek lambi saans li aur khidki se baahar dekhne lagin. Shakil, Gajaalaa, Ruhi aur Jamil ki patni Razia dhire dhire baaten kar rahe the. Baarish ke kaaran shayad unki awaazen Mrs Jaffery tak nahin pahuch rahi thin. Unhone achanak unki taraf mud kar kaha...."Kya aaj tum sab ko nind nahin aa rahi?"

"Nahin ammi," Shakil bola. "Jab tak Jamil bhai aapke pairon par naak nahin ragdenge mujhe nind nahin aayegi."

"Murkhon jaisi baaten mat karo.....jaao....so jaao."

"Mujhe nind nahin aayegi ammi.....mera dil chaahta hai ki Jamil bhai ka gala ghont dun."

"Kya bakwas hai." Mrs Jaffery krodh bhare swar me bolin...."Aisi behoodagi mujhe pasand nahin hai.....agar tumne uske khilaf ek shabd bhi kaha to main tum se bhi naraaz ho jaaungi. Uska kya kasoor hai? Wo to shayad hosh me hi nahin hai."

"Aap unhen mujh se adhik nahin jaanti ammi."

"Haan thik kaha.....tumhi ne to usko paal pos kar itna bada kiya hai....tumhi kyon nahin jaanoge."

"Aap mera matlab nahin samjhin."

"Main kuchh nahin samajhna chaahti.....jaao so jaao."

Tabhi ek naukar wahaan prawesh kiya......aur Shakil se bola...."Ek sahab aapko puchh rahe hain."

"Iss samay?" Mrs Jaffery ne hairat se kaha. "Kon hai?"

"Pata nahin kon sahab hain." Naukar ne kaha. "Be-matlab bahas karte hain.....kahne lage Mushtari Manzil yahi hai na......yahan Shakil sahab rahte hain naa?......maine kaha jee haan rahte hain.....lekin ye Jaffery Manzil hai.....kahne lage nahin Mushtari Manzil hai.....is baat par unhone jhagda shuru kar diya.....bolne lage tum mujh se adhik vidwaan ho kya? Main M A, B A na jaane kya kya hun."

"Ohhoo...." Shakil uchhal kar khada ho gaya....uska chehra dekhne laga.....phir usne darwaaze ki taraf chhalaang lagaayi.....aur Mrs Jaffery ke sawaal ka uttar diye bina raah-daari me daudta chala gaya.

"Kya musibat hai...." Mrs Jaffery barbadaayin..."Ek taraf se sabhi ke dimaag ulat'te chale jaa rahe hain......Allah rahem kare..." Phir wo naukar ki taraf dekh kar bolin..."Kon aaya hai?"

"Pata nahin begam sahiba.....unhone apna naam bataya tha.....lekin phir MA, BA aur na jaane kya kya kahne lage.....main naam hi bhool gaya.....bina matlab mujhse ladne lage the ki nahin ye Mushtari Manzil hai."

"Jaao." Mrs Jaffery hath utha kar bolin aur naukar chala gaya.

Razia, Ruhi aur Gajaalaa me phir phusphusaahat hone lagi thi. Mrs Jaffery ke chehre par nazar aane waali tanaao pahle se adhik badh gaya tha.

"Ladkiyo! aakhir kab tak jaagti rahogi?"

"Abhi nind nahin aayegi ammi....iss shor me.." Gajaalaa ne kaha. Kuchh der khamoshi rahi....Mrs Jaffery ne kaha "Ye itni raat gaye is toofan me kaun aaya hai?.....main sach kahti hun ye donon ladke mujhe pagal bana denge."

"Ammi....aap bekar pareshan ho rahi hain...." Ruhi boli...."Wo bhaiya ke koi dost honge....unke adhiktar dost aise hi oot-pataang kism ke hain."

"Mere khuda......ye Jamil kitna achha ladka tha." Mrs Jaffery dukhi swar me bolin...."Kitaabon ka keeda.....duniya ki buraayi se usay koi usay koi matlab nahin tha....achanak uss chudail aurat ne na jaane kis prakar uska dimag ulat diya."

"Ammi.....wo aurat shaitani shaktiyon ki maalik lagti hai......aap us se aankh mila kar baat nahin kar saktin...."

"Main uski soorat bhi nahin dekhna chaahti." Mrs Jaffery ne bura sa muhh bana kar kaha.

"Maine itni sundar aurat aaj tak nahin dekhi." Gajaalaa ne kaha.

"Kya sundarta hai usme?" Jamil ki patni Razia ne bura sa muh bana kar kaha. "Kisi laash ki tarah safed dikhti hai."

"Khuda usay lash hi me badal daale." Gajaalaa ne kaha.....jo shayad ye soch kar garbada gayi thi ki kahin uske is remarks Razia ko dukh na pahuchaya ho.

Tabhi Shakil kamre me prawesh kiya. Uska chehra laal pad raha tha......aur hansi phooti pad rahi thi.

"Ammi.....wo mera dost hai.......bahut door se aaya hai...usay pahle hamen suchna deni chaahiye thi. Ham usay station lene jaate." Usne kaha.

"Ohho....tumhen doston se itna prem kab se ho gaya? Tumhara to ye haal tha ki jahaan kisi dost ke aane ki khabar suni is tarah hont sikod liye jaise wo ssari zindagi tumhaare sath rahne keliye aaya ho."

"Ye dost un sab se alag hai ammi....ye un logon ki tarah bore nahin karta.....balki khud hi dusron ki dilchaspi ka saaman ban jaata hai. Kahiye to main usay yahaan laaun?"

"Wo thaka hua aa raha hai......nahin ab ham subah us se milenge.....uska khana uske kamre me jaayega...."

"Khaana....?" Shakil muskura kar bola. "Wo kahta hai maine pichhle hafte se khana nahin khaaya......aur na aainda khaane ka iraada hai."

(......jaari.)
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

काले चिराग -हिन्दी उपन्यास/इब्ने सफ़ी

Sponsor

Sponsor
 

Jemsbond
Super member
Posts: 4277
Joined: 18 Dec 2014 12:09

Re: काले चिराग -हिन्दी उपन्यास/इब्ने सफ़ी

Post by Jemsbond » 07 Dec 2017 17:07


"दूसरा प्रेत-आत्मा..." ग़ज़ाला धीरे से बोली और शकील हँसने लगा......फिर बोला.

"बेशक......अगर जमील भाई प्रेत-आत्मा से संबंध बना सकते हैं तो फिर मैं क्यों पिछे रहूं?"

"अच्छा तो फिर मेरे लिए कहीं से थोड़ा सा ज़हर ला दो.....फिर जो तुम लोगों का दिल चाहे करते रहो....मैं देखने केलिए नहीं आउन्गि." मिसेज़ जॅफर्री ने कहा.

"वाह अम्मी.....ज़हर तो लाउन्गा....लेकिन उनलोगों केलिए जिनके कारण आप परेशान हैं. बस देखती जाइए तमाशा......अगर वो जादूगरनी अपना सर पीटती हुई यहाँ से ना भागी तो नाम बदल दूँगा अपना. जमील भाई के सारे फिलॉसोफी राख का ढेर हो जाएँगे."

"तो क्या......आने वाला...."

"वो केवल मेरा एक दोस्त है.....एक मूर्ख सा व्यक्ति....जिसके चेहरे से ही मूर्खता बरसती है."

"तुम्हारा ही दोस्त जो तरह..." रज़िया मुस्कुराइ. मिसेज़ जॅफर्री के अलावा और सब हँसने लगे.

"अच्छा भाभी.....फिर तुम उसे देख ही लेना." शकील ने झेंप कर कहा और ड्रॉयिंग रूम से चला गया.

**********************************************************

अगली सुबर ब्रेक-फास्ट केलिए डाइनिंग टेबल पर सब बैठे पिच्छली रात आए मेहमान का इंतेज़ार कर रहे थे. जमील इस समय भी अनुपस्थित था. शकील के बारे मे उम्मीद थी कि वो आगंतुक के साथ आएगा. जब वो मेहमान आया तो उनकी आँखें हैरत से फैल गयीं.

वो पीले रंग का शर्ट और नीला पॅंट्स धारण किए हुए था. गले मे पिंक कलर की प्लेन टाइ थी......और सर पर हरे रंग का फेल्ट हॅट. वो किसी टेचनी-कलर फिल्म का कोई किरदार लग रहा था. और उसपर से चेहरे पर फैली मूर्खता पूर्ण गंभीरता.....सारी कमी को पूरा कर दे रही थी.

"ये मेरी अम्मी हैं...." शकील ने परिचय कराना शुरू किया. "ये भाबी रज़िया, ये दोनों ग़ज़ाला और रूही मेरी बहनें हैं."

"आप सब से खुश कर.....अर्ररर.....मिल कर बड़ी खुशी हुई..." मेहमान मूर्खतापूर्ण ढंग से सर हिलाता हुआ बैठ गया.

