चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़) complete

Jemsbond
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 19:09

तीसरी चेतावनी के बाद !


विजय की आवाज---"बस, मेरे मिट्टी के शेर ! अब बंद करो ये सर्कस का कमाल और-अपने हाथ से छड़ी छोडकर वंह लहराया और चक्कर खाकर धड़ाम से गिरा । इतनी देर से एक ही दिशा में धुमते-घूमते उसका दिमाग तरह भिन्ना गया था । सांस धोंकनी की भांति चल रही थी ।

यही कार था कि वह स्वय को संभालं नहीं सका ।


इसके बाद क्या हुया, वह कुछ न जान सका । उसकी आंखो के सामने काजल-सा अधकार छाता चला गया और मस्तिष्क को अवचेतना के गहन सागर में डूबने से वह न रोक सका, किन्तु होश के अन्तिम क्षण में उसे यह तसल्ली थी किं वह सुरक्षित है ।होश आया तो उसे छत दीवारें, फर्श अर्थात् सारा हाँल अब भी घूमता-सा प्रतीत हो रहा था । अभी तक उसका दिमाग हिलोरें ले रहा था । विजय का स्वर उसे ऐसा लग रहा था मानो वह स्वप्न में कहीं बहुत दूर से अारहा हो ।


विजय कह रहा था--"घबराओ मत बटन प्यारे,हमने संवार दिए हैं काम सारे ।"


आंखें खोल दी वतन ने, देखा-वह स्वयं एक लम्बी मेज पर पड़ा था । समीप ही विजय खड़ा था । सब कुछ तेजी के साथ घूमता प्रतीत हुआ उसे ।


उसने देखा उस हाँल में अनेक टी० वी० स्क्रीनें फिट थी ।

उनमें से सिर्फ एक टी० वी० अॉन था ।।


स्क्रीन पर जलपोत के चालक-कक्ष का दृश्य मौजूद था। दो चालक जलपोत को चला रहे थे ।। उनके चेहरे पर छाये भय को वतन स्पष्ट देख सकता था । अभी वह कुछ बोल भी न पाया था कि विजय ने कहा-----"घबराना मत बटन मियां, . साले सभी चीनी चमगादडों को मैंने निहत्थे करके एक कक्ष में बन्द कर दिया है, सिर्फ ये दोनों चालक ही स्वतन्त्र है और इतनी शराफत ये जलपोत को से इसलिए चला रहे हैं ,क्योंकि इन्हें पता है कि हम प्रत्येक पल इन्हें स्क्रीन पर देख रहे है और इनकी किसी भी हरकत से ईश्वरपुरी के लिए इनका टिकट कटा सकते हैं !"


वतन ने अपने दिमाग को नियन्त्रित किया । लम्बी मेज पर उठकर बैठ गया वह । पुन: सिर बुरी तरह चकराया ।


"अमां तुम, उठते क्यों हो, बटन प्यारे ? विजयं ने उसे रोकने का प्रयास किया ।। " चचा ।" होश में आने के बाद पहला शब्द कहा वतन ने ---" अपने चरणों की धूल तो लेने दो ।" कहने के साथ
ही मेज से उतरकर खड़ा हो गया वह। चरण स्पर्श करने के लिए झुका तो दिमाग ने एक इतना तेज झोंका खाया कि विजय के चरणों में गिर पड़ा ।।

" अमां , ये क्या उठा पटक करते हो ?" एकाएक बौखला गया विजय ।


वतन को चरणों से उठाया, गले से लगा लिया , बोला ---" तुम नई पौध की औलाद बहुत बदमाश हो । सालो ये नहीं सोचते कि क्या होगा , क्या नही ।"


" आपने ठीक समय पर आकर मुझे बचा लिया , चचा ।"



" साले ! " भर्रा उठा विजय का स्वर ---" पता होता है कि जहां छलांग लगा रहे हैं , वहां मौत ही मौत है, लेकिन नहीं --- दिमाग से काम नहीं लेंगें , बदले से मतलब , चाहे जो हो । दिमाग तो सालों ने टांड पर टागं दिया है ।"



" चचा । " वतन लिपट गया विजय से ----" बच्चा हूं आपका ।"



" अबे , हमारा बच्चा क्यों होता ?" छेड़ा विजय ने , " हमारा होता तो दिमाग से काम करता । साले तुम --- तुम विकास से कम नहीं । उसी की तरह मुर्ख हो---महामुर्ख ! तुममें से कोई सफल जासूस नहीं बन सकता । तुम दोनों को एक साथ लिखकर दे सकता हूं मैं कि तुममें से कोई सफल जासूस नहीं बन सकता । दोनों बहादूर हो , आवश्यकता से अधिक बहादूर हो और मेरा दावा है कि बहादूर आदमी कभी सफल जासूस नहीं बन सकता ।। जासूस आदमी बहादूरी या शरीरिक शक्ति से नही , बल्कि अपने दिमाग से बनता है और हकीकत ये है कि तुम्हारे पैदा होते ही 'तुम्हारा सारा दिमाग दीमक चाट गई ।"


" क्यों चचा , ऐसा क्या कर दिया मैंनें?"


" तो बेधड़क इस छड़ी के बूते पर इतने सैनिकों की मौजूदगी में हबानची से भिड़ना क्या दिमाग की बात थी ।?"

" उसने मुझे ललकारा था चचा ।"
"जो दुश्मन की ललकार पर तकरार कर बैठे, वह कभी सफ़ल जासूस नहीं बन सकता वटन प्यारे!" विजय कहता ही चला गया-"लेक्रिन जानता हूं कि मैं भैंस के आगे बीन बजा रहा हूँ । यह बीन साले उस दिलजले के आगे बजाते बजाते हम बूढे हो गए, लेकिन वंह भैस की तरह रेंकता ही रहताहै । एक छुटकारा मिला नहीं कि साले तुम पैदा हो गाए । उस साले नकली चचा की भी खोपडी खराब हो गई थी, जो तुम्हें पैदा कर दिया । तुम भी अपने गुरु का नाम रोशन. करोगे, क्योंकि दिमाग पैदल हो !"'

"ऐसी बात नही चचा !"


"तो और कैसी वात है बटन ?" उसी की टून में विजय ने प्रश्न किया ।



होश में आने के बाद पहली बार वतन के होंठों पर मुस्कान उभरी, बोला---" जिन बच्चों के ऊपर आप जैसों का साया हो चचा, वे मौत से क्यों डरें ? हम जानते हैं कि आप, अलकांसे चचा और महान सिंगही कवच बनकर हमेशा हमारी रक्षा करते हैं, फिर फिर क्यों न हम मौत से लड़े ?"



-'"ह्रम इत्तफाक से न पहुंचते बटन प्यारे, तब पता लगता ।"



"ऐसी उम्मीद न विकास को है चचा ,न मुझे । वतन ने कहा-बल्कि हमें विश्वास है कि जब भी मौत हम पर झपटेगी, आप तीनों मे से कोई उसे टाल देगा ।। इसी विस्वास पर तो मौत के कुऔ में कूद पड़ते हम । हमेँ यकीन है कि यमराज़ के हाथों में से भी झीन लायेंगे आप हमें ।"



-""साले हम-हम न हो गए, तुम जैसे सत्यवानों की सावित्री हो गए !"


विजय की इस बात पर उन्मुक्त ढंग से हंस पडा वतन ! उसके ठहाके की आवाज से मानो पूरे जलपोत पर फूलों की वर्षा हो उठी ।

विजय ने हंसते हुए वततं का चेहरा देखा---खून से लथपथ ! विजय ने देखा…हुंसंतै हुए भी उसकी आंखों में पानी था ।
समीप ही, मेज पर रखा वतन का चश्मा उठाकंर विजय अपने हाथों से वतन को पहनाता हुआ--बोला-"'इसे ,पहन लो बटन प्यारे, तुम्हारी आंखें नहीं देखी जातीं । ये आंखें एक कहानी कहती हैं ---- लम्बी कहानी । बचपन से लेकर तुम्हारे राजा बनने की कहानी !"


मस्तक पर बल पड़ गया वतन के ।


फिर मानो स्वयं को सम्भालकर बोला---" उस बात को छोडो चचा, ये बताओं कि ह्रवानची कहां है ?"



" वह साला तो अभी तक मेज के उस तरफ बेहोश पडा है ।" विजय ने कहा----"होंश में आ भी गया तो कुछ नहीं कर सकेगा । हमने बांध रखा है उसे, किन्तु आश्चर्य की बात ये है कि सारे जलपोत पर न कहीं सांगपोक है अौर न ही सिंगसी ! "



"वे दोनों कहां गये ?"



" यह भी जरुर पता लगायेंगे ।" विजय ने कहा लेकिन उससे पहले यह बताओं कि क्या तुम्हें मालूम हैं कि अपना दिलजला कहां है ?"



"सबसे निचली मंजिल के कमरा नम्बर दस मे ।" बतन ने बताया।



" हम जहां बैठे इन साले जलपोतों के चालक को देख रहे हैं ।" विजय ने कहा ----"तुम जाकर अपने दिलजले को ले आओ : याद रहे वहा किसी भी तरह की बहादुरी दिखाने की आवश्यक नहीं है । वहां जेम्स बाण्ड और बागारोफ जैसे महारथी होंगे फिलहाल उनमें से किसी को भी उस केैद से आजाद नहीं करना है । कमरे में से सिर्फ अपने दिलजले को निकालकर यहां लाना है ।"

" तब तो इस गन की आवश्यकता पड़ेगी चचा तो कहते हूये वतन ने गन उठा ली ।



""अवे....अबे !" बोखलाया बिजय-"इसकी क्या जरुरत है ?"


" यकीन रखो चचा, इसका दुरुपयोग नहीं करूंगा मैं ।" कहने के साथ ही-गन सम्हालकर हाँल से बाह्रर निकल गया वतन ।।


सूनी और साफ पड़ी गैलरी में से गुजरता हुआ वतन -अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ा । सबसे नीचे की मंजिल में कमरा नम्बर ढ़स के सामने ठिठक गया वह ।
दरवाजा बन्द था !



अन्दर से कुछ लोगों के आपस में बातचीत करने की आवाजें आ रही थीं ।


दरवाजा बाहर से बन्द धा । उसने धीरे के से सांकल खोली, इतनी धीरे से कि अन्दर किसी को सांकल खुलने का आभास न हो सका ।



फिर वतन ने एक तेज ठोकर दरवाजे में मारी ।


भड़ाक की आवाज के साथ किवाड़ खुलकर झनझना उठे !!


कमरे में उपस्थित बाण्ड , बागारोफ, नुसरत तुगलक औऱ विकास ने चौककर दरवाजे की तरफ देखा ।

उम पर दृष्टि पड़ते ही सबके मुंह से एक साथ निकला ----"वतन !"



"कोई भी हिला तो मेरी गन उसे स्थिर कर देगी ।" अपने स्वर में कठोरता उत्पन्न करके वतन ने कंहा----"सिर्फ विकास बाहर आए !"



सहित समी अवाक-से खडे़ वतन का चेहरा देख रहे थे !



और सभी पर दृष्टि रखे हुए वतन ने कहा------"तुमने सुना नहीं विकास ? तुम बाहर आओ ।"



एकाएक उसके आदेशात्मक स्वर को सुनकर सख्त हो गया विकास का चेहरा, गुरोंया----"क्या इस गन के बूते पर आदेश दे रहे हो ?"



वतन को लगा कि अगर उसने विकास को वास्तविकता नहीं समझाई तो र्वह भड़क उठेगा। यह भी वह समझता था कि उसके भड़काने से कोई भी जासूस कुछ भी लाभ उठा सकता है । बह सोचकर वतन ने विकास से नम्र स्वर में कहा-----"'ये गन तुम्हें आदेश देने के लिए तनी हुई नही है दोस्त, वल्कि इन सबको कक्ष, में रोक रखने के लिए तनी हुई हैं । बिजय चचा ने आदेश दिया है कि इस कमरे से सिर्फ तुम्हें निकालूं । उन्होंने हिदायत दी है कि इस कमरे से कोई और न निकल सके !"



