चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़) complete

Jemsbond
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Post by Jemsbond » 16 Oct 2016 19:14

चौककर वह अपनी सीट से खड़ा होता हुआ बोला-----"'कौन हैं आप लोग !"


"मेरा नाम विकास है ।" बागारोफ ने कहा है !


" वि ...का.... स !" टूटकर एक-एक शब्द निकला उसके मुंह से । चेहरा पीला पड़ गया । आंखों में मौत नाचने लगी ।


शरीर इस तरह कांपने-लगा, जैसे अचानक वह जाड़ो के बूखार का मरीज-बन गया हो, बोला…म.....मैंने आपका क्या विगाड़ा है ? अ…आप तो बाप हैं मेरे.....स…साली ये हमारी सरकार उल्लू की पट्ठी है, जो आपकी मांग नहीं मांगती ....."

" इसे ही तो कहते हैं गुटरगूं की आवाज ।" कहता हुआ बागरोंफ उस पर झपट पडा़ !


उस बेचारे के तो विकास का नाम सुनते ही हाथ-पांव ढीले पड़ गए थे ! विजय को कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ी और बागरोफ ने उसे बेहोश कर दिया ।
" मैं किसी और को देखता हूं चचा !" कहकर विजय ने दरवाजा खोता और कमरे से बाहर निकल गया ।


आगे बढकर बागारोफ ने चटकनी पुन: अन्दर से चढ़ा ली वापस आया और उस अधिकारी के जिस्म पर से कपडे़ उतारने लगा ।


दस मिनट बाद उसके जिस्म पर अधिकारी के कपड़े । दरबाजा खोलकर वह गैलरी में आया, दरबाजा बाहर से भिड़ा दिया , तभी गैलरी के एक अन्य आफिस का दरबाजा खुला एक अफसर की वर्दी में विजय बाहर निकला ।


बागरोफ को देखते ही विजय ने आँख दबा दी ! भुनभुनाता हुआ-बागरोफ उसके साथ अागे बढ़ गया ।




"'उस कबूतर मार्का की सूरत ही ऐसी थी कि हमने अनुमान लगा लिया कि अंब वह अपने मुंह से गुटरगूं की आवाज निकाले तो बहुत अच्छी लगेगी ।। यह तो हम जानते' ही थे कि गुटरगूं की वह आबाज न तो तुम्हारा ही नाम लेकर निकलेगी अोर न ही मेरा। अत: विकास का नाम ले दिया देखा नहीं------नाम सुनते ही किस तरह कत्थक डांस करने लगा था।"'



बातें करते हुए वे एयरपोर्ट की बालकनी तक पहुंच गए ।



वहाँ से हवाई पदृटी स्पष्ट चमक रही थी ।

बड़े बडे़ हैंगरों में कई विमान खडे थे ।



उन्हें देखता हुआ विजय वोला--", जो इधर से पहले दो विमान खड़े हैं, वे हमारे बाप के । पहला वाला तुम्हारे बाप ने बनवाया है, दूसरा मेरे बाप ने । वाकी सब बेकार हैं ।"



--"ठीक है ।" बागारोफ ने कहा----"आओ । बालकनी से उतरने के कुछ ही समय बाद वे विमान की तरफ बड़ रहे थे । दोनों का एक-एक हाथ रिवॉ्ल्वर पर था ।।
अभी है हैगरों से काफी दूर ही थे कि अंधेरे में से एक सैनिक निकलकर सामने आया !



" आप ?"



अभी बह कूछ कहना ही चाहता था कि धांय'. ......



