दुल्हन मांगे दहेज complete

Jemsbond
Super member
Posts: 4263
Joined: 18 Dec 2014 12:09

Re: दुल्हन मांगे दहेज

Post by Jemsbond » 29 Jun 2016 22:05


विभिन्न सवाल कर करके हेमन्त ने चौकीदार से घटना का विस्तार पूछा, यह धारणा धूल में मिल गई कि उसके परिवार से मुसीबत के बादल छट गए हैं ।



" आओ अमित । " उसने क्रिकर्तव्यविमूढ़ से खड़े अमित को झंझोड़ा तो वह चौंका, गुर्राया-"अगर रेखा को कुछ हो गया तो मैं मनोज को जिंदा नहीं छोडूंगा भइया । ”



"होश में आओ अमित, चलो यहाँ से । "



"मैं खून पी जाऊंगा उसका---उस कमीने की हिम्मत कैसे हुई हमारे घर में घुसने की और-रेखा पर तेजाब फेंका उसने-मैं हरामजादे को कच्चा चबा जाऊंगा ।"



" अमित......पागल हो गए हो क्या, चलो ।


हेमन्त ने उसे लगभग जबरदस्ती खींचा ।


चौकीदार ने पूछा----"अब अाप कहां जा रहे हैं शाब ?"


" अस्पताल । " कहने के साथ ही अंमित को खींचता हुआ वह दूर ले गया ।
" 'तुम्हारा' दिमाग खराब हो गया है क्या अमित जों चौकीदार के सामने इतना सब कुछ बकने लगा, होश में रहो वरना हम सब पकडे जाएंगे ।"



"आपको पकडे़ जाने की पड़ी है, भइया-----वह कुत्ता हमारी वहन को… ।"


"सुन लिया, सब कुछ सुन लिया है अमित । हेमन्त गुर्राया--" यह भी कि मनोज ने रेखा को जला दिया है-रेखा तुम्हारी ही नहीं मेरी भी बहन है----------जितना गुस्सा तुम्हें आ रहा, उतना ही मुझे भी, जितना जोश तुम्हे आ रहा उतना ही मुझे भी---होश में होश मत खो मेरे भाई-----ऐसा कुछ मत कर कि हम सब जेल में पड़े हों !"



"क्या मतलब ?"



" मनोज को पुलिस ने पकड़ लिया है, इसलिए फिलहाल हम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते, मगर जमानत पर या सजा के बाद कभी तो बाहर निकलेगा------हम उसे छोडेंगें नहीं, अपनी बहन पर तेजाब फेंकने का पूरा बदला लेंगे, लेकिन तभी न जब हम सब सुरक्षित रहें, खुद जेल से बाहर रहें' ? "



"हमें क्या होने वाला है ?"



"अगर तुम जोश में रहे और होश से काम न लिया तो वह _ हो जाएगा जिससे बचने के लिए हमने इतने पापड वेले हैं, जरा सोचो-----सामने पडते ही हमसे गोडास्कर का सबसे पहला-सवाल यह होगा कि सारी रात हम कहां रहे, क्या किया ?"



अमित चुप रह गया ।




हेमन्त ने आगे कहा-----"अंगर हम उसे तसल्ली बख्श जवाब न दै सके तो सारे किए-धरे पर पानी फिर जाएगा…गोडास्कर को यह समझते देर नहीं लगेगी कि अाज की रात हमने क्या किया है--लाश मिलते ही वह समझ जाएगा कि वहां उसे-हम ही टांगकर अाए हैं । "



"फ...फिर ?"



"मेरे दिमाग में एक तरकीब है !"



" क्या ?"


"पुलिस को यह बयान देंगे कि क्लिनिक से लौटते समय अचानक हमारे दिमाग में यह ख्याल अाया कि कहीं सुचि मामा के पास खुर्जा तो नहीं चली गई है और सुचि की तलाश करने हम उसी समय वस की नाइट सर्विस से खुर्जा चले गए ? "



"मगर जब मामा के बयान लेगी तो !"



" 'तुम बस अड्डे चले जाओ ।" हेमन्त उसे समझाता हुआ बोला---" मेरठ से आगरा के लिए सारी रात गाड्रियां चलती हैं !"
अगर कोई गाड़ी न हो तो इंतजार करना----मेरठ से आगरा जाती जो भी गाड़ी वहां जाकर रुके तुम उसके कंडक्टरं से बुलंदशहर से खुर्जा तक के दो टिकट लेना------------याद रहे, बस में यात्रा नहीं करनी है----सिर्फ टिकट लेने हैं----टिकट लेते ही कहीं गुल हो जाना-कंडक्टर वहां सवारियों की गिनती नहीं करता है रास्ते में कहीं करेगा सो, दो सवारियां कम होने का राज जानने के बावजूद बस को वह वापस बुलंदशहर तो लाने से रहा ।"



"'उसके बाद !"




" इसी तरह आगरे से मेरठ जा रही बस जब बस अड्डे पर रूके तो वहां उतरने वाले यात्रियों से पूछना कि वे कहां से अाए हैं-उसमें से किसी से खुर्जा से बुलंदशहर तक के टिकट लेना--चूंकि वे टिकट उनके लिए बेकार हो चुके होगे, अत: थोड़े से लालच से ही तुम्हें दे देगे----अपने बयान को प्रभावित करने के लिए यह टिकट वहुत जरूरी है अमित---एक बस से काम न बने तो दूसरी का इंतजार करना !"



"मैं-समझा गया !"



''टेलीग्राम देंकर मैं डाकखाने से सीधा बस अड्डे पहुंचूंगा, काम हो या न हो---मुझे वहीं मिलना ।"



"ठीक है !"



इस तरह हेमन्त डाकखाने पहुंचा !


टेलीग्राम का मैटर उसने कुछ इस तरह बनाया----"हमनें सुचि भाभी से एक मजाक किया है मामाजी, अत: अगर अापसे कोई यह पूछे कि मैं और भइया रात को भाभी को पूछने खुर्जां अाए थे या नहीं तो आपको कहना है कि हां.......रात हम दोनों भाभी को पुछने आपके पास अाए थे----आपका भांजा, अमित । "
" य.....यह क्या हो गया बाबूजी, कैेसे हो गया यह सब ?" पलंग पर लेटी रेखा के चेहरे पर नजर पड़ते ही तढ़प कर हैमन्त ने पूछा-----"क्या तेजाब ने-इसके सारे चेहरे को.......?"



साड़ी का पल्लू मुंह मे ठूंसकर ललितादेवी फफक रो पडीं ।



अमित एकटक रेखा की तरफ़ देखता रह गया-----उस रेखा की तरफ जिसका संपूर्ण चेहरा सफेद पट्टियों से ढका हुआ था, सांस लेने के लिए ,केवल मुंह और नाक के छिद्रो को खुला छोडा गया था, अभी तक बेहोश थी !!



बिज्ञाबर गुप्ता ने बड़े ही दयनीय अंदाज में हेमन्ते की तरफ देखा, बोले----"सब कुछ तबाह हो गया बेटे, बरबाद हो गए हम । "



हेमन्त की आंखों में अासूं झिलमिला उठे, बोला----"ऐसा क्या हो गया है बाबूजी,,हमे भी तो कुछ बताइए---------क्या कहते हैं डॉक्टर ?"


"तेजाब रेखा की आंखों में चला गया है, अब यह कभी देख नहीं सकेगी और मेरी वेटी का चेहरा हमेशा के लिए बदसूरत हो गया है-वैसा जैसी चमगादड़ की खाल होती है, काली और चुडचुड़ी़ !"



" न. . .नहीं ।" हेमन्त के हलक से निकलने बाली चीख ने सारे अस्पताल को झंझोड़ डाला…बिशम्बर गुप्ता बिलख बिलखकर रो पडे थे, र्कितु अमित की आंखों से पानी की एक बूंद नहीं-----चेहरे पर वेदना का एक भी लक्ष्य नहीं !

पथराई हुई आँखों में हिंसा !


