सुलग उठा सिन्दूर complete

Jemsbond
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Re: सुलग उठा सिन्दूर

Post by Jemsbond » 07 Jun 2016 00:10


वह फरार जीप का पीछा करना, चहता था, किन्तु फिलहाल कसमसाने के अलावा कुछ न कर सका, क्योंकि अभी-अभी मरा सेनिक इस वात का गवाह था कि बचे हुए बदमाश दरवाजे के आस-पास पोजीशन लिए हुए हैं-फिर भी वह लॉन की घास पर धीरे-धीरे रेगकर अागे बढ़ रहा था ।



अचानक एक अन्य जीप स्टार्ट हुई ।



किसी ने जीप पर गोली चलाई, हालांकि वह गोली जीप को रोक न सकी । किन्तु नागर को यह बता गई कि अब दरवाजे पर एक भी बदमाश नहीं है, क्योकि सेनिक की गोली के जवाब में उधर से कोई गोली न चली थी और यह समझते ही वह रबर के बवुए की तरह न सिर्फ उछलकर खड़ा हो गया बल्कि जीप की तरफ़ लपकत्ता हुआ चीखा-" वे लोग भाग रहे हैं, पीछा करो ।"


सैनिक और सिपाही उसके पीछे लपके।

दरवाजा अन्दर से बन्द करने के वाद देव ने चटक्नी चढा दी और कंघे पर लटके छोटे से सफारी वेग से शक्तिशाली टार्च निकालकर अॉन की----रोशनी का विशाल दायरा सारे कमरे में चकराने लगा--एक मेज-कुर्सी के अलावा वहां सामान के नाम पर अन्य कुछ न था ।


प्रकाश का दायरा बाल क्लॉक पर जाकर स्थिर हो गया । धड़कते दिल से देव कुछ देर तक पुराने जमाने के उस घंटे को घूरता रहा-फिर कुर्सी उठाकर उसके नीचे रखी----जेब से चाबियां निकली, घंटे की चाबी के अलावा अन्य सब वापस जेब में डाली और चाबी छिद्र मे डालकर राऊंड देने शुरू किये ।।


अच्छी तरह गिनकर उसने सात राउंड दिए। टार्च का प्रकाश कमरे के फर्श पर ठीक बीच में स्थिर कर दिया ।


दो मिनट बाद--हल्की सी गड़गड़ाहट के साथ फर्श का एक हिस्सा हट गया और टॉर्च के प्रकाश में केवल पल-भर के लिए सीढि़यां चमकी क्योंकि देव ने तुरन्त ही टॉर्च आँफ कर ली थी ।


अब इसे सिर्फ यह डर था कि कहीं कुत्ते सीढियां तय करके जहां न पहुच जाएं, अत: तेजी के साथ सफारी बैग से भगतसिंह के विना घुले कपडे़ निकाले ।


मेज से उतरकर खुले रास्ते के नजदीक पहुंचा ।


इन कपडों में कर्नल भगतसिंह के जिस्म की गन्ध मौजूद थी, जिसे इन्सान भले ही न सूंघ सके, किन्तु 'कुत्ता सूंघ सकता धा और शायद कुत्तों को भ्रमित करने के लिए ही कपडों की यह गठरी सीढियों पर लुढका दी।



नीचे से कुत्तों के भौकनें की आवाज उभरी ।



इस आवाज ने न सिर्फ देव के रोंगटे खड़े कर दिए, वल्कि उसके दिलो-दिमाग को आतंकित भी कर दिया-उसने जल्दी से बैग से गोश्त का एक लोथड़ा निकलकर तहखाने में उछाल दिया-कुत्तो के झपटने की आवाज ऊपर तक अाई ।



देव की आंखे चमक गई । एक के बाद एक. . .उसने गोश्त के चार छोथड़े तहखाने में फेंके ।



मुश्ताक ने लिखा था…" कर्नल के कपडों की गंध से कुत्ते भ्रमित हो जाएंगे-जब तुम छोथड़े फेकोंगे तो वे यही समझेंगे कि कर्नल उनकी खुराक देने आया है इसलिए हमने तुम्हारे वहां पहुंचने का टाइम भी लगभग वही रखा है जब कर्नल उन्हें खुराक पहुचाता है, 'पुड़िया' में जहर है इसे गोश्त 'के लोथडों पर लगा दोगे…कोई भी चीज खाने से पहले कुत्ता उसे सूंघता जरूर है, वे भी खूंधेगे और सूंघते ही भांप जाऐंगे कि गोश्त को नहीं खाना है, परन्तु तब तक फाफी देर हो चुकी होगी, क्योंकि जहर इतना तीक्ष्ण है कि इसे सूंघने मात्र से कुत्तों का कल्याण हो जाएगा!" और अब...देव रहा था कि क्या सचमुच कुत्तो का कल्यान हो चुका है?