विजय के रिबॉल्वर से निकली गाली ने उसके माथे में लहू निकलने के लिए सुराख बना दिया । एयरपोर्ट की इमारत अौर उसके आस-पास छाये सन्नाटे ने एक फायर और चीख की आवाज पर दम तोड़ दिया ।



" आओ चचा । " नारा-सा लगाता हुआ विजय स्वयं बहुत तेजी क साथ विमान की तरहा भागा ।



फायर की आबाज ने एयरपोर्ट की इमारत में हंगामा-सा खडा़ कर दिया था । अभी वे अधिक दूर नहीं दौड़ पाये थे कि उन के पीछे दो-तीन फायर हुए और सांय-सांय आवाज करती हुई गोलियां बराबर से निकल गई ।

भागते हुए' बागारोफ का रिवॉल्वर दो बार गर्जा और वे दोनों बल्व शहीद हो गए जिनके प्रकाश के दायरे में वे थै । अब उनके इर्द-गिर्द अंधेरा छा गया और इस अंधेरे मे वे भाग रहे थे ।।




पीछे से उन पर अब अनगिनत तेज फॉयर हो रहे थे किन्तु क्योंकि वे अंधेरे में थे इतलिए पीछे से उन्हें सही निशाने पर कोई नही ले पाया था ।




भागते हुए विजय ने जेब से हैडग्रेनेड निकाला, मुंह से पिन निकाली और अचानक पीछे पलट गया ।


अपनी गनों से फायऱ करते हुए करीब पांच सैनिक उन की तरफ दौड़ रहे थे !


उन्हीं का निशाना बनाकर विजय ने
बाउंड्री पर ख़ड़े क्रिकेट खिलाडी की भांति बम फेका ।

जिस तरह एक अच्छे खिलाड़ी की थ्रो पर खड़े विकेटकीपर हाथ में जाती है उसी तरह हवा में लहराता हुआ बम सीधा उन पांच सैनिकों के वीच गिरा । एक कर्गभेदी धमाके के साथ उनकी लाशों के चिथड़े हवा मैं लहरा उठे ।




फिर बागारोफ के पीछे भाग लिया बिजय । अब भी चारों तरफ से सैनिकों के भागकर आने की आवाजें आं रही थीं । वे भागते हुए विमानों पर पहुच गए तो विजय ने कहा----"'तुम विमानों को निबटाओ चचा---मैं इन्हें देखता हूं !"


ऐमा ही हुअा भी !


बिजय जैसे पहले, ही यह अन्दाजा कर लिया था कि किसी भी तरफ से सैनिक यहां तक ही पहुंच सकेगा और वह उन्हें चटनी बना देगा !

उधर अपनी जेब से हेंडग्रनेड निकालकर वागारोफ ने मुंह से पिन खींची और शेड के नीचेे खडे़ एक विमान पर उछाल दिया ।



एक कर्ण भेंदी धमाका । आग में झुलता हुआ पेट्रोल उछला है विमान की बाडी खील-खील होकर बिखर गई ।


फिर मानो साक्षात प्रलय का दृश्य एयरपोर्ट पर उपस्थित हो गया ! दस्तीबमों के धमाके और फायरों की आवाज ने सारे वातावरण की मथकर रख दिया !! चीनी सैनिक कुछ भी न कर सके ।।


अन्त में उन्होंने पहले दो विमान को हवाई पदृटी पर दौड़तें और फिर जमीन छोड़कर आकाश की अोर उठते देखा । अपने दो विमानों के अतिरिक्त वे एयरपोर्ट पर मौजूद सभी विमान नष्ट कर गये थे ।।

भारी बूटों की आवाज करता हुआ सैनिक कंटीले तारों की दीवारों के समीप से गुजरा तो विकास और वतन ने अपनी सांसे रोक ली । सैनिक उनके समीप आया तो किसी गोरिल्ले की भांति झपटकर विकास ने सैनिक को दबोच लिया । विकास ने एक हाथ से उसकी गन वाली कलाई को पकडा और दूसरा उसके मुंह पर ढ़क्कन बनकर चिपक गया।

लाचार सैनिक चीख भी नहीं सका और विकास ने उसे झाडीयों में खींच लिया ।


विकास ने क्योंकि उसकी नाक और मुंह बंद कर रखे थे अत: सांस न लेने के कारण वह दो मिनट में ही बैहोश हो गया ।

" ज़ल्दी करो दोस्त विकास ने वतन से कहा…

ठीक दो बजे गुरु और चचा का हमला होगा !


