रहस्यमई आँखें complete

Jemsbond
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Re: रहस्यमई आँखें

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 16:06

“ यह आवश्यक भी नहीं है।” उसने हँसकर कहा।

मृत्युंजय से ज्ञान लेने के बाद मैं बाहर आई तो मुझे निचे अन्तस और दिव्या कोई गुप्त मंत्रणा करते दिखे। मैं इनके पास गई तो वो दोनों चुप हो गये।

“कहा गई थी तुम? मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे में ढूँढ कर आया था।” उसने एक बार दिव्या और फिर मेरी ओर देखकर कहा।

“मृत्यंजय महाराज मुझे ‘कॉलेज’ दिखाने ले गए थे।” मैंने कॉलेज पर दबाव देकर कहा जिससे अन्तस इसका असली अर्थ समझ जाए।

“दिव्या मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ।” अन्तस ने दिव्या को जाने का ईशारा करते हुए कहा। मैं और अन्तस दोनों बाहर गार्डन में आ गए।

“तुमने वो नंबर देखा था?” अन्तस ने मुझसे पूछा।

“हाँ वो......” तभी ‘धम्म’ की आवाज आई। मेरे पीछे पेड़ की एक बड़ी सी शाखा गिरी हुई थी। हमने ऊपर देखा तो कोई मजदूर डाल काट रहा था। अन्तस ने गुस्से से उसकी तरफ देखा तो वो बेशर्मी से मुस्कुराया। “माफ़ करना भैया, गलती से गिर गया।”

अन्तस ने उसे फिर गुस्से से देखा मगर फिर मुझे लेकर आगे बढ़ गया।

“तुम क्या कह रहे थे?” मैंने अन्तस से पूछा।
तभी अन्तस का पैर पानी में गिरा। उसके जुते पूरे पानी से सन गए थे।

“ये पानी का नल किसने खुला छोड़ दिया?” अन्तस गुस्से से चिल्लाया। सामने एक पाइप पड़ा था जिससे पानी निकल रहा था, पूरे गार्डन में पानी भर गया था।

“२१२१” मैंने उसे देखकर कहा।

“चलो तुम्हारे कमरे में चलते है।” उसने मुड़ते हुए कहा।

‘अंतर्मन पर नियंत्रण का पहला चरण है कि सामने वाले को यकीन दिलाओ कि वह जो देख रहा है वह बिलकुल वास्तविक है।” अन्तस मुझे अंतर्मन को नियंत्रित करने के कुछ रहस्य बता रहा था।

“फिर उसके लिए एक उद्देश्य पैदा करो, जिसकी प्राप्ति में वो रत हो जाए और इसकी परवाह करना ही छोड़ दे कि यह हकीकत है या भ्रम।” मैं उसे ध्यान से सुन रही थी।

“तीसरा और महत्वपूर्ण चरण है कृतिम भ्रम पैदा करो। यह एक नियंत्रित छल होता है, किसी टिके की तरह। जिससे व्यक्ति को यकीं होता है कि सिर्फ यही भ्रम है बाकी सब सत्य है।“

“चौथे चरण में उस व्यक्ति के उद्देश्य से स्वयं के उद्देश्य का इस तरह से मिलान करना होता है कि उसे एहसास ही न हो कि कब वह तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति में लग गया है। “
“और अंतिम चरण होता है उस व्यक्ति के सपने से बिना किसी छेड़छाड़ के बाहर निकलना।” उसने मुझे समझाते हुए कहा।

“और अगर कभी उस व्यक्ति को पता चल जाए की हम उसके सपने में है तो?” मैंने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की।

“उसके अंतर्मन के रक्षक तुम्हारे पीछे पड जायेंगे और तुम्हें वहाँ से बाहर निकालकर ही दम लेंगे।” मुझे याग्निक के अंतर्मन का वो कुत्ता याद आ गया।

“और कभी अगर हम खुद किसी के अंतर्मन में सपने की हकीकत भूल जाए तब?”

उसके चेहरे पर चिन्ता की लकीरे उभर आई जैसे मैंने कोई गहरा सवाल पुछ लिया हो।

“नहीं ऐसा कभी नहीं होता है।” उसने उठते हुए कहा।

“क्यों नहीं हो सकता है, तुमने ही तो कहा था कि यह छल संभव है।”

“हाँ मगर छल हम दूसरे के अंतर्मन में करते है।”

“फिर भी अगर अभी ऐसा हो जाए तो।” मैंने जोड़ डालकर पूछा।

“इसके लिए तुम्हें खुद के अंतर्मन के रक्षक तैयार करने होंगे जो ऐसी परिस्थिति में फंसने पर तुम्हें ढूंढ़कर उसके अंतर्मन से बाहर निकालेंगे।”

मैंने हाँ में सर हिला दिया।”

अगले दिन मैं खाना खा कर अपने कमरे में आई ही थी कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। मैंने दरवाजा खोला तो यह मृत्युंजय था।

“तुम साधना के लिये तैयार तो हो न?” उसने अन्दर आते हुए पूछा।

“हम्म,,,,” ,मैं उसका चेहरा देखने लगी जैसे असली बात का पता लगाना चाहती हूँ।

“ताश्री!” उसने सांस लेकर कहा जैसे कुछ कहने की हिम्मत जुटा रहा हो। मैं उसे ही देख रही थी।
“हम तुमसे कुछ कहना चाहते है।”

वो बेड पर बैठ गया। उसने मुझे ईशारा किया तो मैंने दरवाजा बन्द कर दिया।

“यह सच जानना तुम्हारे लिए आवश्यक है।
तुम्हारे पिता की मौत कोई हादसा नहीं थी, उनकी हत्या हुई थी। उसने वापस उठते हुए कहा।

“...........और उनकी हत्या मैंने करवाई थी।”

मैं आँखें फाड़कर उसे देखने लगी. मुझे मृत्युंजय से ये उम्मीद कभी नहीं थी. मुझे लगा था कि वो भरसक कोशिश करेगा कि यह बात मुझे पता न चले. मगर यहाँ तो वो खुद मुझे बता रहा था.

“किस लिए?” मैंने अपने गुस्से को शांत रखकर पुछा. मैं हकीकत जानती थी मगर फिर भी देखना चाहती थी कि मृत्युंजय क्या कहता है? मुझे इस तरह शांत देखकर उसे आश्चर्य हुआ.

“अन्तस ने अगर तुम्हें संगठन के बारे में बताया होगा तो यह भी बताया होगा कि संगठन के कुछ सिद्धांत है जिसमें से एक सिद्धांत यह भी है कि हम संगठन के रहस्यों की रक्षा के लिए प्राण दे भी सकते है और प्राण ले भी सकते है. अफ़सोस की तुम्हारे पिता इसी सिद्धांत की बलि चढ़े थे. वह संगठन के कुछ ऐसे रहस्य जान गए थे जो उन्हें नहीं जानने चाहिए थे. फलस्वरूप संगठन कि रक्षा हेतु हमें विवशता वश वो करना पड़ा जो हम नहीं करना चाहते थे.”

“विवशता...... रहस्य...... सिद्धांत....... बलि.....” मैं मृत्युंजय को घूरते हुए एक-एक शब्द जोर देकर कहते गयी.
“संगठन के ऐसे कौन से रहस्य थे कि जिनकी रक्षा के लिए किसी की जान लेने कि आवश्यकता पड गयी, किसी का गुप्त होना तभी आवश्यक होता है जब वो अनुचित हो या फिर उसे डर लगता हो. संगठन किस बात से डरता है?”

“कुछ रहस्य इतने मूल्यवान होते है कि उनकी रक्षा अनिवार्य होती है. संगठन सैकड़ों वर्षों कि मेहनत का परिणाम है.”

“आपका संगठन एक भ्रम मात्र है, एक झूठा विश्वास जिसे संगठित तौर पर हजारों लोग ढो रहे है. इनके रहस्य और कुछ नहीं है एक पेंडुलम है जिसे दिखा कर तुम इस संगठन के सदस्यों को वशीकृत रखते हो और शायद तुम स्वयं इसके प्रभाव में हो. अफ़सोस इस झूठे भ्रम की रक्षा में मेरे पिता और न जाने कितने मासूमों कि जान गयी है.” मेरी आँखें छलक आई थी.

“हो सकता है की तुम सही हो, मगर फिर भी जब कोई विश्वास एक जनसमूह द्वारा लम्बे समय तक अपनाया जाता है, वह सत्य बन जाता है, एक ऐसा सत्य जिसे नकारना नामुमकिन होता है. संगठन एक ऐसा ही सत्य है. सही या गलत हम इसे नकार नहीं सकते.”

“………. लेकिन तुम यह सब मुझे क्यों बता रहे हो.” मैंने भरी हुई आवाज में कहा. “जिस बात को तुमने इतने समय तक गुप्त रखा उसे आज बताने कि जरूरत कैसे महसूस हुई.”

