चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल compleet

Jemsbond
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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 12:59


"हरामजादे, नमक हराम, उल्लू के पटूठे !" सफेद नकाबपोश के मुह से गालियों का सैलाब उमड़ पड़ा---अबे, अगर पिल्ला मर भी गया था तो ये बात तुझे उसके बाप के सामने कहने की क्या जरूरत थी--ये साला, मेरा नाम लेने वाला था -- मजबूर होकर मुझे इसका खेल खत्म करना पडा…वरना तो की काम का अादमी था ये-इसके जरिए मैं ऐसे-ऐसे खेल दिखाता कि … 'उफ्फ' "जी तो चाहता है कि तुझे भी गोली से उड़ा दूं भूतनी के !"'



"म-मगर मैं बता कहां रहा था बॉस.....।" काला नकाबपोश बोला------"वो....वो तो अाप ही ने मजबूर करके मुझ से पूछा. . .



"जुबान को लगाम दे चोट्टी के वरना सचमुच तेरा भेजा उड़ा दूगा ।"


इस बार काला नकाबपोश कुछ न बोला ।


कॉटेज में सन्नाटा छाया रहा ।


सफेद नकाबपोश मानो अपने गुस्से को नियंत्रित करने का प्रयत्न कर रहा था-उसकी अवस्था से स्पष्ट था कि जो कुछ हुआ है उसका उसे वेहद अफसोस है कुछ देर थोडा नियंत्रित होकर बोला----" मेरे मु'ह को क्या तक रहे हो कुत्ते, इस लाश को उठाकर वहाँ डाल दो जहां इसके लड़के कैद को रखा था ।"


एक साथ चार नकाबपोश औधें पड़े गिरधारीलाल पर झपटे ।
" आपके लिए फोन है शेखर शाब हैं' निक्यू ने सपाट स्वर में कहा ।


"किसका ? "


"बैरिस्टर साहब का ।" कहने के बाद बह चला गया ।



"शेखर मल्होत्रा यह सोचकर चकरा उठा कि बैरिस्टर विश्वनाथ ने उसे फोन क्यों किया है ?"


विस्तर से उठा ।


ड्राइंग-हाँल में मौजूद फोन के नजदीक पहुचा ।होल्ड-स्टैन्ड से रिसीवर उतारकर बोला---"हैलो ।"



"किरन तो वहां नहीं है ?" बैरिस्टर साहब की आवाज उभरी ।



"जी, नहीं तो---किरन तो आज अाई ही नहीं जबकि मुझे पूरी उम्मीद थी कि वह अायेगी ।"




"फिर कहां गई ?" बैरिस्टर साहब का स्वर चिंता में डूबा हुआ था---“तुम्हरे नामुराद केस की रि'-इन्वेस्टीगेशन के चक्कर में सुबह नो बजे की निकली हुई है और अव रात के नौ बज रहे थे-लंच टाइम के आसपास वह चाकू------विक्रता के मकान पर देखी गई थी ।"



" क- कौन चाकू विक्रेता ।"


"वही, जिससे तुमने संगीता को मारने के लिए चाकू खरीदा था ।"



यह सोचकर शेखर के होंठों पर फीकी मुस्कान रेग गई कि उसके प्रति बैरिस्टर साहब के रवैये में अभी तक कोई परिवर्तन नहीं अाया था, हां…थोड़े चौंके हुए स्वर में उसने सवाल जरूर किया-----“किरन वहाँ क्यों गई थी ?"



"तुम्हें नहीं मालूम ?" व्यंग्यात्मक स्वर ।



"जी-जी-मुझे क्या मालूम हैं'"



"पिछली रात चाकू-बिक्रेता का किसी ने कल्ल कर दिया है ।"


चौंके हुए स्वर में शेखर मल्होत्रा कुछ कहने ही जा रहा था कि दूसरी तरफ से इतनी वेहरेमी के साथ रिसीवर पटका गया कि शेखर के कान में धमाका होता महसूस हुआ और फिर ...... किर्र ..रं .... किर्र .... र्र ... की आवाज गूंजती चली गइं-रिसीवर वापस क्रेडिल पर रख कर अभी ठीक से मुड भी नहीं पाया था कि वेल पुन: बजने लगी ।



रिसीवर उठाकर बोला---" शेखर मल्होत्रा हियर ।"



जवाब तुरन्त न मिला , कम-से-कम पन्द्रह सेकेंड बाद धीमे से कहा गया----"किरन बोल रही हूं शेखर ।"



"क-किरन ?" वह उत्तेजित हो उठा-----"त-तुम आखिर हो कहा, तुम्हारे पापा तुम्हारे लिए बहुत परेशान हैं ।"



“वह सब छोडो शेखर !" किरन ने बात काट दी----“इस वक्त केवल वह सुनो जो 'मैँ' कहना चाहती हूं।"



" हा", बोलो क्या वात है ?"


"मैं संगीता के हत्यारे को पहचान चुकी हूं ।"



" क -- क्या ?"' शेखर उछल पड़ा ।


"मगर थोडी गड़बड़ हो गई है ।"


" कैसी गड़बड़ ?"


"वह भी जान चुका है कि मैं उसका रहस्य जान गई हूं और वह पागल की तरह मुझें सूंघता फिर रहा है---सबसे ज्यादा मुसीबत की बात है कि उसकी पहुच से ज्यादा दूर नहीं हूं !"
"क-कहां हो तुम ?"' शेखर पुरी तरह व्यग्र नजर आने लगा-----" प्लीज , बताओ किरन, तुम क्या हो, मैं इसी वक्त...........



"नहीं, फोन पर बताना मुनासिब नहीं होगा ।"



"फ-फिर. ?"



"शहर के बाहर ठीक उस स्यान पर नटराज का मन्दिर है जहां से पहाडि़या शुरू होती हैं ।"



"मैँने देखी हैं ।"



"सारे फोटो लेकर तुम वहीं पहुंच जाओ ।"'


"फ़-फोटो ?"



" "हां वे फोटो जिन्हें कल रात मेरी कोठी से अपनी कोठी के लिए रवाना होते-वक्त तुमने जूतों के अन्दर रखे थे--समझ रहे हो, न, मैं संगीता की मां और शहजाद राय के "फोटुओं की बात कर रही हूं ।"


"म-मगर वे फोटो-----।"'



उसे ज्यादा बोलने का अवसर दिये बगैर किरन बोली---"फोटुओं के साथ शहजाद बाय की सारी चिट्ठियां भी ले आना----वहीं तुम्हें दो आदमी मिलेंगे-घबराना बिलकुल मत, अपने ही आदमी हैं वे ---- उनके साथ चले आना, वे तुम्हें मेरे पास ले आयेंगे, ज्यादा सवाल मत करो…टाइम कम है ।"



" ठ ठीक है ।" शेखर ने कहा ।



"और सुनो ।" किरन ने रहस्यमय स्वर में कहा… "अभी मेरे इस फोन का जिक्र किसी से मत करना क्योंकि" मुमकिन है कि जिसे तुम मेरा और अपना शुभचिन्तक समझकर फोन करो वही संगीता का हत्यारा हो ।"'



" न-- नाम तो बता दो उसका ।"



"मिलने पर !" इन शब्दों के साथ दूसरी तरफ से रिसीवर रख दिया गया ।



शेखर मल्होत्रा के होंठों पर पहेलीनुमा मुस्कुराहट उभरी थी ।

" गुड , वैरी गुड गर्ल ।“ कहने के साथ सफेद नकाबपोश ने किरन की कनपटी से सटा रिवॉल्वर जेब के हवाले किया और बोला----" वाकई तुम वड़ी प्यारी लडकी हो, हमें तुमसे यही उम्मीद थी ।"



किरन चुपचाप उसकी तरफ देखती रही ।



' नकाबपोश ने उसके हाथ से वह कागज छीन लिया जिस पर लगभग वही वाक्य लिखे थे जो किरन ने फोन पर बोले थे…उन वाक्यों पर सरसरी नजर डालने के बाद नकाबपोश ने कहा----"बिल्कुल ठीक, ये ही सब वाक्य बोले हैं तुमने----इस पर्चे में केवल वे वाक्य नहीं हैं जो तुमने शेखर मल्होत्रा के सवालों के जबाव में कहे-हम खुश हैं कि तुमने उसके सवालों के जवाब भी ठीक दिये अौर बात करने का तुम्हारा लहजा भी हमें पसन्द अाया-----'' मल्होत्रा सात जन्म लेने के बावजूद नहीं समझ सकता कि फोन पर तुम नहीं तुम्हारी कनपटी पर रखा रिवॉल्वर बोल रहा था !"



"म-मगर मैं अभी तक नहीं समझ पाई कि तुम आखिर चाहते क्या हो ?"



