रहस्यमई आँखें complete

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Jemsbond
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रहस्यमई आँखें complete

Post by Jemsbond » 08 Jul 2016 06:56

रहस्यमई आँखें

मैं कॉलेज जाने के लिए घर से निकली ही थी कि मुझे लगा कि कोई मेरा पीछा कर रहा हैं आज तो कोई रिक्शा भी नहीं दीख रहा था, कॉलेज के लिए लेट भी हो रही थी तो मैंने चल कर जाना ही बेहतर समझा. इतनी सर्दी की सुबह में भी रोड बिलकुल सुनसान थी, न ही कोई गाडी वाला आ-जा रहा था. मुझे अब भी कोई मेरे पीछे आते लग रहा था, मैंने पीछे मुड़ कर देखा लेकिन कोई नज़र नहीं आया. लेकिन मुझे डर लगने लगा था, इतनी सुनसान रोड...सारी दुकाने बंद पड़ी थी, जैसे कर्फ्यू लगा हो. मैं जैसे दोड़ने लगी थी. लेकिन क्या फायदा, कॉलेज तो यहाँ से एक किलोमीटर दूर था...और तभी वो मेरे सामने वो आ गया, एक हट्टा-कट्टा, लम्बी दाढ़ी वाला, काला चोगा पहने बुढा तांत्रिक, मैं पसीने से भीग गयी, मेरे पैर बंध गए, मैं बुत बन कर खड़ी हो गयी. उसकी लाल लाल आँखे मुझे घूरने लगी. “ग्यारहवां सूत्र...” उसने कहा और मुझे अपने कंधे पर उठा लिया. दिन दहाड़े मेरा अपहरण किया जा रहा था, मैं चीखना चाहती थी, पर मेरी आवाज ही नहीं निकल रही थी, अचानक मेरी जोर से एक चीख निकली और मेरी नींद खुल गई. मैं पूरी पसीने से भीग चुकी थी.
मुझे पिछले कुछ दिनों से लगातार ऐसे सपने आ रहे थे. किसी मनोविज्ञान के स्टूडेंट के लिए सपने भी एक अध्ययन की वस्तु होते हैं, फिर चाहे वो डरावने ही क्यों न हो. लेकिन लगातार ऐसे सपने आना मेरे लिए चिंता की बात थी. शायद ज्यदा मैडिटेशन करने की वजह से ऐसा हो रहा था. मैडिटेशन के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं, मुझे अब पता चला था.****
आज कल लडकियों का कॉलेज जाना भी मुश्किल हो गया हैं. लगता हैं जैसे हम लडकियां न होकर कपड़ो की दूकान में खड़ा पुतला हो. कुछ नजरे चुरा कर देखते हैं, कुछ सीना तान कर देखते हैं, कुछ कमैंट्स करते हैं लेकिन हम सिर्फ नज़रे उठा कर देख ले तो इसे हमारी गुस्ताखी समझा जाता हैं. उन्हें ऐसा लगता हैं कि हम ‘तैयार’ हैं; और गलती से अगर किसी से बात कर लो तो उसे लगता हैं कि हमें तो बस उसी के लिए बनाया गया हैं.
कुछ लड़के हमारे कॉलेज के बाहर भी खड़े रहते हैं. उस चाय वाले की दूकान के पास, इस उम्मीद में कोई कोई न कोई तो फंसेगी. आती-जाती लडकियों को ताड़ते रहते हैं. हमें भी वैसे उनकी आदत पड़ चुकी हैं. रिक्शे से उतरते वक़्त एक बार मैने बस नज़र उठा कर उधर देखा. आज* वहाँ पर एक नया लड़का खडा था, उनके साथ नहीं, उनसे थोडा सा दूर होकर. वो शायद मुझे ही देख रहा था, मेरी नज़र उस पर पड़ी तो वो थोडा सतर्क हो गया और नजरे चुरा ली. नजरे चुराये या लड़ाए इन लडको का इरादा एक ही होता हैं, बस किसी भी तरह लड़की सेट होनी चाहिए. रिक्शे से उतर कर कॉलेज में घुसने तक वह लगातार मुझे ही देख रहा था.
वैसे वो लड़का बाकी से अलग लग रहा था, शक्ल सूरत से, पहनावे से, उसके चहरे से एक स्थिरता झलकती थी, ठहरे हुए समंदर जैसी. हो सकता वो बस किसी को कॉलेज छोड़ने आया हो. वैसे लग भी मासूम ही रहा था. अरे! नहीं...नहीं... यहाँ पहली नज़र में प्यार जैसा कुछ नहीं. यहाँ हर दूसरा लड़का अपने आप को हीरो समझता हैं, और हर लड़की को अपनी हेरोइन... हम ऐसे हर लड़के पर ध्यान देने लग जाये तो हो गया हमारा तो सत्यानाश. और वैसे भी आजकल प्यार करता ही कौन हैं? प्यार तो बस एक नाव हैं किनारे तक पहुँचने की खातिर.* ताश्री तो इन सब लफडो से दूर ही अच्छी. वैसे भी कॉलेज से लौटेते वक़्त वो लड़का मुझे वहाँ नहीं दिखा.

08/01/2013
आज वापस वो लड़का वही खड़ा था और आज तो उसने नज़रे भी नहीं चुराई. लगातार मुझे घूरे ही जा रहा था. मन में तो आया* बोल दूँ कि खा जाएगा क्या? शायद वो खुद भी यही चाहता था कि मैं उसे देखते हुए देखू. अब कल स्कार्फ से चेहरा ढँक कर ही जाउंगी. घुंगट प्रथा ख़त्म हो गई पर इन छिछोरो की वजह से हमें आज भी चेहरा छुपा कर ही जाना पड़ता हैं. वैसे हम कितना भी चेहरा छुपा ले ये देख ही लेते हैं, नज़रे तो इनकी ख़राब हैं एक घुंगट इन्हें ही निकाल लेना चाहिए. आज तो वापस लौटते वक़्त भी वो वही खड़ा था मेरे साथ-साथ वो भी निकल गया.*
आज शाम को जब फेसबुक चेक किया तो एक अजीब फ्रेंड रिक्वेस्ट आई थी, ‘ब्रहम राक्षस’ नाम का कोई था. लोग आज कल दुसरो को इम्प्रेस करने के लिए क्या-क्या टोटके अपनाते हैं. एक मेसेज भी था ‘हाय’. एक लड़की के लिए यह कोई नहीं बात नहीं हैं रोज पांच-सात फ्रेंड रिक्वेस्ट आती हैं, उतने ही मेसेज. मैं फ्रेंड रिक्वेस्ट हाईड कर दोस्तों से चैट करने लगी वहां

10/01/2013
माफ़ करना, परसों डायरी लिख रही थी तभी खाना खाने के लिए माँ ने बुला लिया था. कल जो हुआ उसके बाद डायरी लिखने की हिम्मत ही नहीं बची. कॉलेज पहुँचने तक सब ठीक था. आज वो लड़का भी वहाँ नहीं था. दो पीरियड निकलने के बाद ही मेरे पेट में दर्द होने लग गया. मैं समझ गयी की यह मासिक आफत फिर से आने वाली हैं. मैंने घर के लिए निकल जाना ही ठीक समझा. दिन के बारह बज रहे थे और इस वक़्त कॉलेज के बाहर से रिक्शा मिलना मुमकिन नहीं था, मुझे आधे किलोमीटर रिक्शा स्टैंड तक चल कर ही जाना था, तब तक रास्ते में कोई न कोई रिक्शा मिल ही जाएगा. मैं धीरे-धीरे चलने लगी. कॉलेज जयपुर से थोडा बाहर हैं और रास्ता थोडा सुनसान हैं बस गाडिया चलती है. लेकिन शुक्र हैं यह कोई सपना नहीं हैं और कोई तांत्रिक आकर मुझे उठा कर नहीं ले जाने वाला और वैसे भी मुझे किसी से डरने की जरुरत नहीं हैं.
तभी सामने से दो लड़के बाइक पर आते दिखे, ये उनमे से ही थे जो कॉलेज के बाहर चाय की दुकान पर खड़े रहते थे. पीछे वाले ने मुझे देख कर आवाज लगाई “मिस गोगल”. हाँ! कॉलेज में मेरा यही नाम पड़ गया था, मैं हमेशा एक काला चश्मा जो लगाये रहती हूँ यहाँ तक की क्ला रूम* में भी, माँ ने इसके लिए कॉलेज के डीन से बात की थी. अब इन छिछोरो को कौन समझाए कि यह चश्मा में उनकी भलाई के लिए ही लगा कर रखती हूँ.
मैं सोचते हुए जा ही रही थी तभी मुझे एक जोर का झटका लगा, मैं नीचे गिर गयी. वो दोनों लड़के वापस आये थे, उनमें से पीछे वाले ने मेरा दुप्पटा खीच लिया था. नीचे गिरने से मेरा चश्मा गिर गया था, पीछे वाला लड़का खी-खी कर हंस रहा था, तभी अचानक उसने आगे हाथ कर बाइक का ब्रेक लगा दिया. बाइक अचानक रुक गई और वो दोनों गिर गए. तभी मेरे पास एक रिक्शा आकर रुका, “बैठो गुडिया” रिक्शे वाले अंकल ने कहा. मैंने पीछे देखा वो दोनों खुद को उठाने की कोशिश कर रहे थे. मैने फटाफट चश्मा पहना और रिक्शे में बैठ गयी.
तुम ठीक तो हो, अंकल ने पूछा.
हाँ अंकल. मैंने कहा. लेकिन नीचे गिरने से मेरे घुटने में चोट आई थी और दाया हाथ भी छिल गया था.
तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड हैं?
न..नहीं मैंने सकपका कर कहा.
तो फिर वो कौन हैं? मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो कोई उन दोनो लडको की धुनाई कर रहा था. ये वही लड़का था, जो मुझे घूरता रहता था.
मुझे नहीं मालुम... मैंने धीरे से कहा.**
घर पहुँच कर मैंने घुटने पर आयोडेक्स की मालिश की और हाथ के भी दवा लगा ली. माँ को मैंने कहा कि चक्कर आकर गिर गयी थी; सच बोल कर मैं उन्हें परेशान नही करना चाहती थी. वैसे भी उन छिछोरो का इलाज तो हो चुका था.*
शाम को जब फेसबुक चलने बैठी तो एक मेसेज आया, उसी ब्रहम राक्षस का था, मैं उसे ब्लॉक करना भूल गयी थी.
तुम ठीक हो?
तुम हो कौन?
वही जिसने तुम्हे आज उन लफंगो से बचाया.
तुमने बचाया? तुमने बस उन्हें पीटा था.
बात तो एक ही हैं.
नहीं, उनका इलाज तो पहले ही हो चुका था. तुमने बेकार में ही मारपीट की.
हो सकता हैं, पर वे दौबारा ऐसा न करे इसलिए उन्हें थोडा समझाने की जरूरत थी.
तुम कौन हो?
माँ को बोलना गुड़ और अजवाइन का हलवा बना कर खिलाये, दर्द कम हो जाएगा.
नहीं, मैंने आयोडेक्स की मालिश कर ली हैं.
मैं उस दर्द की बात नहीं कर रहा हूँ.
तुम्हे उस बारे में कैसे पता?
तुम कॉलेज से जल्दी निकली थी, तुम्हारा चेहरा दर्द से पीला पड़ा था, और ठीक से चल तक नहीं पा रही थी.
तुम आखिर हो कौन और मेरी जासूसी क्यों कर रहे हो?
कल मिलना सब बता दूंगा.
उसने लोगआउट कर दिया. अजीब इन्सान हैं, खतरनाक भी लगता हैं, ऐसे इंसान से तो मैं सात जनम में भी नहीं मिलने वाली.**