पुर्वं-निर्धारित योजना के अनुसार पांच मिनट तक वह दम साधे खामोश बैठा रहा, फिर जेब से रिवॉल्वर निकलकर तहखाने के अंधेरे में एक गोली दाग दी ।

सारे तहखाने और प्राइवेट रूम में धमाका गूंज उठा ।



फायर के जवाब में तहखाने के अन्दर से कुत्ते की कोई आवाज़ नहीं अाई और यह समझते ही देव की आंखे चमक उठी कि कुत्तों का कल्याण हो चुका है ।



अब उसने निश्चित भाव से ही टॉर्च अॉन की ।


उसकी रोशनी में सीढियां उतरनी शुरू की-हालाक्रि वह अच्छी तरह जानता था कि कुत्ते मर चुके होंगे-परन्तु फिर भी तीन सीढियां तय करने के वाद उसकी टांगे कापने लगी-----मन में यह बिचार उठा कि कहीं किसी तरह कोई कुत्ता जीवित न बच गया हो? एक ही उसे फाड़ डालने के लिए काफी था ।



पाचर्वी सीढ़ी पर पहुंचकर उसने टॉर्च का प्रकाश नीचे, गैलरी में घुमाना शुरू किया शीघ्र ही प्रकाश के दायरे में चार कुत्तों की लाशें और गोश्त के लोथड़े दूंढ़ लिए-खाने के नाम पर गोश्त को उन्होंने छुआ तक न था मगर फिर भी वे लाश में तब्दील हो चुके थे ।




उनकी लाशें देखकर ही देवं की रीढ़ की हड्डी मैं सिहरंन-सी दौड गई---कद और स्वास्थ्य से वे कुत्ते नहीं, बल्कि भेड्रिए लगते थे-यह सोचकर वह कांप उठा कि यदि वे जीवित होते तो उसकी क्या हालत करते ?



कुछ देर तक उनका निरीक्षण करने और सन्तुष्ट होने के वाद नीचे उतरने लगा…अन्तिम सीढ़ी पर कदम रखते ही सारी गैलरी प्रकाश से भर गई ।



गैलरी की छत पर दूर-दूर तक लगे बल्ब अॉन हो गए---पहले मोड़ तक गैलरी बिल्कुल साफ नजर आ रही थी, कदमों मे पड़ी थी कर्नल के कपडों की गठरी-हाथो से उसने त्वचा की रंगत के दस्ताने उतारकर वहीं डाल दिए ।



टार्च आँफ करके सफारी बैग में रखी ।



इसके बाद तेज कदमों से गैलरी पार करने लगा…पहला मोड़ पार करने के बाद कुछ ही देर वाद ही उसके सामने कृत्रिम दरिया था--दरिया के इस किनारे पर खड़े होकर उसने ध्यान से देखा, एक विशालकाय मगरमच्छ और लम्बा अजगर दरिया में शायद सोए पड़े पे, क्योंकि पानी में कोई हलचल न थी-देव ने बेग से एक कार्क की गेद निकाली। गेद उसने दरिया के ठीक बीच में फेंकीं और उसके पानी में गिरते ही दरिया में जैसे भूचाल अा गया-सोया हुआ अजगर और मगरमच्छ हरकत में अा गए थे । दिल ने दहशत उभरी।

मगर मन में यह विश्वास लिए कि जव तक वह पानी से बाहर है, उसका वे कुछ न बिगाड सकेंगे-उस दिलचस्प उठा-पटक को देखता रहा---कुछ देर बाद अपने बाईं तरफ बढ़ा ।



दीवार में एक छिद्र टूढा ।




जेब से एक चाबी निकलकर उसमें डाली, तीन वार उल्टी चाबी घुमाते ही सारी गैलरी हल्की गड़गड़ाहट की आवाज़ से गूंज उठी --- उसने छत की तरफ देखा, बीचों--बीच दो फुट चौडा करीब डेढ सौ गज लम्बा टुकड़ा बाई तरफ सरक गया ।




दरिया के इस किनारे पर छत से नीचे की तरफ सरकती हुई एक मोटी जंजीर नजर अाई, छत पर एक विशाल बेलन था, बेलन पर जंजीर लिपटी थी और बेलन के घूमने के अनुपात में ही जंजीर नीचे अाती जारही थी।




दो मिनट वाद गड़गड़ाहट बन्द ।




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Re: सुलग उठा सिन्दूर

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Re: सुलग उठा सिन्दूर

Post by Jemsbond » 07 Jun 2016 00:11

जंजीर का निचला सिरा अब इतना नीचे था कि देव उसे अराम से छू सकता था…ऊपरी सिरा एक मजबूत फौलादी छल्ला था जो उस राड में फंसा हुआ था, जो रेल की पटरी के समान दरिया के उस पार तक चली गई थी ।

देव जंजीर के नजदीक पहुचा । ८ .

निचले सिरे पर लगा एक नन्हा-सा स्विच दबाते ही गैलरी में धुर्र घुर्र की आवाज गूंजने लगी-देव ने दोनों हाथों से जंजीर जकड़ ली ।



और फिर जंजीर पर लटके देव का सफर शुरू हो गया ।



जंजीर के उपरी सिरे वाला कुन्दा राड पर चल रहा था और साथ ही जंजीर पर लटका देव भी दरिया के ऊपर से गुजरने लगा----मगरमच्छ और अजगर काफी उछल-कूद मचा रहे थे किन्तु व्यर्थ---देव उनकी पहुंच से वहुत ऊपर था ।



इस तरह वह दरिया पार पहुंचा ।



जंजीर का सफर खत्म होते घुर्र-घुर्र की आवाज बन्द हो गई---देव गैेलरी में तेजी से आगे बढ़ गया-उस स्थान पर जहाँ सुरंग बन्द थी । फर्श पर वह कुछ दूंढ़ने लगा ।



शीघ्र ही उसे एक "की-हॉल' मिला-जिस से एक अन्य चाबी निकालकर इस्तेमाल करते ही सामने वाली दीवार में एक मोखला प्रकट हुआ --- इतने ब्यास का कि एक बार में केबल एक ही व्यक्ति लेटकर अन्दर प्रविष्ट हो सकता था ।।।

देव बेहिचक उसमें रेग गया । अन्दर अंधेरा था ।



सुरंग 'जेड' के अाकार की थी, यानी दो मोड़ पड़े, जिन्हें पार करते-करते देव का दम घुटने लगा-दिलो--दिमाग पर थोड़ी दहशत भी सवार होती महसूस हुई ।

