चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल compleet

Jemsbond
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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 13:12



बैरिस्टर, रमन और शहजाद राय ने लपककर फ़र्श से उठने की कोशिश कर रहे अक्षय को दबोच लिया और फिर कमरे में दाखिल हुआ वह शख्स जिसने एक ही घूंसे में अक्षय को उछालकर हॉल में फेंक दिया था-उसे देखते ही किरन के अलावा सबके हलक से चीखे निकल गई है !!!
बुंदू की तो घिग्घी बंध गई ।


यह लाश थी गुलाब चन्द की लाश ।



"य-यही है?" बुंदू चीखा-----" व-वह लाश यही है मेमशाव, जिसने अपनी गर्दन दबाने की कोशिश की थी ।"



लाश आहिस्ता-आहिस्ता हाल में आ गई ।


तेजी से धड़कते दिलों के साथ सभी आँखों में खौफ लिए लाश को देख रहे थे-------सबसे ज्यादा आश्चर्य के भाव अक्षय की आंखों में थे --------वैरिस्टर रमन और शहजाद राय के बंधनों में कैद वह गुलाब चन्द की ताश को इस तरह देख रहा था जैसे दुनिया के बड़े अजूबे को देख रहा हो जबकि अजूबा किरन के नजदीक पहुंचकर कुछ देर सीधा खडा रहा फिर अपना _सड़ा-गला हाथ पेट पर रखकर इस तरह झुका जैसे करोड़पति का ड्राइवर गाडी का दरवाजा खोलते वक्त झुकती है ।।।।



"यहां खडे़ हो जाओ ।" किरन ने उसे आदेश दिया ।

"अजूबा ठीक वहां खड़ा हो गया जहाँ किरन ने कहा था ।"



बैरिस्टर सहित सभी लोग चकितं हुए किरन की तरफ देख रहे थे, उसने कहा------ सब लोग अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठ जाए-केवल बुंदू और रमन इंस्पेक्टर को पकड़े रखेंगे, तुम हॉल का दरवाजा अन्दर से बन्द कर दो कमल ।"



सबने मशीनी अन्दाज से उसके आदेश का पालन किया ।



अक्षय भी अब किसी किस्म का विरोध करता नजर नहीं जा रहा था ।



आंखों में खौफ लिए बुंदू उस वक्त भी गुलाब चन्द की लाश को घूर रहा था, जब एकाएक किरन ने हाथ बढाकर लाश के चेहरे पर चढा सड़ा, गला और जला हुआ-सा नजर जाने वाला फेसमास्क नोंच लिया ।

"न-निवकू ..... ?" बुन्दू के हलक से चीख निकल गई-------शाब की लाश तू बना था निवकू ?"



आश्चर्य से परिपूर्ण चीखे़ वेड पर पड़े शेखर मल्होत्रा से लेकर अतर जैन एण्ड फैमिली तक के हलक से निकली थी, मगर सबसे बुरा हाल बुंदू का था जबकि निवकू इस तरह मुस्कुरा रहा था जैसे स्टेज पर उसे "बेस्ट एक्टर' का एवार्ड मिलने वाला हो-जज साहब, बैरिस्टर और शहजाद राय चक्ति निगाहों से निक्कू को देख रहे थे।।।।



हाँल में छाई मुक्मल सनसनी का आनन्द लूटने के बाद किरन ने बताया--"इस वक्त गुलाब चन्द की लाश निवक्रू ज़रूर बना हुआ है बुंदू मगर वह निवकू नहीं था, जिसने तुम्हारी गर्दन दबाने की कोशिश की थी ।"


“तो वह कौन था मेमशाब ?"



"वही जिसकी गर्दन इस वक्त तुम्हारे हाथों में है ।"



"तो इस वक्त ताश का-सा चेहरा निवकू क्यों वना हुआ है मे-मसाहब-----ये लाश का-सा चेहरा, ये मालिक के अधजले कपड़े और अंगूठियां निवकू पर कहाँ से आ गयी ?"


"मैंने दिए थे ?"


" अापने---क्यों ?"



"ताकि भागने की कोशिश करते इंस्पेक्टर को रोके उसे देखकर इसके रहे सहे हौंसले भी पस्त हो जाये !"
कहने के साथ किरन ने फेसमास्क के वने गले-सड़े से नजर अाने बाले ग्लब्स निक्कू के दोनों हाथों से जुदा किए----ग्लब्स कोहनियों तक थे और-अंगुठियां ग्लब्स की अंगुलियों के ऊपर चढी हुई थी ।



बैरिस्टर ने पूछा------" “यह सारा" सामान तुम्हारे पास कहां से अाया ?"
" ब्रेक शु-के साथ इंस्पेक्टर अक्षय के घर से चुराया था----अाप देख रहे हैं न जज साहब, फेसमास्क और ग्लबज कितने शानदार बने हुए हैं-इन्हें बनाने वाला कारीगर कोर्ट को बताएगा कि उसने अक्षय के लिए बनाये थे ।"



"तुम्हें यह कैसे पता लगा कि अक्षय सुब्रत जैन का लडका है?"



“सबसे पहले मैं अक्षय को डाक बंगले में पहचानी ।” किरन ने कहना शुरू किया-----"और यह सुनकर शायद अाप हँसेंगे कि पहचाना कैसे-दरअसल इसने चेहरे पर सफेद नकाब पहन रखा था, आंखों में कान्टेक्ट लेस लगा रखे ये यानि अपनी तरफ़ से पूरी तरह से सावधान था कि इसे कोई न पहचान सके मगर अपनी जुबान को क्या करता यह-आमतोर पर लोग कहते हैं कि पुलिस वाले गालियां इतने फर्राटे से देते हैं जैसे इन्हें ट्रेनिंग में में सिखाई जाती हों-------

--------सफेद नकाबपोश की गालियां सुनकर मुझे लोगों का यह कथन याद आ गया और दिमाग में विचार उभरा कि कहीं यह कोई पुलिस वाला ही तो नहीं ? दिमाग में यह ख्याल उभरते ही अक्षय का ख्याल आया क्योंकि संगीता मर्डर केस से अक्षय ही कनैक्टिड था--------


--------;डाक बंगले में श्योर नहीं हो पाई थी, केवल शक था या यूं कहा जाना चाहिए कि दिमाग में एक सम्भावना हुई थी, सम्भावना में कितना दम हे--- है भी या नहीं-यह जांचने में उस वक्त उसके रेजीड़ेस पर पहुची पापा, जव आप एम्बुलेंस में बैठे अस्पताल जा रहे ये-------


------जानती थी कि इस वक्त पर अक्षय घर पर नहीं है----बहीं उसकी पत्नी और दोनों बच्चे मिले--पत्नी का नाम कमला है, लड़की का स्वीटी और लड़के का बीशु--दोंनो बच्चे सोये हुए थे--कमला को मैंने अपना नाम . शकुन्तला बताया और कहा कि किसी अावश्यक काम से इंस्पेक्टर साहब से मिलना चाहती हु--उसके यह कहने पर कि इंस्पैक्टर साहब घर पर नहीं हैं, मैंने कहां, अाप ही से बात कर लूगी

अगर कोई मर्द होता तो रात के उस वक्त कमला कभी उसे घर के अन्दर अाने की इजाजत न देती मगर लेडीज होने का लाभ मिला-कमला मुझे ड्राइंगरूम में ले गई------



------वहां, दो जोडी के फोटो लगे हुए और दोनों ही पर मालाएं चढी हुई थीं जो इस बात का द्योतक थी कि दोनों जोड़े स्वर्गीय ---एक फोटो के नीचे लिखा था मिस्टर . एण्ड मिसेज राजेश श्रीवास्तव तथा दूसरे के नीचे लिखा था---मिस्टर एन्ड मिसेज सुब्रत जैन----इस नाम को पड़ते ही बिजली की तरह यह बात दिमाग में कौंध गई कि सुब्रत जैन, अतर जैन और गुलाब चन्द का भाई था-----


-------एक लिंक और मिल गया था मुझे अत: बातों-ही-बातों में कमला से पूछा--"ये फोटों किसके हैं है"'
"इनके माता-पिता के ?"


"हां ।"'


ऐसा कैसे हो सकता है, इनमें से एक ही जोडी तो इंस्पेक्टर साहब के माता-पिता होंगे ?"


कमला अजीब अन्दाज में मुस्करा: बोली-नी दोनों ही जोडे 'इनके' मां बाप हैं---ठीक उसी तरह जैसे कृष्णा के दो मां-बाप थे यानि एक जोडे ने इन्हें जन्म दिया दूसरे ने पाला ।"



जन्म किसने दिया ? मैंने पूछा---“और पाला किसने ?"'


