चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़) complete

Jemsbond
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 18:06


एक क्षण के लिये तो झनझना उठा हैरी का दिमाग । उसके जिस्म की समस्त नसों में एक विचित्र-सी जकड़न स्थापित हो गयी । बोला---"अगर यह जानते हो विकास बेटेे कि मैं हैरी हूं, तो यह भी अवश्य जानते होगे कि मैं चीनी जासूसों की तरह तुमसे डरता नहीं हूं ।"


उधर हैरी और इधर विकास ।।



दोनों ही एकदूसरे के किसी भी हमले के प्रति सतर्क हो गयेे ।




" छः महीने पहले ही तो वतन ने तुम्हें इस देश से मार-मारकर भगाया था ।" विकास गुर्राया…"लेकिंन तुम कुत्ते की दुम हो न-वारह वर्ष भी नलकी में रही तो भी सीधे नहीं होगेै यहांआकर फार्मूला प्राप्त करने की कोशिश करने से पूर्व यह तो सोच लेते कि वतन किसका दोस्त है ?"

उपर्युक्त शब्दों के साथ ही विकास ने जो तीव्र हरकत की थी उसे भाँप कर अगर हैरी फुर्ती का प्रदर्शन न करता
तो निश्चित रूपं से उंसकी एक आँख जाती 'रहती ।


हुआ यूं कि विकास ने अपना आलपिन चला दिया था ।


हैरी--किसी जमाने का विकास का दोस्त ।
वह जानता था कि विकास का आलपिन क्या रंग लाता है ।



भयानक फुर्ती के साथ वह स्वयं को बचा गया है किंतु--फिर भी आलपिन उसकी आंख में तो नहीं----गाल पर अवश्य लगा , गाल पर लगा आलपिन क्या करता ? एक सुईसी चुभकर रह गई हैरी को ।


असली करामात तो आलपिन आंख में लगकर बताता है ।



फटाक से आंख फूट जाती है ।


विकास के आलपिन से अपनी आंख तो बचा गया हैरी किंतु विकास के उस जबरदस्त घुंसे से न बच सका जो फौलाद की ,भांति उसके चेहरे पर पड़ा था ।


एक क्षण केलिये तो उसे ऐसा लगा की उसका जबड़ा हिल उठा है ।


न चाहते हुये भी हवा में उछलकर वह "धडाम" से फर्श पर गिरा ।


विकास ने किसी गोरिल्ले की भाँति उसपर जम्प लगाई ।


किन्तु---- लोमड़ी जैसी चालाकी के साथ हेैरी सड़क पर दौ-तीन करवटें बदल गया ।



विकास मुंह के बल गिरा । तुरन्त ही खडा हुअा तो---- हैरी की एक् फलाईंग किक उसके सीने पर पडी ।


वह पुन लडखड़ाकर सड़क पर आ गिरा और अभी उठने ही वाला था कि हवा में लहराता हैरी का जिस्म उसके ऊपर आ पड़ा ।


विकास ने अपनी टांगो पर रख कर उसे उछालना चाहा, किंतु उसी समय हैरी के सिर की एक तेज टक्कर विकास चेहरे पर पड़ी ।



विकास के मुख से चीख निकल गयी ।।


हवा में सिर घुमाकर हैरी ने अपने -सिंर का बार पहले से भी अधिक तीव्रता के साथ विकास के चेहरे किया तो ----इस बार चिकनी मछली की भांति फिसलकर उसके नीचे से विकास निकल गया ।।
हैरी का सिर बहुत् जोर से सड़क पर टकराया------- रंग बिरंगे तारे नाच उठे उसकी आँखों के सामने ।


अभी वह उनसे मुक्त हो भी नहीं पाया था कि विकास के उसकी पसली में इतनी जोर से अपने बूट का वार किया कि हैरी दर्द से तिलमिला उठा ।




झुककर विकास ने हैरी के बाल पकड़े ।

बेरहमी से बालों को एक तीव्र झटका देते हुये उसने हैरी कों ऊपर उठाया । उठाते ही, अपने सिर की एक टक्कर हैरी के चेहरे पर मारी ।



इधर उसेके सिर की टक्कर हैेरी के चेहरे पर पड़ी, उधर हैरी के दाहिने पैर का गुटना दोनों टागों के बीच में ।।




" एक साथ दोंनों के कंठ से मार्मिक चीख निकली ।

चीखने के पश्चात भी दोनों में से कोई भी एक-दूसरे से अलग न हुआ ।


एक-दूसरे से बुरी तरह लिपट गये ।


किसी जमाने में एक-दूसरे के गहरे दोस्त थे वे। एक-दूसरे की ताकत का उन्हें पूरा अन्दाजा था ।


हैरी जानता था कि वह हल्का सा चूका और विकास उस पर हावी हुआ है विकास जानता था कि हैरी किसी भी प्रकार उससे कम नहीं है ।।


मगर वह क्षण मात्र के लिये भी ढीला पड़ा तो हैरी उस पर इस प्रकार हावी ही जयेगा कि फिर कभी सम्भाल में नहीं आयेगा ।



एक-दूसरे से गुंधे हुये दोनों ही सडक पर आ गिरे ।


न जाने कैसे दोनों के हाथों की उंगलियां अापस में फस -गयी ।


हथेलियाँ एक-दूसरे से सटी हुयी थीं । दोनों ही हाथ मोड़कर, एक-दूसरे की उगलियाँ तोडने का प्रयास कर रहे थे ।।

इतनी ताकत लंगानी पड़ रही थी दोनों को कि दोनों के ही चेहरे सुर्ख पड़ गये थे । लोहे की सलाखों की भांति उंगलियां फंसी थीं । उसी तरह हाथ फंसाये वे खड्डे हो गये ।



एकायक हैरी हाथ फंसाये ही घूम गया । पलक झपकते ही उसने विकास को अपनी पीठ पर लिया और झूक कर सड़क पर दे मारा ।।
यह दूसरी बात है कि सड़क पर चारों खाने चित गिरते ही विकास के कंठ से चीख निकल गयी मगर तुरन्त पलटकर उसने अपनी टांगे हैरी की गर्दन में फंसाई अौर हैरी को भी उसने सड़क पर दे मारा । हैरी के कंठ से भी चीख निकल गई ।


दोनों कलयुगी लड़कों के बीच जबरदस्त मल्लयुद्ध हुआ ।।


हैरी शैतान तो विकास महाशैतान ! विकास खतरनाक तो हैरी महाखतरनाक ।


करीब पन्द्रह मिनट तक उनके बीच युद्ध चला ।


पन्द्रह निबटे पश्चात् भले ही विकास ने हैरी की बेहोश कर दिया , पर इस कार्य में सफलंता अर्जित-करते-करते विकास कों दांतों पसीना अा गया ।



हैरी के बेहोश होते ही बहीं सड़क पर लेट गया था विकास लम्बी-लम्बी सांस लेता रहा ।।


कोई पांच मिनट बाद वह स्वय को सामान्य' स्थिति में ला पाया ।


वह उठा।



हैरी के बहाश शरीर को उठाकर कार, में डाला और कार तीव्र वेग पर सड़क पर दौडा दी ।

अधिक नहीं, सिर्फ दस मिनट पश्चात् विकास अलफांसे और पिशाचनाथ के पास बैठा था । वे तीनों एक दूसरे के अामने-सामने सोफों पैर बैठे थे और हैरी का बेहोश शरीर कमरे के फर्श पड़ा था ।


अलफांसे कह रहा था--"लगता है विकास वेंटे कि हैरी भारी पड़ा?"



" भारी तो पड़ना ही था गुरु । "' बिकास ने कहा----" वे सभी गुर इसे मालूम हैं, जो मैं जानता हूँ "


" खैर ।" अलफांसे ने कहा…"अब क्या इरादा है ?"

" इरादा ही क्या है ?" विकास ने पिशाचनाथ की और देखते हुये कहा-----" वही करना है, जों मैं बता चुका हूं । वह तैयार कर लिया ?"
" जी महाराज ।" कहते हुये पिशाचनाथ ने अपने बटुये में हाथ डाला है प्लास्टिक का बना एक ताजा फैसमास्क उसमे से निकालता हुआ बोला…" लिजिये आप देख सकते हैं । इसमें और हैरी के चेहरे में लेशमात्र भी अन्तर न होगा ।"




"अभी तो इसी के चेहरे पर गुरु का मास्क है ।" कहते हुये विकास ने हैरी के चेहरे पर से मास्क हटा दिया ।



इसके पश्वात्-विकास ने स्वयं वे कपडे जो हैरी के शरीर पर पहने थे ।अपने चेहरे पर पहले, हैरी का फेसमास्क चढ़ाया फिर अलफांसे का और हैरी को अलफांसे और पिशाचनाथ के हवाले करके स्वयं वहाँ से चल दिया है जिस अलफासे ने वतन के पास जाकर यह कहा था कि वह चमन घूमने गया था, वह हैरी था न अलकांसे बल्कि विकास था ।।


अलफांसे बना बिकास ही वतन की प्रयोगशाला तक पहुंचा था ।।


वह भी विकास ही था, जो प्रयोगशाला से फिल्म निकाल लाया ।

वह भी विकास ही था, जो फिल्म सहित हैलीकॉप्टर में जैकी से मिला ।


जैकी जिसे हैरी समझ रहा था असल में वह विकास था ।

असल में वह हैरी नहीं, विकास था , जौ जैकी के मुंह से एक अन्य आवाज सुनकर चौक पड़ा ।।



यह सब कुछ आप
"जला हुआ वतन" में पढ़ आये हैं । "
"हैरी हमारे पास है प्यारे जासूस !" ट्रांसमीटर पर झूका हुआ अलफांसे कह रहा था----" वतन की दृष्टि में अलफांसे और जैकी की नजरों में हैरी बनकर विकास सफलता अर्जित करता चला जायेगा । मेरा ख्याल है कि अव तक तो जैकी के साथ हैलीकॉप्टर में बैठ भी चुका होगा ।"


"आखिर तुम उस साले दिलजले को रोक नहीं पाये लूमड़ भाई ?" दूसरी ओर से विजय ने कहा ।



" रोकना चाहता तो रोक लेता, किंतु उसने योजना ही ऐसी बनाई कि जिसमें कहीं भी लोच नहीं था । " अलफांसे ने कहा…"तुम यह चाहते थे अन्तर्राष्ट्रीय जासूसों ही जासूसी का केन्द्र चमन न बन सके । । यहीं तो करण था नि तुम यह चाहते थे कि हैरी प्रयोगशाला से फार्मुला चुरा ले ।
और बाहर निकलने पर उसे हम छीन लें ।। विकास ने उस योजना को और निखार दिया है जितने भी जासूस इस चक्कर में लगे हुये हैं, वे ये समझते होगें कि हैरी फार्मूला ले गया ।
जबकि फार्मूला विकासं पर है ।अब, अन्तर्राष्ट्रीय जासूसी का केन्द्र अमेरिका बनेगा जबकि फार्मूला अशरफ लेकर अमेरिका से चुपचाप निकल अायेगा ।"




"खैर ।" विजय ने कहा…"जो हो चुका, वह ठीक है लेकिन आगे की योजना क्या है ?"