"बिजय गुरु !" प्रसंनता से उछल पड़ा विकास--"वे पहुंच गए यहां' ?" " कहाँ है वह चिडीमार झकझका?" वागारोफ एक दम बिफर पड़ा-----"उस चौट्टी के ने ऐसा कहा !"

"बहको मत डबल चचा !" वतन ने गम्भीर स्वर में कहा--"डबल इसलिए क्योंकि विजय चचा तुम्हें खुद चचा कहते हैं । यह विजय चचा का ही आदेश है कि मैं फिलहाल सिर्फ विकास को ही इस कमरे से निकालूं !"




वतन की बात का तात्पर्य विकास अचछी तरह समझ चुका था ! तीव्रता के साथ वह लपका, औऱ वतन के समीप से गुजरकर कक्ष से बाहर आ गया ।



बाहर निकलने के लिए झपटा तो बागारोक भी था, किंन्तु इससे पूर्व कि वह दरवाजे तक पहुंचता, वतन ने एक झटके के साथ बागारोफ के मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया !



अन्दर बागारोफ भुनभुनता रहा अौर वतन बाहर से दरवाजे को सांकल लगाकर धूमा !



सामने खड़ा उसी की तरफ देख रहा था विकास !



दो बराबर की लम्बाईयां आमने-सामने खडी थीं । वतन तो विकास के नेत्रों में साफ-साफ झांक ही रहा था, लेकिन विकास को चश्मे के पीछे छुपी वतन की आँखों की स्थिति का आभास था । फिर दोनों एकसाथ एक-दूसरे की तरफ लपके -एक-दूसरे के गले से लग गये, बांहो में समा गए । उनके बीच छाई वह खामोशी उस महान प्रेम की सूचक थी, जिसकी अभिव्यक्ति के लिए कोई भी भाषा शब्द निर्माण न कर सकी । ।




-"ये तुमने अपनी क्या हालत बना रखी है ?" विकास ने पूछा ।।



"तुम्हारी चाल में लंगड़ाहटं देखी है मैंने ।" वतन ने उल्टा प्रश्च किया----"क्या कारण है उसका ?"

जो कुछ विकास के साथ हुआ था, वह उसने वतन को बताया और जो वतन के साथ हुआ था, वह विकास को। जब 'यह भेद' खोला कि विकास हैरी के भेष में प्रयोगशाला से फार्मूलां चुराने गया था तो वतन का चेहरा खिल उठा, क्योंकि सारा काम वतन की योजना के अनुसार हो रहा था !

जब विकास को यह पता लगी कि हवानची इस समय कब्जे में है
और सांगपोक व सिंगसी गायब हैं, तो चेहरा सुखे पड़ गया उसका ! अपने चश्मे के पीछे से वतने ने देखा-----किसी खून पीने वाले भेंड़िये की तरह हो गया था विकास का चेहरा ।



तव, जबकि वे उस स्क्रीन कक्ष में पहुंचे ।


ऐक विचित्र ही दृश्य देखा उन्होने । न जाने कहाँ से विजय को एक रस्सी मिल गई थी । जिसे उसने कक्ष की छत में पड़े एक कुन्दे में डाल थी उस रस्सी पर ही हंबानची के उसने उल्टा लटका रखा था !!



न सिर्फ लटका रखा था जबिक हवानची होश में थां । विजय उसकी पसलियों में गुदगुदी कर रहा था !!



मजबूर से हवानची को एक विचित्र से अन्दाज में हंसना पड रहा था ।



"आशीर्वाद दो गुरु !" कहता हुआ विकास चरणों में झुक गया विजय के । श्रद्धापूर्वक उसने चरण स्पर्श कर लिए !



"किसका आशीर्वाद !" झुककर विकास के कान पकडकर विजय ने ऊपर उठाया और जब पूरी तरह से साबधान स्थितियों में खड़ा हुया-----------विकास तो कान पकडे बिजय के हाथ ऊपर उठ गए थे, बोला, "साले, तूं टाड हो गया है दिलजले, लेकिन अक्ल के पीछे अभी तक लठिया लिए घूम रहा है !"

" कहो तो सहीं गुरु, क्या गलती हो गई मुझसे ?"
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 19:10

"'देख लिया घुसकर तमाशा देखने का पारणाम ?"


विकास के गुलाबी होंठों पर शरारत युक्त मुस्कान दौड गई बोला---" देख तो-रहा हूं गुरु, हम तीनों मस्ती मना रहै है । ये चीनी चमगादड़ हमारे सामने उल्टा लटका हुआ है । बोलिए, क्या ये परिणाम हमारे हक का नहीं ?"



"प्यारे दिलजले !" एकाएक गम्भीर हो गया विजय --"‘पहले भी कई बार कह चुका हूं, आज फिर कहने की तमन्ना। है । "



"जरूर कहिए !"


" तुम पैदा हुए थे तो हमने ख्बाब सजाया था कि तुम्हें जासूस बनायेंगे---------दुनिया का सबसे बड़ा जासूस !"



" बन तो गया हूं गुरू --- अन्तर्राष्ट्रीय सीक्रेट सर्विस का चीफ है तुम्हारा बच्चा ।"
" होगें !" विजय ने कहा ---" ये भी मानता हूं कि दुनिया भर के मुर्ख जासूसों ने तुम्हें ---सबसे बड़े जासूस की उपाधी दे दी है । ये दुनिया भी मुर्ख है , जो तुम्हें इस सदी का सबसे बड़ा जासूस समझती है ।

----- मुझसे पुछो, मेरे दिल की गहराईयों से पुछो तो जासूसी की ए बी सी डी का भी पता नहीं है तुम्हें !


------ हां सबसे बहादूर , सबसे बड़े पहलबान और समय आने पर दुनिया के सबसे बड़े दरिन्दे होसकते हो तुम ! जासूस के पास दीमाग होता है, इस नाम की कोई चीज तुम्हारे पास नहीं है ।

----- जासूस किसी घटना पर भली भातिं बिचार करता है , फिर मैदान में आता है , किन्तु तुम ----- तुम उस समय सोचते हो जब फंस जाते हो , खैर छोड़ो इस बात को मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तुम्हे भाषण पिलाने का कोई लाभ नहीं होने बाला है । देख रहा हू कि तुम्हारे पैरों में लड़खड़ाहट है, तुम्हारे मैदान में कूदने का परिणाम है ये !"



खूनी दृष्टी से पलटकर उल्टे लटके हबानची की तरफ देखा विकास ने !



हबानची के नाटे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई ।



विकास गुर्राया ----" ये लंगडाहट इन मर्दों की मर्दानगी है की वजय से है ।। मुझे चारों तरफ से घेर कर मर्दानगी का परिचय दिया था इन्होंने ।। मैं जान भी ना सका कि मुझे किसने घेरा है कि इनकी गोलियां मेरे शरीर में धंस गई ।"



" इसी को तो जासूसी पैंतरा कहते हैं प्यारे दिलजले ! इन्हे पता था कि अगर इन्होंने तुम्हें सम्हलने का का अबसर दिया तो परिणाम क्या होगा ।"



किन्तु विजय की बात पर ध्यान कहां था बिकास का । वह तो उल्टे लटके हबानची पर गुर्राया-----" तू तो मुझसे अपने जीबन का आखिरी खून करने के लिए मिला हे । जो कुता अपने बाप की कब्र को मेरे खून से धोने के लिए निकला था , वह कहां चला गया ?"


कुछ बोला नही हबानची , चुपचाप लटका रहा ।
" सुना नहीं तुमने ?" ऐसी आबाज कि अगर फौलाद से टकराये तो उसमें भी दरार पड़ जाती----" क्या पूछ रहा हूँ मैं ?"



बेचारा हवानवी जवाब वया देता ?


चुप रहा ।

उत्तर में एक तीव्र ठोकर उस के चेहरे पर पड़ी हबानची के कंठ से चीख निकल गई । फिर विकास ने शुरू कर दिया अपनी द़रिन्दगी का दौर !! स्वयं हबानची तो हलाल होते हुए बकरे की तरह मिमिया ही रहा था, इधर विजय और वतन’ को भी आंखें बन्द कर लेनी पड़ी । विजय तो जानता ही था कि ऐसे मौके पर विकास को टोकने 'से कोई लाभ नहीं होता, लेकिन वतन ने टोका तो उसकी तरफ इस तरह पलटकर गुर्रापा विकास कि जैसे उसे फाड़कर खा जाएगा-----"बीच में मत बोलो वतन , अपने काम में अवरोध उत्पन्न करने वाले को मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता ।"



और विकास की इस गुर्राहट के बाद स्वयं वतन कां साहस नं हुआं कि वह कुछ कहे ।



कहते है कि बिकास अगर जुबान खुलवाने का प्रण कर ले तो पत्थर के टुकडों को भी बोलने पर विवश कर देता है । एक समय ऐसा अग्या कि हवानची को बोलना ही पड़ा---- "वे दोनों चीन पहुँच चुके हैं !"

--'"क्रिस माध्यम से ?" विकास ने पूछा ।


"विमान से ।"


" क्या वे 'वेवज एम व अणनाशक किरणों के फार्मुले फिल्में भी अपने साथ ले गए हैं ?"



-"हा । हवानची ने जवाब दिया ।


"हूं !" गुर्राया विकास----"तो चीन में तबाही मचाने का सामान वे अपने साथ ले गए हैं !"

"एक बार फिर समझो प्यारे दिलजले------इसे कहते हैं जासूसी ।" विजय ने कहा--"हमारा ध्यान इस जलपोत पर केन्द्रित करके फिल्मों सहित वे सुरक्षित अपने देश पहुंचने में सफल हो गए हैं ।"



--"यही तो मैं चाहता था चचा !" विकास के स्थान पर वतन बोल पड़ा----" अगर इसी-जलपोत पर फिल्में मेरे हाथ लग गई होतीं तो बेहद अफसोस होता मुझे !"
"इस ऊट पटांग बात का क्या मतलब है बटन प्यारे ?" विजय ने, आंखें निकाली ।



" मतलब सिर्फ इतना है चचा कि चीन में जाकर तहलका मचाना चाहता हूँ मैं ।" वतन ने कहा-"अगर फिल्में यहीं मिल जाती तो चीन जाने का बहाना समाप्त हो जाता, मेरी हसरतें दिल में घुटकर रह जाती !"



. "तुम्हें कोई नहीं समझ सकता ।" झुंझला उठा विजय ।



विकास हवानची से कह रहाथा किसी ओऱ के द्वारा किए गए शिकार को खाना विकास का सिद्धान्त नहीं है । इस समय मेरी सेवा में तुम्हें गुरु और वतन ने प्रस्तुत किया है । तुमने कसम खाई है कि अपनी जिन्दगी का आखिरी खून तुम, मेरा करोगे ! जब तक तुम्हें अपनी हसरत पूरी करने का एक मौका न दे दू, तब तक मरने भी नहीं दूगा । तुम्हें जिन्दा रखूंगा मैं, मौका दूगा कि तुम मेरी हत्या कर सको । उस प्रयास में स्वयं भी अपने जीजा के पास पहुंच जाओ तो यह तुम्हारा भाग्य होगा !"



न जाने क्या सोचकर दर्द से कराहते हवानची के कान की एक नस दबा दी विजय ने ।


हबानची बेहोश हो गया ।



विजय की तरफ पलटकर विकास ने पूछा…"इससेक्या लाभ हुआ ?" '3"

" इससे वही लाभ हुआ प्यारे दिलजले, जो जुकाम में विक्स बैपोरब लगाने से होता ।" अपनी ही टुन में विजय कहता चला गया----"होश में रहने परं अब यह मिमियाने के अलावा कर भी वया सकता था ! वैसे भी यह हमें अपसी मुहब्बत की बाते न करने देता ।"



"खैर, चचा, अब आदेश दीजिए कि हमें क्या करना है ?" वतन बोला ।



खा जाने वाली नजरों से विजय ने घूरा वतन को बोला "मेरे आदेश की जरूरत है तुम्हें ?"