16/01/2013
आज जब कॉलेज पहुंची तो वो वही खड़ा था, मुझे देख कर मुस्कुराया, मैंने अपनी नज़रे घुमा ली. अब मुझे भी डर लगने लगा कि आखिर क्यों ये लड़का मेरे पीछे पड़ा हैं? आज शाम को माँ को इस बारे में बताना पड़ेगा या बेहतर होगा कॉलेज के डीन को ही इस बारे में बता दूँ.
आज मुझे प्रेक्टिकम का प्रोजेक्ट सबमिट करवाना था, इतने दिनों तक एब्सेंट रहने के कारण मेरा काफी काम बाकी था. मैंने नीता से उसका प्रोजेक्ट लिया और कॉपी करने लगी. मुझे मालुम था, मैडम इसे पकड़ लेगी लेकिन कुछ नहीं से तो थोडा बहुत ही अच्छा.
कॉलेज ख़त्म होने पर निकली तो वो अब भी वहीं खड़ा था. अजीब निठल्ले लोग हैं, इनके कुछ काम-धंधा भी होता हैं या नहीं. और मान लो अगर सप्ताह भर यहाँ जक मार कर कोई लड़की पटा भी ली तो वो कौनसा इन्हें कमा कर खिलाने वाली हैं? और ऊपर से उसके नखरे का खर्चा अलग... लेकिन होंगे अमिर बाप की औलाद, इन्हें इतनी परवाह कहाँ?
मैं धीरे धीरे चलने लगी. वो लड़का भी मेरे पीछे आने लगा. मुझे गुस्सा आने लगा था. एक बार तो दिल में आया कि मुड़ कर एक थप्पड़ मार दूँ लेकिन मैं चलती रही. वो मेरे पीछे-पीछे ही आ रहा था. मुझे घबराहट होने लगी थी, तभी वो एक दूकान में घुस गया. मैंने राहत की सांस ली. मैंने एक रिक्शा रुकवाया और उसमें बैठ गयी.
शाम को फेसबुक ओन किया तो वो ऑनलाइन था. मैंने उसे मेसेज किया.
तुम मेरा पीछा क्यों कर रहे थे?
मैं तुम्हारा पीछा कर रहा था?
हाँ, और नहीं तो क्या!
तुमने रिक्शा क्यों नहीं लिया?
कॉलेज के बाहर कोई रिक्शा था ही नहीं.
ताश्री! वहां रिक्शा था. रिक्शे वाला रिक्शा रोककर तुम्हे आवाज भी दे रहा था लेकिन तुमने सुना ही नहीं.
(मैंने एक पल के लिए सोचा, हाँ शायद वहां रिक्शा था, अगर नहीं भी था तब भी मुझे रिक्शे का इंतज़ार करना था, मैं चलकर क्यों जा रही थी?)
तुम कॉलेज के बाहर खड़े क्यों रहते हो?
तुम्हारे लिए.
मैं ऐसी-वेसी लड़की नहीं हूँ. बेहतर होगा तुम वक़्त बर्बाद न करो और अपना काम-धंधा करो.
मैं जानता हूँ तुम ऐसी वैसी लड़की नहीं हो. तुम बहुत ही ख़ास हो ताश्री!
बकवास बंद करो, मैं तुम लडको की यह ट्रिक्स अच्छी तरह से जानती हूँ. पहले किसी लड़की के पीछे पड़ो, कुछ भी करके उससे बात करो, उससे बात करके उसे जताओ कि वह स्पेशल हैं और फिर अपना मतलब पुरा कर के भुल जाओ.
तुम जानती हो, तुम्हारे साथ ऐसा कुछ नहीं हो सकता हैं. तुम एक बार मुझ से मिल लो तुम समझ जाओगी कि मैं वो नहीं हूँ जैसा तुम समझ रही हो.
तुम क्या हो मैं अच्छी तरह से समझ रही हूँ. मेरा पीछा करना बंद करो वरना मैं कॉलेज के डीन से शिकयत कर दूंगी.
तुम नहीं कर सकती.
अच्छा! तो फिर देखो.
मैंने उसे ब्लॉक कर दिया. इन छिछोरो को जितना मुंह लगाओ उतना चढ़ते हैं. इसे तो मैं कल बताउंगी ताश्री किसे कहते हैं?

17/01/2013

आज जब कॉलेज पहुंची तो वो मुझे वहां नहीं दिखा. वापस लौटते वक्त भी वो वहां नहीं था. चलो पीछा छुटा. वहां से मैं नीता के साथ ड्रेस लेने चली गयी. ब्लू जींस और ब्लैक टी-शर्ट ली हैं , मेरी फेवरेट हैं, साथ में एक सलवार सुट भी अगले महीने ही मामा के लड़की की शादी हैं न, उसी के लिए.
घर पहुँच कर फेसबुक ऑन किया. आज कोई पॉएम लिखने का मन कर रहा था. वैसे मन तो नए जीन्स-टी में फोटो खींच कर डालने का हो रहा था लेकिन नहीं कर सकती न, काफी रिस्क रहता हैं पता चला किसी ‘हाय, मैं कैसी लग रही हूँ?’ वाले पेज के एडमिन ने कॉपी कर लिया तो मेरी तो बैंड बज जायेगी. तो मैंने एक पॉएम लिखना ही बेहतर समझा.

अजनबी कौन हो तुम?
दिल में तुम, दिमाग़ में तुम,
राग में तुम, आवाज़ में तुम,
पर फिर भी अनजान हो तुम,
अजनबी कौन हो तुम?

खुद कोई सवाल हो या,
हर सवाल का जवाब हो तुम,
अपने हो या बेगाने कोई,
या किस्मत का कोई राज़ हो तुम,
अजनबी कौन हो तुम?

अजीब कविता लिखी न, ख़ास तो कोई था नहीं तो अजनबी के ऊपर ही लिखनी पढ़ी. पोस्ट के ऊपर लाइक्स-कमैंट्स गिन ही रही थी तभी एक मेसेज आया.
सोरी! मैं आज नहीं आ पाया. (अरे! ये तो उसी ब्रहम राक्षस का था, पर मैंने तो इसे ब्लॉक कर दिया था. फिर इसने मेसेज कैसे भेज दिया?)
तुमने मुझे मेसेज कैसे क्या मैंने तो तुम्हे ब्लॉक कर दिया था?
‘1234567890’* उम्मीद हैं तुम अगली बार इससे बेहतर पासवर्ड रखोगी.
ओह! तो तुम एक हैकर हो?
नहीं पर वैसा ही कुछ ...और तुम मुझे अगली बार ब्लॉक करो और अपने पासवर्ड बदलो, उससे पहले तुम अपने नंबर भी बदल लेना और फिर तुम डीन के पास जा सकती हो या बेहतर हैं तुम एक बार मुझसे मिल लो तुम्हे इन सब की जरुरत नहीं पड़ेगी.
Last edited by Jemsbond on 16 Oct 2016 16:09, edited 1 time in total.
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: रहस्यमई आँखें

Post by Jemsbond » 08 Jul 2016 06:56


तो तुम मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो?
नहीं तुम बिना पैसो के भी आ सकती हो.
मैं कही नहीं आने वाली.
‘फ्रेश-ड्रिंक कॉफ़ी शॉप’ पर, तुम्हारे कॉलेज ख़त्म होने के बाद ...और हाँ नयी जीन्स और टी-शर्ट पहन* कर ही आना, तुम उनमें अच्छी दिखोगी. बाय!
वो लॉगआउट हो गया. परेशान कर दिया इसने तो. ठीक हैं! मिल कर देख लेते हैं, कौनसा खा जाएगा? वैसे भी कॉफ़ी शॉप में ही बुला रहा हैं. रोज-रोज के इस झंझट से तो छुटकारा मिलेगा.

18/01/2013
आज कॉलेज पहुंची थी तो अजीब-सी बैचैनी हो रही थी. वैसे बैचेनी तो कल शाम से ही हो रही थी. ठीक से सो भी नहीं पायी थी. मैं एक अजनबी से मिलने जा रही थी जिसे मैं जानती तक नहीं थी और* जो काफी अजीब भी था. ऊपर से आज फिर वो ही तांत्रिक वाला सपना... ‘ग्यारहवां सूत्र’.... वो आखिर कहना क्या चाहता हैं? मुझे साइकोलोजी न लेकर मैथ्स लेनी चाहिए थी? मैंने नेट पर भी सर्च कर के देख लिया ग्यारहवे सूत्र जैसा कुछ हैं ही नहीं. आखिर ये सब हैं क्या बला?
मैंने आज नयी वाली सलवार सूट पहनी थी, वैसे इच्छा तो जीन्स-टी पहनने की थी लेकिन वो कमीना भी तो यही चाहता था. अगर मैं वो ही पहन लेती तो उसे कुछ उल्टा-पुल्टा लगने लग जाता. वो न तो सुबह वहां दिखा, न ही कॉलेज से निकलते वक़्त. वो शायद मुझसे मिलने की तैयारी कर रहा था. मैं कॉलेज ख़त्म होने के बाद कॉफ़ी शॉप पहुंची. धड़कन 100 की.मी. प्रति मिनट की रफ़्तार से चल रही थी. इतनी टेंशन तो मुझे बोर्ड का पहला एग्जाम देते वक़्त भी नहीं हुई थी. वैसे मुझे लडको से कभी डर नहीं लगा हैं क्योंकि वे कभी मेरे लिए खतरा नहीं बन सकते, लेकिन मुझे इस वाले से लग रहा था, ये जिस तरह से बात करता हैं, ऐसा लगता हैं कि यह मुझे बरसो से जानता हैं और उसके बारे में ऐसा ही कुछ मुझे भी लगता हैं.
जब रिक्शे से उतरी तो वो कॉफ़ी शॉप में बैठा था. एकदम शांत जैसे अपनी बरसो पुरानी गर्लफ्रेंड से मिलने वाला हो. हां, लेकिन वो बार-बार इधर उधर देख रहा था जैसे सबकी निगरानी कर रहा हो. मुझे तो आईएसआई का एजेंट लगता हैं, कहीं हमारे शहर में बम-विस्फोट करने तो नहीं आया! खेर मैं जैसे-तैसे उसके पास पहुंची.
"सलवार सूट, से आयातित ही सही भारतीयता छलकती हैं, और सफ़ेद रंग शान्ति का प्रतीक हैं. मुझे तुमसे यही पहन कर आने की उम्मीद थी." (मेरे बैठने से पहले ही उसने कहा.)
तुम्हे तो जींस-टी पसंद थे, मैं उनमें तुम्हे अच्छी लगती थी.
नहीं वह तो तुम्हे पसंद हैं... (तभी वेटर लेमन जूस लेकर आता हैं. कॉफ़ी शॉप में लेमन जूस, अजीब हैं!)
ये लो तुम्हारे लिए लेमन जूस! तुम कॉफी नहीं पीती न, तुम्हारे लिए स्पेशल आर्डर करवाया हैं.
तुम कौन हो और मेरी जासूसी क्यों कर रहे हो? मैंने पूछा.
यह सवाल तो तुम्हे खुद से पूछना चाहिए, कि तूम कौन हो?
हु ये आध्यात्मिक पहेलियां मैं बहुत पढ़ चुकी हूँ, बेहतर हैं तुम मुद्दे की बात करो.
पढने में और उन्हें सुलझाने में काफी फर्क होता हैं. तुम...
बकवास बंद करो और मेरी जासूसी करना बंद करो; वरना मैं अपने पापा से तुम्हारी शिकायत कर दूंगी. (मैंने गुस्से में कहा.)
नहीं तुम नहीं कर सकती, मरे हुए लोग शिकायते नहीं सुनते.(मुझे अब बहुत ही ज्यादा गुस्सा आने लगा था, यह इंसान मेरे बारे में बहुत ही ज्यादा जानता हैं और मैं इसका नाम तक नहीं जानती थी)
तुम चाहते क्या हो? मुझे परेशान क्यों कर रहे हो?
मैं तो बस तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ.
मेरी मदद! किसलिए? मुझे किसी मदद की जरुरत नहीं हैं. सीधे-सीधे बताओ तुम क्या चाहते हो, वरना मैं खुद ही पता लूंगी.
हाँ बिलकुल. लेकिन तब तुम केवल वो ही जान सकोगी जो की मैं जानता हूँ, वो नही जो तुम जानना चाहती हो.
मैं कुछ नहीं जानना चाहती. बेहतर हैं तुम मेरा पीछा करना छोड़ दो.* (मैं वहाँ से उठ खड़ी हुई)
अपने पिता के बारे में भी नहीं? (मैं मुड़ चुकी थी कि उसने कहा)
बकवास बंद करो...(मैं जोर से चिल्लाई, इतनी जोर से कि सब लोग हमारी तरफ ही देखने लगे.) अगली बार तुम मुझे नज़र भी आये तो मैं तुम्हारी शिकायत सीधे पुलिस में करुँगी.
मैंने उसकी तरफ देखा तक नहीं और सीधे बाहर निकल गयी. कितने घटिया लोग होते हैं किसी लड़की को पटाने के लिए उसके मरे हुई पिता का सहारा लेने से भी नहीं चुकते.*