“प्रायश्चित........” उसने बिलकुल धीरे से कहा. “तुम्हारे पिता की हत्या मेरा सबसे निष्कृष्टम् निर्णय था जिसका मुझे आज तक अफ़सोस है. अवन्तिका से मेरा जो भी रिश्ता रहा हो रणवीर से मेरा कभी बैर नहीं रहा. उसकी हत्या का पाप आज भी मेरी अंतरात्मा को कचोटता है. उस दुष्कर्म का संताप मेरी आत्मा को अग्नि की भाँति जलाता है. इसीलिए मैंने अन्तस को तुम्हें यहाँ लाने के लिए कहा था ताकि मैं तुमसे अपने अपराधों के लिए क्षमा मांग सकूं. इससे शायद मुझे कुछ शांति मिल सके.” उसने बिलकुल दुखी होकर कहा, जैसे उसे सच में इसका अफ़सोस हो.

‘तुम्हें लगता है मैं तुम्हें माफ कर दूंगी?” मैंने उसे घूरकर कहा.

“नहीं..... बिलकुल नहीं. कुछ गुनाहों कि कभी माफ़ी नहीं होती. तुम मुझे जो चाहो वो सजा दे सकती हो. उसने हाथ जोड़ते हुए कहा. उसकी आँखों से आंसुओं कि कुछ बुंदे छलक आई थी. “मुझे इस भार से मुक्ति चाहिए.” उसने कातर दृष्टि से मेरी और देखकर कर कहा जैसे मेरा निर्णय जानना चाहता हो. मैं बिलकुल तटस्थ थी.

“तुम पुलिस में समर्पण कर दो. मैंने निर्दयता से कहा. वो मेरी और देखने लगा जैसे उसे ऐसे निर्णय कि अपेक्षा न थी.

“ठीक है, जैसा तुम चाहो. मगर...........” उसने एक पल रुककर मुझे देखा. “मेरी एक अंतिम इक्षा है..... मैं मेरे पिता और तुम्हारी माँ को सूत्र साधना कि असफलता के कलंक से मुक्ति दिलाना चाहता हूँ. अवन्तिका की पुत्री और नित्यानंद का पुत्र अगर सूत्र साधना में सफल हो जाते हैं तो उन पर लगे कलंक हमेशा के लिए मिट सकते हैं . मैं सूत्र साधना करना चाहता हूँ.” उसने मेरी ओर देखकर कहा.

तुम फिर से ग्यारह जिंदगियां दांव पर लगा रहे हो मैंने उससे सीधा प्रश्न किया. अब तक के घटनाक्रम से मेरे मन में उसके प्रति भय बिलकुल ख़त्म हो चूका था .

“नहीं , ऐसा कुछ नहीं होगा . मेरे पिता से यह गलती हुई थी कि उन्होंने बाकी सूत्रों को एक माध्यम मात्र माना था किन्तु मैंने सभी सूत्रों को व्यक्तिगत रूप से दीक्षा दी है . वे सब सामान रूप से समर्थ है जितना कि ग्यारहवां सूत्र है वे सब अपनी रक्षा कर सकते है .” उसने कुछ विश्वास और कुछ गर्व से कहा .

“मैं तैयार हूँ.” मैंने कुछ सोचकर कहा. “मगर तुम्हारी परिणीत निश्चित है,” मैंने उसे फिर से याद दिलाया कि मैं किस शर्त पर हुई हूँ. उसने हाँ में सर हिला दिया.
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मृत्युंजय के जाते ही मैं अन्तस के पास गयी. मैं उसे बताना चाहती थी कि मृत्युंजय ने खुद अपना गुनाह कबूल कर लिया है. वो मुझे उसके कमरे में ही मिल गया. मुझे इतना परेशान देखकर वह समझ गया कि कुछ गंभीर मामला है. वो मेरी ओर जिज्ञासा से देखने लगा.

“मृत्युंजय ने खुद मुझे बता दिया कि उसी ने मेरे पिता की हत्या कि थी.” मैंने झुंझलाते हुए कहा. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैंने जो निर्णय लिया वो सही था या नहीं.

“और तुमने क्या कहा?” उसने दरवाजा बंद करते हुए कहा.

“यही कि वह पुलिस में समर्पण कर दे.” मैंने गर्व के भाव से कहा.

“और वो मान गया?” उसने मेरे चेहरे के भाव पढ़ते हुए पुछा.

‘हां......मगर वो पहले सूत्र साधना करना चाहता है.” उसने मुझे इस तरह देखा मानो पुछ रहा हो कि मेरा निर्णय क्या है?

“वो अपने पिता को सूत्र साधना कि असफलता के कलंक से मुक्त करना चाहता है.” मैंने अपने निर्णय का कारण उसे बता दिया.

“और तुम क्या चाहती हो?”

“मैं भी अपनी माँ के लिये वही चाहती हूँ.”
“मैं सूत्र साधना करूँगी.” मैंने स्पष्ट किया.

‘वो तो तुम वैसे भी करने ही वाली थी.” अन्तस ने मुस्कुरा कर कहा. मैं उसे घूरने लगी जैसे उसकी मुस्कराहट का रहस्य जानना चाहती हूँ.

“तुमने यह नहीं सोचा कि जब तुम पहले से ही सूत्र साधना के लिए तैयार थी तो मृत्युंजय ने तुम्हें सच बताकर व्यर्थ का ख़तरा क्यों लिया?”

मैं उसके ओर देखने लगी. दरअसल मैं उसे प्रायश्चित वाली बात बताना नहीं चाहती थी. क्योंकि मुझे खुद पर विश्वास नहीं था.

“मैंने तुमसे पहले ही कहा था मृत्युंजय छल में पारंगत है. अंतर्मन पर नियंत्रण का तीसरा सिद्धांत.......” उसने मुझे याद दिलाया. “कृतिम भ्रम पैदा करो. एक नियंत्रित छल... जिससे व्यक्ति को लगे कि सिर्फ यही भ्रम है.” मैं अन्तस को ताकने लगी क्योंकि मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया था.

“मृत्युंजय जानता था कि हो सकता है कि तुम पहले से उसके बारे में जानती हो और अगर ऐसा है तो तुम उसके प्रति सचेत भी हो. इसलिए उसने स्वयं तुम्हें बताया ताकि तुम उसके प्रति निश्चिंत हो जाओ.” उसने रुककर मेरी ओर देखा. ‘विश्वास ही वो गुप्त मार्ग है जिससे हम किसी के अंतर्मन में प्रवेश कर सकते है.”

“तो अब?” मैं मुंह खोले उसे देखने लगी. मुझे तो अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

“मैं तुम्हें किसी से मिलवाना चाहता हूँ.” उसने दरवाज़ा खोल कर बाहर निकलते हुए कहा. मैं भी उसके पीछे-पीछे चल दी.

हम एक गुप्त मार्ग से संगठन में पहुंचे और एक कमरे के दरवाज़े के सामने खड़े हो गये. अन्तस ने दरवाज़ा खोला तो सामने जमीन पर दस लडकियां बैठी थी, उनके सामने एक लड़की हमारी तरफ पीठ करके बैठी थी. सबकी आँखें बंद थी. हमने कुछ देर प्रतीक्षा कि.

‘दिव्या......, ताश्री तुमसे मिलना चाहती है.” उनके आँखें खोलने पर अन्तस ने कहा. दिव्या ने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा.
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सूत्र साधना का समय आ चूका था. हम सब उसी बड़े हॉल में थे. वहाँ से सारे कम्प्यूटर हटा कर जगह बना दी गयी थी. वहाँ हजारों तांत्रिक खड़े थे. सामने एक मंच बनाया गया था, जहाँ मैं, मृत्युंजय और बाकी दस लड़कियों के साथ खड़ी थी. मंच पर ही एक हवन कुण्ड बनाया गया था. जिसके एक तरफ मेरे बैठने की व्यवस्था थी. वही सामने कतार से बाकी सूत्रों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी. सामने ही एक बड़ा सा आसन था, जो शायद मृत्युंजय ने स्वयं के लिए लगवाया था. शायद वो अब भी विशेष होने के मोह से मुक्त नहीं हो पाया था.
सभी लोग काले वस्त्रों में थे. मुझे भी वैसे ही कपडे पहनाये गए थे. मेरे असली कपडे, मोबाइल सब इन्होंने पहले ही ले लिया था. अन्तस यहाँ मौजूद नहीं था, उसे होना भी नहीं था.

मृत्युंजय आगे आया और गरजती हुई आवाज में बोलना शुरू किया.

“उस रात्रि कि तरह जो सूर्योदय के पूर्व सर्वाधिक अन्धकारमय होती है.
उस दिन कि तरह जो बरसात से पहले सर्वाधिक गर्म होता है.
उस लोहे कि तरह जो ढलने से पहले सबसे जादा कमजोर होता है.

इन सबकी तरह हम सब श्रेष्ठ होने से पूर्व पतित है. लोग हमें महान या पतित के रूप में देख सकते है. मगर हम वही है जो हम बनना चाहते है. हम महान नहीं है और शायद बन भी ना पाए मगर इसका अर्थ तो नहीं है कि हम इसका प्रयास ही न करें.”
“जय महाकाल.”