"जन्म देने वाले मां-बाप वे है ।" कमला ने सुब्रत जैन की तरफ इशारा दिया और फिर दूसरे फोटो की तरफ इशारा करके बोली---'"पालने वाले वे ।"


"क्या मतलब ?"


"कुछ दिन पहले तक मैं खुद नहीं जानती थीं कि इनके मां-बाप दो हैं ।" कमला कहती चली गई---", तो इन्हें श्रीवास्तव साहब का बेटा ही समझती थी-मेरे पिता ने शादी भी यही सोचकर की थी कि ये श्रीवास्तव हैं---------

मगर कुछ ही दिन पहले मेरे हाथ इन्की पर्सनल डायरी लग गई
उसमें जैन दम्पति का फोटो रखा था और इनके पर्सनल जीवन की बोहत-सी बातें लिखी थीं-अन्य बातों के साथ-साथ डायरी में यह भी लिखा था कि करीब बारह वर्ष पूर्व 'ये’ अपने मां-बाप यानि जैन दम्पति के साथ ट्रेन में यात्रा कर रहे थे-इनके सामने वाली सीट पर श्रीवास्तव दम्पत्ति बैठे थे जो कि निःसन्तान थे और उन्हें 'इनकी' शरारत बहुत लुभा रही थीं अचानक उस ट्रेन का एक्सीडेंट हुआ जैन-दम्पत्ति मारे गये-------
---------श्रीवास्तव दम्पत्ति के हाथ ये लगे और उस घटना के बाद उन्होंने इन्हें अपना बेटा वना लिया-श्रीवास्तव दम्पती नितांत नये शहर में जाकर बस गये-बहां उन्हे कोई नहीं जानता था-कि ये उनके बेटे नहीं हैं-यह रहस्य किसी को न बताने के लिए श्रीवास्तव दम्पत्ति ने इन्हें भी समझा दिया-उन्होंने इनका नाम वही यानि अक्षय रखा केवल कास्ट चेंज कर दी यानि जैन की जगह श्रीवास्तव कहने लगे ।"

"ओह ।"



एक दिन इनका मूड देखकर यह बात कह दी कि मैंने डायरी पढ़ ली है-पहले तो ये "सन्न' रह गये मगर जब मैंने प्यार से पूछा कि यह बात आपने मुझसे छुपा क्यों रखी थी तो बोले, 'डरता था कि कहीं हकीकत जानने के बाद तुम मुझसे नफरत न करने लगो,-----मैंने कहा----इसमें भला नफरत करने की क्या बात है, भगवान् श्री कृष्ण के मां-बाप भी तो दो थे ।।"


"यानि इंस्पेक्टर साहब ने कुबूल कर लिया कि वे वास्तव में जैन हैं?"


"हां ।" कमला ने बताया----" तब मैंने यह फोटो डायरी से निकालकर खुद यहा, उतने ही सम्मान के साथ लगाया,जितने सम्मान साथ श्रीवास्तव दम्पत्ति का लगाया था, उस दिन यह इतने भावुक हो उठे कि रो पडे ।"
"यह जानकारी मेरे लिए धमाकेदार थी ।किरन कहती चली गई---"'बल्कि अगर यह कहा जाये तो गलत न होगा कि इस जानकारी ने मुझे हत्यारे का नाम साफ-साफ बता दिया था-अब तो जरूरत केवल यह जानने की थी कि अक्षय जैन ने क्या, कैसे किया है और जो किया है उसे साबित कैसे किया जा सकता है----बातों-ही-बातों में मैंने कमाला से यह पता लगा लिया था कि अक्षय का पर्सनल कमरा कौन -सा है----- बच्चे दूसरे कमरे में सोये हुए थे, सो मैं समझ गई कि मेरे जाने और अक्षय के अाने तक कमला उसी में बच्चों के पास सोयेगी------जानती ही थी कि डाक बंगले वाले केस में उलझा अक्षय तीन चार घन्टे से पहले घर अाने वाला नहीं है-----तीस मिनट तक कमला के सो जाने का इंतजार करके पाईप के जरिये छत पर पहुंची, वहाँ से आंगन में और आंगन से दवे पांव खाली पड़े अक्षय के कमरे में-दूसरे कमरे में बच्चों के साथ मौजूद कमला तब तक सो चुकी हो या न सो चुकी हो, मगर यह सच है कि मैं अपना काम मुकम्मल करके स्थान से निकल गई और कमाला को मेरे आने-जाने की भनक तक न लगी ।


"वहां क्या किया तुमने ?




“कमरे की तलाशी ली------इत्तनी सावधानी के साथ कि बाद में किसी को भनक तक न लगे कि कोई चीज छेडी गई है-कमरे में एक सेफ थी-उसकी चाबियों का गुच्छा वेड पर गद्दे के नीचे रखा मिल गया-सेफ़ का लॉकर तक खंगाल लिया मैंने किन्तु काम की कोई भी चीज हाथ न लगी । हर जगह की तलाशी लेने के बाद निराश-भी हो गई मैं-----अब नजर केवल राइटिंग टेबल पर जो एक कोने में दीवार से सटी रखी थी'----तीन दराजें थीं उसमें तीनों में ताले---- चाबी कमरे में कहीं न थी और इसलिए लग रहा था कि मेरे काम की वस्तु उसमें होगी---- चुंकि एक बार कमला उनकी पर्सनल डायरी पढ़ चुकी थी----अब वह डायरी को ऐसे स्थान पर नहीं रखता होगा--- जहां कमला के हाथों पहुच जाए, दराज की चाबी निश्चित रूप से किसी ऐसे स्थान पर होगी जहाँ से कमला को न मिल सके----"तलाश करते-करते जब दांतों तले पसीना अा गया मगर चाबी न मिली तो मैंने दूसरी तरकीब इस्तेमाल की ।"



“क्या ?"'



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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 13:14

“पूरी मेज लकडी की थी और आप लोगों को अनुभव , होगा कि मेज का पिछला हिस्सा यानि उसके विपरीत हिस्सा जहाँ मेज का मालिक बैठकर लिखता है अक्सर कमजोर होता है-दरवाजों की बैक साइड में तो ज्यादातर लकडी का एक हत्का-सा "फ़ट्टा' भर लगा रहता है-----उस मेज में भी ऐसा ही फट्टा था और उस फट्टे को मैंने आराम से तोड़ दिया-दरबाजे के पिछले हिस्से मेरे सामने थे और उनमें था यह सामान जो मेरे काम का था-दरवाजों में हाथ डालकर मैं आराम से जो चाहू निकाल सकती थी ।"


"क्या-क्या था वहां ?"


"चार ब्रेक-शु काला नकाब, काला चौंगा, कीचड-युक्त जूते, ठीक वेसा चाकू जिससे संगीता का मर्डर हुआ था, प्योंइन्ट फाइव का "एक रिवॉल्वर गुलाब चन्द की लाश हन सकने वाला यह सामान और इन सबसे बढकर महत्वपूर्ण थी अक्षय जैन के नितान्त निजी जीवन को नंगा करती तीन डायरियां ? "



"तीन डायरियां ?"


"हां, तीन डायरियां थीं वे-उन्हें पढ़कर यह बात मेरी समझ में अाई कि कमला ने डायरी पढ़कर यह क्यों जान लिया कि अक्षय फो जन्म देने वाले मां-बाप जैन दम्पत्ति है और यह क्यों नहीं जान पाई वह हत्यारा भी है ।"


"ऐसा कैसे हुआ ?"
"इंस्पेक्टर साहब को काफी विस्तार से डायरी लिखने का शौक हैं-उसी शौक के कारण दो डायरियां भर चुकी है और तीसरी चल रही है------

-----इत्तेफाक से कमला के हाथ डायरी नम्बर एक लगी थी और उसका अंत वही था जहां इस्पेक्टर साहब ने यह लिखा है कि मैं अक्षय श्री वास्तव नहीं, अक्षय जैन हूं!"



"ओह !" सबके मुंह से एक साथ निकला ।



“अगर डायरी नम्बर दो कमला के हाथ लग जाती तो वह जान जाती कि पतिदेव कितने खतरनाक आदमी हैं---------उसकी शुरूआत ही इन पंक्तियों से है कि "मैं उस मंजर को कभी नहीं भूल सकता जब मेरे दादा और बड़े चाचा ने हमें धक्कै देकर निकल दिया था और न ही वह भूल सकता हू कि अपने पिता का अधूरा काम मुझे पुरा करना है ।" कहने का मतलब ये कि उसमें सब कुछ लिखा है _।"




"तुमने तीनों डायरियां पढ़ी हैं ।"



" हाँ ।" किरन ने कहा---" मगर उनका मजमून जानने से पहले ये जान लीजिए कि मैंने दराज में से केवल एक शू तीन डायरियां और गुलाब चन्द की लाश जानने बाला यह सामान गायब किया-बाकि सव अभी तक वहीं है !"