घर पहुंची तो सिर दर्द से फटने लगा था. मैंने खाना-वाना कुछ नहीं खाया हैं बाम लगाकर सो गई. जब उठी तो सब कुछ किसी तूफ़ान की तरह वापस दिमाग में आ गया. माँ चाय लेकर आ गई.
तुम्हारा फोन कहाँ हैं श्री?
वो...फोन....(मैं इधर उधर ढूंडने लगी)
क्या ढूंड रही हो? यहाँ नहीं हैं. तुम रिक्शे में भूल आई थी. किसी लड़के का फ़ोन आया था कल जाकर हॉस्पिटल के बाहर उससे ले लेना.
थैंक गोड! लेकिन माँ... (मैं कुछ परेशान सी हो गई, मुझे पिछला कुछ याद ही नहीं आ रहा था)
क्या हो गया श्री? आजकल बहुत परेशान लग रही हो. कोई प्रॉब्लम हैं क्या? (माँ ने पास में बैठते हुए कहा)
नहीं माँ कुछ नहीं. बस थोड़ा-सा सरदर्द हैं.
कोई नहीं. चाय पीकर कुछ देर और आराम कर लो. मैं खाना बना लेती हूँ1

19-01-2013

आज सुबह उठते ही काम था जो मेरे दिमाग में घूम रहा था कि मुझे मेरा मोबाइल लेने जाना हैं। कल से मोबाइल के बिना ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने हाथ काट कर ले लिया हो।
जब हॉस्पिटल के सामने पहुंची तो बैचेनी हो रही थी, पता नहीं उस रिक्शे वाले को कैसे पहचानूँगी? वो मुझे पहचान भी पायेगा या नहीं? जब वहां खड़े खड़े आधा घंटा बीत गया तो मुझे लगने लगा की शायद अब वो रिक्शे वाला न आना हैं। शायद उसका इरादा बदल गया होगा।
तभी मुझे सामने वो ही कॉलेज वाला लड़का आता दिखा। मैं उसे देखते ही पीछे घूम गयी और दूकान में देखने लगी। लेकिन वो मेरी तरफ ही आ रहा था।
ताश्री!
उसने पुकारा तो मैं काँप गयी। मैं पीछे मुड़ी और गुस्से से उसे देखने लगी।
तुम्हारा मोबाइल, उसने मोबाइल जेब से निकालते हुए कहा।
ओह तो ये तुम्हारे पास था।
हाँ, तुम गुस्से गुस्से मैं कैफे में ही भूल आई थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा।
तुमने तो पूरा खोल कर देख लिया होगा। मैंने* फोन चेक करते हुए कहा।
नही पासवर्ड लगा हुआ था। वो मुस्कुराते हुए मुझे ऐसे निहार रहा था जैसे मैं कोई छोटी बच्ची हूँ।
पर तुम तो हैकर हो।
नही मैं कोई हैकर-वेकर नही हूँ। वो तो साइबर कैफे पर तुम्हे पासवर्ड डालते हुए देखा था।
तुम कबसे मेरे पीछे लगे हुए हो? मुझे सच में आश्चर्य हो रहा था।
जब से तुम पैदा हुई हो। उसने अपनी मुस्कराहट और चौड़ी करते हुए कहा।
बकवास मत करो।
तो चलो काम की बात करते हैं।
काम की बात? वो क्या?
तुम्हारे पिता...
तुम.....मैं फिर से गुस्से से भर गयी थी। मेरे मुंह से शब्द तक न निकले।
ताश्री मेरी बात तो सुनो। वो गिड़गिड़ाया।
क्या कहना हैं? मैं गुस्से मैं चिल्लाई।
तुम्हारे पिता मरे नहीं हैं, वो ज़िंदा हैं।



--मेरी आँखों से आंसुओ की धारा निकल पड़ी। इसलिए नही की मुझे उस व्यक्ति की बातो पर लेश मात्र भी विश्वास था। बल्कि इसलिए कि वो लड़का अपने मकसद के लियें मेरे मरे हुए बाप तक का इस्तेमाल कर रहा था।
तुम जो कोई भी हो और मेरे बारे में चाहे जितना* कुछ भी जानते हो। एक बात कान खोल कर सुन लो* मैं तुम्हारी इन बकवास बातो पर बिल्कुल भी विश्वास नही करने वाली।
...और अपनी माँ पर? क्या तुमने उनसे कभी नही पूछा क्यों अब भी लाल साडी पहनती हैं और* सिंदूर लगाती हैं।
मैंने मुड़ कर उसकी तरफ देखा तक नही। मैं चलती गयी....चलती गयी...आधे किलोमीटर तक और फिर मैंने रिक्शा ले लिया।
मैं जानती हूँ...अच्छी तरह से...क्यों माँ लाल साडी पहनती हैं? क्यों सिंदूर लगाती हैं?-

21/01/2013

आज छुट्टी का दिन था सो सुबह लेट ही उठी थी. सर चकरा रहा था. सरदर्द नहीं था लेकिन तरह तरह के विचार आ रहे थे. रह रह कर रोना भी आ रहा था. लड़कियो के लिए यह आम बात हैं, ज़रा सी भी तकलीफ हो तो आंसू निकल आते हैं. यह एक तरह का वरदान हैं, दर्द अगर अंदर जमा हो जाये तो तेज़ाब बन जाता हैं.

लेकिन रोना कोई उपाय न था. मैं जानती थी मुझे क्या करना था. मैं उठी और आसन ज़माने लगी. मैं अक्सर जब बहुत ज्यादा परेशान होती हूँ तो कुछ देर मैडिटेशन कर लेती हूँ. दुसरो के दिमाग में घुसने की वजह से मेरे दिमाग को जिस तरह की उथल पुथल से गुजरना पड़ता हैं मेरे लिये यह ज़रूरी भी हैं. वर्षो के अभ्यास से मैं अपने मूलाधार को मजबूत कर चुकी थी, और कुछ उच्च चक्रों की अनुभूति भी मुझे होने लगी थी.

मैंने अपनी आँखे बंद की और धीरे-धीरे अपने अंतर्मन की गहराइयो में खोने लगी. मैं अब एक जाग्रत स्वप्न में थी. यह एक आम सपने जैसा ही था फर्क बस इतना हैं कि मैं जानती हूँ की यह एक सपना हैं और मैं इसे एक हद तक नियंत्रित कर सकती हूँ.

यह एक हरा भरा मैदान था.* जिसके पास से एक नदी बह रही थी. मैं अक्सर यही पर आती हूँ. नदी के किनारे एक* घोडा खड़ा था. मैं उस घोड़े के पास गयी, वो मुझे देख कर हिनहिनाया. मैं अब उसका रंग देख सकती थी, यह हलके नीले रंग का था. मैंने इसकी पीठ पर हाथ घुमाया तो वह शांत खड़ा हो गया. वह जुगाली कर रहा था, मैं उसे निहारने लगी.
तभी अचानक वो रुक गया. शायद उसके गले में कुछ फंस गया था, उसकी साँस अटक गयी. वह इधर उधर उछलने लगा. मैं धीरे-धीरे अपना हाथ उसके पास ले गयी ताकि वो शांत हो जाये, और फिर मैंने उसकी गर्दन पर एक जोर से मुक्का मारा. वो चीज उसके गले से निकल कर उसके मुंह में आ गयी और फिर उसने उसे बाहर उगल दिया.

अरे! यह तो एक मंगलसूत्र था.

उफ़्फ़! यह तो मेरा यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ रहा था. मेरी आँखे खुल गयी थी. मैं उठकर बाहर आ गयी.

बाहर आकर देखा तो माँ तैयार हो रही थी. तैयार क्या हो रही थी, खुद को व्यवस्थित भर कर रही थी. वह आज भी किसी नवयौवना की भाँति खूबसूरत लगती हैं.* पीपल के पत्ते पर किसी ने नीली मणि रख दी हो वैसी नीली आँखे, भोर को आसमान में डूबते सूरज जैसी माथे पर एक छोटी सी लाल बिंदी, लाल साड़ी और आभूषण के नाम पर मात्र गले में एक मंगलसूत्र. मुझे इस सब पर कभी आश्चर्य नही होता हैं क्योंकि इसकी वजह भी मैं खुद हूँ!

माँ कहती हैं कि पापा के गुज़रने के बाद जब उन्होंने पहली बार सफ़ेद साडी पहनी थी तो मैं उनके पास ही नहीं गयी थी, काफी देर तक रोती रही लेकिन उनके पास नही गयी. तक किसी ने समझाया की शायद बच्ची सफ़ेद रंग से डरती हैं, इसलिए वो तुम्हारे पास न आ रही हैं. फिर बड़ी हुई तो दूसरी औरतो को देखकर मैंने भी माँ से सजने संवरने की ज़िद की, पहले तो माँ ने बहुत आनाकानी की लेकिन फिर अपनी इकलौती बेटी की ज़िद के आगे उन्हें झुकना पड़ा.

