अंध विश्वास

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Jemsbond
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अंध विश्वास

Post by Jemsbond » 09 Feb 2015 19:15

अंध विश्वास
रात का अंधेरा गहराता जा रहा था. समय करीब 11:30 रहा होगा जब वो अपने घर से निकली थी. चारो तरफ सन्नाटा फैला हुया था. बस हवाओ और पेड़ के पत्तों की आवाज़ ही इस सन्नाटे को भंग कर रहे थे. कभी कभी कुत्तों के भोंकने की आवाज़ भी सुनाई पड़ जाती थी लेकिन वो छनिक मात्र थी.

वो पैदल ही सबसे छुपते छुपाते शमशान की ओर जा रही थी. और कोई होता तो उसे इतनी रात को शमशान जाने के नाम से हार्ट अटॅक हो जाता, लेकिन जाने वो किस मिट्टी की बनी थी उसे भूत प्रेतों का ज़रा भी भय नहीं था. वो तो बस अपने किसी उद्देश्य के लिए जैसे सर पर कफ़न बाँध कर चली जा रही थी. हाथों में अपने पति की तस्वीर और कुछ पूजा का सामान लिए वो धीरे धीरे बिना डरे शमशान वाले रास्ते पर बढ़ रही थी. डर था तो केवल इतना की कहीं उसे कोई देख ना ले और उसकी पूजा भंग ना हो जाए जिसके लिए उसे पूरे 10 दिन अमावस्या तक इंतजार करना पड़ा.

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10 दिन पहले

रूपा एक बेहद खूबसूरत कोई 25 साल की नवयुवना थी जिसकी चाह हर किसी के मन में होती है. उसका पति रमेश खेतों में मज़दूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट पालता था. दोनो का एक सुंदर सा बेटा भी था जिसे दोनो ही बहुत प्यार करते थे. एक कारण ये भी था कि इस बच्चे का जनम ऑपरेशन से शहर में हुया था जिसका खर्चा खेत के मालिक ने दिया था और वो क़र्ज़ धीरे धीरे रमेश चुका रहा था. इस ऑपरेशन के बाद अब रूपा कोई बच्चा नहीं जन सकती थी तो बस वोही एक उनकी आँख का तारा था जिसे दोनो बेहद प्यार करते थे.

रमेश रोज़ सुबह नाश्ता करके काम पर चला जाता और शाम को घर आ जाता. दोपहर का खाना वो घर से लेकर जाता था क्यूंकी खेत घर से दूर थे. खेत का मालिक भी बहुत अच्छा इंसान था जो समय समय पर रमेश की मदद कर देता था. उनकी जिंदगी बढ़िया चल रही थी लेकिन कब किस की नज़र लग जाए कोई नहीं कह सकता.

ऐसे ही एक दिन अचानक जब रमेश खेत में काम कर रहा था तो अचानक वो बेहोश हो कर गिर पड़ा. उसके साथ काम करने वाले दूसरे मजदूरों ने उसे उठाया और पास ही एक पेड़ के नीचे लिटा दिया. उसको ठंडे पानी के छींटे मारके उठाया गया और शायद ये उन लोगों के लिए नुक़सानदायक ही हुआ. रमेश होश में आते ही पागलों जैसी हरकत करने लगा. बिना मतलब चिल्लाना, हाथ पैर चलाना, गालियाँ बकना उसने शुरू कर दिया.

पहले तो सब लोग कुछ समझ नहीं पाए लेकिन बाद में उन्हें लगा कि कहीं इस पर कोई भूत प्रेत का साया आ गया है जो ये इस तरह की हरकत कर रहा है. किसी तरह उन लोगों ने रमेश के हाथ पैर बाँध दिए और उसे उसके घर पहुँचा दिया. जल्दी ही ये खबर पूरे गाओं में आग की तरह फैल गयी. सब भौंचक्के से रमेश को देख रहे थे. रमेश उठता, चीखता चिल्लाता और फिर बेहोश हो जाता. रूपा की तो जैसे जान ही निकल गयी थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे. किसी ने भी ये ध्यान नहीं दिया कि रमेश दो दिन से बुखार में था और आज बुखार इतना तेज हो गया था कि उसके दिमाग़ में चढ़ गया था. सब इसे भूत प्रेत का मामला समझ रहे थे और यही समझ रहे थे कि भूत प्रेत की वजह से ही रमेश का बदप तप रहा है.

