रात का शहज़ादा--हिन्दी नॉवॅल

Jemsbond
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रात का शहज़ादा--हिन्दी नॉवॅल--8

Postby Jemsbond » 13 Nov 2016 18:05

.….इमरान….वो हाँपते हुए बोले….साज़िश

क्या हुआ….?

लाश….!

कहाँ….?

मेरे बाग में….चलो….वो फिर तेज़ी से मूड गये….!

इमरान उनके पीछे तेज़ी से दौड़ रहा था….आज से पहले कभी उसे सर सुल्तान को इस हाल में देखने का इत्तेफ़ाक़ नही हुआ था….किसी ज़माने में उनका फ़ौजी करियर भी ऱह चुका था….
और
अब बुढ़ापे में भी वो कम-अज-कम कमज़ोर दिल तो नही हो सकते थे कि एक लाश देख कर इस तरह बद-हवास हो जाते
इमरान उनके साथ दौड़ता हुआ बाग में आया….
और यहाँ उसने गुलाब की झाड़ियों में एक लाश देखी….चूँकि वो औंधी पड़ी हुई थी इसलिए वो चेहरा ना देख सका….
लेकिन
पीठ में घूसे हुए खंजर का दस्ता तो बहेरहाल सॉफ नज़र आ रहा था

इमरान सर सुल्तान की तरफ मुड़ा….जो किसी मासूम बच्चे की तरह खड़े पलकें झपका रहे थे….

आप ने फोन नही किया….? इमरान ने पूछा

नही….उसकी नौबत ही नही आई….सर सुल्तान ने अपने खुश्क होंठों पर ज़ुबान फेरते हुए कहा….लेकिन

इमरान उस लेकिन के बाद वाले जुमले के इंतजार में रहा….
मगर
सर सुल्तान ने उससे आगे और कुछ नही कहा

आप शायद कुछ कहना चाहते थे….इमरान बोला

मेरी समझ में नही आ रहा कि मैं क्या करूँ….सर सुल्तान दोनो हाथों से सर पकड़ कर लॉन में बैठ गये….और आखें बंद कर ली

मैने आज से पहले कभी आप को इस हाल में नही देखा….आख़िर आप परेशान क्यूँ है….? यहाँ सिर्फ़ लाश की मौजूदगी यह साबित नही कर सकती कि आप क़ातिल है….!

हम इधर ही से गुज़र कर वहाँ गये थे….सर सुल्तान ने कहा

जी हां….

लेकिन यह लाश उस वक़्त यहाँ नही थी….!

ना रही होगी….इमरान ने लापरवाही से कहा….मैं दरअसल आप की परेशानी की वजह मालूम करना चाहता हूँ….!

ओह….मुझे फोन कर देना चाहिए….सर सुल्तान ने उठते हुए कहा

इमरान उन्हे बहुत गौर से देख रहा था….वो लड़खड़ाते हुए कदमो से बरामदे की तरफ चले गये….!

पोलीस की कारवाही ख़त्म हो जाने के बाद इमरान ने सर सुल्तान से कहा….आप कुछ छुपा रहे है


कंटिन्यू......
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रात का शहज़ादा--हिन्दी नॉवॅल-9

Postby Jemsbond » 18 Dec 2016 18:16

क्या छुपा रहा हूँ….? सर सुल्तान चौंक पड़े और उनका चेहरा पीला पड़ गया

मख़्तूल (मृत) आप के लिए गुमनाम था….?

कतई गुमनाम था….

फिर समझ में नही आता कि मुजरिम की इस हरकत का क्या मक़सद हो सकता है….ज़ाहिर है कि आप पर शक भी नही किया जा सकता….!

सर सुल्तान खामोश रहे….
और
इमरान कहता रहा….अगर आप के खिलाफ किसी किस्म की साज़िश है तो उसे दूसरी शक्ल में होना चाहिए था….यानी आप इस सूरत में मख़्तूल (मृत) से ना सिर्फ़ वाक़िफ़ होते बल्कि दूसरों को भी इसका इल्म होता कि आप के और उसके ताल्लुक़ात अच्छे नही थे….!