और वैसे भी ये सही भी लगता हैं. कैसे किसी स्त्री का श्रृंगार किसी पुरुष के होने या न होने पर निर्भर हो सकता हैं, और अगर वास्तव ऐसा हैं तो फिर कुंवारी कन्याओ का श्रृंगार भी वर्जित हो. अगर समाज किसी विधवा के श्रृंगार को लेकर इतना ही चिंतित हैं तो ऐसे ही नियम पुरुषो पर क्यों न थोपे गए. यह भी तो हो सकता था कि* विधवा स्त्री को देखते ही सारे पुरुष आँखों पर पट्टी बाँध लेते! लेकिन नही सारी जिम्मेदारियों, सारे कर्तव्यों, सारे महानताओं के टैग केवल स्त्रियों पर ही लगाये गए हैं.

मुझे घूर क्या रही हैं, पहले कभी देखा नही क्या? माँ ने मुझे देखकर कहा.
आप बिल्कुल परी जैसी लग रही हो माँ.
धत्! परी तो हैं मेरी. तू उठ कर तैयार भी हो गयी? मुझे तो लगा रविवार हैं तो दो बजे तक पड़े पड़े मोबइल से खेलती रहेगी.
माँ! आप भी...मैं मडिटेशन कर रही थी.
तेरे टोटके तू ही जाने. सब लडकिया व्रत-पूजा-पाठ करती हैं. वो तो तू करती नही, मंदिर कभी जाती नही, ले देकर यह मैडिटेशन लेकर बैठ जाती हैं.
जरुरी हैं माँ! दुनिया भर का कचरा अपने दिमाग में लेकर घूमती हूँ, जो चीजे लोग पूरी ज़िन्दगी में नही देख पाते वो मैं कुछ मिनटो में ही देख लेती हूँ. कभी कभी तो मैं सोचती हूँ ये मुझे मिला ही क्यों? पुरे दिन चश्मा लगाकर घुमो, वो भी आम नही बड़ा काला चश्मा! मिस गोगल नाम रख दिया हैं लोगो ने मेरा. इसका कोई इलाज विलाज नही होता क्या माँ?
इलाज बीमारी का होता हैं ताश्री, वरदान का नहीं.
बकवास. ऐसे वरदान से तो श्राप ही अच्छा. और आखिर मुझे ही क्यों मिला यह 'वरदान'?
क्योंकि तुम खास हो ताश्री.
खास! वो भी तो यही कह रहा था. मैं सोचने लगी.
मार्किट चलेगी? माँ ने मेरी तन्द्रा तोड़ते हुए कहा.
हां, क्यों नहीं? वैसे भी घर पर बैठे बैठे बोर हो जाउंगी.
अगले दिन कॉलेज पहुंची तो वो वहां नहीं था। एक पल को तो सुकून मिला लेकिन फिर सोचा कि क्या फायदा अभी नही हैं तो दोपहर को आ जाएगा।
मैं लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ रही थी कि पूजा मेरे पास दौड़ कर आई। मैंने पूछा, क्या हुआ?
उसने एक ख़त मेरी और बढ़ा दिया।
किसने दिया हैं?
रोहित ने...
ओह रोहित!

ये रोहित भी काफी दिनों से मेरी ताँका झांकी कर रहा था। पिछले महीने मैंने उससे नोट्स मांगे थे, पढ़ने में थोडा होशियार था और राइटिंग भी अच्छी थी, तो मैंने उसी से ले लिये। मुझे लगा सीधा साधा हैं तो कोई दिक्कत नहीं होगी। लेकिन यहाँ तो सभी ताक में घूमते हैं। हम लड़कियां जैसे लड़की न होकर गूगल हो, जिसे देखो पिंग करता रहता हैं। लग गया तो ठीक वरना क्या जाता हैं?

ख़त में वही सब था। दो चार शायरियाँ, थोड़ी मेरी थोड़ी मेरे बालो की तारीफ़...तुम्हारी खूबसरत आँखों में डूब जाना चाहता हूँ ।(कोशिश तो कर!)
और अंत में मैं तुम्हारे बिना नही जी सकता (हाँ तो मर क्यों नही जाते कौन तुम्हारे लिए यहाँ करवा चौथ करके बैठा हैं?)

पहले तो मन हुआ की फाड़ कर फेंक दूँ लेकिन फिर मैंने जवाब देना ही ठीक समझा।
चल। मैंने कहा।
कहाँ?
उसको जवाब देकर आते हैं।
पागल हो गयी हैं क्या! ये लड़के तो होते ही लफंगे हैं किस किस से भिड़ती फिरेगी?
हाँ लेकिन सब बांस की मचान हैं, एक खींचेंगे तो सारे के सारे धड़ाम से निचे आ गिरेंगे।
*****************
दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
*****************

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Re: रहस्यमई आँखें

Post by Jemsbond » 08 Jul 2016 06:57



मैं क्लास तक पहुंची। अंदर क्लास चल रही थी, प्रोफेसर पढ़ा रहे थे और वो आगे ही आगे बैठा था, ऐसे ध्यान से सुन रहा था* जैसे सारा ज्ञान इसी को अपने अंदर समाना हो।
मैं अंदर गयी और आगे स्टेज पर जाकर खड़ी हो गयी। सब आँखे फाड़ कर देखने लगे।
एक सेकंड सर! मुझे कुछ कहना हैं। मैंने प्रोफेसर से कहा।
दोस्तों! मुझे एक ख़त मिला हैं। हमारी क्लास के बहुत ही होनहार छात्र ने लिखा हैं। जिसकी राइटिंग सबसे खूबसूरत हैं। मैं रोहित की तरफ देखकर ही बोल रही थी, सब समझ गए थे कि मैं किसकी बात कर रही थी।
ये मुझे दिलोजान से चाहते हैं कहते हैं मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नही रह सकता। तो ठीक है मैं इनका प्रेम प्रस्ताव स्वीकार करती हूँ। ये अभी इसी वक़्त चले और मेरे साथ कोर्ट में शादी कर ले।

सभी लोग हंसने लगे और काना फुंसी करने लगे।
सर ये लेटर मैंने नही लिखा हैं...ये लेटर मेरा नही है।
रोहित अपनी सीट से खड़ा ही गया और थरथराते हुए बोला।

बकवास बंद करो। मैं अच्छी तरह से पहचानता हूँ यह राइटिंग तुम्हारी ही हैं। प्रोफेसर ने कहा। चलो ताश्री हम डीन के पास चलते हैं।

नही सर उसकी कोई जरुरत नही हैं। मैं डीन को बोलूंगी, वो इसके मम्मी-पापा को बुलाएँगे और उनके सामने इसे दो चार बाते सुनाएंगे और क्या होगा? मेरी इससे कोई दुश्मनी नही हैं। क्लास के सभी लड़के सुन ले अगर कोई मुझसे प्यार-वार करता हो तो अभी सबके सामने बता दे, बाद में ये कुतो वाली हरकते करने की जरुरत नही हैं।

क्लास तालियों से गूंज उठी, जो न बजाना चाहते थे उन्हें भी मज़बूरी में बजानी पड़ी। मेरी आँखों से आंसू आने लगे थे, मैं चुपचाप बाहर आ गयी।

इतनी हिम्मत कहाँ से लाती हो? बाहर आकर पूजा ने पूछा।
क्या पता शायद पैदाइशी हैं। मैंने मुस्कुराकर कहा।
कॉलेज ख़त्म होने पर मैं बाहर निकली. सामने देखा तो वो लड़का नही था. मैंने चैन की सांस ली. मैं वही खड़ी होकर पूजा का इंतज़ार करने लगी. तभी पीछे से आवाज़ आई.

वहां कहाँ ढूंढ रही हो? मैं यहाँ हूँ.

वो मेरे पीछे ही खड़ा था, बिलकुल गेट के पास में छिपकर.

भाड़ में जाओ. मैंने कहा और मैं आगे बढ़ गई.
अच्छा सबक सिखाया तुमने उसे.
इसे कैसे पता चला? पर पूछने से क्या फायदा इसे तो सब पता रहता ही हैं. मैं चुपचाप आगे बढ़ गई.
तुम जैसी अगर सारी लडकिया हो जाए तो हम जैसे लड़को की जरुरत ही न रहेगी. वो मेरे पीछे पीछे ही चलने लगा.
तुम जैसे लफंगों की वैसे भी जरुरत नही हैं. इस बार मेरे मुंह से निकल ही गया.

मैं ऑटो तक पहुंची और अंदर* बैठ गयी. मैं यह भी भूल गई थी कि मैं वहां पूजा के लिए रुकी हुई थी. थोड़ी सी आगे बढ़ी ही थी कि मैंने ऑटो के कांच से पीछे देखा. मैं यह देखना चाहती थी कि क्या वो अब तक वही खड़ा हैं या निकल गया हैं. लेकिन ये क्या?!!
अंकल-अंकल* ऑटो रोको! मैं जोर से चिल्लाई.
ऑटो रुकते ही मैं वापस पीछे लपकी.

मेरे ऑटो में बैठते ही एक जीप उसके पास आकर रुकी थी. उसमें* से तीन-चार लड़के उतरे और उस लड़के को पीटना चालू कर दिया.
दो लोग अभी भी जीप में ही बैठे थे. उसमें से एक तो वो था जो उस दिन गाड़ी चला रहा था जिस दिन पीछे वाले ने मेरा दुप्पटा खिंचा था. दूसरा कोई 45-50 साल का आदमी था. उस आदमी ने सलीके से एक काला सूट पहन रखा था, गले में मोटी सोने की चैन जिसमें एक त्रिशूल लटका हुआ था, दोनों हाथो में* रत्नजड़ित चार-चार* अंगूठियां और कटावदार राजपूती मुच्छे; कुल जमा कोई रईस आदमी लग रहा था.
मुझे आता देख* जीप में बैठा वो लड़का चिल्लाया. दादा! यही हैं वो लड़की, यही हैं!
वो आदमी जीप से उतरा* और मेरी और बढ़ने लगा. मैं चश्मा उतारने ही वाली थी कि रुक गयी. इसने भी तो बड़े काले रंग का चश्मा पहन रखा था.

वो आदमी मुझसे चार कदम दूर ही रुक गया और मुझे घूरने लगा जैसे मुझमे कुछ ढूंढ रहा हो.
इतने में जीप में बैठा वो लड़का भी उतर गया और मेरी और बढ़ने लगा. इस लड़की को तो मैं नही छोड़ूंगा ....साली...

इसकी तो मैं भी आज बैण्ड बजाने वाली थी. मेरा चश्मे की तरफ बढ़ने ही वाला था कि उस आदमी ने पीछे से उस लड़के का कॉलर पकड़ लिया.
रुको! वो आदमी पीछे मुड़ कर चिल्लाया.
यह सुनते ही वो लड़के जो पीछे उस लड़के की पिटाई कर रहे थे रुक गए.
उस आदमी ने एक बार फिर* मुझे घूरा और उस लड़के से कहा, तुमने इसे छेड़ा था.