रूपा बस रोए जा रही थी. किसी तरह गाओं की औरतों ने उसे संभाला. गाओं के एक आदमी ने जाकर पास के शमशान से बाबा गोरखनाथ को बुलाने भेज दिया जो भूत प्रेत को अपने वश में करके की विद्या जानते थे. थोड़ी ही देर में वो आदमी उन बाबा को लेकर आ गया. लंबे घुँगराले बाल, बड़ी बड़ी लाल आँखें, गले में नर मुंडों की माला, एक हाथ में खोपड़ी तो दूसरे में एक मोर पंख की झाड़ू, कंधे पर एक बड़ा सा झोला जिसमे जाने क्या क्या रखा था. एक बार तो सब उन्हें देख कर डर गये लेकिन फिर हिम्मत करके उन्होने अपनी दुविधा सामने रखी.

बाबा ने रमेश की नाडी को देखा और जल्दी ही वो असली बात भाँप गये. लेकिन उनके मन में पाप आ गया और उन्हें अपनी काली विद्या की पूजा के लिए एक साधन मिल गया. उन्होने रूपा से एकांत में बात करनी चाही जिसके लिए गाओं वाले तय्यार हो गये. बाबा रूपा को सबसे थोड़ा सा दूर ले गये और कहा “बेटी, तुम्हारे पति पर बहुत बड़े भूत का साया है जो हर क्षण तुम्हारे पति के शरीर को कमजोर किए जा रहा है. जल्दी ही उपाय नहीं किया गया तो उसकी जान को ख़तरा हो सकता है.”

“बाबा आप कृपया करके मेरे पति को बचा लीजिए. जो भी पूजा करनी है आप करिए. जितना भी पैसा लगेगा मैं अपनी तरफ से भरने की पूरी कोशिश करूँगी.”

“बेटा पैसा तो कुछ खास नहीं लगेगा लेकिन एक काम है जो तुम शायद ना कर सको”

“बाबा आप बताइए ऐसा क्या काम है. मैं अपने पति की जान बचाने के लिए सब कुछ कर सकती हूँ”

“बेटा तुम्हे अमावस्या वाले दिन रात को 12 बजे शमशान पहुचना होगा क्यूंकी उसी दिन राक्षसी ताकतें बाहर निकलती हैं तो उनको आसानी से वश में किया जा सकता है. हां और तुम्हे सबसे छुपते छुपाते आना होगा वरना ये पूजा भंग हो जाएगी”

“मैं आ जाउन्गि बाबा. आप के बताए अनुसार 12 बजे बगैर किसी की नज़र में आए में शमशान पहुँच जाउन्गि”

“लेकिन एक दिक्कत है बेटी, हमे इस पूजा में एक बलि देनी होगी”

“कोई बात नहीं बाबा, मेरे पास मुर्गा है बाडे में. मैं वो लेती आउन्गि”

“नहीं बेटी हमे पशु बलि नहीं नर बलि चाहिए”

“क्या! बाबा ये आप क्या कह रहे हैं. मैं किसी की जान कैसे ले सकती हूँ. ये मुझसे नहीं होगा”

“तो फिर तुम्हारे पति को भी में नहीं बचा सकता”

रूपा की रुलाई फुट पड़ी. बाबा को शायद उस पर तरस आ गया तो उसने कहा “चिंता मत करो बेटी, बलि का इंतजाम में कर दूँगा तुम बस ये बात किसी को मत बताना इसे राज़ ही रखना”

“जैसा आप ठीक समझे बाबा”

इसके बाद बाबा अपने शमशान में चले गये और रूपा ने लोगों के पूछने पर सिर्फ़ यही बताया कि बाबा ने कोई पूजा करने को कहा है मुझे जिससे ये ठीक हो जाएँगे.

सब उसकी बात पर विश्वास करके वहाँ से चले गये. सिवाय भोला के जो काफ़ी देर से इनकी बातें सुनने की कोशिश कर रहा था लेकिन ठीक से कुछ सुन नहीं पाया केवल अमावस्या की रात का जिकर ही सुन पाया.