"लो-अभी -- तक इतना नहीं समझ पाई तुम----भाई कमाल है?" अजीब से चटखारे के साथ कहता चला गया व्रह-“वेसे तो यही बुद्धिमान समझती हो खुद क्रो-जज साहब, बैरिस्टर साहब, अक्षय श्रीशस्तव और शहजाद राय जैसे धुरंधरों को धूल चटाने की इच्छा से संगीता मर्डर कैस की रि’-इन्वेस्टीगेशन करने निकल पड्री ।



किरन पर कुछ कहते न वन पडा ।


उसकी कुर्सी के ठीक सामने पडी मेज पर दो फोन रखै थे ।

एक का रिसीवर अभी तक सफेद नकाबपोश के हाथ में था ---यह रिसीवर वह था जिस पर उसने किरन और' शेखर के बीच हुई भी अक्षरश: सुनी थी…इस रिसीवर को फोन के केहिल पर रखता हुआ बोला वह-"खैर तुम नहीं समझी तो हम बता देते है---. बात ये है कि केवल कल का दिन बीच में है, परसों संगीता मर्डर केस का फैसला होगा और शहजाद राय के फोटो तथा चिट्टियां उस फैसले 'की ऐसी…तैसी फेर सकते हैं --- बिना वजह के खून-खराबे में मैं विश्वास नहीं रखता इसलिए तुम दोनों में से किसी को मारूंगा नहीं----इतना करना है कि फोटो और चिट्ठियां तुम्हारे सामने जला दूगा तथा परसों सुबह तुम्हारा टीका - वीका करके विदा कर दूगा ।"



किरन अव भी चुप रही ।



सफेद नकाबपोश ने आठ में से दो को कहा…"नटराज के मन्दिर म दोनों जाओगे ।"


"ओ.के. बॉस ।" दोनों एक सुर में बोले ।
नटराज का मन्दिर एक उजाड़ स्थान पर था ।



चारों तरफ और दूर-दूर तक साये अधंकार को शेखर मेल्होत्रा आंखे फाड़कर घूर रहा था है ।।



दिल वहुत जोर'-जोर से धड़क रहा था उसका ।



" अचानक एक शक्तिशाली टॉर्च के 'प्रकाश झागों' ने अधंकार के मुंह पर जोरदार चांटा जड़ा ।



शेखर सतर्क हो गया ।


प्रकाश दायरा मन्दिर प्रांगण और दीवारों पर यात्रा करने के बाद उसके जिस्म पर अाकर ठहर गया-दायरा इतने व्यास का था कि शेखर का सम्पूर्ण जिस्म प्रकाश झागों से नहा उठा-मिचमिचाती आंखों से उसने टॉर्च की तरफ देखने की केशिश की मगर रंग-बिरंगे सितारों और प्रकाश दायरे के उदृगमस्थल के अलावा कुछ नजर न आ सका ।



फिर !



दायरे का उदृगमस्थल उसकी और बढने लगा ।



आंखों के आगे अपना हाथ अड़ाकर शेखर चुपचाप खडा रहा ।



सामने उसकी तरफ आता दायरे का उदूगम अभी दस-पांच कदम दूर ही था कि पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा…चिहुंककर शेखर पलता, लम्बी--लम्बी और मोटी मूंछों वाला एक कुम्भकरण सरीखा व्यक्ति उसके निकट खड़ा था…रंग काला भुजंग, चेहरा इतना चौडा जैसे रामलीला ग्राउण्ड में खडे कुम्भकरण के पुतले का हो ।



“फोटो और चिट्ठियां लाये हो ?“ उसके मुह से गड़गड़ाहटदार आवाज निकली ।



सहमते हुए शेखर ने कहा---"हां ।"



“कहां हैं ?"


"म-मेरी जेब में ।" उसने थूक सटका ।


, "मुझे दो ।"



"नहीं ।" शेखर ने कहा-“फोटो तुम्हें नहीं, केवल किरन को दूंगा ।"



"दिखा तो सकते हो ? कहाँ हैं वह है?"



"जरूर ।" कहने के साथ उसने जेब से एक लिफाफा निकालकर कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति को दिखाया और उसने लिफाफा के लिए हाथ बढाया ही था कि शेखर ने फुर्ति के साथ वापस जेब में रखते हुए कहा----“कह चुका हू कि लिफाफा केवल किरन के हाथ में दूंगा ।"

कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति ने कुछ ऐसे अन्दाजा में उसकी तरफ देखा जैसे जल्लाद अपने शिकार को देखता है--मुस्कुराने के प्रयास में उसके लम्बे-लम्बे और चौडे दांत जो चमके तो शेखर सिहरकर रह गया, वड़े ही कातिलाना अन्दाज में कहा उसने---"'' ऐसा चाहते हो तो ऐसा ही सही, चलो ।"


कहने के बाद वह मुड़ा और एक तरफ़ को चल दिया ।


शेखर उसके पीछे था ।


प्रकाश दायरा साथ-साथ चल रहा था ।


मुश्किल से पन्द्रह मिनट बाद वह 'बड' के घने वृक्ष के नीचे छुपी खडी विना नम्बर प्लेट बाली काली एम्बेसेडर के नजदीक पहुच गये-उस पर नजर पड़ते ही शेखर चीख पड़ा-“न-नही, तुम किरन के भेजे हुए अभी नहीं हो ..... ।"


चेहरे पर "भड़ाक" से घूंसा पड़ा ।

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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 13:00


अागे के शब्द न केवल चीख में तब्दील होकर रह गए बल्कि किसी पतंगे की तरह हवा में उछलकर वह दूर जा गिरा---कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति का घूंसा ऐसा लगा था जैसे लोहे का मूसल चेहरे से टकराया हो ।



प्रकाश का दायरा उसी पर स्थिर था ।


शेखर उठने का प्रयत्न कर रहा था कि कुम्भकरण सरीखा व्यक्ति निकट पहुंचा --- गिरेबान पकडकर उसने शेखर को इस तरह उठा लिया जैसे रबड़ का बबुआ हो और फिर जो उसने ताबड़तोड़ बार करने शुरू किये तो-----


शेखर की चीखें सन्नाटे का भेजा उड़ाने लगी ।


ऐसा लग रहा था जैसे जिस्म पर लोहे के मूसल और घन बरस रहे हों ।



हाथ-पैर तो शेखर ने वहुत मारे मगर सच्चाई ये है कि कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति को छू तक नहीं सका वह, शीघ्र यह बात समझ में आ गई कि उसकी एक न चलेगी और-बस इस बार जो जमीन पर जाकर गिरा तो वहीं पड़ा रह गया !!


हिला तक नहीं ।


वह बेहोश हुआ नहीं था मगर दर्शा खुद को बेहोश ही रहा था । बचाव का एकमात्र वही रास्ता सूझा था उसे ।



प्रकाश दायरा उसी पर स्थिर था-कुम्भकरण सरीखा व्यक्ति लम्बे-लम्बे कदमों के साथ नजदीक पहुंचा -भारी बूट की इतनी जोरदार ठोकर पसलियों पर शेखर का दिल हलक फाड़कर चीख पड़ने के लिए करने लगा ।



परन्तु!


चीख अपने हलक से उसने निकलने नहीं दी-जानता था कि अगर मुंह से सिसकारी भी निकल गयी तो सचमुच में बेहोश होने या मर जाने तक मार खानी पडेगी, जिस्म में "एक्स्ट्रा हरकत तक नहीं होने दी उसने । "



प्रकाश के उदगम से आवाज उभरी ----" शायद बेहोश हो गया है ।"


कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति ने विना एक भी शब्द मुंह से निकाले शेखर के ढीले पडे जिस्म को कंधे पर लादा और किसी जिन्न की मानिन्द विना नम्बर प्लेट वाली काली एम्बेसेडर की तरफ वढ़ गया ।
घुमावदार पहाडी सडक पर करीब तीस मिनट की चढाई के बाद विना नम्बर वाली, काली एम्बेसेडर सरकारो डाक बंगले के प्रांगण में रूकी --- चारों तरफ खाइंया और ऊंचे-ऊंचे पहाड अंधेरे की गोद में मानो सो रहे ये।

जाग रही थी सिर्फ एक नदी ।
बहुत नीचे, एक खाई में वह रही थी वह और वातावरण में गूंज रही थी पानी से पत्थरों के टकराने की आवाज़ ।


नदी वाली खाई के ठीक ऊपर एक झोंपडी थी--

हालांकि थी तो वह भी सरकारी डाक बंगले का ही हिस्सा परन्तु डाक बंगले से जरा हटकर वनी हुई थी-पर्वतों की मानिन्द यह भी अधिकार की चादर ढांपे सोई पड़ी थी ।