" तुम अमेरिका में स्थित अशरफ से कहोकि वह विकास से वाशिंगटन के लाजिक होटल में मिले । हेरी को तो अशरफ पहचानता ही है । किसी भी दिन शाम को सात बजे हैरी उस होटल के हाँल में आयेगा । तुम अशरफ कों सामझा सकते हो कि वह हैरी नहीं विकास होगा ।। दोनों फिल्में वह अशरफ की सौप देगा । बस, अशरफ को चुपचाप भारत के लिये रवाना हो जाना है ।"



" लेकिन लगता है लूमड़ भाई कि अमेरिका में अपने झानझरोखे के साथ कोई गड़बड़ हो गई है ।"




"क्यों ------? क्या मतलब ?" अलफासे चौंका ।



" कई बार उससे ट्रांसमीटर पर सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास कर चुके हैं, किन्तु सफलता नहीं मिली ।"
विजय ने कहा ---" खैर मैं विक्रम, नाहर परवेज और अाशा कों अमेरिका पहुंचने के आदेश दे चुका हूं ।। उनका काम अशरफ का पता लगाना होगा । साथ ही लाजिक होटल विकास से उनमें से कोई मिल लेगा ।'"




"हूँ ।" अलफांसे ने, कहा, "अव तुम्हारा क्या इरादा है ?"



"जब तक फार्मूला सुरक्षित भारत नहीं पहुंच जाता , तव तक चीन की दीवार पर ही लटके रहेंगे ।"





"और मैं यहाँ क्या करू ?"

"तुम वहाँ रहकर वतन प्यारे की हिफाजत करो लूमड़ भाई ।।" विजय ने कहा---"वतन चाहे कुछ भी सही " किन्तु इस समय वतन वैज्ञानिक है और जिन जासूसों के हाथ फार्मूला नहीं लगेगा वे वतन को किडनैप करने का प्रयास करेंगे ।"


अभी अलफासे कुछ कहने ही वाला था -----

"चचा से कह दो कि वतन का किडनैप करना छोटे मौटे जासूसों के बस का रोग नहीं है ।" इस आबाज को सुनते ही अलफांसे और पिशाचनाथ उछल पडे । बुरी तरह चौंककर उन्होंने कमरे के दरवाजे की देखा ।


"वतन ------ वतन ।" अलग--अलग दोनों के मुंहसे निकल पड़ा ।



सचमुच वतन ही कंमंरे में प्रविष्ट हुआ या । ऊपर से नीचे तक दुध जैसे बेदाग सफेद कपडे, आँखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा । हाथ में छड़ी लिये वह खट-खट करता उनके समीप आया रहा ।। चेहरे पर हमेशा रहने वाली गम्भीरता विराजमान थी ।




उसे यहां देखकर सकते की सी हालत से रह गये थे अलफांसे और पिशाचनाथ ।।।।।।।
अलफांसे ने तो स्वप्नमें भी कल्पना नहीं की थी की वतन वहां आ पहुंचेगा । इतना अवाक-सा वतन कौ देखकर रह गयां वह कि जुबान तालू से चिपक गई । कुछ कहना चाहा भी कह न सका है ।



"प्रणाम चचा ।" कहकर लम्बा वतन अलफांसे के चरणों में झुक गया ।"




अलफांसे इतना ही कह सका---"तुम यहां ?"

किन्तु अलफांसे के प्रश्न का कोई भी उत्तर न :देकर वतन ने उसके हाथ में से ट्रांसमीटर ले लिया ।



दूसरी तरफ से ट्रांसमीटर पर विजय की यहीं आवाज गूंज रही थी---" अबे मियां लूमड़ प्यारे क्या हो गया है यार हमारे ? वतन --- वतन कहकर क्यों कहकर चुप क्यों हो गये ?"





"'प्रणाम चचा ?" वतन ने कहा---"मुझे यहां देखकर लूमड़ चचा हैरान रह गये ।"



"हांय ।" दूसरी तरफ से विजयं चौका----बटन प्यारे तुम साले राष्ट्रपति भवन की कमीज से टूटकर यहां कहाँ पहुंच गये ।।"





'" आप भूल गये चचा कि कम से-कम चमन में वतन वहीं पहुच जाता है, जहां उसकी आवश्यकता होती है ।" वतन ने गम्भीर स्वर में कहा-----"रही यह बात कि वतन का कोई किडनैप न कर ले तो क्या आप जवाब देंगे कि --- क्या महान सिंगही वैज्ञानिक नहीं है ?"



"विल्कुल है बटन प्यारे । " विजय की आबाज ----" रूपये में सत्रह आनें है !"


"क्या कभी किसी ने उन्हें क्रिडनैप किया ?"




'"किसी को मरना है क्या ?"

" तो यह समझिये उनके शिष्य को भी किडनैप करने का प्रयास करेगा तो वह अपनी मौत को ही दावत देगा ।"
"लेकिम मियाँ बटन प्यारे तुम यहाँ पहूंच कैसे गए?"बिजय ने पूछा।




"आपने महान सिंगही के शिष्य को मूर्ख समझकर बहुत बड़ी भूल की है चचा ।" वतन ने कहा- आप समझते हैं कि अखबार में स्टेटमेंट देना मेरी मूर्खता थी । हकीकतं है तो यह है कि वह स्टेटमै'ट एक बहुत बड़ी साजिश थी मेरी । उसमें आप भी फंस गये ।"






"क्या मतलब ?"




"मेरी बातों के मतलब उस समय तक समझे मैं नहीं आयेंगे चचा, जव तक कि मैं स्वयं आपको नहीं समझा दूंगा ।" वतन ने कहा-----" बहुत जल्दी ही आपसे मिलूंगा मैं । आपसे बातें करुगा ।"



" -लेकिन यह मामला क्या है वटन प्यारे ?"




"मामला सिर्फ यह है चचा कि कुछ दिनों के लिये दुनिया के इन महान जासूसों के बीच घूम रहा हूं मैं ।" अतन्त गम्भीर स्वर में वतन कह रहा था-----दोस्त और दुश्मन को पहचान चूका हूँ मैं । ऐलान कर दो चचा-दुनिया के महान जासूसों में ऐलान करार दो कि वतन आ रहा है । ढंके की चोट से मदान में आ रह हूँ । किसी में ताकत हो तो पूछ ले मुझसे वेवज एम का फार्मूला ।"

"तुम क्या चाहते हो ?"



यह कि जिस दिन से अखबार में मैंने स्टैटमेंट दिया है, उसी दिन से मेरी और सिर्फ मेरी ही जीत होती चली आई है ।" वतन ने कहा-"कौई भी इस भ्रममें न पड़े कि वह जीत गया है । आप, विकास, लूमड़ अंकल सभी हारे हैं । क्यों-कैसे? इन सब प्रश्नो के उत्तर मैं बाद दुगा ।"




कहने के साथ ही वतन ने सम्बन्ध बिच्छेद कर दिया ।



पलटकऱ अलफांसे और पिशाचऩाथ की ओर देखा ।
वतन बोला--" इस तरह क्यों खड़े हैं चचा , बैठ जाइये ।"



इस बीच अलफासे स्वयं को नियन्त्रित कर चुका था । बोला------"तुम यहाँ कैसे पहुंच गए ।"

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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 18:07



"'क्या आपको भी यह बात अलग से बतानी पडेगी की चमन में जहाँ वतंन की जरूरत होती है, वहीं पहुच जाता
है । "



" तो-----तो आज तुम्हारे साथ अपोलो नहीं है ?"

" आज उससे छुपकर आया हूं यहां " वतन ने बताया--विकास ने समझा कि प्रयोगशाला के प्रयोग-कक्ष में लड़ता-लड़ता मैं बेहोश हो गया था । वह बेचारा तो इस भुलावे में भी रहाँ कि मैं उसे आपको समझ रहा हूँ । मुझे राष्ट्रपति भवन में बंधा छोड़कर वह अपोलो और धनुषटंकार से यह वहाना बनाकर चला गया कि वह फिल्मों को सुरक्षित रखने जा रहा है । उसके जाने के बाद जब धनुषटकांर ने अलफांसे समझकर मेरी तलाशी ली तो जाना कि मैं वतन और वह अलफांसे था, जो वतन बनकर निकल गया । अपोलो और धनुषटंकार जो सचमुच मुझसे असीम प्रेम करते हैं, पागल से होकर कथित अलफांसे की तलाश में गए और अपने बन्धन खोलकर मैं यहाँ आ गया हूं ।।"





" तो तुम्हें यह भी मालूम है कि वह विकास था ?"



" ये पूछिए कि क्या नहीं मालूम मुझे ?" वतन का लहजा गम्भीर ही था--"मुझे,तो यह भी मालूम है कि शाम को घूमकर आने से पूर्व अापके मेकअप में हैरी था और तब जबकि हैरी मेरी प्रयोगशाला की चारों सर्चलाइटों का प्रबंध करके लौट रहा था तो टेक्सी ड्राइवर के रूपमें विकास ने उसे पकड़ लिया, उनका टकराव हुआ । हैरी को बेहोश करके विकास उसे यहाँ आपके पास ले आया और यंहां से हैरी और आपका फैसमास्क पहनकर मेरे पास पहुंचा ।"
हैरत से आँखें' फैल गई अलफांसे की । पिशाच की भी बूद्धि चकराकर रह गई ।



"तुम्हें सब कुछ मालूम था तो तुमने वह सव कुछ होने क्यों दिया, जो हुआ ।" अलफांसे ने पूछा ।।


"--क्योंकि मैं चाहता था कि वह सब कुछ हो ।"



" क्या कह रहे हो तुम ।"

’"मैं ठीक कह रहा हूँ लूमड़ चचा । जो भी कुछ हुया है, वह मेरी एक योजना थी ।"




"लेकिन क्यों ? यह सबकुछ तुमने क्यों होने दिया ?" अलफांसे ने पूछा---" यह सब कुछ करवाने के पीछे तुम्हारा मकसद क्या है ?"





-"'सुनिए, मैं बताता हूँ आपको ।" सदा की भांति गंभीर स्वर में कहना शुरू किया वतन ने…"यह सच है किं मैंने पहले वेवज एम और फिर उसके बाद डॉक्टर आवा की आवाज कैच करके 'अणुनाशकों किरणे बनाई । मगर प्रश्न यह हैकि मैंने यह घोषणा विश्वभर के अखबारों में क्यों की। आपने, विकास और विजय चचा ने मेरी इस हरकत को मूर्खतापूर्ण ही कहा । सचमुच, यह मूर्खता ही होती- किन्तु तब जबकि मुझे यह विदित न होता कि मेरी इस घोषणा को पढ़ते ही मेरे दुश्मन इस फार्मूले को प्राप्त करने है कि के लिए दौड पड़ेगे है मुझे मालूम था यह सब और मैं चाहता था कि मेरे दुश्मन चमन की तरफ दौड पड़े । यह चाहकर ही तो मैंने वह स्टेटमेट दिया था ।"



"लेकिन प्रश्न यह है कि तुमने ऐसी विचित्र बात चाही क्यों ?"
"चचा !" धीरे से कहा वतन ने…"यह पता लगाना मेरे लिए बहुत आवश्यक था कि विश्व की कौन-सी हस्ती मेरी दुश्मन है और कौन-सी, दोस्त है सम्पूर्ण विश्व अनेक राष्ट्रोंका एक समूह है ।" इस समूह में मेरा एक राष्ट्र है जो सिर्फ छ: मंहीने पहले ही आजाद हुआ है 'दुनिया के सभी ' राष्ट्र चमन-को अपना मित्र कहते थे, मेरी तरफ दोस्ती का हाथ बढाते थे, मेरे लिए उनमें से यह पहचानना कठिन था कि कौन मुझसे सच्ची दोस्ती चाहता है और कौन बगल में छुरी दबाए हुए है । यही जानने के लिए मैंने एकं तरीका निकाला' और वह तंरीका था-विश्वभर के अखबारों ये अपना स्टेटमेंट छपवा देना । वस…अ्सली चेहरे मेर सामने अा गए। दुश्मन फार्मू'ला गायब करने के केलिए दौड पडे । दोस्त मेरी मदद करने दौड़ पडे । ओर जिन्होंने कुछ नहीं किया वह न मेरे दोस्त हैं न दुश्मन । उन्हें दोस्त भी बनाया जा सकता है ।"

" बेशक ।"अलफांसे प्रशंसा कर उठा----" विश्व राजनीति को झटका देने के लिए तुम्हारा तरीका अच्छा था किन्तु' ....... ।"




"किंन्तु वया ?"