झाडि़यों में से होकर वतन ने आगे रेंगते हुए कहा…"मुझे क्रिस्टी का बहुत दुख है विकास वह बेचारी हमारे साथ आने के लिए रोती रह गई । उसे ले ही आते तो अच्छा रहता । वह बहादुर है और बहादुरी दिखाने के इस मौके पर उसने अपनी इच्छाओं को किस तरह दबाया होगा ।"

'’मैंनें तो कहा भी था तुमसे कि उसे अाने दो ।" रेंगत हुए विकास ने कहा ।


"मैं नहीं चाहता था विकास कि क्रिस्टी मेरे लिए अपनी जान पर खेले वतन ने कहा ।
"आपके चाहने से क्या होता है?" एका एक वे दोनो…अपने समीप से ही क्रिस्टी की आवाज सुनकर चौक पड़े।



वतन तो एकदम बुरी तरह से बौखला गया । मुंह से एक ही शब्द निकला-"क्रिस्टी !"




--"हां ।". अंधेरे में से आवाज उभरी---" मैं साथ हूँ आपके ।"



आवाज की दिशो में अंधेरा था और उस अंधेरे को वतन ने घूरा क्रिस्टी उसे नजर न आई तो बोला----" कहाँ हो क्रिस्टी ?"



'"यहां हूं मैं-आपके बहुत करीब ।" इस आवाज के साथ वतन के जिस्म में बिजला-सी दौड़ गई । अंधेरे में उसके हाथ को एक कोमल हाथ ने भींच दिया था । अनजाने मैं ही वतन ने उस कोमल हाथ को जोर से भींच दिया लिया ! बोला----" त-तुम लौट जाओ क्रिस्टी !"



-"हदय पर वज्रपात न करो !" दर्द में डूबी क्रिस्टी की आवाज ।



" लेकिन मै......!"

"विकास भैया समझाओ न इन्हें ।" क्रिस्टी ने कहा…"'मुझसे बात करके क्या इस महत्त्वपूर्ण समय को खो रहे हैं ।। वो देखो , सामने प्रयोगशाला का मुहाना---रूपी दरवाजा है----सुरंग से किसी वल्ब की रोशनी झांक रही है । दो सैनिक हाथ में गन लिए मुहाने पर खड़े है ! इनसे निपटकर अन्दर जाना है । अन्दर न जाने कितने सैनिकों से निपटना पडे । बहुत काम है…समम बहुत कम । दो बजे हवाई हमला हो जायेगा । उस समय तक हम प्रयोगशाला से बाहर न निकले तो इन सबके साथ ही प्रयोगशाला हमारी भी कब्र बन जाएगी ।"
इससे पूर्व कि वतन कुछ बोले, विकास ने कहा---"वतन, अब आ ही गई है तो आने दो क्रिस्टी को । देखा जायेगा है तुम ध्यान को चारों तरफ से हटाकर सिर्फ लक्ष्य पर केन्दित करो । वह देखो…सुरंग के अन्दर से कोई बाहर आ रहा है ।"
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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Jemsbond
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Post by Jemsbond » 16 Oct 2016 19:15

सचमुच एक सैनिक अधिकारी बाहर आया ! दरवाजे पर खड़े दोनों सैनिकों से कुछ बातें करने लगा ।


उसी पल क्रिस्टी ने वतन का हाथ छोड़ दिया । वतन को एेसा लगने लगा, जैसे उनका ह्रदय खाली होता जा रहा है ।



न जाने क्यों उसे क्रिस्टी का इस तरह हाथ छूड़ाना अच्छा न लगा ।


वे प्रयोगशाला के मुहाने के काफी करीब थे । इतने करीब अगर वे अपने स्थान से एक जम्प लगा देते तो मुहाने पर ही होते ।



वतन और विकास अभी कुछ सोच ही रहे थे कि अंधेरे में क्रिस्टी की आवाज गूंजी…"वे तीन हैं, हम भी तीन ! दायां मेरा, बायां बिकास भैया का और अफ़सर को ये संभालेंगे !"