"और ये कॉन हैं?" मिसेज़ जॅफर्री ने पुछा.

"अली इमरान.....एम एससी, डी एससी....ओक्षुन....." शकील हंस कर बोला."ऑक्स्फर्ड मे मेरे साथ थे...."

उन सबों को शायद इसपर विश्वास नहीं हुआ था.....क्यों कि वो सब अपनी हँसी को रोकने का प्रयास कर रही थीं.

इमरान सर झुकाए बैठा रहा....मिसेज़ जॅफर्री शकील को घूर रही थीं......और शकील का ये हाल था कि हंसते हंसते दोहरा हुआ जा रहा था.

"क्या बेहुदगि है शकील......क्यों पागलों की तरह हँसे जा रहे हो?" मिसेज़ जॅफर्री ने क्रोध भरे स्वर मे कहा.....और इमरान ने इस तरह चौंक कर शकील की तरफ देखा जैसे वो सच-मुच पागल हो गया हो. वैसे इमरान की मूर्खता भरी गंभीरता मे कोई कमी नहीं आई थी.

शकील ने मज़बूती से अपने होंठ बंद कर लिए.....लेकिन साउंडलेस्स ठहाके अब भी जारी थे. आख़िर जब उसने देखा कि क़हक़हे फिर आवाज़ के साथ होने लगे हैं तो वो टेबल से उठ ही गया और पेट दबाए हुए बाहर निकल गया.

"देखा तुमने?" मिसेज़ जॅफर्री लड़कियों की तरफ देख कर बोलीं....."मैं तंग आ गयी हूँ इन लड़कों से."

"आप शायद उनके कोई बहुत ही बेतकल्लुफ दोस्त हैं...." रज़िया ने इमरान की तरफ देखा जो इस अंदाज़ मे नाश्ते मे व्यस्त था जैसे वहाँ और कोई दूसरा नहीं हो.

"कुच्छ भी हो.." मिसेज़ जॅफर्री बोली...."मॅनर्स हर जगह और हर अवसर बार क़ायम रहना चाहिए."

इमरान सर झुकाए कॉफी पी रहा था. रज़िया, ग़ज़ाला और रूही एक दूसरे की तरफ अर्थपूर्ण दृष्टि से देख रही थीं.

अचानक मिसेज़ जॅफर्री ने इमरान से पुछा..."आप दोनों एक दूसरे को कब से जानते हैं?"

"कॉन दोनों?" इमरान ने चीनी मिला कर स्पून को टेबल पर रखते हुए हैरत से पुछा.

"आप और शकील..."

"ओह्ह.....वो....जी हां....शायद लंडन मे पहली बार जान पहचान हुई थी......मैं केमिस्ट्री मे रिसर्च कर रहा था.....उफ्फ.....वो भी क्या दिन थे..."

"आप क्या करते हैं?"

"सैर....सपाटा के अलावा और क्या कर सकता हूँ? पिच्छले साल गन्नों की खेती किया था.....लेकिन बाद मे पता चला कि गुड बनाना हँसी खेल नहीं है.....इसलिए इरादा......वो कर दिया.....क्या कहते हैं उसे.....मेरे साथ बड़ी मुसीबत है.....सही शब्द याद नहीं आते.....एनीवे इरादा.....इरादा.....इरादा....नहीं....मतलब की......"

इमरान चुप हो गया. उसके चेहरे पर उलझन के भाव थे. ऐसा लग रहा था जैसे शब्द को याद करने के क्रम मे उसका कलेजा फॅट रहा हो......अचानक उसने प्रसन्न होकर कहा....."जी हां याद आ गया.....कहने का मतलब यह था कि फिर इरादा त्याग देना पड़ा."

वो चारो उसे आश्चर्य से घूर रही थीं.

"आपके डॅडी क्या करते हैं?" मिसेज़ जॅफर्री ने इस तरह पुछा जैसे वास्तव मे वो चुप ही रहना चाहती हों लेकिन शिष्टाचार के नाते उन्हें बात जारी रखना पड़ रहा हो.

"अर्रे उनकी कुच्छ ना पुछिये." इमरान सर हिला कर बोला. "कभी संतोष करते हैं और कभी क्रोध.....उनका सोचना है कि मैं बहुत ही स्टुपिड और डंब हूँ.....लेकिन वो इसे साबित नहीं कर पाते......यही कारण है कि उन्हें संतोष करना पड़ता है......लेकिन स्टुपिड कहते समय वो क्रोध मे ही होते हैं....."

मिसेज़ जॅफर्री लड़कियों की तरफ देख कर चुप हो गयीं. इमरान बात. समाप्त कर के सर झुकाए बैठा रहा. मिसेज़ जॅफर्री कुच्छ देर बाद बोलीं..."अगर आप उठना चाहें तो हमें कोई आपत्ति नहीं होगी."

"ओह्हो....ज्ज....जी हां.....धन्यवाद...." इमरान उठता हुआ बोला और चुप चाप कमरे से निकल गया.

ग़ज़ाला और रूही फूट पड़ीं. काफ़ी देर तक हँसती रहीं.....रज़िया भी हंस रही थी.....और मिसेज़ जॅफर्री के होंठो पर भी हल्की सी मुस्कुराहट थी.

"अम्मी.....मज़ा आ गया..." ग़ज़ाला अपनी हँसी रोकती हुई बोली. "ये कोई बहुत बड़ा ड्यूट है....और भैया ने घर के मातमी वातावरण से ऊब कर उसे यहाँ बुलाया है. हम इतना दिल खोल कर कब से नहीं हँसे......आप खुद सोचिए..."

"हँसो....आख़िर एक दिन मेरे सरहाने बैठ कर रोना. जमील की ये हरकत मेरी जान ले लेगी....तुम देख लेना."

"आप भी कैसी बातें करती हैं अम्मी..." रज़िया बोल पड़ी...."मिट्टी डालिए सब पर....आप से अधिक हमारे लिए और कोई नहीं है.....आप अकारण चिंता करके परेशान होती हैं....मुझे तो रत्ती भर भी परवाह नहीं."

"तुम मुझे बहलाने केलिए ऐसा कह रही हो." मिसेज़ जॅफर्री ने दुखी स्वर मे कहा...."मैं कैसे मान लूँ कि पति का भटक जाना तुम्हारे लिए कष्टदायी नहीं है?"

"बिल्कुल नहीं है अम्मी...." रज़िया ने कहा..."मैं जानती हूँ कि आप मेरे लिए ही परेशान हैं....आप कहें तो मैं कोई बड़ी सौगंध खा कर कह दूं ताकि आपको विश्वास हो कि मुझे उनके भटकाव की थोड़ी सी भी चिंता नहीं."

मिसेज़ जॅफर्री ने सर झुका लिया.....लेकिन उनके चेहरे पर अब भी दुख की रेखाएँ थीं.

********************************************************

(......जारी.)


"Dusra pret-aatma..." Gajaalaa dhire se boli aur Shakil hasne laga......phir bola.

"Beshak......agar Jamil bhai pret-aatma se sambandh bana sakte hain to phir main kyon pichhe rahun?"

"Achha to phir mere liye kahin se thoda sa zahar laa do.....phir jo tum logon ka dil chaahe karte raho....main dekhne keliye nahin aaungi." Mrs Jaffery ne kaha.

"Waah ammi.....zahar to laaunga....lekin unlogon keliye jinke kaaran aap pareshan hain. Bas dekhti jaaiye tamasha......agar wo jaadugarni apna sar peetati huyi yahaan se na bhaagi to naam badal dunga apna. Jamil bhai ke saare philosophy rakh ka dher ho jaayenge."

"To kya......aane waala...."

"Wo kewal mera ek dost hai.....ek murkh sa vyakti....jiske chehre se hi murkhta barasti hai."

"Tumhara hi dost jo thara..." Razia muskuraayi. Mrs Jaffery ke alawa aur sab hasne lage.

"Achha bhabi.....phir tum usay dekh hi lena." Shakil ne jhenp kar kaha aur drawing room se chala gaya.

**********************************************************

Agli subar break-fast keliye dining table par sab baithe pichhli raat aaye mehmaan ka intezaar kar rahe the. Jamil is samay bhi anupasthit tha. Shakil ke baare me ummid thi ki woh aagantuk ke sath aayega. Jab wo mehmaan aaya to unki aankhen hairat se phail gayin.

Wo peele rang ka shirt aur neela pants dhaaran kiye huye tha. Gale me pink colour ki plane tie thi......aur sar par hare rang ka felt hat. Wo kisi techni-colour film ka koi kirdar lag raha tha. Aur uspar se chehre par phaili murkhta purn gambheerta.....saari kami ko poora kar de rahi thi.

"Ye meri ammi hain...." Shakil ne parichay karana shuru kiya. "Ye bhabi Razia, ye donon Gajaalaa aur Ruhi meri bahnen hain."