" यहां तक तो बात ठीक थी ।” अलफासे ने कहा ---- " अब तुम जान गए होने कि कौन दुश्मन और कौन दोस्त है फिर तुमने प्रयोगशाला से फामू"ला क्यों निकल जाने दिया ? हैरी को पकड़कर बैठा कयों नहीं लिया?"



जब से वतन यहां आया था, प्रथम बार हल्ले से मुस्काराया वह । वाणी में वहीं गम्भीरता---"जान लेना ही तो काफी नहीं कि कौन दुश्मन, कौन दोस्त है । उस समय तक दुश्मनों के विषय में जानने से ही क्या लाभ जव के उनसे बदला न लिया जाये ? वेचारे अकेले हैरी से मैं क्या बदला लेता ? बदला किसी व्यक्ति से नहीं, पांच राष्ट्र से लेना है ।। रूस, अमेरिका, चीन, इंगलैण्ड और पकिस्तान । सिंगही गुरु का शिष्य हूँ न चचा, जो करता हूँ, डंके की चोट पर करता हूं । स्वयं ही अपनी प्रयोगशाला से फार्मुला निकलवा दिया मैने , न न न यह ना समझना कि वह फार्मूला नकली है । "
जब से वतन यहां आया था, प्रथम बार हल्ले से मुस्काराया वह । वाणी में वहीं गम्भीरता---"जान लेना ही तो काफी नहीं कि कौन दुश्मन, कौन दोस्त है । उस समय तक दुश्मनों के विषय में जानने से ही क्या लाभ जव के उनसे बदला न लिया जाये ? वेचारे अकेले हैरी से मैं क्या बदला लेता ? बदला किसी व्यक्ति से नहीं, पांच राष्ट्र से लेना है ।। रूस, अमेरिका, चीन, इंगलैण्ड और पकिस्तान । सिंगही गुरु का शिष्य हूँ न चचा, जो करता हूँ, डंके की चोट पर करता हूं । स्वयं ही अपनी प्रयोगशाला से फार्मुला निकलवा दिया मैने , न न न यह ना समझना कि वह फार्मूला नकली है । "



"तुम कहना क्या चाहते हो ?"-



"प्रमाणितं करना चाहता हूँ की महान सिंगही का असली शिष्य हूं मैं !"

"हम फिर नहीं समझे ।"



"वे फिल्में अपनी प्रयोगशाला से निकालकर पांच राष्ट्रों को चुनौती दी है मैंने कि जिसमें ताकत है, वह प्राप्त कर ले उन्हें । अपनी फिल्मों के पीछे-पीछे मैं आरहा हूँ मेरा दावा है कि किसी के पास भी वे फिल्में सुरक्षित नहीं छोडूंगा । जिसमें ताकत हो मुझे रोके ले । अन्त में चाहे किसी के पास भी चली जायें मैं उन्हें निकालकर लाऊंगा । हां, भारत को तो वह फार्मूला देना ही चाहता हूं में ।"





"'वडी विचित्र-सी बात है !" अलफांसे ने कहा--"स्वयं ही अपनी प्रयोगशाला से फिल्में चोरी होने देते ,हो और फिर उन्हें प्राप्त करने के निकल पडते हो है तुम्हारी इस ऊटपटांग हरकत का मतलब ही क्या है ?"


एक बार पुन: हल्ले -से मुस्कराया बतन----" मतलब यह है कि दुश्मनों को चमन की शक्ति का पता लग जाए और वतन को पता लग जाए कि महान शक्ति कहलाने वाले ये राष्ट्र आखिर हैं कितने पानी में है ।"



" अजीब आदमी हो ।" अलफांसे ने कहा--"यह भी कौई बात हुई भला ?" "




"चचा !" वतन की वही गंभीर वाणी-------बहुत-सी बातें होती हैं जो पहले पहल ऊपर से देखने पर बडी विचित्र सी लगती हैं, किन्तु जब उन बातों को ध्यान से सोचा जाता है तो पता लगता है कि उनकी गहराई में क्या है ? यह समझिए कि यह लडाई मेरे द्वारा पैदा की गई है । "
आज न लड़ता तो के कल किंसी-न-किंसी ढ़ग से मुझ पर आक्रमण करते । ऐसे महत्त्वपूर्ण लोग भी दुनिया में कम ही होंगे जो अपनी इतनी महत्वपूण चीज को दांव पर लगाकर लडने चला है । मैं स्वयं दुश्मन की शक्ति का अन्दाजा करके उन्हें अपनी शक्ति दिखाना चाहता हूँ ।"

" मैं तुम्हारा मेकसद मकसद समझ गया हूँ" । .अलफांसे ने कहा…"किन्तु फिर भी बात है बिचित्र-सी ही !"





"मुझे अदृश्वर्य है को आपकी मेरी बात विचित्र लग रही है ।" वतन ने' कहा-"जवकि मैंने सुना यह है की आपराध की दुनियाँ में आप एकमात्र ऐसे अपराधी हैं, जिसका अपराध करने का मकसद आज तक कोई नहीं जान सका

"खैर !" अलकांसे ने कहा---" क्या मैँ जान सकता हूं कि तुम आगे क्या करना चाहते हो ?"

" जो भी कुछ करना चाहता हूं, उसमें आपकी और विशेष रूप से पिशाचनाथ की थोडी-सी आवश्यकता है । वतन ने कहा----"अखबारों में स्टेटमेंट के पश्चात् मैंने जाना है कि आप लोग मेरे दोस्त और हमददों में से है । सोचा कि आप मेरी थोडी-सी सहायता अवश्य करेंगे ।"



" बोलौ-क्या सहायता चाहते हो ?"



मैं जो कुछ करूंगा, उसे सारी दुनिया जानेगी ।" वतन ने कहा…"सभी जानेंगे कि वतन क्या कर रहा है । इतना सब कुछ करने के बावजुद भी मैं अन्तर्राष्ट्ररैय अदालत के शिकंजे हैं नहीं फंसनां चाहता । मैं यह चाहता हूँ कि सारी दुनिया यंह तो जाने कि वतन ने क्या किया है, किंतु वह सब कुछ वतन ने ही किया है, यह प्रमाणित करने हैं लिए किसी के पास प्रमाण न हो !"


" हम हर प्रकार से तुम्हारी सहायता करने के लिए तैयार हैं ।"



" मुझे आपसे ऐसी ही आशा थी ।" कहने के बाद वतन धीरे धीरे उन्हें सब कुछ समाझाने लगा ।।
हैरी के मेकअप में हैलीकॉप्टर ड्राईव करता हुआ विकास अपने बराबर में बैठे जैकी के मुंह से निकलने बाली आबाज को सुनकर बुरी तरह चौक पड़ा़ ।। उसका मस्तिष्क सन्ना उठै ।। स्वयं मानो अन्तरिक्ष में चकरा रहा था । उसकेे मुंह से निकंला---"'बाण्ड अकंलं ।"

"'ठीक पहचाना वेटे ।" जेम्स बाण्ड की आवाज---"लेकिन देर से पहचाना याद रहे हमारी रिवॉल्वर, का रूख तुम्हारी तरफ है । कोई भी हरकत करने से पूर्व यह याद रखना कि मैं गोली मारने में एक क्षण का भी विलम्व न कुंरूंगा ।"




एक क्षण स्थिर से नेत्रों से विकास ने बाण्ड को धूरा ।



बाण्ड कहे जा रहा था----मुझे दुख हैं हैरी बेटे कि फार्मूला प्राप्त करने के लिये तुमने जो मेहनत की थी वह------------बेकार हो गई !"




-"'अंकल ।" हरी के ही लह्रजे में विकास ने कहा ----"जो आपने किया, अपने हित में अच्छा नहीं-किया ।"



" मेरा नाम बाण्ड है बेटे ।" अपने रिवॉल्वर का दबाव हल्के से उसकी कनपटी रर बड़ाता हुया बोला-----तुम पैदा भी नहीं हुए थे तब से में अपना _हित और अहित समझता हूँ ।तुमने इस जासूसी के क्षेत्र में अभी कदम रखा है । बेशक इस बात के लिये तुम्हारी प्रर्शसां करनी होगी कि 'तुमने वतन की सुदृढ प्रयोगशाला से खुबसुरती के साथ फिल्में गायब की किंतु इसका यह मतलब नहीं कि उतनी ही खूबसूऱती से तुम इन्हें अमेरिका ले जाने में भी कामयाब हो जाते ।। न-न-कौई चालाकी नहीं, हैलीकॉप्टर चलाते रहो ।"


इस प्रकार, उन कुछ क्षणों के लिये विवश था, विकास ।



उसने जेम्ज बाण्ड पर यह भेद भी नहीं खोला कि वह हैरी नही विकास है । इस विचार से भी उसकां मस्तिष्क सन्ना रहा था कि 'बाण्ड' ने वे फिल्में जंगल में क्यों फेंक दीं ? अब स्वयं उन फिल्मों को कैसे ढूंढ पायेगा ?"

