हीरों का फरेब कॉम्प्लीट हिन्दी नॉवल

Jemsbond
Super member
Posts: 4044
Joined: 18 Dec 2014 12:09
Contact:

हीरों का फरेब कॉम्प्लीट हिन्दी नॉवल

Postby Jemsbond » 16 Nov 2015 20:53

हीरों का फरेब:

इमरान ने कार रोक दी. दूसरी कार ने कुच्छ इसी तरह रास्ता रोक रखा था कि उसके अलावा और कोई चारा ही नहीं था. जोसेफ ने पिच्छली सीट से किसी बुड्ढे सारस की तरह गर्दन उठाई और वाइंड स्क्रीन से बाहर देखने लगा.
गाड़ी सड़क पर तिर्छि खड़ी थी और कोई उसके नीचे चित लेटा हुआ शायद अचानक आ गयी खराबी को दूर करने की कोशिश कर रहा था. उसकी टाँगें दिखाई दे रही थी.

इमरान ने शायद नीचे उतरने ही के इरादे से खिड़की पर हाथ रखा था कि अचानक जोसेफ भर्रायि हुई आवाज़ मे बोला....."खबरदार बॉस......टाँगें देख कर....."

इमरान ने पलट कर उल्लुओं की तरह आँखे नचाई और जोसेफ हकलाया...."म्म....मतलब की................देखो ना बॉस......पैरों मे हाइ हील वाले सॅंडल हैं."

"हुआ करें...." इमरान लापरवाही से कंधे उचकाते हुए बोला...."नीली पॅंट्स भी तो है....गालों पर दाढ़ी भी ज़रूर होगी...."

"बॉस......फॉर गॉड सेक.....हाइ हील...."

"मूह बंद कर...." उसने थप्पड़ मारने वाले ढंग से हाथ चलाया और जोसेफ बोखला कर एक तरफ हट गया.

अब इमरान अपनी कार से उतर कर दूसरी गाड़ी की तरफ बढ़ रहा था. गाड़ी अधिक दूर भी नहीं थी. नीले पॅंट्स वाली टाँगों मे हरकत हुई.....और फिर पूरा शरीर गाड़ी के नीचे से निकल आया.

ये एक लड़की थी. उमर 20 और 25 के बीच रही होगी. अच्छी शकल भी थी.....और तंदुरुस्त भी. ब्राउन जॅकेट और ब्लू पॅंट्स मे अच्छी जच रही थी.

"गाड़ी ग़लत खड़ी की है मैने...." उसने मुस्कुराकर बिंदास ढंग से कहा.

इमरान के चेहरे पर पूरी मूर्खता छायि हुई थी. उसने बोखलाए हुए ढंग से उत्तर दिया...."ज्ज...जी नहीं....एकदम नहीं.....बिल्कुल नहीं......"

"केवल इसलिए ये ग़लती की थी........कि कोई शरीफ आदमी अपनी कार रोक कर मेरी मदद करे...."

"ज़रूर करेगा......ज़रूर करेगा....."

"तो फिर कीजिए मदद.....मैं होलिडे कॅंप जा रही थी. यहाँ ये मुसीबत आ पड़ी. समझ मे नहीं आता क्या करूँ."

"ओह्हो...." इमरान खुश हो कर बोला. "वहीं तो मुझे भी जाना है...." लेकिन फिर उस ने मूह लटका लिया.....ऐसा लग रहा था जैसे अचानक कयि समस्याएँ आ पड़ी हों.

"क्या सोचने लगे आप....?" लड़की कुच्छ देर बाद बोली.

"किसी दूसरे शरीफ आदमी का इंतेज़ार करना पड़ेगा...." उस ने ठंडी साँस लेकर कहा.

"क्यों?"

"एक से दो शरीफ भले होते हैं....हो सकता है वो कोई अच्छा सजेशन दे सके. मेरी समझ मे तो नहीं आता कि क्या करना चाहिए...."

"थोड़ा एंजिन देख लीजिए...."

इमरान ने तेज़ी से आगे बढ़ कर बोनट उठाया और एंजिन पर सरसरी नज़र डाल कर बोला. "ठीक तो है."

"क्या ठीक है?"

"एंजिन...."
"कमाल करते हैं आप भी....फिर स्टार्ट क्यों नहीं होती..."

"पता नहीं आप क्या चाहती हैं...." इमरान अपने चेहरे पर उलझन के भाव पैदा करके बोला.

"माइ गॉड्ड...." वो उसे घूरती हुई बोली......"इतनी सी बात आपकी समझ मे नहीं आई? अरे मैं

अपनी कार सहित होलिडे कॅंप जाना चाहती हूँ. वहाँ एक गेरेज़ भी है.....गाड़ी की मरम्मत हो

सकेगी."

"उफ्फॉ....तो पहले क्यों नहीं बताया था?" इमरान ने कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया.

ये इमरान की गाड़ी थी इसलिए उसमे तरह तरह के जुगाड़ की चीज़ें होनी ही थीं. ये उसके पेशे मे आने

वाली चीज़ें थीं. लेकिन रस्सी?

उसका ये सफ़र केवल एंटरटेनमेंट केलिए था. कुच्छ दिन सकून से गुज़ारने केलिए होलिडे कॅंप जा

रहा था. इसलिए रस्सी साथ लिए फिरने का सवाल कहाँ था. लेकिन उसने गाड़ी की डिकी से काफ़ी

मज़बूत रस्सी का एक लच्छा निकाला. हो सकता है कभी किसी ज़रूरत केलिए वहाँ डाला गया हो जो

आज तक पड़ा रह गया हो.

एनीवे.....उसके हाथ मे रस्सी का लच्छा देख कर लड़की का चेहरा चमक उठा.

"जोसेफ...." इमरान रस्सी हिलाता हुआ बोला....."नीचे आओ..."

जोसेफ गाड़ी से उतर आया लेकिन उसके ढंग से नहीं लगता था कि उसे इमरान का ये रवैया पसंद आया

हो.

"बॉस.....धोका भी हो सकता है." उसने धीरे से कहा.

"चलो..." इमरान उसे धक्का देकर आगे बढ़ाता हुआ बोला और लड़की को इशारा किया कि वो अपनी गाड़ी

मे बैठ जाए. लड़की ने अंदर बैठ कर स्टेरिंग संभाल लिया.