"Aap sab se khush kar.....arrrr.....mil kar badi khushi huyi..." Mehmaan murkhtapurn dhang se sar hilaata hua baith gaya.

"Aur ye kon hain?" Mrs Jaffery ne puchha.

"Ali Imran.....M Sc, D Sc....Oxun....." Shakil hans kar bola."Oxford me mere sath the...."

Un sabon ko shayad ispar vishwaas nahin hua tha.....kyon ki wo sab apni hansi ko rokne ka prayas kar rahi thin.

Imran sar jhukaaye baitha raha....Mrs Jaffery Shakil ko ghoor rahi thin......aur Shakil ka ye haal tha ki hanste hanste dohra hua jaa raha tha.

"Kya behudagi hai Shakil......kyon paaglon ki tarah hanse jaa rahe ho?" Mrs Jaffery ne krodh bhare swar me kaha.....aur Imran ne is tarah chaunk kar Shakil ki taraf dekha jaise wo sach-much paagal ho gaya ho. Waise Imran ki Murkhta bhari gambhirta me koi kami nahin aayi thi.

Shakil ne mazbuti se apne hont band kar liye.....lekin soundless thahaake ab bhi jaari the. Aakhir jab usne dekha ki kahkahe phir aawaz ke saath hone lage hain to wo table se uth hi gaya aur pet dabaaye huye baahar nikal gaya.

"Dekha tumne?" Mrs Jaffery ladkiyon ki taraf dekh kar bolin....."Main tang aa gayi hun in ladkon se."

"Aap shayad unke koi bahut hi betakalluf dost hain...." Razia ne Imran ki taraf dekha jo is andaaz me naashte me vyast tha jaise wahaan aur koi dusra nahin ho.

"Kuchh bhi ho.." Mrs Jaffery boli...."Manners har jagah aur har avasar bar qaayam rahna chaahiye."

Imran sar jhukaaye coffee pi raha tha. Razia, Gajaalaa aur Ruhi ek dusre ki taraf arthpurn drishti se dekh rahi thin.

Achanak Mrs Jaffery ne Imran se puchha..."Aap donon ek dusre ko kab se jaante hain?"

"Kon donon?" Imran ne chini mila kar spoon ko table par rakhte huye hairat se puchha.

"Aap aur Shakil..."

"Ohh.....wo....jee haan....shayad London me pahli baar jaan pahchan huyi thi......main chemistry me research kar raha tha.....uff.....wo bhi kya din the..."

"Aap kya karte hain?"

"Sair....sapaata ke alawa aur kya kar sakta hun? Pichhle saal gannon ki kheti kiya tha.....lekin baad me pata chala ki gud banaana hansi khel nahin hai.....isliye iraada......wo kar diya.....kya kahte hain usay.....mere sath badi musibat hai.....sahi shabd yaad nahin aate.....anyway iraada.....iraada.....iraada....nahin....matlab ki......"

Imran chup ho gaya. uske chehre par uljhan ke bhaaw the. Aisa lag raha tha jaise shabd ko yaad karne ke kram me uska kaleja phat raha ho......achanak usne prasann hokar kaha....."Jee haan yaad aa gaya.....kahne ka matlab yah tha ki phir iraada tyag dena pada."

Wo chaaro usay aashcharya se ghoor rahi thin.

"Aapke daddy kya karte hain?" Mrs Jaffery ne is tarah puchha jaise vastav me wo chup hi rahna chaahti hon lekin shishtachar ke naate unhen baat jaari rakhna pad raha ho.

"Arre unki kuchh na puchhiye." Imran sar hila kar bola. "Kabhi santosh karte hain aur kabhi krodh.....unka sochna hai ki main bahut hi stupid aur dumb hun.....lekin wo isay saabit nahin kar paate......yahi kaaran hai ki unhen santosh karna padta hai......lekin stupid kahte samay wo krodh me hi hote hain....."

Mrs Jaffery ladkiyon ki taraf dekh kar chup ho gayin. Imran B.F. samaapt kar ke sar jhukaaye baitha raha. Mrs Jaffery kuchh der baad bolin..."Agar aap uthna chaahen to hamen koi aapatti nahin hogi."

"Ohho....jj....ji haan.....dhanyawad...." Imran uthta hua bola aur chup chap kamre se nikal gaya.

Gajaalaa aur Ruhi phoot padin. Kaafi der tak hasti rahin.....Razia bhi hans rahi thi.....aur Mrs Jaffery ke honton par bhi halki si muskurahat thi.

"Ammi.....maza aa gaya..." Gajaalaa apni hansi rokti huyi boli. "Ye koi bahut bada dute hai....aur bhaiya ne ghar ke maatami vaatavaran se oob kar usay yahaan bulaaya hai. Ham itna dil khol kar kab se nahin hanse......aap khud sochiye..."

"Hanso....aakhir ek din mere sarhaane baith kar rona. Jamil ki ye harkat meri jaan le legi....tum dekh lena."

"Aap bhi kaisi baaten karti hain ammi..." Razia bol padi...."Mitti daaliye sab par....aap se adhik hamaare liye aur koi nahin hai.....aap akaaran chinta karke pareshan hoti hain....mujhe to ratti bhar bhi parwaah nahin."

"Tum mujhe bahlaane keliye aisa kah rahi ho." Mrs Jaffery ne dukhi swar me kaha...."Main kaise maan lun ki pati ka bhatak jaana tumhaare liye kashtdaayi nahin hai?"

"Bilkul nahin hai ammi...." Razia ne kaha..."Main jaanti hun ki aap mere liye hi pareshan hain....aap kahen to main koi badi saugandh kha kar kah dun taaki aapko vishwaas ho ki mujhe unke bhatkaao ki thodi si bhi chinta nahin."

Mrs Jaffery ne sar jhuka liya.....lekin unke chehre par ab bhi dukh ki rekhaayen thin.

********************************************************

(......Jaari.)

*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Jemsbond
Super member
Posts: 4277
Joined: 18 Dec 2014 12:09

Re: काले चिराग -हिन्दी उपन्यास/इब्ने सफ़ी

Post by Jemsbond » 07 Dec 2017 17:22

"अब्बे......क्यों मेरा टाइम वेस्ट कर रहा है...शकील के बच्चे...." इमरान आँखें तरेड कर बोला. लेकिन शकील पूर्व-वत बोलता रहा.

"बाइ गॉड.....अगर तुमने उसे देख लिया तो कलेजा थाम कर बैठ जाओगे. ऐसी हसीन औरत आज तक मेरी निगाहों से नहीं गुज़री..."

"अगर नहीं गुज़री तो इसमे मेरा क्या कसूर है?" इमरान रो देने वाली आवाज़ मे बोला. "तुम नहीं जानते मैं इस समय किन जंजालों से पिच्छा छुड़ा कर तुम तक पहुचा हूँ.....मेरे पास बहुत थोड़ा समय है."

शकील कुच्छ पल खामोश रहा.....फिर बोला...."पहले वो यहाँ के एक होटेल मे ठहरी हुई थी.....और लोगों के हाथ देख कर उनके भविश्य-वाणी किया करती थी. तुम खुद सोच सकते हो कि वहाँ कितनी भीड़ भाड़ रहती होगी. कितने तो केवल उसके समीप कुच्छ समय बिताने केलिए जाते थे."

"मामला को अधिक खिचो मत.....ये बताओ कि वो यहाँ तुम्हारी कोठी मे कैसे आई?''

"जमील भाई एक पार्टी मे इन्वाइटेड थे....वो भी वहाँ आई थी. जब जमील भाई वहाँ से चलने लगे तो उसने उन्हें रोक कर कहा कि वो इस समय पूर्बी गेट से बिल्डिंग मे प्रवेश ना करें."

"किस बिल्डिंग मे?"

"यहीं इसी कोठी के बारे मे बोली थी.....यहाँ 2 गेट हैं....एक उत्तर दिशा मे दूसरा पूरब दिशा मे. आना-जाना पूरब वाले गेट से ही होता है. एनीवे....जमील भाई उसकी बात पर हंस दिए.....इसपर उस औरत ने कहा कि वो जादूगर नहीं है....बल्कि तारों की चाल से यही प्रकट है कि पुर्बि फाटक 9 और 10 बजे के बीच अशुभ हो जाएगा. उन्होने शिष्टाचार मे उस से वादा कर लिया लेकिन उनका इरादा नहीं था कि वो उसकी बातों पर चलेंगे. लेकिन फिर घर के निकट पहुचने पर अचानक उन्होने इरादा बदल लिया. वो उत्तरी फाटक पर आए जो बंद था. वैसे उसे खुलवाने मे कोई दिक्कत नहीं थी.....क्योंकि दरबान का कमरा उसी गेट से मिला हुआ था. वो गाड़ी रोक कर फाटक खुलवाने केलिए उतर ही रहे थे कि ऐसा लगा जैसे दूर कहीं कोई दीवार गिरी हो. पहले तो उन्होने इसपर ध्यान नहीं दिया. फिर अचानक पुर्बि फाटक का ध्यान आया.....उस औरत की चेतावनी याद आई....वो तेज़ी से गाड़ी मे बैठे और पुर्बि गेट की तरफ चल पड़े.....और फिर उनके आश्चर्य की कोई सीमा ना रही जब उन्होने फाटक को ढहा हुआ देखा. उनके अनुसार फाटक ठीक उसी समय गिरा था जिस समय वो उस फाटक से पार कर रहे होते. अर्थात फाटक उनकी गाड़ी पर ही गिरता........बॅस यहीं से सारी मुसीबतें शुरू हुईं."