धीरे धीरे दिन बीतते गये और रमेश की हालत में भी सुधार आता गया. ये सुधार अच्छे ख़ान पान, पूरे आराम और रूपा की देखभाल की वजह से आया था लेकिन रूपा को तो अब भी डर था कि कहीं फिर से भूत कब्जा ना कर ले तो उसने पूजा करने की ठान ली. और वो दिन भी आ ही गया जिसका उसे इंतजार था. रात 11 बजे उसकी नींद खुली तो देखा कि उसका पति और उसका बच्चा दोनो सो रहे हैं तो वो दबे पैर वहाँ से निकल गयी.

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Re: अंध विश्वास

Post by Jemsbond » 09 Feb 2015 19:15


अमावस्या वाले दिन

करीब 11:50 पर वो शमशान पहुँच गयी जहाँ बाबा उसका इंतेजार कर रहे थे. वहाँ पहुँच कर उसने वो सामान बाबा के पास रख दिया जो बाबा ने उसे लाने को बोला था. इतने में पूरे 12 बाज गये तो बाबा ने पूजा शुरू की. पहले एक धुनि रमाई और हवन कुंड जैसा बना कर उसमे आग लगाई. फिर कुछ बीज उस आग में डालके कुछ मन्त्र पढ़ने लगा. अब तो रूपा को भी एक अंजाने डर ने आ घेरा था. उसने हिचकिचाते हुए बाबा से उस बलि के बारे में पूछा तो बाबा सिर्फ़ मुस्कुरा दिए और फिर गंभीर होते हुए कहा “उसका इंतज़ाम करने के लिए हमारा शिश्य गया हुआ है जो किसी भी क्षण आता होगा”

इसके बाद वही कुछ बीज झोंकने और मन्त्र पढ़ने का सिलसिला चलता रहा. रात ने अपना भयावह रूप धारण कर लिया था. अजीब अजीब आवाज़ें आ रही थी जो रूपा ने आज तक नहीं सुनी थी. बाबा की आँखें भी लाल होती जा रही थी जिसे देखकर रूपा की अंतरात्मा तक हिल गयी थी. कुछ देर बाद जब बाबा का शिष्य आया तो उसके हाथ में एक छोटा सा थैला था जिसमे से खून टपक रहा था. रूपा को तो ये देखकर उल्टी आने लगी थी. लेकिन उसने अपनी नज़रें वहाँ से हटा कर खुद को संभालने की कोशिश करी.

बाबा ने लाश का सर झोले में से निकाला और अपने सामने रखकर उस पर कुछ बीज डाले और मन्त्र पढ़ने लगा. फिर उसने रूपा को कहा “बेटी इस सर को अपने हाथों से अग्नि कुंड में अर्पित करो तभी तुम्हारे पति के शरीर से भूत प्रेत जाएँगे”

डरते डरते रूपा ने वो सर अपने हाथ में लिया और जैसे ही उसका सर अपनी तरफ घुमाया उसके गले से एक जोरदार चीख निकली और वो बेहोश हो गयी.

जब उसे होश आया तो उसने देखा कि वो अपने घर में बिस्तर पर लेटी हुई है और उसके पास उसका पति और गाओं का ही एक आदमी यानी भोला खड़े हैं.

रूपा अपने पति को देखते ही उसके सीने से लिपट गयी और रोने लगी. “मुझे माफ़ कर दो. मैने अपने ही हाथों से अपने लाड़ले का खून कर दिया”

रमेश ने उसे किसी तरह चुप कराया और बताया “नहीं ग़लती मेरी भी है. मुझे दो दिन से बुखार था लेकिन मैने इसे हल्के में ले लिया कि अपने आप ही ठीक हो जाएगा. उस दिन धूप भी ज़्यादा थी और काम भी. बस बुखार दिमाग़ में चढ़ गया और उसे तुम लोगों ने भूत प्रेत का साया मान लिया”

रमेश ने आगे रोते हुए बताया “वो बुखार भी तुम्हारे प्यार और देखभाल से जल्दी ही ठीक हो गया. मुझे तो इन सब के बारे में पता भी नहीं चलता अगर भोला मुझे नहीं बताता. लेकिन मैं अपने बच्चे को नहीं बचा पाया. रात को वो बाथरूम करने घर के बाहर नाली पे गया उसके बाद मैने उसकी लाश ही देखी वहाँ पर जिसका सर कटा हुया था”