फिर उस समय तक खामोश बैठी रही जब तक इमरान उसकी कार के अगले हिस्से मे रस्सी के फंदे डालता

रहा. लेकिन जैसे ही दूसरा सिरा जोसेफ की कमर से लपेटने लगा वो बोखला कर बोली...."अर्रे अर्रे.....ये

क्या?"

साथ ही जोसेफ ने भी भर्रायि हुई आवाज़ मे कहा...."ये क्या कर रहे हो बॉस....?"

लेकिन इमरान ने किसी को भी उत्तर दिए बिना गिरह लगा दी और फिर जोसेफ के कंधे थपकता हुआ

बोला...."होलिडे कॅंप......सरपट...."

"ये क्या कर रहे हैं आप?" लड़की झुंजला कर गाड़ी से उतर आई.

"निश्चिंत रहिए...." इमरान मूर्खों की तरह बोला..."बहुत होशियार है.....मूह से एंजिन की आवाज़

भी निकालेगा और हॉर्न भी देगा......बस आप स्टेरिंग संभाले रहिए...."

"ये नामुमकिन है बॉस...." जोसेफ ने क्रोध भरे स्वर मे कहा...."कोई औरत मुझे ड्राइव नहीं कर

सकती..."

"क्यों शामत आई है? अगर मुझे गुस्सा आ गया तो तुम्हें मक्खियाँ और चीटी भी ड्राइव

करेंगी...."

"आप अजीब आदमी हैं...." लड़की गर्दन झटक कर बोली...."अरे रस्सी का दूसरा सिरा अपनी गाड़ी मे

क्यों नहीं बाँध लेते?"

इमरान ने आँखें निकालीं. फिर किसी सोच मे पड़ गया. फिर चिंतित स्वर मे बोला...."मगर ये कैसे

संभव है.....मेरी गाड़ी आप की गाड़ी के पिछे है. इस तरह तो हम फिर शहर ही वापस पहुच

जाएँगे. क्यों जोसेफ....?"

"मैं कुच्छ नहीं जानता...." जोसेफ गुर्राया...."मेरी बुद्धि का सत्यानाश होकर रह गया है. कोई

ढंग की बात नहीं सोच सकता."

"मैं कहती हूँ आप की अकल कहाँ है?" लड़की हाथ नचा कर बोली....."क्या आप अपनी गाड़ी आगे नहीं

ला सकते?"

"आअन्न....हान्ं....वाहह..." इमरान उच्छल पड़ा. "ये ठीक है......पहले क्यों नहीं बताया..."

फिर जोसेफ ने ज़ोर लगा कर उसकी गाड़ी इस तरह एक तरफ हटाई कि दूसरी गाड़ी को आगे बढ़ाने केलिए

काफ़ी जगह निकल आई.
Last edited by Jemsbond on 24 May 2016 23:01, edited 2 times in total.
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************
Jemsbond
Super member
Posts: 4044
Joined: 18 Dec 2014 12:09
Contact:

Re: हीरों का फरेब

Postby Jemsbond » 16 Nov 2015 21:03

Hiron Ka Fareb

Imran ne car rok di. Dusri car ne kuchh isi tarah raasta rok rakha tha ki uske alaawa aur koi chaara hi nahin tha. Josef ne pichhli seat se kisi buddhe saaras ki tarah gardan uthaayi aur wind screen se baahar dekhne laga.
Gaadi sadak par tirchhi khadi thi aur koi uske niche chit leta hua shayad achanak aa gayi kharaabi ko door karne ki koshish kar raha tha. Uski taangen dikhayi de rahi thin.

Imran ne shayad niche utarte hi ke iraade se khidki par hath rakha tha ki achanak Josef bharraayi huyi aawaz me bola....."Khabardaar boss......taangen dekh kar....."

Imran ne palat kar ulluon ki tarah aankhon ko nachaayi aur Josef haklaaya...."mm....matlab ki................dekho na boss......pairon me high heel waale sandal hain."

"Hua karen...." Imran laparwaahi se kandhe uchkaate huye bolaa...."Neeli pants bhi to hai....gaalon par daadhi bhi zaroor hogi...."

"Boss......for god sake.....high heel...."

"Muh band kar...." usne thappad maarne waale dhang se hath chalaaya aur Josef bokhlaa kar ek taraf hat gaya.

Ab Imran apni car se utar kar dusri gaadi ki taraf badh raha tha. gaadi adhik door bhi nahin thi. Neele pants waali taangon me harkat huyi.....aur phir poora sharir gaadi ke niche se nikal aaya.

Ye ek ladki thi. Umar 20 aur 25 ke bich rahi hogi. Achhi shakal bhi thi.....aur tandurust bhi. Brown jacket aur blue pants me achhi jach rahi thi.

"Gaadi galat khadi ki hai maine...." Usne muskuraakar bindaas dhang se kaha.

Imran ke chehre par poori murkhta chhaayi huyi thi. Usne bokhlaaye huye dhang se uttar diya...."jj...ji nahin....ekdam nahin.....bilkul nahin......"

"Kewal isliye ye galati ki thi........ki koi sharif aadmi apni car rok kar meri madad kare...."

"Zaroor karega......zaroor karega....."

"To phir kijiye madad.....main Holyday camp jaa rahi thi. Yahaan ye musibat aa padi. Samajh me nahin aata kya karun."

"Ohho...." Imran khush ho kar bola. "Wahin to mujhe bhi jaana hai...." Lekin phir us ne muh latkaa liya.....aisa lag raha tha jaise achanak kayi samassyaayen aa padi hon.

"Kya sochne lage aap....?" Ladki kuchh der baad boli.

"Kisi dusre sharif aadmi ka intezar karna padega...." Us ne thandi saans lekar kaha.

"Kyon?"

"Ek se do sharif bhale hote hain....ho sakta hai wo koi achha suggestion de sake. Meri samajh me to nahin aata ki kya karna chaahiye...."

"Thoda engine dekh lijiye...."

Imran tezi se age badh kar bonut uthaaya aur engine par sarsari nazar daal kar bola. "Thik to hai."

"Kya thik hai?"

"Engine...."
"Kamaal karte hain aap bhi....phir starat kyon nahin hoti..."

"Pata nahin aap kya chaahti hain...." Imran apne chehre par uljhan ke bhaav paida karke bola.

"My godddd...." Wo usay ghoorti huyi boli......"Itni si baat aapki samajh me nahin aayi? Aray main

apni car sahit Holyday Camp jaana chaahti hun. Wahan ek garrage bhi hai.....gaadi ki marammat ho

sakegi."