"आहा....मुसीबत क्यों?" इमरान चहक कर बोला...."कलेजा थामे बैठे रहा करो....तुम चलते फिरते क्यूँ हो?"

शकील हँसने लगा....फिर बोला...."क्लियर है कि ये घटना जमील भाई जैसे फिलॉसफर माइंड व्यक्ति के मस्तिस्क को बुरी तरह प्रभावित किया. तुम उन्हें अच्छी तरह नहीं जानते.....उनका अधिक समय लाइब्रेरी मे गुज़रता है....वो इतने प्रभावित हुए कि दूसरे दिन उस होटेल मे जा पहुचे जहाँ ये औरत ठहरी थी. एक घंटे मे उस से और अधिक प्रभावित होकर लौटे. धीरे धीरे उनकी आस्था बढ़ती गयी.....और फिर एक दिन उसे यहाँ ले आए....अम्मी से वो बहुत डरते थे.....लेकिन अब ये हाल है जैसे उन्हें उनकी परवाह ही ना हो."

"लेकिन इस बारे मे इमरान उल्लू का पट्ठा क्या कर सकता है?" इमरान झुंज़ला कर बोला...."तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया?"

"पूरी बात भी तो सुनो प्यारे...." शकील मुस्कुरा कर कहा.

"2 घंटा से तुम पूरी बात सुना रहे हो..."

"अच्छा अब तुम अपना मुँह बंद रखो..." शकील हाथ उठा कर बोला.

"बंद है." इमरान होंठ भिचते हुए बोला.

"बात अगर यहीं तक रहती तो कोई बात नहीं थी.....दुनिया के सारे मर्द पत्नी के रहते हुए भी किसी दूसरी औरत के सपने देखते हैं.....और ये बताना कठिन होता है कि जीवन मे कब कोई दूसरी औरत आ जाए..."

"फिर बात बढ़ाई तुम ने..." इमरान मेज़ पर घूसा मार कर बोला..."अब्बे क्या मैं औरतों के दाखिल-खारिज के लिए आया हूँ? शकील के बच्चे.....काम की बात करो..."

"सॉरी....मुझे नहीं पता था कि अब भी तुम्हें औरत के नाम से बुखार आता है."

"मलेरिया..." इमरान बड़ी सादगी से बोला.

"ओके....हां तो ये औरत मुझे बहुत रहस्सयमयी लगती है."

"गधे हो तुम....शेक्स्पीयर तक को औरतें रहस्सयमयी ही लगती थीं.....हर आशिक को उसकी....वो क्या कहते हैं....मंबुसा....बंबुसा....नहीं कुच्छ और कहते हैं.....वो जो आशिक की मादा होती हैं..."

"महबूबा..." शकील नटखट सी मुस्कान के साथ बोला.

"हां...जीते रहो....महबूबा....हां तो हर आशिक को उसकी महबूबा रहस्सयमयी लगती है......इसका ये मतलब नहीं कि हर आशिक जासूस को बुलाता फिरे,,,"

"ओ...ईश्वर के बंदे....मेरी बात भी तो सुनो..."

"नहीं सुनता...." इमरान चिल्ला कर बोला...."इतनी देर से झक मार रहे हो.....लेकिन अभी तक कोई विशेष बात नहीं आई."

"अब मैं एकदम विशेष बात ही सुनाने जा रहा हूँ....चोच बंद रखो..." शकील हाथ हिला कर बोला...."ये बताओ....अगर तुम किसी ऐसी औरत को रातों मे उठ उठ कर इमारत के विभिन्न तरफ चोरों की तरह जाते देखो तो क्या करोगे?''

"आहम्म..." इमरान अंगड़ाई लेते लेते रुक गया.

(......जारी.)


"Abbe......kyon mera time waste kar raha hai...Shakil ke bachche...." Imran aankhen tared kar bola. Lekin Shakil poorv-vat bolta raha.

"By God.....agar tumne usay dekh liya to kaleja thaam kar baith jaaoge. Aisi haseen aurat aaj tak meri nigaahon se nahin guzri..."

"Agar nahin guzri to isme mera kya kasoor hai?" Imran ro dene waali aawaz me bola. "Tum nahin jaante main iss samay kin janjaalon se pichha chhuda kar tum tak pahucha hun.....mere paas bahut thoda samay hai."

Shakil kuchh pal khamosh raha.....phir bola...."Pahle wo yahaan ke ek hotel me thahri huyi thi.....aur logon ke hath dekh kar unke bhavishya-vani kiya karti thi. Tum khud soch sakte ho ki wahaan kitni bheed bhaad rahti hogi. Kitne to kewal uske sameep kuchh samay bitaane keliye jaate the."

"Maamla ko adhik khicho mat.....ye bataao ki wo yahaan tumhari kothi me kaise aayi?''

"Jamil bhai ek party me invited the....wo bhi wahaan aayi thi. Jab Jamil bhai wahaan se chalne lage to usne unhen rok kar kaha ki wo iss samay poorbi gate se buiding me prawesh na karen."

"Kis building me?"

"Yahin isi kothi ke baare me boli thi.....yahaan 2 gate hain....ek uttar disha me dusra poorab disha me. Aana-jaana poorab waale gate se hi hota hai. Anyway....Jamil bhai uski baat par hans diye.....ispar us aurat ne kaha ki wo jaadugar nahin hai....balki taaron ki chaal se yahi prakat hai ki purbi phaatak 9 aur 10 baje ke bich ashubh ho jaayega. Unhone shishtachar me uss se waada kar liya lekin unka irada nahin tha ki wo uski baaton par chalenge. Lekin phir ghar ke nikat pahuchne par achanak unhone iraada badal liya. Wo uttari phaatak par aaye jo band tha. Waise usay khulwaane me koi dikkat nahin thi.....kyonki darbaan ka kamra usi gate se mila hua tha. Wo gaadi rok kar phaatak khulwaane keliye utar hi rahe the ki aisa laga jaise door kahin koi deewar giri ho. Pahle to unhone ispar dhyan nahin diya. Phir achanak purbi phaatak ka dhyan aaya.....us aurat ki chetawani yaad aayi....wo tezi se gaadi me baithe aur purbi gate ki taraf chal pade.....aur phir unke aashchrya ki koi seema na rahi jab unhone phaatak ko dhaha hua dekha. Unke anusar phatak thik usi samay gira tha jis samay wo uss phaatak se paar kar rahe hote. Arthaat phatak unki gaadi par hi girta........bass yahin se saari musibaten shuru huyin."

"Aahaa....musibat kyon?" Imran chahak kar bola...."Kaleja thaame baithe raha karo....tum chalte phirte kyun ho?"

Shakil hasne laga....phir bola...."Clear hai ki ye ghatna Jamil bhai jaise Philosopher mind vyakti ke mastisk ko buri tarah prabhawit kia. Tum unhen achhi tarah nahin jaante.....unka adhik samay liberary me guzarta hai....wo itne prabhawit huye ki dusre din us hotel me jaa pahuche jahaan ye aurat thahri thi. Ek ghante me uss se aur adhik prabhavit hokar laute. Dhire dhire unki aastha badhti gayi.....aur phir ek din usay yahan le aaye....ammi se wo bahut darte the.....lekin ab ye haal hai jaise unhen unki parwaah hi na ho."

"Lekin iss baare me Imran ulloo ka pattha kya kar sakta hai?" Imran jhunjla kar bola...."Tumne mujhe yahaan kyon bulaaya?"

"Poori baat bhi to suno pyare...." Shakil muskura kar kaha.

"2 ghanta se tum poori baat suna rahe ho..."

"Achha ab tum apna muhh band rakho..." Shakil hath utha kar bola.

"Band hai." Imran hont bhichte huye bola.

"Baat agar yahin tak rahti to koi baat nahin thi.....duniya ke saare mard patni ke rahte huye bhi kisi dusri aurat ke sapne dekhte hain.....aur ye bataana kathin hota hai ki jeewan me kab koi dusri aurat aa jaaye..."

"Phir baat badhayi tum ne..." Imran mez par ghoosa maar kar bola..."Abbe kya main auraton ke daakhil-kharij ke liye aaya hun? Shakil ke bachche.....kaam ki baat karo..."

"Sorry....mujhe nahin pata tha ki ab bhi tumhen aurat ke naam se bukhaar aata hai."