"वयों नहीं गुरु ?" विकास ने शरारत की ।



" तो मेरा आदेश तो ये है प्यारो कि इसी जलपोत पर बैठकर अखण्ड कीर्तन करो ।" विजय ने कहा, " शरीफ भक्तों की तरह बैठकर हमारी झकझकियों का रसास्वादन करो । उनमें छूपे तथ्यों को समझो और जीवन में उनका अनुकरण करो।"
"खैर, चचा, अब आदेश दीजिए कि हमें क्या करना है ?" वतन बोला ।



खा जाने वाली नजरों से विजय ने घूरा वतन को बोला "मेरे आदेश की जरूरत है तुम्हें ?"



"वयों नहीं गुरु ?" विकास ने शरारत की ।



" तो मेरा आदेश तो ये है प्यारो कि इसी जलपोत पर बैठकर अखण्ड कीर्तन करो ।" विजय ने कहा, " शरीफ भक्तों की तरह बैठकर हमारी झकझकियों का रसास्वादन करो । उनमें छूपे तथ्यों को समझो और जीवन में उनका अनुकरण करो।"

कुछ देर उन्हें विजय की उस बकवास का सामना करना पड़ा जो एक बार शुरू होकर बंद होनी कठिन हो जाती है ।


विकास तो वैसे भी विजय की बकसास का जवाब बकवास में ही देने का के माहिर था । वह तो विजय के सामने अड़ा रहा, किन्तु वतन बुरी तरह बोर हो गया ।।



जब उस पर रहा न गया तो बोला-----------" कुछ काम की बातें भी करो चचा!"



" ये हुई शरीफ वच्चों वाली बात ।" यह सोचकर कि काफी देर मौज मस्ती हो ली है, विजय स्वयं ही लाइन पर आता हुअा बोला--- --" चचा के पास तो बचा ही क्या है व्रटऩ प्यारे तुम ही काम की बातें करो ।"




" ये जलपोत किधर जा रहा है ?"



" पीकिंग की तरफ ।"



'"क्या हम इसी जलपोत के माध्यम से चीन में प्रविष्ट होंगें ?" वतन ने पूछा।





" इस जलपोत के चालकों को तो हमारा यही आदेश है की वे सीधा पीकिंग के बन्दरगाह पर ही लंगर डाले ।" बिजय ने बताया----""लेक्रिन हम बन्दरगाह तक पहूंचने से पूर्व ही जलपोत छोड़ चुके होंगे !"

" हूं !" बाण्ड वागगरोफ नुसरत और तुगलक का क्या होगा ?"



" हां !" बिजय न कहा "यह प्रश्न अवश्य विचार योग्य है । अगर हमंने उ़न्हें उसी कक्ष में बंद छोड़ दिया--- तो अंत में चीनियों की कैद में होगें बे । उन्हें साथ लें, तब भी खतरा है । साथ रहै, सम्भव है हमारे साथ रह कर वे हमारे ही काम मे अबरोध उत्पन ना करें ।"



" एक राय दूं गुरू ? विकास बोला ।



" जरूर दो !" विजय ने कहा है


" क्युं ना हम अपने साथ साथ चचा बागरोफ को ले लें ।"



" क्यों ? चचा में क्या लाल जड़ें हैं ?"
" क्यों? चचा में ही क्या लाल जडे है ?"



"यह बात अन्तर्राष्ट्रिय गठ्बन्धन के आधार पर की हैं गुरु ।" विकास ने कहा--" चीन, पाकिस्तान और इंगलैण्ड एक है। रूस उनका विरोधी है ,हमारे साथ है । पाकिस्तान और इगलैण्ड की सरकार के अनुराध पर चीनं उंनके जासूसों को तो लौटा देगा, किन्तु चचा के मामले में गड़बडी़ कर
सकता है । सम्भव है चीनी सरकार चचा के साथ कोई अनुचित हरकत भी कर डाले । चचा के साथ अगर कुष्ट भी अनिष्ट होता है तो उसके जिम्बेदारं हम होंगे !"

"जिस आधार पर तुमने यह राय दी है प्यारे दिलजले उस दृष्टि से तो बिल्कुल सही है !" विजय ने कहा…......"इसमें कोई शक नहीं कि एक बार अपने पंजे मे फंसे बागारोफ को चीन सरकार मार भी डाल तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी ! किन्तु सोचना यह है कि इस अभियान में चचा का लक्ष्य भी बही है जो बाण्ड इत्यादि का है-फार्मूला
प्राप्त करना । सम्भव है कि हमांरे साथ रहकर भी चचा वही प्रयास करें?"



" निश्चित रूप से आपकी बात में दम है गुरु !"



"तुम्हारी इस बारे में क्या राय हे बटन मियां !" विजय ने वत्तन से पुछा।



गम्भीर स्वर में वतन ने कहा--"क्या आप सचमुच मेरी दिली राय जानंना चाहते चचा ?"



" स्पष्ट कंहो दोस्त ! क्या कहना चाहते हो तुम ?" बिकास बोला !


"चचा !" विजय पर दृष्टि गड़ाए वतन गम्भीर में कहा…"मेरी राय जानना चाहते हो तो सच्चाई ये है कि मैं अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों में कोई फर्क नहीं समझता ।।ये सभी राष्ट्र महाशक्तियाँ कहलाते हैं और करीब करीब इन सभी की नीति एक जैसी है । मैं इसे अच्छा नहीं समझता किं रुस अगर भारत के साथ है तौ हम उसे ठीक कहें ।। नीति उसकी भी वही हेै छोटी मछलियों को ग्रास बनाना !"
" तुम लो अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का कचूमर निकालने लगे बटन प्यारे !"
विजय ने कहा--- "यहां सबाल ये नहीं हैं कि किस महाशक्ति की नीति क्या है ! प्रश्न ये है कि चचा को साथ लें अथवा बाण्ड और नुसरत तुगलक के साथ उसी कक्ष में बन्द पड़ा रहने दे?"



" सिर्फ इसलिए मुझे बागरोफ चचा से कोई सहानुभूति नहीं हो सकती कि वे रूस के हैं ।" वतन ने स्पष्ट कहा------"लेकिन यह भी सच्चाई है कि अगर उन्हें चीन के हवाले किया गया तो उन्हें सिर्फ रूसी होने की सजी मिलेगी !"

" तुम्हारे कहने का मतलब ये है कि चचा को अपने साथ ही ले लेना चाहिए !"



…"यही समझ लीजिये ।"



" और अगर वे फार्मूला प्राप्त करने के लिए हमारे साथ ही गड़बड़ करे तो ?"




''जब वह वक्त आयेगा तो चचा से हम स्वयं निबट लेंगे ।" वतन ने कहा----"यह बात ज्यादा गलत होगी कि इस डर से उन्हें इन दरिन्दे चीनियों के हवाले कर दिया जाए ।"




"मैं बतन की बात का समर्थन करता हूं ।" विकास ने कहा…"और साथ ही यह राय भी देता हूं कि फिलहाल हम हबानची को भी अपने साथ रखें । चीन में वह एक कवच की तरह हमारी रक्षा करेगा ।"

-"क्या मतलब ?" विकास की उपर्युक्त राय पर विजय चौका----हमें गले में घण्टी बाँधने की क्या जरूरत है ?"



" आप समझे नहीं गुरु !" विकास ने कहा-"हमे क्रिस्टीना के यहां ही तो ठहरना है !"



"बेशक।"



" जब तक हम चीन में रहकर फार्मुला ना प्राप्त करें,, तब तक हवानची को अपनी कैद में रख सकते है !"

" लेकिन इससे लाम क्या होगा ?"
"बहुत से लांभ होगे !" विकास ने कहा---"पहला फायदा तो ये कि सांगपोकऔर सिंगसी के ठिकानों का पता बतायेगा ये । वे ही दोनों फिल्में ले गये है और उन्हीं को मालूम होगा कि फिल्में कहाँ हैं ! वैसे भी जब तक हवानची हमारे कब्जे मैं-रहेगा, हम सुरक्षित रहेगे !"



"बात उल्टी भी पड़ सकती है प्यारे दिलजले !" विजय ने कहा हवानची हमारे साथ-साथ क्रिस्टीना--- को भी फंसा सकता है !"


''मामला थोडा गडबड हो गया गुरु !" विकांस ने कहा--"अगर यहां हमें हवानची के स्थान पर सांगपोक टकराया होता तो एक वडी़ ही खूबसुरत चाल चली जा सकती थी । दिक्कत ये है कि इसके लोटे जैसा शरीर हममें से किसी के पास भी नहीं है !"




"तुम शायद यह कहना चाहते हो कि इसके स्थान पर यहां सांगपोक होता तो उसका मेकअप करके चीनी सीक्रेट सर्विस में धुस जाते ?"




"आपके बच्चे जियें गुरु !" विकास ने कहा… "काफी समझदार हो गये हैं आप ।''



सीना चौड़ा कर लिया विजय ने, बोला---" मूंग की दाल में भीमसेनी काजल मिलाकर खाना अपना खानदानी शोंक है प्यारे--- और यह तो तुम्हें पता है ही कि इनके सेवन से बुद्धि ऐड़ लगे हुए घोडे की तरह सरपट दौड़ती है । किन्तु सबाल ये हैकि हममें से किसी ने भी हवानची के शरीर जैसा हसीन जिस्म नहीं पाया है, अत: इसका मेकअप करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है ।"



''तो आप इस बात से सहमत नहीं है गुरु कि हबानची को अपने साथ रखा जाये !"


''एकदम नहीं ।" विजय ने कहा------"हां !"-----इस बात की तुम्हें पूरी छूट है कि जलयान छोड़ने से पूर्व तुम इससे जो भी जानकारी प्राप्त करना चाहते हो, प्राप्त कर सकते हो । जैसे सांगपोकं और सिंगसी का पता इत्यादि !"



" ठीक है !" कहकर विकास हवानची की तरफ धूम गया । अब वह हवानची को दुबारा होश में लाने का प्रयास कर रहा था ।



वतन कल्पना कर सकता था कि अब अगले कुछ समय में इस कक्ष में क्या कुछ होने जा रहा है !


वह सब कुछ अपनी आंखों से देखकर वतन में चुप रहने की ताकत नहीं थी ।


और न ही विकास का बिरोध करना चाहता था । अतः लम्बे-लम्बे कदमों के साथ वह कक्ष से बाहर निकल गया ।।।।
क्रिस्टीना ने वतन कौ देखा तो देखती ही रह गई । न जाने क्यों उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि दो तीन बार जोंर-जोर से धड़ककर उसकी हृदय-गति वंन्द हो गई है ।


हालांकि वतन के साथ ही उसके फ्लैट में विजय, विकास और बागारोफ भी प्रविष्ट हुए थे, किन्तु उसकी दृष्टि वतन के चेहरे पर ही स्थिर होकंर रह गई थीं । गोंरा दूध जैसा, सेव की लाली लिये चेहरा ।


आंखों पर काला चश्मा ।


हाथ में छडी़ । जिस्म पर मौजूद सफेद कपडों पर न सिर्फ खून के धब्बेे लगे हुए थे बल्कि जगह-जगह फटे हुए भी थे !

उसे देखकर कोई भी कह सकता था कि भयानक जंग के बाद उसे कपड़े बदलने का मौका नहीं मिला है ।



" वतन की ही देखती रहोगी क्या---- क्रिस्टीना को बिकास की आबाज ने मानो स्वप्न से जगाया , " हम भी खडे़ है !"



" ओह !" अपनी मुर्खता का अहसास करके झेंप गई क्रिस्टीना -----" आओ-आओ !" कहने के साथ ही बह दरवाजे से हटी और उन्हें ड्राइंगरूम में पड़े सोफे पर बैठने का संकेत करने लगी !"

बांगारोफ भला ऐसे मौकें पर चुप रेहने वाला कहाँ था ! बोला---"लगता हैं, छोकरी इस हरामजादे पर फिदा हो गई हैं !"


सुर्ख हो उठा क्रिस्टीना का चेहरा !




'विजय ने कहा----" चचा, अपने बंटन का नाम सुनते ही मीरा की तरह दीवानी हो गई है क्रिस्टी ! जब हम यहां थे तो हम इसे बटन की मुहब्बत के बताशे फोड़-फोड़कर खाते देखा करते थे । अब स्थिति ये है कि इस बटन को क्रिस्टी अपने ब्लाऊज पर लगा लेना चाहती है !
वतन के अधरों पर एक विचित्र-से दर्द में डुबी मुस्कान उभर अाई थी ।




विकस ने कहा सच ---वतन् क्रिस्टी के लायक है ! क्रिस्टीना खडी न रह सकी वहाँ' ! तेजी के साथ मुडी और दूसरे कमरे में भाग गई !!