“जय महाकाल.” सभी लोगों ने एक स्वर में कहा.

मैं अपनी जगह पर बैठ गयी. वो लडकियां और मृत्युंजय भी अपनी जगह पर बैठ गए थे. एक तांत्रिक आया और हवन की आग जलाने लगा.

“इसकी कोई जरूरत नहीं है.” मैंने उसे रोकते हुए कहा. मृत्युंजय मुझे घूरने लगा. सभी लोग कानाफूसी करने लगे.

“तुम सब मेरी आँखों में देखना.” मैंने अपना चश्मा उतारते हुए उन दसों लड़कियों से कहा.

मेरी आँखों के सामने उजाला हुआ और मैं एक मरुस्थल में थी। चारों तरफ रेत ही रेत थी। सांयसांय कर गर्म हवाएं चल रहीं थी। बस रेत के बड़े-बड़े टीले दिखाई दे रहे थे। आसमान बिलकुल खाली था, कहीं बादल का एक टुकड़ा भी नहीं था। मैं आगे चलने लगी। कुछ चलने पर मुझे दूर कुछ दिखाई दिया। मैं और पास गयी तो यह साफ़ दिखने लगा था, यह एक महल था, पूरा रेत से बना हुआ महल!

मेरे सामने जाते ही उस महल का दरवाज़ा खुल गया। सामने एक बड़ा सा हॉल था, मेरे अन्दर जाते ही वो दरवाज़ा वापस बंद हो गया। यहाँ अन्दर भी रेत ही रेत थी पर चारों तरफ कुछ दरवाज़े थे। मैं एक दरवाज़े की तरफ बढ़ गयी। अन्दर एक गलियारा था जिस पर कुछ अजीब पेंटिंग्स लगी हुई थी। मैं उस पेंटिंग्स को देखते हुए आगे बढ़ने लगी। ये कुछ अजीब से निशान थे जिन्हें समझाना मेरे बस से तो बाहर था। मैं जैसे ही कुछ आगे बढ़ी मेरे पीछे एक और दरवाज़ा बंद हो गया था। मैं रुक कर उसे देखने लगी, तभी मुझे एक आवाज सुनाई दी। ऐसा लगा जैसे कोई मदद के लिए पुकार रहा हो। मैं तेज़ी से उस ओर भागी। मैं वहां पहुंची तो देखा कि एक जेलनुमा कमरे में मेरे पिता पड़े थे और उनके सीने में चाक़ू गडा हुआ था। मैं उनके पास गयी तो उन्होंने कहा, ‘भागो ताश्री! वो यहीं है।” मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वही तांत्रिक खड़ा था काले कपड़ों में, गले में माला, लाल आँखें, हाथ में त्रिशूल......... । मैं उसे देखकर भागने लगी। वो भी मेरे पीछे ही भागने लगा। ‘तुम ग्यारहवां सूत्र हो’ वो चिल्ला रहा था। मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी मेरे पीछे दरवाज़े बंद होते जा रहे थे। तभी मैं अचानक रुक गयी। वो तांत्रिक भी मुझसे कुछ कदम दूर ही रुक गया। ‘तुम ग्यारहवां सूत्र हो’ उसने धीमी आवाज में कहा, जैसे वो भी दौड़ते दौड़ते थक गया हो।
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: रहस्यमई आँखें

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 16:07

“मैं ताश्री हूँ।” मैंने उसके पास जाते हुए कहा। “मैं कोई ग्यारहवां सूत्र नहीं हूँ गुरुदेव!” मैं उनका चेहरा साफ़ देख सकती थी। यह वही चेहरा था जो उस तस्वीर में था। “हम सभी हैं।” उन्होंने मुस्कुराकर कहा और रेत बन कर फर्श पर गिर गये। वहाँ सिर्फ वो त्रिशूल बची थी, जो उनके हाथ में थी।

“मेरे अंतर्मन में तुम्हारा स्वागत है ताश्री।” एक आवाज गूंजी यह मृत्युंजय की थी। “जिज्ञासा एक बुरी चीज है ताश्री! यह अक्सर हमसे वह करवाती है जो हमें नहीं करना चाहिए।” मैंने वो त्रिशूल उठा लिया। “किसी के अन्तर्मन पर नियंत्रण का सबसे आसान तरीका है उसके डर को समझना। हम मंत्र के प्रयोग से व्यक्ति को खिलौने कि तरह नचा सकते हैं।” उसने कहा। मैं इस कमरे कि दीवारों को देखने लगी जो पूरी तरह से रेत से बनी हुई थी। इस महल को बहुत ही सोच समझकर बनाया गया था। रेत कोई निशान नहीं छोड़ती, यह भावशून्यता का प्रतीक है, बल्कि मृत्युंजय के पूरे अंतर्मन में ही कहीं पानी नहीं था, यादों को छिपाने का एक सोचा समझा तरीका....... यह एक स्वनिर्मित अंतर्मन था जिसका एक-एक हिस्सा मृत्युंजय ने खुद तैयार किया था और मैं अब उसके छल के सबसे मजबूत किले में कैद थी। एक अन्तिम दरवाज़ा बंद हुआ और अब मैं एक छोटे से कमरे में कैद थी।

“यह सब किसलिए? तुम आखिर चाहते क्या हो?” मैंने दरवाज़े कि सलाखें पकड़ते हुए कहा।

“पहिये की खोज किसने कि थी?” वो मेरे सामने सलाखों के उस पार प्रकट हुआ। “वह कौन था जिसने पहली नाव बनाई थी या फिर वो जिसने पहली खेती की होगी? घडी का आविष्कारक........ कपड़ों का....... या पहले कागज़ और पेन का...... या फिर तुम्हारे चश्मे के लेंस का..... इन सब के आविष्कारक कौन थे? कौन थे जिन्होंने ये सृजन किये थे..... हम नहीं जानते। इतिहास सृजनकर्ताओ को याद नहीं रखता, वह सिर्फ विनाशकों को याद रखता है।” उसकी आवाज इतनी तेज़ थी कि पूरे महल में गूंज रही थी मगर उसके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी। । “कौन सा युद्ध कब हुआ था? कौन जीता कौन हारा....... कितने लोग मरे। हम यह याद रखते है। पहला और दूसरा विश्वयुद्ध, इन्हें तो हमने समय मापने कि इकाई बना दिया है। हम विनाशकों को महिमामण्डित करते है, उनकी मूर्तियाँ लगाते है उनकी याद में कवितायेँ सुनाते है और सृजनकर्ता? वे इतिहास की धुल में दब कर रह जाते है.....” वो एक पल रुका और फिर बोलता रहा।

“मेरे पिता एक अच्छे इन्सान थे, वे सृजन करना चाहते थे मगर अफ़सोस इतिहास उन्हें याद नहीं रखेगा। यह उसकी विशेषता ही नहीं है। मैं वो भूल नहीं करूँगा, ,मैं कुछ ऐसा करूँगा की इतिहास सदियों तक मुझे याद रखेगा। तुम्हें एक उपहार मिला है ताश्री! तुम्हारी आँखों में एक अद्भुत शक्ति है, यह शक्ति कुछ मनचलों से स्वयं का बचाव करने या फिर किसी के अंतर्मन से खेलने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, इसका उचित प्रयोग होना चाहिए, दुनिया को पता चलना चाहिए कि तुम चमत्कार हो, तंत्र का चमत्कार........ हजारों तांत्रिकों की मेहनत का परिणाम! लोगों को पता चलाना चाहिए कि तंत्र शास्त्र और तांत्रिक कोई मज़ाक नहीं है, वो कुछ ऐसा अद्भुत भी कर सकते है। हमें तुम्हारी ताकत को दुनिया के सामने लाना होगा।” वो मेरी ओर देखने लगा जैसे मेरी प्रतिक्रिया जानना चाहता हो।
“तुम विज्ञान कि बात कर रहे हो, मैं तुम्हें विज्ञान के बारे में बताती हूँ।” मैंने कुछ पल सोचा और कहा। “ 1997 में नासा ने अन्तरिक्ष में वायेजर नाम का एक यान प्रक्षेपित किया था। यह यान अभी पृथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर है और आने वाले वर्षों में हजारों वर्षों तक ब्रम्हाण्ड की यात्रा करता रहेगा। इस यान में एक रिकार्ड है जिसमें पृथ्वी से जुडी आवाजें, चित्र आदि है ताकि भविष्य में अगर किसी बुद्धिमान जीव को यह मिले तो वह पृथ्वी के बारे में जान सके और यकीन मानो मृत्युंजय उस रिकार्ड में किसी भी विनाशक का नामों निशान तक नहीं होगा। वहाँ सिर्फ सृजनकर्ता ही है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि इतिहास किसे याद रखता है, महत्वपूर्ण यह है कि भविष्य किसे याद रखता है, यह हमारे ऊपर है कि हम क्या बनना चाहते है? अपने इतिहास कि परछाई या फिर भविष्य की चमक............” उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा और फिर मुस्कुराया, जैसे मेरी बात उसे कोई नादानी लगी हो।