उसका दबाव 'छेड़ा' की बजाय 'इसे' पर ज्यादा था,* मानो* छेड़ना तो आम बात हो.
वो दादा...लेकिन....वो लड़का मिमियाया.
घर चल चुपचाप, इससे पहले की मैं यहाँ तुम्हे सबके सामने जूतियाँ दूँ. उस आदमी ने कहा और उसका कॉलर पकड़ कर ही उसे खींचते हुए ले गया. उसने* जीप में बैठते हुए उस लड़के की तरफ उंगली करके कुछ कहा. वो चारो लड़के भी हतभ्रत से जीप में बैठ गए.

ये सब कुछ इतना अजीब तरीके से हुआ की, मुझे कुछ समझ ही नहीं आया था.
मैं दौड़ कर उस लड़के के पास गई और उसे सहारा देकर उठने में मदद करने लगी. इतनी देर में ऑटो भी हमारे पास ही आ गया था.
ये सच में तुम्हारा बॉयफ्रेंड नही हैं! ऑटो वाले अंकल ने उसे ऑटो में बिठाते हुए कहा.
नही...सवाल ही पैदा नही होता. मैंने कहा और ऑटो में बैठ गयी.***
तुम्हे ज्यादा चोट तो नही लगी. मैंने डरते हुए उससे पूछा.
नही बस मामूली हैं. उसने रुमाल से अपने होंठो को दबा रखा था. शायद खून आ रहा था.
बड़ा हीरो बनने का शौक था न! अब और बनो हीरो, तुम्हे क्या जरुरत थी मेरे मामले में पड़ने की. मैंने गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए कहा.
तुमने अपना चश्मा तो नही उतारा?
उसने मुझे अनसुना करते हुए धीरे से कहा.
नहीं, वो तो मुझे घूर रहा था.
उसने तुमसे कुछ कहा?
नही तो...बस घूर रहा था. मैंने झल्लाते हुए कहा.
किस्मत वाले हो बचुआ! सस्ते में बच गए. राणा साहब के भतीजे को पीटा था तुमने, ज़िंदा जला देते. ऑटो वाले अंकल ने कहा.
राणा साहब... मेरे मुंह से धीरे से निकला.
नाम तो मैने भी सुना था, शहर में बहुत सारी फैक्टरियां और होटले हैं उनकी, बहुत ही अमिर आदमी हैं.
...और वो कौन था अंकल, काले कॉट वाला? मैंने पूछा.
अरे, वही तो राणा साहब हैं. मुझे भी समझ में नहीं आ रहा राणा साहब कब से इन बच्चों के झगड़े निपटाने लग गये.
मुझे भी आश्चर्य हुआ.

इतने में ऑटो वाले अंकल ने ब्रेक लगाया. ये लो हॉस्पिटल आ गया.

काका इसे घर छोड़ देना. वो ऑटो से उतरते हुए बोला.
अरे रुको! मैं आ रही हूँ. मैंने कहा.
कुछ नही मामूली खरोंचे हैं, मैं खुद ही दवा लगा लूंगा.
हाँ तुम तो आयुर्वेद के ज्ञाता हो....संदर्भ सोच कर मुझे शर्म आ गयी मैं इससे आगे न बोल पायी. मैं रिक्शे से उतर चुकी थी.

अंदर हॉस्पिटल काउंटर पर, उसे देखते ही रेसेप्शनिस्ट ने पूछा. इतनी चोट कैसे लगी, किसी से झगड़ा हुआ हैं?
नही बाइक से गिर गया था.
ये भी थी साथ में? उसने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा.
हाँ!
तो इसे चोट क्यों नही लगी?
इसने हेलमेट पहन रखा था.
...और तुमने नहीं पहन रखा था? हेलमेट कहाँ हैं?
आपको इलाज करना हैं या मैं किसी दूसरे हॉस्पिटल में जाऊँ. वो थोडा गुस्से से बोला.
ठीक हैं ठीक हैं. नाम बताओ.

मैं उसकी और आँखे फाड़ कर देखने लगी. चलो आज इसका नाम तो पता चलेगा.
राणा...राणा ठाकुर, उसने मेरी और देखकर कहा. मैंने बुरा सा मुंह बनाया और दरवाजे की तरफ देखने लगी.

इसके बाद वो अंदर डॉक्टर को दिखाने चला गया. मैं बाहर बेंच पर बैठ कर इन्तजार करने लगी.
थोड़ी देर बाद वो बाहर आ गया और मेरे सामने आकर खड़ा हो गया. मैं उसे घूरने लगी.
पांच सौं रूपये हैं?
मुझे हंसी आ गयी. मैंने पर्स से पैसे निकाल कर उसे दे दिए.
वो चुपचाप गया और अंदर डॉक्टर को दे आया.

तुमने अपना नाम गलत क्यों बताया? हॉस्पिटल के बाहर मैंने उससे पूछा.
क्यों तुम्हे जानना हैं?
नही, पर सही बता देते तो कोई मार नहीं डालता.
अंतस..अंतस नाम है मेरा.
मेरे ऑटो में बैठते वक्त उसने कहा. उसके बाद मैं घर आ गयी.

22/01/2013

सुबह उठी तो देखा कि कोलेज के लिए पहले ही लेट हो चुकी थी. मैं जल्दी-जल्दी नहाई, माँ ने नाश्ता बना रखा था.
मुझे उठाया क्यों नही माँ?
मैं कौनसा उठ गयी थी जो तुझे उठाती? मैं भी तो अभी-अभी ही उठी थी.
तो आपको कौनसा कोलेज जाना हैं?
मुझे भी आज जल्दी जाना हैं. NGO की कोई ऑडिट आई हुई हैं, शाम को भी शायद लेट आऊँगी. तू खाने का क्या करेगी...बना के जाऊ?
नहीं आज व्रत रख लुंगी. मैंने नाश्ते की प्लेट रखते हुए कहा.
पागल हैं! आज कौनसा व्रत रख लेगी, और अभी नाश्ते में जो ब्रेड ठुंसा हैं उसका क्या?
तो मैं बाहर से कुछ खाकर आ जाउंगी. मैं बैग लेकर आ गयी थी और उसमें किताबे भरने लगी.
रहने दे बाहर से अनाप शनाप कुछ भी खाकर आएगी. मैं अनीता आंटी को बोल दूंगी, उनके बच्चे भी स्कुल से उसी वक्त आते हैं, तेरे लिए भी खाना बना देगी.
रहने दो. मैंने भी उसी टोन में कहा. उनके विचार आपके लिए ज्यादा अच्छे नही हैं, कोलेज तो मैं उनके हिसाब से मौज-मस्ती करने ही जाती हूँ.
तू सबके दिमाग पढ़ती फिरेगी तो उसमें उनकी क्या गलती? कोई सतयुग नही चल रहा हैं, सबकी सोच ऐसी ही होती हैं.
इसकी माँ की....अचानक मेरे मुंह से निकल गया. माँ मेरा मुंह ताकने लगी. ये बैग की चैन ख़राब हो गयी हैं, मैंने सँभलते हुए कहा.
बाहर नुक्कड़ पर वो बैग वाला बैठता हैं उसे दिखा देना. माँ ने कहा.
हाँ ठीक हैं. मैं भाग कर निकली. पहले से ही लेट हो रही थी, यहाँ कंगाली में आटा गिला हो गया था.
दीदी! ये बैग तो पूरा ही ख़राब हो गया हैं, चैन तो में नयी डाल दूंगा पर अन्दर से पूरा खराब हो चूका हैं, नया ही ले लो. बैग वाले ने कहा.
एक बार तो तुम चैन ही लगा दो.
मैं भाग कर कोलेज पहुंची लेकिन आधा घंटा तो लेट हो ही चुकी थी. बाहर ऑटो से उतरी तो सोचा 15-20 मिनट लाइब्रेरी में बैठ कर ही पढ़ लुंगी. तभी सामने वो खड़ा था, अंतस.
अरे! तुम्हारे जख्म तो बहुत जल्दी भर गए. मुझे आश्चर्य हुआ. वास्तव में उसके चेहरे पर सिर्फ निशान ही बचे थे, कोई और होता तो चार दिन बिस्तर से न उठता.
आयुर्वेद का ज्ञाता होने का कुछ तो फायदा होता ही हैं.
और क्या क्या आता हैं तुम्हे?
धीरे-धीरे सब जान जाओगी. ‘धीरे-धीरे’ तो ऐसे बोल रहा था जैसे मेरी इससे सगाई होने वाली हो.
ये लो तुम्हारे पैसे! उसने पांच सो रूपये मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा.
थैंक्स! मेरे मुंह से इतना ही निकला.
वैसे ये पीरियड तो तुम्हारा अटेंड होने से रहा, अगले पीरियड के भी तुम्हारे टीचर नहीं आये हैं. तुम्हारी पूजा भी आज नहीं आई हैं. अकेले कोलेज में धक्के खाने से बेहतर हैं अगर चाहो तो मेरे साथ काफी पीने चल सकती हो.
वो एक सांस में ही सब कह गया. मैं आँखे फाड़कर उसे देख रही थी.
मैं भी इससे थोड़ी बात करना चाह रही थी, पता तो चले आखिर यह चाहता क्या हैं?
एक शर्त पर तुम कोई बकवास नही करोगे!
जैसा तुम चाहो. उसने कहा और हम दोनों कॉफ़ी पीने के लिए निकल गये.
मे आय कम इन मेम? इस्पेक्टर विजय ने कहा तो एसीपी नंदिनी जैसे किसी सपने से बाहर आई. उनकी नज़रे अब भी उस डायरी पर गढ़ी हुई थी.
मे आय कम इन...विजय ने दुबारा पूछा.
हाँ..हाँ आ जाओ. नंदिनी ने बिना उसकी और देखे हुए ही कहा.
एसीपी नन्दिनी का ट्रान्सफर दो दिन पहले ही जयपुर के लोकल थाने में हुआ था, यह उनका गृह नगर भी था. तीन साल पहले ही वो ट्रेनिंग के सिलसिले में मुंबई गयी थी. ट्रेनिंग के बाद पास के ही एक ठाने में बतौर इंस्पेक्टर उनकी ड्यूटी लग गयी थी. वहां उनके काम ने बदमाशो की नींदे उड़ा दी थी. उनके काम को देखते हुए, उन्हें जल्द ही एसीपी बना दिया गया था.
बाहर से सख्त और अन्दर से नर्म नंदिनी दो दिन में ही यहाँ के स्टाफ से घुलमिल गयी थी. इंस्पेक्टर विजय उन्हें काफी काबिल और समझदार लगे थे. वो उनसे यहाँ के सारे मामलो की जानकारी ले रही थी. आज उन्हें किसी महेंद्र प्रताप के केस की जानकारी लेनी थी लेकिन आते ही ऐसी खो गयी कि दो घंटे निकल गए. अंत में विजय खुद ही अन्दर आ गया.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Re: रहस्यमई आँखें

Post by Jemsbond » 08 Jul 2016 06:58


ये सुबह से आप क्या पढ़ रही हैं? विजय ने बैठते हुए कहा.
ये ड्राअर में मिली थी यही देख रही थी, शायद किसी की डायरी हैं...ताश्री नाम की किसी लड़की की. नंदिनी ने नाम देखने का नाटक करते हुए कहा.
ओह ताश्री! अजीब मर्डर केस था यह भी.
मर्डर केस!!? नंदिनी ने चौंकते हुए पूछा.
हां! इस लड़की का मर्डर हो गया था, दो साल पहले, २०१३ का केस हैं.
मर्डर...मगर किसने किया था? नंदिनी ने एक दम दबी आवाज में पूछा.
इसके बॉयफ्रेंड ने.
बॉयफ्रेंड!! मतलब अंतस ने? नंदिनी ने आँखे फाड़कर कहा.
हाँ..शायद यही नाम था. हमारे पुराने एसीपी सर ने इसकी जांच की थी, लेकिन कुछ मिला नही, ये लड़का भी फरार हैं.
फरार मतलब? ये केस अबतक सोल्व नही हुआ?
सोल्वे क्या...साल्व्ड ही हैं मैडम, पहले लड़का-लड़की में प्यार हुआ फिर किसी बात को लेकर झगडा हुआ और फिर लड़के ने गुस्से में आकर लड़की का खून कर दिया. बड़ा ही मामूली केस था.
मामूली? ये कोई मामूली केस नही हो सकता विजय!
ऐसा क्यों मेम? विजय ने पूछा.
...क्योंकि ताश्री कोई मामूली लड़की नही थी. वह बहुत ही ख़ास थी. नंदिनी ने अपनी आँखों के कोरे पूछते हुए कहा.