“मेरी तो हालत ही खराब हो गयी थी. मैने सब गाओं वालों को बुलाया तब मुझे भोला ने बताया तुम्हारे और बाबा के बीच कुछ बातें हुई हैं. मैं और गाओं वाले भाग कर शमशान पहुँचे तो वहाँ तुम बेहोश पड़ी थी और वो ढोंगी बाबा आँखें बंद करके कुछ का कुछ बक रहा था. हमे देख कर वो भागने लगा तो गाओं वालों ने उसे और उसके साथी को घेरकर पीट पीट कर मार डाला”

रूपा और रमेश दोनो की आँखों में आँसू थे. एक अंधविश्वास के कारण उनके लखते जिगर की जान चली गयी थी. उनकी दुनिया उजड़ गयी थी.
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Re: अंध विश्वास

Post by Jemsbond » 09 Feb 2015 19:16

Andh Vishwaas
Raat ka andhera gehrata jaa raha tha. Samay kareeb 11:30 raha hoga jab wo apne ghar se nikli thi. Charo taraf sannata faila huya tha. Bas hawayon aur ped ke patton ki awaaz hi is sannate ko bhang kar rahe the. Kabhi kabhi kutton ke bhonkne ki awaaz bhi sunai pad jaati thi lekin wo chanik matra thi.

Wo paidal hi sabse chupte chupate shamshaan ki aur jaa rahi thi. Aur koi hota to use itni raat ko shamshaan jaane ke naam se heart attack ho jaata, lekin jaane wo kis mitti ki bani thi use bhoot preton ka jara bhi bhay nahin tha. Wo to bas apne kisi uddesya ke liye jaise sar par kafan baandh kar chali jaa rahi thi. Haathon mein apne pati ki tasveer aur kuch pooja ka saaman liye wo dheere dheere bina dare shamshaan wale raaste par badh rahi thi. Dar tha to kewal itna ki kahin use koi dekh na le aur uski pooja bhang na ho jaye jiske liye use poore 10 din amavasya tak intejar karna pada.

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10 Din Pehle

Roopa ek behad khubsurat koi 25 saal ki navyuvna thi jiski chah har kisi ke man mein hoti hai. Uska pati Ramesh kheton mein majdoori karke apna aur apne pariwaar ka pet paalta tha. Dono ka ek sunder sa beta bhi tha jise dono hi bahut pyaar karte the. Ek kaaran ye bhi tha ki is bacche ka janam operation se shehar mein huya tha jiska kharcha khte ke maalik ne diya tha aur wo karz dheere dheere Ramesh chukka raha tha. Is operation ke baad ab Roopa koi baccha nahin jan sakti thi to bas wohi ek unki aankh ka taara tha jise dono behad pyaar karte the.

Ramesh roz subah naasta karke kaam par chala jaata aur shaam ko ghar aa jata. Dopahar ka khana wo ghar se lekar jaata tha kyunki khet ghar se door the. Khet ka maalik bhi bahut achha insaan tha jo samay samay par Ramesh ki madad kar deta tha. Unki jindagi badhiya chal rahi thi lekin kab kis ki najar lag jaye koi nahin keh sakta.

Aise hi ek din achanak jab Ramesh khet mein kaam kar raha tha to achanak wo behosh ho kar gir pada. Uske saath kaam karne waale doosre majdooron ne use uthaya aur paas hi ek ped ke neeche lita diya. Usko thande paani ke cheente maarke uthaya gaya aur shayad ye un logon ke liye nuksaandayak hi hua. Ramesh hosh mein aate hi pagalon jaisi harkat karne laga. Bina matlab chillana, haath pair chalana, galiyan bakna usne shuru kar diya.

Pehle to sab log kuch samajh nahin paaye lekin baad mein unhen laga ki kahin is par koi bhoot prêt ka saaya aa gaya hai jo ye is tarah ki harkat kar raha hai. Kisi tarah un logon ne Ramesh ke haath pair baandh diye aur use uske ghar pahuncha diya. Jaldi hi ye khabar poore gaon mein aag ki tarah fail gayi. Sab bhaunchakke se Ramesh ko dekh rahe the. Ramesh uththa, cheekta chillata aur fir behosh ho jaata. Roopa ki to jaise jaan hi nikal gayi thi. Use samajh nahin aa raha tha ki wo kya kare. Kisi ne bhi ye dhyaan nahin diya ki Ramesh do din se bukhar mein tha aur aaj bukhar itna tej ho gaya tha ki uske dimaag mein chad gaya tha. Sab ise bhoot prêt ka maamla samajh rahe the aur yahi samajh rahe the ki bhoot prêt ki wajah se hi Ramesh ka badap tap raha hai.