चेहरा सपाट-----मगर सारा जिस्म गुस्से से कांप रहा था उसका । मुट्ठियां इस कदर कसती चली गई कि उंगलियों के सिरे हथेली में गड़ गए, मुंह से गुर्राहट निकली-----ओर यह सब मनोज ने किया हेै-----मै उस कुत्ते की खाल में भूस भरदूंगा । "




बिशाम्बर गुप्ता ने चौंककर उसकी तरफ देखा---अमित की अवस्था देखकृर चिहुंक उठे वे…लपककर उसके नजदीक पहुंचे, दोनों कंधे पकड़कर जोर से झंझोड़ते हुए चीखे-------"अमित-----होश में आओ बेटे । "
"म...मैं उसका खून पी जाऊंगा बाहूजी । " अमित गुर्राया-----"बोटी----बोटी काटकर चील-कौंबों के सामने डाल दूंगा उसको ।"



"न...नही ।" बिशम्बर गुप्ता कराह उठे------"ये सिलसिला ठीक नहीं हैै बेटे जिन के शिकार इस वक्त तुम हो, -कुछ बैसे ही जज्जात अपनी बहन के लिए मनोज के दिल में भी होंगें------उनका अंजाम ऐसे भयानक रूप में सामने आया हैे ओर अगर तूने खुदको न संभाला तो अंजाम शायद इससे भी ज्यादा भयानक हो ।"




"हमने उसकी बहन को क्या-किया था ?" इसे बार चीखने के साथ ही अमित की रुलाई फूट पडी-----"क-----कुछ भी तो नही बाबूजी----कुछ भी तो नहीं किया हमने ।"



" 'मगर वह यही समझता है बेटे । "



"उसऩे मेरी बहन को बदसूरत बना दिया, अंधी कर दिया-मैं उससे बदला लूंगा बाबूजी, इससे भी भयानक बदलां लूंगा । "
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Re: दुल्हन मांगे दहेज

Sponsor

Sponsor
 

Jemsbond
Super member
Posts: 4263
Joined: 18 Dec 2014 12:09

Re: दुल्हन मांगे दहेज

Post by Jemsbond » 29 Jun 2016 22:06



"नहीं-तुम ऐसा नहीं का सकते चीखते हुए विशम्बर गुप्ता हेमन्त की तरफ़ घूमे------ "यह पागल हो गया है हेमन्त, तुम ही समझाओ इसे ।"



हेमन्त ने कठोर और प्रभावशाली स्वर में कहा----"उस योजना को मत भ्रूलो अमित, जो हमने बनाई है-----अगर दो-दो भाई होकर भी हम रेखा पर हुए जुल्म का बदला न ले सके तो लानत है हम पर…मगर जो चीख-चीखकर बदला लेने की बात कह देते हैं उनके इरादे पुलिस को पता लग जाते हैं और फिर पुलिस उसे बदला लेने का मौका नहीं देती-----बैसे भी इस वक्त मनोज पुलिस के कब्जे में है, हम उसका कुछ नहीं कर सकते ।"




हेमन्त के शब्द अमित-के भेजे में घुस गए । वह शांति पाता चला गया चौंककर बिशम्बर गुप्ता ने पूछा…"वें कौनसी योजना, कैेसी स्कीम--क्या सोच हो तुम लोग-----क्या तुम भी पागल हो गए हो हेमन्त, बदला लेने क्री क्या स्कीम बनाई है तुमने?"
"वह हम आपको नहीं बता सकते बाबूजी ।" प्रत्यक्ष में ऐसा कहते हुए हेमन्त ने उन्हें संकेत से समझाया कि व्रहां ऐसा सिर्फ अमित को सामन्य करने के लिए कह रहा है-----" वह स्कीम हम दोनों भाईयों में गुप्त रहेगी !"




हेमन्त ने बडी मुश्किल से हालात संभाले ।



ललितादेबी लगातार रोए जा रही थी----काफी देर की गहरी खामोशी के बाद हेमन्त ने विषय परिवर्तन किया-----"यहां से छुट्टी केबारे में डॉक्टर क्या कहत्ते है ?"


रेखा को होश अाते ही छुट्टी मिल जाएगी । "



"अौर जख्स ? "



"उनके लिए डॉक्टर ने दबाएं लिख दी हैं, उनका कहना है कि हम रोज अस्पताल अाकर या घर ही पर किसी कम्पाउंडर से पट्टियों को बदलवा सकते हैं । "



कमरे में पुन: खामोशी छा गई ।


काफी देर तक बिशम्बर गुप्ता ने बताया-------"इंस्पेक्टरं गोडास्कर यहां से कह कर गया था हेमन्त कि जैसे ही तुम लोग आओ उसे इन्फॉंर्म किया जाए । "




" शायद यह यह जानना चाहता है कि हम कहाँ थे ? "




"अपका अनुमान बिलकुल ठीक है मिस्टर हेमन्त ।"


इन शब्दों के साथ कमरे में गोडास्कर प्रविष्ट हुआ ।



चारों सकपका गए ।



गोडास्कर के साथ दो सिपाही थे,"बोला------अस्पतालं के एक कर्मचारी ने फोन द्वारा अापकी वापसी की सूचना दे दी और मैं आपको यह समझाने चला अाया कि जव मिस्टर गुप्ता ने आपको डॉक्टर अस्थाना के यहां से घर भेजा था, अगर तब आप सीधे घर चले जाते तो शायद यह भयानक और शर्मनाक घटना न घटती !"
" हम क्या जानते थे इंस्पेक्टर की ऐसा होने वाला है ?"



"बेशक अाप नहीं जानते थे-वैसे बाई-द-वे, क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि रात पौने बारह बजे से अब तक कहाँ रहे ?"


हेमन्त ने जवाब दिया, सुनकर गोडास्कर की भृकुटि तन गई, बोला…"हालांकि यही बड़ी अटपटी बात है अाप किसी से भी कहे बिना खुर्जा चले गए, मगर क्या मैं यह पूछ सकता हूं अगर यह मान भी लिया जाए कि अचानक अापको यह ख्याल ऐया था कि कहीं सुचि खुर्जा अापके मामा के यहाँ न चली गई हो तब भी, अाप दोंनो ही एक साथ खुर्जा क्यों चले गए-----इस काम के लिए किसी एक का जाना ही काफी था । "



"हम दोनों चले गए, इसमें आपको आपत्ति... ? "



"नो-मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती है ? "' गोडास्कर ने लापरवाही के साथ कंधे उचकाकर कहा----"और फिर आपके पास कार थी अगर गाड़ी हो तो खुर्जा है ही कितनी दूर ?"


"क्या मतलब ?'' हैमन्त का दिमाग नाच उठा ।






"क्या रात जापके पास" कार नहीं थी ?" हेमन्त ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि जो गोडास्कर ने सख्त स्वर में चेतावनी दी----"झूठ मत बोलना मिस्टर हेमन्त, बंसल ने मुझे बताया कि जब वह तुम्हारी रिक्शा के पीछे-पीछे अस्पताल पहुंचा तो इमरजेंसी के बरामदे में खडे़ व्यक्तियों ने उसे बताया कि तुम इमरजेंसी बिजी होने के कारण ललित्तादेबी को कार में डालकर किसी प्राइवेट डॉक्टर के यहीं ले जा चुके हो----वह यह न बता सका किस डॉक्टर के यहाँ अत: वहां से बंसल को अपने घर लौटना पड़ा----रात को जब मैं मनोज को गिरफ्तार करने पहुचा तो मिस्टर गुप्ता ,ने बताया कि अस्पताल से वे डॉक्टर अस्थाना के गए थे---अस्थाना भी मुझे बता चुका है कि अाप लोग पेशेंट को कार ही में लेकर अाए थे ।"
" हमने कब मना कियाकि उस वक्त कार नहीँ थी ?"



"कहां से अा गई कार ?"' गोडास्कर ने व्यंग्य किया---"'क्या पिछली रात की तरह कहीं से चुराई गई थी ? "



घबराकर अमित ने कहा----"न----नहीं ।"


" फिर ?"



"एक कार वाले से थोडी देर के लिए लिफ्ट माँगी थी, उस बेचारे ने मदद की।"



" आपने तो ऐसा कुछ नहीं बताया मिस्टर गुप्ता, अाप तो कहते थे कि आपको पता ही नहीं कि अमित कार कहां से ले अाया?"