"बाकी सामान क्यों छोड़ दिया तुमने?" जज साहब ने पूछा ।



"ताकि इस मीटिंग के वाद अाप स्वयं उसे बरामद करें और आगे चलकर बचाव पक्ष के वकील को यह कहने का मौका न मिले कि मैंने वास्तव में यह सामान इंस्पेक्टर अक्षय की दराज से नहीं बल्कि अन्य से हासिल किया है ।"



शहजाद राय तपाक से बोले---- मुमकिन है कि सारा सामान तुम इसकी दराज में रखकर आई हो ?"



"अगर मैं रखकर आईं हूंगी तो उस सामान पर से इंस्पेक्टर साहव की अंगुलियों के निशान कैसे मिलेगें ?"
"क्या निशान मिलेंगे ?"

“बिल्कुल मिलेगे ।" किरन ने अपने एकाएक शब्द पर जोर देते हुए कहा----इसलिए मिलेंगे क्योंकि उन्हें वहीं वास्तव में अक्षय ने रखा है और मैंने रिवॉल्वर, चाकू या बाकी तीनों शू को छेड़ा तक नहीं है ।"

"गुड ।" बैरिस्टर विश्वनाथ कह उठे ।

' "सामान निकालने के बाद मैंने मेज यथास्थान ठीक उसी पोजीशन में रख दी जैसी मेरे छेड़ने से पहले थी और मैं वह पोजीशन ऐसी थी कि जो हिस्सा मैंने उखाड़ा था वह दीवार से सटा हुआ था यानि हिस्सा उखाड़ा हुआ था, यह बात तब तक किसी को पता लगने वाली नहीं थी जब तक कि मेज को वहां से हटाकर कहीं अन्य रखने का प्रयास न किया जाये और मेरी जनरल नॉलिज यह कहती थी कि मेज ऐसी चीज नहीं है जिसका स्थान कोई अाये दिन चेंज करता होगा-----“जनरल नॉलिज ने ठीक ही कहा था, यह बात इस बात से साबित हो जाती है कि इंस्पेक्टर साहब को अपने यहाँ चोरी को भनक यहाँ अाने तक नहीं थी ।"



"" डायरियों से तुमने क्या पढ़ा ?” जज साहब ने ।



"लिखने को तो इंस्पेक्टर साहब ने काफी लम्बी चौड़ी रामायण लिख रखी है मगर मैं संक्षेप में वे बांते बता देती हूं जिम्हें सुनने के बाद अाप लोगों के जहन में यह केस क्लियऱ हो जाये ।" कहने के बाद किरन शुरू हो गई"--------श्रीवास्तव दम्पत्ति को अक्षय ने अपनी उस 'आग' के बारे में कुछ नहीं बताया था जो सुव्रत जैन-ने उसके अन्दर भरी थी- श्रीवास्तव दम्पत्ति ने इन्हें पढाया, लिखाया और शादी की…पुलिस इंस्पेक्टर यह शादी के बाद बना-गुलाब चन्द की हत्या का विवरण तो मैं आपको बता ही चुकी हू-उसके बाद इसने अपना ट्रांसफ़र उस थाने में करा लिया जिस क्षेत्र में यह कोठी अाती थी..........कोठी की भगोलिक स्थिति देखने के लिए एक रात इसने खुद संगीता के जेवरों की चोरी की--------उन्ही में गुलााब चन्द की अंगूठियाँ थी…चोऱी की रिपोर्ट लिखवाई जाते ही इन्क्वायरी के लिए आ गया और इन्वेस्टीगेशन के बहाने सारी कोठी में घूमा -------

------ उन दिनो शेखर मल्होत्रा बिजनेस के काम से कलकत्ते गया हुआ था---छानबीन करते वक्त इसने शेखर और संगीता के बेडरूम की बाई दीवार से 'अटेच्ड' एक लोहे की आलमारी भी खुलबाई----एक नजर में देखने पर वह मात्रा आलमारी लगती धी…अक्षय को तो चूकि कोठी के चप्पे-चप्पे की जानकारी लेनी थी अत: अालमारी के सारे कपडे बाहर फिकवाकऱ खुद उसमें घुस गया--आलमारी आदमकद थी--- उस वक्त वह दीबारों को ध्यान से देख रहा था जब लगा कि आलमारी के टीन के फर्श पर जूतों की वैसी आवाज नहीं हो रही है जैसी होनी चाहिए-उसका ध्यार्व फर्श पर गया और यह देखकर चौ'क पड़ा कि फर्श आलमारी की दिवारों से ज्याइंटं नहीं बल्कि अलग था और 'स्क्रुज' द्वारा कसा हुआ था------


------घूंसे मार-मारकर उसे बजाते हुए संगीता से पूछा-----"इसके नीचे क्या है "


तब-मजवूर होकर संगीता को यह बताना पड़ा जो नहीं बताना चाहती थी यानि उसे कहना पडा कि कोठी में एक तहखाना है और यह तहखाने का रास्ता है ।”


"त-तो तहखाने का दूसरा रास्ता बह है ?" पलंग पर पड़ा शेखर मल्होत्रा बड़बड़ा उठा ।



“कहने का मतलब ये कि उस इन्ववायरी के बहाने अक्षय ने संगीता से यह जान लिया जो उसने शेखर मल्होत्रा तक को नहीं वताया था--हालांकि शेखर मल्होत्रा गुलाव चन्द के परिवार का सदस्य नही कहा जा सकता, मगर अक्षय की नजर में वह भी इस वजह से जीवित रहने का हकदार नहीं था क्योंकि उसने संगीता से शादी करने की हिमाकत की थी ---- हालात्त ऐसे थे जिनमें संगीता का कत्ल होने पर लोगों का सबसे पहले शक शेखर पर ही जाना था, अत: इस बार अक्षय ने एक तीर से दो शिकार करने की योजना बनाई यानि ऐसे मौके की ताक में लग गया जब संगीता का मर्डर करके शेखर मल्होत्रा को फंसा सके-इसके हाथ की लिखी डायरी साफ-साफ़ कहती है कि उन दिनों यह साये की तरह शेखर मल्होत्रा के पीछे लगा हुआ था जब "ताज पैलेस' में शेखर और संगीता के बीच फ़र्स्ट अप्रेल को लेकर चेतावनियों का आदान-प्रदान हुआ----बगल वाली सीटपर बैठकर इसने वे सारी बातें सुनी थी परन्तु उस वक्त कल्पना नहीं कर पाया था कि जिस मौके की उसे तलाश है वह मौका इसी बहस के कारण मिलने जा रहा है--------------------


----------चौंका वह जब अगले दिन शेखर को काला कपडा खरीदकर टेलर को नकाब और चौगा 'सीने' का आर्डर देते हुए देखा-इसने भी उसी दिन टेलर को नकाब काला कपड़ा देकर चोगा और नकाब सीने के लिए कहा-कहने का मतलब ये कि शेखर के प्लान का आभास हो गया इसे तथा इधर, इसने रधियां बुन्दू के सम्बन्धों का भेद जान लिया---------------


----------- अनपढ नौकरानी को भेद खोल देने और दोनों को जेल में डाल देने की धमकी भी दे दी कि अगर इस बारे में बुन्दू से कुछ कहा तो दोनों को जेल में सड़ा देगा-कम अक्ल रधिया इसके जाल में फंस गई-घटना वाली रात का उसने तीन दो -पांच खेलने के बहाने बुन्दू-निक्कू को जगाये रखा-चीख की आबाज सुनते ही उन्हें बेडरूम में ले गयी-औंर खुद इसी के द्वारा लये गये नम्बर पर फोन कर दिया-अाप जानते ही हैं कि यहां से थाने का रास्ता पांच मिनट से'ज्यादा का नहीं है ।"


"फिर ?”