"लौ !" बागारोफ ने कहा पहले तो इस हरामजादे के दिल में मुहंब्बत की धण्टी बजा दी छिनाल ने, ओर अब खुद डंका बजाती चली गई !"

" डबलं चचा !" वतन ने 'गम्भीर स्वर मैं कहा---"यहाँ इतनी फुर्सत ही कहां है कि किसी से मुहब्बत कर सकू ।चीन में आया हूं, चीनियों को सबक देने से ही फुर्सत नहीं मिलेगी । तुम समझाना क्रिस्टी को । विजय चचा, तुम भी समझाना । जो कुछ आंप कंह रहे हैं सचमुच अपने लिए क्रिस्टी की आखों में मैंने वह सब कुछ देखा है । विकास! उसे तुम भी समझाना मेरे यार । कहना कि वतन के दिल को धडकन उसका देश बन चुका है --------चमन ।"


वतन के उन शब्दों के बाद एक सन्नाटा सा खिंच गया कमरे में ।



कुछ देर तक तो बागारोफ जैसे व्यक्ति की भी समझ में नहीं आया कि इस सन्नाटे को वहं कैसे तोडे परन्तु अधिक, देर तक वातावरण मे वह बोझिलता कायम न रह सकी जहां विजय और बागारोफ जैसे हो ऊट पटांग बातें करने वाले हों वहाँ भला संनांटा कितनी देरे टिक सकता है ?





परिणाम ये कि कुछ ही देर बाद वहां ठहाके लगने लगे । उधर क्रिस्टीना को चैन कब था ! उसवै बहाना ढूंढा ! किचन में जाकर फटाफट काफी तैयार की और एक ट्रै में ऱख ड्राइंगरूम में आ गई ! दृष्टि झुका रखी थी उसने ! इच्छा क्या तो थी किंतु उनमें से किसी से भी दृष्टि मिलाने का साहस नहीं था उसमें !!!



कोई कुछनहीं बोला ।


" बतन ने स्वयं ही कहा---- "चचा सर्वप्रथम कपडे बदलने की इच्छा है !"
" तुम्हारे कपड़े बंदलना कोई आसान बात तो है नहीं प्यारे !" बिजय ने कहा… "सफेद कपडों के अतिरिक्त किसी अन्य रंग का कपड़ा तुम पहनते नहीं और मियां चुकन्दर की दुम,, तुम्हारे लिए अब यहां सफेद कपडे आयें कहां से ?"



" मेरे पास है !" एकाएक क्रिस्टीना के मुंह से निकल पड़ा !

सभी ने चौककर क्रिस्टीना की तरफ देखा ।


लाज से दोहरी हो गई क्रिस्टीना ।


दृष्टि उठा न सकी !
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 19:13

विजय न पूछा----" तुम पर कहां से आ गये ?"


इस प्रश्न पर क्रिरुटीना बौखला गई । फिर स्वयं को संभालने का प्रयास करती हुई बोली---"मुझे मालूम था न भैया कि ये आ रहे हैं । यह भी पता था कि सफेद के अलावा किसी रंग का कपडा नहीं पहनते है ! सो...........सो मैं खरीद.....।


बात पूरी न कर सकी क्रिस्टीना । हलक सुख गया उसका !


'"यह्र तो बड़ा अच्छा किया तुमने । वतन सीधा क्रिस्टीना से बोला---;-"कपडे बदलना मेरे लिए इस समय किसी भी कार्य से अधिक आवश्यक है । अगर कपडे मैं नहा… कर बदलूं तो ओर भी अधिक अच्छा रहे ।"



यह अनुभूति करते ही कि यह वाक्य बतन ने सौधा उसी कहा है क्रिस्टीना का दिल जोर-जोर से धड़क उठा !


बीच में टपक पड़ा विजय---"क्यों" नहीं-क्यों नहीं बटन प्यारे, नहाना जरूर, चाहिये । आओ, मैं तुम्हें बाथरूम दिखाता हूं !



सोफे पर से उठकर खडे हो गये विजय की कलाई पकडी विकास ने एक झटका देकर सोफे पर विजय को वापस विठाता हुआ विकास वोला------"अाप बैठो गुरु, क्रिस्टी वतन को बाथरुम बतला देखी !"

"'अजी नहीं !" विजय ने खड़े होने का अभिनय किया ---"हम बतायेंगे !"
"'नहीं गुरु !" विकास ने वापस खीचा



-"अजी नहीं ।'" विजय ने पुन: उठना चाहा तो इस बार विकास के साथ बागारोफ ने भी विजय को पकड़कर खींचते हुये कहा…"अबे बोलती पर ढक्कन लगा ढक्कनी के ! मुहब्बत की खिचडी पक रही है तो पकने दे । तु क्यों दालभात में मूसलचन्द बनता है ? जा छिनाल की ताई-तू दिखा इस भूतनी वाले को बाथरूम का रास्ता ! इस चिडी के नटवे को हमने पकड़ रखा है !"



विजय की इस एक्टिंग पर वतन और क्रिस्टीना भी बिना मुस्कराये नहीं रह सके ।



-"'आप भी खूब हैं चचा !" कहता हुआ वतन उठ खड़ा हुआ-" मैं नहाने जा रहा हूँ ! क्रिस्टोना----बताना बाथरुम ।"



दृष्टि झुकाये कमरे से बाहर की तरफ चल दी क्रिस्टीना ।

उसके पीछे वतन था !


रहरहकर विजय विकास और बागारोफ के बन्धनों से मुक्त होने का प्रयास कर रहा था----साथ ही चीख रहा था -------"अबे छोडो मुझे ! बटन को बाथरुम का रास्ता मैं दिखाऊँगा !



"काँफी पी चटनी के वर्ना गंजा कर दूंगा ।" बागरोंफ उसे रोकता हुआ बोला !



दरवाजा पार करके वतन और क्रिस्टीना ओझल हो गये । तो ढीला पड़ गया विजय । बागारोफ की तरफ देखकर नाराजगी जैसे शब्दों में बेला-"ये तुमने अच्छा नहीं किया चचा मेरे पेट में दर्द होने लगा है ।''

" अबे चुपचाप कॉफी पी चोट्टी के ।"


कप उठकर कॉफी का एक पूंट भरा विजय ने और फिर विकास से वोला…"तुम्हें तो मैं भुगत लूँगा दिलजले !"


इधर यह मोज-मस्ती आ रहीं थी और उधर…वतन और क्रिस्टीना ?



उसके पीछे-पीछे चल रहा था वतन ! गर्दन झुकाये क्रिस्टीना धीरे-धीरे चली जा रही थी !
अचानक वतन दो लम्बे कंदमों के साथ उसके बराबर में अा गया !

उसके साथ चलता हुआ बोला--" क्रिस्ट्री !"



ठीठककर, दृष्टि झुकाये हुए ही क्रिस्टीना ने कहा…" जी !"



"मेरी तरफ देखो ।" उसके समीप ही खड़े वतन ने गम्भीर स्वर में कहा ।



न जाने कैसी शक्ति थी वतन में कि क्रिस्टीना कों धडकता हुआ दिल उसकी पसलियों में टकराने लगा है ! कम्पित से नेत्र उठे ! ऊपर, वतन के चेहरे की तरफ़ देखा उसने ! एक अनजाने से आदेशबश उसका सारा शरीर कांप रहा था ।


"त----तुम मुझे कैसे जानती हो !" वतन… ने गंभीर स्वर में पूछा ।


हलक सूख-सा गया था क्रिस्टीना का उसने वोलना चाहा है किन्तु स्वर अधरों से बाहर ना निकला !

"जवांब दो क्रिस्टीना-"कैसे जानती हो तुम मुझे ?"


क्रिस्टीना ने साहास समेटा धीमे स्वर में बोली…आपकौ कौन नहीं जानता ?"


"जो मुझे जानता है वह मेरी पूरी कहानी से भी परिचित होता है !"


" अनभिज्ञ मैं भी नहीं !"




" फिर भी मेरी तरफ इस विशेष दृष्टि की त्रुटि क्यों कर रही हो तुम ?" शान्त सागर जैसे गंभीर स्वर में वतन …" तुम भी तो जानती होंगी कि मैं उन अभागों में हूं जिससे जो प्रेम करेगा वह मृत्यु की गोद में सो जायैगा !" क्रिस्टीना देख रही थी-बोलते हुये वतन के मस्तक पर बल उभर आया था ---- वह कह रहा था---" अपने परिवार से प्रेम था मुझे अपनी मां से, बहन और पिता से मगर वे जीवित न रहे ! बूढी दादी मां से प्रेम करके उसे भी मार डाला मैंने अब----अव किसी से प्रेम करना नहीं चाहता । किसी को मारना नहीं चाहता ! किसी के भी प्रति मेरे ह्रदय मे प्रेम उमड़ने का तात्पर्य हैं, उसके लिये मृत्यु का सृजन करना ! मैं ओर अधिक हत्यायें नहीं, कर सकता ।"
"आपकी यह धारणा त्रुटिपूर्ण है !" क्रिस्टीना ने धीरे से कहा--- "आपके ह्रदय का भ्रम मात्र !"


"नहीं क्रिस्टी ये भ्रम नहीं, सत्य है !" वतन ने कहा---"कठोर सत्य है कि जिससे मैं प्रेम करूंगा, वह जीवित नहीं रह सकेगा क्रिस्टी !" वतन की आवाज भर्रा गई---" मैं और अधिक धाव न सह सकूगां ! मैं तुम्हारे प्रेम का उत्तर प्रेम से नहीं दे सकुंगा !"




"उतर की अभिलाषा किसे है ?" क्रिस्टीना ने कहा --- ईश्वर का उपासक यह कब चाहता है कि ईश्वर उसकी उपांसना करे ?"

" समझने का प्रयास करो क्रिस्टी !"


"यह प्रयास करने की आवश्यकता आपको है !" कहने के साथ ही क्रिस्टीना आगे बढ़ गई । बाथरुम की ओर सकेंत करके बोलीट---"वह बाथरुम है, उसी के अन्दर अपके कपड़े भी उपस्थित हैं ! नहाकर परिवर्तित कर लीजिएगा ।"



वतन उसे देखता रह गया !



सिर झुकाये वह तेजी से गैलरी में बढ़ी जा रही थी ।


"क्रिस्टी !" वतन ने पुकारा !"


ठिठकी क्रिस्टीना, मुड़ कर वतन की अोर देखा । कम्पित स्वर में बोली-"क्षमा करें, आपके उत्तर की अभिलाषी, नहीं मैं !"



"मैं तुम्हें कुछ समझाना चाहता हूं !"



" यही न कि ईश्वर की उपासना त्याग दूं मैं ?" धीरे से क्रिस्टीना ने कहा--------परन्तु क्षमा करें । चमन पर शासन होगा आपका । चमन के नागरिकों के हृदय पर भी राज्य करते हैं आप--किन्तु क्रिस्टी के ह्रदय पर आप का कोई अधिकार नहीं है !

क्रिस्टी अंपने मनो-मस्तिष्क में किसी भी प्रकार के विचारों को स्थायित्व प्रदान करने हेतु स्वतन्त्र है । यह कहने का आपको कोई अधिकार नहीं कि अपने ह्रदय में ईश्वर की उपासना के विचारों को त्याग दूं । यह मुझ पर अत्याचार होगा और अत्याचार सहना क्रिस्टी का काम नहीं है !" कहकर वह मुडी और आगे बढ़ गयी !



" सुनों क्रिस्टी, मेरी बात सुनो ।" वतन ने पुकारा !

परन्तु इस बार रुकी नहीं क्रिस्टीना, पूर्ववत आगे वढ़ती चली गई !
अपने स्थान पर खडा वतन उसे उस समय तक देखता रहा जब तक कि गैलरी के मोड़ पर घूमकर ओझल न हो गई । वतन के मस्तक पर पड़ा बल गहरा हो गया । फिर न जाने किन विचारों के वशीभूत उसका चेहरा सुर्ख पड़ गया ।


सुर्ख चेहरा लिये वह लम्बे-लम्बे कदमो के साथ बाथरुम में समा गया !