“मैं जानता था तुम नहीं मानोगी, इसीलिए मैंने यह योजना बनाई थी। काल के क्रम में सिर्फ शक्तिशाली बचता है, कमज़ोर हमेशा विलुप्त हो जाता है। तुम इस शक्ति को संभालने के योग्य नहीं हो इसलिए अब तुम्हारा अंतर्मन हमेशा के लिए यहीं कैद रहेगा। मैं तंत्र कि सहायता से तुम्हारी शक्ति वहां मौजूद हजारों तांत्रिकों तक पहुंचा दूंगा। उनमें से प्रत्येक के पास वह ताकत होगी जो तुम्हारे पास है और तब विश्व को तांत्रिक समाज की ताकत पता चलेगी। हम एक शक्तिशाली समाज बनकर उभरेंगे जो युगों तक जाना और माना जायेगा। हम ही भविष्य है”। उसने ठहाका लगाकर कहा। मैंने अपना सर झटका। मृत्युंजय, मैंने जितना सोचा था उससे भी जादा खतरनाक था। उसने सोच समझकर एक छल रचा था ताकि वो मेरा फायदा उठा सके, और मैं आसानी से उसके जाल में फंस गयी थी। मैं इधर-उधर देखने लगी मगर मुझे कुछ भी ऐसा नहीं दिख रहा था जिससे यहाँ से बाहर निकला जा सके। तभी मुझे कुछ याद आया। मैंने अपनी आँखें बंद की।

“कोई फायदा नहीं है। तुम किसी भी हालत में यहाँ से बाहर नहीं निकल सकती।” मृत्युंजय ने मुझे आँखें बंद करते हुई देखकर कहा।

“तुमने इस महल को कितनी भी बारीकी से क्यों ना बनाया हो मगर तुमने एक भूल कर दी।” मृत्युंजय मुझे घूरने लगा। “तुमने इसे रेत से बनाया है।” मैंने अपनी आँखें खोल दी। बाहर बादलों के गरजने कि आवाज आई। मृत्युंजय ने दौड़कर खिड़की से बाहर देखा। “यह असंभव है, इस रेगिस्तान में कभी बारिश नहीं होती है।”

“तुम भूल गए मृत्युंजय, हम दूसरों के अंतर्मन में ज्यादा शक्तिशाली होते है। हम अभी तुम्हारे अंतर्मन में है।” बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गयी।

इस महल की दीवारें, छत सब गलने लगीं। कुछ ही देर में सिर्फ रेत ही रेत बची थी।

‘मैं ताश्री हूँ बेवकूफ!” मैंने मुस्कुराकर मृत्युंजय की तरफ देखकर कहा। ऊपर काले बादलों से घिरा आसमान दिख रहा था। चारों तरफ उस महल के बड़े-बड़े टूकडे दिख रहे थे। मैं वहाँ से बाहर निकलने लगी।
“ तुम कुछ भी हो, यहाँ से बच कर नहीं जा सकती।” उसने गुस्से से मेरी ओर देखा और मेरी तरफ बढ़ने लगा।

“तुम्हें लगता है तुम अपनी बेटी से लड़ पाओगे?” मैंने कहा।

“तुम मेरी बेटी नहीं हो।” मृत्युंजय ने झल्ला कर कहा।

“मैंने ऐसा कब कहा?” मैंने आसमान कि तरफ देखते हुए कहा। वहाँ से उड़ते हुए घोड़ों से बंधी एक बग्घी आ रही थी जिसे दिव्या चला रही थी।

“क्षमा करना हमें पहुँचने में विलम्ब हो गया।” जैसे ही वो बग्घी जमीन पर उतरी दिव्या ने उतरते हुए कहा।

“नहीं तुम बिल्कुल सही समय पर आई हो।” मैंने मुस्कुराकर कहा।

“तुम यहाँ क्या कर रही हो?” मृत्युंजय ने गुस्से से दिव्या कि तरफ देखते हुए कहा।

‘यही सवाल तो मैं भी आपसे पुछ सकती हूँ। ताश्री को पहले ही आपके गलत इरादों का अंदेशा हो गया था। इसलिए उसने मुझे पहले ही अपने अंतर्मन में बुला लिया था। ताश्री को जाने दीजिये पिताजी।”

“मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ, तंत्र और तांत्रिक समाज कि भलाई के लिए कर रहा हूँ। तंत्र विलुप्त होने की कगार पर है और उसे बचाने का यही एक मात्र रास्ता है।”

“तंत्र को किसी की रक्षा कि आवश्यकता नहीं है, कम से कम आप जैसे रक्षक कि तो नहीं।” दिव्या ने घृणा से कहा।

“तुम्हें उसका परिणाम भुगतना पडेगा।” मृत्युंजय ने गुस्से से कहा।

“क्यों नहीं...... ताश्री, तुम जाओ, इनसे मैं निपट लुंगी।” दिव्या ने मुझे जाने का इशारा कर कहा।

“मैं बग्घी पर सवार हो गयी। “अलविदा मृत्युंजय! फिर मिलते है।” मैंने मृत्युंजय से कहा और अपनी आँखें बंद कर ली, एक सफ़ेद प्रकाश हुआ और मैं एक घास के हरे भरे मैदान में थी। मैंने घोड़ों कि लगाम खींची और वे हवा में उड़ गये। पहले जंगल, फिर समुद्र, फिर पहाड़ के ऊपर से उड़ते हुए हम बर्फ कि सफ़ेद चोटियों तक पहुँच गये। अंत में हम उस गुफा तक पहुंचे। मैंने बग्घी को खोल दिया और जाने का इशारा किया। वो जाने को तैयार नहीं थे। “तुम अपना मकसद पूरा कर चुकी हो अब तुम लौट जाओ, मेरी चिंता मत करो मैं जल्द ही लौट आऊंगी। उन्होंने हाँ में सर हिलाया और फिर हवा में उड़ गये। मैं कुछ देर उन्हें उड़ते हुए देखती रही। फिर मैंने उस गुफा कि तरफ देखा और फिर एक निःश्वास लेकर गुफा कि तरफ बढ़ गयी। कुछ अन्दर जाने पर मुझे एक दरवाज़ा दिखा। यह बंद था। मैंने थोडा ढूंढा तो मुझे वो पत्थर दिख गया जिसपर त्रिशूल का निशान था। मैंने अपने हाथ में जो त्रिशूल था उसे उस निशान पर रख दिया।

“ठहरो......... कौन हो तुम?” एक आवाज गूंजी।

“मैं ताश्री हूँ।” मैंने कहा।
“मैं ताश्री हूँ।” मैंने कहा।

“यहाँ क्यों आई हो?” उस आवाज ने गरजते हुए पूछा।

“मुझे रुद्र से मिलना है।” मैंने एक पल रुककर कहा।

“रुद्र किसी से नहीं मिलते।” उसने कहा। “तुम तो पात्र भी नहीं हो।”

“हम सब है, मुझसे किसी ने कहा था।” मैंने असमंजस में कहा।

“ठीक है। मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो, फिर तुम अन्दर जा सकती हो। उसने थोडा सा ढीला पड़ते हुए कहा।

“तुम अगर कोई आध्यात्मिक पहेली पुछने वाले हो तो रहने दो, मैंने कोई शास्त्र-वास्त्र नहीं पढ़े हैं।” मैंने बेरुखी से कहा।

“मैं तुमसे वो पुछ ही नहीं सकता हूँ जो तुम्हें ज्ञात न हो।”
वह कुछ देर रुका और फिर बोलना शुरू किया।
“एक लड़का और लड़की एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। वो उस दिन एक समुद्री तूफ़ान में फंस गये। किसी तरह लकड़ी के एक टूकडे के सहारे उस टापू के किनारे पहुंचे। उस सुनसान टापू पर उस लडके और लड़की के अलावा और कोई भी नहीं था। कुछ आगे चलने पर उन्हें एक खुबसुरत महल दिखाई दिया, जिसके पास ही एक सुन्दर फलों का बगीचा था। इस महल में वो सारी सुविधायें थीं जिसके कोई ख्वाब देखता है। लड़की ख़ुशी से झूम उठी, उसने निर्णय किया कि वो अब यहीं रहेंगे, वापस नहीं जायेंगे। लडके ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराया। उसने अपनी जेब से चाक़ू निकाला और लड़की के सीने में उतार दिया।
लडके ने लड़की को क्यों मारा, जबकि वो उससे बहुत प्यार करता था?

मैं उसके सवाल का एक-एक शब्द बहुत ध्यान से सुन रही थी, मगर अंत तक आते-आते मैं चौंक गयी। ‘ये कैसा बेतुका सवाल है।’ मैंने मन ही मन में कहा। मैं अपने दीमाग पर जोर डालने लगी मगर उस सवाल का कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। लड़का अगर लड़की से प्यार करता तो वो उसे क्यों मारेगा? अगर लड़की को कोई खतरा था तो उसे लड़की को बचना चाहिए था, मारने से क्या होगा?

