दुल्हन मांगे दहेज complete

Jemsbond
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Re: दुल्हन मांगे दहेज

Post by Jemsbond » 29 Jun 2016 22:17

मेरा ख्याल था कि लाश को देखते ही तुम लोग पुलिस को सूचित करोगे क्रि सुचि ने आत्महत्या कर ली है------------आत्महत्या का कोई कारण न तुम पुलिस को बता सकोगे न पुलिस को मिलेगा------अतः पुलिस की नजरों में संदिग्ध तो तुम इसी क्षण से हो जाओगे----उधर पोस्टमार्टम के बाद पुलिस पर राज खुलेगा कि सूचि की हत्या की गई है, तब तक दीनदयाल भी सुचि का पत्र लेकर पुलिस तक पहुंच चुका होगा, अत: साबित हो जाएगा कि दहेज के लिए सुचि की हत्या तुम लोगों ने की है-टंकी से रिवॉल्वर और सुचि के सामान की बरामदगी यह साबित कर देगी कि तुम पुलिस को धोखा देना चाहते थे ।


हेमन्त का दिमाग फिरकनी की तरह घूम रहा था ।



"मगर तुम लोगों ने वह नहीं किया जो मैंने सोचा था , बचने की कोशिश की और यह कहने में मुझे कोई हिचक नहीं है कि बचने की तुम्हारी कोशिश काफी खूबसूरत थी, अफसोस---------तुम कामयाब न हो सके----पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ने सब चौपट कर दिया और अंतत: अंजाम वही हुजा जैसा मैंने सोचा था, जैसा मैं चाहता था--सारे शहर की नजरों में मैंनें विशम्बर गुप्ता के जीवन की एकमात्र कमाई यानी, प्रतिष्ठा धुल में मिला दी-लोगों ने गधे पर बैठाकर मेरे बेटे के हत्यारे का जुलूस निकाला-------इतना अपमान किया कि गधे पर बेठा-बैठा ही मर गया कमीना----खुशी है कि सबके सामने अपने हाथों से उसका मुंह काला कर सका----मुझे इस बात की भी खुशी है कि मेरे बेटे के हत्यारे ने अपनी आंखी से अपने बेटे की लाश देखी----तेजाब से जला अपनी वेटी का चेहरा देखा-अफसोस यह है कि वह अपनी पत्नी को कहकहे लगाते न देख सका--------तुम्हें मेरे सामने गिड़गिड़ाते न देख सका-मगर मैं खुश हू क्योंकि सुरेश के हत्यारे से भरपूर बदला लेने में कामयाब रहा-------------उसका और उसके परिवार का नाम लेकर इस शहर का वच्चा-वच्चा वर्षों नफरत से थुकता रहेगा-------किसी को पता नहीं लगेगा कि दहेज बिशम्बर गुप्ता ने नहीं, बल्कि खुद तुम्हारी दुल्हन ने मांगा था-----हत्या विशम्बर गुप्ता और उसके परिवार ने नहीं, कर्नल जयपाल अग्रबाल ने की थी ।"

"म. ..मैं यह सावित करके रहूंगा । " हेमन्त चिल्लाया-------"मैं अपने बाबूजी' की प्रतिष्ठा स्थापित करने के बाद ही मरूंगा !"



कर्नल ने बड़ा ही जबरदस्त ठहाका लगाया । वोला-----"कभी नहीं बेटे, जो कुछ मैंने बताया वह भी एक ऐसी ही कहानी है, जिसे तुमने जान तो लिया, लेकिन साबित नहीं कर सकोगे, क्योंकि !"



"क्योंकि ?



"जिस तरह खुद को बेगुनाह सावित करने के लिए तुम्हारे पास कोई सबूत नहीं है-----उसी तरह इस कहानी को भी सच साबित करने के लिए तुम्हें कोई सबूत नहीं मिलेगा और सबूतों के अभाव में यह कहानी भी सिर्फ कहानी हीं बनकर रह जाएगी--तुम अदालत को चीख-चीखकर वह सब कुछ बताओगे जो मैंने बताया है, मगर मैं अदालत में यह कहूंगा कि यह कहानी तुमने सिर्फ इसलिए 'घढ़ी' है, क्योंकि मैंने तुम्हारे बाप का मुंह काला किया था-जो शख्स पहले ही एक काल्पनिक ब्लैकमेलर की कहानी 'धढ़' कर पुलिस को 'धोखा' देने की नाकाम कोशिश कर चुका हो------सबूतों के बिना अदालत उस शख्स की इस कहानी को भी नितांत मनघड़ंत करार देगी !"