“फिर -- क्यी इसका प्लान अक्षरश: कामयाब हुआ
शेखर इस हद तक फंस गया कि आज शायद इसे फांसी की सजा हो जाती, किसी ने इस बात पर गौर करने की जरूरत नहीं समझे कि हत्यारा कोई और भी हो सकता है-शेखर की नॉलिज में दूर--दूर तक अक्षय का खुद से या संगीता के परिवार से कोई लिंक न था, फिर भला बेचारा कैसे कल्पना कर सकता था कि चक्रव्यूह का रचियता इंस्पेक्टर अक्षय है---इसके ग्रह तो विपरीत दिशा में चलने तब शुरू हुए जब शेखर की बातों से प्रभावित होकर में रि-इन्वेस्टीगेशन लिए निकल पडी---------



---------बह शेखर की प्रत्येक गतिविधि पर तब तक नजर रखना चाहता था जव तक संगीता के कत्ल के जुर्म में सजा न हो जाये बल्कि कहना चाहिए कि नजर रख रहा था-तभी इसे पता था कि शेखर से प्रभावित होकर मैं रि'-इन्वेस्टीगेशन पर निकल चुकी हूं---मुझे आतंकित करने के लिए किराये के गुन्डों से हमला करवाना इसकी पहली भूल थी-इसने सोचा था कि मैं डरकर कदम वापस खींच लूंगी मगर जब इसकी सभी उम्मीदों के विपरीत मैं कोठी पर यानि यहाँ पहुच गई तो यह सोचकर बौखला गया कि अनपढ राधिया कोई बेवकूफी-भरी बात कहकर इसके किये---धरे को चौपट कर सकती है अतः मजबूर होकर रधिया को कल्ल किया-- गुलाब चन्द की लाश के रूप में बून्दू का गला दबाने की कोशिश का मकसद केवल आतंक और मुझे भ्रमित करने की चेष्टा करना था-यह बताने की जरूरत शायद बाकी नहीं बची है कि स्टडी का दरवाजा बन्द करके यह किस रास्ते से निकला और थाने में जा बैठा ।"


"क्या इस बारे में भी पता लगा कि हमारे फोटो रधिया के कमरे में कैसे पहुचें ??"' शहजाद राय ने पूछा !!!

“डायरी में इसने आपके फोटो और चिट्टियों के बारे में भी लिखा है, कि वह लिफाफा इसे तहखाने से उस मिला जब चोरी की इन्कवायरी करने के बहाने कोठी की भौगोलिक स्थिति जानने आया था-ब्लैक-मेल भी अपको यही करता रहा है परन्तु रधिया की मौत के बाद लिफाफा मेरी तवज्यो आपकी तरफ मोड देने के मकसद से उसके कमरे में रख दिया ।"



“इसने यह कैसे जाना कि तुम सबके फोटुओं का क्या करोगी ? "



"चाकू विक्रेता के कत्ल के बाद लिखे पुष्ट परे इसने साफ लिखा है कि अाज मैं ‘अहमद' का सफाया कर अाया क्योंकि वह किरन को बता सकता था कि शेखर के तुरन्त बाद ठीक वेसा ही चाकू मैंने खरीदा था-------मैं इतना बेवकूफ नहीं हुं कि इतना भी अन्दाजा न लगा सकू" कि उसने सबके फोटो क्यू कलेक्ट किये है !"



" डायरी में गिरधारी लाल के बारे में लिखा है कुछ ?"'


बैरिस्टर विश्वनाथ ने पूछा ।


"लिखा है कि आज एक ऐसी घटना घटी जिसे मैं इस दुनिया का नौवां आश्चर्य कह सकता हु, और साथ ही मुझे यह विश्वास हो गया कि मेरे सितारे बुलन्दी पर हैं किरन तो है क्या चीज , दुनिया की कोई ताकत कभी नहीं जान सकती कि संगीता की हत्या मैंने की है---' पुलिस जीप में मैं अकेला चीथड़ रोड से गुजर रहा था कि लम्बी दाढी वाले एक युवक ने मुझें रोका, किसी के द्वारा अपनी जेब कटी जाने की शिकायत की मगर मेरा ध्यान उसके शब्दों पर नहीं, शाल पर था-लम्बी और धनी दाढी के पीछे मुझे शेखर मल्होत्रा का चेहरा नजर आ रहा था…एक बार तो मन में शंका उठी कि कहीं शेखर मल्होत्रा को आगे करके किरन मुझे किसी के जाल में तो नहीं फंसा रही है-मगर दाढी असती यी अत: लगा कि चक्कर कुछ और है---- उसके साथ एक बच्चा भी था -जीप में बैठाकर मैं उन्हें डाक बंगले पर ले गया ।
दाढ़ी साफ होते ही यह देखकर दंग रह गया कि वह हू-ब-हू शेखर मल्होत्रा नजर आ रहा था…काफी पूछताछ के वाद इस नतीजे पर पहुचा कि शेखर मल्होत्रा से उसका दूर का भी कोई सम्बन्थ नहीं है… उसका नाम गिरधारी लाल हैं बडौदा का रहने बाला है, बच्चा उसका बेटा है-जव भी उसकी शक्ल याद आती है तो सोचता हु, कि यह कैसे सम्भव है विश्वास नहीं होता मगर जो सामने है उसे झुठला भी नहीं सकता, अंत: यह सोचकर संतोष कर लेने के अलावा "कुछ नहीं है कि दुनिया के आश्चर्यों में से वह मैं एक आश्चर्य है-------
----- गिरघारीलाल को अपनी अंगुलियों पर नचाकर अब मैं किरन को ऐसे-ऐसे खेल दिखाऊंगा कि जीवन में फिर कभी किसी केस की रि-इन्वेल्टीनेशन के बारे में सोचने तक से थर्राया करेगी ।"



रमन ने पूछा…"उस पत्र का क्या चक्कर था किरन जी, जो कल रात आपने मुझे दिखाया था ?"



"एक पत्र तो हमेँ भी दिखाया था तुमने ।" शहजाद राय ने कहा ।



किरन हौले से मुस्कुराई बोली----“वे दोनों पत्र खुद मैंने लिखे थे !"



" त-तुमने !" दोनों उछल पड़े-“क-क्यों?"


“मैटर ऐसा बनाया था कि अाप दोनों के दिमाग उसमें उलझ जाये और वे पत्र आपकी पढ़ाने के पीछे जो मेरा
असंली मकसद था उस तक अापकी तवब्जो न पहुच सके !"


"तुम्हारा मकसद क्या था ?"


"आपकी अंगुलियों के निशान लेना ।"


"अंगुलियों निशान ----- मगर उनका तुमने क्या किया ?"



"कल रात किसी-न-किसी बहाने से मैंने सभी की अंगुलियों के निशान लिए थे, जैसे अाप दोनों के लेटर्स पर अक्षय के रिवॉल्वर पर, जज साहब के पैन पर अतर एण्ड फेमिली के निवकू और बुंदू को साफ-साफ़ कहकर ।"


"लेकिन जव तुम जान चुकी थी कि हत्यारा केवल इंस्पेक्टर अक्षय है तो हम सबकें निशान लेने की क्या जरूरत थी ?"




"क्योंकि एक भेद ऐसा था जिसे अक्षय की डायरी न खोल सकी थी ।"



"वह क्या ?"



"अक्षय ने अपनी डायरी में साफ लिखा है कि तहखाने का बल्ब होल्डर से निकालकर ड्रम पर मैंने नहीं रखा हालांकि किरन को मैंने यह कहकर टाल दिया है कि बल्ब पर कोई निशान नहीं मिले मगर वास्तविकता ये है कि फिंगर प्रिन्टृस एक्सपर्ट कहता है कि बल्ब पर किसी की अंगुलियों के निशान हैं-ऐसे, जैसे बल्ब को वहुत दिन पहले किसी ने छेडा हो, इस पंक्तियों को पढ़कर मन
में यह जानने की उत्सुकता जागी कि आखिर बल्ब होल्डर से उतारकर ड्रम पर किसने रखा और इस सवाल का
जवाब पाने के लिए सम्बन्धित सभी लोगों की अंगुलियों के निशान रात ही मैं एक्सपर्ट को देकर अाई । आज सुबह वह अपनी रिपोर्ट दे चुका है ।"'


"किसके निशान वे ?"


"बल्ब पर रधिया की अंगुलियों के निशान हैं ।"


"रधिया के ?"'


."'इनसे स्पष्ट होता है कि रधिया तहखाने के अस्तित्व से वाकिफ थी !"


"मगर रधिया के अंगुलियों के निशान तुमने एक्सपर्ट को कहां से दिए ?"