डाक बंगले की मुख्य इमारत नदी की तरह जाग रही थी ।



यानि उसके अन्दर टूयूब का प्रकाश नजर आ रहा था ।



कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति ने शेखर के जिस्म को पुन: "कंधे पर लादा और गाडी का दरवाजा खोलकर बाहर आ गया…ड्राइविंग सीट का दरवाजा खोलकर पहले ही एक व्यक्ति बाहर निकल चुका था-इस वक्त अपने चेहरे उन्होंने काले नकाबों से ढक लिए थे ।



बाॉस का आदेश शायद यह था कि किरन किसीकी शक्ल न देख पाए ।



हॉत में पहुचते ही कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति ने शेखर के जिस्म को किरन की कुर्सी के नजदीक इस तरह डाल दिया जैसे अादमी का जिस्म न होकर चीनी की बोरी हो ।



शेखर को इस अवस्था में देखते ही कुर्सी से बधी किरन का रंग उड़ गया-



उधर, कुम्भकरण सरीखे व्यक्ति ने हॉल में मौजूद _छ: नकम्बापोशो में से एक से पूछा-"बॉंस कहाँ हैं ? "'



" तुम्हारे जाने के बाद बॉस को "बाकी-टाकी पर कोई मेसेज मिला था जिसे सुनते ही वे चले गए ।"


"कुछ कहकर गए ?"



" हां कह गए हैं कि इसे झोपडी में कैद करके रखा जाए ।" नकाबपोश ने कहा---"सख्त हिदायत दे गए हैं कि कसकर बांधा जाए इसे तथा मुकम्मल चौकसी की जाए कहीं ऐसा न हो कि यह भी भागने के चक्कर में नदी में गिर जाए ।"



"बॉस कब तक आंयेगे ?"


"इस वारे में कुछ नहीं कह गए…क्या इसके पास है फोटो हैं जिनकी बॉंस की तलाश है?"



“लिफाफा तो इसने दिखाया था ।"



"कहीँ ऐसा न हो कि लिफाफा भी बैरिस्टर की बेटी के पर्स की तरह खाली हो ।"


"मैँ देख लेता दूं।” कहने के बाद कुम्भकरण सरीखा व्यक्ति शेखर के जिस्म पर झुका ही था कि…

नकाबपोश ने कहा-" ठहरो ।"


"क्या बात है ?"' कुम्भकरण चौंका ।


"बाँस खास हिदायत दे गए हैं कि हममें कोई फोटो और चिट्ठियों को न देखे ।"



" क्यों ?"



" कारण बांस जाने ।"


"कुछ देर और उनके बीच इसी किस्म की बाते होती रहीं और बातों की समाप्ति पर कुम्भकरण शेखर के जिस्म को उठाकर झोंपडी से पहुचाने के मकसद से झुका ही था के-

'".....खनाक ......खनाक ......खनाक !"



हाँल में चारों तरफ कांच के टूटने की आवाज़ गूंजी !



आठों नकाबपोश बुरी तरह चौंके और खिड़कियों पर लगे कांच के स्थान पर नजर आ रही रायफ्लों पर अभी उनमें से किसी की नजर पडी थी, कि हाँल में आवाज गूंजी--- " हिलने वाले को गोली से भून दिया जाएगा ।"



सभी बौखला गए ।



तभी दूसरी आवाज उभरी ---" खबरदार, डाक बंगले को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया है ।"
"ध-धोखा !" चीखते हुए कुम्भकरण ने किरन की कुर्सी की बैक में जम्प लगा दी…“हमारे साथ धोखा हुआ है ।"



जागा ने फुर्ती के साथ जेब से रिवॉल्वर निकाला।



"धांय ! "


दरवाजे से एक गोली चली सीधी रिवॉल्वर वाले के हाथ में लगी ।



हाथ से रिवॉल्वर निकला, मुह से चीख और इसी अफरा-तफरी का लाभ उठाकर बाकी सभी नकाबपोशों ने खुद को फर्श पर गिरा दिया, रिवॉल्वर सभी ने निकाल लिए थे ।



“मोर्चा लेने की केशिश मत करो ।" खतरनाक चेतावनी गूंजी----"तुम लोग इस तरह धिर चुके हो कि बचकर एक भी नहीं निकल सकेगा, हथियार लेकर हाथ ऊपर उठा लो ।"


"प-पुलिस साली यहां कैसे पहुंच गई ?" कुर्सी के बैक में छिपा कुम्भकरण बड़बड़ाया और फिर किरन पर नजर पड़ते ही जाने क्या हूआ कि खतरनाक स्वर में गुर्रा गुर्रा उठा-तू बहुत चालाक है ।। मुझे लगता है कि तूने ही किसी चालाकी से पुलिस यहाँ बुलाई है ।"



उसके तेवर देखकर किरन के होश उड़ गए ।


पलक झपकते ही कुम्भकरण ने जेब से रिवॉल्वर निकाला और उसकी नाल किरन की कनपटी पर रखकर गुरोंया--" हमारा भले ही चाहे जो अंजाम हो मगर तेरी मौत शायद मेरे ही हाथों से लिखी थी ।"



किरन बंघी हुई थी, कुछ भी तो नहीं कर सकती थी वह । लगा कि वह मरने वाली है ।



ट्रेगर पर बढ़ता कूम्भकरण की मोटी अंगुली का दबाव वह साफ देख रही थी ।


" न न नहीं !" कर्णमेदी दहाड के साथ शेखर ने अपने दोनों पैर किरन की कुर्सी में मारे ।
"थाय !" कुम्भकरण के रिवॉल्वर से निकली जिस गोली को किरन का भेजा उडा देना चाहिए था बह हवा में 'सनसनाती' लकडी की दीवार में जा धंसी क्योंकि शेखर के दोनो पैरों ( ने कुर्सी को किरन सहित फर्श पर गिरा दिया था, उधर किरन के हलक से चीख निकली, इधर वातावरण गोलियों की आवाज से थर्रा उठा ।



नकाबपोशों द्वारा समर्पण न किए जाने के परिणामस्वरूप चारों तरफ से गोलियां बरसने लगी थीं ।



नकाबपोश भी फायरिंग कर रहे थे ।



शेखर उछलकर रव्रड़ा हो गया ।



"हरामजादे ....कमीने..... तू नाटक कर रहा था ?" रिवॉल्वर ताने कुम्भकरण दह्मड़ा----“इसका मतलब वे हूआ कि सारी चाल तेरी है, अपने साथ पुलिस तू लाया था, ले इनाम ।"



"धांय !"


_"गुस्से की ज्यादती के कारण पागल से हुए कुम्भकरण ने एक गोली चलाई और उस गोली को शेखर मल्होत्रा के जिस्म में घुसने से रोकने वाला कोई न था ।"



"हॉं औधीं पड़ी कुर्सी के साथ बंधी किरन ने एक मुकम्मल दृश्य देखा था ।



शेखर मल्होत्रा का अंजाम देखकर वह चीखने वाली मशीन की तरह चीखती चली गई और बुरी तरह जख्मी तथा लहू-लुहान हुए शेखर मल्होत्रा ने कुम्भकरण पर जम्प लगा ।



कुम्भकरण ने एक और फायर कर दिया । इस वार चीख के साथ शेखर मल्होत्रा लहराया और धड़ाम से औंधी पडी कुर्सी के नजदीक आ गिरा, उसका चेहरा किरन के चेहरे के बहुत नजदीक था मगर कैसी विवशता थी कि वह उसे स्पर्श न कर सकती थी ।
शेखर मल्होत्रा शान्त पड़ चुका था ।


निश्चल !



किरन का चीखना आश्चर्यजनक ढंग से रुक 'गया ।


अवाक-स्री रह गई वह ।


शेखर मल्होत्रा के चेहरे को यूं देख रही यी मानो स्टैचू शून्य को निहार रहा हो…उसे लगा कि वह बेगुनाह शख्स मर चुका है और यह क्षण ऐसा था जिसने किरन के दिल को उसके प्रति असीमित प्यार से लबालब भर दिया, जोर लगाकर उसने कुर्सी सरकाई और फिर ......... शेखर मल्होत्रा के चेहरे का चुम्बन कर लिया उसने । '



तभी किसी ने गोलियां चलाकर हॉल लगी टूयूब्स फोड दीं ।



चारों तरफ अन्धेरा छा गया ।


घुप्प अन्धेरा !!