वतन अभी कुछ समझ भी नहीं पाया था कि क्रिस्टी ने कहा --"'वनं टू थ्री !"



और थ्री के साथ ही विकास और क्रिस्टी ने अपने-अपने शिकार पर जम्प लगा दी । वतन क्योंकि तैयार नहीं था, इसलिए थोडा चूक गया ।

इन दोनों ने अपने अपने शिकारों कों दबोचा, अधिकारी ने चौककर रिर्वाल्वर निकाला और क्रिस्टी पर फायर कर दिया ।


यह वहीं वक्त था, जब वतन अधिकारी के ऊपर अाकर गिरा ।



गोली क्रिस्टी के पेट में लगी थी किन्तु अपने शिकार को उसने छोड़ा नहीं ।


वतन तो जैसे पागल हो गया था ।



उसका मुगदर संन्नाकर अधिकारी की कनपटी पर पडा़ तो वह चीख के साथ हमेशा के लिए सोगया ।
फॉयर की आवाज ने प्रयोगशाला के अन्दर-बाहर के सभी सैनिकों को सचेत कर दिया था ! विकास ने सोचा कि अब जबकि सन्नाटा भंग हो ही गया' है तो कोई भी काम चुपचाप करने से क्या लाभ है उसने रिबाँल्बर निकालकर दोनों सैनिकों को मार डाला । वतन ने झपटकर क्रिस्टी को पकडा, बोला-----" तुम ठीक हो क्रिस्टी !"



" हां, मेरे देवता-----ठीक हूं मैं ।" अपने दर्द को पीकर क्रिस्टी ने कहा------"मेरी चिंता मत करो । अन्दर जाओ, मैं यहीं पडी़ हूँ । तुम्हारी कसम, बाहर बाले सैनिकों को भी अन्दर नहीं जाने दूंगी ।"




" क्रिस्टी ........" उसने कुछ कहना चाहा ।



"आंओं वतन !" उसका हाथ पकड़कर के अंदर प्रविष्ट हो गया विकास । चारों तरफ़ से सैनिकों के भागते कदमों की आवाजें आ रही थीं । अभी वतन उससे कुछ कहना ही चाहता था कि विकास ने अन्दर का वह एक बल्ब फोड़ दिया । जिसका प्रकाश सुरंग के मुहाने के रास्ते से बाहर झांका करता था ।

सुरंग में गहरा अंधेरा छा गया । वतन का हाथ पकड़े विकास अंधेरी सुरंग से भागा चला जा रहा था । सुरंग,
के बाहर से फायरों की आवाज आ रही थी !




वे आवाजें वतन के सीने को छलनी किये दे रही थीं ।



"विकास,क्रिस्टी ।'" दौड़ता हुआ वतन कुछ कहना ही चाहता था कि विकास ने कहा --"वह सब सम्हाल लेगी , वतन ! तुम सामने नजर रखो !"



विकास और वतन भले ही सुरंग के अंधेरे भाग में भाग रहे थे, किन्तु आगे प्रकाश था !



उस प्रकाशं में तीन सैनिक भागकर उन्हीं की अोर आते दिखाई दिये ।


वतन ने हैंडग्रनेड की पिन खींची और उनकी तरफ उछाल दिया !