"रधिया के निशान तो एक्सपर्ट के पास थे ही-तब के, जब उसने तहखाने से निशान उठाये थे---चूक यह हूई थी कि-------

उन निशानों का मिलान बल्ब पर मिले निशानों से नहीं किया रात जब मैंने रधिया के निशानों का मिलान भी बल्ब पर मिले निशान से करने के लिए कहा तो सुबह परिणाम सामने था ।"

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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Jemsbond
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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 13:14

बडी गहरी नजरों से उसे देखती हुई किरन ने पूछा---"अब कहिए पापा----- अब कहिए कि हत्यारा शेखर मल्होत्रा, इस्पेक्टर अक्षय जैसी हस्ती को अरेंज कर रखा था उसने
और---------



"बस-------उस ।" बैरिस्टर साहब ने झपटकर उसका मुंह भींच लिया, बोले----".लोगों के सामने और ज्यादा
बेइज्जती मत करो, हम किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेगे !"



" अरे!" जज साहब चौंके-“ये क्या हो रहा है बैरिस्टर साहब, किरन को बोलने क्यों नहीं देते ?"



"व-वा-------- वो --------- बात ये है सर कि हमारी इस बेटी ने हमे "धोबी-पाट' मारा है……ऐसा धोबी पाट कि हम मुंह के बल जमीन पर पड़े अभी तक जमीन चाट रहे है !"



"हम समझें नहीं ?"


" बात यह है सर कि हम रात तक यह कह रहे वे कि--------


वाक्य बैरिस्टर साहब भी पूरा न कर सके ।


उनके मुंह पर हाथ रखे कह रही थी किरन----नहीं पापा नहीं ।"



बेटी की इस अदा पर बैरिस्टर साहब के ह्रदय से उसके प्रति मुहब्बत का सैलाब-सा उमड़ पड़ा, प्यार की ज्यादती के कारण आंखें भर अाई और मुंह से उसका हाथ हटाकर
कुछ कहना ही चाहते थे कि जज साहब ने कहा----“अरे क्या खेल हो रहा है भई, तुम उसे नहीं बोलने दे रहे-बह तुम्हें नहीं बोलने दे रही, आखिर हमेँ भी तो बताओ कि क्या बात है ?"



"दरअसल मेरे और किरन के बीच में यह बहस छिड्री हुई थी सर कि हत्यारा शेखर मल्होत्रा है या कोई और रात तक हम इसी बात पर अड़े हुए थे कि हत्यारा शेखर ही है मगर---------अब-------मैं फ़ख्र के साथ का सकता है सर कि मेरी बेटी ने मुझे शिकस्त दे दी, इसने साबित कर दिया कि यह बैरिस्टर विश्वनाथ की बेटी है ।"


“ओह तो तुम शिकस्त कुबूल कर रहे हो ?"'


"यस सर ।"


"भला ये भी शिकस्त कुबूल करने का कोई तरीका है ?"


"ज-जी--------क्या मतलब ?"



“सीधे खड़े होकर बेटी को जोरदार सैल्यूट मारो ।"


और फिर ।


बैरिस्टर विश्वनाथ ने सचमुच पूरे सम्मान के साथ किरन को सैल्यूट मारा ।


हाँल में ठहाके गूंज गये, जब साहब खुद जोर’-जोर से हँस रहे थे ।


लजा गई किरन, नन्हीं-सी गुडिया बनकर अपने पापा के सीने में चेहरा छुपा लिया उसने ।
केस खत्म हो चुका था ।


शायद यह देखकर-कि बचाव का कोई रास्ता नहीं बचा है इंस्पेक्टर अक्षय ने भी ज्यादा हाथ-पेर न मारे--मीटिंग के बाद कोठी धूमी गई, तहखाने का रास्ता नम्बर दो चैक किया गया और इंस्पेक्टर अक्षय की दराज से काफी सामान बरामद किया गया, हकीकत जानने के बाद कमला बेचारी दहाड़े मार-मारकर रोई थी ।



अतर एन्ड फेमिली को कोठी छोड़नी पडी ।


केस अदालत में पहुंचा ।


बचाव पक्ष के लिए कहने को कुछ था ही नहीं।


फिर भी कानूनी औपचारिकतायें तो निभाई ही जानी थी --सो, निभाई जा रही थी ।


सरकारी वकील के रूप में एक बार फिर बैरिस्टर विश्वनाथ कोर्ट में खड़े थे । मगर सच्चाई ये है कि करनेके लिए उनके पास भी कोई खास काम न था----सारा काम है अपनी रि-इन्वेस्टीगेशन के दरम्यान किरन ने कर दिया था । सबूत इतने पुख्ता थे कि दुनिया की कोई ताकत उन्हें काट नहीं सकती थी ।



सबसे बडी गवाह थी अक्षय जैन के अपने हाथ से लिखी डायरियां ।


तारीखें लग रही थी, केस आगे चल रहा था ।


और.........


इस गुजरते वक्त के साथ शेखर मल्होत्रा स्वस्थ होता चला गया ।



किरन ने ठीक ही कहा था कि अगर दो व्यक्तियों के बीच भावनात्मक लगाव पैदा हो चुका है तो दुनिया की की ताकत, दुनिया की कोई साजिश उसे पनपने और बढ़ने से नहीं रोक सकती!



इतिहास मानो स्वयं को दोहरा रहा था ।



वर्षों पहले जोश और जनून में फंसा शेखर मल्होत्रा सब कुछ भूलकर संगीता के लिए विधायक के बेटे पर टूट पड़ा था…उस घटना से संगीता के दिल में उत्पन्न हुई चिंगारी शेखर मल्होत्रा के जिस्म पर चढा प्लास्टर उतरने तक "मुहब्बत के रोशन चिराग' में तब्दील हो गया था…


करीब-करीब ऐसा ही पुन: हुआ, डाक बंगले में घटी घटना ने किरन के हृदय में चिंगारी पैदा की थी वह शेखर के स्वस्थ होते-होते 'मुहब्बत की रोशन मीनार' बन गई ।


बैरिस्टर विश्वनाथ सब समझ रहे थे ।


शुरू में तो थोडा अजीब लगा उन्हें मगर फिर जब गहराई से सोचा था तो पाया कि बुराई क्या है?



शेखर खूबसूरत है । युवा है-करोडों का व्यापार है उसका।


बेटी सुखी रहेगी ।

सो !


गुलाब चन्द की तरह नादानी नहीं दिखाई उन्होंने किरन को किसी किस्म के विद्रोह का अवसर न दिया बल्कि खुद जागे बढे-----------------------

-------- बेटी की इच्छा के अनुसार शादी तय कर दी उन्होंने ।


उस दिन "भावविहल' होकर किरन अपने पापा से लिपट गई थी ।
"रात के इस वात कहाँ जाने की तैयारी हो रही है पापा ?"



"जज साहब के पास जा रहे है, उनके साथ जेल जायेगे-सुबह अक्षय को फांसी दी जानी है न, हमें वहां मैजूद रहना होगा-सो सुबह का प्रोग्राम सैट करने जा रहे हैं । मगर हमारी बेटी ने कहाँ की तैयारी की है?"


किरन जवाब न दे सकी, लजा गई वह ।


बैरिस्टर विश्वनाथ ने किरन को ध्यान से देखा ।


झिलमिल करती सितारों टंकी काली साड़ी में किरन का रंग कुछ यूं निखरा नजर आ रहा था मानो कमल के बहुत बड़े फूल के निचले हिस्से को रेशमी काले कपडे से ढांप दिया था, बोले----शेखर से मिलने जा रही हो न ?"


जवाब आहिस्ता से गर्दन झुकाकर दिया उसने ।


बैरिस्टर साहब गम्भीर स्वर में बोले----''' बुरा न मानो तो एक-बात कहे किरन ।"



"ज-जी ?"' किरन ने अपना मुखड़ा ऊपर उठाया !'


"बोलिए ।"'


"शादी में केवल दस दिन बाकी रह गए हैं और तक अब तुम लोगों को मिलना जुलना बन्द कर देना चाहिए-यह अनुभव की बात है बेटी, जिससे रोज मिलती हो, उससे दस दिन के विरह के बाद मिलोगी तो मिलन अलौकिक होगा ।"



" ब-बस आज पापा !" उसने बच्चों की तरह जिदृद की------“आज़ के बाद, फिर शादी के बाद ।"


विश्वनाथ ठहाका लगा उठे, बोले-बड़ी शरारती हो गई हो तुम?"
"आइए ।" बुन्दू ने कहा…“आइए मेमशाब !" शेखर के बेडरूम में दाखिल होते किरन ने पूछा----"तुम्हारे मालिक साहब नहीं अाए अभी ?"


"फैकट्री से उनका फोन अाया था मेमशाब !" बुन्दू जानता था कि दस दिन बाद किरन उसकी मालकिन बनने बाली है-----" बता रहे थे अाप अयेंगी, आपको बैठा दूं !!! वे आठ बजे तक आ जायेगे ।"


पौने आठ बजा रही रिस्टवॉच पर नजर डालती वह टेप-रिकार्डर की तरफ़ बढ़ गई !!!!!