“क्या हुआ?” मुझे परेशान देखकर फिर से वो आवाज आई।

“बड़ा अजीब सवाल है। मुझे नहीं लगता है कि मैं इसका जवाब जानती हूँ। तुम कोई दूसरा सवाल पूछो।” मैंने निराश होकर कहा।

“कोई दूसरा सवाल नहीं है, सिर्फ एक ही सवाल है। एक ही होता है, जिसका जवाब ढूंढना होता है। मैंने कहा था तुम जवाब जानती हो, बस तुम्हें समझना है।”

“नहीं! मैं नहीं जानती।” मैंने झुंझलाकर कहा।

“तब तुम वापस लौट सकती हो।”

“नहीं मैं वापस नहीं लौट सकती। यहाँ तक पहुँचने के लिए मैंने बहुत मेहनत की है। कोई दूसरा रास्ता नहीं है?” मैंने घबराकर कहा। मुझे लगा था मैं मेरी माँ से बेहतर हूँ, मगर मैं तो उतना भी नहीं कर पाई थी जो उन्होंने आसानी से कर दिया था। मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था।

“कोई दूसरा रास्ता नहीं है।” उस आवाज ने कहा।

“हमेशा से एक दूसरा रास्ता होता है।” मैंने विश्वास से कहा और अपनी आँखें बंद की। वो दरवाजा मुड़ने लगा, कुछ ही देर में वो टूटकर निचे गिर गया। “मैंने कहा था न!” मैंने मुस्कुराकर कहा और आगे बढ़ गयी।
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Re: रहस्यमई आँखें

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 16:07

“आगे सब कुछ वैसा ही था जैसा मेरी माँ ने कहा था। एक पानी का तालाब, आगे हरा भरा मैदान और उससे आगे एक पर्वत था। यह बाहर के वातावरण से बिल्कुल अलग था। मैंने एक बार उस पर्वत कि तरफ देखा और फिर आगे बढ़ने लगी। काफी देर चलने के बाद आखिर मैं उस पर्वत के ऊपर पहुँच ही गयी। मगर यह क्या? यहाँ तो कुछ भी नहीं था। थोडा सा खुला मैदान था और फिर आगे एक गहरी खाई थी।

“यह क्या है, रुद्र कहाँ है?” मैंने झल्लाकर कहा।

“वो यहीं हैं, मगर तुम उन्हें तबतक नहीं देख सकती जबतक तुम उस सवाल का जवाब नहीं ढूंढ लेती।” फिर से वो आवाज गुंजी।

“क्या बकवास है? मैं इतनी मेहनत से यहाँ आई हूँ, तुम ऐसा कैसे कर सकते हो?” मैंने गुस्से से कहा।

“मैंने तुम्हें पहले ही कहा था। तुम्हें जब उस सवाल का जवाब मिल जाए तुम वापस आ सकती हो।” एक तेज़ रोशनी चमकने लगी। “नहीं।” मैं जोर से चिल्लाई। वो रोशनी चारों तरफ फ़ैल गयी और मेरी आँखें खुल गयी।

सूत्र साधना को शुरू हुए तीन घंटे हुए थे। मेरे जागने के आधे घंटे पहले ही मृत्युंजय भी जागा था, मगर इस आधे घंटे में ही उसने अपना खेल रच दिया था।

जब मुझे होश आया तब मैंने देखा कि वो दस लडकियां बेहोश पड़ी हुई थी, मगर वे सभी सुरक्षित थीं। सारे तांत्रिक गुस्से से मेरी ओर देख रहे थी।

“तुम रुद्र से मिली?” मेरे जागते ही मृत्युंजय ने पूछा। उसकी आवाज इतनी शालीन थी जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैंने ना में सर हिला दिया।

“तुम मिल भी नहीं सकती थी।” वह गुस्से से मेरी ओर देख कर बोला। “मैंने कहा था साथियों इस लड़की ने छल किया है....... यह अपवित्र है।” मृत्युंजय ने मेरी ओर घृणा भरी नज़रों से देखकर सभी तांत्रिकों को संबोधित करते हुए कहा। अचानक मुझे ध्यान आया कि मैंने चश्मा नहीं पहना है मगर मैं किसी के अंतर्मन में नहीं थी।

‘संगठन की वर्षों की मेहनत इस लड़की के वासना कि अग्नि में स्वाहा हो गयी।” मृत्युंजय ने आवेश में कहा। सभी तांत्रिक आपस में बात करने लगे जैसे कोई निर्णय ले रहे हो। “इसको इसके किये का दण्ड मिलना चाहिए।” एक तांत्रिक चिल्लाया। “हां..... सूत्र साधना कि असफलता के कारक को दण्ड मिलना ही चाहिए।” दूसरा तांत्रिक भी चिल्लाया और फिर कोहराम मचने लगा।

“बेशक मिलना चाहिये।” मैंने उठकर कहा। “सूत्र साधना की असफलता के कारक को दण्ड मिलना ही चाहिए। यही वो व्यक्ति है जिसने मेरे अंतर्मन में घुसपैठ कि थी।” मैंने अपना बचाव करते हुए कहा।

“उल्टा चोर कोतवाल को डांटे.......” मृत्युंजय ने हंसते हुए कहा। “यह लड़की अपनी असफलता का भार मुझ पर लादना चाहती है। मैं ही वो व्यक्ति हूँ जिसने इस साधना के लिए सर्वाधिक परिश्रम किया था, भला मैं इसे असफल क्यों बनाना चाहूंगा?”
“तुम असफलता के कलंक से बचने के लिए बकवास बातें कर रही हो, बल्कि हकीकत यह है कि इसकी असफलता की मात्र तुम जिम्मेदार हो।” मृत्युंजय के चेहरे पर उसकी कुटिलता साफ़ नजर आ रही थी।

“जिम्मेदार वही होते है, जो प्रयास करते है।” मैंने मृत्युंजय कि आँखों में आँखे डालकर कहा। इस बार वो मेरी आँखों में खुद के प्रति नफ़रत साफ़ देख सकता था। “क्यों हर बार साधना के लिए बाहर से कुछ मासूमों को बुलाया जाता है?” मैंने सभी तांत्रिकों की तरफ देखकर गरजते हुए पूछा।

“क्यों आप तांत्रिकों में से कोई इस साधना के लिए सूत्र नहीं बनता है?” सब मेरी ओर ही देख रहे थे। “क्योंकि आप जानते है कि इस साधना में जान का खतरा है। आप इसकी सफलता का फल तो लेना चाहते है मगर इसकी असफलता का काल दंश नहीं सहना चाहते। किसी पर असफलता का लांछन लगाना आसान होता है, मगर कोशिश करना मुश्किल होता है।”
मुझे लगा था कि मेरी इस बात का उनपर कोई असर होगा, मगर उन्हें यह मेरी असफलता पर सफाई भर लगी। दरअसल इंसान वही सुनता है जो उसे अच्छी लगती है। फिलहाल मेरी हर बात उनका गुस्सा और बढ़ा रही थी।

“इसे मृत्यु दण्ड मिलना चाहिए।” मृत्युंजय ने मेरे पास आते हुए कहा। “हाँ इसे मृत्यु दण्ड मिलना चाहिए।” फिर से एक तांत्रिक ने हाँ में हाँ मिलाई। “मृत्यु दण्ड..... मृत्यु दण्ड..........” और सभी एक स्वर में चिल्लाने लगें। हर इंसान के मन में एक गुस्सा भरा होता है, उसे बस एक अवसर चाहिए उस गुस्से को बाहर निकालने के लिये....... फिलहाल वो अवसर मैं थी।

“मैं मृत्युंजय हूँ......” मृत्युंजय ने मेरे पास आकर धीरे से कहा। “.........तुम छल में कभी मुझसे नहीं जीत सकती।” उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी।

“हाँ.... मगर तंत्र में जीत सकती हूँ।” मैंने मुस्कुराकर कहा।
मैंने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद की और फिर दुबारा खोल कर उन तांत्रिकों की ओर देखने लगी। उनके चिल्लाने कि आवाज कम पड़ने लगी थी और सब मंत्रमुग्ध होकर मेरी ओर देखने लगे। कुछ देर बाद एक-एक कर वो सब बेहोश होने लगें। एक मिनट से भी कम समय में सारे तांत्रिक जमीन पर पड़े थे। मृत्युंजय हक्का-बक्का मुझे यह सब करते देख रहा था।

“रवि!” मैंने कहा तो मृत्युंजय मेरे मुंह से अपना असली नाम सुनकर चौंक गया। “मुझे नहीं मालूम की तुम तंत्र को कितनी गंभीरता से लेते हो, मगर मैं इसे बचपन से जीती आई हूँ।” मैंने उसकी आँखों में देखा और कुछ ही पल में वो भी जमीन पर पड़ा था।