हेमन्त दांत भींचकर कह उठा-"सबूत मैं इकट्ठे करूंगा कुत्ते !"



"सबुत तो तुम तब इकट्ठे करोगे मेरे बच्चे, जब कहीं होगें ।" कर्नल ने व्यग्यात्मक लहजे में कहा----"सच्चाई यह है कि अब अगर मैं खुद भी चाहूं तो इस कहानी को सच्ची साबित नहीं कर सकता । "




" क्या मतलब ?"




" जो मैंने किया उसका कहीं कोई सबूत नहीं छोड़ा-----आज से चार रात पहले होटल के जिस कमरे में मैंने हत्या की, आज मैं साबित नहीं कर सकता कि वह कमरा मैंने कभी किराए पर भी लिया था-----रजिस्टर तक में मेरे स्थान पर किसी अन्य के हस्ताक्षर हैं-होटल के स्टाफ का कोई भी शख्स मुझे पहचान नहीं सकता, क्योकि किसी अन्य नाम से वे मुझे मकड़ा बाले चेहरे में पहचानते हैं और उस चेहरे को मैं खुद राख में बदलकर फ्लश में बहा चुका हूं-----कमरे में हत्या का निशान जब आज तक ना मिल सका तो अब क्या मिलेगा----

जबकि बहां हर रोज-नये ग्राहक अाते-जाते रहते है-----हत्या क्योंकि, मैंने गला घोंटकर की थी, अत: किसी किस्म के चिह्न आदि का स्थान ही नहीं उठता-----सुचि क्योंकि स्वयं को , छुपाकर वहां पहुंची थी अत: उस रात उसके वहां पहुंचने का कौई गवाह नहीं-----हत्या से लाश को तुम्हारे बेडरूम तक पहुंचाते समय जो दस्ताने मैंने पहन रखे थे, उन्हें आज मैं खुद भी दोबारा हासिल नहीं कर सकता----लाश ले जाते मुझे किसी ने नहीं देखा-उन नेगेटिव तक को जलाकर राख कर चुका हूँ जो मैरे द्वारा सुचि को ब्लैकमेल किए जाने के प्रमाण थे-----मत्तलच यह कि अपनी कारगुजारी मैं किसी को बता तो सकता हूं मगर साबित नहीं कर सकता और सिर्फ बताने से तो अंदालत मेरे बयान को भी झूठा मानेगी------इस अवस्था में तुम इस कहानी को सच्ची साबितं नहीं कर सकते और जो साबित न हो वह हकीकत नहीं, सिर्फ कहानी होती है ।


हेमन्त किकर्तव्यविमूढ़-सा बैठा रह गया ।



कर्नल के स्पष्ट करने पर शायद पहली बार उसे यह अहसास हुआ कि वास्तव में उसकी स्थिति वहीं है जो कर्नल ने बयान की-----हर सवाल का जवाब मिल जाने, सारी सच्चाई जान जाने के बाबजूद वह कुछ नहीं कर सकता था ।


कुछ भी तो नहीं !



अदालत को यह सब बता देने, सिर्फ बता देने ले कोई लाभ होने वाला न था और प्रूव करने के लिए कोई सबूत नहीं, जबकि होंठों पर अपनी सफलता की मुस्कान लिए कर्नल राइटिंग टेबल पर रखे फोन की तरफ बढा ।

हेमन्त को कवर किए उसने एक नम्बर रिंग किया, संबंध स्थापित होने पर बोला----" हैलो मैं कर्नल जयपाल बोल रहा हूं--एस.पी. साहब से बात करना चाहता हूं । "


दूसरी तरफ से कुछ कहा गया ।


. "थेंक्यू ।" कहकर कर्नल शांत हो गया ! रिवॉ्ल्वर से उसे कवर किए………दूसरे हाथ में रिसीवर कान से लगाए कर्नल उसे देखता हुआ मंद मंद मुस्कराता रहा और कुछ देर बाद एकदम चौंकता हुआ बोला-----"जी हां, मैं कर्नल बोल रहा हू । "

हेमन्त ने अंदाजा लगाया कि दूसरी तरफ से कहा गया होगा---" कहिए !"