वही क्षण था जब फायरिंग की आवाज के बीच कुम्भकरण नुमा शख्स की डकारें गुंजी और किरन ने महसुस किया कि एकाएक अत्यन्त भारी जिस्म कुर्सी के पाये से उलझकर फर्श पर जा गिरा ।



फायरिंग की आवाजें धमने का नाम न ले रही थी--अनगिनत टॉ'र्चों के गोल प्रकाश दायरे हॉल में भागे-भागे फिर रहे थे और गूंज रही थी यह चेतावनी कि पुलिस ने डाक बंगले के चारों तरफ घेरा डाल लिया है ।



किरन उन आवाजों को बखूबी पहचान सकती थी ।


एक आवाज इंस्पेक्टर अक्षय की थी ! दूसरी उसके पापा बैरिस्टर विश्वनाथ की ।
"देखो ...... देखो पापा, शेखर मल्होत्रा मर गया ।" किरन किसी पागल की भांति चीखे चली जा रही थी ----" क्या अब भी आपको यकीन ना आया कि यह बेगुनाह था--- क्या इसकी लाश भी इस बात का सबूत नहीं है कि इसने संगीता की हत्या नहीं की थी ----

खुद को बेगुनाह साबित करने के सफर इसने अपनी जान दे दी ---
आप…आप तो अभी भी यही कहेगे कि शेखर मल्होत्रा कोई नाटक कर रहा है, मगर नहीं--नाटक नहीं है, इसकी मौत इसकी बेगुनाही का सबूत है-मरता-मरता वह मुझ पर एक कर्ज चढा गया पापा, अपनी जान इसने मुझे बचाने के फेर में दी है जो गोलियां मेरे जिस्म की तरफ़ लपकी थी उन्हें इसने अपने शरीर में शरण दे दी ......... उफ........ ।"



"रुको किरन, रुको ।" शेखर की नज्ज हाथ में लिए बैरिस्टर विश्वनाथ ने कहा…“नब्ज चल रही है, शेखर मल्होत्रा अभी जीवित है !"


किरन दंग रह गई ।


किसी साधु के शाप से मानो स्टैचू में तब्दील हो गई ।



जबान को लकवा मार गया ।


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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 13:00


"डॉक्टर को फोन करो इंस्पेक्टर ।” विश्वनाथ चीखे----"शेखर मल्होत्रा बच सकता है ।"


किरन के बंधन खोल रहे अक्षय के हाथ रुक गये----जाने क्या सोचते रह गया वह कि बैरिस्टर साहब स्वयं आकरर फोन के नजदीक पहुचे और जल्दी-जल्दी नम्बर डायल करने लगे ।



जाहिर था कि फायरिंग रुक चुकी थी ।


जंग समाप्त हो गयी थ्री ।


कुम्भकरण व्यक्ति सहित तीन नकाबपोश मारे गये थे… बाकी जख्मी हूये थे और इस वक्त वे पुलिस के चंगुल में थे…अक्षय ओर बरिस्टर के साथ पुलिस के दस सिपाही ।

सभी हाथों में मोजूद टॉर्चे इस वक्त अॉन थी ।
हॉल में भरपूर प्रकाश था ।


उधर डॉक्टर को फोन करने के बाद बैरिस्टर विश्वनाथ ने रिसीवर क्रेहिल पर रखा । इधर अक्षय ने किरन के बंधन खोल दिये, अाजाद होते, ही उसने शेखर का सिर अपनी गोद में रख लिया और उसे पुकारने लगी ।



किरन बैरिस्टर विश्वनाथ ने कहा…"खुद को सम्भालो वेटी इस वक्त उसे जगाने की कोशिश मत करो ।"

किरन ने एक झटके से अपने पापा की तरफ देखा और उस वक्त उसके चेहरे पर कुछ ऐसे भाव थे कि बैरिस्टर विश्वनाथ के समूचे जिस्म में मोत की झुरझुरी दौड़ गई…फूल -सा कोमल चेहरा और चांद के रंग का चेहरा इस वक्त कोयले की मानिन्द काला और खुरदरा नजर आ रहा था-आंखों में आंसुओं के साथ-साथ तैर रहा था खून -----खून भरी वे आंखें अपने पापा के चेहरे पे गाड़कर उसने कहा-----"मैं हत्यारे को पहचान चुकी हूं पापा ।



"क-कोन है ?"' बैरिस्टर विश्वनाथ की जुबान लड़खड़ा गई ।



"नहीं ।" किरन ने अजीब से स्वर में कहा----'-" नहीं बताऊंगी ।"


"क-क्यो ?"


"आपको यकीन नहीं आयेगा।”


" म म मतलब ?"


"विना सबूत, विना तर्क, विना शहादतों और विना गवाह के आपने किसी पर विश्वास करना नहीं सीखा न. . . इसलिए अभी मैं उसका नाम नहीं लूंगी ......अभी तो मैं केवल उसका मनहूस चेहरा देख पाई हूं…सबूत, गवाह और शाहदतें जुटानी बाकी हैं, मगर आप फिक्र न करें-----मुझे मालूम है कि वह सब आसानी से जुटा लूंगी------

अगर शेखर मर गया असली हत्यारे को फांसी कराना मेरी उसे श्रद्धांजलि होगी ।"



"फिक्र मत करों बेटी शेखर शायद बच जायेगा । बैरिस्टर साहब ने कही---"संयोग से एक भी गोली जिस्म के किसी नाजुक हिस्से में नहीं लगी है…एक पेट में और एक कंधे में-हालांकि खून काफी निकल चुका है, गोलियों का जहर भी जिस्म में फैल रहा होगा----अगर शीघ्र ही मैडिकल एड मिल जायेगी तो

" ये - ये किसकी लाश है ?"' झोंपडी के फर्श पर पडी लाश की तरफ संकेत करके बैरिस्टर विश्वनाथ ने पूछा है

किरन अपने पापा के सवाल का ज़वाब न दे सकी-गले में मफ्लर डाले, लाल कमीज, मुडी हुई चीन और घिसे . हुए जूते पहने युवक की लाश से उनकी नजरे" हट न रही थी-------------याद आ रहा था वह दृश्य जब इसे देखकर शेखर मल्होत्रा का भ्रम हुआ था फिर इसने, शेखर मल्होत्रा को विनोद मल्होत्रा और खुद को शेखर मल्होत्रा बताते हुए एक ऐसी चक्करदार कहानी सुनाई थी कि वह चकराकर रह गइं-यह कहना गलत न होगा कि उस वक्त किरन को 'यह' सच्चा और शेखर मल्होत्रा झूठा लगा था-सबसे सशक्त कारण था इसकी शक्ल--आवाज ।


मगर इस वक्त ।।।।।



इस वक्त कोई नहीं कह सकता था कि उसकी शक्ल का शेखर मल्होत्रा की शाल से कोई सम्बन्य रहा होगा ।



चेहरे के चिथड़े उड़ गए थे…हत्यारे की तीन गोलियां चेहरे ही पर लगी थीं.........लहूलुहान और उघड़ गये चेहरे की शिनाख्त करना किसी के वश में नहीं था-झोपड्री की दीवार में लगी टूयूब अॉन थी---भरपूर प्रकाश था वहाँ किन्तु किरन स्वयं यकीन न कर पा रही थी कि यह शख्स मल्होत्रा का इतैवट्रोस्टैट कापी धा ।



झोंपडी के एक कोने में कुर्सी पड़ी थी ।


कुर्सी के नजदीक पड़ी थी रेशम की डोरी।


इस बार इंस्पेक्टर अक्षय ने पूछा-“क्या अाप जानती हैं किरन जी कि यह किसकी लाश है ?"




"मेंरे ख्याल से नाम तो इसका गिरधारी लाल था मगर------


"मगर ?"


" यह वह शख्स है जिसकी शक्ल और आवाज के जाल में फंसकर मैं हत्यारे की कैद में फंस गई !"



"क्या मतलब ?"



"क्या लाश को देखकर आप कल्पना कर सकते है कि इसकी शक्ल और आवाज शेखर मल्होत्रा से हू-ब-हू मिलती थी ?"


"क-क्या बात कर रही हो बेटी ?" बैरिस्टर विश्वनाथ कह उठे---"भला ऐसा कहीं होता है ?"


"मुझे नहीं मालूम पापा कि कैसा होता है और कैसा नहीं---बस इतना जानती हूं कि आपने खुद को उन सिद्धांतों और मान्यताओं में बांधकर रख लिया है जो आपको आपके तजुर्बै ने दिये हैं---अपने सिद्धांतो और मान्यताओं के दायरे से बाहर निकलकर न अाप कुछ सोचना चाहते हैं, न मानते हैं, मगर मैं उन सबको भला झुठला सकती हूं जो अपनी आंखों से देखा है, कानों से सुना है ?"


"क्या देखा-सुना है तुमने ?"