"Maleria..." Imran badi saadgi se bola.

"OK....haan to ye aurat mujhe bahut rahassyamayi lagti hai."

"Gadahe ho tum....Shakespear tak ko auraten rahassyamayi hi lagti thin.....har aashik ko uski....wo kya kahte hain....mambusa....bambusa....nahin kuchh aur kahte hain.....wo jo aashik ki maada hoti hain..."

"Mahbuba..." Shakil natkhat si muskan ke sath bola.

"Haan...jeete raho....mahbuba....haan to har aashik ko uski mahbuba rahassyamayi lagti hai......iska ye matlab nahin ki har aashik jasoos ko bulata phire,,,"

"O...ishwar ke bande....meri baat bhi to suno..."

"Nahin sunta...." Imran chilla kar bola...."Itni der se jhak maar rahe ho.....leki abhi tak koi vishesh baat nahin aayi."

"Ab main ekdam vishesh baat hi sunaane ja raha hun....choch band rakho..." Shakil hath hila kar bola...."Ye bataao....agar tum kisi aisi aurat ko raaton me uth uth kar imaarat ke vibhinn taraf choron ki tarah jaate dekho to kya karoge?''

"Aahmm..." Imran angdaayi lete lete ruk gaya.

(......Jaari.)


*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Jemsbond
Super member
Posts: 4277
Joined: 18 Dec 2014 12:09

Re: काले चिराग -हिन्दी उपन्यास/इब्ने सफ़ी

Post by Jemsbond » 08 Dec 2017 21:48

शकील कहता रहा..."सर्दी की रातें हैं....12 बजे तक पूरी कोठी मे मरघाट जैसा सन्नाटा छा जाता है.....और फिर वो अपने कमरे से निकल कर चोरों की तरह कुच्छ तलाश करती फिरती है......पतली रोशनी वाला टॉर्च उसके हाथ मे होता है. कभी उसकी रौशनी दीवार पे रेंगती नज़र आती है.....और कभी फर्श पर. मैं 3 रातों से उसे देख रहा हूँ. लेकिन मौने अभी तक किसी से इसकी चर्चा नहीं किया."

"ये तुमने बहुत अच्छा किया." इमरान बडबडाया. "और कोई ख़ास बात?"

"वो कहती है कि वो स्विट्ज़र्लॅंड से अकेली आई है.....और यहाँ किसी भी विदेशी से उसकी जान पहचान नहीं है.....लेकिन मेरा विचार है कि वो ग़लत कहती है."

"किस बुनियाद पर ये विचार है?"

"पिच्छली शाम वो और जमाल भाई घूमने बाहर गये थे.....मैं उन दोनों का पिछा कर रहा था. बात ये है कि जब से उसकी रातों वाली हरकत मेरी जानकारी मे आई है मैं लगभग हर समय उस पर नज़र रखने की कोशिश करता हूँ. एनीवे.....पिच्छली शाम मुझे शक हुआ कि वो एक विदेशी को इशारा कर रही है......ये मैं ना बता सकूँगा कि वो अँग्रेज़ था, जर्मन था या फ्रांसीसी था.....लेकिन मुझे संदेह है कि उसने उसे इशारा किया था."

"कहाँ की बात है?"

"पिच्छली शाम वो लोग फिगारो मे थे.....यहाँ के बेहतरीन क्लब है."

"लेकिन यहाँ के अक्सर बड़े लोग जमील से जेलस भी हो गये होंगे?"

"स्वाभाविक बात है. यहाँ के काई अयाश और दौलतमंद लोगों ने कोशिश की थी कि वो होटेल मे रहना छोड़ कर उन्ही के साथ रहे......लेकिन वो उसपर तैयार नहीं हुई.....और मैदान जमील भाई के हाथ आया. वो उनसे कह रही थी कि उसे होटेल मे शांति नहीं मिलती. जमील भाई ने अपने साथ रहने का ऑफर किया......और वो फ़ौरन तैयार हो गयी. क्या ये आश्चर्य-जनक नहीं है.....मतलब वो इंतेज़ार मे थी कि कब जमील भाई ऐसा ऑफर करते हैं."

इमरान कुच्छ ना बोला. शकील कहता रहा..."अब यहाँ इस कोठी मे उसके भक्तों की भीड़ रहती है. 9 बजे से 12 बजे तक. अम्मी को ये बात बिल्कुल पसंद नहीं.....लेकिन भाई साहब का व्यवहार ऐसा हो चुका है कि वो कुच्छ नहीं कहतीं.......कि कहीं वो पलट कर उन्हें ही कुच्छ कठोर बातें कह दें. लेकिन अगर कभी उन्होने ऐसी हरकत की तो खुदा की क़सम मैं जमील भाई की गर्दन उड़ा दूँगा."

"ये तुम्हारी सौतेली माँ हैं?"

"मैं नहीं समझता.....हम मे से कोई भी ऐसा नहीं समझता......अम्मी भी नहीं समझती क़ि वो हमारी सौतेली माँ हैं.....मुझे बड़ी तकलीफ़ होती है जब कोई कहता है कि वो हमारी सौतेली माँ हैं."

इमरान कुच्छ सोच रहा था. शकील भी चुप हो गया था. फिर इमरान कुच्छ देर बाद बोला...."तुमने उस विदेशी का पिछा नहीं किया जिसे उस औरत ने इशारा किया था?"

"यही ग़लती हुई मुझ से." शकील बोला. "मुझे उसका पिछा करना चाहिए था."

"ह्म....ओके...मैं देखूँगा." इमरान ने कहा.."क्या तुम बता सकते हो कि उसे इस बिल्डिंग मे किस चीज़ की तलाश है?"

"मुझे खुद हैरत है....मैं किसी ऐसी चीज़ से अंजान हूँ जिसमे कोई विदेशी औरत इंटेरेस्ट ले सके.....और यहाँ तक पहुचने केलिए उसे इतना लंबा चौड़ा ड्रामा करना पड़े."

"हो सकता है तुम्हारी अम्मी किसी ऐसी चीज़ को जानती हों."

"मैं नहीं कह सकता.....और ना ये चर्चा उन उनके सामने छेड़ सकता हूँ."

"क्यों?"

"उनकी परेशानी बढ़ जाएगी.....मैं नहीं चाहता कि वो और अधिक उलझनों मे पड़ें."

"ह्म..." इमरान फिर कुच्छ सोचने लगा. कुच्छ देर बात उसने पुछा.

"वो औरत किस नाम से पुकारी जाती है?"

"स्टेरिटा..."

"नाम से तो स्विस ही लगती है." इमरान बडबडाया. कुच्छ पल खामोश रह कर फिर बोला..."क्या वो लोगों से कुच्छ फीस भी लेती है?"

"हां.....हाथ देखने के 500 और रूह से मुलाकात कराने के 2000."

"किययाया??" इमरान आँखें फाड़ कर बोला...."वो आत्माओं से मुलाकात भी कराती है?"

"हां.....मैने सुना है.....इस तरह की कोई क्रिया करते देखा नहीं हूँ."

"और इसके बाद भी तुम उस से भयभीत नहीं हो? रातों को छुप छुप कर उसका पिछा किया करते हो? बड़े दिलेर हो तुम?"

"यार....इमरान डियर....औरत ही तो है....अगर अम्मी का डर ना होता तो मैं खुद भी उसपर आशिक़ हो जाता."

"खबरदार...." इमरान हाथ उठा कर बोला..."अब तुम उस पर आशिक़ नहीं हो सकते......क्योंकि मैं केवल नाम ही सुन कर आशिक़ हो गया हूँ. स्टेरिटा....हहा....कितनी मिठास है....ऐसा लगता है जैसे कानों मे रस्स की बाल्टी उलट दी हो..."

"तुम और आशिक़....!!" शकील हँसने लगा.

"क्यों क्या हुआ....क्या मुझे आशिक़ होना नहीं आता? पहले ना आता होगा.....मगर अब मैं बड़ी सफाई से आशिक़ हो सकता हूँ.....अब तुम मुझे दिखाओ....उस औरत.....नहीं.....स्टेरिटा.....स्टेरिटा कहना मुझे अच्छा नहीं लगता.....इसलिए उसे केवल रीता कहूँगा."

शकील घड़ी की तरफ देखता हुआ बोला..."15 मिनट बाद वो लॉन पर निकल आएगी....फिर तुम क़रीब से उसके दर्शन कर सकोगे."

"15 मिनट भी बहोत होते हैं..." इमरान सच मुच आशिक़ों के से अंदाज़ मे ठंडी साँस लेकर बोला.

*********************************************************

इमरान ने उसे देखा.......वो सच मुच बहुत हसीन थी.....लंबा क़द....अंग अंग पर्फेक्ट रेशियो मे....शरीर पर फिटिंग ड्रेस.....कंधों पर झूलते घुंघराले बाल.....जिनकी रंगत सुनहरी थी. नैन-नक्श असाधारण.....जिनके संबंध मे आम तौर पर ये सोचा जाता था कि वो वर्णन करने से परे हैं.....मतलब शब्दों मे उनकी तस्वीर पेश करना असंभव हो....कितनों का कहना है कि शायद वो खुद भी कोई रूह है.