अन्तत: सुरंग ने उसे एक कमरे में पहुचा दिया-बहीं छत पर लगे एक बल्ब का पीला प्रकाश फैला हुआ था और इस प्रकाश में चमचमा रही थी-----स्टील की एक अलमारी------जमीन के साथ 'अटैचड' वह एक छोटी-सी अलमारी थी ।



देय की नजर उस पर चिपककर रह गई ।



देखने मात्र से ही इल्म होता था कि यदि 'बैेरिंग मशीन' के सिरे पर लोहा काटने वाला 'सूजा' लगा दिया जाए तब भी उसमे बाल बराबर छेद न किया जा सकेगा ।



मगर देव यह सोचकर मुस्कराया कि मुझें इसमें छेद करने की कोई जरूरत नहीं है, उसकी आंखे नम्बर वाले लाक और हैँडिल पर स्थिर हो गई ।



उन्हीं पर नजर टिकाए वह नजदीक पहुचा ।



एक-दूसरे से सटे सात 'नम्बर रिग' थे ।


उसने जेब से कागज निकाला-कागज पर दो नम्बर लिखे थे---एक छ: अंकों का दूसरा सात अंकों वाला-देव ने अलग-अलग रिंग्स को घुमाकर तीर के निशान के सामने छ: अंको वाला नम्बर फिक्स किया---सातवे रिंग की जीरो तीर के सामने लाकर हैंडिल घुमाया।



खतरे की घंटियों से अलमारी का सम्बन्ध कट गया ।



फिर सात अंक बाला नम्बर फिक्स करके हैंडिल घूमाते ही मजबूत अलमारी का भारी दरवाजा खुल गया ओर खुलते ही अलमारी के अन्दर लगा बल्ब ठीक उसी तरह रोशन हो उठा जिस तरह फ्रीज का बल्ब रोशन हो उठता है ।



अलमारी के अन्दर रखी फाइलों पर नजर पड़ते ही देव की आंखें नन्हे-नन्हे बल्वों के मानिन्द चमक उठी---उनमें से एम. एक्स. ट्रिपल फाईव तलाशने में उसे कोई दिक्कत पेश नहीं अाई और इस फाइल के चमकदार कवर पर उसे करेंसी नोटों की गड्डीयों का पूरा अंम्बार नजर आया---बीस करोड रुपए उस कवर पर समा न रहे थे ।


फाईल को दीवानों की तरह चुमने लगा था वह ।।।
ड्राइविंग सीट पर सुवखू था और उसके सधेे हुए हाथों में फर्राटे भरती हुई जीप सड़क पर उड़ी चली जा रही थी ।।

पिछ्ली सीट पर थे कर्नल भगतसिंह और जगबीर----जगबीर ने अपने हाथ में दवा रिवॉल्वर अभी तक भगतसिंह की कनपटी पर रखा हुआ था ।



कर्नल भगतसिंह का चौडा और रौबीला चेहरा पुरी तरह भभक रहा था-ऐसा लग रहा था कि यदि उसका वश चले तो अभी दोनों को कच्चा चबा जाए, किन्तु उन्होंने भगतसिंह को पल भर का मोका न दिया था।।



एकाएक सुक्खू बोला-----" अब इसकी आखो पर पट्टी बांध दो जगबीर!"



"इसके लिए जीप रोकनी पडेगी!"



" क्यों? "



"यूं देख रहा है हरामजादा जैसे कच्चा चबा जाएगा, मेरे रिवॉल्वर के निशाने से हटते ही यह हरकत कर सकता है, अत: जीप रोककर पट्टी तुम बांधों ।"



सुक्खू ने ज्यादा हुज्जत न की ।




ब्रैकों की चरमराहट के साथ जीप सूनी पड़ी सड़क के बीचों--बीच रुक गई, जगबीर कर्नल को कबर किए रहा और जिस वक्त -जेब से सुक्खू काली पट्टी निकाल रहा था उस वत्त कर्नल गुर्राया----"यह सव तुम ठीक नहीं कर रहे हो!"




""क्यों?" जगबीर हंसा----"क्या कर लोगे हमारा?"




"मिलिट्री सीक्रेट सर्विस के जासूसों की नजर से तुम ज्यादा देर तक छुप नहीं सकोगे और अपने हत्थे चढ़ते ही वे तुम्हें चीर-फाड़कर डाल देगे!"




"तुम्हारा ख्वाब कभी पूरा नहीं होगा कर्नल, क्योंकि हर कदम पूरी तरह सोच…समझकर उठाया है, कोई जासूस हमारा बाल भी बांका न कर सकेगा!"



"त-तुम आखिर हो कौन और चाहते क्या हो?"



"जहाँ तुम्हें ले जाया जा रहा है, वहाँ इन्हीं सवालों का जवाब दिया जाएगा!"




सुक्खू बोला----"' मगर अव यदि वहाँ पहुंचने से पहले तुमने एक लफ्ज भी जूबान से निकाला तो गोली भेजे में घुसेड़ दी जाएगी---शरीफ बच्चे की तरह, आंखों पर पट्टी बंधवा लो !"

इसके वाद भगतसिंह की आंखों पर पट्टी बाँध दी गई ।

जीप पुन: स्टार्ट होकर अागे बड़ी, मगर अब क़र्नल नहीं देख सकता वह किन रास्तों से गुजर रही है ।
बीस मिनट बाद जीप रुक्री----उसे उसी हालत में उतारा गया ।


दोनों तरफ से पकड़कर पैदल चलाया गया । दस मिनट वाद आंखो से पट्टी हटाई गई तो कर्नल ने कीमती सामान से खूबसूरती के साथ सजे कमरे को निहारा----यह वही कमरा था, जिसमें देव को लाया जाता रहा था-नज़र सामने खडे़ जगबीर और सुक्खू पर जम गई , बोला----" ये कौन-सी जगह है?"