" कॉफी ------- चाय -------कुछ बनाऊं मेमशाब हैं"'



"नहीं ।" किरन, कैसिट स्टैण्ड में लगी कैसिटृस को देखती हुई बोली-----बह देखने का प्रयत्न कर रही थी कि पन्द्रह मिनट कैन-सी कैसिट सुनकर गुजारे जाये-------


--------अचानक उसकी नजर एक ऐसी केसिट पर पड़ी जिसके बॉंक्स पर ढेर सारी मिट्टी लगी हुई थी !! बोली-----" अरे इस पर इतनी मिट्टी कहाँ से लग गई बुन्दू ?'



"आज दिन में मुझे लॉन में मिली थी मेमशाब------जाने किस बेवकूफ़ ने लॉन में डाल दी और फिर मिट्टी के नीचे दब गई--------एक पौधे को रोपने के लिए मैं क्यारी में 'खुरपा' चला रहा था तो मिली जरूर यह हरकत अतर जैन के परिवार के किसी आदमी की होंगी------किसी चीज को सम्भालकर नहीं रखते थे वे-हुहहह उनके बाप का माल तो था नहीं ।"



किरन मुस्कुरा दी ।



न कैसिंट बॉक्स पर कुछ लिखा था, न कैसिट पर ।


उसने वही कैसिंट रिकॉर्डर में डाली और "प्ले" वाता स्विच अान कर दिया ।


बुन्दू ने हिचकिचाते हुए पूछे----""अगर इजाजत हो तो बेकरी बाले तक हो आऊं मेमशाब !"


" क्यों ?"


"सुबह के ब्रेकफास्ट के लिए डबल रोटी लानी है न !!!"



"निवकू कहां गया ?"



"गांव गया है मेमशाब ।"



"चले जाओ ।" कहने के बाद वह सोफे की तरफ़ बढ़ गई !


बून्दू चला गाया !!
सोफे पर बैठकर किरन ने अभी पहली ही सांस ली थ्री कि इस तरह उछलकर खडी हो गई जैसा सोफा…सोफा नहीं बल्कि दहकता हुआ तवा हो ।




दिल घक्क से रह गया ।


सांसें जहाँ की तहाँ रुक गई ।


टेपरिकॉंडर से इंस्पेक्टर अक्षय की आवाज निकली थी ।



"" सुनो कमला !" वह कह रहा था------“इस कैसिट के जरिए जो कुछ तुमसे कह रहा हूँ उसे ध्यान से सुनो और जो कहू उस पर अमल करना----जिसके पास यह है वह इसे ठीक उस दिन तुम्हारे 'एड्रेस' पर पोस्ट कर देगा जिस दिन मैं "फांसी पर चढाया जा चुका हूंगा । यानि मेरी मौत के दूसरे, तीसरे या ज्यादा-से-ज्यादा चौथे दिन कैसिट _ तुम्हें मिल जाएगी ।"



किरन का दिमाग मानो 'कोमा' में पहुच गया था ।



टेपरिकार्डर कहे जा रहा था---“तुम्हें याद होगा एक दिन मैंने तुमसे कुछ फार्मों पर साइन कराए थे…इंगलिश के फार्म थे वे और तुम इंगलिश जानती नहीं हो,सो समझ न सकी थीं कि काहे के फार्म हैं-----तुमने पूछा भी था मगर मैंने यह कहते हुये वात मजाक में उड़ा दी कि फिक्र मत करो, तलाक के फार्म नहीं हैं-------चे फार्म "स्विस बैंक' के थे कमला और तुम्हारे साइन से स्विटूजरलेंड की राजधानी की "मेन ब्रांच' तुम्हारा एकाउन्ट खुल गया था---- उसमें तुम्हारे नाम बीस लाख रुपये जमा हैं नन्हीं-सी स्वीटी और प्यारे से वीशू के लेकर स्विटृज़रलेड चली जाना ।



मेरे बच्चों को पड़ाना-लिखाना ।
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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 13:15



वीशू को बड़ा आदमी बनाना ।


किसी काबिल लड़के से मेरी स्वीटी की शादी कर देना ।


और सुनो, इस कैसिट को किसी अन्य को सुनाने की कोशिश मत करना
उससे तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा-मैं मर चुका हूं लोग अगर हकीकत जान भी जाएं तो मैं तुम्हें वापिस न मिल सकूगा---------साथ ही तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि टेप कैसिट की कोर्ट या कानून की नजर में कोई वेल्यू नहीं है----------------- कानून यह मानता है कि इस दुनिया में किसी की आब की 'हू-ब-हु. नकल कर देने वाले अनेक कलाकार मौजूद हैं और वे किसी भी आवाज में कैसी भी कैसिट तैयार कर सकते हैं-अर्थात् इस केसिट के बूते पर मेरी मौत के बाद कोर्ट में कोई साबित नहीं कर सकता कि संगीता मर्डर केस का जो फैसला हुआ वह गलत हुआ था-जिसके पास कैसिट है वह जानता है कि कैसिट की कोई कानूनी वेल्यू नहीं है इसलिए इसे तुम्हारे पास भेजने में नहीं हिचकेगा ।


मुझे केंसर था कमला ।


अगर अब न मरता तो साल छ:----------महीने बाद मर जाता-मेरी उस मौत के बाद तुम और मेरे बच्चे तबाह हो जाते------भीख मांगकर पेट के अलावा शायद तुम्हारे पास कोई रास्ता न बचता ।



मुझे एक आंफ़र मिला ।



एैसा ओंफर जिससे मेरी जान की कीमत बीस लाख लगाई गई थी !!!



कैंसर से मरता तो फ्री में मर जाता, तुम लोगों के लिए कुछ न कर पाता ।



फांसी से मरने पर बीस लाख मिल रहे थे ।



मरना निश्चित था ।



सो।



तुम्हारे और अपने बच्चों के बेहत्तर भविष्य के लिए बीस लाख छोड़ जाना न्यायसंगत लगा ।
अच्छा, अब विदा कमली, तुम्हें मेरे बच्चों की कसम के है ---- यह कैसिट किसी अन्य को सुनाने की बेवकूफी न करना ।



बस !!!


"कट" की हल्की-सी आवाज के साथ टैपरिकॉंर्डर आंफ हो गया ।


हक्की-- बक्की अवस्था में खडी हो गई किरन ।।



सारा मामला समझ में अाते ही चेहरा पसीने-पसीने होगया और उसके भीतर से कोई चीखा------भाग जा किरन, भाग जा यहीं से---


-------दुनिया का सबसे बड़ा धूर्त ---- सबसे बड़ा मक्कार -------------सबसे बड़ा जालसाज और संगीता मर्डर केस का असली मुजरिम यहां पहुंचने वाला होगा------भाग बेवकूफ, भाग यहाँ से ।"


और !


भागने के लिए वह दरवाजे की तरफ़ मुडी ।


" न न नहीं------नहीं !" भयाग्रस्त हुई वह हलक फाड्रकर चिल्ला उठी ।



वह दरवाजे पर खड़ा था ।


चेहरा किसी हिंसक जानवर के चेहरे-----सा लग रहा था, आंखें अंगारों-सी-दोंनों हाथ दायीं-वायी चौखट पर टिकाये दरवाजे के बीचों----बीच किसी दैत्य की मानिन्द खड़ा था वह, सुर्ख आंखें किरन पर स्थिर थी-------जाहिर था कि बह किरन को टेप सुनते देख चुका था--------चह जिसका रोयां-रोयां गुस्से की ज्वाला में भभक रहा था ।



किरन का चेहरा पीला पढ़ गया ।



अपनी मौत उसे साक्षात् खडी नजर आ रही थी !!!



पीछे हटी, खौफ की पराकाष्ठा के कारण चीख पडी---न-नहीं-------नहीं तुम मुझे नहीं मार सकते ।"



"छोड भी कैसे सकता दूं ?" आवाज इतनी भयानक थी जितनी इंसान के मुंह से हरगिज नहीं निकल सकती, हां------ दरिन्दे के मुंह से निकल सकती है ।



किरन के छक्के छुट गए ।



रोयां-रोयां खडा गया ।


दैत्य ने चौखट से हाथ हटाये----मौत के फरिश्ते की तरह कमरे में आया और फिर बेहद फुर्ति के साथ लपककर दरवाजा बंद करके चटकनी चढा दी------बुरी तरह आंतकित किरन लॉन में खुलने वाली खिड़की पर झपटी ।

अन्दर से बंद अभी उसकी चटकनी ही गिरा पायी थी कि वनमानुष के से चौड़े पंजे ने पीछे से ब्लाउज पकडकर ऐसा जोरदार झटका दिया कि एक लम्बी चीख के साथ किरन वेड के नजदीक फर्श पर जा गिरी ।



ठीक वहा, जहाँ संगीता की लाश मिली थी !