"Uffohhh....to pahle kyon nahin bataaya tha?" Imran ne kaha aur apni gaadi ki taraf badh gaya.

Ye Imran ki gadi thi isliye usme tarah tarah ke jugaad ki chizen honi hi thin. Ye uske peshe me aane

waali chizen thin. Lekin rassi?

Uska ye safar kewal entertainment keliye tha. Kuchh din sakoon se guzaarne keliye holyday camp jaa

raha tha. Isliye rassi sath liye phirne ka sawaal kahaan tha. Lekin usne gaadi ki dikky se kaafi

mazboot rassi ka ek lachhaa nikaala. Ho sakta hai kabhi kisi zarurat keliye wahaan daala gaya ho jo

aaj tak pada rah gaya ho.

Anyway.....uske hath me rassi ka lachha dekh kar ladki ka chehra chamak utha.

"Josef...." Imran rassi hilaata hua bola....."Niche aao..."

Josef gaadi se utar aaya lekin uske dhang se nahin lagta tha ki usay Imran ka ye rawaiya pasand aaya

ho.

"Boss.....dhoka bhi ho sakta hai." Usne dhire se kaha.

"Chalo..." Imran usay dhakka dekar age badhaata hua bola aur ladki ko ishaara kiya ki wo apni gaadi

me baith jaaye. Ladki ne andar baith kar stearing sambhaal liya.

Phir us samay tak khamosh baithi rahi jab tak Imran uski car ke agle hisse me rassi ke phande daalta

raha. Lekin jaise hi dusra siraa Josef ki kamar se lapetne laga wo bokhlaa kar boli...."Arre arre.....ye

kyaa?"

Sath hi Josef ne bhi bharraayi huyi aawaz me kaha...."Ye kya kar rahe ho boss....?"

Lekin Imran ne kisi ko bhi uttar diye binaa girah lagaa di aur phir Josef ke kandhe thapakta hua

bola...."Holyday Camp......sarpat...."

"Ye kya kar rahe hain aap?" Ladki jhunjlaa kar gaadi se utar aayi.

"Nishchint rahiye...." Imran murkhon ki tarah bolaa..."Bahut hoshiyaar hai.....muh se engine ki aawaz

bhi nikaalega aur horn bhi dega......bas aap stearing sambhaale rahiye...."

"Ye namumkin hai boss...." Josef ne krodh bhare swar me kaha...."Koi aurat mujhe drive nahin kar

sakti..."

"Kyon shaamat aayi hai? Agar mujhe gussaa aa gaya to tumhen makkhiyaan aur chitiyaan bhi drive

karengi...."

"Aap ajeeb aadmi hain...." Ladki gardan jhatak kar boli...."Aray rassi ka dusra siraa apni gaadi me

kyon nahin baandh lete?"

Imran ne aankhen nikaalin. Phir kisi soch me pad gaya. Phir chintit swar me bolaa...."Magar ye kaise

sambhav hai.....meri gaadi aap ki gaadi ke pichhe hai. Is tarah to ham phir shahar hi waapas pahuch

jaayenge. Kyon Josef....?"

"Main kuchh nahin jaanta...." Josef gurrayaa...."Meri buddhi ka satyanash hokar rah gaya hai. Koi

dhang ki baat nahin soch sakta."

"Main kahti hun aap ki akal kahaan hai?" Ladki hath nacha kar boli....."Kya aap apni gadi age nahin

laa sakte?"

"Aaann....haann....waahh..." Imran uchhal pada. "Ye thik hai......pahle kyon nahin bataaya..."

Phir Josef ne zor laga kar uski gaadi is tarah ek taraf hataayi ki dusri gaadi ko age badhaane keliye

kaafi jagah nikal aayi.

*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************
Jemsbond
Super member
Posts: 4044
Joined: 18 Dec 2014 12:09
Contact:

Re: हीरों का फरेब

Postby Jemsbond » 16 Nov 2015 21:23


राजधानी के नागरिक जब होलिडे कॅंप की चर्चा करते है तो उनका अर्थ होता है सरदार गढ़ और सरदारगढ़ वाले एक विशेष भाग को हॉलिडे कॅंप कहते हैं. छ्होटी छ्होटी पहाड़ियों के बीच एक सुंदर सी झील है जिस के चारों तरफ लकड़ी के अनगिनत कॉटेज बिखरे हुए हैं. लाल, हरे(ग्रीन) और पीले. रेड कॉटेज मेट्रो होटेल के अधीन हैं. ग्रीन कॉटेज का मॅनेज्मेंट स्टार होटेल वाले करते हैं और येल्लो कॉटेज टिप टॉप नाइट क्लब वालों की संपत्ति हैं.

ये कोई सीज़नल हिल स्टेशन नहीं है. सालो भर इन तीनों होटेलों का बिज़्नेस धडल्ले से चलता है. राजधानी के थके हुए हाइ सोसाइटी के लोग अक्सर इधर ही आते हैं.

शाम का सूरज यहाँ बड़ी रंगीनियाँ बिखेर देता है. झील के सीने पर नारंगी रंग की चमकदार लहरें नाचती रहती हैं. मछलियो की ताक मे मंडलाने वाले पक्षियों की तेज़ सीटियाँ दूर दूर तक फैलती हैं. हर्याली से भरी पहाड़ियों और रंगीन कॉटेजस की परच्छाईं झील के हिलते हुए पानी की सतह पर मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करता है. ऐसा लगता है जैसे किसी उकताए हुए चित्रकार ने कयि रंग कॅन्वस पर छिड़क दिए हों......और उन्हें जैसे तैसे फैलाया गया हो.

स्विम्मिंग वाले घाट पर सुबह से शाम तक मेला सा लगा रहता है. हर तरफ रंग बिरंगी छतरिया दिखाई देती हैं.....जिसके नीचे स्विम्मिंग कॉस्ट्यूम मे भाँति भाँति के शरीर दिखाई देते हैं.

आज तो यहाँ बहुत भीड़ थी. खुद सरदारगढ़ ही ने यहाँ की भीड़ बढ़ा दी थी. क्योंकि आज सनडे था. स्विम्मिंग वाले धरती पर तिल धरने की भी जगह नहीं थी.

इमरान और जोसेफ भी एक छतरि के नीचे बैठे सच मुच मे उंघ रहे थे.