"कुछ देर वाद तुम्हारे हर सवाल का ज़वाब हमारा 'मास्टर' देगा!"



"मास्टर?"



"जी हा!" उसकी खिल्ली-सी उड़ाते हुए सूक्खू ने कहा----"वोे-चमकदार सनमाईंका वाली मेज के पीछे पुश्तवालीं कुर्सी दे ख रहे हो न…वे उसी पर बैठते हैं!"



"तो मैं बैठ जाऊं?" कर्नल भगतसिंह ने विशिष्ट अंदाज में नाक खुजलाते हुए कहा ।




"क-क्या ?" दोनों बुरी तरह उछल पड़े ।



भगतसिंह के होठो पर मुस्कान उभर अाई । इस बार उसके मुंह से निकलने वाली अबाज भी मुश्ताक या कुबड़े भिखारी वाली थी, बोला--------"मैंने ये पूछा है हुजूर कि क्या अाप लोगों की तरफ से मुझे उस कुर्सी पर बैठने की इजाजत है?"




"अ-अाप खुद मास्टर हैं?" मारे हैरत के वे पागल हुए जा रहे थे-कर्नल भगतसिंह के चेहरे को वे यूं देख रहे थे जैसे दिल्ली के लालकिले को इस कमरे में खड़ा देख रहे हों और उनकी इस हैरत का पूरा मजा लूटता हुआ भगतसिंह मेज के पीछे पहुचा-----------ऊंची पुश्त वाली रिबॉंल्विंग चेयर पर बैठकर उसने दराज से "डनहिल' का पैकिंट निक्राला----एक सिगरेट सुलगाने के बाद बोला…"नहीं तो क्या उस कोठी से कर्नल भगतसिंह को किडनैप कर लेना इतना आसान है, जितनी आसानी से तुम हमें किडनैप कर लाए हो?"



दोनों में से किसी के मुह से बोल न फूटा ।
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Re: सुलग उठा सिन्दूर

Post by Jemsbond » 07 Jun 2016 00:11



" अपना किडनैप करने में हमने भी तुम्हारी मदद की है या यूं कहा जाए तो गलत न होगा कि अपना अपहरण हमने खुद किया है!"




"मगर अापको खुद यह सव करने की क्या जरूरत थी?"

भगतसिंह ने पूरे आराम से कहा------"ऐसे सवालों का जवाब तुम जैसे बच्चों को नहीं दिया जाता!"



"जी ?"



"दोनों अपने-अपने रिवॉल्वर मेज पर रख दो!"



गुलामों की तरह सुक्खू और जगबीर ने उसके अादेश का पालन कीया--------तब कर्नल ने कहा-"तुम दोनों यहाँ से हजारों मील एक कस्बे के छोटे से बदमाश हो, किन्तु देव की नजर में मैंने तुम्हें पाकिस्तानी सीक्रेट विंग के जासूसों का सम्मान दिया और वह सव तुमसे काम निकालने के लिए किया गया था, जो तुमने किया!"



" जी ।"



"अब मेरा मिशन लगभग पूरा हो चुका है और साथ ही तुम्हारा काम खत्म!" वह कहता चला गया--------"'अफसोस के साथ बताना पड़ रहा है कि अब मैं तुम्हे एक पल के लिए भी इस कमरे से बाहर नहीं जाने दे सकता!"




दोनों के होश उड़गए ।।।




यह समझते ही दोनों के पैरों तले से जमीन खिसक गई कि वह क्या कह रहा हे-सुक्खू पागलों की तरह चीख पड़ा-" न---नहीं-----तुम ऐसा नहीं कर सकते मास्टर!"



" क्यों ?"



"क्योंकि हमने तुम्हारा वहुत काम किया है-तुम्हारे हर हुक्म का पालन किया है हमने!" आतंक में डूबा जगबीर चीखता चला गया----------"'हमने ट्रेजरी में डाका डाला-अपने दोस्त बलजीत को खोया-देव को आतंकित किया--------एम. एक्स. ट्रिपल फाईव की चोरी में तुम्हारा साथ दिया"




""बस.........." कहते हुए कर्नल ने दराज से एक रिवॉल्वर निकलकर उन पर तान दिया----" यही तो एक बात है जिसकी वजह से मैं तुम्हें जिन्दा नहीं छोड सकता---मुझे ऐसा एक भी शख्स जिन्दा नहीं चाहिए, जो भारतीय सेना के जनरल को यह बता कि एम० एक्स ट्रिपल फाइव की चोरी के पीछे कर्नल भगतसिंह है! "




दोनों के हाथ-पैर फूल गऐ-चेहरे पीले जर्द-----जगबीर ने मौके की नजाकत को भांपकर कहा-----" ह--हम किसी को यह राज नहीं बताएंगे प्लीज-हमें जाने दो ।"




"क्या ताजमहल बनाने वालों के हाथ नहीं काट डाले गए थे?"



"हमारा यकीन करे मास्टर----एम.एक्स. ट्रिपल फाईव की चोरी के सम्बन्थ में किसी से भी कोई जिक्र किए बिना हम अपने कस्बे लौट जाऐंगे ----- यहां से बहुत दूर ।"
"मैं तुम्हें उससे भी दूर भेजना चाहता हुं !"




" ह-हम चले जाएंगे मास्टर-----" तुम जहां कहो हम चले...!"




" धांय---------धांय !"