ब्लाउज का दुकड़ा वनमानुष के पंजे में झूल रहा था ।


किरन जहाँ थी वहां पड़ी रह गई ।


भय ने जिस्म क्षीण कर दिया था, इतना ज्यादा कि खड़ी होने तक की शक्ति न जूटा सकी ।

अच्छा, अब विदा कमला, तुम्हें मेरे बच्चों की कसम के है ---- यह कैसिट किसी अन्य को सुनाने की बेवकूफी न करना ।



बस !!!


"कट" की हल्की-सी आवाज के साथ टैपरिकॉंर्डर आंफ हो गया ।


हक्की-- बक्की अवस्था में खडी हो गई किरन ।।



सारा मामला समझ में अाते ही चेहरा पसीने-पसीने होगया और उसके भीतर से कोई चीखा------भाग जा किरन, भाग जा यहीं से---


-------दुनिया का सबसे बड़ा धूर्त ---- सबसे बड़ा मक्कार -------------सबसे बड़ा जालसाज और संगीता मर्डर केस का असली मुजरिम यहां पहुंचने वाला होगा------भाग बेवकूफ, भाग यहाँ से ।"


और !


भागने के लिए वह दरवाजे की तरफ़ मुडी ।


" न न नहीं------नहीं !" भयाग्रस्त हुई वह हलक फाड्रकर चिल्ला उठी ।



वह दरवाजे पर खड़ा था ।


चेहरा किसी हिंसक जानवर के चेहरे-----सा लग रहा था, आंखें अंगारों-सी-दोंनों हाथ दायीं-वायी चौखट पर टिकाये दरवाजे के बीचों----बीच किसी दैत्य की मानिन्द खड़ा था वह, सुर्ख आंखें किरन पर स्थिर थी-------जाहिर था कि बह किरन को टेप सुनते देख चुका था--------चह जिसका रोयां-रोयां गुस्से की ज्वाला में भभक रहा था ।



किरन का चेहरा पीला पढ़ गया ।



अपनी मौत उसे साक्षात् खडी नजर आ रही थी !!!



पीछे हटी, खौफ की पराकाष्ठा के कारण चीख पडी---न-नहीं-------नहीं तुम मुझे नहीं मार सकते ।"



"छोड भी कैसे सकता दूं ?" आवाज इतनी भयानक थी जितनी इंसान के मुंह से हरगिज नहीं निकल सकती, हां------ दरिन्दे के मुंह से निकल सकती है ।



किरन के छक्के छुट गए ।



रोयां-रोयां खडा गया ।


दैत्य ने चौखट से हाथ हटाये----मौत के फरिश्ते की तरह कमरे में आया और फिर बेहद फुर्ति के साथ लपककर दरवाजा बंद करके चटकनी चढा दी------बुरी तरह आंतकित किरन लॉन में खुलने वाली खिड़की पर झपटी ।

अन्दर से बंद अभी उसकी चटकनी ही गिरा पायी थी कि वनमानुष के से चौड़े पंजे ने पीछे से ब्लाउज पकडकर ऐसा जोरदार झटका दिया कि एक लम्बी चीख के साथ किरन वेड के नजदीक फर्श पर जा गिरी ।



ठीक वहा, जहाँ संगीता की लाश मिली थी !


ब्लाउज का दुकड़ा वनमानुष के पंजे में झूल रहा था ।


किरन जहाँ थी वहां पड़ी रह गई ।


भय ने जिस्म क्षीण कर दिया था, इतना ज्यादा कि खड़ी होने तक की शक्ति न जूटा सकी ।

वहीं पर-पडी़, भयाक्रांत अन्दाज -मेँ दडाडी ------तुमने खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए इतना चक्करदार चक्रव्यूह रचा--------मैं बेवकूफ तुम्हारे चक्रव्यूह में ------ फंसती चली गई वह साबित करती चली गयी जो तुम चाहते थे----------------त---तुम मुझे अपने चक्रव्यूह में फंसाने में शायद इसलिए कामयाब हो गए क्योंकि संगीता तुम्हें बता चुकी थी कि अगर कोई मुजरिम किरन के सामने गिड़गिड़ाए प्रभावशाली ढंग से कहे कि "मैं बेगुनाह हु' तो किरन पसीज जाती है, मुजरिम के फेवर से रि'-इन्वेस्टीगेशन करने निकल पड़ती है ।"



वह हँसा है !!!!


दांत नरभक्षी जानवर की तरह चमके ।


मुंह से गुर्राहट निकली------“अपने चक्रव्यूह में फंसाने के लिए मुझें तुमसे बडी बेवकूफ़ और कहाँ मिल सकती थी जो अपने बाप के बार-बार समझाये जाने के बावजूद मेरे रंग में रंगी रही------वह खुर्राट बुडूढा मेरी हर चाल समझ रहा था, हर कदम को 'एक्यूरेट' भांप रहा था मगर जिस ढंग से मैंने इंस्पेक्टर अक्षय को मुजरिम के रूप में प्लेट में सजाकर तुम लोगों के सामने प्रस्तुत किया उससे वह भी धोखा खा गया ।"


" क क्या रधिया और चाकू-विक्रेता की हत्या भी तुम्ही ने की थी ?" .


“हत्या करने के लिए कलेजा चाहिए और इंस्पेक्टर में वह कलेजा नहीं था-------सो रधिया और चाकू-विक्रेता के बाद नकाब और चोगा सीने वाले टेलर को भी मैंने ही मारा ।"


"ट-टेलर को ?"


"जिसे मेरी योजना के मुताबिक तुम गिरधारी लाल की लाश समझे वह टेलर की लाश थी ।"



"य-यानि दुनिया में गिरधारी लाल नाम का कोई अदमी न था ----------- यह तुम ही थे तुमने मुझे खुद किडनैप कर लिया और मैं बेवकूफ़ समझ न सकी -------------- डाक बंगले में मुझे ही नहीं, जग्गा और चन्दू तक को धोखा दिया गया ?"



"रधिया उस क्षण मर चुकी थी जिस क्षण तुम रि…इन्वेस्टीगेशन का "आला विचार" अपने जहन में संजेये घर से निकली ----------अक्षय से गुलाब चन्द की लाश का ड्रामा रचवाकर मैंने तुम्हें रधिया की लाश तक पहुंचाया -----------संगीता की मां शहजाद राय के फोंटों रधिया के कमरे में मैंने रखे-------तुम पर पहला हमला जानबूझकर ठीक उस वक्त कराया जब उस सडक से रमन को गुजरना था --------- उद्देश्य था तुम्हें चक्रव्यूह में उलझाना, अटकाना और तुम्हारे , दिमाग में वह बैठा देना कि सही रास्ते पर जा रही हो तुम खुद को 'ब्रिलिएन्ट' समझ रही थी, मगर थी इतनी बेवकूफ़ मेरी जान कि हर स्पाट पर, हर क्षण तुमने वह किया जो मैं चाहता था ।"



"क-क्या इंस्पेक्टर अक्षय सुब्रत जैन का लड़का नहीं ?!!



"सुब्रत जैन उसकी पत्नी और लड़का उसी दिन ट्रेन एक्सीडेन्ट में मारे गये थे जिस दिन उन्होंने हस्तिनापुर छोड़ा----++++++++अक्षय को सुब्रत का लड़का वना पेश करने के लिए जरूरी था कि कमला भी उसे सुब्रत का ही लड़का समझे--------------सो ऐसा ड्रामा रचा गया कि एक पत्नी भी अपने पति को यह मान बैठी जो वह नहीं था ।"


"इसका मतलब ये हुआ कि खुद को बेगुनाह साबित करने का चक्रव्यूह---------पहले ही रच चुके थे-------मुझे उसमें फंसाने के लिए मेरे पास तब अाये जब सभी तैयारीयां मुकम्मल हो चुकी थीं ।"



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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल compleet

Post by Jemsbond » 27 Jun 2016 13:16


"अब तुम समझी कि चक्रव्यूह मेरे नहीं तुम्हारे चारों तरफ रचा गया था, मैं तो रचयिता था मगर अव समझी तो क्या समझी-------पर वह काम तुम पूरी कर चुकी हो जिसके लिए जरा-सी चूक के कारण 'बेवकूफ' चन्दू की रिवॉल्वर की गोलियां तक सहनी पड़ी---उस वक्त भला मैं तुम्हें कैसे मरने दे सकता था बेबी, तुम न रहती तो वह दिन कैसे उगता जिस दिन तुमने मुझे बेगुनाह साबित किया---------दुख है तो सिर्फ ये कि मैं पत्नी के रूप में तुम्हें भोग न सका ।"




"म-मगर संगीता का मर्डर करने की तुम्हें जरूरत क्या थी?