"हैरी वेटे !" अचानक बाण्ड ने उसकी बिचार श्रृंखला भंग की---" मुझे विदित था कि बही होगा, जो हो रहा है, अत: मैं पूरी तैयारी करके अाया था । इस हेलीकॉप्टर में सिर्फ एक पैराशूट है ।" कहते हुये वास्तव में बाण्ड ने सीट के नीचे से एक पैराशट निकाल लिया ।


विकास चुप था ।



-तुम जिस प्रकार; हैलीकाँप्टर चला रहे हो, उसी प्रकार चलाते रहोगे।" बाण्ड ने कंहा----"मैं कूद रहा हूँ ।"



''याद रहे---अगर तुमने भूमि से हैलीकॉप्टर की ऊंचाई लेश मात्र भी कम करने की चेष्ठा की तो अंजाम--ये हैलीकॉप्टर तुम्हारी चिता बन् जायेगा ।"
चुप ही या विकासं ।


"ये न समझना कि हैलीकॉप्टर को उडाने को धमकी अपने रिवॉल्वर के आधार पर दे रहा हूँ ।" बाण्ड ने पुन: कहा----"मेरे पास गन है और किसी भी क्षण तुम्हारा हैलीकॉप्टर मेरी गन की रेंज से बाहर नहीं होगा ।"




एकदम, किसी गूंगे की भाँति चुप था विकास उसका चेहरा सुर्ख हो चुका था-कनपटियों तक सुर्ख ।। नेत्रों में कठोरता । उसी प्रकार सीट पर -वैठा वह हैलीकॉप्टर ड्राईव किये जा रहा था ।।।



' विभिन्न प्रकार की चेतावनियां देता हुया बाण्ड पैराशूट इत्यादि बाँधकर तैयार, हो गया । अन्त में बोला--, "बहुत गुस्से में लग रहे हो हैरी बेटे लेकिन असलियत ये है कि इसमें गुस्से जैसी कोई बात नहीं है । कभी तुम्हारा दांव लगता है, कमी हमारा । अगर तुम बचकर निकलना चाहो तो हैलीकाप्टर वाशिंगटन की ही धरती छुए ।'"

कहकर हैलीकॉप्टर से बाहर अंधकार में कूद गया ।


विकास तो जैसे पहले ही सौचे बैठा था कि उसे कब कहाँ क्या हरकत करनी है । अभी तक वह जैसे सिर्फ समय का प्रतीक्षक था ।


उधर, बाण्ड कूदा ।।।

इधर विकास दूसरी दिशा बाली खिड़की से बाहर कूद गया ।


हैलीकाप्टर चालक रहित रहित हो गया । कूदते ही विकास कुछ दूर तक भूमि की तरफ प्रबल बेग से गिरा, फिर-एक झटका लगा ।


उसकी गति हवा में तैरते-से किसी इन्सान जैसी हो गई । हवा में तैरता विकास बुदबुदा रहा था ---" मैं भी जानता था बाण्ड बेटे कि ऐसा कुछ हो सकता है ।"
सचमुच एक पैराशूट की डोरियों में बंधा विकास हवा में तैर रहा था । उसका पैराशूट न जाने कौन से ऱंग का था कि वातावरण के स्याहीदार अंधेरे में उसका कोई अस्तित्व नजर नहीं आ रहा था ।


उसके ठीक विपरीत बाण्ड का पैरामूट नजर आ रहा था बिकास से थोड़ी ही दूरी पर हबा में तैरता बाण्ड भुमि की तरफ उतर रहा था ।



उधर-चालक रहित हैलीकॉप्टर हवा में लड़खडाया ।



उसी पल--बाण्ड की गन की गर्जना से वातावरण दहल उठा ।।


एक साथ गन की अनेक गोलियां हैलीकॉप्टर के जिस्म से टकराई । कोई गोली शायद टकीं को फाड़कर अंदर भी पहुंच गई थी है उसी के कारणवश सम्पूर्ण हैलीकॉप्टर आग की लपटों में घिर गया ।

विकास ने जलते हुए हैलीकॉप्टर को किसी परकटे पक्षी की भांति हवा में लहराते और अन्त में दूर किसी वृक्ष की चोटी से टकरा कर नष्ट होते देखा ।


न जाने किस विचार के परिणामस्वरूप उसके-होठों पर मुस्कराहट उभर आई ।



दुर-बृक्ष की शाखों में उलझा हैलीकॉप्टर जल रहा था ।


उसके साथ ही जल रंहा था वृक्ष का वह भागं जिसने हैलीकाप्टर को सम्हाल रखा था । पहले बाण्ड और उसके पांच मिनट पश्चात ही विकास भूमी पर पहुंच गया । बाण्ड का पैराशूट क्योंकि अंधेरे में स्पष्ट चमक रहा था , इसलिये विकास सरलता से प्रत्येक पत उस पर नजर रख सकता था ' मृ ३' क्रिन्तु बाण्ड को शायद स्वप्न मैं भी उम्मीद नहीं थी कि विकास भी उसके आसपास कहीं है ।



विकासं बाण्ड से करीब पचास गज दूर था । पैराशूट को लपेटकर सुरक्षित रखने की विकास ने कोई कोशिश की ।
विकास स्वयं को अंधेरे में रखता हुआ धीरे धीरे बाण्ड की तरफ बड़ा । अभी वह अपने और वाण्ड के बीच की दूरी ही तय कर सका था कि-----



बाण्ड की दिशा में एक टार्च चमकी ।।



विकास ठिठक गया ।।


ठिठककर गौर से देखने लगा ।
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 18:07


टार्च से बाण्ड हाथ में मौजूद किसी चीज को देख रहा था ।

विकास यह न देख सका कि टार्च की रोशनी में बाण्ड ने क्या देखा है ।



फिर --- रोशन टार्च हाथ में लिये बाण्ड एक तरफ को बड़ गया ।।




जिसने की आवश्यकता, नहीं कि स्वयं को अंधेरे में रखकर विकास उसके पीछेे लपका । इतना तो विकास समझ ही चुका था कि जंगल के इस अंधेरे में बाण्ड ने फिल्में यूं ही नहीं फेंक दी ।


खोजने के लिये बाण्ड के पास कोई-न-कोई साधन अवश्य होगा । यह साधन क्या है ? जब तक विकास को यह पता न लग जाये, तब तक वह वाण्ड के सामने अाना उपयुत्त नहीं समझता था ।।


बाण्ड के हाथ में क्योंकि रोशन टॉर्च थीं इसलिये विकास को निरन्तर उसका पीछ् करने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं हो रही थी ।। बीच बीच में बाण्ड टॉर्च का प्रकाश अपनी हथेली में दबी किसी चीज पर डालकर देख लेता और फिर आगे बढ़ जाता ।


कठिनता से पन्द्रह कदम की दूरी का अन्तराल रखता हुआ विकास उसका पीछा कर रहा था ।


कोई तीस मिनट तक यही सिलसिला जारी रहा।


फिर, एकाएक बाण्ड उस समय ठिठका ।
जब टार्च के प्रकाश में अपनी हथेली दबी चीज को देख रहा था ।
कुछ देर तक बाण्ड गौर से उस चीज को देखता रहा ।

उस समय विकास एक पेड के पीछे उससे सिर्फ इतनी दूर पर था कि बाण्ड की बुदबुदाहट भी उसने सुन ली । बाण्ड बुदबुदाया था----"इसका मतलब फिल्में किसी के हाथ लग गयी है ।"

विकांस ने उसका यह वाक्य सुना और समझ लिया कि मामला क्या है । टार्च के प्रकाश में वह बार-बार किस चीज कों देखता है ।। कई प्रकार के विचार तेजी से विकास के दिमाग में चकरा उठे । यह समझने में उसे की प्रकार की कंठिनाई नही हुई की बाण्ड बार बार दिशा और दूरी बताने वाली विरामघड़ी देखता है ।
यह समझने में भी उसे देर न लगी कि विरामघड़ी का सम्बन्ध उस पर्स से होगा । पर्स में कोई ऐसा ट्रांसमीटर होगा जिसकी दिशा और दूरी बाण्ड के बायें हाथ में दबी वह विरामंधडी बता रही होगी ।


घडी की सुइयों को गतिमान देखकर ही बाण्ड इस नतीजे पर पहुंचा होगा कि पर्स किसी के हाथ लग गया है ।



उधर बाण्ड पहले से अधिक तेजी के साथ एक तरफ को बड़ गया ।।




सावधानीवश बाण्ड ने टार्च बुझा दी थी । परिणामस्वरुप, विकास को अब उसका पीछा करने से मुश्किल हो रही थी ।।
हालांकि विकास काफी सतर्कता से आगे बढ़ रहा था मगर यह बात बाण्ड से अधिक देर न छूप सकी कि कोई उसका पीछा कर रहा है ।

एकाएक गजब की तीव्रता के साथ बाण्ड पलट पड़ा ।। झनाक से टार्च की रोशनी विकास की तरफ लपकी ।




साथ ही बाण्ड की आवाज-" कौन है ?"




किन्तु उससे अधिक तेजी के साथ हवा में सन्नाया विकास का आलपिन।


सूं--सूं की हल्की सी ध्वनि के साथ आलपिन जेम्स बाण्ड की कलाई में घूस गया । बौखलाहट में टॉर्च उसके हाथ से गिर गई ।


अभी वह उसे पुन: उठाने के लिये फुर्ती से झुका ही था कि----" नहीं अंकल, टार्च उठाने की कोशिश न करना, वर्ना मैं फायर कर दूंगा ।

ठिठक गया बाण्ड, मुंह से निकला----"हैरी ।"



आप क्या समझते है अंकल, कि मैं इतनी सरलता से हैलीकॉप्टर में जलकर राख हो जाऊंगा ?"



"तुम विकास हों-विकास ।। तुम हैरी नहीं हो सकते ।"


"जानता हूं अंकल , आपको विदित है कि आलापिन को हथियार के रूप में सिर्फ विकास इस्तेमाल करता है ।"


इस बार विकास अपनी वास्तविक स्वर में बोला था----" पहचाना तो ठीक अंकल लेकिन काफी देर से पहचाना ।"



" त-----तुम----लड़खड़ा गई बाण्ड की जुबान----"हैरी में भेष में ?"



"क्यों---जब आप जैकी के रुप में हो सकते है तो क्या में हैरी के रुप में नहीं हो सकता ?"



" किन्तु....."
बाण्ड अभी कुछ कहना ही चाहता था कि विकास की आवाज गूजीं --" किन्तु -विन्तु कुछ नहीं अंकलं------------------ कोई भी हरकत की तो भेजा फोड़ दूगां ।"

जेम्स बाण्ड ने देखा -----


उपर्युक्त शब्दों के साथ ही लम्बा लड़का उसके ठीक सामने खड़ा हो गया था । बाण्ड के समीप ही जमीन पर रोशन टार्च पड़ी हुई थी । उसका प्रकाश ना बाण्ड पर पड़ रहा था ना विकास पर , किन्तु उसके प्रकाश में एक--दूसरे को साये को भली भातीं देख सकते थे ! बाण्ड ने विकास के हाथ में दबी रिवॉ्ल्वर का साया भी देख लिया था ।




" अंकल ।" विकास ने कहा ---" जब तुम्हारे गंजे "एम" ने तुम्हें काम सौंपा था तो वह भूल गया कि वतन यार है विकास का ?"



" विकास !" गुर्रा उठा बाण्ड ---" चीफ के बिषय में जुबान संभालकर बात करो ।"



" छोड़ो चीफ की बात ।" विकास हंसा ----" अंकल क्या तुम भी भूल गये थे कि विकास की जान दोस्तों के लिये है ? क्या ---तुमने नहीं सोचा था कि उन फिल्मों को प्राप्त करने जाओगे तो तुम्हारा टकराब विकास से भी होगा ?"



" जानता था ----फिर ....?"



" फिर भी इस अभियान में कूदने की हिम्मत हो गई तुम्हारी ?"



अन्दर ही अन्दर कांप उठा बाण्ड ।


दुनिया में विकास ही ऐसा लड़का था जिसका सामना करने में बाण्ड स्वयं को नर्वस समझा करता था ।।

ना जाने क्यों विकास के सामने आते ही वह घबराहट सी महसूस करता था , किन्तु उस घबराहट को उसने कभी प्रकट नहीं कीया ।



तभी तो बोला ----" क्यों , क्या तुमसे कुछ डरता हूं मैं ?"