कर्नल भगतसिंह के रिवॉल्वर से निकले दो शोले उनके जिस्म के ऐसे संवेदनशील स्थानों में जा धंसे कि सूक्खू या जगवीर में से किसी को तड़पने तक का मौका न मिला------"वे कटे वृक्ष की तरह गिरे और वहीं देर हो गए । "




भगतसिंह के चेहरे पर रहम या उनके प्रति सहानुभूति का कहीं कोई भाव न था और उस वक्त वह फूक मारकर रिवाल्वर की नाल से निकल रहे धुएं को छिन्न-भिन्न कर रहा था, जब कमरे का दरवाजा खुला---प्रशंसा के अंदाज में ताली बजाता हुआ अधेड़ आयु का एक व्यक्ति अन्दर दाखिल हुआ--------उसके चेहरे पर खिचड़ी बालों की फ्रेचकट दाढ़ी और आंखों पर जीरो पावर-के लेंसों वाला एक चश्मा था-----मेज के नजदीक अाता हुआ लह बोला----"वेल डन कर्नल.. वेल डन-----अपने मिशन की कामयाबी पर मैं तुम्हें बधाई देता हूं ।"




'थैक्यू ।" रिवॉल्यर वापस दराज में रखते हुए कर्नल ने कहा---" बैठो ।"




वह उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया ।



"मान गए कर्नल…सचमुच तुमने हक अदा कर दिवा-सारा मिशन तुमने खुद अपने हाथ में रखा-हम तो सिर्फ पचास करोड़ खर्च करने के गुनहगार हैं!"



"अभी तक तुमने सिर्फ पच्चीस करोड खर्च किए हैं!"



"बाकी पच्चीस भी तुम्हारे खाते में जाने के लिए तैयार हैं!" , फ्रेचकट दाढी वाले ने कहा---" तुम एम. एक्स. ट्रिपल फाईव हमारे हवाले करो…पच्चीस करोड तुम्हारे! "



"अभी वह वक्त नहीं आया ।"



" क्या मतलब?"



"एम. एक्स. ट्रिपल फाइव तब मिलेगी जव अपने रिवाल्वर से तुम देव और दीपा को कत्ल का चुके होंगे-तुम्हारे करने के लिए मेरे पास यही पहला और अंतिम काम है ।"



"मैं जानता हूं ।" वह बोला-----" तुम फिक्र मत करो---यहां से पाकिस्तान रवाना होने से पहले मैं इस कमरे में वीडियो कैसेट, जब्बार, देव और दीपा की लाश छोड़ जाऊंगा ।"

जो स्कीम मैंने देव को कागज़ पर लिखकर समझाई थी, उसमे उसे यह नही बताया गया है कि एम. एक्स. ट्रिपल फाईव की चोरी के बाद दीपा के साथ उसे कोठी से कैसे फरार होना है-----इस वक्त वह कोठी के तहखाने में कहीं होगा----" मैं यहां से करीब ग्यारह बजे सुक्खू और जगबीर की लाशों के साथ उसी जीप में कोठी पर पहुंचूगा-तब तक देव और दीपा कथित एम. एक्स. ट्रिपल फाइव के साथ कोठी से निकल चुके होंगे और मिलिट्री सीक्रेट सर्विस के चीफ सहित जनरल साहब वहां पहुंच चुके होंगे---मुझे देखते ही वे सब चौंक पड़ेगे और पूछेंगे कि कहां से आ रहा हूं तब जानते हो मैं क्या जवाब दूगा?"



" क्या ?"



"जिन लोगों ने मुझे किडनैप किया था, मौका लगते ही मैँने उऩ पर अंकुश पा लिया और इस वक्त उनकी लाशें उस जीप में पड़ी हैं, जिसमें मैं यहाँ तक आया हूं----उन्हीं से मुझे पता लगा है कि मेरा अपहरण केवल सव लोगों का ध्यान बांटने के लिए किया गया है-वास्तव में इस अफरा-तफरी के बीच देव और दीपा ने एम. एक्स. ट्रिपल फाइव चुरा ली है----मैं उन्हें बताऊंगा कि मेरा लड़का और बहू पाकिस्तानी जासूसों के लिए काम-कर रहे थे-सिर्फ एम. एक्स. ट्रिपल फाईव की चोरी के लिए ही मेरे साथ कोठी में रहने अाए थे---मेरे इस बयान के तुरन्त बाद कोठी में उनकी तलाश शुरू होगी, किन्तु तब तक वे वहां से निकल चुके होंगें ।"



" गुड ।"



" योजना के मुताबिक वे कोठी से निकलकर सीधे सीरांक होटल के रूम नम्बर दो सौ सोलह में पहुंचेगे जो फर्जी नामों से पहले ही उनके लिए बुक हैं--वहाँ तुम कल सुबह मुश्ताक वाले मेकअप में उनसे मिलोगे और एम. एक्स. ट्रिपल फाइव के बदले बीस करोड़ देने के लिए यहाँ ले जाओगे-----यहां लाकर तुम उन्हें कत्ल कर दोगे!"




"जो करना है मुझे वह सब याद है!"