"क्या तुम यह कहना चाहती हो बेबी कि मुझे उस वेश्या को सिर पर बैठाये रखना चाहिए था जिसे एक चुटकी स्मैक देकर अनगिनत विदेशी लड़के भोग चुके थे ?"
ओह ! तो तुमने संगीता की हत्या दौलत की खातिर नहीं की बल्कि इसलिए की क्योंकि तुम उसके लंदन वाले चरित्र से वाकिफ हो गए थे ।।।



“मैं शर्त लगाकर कह सकता हूं कि कोई भी मर्द अपनी उस बीबी का चुम्बन तक नहीं ले सकता जिसे स्मैक की तरंग में डूबकर एक दिन वह मुझे खुद बता बैठी थी-----------'मैंने उसी दिन संगीता से पीछा छुडाने का फैसला कर लिया और पीछा छुड़ाने के दो तरीके थे--------तलाक या संगीता का खात्मा----मुझे दूसरा तरीका चुनना पडा क्योंकि 'तलाक' की अवस्था मैं करोड़पति से फ़कीरपति वन जाता ।"


“और गुलाब चन्द की हत्या क्यों की तुमने ?"



बहुत जोर से, दरिन्दे की मानिन्द हैंसा वह…"हकीकत ये है बेवकूफ लड़की कि गुलाबचन्द की हत्या न मैंने की------न किसी अन्य ने----उसकी हत्या नशे ने की, नशे की ज्यादती ने की-----बह सचमुच एक दुर्घटना थी, केवल दुर्धटना-----हत्या तो तुम्हारी नजरों में उसे मैंने साबित कर दिया ।"



“क्या मतलब ?"


“तुम्हारे साथ रहते-रहते मैंने महसूस किया कि तुम व गुलाव चन्द की मौत को भी मर्डर मानने के लिए तैयार बैठी हो, अत: हिल एरिया में गया--------खाई में पड्री गाडी के 'ड्रम्म से "शू निकाले और अक्षय को पकड़ा दिये-बस, मेरी इतनी-सी मेहनत के बाद तुमने अपना 'व्रिलिएन्टपना' दिखाया तथा जो वास्तव में दुर्धटना थी उसे मर्डर साबित कर दिया ।"



"म-मगर इस कैसिट से तुम्हारे खिलाफ़ साबित तो कुछ नहीं किया जा सकता ।"



"जो रहस्य इसमें है उसे तब तक साबित किया जा सकता है जब तक इंसपेक्टर जीवित

किरन ने एक पितल का फूलदान पूरी ताकत से फेककर मारा ।


परन्तु !


हल्के से झुककर वह खुद को बचा गया ।


तेवर विकराल हो उठे,गुर्राया-------"ओह । तुम मुझे ही खत्म करने का इरादा वना बैठी ।"

किरन उछलकर खडी अवश्य हो गई परन्तु टांग इस कदर कांप रही थी कि वह 'ज्यादा देर तक खडी नहीं रह सकती थी-----मारे खौफ के चीखकर दरवाजे की तरफ भागी ।


चीता झपटा !!!!


वनमानुष के हाथों ने उसके बाल पकडे और इतना जोरदार झटका दिया कि वह चीखती हुई पुन: फर्श पर जा गिरी-चेहरे पर वहशियाना भाव लिए वह किंसी दैत्य की तरह किरन की तरफ बढा ।



फर्श पर पडी किरन पीछे की तरफ़ रेंगती हुई भयभीत अन्दाज में चीखी---" न-नहीं --- तुम मुझें मार नहीं मार सकते----तुम एक बेगुनाह के खून से हाथ नहीं रंग सकते ।"



"अफसोस की बात है बेबी तुमने मुझे ठीक से नहीं पहचाना खुद क्रो बेगुनाह साबित करने के लिए मैं हजार बेगुनाहों का खून कर सकता हुं-----जरा सोच, रधिया, चाकू-बिकेता और टेलर को मैंने क्यों मार डाला है"'

" त--तुम ...... तुम नहीं ...... नहीं ......


किरन चीखती रह गई ।



वनमानुष का-सा हाथ उसके ब्लाउज के अगले हिस्से यानि नोंच ले गया ।
"न-नहीं . ..नहीं ।" उसका इरादा भांपकर खौफ की ज्यादती के कारण किरन रो पडी, गिड़गिड़ा कर कह उठी --- '"त'---तुम ---- तुम मुझे मार डालो मगर ------ मगर वह मत करो जो तुम चाहते हो ।"


वह हँसा ।


मानो 'ड्राक्यूला' हँसा हो । बोला-तुम----- तुम समझ गयीं कि मैं क्या चाहता हूं ?"


"प्लीज ------ प्लीज -----मुझें बख्श दो------बुरी तरह किरन ने हाथ छोड़ लिए------म-मैँ तुम्हारे अागे हाथ जोड़ती हूं --- पैर पकड़ती है---- म-----मुझे मार डालो मगर छुओ मत ।"


"अरे वाह ?" वह 'हँसा----"भला विना छुए कोई किसी को कैसे मार सकता है---तुम्हारे साथ जबरदस्ती नहीं करना चाहता----जबरदस्ती वाले हालात बने हैं वुन्दू की बेवकूफी से-------- "मैंने सुरक्षित जगह समझकर केसिट क्यारी में छुपा रखी थी-----वह बेवकूफ उठाकर यहां ले अाया ।


बचाव के लिए किरन को कोई रास्ता नजर न जा रहा या । "



वह चीखती रही, चिल्लाती रहीं । ।


परन्तु !!


गिद्ध के हाथ को अपनी बेजरी की तरफ बढने से न रोक सकी ।
हाथ ब्रेजरी को नोचकर फेंकने ही वाला था किं-"खट्ट' की आवाज हुई ।


दोनों की तवज्जो लॉन की तरफ खुलने बाती खिड़की की तरफ गई!!!!



किरन साड़ी से खुद को ढांप चुकी थी !


किसी ने बाहर से धक्का मारकर उसे खोल दिया था ।


" धांय--------- धांय -------- धांय------!"


तीन गोलियां एक साथ चली !!


एक ने उसका सिर फोड़ा, दूसरी ने दिल में शरण ली और----तीसरी ने चेहरे का भूगोल बदल डाला---किसी जानवर से मिलती-जुलती डकार जैसी चीख के साथ एक लाश बेडरूम के फ़र्श पर जा गिरी !



हाथ में रिवॉल्वर लिए खिड़की की चौखट पर पैर रखकर बैरिस्टर विश्वनाथ कमरे में कूदे ।


रिवॉल्वर से धुएं की लकीर निकल रही थी । "प-पापा---------' पागलों की मानिन्द किरन दौडी और उनसे लिपट गई ।


फूट-फूटकर रो रहीं थी वह ।



तभी, खिडकी के माध्यम से जज साहब भी बेडरूम में अाये ।


बुरी तरह रोती किरन ने पूछा-----" अ--आप यहाँ कैसे पहूंच गये पापा ?"


"'जोश में भरे लोग आत्महत्या का इरादा तो वना लेते हैं बेटी, जब मौत झपटती है तो जिन्दा रहने के लिए छटपटाने लगते हैं ---सचमुच , मौत इंसान को बुरी तरह डरा देती है-तोड़कर रख देती है ।"



"मैं समझी नहीं ।"


"इस अहसास ने इंस्पेक्टर को तोड दिया कि सुबह उसे फांसी पर चढा दिया जायेगा-----, जज साहब और जेलर साहब को सारी हकीकत बता दी उसने ।"


"ओह पापा ------ओह ----अाप जीत गये-----मैं हार गयी, खुले दिल से कुबूल करती हू् कि बड़ीं करारी शिकस्त खाई है मैंने ----- मगर------ मगर एक बात आपको भी कुबूल करनी पडेगी ।"


"क्या ? "


"वही जो शेखर मल्होत्रा कहा करता था ।"


"यानि ?"


"कि सच्चाई सभी तर्कों शहादर्तो, सबूतों और गवाहों से ऊपर होती है ।"


"बह कैसे ?"


" अब देखिए न --- सच्चाई क्या थी और मैनें क्या साबित कर दिया ?"


The end
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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