" मैं जानता हूं अंकल , जो दिल में है , उसे प्रश्न बनाकर पुछ रहे हो मुझसे ।"
ह्रदय भले ही कांप रहा हो बाण्ड का, किन्तु ऊपर से मुस्कराया , बाण्ड बोला ----" अपने बारे मे तुम्हें बहुत बड़ी गलती होगयी है विकास बेटे ! जिस दिन बाण्ड को तुम जैसे छोकरों से डरना पडा, उस दिन बाण्ड जीवित रहने से वेहतर आत्महत्या करना समझेगा ।'"



" आत्महत्या करोगे कैसे अंकल , मौत तो तुरूहारी विकास के हाथों लिखी है ।"




-“यह तो वक्त वतायेगा बटे कि किसकी मौत किसके हाथ लिखी है ।" बाण्ड गुर्राया---"काम की बात करो ।"



" वह विरामधड़ी मेरे हबाले कर दो ।"




" कौन-सी बिरामघड़ी ?"



"वंही जिसके आधार पर उस पर्स तक पहुंचना चाहते है जिसमे......"



किन्तु--पूर्ण न हो सका विकास का वाक्य ।।

उससे पूर्व ही ऐसी हरकत कर दी बाण्ड ने जिसकी विकास ने आशा नहीं की थीं । अपने कदमों में पड़ी रोशन टार्च कों उसने एक ठोकर मारकर विकास की तरफ उछाल दिया ।।


निशाना इतना सटीक कि सन्नाती हुई टॉर्च विकास के हाथ में दबे रिवॉल्बर से जाकर टकराई ।


उस अप्रत्याशित हमले के प्रति विकास सतर्क न था और यही कारण था कि एक पल केलिये उस से चूक होगई ।



रिबाँल्वर जाके हाथ से छिटकर कहीं अंधेंरे में दुर जा गिरा।


अभी वह संभलने ही वाला था की हवा में सन्नाता हुअा जेम्स बाण्ड का शरीर उसके-ऊपर आ गिरा ।।



विकास अभी स्वयं की बाण्ड के मुकाबला करने हेतु तैयार भी नहीं कर पाया था कि-----" ये जो विरामंधडी ।"


बाण्ड के इस बाक्य के साथ ही एक जबरदस्त घूंसा बिकास की कनपटी पर पडा ।।


घूंसा इतना शक्तिशाली था की फिरकनी की भांति घूमकर विकास धड़ांम से जमीन पर गिरा ।।
भयानक फुर्ती के साथ वह उछल कर खड़ा हो गया । इस कार्य में अगर उसे एक क्षण का भी बिलम्ब हो जाता तो बाण्ड के बूट की ठोकर पूरी शक्ति से उसके चेहरे पर टकराती ।

किन्तु अब----अब वह हबा में घूमकर रह गयी बाण्ड की टांग ।


उसी पल विकास के सिर की एक जोऱदार टक्कर उसके चेहरे पर पडी है न चाहते हुए भी बाण्ड के कण्ठ से चीख निकल गई ।


टक्कर सीधी उसकी नांक पर बैठी थी और नाक से खून किसी टूटे हुए बांध की भाति बहने लगा था । बाण्ड पहली चोट के कारण ही अपने दिमाग को नियन्त्रित न कर पाया था कि विकास की लम्बी टांग धूम गई ।


बूट की जौरदार ठोकर बाण्ड के पेट में पडी ।


कराहकर बाण्ड पेट पकड़कर दुहरा हो गया । उसी समय बाण्ड की गुद्दी पऱ विकास का दुहत्तड़ पड़ा ।


मुंह के बल विकास के कृदमो में जा गिरा बाण्ड । इससे पूर्व कि विकास उस पर अपना कोई अगला बार करता, बाण्ड ने उसकी दोनों टांगे पकड़कर एक झटके के सांथ खीच दीं ।



विकास के पैर धरती से हटे और वह बिचित्र से ढंग से चकराकर जमीन पर गिरा ।


गिरा अौर गिरने के उपरान्त भयानक फुर्ती के साथ वह उठकर खड़ा भी हो गया , किन्तु---इस बार जब उसने बाण्ड पर जम्प लगानी चाहीं तो एकाएक ठिठक गया ।।


टार्च की रोशनी में उसे चमक रहा था-अपने सामने खड़ा बाण्ड का साया, साथ ही उसने बाण्ड के हाथ में चमचमाता हुआ एक चाकू देख लिया था । उस चाकू को देखकर ही ठिठका था, वह गुर्राया-----"क्यों अंकल, उतर अाये बुजदिली पर ?"

-'"रिवॉल्वर मेरी तरफ तानकर खड़े रहना बुजदिली नहीं है ?" कहने के साथ हीं बाण्ड ने विजली की गति से झपटकर विकास पर चाकू का बार किया ।
विकास ने हबा में ही बाण्ड की चाकू वाली कलाई थाम ली और बोला---" शेर का कलेजा है अंकल तो मुझे भी एक चाकू ......."


उसका वाक्य पूरा होने से पूर्व ही बाण्ड का घूटना उसकी टांगों के जोड पर पडा ।।



निश्चय ही दर्द से तिलमिला उठा विकासं, किन्तु उसके चक्कर में वाण्ड की चाकू बाली कलाई कों छोड़ने के स्थान पर इतनी जौर से मरोडा कि बाण्ड के कंठ से चीख निकल गई । मुंह से चीख निकालता हुआ वाण्ड विकास की कमर पर से होता हुआ जमीन-पर गिरा ।

इलना सव कुछ करने के बावजूद भी उसने बाण्ड की चाकू वाली कलाई नहीं छोड़ी । एक टांग उस कलाई के जोड़ पर रखी अौर इस तरह कलाई की खींचने लगा मानौ उसे बाण्ड के जिस्म से तोड़कर अलग फेंक देने का इरादा रखता हो । इधर विकास इस प्रयास में था और उधर बाण्ड ने अपनी दोनों टांगे उठाकर विकास की गर्दन में फंसा दी।



बड़ा विचित्र-सा दांव फंसा था ।



विकास उसकी कलाई नहीं छोड़ रहा था और बाण्ड उसकी गर्दन । बाण्ड उसे गिराने के लिये झटका देता तो दर्द उसकी कलाई में होता । काफी देर तक दौनो उसी स्थिति में रहे । फिर------------



जैसे एकसाथ दोंनों ने निश्चय किया ।
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 18:08

बाण्ड का मूट विकास के चेहरे से टकराया और विकास का बाण्ड के चेहरे से । एक साथ दोनों के कंठ से चीख निकल गई । छिटककर दोनों एक साथ दूसरे अलग होगये ।

विकास उछल कर खड़ा होगया।


उससे पहले खडा हो गया था जेम्स बाण्ड ।


विकास किसी चिते की तरह उस पर झपटा । बिजली की सी गति से बाण्ड का चाकू बाला हाथ चला ।
एक भयानक चीख विकास के मुंह से निकल गई ।


हुआ यूं था कि बाण्ड का चाकू विकास के दायें कन्धे में एक गहरा घाव करता हुआ निकल गया ।


कन्धे से बुरी तरह खून वहने लगा । बायें हाथ से उस घाव को दबाकर पीछे हटा विकास ।


पहले जैसी फूर्ती के साथ बाण्ड ने उस पर दूसरा वार किया ।


किन्तु अब ----- अब विकास भेड़िया बन चुका था ।


जेम्स बाण्ड से अधिक फूर्ती का परिचय देकर वह न सिर्फ स्वयं को वचा गया , बल्कि साथ ही उसकी लम्बी टांग भी चल गई । इस बार बूट की ठोकर बाण्ड के उस पंजे पर पड़ी , जिसमें चाकू दबा था ।


हाथ से चाकू निकल कर न जाने कहां गिरा ?


अभी चाकू के चक्कर में ही था बाण्ड कि विकास के एक जबरदस्त घूंसे ने उसके जबड़े पर लगकर उसे आतिशबाजी का कमाल दिखा दिया । पलक झपकते ही लम्बे विकास की ठोकर घुमकर उसके चेहरे पर पड़ी ।


गर्म गर्म खून से बाण्ड का मुंह भर गया ।

दो दांत भी टूट गये उसके ।


खून का कुल्ला किया तो टूटे दांत भी गिर गये ।


इधर वह कुल्ली कर रहा था कि विकास की एक और ठोकर ने उसकी पसलियों को चरमराकर रख दिया ।


चाकू लगते ही न जाने क्या हुआ था विकास को कि बिजली के पुतले की भांति उसके जिस्म का हरेक अंग काम करने लगा ।


इस फूर्ती के साथ उसके हाथ पैर चल रहे थे कि बाण्ड को सम्भलने के लिये एक क्षण भी तो ना दिया जालिम ने ।


वार ----वार पर वार । चोट पर चोट ।



अन्त यह कि जेम्स बाण्ड बेहोश हो गया ।


सरलता से विकास ने यह भी नहीं माना कि वह बेहोश होगया ।


चैक करने के उपरान्त जब उसे विश्बास होगया कि वह बेहोश होगया है तो बाण्ड के कपड़ो की तलाशी ली उसने ।


जेव से विरामंधडी़ निकाल ली ।


टार्च के प्रकाश में उसने समीप की झाड़ीयों में पड़ी बाण्ड की वह गन भी उठा ली , जिससे उसने हैलीकॉप्टर नष्ट कीया था ।


फिर ---- विरामंधडी़ की सुईयों को ध्यान से देखा । देखकर हल्के से मुस्कराया विकास ।

बाण्ड के बेहोश जिस्म को कन्धे पर डाला और लम्बे-लम्बे कदमों के साथ एक तरफ को बढ़ गया ।।।।।
" तुगलक अली ।"


" हां मेरी भाभी के प्यारे नुसरत-खान ।"


."जहां से इस समय हम गुजर रहे हैं यह एक भयानक जंगल है ।"




" वेशक है ।"


"'रात का समय है ।" नुसरत खान कह रहा था---" करीब बारंह बजे है ।"




अपने हाथ में बंधी रिस्टवांच देखी तुगलक ने, रेडियम डायल चमक रहा था ---बोला ---" पूरा डेढ़ बजा है ।"




"चारों तरफ अधेंरा है ।"


" सन्नाटा भी ।"




" ऐसे मौसम में मुझे एक बात याद आ रही है ।"

" उगल' दो ।"



"ऐसा ही मौसम था जब मेरे अब्बा अम्मी की आँखों से वनी चाट खा गये ।" नुसरत अली कहने लगा---" मेरी अम्मी की आखों से बनी वह चाट अब्बा को इतनी पसन्द आई कि वे उसे बार-बार खाने लगे । वियावान जंगल था रात का समय था, चारों तरफ सन्नाटा । जानवंर बोल रहे थे ।

ऐसे में मेरी अम्मी और अब्बा के ताशे बज गये । एक-दूसरे के प्यार में बजरबटटू बनेे तो अम्मी कहने लगी-'" मेरे दिल के शरबत, मुझे इश्क की कोई ऐसी निशानी दे कि जो हमेशा मुझे तुम्हारी याद दिलाया करे ।


और अब्बा ने एक ऐसी निशानी दे दी ।




" क्या निशानी दी तुम्हारे अम्बा ने ?" तुगलक ने पुछा ।



"तू ही बता सोच कर----" इश्क की सबसे बढ़िया निशानी क्या ही सकती है ।"


तुगलक बताने लगा ।


बहुत-सी निशानियों के नाम ले डाले उसने, किन्तु नुसरत था कि इंकार में ही गर्दन हिलाये जा रहा था ।


स्थिति ऐसी आ गयी कि तुगलक इश्क की निशानियां बताता बताता थक गया ।। अतः तुगलक बोला-"अबे तो और क्या भिण्डी का मुरब्बा देदिया ?"