" उनके पास जो एम. एक्स. ट्रिपल फाईव है वह-नकली है-वही जो उन्हें एम. एक्स. ट्रिपल फाइव के बारे में बताते वक्त दिखाई गई थी-असली एम. एक्स. ट्रिपल फाइव सुबह नौ बजे मैं स्वयं यहाँ आकर तुम्हें दूंगा--मेरे बाकी के पच्चीस करोड तैयार
रखना----उसके बाद तुम करांची के विमान में बैठ जाओगे और मैं कोठी चला जाऊंगा ।"

"मिशन खत्म ।"

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Re: सुलग उठा सिन्दूर

Post by Jemsbond » 07 Jun 2016 00:12



"हमारा-तुम्हारा मिशन भले ही खत्म हो जाए, मगर मेरे बचाव की शहादत यहीं खत्म नहीं हो जाएंगी!" कर्नल भगतसिंह ने कहा-----"मकान किराए का है-तुम्हारे जाने के बाद देव और दीपा की लाशों से निकलने वाली बदबू राहगीरों का ध्यान इस तरफ , खींच लेगी----पुलिस में रिपोर्ट होगी---पुलिस अाएगी और उधर मिलिट्री सीक्रेट सर्विस के जासूसो को देव और दीपा की तलाश होगी ही---यहां की स्थिति और जब्बार की लाश जासूसों को समझा देगी कि देव और दीपा को किस आधार पर ब्लैकमेल करके एम. एक्स. ट्रिपल फाईव चुरवाई गई----इससे अागे यह अनुमान जासूस खूद लगा लेगे कि काम खत्म होने के बाद पाक जासूस देव को खत्म करके एम. एक्स. ट्रिपल फाइव के साथ फरार हो गए है ।"




"और तुम सुरक्षित!"



"खुद को सुरक्षित रखने 'के लिए ही तो इतनी लम्बी-चौडी़ योजना वनाई थी ।"

अंजली और घर के नौकरों की तरह द्वीपा भी अंधेरे में भाग-दोड़ करने और चीख-पुकार मचाने वालो में शामिल हो गई थी…काम निपटाने के बाद फोल्डिंग टेबल उसने अपने कमरे में पहुंचा दी ।





करीब बीस मिनट वाद किसी ने 'फ्यूज' जोड़ दिया और सारी कोठी की लाइटे जगमगाने लगीं-सेनिक, रामू ,अंजली और दीपा की जुबान पर भी एक मात्र यह वाक्य था कि बदमाशों ने कर्नल साहब और देव को किडनैप कर लिया है। तो 'रामू' ने घटना की सूचना अपने चीफ को दी ।




तीस मिनट के अन्दर चीफ़ ही नहीं, बल्कि जनरल साहब भी वहां पहुंच गए और उनके कुछ ही देर बाद एक सिपाही इंस्पेक्टर साथ वहाँ पहुचा ।



सैनिको द्वारा जनरल साहब को चूंकि रिपोर्ट मिल चुकी थी । अत: नागर के पहुचते ही पुछा----" आपने बदमाशों का पीछा किया था…क्या वे हाथ आ सके ?''



"यस सर ।" नागर ने सम्मान दर्शाते हुए बताया-----" जिसका मैंने पीछा किया उस जीप में दो बदमाश भाग रहे थे, उन दोनों ही को मैंने गिरफ्तार कर लिया है!"



"कहां हैं?"



"जीप में-सिपाही लाते ही होंगे!"



" और उस जीप का कुछ पता नहीं लगा, जिसमें भगतसिंह और उनके लड़के को किडनैप करके ले जाया गया है?"



"नो सर-वे हमसे काफी पहले ही निकल चूकै थे!"


दोनों गिरफ्तार व्यक्तियों को ड्राइंग हाँल में ले आया गया-इस वक्त उनके चेहरे घुले हुए सफेद कपडे जैसे लग रहे थे-शक्ल से ही वे छंटे हुए बदमाश नजर आ रहे थे ---- खुद को इतने बड़े अफसर के सामने देखकर उनकी पैंटे गीली होने को तैयार थी ।



"क्या नाम है तुम्हारा?" जनरल साहब ने स्वयं पूछा ।



उनमे से एक तुरन्त बोल पड़ा-"मेरा चन्दू और इसका मल्लाह ।"




"कहां रहते हो?"



"धीमरे की चाल में ।"



इस तरह जनरल साहब के अनेक सवालो के ज़वाब में उन्होंने जो कुछ बताया, वह इस प्रकार था…"उनकी गिनती अपने इलाके के मवालियों में हेै----आज शाम सूक्खू और जगबीर नाम ने दो व्यक्ति उनसे मिले-बोले कि एक मिलिट्री अफ़सर' और उसके लडके को किडनैप करना है, अगर इस काम में हम उनकी मदद करें तो दोनों को 25-25 हजार रुपए मिलेगे-हालांकि मिलिट्री अफसर को किडनैप करने के नाम पर हमारे पसीने छूट गए थे, किन्तु एक ही रात में पच्चीस हजार कमा लेने का लालच वहुत वड़ा था, सो-हम तैयार हो गए-उन्होंने हम दोनों को पन्द्रह-पन्द्रह हजार केश दिए और रात को तैयार रहने के लिए कहकर चले गए-अब से करीब एक घंटा पहले दो जीपे हमारी चाल के बाहर अाकर रुकी-हमें एक जीप में बैठा लिया गया----देखा कि जीप में हमारे और सुवखू के अलावा तीन व्यक्ति और थे-हम उन्हें पहचानते थे और वे हमे, क्योंकि वे भी इसी शहर के दूसरे इलाकों के गुण्डे थे , हम समझ गए कि हमारी तरह उन्हे भी पच्चीस-पच्चीस हजार में तय किया गया है-जीपे समुन्द्र के किनारे जाकर रुकी-तव हमने देखा कि दूसरी जीप में जगबीर के साथ शहर के तीन अन्य गुण्डे थे-----हम आठों को वहाँ इकट्ठा करके सूक्खू और जगवीर ने हथियार दिए-कहा कि मिशन के दोरान जो सामने अाए उसे शूट कर दे----हम आठों हिचके ----

क्योंकि किसी ने भी इतना वड़ा वड़ा काम कमी न किया था, परन्तु पच्चीस हजार के लोभ ने हम सबको जकड़ रखा था साहब…फिर भी हमने कल्पना न की थी कि यह काम इतना खतरनाक होगा-अब से छ: तो शायद मारे ही गये हैं!"