अचानक जोसेफ चौंक कर बोला...."बॉस....एक बात समझ मे नहीं आती."

"दूसरी कब समझ मे आती है....?" इमरान ने आँखें निकाली.

"नहीं बॉस..." जोसेफ बहुत गंभीर सा लग रहा था. उस ने दो तीन बार पलकें झपकाइं और बोला..."आख़िर ये लोग औरतों के साथ खुश किस तरह रहते हैं?"

"क्योंकि ये केवल कान रखते हैं.....मूह मे ज़ुबान नहीं...." इमरान ने उत्तर दिया.....और उसकी निगाहें अनगिनत आनंद से भरे जोड़ों पर रेंगती चली गयी.

जोसेफ ने नफ़रत से होन्ट सिकोडे और धीरे से कुच्छ बड़बड़ाया.

ये दोनों स्विम्मिंग ड्रेस मे नहीं थे और शायद यही दोनों ऐसे थे जिन के साथ कोई औरत भी नहीं थी. फिर भी होटेल की एक छतरि ले ही मरे थे.

छतरियो का बंदोबस्त होटेल ही की तरफ से किया जाता था. ये लोग ग्रीन कॉटेज मे ठहरे थे इसलिए इनकी च्छतरी भी ग्रीन ही थी. रंगों के इस व्यवस्था का मकसद था कि होटेलों के स्टाफ अपने अपने कस्टमर्स को आसानी से पहचान सकें.

इस समय तीनों ही होटेल्स की ट्रॉल्लयाँ घाट पर दौड़ती फिर रही थीं.

अचानक जोसेफ ने भांड सा मूह फैला कर जमहाई ली. शायद उसे नज़दीक ही कहीं कोई शराब की ट्रॉल्ली दिखाई दी थी.

"काटेगा क्या?" इमरान बोखला कर एक तरफ खिसकता हुआ बोला......और जोसेफ ने भरपूर ढंग से दाँत निकाल दिए. फिर कहा...."बॉस......क्या किसी तफरीह वाली जगह पर भी मैं तुम्हारे सामने नहीं पी सकता?"

"पी कर देखो..."

"मतलब ये कि.....अच्छा तो फिर मैं कॉटेज की तरफ जा रहा हूँ....."

"नर्क मे जाओ...." इमरान हाथ हिला कर बोला.

वो निकट के ही एक च्छतरी के नीचे बैठे हुए लोगों की बातें बड़ी रूचि के साथ सुन रहा था.

एक आदमी शायद नशे मे था......दूसरों से कह रहा था....."ये राज़ है.....एक बहुत बड़ा राज़ कि मैं इतना अधिक हवाई यात्रा क्यों करता हूँ. शायद किसी को पता नहीं चल पाए. ये राज़ मरते दम तक मेरे सीने मे ही रहेगा. मैं बहुत बद-नसीब आदमी हूँ. छोटा सा था तो मेरी माँ उठते बैठते जूते लगाया करती थी. अगर कभी वो नहीं मारती तो बाप शुरू हो जाता था. अब बीवी मिली है. माइ गॉड......ये मारती तो नहीं है.....लेकिन उसकी ज़ुबान......खुदा की क़सम......ज़हर की गाँठ है. बोलती है तो ऐसा लगता है जैसे हड्डियाँ चबा रही हो. खून पी रही हो. मैं नहीं जानता कि प्यार किस चिड़िया का नाम है. हूँ ना बद नसीब......इसी लिए मैं अधिक से अधिक हवाई यात्रा करता हूँ."

"ये क्या बात हुई?" उसके साथी ने टोका.
"समझने की कोशिश करो.....एर होस्टेस्स....हाए....कितनी मिठास होती है उसकी ज़ुबान मे. कितनी सुशील होती हैं. ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे लिए आसमान से तारे तोड़ लाएगी. खुदा ने मुझ को आदमी बना कर मुझ पर ज़ुल्म किया है. बनाना ही था तो एरोप्लेन बनाया होता. कम से कम चार एर होस्टेस्स तो रहा करतीं हर दम."

"उस बास्टर्ड की बात सुन रहे हो बॉस...." जोसेफ किसी कटखने कुत्ते की तरह गुर्राया.

"अब्बे.....तो तेरा दम क्यों निकल रहा है?"

"पता नहीं ये सब किस मुर्गी के अंडे से पैदा हुए हैं......हर समय औरत औरत

औरत....अर्ररर......हप्प्प्प.....बॉस.....वो इधर ही आ रही है...."

"कौन....?"

"वही कल वाली लड़की.....वो देखो...."

वो स्विम्मिंग सूट मे थी......और तीर की तरह उन्हीं की तरफ आ रही थी.

"मैं एकदम गधा हूँ बॉस......" जोसेफ ने अर्थपूर्ण ढंग से सर हिला कर बोला...."लेकिन मुझे ये लड़की बिल्कुल पसंद नहीं है...."

"पसंद कर के देखो......क्या दूरगत करता हूँ तुम्हारी....गधों का सौन्दर्य पूजन मुझे डेढ़ आँख नहीं भाता....समझे."

जोसेफ बुरा सा मूह बनाए हुए उठ गया.

"ओह्हो......आप तो गायब ही हो गये." लड़की ने निकट आ कर कहा.

"नहीं तो....." इमरान ने बोखलाए हुए अंदाज़ मे नीचे से उपर तक अपने जिस्म को टटोलते हुए

कहा....."मौजूद तो हूँ शायद....."

"मतलब ये कि फिर नहीं दिखाई दिए थे.....आप का शुक्रिया तक नहीं अदा कर सकी थी. अगर कल आप

नहीं मदद करते तो........"

"अर्रे वो तो कुच्छ भी नहीं...." इमरान बेढंगे अंदाज़ मे हंस पड़ा. "वास्तव मे दूसरों को तकलीफ़

मे देख कर मुझे बहुत खुशी होती है....."

"तकलीफ़ मे देख कर खुशी होती है....???" लड़की ने हैरत से कहा.

"मतलब ये कि वो क्या कहते हैं......हां शायद ख़ुसी मे देख कर तकलीफ़ होती है......म्म....मगर

फिर शायद ग़लत मैं ग़लत बोल रहा हूँ......अच्छा तो आप ही बताइए कि इस मौके पर क्या कहना

चाहिए......."

लड़की हंस पड़ी.....और फिर गंभीर होते हुवे इस तरह देखने लगी जैसे उस के बारे मे अंदाज़

लगाने की कोशिश कर रही हो कि वो किस प्रकार का आदमी है.