बिशम्बर गुप्ता हकलाते रह गए!



जबकि हेमन्त ने कहा----" इन्हे क्या पता, उस वक्त बाबूजी को यह पूछने का होश कहां कि कार कहां से आई----यह तो मुझे भी तब पता लगा जब अस्थाना के क्लिनिक से चलने के बाद अमित ने मदद के लिए कार वाले का शुक्रिया अदा किया-------बहुत ही भला आदमी था कोई जिसने अमित के मिन्नत करने पर हमारी मदद की । "


"मगर बंसल और दूसरे मोहल्ले वालों का कहना तो यह है ललितादेबी को लेकर घर से आप दोनों ही चले थे फिर अमित आपके साथ... । "



"मै'ने बताया तो था इस्पेक्टर, अमित हमें रास्ते में मिला था !" बिशम्बर गुप्ता इस डर से त्रस्त होकर पहले ही बोल उठे कि कहीं उनमें से कोई उनके बयान को काटता हुआ जवाब न दे दे और उनकी इस भावना को अच्छी तरह समझता हुआ गोडास्कर मोहक अंदाज में मुस्कराया,बारी बारी से वह तीनों को देखता हुआ बोला-----"काफी होशियारी से एक दूसरे का बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं अाप लोग !"



तीनों को सांप सूंघ गया ।


अपने हाथ दबे रूल को बड़ी स्टाइल से घुमाते हुए गोडास्कर ने कहा------"मगर येह समझने की भूल मत करना कि इस झूठे बयान से तुम लोग गोडास्कर को धोखा देने में
कामयाब गए हो ? "



"क.. क्या मतलब ?" अमित के हलक में जैसे कुछ अटक गया ।



" मतलब यह मेरे बच्चे कि मेरे जाने के बाद तुम तीनों सिर जोड़कर जरा इस बात पर विचार करना कि मुझे दिया हुआ तुम्हारा बयान कितना अटपटा है ? "


" अ.. .आप गलत समझ रहे हैं । "
मैं अभी साबित कर सकता हूं कि हकीकत वही हेै जो मैं समझ रहा हूं !"


हेमन्त के मुंह से निकला-----" कैसे ?"



"न तो अपने कथित मददगार का नाम ही मालूम होगा न ही उस गाडी का नम्बर जिसमें रात तुमने लिफ्ट ली!"


"न..नाम हमने पूछा था, मगर उसने बताया नहीं कहने लगाकि अगर मैं अपना परिचय दे दूं तो समझूंगा कि मैंने आपकी कोई मदद नहीं की और नम्बर देखने का होश न था । "



"मैं बिलकुल ठीक समझ रहा हूं न ।" गोडस्कर ने बड़े जानदार अंदाज में उन्हे घूरता हुए कहा------"मजे की बात यह है कि अस्पताल के बरामदे में खड़े तीनों व्यक्ति और डाक्टर अस्थाना के बयान भी यह है कि अापके साथ अन्य कोई नहीं था !"



" जब वह कहीं गाड़ी से बाहर ही नहीं निकला तो वे लोग क्या बताते ? "



"चकमा देने की कोशिश मत करों मिस्टर हेमन्त । "

एकाएक गोडास्कर गुर्राया----"मैँ सब समझ रहा हूं कि यह गाड़ी कहां से अाई थी----मिस्टर अमित गाड़ी चुराने के मामले में सिद्धहस्त हो चुके हैं ।"



".य यह झूठ है । " अमित का प्रतिरोध बड़ा कमजोर था !



"गाडी चुराने के जुर्म में अभी तक आप लोगों को सिर्फ इसर्लिए गिरफ्तार नहीं कर रहा हू क्योंकि बुलंदशहर के किसी थाने में अभी तक किसी गाड़ी के चुराए जाने की रपट नहीं लिखवाई गई है, मगर क़ब तक-उसे तो रपट लिख़वानी ही होगी, जिसकी गाड़ी चेरी हुई और ऐसी रपट लिखी जाते ही तुम सब गिरफ्तार कर लिए जाओगे ।"



"जरूर गिरफ्तार करना इंस्पेक्टर ।" अपनी स्कीम पर मन-ही-मन मुस्कराते हुए हेमन्त ने कहा---"मगर तब जब किसी गाडी के चोरी हो जाने की रपट हो ।"



"वैसे बाई द वे, आपके उस मददगार ने आपको कहां छोडा ?"


""बस अड्डे पर!"



" वहा से अाप खुर्जा गए ?"


"जी हां !"
बडी ही मोहक मुस्कान के साथ गोडास्कर ने पुन: कहा---"और दुर्भाग्य से न तो अापके पास यहाँ से खुर्जा जाने के टिकट होंगे न ही खुर्जां से यहां आने के !"




"ये रहे टिकट !"
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Jemsbond
Super member
Posts: 4263
Joined: 18 Dec 2014 12:09

Re: दुल्हन मांगे दहेज

Post by Jemsbond » 29 Jun 2016 22:07

इसं बार गोडास्कर की खोपडी नाचं गई, काफी देर तक वह हेमन्त को घूरता रहा, जबकि मन-ही-मन अपनी सफलता पर बल्लियों उछल रहे हेमन्त ने कहा-----"बडे शर्म की बात है इंस्पेक्टर कि मनोज के इस घिनौने और संगीन जुर्म के बाद भी हमें ही परेशान कर रहे हों----कदम-कदम पर हमारी ही गतिविधियों पर शक क्रिया जा रहा है । "



"मनोज ने जो किया उसके आरोप में उसे गिरफ्तार किया जा चुका है मिस्टर हेमन्त । गोडास्कर का लहजा खराब था---"उसने एक शर्मनाक और जघन्य जुर्म किया है----अदालत से उसके की पूरी-पूरी सजा दिलाने की में पुरजोर कोशिश करूगा !"






"लेकिन ?"


"उसके इस जुर्म से न अापके उस गुनाह में कोई कमी अाती है जो अाप कर चुके हैं और न ही वे गुनाह हल्के पडते हैं जो अभी तक कर रहे हैँ-वादा रहा, मुझम्मल सबूत हाथ लगते ही मैं न सिर्फ अाप सब लोगों को गिरफ्तार का लूंगा बल्कि अदालत से सजा दिलाने के लिए भी उतनी ही पुरजोर कोशिश करूंगा, जितनी मनोज को उसके कुकृत्य की सजा दिलबाने के लिए !"



" तभी न जब सबूत तुम्हे मिलेगे' ?" हेमन्त ने अपने अाप से कहा-'सुचि की लाश मिलते ही सारे पासे पलटने बाले है बच्चु----तुम्हारी खोपडी़ को भी हवा में न घुमा दिया और तुम बाबूजी से माफी मांगने घऱ न आए तो मेरा नाम भी हेमन्त नहीं।"
सब इंस्पेक्टर अब्दुल जिस समय फोर्स के साथ वहाँ पहुचा, तब तक घटनास्थल के चारों तरफ गांव वालों की भीड़ लग चुकी थी, मगर--------------पुलिस को देखते ही भीड़ ने कई की तरह
फट कर रास्ता दे दिया ।




शीघ्र ही अब्दुल को एक वृक्ष को शाख से लटकी लाश नजर आई।




उसे मिली इन्फॉरमेशन के मुताबिक लाश किसी विवाहिता युवती की ही थी----एक पल ठिठककर अब्दुल ने दूर ही से लाश का निरीक्षण किया-----फिर उसी पर नजरें टिकाए धीरे-धीरे अागे बढा ।


लाश के इर्द-गिर्द दुर्गध फैल चुकी थी ।



अब्दुल ने-ईटों के उस देर को है जिस पर ,खडे होकर संभवतया युवती ने आत्महत्या की थी---आधी-अधूरी ईंटों का वह चट्टा लाश के ठीक नीचे था और इतना ऊंचा था कि जिस पर खड़े होकर युवती ने रस्सी का एक सिरा आराम से शाख में बांधां होगा बहुत-सी ईंटे चट्ठे के चारों तरफ लुढकी पड़ी थी !