"सुवखू और जगबीर को पहचान लोगे?" .



"हां साहब-सामने आ जाएं तो जरूर पहचान लेगें ।"




उनसे वाकी देर झक्क मारने के बाद जनरल साहब इस नतीजे पर पहुचे कि भगतसिंह और देव को दूंढ़ निकलने में वे कोई मदद न कर सकेंगे । अत: उन्हें नागर के सुपुर्द करके सीक्रेट सर्विस के चीफ के साथ एक अन्य कमरे में बन्द हो गए-जनरल ने पहला सवाल किया-"क्या इस घटना के बारे में आपकी अपनी कोई राय ?"




"मुझे तो इस घटना ने हैरान कर दिया है सर…समझ में नहीं अाता कि इतना खून-खराबा करके कौन लोग कर्नल साहब और देव का अपहरण क्यों करेगे?"



" इस घटना का सम्बन्थ एम. एक्स. ट्रिपल फाइव से तो नहीं है ?"




"मेरे दिमाग में भी तुरन्त यही सवाल अाया था सर कि कहीं इस अफरा-तफरी का लाभ उठाकर कोई प्राइवेट रूम में तो नहीं घुस गया!" चीफ ने कहा…"मगर जांच के बाद पाया-कि वहां सब ठीक है!"



" कैसे जाना?"




"जैसा कि अाप जानते हैं, यहां नौकरों के रुप में हमारे दो जासूस रह रहे थे-उनमें से एक इस मुठभेड़ में शहीद हो गया ~~-दुसरे को मैंने प्राइवेट रूम चैक करने भेजा उसकी रिपोर्ट है कि दरवाजे के ऊपर लगा बल्ब आँफ हे…इसका मतलब यह है कि उसके अन्दर कोई नहीं छुपा है, क्योकि अन्दर से चटक्नी लगते ही वह आँन हो जाता है"'



"तव तो यही हो सकता है कि किसी गिरोह ने एम. एक्स. ट्रिपल फाइव की सुरक्ष-व्यवस्था उगलवाने की मंशा से भगतसिंह को किडनैप किया हो!"



"यही एक विचार दिमाग में जाता है सर, लेकिन. . . ।"



"लेकिन . . . . ?"




"उनके साथ उनके लड़के को किडनैप क्यों किया गया?"

"हुं ।" जनरल साहब की मुद्रा सोचने वाली बन गई-चीफ चुपचाप उनका चेहरा देख रहा था, जबकि कुछ देर तक सोचते रहने के बाद जनरल साहब बोले----"क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कर्नल के लड़के का अपहरण गुण्डों ने कर्नल को टार्चर करने के लिए किया हो?"



"क्या मतलब सर?"



"ऐसा हो सकता है!" सोचने की-सी मुद्रा में जनरल साहब ने स्वयं ही से कहा-"गुण्डों ने यह सोचा होगा कि कर्नल के सामने उसके लड़के को टॉर्चर किया जाए तो शायद कर्नल जल्दी टूट जाएगा और उनके मतलब की जानकारी बक्क देगा"




"'मुमकिन है सर कि ऐसा ही हुआ हो मगर पिछली घटनाओं के बारे में सोचने और देव के करेक्टर की रोशनी में कर्नल साहब के साथ उसका अपहरण मुझें अजीब-सा लग रहा है!"



"पिछली घटनाएं और करेक्टर?"



"' ही देर पहले इंस्पेक्टर नागर ने मुझें वताया कि पिछले दिनों ट्रैजरी में एक डकैती पडी थी-अभी यह तो नहीं कहा जा सकता कि उस डकैती से देव का क्या सम्बन्ध था परन्तु इतने सबूत मिल चुके है जिनसे देव का सम्बन्ध उस डकैती से जुड़ता हे-इंस्पेक्टर को तो यह भी शक है कि देव पुलिस कै एक सब इंस्पेक्टर का हत्यारा है!"



"क्या कह रहे हो तुम ?"



"पिछले दिनों यहां भी उसकी गतिविधियां संदिग्ध रही हैं-साथ में उसकी पत्नी की भी-कर्नल साहब ने स्वयं उनकी शिकायत की थी ।"


" क्या ?"



चीफ ने कुछ कहने के लिए अभी मुंह खोला ही था कि धमाके की एक जोरदार अावाज ने उन्हें उछाल दिया-----ज़नरलं साहब अभी समझे भी नहीं थे कि चीफ़ उछलकर खडा होता हुआ बोला ---"'शायद फिर कोई गड़बड़ हो गई है सर?"




जनरल साहब भी उसके पीछे लपके।




'पूरी कोठी में एक वार पुन: भगदड़ मची हुई थी…सब एक-दूसरे से पूछ रहे थे कि "क्या हुआ-----मगर जवाब किसी के पास न था । चारो तरफ़ हंगामा-----शोर ।।।



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Jemsbond
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Re: सुलग उठा सिन्दूर

Post by Jemsbond » 07 Jun 2016 00:13


शीघ्र ही चीफ और जनरल साहब लॉन के उस हिस्से में पहुंच गए जहाँ बम फटा था , कोई जनहानि न हुई थी, किन्तु न किसी की समझ में इस विस्फोट का कारण ही अा रहा था और न ही यह कि हरकत किस ने की है ।
कमरा अन्दर से वन्द करने के बाद देव अपनी फूली हुई सांस को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा था-दीपा डरे हुए से नेत्रों से उसे देख रही थी----छोटा-सा सवाल वह बडी मुश्किल से पूछ सकी…"क्या हुआ देव?"