उधर जब क्रिरुटीना ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया ।


नारा-सा लगाया विजय ने---" तो पक गई प्रेम की खिचडी ?"



" आपका तो हर सम्य मजाक सूझा करती है विजय भैया !" कहती हुई सोफे अर बैठ गई क्रिस्टीना ।


कॉफी का मग उठाया उसने और होंठो से लगा लिया ।


इधर उसने एक घूंट लिया और उधर विजय ने कहना शुरू किया------------"'मजाक नहीं क्रिस्टी इस गंजे चचा की कसम ।" विजय के स्वर में बंनावटी गम्भीरता थी------------"ये इस्क का रोग बडा भयानक है । एक बार हमें कल्लो..."




"अबे चुप !" बीच में ही डाटा बागारोफ ने---"तू साले क्या जाने कि…।"



"नहीं चचा, पिछले जन्म में कान्ता से इश्क किया था गुरू ने !"

इस प्रकार तीनों ही ऊलजलूल बातें करते रहे । इधर उनकी कॉफी समाप्त हुई, उधर दूध जैसे सफेद कपडे पहने वतन प्रविष्ट हुआ ।



एकटक वतन के सौन्दर्य को देख रही थी क्रिस्टी ।


वतन उससे नजर बचाने का प्रयत्न कर रहा था !


.'"चचा ! विजय ने नारा सा लगाया---" मामला तो साला उल्टा हो गया है क्रिस्टी मर्द बन गयी अौर अपना बटन औरत !"
जलपोत ने बन्दग्गाह पर लंगर डाला तो कई सैनिक अंधिकारियों के साथ सांगपोक और सिंगसी भी जलपोत पर चढ़ गये । इस बात से उनका 'माथा' ठनका था कि डेक पर कोई भी आदमी नहीं चमका था !



एक साधारण-सी बात थी के कि जलपोत जब बन्दरगाह पर पहुंचे तो यात्री डेक पर आजाते हैं, मगर डेक सूना पड़ा था ! कल्पना तो उन्होंने यहीं की थी कि कम-से-कम हवानची को तो होना ही चाहिये था ।



किन्तु पह अप्रिय घटना क्या हो सकती है, यह बात सांगपोक के-दिमाग के दायरे से बाहर थी ।



यह विचार भी उसके दिमाग से चकराया था कि अगर रास्ते में कोई अप्रिय घटना घटी है तो जलपोत के सुरक्षित यहां पहुंचने का क्या मकसद है?



फिर भी सांगपोक ने सैनिकों को सचेत कर दिया ।


सर्थप्रथम वे चालक-कक्ष में पहुंचे ।।

दो चालकों को बुत की भांति अपनी सीटों पर बैठे पाया !


"क्या बात है इस तरह क्यों बठे हो तुम ?" -सांगपोक ने पूछा !



अपने साथियों को अपने पास देखकर उनके पीले चेहरों की रंगत बदली । उन्होंने बताया कि, उनकेसभी साथियों को एक कक्ष में बन्द कर दिया गया है ।



विजय ने उन्हें जलपोत चलाते रहने का आदेश देते हुए यह कहा था कि अगर वे एक पल के लिये भी सीट से उठे अथवा अन्य किसी प्रकार की अनुचित हरकत करने की चेष्टा की तो वह टी.बी हाल में बैठा उन्हें देख रहा है । इसी डर से उनमें से कोई हिला तक नहीं ! जलपोत को सीधा यहाँ ले आये । अब भी बुत के समान इसीलिये बैठे थे, क्योंकि, उनकी दृष्टि में उन पर नजर रखी जा रही थी !
उनके उलटे-सीधे बयान से सांगपोक समझ गया कि रास्ते में जलपोत पर क्या घटना घटी है !


सिंगसी और कई अन्य अधिकारियों सहित सांगपोक टी वी हॉल की तरफ वढ़ गया है ! वहां पहुंचने के लिये पहले वे उस हॉल से गुजरे जिसमें वतन ने व्यूह का कमाल दिखाया था !




वहाँ की स्थिति कां निरीक्षण करता हुआ साँगपोक अनुमान लगाने का प्रयास करने लगा कि क्या कुछ हुआ होगा !!
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 19:13

तबजबकि वे टीवी हाँल में पहुंचे !

कई अधिकारियों के कण्ठों से तो चीखें निकल गई । सांगपोक और सिंगसी के माथे ठनक गये !

आंखों में खून उतर आया ।



दृश्य देखने वाले चीनी अधिकारियो के शरीर-कांप रहै थे !!

एक डरावनी सिहरन उनकी आखों में आबैठी थी ।।

दृश्य ही ऐसा था कि बडे-से-बडे दिलके इन्सान भी कांप उठे ।


सारे हॉल में अनेक चीनी सैनिकों के "जिस्म उल्टे लटके हुये थे । रेशम की डोरियों के सिरे हाँल की छत पेर वंदे थे ! उन्हीं डीरियों में बंधे उल्टे लटक रहे थे चीनी सैनिक !


उनके सिर हॉलके फर्श से ठीक सात फीट की ऊंचाई पर पे । सभी बेहोश सभी के माथों पर से खून की बूंदें फर्श पर टप-टप करके गिर रही थीं ब्लेड द्वारा सभी के माथों से गोश्त
नोचकर लिखा गया था --- विकास--

विकास--विकास--विकास--विकास--


सांगपोक के दिमाग में हथोड़े की भाति यह नाम बजने लंगा ।



हॉल का सारा फर्श खुन की बूदों से अंटा पडा था ! एक -दृष्टि में वे सब लटके हुए शरीर लाश-से ही प्रतीत हो रहे थे ! सर्वाधिक्क गम्भीर हालात हबानची की थी !



उसके मस्तष्क पर भी विकास लिखा था ।


आभास होता था कि कोई रहस्य उसके मुँह से उगलबाने के लिये उसे भयानक रूप से यातनाएँ दी गई है ।

विकास--विकास--विकास--
सागपोक के आदेश पर हबानची और सभी सैनिकों को उतारा जाने लगा ।।


किन्तु लाशों के उतरने से पहले ही कई पत्रकारों ने वहां पहुंचकर वह भयानक दृश्य अपने कैमरे के अंदर, कैद कर लिया ।।


सांगपोक गम्बीर था बेहद गम्भीर ।

उसकी नसों में दौड़ता खून उबल रहा था !!


सिंगसी को वंही छोडा उसने, दो अधिकारियों कों अपने साथ लिया ।


जलपोत की सबसे निचली मंजिल के कमरा नंम्बर दस तक पहुंच गया वह । कमरे के बन्द दरबाजे पर उसे एक कागज चिपका नजर आया ! उस कागज को पड़ा उसने।।

उसमें लिखा था---



बेटे सागंपोक !


इस कमरे के अंदर तुम्हारे पिट्ठु मौजूद है ! तुम्हारी सहायता के लिये छोड़े जा रहा हूं !!! यह बात जानकर कर बेहद खुशी हुई कि तुम फिल्में ले गये हो !

फिल्में हमें इसी जलपोत पर मिल जाती तो बेहद दुख होता ।। जानता हूँ कि यह जलपोत चीन पहुचेगा और मेरे इन शब्दों को तुम पडोगे भी अवश्य । अच्छी तरह समझ लो कि जिस समय तुम ये शब्द पढ़ रहे होंगे उस समय मैं तुम्हारे ही देश में कहीं हूं । सम्हलकर रहना !! रोक सको तो रोक लेना !! तुम्हारे देश में तुफान मचाने आया हूं । तुम्हें चैलेंज देता हूं---------चीन से अपनी फिल्में निकालकर ले जाऊगाँ !! तुम तो क्या पूरी चीन सरकार मुझे नहीं रोक सकेगी !!

तुम जैसे दरिन्दे,, अहिंसा के उपासक को हिंसा अपनाने पर विवश करते है !
uttarakhandi
07-10-2016, 10:33 PM
हे भगवान ,


इतनी ऊर्जा लाती कहाँ से हैं आप , आज ३१ पेज पढ़ डाले । मैं तो पढ़ कर ही थक गया और आप पोस्ट करते नहीं थकीं ।

हे भगवान ,


इतनी ऊर्जा लाती कहाँ से हैं आप , आज ३१ पेज पढ़ डाले । मैं तो पढ़ कर ही थक गया और आप पोस्ट करते नहीं थकीं ।


हा हा हा

पता नहीं जी
बस अभी ये उपन्यास पूरा हो जायेगा
३७ पन्ने ही बचे बस

वतन !

----- वतन ----- -----वतन ----- वतन
----- -----वतन ----- -----वतन
----- वतन----- -----वतन ----- वतन


सांपपोक ने उस कागज को पढा ! पढ़ कर रोंगटे खड़े हो उसके ।


उसके आदेश परे दरवाजा खोला गया ।
सांगपोक ने उस कागज को पढ़ा ।


पढ़कर रोगंटे खड़े हो गये उसके ।



उसके आदेश पर दरबाजा खोला गया ।


" नुसरत !" उसे देखते ही तुगलक बोला उठा था --" हमारे आका आगये !"



" आका !" कहता हुआ आगे बढ़ा नुसरत ! वह अभी----अभी सांगपोक के पैरों में झुकने हो बाला था कि साँगपोक ने कठोर स्वर में चेतावनी देकर उन्हें रोक दिया ।


जेम्स बाण्ड चुपचाप सांगपोक की तरफ देख रहा था !


पोक ने कहा-“आश्चर्य की बात है कि बाण्ड जैसा महान जासूस इस चूहेदानी में कैद है !"


जल उठा जैम्म-बाण्ड, बोला…"जिन्होंने हमें यहाँ कैद किया है जब तुम उनके चंगुल में र्फसोंगे तो पता लगेगा ।"

हल्की सी मुस्कान दौड गई गांगपोक के होंठों पर, बोला----"खैर जो हो गया ठीक है, ।किन्तु फिलहाल मैं तुम्हारी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाता हूं !"




"जब तक फार्मूले की फिल्में हमारे बीच है तब तक शायद हमारे नीच दोस्ती नहीं हो सकेगी !"




"फिल्में हमारे पास सुरक्षित है मिस्टर बाण्ड !" पोक के दिमाग में एक योजना आ गई थी और वह उस योजना के आधार पर बातें कर रहा था-----"विजय और वतन यहां से विकास और बागारोफ को निकालकर ले गये और तुम्हें यहीं छोड़ दिया । इसका सीधासा तात्पर्य है कि बे बागारोफ को अपना दोस्त समझते हैं और तुम्हें दुश्मन शायद अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के हिसाब से उन्होंने यह निर्णय लिया है !"



"क्या कहना चाहते हो ?"



"अगर उनकी दृष्टि. से सौचें तो हम दोस्त है ।"' सांगपोक ने कहा …"अगर वे सब हमारे विरुध्द एक हो सकते हैं तो हमें चाृहिये कि एक जुट होकर हम भी उनके खिलाफ खड़े हो जायें । दोस्त बनकर दुश्मनों का मुकाबला करें ।"



एक पल वाण्ड ने कुछ सोचा है शायद यह कि इस समय पोक अपनी दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है । उसे स्वीकार कर लेना ही हितकर है । सम्भव है कि पोक के साथ चीन में रहकर वह फिल्मों का पता निकाल सके !



एक ही पल में इन सच बातों पर विचार कर गया वह, बोला----मुझे आशा नहीं थी कि तुम इतनी समझदारी की बात करोगे !”

पोक की आंखें' चमक उठी ।
सांगपोक मुस्कराया, बोला---" इसका मतलब दोस्ती मन्जूर है तुम्हें ?"



" अगर यह सच्चे दिल से की जा रही है !" बाण्ड मुस्कराया !



फिर --दोस्त बन गये वे । नुसरत और तुगलक भी उनके साथ थे ! "



उसी शाम सांगपोक चीनी सीक्रेट सर्विस के साऊण्ड प्रूफ कमरे में अपने चीफ के सामने बैठा था । चीफ़ उससे कह रहा था ----" सुना है जेम्स बाण्ड, नुसरत और तुगलक को तुमने 'हाऊस' में ठहरा दिया है ?"