एक ही सांस में किरन ने होटल में गिरधारी लाल के मिलने से लेकर उसकी मौत तक का वृतांत कह सुनाया -----
विश्वनाथ और अक्षय की आंखें मारे हैरत के फेल गई थी जबकि किरन कहती चली गई-"जव इसे पता चला कि इसका बेटा मर गया है तो यह पागल हो उठा बॉस के नाम का पर्दाफाश करने ही वाला था कि हत्यारे ने मजबूर होकर अपने रिवॉल्वर से इसके चेहरे में आग पर दी 'मजबूर' शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रही हूं क्योंकि हत्यारा दिल से इसे मारना नहीं चाहता था-उसफे दिमाग से इसके बहूत से इस्तेमाल थे ।"



"इसका इस चेयर पर कैद रहा होगा ।" अक्षय ने क्या ।



"कुर्सी के नजदीक पडी रेशमी ड़ोरी से जाहिर है कि 'अंकुर' को वहां बांधकर रखा गया था मगर बच्चा होने के कारण, अपने हाथ पैर नन्हे-नन्हे होने के कारण किसी तरह वह आजाद हो गया और झोंपडी से बाहर निकल पड़़ा ---- आप लोग देख चुके हैं कि झोपडी और डाक बंगले की मुख्य इमारत के बीच सीधी नदी की तरफ़ चला गया है कितना जबरदस्त ढलान है---अंकुर उस ढलान पर लुढ़कने से खुद को न रोक सका और नदी में जा गिररा ।"



"सबसे ज्यादा हैरत की बात यह है कि डाक बंगला सरकारी है और हत्यारा इसे अपने अडडे के रूप में इस्तेमाल कर रहा था ।" बैरिस्टर साहब कहते चले गये---, "सवाल ये है कि ऐसा हुया तो कैसे , डाक बंगला इन दिनों किसके नाम से बुक है और यहीं का चौकीदार कहाँ चला गया है"' …


एक कांस्टेबल मानो उनके इसी सवाल का इंतजार कर रहा था, झोंपडी में दाखिल होते हुए उसने बताया---" डाक बंगले के किचन में यहाँ का चौकीदार मिलाहै सर…उस बुडूढे के हाथ-पेर किसी ने कसकर बांधे हुए थे, मुंह में कपड़ा ठूंसा पड़ा था और इससे ज्यादा वह कुछ नहीं बता क्या है कि कल दोपहर कुछ नकाबपोशों ने अचानक हमला किया

उसे बांधकर किचन में डाल दिया तथा डाक बंगले पर कब्जा कर लिया !

किरन, बैरिस्टर विश्वनाथ और इंस्पेक्टर अक्षय के बीच कुछ देर के लिए सन्माटा छा गया ।


फिर वे झोंपडी से बाहर निकल आए ।


ढलान वाकई बेहद खतरनाक था-ऐसा कि अगर एक बार उस पर कोई लुढक जाए तो निश्चित रूप से सीधा नदी में जाकर गिरे-ढलान पर पड़े पत्थरों के बीच पैर फंसा-फंसाकर वे उतरने लगे और उस स्थान पर पहुच गए जहाँ दो पत्थरों के बीच एक छोटा-सा जूता पड़ा था ।



जूते को उठाकर ध्यान से देखते हुए अक्षय ने कहा… "अंकुर की उम्र दस साल के आसपास रही होगी !"


कोई कुछ नहीं बोता ।


सम्भल-सम्भलकर और पैर जमाते हुए वे खाई में उतर गए, नदी तट पर खडे तेज बहाव के बीच बच्चे का शव ढुंढने की कोशिश कर रहे थे-एकाएक किरन की नजर पत्थर पर पडी जिस पर 'हल्का-सा खून लगा हुआ था,मुंह से बरबस ही वे शब्द निकल गए…“ढलान से लुढ़कने बाद अंकुर शायद इस पत्थर से टकराया था ।"



"बहाव इतना तेज है कि बच्चे की लाश मिलने की हमें उम्मीद ही छोड़ देनी चाहिए ।"



बैरिस्टर साहब ने लगभग सच कहा था इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया---हॉं किरन ने यह जरूर पूछा-"आप लोग इतनी फोर्स के साथ अचानक यहाँ कैसे पहुच गए ?"


"हमेँ तुम्हीं ने बुलाया था ।"


किरन उछल पडी--" म म मैंनें ?'


"कह तो शेखर मल्होत्रा यही रहा था ।"

" श -शेखर कह रहा था, क्या कहा उसने ?"
"तुम सुबह नौ बजे की घर से निकली हुई थी, हम फिक्रमन्द थे और जहा-जहा तुम्हारे होने की सम्भावना थी वहां फोन करके पूछ रहे थे कि वहां पहुची हो या नहीं ---शेखर मल्होत्रा को भी फोन किया, उस वक्त उसने कहा कि तुम उसके पास नहीं पहुंची थी मगर करीब पन्द्रह मिनट बाद स्वयं शेखर मल्होत्रा ने हमें फोन किया और कहा कि हमारे फोन के तुरन्त बाद ही उससे फोन पर बात की है----उसने यह भी कहा कि तुम्हारी बातो से उसने यह अन्दाजा लगाया है कि तुम किसी की कैद में हो !"



"ओह इसका मतलब मेरा मेसेज शेखर मल्होत्रा की समझ में आ गया था ?"



"हत्यारा मुझसे राय अंकल के पत्र और फोटो चाहता था ।" किरन ने कहना शुरू किया---उस वक्त मेरे दिमाग में यह बात कोंधी कि हत्यारे की इस गर्ज का लाभ उठाकर अपने शुभचिन्तर्कों को न सिर्फ यह पैसेज पहुचा सकती हूं कि मैं किडनेप कर लीगई बल्कि यह भी बता सकती हूं कि कहाँ हूं और अपनी सकीम को अंजाम देने के लिए मैंने कह दिया कि फोटों और चिट्टियां शेखर मल्होत्रा के पास हैं, पहले तो उन्होंने मेरी इस बात को झूठ माना कहने लगे कि पिछली रात वे शेखर मल्होत्रा की तलाशी ले चुके हैं-फोटो और पत्र उसके पास नहीं है-मैंने पूछा कि क्या तुमने उसके जूतों की तलाशी ली थी उन्होंने इंकार किया---बस-मैंने बात पकडकर कहा कि फोटो और पत्र . उसके जूतों में थेे…अब हत्यारे को यकीन हो गया कि मैं सच बोल रही है तो वही हुआ जिसकी मुझे उम्मीद घी यानि उसने शेखर से बात का हुक्म दिया, इस कागज पर वे बातें लिखी जो मुझे शेखर से करनी थी…-साथ ही, जबरदस्त तरीके से धमकाया कि अगर मैंने कागज पर लिखी बातों से हटकर कोई अन्य बात, खासतौर पर ऐसी वात कहने की बेवकूफी की जिससे यह ध्वनित होता हो कि मैं किसी के द्वारा किडनैप हूं या 'ये' बाते किसी के दबाव में कर रही हू तो बेहिचक मुझें शूट कर देगा-मैंने सहमते हूये कहा कि वही करूंगी जो वह कहेगा और तव ..... प्रैक्टकत शुरू हुआ-शेखर मल्होत्रा का नम्बर मिलाकर मेरे हाथ में रिसीवर तथा दुसरे में कागज पकडा दिया--स्वयं हत्यारे के एक हाथ में उसी फोन के 'एक्सटेंशन' का रिसीवर तथा दूसरे में रिवॉल्वर था… रिवॉत्त्वर उसने मेरी कनपटी से सटा दिया, सखत हिदायत दी कि अगर एक भी बात इधर से उधर करने की कोशिश की तो खोपडी का तरबूज बना दिया जाएगा ।"



बैरिस्टर विश्वनाथ ने धड़कते दिल से पूछा----"फिर तुमने शेखर को यह 'मैसेज़' कैसे दिया कि तुम किडनैप और जो कुछ कह रही हो किसी के दबाव के कारण मजबूर होकर कह रही हो ?"



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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 13:01

किरन के होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान उभरी, ऐसी टैक्नोक से जिसे हत्यारा सात जन्म के बावजूद नहीं समझ सकता था-मुझें फोन पर वे और सिर्फ "वे ही' शब्द कहने थे जो हत्यारे ने पर्चे पर लिखे थे और शेखर मल्होत्रा को उन्हीं शब्दों से समझ जाना था कि मैं किडनैप हूं किसी की कैद में है और जो कुछ कह रही हूं मज़बूर होकर कह रही हुं ।"



"कैसे समझ जाना था उसे ?"