"हां ।" नुसरत ने एकदम कहा…"अब पहुंचे तुम असली निशानी पर ।"

चौका तुगलक, बोला --"क्या कहते हो ?"


"भिण्डी के मुरब्बे जैसा ही तो हू मैं ।"



" क्या मतलब ?"



"अबे मैं ही तो हूं प्यार की निशानी जो मेरे अब्बा ने मेरी अम्मी को दी ।"



" ओह ।" तुगलक ने कहा ---" तो तुम उसी रात की औलाद हो ?"


" अबे तू कौन सा सुबह की औलाद है ?" नुसरत ने कहा --- " मुझे तेरी सारी हिस्ट्री मालुम है मुझे । तू दोपहर के समय शहतूत के पेड़ से टपका था ।"


इस प्रकार ऊटपटांग बातें करते चले जा रहे थे नुसरत ओर तुगलक ।


पोशाक से जासूस कम पाकिस्तानी शायर ज्यादा लगते थे ।


चूड़ीदार पजामा, पैरों में जूती । घुटनों तक बन्द गले का कोट । सिरों पर काली टोपी । मुंह में पान थे । बात करते हुए बीच-बीच में पान का पीक थूक देते थे ।।


" भाई नुसरत ।"

" हां बहन तुगलक बानो !" नुसरत ने लपककर कहा ।



" थक गये यार ये साला चमन अभी कितनी दूर और है ?"


बस सुबह होते होते हम चमन के ही किसी बाग में एक दूसरे की बेगमों की कमी को पूरी कर रहे होंगे ।


" यार तुझे चमन में इस तरह जंगल के रास्ते से पैदल जाने की क्या सूझी ?"


अचानक दोनों रूक गये । दोनों के कान कुछ सुनने की चेष्टा कर रहे थे ।


आकाश की ओर देखता हुआ तुगलक बोला ---" लगता है आसमान से साला कोई हबाई जहाज गुजर रहा है ।"


" हबाई जहाज नही मूर्ख आबाज हेलीकॉप्टर की है ।" नुसरत ने कहा ।


अड़ा नहीं तुगलक , बोला---" तू ठीक कहता है । लेकिन यार साला कहीं नजर नहीं आ रहा है ।"



अचानक ..............



हबा में लहराकर आकाश से नीचे गिरती हुई कोई चीज फटाक से नुसरत के चेहरे पर आ पड़ी।


" अबे तेरी की......!"

" क्या हुआ ---- क्या था ?" तुगलक ने पुछा ।


" मुझे लगता है कि हेलीकॉप्टर का पुर्जा टूटकर मेरे चेहरे पर गिरा है , उसे ढूंढों --- हो सकता है कि उसे देखकर हम यह जान सकें कि वह हैलीकॉप्टर कौन से सन् में बना था ?"


दोनों ही उस चीज को तलाश करने लगे , जो ऊपर से गिरी थी ।


" अबे !" तुगलक के मुंह से निकला--------" ये साला पर्स किसका पड़ा है ?"



तुगलक ने झुककर पर्स उठा लिया ।।


" इसमें माल होगा ।" कहते हुए तुगलक ने पर्स की चेन खोल दी ।


" अबे इस में तो फिल्में हैं --- दो रील ।"


तुगलक ने आईडिया फिट किया ---" लगता है को प्रोडयूसर इस जंगल में अपनी किसी जासूसी फिल्म की शूटिंग करने आया होगा । उस बेचारे ने फिल्में अपने पर्स में रखी होंगी और पर्स यहां गिर गया ।।


" मुझे तो कुछ और ही लगता है । "


" क्या ?"


" किसी जेबकतरे ने किसी बहुत ही अमीर आदमी की जेब काट ली होगी ।" नुसरत खान ने राय प्रकट की ---" पर्स से पैसे निकाल कर उसने पर्स यहां फैंक दिया होगा ।"

तुगलक ने राय प्रकट की ----" अबे कहीं ये पर्स ही तो वह चीज नहीं जो मेरे चेहरे पर आकर लगी थी ?"




" हां ।" खिल्ली उड़ाने वाले भाव से तुगलक ने कहा , " कोई चील ईसे अपनी चोंच में दबाकर उड़ी चली जा रही होगी , अन्धेरें में तेरी शक्ल देखी तो फिदा हो गई । अपनी मोहब्बत के इकरानामे पर दसतख्त कराने के उसने चोंच खोली होगी और ये पर्स ......"






" तुझे कभी अक्ल नहीं आयेगी साले जामुन की औलाद ।" नुसरत ने कहा ---" अबे क्या ये नहीं हो सकता कि यह पर्स उस हैलीकॉप्टर में बैठे किसी आदमी की जेब से गिरा हो ? इत्तफाक से हमें मिल गया ।"


" तो फिर तेरे विचार से इस फिल्म में क्या होगा ?"



" यह तो इन्हें देखने से ही पता लगेगा!" कहकर तुगलक फिल्मों को टार्च की रोशनी में देखने का प्रयास करने लगा ।।।।।
अभी फिल्में निकालकर टार्च की रोशनी से चेक कर ही रहे थे कि ----

--- उसी समय --- वातावरण किसी गन के गर्जने से कांप उठा ।।

वे दोंनो ही सहमकर एक दूसरे से लिपट गये । बस गन की इस गर्जना के बाद वे किसी प्रकार की कोई आवाज न सुन सके ।

पहले वे एक दूसरे से चिपके थर थर कांपते रहे , फिर नुसरत बोला ---" तुगलक ।"

" हां नुसरत ।"

" साले , लगता है कोई पागल जासूस इस जंगल में आ गया है ---" भागो ।"

" सचमुच --- जासूस अगर अक्लमंद होता तो , इस तरह संगीत बजा कर हमें सतर्क न करता बल्कि चुपचाप हमें इस तरह दबोच लेता जैसे बिल्ली चूहे को दबोच लेती है ।" तुगलक कहे चला जा रहा था ----" महान जासूस तो बिना मारधाड़ के काम करते हैं ।"

" बिल्कुल ।" नुसरत ने कहा ----" हमें बेवकूफ जासूसों की जासूसी से फायदा उठाना चाहिए ।"

" भागो ।" तुगलक ने नारा लगाया और आपस में हाथ पकड़ कर दोनों ही भाग लिये ।

पर्स सहित दोंनों फिल्में तुगलक के हाथों में सही सलामत थी ।

वे अंधेरे जंगल में वेतहाशा भागे चले जा रहे थे । इस प्रकार मानों भूतों कोइ टोली उनका पीछा कर रही हो ।

अन्धेरें में कई स्थान पर ठोकर खाकर गिरे भी , किन्तु उठ कर फिर दौड़ने लगते ।

अन्त में जंगल के बीच वनी एक इमारत को देखकर वे रूक गये ।।।।



बुरी तरह फूली हुई सांसें लेकर उन्होंने एक-दूसरे को देखा, फिर इमारत को और फिर एक-दूसरे को ।।

दोनों डी आखें एक--दूसरे से पूछ रही थीं कि जंगल के बीच यह इमारत कैसी है ? अपनी फूली हुई सांस पर पहले संयम पाया । नुसरत ने बेला कौन बेवकूफ है, जो इस जंगम में रहता है ।।

" बेवकूफ तुम हो जो तुमने यह सवाल किया ।"

खा जाने वाली नजरों से नुसरत ने तुगलक को घूरा बेले---" क्या मतलब।"

" अबे यही सवाल तो मैं तुमसे करने बाला था ।"

" जरा सोचने दे ।" कहने के उपरान्त तुगलक ने ऐसा पोज बना लिया मानो वह दुनिया का सवोंत्तम विचारक हो । कोई प्रेमी बात सोचने में तल्लीन हो होगया हो जो मानव जाति को नया मार्ग दिया सके । फिर उसने अपनी समाधि तोड़ी बोला ---" सोच लिया ।"

" क्या सोचा ?" नुसरत ने पुछा ।

" निश्चित रूप किसी लकड़वग्घे ने यह इमारत अपनी लकड़वग्घी केलिये बनाई है ।" अपने दीम्ग का मलीदा निकालते हुए तुगलक ने बतीया-"उसे अपनी लकड़वग्घी से उतनी ही मोहब्बत होगी जितनी मेरे अब्बा को अम्मी से ...."

"अबे चुप देगची के ।"

"गाली देता है ।"
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 18:09

किन्तु तुगलक पर लेशमात्र भी तो असर न हुआ । वह कहता हीं चला गया-"तुझे नहीं पता ये, पुराने जमाने के राजा-महाराजा शेर का शिकार किया भी करते थे । बार-बार पड़ाब डालते की किल्लत' से बचने के लिये वो जंगल में इमारत बनवा लिया कंरते थे । ये सब बातें मुझे एक दिन ख्बाब में चमकी थीं । यह ही चमका था कि इमारत को शिकारगाह कहते हैं ।"

"सच ।" नुसरत बोला-"ऐसा ख्बाब तो मुझे मी चमका था ।"

-"ये शिकारगाह ही है ।"

"अबे सुन तो सही, मुझे क्या ख्वाब चमका था ।" नुसरत कहता चला गया---" मुझे चमका था कि अम्मी की बजाय अब्बा के पेट से पैदा......."

"नुसरत ।" उसकी बात बीच में ही काटकर तुगलक ने कहा ----" ख्बाब की बात छोड यार, तू ये क्यों भूल रहा है कि हम जासूस हैं-और जासूस भी छोटे मोटे नहीं-दुनिया के सबसे महान जासूस है ।"

"इस हकीकत को मैं कभी नहीं भूलता ।"

" तो फिर इस शिकारगाह में छुप जायें । तुगलक ने राय दी----"साला कितना भी बड़ा जासूस आ जाये किसी को शक नहीं होगा कि हम यहां हैं । तू वीं सोच कभी कोई ये सोच सकता है कि शेर की मांद मे चुहा होगा? "


" कभी नहीं ।"

" तो आ फिर ।" तुगलक ने कहा ----" अन्दर इन फिल्मों का जोड़ घटाना देंखेंगें ।"

इस प्रकार----ये हमारे दोनों महान जासूस शिकारगाह के अंदर चले गये ।" सचमुच बहुत पहुच किसी राजा द्वारा बनाया गया शिकारगाह ही था ।

घूमते घूमते वे एक कमरे में पहुंचे । कमरे में अंधेरा था, जिसे पहले तो उन्होंने' टार्च की रोशनी से दूर किया, फिर कमरे की एक दीबांर में लगी मशाल जला कर , प्रकाश हो गया ।

कमरा देखने से ही आभास होता था कि कम-से-कम एक वर्ष से किसी इन्सान ने यहां कदम नहीं रखा है ।

-"'अब हम जानी पाकिस्तानं के बीर सपूत सुरक्षित है ।"

" तुम कुछ सुरक्षित नहीं हो चमगदड़ के बच्चो !" एक अन्य आवाज गूंजी ।!।!!!!!
पलक झपकते ही दोंनों ने रिवॉ्ल्वर निकाल ली थी ।

"कौन है बे ?" नुसरत गुर्राया --" किस भिण्डी की औलाद ने हम जैसे महान जासूसों को गाली देने की हिम्मत की है ?सामने आ साले----मुसल्लम बनाकर हलम कर जायेंगे ।"

"तुम दोनों का सिर मुंडवाकर चुटिया एक साथ बांध दूंगा ।" कमरे के बाहर से आवाज अाई ।

बौखलाकर तुगलक ने अपने शायरों जैसे लम्बे बालों पे हाथ फिराया । नुसरत की परेशानी यह थी कि वे प्रकाश मे-थे और कमरे के बाहर था अंधेरा ।इस वात की वह भलीभांति समझ रहा था कि बाहर बाला उन्हें आसानी से देख रहा होगा और. वे उसे नही देख पा रहे हैं, तभी तो उसमे तुरन्त कहा--"मेरा अब्बा साला उल्लू का गोश्त खाता था, तभी तो मुझे अंधेरे में भी दिखता है ।"

अभी वह कह हीं रहा था कि दरवाजे के बाहर किसी कै जूतों की आवाज गूंजने लगी "टक्…टक्-टक् !"