"इधर आओ!" दीपा का बाजू पकड़कर वह उसे लगभग घसीटता हुआ भीतरी कमरे में ले गया और दरवाजा बन्द करके इसकी भी चटकनी चढाता हुआ बोला…"शुक्र है कि प्राइवेट रूम से निकलकर मुझे यहाँ अाते किसी ने नहीं देखा-तुमने मेरा वहुत शानदार ढंग साथ दिया है दीपा…पत्नी हो तो तुम जैसी! "




"एम. एक्स. ट्रिपल फाईव मिली?"




""हां! " वह गर्व से बोला, "वह मेरे कन्धें पर लटके इस वेग में है, अब फौरन इस कोठी से निकलने की तैयारी करो ।"




"कोठी से निकलने की?" दीपा चौंकी ।



"हां ।"





"म-मगर पहले तो ऐसी कोई योजना न थी फिर कोठी से निकलकर भागने की हमें जरूरत क्या है-किसी को कानो-कान पता नहीं चलेगा कि हमने एम. एक्स. फाइव---!"




"योजना थी-मैंने तुम्हें पूरी स्कीम नहीं बताई थी दीपा!" देव ने जल्दी से कहा----"ओर अब----अब तो यहां से फरार हो जाना बेहद जरूरी हो गया है!"




"वह क्यों?"




"इंस्पेक्टर नागर यहां पहुच गया है-उसके पास मेरी गिरफ्तारी का वारंट है-वह सब कुछ जान गया है-यह कि हम जंगल से लूट की दौलत-लाये थे-यह भी कि हमने जब्बार की हत्या की है और अब यह राज कोठी में रहने वाले ज्यादातर लोग जानते हैं!"





"क-कैसे ?"




""उफ…बातों में गंवाने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है दीपा-----समय मिलने पर सब कुछ विस्तार से -समझाऊंगा------यहाँ रहा तो देख लिए जाने के एक पल बाद भी आजाद न रह है सकूंगा-निकलो यहाँ से ।"

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है-इस वक्त यहां सेनिक ही नहीं, बल्कि जनरल साहबं भी हैं और उन सबकी नजर से बचकर कोठी से निकलना असम्भव है!"




देव के होंठों पर अजीब मुस्कान दौड़ गई-बोला न इसीलिए तो मानना पड़ता है कि मुश्ताक नाम के आदमी के दिमाग में कम्यूटर फिट है!"




"क्या मतलब?"




"कोठी में इस वक्त जो हालात हैं उसकी हू-व-हू-कल्पना मुश्ताक ने पहले ही कर लो थी और वह पहले ही से समझा चुका है कि इन हालातों के रहते मुझे तुम्हारे साथ कोठी से कैसे निकलना है-बड़ा नायाब तरीका !"



"मगर यहाँ से भागकर जाओगे कहां?"



"स्रीरांक होटल-वहां कमरा नम्बर दो सौ सोलह हमारे फ़र्जी नामों से बुक है, सारी रात वहीं रहेगे-यह सारा इन्तजाम मुश्ताक ने किया है सुबह वह हमसे मिलने वहीं जाएगा-हम उसे एम. एक्स. ट्रिपल फाइव देगे और वह हमें बीस करोड़!"




"ब-बीस करोड़?" दीपा के रोंगटे खडे़ हो गए ।



"हाँ, बीस करोड़!" अपनी ही घुन में मगन देव कहता चला गया…"इस फाइल के बदले मुश्ताक हमे. बीस करोड रुपए देगा-बीस करोड़-जरा सोचो सही दीपा कि ये कितने रूपये होते हैं-मेरे ख्याल से ये सारा कमरा छत तक भर जाएगा-उफ--कितने अमीर हो गए हैं हम, बीस करोड़ रुपयों में तो छोटा-मोटा मुल्क भी खरीदा जा सकता है!"




दीपा के मुह से बोल न फूटा ।



हैरत के सागर में डूबी वह अपने पति की दीवानगी को देखती रह गई…पागल-सा हुआ जा रहा था देव-----ये दीवानगी उस पर विजली बनकर गिर पडी थी----ऐसी बिजली जिसने वहीं खड़े--खड़े उसे राख के देर में तब्दील कर दिया।



"अरे-क्या हुअा, तुम बोलती क्यों नहीं----हा-हा-हा ।" वह धीरे से हंसा, "सकते में अा गई हो शायद----यह सोचकर कि क्या हम सचमुच बीस करोड के मालिक वन गए हैं, मगर इस तरह सपनों में मत खो दीपा-इन बीस करोड का मजा हम तभी लूट सकेंगे, जव इस कोठी से सुरक्षित् निकल जाएं।"




"म-मगर तुमने तो कहा था देव कि यह सब हम देश के दुश्मनों के षडयंत्र को पर्दाफाश करने के लिए कर रहे हे?"

"तुम पागल की पागल ही रहोगी दीपा, अरे हमने किसी षडृयंत्र का पर्दाफाश करने का ठेका ले रखा है क्या, बेवकूुंफ मत वनो, वीस करोड़ रुपये किसी षडृयंत्र का पर्दाफाश करने से बहुत ज्यादा होते हैं ।"



दीपा ने मुर्खों की तरह पूछा----"तो क्या तुम बीस करोड हासिल करने के लिए एम. एक्स. ट्रिपल फाइव दुश्मनों के हवाले कर दोगे ?"



"इसमें दो राय नहीं ।"



"क्या तुमने सोचा है कि इसका अंजाम क्या होगा?"



"हुंह----तुमने शायद यह नहीं सोचा कि बीस करोड रुपये से क्या-क्या हो सकता है?"
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