लाश के पैरों के अंगूठे चट्टे की शेष ईटों से बाल बराबर स्पर्श हो रहे थे ।



पहली नजर में अब्दुल के दिमाग में यह कहानी उभरी कि सबसे पहले युवती ने आत्महत्या के इरादे से, इधर-उधर से आधी अधूरी ईंटें ढूंढकर शाख के नीचे इतना ऊंचा चट्टा _ लगाया जिस पर खड़ी होकर एक सिरा शाख में बांध सके-----उसके बाद रस्सी के दूसरे सिरे पर बने फंदे में अपनी गरदन डालकर चट्टे पर खडी़ हो गई और तब उसने पैरों से चट्टे की ईटे हटानी शुरू की ।

ईंटे हटती गई, फंदा कसता गया ।



क्लाइमेक्स अाने पर ईहलीला खत्म !



अब्दुल को यह मामला शुद्ध आत्महत्या का लगा, किंतु दिमाग में यह विचार जरूर अटककर रह गया था कि युवती कौन है और उसने यहीं आकर आत्महत्या क्यों की ?


कहीं अन्य क्यों नहीँ ?


आत्महत्या बडे परिश्रम और समझंदारी के साथ की गई थी !




अब्दुल यह सोचने के लिए बाध्य था कि क्या आत्महत्या करने वाले के दिमाग में इतनी समझदारी रहती है और क्या वह चुन चुनकर ईंटों का चट्टा बनाने जैसी परिश्रम करने की स्थिति में होता है ?


यह रस्सी इसे कहां से मिली ?


क्या आत्महत्या करने के लिए यह रस्सी अपने साथ लेकर चली थी--अगर हाँ, तो यह बात कितनी स्वाभाविक है-जहां से यह रस्सी लेकर चली थी, वहीं आत्महत्या क्यों
नहीं की-यंहा अाकर क्यो ?



एकाएक उसके दिसठग में विचार उठा कि कहीं यह हत्या तो नंहीं ?


अासपास कदमों के निशान कैं लिए उसने नजर मारी, परंतु वहीं नंगे पैर गांव के इतने निशाने थे कि किसी निष्कर्ष तक पहुंचना असंभव था ।



अब्दुल का दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो उठा । अह वह इसे पूरी तरह आत्महत्या नहीं मान रहा था, बल्कि यह सोचकर चल रहा था कि मुमकिन है किसी ने हत्या करके लाश यहीं इस ढंग से लटका दी हो कि आत्महत्या नंजर आए…अंतिम फैसला तो, वह यह पता लगाने पर ही कर सकता था कि युवती कौन हे और यहां केसे पहुंच गई ?
इसकै लिए लाश की तलाशी लेना जरूरी और फोटो आदि से पहले ताश को छेढ़ना उसने मुनासिब नहीं समझा । फिंगर प्रिंटृस विभाग और फोटोग्राफर के यहां आने में अभी समय था, अत: उसने सभी गांव बालों की तरफ देखते हुए ऊंची आवाज में पूछा---"क्या आपमें से कोई इस युवती को जानता है ?"



कहीं से कोंई जवाब नहीं !


कई बार पूछने पर भी जब कोई अागे न आया तों अब्दुल समझ गया कि युबती गांव बालों के लिए नितांत अपरिचित है,


बैसे भी लिबास से युवती शहरी लग रही थी ।



ऊंची आबाज में उसने दूसरा सवाल किया…"सबसे पहले लाश किसने देखी ?"



"मैंने साब ।" एक ग्रामीण ने कहा ।



"क्या तुम इधर से गुजर रहे थे ?" अब्दुल ने पूछा।



"नहीं साब, यह रास्ता तो है नहीं जो गुजर रहा होता ।"


"फिर तुम इधर केैसे आ निकले ?"



"कल रात से मेरी गाय खोई हुई है साब, रात को अच्छी भली छप्पर तले बांधी थी कि सुबह को गायब देखी, सो उस को ढूंढता फिर रहा था कि इधर आ निकला ----- लाश पर नजर पड़ी तो ऊपर का दम उपर रह गया साब-नीचे का नीचे---- चिल्लाता हुआ गांव की तरफ भागा और कुछ ही देरमें हम सब यहां इकट्ठे हो गए फिर आपको खबर देने का फैसला
किया गया । "




अपने अनुभव के आधार पर अब्दुल को लग रहा था कि लाश तीस पैंतीस घंटे पुरानी है, अतः उसने ऊंची आबाज में पूछा----"क्या इससे पहले किसी ने लाश देखी थी ?"



खामोशी ।



"कल रात या कल सारे दिन?"



कोई जवाब नहीं !


अब अब्दुल ने एक और सवाल किया.---"यह बाग 'किसका है ?"



" मेरा है साब ।" ऐक व्यय ग्रामीण आगे अाया ।


"क्या तुम हर रोज अपने बाग की देख-रेख नहीं करते हो ?" अब्दुल ने पूछा !

" लाश बता रही है कि वह परसों रात से यहाँ टंगी है-----कल दिन में तो तुम यहाँ आए होगे-----लाश पर तुम्हारी नजर तो पड़नी ही चाहिए थी ?"




"बाग पर चौबीस घंटे नजर रखनी पढ़ती है साहब मगर तब जबकि पेडों पर फ़ल लगे हों----आप देख ही रहे हैं , कि यह बाग अाम का है, आजकल अाम नहीं लगते सो, इधर अाए एक-एक हफ्ता गुज़र जाता है ।"




फोटोग्राफर और - फिंगर प्रिट्स विभाग के लोगों के जाने तक अब्दुल ग्रामीणों से इसी किस्म के सवाल करतां रहा-कोई खास सूत्र हाथ न लगा जबकि उन लोगों ने जाते ही यंत्रवत अंदाज में अपना काम शुरू का दिया ।



अब्दुल ने कई फोटो अपनी इच्छा के एंगल से खिंचवाए------कई ईटों से फिंगर--प्रिट्स उठवाए और उनका
काम खत्म होने के बाद पुलिस वालों की मदद से उसने खुद लाश उतरवाई-जब उसने लाश एम्बुलेंस के साथ अाए स्ट्रेचर पर रखवाई तब नजर एक कागज पर पडी़ ।



कागज का कोना लाश की छाती से बाहर झांक रहा था । अब्दुल की आंखें चमक उठी----उसे लेगा किं इस कागज से उसे युवती का नाम-पता मिल जाएगा-----कागज निकालकर खोला और पढा !



शंकर,



यह सोचकर मुझे अपने आपसे घृणा हो रही है कि कभी मैंने तुमसे प्यार किया था----वह शायद युवावस्था का जोश ही था, जिसने मुझे तुम्हारी तरफ आकर्षित किया वरना आज सोचती हूकि लड़की के प्यार की तो बात ही दूर, तुम घृणा के लायक भी नहीं हो और 'उन दिनों' अगर जानती की भविष्य में तुम मेरे जीवन के कोढ़ बन जाओगे तो कभी तुमसे प्यार न क्रिया होता, पत्र न लिखे होते ।



*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Jemsbond
Super member
Posts: 4263
Joined: 18 Dec 2014 12:09

Re: दुल्हन मांगे दहेज

Post by Jemsbond » 29 Jun 2016 22:08


आज से दो साल पहले तुम मेरा सब कुछ लूटकर हापुड़ से इस तरह गायब हो गए जैसे कभी कहीँ थे ही नही-----उस कमरे पर गई जहां तुम रहते थे, परंतु मकान मालिक से पता लगा कि तुम कमरा छोड़ गए हो और मकान मालिक को भी तुम्हारा पत्ता-ठिकाना मालूम न था-कितना ढूंढा, कितना तलाश किया-मगर तुम न मिले और उन दिनों मुझे अपने अाप पर तरस आ रहा था
तरस आ रहा था----यह सोचकर कि मैंने तुम्हारे बारे में उस किराये के कमरे से अागे कभी जानने की कोशिश ही नहीं की-घर वाले शादी की जिद कर रहे थे, तुम्हारी तलाश थी--एक साल गुजार गया और तब मैंने अपने दिमाग में धोखेवाज करार दिया----वहीं शादी कर ली जहां पापा ने कही !