तुम रहते कहाँ हो? मैंने कुर्सी पर बैठते हुए कहा.
हरिद्वार, उसने कहा.
इसका मतलब तुम जयपुर से नही हो. तो यहाँ क्या कर रहे हो?
किसी काम के सिलसिले में आया हूँ.
और मेरे कॉलेज के बाहर खड़ा रहना भी तुम्हारे काम में ही आता हैं. मैंने उसे घूरते हुए पूछा. वो केवल मुस्कुराया. इतने में वेटर ज्यूस के दो गिलास लेकर आ गया.
आज तुम भी ज्यूस ही पियोगे.
पिनेपल का रस जख्मो को जल्दी भरने में मदद करता हैं.
वैसे तुम काम क्या करते हो? मैंने ज्यूस का घूंट भरते हुए पूछा.
तुम्हारे साथ यही दिक्कत हैं ताश्री! तुम सबकुछ एक ही पल में जान लेना चाहती हो. सच एक बहुत ही कडवी दवा होती हैं, उसे धीरे धीरे लेना चाहिए. वक्त आने पर सच खुद ही सामने आ जाता हैं.
तो तुम मेरे बारें में इतना सबकुछ कैसे जानते हो?
जानना महत्वपूर्ण नही हैं, समझना महत्वपूर्ण हैं. सवाल यह हैं कि क्या मैं तुम्हे समझता हूँ, क्या तुम खुद अपने आप को समझती हो?
मैं मेरे बारे में जो जानती हूँ वही समझती हूँ. नया कुछ नही हैं, जो हैं वो हैं, जैसी हूँ वैसी हूँ. मेरे खुद के बारे में कोई सवाल नही हैं.
मैं विशेषण की नही उद्देश्य की बात कर रहा हूँ.
उद्देश्य से तुम्हारा क्या मतलब हैं, भला मेरे ऊपर कोई विशेष जिम्मेदारी क्यों आएगी?
ईश्वर तोहफे नहीं देता हैं. वह जो कुछ भी करता हैं उसका एक उद्देश्य होता हैं. वह सूरज को रौशनी देता हैं ताकि वह उजाला कर सके.नदियों को पानी देता हैं ताकि वह दुसरो की प्यास मिटा सके.* हर ताकत के साथ एक जिम्मेदारी भी होती हैं.
जलना सूरज का विशेषण हैं, कोई ताकत या जिम्मेदारी नहीं हैं. पानी नदियों को अस्तित्व हैं, पानी का उपयोग जीवो पर निर्भर करता हैं, जीव अगर न भी हो तब भी नदियाँ सुख नही जायेगी, सूरज चमकना बंद नही कर देगा. सृष्टि अपना पालन खुद कर सकती हैं, उसे किसी संयोजक की आवश्यकता नही है. रही बात मेरी, तो मैं जो कुछ भी हूँ, स्वयं की वजह से हूँ, अपने माता-पिता की वजह से हूँ, किसी तीसरे की प्रति मेरी कोई विशेष जिम्मेदारी नही हैं.
आँखे बंद कर लेने से अँधेरा नही हो जाता हैं. रात को एक दिया जला कर अगर हम सोचे की हमने सारे जहाँ में उजाला कर दिया हैं तो हम भ्रम में हैं. तुम व्यक्त की बात कर रही हो, मैं अव्यक्त का कह रहा हूँ.
तो तुम ही बता दो, अव्यक्त क्या हैं? मैंने झुंझलाकर कहा. मैंने अबतक ज्यूस ख़त्म कर दिया था लेकिन उसने ग्लास छुआ तक नही.
मैं तुम्हे सबकुछ एक दिन में नहीं समझा सकता. उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा.
तो तुम मुझसे अब रोज मिलना चाहते हो. मैंने हँसते हुए कहा.
अगर तुम चाहो तो?
मैं चाहूँ तो! मतलब कि अगर मैं न चाहूं तो तुम मेरा पीछा करना छोड़ दोगे.
बेशक! अगर तुम न चाहो, तब यह हमारी आखिरी मुलाकात होगी.
अच्छा! तब तो मैं तुम्हे पहले ही कई बार मना कर चुकी हूँ.
मैं भ्रम की स्थिति में लिए गए निर्णयो को सही नही मानता.
सत्य तो लेकिन मैं अब भी नही जानती.
लेकिन जानना तो चाहती हो, वही काफी हैं.
ठीक हैं मैं सोच कर बताउंगी. मैंने उठते हुए कहा.
23/01/2013
मैं एक सफ़ेद घोड़े पर सवार हूँ जो कि घास से भरे हरे-भरे मैदान में सरपट भाग रहा हैं. आसमान में घने काले बादल छाए हुए हैं. मेरे पीछे-पीछे काले घोड़े पर सवार एक तांत्रिक भी मेरा पीछा कर रहा हैं, जिसके हाथ में एक बड़ा सा त्रिशूल हैं. वह बार बार चिल्ला रहा हैं, तुम ग्यारहवां सूत्र हो ताश्री! तुम ग्यारहवां सूत्र हो. मैंने घोड़े की लगाम खिंची और मैं ओर तेज भागने लगी. वो तांत्रिक भी तेज हो गया और धीरे धीरे मेरे पास आने लगा. जब वो ठीक मेरे बराबर आ गया तो मैंने उसका चेहरा ध्यान से देखा, ये तो राणा ठाकुर था. तुम ख़ास हो ताश्री, तुम ग्यारहवां सूत्र हो. तभी मैंने देखा की सामने अंतस हाथ में एक लट्ठ लिए खड़ा हैं. उसने तांत्रिक वाले घोड़े के पैरो पर लठ्ठ मारा और तांत्रिक घोड़े समेत नीचे गिर गया. तभी वहां तीन चार लड़के और आ गये, उन्होंने अतस को दबोच लिया और उसे पीटने लगे.
मेरा घोडा दौड़ते-दौड़ते* आगे निकल गया. मैं एक जंगल में आ चुकी थी. जंगल के अंदर एक फूलो का बगीचा था. उस बगीचे के दरवाजे पर माँ खड़ी थी. उन्होंने मेरी और देखा जैसे वो मुझसे कुछ कहना चाहती हो लेकिन मैं घोड़े से उतरी और बगीचे के अन्दर चली गयी. सामने बेंच पर कोई बैठा हुआ था. मैं पास में गयी, अरे यह तो पापा थे! बैठो ताश्री... उन्होंने कहा.* मैं तुम्हे किसी से मिलवाना चाहता हूँ. एक छोटा बच्चा कही से निकल कर आया. ये तुम्हारा दोस्त हैं मेरी बच्ची. यह तुम्हारा ध्यान रखेगा. मैंने उस बच्चे की तरफ देखा. मैं तुम्हारा ध्यान रखूँगा. उस बच्चे ने कहा.
तभी अचानक पापा पूरी तरह से काँप गए, एक चाकू उनके सीने से बाहर निकल गया. पापा... पापा....मैं रोने और चिल्लाने लगी....तभी अचानक मेरी नींद खुल गयी.
तुम ठीक तो हो श्री. माँ मेरे पास में खड़ी थी.
हाँ...बुरा सपना देखा था.
अपने पापा को देखा था, माँ ने पास में बैठते हुए कहा.
हाँ..
हम्म! तुम तैयार हो जाओ मैं तुम्हारे लिए चाय बना देती हूँ.
माँ मेरा बचपन में कोई दोस्त था क्या? जब मैं बहुत छोटी थी. मैंने पुछा.
तुम्हारे बचपन में बहुत सारे दोस्त थे, तुम थी ही इतनी प्यारी. माँ ने मुस्कुराते हुए कहा.
नहीं..मेरा मतलब हैं कोई ख़ास दोस्त.
माँ एक पल के लिए रुकी. ख़ास भी थे, क्या हुआ, आज उनकी याद कैसे आ गयी?
मैंने अपने सपने में पापा के साथ छह साल एक लड़के को देखा था.
श्री, तुम दिन में कई सारी चीजे देखती रहती हो, वो भी जो आम लोग नहीं देख पाते. तुम कई सारे लोगो की यादो से रूबरू होती हो, इसलिए तुम्हारे सपने सिर्फ तुम्हारे नही होते, उनमें दुसरे लोगो की यादे भी शामिल होती हैं, इसलिए इतनी चिंता मत करो...फटाफट तैयार हो और बाहर आ जाओ.
मैं नाश्ता करके कोलेज पहुंची तो देखा कि अंतस बाहर नहीं था. मेरी भी अजीब आदत हो गयी थी, पहले तो उसे ढूंढती थी और फिर अगर होता था तो परेशान होती थी.
कुछ देर बाद पूजा भी आ गयी, वो आज मुझे अजीब मुड़ में दिख रही थी, न ठीक से बात कर रही थी, न ही पढाई में उसका ध्यान लग रहा था. पीरियड ख़त्म होने पर हम दोनों बाहर आ गए.
क्या हुआ पूजा कुछ परेशान लग रही हैं. मैंने उससे पूछा.