इमरान के चेहरे पर मूर्खता के भाव और गहरे होते चले गये थे.

"शायद आप ये कहना चाहते थे कि दूसरों की मदद कर के आप को खुशी मिलती है...."

"ओह्ह.....बिल्कुल बिल्कुल एग्ज़ॅक्ट...." इमरान खुशी के मारे उच्छल पड़ा. "बिल्कुल यही कहना चाहता

था.....पता नहीं क्यों जब मैं बातें करने लगता हूँ तो मेरा दिमाग़ बिल्कुल खाली हो जाता है. कल

शायद आप ने मुझे अपना नाम बताया था......लेकिन मुझे याद नहीं....."

"मोना...."

"ओ....तेरी....मुझे चूना याद आ रहा था."

"कोई बात नहीं......अब याद रखिएगा.....आप क्या करते हैं?"

"कॉलेज से भागा करता हूँ......और क्यों ना भागु. भला मुझे इस की क्या परवाह हो सकती है कि

शेर शाह सूरी ने हुमायूँ की फौज पर कितनी बार हमले किए....."

"ओह्हो......तो आप स्टूडेंट हैं....और पढ़ने से जी चुराते हैं....."

"बस बस स्टॉप...." अचानक इमरान गुस्से से बोला....."आप हमारी अब्बा जान नहीं हैं. उनकी तरह

बात मत कीजिए, वाह जी ये भी अच्छी मुसीबत है.....ऐसी बातों से कहीं छुट्टी नहीं मिलती. घर

से बोर होकर भागे तो यहाँ भी वही चरखा. जी हां हम पढ़ने से जी चुराते हैं.....फिर

आप क्या बिगाड़ लेंगी हमारा....!"

"अरे.....तो खफा होने की क्या ज़रूरत......मैने तो यूँ ही कह दिया था."

"सब यूँ ही कह देते हैं...." इमरान ने रूठे हुए अंदाज़ मे कहा.

"वो काला आदमी कौन है?" मोना ने पुछा.

"मेरी जान का दुश्मन...."

"बॉस कह कर पुकारता है आप को."

"नशे मे बाप भी कहने लगता है....हालाकी उसके बाप बनने से कहीं अच्छा ये होगा कि हम एक बोरी कोयला चबा कर मर जाएँ."
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************
Jemsbond
Super member
Posts: 4044
Joined: 18 Dec 2014 12:09
Contact:

Re: हीरों का फरेब

Postby Jemsbond » 16 Nov 2015 21:23


Rajdhaani ke naagarik jab holyday camp ki charcha karte hai to unka arth hota hai Sardar Gadh aur Sardargadh waale ek vishesh bhaag ko holiday camp kahte hain. Chhoti chhoti pahaadiyon ke bich ek sundar si jheel hai jis ke chaaron taraf lakdi ke anginat cottage bikhre huye hain. Laal, hare(green) aur peele. Red cottage Metro Hotel ke adhin hain. Green cottage ka management Star Hotel waale karte hain aur yellow cottage Tip Top night club waalon ki sampatti hain.

Ye koi seasonal hill station nahin hai. Saalo bhar in teenon hotelon ka business dharalle se chalta hai. Rajdhani ke thake huye high society ke log aksar idhar hi aate hain.

Sham ka sooraj yahaan badi rangeeniyaan bikher deta hai. Jheel ke seene par naarangi rang ki chamakdar lahren nachti rahti hain. Machhliyon ki taak me mandlaane waale pakshiyon ki tez seetiyaan door door tak phailti hain. Haryaali se bhari pahaadiyon aur rangeen cottages ki parchhaayin jheel ke hilte huye paani ki satah par manmohak drishya prastut karta hai. Aisa lagta hai jaise kisi uktaaye huye chitrakaar ne kayi rang canvas par chhidak diye hon......aur unhen jaise taise phailaaya gaya ho.

Swimming waale ghaat par subah se sham tak mela sa laga rahta hai. Har taraf rang birangi chhatariyaan dikhaayi deti hain.....jiske niche swimming costume me bhaanti bhaanti ke shareer dikhayi dete hain.

Aaj to yahaan bahut bheed thi. Khud sardargadh hi ne yahaan ki bheed badha di thi. Kyonki aaj Sunday tha. Swimming waale dhaat par til dharne ki bhi jagah nahin thi.

Imran aur Josef bhi ek chhatari ke niche baithe sach much me ungh rahe the.

Achanak Josef chaunk kar bola...."Boss....ek baat samajh me nahin aati."

"Dusri kab samajh me aati hai....?" Imran ne aankhen nikaali.

"Nahin boss..." Josef bahut gambhir sa lag raha tha. Us ne do teen baar palken jhapkaayin aur bola..."Aakhir ye log aurton ke sath khush kis tarah rahte hain?"

"Kyonki ye kewal kaan rakhte hain.....muh me zubaan nahin...." Imran ne uttar diya.....aur uski nigaahen anginal aanand se bhare jodon par rengti chali gayi.

Josef ne nafrat se hont sikode aur dhire se kuchh barbadaaya.

Ye donon swimming dress me nahin the aur shayad yahi donon aise the jin ke sath koi aurat bhi nahin thi. Phir bhi hotel ki ek chhatri ti le hi mare the.

Chhatriyon ka bandobast hotel hi ki taraf se kiya jaata tha. Ye log green cottage me thahre the isliye inki chhatri bhi green hi thi. Rangon ke is vyavastha ka maksad tha ki hotelon ke staff apne apne customers ko aasani se pahchan saken.

Is samay teenon hi hotels ki trollyaan ghaat par daudti phir rahi thin.

Achanak Josef ne bhaand sa muh phaila kar jamhaayi li. Shayad usay nazdik hi kahin koi sharab ki trolly dikhayi di thi.

"Kaatega kya?" Imran bokhlaa kar ek taraf khisakta hua bola......aur Josef ne bharpoor dhang se daant nikaal diye. Phir kaha...."Boss......kya kisi tafreeh waali jagah par bhi main tumhaare saamne nahin pee sakta?"

"Pee kar dekho..."

"Matlab ye ki.....achha to phir main cottage ki taraf jaa raha hun....."

"Nark me jaao...." Imran hath hila kar bola.

Wo nikat ke hi ek chhatri ke niche baithe huye logon ki baaten badi ruchi ke sath sun raha tha.