ठीक है….

फिर….आप की परेशानी फ़िज़ूल है….

मैं क्या बताऊ कि….वो फिर कहते-कहते रुक गये
और
इमरान मोज़ुवा (विषय) बदल कर बोला….अब मैं आप की क्या खिदमत कर सकता हूँ….!

तुम….मैं खुद नही बता सकता कि तुम इस सिलसिले में क्या कर सकोगे….

मुमकीन है कुछ कर ही सकूँ….
लेकिन
इस सूरत में जब के आप मुझे किसी मामले में भी अंधेरे में ना रखे….इमरान ने कहा

सर सुल्तान कुछ सोचने लगे
फिर
उन्होने कहा….देखो इमरान….मैं इससे ज़्यादा और कुछ नही चाहता कि तुम क़ातिल को ढूँढ निकालो

मैं इसके लिए हाज़िर हूँ….
लेकिन
इस सूरत में भी आप मेरे कुछ सवालात के जवाब देने पर मजबूर होंगे….मैं इस बेताकल्लूफ़ी के लिए मुआफी चाहता हूँ

कोई बात नही….सर सुल्तान ने मुस्कुराने की कोशिश की….वो आहिस्ता-आहिस्ता खुद पर खबू पा रहे थे

लाश वहाँ से उठ चुकी थी
और
पोलीस वाले भी जा चुके थे….!

इस दौरान आप का किसी से झगड़ा हुआ है….इमरान ने पूछा

नही कतई नही….

क्या आप की तरक्की के सिलसिले में किसी दूसरे का हक़ तल्फि हुई है….

नही….यह बात भी नही है….

फिर….बताइए क़ातिल कैसे पकड़ा जा सकता है….इमरान ने ताश्विश (चिंता) अमेज़ लहजे में कहा….ना आप किसी के दुश्मन ना कोई आप का दुश्मन….मख़्तूल (मृत) आप के लिए अजनबी….एक ऐसे मकान में उसे क़त्ल किया गया जिसकी कुंजी आप ही के पास थी….
और
फिर….उसे आप के बाग में डाल दिया गया….आप खुद सोचिए….मैं किसी उलझन में पड़ सकता हूँ….!
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Re: रात का शहज़ादा--हिन्दी नॉवॅल

Postby Jemsbond » 18 Dec 2016 18:53

सर सुल्तान कुछ नही बोले….इमरान बड़े गौर से उनका चेहरा देख रहा था….उसे यक़ीन था कि वो कुछ ना कुछ ज़रूर छुपा रहे है

इमरान ने कहा….आप के टेलिफोन के तार के खंबे से कनेक्षन लिया गया था….और फोन….अब आप सोचिए कि वहाँ अक़र टेलिफोन का ड्रामा खेलने की क्या ज़रूरत थी….
अगर
आप सोचेंगे तो इसी नतीजे पर पहुँचेंगे कि क़ातिल यही चाहता था….क्या नंबर….जी हाँ….मतलब यह है कि क़ातिल चाहता था कि मरने से पहले मख़्तूल (मृत) किसी को फोन ज़रूर कर दे….इसलिए उसने आप का फोन इस्तेमाल किया
अच्छा….अब मैं कुछ ना पूछूँगा….अभी मेरे हाथ में एक कार्ड मौजूद है….
यानी
वो आदमी जिसे फोन किया गया था….मेरी ही तरह ज़रूर उसे भी डाइरेक्टरी में आप का नंबर देख कर हैरत हुई होगी….या ना हुई हो….खुदा जाने

लेकिन….उसे तलाश कैसे करोगे….तुम्हे क्या मालूम मख़्तूल (मृत) ने किस नंबर पर रिंग किया था….