शायद आपको पता लग गया होगा की श्मशान से हेमन्त पुलिस का घेरा तोड़कर भाग निकला है----जी हां, बह मेरे पास कोठी पर पहुंचा-----------कम्बख्त के सिर पर अभी तक खून सवार है, कहता था कि, मेरा कत्ल करने यहां आया है क्योंकि इन्हें सबसे ज्यादा अपमानित मैंने किया----अगर वक्त रहते मैं इस पर काबू न पा लेता तो शायद अपनी वाइफ की तरह मेरी भी हत्या कर देता, मगर फिलहाल मेरे रिवॉल्वर
की नोक पर है-----जी हां, आप फोर्स के साथ स्वयं आकर इसे लेजाइए ।"


हेमन्त का खून खौल उठा ।



संबंध--विच्छेद करने के लिए कर्नल ने रिसीवर क्रेडिल पर रखना चाहा, क्रितु दृष्टि हेमन्त पर स्थिर होने की वजह से सही स्थान पर न रख सका------सही स्थान देखने के लिए जैसे ही उसकी नजर हेमन्त से हटी बैसे ही हेमन्त ने सेंटर टेबल पर रखा पेपर वेट उठाकर उसे पर खींच मारा । "



पेपरवेट कर्नल के सिर से टकराया ।



कर्नल दर्द के कारण चीखा और अभी अपनी बौखलाहट पर काबू न पाया था कि जख्मी चीते ही तरह चीखता हुआ हैमन्त उसके उपर जा गिरा ।


मेज को साथ लिए दोनों फर्श पर जा गिरे ।


रिवॉल्वर कर्नल के हाथ से निकल गया ।


दोनों बुरी तरह गुत्थ गए ।



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Re: दुल्हन मांगे दहेज

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Re: दुल्हन मांगे दहेज

Post by Jemsbond » 29 Jun 2016 22:17

आयु का फर्क होने की वजह से कुछ तो हेमन्त उस पर वैसे ही भारी था, दूसरे, सारे रास्ते बंद होने की वजह से हेमन्त पर वैसे भी खून सवार था--------उसने शीघ्र ही स्वयं को कर्नल की मैं पकड़ से मुक्त करके फर्श पर पड़े रिवॉल्वर पर जम्प लगाई ।



इधर उसके हाथ में रिवॉल्वर आया उधर कर्नल उछलकर के खड़ा हो गया, किंतु अपनी तरफ तने रिवॉल्बर को देखते भी उसके छक्के छुट गए-------वही हालत हो गई जो होटल के कमरे मैं सुचि के सामने हुई थी और हेमन्त का समूचा चेहरा भभक रहा था, गुस्से की ज्यादती के कारण सारा शरीर बुरी तरह कांप रहा रहा था उसका, मुहं से गुर्राहट निकली---"अब तू वच नहीं सकता हरामजादे !"

"ह.....हेमन्त फायर मत करना बेटे । " भयभीत कर्नल गिड़गिड़ा उठा----"रुको मेरी बात सुनो ।"



"बहुत सुन चुका कुत्ते । " हेमन्त दांत भीच कर गर्जा--"जब से आया तेरी ही सुने जा रहा हूं और अब समझ चुका हूं कि अपने बाबूजी की खोई प्रतिष्ठा स्थापित नहीं कर सकता--अदालत और इस शहर को सच्चाई बता तो सकता हूं मगर उसे प्रूव नही कर सकता, लेकिन अपनी वरबादी, अपने परिवार की बदनामी, सुचि, अमित और बाबूजी की मौत, रेखा की बदसूरती और अपनी मां के पागलपन का बदला तो ले ही सकता हूं मैं !



"ऐसी बेवकूफी मत करना--------अगर मैं मर गया तो कभी साबित नहीं कर सकोगे कि मैं मकड़ा वना था, मैंने ही सुचि की हत्या की थी । "




"साबित तो तुम्हारे जीवित रहने से भी नहीं होगा । "



"म. ..मैं खुद अदालत को वह सच्चाई बताऊंगा जो तुम्हें कहीं है ।"





"तुम्हारे कहने से भी अदालत यकीन नहीं करेगी, तुम खुद प्रूव नहीं कर सकते कि यह सब सच है और विना सबूतों के..........!"



" स......सबूत मैं दूंगा-----मैँ अदालत में खुद इस कहानी की सच्चाई साबित करूंगा । "



"अभी तो तुम कह ऱहे थे कि सारे सबूत नष्ट कर चुके हो ?"



"व...वह झूठ था----सच यह है कि मेरे पाँस सारे सबूत , मैं सावित कर सकता हूं कि मैंने ही सुचि को ब्लैकमेल किया, मैं ही मकड़ा बना और मैंने ही उसकी हत्या की । "



"साबित करो,इसी वक्त पेश करो--------क्या साबूत है तुम्हारे पास ।"


"म....म.....मैँ !" वह केवल गिड़गिड़ा कर रह गया ।



हेमन्त गुर्राया-------"तुम्हारे पास कोई सबूत है नहीं है------अगर है भी तो अदालत तक पहुंचते-पहुचते तुम मुकर जाओगे-----मैं तुम्हारे इस फरेब के जाल में फंसने वाला नही' हुं----------अपने हाथ से तुम्हारी लाश बिछाने के अलावा अब कोई इच्छा बाकी नहीं बची है कर्नल, मरने के लिए तैयार हो जाअो !"