Ek aadmi shayad nashe me tha......dusron se kah raha tha....."Ye raaz hai.....ek bahut bada raaz ki main itna adhik hawaayi yaatraa kyon karta hun. Shayad kisi ko pata nahin chal paaye. Ye raaz marte dam tak mere seene me hi rahega. Main bahut bad-naseeb aadmi hun. Chhota sa tha to meri maa uthte baithte joote lagaaya karti thi. Agar kabhi wo nahin maarti to baap shuru ho jaata tha. Ab biwi mili hai. My god......ye maarti to nahin hai.....lekin uski zubaan......khuda ki qasam......zahar ki gaanth hai. Bolti hai to aisa lagta hai jaise haddiyaan chaba rahi ho. Khoon pi rahi ho. Main nahin jaanta ki pyar kis chidiya ka naam hai. Hun naa bad naseeb......isi liye main adhik se adhik hawaayi yaatraa karta hun."

"Ye kya baat huyi?" uske sathi ne toka.
"Samajhne ki koshish karo.....air hostess....haaye....kitni mithaas hoti hai uski zubaan me. Kitni susheel hoti hain. Aisa lagta hai jaise tumhaare liye aasman se taare tod laayegi. Khuda ne mujh ko aadmi bana kar mujh par zulm kiya hai. Banaana hi tha to aeroplane banaya hota. Kam se kam chaar air hostess to rahaa kartin har dam."

"Us basterd ki baat sun rahe ho boss...." Josef kisi katkhanne kutte ki tarah gurraaya.

"Abbe.....to tera dam kyon nikal raha hai?"

"Pata nahin ye sab kis murgi ke ande se paida huye hain......har samay aurat aurat

aurat....Arrrr......hpppp.....boss.....wo idhar hi aa rahi hai...."

"Kaun....?"

"Wahi kal waali ladki.....wo dekho...."

Wo swimming suit me thi......aur teer ki tarah unhin ki taraf aa rahi thi.

"Main ekdam gadhaa hun boss......" Josef ne arthpurn dhang se sar hila kar bola...."lekin mujhe ye ladki bilkul pasand nahin hai...."

"Pasand kar ke dekho......kya durgat karta hun tumhaara....gadhon ka saundarya poojan mujhe derh aankh nahin bhaati....samjhe."

Josef bura sa muh banaaye huye uth gaya.

"Ohho......aap to gayab hi ho gaye." Ladki ne nikat aa kar kaha.

"Nahin to....." Imran ne bokhlaaye huye andaz me niche se upar tak apne jism ko tatolte huye

kaha....."Maujood to hun shayad....."

"Matlab ye ki phir nahin dikhayi diye the.....aap ka shukriyaa tak nahin adaa kar saki thi. Agar kal aap

nahin madad karte to........"

"Arre wo to kuchh bhi nahin...." Imran bedhange andaz me hans pada. "Vastav me dusron ko taklif

me dekh kar mujhe bahut khushi hoti hai....."

"Taklif me dekh kar khushi hoti hai....???" Ladki ne hairat se kaha.

"Matlab ye ki wo kya kahte hain......haan shayad khusi me dekh kar taklif hoti hai......mm....magar

phir shayad galat main galat bol raha hun......achha to aap hi bataaiye ki is mauke par kya kahna

chaahiye......."

Ladki hans padi.....aur phir gambhir hote huwe is tarah dekhne lagi jaise us ke baare me andaaz

lagaane ki koshish kar rahi ho ki wo kis prakar ka aadmi hai.

Imran ke chehre par murkhtaa ke bhaav aur gahre hote chale gaye the.

"Shayad aap ye kahna chaahte the ki dusron ki madad kar ke aap ko khushi milti hai...."

"Ohh.....bilkul bilkul exact...." Imran khushi ke maare uchhal pada. "Bilkul yahi kahna chaahta

tha.....pata nahin kyon jab main baaten karne lagta hun to mera dimaag bilkul khaali ho jaata hai. Kal

shayad aap ne mujhe apna naam bataaya tha......lekin mujhe yaad nahin....."

"Mona...."

"o....teri....mujhe Chuna yaad aa raha tha."

"Koi baat nahin......ab yaad rakhiyega.....aap kya karte hain?"

"College se bhaaga karta hun......aur kyon na bhaagun. Bhala mujhe is ki kya parwaah ho sakti hai ki

Sher Shah Suri ne Humaayun ki fauj par kitni baar hamle kiye....."

"Ohho......to aap student hain....aur padhne se ji churaate hain....."

"Bas bas stop...." Achanak Imran gusse se bola....."Aap hamaari abbaa jaan nahin hain. Unki tarah

baat mat kijiye, Waah ji ye bhi achhi musibat hai.....aisi baaton se kahin chhutkaara nahin milti. Ghar

se bore hokar bhage to yahaan bhi wahi charkhaa. Ji haan ham padhne se ji churaate hain.....phir

aap kya bigaad lengi hamaara....!"

"Aray.....to khafaa hone ki kya zarurat......maine to yun hi kah diya tha."

"Sab yun hi kah dete hain...." Imran ne ruthe huye andaz me kaha.

"Wo kaala aadmi kaun hai?" Mona ne puchha.

"Meri jaan ka dushman...."

"Boss kah kar pukaarta hai aap ko."

"Nashe me baap bhi kahne lagta hai....haalaaki uske baap banne se kahin achha ye hoga ki ham ek bori koyala chabaa kar mar jaayen."
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************
Jemsbond
Super member
Posts: 4044
Joined: 18 Dec 2014 12:09
Contact:

Re: हीरों का फरेब

Postby Jemsbond » 16 Nov 2015 21:43



"आप अजीब आदमी हैं...किसी बात का ढंग से जवाब ही नहीं देते."

"परीक्षा मे भी हमारा यही हाल होता है. इसी लिए हम फौर्थ एअर मे पाँच साल से विराजमान हैं. किसी को भी हम मे किसी तरह का ढंग दिखाई नहीं देता."

"आप के पिताजी क्या करते हैं?"

"झक मारा करते हैं....मेरी बला से. इतनी मोटी सी बात उनकी समझ मे नहीं आती कि अगर हम ने बीए पास कर लिया तब भी हम शहज़ादे ही कहलाएँगे और ना किया तब भी शहज़ादे ही कहलाएँगे."

"ओह्ह.....तो शहज़ादे हैं आप...."