खुद इमरान ने भी यही महसूस किया.....कि कुच्छ देर देखते रहने के बाद भी केवल अपनी मेमोरी के सहारे उसकी शकल के बारे मे कुच्छ ना बता सकेगा......कभी उसका उपरी होंठ एक हल्की कर्व के साथ उपर उठ जाता था.....और कभी ऐसा लगता था जैसे नाक की जड़ से मुहह तक बिल्कुल सपाट हो.....कभी आँखें स्वप्निल सी लगती हैं और उन से उदासी सी झाँकने लगती.....और कभी ऐसा लगता जैसे शरीर की सारी शक्ति आँखों मे उतर आई हो. ना जाने क्यों उन बदलती हुई अवस्था का प्रभाव उसके उसकी शकल और नैन-नक्श पर भी पड़ता था.

वो लॉन पर टहल रही थी. उसके साथ जमील भी था. शकील और जमील मे बहुत समानता थी. वैसे टोनों के अपीयरेन्स मे बहुत अंतर था. जमील के चेहरे पर गंभीरता थी.....ठहराव था.....इसके विपरीत शकील खिलंदारा और चंचल लगता था.

"क्या मैं जमील भाई से तुम्हारा परिचय करवाऊ?" शकील ने इमरान से पुछा.

"हरगिज़ नहीं..." इमरान दाँत जमा कर बोला. "मैं रक़ीबों से परिचित होना पसंद नहीं करता."

"क्या मतलब?"

"मैं अभी और इसी समय इन महाशय को रक़ीब घोषित करता हूँ......क्योंकि पहली ही नज़र मे इश्स जाग-मारिणी पर आशिक़ हो चुका हूँ."

"जाग-मारिणी....ये क्या बला है....?" शकील पर हँसी का दौड़ा पड़ गया.

"जाहिल हो....मूर्ख हो....तुम क्या जानो. मैने उर्दू-हिन्दी के एक रोमॅंटिक नॉवेल मे पढ़ा था.....आशिक़ अपनी मंनूआ....अर्र....फिर भूल गया.....क्या कहते हैं....माम्बूहा...नहीं.....महबूबा को सितम्गर.....बेवफा....जफ़ा-पेशा और जाग-मारिणी कहता है...."

"अब्बे....उसे उर्दू मे 'क़त्ताल-ए-आलम कहते है....आशिक़ के बच्चे...."

(......जारी.)


Shakil kahta raha..."Sardi ki raaten hain....12 baje tak poori kothi me marghat jaisa sannaata chha jaata hai.....aur phir wo apne kamre se nikal kar choron ki tarah kuchh talash karti phirti hai......patli roshni waala torch uske hath me hota hai. Kabhi uski raushni deewar pe rengti nazar aati hai.....aur kabhi farsh par. Main 3 raaton se usay dekh raha hun. Lekin maune abhi tak kisi se isaki charcha nahin kiya."

"Ye tumne bahut achha kiya." Imran barbadaaya. "Aur koi khaas baat?"

"Wo kahti hai ki wo Switzerland se akeli aayi hai.....aur yahan kisi bhi videshi se uski jaan pahchan nahin hai.....lekin mera vichar hai ki woh galat kahti hai."

"Kis buniyad par ye vichar hai?"

"Pichhli sham wo aur Jmail bhai ghoomne bahar gaye the.....main un donon ka pichha kar raha tha. Baat ye hai ki jab se uski raaton waali harkat meri jaankari me aayi hai main lagbhag har samay us par nazar rakhne ki koshish karta hun. Anyway.....pichhli sham mujhe shak hua ki woh ek videshi ko ishara kar rahi hai......ye main na bata sakunga ki wo angrez tha, German tha ya Francisy tha.....lekin mujhe sandeh hai ki usne usay ishara kia tha."

"Kahan ki baat hai?"

"Pichhli sham wo log Figaro me the.....yahan ke behtareen club hai."

"Lekin yahan ke aksar bade log Jamil se jealous bhi ho gaye honge?"

"Swabhavik baat hai. Yahan ke kayi ayaash aur daulatmand logon ne koshish ki thi ki wo hotel me rahna chhod karunhin ke sath rahe......lekin wo uspar taiyar nahin huyi.....aur maidan Jamil bhai ke hath aaya. Wo unse kah rahi thi ki usay hotel me shanti nahin milti. Jamil bhai ne apne sath rahne ka offer kiya......aur wo fauran taiyar ho gayi. Kya ye aashcharya-janak nahin hai.....matlab wo intezar me thi ki kab Jamil bhai aisa offer karte hain."

Imran kuchh na bola. Shakil kahta raha..."Ab yahan is Kothi me uske bhakton ki bheed rahti hai. 9 baje se 12 baje tak. Ammi ko ye baat bilkul pasand nahin.....lekin bhai sahab ka vyawahar aisa ho chuka hai ki wo kuchh nahin kahtin.......ki kahin wo palat kar unhen hi kuchh kathor baaten kah den. Lekin agar kabhi unhone aisi harkat ki to khuda ki qasam main Jamil bhai ki gardan udaa doonga."

"Ye tumhari sauteli maa hain?"

"Main nahin samjhta.....ham me se koi bhi aisa nahin samajhta......ammi bhi nahin samajhti ki wo hamari sauteli maa hain.....mujhe badi taklif hoti hai jab koi kahta hai ki wo hamari sauteli maa hain."

Imran kuchh soch raha tha. Shakil bhi chup ho gaya tha. Phir Imran kuchh der baad bola...."Tumne us videshi ka pichha nahin kiya jise us aurat ne ishara kiya tha?"

"Yahi galati huyi mujh se." Shakil bola. "Mujhe uska pichha karna chaahiye tha."

"Hmm....ok...main dekhunga." Imran ne kaha.."Kya tum bata sakte ho ki usay is building me kis chiz ki talash hai?"

"Mujhe khud hairat hai....main kisi aisi chiz se anjaan hun jisme koi videshi aurat interest le sake.....aur yahan tak pahuchne keliye usay itna lamba chauda drama karna pade."

"Ho sakta hai tumhari ammi kisi aisi chiz ko jaanti hon."

"Main nahin kah sakta.....aur na ye charcha un unke saamne chhed sakta hun."

"Kyon?"

"Unki pareshani badh jaayegi.....main nahin chaahta ki wo aur adhik uljhanon me paden."

"Hmm..." Imran phir kuchh sochne laga. Kuchh der baat usne puchha.

"Wo aurat kis naam se pukari jaati hai?"

"Starieta..."

"Naam se to Swiss hi lagti hai." Imran brbadaaya. Kuchh pal khamosh rah kar phir bola..."Kya wo logon se kuchh fees bhi leti hai?"

"Haan.....hath dekhne ke 500 aur rooh se mulaakat karaane ke 2000."

"Kyaaaa??" Imran aankhen phaad kar bola...."Wo aatmaaon se mulakat bhi karaati hai?"

"Haan.....maine suna hai.....is tarah ki koi kriya karte dekha nahin hun."

"Aur iske baad bhi tum uss se bhaybheet nahin ho? Raaton ko chhup chhup kar uska pichha kiya karte ho? Bade diler ho tum?"

"Yaar....Imran dear....aurat hi to hai....agar ammi ka dar na hota to main khud bhi uspar aashiq ho jaata."

"Khabardar...." Imran hath utha kar bola..."Ab tum us par aashiq nahin ho sakte......kyonki main kewal naam hi sun kar aashiq ho gaya hun. Starieta....haha....kitni mithaas hai....aisa lagta hai jaise kaanon me rass ki baalti ulat di ho..."

"Tum aur aashiq....!!" Shakil hasne laga.

"Kyon kya hua....kya mujhe aashiq hona nahin aata? Pahle na aata hoga.....magar ab main badi safaayi se aashiq ho sakta hun.....ab tum mujhe dikhaao....uss aurat.....nahin.....Starieta.....Starieta kahna mujhe achha nahin lagta.....isliye usay kewal Rita kahunga."

Shakil ghadi ki taraf dekhta hua bola..."15 minut baad wo lawn par nikal aayegi....phir tum qareeb se uske darshan kar sakoge."

"15 minut bhi bahot hote hain..." Imran sach much aashiqon ke se andaz me thandi saans lekar bola.

*********************************************************

Imran ne usay dekha.......wo sach much bahut haseen thi.....lamba qad....ang ang perfect ratio me....sharir par fitting dress.....kandhon par jhoolte ghunghraale baal.....jinki rangat sunahri thi. Nain-naksh asadharan.....jinke sambandh me aam taur par ye socha jaata tha ki wo varnan karne se pare hain.....matlab shabdon me unki tasweer pesh karna asambhav ho....kitnon ka kahna hai ki shayad wo khud bhi koi rooh hai.