कुछ नहीं. मेरी तबियत कुछ ठीक नही हैं.
ओह! क्या हुआ, डॉक्टर को बताया?
नही लेकिन अब बता दूंगी. मैं घर जा रही हूँ.
मैं चलूँ साथ में?
नही कोई बात नही मैं चली जाउंगी.
उसके बाद वो घर के लिए निकल गयी. मुझे उसकी बाते कुछ अजीब लग रही थी. वो सोच कुछ रही थी और बोल कुछ रही थी. खैर! मैंने सोचा कि मैं अब कुछ देर लाइब्रेरी में जाकर पढ़ती हूँ. मैं उठी ही थी कि किसी ने मुझे आवाज दी.
मैंने मुड़ कर देखा. यह तो रोहित था. मैं रुक गयी.
मुझे तुमसे कुछ कहना हैं.
अब और क्या कहना हैं? ख़त में सब कुछ कह तो चुके हो.
तुमने मुझे समझा नही ताश्री!
मैं तुम्हे अच्छी तरह से समझ चुकी हूँ और बाकि सबको समझा भी चुकी हूँ. मुझसे प्यार करते हो, शकल देखी हैं तुमने अपनी...
यही तो तुमने मुझे गलत समझा था, मैं तुमसे प्यार नही करता.
मतलब? मैंने चौंकते हुए पूछा.
तुम एक निहायती घमंडी लड़की हो. मुझे नहीं मालुम तुम्हे किस बात का इतना गुरुर है लेकिन तुम इसमें इतनी डूबी हुई हो की तुम देख ही नही सकती हो कि कौन तुमसे प्यार करता हैं और कौन नफरत करता हैं? तुमसे कोई प्यार नही कर सकता ताश्री!
वो इतना कह कर चला गया. मैं बस उसे देखती रही, मुझे समझ में नही आया कि उसने क्या कहा हैं? लेकिन जैसे वो मुझे झंकझोर कर चला गया.
* कोलेज खतम होने पर मैं बाहर आ गयी. अंतस अब भी वहां नही था. शायद अपना काम कर रहा हो. वैसे भी मुझे नया बैग लेना था सो मैं मार्किट की तरफ चल पड़ी. एक दूकान से मैंने बैग लिया और वही पर खड़ी होकर ऑटो का इन्तजार करने लगी. तभी वहां से किसी को बाइक पर गुजरते हुए देखा.
अरे! यह तो पूजा थी. वो बाइक पर एक लड़के के पीछे बैठी हुई थी. उसने अपना चेहरा स्कार्फ से ढक रखा था, लेकिन फिर भी मेरी पहचान में आ ही गयी. इसकी तो तबियत ख़राब थी न, तो फिर यह इस लड़के के साथ क्या कर रही थी? कही इसका कोई चक्कर-वक्कर तो नही हैं?!!
मैं वहाँ खड़े-खड़े यह सब सोच ही रही थी कि मुझे लगा कि कोई मुझे घुर रहा हैं. मैं मुड़ कर देखा तो कोई सच में वहां खड़ा था. यह राणा साहब थे.
वह धीरे-धीरे मेरे पास पास आने लगे. मुझे डर लग रहा था.
तुम वही लड़की हो न, परसों वाली?
उन्होंने मुझे घूरते हुए ही कहा.
जी...मेरे मुंह से इतना ही निकला.
मैं अपने बच्चो की गलती के लिये तुमसे माफ़ी मांगता हूँ, तुम्हे तरह से छेड़ना नही चाहिए था.
मैंने कुछ नही कहा, चुपचाप खड़ी रही. वो बोलते रहे.
पैसे वाले ह हैं तो घुमे-फिरे, मौज मस्ती करे. किसने रोका हैं? लेकिन इस तरह किसी की इज्जत पर हाथ डालना ठीक नहीं हैं. मैंने उन्हें घर जाकर खुब डाटा और धमकी भी दी हैं कि अब अगर तुम्हारी तरफ आँख उठा कर भी देखा तो हालत ख़राब कर दूंगा.
तो फिर आपने अंतस को क्यों पीटा था?
कौन? वो लड़का! उसने राणा ठाकुर के भतीजो को मारा था उसका तो* भुगतान करना ही था. आखिर हमारी भी इज्जत का सवाल हैं. उन्होंने हँसते हुए कहा.
तुम क्या यहाँ ऑटो का इन्तजार कर रही हो. वो कुछ देर रुक कर बोले. तुम चाहो तो मैं तुम्हे तुम्हारे घर छोड़ देता हूँ? उन्होंने अपनी जीप की तरफ देखते हुए कहा.
शुक्रिया! पर मैं घर चली जाउंगी. उसके बाद मैंने ऑटो पकड़ा और घर आ गयी.*
एसीपी नंदिनी और इंस्पेक्टर विजय काफी देर से कुछ चर्चा कर रहे थे.
...तो मैडम यह हैं महेंद्र प्रताप के व्यवसाय का पूरा कच्चा-चिट्ठा. कहने को तो बहुत बड़े उद्योगपति हैं लेकिन शहर के सारे काले कारनामें यही सम्भालता हैं.
ठीक हैं...कल इससे भी मिल लेते हैं. तुम बात कर लेना कि एसीपी मिलना चाहती हैं.
जी..मैडम.
अब मैं घर के लिए निकल रही हूँ.
नंदिनी यहाँ उनको मिले सरकारी क्वार्टर में ही रह रही थी. उनके पास खुद का घर तो पहले भी नही था. वो अनाथ थी और यहाँ के एक अनाथाश्रम में ही पली थी. बचपन से ही पढाई-लिखाई में अव्वल थी, तो अनाथाश्रम ने भी उसकी पढाई लिखी में कोई कसर नही छोड़ी थी. विशेषतः उनकी अंजनी माँ ने...वो वहां की संचालक थी. अनाथाश्रम का सारा काम वही देखती थी. उनको नंदिनी से विशेष लगाव था. बचपन से ही उसको बहुत प्यार से पाला था. नंदिनी ट्यूशन के लिए तो उन्होंने खुद पैसे दिए थे. नंदिनी भी उनकी उम्मीदो पर खरी उतरी थी. एक के बाद एक परीक्षा प्रथम प्रयास में ही पास करती गयी थी. आज वो अपनी काबिलियत के कारण ही एसीपी बन पायी थी. मुंबई जाने के बाद कई दिनों तक तो वो रोज अंजनी माँ से फोन पर बात करती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसका बात होना कम होता गया. अब तो उनका फोन भी नही लगता था. नंदिनी ने सोचा था कि आते ही उनसे मिलूंगी लेकिन यहाँ थाने के काम समझने में इतनी व्यस्त हो गयी कि सुबह से शाम तो थाने में ही हो जाती थी. उसने निश्चय कर लिया कि कम तो वो किसी भी हाल में अनाथाश्रम जाकर ही रहूंगी.
अगले दिन नद्निनी और विजय महेंद्र प्रताप से मिलने जा रहे थे. विजय जीप ड्राइव कर रहा था और नंदिनी पास वाली सिट पर बैठी थी.
...तो विजय तुम्हे उस लड़की की लाश कहाँ मिली थी?
कौन मैडम?
वो ताश्री!
हमारे पास एक फोन आया था, पास के एक जंगल में किसी लड़की की लाश पड़ी हैं. उसके पास ही एक बैग था, जिसमे उसकी आईडी और मोबाइल था. वो आईडी और मोबाइल ताश्री के ही थे. हमने उसकी माँ को बुलाकर शिनाख्त करवाई तो वो ताश्री ही थी.
रेप जैसा कुछ था क्या?
नही मैडम ऐसा तो कुछ नही था. वैसे पोस्टमार्टम में ज्यादा कुछ नही आ पाया था, लाश काफी पुरानी हो चुकी थी.
तो तुमने उसके बॉयफ्रेंड को दोषी कैसे माना था?
वो लड़की आखिरी बार उसके साथ ही देखी गयी थी. उसकी माँ ने भी बताया था कि अंतिम बार वो जब ताश्री से मिली थी तो वो अपने बॉयफ्रेंड के साथ कही जाने की बात कर रही थी. उसके बाद हफ्ते भर तक उसका कुछ अता पता नही था. और फिर हमें वो लाश मिली...
तो तुम्हे उसके बॉयफ्रेंड का कोई सुराग मिला था.
नही... वो फरार हो गया था. वैसे एक अन्दर की बात बताऊँ. इस केस में कुछ बड़े नाम भी आये थे, जिसके कारण इसकी जांच ज्यादा आगे नही बढ़ पायी थी.
बड़े नाम? नंदिनी ने चौंकते हुए पूछा. जैसे कि...
एक के यहाँ तो हम अभी जा रहे हैं.
महेंद्र प्रताप? नंदिनी ने आँखे फाड़कर पूछा.
नहीं..उनके बड़े भाई...ठाकुर प्रताप उर्फ़ राणा ठाकुर.