उस हॉल में हजारों तांत्रिक एक साथ बेहोश पड़े थे। उनकी साँसों की आवाज के अलावा कोई आवाज नहीं थी। मैं हमेशा से यह करना चाहती थी, यह मेरी सम्मोहित करने की ताकत की पराकाष्ठा थी। मगर मेरा सर तेजी से दर्द कर रहा था और शायद मुझे डर भी लग रहा था। शायद भय स्त्री का स्वाभाविक गुण है।

मैं तेज़ी से वहाँ से बाहर निकली और अन्तस के कमरे की तरफ बढ़ी जहाँ अन्तस दिव्या के साथ मेरा इंतज़ार कर रहा था। यह अन्तस की ही योजना थी कि दिव्या को मेरे अंतर्मन में भेजा जाए। वो जानता था कि मृत्युंजय कोई न कोई छल अवश्य करेगा और ऐसे में सिर्फ उसकी बेटी ही उसे रोक सकती है।

मैं उसके कमरे तक पहुंची और दरवाज़ा खोला तो देखा कि दिव्या लेटी हुई थी और उसके पास ही अन्तस बैठा था।

“इसे अभी तक होश नहीं आया?” मैंने अन्दर प्रवेश करते हुए कहा। “हमें निकलना होगा। मामला काफी बिगड़ चुका है।” वो चुपचाप गुमसुम बैठा हुआ था, मैंने ध्यान से देखा तो पता चला कि दुखी भी था। “क्या हुआ?” मैंने उसके पास जाकर पूछा। उसकी आँखों में आंसुओं कि बुंदे थी, जिन्हें देखकर मैं जडवत हो गयी। मुझे किस अनहोनी कि आशंका हो रही थी। “क्या हुआ अन्तस?” मैंने अन्तस को झकझोरते हुए कहा। उसकी आँखों से आंसुओं कि धारा बहने लगी थी। “वो नहीं रही......” अन्तस ने टूटे हुए शब्दों में कहा। ‘दिव्या..... वो.....” उसने एक बार दिव्या की तरफ देखा और फिर मेरी ओर। “क्या बकवास कर रहे हो? ऐसा कैसे हो सकता है?” मैं दिव्या को हिलाने लगी मगर उसमें कोई हलचल नहीं थी। उसकी धड़कन बंद थी और शरीर ठंढा पड चुका था। “ऐसा नहीं हो सकता है, यह तो सूत्र साधना कि हिस्सा भी नहीं थी फिर इसके साथ ऐसा कैसे हो सकता है?” मेरे भी आंसू बहने लगे थे। मेरे लिए यह स्वीकार करना असंभव था कि मेरी वजह से किसी कि जान भी जा सकती है। मैं तंत्र को आज तक एक खेल मानते आई थी, मगर आज पहली बार मुझे इसकी गंभीरता का एहसास हुआ था। पहली बार इसकी वजह से मेरे किसी अपने की जान गयी थी और आज मुझे महसूस होता है कि इसकी पीड़ा कैसी होती है। मेरी माँ वर्षों तक जिस दर्द के साथ रही थी।

कुछ देर बाद जब मैं संभली तो मुझे याद आया कि मैं एक और बड़ा खतरा पीछे छोड़कर आई थी। अगर मृत्युंजय यहाँ पहुँच गया तो उसे एक पल नहीं लगेगा यह साबित करने में की दिव्या कि मौत के जिम्मेदार मैं और अन्तस हैं।

“हमें चलना होगा अन्तस यहाँ रहना अब हम दोनों के लिए खतरनाक है।” मैंने अन्तस को वास्तविकता का आभास कराते हुए कहा।

“सूत्र साधना का क्या हुआ?” उसने कुछ देर बाद खुद को संभालते हुए मुझसे पूछा।

“मैं असफल रही और मृत्युंजय सबको यह यकीन दिलाने में सफल रहा है कि इसकी वजह हम दोनों है......” मैं कहते-कहते रुक गयी। “मतलब.........?” उसने अपेक्षानुरूप प्रश्न किया।

“मैं तुम्हें सब बता दूंगी, फिलहाल यहाँ से चलो, वो लोग किसी भी वक्त आ सकते है।” मैं दरवाजे की तरफ बढ़ गयी। अन्तस ने अंतिम बार दिव्या की तरफ देखा और फिर मेरे साथ निकल गया।

“तुम्हारा चश्मा कहाँ है?” अचानक अन्तस को ध्यान आया तो उसने अपनी नजरें फेरते हुए कहा।

“मुझे अब उसकी जरूरत नहीं है। मैं स्वयं पर नियंत्रण रखना सिख चुकी हूँ।” अन्तस ने सही कहा था असफल सूत्र साधना भी कुछ ना कुछ फल अवश्य देती है, शायद यह उसी का परिणाम था कि मैं अपनी ताकत को नियंत्रित कर पा रही थी।
यह आधी रात का वक़्त था । पूरे कॉलेज परिसर में शांति पसरी थी। यहाँ के विद्यार्थियों को तो इस बात कि भनक ही नहीं थी कि यहाँ कितनी बड़ी घटना को अंजाम दिया जा रहा था। मगर आसमान में काले बादल थे और ठण्डी हवायें भी चल रहीं थी। हम कॉलेज के गेट तक पहुँच ही थे कि हमें किसी की आवाज सुनाई दी। “रुको।”

हमने मुड़कर देखा, वहाँ वेद खड़ा था।

मैं और अन्तस दोनों उसे देखकर चौंक गये। यह कैसे बच गया जबकि सारे तांत्रिक तो बेहोश थे। हो सकता है शायद यह वहाँ मौजूद ही न हो।

“कहाँ जा रहे हो अन्तस?” उसने पास आकर कहा। अन्तस को देखकर ऐसा नहीं लग रहा था जैसे कि वो वेद को देखकर डरा हो, मगर उसके चेहरे पर एक अजीब बेचैनी झलक रही थी।

“वो असफल रही, तुम्हें अब लौटना होगा।” वेद ने धीमी आवाज में कहा।

“मैं अब भी इसकी मदद कर सकता हूँ।” अन्तस ने मेरी ओर देखकर कहा। उसकी आँखों में अजीब रहस्य था।

“वो तुम्हारा काम नहीं है, तुम्हारा काम ख़त्म हो चुका है, तुम्हारे पास नंबर है, 0, इस सब को यहीं ख़त्म करो और वापस जाओ।” कहते हुए वेद ने पिस्तौल निकाल ली और मुझपर तान दी। “वरना मुझे मजबूरन यह करना पडेगा।”

नंबर के बारे में सुनकर मैंने आश्चर्य से अन्तस की ओर देखा। मगर वो लगातार वेद की तरफ ही देख रहा था, जैसे उसे आँखों ही आँखों में कुछ समझा रहा हो। बरसात शुरू हो गयी थी।

“हमें देर हो रही है, मैंने अन्तस की तरफ देखकर कहा।” मुझे एक पल लगता वेद को बेहोश करने में, मगर मुझे मामला थोडा पेचीदा लग रहा था, इसलिए मैंने पहले अन्तस की स्वीकृति लेनी चाही।

“एक सेकंड।” अन्तस ने कहा और फुर्ती से आगे बढ़ते हुए वेद की पिस्तौल को नीचे गिरा दिया। उसने वेद के पास जाते हुए अपने अंगूठे से जोर से वेद की दोनों आँखों के बीच दबाया। वेद कुछ ही पल में बेहोश होकर निचे गिर गया। यह सब इतनी जल्दी हुआ कि मुझे कुछ समझ ही न आया। मैंने आश्चर्य से अन्तस कि तरफ देखा। उसने मेरी ओर देखा और उसके बाद हमने वहां खड़ी एक कार उठाई और वहाँ से भाग निकले।

“वेद कहाँ लौटने की बात कर रहा था?” जब हम वहाँ से इतनी दूर निकल गए कि हम खतरे से बाहर लग रहे थे तो मैंने अन्तस से पूछा।
अचानक जोर से ब्रेक लगा। सामने एक गाय आ गई थी। मेरी साँसे फुल गयी। अन्तस अब भी शांत बना हुआ था।

“साधना में क्या हुआ था?” अन्तस ने पूछा।

“उसने मुझसे एक प्रश्न पूछा जिसका जवाब मुझे नहीं मालूम। ‘एक लड़का और लड़की एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। वो उस दिन एक समुद्री तूफ़ान में फंस गये। किसी तरह लकड़ी के एक टूकडे के सहारे उस टापू के किनारे पहुंचे। उस सुनसान टापू पर उस लडके और लड़की के अलावा और कोई भी नहीं था। कुछ आगे चलने पर उन्हें एक खुबसुरत महल दिखाई दिया, जिसके पास ही एक सुन्दर फलों का बगीचा था। इस महल में वो सारी सुविधायें थीं जिसके कोई ख्वाब देखता है। लड़की ख़ुशी से झूम उठी, उसने निर्णय किया कि वो अब यहीं रहेंगे, वापस नहीं जायेंगे। लडके ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराया। उसने अपनी जेब से चाक़ू निकाला और लड़की के सीने में उतार दिया।
लडके ने लड़की को क्यों मारा, जबकि वो उससे बहुत प्यार करता था।‘

“अन्तस कोई लड़का अपनी ही प्रेमिका की जान क्यों लेगा?” मैंने अन्तस कि ओर देखकर पूछा। अन्तस ने एक बार मेरी ओर देखा और फिर सामने देखने लगा।
“ताश्री! कुछ सवालों के जवाब हमें खुद ही ढूंढने होते है। यहाँ तुम्हारा सवाल है, जवाब भी तुम्हारा ही होना चाहिए। हो सकता है मेरा जवाब दूसरा हो और तुम्हारा दूसरा हो।” मैं फिर से खामोश बैठ गयी। अन्तस से पुछने इसे तो अच्छा था कि मैं मृत्युंजय से ही पुछ लेती, कम से कम वो जवाब तो देता। तभी अन्तस ने फोन निकाला और किसी को फोन किया। “हैल्लो पुलिस स्टेशन.........”