--""जी हां ।"



"ऐसा क्यों किया तुमने ?" चीफ ने पूछा----" वहाँ तों अतिथियों को ठहराया जाता है । वहां से तो कोई भी आसानी के साथ निकलकर भाग सकता हैं । इन्हें तो किसी सुरक्षित और गोपनीय स्थान पर कैद करके रखना चाहिये था ।"




"इस समय बे हमारे अर्तिथि हैं चीफ ! वे कहीं नहीं भागेॉगें !"




" क्या मतलब ?"

" मतलब ये चीफ कि विजय, वतन और विकास चीन में आ चुके हैं । रूसी बागरोफ को भी अपनी सहायता के लिए उन्होंने साथ ले लिया है । यूं तो विजय और विकास से ही हमारा देश परेशान है !---अब इनमें एक शैतान और बढ गया हैं--------वतन । उसका कहना है कि चीन में तबाही मचाने आया है वह ! इन सबका मुकाबला करने के लिए बाण्ड, नुसरत तौर तुगलक की सहायता लेने में क्या बुराई है ?"





" मगर वे तुम्हारी मदद करेंगे क्यों ?"




" कियुकि उन्हें उन फिल्मों की अावश्यकता है !" -सांगपोक ने कहा-" ऐसी बात नहीं है चीफ कि मैं कुछ समझता नहीं हूं । मुझे सब पता है कि जेम्स बाण्ड ने मेरी दोस्ती क्यों क्यों स्वीकार कर ली है ।"



-"'क्यों ?"
" अगर वह हमारी दोस्ती स्वीकार न करता तो क्या होता ? यही न कि हम उसे कैद कर लेते ? मैं जानता हूं कि इस हकीकत को बाण्ड अच्छी तरह समझता है । उसने सोचा कि कैद में पड़कर क्या होगा ? दोस्ती स्वीकार करके यह मेरे साथ रहेगा तो शायद किसी तिकड़म से उन फिल्मों का पता क्या सके ।"




" निश्चित रुप से बाण्ड जैसे व्यक्ति कें दिमाग में यह विचार आना -------स्वाभाविक सी बात है।"



-"और यही लालच उसे यहां से फरार नहीं होने मैं देगा !"

"क्रिन्तु अगर वह किसी दिन वास्तव में फिल्मों तक पहुंच गया तो ?" चीफ ने संभावना व्यक्त की ।




"जब स्वयं मैं ही नहीं जानता कि फिल्में कहाँ हैं तो उनके पहुंचने का प्रश्न ही कहां उठता है ?" कुटिलता के साथ मुस्कराते हुए पोक ने कहा----"फिल्में सुरक्षित लाकर मैंने
आपको दे दी । यह मैं स्वयं नहीं जानता कि आपने ये कहाँ पहुंचाई हैं ?"



" अब तुम्हारी योजना क्या है?"



" मैं उनसे कह आया हूँ कि सात बजे उनसे मिलने आऊंगा,, साढे छ: वजाती हुई रिस्टवाच को देखता हुआ सांगपोक बोला- मै उनसे कहूगा कि वे हमारे मित्र राष्ट्र के जासूस हैं : अगर वे विजय इत्यादि के खिलाफ हमारी सहायता करेंगे तो हम उनके राष्ट्र को वेवज एम और अणुनाशक किरणों का फार्मूला अवश्य देंगे ।। इस झांसे में फसाकर मैं उन्हें अपनी मदद के लिए तैयार कर लूंगा । अन्त में उन्हें किस तरह का फार्मूला मिलेगा आप समझ सकते हैं !"


''हमें तुम पर पूरा भरोसा है ।" चीफ ने कहा ।।



"न जाने हैरी कहा गायब हो गया ?" पोक ने कहा---" वह होता तो उसे भी इसी झांसेमें लेकर अपना दोस्त वनाया जा सकता था । वह वतन और विकास की टक्कर का लडका है ।"


" खैर--हां, हवानची का क्या हाल है ?"



" अब तो ठीक है वह है सात वजे वह और सिंगसी भी बाण्ड के पास हाउस में पहुंच रहे है ।"

इस प्रकांर कुछ देर और आवश्यक बातें करने के बाद सांगपोफ खड़ा होगया।
चीफ ने उसे जाने की इजाजत दे दी !


वहाँ से निकलकर वह ठीक सात बजे हाउस पहुँचा !


कमरे में बाण्ड, नुसरत और तुगलक के साथ उसने हबानची और सिंगसी कौ भी अपनी प्रतीक्षा में पाया !


हबानची के सिर पर एक हैट था । काफी हद तक उसने हैट का अग्रिम भाग अपने मस्तिष्क पर झुका रखा था । सम्भवत: इसलिए कि उसके माथे पर लिखा 'विकास' नजर न आए ।



उनके सामने मेज पर शाम को पीकिंग से निकलने वाले करीब करीब सारे अखबार पड़े थे !


सभी में जलपोत के टी वी हाँलं का दृश्य छपा था । चीन में विकास के आगमन की खबर को प्रत्येक अखबार ने अपने ढंग से नमक -मिर्च लगाकर छापा था !


एक अखवार में' तो विशेष रूप से हवानची का फोटों छपा था । उसके माथे पर लिखा था 'विकास' !



"चीन के अन्दर विकास का आधा आतंक तो तुम्हारे देश के ये अखबार फैला देते है ।" जेम्स वाण्ड ने कहा…......."विकास का सिद्धांत है कि वह जहाँ जाता है, पहले वह अपने’ नाम का टेरर फैला देता है ! उसी उदेश्य से उसने टी बी हाँल में सैनिकों को उल्टा लटकाया था उनके माथे पर अपना नाम लिखा था । इन अखबोरों में तो वतन का वह पत्र भी छपा है जो उसने तुम्हारे नाम लिखकर क्रमरे के दरवाजे पर चिपका दिया था !"


"तुम ठीक कहते हों । विकास उतना है नहीं जितना ये अखबार चीनी जनता के सामने उसका हब्बा बना देते है !"

"तुम्हारी सरकार को अखबारों पर सैसर लगाना चाहिए है" बाण्ड ने राय दी…"आदेश हो कि विकास से सम्बन्धित कोई भी अखबार किसी तरह का समाचार न छापे इन समाचारों से होता ये है कि चीनी जनता विकास के आगहन को ही अपने दश के विनाश का द्योतक समझ लेती ।"
" अखबारों पर सैसंर लगाना हमारा काम तो नहीं !" सांगपोक ने कहा--"सरकार का काम है। विषय मे जब वह ही कुछ नहीं सोचती तो हम क्या करें ?"
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 19:14

"सीकेंट सर्विस के माध्यम से तुम्हें अपनी सरकार से मांग करनी चाहिए !" बाण्ड ने कहा… "तुम्हें दलील देनी चाहिए कि अखबार कुछ इस तंरह विकास का टैरर जनता में फैलाते हैं कि साधारण जनता विकास के विषय में कुछ बताते हुए डरती है और तुम्हें परेशानी होती है, इत्यादि ।"


"इस विषय पर मैं स्वयं सोच रहा था !" पोक ने कहा…"लेकिंन यहां हमारी बातों का विषय है कि हम सव को मिलकर बिकास, वतन और विजय का मुकाबंना करना है । आज दिन में मैंने अपने चीफ से बातें कर ली हैऔर उन्होंने एक ऐसा आश्वासन दिया है जिससे हमारी दोस्ती और मजबूत होगी !"



" कैसा आश्वासन ?"



" "यह कि अगर आप उनके खिलाफ हमारी मदद करें तो हमारा देश आपके देश को वतन के दोनों फार्मूलों की नकल दे देगा ।"



एक क्षण ध्यान से सांगपोक के चेहरे को देखने के बाद बाण्ड ने 'कहा-१…"अगर ये सच है तो हम तुम्हारी मदद के लिए तयार हैं ।"



" गुड !" पोक ने कहा ----"अब, एक बार… सिर्फ यह पता लग जाये कि चीन में वे लौग हैं कहां ?" इस बार हमारा प्रयास ये होगा कि उनमें से किसी की लाश भी चीन से बाहर न जा सके । हम दुनिया से उनका ड़र हमेशा के लिए समाप्त कर देना चाहते हैं !"

"क्या मैं भी आप लोगों का दोस्त बन सकता हूँ ?"



एक नई आवाज ने सबको चौका दिया ।


पलटकर सभी ने दरबाजे की तरफ देखा । दरबाजे पर हैरी मुस्करा रहा था !



" हैरी !" पोक एकंदम खड़ा हो गया----"तुम यहां कैसे पहुंच गए?"
" किसी भी जासूस के लिए कही भी पहुंच जाना शायद बहुत आश्चर्य की बात नही है !" कमरे में प्रविष्टि होता हुआ हैरी बाला--"संर्वप्रपम वतन की प्रयोगशाला में प्रविषट होने वाला मैं ही था , किन्तु विकास ने चमन में ही मुझे कैद कर लिया ! मेरे मेकअप में उसने स्वयं फिल्में गायब की । मुझे अलफांसे की सुरक्षा में कैद कर लिया गया ! किसी प्रकार मैं उसकी कैद से भांग निकला ! सबकुछ पता लगाया। यह भी पता लगाया कि डैडी के मेकअप मे मुझे लेने बाण्ड अकंल अकेले चमन आए थे , फिल्मों के चीन तक पहुचने की सारी कहानी पता लगी । लिहाजा मैं यहां अागया । फिल्मों का पता के चक्कंर में ही तुम्हारा पीछा कर रहा था कि तुम्हारी बातें सुनी । सोचा कि मैं भी दोस्त बनकर उस फार्मुले की नकल अपने देश तक पहुचा दू तो उचित रहेगा । यही सोच- मैं सामने आगया । "





--"तुमने बहुत अच्छा किया है हमारे बीच तुम्हारी ही कमी थी ।" पोक ने कहा…" भारत और रूस, चीन और अमेरिका के हमेशा ही खिलाफ रहे है है । इस अभियान में भी , उन दोनों देशों के जासूस मिलकर काम कर रहे हैं । हमें भी एकजुट होकर उनका मुकाबला करना चाहिए ।"




-"तुम्हारा यह प्रस्ताब पसन्दआया तभी तो मैं सामने आया ।" हैरी ने कहा…वर्ना एक दुश्मन जैसे ढंग से फिल्में प्राप्त करने के लिए मैं तुम्हारा पीछा कर रहा था । अगर तुम, अमेरिका को भी उस फार्मू्ले की नकल देने, के लिए तैयार हो तो मैं तुम्हारे साथ आ सकता हूं !"

जेम्स बाण्ड, जो हैरी के आगमन पर अभी तक कुछ नहीं बोला था । वह चुपचाप बहुत ध्यान से हैरी का चेहरा देखे जा रहा था ।। इधर सांगपोक हैरी से कह रहा था----हमारी सरकार ने अपने. मित्र राष्ट्रों को नकल देने का निश्चय कर लिया है ।"



इससे पूर्व कि हैरी कुछ बोले, जेम्स बाण्ड ने कहा-----" तुमसे कोई भी समझौता करने से पूर्व मैं कुछ बातें करना चाहता हूं हैरी?"


" जरूर कीजिए अंकल !"



"ये तो तुम्हें मालूम है ही कि चीन में इसं समय, विजय, विकास, वतन इत्यादि मौजूद है और वे......."



" कोई भी मेकअप कर लेने के मामले में उस्ताद है ।"
मुस्करते हुए हैरी ने बात पुरी की ---" सही भी है । आपको इस तरह अचानक मुझ पर विश्वास भी नहीं करना चहिए ।। जिस तरह भी अाप चाहे अपनी तसल्ली कर सकते हैं ।"



" इस प्रकार बाण्ड ने हर प्रकार से जांच की और पाया कि हैरी ही है तो बोला--"बैठ जाओ ।"



फिर उनके बीच इस विषय को लेकर बार्तालाप होने लगाकि विजय, विकास, वतन और बागारोफ से किस प्रकार निपटा जाये ।। पहले तो यंही प्रश्न उठा कि यह कैसे पता लगे कि इतने वडे़ चीन में वे हैं कहां ?