"मैंने सोचा था, जव कहुंगी कि फोटो और चिट्ठियां लेकर नटराज के मन्दिर में पहूंच जाओं तो शेखर स्वत: समझ जाएगा कि मैं किसी की कैद में हूं दबाव में हूं --क्योंकि असल में फोटो और चिट्ठियां शेखर के पास थी ही नहीं--मैंने सोचा था कि शेखर मेरी यह बात सुनते ही सोचेगे कि जव किरन को मालूम है कि फोटो और चिट्ठियां मेरे पास नहीं है तो वह ऐसा कह ही क्यों रही है-कि......मैं किसी के द्वारा किडनैप हूं या 'ये' बाते किसी के दबाव में कर रही हू तो बेहिचक मुझें शूट कर देगा-मैंने सहमते हूये कहा कि वही करूंगी जो वह कहेगा और तव ..... प्रैक्टकत शुरू हुआ-शेखर मल्होत्रा का नम्बर मिलाकर मेरे हाथ में रिसीवर तथा दुसरे में कागज पकडा दिया--स्वयं हत्यारे के एक हाथ में उसी फोन के 'एक्सटेंशन' का रिसीवर तथा दूसरे में रिवॉल्वर था… रिवॉत्त्वर उसने मेरी कनपटी से सटा दिया, सखत हिदायत दी कि अगर एक भी बात इधर से उधर करने की कोशिश की तो खोपडी का तरबूज बना दिया जाएगा ।"



बैरिस्टर विश्वनाथ ने धड़कते दिल से पूछा----"फिर तुमने शेखर को यह 'मैसेज़' कैसे दिया कि तुम किडनैप और जो कुछ कह रही हो किसी के दबाव के कारण मजबूर होकर कह रही हो ?"



किरन के होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान उभरी, ऐसी टैक्नोक से जिसे हत्यारा सात जन्म के बावजूद नहीं समझ सकता था-मुझें फोन पर वे और सिर्फ "वे ही' शब्द कहने थे जो हत्यारे ने पर्चे पर लिखे थे और शेखर मल्होत्रा को उन्हीं शब्दों से समझ जाना था कि मैं किडनैप हूं किसी की कैद में है और जो कुछ कह रही हूं मज़बूर होकर कह रही हुं ।"



"कैसे समझ जाना था उसे ?"



"मैंने सोचा था, जव कहुंगी कि फोटो और चिट्ठियां लेकर नटराज के मन्दिर में पहूंच जाओं तो शेखर स्वत: समझ जाएगा कि मैं किसी की कैद में हूं दबाव में हूं --क्योंकि असल में फोटो और चिट्ठियां शेखर के पास थी ही नहीं--मैंने सोचा था कि शेखर मेरी यह बात सुनते ही सोचेगे कि जव किरन को मालूम है कि फोटो और चिट्ठियां मेरे पास नहीं है तो वह ऐसा कह ही क्यों रही है
जाहिर है कि ये शब्द किरन स्वेच्छापूर्वक नहीं कह रही है वल्कि किसी के दबाव में कह रही है-यानि अपनी समझ के मुताबिक मैंने उसे 'मैसेज' दे दिया था कि मैं खतरे में हूं-इस टेकनीक में ऐक ही गड़बड़ हो सकती थी…यह कि मेरी बात की गहराई न समझ कर कहीं यह न कह बैठे कि 'कौन-से-फोटो, और अपनी बेवकूफी में वह ऐसा कह भी बैठा-परन्तु मैंने तुरन्त यह कहकर बात सम्भाल ली कि वे ही जिन्हें कल रात तुमने अपने जूते के अन्दर रखा था'…अब यह डर या कि कहीं शेखर यह न कह बैठे "मैंने कल रात अपने जूते में कौन से फोटो रखे थे‘----


और वह ऐसा कह देता तो सारा खेल बिगड जाता-एक-एक हरुफ सुन रहा हत्यारा समझ जाता कि मैं उसे बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही हूं परन्तु मैंने शेखर को ऐसी बेवकूफी करने का मौका ही नहीं दिया…



उसे बोलने का अवसर दिए बगैर वह सब कहती चली गई जो पर्चे पर लिखा था और अपनी बात पूरी करते ही सम्बन्ध विच्छेद कर दिया-विना हत्यारे को यह भनक दिए कि मैं मैसेज दे चुकी दूं, जिस टैक्नीक से मैसेज दे सकती थी दे दिया-----


अब यह दूसऱी तरफ़ वाले की अक्ल पर निर्भर था कि वह मैसेज को समझे या नहीं--हालंकि शेखर के अंतिम एक दो वाक्यों से लगा था कि वह समझ गया है



परन्तु जब उसे 'बेहोश' दिखने जैसी हालत में कुर्सी के नजदीक लाकर डाला गया तो लगा कि वह बेवकूफ मेरा मेसेज नहीं समझा था और खुद भी हत्यारे के चंगुल में फंस गया ।"



"नहीं ऐसी बात नहीं थी किरन ।" बैरिस्टर साहब बोले----" शेखर ने खुद स्वीकार किया कि शुरू में वह तुम्हारा मेसेज नहीं समझा धा-इसलिए चौंके हुए स्वर में पूछ बैठा कि "कौन से फोटो' मगर जब तुम उसे कुछ भी कहने का मौका दिये बगैर अपनी बात कहती चली गई----तव वह समझ गया जो तुम समझाना चाहती थी और तुम्हारे फोन के तुरन्त वाद हमें फोन मिलाकर यही कहा कि किरन किसी किडनैपर के चंगुल में है और उसे वहाँ से निकालने की कोशिश की जानी चाहिए-सच्चाई ये है कि हम उस पर विश्वास न कर सके----


लगा कि वह झूठ बोलकर हमें अपने जाल में फंसाने के चेष्टा कर रहा है और इसी शंका के वशीभूत हमने उसके सामने शर्त रखी कि हमारे साथ इंस्पेक्टर अक्षय भी नटराज के मंदिर चलेगा-शेखर समझ गया कि हम उस पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं परन्तु उसने कहा कि "मुझे कोई एतराज नहीं है'-तव हम थाने में, अक्षय के पास इकटृठे--



-इसे सारी सिचुवेशन समझाई, और फिर यह स्कीम इसी ने बनाई कि प्रत्यक्ष में नटराज के मंदिर में केवल शेखर जायेगा----

हम इंस्पेक्टर और अन्य सिपाही छिपे रहेगे-वही किया गया, हालांकि हम उस वक्त भी प्रकट हो सकते थे जब कुम्भकरण सरीखा व्यक्ति मन्दिर में शेखर की धुनाई कर रहा था किन्तु इसलिए प्रकट नहीं हुए क्योंकि हमारा उददेश्य बदमाशों के हेडक्वार्टर अर्थात यहाँ पहुंचना था---- कहने का मतलब ये कि अपनी मदद के लिए हम लोगों को तुमने अपनी चालाकी से खुद यहां लाया है ।"'



"वह सब तो ठीक गया पापा, आपकी वेटी बच गई, इंस्पेक्टर अक्षय को इतनी शानदार 'ट्रिप' मिल गई..........नुकसान हुआ है तो सिर्फ शेखर मल्होत्रा को, वह बुरी तरह पिटा और इस वक्त बेचारा मौत और जिन्दगी के बीच झूल रहा है ।"



"लो ।" अक्षय ने ऊपर आ रही हैड़लइटस ही तरफ इशारा करके कहर-"एम्बुलेंस आ गई है ।"



उत्साहित किरन ने बहुत तेजी से ढलान पर चढ़ना शुरु किया ।


बैरिस्टर विश्वनाथ चीख पड़े-“सम्भलकर बेटी कही लुढ़क मत जाना ।" किरन को सुनने का होश कहां था ?
पांच सशस्त्र सिपाही अक्षय के साथ जीप में अाये थे, पांच बैरिस्टर विश्वनाथ की फियेट मे-डाक बंगले पर की जाने वालो अागे की कार्यवाही का दारोमदार इंस्पेक्टर अक्षय पर छोड़कर किरन ने फियेट की ड्राइविंग सीट सम्भाल ही थी कि बाई तरफ का दरवाजा खोलकर उसकी बगल में बैठते हुए बैरिस्टर साहब ने पूछा…“कहां जा रही हो ?"



"अस्पताल ।" किरन ने संक्षिप्त में जवाब दिया ।



"तो हमेँ यहाँ क्यों छोड़े जा रही हो ?"


"यह सोचकर कि शायद आप अस्पताल चलना पसन्द के न करें।"


"'क-क्यों ? "


किरन ने यहीं गहरी नजरों से देखा उन्हें बोली----"मामला शेखर मल्होत्रा का है न ?"



बैरिस्टर विश्वनाथ "तुरन्त' जवाब न दे सके-कूछ देर तक अपनी वेटी को अजीब-सी नजरों से देखते रहे और फिर गम्भीर स्वर में बोले---.. तुम यह सोचती हो किरन कि हमे शेखर मल्होत्रा से नफ़रत है तो गलत सोचती हो !"