Roopa bas roye jaa rahi thi. Kisi tarah gaon ki aurton ne use sambhala. Gaon ke ek aadmi ne jaakar paas ke shamshaan se baba Gorkhnath ko bulane bhej diya jo bhoot prêt ko apne vash mein karke ki vidhya jaante the. Thodi hi der mein wo aadmi un baba ko lekar aa gaya. Lambe ghungrale baal, badi badi lal aankhen, gale mein nar mundon ki mala, ek haath mein khopdi to doosre mein ek mor pankh ki jhadu, kandhe par ek bada sa jhola jisme jaane kya kya rakha tha. Ek baar to sab unhen dekh kar dar gaye lekin fir himmat karke unhone apni duvidha saamne rakhi.

Baba ne Ramesh ki nadi ko dekha aur jaldi hi wo asli baat bhaanp gaye. Lekin unke man mein paap aa gaya aur unhen apni kaali vidhya ki pooja ke liye ek saadhan mil gaya. Unhone Roopa se ekant mein baat karni chahi jiske liye gaon wale tayyar ho gaye. Baba Roopa ko sabse thoda sa door le gaye aur kaha “Beti, tumhare pati par bahut bade bhoot ka saaya hai jo har shan tumhare pati ke shareer ko kamjor kiye jaa raha hai. Jaldi hi upay nahin kiya gaya to uski jaan ko khatra ho sakta hai.”

“Baba aap kripya karke mere pati ko bacha lijiye. Jo bhi pooja karni hai aap kariye. Jitna bhi paisa lagega main apni taraf se bharne ki poori koshish karungi.”

“Beta paisa to kuch khas nahin lagega lekin ek kaam hai jo tum shayad na kar sako”

“Baba aap bataiye aisa kya kaam hai. Main apne pati ki jaan bachane ke liye sab kuch kar sakti hoon”

“Beta tumhe amavasya wale din raat ko 12 baje shamshaan pahuchna hoga kyunki usi din rakshi taaktein bahar nikalti hain to unko asaani se vash mein kiya jaa sakta hai. Haan aur tumhe sabse chupte chupate aana hoga varna ye pooja bhang ho jayegi”

“Main aa jaungi baba. Aap ke bataye anusar 12 baje bagair kisi ki najar mein aaye mein shamshaan pahunch jaungi”

“Lekin ek dikkat hai beti, humein is pooja mein ek bali deni hogi”

“Koi baat nahin baba, mere paas murga hai bade mein. Main wo leti aaungi”

“Nahin beti humein pashu bali nahin nar bali chahiye”

“Kya! Baba ye aap kya keh rahe hain. Main kisi ki jaan kaise le sakti hoon. Ye mujhse nahin hoga”

“To fir tumhare pati ko bhi mein nahin bacha sakta”

Roopa ki rulayi foot padi. Baba ko shayad us par taras aa gaya to usne kaha “Chinta mat karo beti, bali ka intejaam mein kar dunga tum bas ye baat kisi ko mat batana ise raaz hi rakhna”

“Jaisa aap theek samjhe baba”

iske baad baba apne shamshaan mein chale gaye aur Roopa ne logon ke poochne par sirf yahi bataya ki baba ne koi pooja karne ko kaha hai mujhe jisse ye theek ho jayenge.

Sab uski baat par vishwaas karke wahan se chale gaye. Siway bhola ke jo kaafi der se inki baatein sunne ki koshish kar raha tha lekin theek se kuch sun nahin paya kewal amavasya ki raat ka jikar hi sun paaya.

Dheere dheere din beette gaye aur Ramesh ki haalat mein bhi sudhar aata gaya. Ye sudhar ache khan pan, poore aaram aur Roopa ki dekhbhal ki wajah se aaya tha lekin Roopa ko to ab bhi dar tha ki kahin fir se bhoot kabja na kar le to usne pooja karne ki than li. Aur wo din bhi aa hi gaya jiska use intejar tha. Raat 11 baje uski neend khuli to dekha ki uska pati aur uska bachha dono so rahe hain to wo dabe pair wahan se nikal gayi.