"पुकारू नाम है हमारा..." इमरान ने शरमा कर सर झुका लिया.

"मैं उस काले आदमी के बारे मे पुच्छ रही थी."

"सब उसी के बारे मे पुछ्ते हैं.....हम तो उल्लू के पठ्ठे ठहरे....."

"आप समझे नहीं.....मेरा मतलब कि ऐसे नौकर केवल बड़े आदमी ही रखते हैं. मैने तो यहाँ किसी के पास भी नीग्रो नौकर नहीं देखा...."

"वो सब बड़े आदमी हैं......जो नीग्रो नहीं रखते.....इसने तो हमारा सत्यानाश कर रखा है. कभी कहता है बॉस ऊँट की सवारी बहुत लाभदायक है. कभी कहता है टीबी से बचना हो तो बकरियाँ पालना शुरू कर दो...."

"ओह्हो....." अचानक लड़की उच्छल पड़ी. लेकिन इमरान की बात पर नहीं.....वो तो शायद उसकी बात सुन भी नहीं रही थी. उसके ध्यान का केन्द्र एक अपाहिज आदमी था. व्हील चेर पर वो उसी तरफ आ रहा था.

"देखा सूअर को...." लड़की बडबडाई. "अब ऐसा बन गया है जैसे मुझे देखा ही ना हो..."

अपाहिज व्यक्ति प्रकट मे खाता पीता व्यक्ति लग रहा था. जिस्म पर कीमती लिबास और उंगलियों मे हीरों की अंगूठियाँ. घनी और चढ़ि हुई मूच्छों मे अच्छा ख़ासा रोबदार लग रहा था.

वो उनके निकट से गुज़र गया.....और मोना जले कटे ढंग से धीरे धीरे उसे गालियाँ देती रही.

"अर्रे नहीं...." इमरान बोला...."छ्हुछुन्दर का बच्चा नहीं हो सकता. ज़रा उसकी मुच्छें तो देखो...."

"मेरा वश चले तो उसकी मुच्छें उखाड़ लूँ. कमीना कहीं का...."

"मज़बूत होती हैं....." इमरान ने निराशा भरे ढंग से सर हिला कर कहा.

"तुम पुछ्ते भी नहीं कि मैं उसे गालियाँ क्यों दे रही हूँ?" मोना झुंझला गयी.

"पुच्छना चाहिए?" इमरान ने मासूम सी शकल बना कर पूछा.

"नॅचुरल बात है......पता नहीं तुम कैसे व्यक्ति हो....."

"आहा......अब समझा...." इमरान सर हिला कर बोला. "अब हम समझे कि हमारी आंटी पिच्छले साल हम से क्यों नाराज़ हैं...."

"क्या मतलब?"

"उन्होने अंकल को गालियाँ भी दी थीं और चप्पल उठा कर मारने भी दौड़ी थीं. लेकिन हम ने उन से इसका कारण नहीं पुछा था. शायद इसी लिए वो हम से नाराज़ हैं."

लड़की कुच्छ बोली नहीं. बस उसे घूरती रही. फिर कुच्छ देर के बाद उस ने कहा....."ये लंगड़ा बहुत बुरा आदमी लगता है. कल से मुझे तंग कर रखा है उसने...."

"ओह्ह...."

"अपनी तरफ आकृषित करने केलिए सीटियाँ बजाता है.....बेहूदा आवाज़ मे गाता है.....बहुत कमीना है. मैं उसे सबक सिखाना चाहती हूँ. अब इस समय तुम्हें देख कर इस तरह अंजान बना हुआ क़रीब से गुज़र गया जैसे कोई बात ही ना हो."

"हम से दार गया....." इमरान खुश हो कर बोला.

"और क्या.......इसके अलावा और क्या कहा जा सकता है."

"तब फिर हम उसे ज़रूर मारेंगे....." इमरान ने अपनी बाहें चढ़ाते हुए कहा.

"नहीं.....ऐसे नहीं. मेरे पास दूसरी स्कीम है....."

"क्या...?" इमरान ने राज़दारी भरे ढंग से धीरे से पुछा.

"मार पीट बेकार काम है. ऐसा सबक दिया जाए जो हमेशा याद रहे."

"अच्छा...." इमरान ने अपनी पलकें झपकाइं.

"अगर तुम मदद करो तो संभव है....."

"ज़रूर करेंगे.....मगर बताओ भी तो....."

"अभी नहीं शाम को. मैने तुम्हारा कॉटेज देखा है. खुद ही आ जाउन्गि. टाटा...." वो उठी और एक तरफ चली गयी.

इमरान उंगली से ज़मीन पर आडी तिर्छि लकीरें बनाने लगा. उस ने अपाहिज को यूँही सरसरी ढंग से देखा था.....और लड़की की बकवास उसकी नज़र मे कोई महत्त्व नहीं रखती थी. थोड़ी ही देर मे वो सब कुच्छ भूल गया.

घाट पर ठहाके गूंजते रहे. शाम तक मौसम भी बदल गया. पश्चिम से काले काले बादल उठे और देखते ही देखते पूरे इलाक़े पर छा गये. तूफान की आशंका थी.

यहाँ आँधी तो आती ही रहती थी. लेकिन ये आँधी का मौसम नहीं था. इसलिए स्थानीय लोगों के चहरों पर भी चिंता के भाव पाए जा रहे थे.

मौसम के इस अचानक बदलाव के कारण कॉटेज समय से पहले ही आबाद हो गये. वरना आम तौर से अंधेरा फैलने तक लोग खुले मे काई प्रकार के मनोरंजन मे व्यस्त रहते थे.

इमरान जैसे ही अपने कॉटेज के निकट पहुचा जोसेफ की कर्कश आवाज़ सुनाई पड़ी. वो शायद किसी से लड़ रहा था. फिर किसी महिला की आवाज़ सुनाई दी. वो भी कम गुस्से मे नहीं लगती थी. कॉटेज मे कदम रखते ही मोना दिखाई दी.

इमरान की आहट पर वो दरवाज़े की तरफ आकृष्ट हुई.

"ये बहुत बेहूदा है. बहुत बद-तमीज़ है." मोना हलक़ फाड़ कर चिल्लाई.

"ज़ुबान संभाल कर...." जोसेफ गुर्राया.