" अा जा बेटा ।" नुसरत ने कहा तो तुगलग बोल पड़ा---"बनायेगे लोटन!"

.स्थिर और' सन्तुलित कदमों से कोई चल रहा था ।

दरवाजे पर एक परछाई उभरी-लम्बी तगडी है दोनों के पंजों की पकड़ रिवॉल्बर पर मजबूत हो गई ।।

कमरे से प्रविष्ट होकर वह परछाई मशाल के प्रकाश मे… आ गई ।

साथ ही उसने कहा--" तुम्हें बाल्टी जरूर वना दूंगा उल्लू के पट्ठो !"

-"रूसी चचा ?" एक साथ दोनों क मुहं से निकला ।

बोगारोफ ही था वह,बोला --“चचा नहीं बाप कहो ।

दोनों की नजरे मिली । रिवॉल्बर झुक गये । नुसरत ने कहा----" हमारी गलती कों क्षमा की टोकरी में फेंक दो चचा हमें क्या पता था तुम भी जंगल में तुम कवड्डी खेलने आये हो, वर्ना कसम मियां भुट्टो की ---हम कभी......"

" तुम्हारी कवड्डी बहुत देर से देख रहा हूं मैं ।" बागरोफ ने कहा--- "
पाकिस्तान के ढक्कनों वह फिल्म मुझे दे दो जो तुम्हारे हाथ लगी है ।"

" हम तो तुम्हारे ताबेदार हैं चचा---------" कहकर एक साथ दोनों ही वागारोंफ की तरंफ बढे । समीप पहुचे । चरणों में झुक ग्रये । अन्तर्राष्ट्रीय जासूस मण्डली में सर्वाधिक उम्र का जासूस बगारोफ ही था । हर राष्ट्र का जासूस चचा कहता था । उसे सम्मान करता था । पैर छूता था ।

नुसरत तुगलक ने भी परम्परा निभाई ।

एक मुस्कान बामारोफ के होंठों पर उभरी दोनों के सिर पर हाथ फेरकर बोला-----"जीते रहो कबूतर के बच्चे........."

औरं हद करदी उन्होंने ।

बागारोफ का वाक्य बीच में ही रह गया अौऱ वह धड़ाम से चारों खाने चित गिरा ।

हुआ यूं कि दोंनों' महान जासूसों ने एकसाथ, झटके से बागारोफ़ की दोनों टांगें खीच ली ।

स्वप्न में भी बागरोफ को ऐसी उम्मीद न थी । तभी वह मात खा गया । सिर का पिछला हिस्सा फर्श से इतनी जोर से टक्कराया कि सन्नाकर रह गया बागारोफ ।

दोनों बागरोफ के ऊपर सवार थे, तुगलक कह रहा था---"देखा नुसरत भाई. कैसी धोड़ी पछाड मारी है ?।"

" बुढ़ापे में चचा, फिल्म देखना चाहते थे ।" नुसरत हँसा ।

" देखी चचा !" नुसरत ने बागारोफ से कहा----"कितनी बढिया फिल्म दिखाई । इसे कहते हैं दुलती मार ।"

उसकी इस हरकत पर बुरी तरह बौखलागया था बागरोफ बोला----"तुम्हें छोडुंगा नहीं मच्छर के अण्डों ।"

" छोड़ने का सवाल तुम्हारे लिये नहीं चचा हमारे लिए है।" नुसरत ने कहा----" जामुन के पेड़ पर से टपका था मैं । जब कोई जामून खाता है तो उसकी जीभ नीली हो जाती है । जब मै किसी का किर्या कर्म करता हूं तो उसका शरीर नीला पड़ जाता है ।"

बागरोफ कसमसाया ।।।

कसमसा कर उनके बंन्धन से मुक्त होने हेतु बागरोफ ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति का प्रयोग किया , किन्तु टस से मस न हो सका वह ।

"पिछले जन्म में अंगद का पैर था मैं ।" नुसरत ने कहा ।

" मैं था वह धनुष जिसे सीता ही उठा सकती थी । " तुगलक ने तान लगाई ।

और सचमुच-ऐसा ही लगा था बागारोफ को । पहले कभी ऐसा मौका नहीं आया था कि वह नुसरत-तुगलक है भिड़ा हो । हमेशा उन्हें मूर्खतापूर्ण बाते करते ही पाया था । उस समय बागारोफ सोचा करता था कि न जाने पाकिस्तान ने अपनी सीक्रेट सर्विस में कैसे-कैसे रंगरूटों को भर्ती कर लिया है, किन्तु अब जबकि वह अपनी सम्पूर्ण शक्ति का उपयोग करने के उपरान्त भी उनके वह वन्धनें से मुक्त नहीं हो पा रहा था, उसे सोचनां पड़ा कि नुसंरत और तुगलक में कोई विशेष बात अवश्य है जो इन्हें पाकिस्तान ने इस अभियान पर है भेजा है ।

" चचा !"अपने शिकंजे जैसे बन्धन् में जकड़े नुसरत बोला---"अव मैं तुम्हें अपनी बेगम का किस्सा सुनाता हूं । "
" चुप वे जामुन की औलाद ! " बागारोफ को जकड़े तुगलक ने नुसरत को डांटा-"पहले मैं चचा को अपनी लाल छडी का हाल ......!"
"अवे मुझे छोडो़ तो सही हरामी के पिल्लो" बागरोफ दहाड़ा-…"सालो मेरा गजरवत ।"

कहते कहते ही बागारोफ ने एक-एक उंगली दोनों कों आंख में मारी ।

" मर गया नुसरत ।"

"बचा तुगलक ।"

चीखते हुए दोनों ने बागारीफ को छोड़ दिया ।

उछलकर खडा हो गया बागारोफ । देखा-सामने वे दोनों खडे़ है ।

बागारोफ ने जिस आंख में उँगली मारी थी, बागारोफ की अोर देखते हुये उसी आंख को बार-वार: दबा रहे थे।

नुसरत कह रहा था… ये तुमने क्या किया चचा, मैं तो तुम्हें अपनी बेगम का किस्सा सुना रहा था ।

--"अव मैं तुम्हारी उडनतस्तरी बना दूंगा भूतनी वालों-बागारोफ दहाड़ा----"तुमने मुझे समझ क्या रखा है !"

"दूध का वीज ।" तुगलक बोला ।

नुसरत ने कहा--"कुत्ते का अण्डा !"

' होश काबू में न रख सका वागारोफ । वह झपट पड़ा । परन्तु इस बार लेशमात्र भी लापरवाह नहीं था वह ।

जान चुका था कि नुसरत और तुगलक के शरीरों में अपरिमित शक्ति है । उसका एक जवंरदस्त घुंसा नुसरत के चेहरे पर पड़ा । गजब की फुर्ती के साथ तुगलक की तरफ घूमा
किन्तु तुगलक-" नंहीं--नहीं,.....चचा !" कहता हुआ चेहरे पर हाथ रखे इस तरह पीछे हट रहा था मानो बागरोफ का घुसा नुसरत के नहीं, उसके चेहरे पर लगा----"चचा मुझे मत मारो । मैं बचा हूं तुम्हारा, नादान हूं-नासमझ हूँ ।"

पूरी सतर्कता के साथ बागारोक तुगलक की तरफ व्रढ़ रहा था, किन्तु 'नुसरत की तरफ से आवाज' आई------" तुझसे पहले ही कहा था साले, प्यार के हथगोले कि चचा को मत छेड़ चचा बहुत खतरनाक हैं, लेकिन नहीं माना चल, माफी मांग लें ।"

एक क्षण-सिर्फ एक क्षण के लिये बागारोफ की दृष्टि तुगलक से हटकर नुसरत पंर गयी कि----

कमाल कर दिया तुगलक ने ।

उस एक ही क्षण में बागरोफ के चेहरे पर ऐसा घूंसा पड़ा कि उसकी आंखों के-सामने लाल-पीले तारे नाच उठे । एक फूट हवा में उछलकर वह धड़ांम से फर्श पर जाकर गिरा ।

जबरदस्त फुर्ती के साथ उठकर खड़ा हो गया था बागारोफ ।

बागारोफ का दिमाग बुरी तरह झन्ना रहा था ।

एक नजर उसने दोंनों को देखा।।

नुसरत हाथ जोडे़ खडा़ था । कह रहा था--------"इस नालायक की तरफ से ने माफी मांग रहा हूँ ! चचा ये नादान है, 'तुम्हारा बच्चा है। इसे माफ कर दो ।।।

इस बार बागरोफ ने उनमें से किसी पर जम्प लगाने की मूर्खता नहीं की।

अपनी एक आंख से वह नुसरत की देख रहा था तो दूसरी तुगलक पर स्थिर थी ।

" अबे नुसरत ।" बागरोफ पर दृष्टी जमाये तुगलक कह रहा था ---" ये क्या होगया चचा को , ये तो भैंगें होगये ।"

मैँने पहले ही कह था न तुझसे चंचा से मजाक मत कर ।" तुगलक की वात को जबाव अवश्य दे रहा या वह, किन्तु दृष्टि बागारोफ पर ही स्थिर थी-----"अवे देख ले, चचा की आँखें घूम गयी हैं । यहां जंगल में साला डॉक्टर भी नहीं मिलेगा ।"


" मैं तुम्हारा---डमरू बजा दूंगा सालो हुकम के इक्कों ।" उसी तरह एक-एक आंख से दोनों को देखता हुआ बागारोफ बोला----"


थोड़ी देर में पता लग जायेगा कि तुममें से किसकी आंख घुमती है, और किसकी नाक । किसके दांत टूटते हैं और किसकी आँत ?"