तुम मेरी जिदगी में दाग थे शंकर और यह दाग में किसी को दिखाना नहीं चाहती थी----संयोग से मुझे अच्छी ससुराल मिली, अच्छा पति और हंसी खुशी मेरे दिन गुजर रहे कि-------------एक बार तुम फिर मेरी जिदगी में आ गये----उस दिन मैं शाम के वक्त हेमन्त के साथ गांधी पार्क में टहल रही थी कि मेरी नजर तुम पर पडी----तुम किसी हिंसक पशु की तरह मुझे घूर रहे थे------उस वक्त मेरी जो हालत हुई उसे मैं बयान नहीं कर सकती-उस दिन के बाद तुम मेरी जिदगी के कोढ बन गए--तुम मेरे पुराने प्रेमी नहीं, बल्कि ब्लेकमेलर बनकर मिले---सुख चैन और हंसी-खुशी में गुज़र रहीं मेरी जिदगी को तुमने झंझोड़ डाला शंकर-----मेरे पत्र हेमन्त को दिखाने कीं धमकी देकर तुम मुझसे छोटी-मोटी रकम ऐंठने लगे-मैं अपने पत्र वापस के लिए रोई, "गिढ़गिडाई हाथ जोडे, तुम्हारे पैर पकडे मगर तुम न माने----पुरे कमीने हो तुम-कहने लगे कि पत्र तब दे सकते हो जव मैं तुम्हें बीस हजार दूं-----इतनी बडी रकम भला मैं कहां से लाती…जब यही बात तुमसे कही तो तुम ठहाका लगाकर हंस पडे-बताया कि मेरी राइटिंग में तुम एक ऐसा पत्र हापुढ़ डाल चुके हो जिससे बीस हजार का इंतजाम हो जाएगा, मुझे तुम्हारी किसी भी राइटिग की नकल उतार देने की वह स्मरण हो अाई, जिसका प्रदर्शन अाज से दो साल पहले करते थे-----जब तुमने पापा के पास डाले गए पत्र का मजमून बतलाया तो मैं ढंग रह गई-चीख पडी कि मेरे पापा इतने पैसों का इंतजाम नहीं कर सकेंगे मगर तुम वहशिाना अंदाज़ में हंसे---- बोले कि बाप चाहे जितना गरीब हो, मांग यदि लडकी की ससुराल से आए------------दुल्हन ही अपने बाप से मांगे तो उसे इंतजाम करना पड़ता है…मेरे डाले गए पत्र के मुताबिक तुम चार तारीख को वहां जाना, रकम मिल जाएगी ।
मुझे चारों तरफ---से जकड़ लिया था तुमने ।



बिबश होकर सोचा कि जब तुमने पत्र डाल ही दिया है तो क्यों न बीस हजार मुंह पर मारकर अपने पत्र वापस ले लूं----चार तारीख ससुराल वाले रोकते रह गए मगर मैं जिद
करके बुलंदशहर से हापुड़े गई…रकम लाई ।


मुझसे कहा था कि जिस दिन मेरे ससुराल में हापुढ़ से टेलीग्राम मिले उसी रात को मैं तुम्हें बीस-हजार सौंपने और अपने पत्र बापस लेने के लिए गुलावठी अड्डे पर पहुंच जाऊं------रूपये लाने के अगले दिन यानी आज ही हापुड़ से अंजू की शादी का टेलीग्राम पहूँचा, मैं समझ गई तुमने ही डाला है, क्योंकि तुम जानते थे अंजू मेरी सबसे प्यारी सहेली है !



जाने क्यों मुझे यकीन न अा रहा था कि तुम बीस हजार लेकर भी मेरे पत्र लौटा दोगे----यह सोच-सोचकर डर रही थी कि अगर तुमने अब भी पत्र न लौटाए तो क्या करूँगी----इसका हल मैंने बडा भयानक निकाला, इतना तक सोच डाला कि अगर ऐसा हुआ तो तो मैं तुम्हें खत्म कर दूंगी और खुद भी मर जाऊंगी--- यह निश्चय करके मैंने बाबूजी का रिवॉल्वर चुरा
लिया !



मैं ही जानती है कि किन-किन मुसीबतों से गुजरकर आज तुम से गुलाबठी में मिली उन्होंने अमित को मेरे साथ लगा दिया था---बडी मुश्किल से बहाना बनाकर उसे बराल से टाला----तुम मुझे गांव के टूटे-फूटे और कच्चे मकान में ले गये--वही हुआ जिसका मुझे पहले से डर था, तुमने बीस हजार ही नहीं बल्कि मेरे गहने भी ले लिए----कहा ससुराल
और पीहर बालों से कह दूंगी कि अटैची बस में ही गुम हो गई---तुमने कुत्तेपने की हद कर दी थी शंकर अत: उस कहानी का वहीं अंत करने का निश्चय कर लिया । जो सोचकर आई थी----मगर वह भी न हो सका…चालाकी से तुमने मेरा रिवॉल्वर भी छीन लिया और दो घंटे बाद अाने के लिए कहकर तुम मुझे कमरे में केैद करके चले गए हो, जहां बैठी मैं अपना आखिरी पत्र लिख रही हूं !



हां आखिरी पत्र । यह कहकर गए हो कि मेरे पत्र उस दिन लौटाओगे जिस दिन मैं तुम्हें एक लाख दूंगी---मगर मैंं जानती हूं कि पत्र मुझे कभी नहीं मिलेंगें
तुम मेरे दामन के क्रोढ़ बन गए हो वक्त के साथ यह कोढ़ बढ़ता ही जाएगा…जिदगी मेरे लिए नर्क बन गई है…ऐसे ही पत्र डाल ड़ालकर तुम मेरे पापा को भी जीतेजी मार दोगे…ऐसी जिदगी से तो मौत अच्छी-मेरी मौत के साथ ही यह सिलसिला रूकेगा, मगर छप्पर की इस छत में कहीं इतनी जगह भी तो नहीं है, जहाँ मैं आराम से मर सकूं--- मगर वह रस्सी जो इस कमरे में शायद कपड़े टांगने के लिए बंधी थी, मैंने कमर पर अपनी साडी के नीचे लपेट ली हैे---तुन शायद आने ही वाले होगे, भविष्य में है एक लाख देने का वादा करके मैं यहाँ से निकल जाऊंगी और फिर वह भविष्य कभी नहीं आएगा शंकर ।




यह पत्र तुम्हें मेरी ताश के साथ मिलेगा और मेरी लाश वहाँ मिलेगी, जहाँ इस रस्सी पर आराम से मरने की जगह होगी---यह पत्र लिखने का अभिप्राय सिर्फ यह है कि मां पापा, भइया-हेमन्त, अमित रेखा, मांजी और बाबूजी को यह पता लग जाए क्रि मैं उनमें से किसी को मुंह दिखाने के लायक न थी-----सबकी दोषी हूं मुझे माफ कर देना मगर शंकर नाम के राक्षस को कभी माफ न करना हेमन्त, मैं तुम्हारी कसम खाकर कहती हूं मेरे देवता कि मैं गंगा-सी पवित्र नहीं, मगर जब से तुम्हारी हुई तब से तुम्हारी ही हूं और शंकर वह दरिंदा है जो शादी से पहले लड़कियो को फंसाकर उनकी शादी हो जाने देता है ताकि बाद में उन्हें ब्लैकमेल कर सके-बाहर का दरवाजा खुला, शायद वह आ रहा है !




अंतिम शब्द बुरी तरह धसीट मारकर लिखे गए थे ।



पत्र पढते ही लाश के संबंध में अब्दुल के जेहन में जितनी गांठें थी, सब खुलती चली गई----उसकि आंखों के सामने आजका अखबार चकरा उठा ।



एक खबर वड़ी सुर्खियों में थी ।



बुलंदशहर के सम्मानित नमारिक रिटायर्ड मजिस्ट्रेट बिशाम्बर गुप्ता की बहू के गायब होने की खबर----- अब्दुल ने पढा था फि लइकी का ससुराल वालों पर दहेज मांगने का आरोप लगा रहा है-----सारे शहर के साथ-साथ पुलिस का भी यह अनुमान है कि ससुराल बालों ने सुचि की हत्या करके लाश कहीं ठिकाने लगा दी है !