"नफरत तो आपको उससे है पापा ।" किरन ने अपना एक-एक शब्द चबाया था ।


"सोचने बाली बात है, भला हमें उससे नफरत क्यों होगी ?"



“जरूरी नहीं कि अभी ही अपके सारे सवालों का जवाब दूं…
खैर क्या एाप मेरे साथ चल रहे है हैं?"



अपनी तरफ वाला दरवाजा बंद करते हुए बैरिस्टर विश्वनाथ ने कहा---" श-श्योर !"



"एक बात मानोगे मेरी ?"


"बोलो ।"


"आप एम्बुलेंस में बेठिए ।"


"'ऐ-एम्बुलेंस में ?"' बैरिस्टर साहब चकराये ।


"हां, शेखर के पास कोई तो होना चलिए---जब अकेली थी तब मजबूरी थी क्योंकि गाड़ी भी अपने साथ ले जाना चाहती थी मगर जब अाप साथ है तो कायदा कहता है कि हममें से एक एम्बुलेंस में होना चाहिए-अगर आपको उसमें बैठना पसन्द नहीं है तो मैं बैठ जाती के अाप गाडी से जाइए ।" कहने के बाद उसने गाडी का दरवाजा खोला ही था कि---------------



"ठहरो किरन----एम्बुलेंस में हम बैठ जाते हैं ।" कह कर वे फियेट से बाहर निकल गये और उसे एम्बुलेंस की तरफ बढते देखकर किरन के होंठों पर जो मुस्कान उभरी वह, वह धी जो किसी भी व्यक्ति के चेहरे पर तब उभरती है-जब उसकी मन मांगी मुराद पूरी हो जाये ।



बैरिस्टर साहब एम्बुलेंस के पिछले हिस्से मैं, रट्रेचर के नजदीक सीट पर बैठ गए ।



अस्पताल के कर्मचारी ने दरवाजा बन्द कर दिया ।



और फिर शुरू हुई यहाँ से अस्पताल तक की यात्रा ।



यात्रा की समाप्ति पर जब बैरिस्टर साहब अस्पताल के प्रांगण में उतरे तब फियेट कहीं नहीं थी…उस क्षण उनके दिमाग में यह विचार आया कि किरन पीछे रह गई होगी परन्तु यह विचार स्थाई न रह सका क्योंकि पांच दस और फिर धीरे-धीरे पन्द्रह मिनट गुजर गये ।


किरन नहीं अाई ।
सैकडों सवाल और शंकाएं नम्हें-नन्हें सर्पं बनकर जहन में गिजबिजाने लगे ।



अस्पताल के कर्मचारी स्ट्रेचर को उठाकर एमरजेंसी वार्ड की तरफ ले गये मगर उस तरफ़ बैरिस्टर विश्वनाथ का ध्यान कहां था-उनका ध्यान अटका दुआ था किरन में ।



कहाँ गायब हो गई वह?


अब तक क्यों नहीं पहुंची?


क्या उसका इरादा पहले से ही गायब होने का था?


क्या उसने उन्हें एम्बुलेंस में इसलिए बैठाया था ?


धीरे धीरे तीस मिनट गुजर गये मगर किरन नहीं अाई----बैरिस्टर विश्वनाथ पुरी तरह व्याकुल हो उठे--अस्पत्ताल में मौजूद सार्वजनिक टेलीफोन से घर पर बात की-वहाँ भी नही पहुची थी वह ।



एक. ..दो…और फिर तीन घन्टे गुजर गये ।


तब कहीं उनकी आंखों ने अपनी फियेट को पार्किंग में रुकते देखा----. तब तक मारे गुस्से के हाल इतना बुरा हो चुका था कि बरामदे में खड़े--खड़े किरन को गाडी से बाहर निकलते और उसे लॉक करते देखते रहे ।



गाडी की तरफ बड़े नहीं थे वे ।



देखते ही-देखते तेजी के साथ चलती हुई किरन उनके नजदीक आ गई-------इस वक्त उसके चेहरे पर बेहद अनोखी और दुर्लभ आभा देदीप्यमान आंखें कीमती डायमंडृस के मानिन्द जगमगा रही थीं और उस वक्त तो मानो बैरिस्टर विश्वनाथ के सम्पूर्ण जिस्म में सुलग रही क्रोधाग्नि में पूरा एक टिन धी डाला गया जब किरन ने कहा----"अाप यहां बरामदे में खड़े क्या कर रहे हैं ?"



“सोच रहे थे कि हमें' पिकनिक पर कहाँ जाना चाहिये !"
"ओह हो-अाप तो बहुत गुरसे में है पापा------सॉऱी ।"



बैरिस्टर साहब गुर्रा उठे----"हम यह जानना चाहते है कि तुम कहाँ गई थी?"



"हत्यारे के खिलाफ़ सबूत ढूंढने !"



"सबूत ------- सबूत कहीं पड़े थे क्या ?"



बड़े आराम से कहा किरन ने---- "ऐसा ही समझिये ।"



" त तुम ..... बहुत बिगड़ती जा रही हो किरन ।" बैरिस्टर साहब अपने गुस्से पर काबू नहीं कर 'पा' रहे थे-------अगर तुम्हें कहीं जाना था तो हमें बताकर नहीं जा सकती थी---क्या तुम कल्पना कर सकती हो कि इन तीन धन्टों में हमारी क्या हालत हूई है ?"



"सौरी पापा मगर यह सच है कि मैंने आपकी जानबूझकर नहीं बताया ।"



"कयों ?"



"क्योंकि पिछली रात मैंने आपको बता दिया था कि सबके फोटो क्यो" कलेक्ट किये है और उसी रात चाकू-विक्रेता का कत्ल हो गया ।"



" क क्या मतलब ?" विश्वनाथ बौखला गये----क्या कहना चाहती हो तुम ?"



"किसी भ्रम में न फंसे, पापा, कम-से-कम आपक्रो हत्यारा कहने का फिलहाल मेरा कोई इरादा नहीं है-इस वक्त मैं केवल इतना कहना चाहती हूं कि हत्यारा जो भी है, किसी तरह मेरे और अपके बीच होने वाली बातें सुन लेता है और मेरा रास्ता की बंद कर देता है---- ऐसा सोचकर मैंने आपको नहीं बताया कि कहां, किस मकसद से जा रही हू !"



"सॉरी पापा ----सॉरी प्लीज माफ कर दीजिये ।"

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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 13:02


किरन के लहजे में जाने क्या था कि इस बार बैरिस्टर साहब गुर्रां न सके--गुस्से पर काबू पाने की भरपूर चेष्टा कर रहे थे
वे, एकाएक किरन ने पूछा--"शेखर के अॉपरेशन का क्या हुआ है"'



"हमें नहीं मालूम कि अस्पताल का स्टाफ उसे कहां ले गया हैं अॉपरेशन हुआ भी है या नहीं और हुआ है तो क्या रहा…तुम्हार बारेे में सोचने से फुरसत मिली होती तो मालूम रखते !"



किरन के चेहरे पर जो भाव उभरे उन्हें देखकर बैरिस्टर साहब गारन्टी के साथ कह सकते डाके उसे उनका जवाब नागवार गुजरा है-----शेखर के प्रति उनकी उपेक्षा अच्छी नहीं लगी है वे महसूस कर रहे थे कि डाक बंगले में घटू घटना किरन को भावात्मक रूप से शेखर मल्डोत्रा कै अत्यन्त नजदीक ले गई है ।




"आइए !" कहने के साथ वह बिजली की-सी तेजी के साथ आगे बढ़ गई ।



अॉपरेशन थियेटर के नजदीक पहुंचकर उसने एक वार्ड वॉय से शेखर मल्होत्रा के वारे में पूछा, वार्ड वॉय ने थियेटर के मस्तक पर लगे लाल रंग के बल्ब की तरफ उंगली उठाकर कहा…“आँपरेशन चल रहा है ।"




उस वक्त चेहरे पर जबरदस्त तनाव लिए किरन सुनी-सूनी आंखों से लाल बल्ब को धूर रही थी जब बैरिस्टर विश्वनाथ ने स्नेहपूर्वक उसके कंधे पर हाथ रखा ।



किरन चिहुंक पड़ी ।


बिचारमाला के मोती जैसे टूटकर बिखर गए हों ।



बैरिस्टर साहब ने गैलरी में पडी बेच की तरफ इशारा करके आहि्स्ता से कहा…"आओं किरन, उधर बैठते हैं ।"



"नहीं मैं ठीक हूं।"



बैरिस्टर विश्वनाथ बोले-----समझने की की कोशिश करो बेटी अॉपरेशन सीरियस और लम्बा है…ऐसे अॉपरेशन के निपटते-निपटते मरीज के सगे-समर्थ और उससे वेइन्तहा प्यार करने बाले भी थक जाते हैं
गैलरी में जगह-जगह वे बेंचें अस्पताल वालों ने उन्हीं की सुविधा के लिए बिछाई हैं !"