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Amavasya wale din

Kareeb 11:50 par wo shamshaan pahunch gayi jahan baba uska intejaar kar rahe the. Wahan pahunch kar usne wo saaman baba ke paas rakh diya jo baba ne use lane ko bola tha. Itne mein poore 12 baj gaye to baba ne pooja shuru ki. Pehle ek dhuni ramayi aur hawan kund jaisa bana kar usme aag lagayi. Fir kuch beej us aag mein daalke kuch mantra padhne laga. Ab to Roopa ko bhi ek anjaane dar ne aa ghera tha. Usne hichkichate huye baba se us bali ke bare mein pucha to baba sirf muskura diye aur fir ghambheer hote huye kaha “Uska intejaam karne ke liye hamara shishya gaya hua hai jo kisi bhi shan aata hoga”

Iske baad wahi kuch beej jhonkne aur mantra padhne ka silsila chalta raha. Raat ne apna bhayavah roop dharan kar liya tha. Ajeeb ajeeb awaazein aa rahi thi jo Roopa ne aaj tak nahin suni thi. Baba ki aankhen bhi lal hoti jaa rahi thi jise dekhkar Roopa ki antaratma tak hil gayi thi. Kuch der baad jab baba ka shishya aaya to uske haath mein ek chota sa thaila tha jisme se khoon tapak raha tha. Roopa ko to ye dekhkar ulti aane lagi thi. Lekin usne apni najrein wahan se hata kar khud ko sambhalne ki koshish kari.

Baba ne laash ka sar jhole mein se nikala aur apne saamne rakhkar us par kuch beej dale aur mantra padhne laga. Fir usne Roopa ko kaha “Beti is sar ko apne haathon se agni kund mein arpit karo tabhi tumhare pati ke shareer se bhoot prêt jayenge”

Darte darte Roopa ne wo sar apne haath mein liya aur jaise hi uska sar apni taraf ghumaya uske gale se ek jordaar cheekh nikli aur wo behosh ho gayi.

Jab use hosh aaya to usne dekha ki wo apne ghar mein bistar par leti huyi hai aur uske paas uska pati aur gaon ka hi ek aadmi yaani bhola khade hain.

Roopa apne pati ko dekhte hi uske seene se lipat gayi aur rone lagi. “Mujhe maaf kar do. Maine apne hi haathon se apne ladle ka khoon kar diya”

Ramesh ne use kisi tarah chup karaya aur bataya “nahin galti meri bhi hai. Mujhe do din se bukhar tha lekin maine ise halke mein le liya ki apne aap hi theek ho jayega. Us din dhoop bhi jyada thi aur kaam bhi. Bas bukhar dimaag mein chad gaya aur use tum logon ne bhoot prêt ka saaya maan liya”

Ramesh ne aage rote huye bataya “Wo bukhar bhi tumhare pyaar aur dekhbhal se jaldi hi theek ho gaya. Mujhe to in sab ke bare mein pata bhi nahin chalta agar bhola mujhe nahin batata. Lekin main apne bacche ko nahin bacha paya. Raat ko wo bathroom karne ghar ke bahar naali pe gaya uske baad maine uski laash hi dekhi wahan par jiska sar kata huya tha”

“Meri to haalat hi kharab ho gayi thi. Maine sab gaon walon ko bulaya tab mujhe bhola ne bataya tumhare aur baba ke beech kuch baatein huyi hain. Main aur gaon wale bhaag kar shamshaan pahunche to wahan tum behosh padi thi aur wo dhongi baba aankhen band karke kuch ka kuch bak raha tha. Humein dekh kar wo bhagne laga to gaon walon ne use aur uske saathi ko gherkar peet peet kar maar dala”

Roopa aur Ramesh dono ki aankhon mein aansu the. Ek andhvishwaas ke kaaran unke lakhte jigar ki jaan chali gayi thi. Unki duniya ujad gayi thi.
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Re: अंध विश्वास

Post by shubhs » 10 Sep 2017 22:25

बेकार सी कहानी
सबका साथ सबका विकास।
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, और इसका सम्मान हमारा कर्तव्य है।

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