अब्दुल ने महसूस किया कि लाश बरामदगी की सूचना सबसे पहले बुलंदशहर पहुंचनी चाहिए, अत: उसने आदेश दिया--"'लाश को एम्बुलेंस में रखवाओ । "

हापुड़ के दहेज विरोधी संगठनों व्यापारियों और महिला की एक संयुक्त आपात्कालीन बैठक पिछली रात ही हो चुकी थी----उसमें हापुड़ बंद का प्रस्ताव ध्वनि मत से पास हुआ ।



आज हापुड़ बंद था !



हापुड़ के नागरिकों से भरी बसें सुबह से ही बुलंदशहर पहुंचने लगीं ।



सारे शहर का वातावरण गर्म हो उठा ।


बुलंदशहर के नागरिक भी उनके साथ थे------सो आनन-फानन में बुलंदशहर बंद की भी घोषणा कर दी गई।


बुलंदशहर बंद ।



दहेज विरोधी नारे लगाता हुआ विशाल जुलूस निकला-----ज़नसमूह बिशम्बर गुप्ता परिवार के साथ ही पुलिस के विरूद्ध भी नारे लगा रहा था--सुचि का पता लगाने संबंधी सारे नारे लगा रहे थे-----हर तरफ उतेजित भीड़ गर्म नारे !



जालूस थाने के बाहर पहुचां !





लोग कुछ ज्यादा ही जोश में अा गए, नारे और ज्यादा गर्म हो उठे ।



इंस्पेक्टर गोडांस्कर ने भीड़ को शांतकरके कहा------" आप लोग यकीन रखें,, दोषी को सजा जरूर मिलेगी------ सुचि को ढूंढने की पुलिस पुरजोर कोशिश कर रही है-------बिशम्बर गुप्ता उसके परिवार के लोगों को गिरफ्तार करने में कुछ कानूनों पेचीदगियों हैं जो शाम तक राइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट आने पर हो जाएंगी----" मेरा विश्वास है कि आज शाम तक उन लोगों को जरूर गिरफ्तार कर लिया जाएगा । '"



गोडास्कर अभी इतना ही बोल पाया था कि एक कांस्टेबल ने आकर उसके कान में सुचना दी----"गुलावठी से सव इंस्पेक्टर अब्दुल का फोन है, वह आप से बात करना चाहते । "


गोडास्कर अंदर चला गया ।



भीड़ भला कहां संतुष्ट होने बाली थी -- नारे कुछ ज्यादा ही बुंलदी से उछलने लगे और फिर यह जुलूस जिलाधी को ज्ञापन देने चल पडा़ !!!
रेखा को सुबह सात बजे होश अाया !


आठ बजे तक वे हस्पताल से घर आ गए-चीखने चिल्लाने और रोने के बाद विस्तर पर पडी़ रेखा अब तो सो चुकी थी----बाकी लोग भूखे-प्यासे,, डरे सहमे से ड्राइंगरूम मेंं बैठे थे--------सुबह काअखबार पढ चुके थे !




शहर के वातावरण से भी अपरिचित न थे



उन्हें लग रहा था कि उत्तेजित जनसमूह को शांत करने के लिए पुलिस उन्हें किसी भी क्षण गिरफ्तार कर सकती है,, यह बात बिशम्बर गुप्ता ने अभी अभी कही थी !


जबाब में हेमन्त बोला------" अब आपको इतना डरना नहीं चाहिए बाबूजी,, यह हंगामा और शोर-शराबा केवल तभी तक है जब तक सुचि की लाश नहीं मिल जाती----लाश मिलते ही सब कुछ बंद हो जाएगा, उनके मुंह पर ताले लग जाए'गे !"



"मगर पहले पुलिस हमे गिरफ्तार तो कर सकती है ?"


" केवल लोगों को शांत करने के लिए----कानूनी रूप से न पुलिस अभी पुख्ता है, न हो सकेगी क्योंकि एक्सपर्ट की रिपोर्ट हमें फेवर करेगी-----लाश मिलने के बाद तो बाकी कुछ बचेगा ही नहीं--------गिरफ्तार हो भी गए तो पुलिस को तुरन्त छोड़ना पडेगा !"






'"म...मगर एक बज ,गया है, लाश आखिर कब मिलेगी?"



"इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, मुमकिन है आज सारे दिन ही न मिले, क्योंकि लाश को हम ऐसी स्थान पर छोडकर अाए हैं जहां उसे कोई आसानी से देख न सके ।"



बिशम्बर गुप्ता के कुछ कहने से पहले ही कॉंलवैल बज उठी !



सबने सवालिया नजरों से एक-दूसरे की तरफ देखा ,,यह लिखना गलत न होगा कि हैमन्त ने अपने पिता को आदेश दिया----" आप देखिए कौन है ?"
सस्पेंस में फंसे बिशम्बर गुप्ता दरवाजा खोलने चले गए-जब वापस आए तो उनके साथ एक व्यक्ति था और उस व्यक्ति को देखते ही ललितादेबी चीख पडीं ।




" भईया । " वह दौड़कर उस व्यक्ति से जा लिपटी ।



"बात क्या हुई ललिता, यह सब कैेसे और क्यों हो गया ? " कहते हुए उस व्यक्ति ने स्नेहपूर्वक उसके सिर पर हाथ फेरा-----ललितादेबी फफ्क--------फ़फककर रो रही र्थी-------इस कदर कि वह अपने भाई के सवाल का जवाब भी न दे सकी, पीड़ा युक्त स्वर में बिशम्बर गुप्ता ने कहा----" सब तकदीर का खेल है जगदीश-लोग हमे दहेज के, लोभी और हत्यारा कह रहे हैं…हमारे बारे में यह सब सोच रहे हैं जो कभी खुद हमने नहीं सोचा ! "




" लेकिंन हुआ क्या है जीजाजी, मुझें भी तो कुछ वताइए----टेलीग्राम और अाज का अखबार मुझे लगभग साथ ही मिले-----पढ़कर चौंक पड़ा मैं । "



बिशम्बर गुप्ता ने हेमन्त की तरफ देखा…जेसे पूछ रहे हो कि जगदीश को सच किस हद तक बताया जाए, जगदीश बोला-"बेहिचक से सब कुछ बता दीजिए, अगर कोई ऊक-चूक बात भी हो गई तब भी मैं आपके साथ हूं--ऐसा भला कैसे हो सकता है कि बहन मुसीबत में है और भाई साथ न दे !"



जगदीश के शब्द एक धूसां बनकर बिशम्बर गुप्ता के दिल पर लगे कराह से उठे वह------" क्या तुम्हे हमसे और अपनी बहन से भा यह उम्मीद है कि हमने दहेज मांगा होगा-----सुचि की हत्या की होगी ?"



" ऐसी बात नहीं है जीजाजी !"



" फिर तुमने सोच भी कैसे लिया कि कोई ऊक चूक बात हुई होगी ?"



"मैनें तो यूं ही---- शहर में इतना शोर जो मच रहा है, कोई बात तो होगी ही और मैं वही बात जानने के लिए बुरी तरह उत्सुक हूं !"



हेंमन्त ने सब कुछ बता दिया !


सब कुछ !


यह भी कि सुचि की लाश को उन्होनें घर से निकालकर क्यों कैसे और कहां पहुचाया है, सुनकर जगदीश गंभीर होगया,, बोला -----" मेरे ख्याल से आप लोगों ने बस यही ठीक नहीं किया !"
" क्या ?"



" आप तो मुझसे बेहतर जानते हैं जीजाजी क्रि जुर्म को जितनी सख्ती के साथ दबाने का प्रयास क्रिया जाए उतेंनी ही तेजी से उछलकर अोरों के सामने आता है-सुचि की लाश मिलने तक न आपने कोई गुनाह किया था न झूठ बोला था,, मगर उसके बाद जो कुछ किया वह ठीक नहीं था !"