Khud Imran ne bhi yahi mahsoos kiya.....ki kuchh der dekhte rahne ke baad bhi kewal apni memory ke sahare uski shakal ke baare me kuchh na bata sakega......kabhi uska upari hont ek halki curve ke sath upar uth jaata tha.....aur kabhi aisa lagta tha jaise naak ki jad se muhh tak bilkul sapaat ho.....kabhi aankhen swapnil si lagtin aur un se udaasi si jhaankne lagti.....aur kabhi aisa lagta jaise sharir ki saari shakti aankhon me utar aayi ho. na jaane kyon un badalti huyi awastha ka prabhaav uske uski shakal aur nain-naksh par bhi padta tha.

Wo lawn par tahal rahi thi. Uske sath Jamil bhi tha. Shakil aur Jamil me bahut samaanta thi. Waise tonon ke appearance me bahut antar tha. Jamil ke chehre par gambhirta thi.....thahraav tha.....iske vipareet Shakil khilandara aur chanchal lagta tha.

"Kya main Jamil bhai se tumhara parichay karaaun?" Shakil ne Imran se puchha.

"Hargiz nahin..." Imran daant jama kar bola. "Main raqeebon se parichit hona pasand nahin karta."

"Kya matlab?"

"Main abhi aur isi samay in mahashay ko Raqeeb ghoshit karta hun......kyonki pahli hi nazar me iss Jag-maarini par aashiq ho chuka hun."

"Jag-maarini....ye kya balaa hai....?" Shakil par hansi ka dauda pad gaya.

"Jaahil ho....murkh ho....tum kya jaano. Maine Urdu-hindi ke ek romantic novel me padha tha.....aashiq apni mamnooa....arr....phir bhul gaya.....kya kahte hain....mambooha...nahin.....mahbooba ko sitamgar.....bewafa....jafa-pesha aur jag-maarini kahta hai...."

"Abbe....usay urdu me 'qattaala-e-aalam kahte hai....aashiq ke bachche...."

(......Jaari.)

*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Jemsbond
Super member
Posts: 4277
Joined: 18 Dec 2014 12:09

Re: काले चिराग -हिन्दी उपन्यास/इब्ने सफ़ी

Post by Jemsbond » 08 Dec 2017 21:50

"अर्रर.....हान्ं....यही था..." इमरान हैरत से बोला...."तुम्हें कैसे पता?"

"देखो डियर इमरान......तुम उसे उल्लू बनाया करो जो तुम्हें नहीं जानता....."

"अच्छा.....तो कोई ऐसा आदमी पकड़ लाओ.....मैं इस समय उल्लू बनाने केलिए बेचैन हूँ......जल्दी करो वरना.....मेरा नर्वस ब्रेक-डाउन हो जाएगा."

"अचानक स्टेरिटा उनकी तरफ मूडी......वो उस से थोड़ी ही दूरी पर पाम के बड़े गामलों के बीच खड़े थे. शकील को देख कर वो बड़े ही मनमोहक अंदाज़ मे मुस्काई....वो कुच्छ इस तरह उनकी तरफ बढ़ने लगी जैसे वो यूँ ही चहल-कदमी कर रही हो.

"अर्रे....बाप रे..." इमरान भयभीत स्वर मे बोला...."ये तो इसी तरफ आ रही है."

"आने दो.....मैने अक्सर महसूस किया है कि वो मुझ से कुच्छ कहना चाहती हो."

इमरान ने डार्क कलर के शीशे वाला चश्मा निकाल कर लगा लिया.

स्तरेयता उनके निकट आकर रुक गयी. उसके साथ शकील का बड़ा भाई जमील भी था.

"हेलो.....मिस्टर शकील....." रीता ने अपनी मुस्कान को कुच्छ और अधिक मनमोहक बना लिया. "आप से मुलाकात ही नहीं होती."

"यही शिकवा मुझे भी आप से है. शकील मोम के ढेर की तरह पिघल गया.

"वाहह..." वो जल्तरंग की आवाज़ पैदा करती हुई हँसी..."मैं तो यहीं रहती हूँ."

"मगर आप बहुत अधिक व्यस्त रहती हैं." शकील ने कहा.

"फिर भी मुझे आशा है कि आप से मिलना होता रहेगा."

"शुवर..." शकील मुस्कुराया.

"जमील इस बीच इमरान को घूरता रहा.....जो किसी फ़ौजी की तरह अट्टेन्स्षन की मुद्रा मे खड़ा था. लेकिन जमील ने शकील से उसके बारे मे कुच्छ नहीं पुछा. वो दोनों फिर टहलते हुए दूसरी तरफ निकल गये. इमरान वैसे ही खड़ा रहा. जब स्टेरिटा और जमील दूसरी तरफ निगाहों से ओझल हो गये तब शकील इमरान को झंझोड़ता हुआ बोला...."तुम्हें तो साँप ही सूंघ गया था."

इमरान किसी आकडी हुई लाश की तरह खड़ा रहा.

"अर्रे..." अचानक शकील बोखला कर पिछे हट गया. इमरान के काले चश्मे के नीचे मोटे मोटे आँसू धलक रहे थे इमरान की आँखें कुच्छ वीरान सी लग रही थीं.....और आँसू थमने का नाम नही ले रहे थे.....शकील एक ठहाके केलिए स्टार्ट लिया....लेकिन फिर इस तरह खामोश हो गया जैसे वो ग़लती कर रहा हो. क्योंकि इमरान की गंभीरता और आँसुओं की रवानी मे कोई अंतर नही हुआ था.

"इमरान....क्या हुआ?" शकील उसे दुबारा झंझोड़ता हुआ पुछा.

"कुच्छ नहीं..." इमरान ठंडी साँस लेकर बोला. "जब मुझे कोई शे'र याद नहीं आता तो यही हालत होती है मेरी......मैं बहुत देर से वो शे'र याद करने की कोशिश कर रहा हूँ......दीवाना बनाना है तो परवाना बना दे.....लेकिन पूरा शे'र याद नहीं आ रहा.....तुम बताओ मैं क्या करूँ? पिच्छले साल ऐसे ही एक मोका पर मुझे डबल निमोनिया हो गया था."

"क्या बक रहे हो...." शकील हंस पड़ा.

"अरे.....लानत है तुम्हारी दोस्ती पर.....मैं रो रहा हूँ और तुम हंस रहे हो?"

"क्या उस औरत ने तुम्हें रोने पर मजबूर कर दिया?'

"नहीं.....वो बेचारी क्यों....वैसे वो मुझे बहुत नेक लगती है......ये तुम्हारे भाई जमील थे?"

"तुम रो क्यों रहे थे?"

"ये मुक़द्दर की खराबी है.....मुझे एक ऐसे रक़ीब का खून करना पड़ेगा जो मेरे भाई का दोस्त....अर्रर....दोस्त का भाई है..."

"क्यों बकवास कर रहे हो." शकील बुरा सा मूह बना कर बोला.

"मैं बक रहा हूँ....?" इमरान दाँत पीस कर बोला..."क्या हक़ है तुम्हारे भाई को.....मैने इस औरत को आज से 18 साल पहले सपने मे देखा था. उसने मुझसे कहा था कि बस तुम जल्दी जवान हो जाओ.....हां फिर जब मैं जवान हुआ.....उसने एक रात फिर सपने मे आकर कहा.....अब तुम जल्दी से बूढ़े हो जाओ.....और हम दूसरी दुनिया मे मिलेंगे....स्सल्ली..........फ्रॉड कहीं की....अर्रर....हप्प्प....महबूबा को साली नहीं कहा जाता....अच्छा आप तुम मुझे अनुमति दो मैं थोड़ा सिविल-लाइन्स तक जाउन्गा."

"क्या.....लेकिन ठहरो....अब उसके भक्त-जनों को भी देखते जाओ...'

"नहीं.....क्या तुम मुझ से हज़ारो खून कराना चाहते हो?'

"क्या तुम किसी समय गंभीर नहीं हो सकते?"

"ये सवाल उस समय करना जब मैं कफ़न मे दिखाई दूं......अच्छा टाटा.....अब मैं एक घंटा बाद वापस आउन्गा."

इमरान तेज़ी से मेन गेट से निकला और कुच्छ दूर पैदल चलता रहा. फिर एक जगह टॅक्सी मिल गयी.....और वो शहर की तरफ रवाना हो गया. टेलिग्रॅफ ऑफीस के सामने उसने टॅक्सी रुकवाई और सीधा उस तरफ गया जहाँ एसटीडी कॉल की जा सकती थी. कुच्छ ही देर बाद वो अपनी मातहत जुलीना फिट्ज़वॉटर से संबोधित था.....

"जूलीया....स्पीकिंग..." दूसरी तरफ से आवाज़ आई.