नन्दीनी और ताश्री को बैठे-बैठे एक घंटा हो चुका था। अँधेरा ढल चुका था, बाहर बादलों की गर्जन साफ़ सुनाई दे रही थी जो की ताश्री के चेहरे की शान्तिः के साथ विरोधाभास कर रही थी। अन्तस चाय बना कर लाया था।
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Re: रहस्यमई आँखें

Postby Jemsbond » 16 Oct 2016 16:08

“संगठन ने दुबारा तुम्हें कभी ढूंढने की कोशिश नहीं की?” नन्दीनी ने चाय का प्याला उठाते हुए कहा।

“मुझे ढूँढ़ना संगठन का पहला लक्ष्य है, मगर जो कोई भी यहाँ आता है, अपनी याददाश्त के कुछ नुकसान के साथ ही लौटता है। आप पहली वो इंसान हैं जो मेरी मर्जी के बिना यहाँ तक पहुंची हो।” ताश्री ने अन्तस की तरफ देखकर कहा जैसे उसकी गलती पर उलाहना दे रही हो। “वैसे तुम्हें मेरे केस में इतनी दिलचस्पी क्यों है? मेरा मतलब है कि तुम्हें मेरे बारे में पता कैसे चला?” ताश्री ने चाय का घूंट भरते हुए कहा। उसे देखकर कहीं से भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वो एक पुलिस अफसर से बात कर रही है। ऐसा लगता था कि वो कोई दो पुरानी सहेलियां मिली हैं।

“मुझे तुम्हारी डायरी मिली थी, जिसे पढ़कर मुझे तुम्हारे बारे में पता चला और फिर एक के बाद एक ऐसी घटनाएं हुई कि मैं इस केस से जुड़ गई और फिर तो मुझे ऐसा लगा कि यह मेरा अंतिम लक्ष्य है।” नन्दीनी ने ताश्री की आँखों में देखकर कहा। ताश्री की आँखों में एक अजीब कशिश थी जो सामने वाले को नजर रोक कर रखने पर मजबूर कर देती थी।

“अवन्तिका आंटी ने तो आपको हमारे बारे में नहीं बताया, फिर आप यहाँ तक कैसे पहुंची?” अन्तस ने नन्दीनी का ध्यान भंग करते हुए पूछा।
नन्दीनी के चेहरे पर एक मुस्कान तैर गई। “मैं यहीं पली बढ़ी हूँ, यह अनाथ आश्रम ही वर्षों तक मेरा घर रहा है। जब मैंने ताश्री के घर पर इसकी तस्वीर देखी तो इसके पीछे यहाँ के संस्थापक की मूर्ति थी। जिसे देखकर मैं समझ गयी की तुम दोनों यहीं हो।”

“आप अंजनी मौसी को जानती थी!” ताश्री ने थोडा आगे झुककर कहा।

“हाँ....... मगर तुम उनकी बहन की बेटी हो यह बात मुझे आज ही पता चली।” ताश्री ने अन्तस कि ओर देखा और उन्होंने आँखों ही आँखों में कुछ इशारा किया।

“क्या हुआ...?” नन्दीनी ने उन्हें देखकर पूछा।

“नन्दीनी अगर आप बुरा न मानो तो मैं आपकी आँखों में देख सकती हूँ?”

“क्यों तुम मेरी याददाश्त मिटाना चाहती हो?” नन्दीनी ने हंसकर कहा।

“नहीं उसके लिए मुझे पुछने कि जरूरत नहीं थी। मुझे बस कुछ जानना है।” ताश्री ने सीधा बैठते हुए कहा।
“ठीक है.......” नन्दीनी को थोडा डर लग रहा था। मगर उसे ताश्री के ऊपर विश्वास था। ताश्री ने कुछ मिनटों तक नन्दीनी की आँखों में देखा और फिर सामान्य हो गयी। नन्दीनी को लगा जैसे उसने कुछ देर कि झपकी ली हो।

“नन्दीनी! आपको मेरी डायरी कहाँ मिली थी।" ताश्री ने नन्दीनी के सामान्य होने पर पूछा।

“मेरे टेबल के ड्रावर में। क्यों?” नन्दीनी ने आशंकित होते हुए पूछा। उसे लग रहा था कि कुछ न कुछ तो जरूर है।

“तुम्हें कभी आश्चर्य नहीं हुआ कि दो साल पुराने केस के पेपर तुम्हारे टेबल के ड्रावर में क्या कर रहें थे?” ताश्री ने नन्दीनी के चेहरे के भाव पढ़ते हुए कहा। “आप मुम्बई जैसे बड़े शहर में इतना अच्छा काम कर रहीं थी तो आपको जयपुर जैसे छोटे शहर में क्यों बुलाया गया?”

“यह मेरा गृहनगर है इसलिए....” नन्दीनी खुद संशय में थी।

“और आपने इसके लिए कोई आवेदन भी नहीं किया था।" नन्दीनी आश्चर्य से ताश्री कि तरफ देखने लगी।

“तुम कहना क्या चाहती हो?”

“मेरी डायरी मिलते ही आपका राणा के घर जाना, फोन करते ही चतुर्वेदी का खुद आपके थाने आ जाना, आपके हवलदार का उसी हॉस्पिटल में एडमिट होना जहां याग्निक काम करता था, विजय का ठीक याग्निक के घर के सामने जीप रोकना, आपको डीनर कराने के लिए उसी रेस्टोरेंट में लेकर जाना जो पूजा का था...... आपको क्या लगता यह सब एक संयोग मात्र है?”

“तुम कहना चाहती हो की.....” नन्दीनी की साँसे फूलने लगीं थी।

“उस ड्राईवर तक रस्सी पहुंचाने वाला और कोई नहीं विजय ही था, विजय ही वेद सागर है।” ताश्री ने अन्तस की तरफ देखकर कहा तो अन्तस भी चौंक गया। नन्दीनी की आँखों में पानी भर आया था।

“मगर मैं ही क्यों?” नन्दीनी ने भार्राते हुए कहा।

“आपके अलावा कोई और हो भी नहीं सकता था। आप अंजनी मौसी को जानती थी, आप याग्निक को जानती थी, आप इस शहर में पली बढीं थी और सबसे बड़ी बात आप एक अच्छी इंसान है। संगठन को इस काम के लिए आपसे बेहतर कोई और नहीं मिल सकता था। मृत्युंजय ने आपसे एक पहेली कही थी। संगठन के इस रणक्षेत्र में आप अर्जुन और विजय वह सारथी जो आपसे युद्ध लड़वा रहा था। संगठन जानता था कि वो मुझे कभी नहीं ढूंढ सकता है और इसीलिए उन्होंने एक सोची समझी साजिश के तहत आपका इस्तेमाल किया। असली छल आपके साथ हुआ है नन्दीनी!” ताश्री ने एक निःश्वास लेकर कहा।

“...........और मुझे हमेशा इसका अफ़सोस रहेगा।” तभी एक आवाज गुंजी, यह आवाज विजय की थी, उसने अपनी आँखों पर काला चश्मा लगा रखा था और वह पिस्तौल थामे खड़ा था। ताश्री, अन्तस और नन्दीनी तीनों एक साथ खड़े हुए।

“तुमने दरवाज़ा ठीक से बंद नहीं किया?” ताश्री ने तीखी नज़रों से अन्तस को देखकर कहा।

“कैसे हो छोटे?” विजय ने पिस्तौल अन्तस की तरफ घुमाते हुए कहा।

“स्वागत है आपका बड़े भाई।” अन्तस ने मुस्कुराकर कहा।

“मुझे माफ करना नन्दीनी तुम एक अच्छी इन्सान हो और तुम्हारा फायदा उठाते हुए मुझे कभी अच्छा नहीं लगा मगर कुछ उद्देश्य इतने महान होते हैं कि उनकी प्राप्ति में कुछ त्याग करने पड़ते है।” नन्दीनी बस गुस्से से विजय की ओर देख रही थी। वो बहुत कुछ कहना चाहती थी मगर उसे कोई शब्द नहीं सूझ रहा था। अजीब बात थी वक़्त ने दोबारा उसे उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था।