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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Jemsbond
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Re: रहस्यमई आँखें

Post by Jemsbond » 08 Jul 2016 06:58



जीप महेंद्र प्रताप के घर के बाहर आकर रुकी. घर क्या था, यह तो एक आलिशान महल था. दरवाजे के पास ही दो हट्टे-कट्टे लोग हाथ में बंदूके थामे खड़े थे. नंदिनी को देखते ही दोनों चौकन्ने हो गए. उन्होंने इसे दरवाजे पर ही रोक लिया. नंदिनी ने उन्हें घुर कर देखा लेकिन उन पर कोई असर न हुआ. तभी विजय बोला, ‘प्रताप साहब से मिलना हैं, 12.०० बजे की अपॉइंटमेंट ली हुई हैं. ‘अपॉइंटमेंट` सुन कर नंदिनी ने विजय की तरफ देखा लेकिन वो नज़रे चुरा रहा था.
आप आधा घंटा बेठिये, साहब खाना खा रहे हैं. गार्ड ने बाहर पड़ी बेंच की और इशारा करते हुए कहा.
मेरे पास एक इससे बेहतर रास्ता हैं, नंदिनी गुस्से से बोली. विजय इन दोनों को हथकड़ी लगाओ और जीप में बिठाओ. दो दिन जेल की हवा खायेंगे तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी इनकी.
मैडम मेरी बात तो सुनिए...विजय गिडगिड़ाया.
ठहरिये! हम बात करते हैं. एक गार्ड बोला. उसने फोन निकला और फोन लगाया.
होकम, कोई पुलिस साहिबा आपसे मिलना चाहती हैं. ...12.00 बजे के अपॉइंटमेंट के लिए बता रहे हैं.....नही होकम संभव नहीं हो पा रहा हैं....जो हुकुम.
आप जा सकते हैं मैडम. चौकीदार ने फोन रखते हुए कहा.
अन्दर हवेली काफी शानदार बनाई हुई थी. यह बाहर से जितनी खुबसूरत दिखती थी अन्दर से उससे भी ज्यादा खुबसूरत थी. फर्श पर सुन्दर संगमरमर लगता था. छत पर सुन्दर नक्काशी के बीच लगे सुन्दर झूमर किसी राजा के महल जैसे अनुभव देते थे.
सामने बड़ा खाने का टेबल लगा हुआ था, इसके चारो तरफ कुर्सियां लगी थी और उसके एक सिरे पर राजशी कोट और पूरी सफ़ेद पोशाक में तीखी मुच्छो वाला एक आदमी बैठा हुआ, यहीं महेंद्र प्रताप था.
बैठिये मैडम, बैठिये. प्रताप ने पास ही पड़े एक सोफे की तरफ इशारा करते हुए कहा.
मेरा भोजन हो ही गया हूँ.
नंदिनी और विजय सोफे पर बैठ गये. कुछ ही देर में महेंद्र प्रताप भी आ गया.
..और भाई विजय क्या हाल चाल हैं, क्या बात हैं आजकल तो तुम्हारा आना होता ही नही हैं इस तरफ.
जी वो बस काम की व्यस्तता हैं बाकि तो आता ही रहता हैं...
प्रताप साहब में आपके व्यवसाय के सिलसिले में आपसे कुछ बात करना चाहती हूँ. नंदिनी ने बात बीच में काटते हुए कहा.
जी कहिये. प्रताप ने थोड़ा आगे झुकते हुए कहा.
शहर में आपके बहुत-से शराब के ठेके, होटले और शराब के ठेके हैं....
हाँ लेकिन वो सब वैध हैं. हमारे पास सबके लाइसेंस हैं. प्रताप बीच में ही बोला.
नंदिनी एक पल रुकी और फिर प्रताप की आँखों में आँखे डालते हुए बोली. जी हाँ बिलकुल...लेकिन आपके नाईट क्लब्स में नशाखोरी होती हैं, कई शराब के ठेकों पर नकली शराब बेचीं जाती हैं और होटलों में खुले आम जिस्मफरोशी होती हैं.
क्या बकवास कर रही हैं? जानती हैं किसपर इल्जाम लगा रही हैं आप? प्रताप ने गुस्से में आकर कहा.
मैं बकवास कर रही हूँ या सच कर रही हूँ या सच कह रही हूँ , वो तो आपको जल्द ही पता चल जाएगा. बेहतर हैं कि वक़्त रहते आप अपने काले कारनामें बंद कर दे. वर्ना मुझे अपनी कार्यवाही करनी पड़ेगी.
पुलिस का रॉब किसे दिखाती हैं? तुझ जैसी पुलिस वालियाँ मेरी जेब में रहती हैं. परताप अब पुरे गुस्से में आ चूका था. तभी पीछे से एक आवाज आई.
अपनी आवाज ज़रा नीचे करो महेंद्र.
महेंद्र प्रताप अपनी जगह पर खड़ा हो गया, साथ ही विजय भी खड़ा हो गया. नंदिनी भी उन्हें देख कर खड़ी हो गयी. यही राणा साहब हैं. विजय नंदिनी के कान में बुदबुदाया.
महेंद्र प्रताप अपनी जगह पर खड़ा हो गया, साथ ही विजय भी खड़ा हो गया. नंदिनी भी उन्हें देख कर खड़ी हो गयी. यही राणा साहब हैं. विजय नंदिनी के कान में बुदबुदाया.
वो दादा ये...महेंद्र धीरे से बुदबुदाया.
होटल पद्मिनी से फोन आया था, वहां स्विमिंग पूल में कोई हादसा हो गया हैं. आपको जाकर देखना चाहिए. राणा सीढियों से नीचे उतारते हुए बोले.
जी दादा... महेंद्र मिमियाया और नंदिनी को घूरते हुए निकल गया.
मैं महेंद्र की ओर से आपसे माफ़ी मांगता हूँ मैडम. ये व्यवसाय करना तो सीख गए हैं लेकिन स्त्रियों का सम्मान करना अब तक नही सीख पाए हैं. राणा महेंद्र के जाने के बाद बोले.
जी कोई बात नही...मैं समझ सकती हूँ. नंदिनी धीरे से बोली.
बैठिये मैडम बैठिये. क्या लेगी आप..चाय, कोफ़ी, शरबत या और कुछ?
जी कुछ नही. नंदिनी ने बैठते हुए कहा.
ऐसे कैसे कुछ नही...काका! चाय-नाश्ता लेकर आओ. ठाकुर साहब ने अपने नौकर को आवाज लगाते हुए कहा.
जी मैडम कहिये...क्या कह रही थी आप?
ठाकुर साहब आपके कुछ व्यवसाय में गलत काम हो रहा हैं. पिछले महीने ही आपके एक शराब के ठेके से नकली शराब पीने से कुछ लोगो की मौत हो गयी थी.
हाँ मैडम...हमें सुचना मिली थी....तब हमने खुद ही उस ठेके को बंद करवाकर वहां के ठेकेदार को पुलिस के हवाले कर दिया था और मरने वालो को क्षतिपूर्ति भी दी थी.
...लेकिन राणा साहब...बहुत सी और भी ऐसी चीजे हैं जो सही नही हैं.
देखिये एसीपी साहिबा. व्यवसाय लड़की के ब्याह जैसा होता हैं, हज़ार तरह के लोगो का ख्याल रखना होता हैं, थोडा बहुत ऊपर नीचे तो चलता रहता हैं. उम्मीद हैं आप भी समझती होगी. फिर भी अगर आपको कोई विशेष आपत्ति हो तो बता दीजियेगा हम दिखवा देंगे.
शुक्रिया राणा साहब...विजय के जरिये मैं आपको आवश्यक मामलो से अवगत कराती रहूंगी. अच्छा अब मैं चलती हूँ.
अरे आपने तो नाश्ता वगेरह कुछ नही लिया. कोई बात नही... ज़रा एक पल ठहरिये.... काका! ज़रा तोहफा लाना.
काका एक पार्सल लेकर आ गए. नंदिनी राणा को घूरने लगी.
इसे रिश्वत मत समझिये मैडम. हमारे घर का रिवाज हैं कोई भी मेहमान पहली बार आता हैं तो उसे खाली हाथ नही भेजते.
नंदिनी ने कुछ देर सोचा और फिर बोली.
शुक्रिया राणा साहब! मैं तो यह तोहफा नही ले सकती लेकिन अगर आप देना ही चाहते हैं तो मेरी तरफ से किसी अनाथालय में दान कर दीजियेगा.
राणा मुस्कुराए. बेशक जैसा आप कहे मैडम....काका! जैसा इन्होने कहा हैं, इसे किसी अनाथालय में दान करवा दीजियेगा. और कुछ सेवा हो तो बताइए मैडम.
जी शुक्रिया...और कुछ नही... इसके बाद नंदिनी और विजय बाहर आ गए.
रास्ते में विजय और नंदिनी काफी समय तक खामोश रहे. शायद विजय को अब नंदिनी से डर लग रहा था.
यह राणा ठाकुर किस तरह का आदमी हैं? नंदिनी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.
सच कहूँ मैडम तो राणा एक बंद किताब की तरह हैं, कोई उसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता...लेकिन एक बात मैं अच्छी तरह से जानता हूँ, राणा जो दीखता हैं वो हैं नही..और वो जो हैं वो कभी सामने नही आता.
मतलब?
मतलब यह कि महेंद्र एक मोहरा मात्र हैं, सारा कारोबार राणा खुद सम्भालता हैं लेकिन हमेशा प्रताप को आगे रखता हैं.
...लेकिन मुझे तो वो काफी अच्छा आदमी लगा...नंदिनी ने दूसरी तरफ देखते हुए कहा.
लोग उसे बातो का जादूगर कहते हैं. अपनी बातो से दूसरो को वश में करना और अपना मतलब निकालना उसे बखूबी आता हैं.
ये कारोबार इसका पुश्तेनी हैं? नंदिनी ने सामने देखते हुए कहा.
कहाँ मैडम? ये सब इसने खुद खड़ा किया हैं वो भी केवल 20 सालों में...इससे पहले राणा को कोई जानता तक नही था, पता नही कहाँ से आया और कैसे इतना बड़ा कारोबार खड़ा कर दिया?
नंदिनी और विजय थाने पहुँच चुके थे. विजय अब मैं घर जा रही हूँ, कुछ जरुरी काम से जाना हैं.
जी मैडम, बाकी काम मैं संभाल लूँगा.
घर से नंदिनी सीधे अनाथालय गयी. वहां पहुँचते ही पुरानी सहेलियों ने उसे घेर लिया. वो काफी देर तक उनसे बात करती रही . उसकी सहेलियां भी अपनी दोस्त को एसीपी के रूप में देखकर गर्व महसूस कर रही थी. काफी देर तक उनसे बात करने के बाद नंदिनी को अंजनी माँ का ख्याल आया.
अंजनी माँ कहीं नज़र नही आ रही. नंदिनी ने पूछा.
वो अब नही आती. एक सहेली ने जवाब दिया.
क्यों?
उनके कुछ प्रॉब्लम हो गयी थी, उसके बाद उन्होंने यहाँ आना बंद कर दिया था. अब दूसरी वार्डन संभालती हैं.
नंदिनी को बहुत बुरा लग रहा था. इतने दिनों बाद आई थी लेकिन अंजनी माँ से नहीं मिल पायी थी.
24/01/2014

ज़िन्दगी में विश्वास सबसे बड़ी चीज हैं, इसे बनाने में उम्र गुज़र जाती हैं लेकिन टूटने में एक पल भी नही लगता.
आज सुबह से एक ही उधेड़बुन थी कि अंतस से मिलूं या न मिलूं. पिछली बार जब उससे मिली थी तो उसने मुझे एक अजीब पशोपेश में डाल दिया था. उससे मिलने का निर्णय मुझे खुद ही करना था. अगर मैं उससे न मिलूं तो कोई फर्क नही पड़ेगा, सब जैसा हैं वैसा ही चलता रहेगा लेकिन बहुत सी ऐसी बातें जो मैं जानना चाहती हूँ नही जान पाउंगी.
लेकिन क्या मेरे लिए जानना इतना ही जरुरी हैं? रोहित ने जब मुझे कहा था कि कोई मुझसे प्यार नही कर सकता तो मेरे अन्दर एक अजीब डर बैठ गया था. क्या मैं सच में ऐसी थी कि कोई मुझसे प्यार नही कर सकता? तो फिर अंतस क्यों मेरे पीछे पड़ा था? कही वो मुझे फंसाने के लिए कोई जाल नही बन रहा था? मैंने लोगो को जिज्ञासा की अक्सर बड़ी कीमत चुकाते हुए देखा हैं..मैं इस सब के लिए तैयार नही हूँ. मुझे अब कोई मुसीबत नही मौल लेनी. मुझे ख़ास नही बनना...मैं आम ही ठीक हूँ. मैनें फैसला कर लिया हैं मैं अब अंतस से नही मिलूंगी.
इसी उधेड़बुन में तैयार हो रही थी कि जैसे ही बैग उठाया मुझे याद आया कि आज तो मुझे नया बैग लेना हैं. मैंने फटाफट किताबे नए बैग में भरी और कोलेज के लिए रवाना हो गयी.
कोलेज में भी आज मन नही लग रहा था. पूजा भी दो पीरियड बाद आई थी.
इतनी लेट क्यों आयी? उसके आते ही मैंने पूछा.
वो कुछ काम आ गया था यार.
हाँ मुझे पता हैं तेरे सारे काम... मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
मतलब? उसने बुरा सा मुंह बनाया.
कल तू किसके साथ थी बाइक पर?
कौन सी बाइक? मैं तो ऑटो से घर गयी थी.
उसका चेहरा देख कर पता चल रहा था कि वो साफ़ झूठ बोल रही थी.
झूठ मत बोल... तू कल एक ग्रीन टी-शर्ट वाले लड़के के साथ नही थी? मॉल के बाहर से निकली थी.
नही तो...कल तो मैं पुरे दिन घर से बाहर ही नही निकली...घर पर ही आराम कर रही थी. वैसे तेरा उस लड़के के साथ क्या चक्कर हैं? उसने अचानक तीर मेरी मोड़ दिया.
कौन...कौनसा लड़का?
वही...जिसको कल तू हॉस्पिटल ले कर गयी थी. सब बात कर रहे थे. उसने मेरे ही अंदाज़ में कहा.
मैं तो उसे जानती तक नही हूँ. कुछ दिन पहले कुछ लडको ने मुझे छेड़ा था तो उसने उन्हें पीटा था, अब वापस में उन्होंने बदला लेने के लिए उसे पीट दिया. इसी लिए मैं उसके साथ हॉस्पिटल गयी थी. मैंने सफाई देते हुए कहा.
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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