" नही चचा, ऐसा मत करना ।" तुगलक गिड़गिड़ा उठा ।
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 18:09

बागरोफ अच्छी तरह समझ चूका था, बातों से जितने मूर्ख नजर आत्ते हैं, ये असल में उतने ही खतरंनाक है। कहने को तो वह न जाने क्या कह रहा था किन्तु दिल में सोच रहा था कि वह एकसाथ इन दोनों पर काबू कैसे पाये ? उसका दिमाग बडी तेजी से काम कर रहा था । ईतना वह समझ चुका था कि, अगर वे एक बार वह हावी हो गये तो फिर वह बच न सकेगा है अचानक उसकी नजर मशाल पर गई।

वह फुर्ती के साथ मशाल पर झपटा तो---

"अरे…अरे...रे ... चचा पागल हो गये तुगलक --इन्हें पकड़ ।"

किन्तु, इससे' पूर्व कि इनमें से कोई वागारोफ के झपटे बागारोफ ने मशाल सम्भाल ली और विद्युत की तीव्रता के साथ उनकी तरफ घूम गया । उस पर झपटने का प्रयास कर रहे दोनों ही ठिठक गये ।

नुसरत कह रहा था --"मै कहता न था तुगलक, हमारे मजाक को चचा गलंत समंझेंगे वही हुआ । अब तुझे नहीं छोड़ेगे चचा । मर साले मैं तेरी क्या मदद कर सकता हूं ?"

हाथ में मशाल लिये बागारोफ नुसरत की तरफ ही बढ़ रहा था ।

उधर तुगलक कह रहा था नुसरत की क्या गलती है चचा, गलती तो मेरी है । मजाक तो मैंने किया था, सजा मुझे दो ।"


" सच चचा !" कान पकड़ लिये नुसरत ने -----" मेरी कोई गल्ती नहीं है । सजा देनी है तो इसे ही दो चचा मैं तो ......"

तेजी से घुमाकर मशाल का एक बार बागरोफ ने नुसरत पर किया ।
गजब की फुर्ती के साथ स्वयं को वचाता हुया नुसरत चीखा-"अबे ओ उल्लु के पदृठे तुगलक की दुम, साले मरवा दिया मुझे ।"

और…जैसे रो पड़ा तुगलक-"नहीं चचा, मेरे गुनाहों की सजा नुसरत को न दो । कहता हुआ तुगलक अभी उस पर झपटने ही बाला था कि बागरोफ ने तीव्रता के साथ उसकी तरफ मशाल घुमा दी ।

मशाल सटाक से उसके चेहरे पर लगी ।

" मर साले और कर चचा से मजाक ।" नुसरत चीखा ।

सचमुच, तुगलक के चेहरे पर मशाल बहुत जोर टकराई थी । उसके मुंह से चीख निकल गई, किंतु- बागरोफ की तरफ से तुरन्त ही होने वाले वार से उछलकर स्वंयं को बचाता हुआ वह रो पडा बोला--" माफ कर दो चचा,मैं उसे चिमटे की कसम खाकर कहता हैं, जिससे पकड़कर मेरे अब्बा ने मुझे अम्मी क पेट से निकाला था । अब तुमसे कभी मजाक नहीं करुगाँ ।"

"अब रोता क्या है साले चचा के पैरों में गिरकर माफी मांग।" नुसरत ने उसे डांटा ।

तुगलक ने जैसे ही बागरोफ के कदमों में झुकना चाहा, बागारोफ ने पुन: उस पर मशाल का वार किया ।

" नहीं चचा , ऐसा न करो ।" तुगलक ने 'कहा-"मुझे माफी मांगने का मौका तो दो ।"



तुगलक गिड़गिड़ाता रहा ।


' रह-रहकर नुसरत तुगलक को कोस रहा था कि उसने चचा से मजाक किया ही कयों ? बीच बीच में वह बागरोफ से तुगलक को क्षमा कर देने का भी अनुरोध करता है मगर
तुगलक और नुसरत की चाल बागारोफ समझ चुका था । वह समझ चुका था कि जिस तरह मुर्खता पूर्ण बाते करने में वे एक दूसरे से काफी आगे हैं, उसी प्रकार बातों में फंसाकर बार करने में भी एक से आगे एक है ।
वे दोनों इसी चक्कर में थे कि जिसका भी मौका लगे, यह बागारोफ को दबोच ले जबकि बागरोफ का प्रयास था कि इतना अवसर उनमें से किसी को भी न मिल सके ।
बे दोनों ऊटपटांग बातों के-साथ अपने बचाव में रहे किन्तु--विजयी हुआ यागारोफ । .

करीब तीस मिनट पश्चात् एक प्रकार से वे दोनों बागारोक की कैद में थे ।कई पलों के लिये तीनों के दिल की धड़कनें मानों बन्द हो गई ।

किसी बुत की भांति वे खड़े रह गये -- सागर तट पर ।

उन तीनों के सामने वतन पड़ा था । झुलसा हुआ --- जला हुआ वतन । मस्तक पर पडा़ बल इस बात का प्रमाण था कि वह वतन ही है । चमन का मसीहा । धनुषटंकार का भाई । अपोलो का मालिक ।

गीले रेत पर जला हुआ वतन पड़ा था ।

फूट-फूटकर रो पड़ा नादिर । अपोलो चीख चीखकर अपने सींग रेत में पटकने लगा । धनुषटंकार है मुंह से एक डरावनी आवाज निकली रोने की आवाज । वह भी सिर पटक पटककर अपोलो की तरह रोने लगा ।

नादिर किसी बच्चे की तरह कुट-कूटकर रो रहा था ।

ना जाने कितनी देर तक वतन के दीवाने पागलो की तरह रोते रहे ।

जब उन्हें होश आया तो देखा-चमन के हजारों नागरिक उन्हें घेरे खड़े थे ।

सभी रो रहे थे । सारा चमन रो रहा था। रोता क्यों नहीं, उनका मसीहा-उनका देवता जो सामने पड़ा था----जला हुआ ।।

अचानक-वतन के मुंह से एक कराह निकली ।

नादिर के साथ साथ अपोलो और धनुषटंकार चौके । उन दोनों के मस्तक उन्हीं के खून से सने थे ।

"अभी महाराज जिन्दा हैं ।" रोते हुए नादिर के मुंह से खुशी की एक किलकारी निकली-"इन्हें महल में ले चलो ।"

फिर जले हुए वतन को महल में लाया गया । शरीर पर से इस तरह के तिनके उतर रहे थे जैसे जले हुये गत्ते पर से उतरते है । चमन के यौग्यतम जसूसों ने राष्ट्रपति भवन के उस विशेष कक्ष में पडे़ पलंग को धेर लिया ।

अभी वे अधिक कुछ नहीं, कर पाये थे कि वतन ने कराहकर नेत्र खोल दिये । फफोलेयुक्त आखों से उसने चारों तरफ देखा । यह समझते ही कि वह राष्ट्रपति भवन में है, बिस्तर पर उठकर बैठ गया ।


डॉक्टरों ने इन्कार किया तो वतन की वाणी गूँज उठी -"बतन मरा नहीं है साथियों---सिर्फ जला है औरर जलकर कुन्दन सी तरह चमका है ।"

सुनने बाले रो पड़े । धनुषटंकार और अपोलो उससे लिपट गए ।

फिन्तु-देखने बालों ने देखा वतन के जले हुए होंठों पर एक दर्द युक्त मुस्कान उभरी ।।।





वतन बोला, "रोते नहीं पागलो, इस दुनिया ने वतन की दिखा दिया है कि दुनिया कितनी धिनौनी हैं ? कितनी डरावनी और बदसूरत है, मेरी तरह । मैं इस दुनिया को जवाब दूंगा--जबाव ।" कहकर धनुषटंकार अौर अपोलो को अलग-अच्चा हटा दिया उंसने ।

मुलाजिम रोकते ही रह गये अौर वतन उठकर खड़ा हो गया । डॉक्टर यह कहते ही रह गये कि अभी उसका उठना ठीक नहीं है, लेकिन वह नहीं माना । चमन में किसका साहस था जो वतन की इच्छा का विरोध करता.

यूं जला हुआ वतन बाहर आ गया । ।

चमन का बच्चा-बच्चा राष्ट्रपति भवन के बाहर खडा था ।

एक दृष्टि वतन ने सागर की भांति उमड़ते विशाल ज़न् समुदाय 'पर डाली । मस्तक पर वल पड़ गया । आंखों से नीर तैर उठा ।।

वातावरण में मौत का सा सन्नाटा था । अभी कुछ कहने ही जा रहा था वतन कि सफेद, बेदाग--दूध जैसे कपडे लिये उसके पास अपोलो पहुंचा । सुनहरे फ्रेम का एक काला चश्मा भी था उसके पास। रोते हुए अपोलो ने वतन का वह सामान उसके आगे कर दिया ।

हल्के से मुस्कराया वतन ।अंपोलो को प्यार किया । तड़प-तड़प-खूब चूमा उसे ।

फिर-अपनी प्रजा के समक्ष ही सफेद कपड़े पहने उसने आँखों पर चश्मा लगाया ।

सारा चमन वहाँ मौजूद था, लेकिन संन्नटा ऐसा कि सुई भी गिरे तो बम जैसा विस्फोट हो । एक बार पुन: बंतन ने अपने दीवानों को चश्मे के अन्दर से देखा । फिर-वतन की वाणी जन-जन् के कानों तक-पहुंची---'" प्यारे देशा वासियों ! मैं देख रहा हैं कि आज तुम्हारी आँखों में आसू हैं ।





हर आँख में आंसू देख रहा हूँ । मुझे ये अाॉसू पसंद नहीं । जो आंसुओं को न रोक सकता हो, वह उन्हें काले चश्मे से ढक ले । क्यों--मेरे जिगर के टुकडों की आँखों में आँसू क्यों हैं ? अपने वतन की सूरत देखकर ? यह देखकर कि कल का खूबसूरत वतन आज जलकर दुनिया का सबसे वदसूरत व्यक्ति बन गया है ? इसमें रोने की कोई वात नहीं है प्यारे चमन के निवासियों । रोने की बात तो यह है कि ये दुनिया-तुम्हारे वतन की तरह वदसूरत है । उसी दुनिया ने तुम्हारे वतन को अपनी तरह बदसूरत बना दिया है । अभी नहीं बताऊँगा प्यारे देशवासियों कि मुझे बदसूरत किसने बनाया ा है ? यह रहस्य मैं तुम्हें नहीं, एक साथ सारी दुनिया को वतलाऊंगा । तभी आप भी जान लेंगे। मैं अपनी प्रयोगशाला में जा रहा हूँ । कुछ ही देर पश्चात दुनिया के हर टी० वी० सेट पर मेरा चेहरा उभरेगा । सारी दुनिया के साथ आप भी जान तेने कि यह दुनिया कितनी बदसूरत है ।"

एक क्षण सांस लेने हेतु रूका वतन, फिर बोला-"आप लोगा से सिर्फ इतना ही कहना है की कोई भी घवराये नहीं । वतन अभी जिन्दा है । आज मैं आपका खूबसूरत वतन न सही, जला हुआ वतन तो हूँ । बदसूरत वतन तो है । कम-से-कम उस समय तक जब तक कि वतन किंसी भी सूरत में जीवित है--चमन को दुनिया से नहीं, दुनिया को चमन से डरना होगा । अगर तुम्हें वतन क् चेहरे से नहीं, दिल से मुहब्बत है तो तुम सबको कसम है अपने वतन की, कोई भी एक भी आँसू आँखों में न आने दे । जो भी यह जानना चाहता हैकि मैं आगे क्या करने जा रहा हूँ, वह कुछ ही देर बाद टी० बी० पर मेरी आबाज सुन ले । जो कुछ मुझे करना है, उसकी घोषणा मुझे सारी दुनिया के सम्मुख करनी ।"
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