"एक्स2.....फ्रॉम शादाब नगर...तुम और कॅप्टन जॅफर्री पहली अवेलबल फ्लाइट से शादाब नगर पहुचो.....तुम सब एक तरफ से निकम्मे हो.....अगर मैं इमरान पर नज़र ना रखूं तो.....वो मेरी आँखों मे भी धूल झोंक दे..."

"क्यों.....क्या हुआ सर?"

"टी3बी...."

"मैं समझी नहीं...सर"

"मैं तुम्हें डिसचार्ज कर दूँगा.... ....तुम टी3बी को नहीं जानती....? मैं फ्रॅन्स...बोहीमिया....जर्मनी की बात कर रहा हूँ..."

"ओह्ह्ह....सिररर.....मैं समझ गयी....वो यहानन्न??''

"हां यहाँ शादाब नगर मे....लेकिन तुम सब को शर्म से डूब मरना चाहिए.....तुम सब के होते हुए भी इमरान को सब से पहले उसका पता चला....और आज वो दोनों एक ही बिल्डिंग मे रह रहे हैं..."

"ओके....सर..." जूलीया की आवाज़ आई....."आपको पता है सर कि वो सर सुल्तान का चहेता है....वो उसे अक्सर हम लोगों पर वरीयता देते हैं..."

"सर सुल्तान की क्या हक़ीक़त है मेरे सामने..." इमरान एक्स2 के रूप मे गुर्राया..."जब तक मैं चाहूं वो उस पोस्ट पर रह सकते हैं.....अच्छा अब बेकार बातें बंद.....तुम तीनो जितनी जल्दी हो सके यहाँ पहुचो....प्रिन्स मे तुम्हारा रहना होगा...मैं खुद ही तुम से संपर्क करूँगा."

"शायद मैं आपको देख भी सकूँ वहाँ."

"तुम्हारी ये इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकेगी....जबकि तुमने मुझे हज़ारों बार देखा है." इमरान ने कहा और फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

(.....जारी.)


"Arrr.....haann....yahi tha..." Imran hairat se bola...."Tumhen kaise pata?"

"Dekho dear Imran......tum usay ullo banaaya karo jo tumhen nahin jaanta....."

"Achha.....to koi aisa aadmi pakad laao.....main is samay ulloo banaane keliye bechain hun......jaldi karo warna.....mera nevous break-down ho jaayega."

"Achanak Starieta unki taraf mudi......wo us se thodi hi doori par palm ke bade gamlon ke bich khade the. Shakil ko dekh kar wo bade hi manmohak andaz me muskaayi....wo kuchh is tarah unki taraf badhne lagi jaise wo yun hi chahal-kadmi kar rahi ho.

"Arre....baap re..." Imran bhaybheet swar me bola...."Ye to isi taraf aa rahi hai."

"Aane do.....maine aksar mahsoos kiya hai ki woh mujh se kuchh kahna chaahti ho."

Imran ne dark colour ke sheeshe waala chashma nikal kar laga liya.

Stareita unke nikat aakar ruk gayi. Uske sath Shakil ka bada bhai Jamil bhi tha.

"Hello.....Mr Shakil....." Reeta ne apni muskaan ko kuchh aur adhik manmohak bana liya. "Aap se mulaakat hi nahin hoti."

"Yahi shikwa mujhe bhi aap se hai. Shakil mom ke dher ki tarah pighal gaya.

"Waahh..." Wo jaltarang ki aawaz paida karti huyi hansi..."Main to yahin rahti hun."

"Magar aap bahut adhik vyast rahti hain." Shakil ne kaha.

"Phir bhi mujhe aasha hai ki aap se milna hota rahega."

"Sure..." Shakil muskuraaya.

"Jamil is bich Imran ko ghoorta raha.....jo kisi fauji ki tarah attension ki mudra me khada tha. Lekin Jamil ne Shakil se uske baare me kuchh nahin puchha. Wo donon phir tahalte huye dusri taraf nikal gaye. Imran waise hi khada raha. Jab Starieta aur Jamil dusri taraf nigaahon se ojhal ho gaye tab Shakil Imran ko jhanjhodta hua bola...."Tumhen to saanp hi soongh gaya tha."

Imran kisi akdi huyi laash ki tarah khada raha.

"Arre..." Achanak Shakil bokhla kar pichhe hat gaya. Imran ke kaale chashme ke niche mote mote aansu dhalak rahemran ki aankhen kuchh weeran si lag rahi thin.....aur aansu thamne ka naam nahi le rahe the.....Shakil ek thahaaka keliye start liya....lekin phir is tarah khamosh ho gaya jaise wo galti kar raha ho. Kyonki Imran ki gambhirta aur aansuon ki rawaani me koi antar nahi hua tha.

"Imran....kya hua?" Shakil usay dubaara jhanjhodta hua puchha.

"Kuchh nahin..." Imran thandi saans lekar bola. "Jab mujhe koi she'r yaad nahin aata to yahi haalat hoti hai meri......main bahut der se wo she'r yaad karne ki koshish kar raha hun......Diwaana banana hai to parwaana bana de.....lekin pura she'r yaad nahin aa raha.....tum bataao main kya karun? Pichhle saal aise hi ek moka par mujhe double nimonia ho gaya tha."

"Kya bak rahe ho...." Shakil hans pada.

"Aray.....laanat hai tumhari dosti par.....main ro raha hun aur tum hans rahe ho?"

"Kya us aurat ne tumhen rone par majboor kar diya?'

"Nahin.....wo bechari kyon....waise wo mujhe bahut nek lagti hai......ye tumhare bhai Jamil the?"

"Tum ro kyon rahe the?"

"Ye muqaddar ki kharabi hai.....mujhe ek aise raqeeb ka khoon karna padega jo mere bhai ka dost....arrr....dost ka bhai hai..."

"Kyon bakwas kar rahe ho." Shakil bura sa muh bana kar bola.

"Main bak raha hun....?" Imran daant pees kar bola..."Kya haq hai tumhare bhai ko.....maine is aurat ko aaj se 18 saal pahle sapne me dekha tha. Usne mujhse kaha tha ki bas tum jaldi jawan ho jaao.....haan phir jab main jawaan hua.....usne ek raat phir sapne me aakar kaha.....ab tum jaldi se budhe ho jaao.....aur ham dusri duniya me milenge....ssalli..........frod kahin ki....arrr....hppp....mahbuba ko saali nahin kaha jaata....achha ap tum mujhe anumati do main thoda civil-lines tak jaaunga."

"Kyaa.....lekin thahro....ab uske bhakt-janon ko bhi dekhte jaao...'

"Nahin.....kya tum mujh se hazaaro khoon karana chaahte ho?'

"Kya tum kisi samay gambhir nahin ho sakte?"

"Ye sawaal us samay karna jab main kafan me dikhayi dun......achha tata.....ab main ek ghanta baad waapas aaunga."

Imran tezi se main gate se nikla aur kuchh door paidal chalta raha. Phir ek jagah taxi mil gayi.....aur wo shahar ki taraf rawaana ho gaya. Telegraph office ke saamne usne taxi rukwaayi aur sidha us taraf gaya jahaan std call ki jaa sakti thi. Kuchh hi der baad wo apni maatahat Juliana Fitzwater se sambodhit tha.....

"Julia....speaking..." dusri taraf se aawaz aayi.

"X2.....from Shadab Nagar...tum aur captain Jaffery pahli available flight se Shadab Nagar pahucho.....tum sab ek taraf se nikamme ho.....agar main Imran par nazar na rakhun to.....wo meri aankhon me bhi dhool jhonk de..."

"Kyon.....kya hua sir?"

"T3B...."

"Main samjhi nahin...sir"

"Main tumhen discharge kar doonga.... ....tum T3B ko nahin jaanti....? Main France...Bohemia....Germany ki baat kar raha hun..."

"Ohhh....sirrr.....main samajh gayi....wo yahaannn??''

"Haan yahan Shadab Nagar me....lekin tum sab ko sharm se doob marna chahiye.....tum sab ke hote huye bhi Imran ko sab se pahle uska pata chala....aur aaj wo donon ek hi building me rah rahe hain..."

"OK....sir..." Julia ki awaaz aayi....."Aapko pata hai sir ki wo Sir Sultan ka chaheta hai....wo usay aksar ham logon par wariyata dete hain..."

"Sir Sultan ki kya haqiqat hai mere saamne..." Imran X2 ke roop me gurraaya..."Jab tak main chahun wo us post par rah sakte hain.....achha ab bekaar baaten band.....tum tonon jitni jaldi ho sake yahaan pahucho....Prince me tumhara rahna hoga...main khud hi tum se sampark karunga."

"Shayad main aapko dekh bhi sakun wahaan."

"Tumhari ye ichha kabhi poori nahin ho sakegi....jabki tumne mujhe hazaaron baar dekha hai." Imran ne kaha aur phone disconnect kar diya.

(.....Jaari.)

*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Post Reply