किन्तु पता लगाने का कोई उचित तरीका उनके दिमाग में नहीं आया । तब हैरी ने कहा----" वे लोग चीन में हैं और जब तक चुपचाप बैठे हैं, तब तक तो किसी भी प्रकार उनके ठिकाने का पता लग ही नहीं सकता। किंतु हां यह एक स्वाभाविक-सी बात है कि वे यहाँ चूप नहीं बैठेगे ।। बात अगर सिर्फ विजय अंकल की होती तो यह सोचा जा सकता था कि वे दिमाग से काम लेंगे और उसी समय कोई हरकत करेंगे' जब उन्हें पता सग जायेगा कि फिल्में कहां है ,, किंतु न विकास शांति से बैठने वाला है, न वतन । वे अवश्य ही कोई हंगामा करेंगे । बस, उनके मैदान में अाते ही हमारा काम आसान हो जायेगा ।'"




’इस प्रकार की बातों के पशचात् बारह बजे यह मीटिंग समाप्त हुई ।


सांगपोक ने हैरी के रहने का प्रबंध भी हाउस में कर दिया ।।


रात के करीब दो बजे के करीब सांगपोक अपने बिस्तर पर लेटा । लेटते ही अपने जिस्म में उसे कुछ खुजली सी महसूस हुई । फिर वह अपने जिस्म की बुरी तरह खुजलाने लगा ।




" हम खुजलां दें पोक बेटे !"' इस एक आबाज ने उसके सारे शरीर को जडवत् सा कर दिया ।



उसने देखा-दखते ही रोंगटे खड़े हो गए उसके । पर्दे के पीछे से विकास प्रकट हुआ था !




बेड पर से उछलकृर वह फर्श पर खड़ा हुअा तो बेड के नीचे छूपे किसी व्यक्ति, ने उसकी दोंनों टागें पकड़कर खींच दी । धड़ाम से मुंह के बल बह फर्श पर गिरा ।
अगले ही पल बेड के समीप वतन खडा हुया था-सफैद कपडे, आखों पर काला चश्मा, हाथ में छड़ी ।

जबरदस्त फुर्ती के साथ पुन: उठकर खड़ा हो क्या था सांगपोक ।


उसने देखा…दो तरफ से घिरा हुआ था वह ।


** दोनों तरफ बराबर की लम्बाइयों वाले लड़के । मानो कामदेवों ने एकाएक यमराज का रूप धारण कर लिया हो । सांगपोक उनके बीच स्वयं को नर्वस सा महसूस कर रहा था ।



उसके जिस्म में खुजली उठी और पागलों की तरह खुजाने लगा ।


वतन और विकास ठहाके लगाकर हंसने लगे ।



सांगपोक के मुंह से खून बहने लगा था । अपने जिस्म को पागलों की तरह वह नोचे चला जा रहा था ।


फिर वतन ने छड़ी में से मुगदर निकाला । झन्नाता हुआ एक बार उसने सागपोक की छाती पर किया, मुंह के बल गिरा तो विकास की ठोकर सहनी पडी़ ।



इस प्रकार-सागपोक पर दोनों ही पिल पड़े । उनमें है किसी ने भी सांगपोक को सम्हालने का मौका नहीं दिया । एक तो वह स्वयं ही खुजली से परेशान था ,ऊपर में उन्होंने उसे दबोच लिया । पोक कुछ भी न कर सका । मारते-मारते विकास ओर बतन ने उसे अधमरा कर दिया ।



अन्त में रोते-गिडगिडाते पोक को वतन ने पंखे पर उल्टा लटकाया और पूछा कि फिल्मे कहां है ? पोक ने जवाय नहीं दिया तो राक्षस बन गया विकास है ब्लेड निकाल कर उसने
पोक की सारी खाल नोंच डाली । नाखूनों की जडें काट दीं । कान काट लिए । माथे पर अपना नाम लिख दिया ।।

बेहोश होने से पूर्व पोक ने उन्हें बताया कि फिल्में उसने अपने चीफ को दे दी हैं । बस, इससे आगे फिल्मों के विषय में उसे कुछ पता नहीं है । विकास को क्या पता था कि वह बेचारा सच बोल रहा है ? वह तो यही समझा कि पोक असलियत छुपा रहा है अत: उसकी और अधिक खातिरदारी करने लगा ।


उस समय विकास को यकीन हो गया कि पोक ने वह बता दिया है, जव पिटता पिटता पोक मृत्यु से कुछ ही दूर रह गया !



फिर उसकी कोठी के मुख्यद्वार के बीच पोक के बेहोश शरीर को वे उलटा लटकाकर चले गये ।

अगली सुबह पूर्ण चीन में आतंक छाया हुआ था ।


अखबारों के कॉलम विकास और वतन के नामों से रंगे पडे़ थे !



अपनी कोठी के मुख्यद्वार पर न सिर्फ पोक का जिस्म उल्टा लटका पाया था, बल्कि करीब-करीब उसी स्थिति में सिंगसी और पचास सैनिक अधिकारियों के जिस्म पाये गये थे ।



चीन में इस प्रकार का आतंक जैसा किसी छोटे-से गांव में शेर के प्रविष्ट हो जाने पर फैल गया हो !!



उसी सुबह क्रिस्टीना के ड्राइंगरूम में बैठा विजय कह रहा था… तुम साले मानोगे नहीं, भला रात यह सब करने से फायदा क्या हुया ?"



"अबे चुप रह चटनी के, बच्चों को करने दे जो कर रहे हैं !"

"चचा, तुम भी इन्हें समझाने से तो गए, शै देते हो है" विजय ने कहा !


इससे पूर्व किह बागरोफ कुछ बोले, गम्भीर स्वर में वतन ने कहा-"क्रिस्टीना ने मुझे सब कुछ बता दिया है चचा ! मैं और विकास -यह समझते रहे कि हम दोनों रात को तुम्हें धोखा देकर यहां से निकल गए थे, मगर वास्तविकता ये थी की अाप न सिर्फ जाग रहे थे, वल्कि जहां-जहा हम गए वहां आप भी हमारे पीछे गये थे और हमसे पहले यहां आकर पुन: सौने का नाटक किया ।"




--'"अबे तो और क्या करता ?" विजय भडंक उठा -----"हमने तो सालो तुम्हारी सुरक्षा का ही ठेका ले लिया है !"



इससे पूर्व कि विजय की इस बात का कोई जवाब दे पाता, दरवाजे पर दस्तक हुई । 'सव एकदम चुप हो गए ।



क्रिस्टीना ने पूछा…"कोन है ?"
"लैला का मजनू ।" बाहर से आवाज आई ।


'"लूमड़ !" कहकर विजय अपने स्थान से उठा और झपटकर दरवाजा खोल दिया । सामने देखा, तो हैरी खड़ा था । जहां हैरी को देखकर विजय भौचका रह गया, वहाँ क्रिस्टीना, बागारोफ और विकास के रिर्वाल्बर बाहर आ गये ।



इससे पूर्व कि कोई कुछ हरकत कर पाता, दरवाजे पर खडे हैरी के मुंह से अलकांसे का स्वर निकला---- " चेहरा हैरी का जरूर है, लेकिन हूँ मैं अलफांसे । इस रूप में मैंने अलकांसे की कैद से फरार होने का नाटक रचा है और दुश्मनों का दोस्त बन बैठा हूं ।"

उसे कमरे के अन्दर लेकर दरवाजा पुन: बन्द कर लिया गया ।
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 19:14

विजय के पूछने पर सोफ पर बैठकर अलफांसे ने संक्षेप में जो कुछ बताया, वह इस प्रकार था, "जब मुझे पता लगा कि फिल्में चीन पहुंच गई हैं तो मैंने भी यहां आने का निश्चय किया । अपनी असली सूरत में आने के स्थान पर मैंने यहां हैरी की सूरत में आना अधिक उचित समझा । सोचा कि इस अभियान के शुरू में हैरी ने मेरा मेकअप करके काम किया था, सो वह कर्ज उतार दूं । मैं पिशाच से मिला । हैरी को उसके हबाले कर दिया । चमन के राष्ट्रपति भवन के एक तहखाने में इस समय हैरी कैद है । पिशाच को मैं सब कुछ समझा, आया हूँ । उसी ने तिलस्मी चीजों का प्रयोग करके मेरे चेहरे पर यह मेकअप किया है । मैं कल यहां पहुच गया था । मैंने सोचा कि मुझे अपने ढंग से यह पता लगाना चाहिए कि फिल्में कहां हैं ? इसी मकसद से मैं पोक के पीछे लग गया ।, सात बजे पोक हाउस में ठहरे बाण्ड,-नुसरत और तुगलक से मिला है उस समय सिंगसी और हूानची वहीं थे । वहाँ मैंने उनकी बातें सुनीं। उनकी बातें सुनकर मेरे दिमाग में एक योजना पनपी । सोचा कि तुम लोग तो अपने ढंग से फिल्मों का पता लगाने के चक्कर में लगे हो ही, क्यों न मैं उनका साथी बनकर यह प्रयासं करूं?"
"'स्कीम तो तुम्हारी निस्सन्देह तारीफ के काबिल है लूमड़ भाई ! " विजय ने कहा----"लेकिन मेरे ख्याल से बाण्ड इतना बेवकूफ तो नहीं होना चाहिए कि वह तुम पर एकदम यकीन कर ले है क्या उन्होंने तुम्हारी जांच नहीं की ?"



" पिशाचनाथ द्वारा किया गया मेकअप क्या आज तक कीसी की जांच में आया है ?" अलफासे ने मुस्कराते हुए जवाब दिया !



" हूं----साला पिशाचनाथ अपनी तिलिस्म-दवाओं को ही लिए फिरता है ।"


इस प्रकार उनके बीच बातें होने लगी ।


एक घंटे बाद अलकांसे वहाँ से चला गया । वे पुन: बातों में लग गए । कोई ऐसी तरकीब सुझाई नहीं दे रही थी जिससे यह पता लग सके, कि फिल्में कहाँ हैं ?


और पुरे तीन महीने गुजर गए है ।-इन तीन महीनों में चीन के अन्दर क्या कुछ नहीं हुअा, परन्तु फिल्मों का फिर भी पता न लग सका ।

ये तीन महीने चीन के लिएं कहर के महीने थे ।।


हर रोज सुबह को अनगिनत ऐसी लाशें मिलतीं जिन पर विकास लिखा होता था । चीन की जनता और सरकार त्राहि-त्राहि कर उठी ।


चीन में होती इस तबाही की गूंज सिर्फ चीन में ही कैद होकर न रह गई थी वल्कि सारे विश्व में गूँज उठी थी ।


विकांस और वतन की एक ही माँग थी----' चीन चमन के चुराये हुए फार्मूले लौटाये !'



चीन सारे विश्व में प्रचार कर रहा था,, वतन और विकास उसके साथ क्या कर रहे हें किन्तु बीच-बीच में विश्व की टी.वीं स्क्रीनों पर जला हुआ वतन उभरता और चीन द्वारा किए गए प्रचार का खण्डन करता,कहता कि वह चीन से बदला अवश्य लेगा, किंतु अभी तक वह ठीक भी नहीं होपाया। चमन से बाहर भी नहीं निकला है ।


इधर चीन में ये दोनों शैतान इस कदर तबाही मचाये हुए थे कि सारा देश आतंकित पुतला बनकर रह गया था ।
हर सुबह चीन की सडकें लाशों से भरी पाई जाती । कभी एयरपोर्ट पर खडे विमान धु-धु, करके जलने लगते तो कभी अच्छी खासी जाती रेलगाडी एक धमाके के साथ उड़ जाती । हर दुर्घटना के पीछे किसी न किसी रुप में वतन और बिकास की माँग गूंज उठती ।




विनाश-बिनाश और विनाश…चारों तरफ विनाश फैला दिया उन लड़कों ने ।।




और इस समय वे क्रिस्टीना के ड्राईरूम में बैठे खिल खिलाकर हंस रहे थे ।

उनके चेहरों की मासूमियत को देखकर कोई कह नहीं सकता था कि उनसे आज पूरा चीन कांप रहा है । उनके अतिरिक्त ड्राइंगरूम मैं इस समय बागारोफ, विजय, हैरी के रूप में अलफांसे और क्रिस्टोना भी मौजूद थे । विजय कह रहा था… "मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि दोनों को इस विनाशलीला से क्या लाभ होगा ?"