"मैं-----मेरी बात तो सुनो-----बेटे----मैं तुम्हें !"


" धांय----धांय-----धांय !"


कर्नल जयपाल कटे वृक्ष के समान फर्श पर गिर पड़ा !
हेमन्त चुप हो गया;---मैं (वेद प्रकाश शर्मा) पूरी तरह स्तब्ध था-----शुरू से अंत तक मैंने इसी स्तब्ध अंदाज हेमन्त की कहानी सुनो थी और अब उसके बोलने का इंतजार कर रहा था-----जेल के मुलाकाती कक्ष में छाई खामोशी जव जरूरत से ज्यादा लम्बी हो गई और वह कुछ न बोला तो मैंने सवाल किया-----" उसके बाद ?"



"उसके बाद क्या?" हेमन्त ने उल्टा सबाल किया ।



" कर्नल जयपाल को मारने के बाद तुमने क्या क्रिया ?"



वह मेरे सामने से उठकर खड़ा गया…थीरे धीरे चलता हुआ कक्ष की सामने वाली दीवार तक गया और फिर अचानक तेजी से पलटकर बोला------"तुम्हारे ख्याल से क्या करना चाहिए था मुझें ?"


मैं चुप रह गया ।


दरअसल उसके सवाल का कोई उचित जवाब मुझे सूझा ही न था, अत: सिर्फ उसकी तरफ देखता भर रहा, जबकि मुझे ऐसी मुद्रा में देखकर उसके होंठों पर फीकी मुस्कान उभर अाई, बोला…"दरअसल ठीक तुम्हारे जैसी -स्थिति मेरी भी हो गई थी-----कुछ सूझा ही नहीं, क्योंकि न मेरे लिए कोई लक्ष्य रह गया था,न दिल में जीने की आरजू----बाब्रूजी की यह बात समझ में आ चुकी थी कि हम कानून को तत्काल तो धोखा दे सकते हैं, परंतु हमेशा नहीं, अतः पुलिस के आने पर खुद को एस. पी. साहव के हवाले कर दिया । "



"क्या पुलिस को कर्नल की सच्चाई बताई ? "



"हां । " वह बापस मेरी तरफ अाता हुआ बोला----"मगर कर्नल के सारे घर की तलाशी लेने के बाद बाबजूद पुलिस को ऐसी कोई चीज नहीं मिली जो उसे मकडा या सुचि का हत्यारा साबित करती-मरने से पहले उसने न मुझे उस होटल का नाम वताया था, ना कमरा नम्बर. जिसमें सुचि की
हत्या की-----

पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि मैनें उसी बजह से कर्नल की हत्या है जो उसने कोन पर एसपी,साहब को वताई थी ।"



"फिर ?"



"अदालत की कार्यवाही का, सिलसिला शुरू हुआ हर पेशी पर तोते की तरह वह सुना देता हूं जो कर्नल ने बताया था, अदालत सबूत मांगती हैं----मैं चुप रह जाता हूं और इस स्थिति में मेरे बयान को बचाव की खोखली दलील से ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता-सुचि के साथ-साथ मेरे सिर पर कर्नल की हत्या का इलजाम भी है और अब तो स्थिति यह आगई है कि जब भी चीख-चीखकर यह कहता हूं कि कर्नल ही सुचि का हत्यारा हे-उसी ने मकड़ा बनकर हमसे अपने बेटे की मौत का बदला लिया है तो सरकारी वकील द्वारा यह कहा जाता है कि मैं अदालत का कीमती वक्त जाया क्रऱ रहा हूं । "




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Re: दुल्हन मांगे दहेज

Post by Jemsbond » 29 Jun 2016 22:19


"मतलब अब तक इस केस का फैसला नहीं हुआ है? "



उसने मुझे घूर कर देखा, कुछ ऐसे अंदाज जैसे मुझें बेबकूफ करार देने वाला हो, सवाल किया उसने-----"क्या तुम्हे नहीं लगता-कि फैसला हो चुका है ?"



"क्या मतलब? "



"तुम शायद उस दिन इस केस का फैसला हुआ मानोगे जिस दिन अदालत विधिवत फैसला सुनाएगी, मगर मेरी समझ के मुताबिक फैसला कर्नल के मर्डर के साथ ही हो गया है । "


"मैं समझा नहीं ?"