*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************
Jemsbond
Super member
Posts: 4044
Joined: 18 Dec 2014 12:09
Contact:

Re: हीरों का फरेब

Postby Jemsbond » 16 Nov 2015 21:44

"शट अप्प्प..." इमरान ने घूँसा दिखा कर कहा. "दोनों खामोश रहो. वरना हम कुत्तों की तरह भौकना शुरू कर देंगे. भारी और सुरीली आवाज़ों की 'म्याउ.....म्याउ....और भों...भों हमारे मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव डालती है."

दोनों एक पल केलिए खामोश हो गये. फिर जोसेफ ने कहा...."मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता...."

"ये बकवास कर रहा है...." मोना बोल पड़ी.

"तुम मेरी तरफ देख कर इस तरह नहीं मुस्कुराइ थी?" जोसेफ ने झल्लाए हुए ढंग से उसकी मुस्कुराहट की नकल उतारी. "क्यों मुस्कुराइ थीं?"

"इस से कहो अपना मूह बंद करे वरना गोली मार दूँगी..." मोना बिफर गयी.

"ठीक है..." इमरान सर हिला कर बोला."पहले तुम इसे गोली मारो......फिर हम आराम से बातें करेंगे....."

"बॉस.....मैं खुद ही अपना गला घोंट लूँगा अगर तुम इस सफेद बंदरिया की तरफ़दारी करोगे..."

"अभी तुम दौड़ कर स्टार से चविन्गम के एक दर्ज़न पॅकेट ले आओ...." इमरान ने जेब से 100 का एक नोट निकाल कर जोसेफ की तरफ बढ़ाते हुए कहा.

जोसेफ ने नोट लेते समय बहुत बुरा सा मूह बनाया.......और फिर मोना को ख़ूँख़ार निगाहों से घूरता हुआ कॉटेज से निकल गया.

"तुम पता नहीं कैसे आदमी हो...." मोना बोली. "मैं तो ऐसे बद-तमीज़ नौकर को कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती."

"बात क्या थी?"

"कुच्छ भी नहीं....मैं तुम्हारी तलाश मेआई थी. बे-मतलब लाल पीला हो गया. कहने लगा कि मैं यहाँ अकेला हूँ. तुम आवाज़ दिए बिना क्यों घुस आई. मैं शोर मचा कर पड़ोसियों को जमा कर लूँगा. पता नहीं किस प्रकार का जानवर है."

"उस जानवर की मादा नहीं होती. ऐसा दूसरा नहीं मिलेगा. मगर तुम हमारी तलाश मे क्यों आई थी?"

"तुम ने भी वैसी ही बेतुकी बातें शुरू कर दी...."

"अच्छी बात है......तुम शुरू से यहाँ आई ही नहीं थीं....."

वो दोनों हाथ से सर थाम कर कॅन्वस की फोल्डिंग चेर पर बैठती हुई बडबडाइ. "तुम दोनों मुझे पागल बना दोगे...."

इमरान ने पहली बार उसे टटोलने वाली नज़रों से देखा. लड़की का सर झुका हुआ था वरना वो भी निश्चित तौर पर उसकी आँखों मे हैरत के भाव देखती.

वो कुच्छ देर तक उसी तरह बैठी रही फिर बोली....."अगर मुझे उस लन्गडे को नीचा नहीं दिखाना होता तो मैं शायद तुम लोगों से बात भी नहीं करती."

"ओह्हो....मगर कैसे नीचा दिखाओगि?"

"बस तुम कॉटेज के बाहर खड़े रहना....मैं अंदर जा कर समझ लूँगी."

"हम बाहर क्यों खड़े रहेंगे?" इमरान ने हैरत प्रकट की.

"देखते रहना कि कोई उधर आ तो नहीं रहा."

इमरान का इंट्रेस्ट जागने लगा था. लेकिन चेहरे पर पहले की ही तरह मूर्खता छायि रही.

"मान लो कि कोई आ ही गया.....तो?"

"सीटी बजा कर मुझे सूचित कर देना."

इमरान ने होन्ट सिकोड कर सीटी बजाने की कोशिश की......लेकिन आवाज़ नहीं निकली.

"मुश्किल है...." उसने निराशा भरे अंदाज़ मे कहा. "मगर तुम अंदर जाकर क्या करोगी?"

"ये ना पुछो..." लड़की हंस पड़ी. "सुबह जब वो मूह पर हाथ फरेगा तो मुच्छें हाथ ही मे रह जाएगी."

"माइ गॉड....हम बिल्कुल नहीं समझे...."

"बस सुबह उसकी शकल देख लेना.....मुच्छें नहीं होंगीं...."

"हम अपनी अकल को कहाँ दे मारें.....अब भी हमारी समझ मे कुच्छ नहीं आया."

"समझने की ज़रूरत भी क्या है. बस तुम बाहर खड़े रहना. किसी के आ जाने पर सीटी ना बजा सको तो झोपडे मे ठोकर मार देना.....मैं समझ जाउन्गि."

"क्या वो लंगड़ा अकेला है?"

"पता नहीं......मैं क्या जानूँ. ओके....ठीक 10 बजे.....याद रखना आउन्गि."

वो चली गयी. लेकिन 10 बजे तो वहाँ तूफान झंडे गाढ रहा था. किसी मे हिम्मत थी कि कॉटेज की खिड़की खोल कर बाहर झाँक सकता.

हवाएँ चीख रही थीं. बिजली के कड़ाके पहाड़ियों मे ऐसी गूँज पैदा कर रहे थे जैसे उनकी जड़ें हिल गयी हों......और देखते ही देखते वो जारों से उखड़ कर तूफ़ानी झक्करों मे चकराती फिरेंगी.

कॉटेजस हिल रहे थे......और उनकी दरारों से पानी रिसने लगा था. हालाकी छते सुरक्षित थीं.

तूफान की शुरुआत 9.30 बजे हुई थी और हवा का ज़ोर 11 बजे से पहले कम नहीं हुआ था. फिर रात भर बारिश होती रही थी.

लेकिन दूसरी सुबह ये कहना भी कठिन हो गया कि पिच्छली रात बूँदा-बाँदी भी हुई होगी. पहाड़ियाँ सुखी पड़ी थीं......और सूरज की पहली किरणें झील के भरे सीने पर नारंगी रंग का जाल बुन रही थीं. घाट फिर आबाद हो गया था.
जोसेफ बहुर सवेरे अपनी बोतलों की खोज मे स्टार होटेल की तरफ निकल गया था.
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Who is online

Users browsing this forum: No registered users and 1 guest