फिर---फायर, धमाकों, चीखों, भागते हुए कदमों की आवाजों का बाजार गर्म हो गया । तबाही मचाते हुए ये 'दोनों' अन्दर की तरफ भागे चले जा रहे थे । तुरंग समाप्त हुई तो स्वयं को उन्होंने एक हाँल में पाया !
उस हाल में उनके और चीनी सैनिकों के बीच एक जबरदस्त मोर्चा लगा ।



गोलियां चलती रहीं ! बीच-बीच में दस्ती बमों के धमाके ।

हाँल को लाशों से पाटकर वे एक गैलरी में बढ़ गये ! उन्हें जहां से भी गुजरना होता था, वहां का बल्ब फौड़कड़ पहले अंधेरा कर देते थे । उनकी यह तरकीब काफी काम आ रही थी । प्रत्येक बार वे अंधेरे में होते थे और दुश्मन प्रकाश में ।



हिमालय के गर्भ में छुपे उस सारे अड्डे में धूम गये वे ! उनके सामने किसी भी सैनिक के आने का मतलब था…. उसकी मृत्यु ! अन्त में----- ऐसे बन्द दरवाजे के सामने ठिठक गये वे,
जिसके बाहर लिखा था "प्रयोग-कक्ष"



उसे देखते ही विकास ने सर्वप्रथम उस बल्ब को फोड़ा जिसके प्रकाश में उन्होंने उपर्युक्त शब्द पढ़ा था । इधर वतन ने एक हैंडग्रेनेड प्रयोग-कक्ष के दरवाजे पर दे मारा । एक भंयकर विस्फोट के साथ दरबाजा खील-खील हो कर बिखर गया । बुरी तरह से लगी हुई आग के ऊपर से कूदकर वे दोनों प्रयोग-कक्ष के अंदर चले गये ।



अन्दर रोशनी थी ओर बीस वैज्ञानिक नजर आने वाले व्यक्ति भयभीत से खड़े थे ! पलक झपकते ही विकास की गन ने गर्जना शुरू किया और उनमें से पन्द्रह वैज्ञानिक चीख -चीखकर शहीद हो गये !



शेष पांच ठग सेे खडे़ थे ।



"'तुम इनसे फिल्म और 'वेवज एम' लो वतन मैं बाहर से संभालता हूँ ।" कहने के साथ ही विकास ने गजब-नाक फुर्ती के साथ वापस बाहर की तरफ जम्प लगा दी । पांचों जीवित वैज्ञानिकों की तरफ वतन की गन तनी थी । उसने गुर्राकर पूछा-"फिल्में कहां है ?"



उनमें से किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया तो वतन की गन ने दो बार खांसा ।

दो वैज्ञानिकों के चीखकर गिरते ही शेष तीन चीख पड़े, "बताते हैं ।"



" जल्दी बोलो ।" वतन गुर्रोंया !



उनमें से एक शीघ्रता के साथ एक प्रयोग सीट के नीचे की अलमारी खोली ! उसमें से एक डिब्बा निकाला । शीघ्रता के शाथ कांपते हाथों से डिब्बे में से फिल्में निकाली और वतन की और बढा दी ।



. वतन पुन: गुर्राया----"इन्हें खोलकर दिखाओ ।"


डिब्बा प्रयोग सीट पर रखकर सामने फिल्म खोल खोल- कर दिखाई !



अपनी फिल्मो को पहचानने के बाद वनन ने कहा----" इनको डिब्बे में रखकर डिब्बा मेरी तरफ उछाल दो !"



उसके आदेश का पालन हुअा । …


"वेवज एम कहा है ?" डिब्बा जेब में रखते हुए वतन ने पूछा ।


एक वैज्ञानिक ने डिब्बा अलमारी से निकालकर सीट के ऊपर रख दिया । वतन की गन से बीसों गोलियाँ ने निकाल-कर वेवज एम का अस्तित्व समाप्त करा दिया है फिर उन… तीनो वैज्ञानिकों की तरफ देखकर वह गुर्राया---तुम तींनों भी यह वेवज एम बनाने वाले वज्ञानिकों में से हो । बनाते वक्त इसकी कुछन कुछ कार्यविधि तो तुम्हें याद हो ही गई होगी। अतः जीवित रहने का अधिकार खो चुके हो तुम ।"


अपने शंब्दों की समाप्ति के साथ ही वतन ने उन् तीनों को भी मार डाला !