"हमने तो कहा था जगदीश हेमन्त ही न माना । "



"क्यों हेमन्त?"



हेमन्त ने उल्टा सवाल किया-----------"आप हमारी जगह होते तो क्या करते ? "



"लाश मिलते ही पुलिस को सूचित कर देता ।"



"हुंह---कहना अासान् है मामाजी, करनां बहुत मुश्किल । "




"क्या मतलब?"



"पुलिस उसी समय सुचि की हत्या के जुर्म में हमारे हाथों में हथकडी डालकर थाने ले जाती ।"



" लेकिन झूठ-झूठ ही होता है, एक दिन सच्चाई अदालत और लोगों के सामने जरुर आती-मगर अब मुसीबतों का फंदा अपऩे गले तुम खुद डाल चुके हो !"


"सच्चाई सामने कभी नहीं आनी थी मामाजी, क्योकि उसे सामने लाने के लिए हमारे पास कोई सबूत न था-------आप बाबूजी से पूछ सकते है, सुचि के पत्र की रोशनी में हर आदमी को हमारी कहानी इतनी खोखली लगती कि वह व्यंग्य से हंसने लगता था----नक्वी और गोडास्कर उदाहरण हैं । "

"मगर अब ही तुमने क्या कर लिया है-मेरा ख्याल तो यह है कि तुम्हारी स्कीम बुरी तरह फ्लाप होगी---------"यह साबित होने में देर नहीं लगेगी कि लाश को वहां तुमने पहुचाया है ----- उसके बाद तुम लाख कहते रहना कि लाश तुमने पहुंचाई जरूर है मगर हत्या नहीं की-कोई विश्वास नहीं करेगा । "



" आप देखते लेना मामाजी सब बिश्वास करेंगें---- सारी दुनिया को यकीन होगा----
दुनिया को यकीन होगा-----अदालतें उस झूठ को सच, मानती हैं जिसके सबूत हों उस सच को सच नहीं जिसके सबूत न हों !




जगदीश के कुछ कहने से पहले ही कॉलबेल पुन बजी । इस बार दरवाजा खोलने हेमन्त खुद गया वापस आया तो साथ में गोडास्कर था----वह पहली बार बिना किसी पुलिस वांले को साथं लिए अाया था---हेमन्त के चेहरे पर तो हवाइयां उढ़ ही रहीँ थीं-----पुतिस को देखते ही जगदीश 'सहित अन्य ' सभी के चेहरे भी फक्क पड़ गए--बुरी बुरी आशंकाओं है दिल धड़कने लगे ।



गोडास्कर की भूरी आंखें जगदीश पर जम गई और जव जगदीश ने ऐसा महसूस किया तो उसके पेट में गैस का गोता उठकर दिल पर ठोकरें मारने लगा, गोडास्कर ने सीधे उसी से पूछा-----" आपका परिचय ?"



"ज.....जी--मेरा नाम जगदीश है, इन बच्चों का मामा हूं !"




"ओह अच्छा…जिनके यहां कल रात मिस्टर अमित और हेमन्त गए थे ?"



*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Jemsbond
Super member
Posts: 4263
Joined: 18 Dec 2014 12:09

Re: दुल्हन मांगे दहेज

Post by Jemsbond » 29 Jun 2016 22:09


जाने क्यों जगदीश की इच्छा उनके झूठ में शामिल होने की न हुई अौर सच शायद बहन के प्यार ने न बोलने दिया ! वह चुप ही रहा----गनीमत्त यह हुईं कि उसकी तरफ़ से किसी किस्म का जवाब मिलने का इंतजार किए बिना गोडास्कर ने हेमन्तं की तरफ घूमकर सवाल किया------" क्या आप किसी शंकर नाम के व्यक्ति को जानते हैं ? "



"हेमन्त का दिल बल्लियों उछल पड़ा !



गोडास्कर के पहले ही सवाल से जाहिर था कि वह न सिर्फ सुचि की लाश, तक पहुच चुका है, बल्कि पत्र भी पढ़ चुका हे-उसका दिल किसी ड्रम की तरह बजने लगा था !



"आपने ज़वाब नहीं दिया मिस्टर हेमन्त ?"



"ज---जी-----कौन शंकर-मैँ किसी शंकर को नहीं जानता ।"



"याद कीजिए, दरअसल यह बहुत जरूरी हेै----दिमाग पर जोर डालकर सोचिए, मुमकिन है कि सुचि ने कभी इस नाम के किसी आदमी का जिक्र किया हो ?"
" स...सुचि ने'?"



"जीहाँ । "



हेमन्त को लगा कि गोडास्कर वही सोच रहा है जो यह सुचबाना चाहता था, कामयाबी की चमक को अपने चेहरे पर उभरने से बड़ी मुश्कि्ल से रोका उसने, बोला…"नहीं-तो, मगर--------यह शंकर कौन है और सुचि को इस आदमी का जिक्र मुझसे क्यों करना चाहिए था । "


उसकी बात का जवाब देने के स्थान पर गोडास्कर ने बिशम्बर गुप्ता ललितादेबी और अमित की तरफ देखते हुए सबाल किया----"' अाप में से किसी ने कभी सुचि के मुंह से यह नाम सुना है ?"



" नहीं !" तीनों का संयुक्त स्वर ।




" मैं फिर कहता हूं कि ठीक से याद कीजिए !" गोडास्कर ने अपने शब्दों पर जोर दिया---" 'दरअसल शंकर नाम का यह अादमी अाप सब लोगों को बेगुनाह साबित कर सकता है ।"




"य.......यह तुम क्या कह रहे हो इंस्पेक्टर?" हेमन्त ने बडी ही खूबसूरत एक्टिंग की…..."क.....कौन है शंकर और यह हमें बेगुनाह कैसे साबित कर सकता है ?"



"वर्योंकि असली गुनाहगार वही है !"




"क. . .क्या मतलब, हम कुछ समझे नहीं-पहेलियां-मत बुझाइए इंसपेक्टर, साफ-साफ बताइए कि बात क्या है-कौन शंकक, क्या किया है उसने और इस केस में अचानक ही यह अजनबी नाम कहां से जुढ़ गया ?“




"सुचि के पत्र से । "



"स...सुचि का पत्र--क्या-पुलिस को मिला है, कहाँ से…प्लीज, जल्दी बताइए इंस्पैक्टर कि सुचि ने पत्र कहाँ से डाला है----कहाँ है वो, कहां है उसका पत्र ? "



"सुचि मर चुकी है !"




"क...क्या ?" योजना के मुताबिक हेमन्त, अमित और बिशम्बर गुप्ता मुंह फाडे़ किसी के स्टेचू के समान खडे़ रह गए और ललितादेबी दहाडें मार-मार रोने लगी…खबर सुनते ही हेमन्त के आदेशानुसार उसे इसी तरह रोना था ।


जगदीश अपनी बहन की खूबसूरत एक्टिंग को देखता रह गया ।
स...सुचि ने'?"



"जीहाँ । "



हेमन्त को लगा कि गोडास्कर वही सोच रहा है जो यह सुचबाना चाहता था, कामयाबी की चमक को अपने चेहरे पर उभरने से बड़ी मुश्कि्ल से रोका उसने, बोला…"नहीं-तो, मगर--------यह शंकर कौन है और सुचि को इस आदमी का जिक्र मुझसे क्यों करना चाहिए था । "


उसकी बात का जवाब देने के स्थान पर गोडास्कर ने बिशम्बर गुप्ता ललितादेबी और अमित की तरफ देखते हुए सबाल किया----"' अाप में से किसी ने कभी सुचि के मुंह से यह नाम सुना है ?"



" नहीं !" तीनों का संयुक्त स्वर ।




" मैं फिर कहता हूं कि ठीक से याद कीजिए !" गोडास्कर ने अपने शब्दों पर जोर दिया---" 'दरअसल शंकर नाम का यह अादमी अाप सब लोगों को बेगुनाह साबित कर सकता है ।"




"य.......यह तुम क्या कह रहे हो इंस्पेक्टर?" हेमन्त ने बडी ही खूबसूरत एक्टिंग की…..."क.....कौन है शंकर और यह हमें बेगुनाह कैसे साबित कर सकता है ?"