"मैं भी यही सोच रही थी पापा ।"


"हम समझे नहीं ।"


"यह कि इस वक्त ओंपरेशन थियेटर में एक ऐसा आँपरेशन हो रहा है जिसके नाकाम होने के नब्बे प्रतिशत चांस हैं और आँपरेशन नाकाम होने का मतलब होगा मरीज की मृत्यु, मगर फिर भी, इन बेचों पर बैठने के लिए कोई मौजूद नहीं है----


------कितना भाग्यहीन है शेखर मल्होत्रा मैं तो खेर अभी छोटी हूं----आप काफी बसन्त देख चुके हैं-क्या आपने कभी ऐसा देखा है पापा कि कोई शख्स जिन्दगी और मौत के झूले में झूल रहा हो तथा इस बात की परवाह करने वाला कोई नहीं कि वह मरेगा या ..............



" ऐसा तो हम आज भी नहीं देख रहे किरन ।"



"तात्पर्य ?"


"परवाह करने वाली तुम जो मौजूद हो ?"



"आप मुझ पर व्यंग्य कर रहे हैं क्या ?"



"नहीं ।"



"अगर व्यंग्य कर रहे हैं. तो मुझे इस व्यंग्य पर बहतु दुख होगा पापा, क्योंकि आपको नहीं भूलना चाहिए कि जो शख्स इस वक्त जिन्दगी से दूर तथा मौत के नजदीक है उसने आपकी बेटी पर झपट पड़ने वाली मौत का वरण किया है !"



बैरिस्टर विश्वनाथ चुप रह गए ।



लगा कि अगर इस वक्त उन्होंने किरन को यह समझाने की कोशिश की कि उसे भावनाओं में नहीं बहना चाहिए तो असर उलटा पडेगा अत: कुछ भी कहने का विचार त्याग दिया ।


बाप--बेटी के मध्य खामोशी पुन: फन उठाकर खड़ी हो गई।
किरन के खूबसूरत चेहरे पर छाया तनाव कहीं जाकर तब कम हुआ जब सीनियर सर्जन ने "आपरेशन थियेटर' से बाहर निकलते वक्त बताया कि अॉपरेशन सफ़ल रहा है तथा दोपहर में किसी वक्त शेखर को होश आ सकता है ।



किरन ने रात के तीन बजा रही रिस्टवॉच पर नजर डाली और बैरिस्टर विश्वनाथ के नजदीक पहुंचती हुई बोली-----पापा अाप मेरे कुछ सवालों का जवाब देगे पापा ?"



"कैसे सवाल ?"


"जब अाप मेरे लिए फिक्रमन्द थे यानि जब शेखर मल्होत्रा को फोन किया था उस श्रृंखला में और किस-किस को फोन किया था आपने?"


बैरिस्टर विश्वनाथ समझ गए कि शेखर मल्होत्रा को खतरे से बाहर पाते ही किरन का दिमाग पुन: इन्वेस्टीगेशन की तरफ़ घूम गया है बोले----" हमने शहजाद राय, रमन आहूजा और अक्षय को फोन किए थे ।"


"क्या जवाब दिया था उन्होंने ?"



“तीनों में से कोई फोन पर नहीं मिला था ।"


“इंस्पेक्टर अक्षय थाने में नहीं था ।"


“सब-इंस्पेक्टर ने बताया था कि वह "रुटीन गश्त' पर निकला हुआ था ।"



"रमन और राय अंकल ?"



“दोनों में से कोई अपने रेजिडेन्स पर नहीं था, रमन के वहाँ 'वेल' जाती रही परन्तु रिसीवर नहीं उठाया गया जबकि मिस्टर राय की मिसेज को मालूम था कि मिस्टर राय कहाँ गए हैं ?"



"रमन आहूजा के बारे में आपका क्या ख्याल है ?"


"किस बारे में ?"'


"संगीता का हत्यारा होने के बोरे में ।"
"क्या तुम्हारे ख्याल से हत्यारा रमन आहूजा है ?"



रहस्यमय मुस्कान के साथ कहा किरन ने-"मैंने आरका ख्याल पूछा है पापा ।"



"एक तरफ दावा पेश करती हो कि हत्यारे को पहचान चुकी हो, दूसरी तरफ़ रमन आहूजा के बारे में हमारा ख्याल जानना चाहती हो------------------दोनों बातों का तालमेल समझ से बाहर है, जब तुम पहचान ही चुकी हो तो हमारा ख्याल पूछने का क्या मतलब ?"




"ख्याल तो सभी का पूछना चाहिए न----मुमकिन है कि जो मैं समझी हू गलत समझी होऊं-मामला छोटे-मोटे अपराधी का नहीं बल्कि हत्यारे का है-----हत्यारे का नाम जुबान से पूरी तरह पुष्टि कर लेने के बाद ही निकलना चाहिए न ?"



"क्या तुम किसी डाउट में हो ?"



छोड़िए पापा, केवल इस सवाल का जवाब दीजिए कि आपके ख्याल से रमन आहूजा..........



"अगर सच्चाई जानना चाहती हो तो वह ये है कि इस सम्बन्थ में हमारा दिमाग कुछ भी सोच पाने में असमर्थ है-हम तो यह _भी नहीं समझ पा रहे हैं कि घटनाएं आखिर इतनी तेजी के साथ क्यों घट रही हैं ?"



किरन ने पुन: प्रश्न किया----बैरिस्टर विश्वनाथ का जवाब इस बार भी गोल-मोल ही रहा…सवाल और जवाबों का सिलसिला चलते-चलते सुबह के पांच बज गए ।



शेखर मल्होत्रा को आंपरेशन थियेटर से एक कमरे मे-----"शिफ्ट' कर दिया गया…इस वक्त सवा पांच बज रहे थे-जब वह एक लेडी टॉयलेट में घुसी, साढे पांच तक भी जब बैरिस्टर साहब ने किरन को टॉयलेट से बाहर निकलते न देखा तो असमंजस में पड़ गए-----तभी, एक वार्ड वॉय उनके समीप आया तथा बोली---'" आपकी बेटी ने आपके लिए दिया है !"
बैरिस्टर विश्वनाथ चौंके ।


कागज का पुर्जा लगभग छीना उससे, पढा-“सौऱी पापा, एक बार फिर मुझे आपको विना कुछ बताये गायब होना पड़ रहा है ।"



बस-इतना ही लिखा था ।



बैरिस्टर विश्वनाथ का दिल 'धक्क से रह गया, बिजली की-सी तेजी के साथ वे एक खिडकी की तरफ लपके, झाकंकर नीचे देखा और पार्किग से अपनी फियेट गायब देखते ही मस्तक पर बल पड गए ।



बे सोचने की भरपूर चेष्टा कर रहे वे कि किरन कहाँ गई होगी ?

"पन्द्रह नवम्बर सन् उन्नीस सौ सत्तासी की शाम के करीब पांच बजे अपके इलाके में एक एक्सीडेंट हुआ था ।" किरन कहती चली गई-"गाडी फिथेट थी, नम्बर यू टी एक्स 9775-माना यह गया था कि चालक नशे में था और ब्रेक के भ्रम में एक्सीलेटर दबाता चला गया लिहाजा गाडी सैक्डो़ फूट गहरी खाई में गिरी ।"




"हुआ होगा, इसमें मैं क्या कर सक्ता हूं !" इंस्पेक्टर देवेन्द्र गौड ने उखड़े हुए स्वर में कहा----"उस वक्त यह थाना कम-से-कम मेरे चार्ज में नहीं था बल्कि अगर यह कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा कि तब से अब तक दसियों इंस्पेक्टर इस थाने में आ चुके होंगे ।"



"लेकिन उस घटना की फाइल तो थाने के रिकार्ड में होगी ?"



"अगर पुलिस जांच हुई थी तो फाइल भी जरूर होगी परन्तु ?"
" परन्तु ?"


" क्या मैं जान सकता हूं कि अाप कौन हैं और इतने पुराने-पुराने गड़े मुर्दों को उखाड़ने का मकसद क्या है ?"



"मैं एक वकील हू ।" कहने के साथ उसने अपना वकालतनामा मेज पर रखा और कहती चली गई-----आजकल एक ऐसे केस की इन्देस्वीगेशन कर रही हूं जिसका एक्सीडेंट से गहरा ताल्लुक है ।"



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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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