फिर प्रयोग कक्ष में अंधेरा किया । झपट कर वह कक्ष से बाहर निकला !


" काम हो गया ? अंधेरे में छुपे बिकास ने पूछा !



" हां ....!" वतन ने कहा…"वेवज एम को नष्ट कर आया हुं-वे फिल्में मेरे पास है।"


"आअो----"अँधेरे में से आकर, बिकास ने वतन का हाथ पकड़ लिया, फिर उसी अंधेरे में से होते हुए, जिसे वे स्वयं बनाते चले आये ये बाहर की तरफ भागे ।
बाहर निकले तो बाहर छुटपुट फायरों की आबाज हो रही थीं !


वे दोनों सुरंग के मुहाने के पास जमीन पर लेट गये थे , वतन फुसफुसाया- "क्रिस्टी !"


" 'मैं’ ठीक हूँ । उसके समीप ही अँधेरे में पड़ी क्रिस्टी ने उसका हाथ पकड़ लिया--" तुम्हारी कसम वतन, एक भी कुत्ते को अन्दर न जाने दिया मैंने । सबको मार डाला । सामने की झाडियों में सिर्फ एक सैनिक बचा है!"



"उसे मैं देखता हूँ । कहने के बाद विकास अंधेरे में आगे रेंग गया !
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Re: चीख उठा हिमालय ( विजय-विकास सीरीज़)

Post by Jemsbond » 16 Oct 2016 19:15

वतन ने भावावेश में क्रिस्टीना के शरीर को टटोंला तो खून से रंग गये उसके हाथ । चीख सा पडा वतन-----" क्रिस्टी !"



"हां मेरे देवता !"

" तुम घायल हो !"



"ज्यादा नहीं तीन गोलियाँ लगी हैं सिर्फ ,, एक तुम्हारे सामने, दो बाद में वदले में मैंने उन सबको मार डाला ! "

"क्रिस्टी !" पागल-सा होकर वतन उससे लिपटता हुआ बोला---" तुम कैसी पागल हो क्रिस्टी ?"



"वो.......वो देखो....... विमानों की, आवाज आ रहीं है.... क्रिस़्टी ने कहा-------" इम प्रयोगशाला पर हमला होने वाला हैं जल्दी चलो यहां से अभी तो इस नर्क समान मुल्क से बाहऱ निकलना है, तुम्हें !"



" आओ वतन । चचा पहुंच चुके है !" विकास की आवाज ! फिर वे तीनों एक-दूसरे का हाथ पकडे़ उस स्थान से दूर' के भागने लगे !!!


ऊपर प्रयोगशाला के ठीक ऊपर दो विमान चकरा रहे थे । ठीक दो बजे उनमें से एक विमान ने पहला बम प्रयोगशाला के ऊपर फेंका ।



एक भयंकर विस्फोट के साथ हिमालय का वह भाग उड़ गया।।


वहा से दूर वे तीनों भागते हुए एक छोटी -सी पहाडी पर चढ़ रहे थे ,उधर-वे दोनों विमान भयानक रुप से प्रयोशाला के ऊपर बम बर्षा कर रहे थे !!
'"बिनाश विनाश-बिनाश "!


विस्फोट पर विस्फोट आग-ही-अाग आग की लपटों में गर्त हो गयी चीनियों-की वह प्रयोगशाला !