"वर्योंकि असली गुनाहगार वही है !"




"क. . .क्या मतलब, हम कुछ समझे नहीं-पहेलियां-मत बुझाइए इंसपेक्टर, साफ-साफ बताइए कि बात क्या है-कौन शंकक, क्या किया है उसने और इस केस में अचानक ही यह अजनबी नाम कहां से जुढ़ गया ?“




"सुचि के पत्र से । "



"स...सुचि का पत्र--क्या-पुलिस को मिला है, कहाँ से…प्लीज, जल्दी बताइए इंस्पैक्टर कि सुचि ने पत्र कहाँ से डाला है----कहाँ है वो, कहां है उसका पत्र ? "



"सुचि मर चुकी है !"




"क...क्या ?" योजना के मुताबिक हेमन्त, अमित और बिशम्बर गुप्ता मुंह फाडे़ किसी के स्टेचू के समान खडे़ रह गए और ललितादेबी दहाडें मार-मार रोने लगी…खबर सुनते ही हेमन्त के आदेशानुसार उसे इसी तरह रोना था ।


जगदीश अपनी बहन की खूबसूरत एक्टिंग को देखता रह गया ।
सबसे पहले नियंत्रित होने का नाटक हेमन्त ने किया, बौला----"क...कैंसे------कहां है वह;-----मेरी सुचि की लाश पुलिस को कहां से मिली थी ?"



जो कुछ उसे अब्दुल से पता लगा था वह सब बताने के बाद गोडास्कर ने सुचि की लाश से बरामद पत्र भी उन्हें पकड़ा दिया-----अकेले हेमन्त ही नहीं, बल्कि उसके उपर खुलकर जगदीश सहित सब लगभग सभी ने पढा और उस पर आंसू टपकाने की खूबसूरत एस्टिंग भी की, जबकि गोडास्कर का बता रहा था----" यह पत्र सुचि के गायब होने और आत्महत्या की सारी कहानी खुद सुना रहा है । "



"क्या पत्र यह नहीं बता रहा इंसपेक्टर कि हमारा बयान अक्षरश: सच था ?” हेमन्त ने जोश में भरकर कहा-----"वह बयान जिसपर यकीन न कर रहे थे ? "




"स......सॉरी हेमन्त, मैंने आपके साथ बडी ज्यादती की है----मगर आप तो जानते है गुप्ता जी----हम पुलिस बाले कर ही क्या सकते हैं----सामने खड़ा व्यक्ति झूठा या सच्चा यह जानने का हम पर एक ही पैमाना होता हेै…सबूत-और आपके खिलाफ सबसे ठोस सबूत वह पत्र था जो अब शंकर का लिखा साबित हो रहा है और शायद इस पत्र की मौजूदगी की वजह से ही आपका बयान भी एकदम , अस्वाभाविक, अटपटा और काल्पनिक लग रहा था---अाई एम रियली वैरी सोंरी गुप्ता जी । "



सारे परिवार का दिल चाह रहा था कि - वे बल्लियों उछलें----खुशियां मनाएं----नाचें, मगर उन जज्बातों को बडी मुश्किल से दबाए ललितादेबी ने कहा---"अब कहाँ है मेरी बहू मुझे उसके पास ले चलो।"




"सॉरी मांजी । " गोडास्कर पहली बार सम्मानपूर्वक बोला-----"अभी ऐसा नही हो सकता, आप लोगों को धैर्य रखना पडेगा । "




"क्यों ?" बिशम्बर गुप्ता के मुह से निकला । " लाश चीरघर में है---- पोस्टमार्टम के बाद आपको मिलेगी !"



"हम चीरधर जा रहे हैं, अपनी बहू कीं लाश को खुद यहां लेकर आएंगे । "
"सॉरी गुप्ताजी, अभी अाप ऐसा नहीं का सकते, पुलिस, कानून और व्यवस्था की मदद करनी होगी । "



"हम समझे नहीं । "




गोडास्कर ने एक सिगरेट सुलगाई, गहरे कश के बाद सारा धुआं गटकता हुआ बोला----"बात दरअसल यह है ,गुप्ताजी कि लाश और यह पत्र मिलने का राज अभी तक गुप्त रखा गया है।"



" क्योंकि लोग अभी इकट्ठा हैं, एक जलुस की शक्ल में हैं और उत्तेजित भी हैँ…वे पूरी तरह यह हैं कि सुचि को दहेज के लिए अाप ही ने मारा है…इस वक्त अगर उन्हें, सच्चाई बता दी जाए तो किसी को प्रिय नहीं लगेगी और इसीलिए वे इस सच्चाई पर यकीन भी नहीं करेंगे बल्कि उल्टे भढ़क उठेंगे----"पुलिस पर आपसे मिलीभगत या रिश्वत का इलजाम लगाएंगे…तोड़-फोढ़ और हिंसा भी भडक सकती है-----इस स्थिति से बचाने के लिए पुलिस के उच्चाधिकारियों ने यह निश्चय किया कि अाज का दिन निकल जाने दिया जाए--जुलूस आदि निकालने के बाद लोग ठंडे पढ़ जाएंगे------अपने-अपने घरों में जाकर सो जाएंगे ।"



"फिर ?"



"कल सुबह जब लोग सोकर उठेंगे तो अखबार में उन्हें सुचि की ताश के फोटो सारी कहानी और यह पत्र भी छपा मिलेगा उस वक्त लोगों को हकीकत जल्दी स्वीकार हो जाएगी !"





"ऐसा क्यों ?" बिशम्बेर गुप्ता ने कहाँ…"आंदोलन, हिंसक वारदातें-तोड़-फोड़ और पुलिस पर इलजाम आदि तो वे कल भी लगा सकंते हैं ?"

"हरगिज नहीं-उत्तेजित भीड़ और एक व्यक्ति की मानसिकता में जो फर्क होता' है उसे आपको समझना चाहिए-----इस वक्त हम एक-एक व्यक्ति को अलग-अलग सच्चाई बता नहीं सकते और भीड़ सुनेगी नहीं, समझेगी नहीं-कल सुबह अलग--अलग, अपने--अपने घरों में जब लोग सच्चाई जानेंगें और समझेंगे भी…ऐसा जाहिर करेंगे जैसे आज के जलूस में वे थे ही नहीं—
कोई सडक पर नहीं अाएगा, भीड नहीं लगेगी तो बलवा भी नहीं होगा-यदि किसी छोटे-मोटे संगठन ने भीड जुटाने की कोशिश भी की तो उसे जासानी से दबाया जा सकता है ।"




"यानी आज हम सारे दिन अपने खिलाफ नारे लगने, दें-गातियां सुनते रहें लोगों का यह सब कहना सहन करते रहे जो हमने नहीं किया ?"



"मजवूरी है गुप्ताजी, इतनी मदद तो कानून की आपकी करनी ही चाहिए और फिर, दूसरे लोगों की तरह अगर हकीकत अभी आपको भी नहीं बताईं जाती तब भी तो यह सब आपको सहन करना ही पडता ?"



'"तो फिर हमे हकीकत बताई ही क्यों गई ? "




" उच्चाधिकारियों की बैठक का नतीजा यह निकला कि , जब सच्चाई यह पत्र है तो गुप्ताजी के बेगुनाह परिवार को बेवजह उस तनाव में क्यों रखा जाए जिसमें रखने का कमसे कम हकीकत खुलने के बाद पुलिस को कोई हक नहीं है, अतः जिस क्षण से यह स्कैंडल उठा है उसी क्षण से अाप लोग जिस तनाव में हैं उससे मुक्त करने के लिम केवल आपको वास्तविकता बताने का निश्चय किया गया । "



" मगर चीरघर तो हम जा सकते है? "



"में एक बार फिर क्षमायाचना के साथ कहूंगा कि नहीं-----शहर के ज्यादातर लोग अापको और अापके परिवार के लोगोंको जानते हैं-यदि आप किसी भीढ़ में धिर गए या 'चीरघर पर आपको किसी ने देख लिया तो स्थिति बिगड सकती है ।"




" मगर मुझे तो हुई नहीं जानता । "


*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

Post Reply