“तुम्हारा खेल ख़त्म हुआ अन्तस। उसे अलविदा कह दो।” विजय ने पिस्तौल लोड करते हुए कहा।

“रुको।“ ताश्री ने चिल्लाते हुए कहा। “दिव्या की मौत का जिम्मेदार अन्तस नहीं है, मैं हूँ।” बाहर बादल गरजने लगे थे और बरसात शुरू हो चुकी थी। लगातार बिजलियाँ चमक रहीं थी। ऐसा लग रहा था प्रकृति आज अपना रौद्र रूप दिखाने वाली थी।

‘मैं जानता हूँ, इसीलिए मैंने तुम्हें अलविदा कहने को कहा था।” विजय ने पिस्तौल का मुंह ताश्री की ओर मोड़ दिया।

“मैं अब भी सब ठीक कर सकता हूँ। बस इसे एक और बार मौक़ा चाहिए।” अन्तस ने विनती करते हुए कहा।

“तो अभी करो। या तो तुम ख़त्म करो या फिर मैं करता हूँ।” बाहर हवाएं तेज़ी से चलने लगी थी, खिड़की दरवाजे खड़खड़ाने लगे । ताश्री को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है।

अन्तस काफी देर विजय को देखता रहा जैसे कोई निर्णय ले रहा हो। “तो मैं यह करना चाहूँगा।” अन्तस ने आगे बढ़ कर विजय के हाथ से पिस्तौल ले ली और ताश्री पर तान दी।

ताश्री बिल्कुल आश्चर्यचकित हो गयी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अन्तस ने उसपर पिस्तौल तान रखा है। नन्दीनी के भी हाथ-पाँव फुल गये। “यह क्या कर रहे हो अन्तस। तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है। नन्दीनी ने चिल्लाते हुए कहा।

“वही जो तुम्हें करना चाहिए था।” विजय ने मुस्कुराकर नन्दीनी कि ओर देखकर कहा।

अन्तस ने अपनी आँखें बंद कर ली। ताश्री बस अन्तस को देखे जा रही थी। बरसात अपने चरम पर थी और बरसात का पानी धीरे-धीरे घर में घुसने लगा था। अचानक एक कांच का गुलदस्ता फर्श पर गिरा। नन्दीनी ने उधर देखा तो वह टेबल जिस पर वह गुलदस्ता पड़ा था ऊपर हवा में उठाने लगा था। धीरे-धीरे घर का सारा सामान ऊपर हवा में उठाने लगा। नन्दीनी ने ताश्री की तरफ देखा। वह बस अन्तस की ओर देख रही थी। बिना किसी डर के, बिना किसी घबराहट के अपनी परिणिति की प्रतीक्षा में। ‘एक लड़का और लड़की एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। वो उस दिन एक समुद्री तूफ़ान में फंस गये। किसी तरह लकड़ी के एक टूकडे के सहारे उस टापू के किनारे पहुंचे। उस सुनसान टापू पर उस लडके और लड़की के अलावा और कोई भी नहीं था। कुछ आगे चलने पर उन्हें एक खुबसुरत महल दिखाई दिया, जिसके पास ही एक सुन्दर फलों का बगीचा था। इस महल में वो सारी सुविधायें थीं जिसके कोई ख्वाब देखता है। लड़की ख़ुशी से झूम उठी, उसने निर्णय किया कि वो अब यहीं रहेंगे, वापस नहीं जायेंगे। लडके ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराया। उसने अपनी जेब से चाक़ू निकाला और लड़की के सीने में उतार दिया। लडके ने लड़की को क्यों मारा ताश्री, जबकि वो उससे बहुत प्यार करता था।‘

अन्तस ने अपनी आँखें खोली और गोली चला दी। गोली लगते ही ताश्री दो कदम पीछे हटी और फिर सोफे पर गिर गयी। सारा सामान धम्म से जमीन पर गिर गया।

“नहीं............!” नन्दीनी जोर से चिल्लाई।

ताश्री ने आखिरी बार अन्तस को देखा, वो मुस्कुरा रहा था। उसने अपनी आँखें बंद की, एक सफ़ेद प्रकाश हुआ और वो उस जगह खड़ी थी जहां वो सूत्र साधना के अन्तिम चरण पर पहुंची थी। उस पर्वत के शिखर पर जहां एक सपाट मैदान था और आगे एक गहरी खाई थी।

अन्तस ने अपनी आँखें खोली तो वो एक हॉस्पिटल के बेड पर था। उसके सर से कुछ तार जुड़े हुए थे जो पास ही पड़ी एक मशीन से लगे थे और उसी मशीन से निकले कुछ तार पास ही के बेड पर पड़ी एक लड़की के सिर से जुड़े थे। यह ताश्री थी। अन्तस को होश आते ही उस कमरे में हलचल मच गयी और दो व्यक्ति दौड़कर उसके पास आ गए। इनमें से एक अवन्तिका थी और दूसरी एक नर्स थी जिसने अन्तस को सहारा देकर उठने में मदद की।

“मुझे कितना वक़्त लगा?” अन्तस ने अपनी आँखें दबाकर रोशनी के हिसाब से उन्हें संयोजित करते हुए पूछा।

“एक सप्ताह हुआ है। मुझे लगा आप भी कोमा में चले गए है।” उस नर्स ने अन्तस के सिर से तार हटाते हुए कहा।

“कुछ हुआ डॉक्टर अन्तस, मेरी बेटी ठीक तो हो जायेगी न?” अवन्तिका ने आतुरता से पूछा। अन्तस ने एक बार ताश्री की तरफ देखा। वह शांत चित लेटी हुई थी। “मैंने पूरी कोशिश की थी” अन्तस ने दुखी होकर अवन्तिका की तरफ देखा। “अब यह सिर्फ उसके ऊपर है।”

‘मगर आपने तो कहा था कि आप उसे कोमा से बाहर ला सकते है!” अवन्तिका ने दुखी होकर कहा।

“देखिये मैं सिर्फ कोशिश कर सकता हूँ....... और आप सोच भी नहीं सकती की कि मैंने कितनी कोशिश की थी।” अन्तस ने ताश्री की ओर देखकर एक निःश्वास लेते हुए कहा। “मगर अभी भी एक उम्मीद बाकी है।” अन्तस ने खड़े होते हुए कहा।
अवन्तिका निढाल सी ताश्री कि बेड पर बैठ गयी।”हाँ... वो लाकर का पासवर्ड..... 2121 है।” अन्तस ने अवन्तिका की तरफ देखकर कहा।

“मुझे मालूम है..... वो तो मैंने आपकी काबिलीयत जाँचने के लिए माँगा था।” अवन्तिका ने ताश्री के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
अन्तस ने हाँ में गर्दन हिलाया और तेज़ी से बाहर निकल गया।
“नर्स मेरे घर से क्या खबर है?” अवन्तिका को एक आवाज दूर जाती हुई सुनाई दी।
“हाँ दिव्या मैडम ने आज सुबह ही फोन किया था..”

ताश्री उस पर्वत के शिखर पर खड़ी थी, जहां सामने एक गहरी खाई थी। ठण्डी हवाएं चल रही थी।
“तुम्हें उस सवाल का जवाब मिल गया?” वो आवाज गूंजी।

“बिलकुल!” ताश्री ने कदम आगे बढायें और उस खाई के मुहाने पर जाकर खड़ी हो गयी। “तुमने सही कहा था। मैं तब तक रुद्र को नहीं देख सकती जबतक मैं उस सवाल का जवाब नहीं ढूंढ लेती।” ताश्री ने उस खाई के अन्दर देखते हुए कहा। यह एक गहरी, अँधेरी खाई थी जिसके अन्दर कुछ भी देख पाना मुमकिन नहीं था। “वो हमेशा से यहीं था मगर मैं उसे देख ही नहीं पाई। मेरी माँ ने सही कहा था, वह कुछ नहीं है।”

“तो तुम्हें उस सवाल का जवाब मिल गया।” उस आवाज ने निश्चितता के साथ कहा।

“हाँ..... क्योंकि वो लड़की सपने में थी।”
ताश्री ने मुस्कुराकर कहा और फिर उस खाई में कूद गयी।


“स”
मनस्त्वं
व्योमत्वं
मरुदशी
मरुत्सारथीदशी
त्वं आपस
त्वं भुमि
त्वयी परिणताय
नहियरम्

त्वमेव सात्वानं
ऋणमणिपुं
विश्वव्भुषा
चिदानन्दाकारम्
शिवेन्दति
भावेनविग्नशे
“हं”


“स्वप्न और वास्तविकता के मध्य एक सूक्ष्म अन्तर होता है और जब हम यह अन्तर पहचान लेते हैं, हम जाग जाते हैं।”
-ताश्री
-------------------------------------------------The End--------------------------------------------
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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