एेक घण्टे की निरन्तर कोशिश के बाद वे-तीनों उस पहाडी की चोटी पर पहुंच गये । वहां पहुंचकर वतन ने जेब से एक बिचित्र-सा रिवॉल्वर निकाला और आकाश की ओर
उठाकर ट्रैगर दबा दिया । रिबाँल्बर की नाल से एक हरे रंग की चमचमाती हुई माला आकाश की तरफ लपकी ।।

आधे घण्टे बाद ही वे दोनों विमान उस पहाडी के ऊपर चकरा रहे थे । उन दोनों से नीचे पहाडी तक दो रस्सियां लटक रहीं थीं !! वतन ने क्रिस्टी से कहा अाओ क्रिस्टी...!"



" 'कहां…?” क्रिस्टी का दर्द-युक्त स्वर---"कहाँ आऊं?"



"'क्या मतलब ?" चौक पड़ा वतन-" तुम नहीं आओगी क्या ?"




"आपका काम खत्म हो गया मेरे देवता !" क्रिस्टी ने कराहकर कहा----"" जाओ इस नर्क से बाहर…मुझे तो यहाँ रहना है !"



-"नहीं ।"' पूरी शक्ति से चीख पड़ा वतन ।



"हां मेरे देवता" 'इसी नर्क समान मुल्क में रहना है मुझे !" क्रिस्टीना ने क्रहा----"'इसलिये कि मेरी सरकार ने मुझे यहाँ जासूसी करने भेजा है ! अपने प्यारे भारत केलिये इसनर्क में ही रहुंगी मैं....."




" नहीं क्रिस्टी तुम भी चलो ।" विकास बोल उठा !

" तुम भी मेरे देवता की तरह पाग़लों जैसी बातें करने लगे विकास भैया !" क्रिस्टी ने मुस्कराकर कहा…क्या तुम नहीं जानते कि मुझे अपने देश की तरफ से क्या हुक्म है ?"
" लेकिन तुम घायल तो क्रिस्टी !" वतन चीखा । "



" इतनी घायल तो इस नर्क में न जाने कितनी बार हुई हूं !" क्रिस्टी ने कहा-----" चित्ता न करो है इतनी ताकत तो क्रिस्टी में अभी है कि वह यहाँ से सुरक्षित अपने फ्लैट पर पहुंच सकती है !"


" नहीं क्रिस्टी नहीं !" पागलों की तरह चीख पडा वतन---"मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा ।"



किन्तु अपनी कसम दे दी क्रिस्टी ने । कह दिया कि अगर उसने साथ ले जाने की जिद की तो उसकी लाश देखेगा । क्रोध में झुलसता वतन एक विमान से लटकी रस्सी पर लटक गया । विकास दूसरे विमान की रस्सी पर ।


विमान ऊचे उठती चले गये ! रस्सी पर लटके वतन और विकास नीचे अंधेरे में डूबी उस पहाडी को देखने की कोशिश कर रहे थे । उन्हें मालूम था कि उस पर खडी क्रिस्टीना तडप-तड़प रो रही होगी !
एक हफ्ते के अन्दर विजय ने विभिन्न देशों में गये भारतीय सीक्रट सर्बिस के सदस्यों को भारत बूला लिया !


अमेरिका से हैरी के बदले अशरफ को ले लिया । भारत में विजय को अलफांसे का पत्र मिला, जिसमें उसने लिखा था…



इतनी आसनी से तुम्हारा काम इसलिये होंगया क्योंकि हिमालय के चीखने का मतलब पोक, हवानची
सिंगसी नुसरत, तुगलक और बाण्ड भी समझ नहीं सके थे ! इन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि हिमालय ने चीखकर तुम्हें बुलाया है । वे तुम्हें पूरे चीन में तलाश करते रहे अौर तुम अपना काम करके निकल गये । सच पूछो इस बार मुझे भी धोखा दे गये ! मेरा ध्यान फिल्मों को प्राप्त करके कुछ कमाने का था, लेकिन मैं चूक गया ।

यह कल्पना मैंने भी नहीं की कि हिमालय के चीखने का मतलब था कि फिल्में वहां है !!!


------- तुम्हारा अलफांसे
उपन्यास समाप्त होता है
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तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

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मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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