''हमारे पास ऐसा कोई तरीका नहीं है गुरु, जिससे हम यह पता लगा सकें कि वे फिल्में कहां हैं ?" बिकास ने कहा--- "आज तीन महीने गुजरने के बाद भी हम पता नहीं लगा सके हैं । कम-से-कम यह तरीका हमारे पास है जिससे , हम चीन सरकार को फिल्में वापस करने पर विवश कर सकते है !"



"इस तरह भला वे फिल्में कैसे दे देंगे !"




…""उन्हें देनी पडेगी ।" विकास ने कहा----"हम इस देश की जनता को इतना आतंकित कर देंगे कि चीनी जनता स्वयं सरकार से यह मांग करेगी कि वह फिल्में हमें दे दे । जनता की मांग सरकार को माननी ही होगी । नहीं मानेगी तौ चीन में गृह-युद्ध होगा ।"




''तुम हमेशा विनाशकारी बात सोचा करते हो प्यारे दिलजले ।" विजय ने कहा-"अगर इस तरह फिल्में मिलती होतीं तो न जाने कब की मिल गई होती ? मेरा विचार तो ये है कि इस तरीके को छोड़कर फिल्मो का पता लगाने की कोई और तरकीब सोची जाये ।"



विसास ने जिद्द नहीं, की !


पुन: तरकीब सोची जाने लगी ।
जब इसी विषय पर बहस होते काफी देर हो गई तो हल्ले से मुस्कराता वतन बोला----"फिल्मों का पता लगाने की हमें कोई आवश्यकता नहीं है ।"

बुरी तरह चौक पड़े सब, विजय के मुंह से निकला---"क्या मतलब ?"




" समय आने पर 'वेवज एम' की फिल्म खुद ही बता देगी कि वह कहां है ?"



"क्या कहना चाहते हो ?"अलफासे ने प्रश्न किया।



" आज मैं तुम्हे एक रहस्य की बात बताता हूँ ।" मुस्कराते हुए वतन ने कहा ।। 'वेवज एम' के फार्मूले को उस फिल्म पर मैंने स्वयं उतारा है ! मुझे मालूम था कि यह उलझनें हमारे सामने आ सकती हैं । उन फिल्मों पर अंकित फार्मूला बिल्कुल सही है ,, जानबूझकर उसमें एक हल्की सी कमी छोड़ दी है । वह कमी यह है कि उसमें ब्रह्यंड की आवाजो को कंट्रोल करने वाले बटन का हवाला फिल्मों में कहीं नहीं है ।''



" इससे क्या होगा ?"




"निश्चित रूप से चीन के वैज्ञानिक किसा गुप्त प्रयोगशाला में उन फार्मूले के आधार पर 'वेवज एम' बना रहे होंगे"वतन ने कहा----- जैसे ही वेवज एम तैयार होगा और वे उसे अॉन करेंगे तो उसमें से इतनी जोर की व्रह्यंड की आवाजें निकलेगी कि सम्पूर्ण चीन गूंज उठेगा । व्रह्माड का सारा शोर चीख पुकार और आवाज़ गूंज उठेगी और मुझे पता लग जायेगा कि वेवज एम कहां तैयार किया जा रहा है !"



"इतनी महत्त्वपूर्ण बात तुमने पहले क्यों नहीं बताई बटन प्यारे ?"

"उस आवाज को कंट्रोल करने के लिए वेवज एम में बटन नहीं होगा !" विजय की बात पर कोई ध्यान न देते हुए वतन ने बताया----"वेवज एम के आँन होते ही बह्याड की सारी चीखो-पुकार चीन से उतर आयेगी और मेरा आविष्कार मुझे स्वयं बता देगा कि वह कहां है !"
हिमालय के गर्भ में…चीनियों की एक गुप्त प्रयोगशाला । एक कमरे में करीब बीस चीनी वैज्ञानिक । एक लम्बीसी मेज के चारों तरफ वे बीसों बैठे है । अचानक उनमें से एक वैज्ञानिक अपने स्थान से खड़ा होकर कहता है कि---" हमने प्राप्त फिल्म के आधार पर "वेवज एम" तैयार कर लिया है और आज हम उससे बह्मांड की आवाज सुनेंगे" ।



" मेंरे विचार से एक वार और फिल्म में अंकित फार्मूले से वेवज ऐम को मिला लें ।"


"वह तो हम करेगे ही ।" उस वैज्ञानिक ने कहा, किंतु खुशी की बात ये है कि हमने वेवज एम तैयार कर लिया है । हमारे देश को इस आविष्कार की कीमत बहुत महंगी चुकानी पड़ रही है । सारे देश में विकास और वतन ने हंगामा खड़ा कर रखा है, परन्तु हमारी सरकार ने इतनी सावधानी बरती कि इतना सबकुछ करने के बावजूद भी वे कुत्ते यहाँ तक नहीं पहुंच सके । यहाँ जहां वतन के फार्मूले पर हमने रात-दिन तीन महीने मेहनत करके वेवजएम तैयार कर लिया है ।" इस प्रकार एक लम्बाचौडा भाषण दिया उस वैज्ञानिक ने ।



फिर वे सब यह निश्चय करके उठे कि वेवज एम पर बाह्मांड की आवाजें सुनी जायें ।



यह प्रयोगशाला हिमालय के गर्भ में सख्त सैनिक पहरे के बीच थी।


वे बीसों वैज्ञानिक एकं अन्य कमरे में पहुंचे । एक मेज है पेर 'वेवज एम' रखा था । उस 'वेवज एम' की बॉडी वैसी बहीं थी, जैसे वतन के वेवज एम की थी । उसी मशीन कों उन्होंने एक भिन्न बाँडी में कैद किया था ।



मशीनरी को उन्होंने पुन: फिल्म से मिलाया ।

फिर धड़कते दिल से 'वेवज एम' आँन कर दिया गया ।


और तुफान उठ खडा हुआ हो जैसे । इतना शोर कि -------


हिंमालय कांप उठा ।




भयभीत होकर वैज्ञानिक एक-दूसरे पर गिर पड़े । चीख--पुकार और भयानक शोर ने इन सभी वैज्ञानिकों के कानों के पर्दे फाड़ डाले ।


कई अणु बम भी मिलकर इतना तेज धमाका न करते, जितना 'वेवज एम' से निकली आवाजों ने किया ।


पूरा हिमालय इस तरह चीख रहा था मानो किसी ने उसके शरीर में आग लगा दी हो ।।
न सिर्फ चीन बल्कि सारी दुनिया एकदम बुरी तरह चौंक उठी ।


हिमालय के गर्भ से निकली वह दहाड़ से सम्पूर्ण धरती गूँज उठी ।

धरती बुरी तरह कांप उठी ।



सारी दुनिया के ज्बालामुखी भी अगर एक साथ फट पड़ते तव भी शायद उतनी भयानक आवाज न होती !


सदियों से शांत खड़ा हिमालंय चीख उठा था । ऐसी आवाज हुई थी जैसै सारी दुनिया के प्राणी एक साथ अपनी पूरी शक्ति से चीख पड़े हों ।। विश्व में आतंक छा गया-------
-------------हिमालय चीख उठा था ।।

चीखकर उसने सारी दुनिया कों भयक्रांत कर दिया था ।


कुछ देर तक चीखकर हिमालय शांत हो गया ।।।।


किन्तु----हिमालय की उस चीख ने सम्पूर्ण विश्व को बुरी तरह आतंकित कर दिया था ।।



वतन की मंडली के अतिरिक्त शायद किसी को भी समझ में नहीं आया कि हिमालय इतनी जोर से आखिर चीख क्यों पंड़ा ?


संसार के प्रत्येक देश का प्रत्येक व्यक्ति भयंभीत हो उठा ।।



पूरी दुनियां मे र्तिकड़मे लडाई जानें लगों ।। कुछ लोग यह समझे बेठे कि प्रलयं आने वाली है । हिमालय ने चीखकर प्रलय के आगमन की सूचना दे दी है।।


तव जबकि विश्व में हिमालय की इस चीख पर अनेक अटकले चल रही थी ।


विजय इत्यादि के सामने बैठा वतन कह रहा था--" लो चचा, मेरे आविष्कार ने मुझ आवाज दी है !'"





"आबाज बडी भयानक रही बटन प्यारे । सारी दुनिया कांप उठी !"



"मेरा अनुमान है कि इसे आवाज कों सारे विश्व ने सुना होगा !" बिकास ने कहा ।

"लेकिन बटन प्यारे, हिमालय तो बहुत बड़ा है ।" विजय ने कहा--" यह कैसे पता लगे कि हिमालय के कौन से भाग में वह प्रयोगशाला है जहाँसे तुम्हारा 'वेवज-एम' चीखा है?"



वतन ने जेब में हाथ डाला और दिशा--दूरी बताने वाली, एक छोटी-सी विरामघड़ी दिखाता हुआ बोला--"इस घड़ी ने उस केन्द्र को पकड लिया है, जहाँ से इस आवाजकी उत्पत्ति हुई है ! इस समय यह घडी हमें 'वेवज एम' की स्थिति ठीक बता रहा है !"



" तो फिर क्यों न आज ही अपना अभियान समाप्त कर लिया जाये !"
जिस दिन हिमालय चीखा था, उस दिन ने अपने गर्भ में एक बहुत ही अन्धकारमय रात छुपा रखी थी ।



एयरपोर्ट की इमारंत पर यहां-वहां रोशन लाइटें उस अन्धकार से लड़
रही थीं । इमारत में सन्नाटा था । इस समय रात के ग्यारह बज रहे थे और चार बजे से पहले न तो यहाँ कोई फ्लाइट ही होने थी आर न ही कोई विमान यहाँ पहुंचने बाला था, इसलिए रात की डयूटी के कर्मयारी लापरवाही से अपनी-अपनी डयूटियों पर ऊंघ रहे थे ।


हवाई-पट्टी बिरुकुत शांत पड़ी थी, ऐसे समय में दो व्यक्तियों ने एयरपोर्ट की इमामृत में प्रवेश किया । उन दोनों के हाथों' में एक एक सूटकेस था ।

जिस्म पर पतलून के उपर ओवरकोट अौर सिर पर एक गोल हैट । ओवरकोट के कालर खडे़ थे अौर हैट के कोने लगभग झुके हुए थे ।। यह 'कारण था कि उनमे से किसी का चेहरा नहीं चमक रहा था ।।



"चचा ।" उनमें से एक के मुंह से विजय की आवाज निकली----"काम जरा संभलकर करना । कहीं सारा गुड़़ गोवर न हो जाये ।'"

" तू हमें पैतरे बता रहा है चटनी के !" बागारोफ ने कहा'--" बेटा, जासूसी के पैतरे इस्तेमाल करते-करते ही तो ये सिर के बाल उड़ गए हैं ! तू संभलकर रहना । ऐसा न हो जाये कि मैं निकल जाऊं और ये चीनी तुम्हारा तबला बजा दें" ।


''तवला तो इनका विकास और वतन ने बजा रखा है !"








" अच्छा, अब बोलती पर ढक्कन लगा, सामने आँफिस आ रहा है ।" वागांरोफ ने कहा तो सचमुच विजय चुपं हो गया ।

बिना किसी प्रकार की दस्तक दिए वे धड़धड़ाते हुए आँफिस में प्रविष्ट हो गए ! मेज के पीछे एक अफ़सर बैठा ऊंघ रहा था ।



उनकी आहट पाते ही कुत्ते की तरह जागकर उसने कान खडे़ कर लिए !


जब तक वह कूछ समझता, तव तक पलटकर विजय ने दरवाजा अंन्दर से बन्द कर दिया था और उस अधिकारी के सामने खडा ? बागरोफ कह रहा------"हम तुम्हारे मुंह से गुटरगूं की आवाज सुनना चाहते हैं !"
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