" उसने मेरी आंखो में झांकते हुए सवाल क्रिया----"तुम्हारे ख्याल से क्या फैसला हो सकता ?"



"कुछ भी, जब तक हो न जाए, क्या कहा जा सकता है ?"



'‘तुम भले ही न कह सको-मगर मैं कह सकता हूं !"



हेमन्त कहता चला मैं गया---"अदालत मेरी एक न सुनेगी-----मुझे वही सजा सुनाई जाएगी जो अपनी बीबी के हत्यारे, कानून को धोखा देने की कोशिश करने वाले मुजरिम और कर्नल जैसे किसी सम्मानित व्यक्ति का मर्डर करने बाले को सुनाई जाती है-इसके अलाबा किसी अन्य फैसले के लिए केस में कोई गुंजाइश ही नहीं है, अगर हो तो सोचकर तुम बता दो !"

मैं चुप रह गया।


दरअसल हेमन्त के शब्दों की कोई काट नहीं थी मेरे पास--अत: विषय बदलने की गर्ज से पूछा----" ये सारी कहानी मेरठ से यहाँ बुलाकर तुमने मुझे क्यों सुनाई ?"



"अदालत को कहानी नहीं हकीकत चाहिए और सिर्फ हकीकत----मेरे और मेरे परिवार के साथ घटी घटनाएं हकीकत होते हुए भी सबूतों के अभाव में सिर्फ एक कहानी है, अत: वह अदालत के लिए नंहीं केवल तुम जैसे किसी लेखक के लिए रह गई ।"



" मगर विशेष रूप से मुझे ही क्यों, लेखक तो और बहुत हैं !"



एकाएक गुर्रा उठ हेमन्त------"बहु मांगे इंसाफ तुम्हीं ने लिखी थी न ?"


" हां !"



"इसीलिए खासतौर से तुम्हें बुलाया है । " वह सख्त स्वर में कह उठा--------"तुम लेखक लोग समस्या के पहलू को बड़े जोरदार ढंग से उठाते हो मगर सिर्फ एक पहलू को-----ठीक उसी तरह जिस तरह .'बहृ मांगे इंसाफ' में तुमने उठाया------दूसरे पहलू को देखकर भी अनदेखा कर देते हो तुम लोग ।"



" ऐसी बात नहीं है । "



“अगर नही तो दहेज के लिए मरने बाली बहुओं से संबंधित इस पहलू को भी उठाओ---जिन्हें तुमने 'बहू मांगे इंसाफ़' पढ़ाई हे,उन्हें यह भी बताओ कि ससुराल में मरने वाली दहेज के लिए नहीं मरती-----कुछ और बजह भी हो सकती है-----. बिना सोचे समझे किसी बिशम्बर परिवार को इतना जलील क्यों किया जाता है-क्यों रेखा के ऊपर तेजाब डाला जाता है-किसी अमित, किसी बिशम्बर या किसी हेमन्तु को किस गुनाह की सजा मिलती है, और----और----!" हेमन्त फफक-फफककर रो पडा…"क्यों किसी ललितादेबी को पागलखाने में कहकहे लगाने पर मजबूर किया जाता है ?"


मेरे रोंगटे खड़े हो गए !



बुरी तरह रोता हुआ वह दीवानगी के आलम में पागलों की तरह चीखता चला गया----" तुंम्हें तो अदालत की तरह किसी सबूत की जरूरत नहीं है न-फिर लिखो , समाज को यह बताओ कि किसी का जुलूस निकालने से पहले अच्छी तरह पुष्टि कर लेनी चाहिए, कि कहीं वह बिशम्बर गुप्ता, ललितादेबी अमित, रेखा या हेमन्त तो नहीं है-दहेज के लोभी, बहू के हत्यारों को सजा जरूर मिलनी चाहिए---गधों पर बैठाकर उनका जुलूस जंरूर निकाला जाना चाहिए मगर वे क्यों पिसें, क्यों मरें, जिन्होंने कुछ नहीं किया--कुछ भी तो नही किया? "



" मै लिखूंगा हेमन्त जरूर लिखूंगा------ये तो नहीं कहता मेरा उपन्यास तुम्हारे पिता की खोई हुई, प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित का देगा, क्योंकि प्रतिष्टा तो अदालत स्थापित करती है, हकीकत स्थापित करती है, जबकि सबूतो के अभाव में मेरा उपन्यास भी हकीकत नहीं एक कहानी मात्र होगा…सिर्फ एक कहानी। "'



THE END

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