जी हाँ….यह तो नही मालूम….
मगर
देखिए….मैं कोशिश ज़रूर करूँगा

उस कमरे में इमरान और सर सुल्तान के अलावा और कोई नही था….
लेकिन
इसका यह मतलब नही था कि घर के दूसरे अफ्राद को इस हादसे की कोई फ़िक्र ना रही हो….इस कमरे के अलावा सारे कमरों से लोगों की आवाज़ें आ रही थी….तखरीबन सभी परेशान रहे होंगे
लेकिन
वो यहाँ इस कमरे में आने की हिम्मत नही कर सकते थे….
क्यूँ कि
सर सुल्तान उन लोगों में से थे जिन के मतलूख कहा जाता था कि नाक पर मक्खी भी नही बैठने देते

अच्छा….तो अब मुझे इजाज़त दी जिए….इमरान ने सर सुल्तान की तरफ देखे बाघैर कहा

अच्छी बात है….सर सुल्तान ने उठ कर उसकी तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा….जैसे ही वो उठे उनके कपड़ों से एक छोटी सी तस्वीर निकल कर फर्श पर गिर पड़ी….और वो बड़ी फुर्ती से उसे उठाने के लिए झुके

इमरान का हाथ मिलाने के लिए फैला ही रह गया….
लेकिन
तस्वीर पर उसकी नज़र पड़ ही गयी….
हालाँकि
सर सुल्तान ने उसे उठाने में जल्दी की थी….

इमरान को ऐसा महसूस हुआ….जैसे सर सुल्तान ज़ेहनी फितूर में मुब्तेला हो….
यह
तस्वीर उल्लू की थी….कॅमरा फोटो….उल्लू की तस्वीर जिसे शायद सर सुल्तान अपने कपड़ों में छुपाए हुए थे

उन्होने इमरान की तरफ चोरों की तरह देखा….
और
झेम्प्ते हुए अंदाज़ में मुस्कुरा पड़े

अपने मामलात आदमी खुद ही समझ सकता है….इमरान आहिस्ता से बड़बड़ाया….ऐसे ही वाकियात मेरी खोपड़ी उलट देते है….मैं पागल हो जाता हूँ….फिर लोगों को मुझसे शिकायत होती है

क्या बात है….?

मैं उस तस्वीर के मतलूख कुछ पूछना चाहता हूँ….
क्यूँ कि
उसके पीछे खून का छोटा सा धब्बा मौजूद है
और
शायद….कुछ लिखा हुआ भी है….!

सर सुल्तान ने एक लंबी साँस ली….
और
आराम कुर्सी में गिर गये….बता सकता हूँ….लेकिन तुम मुझे पागल समझोगे….उन्होने थोड़ी देर बाद कहा.......!

मैं वादा करता हूँ कि ना समझूंगा….इमरान ने कुछ ऐसे ना-समझ बच्चे के अंदाज़ में कहा जो हर हाल में अपनी बात मनवा लेने पर तूल गया हो

सर सुल्तान ने वो तस्वीर उसकी तरफ बढ़ा दी….

इमरान उनके करीब ही की एक कुर्सी पर बैठ कर उसे देखने लगा….तस्वीर के पीछे खून का धब्बा था….
और
अभी उसकी रंगत में ज़्यादा तब्दीली नही आई थी….
और
वो तहरीर (राइटिंग) हैरत-अंगेज़ और मज़ाक़िया-अंगेज़ भी थी….सिर्फ़ तीन लफ्ज़ थे….

“रात का शहज़ादा”

किसी ज़हीन (होशियार) बच्चे की शरारत….इमरान सर सुल्तान की आँखों में देखता हुआ बोला

लेकिन….मुझे यह तस्वीर इसी लाश पर रखी हुई मिली थी….सर सुल्तान ने कहा

आज वो बच्चा रात को सोते वक़्त ज़रूर डरेगा….इमरान संजीदगी से बोला….
फिर
उल्लू की तरह दीदे नचा कर कहा….जनाब-ए-आला
अगर
यह लाश पर मिली थी….तो आप उसे अब तक छुपाए क्यूँ रहे….मैं हक़ीक़तान अब यही मालूम करना चाहता हूँ….

क्या तुम भी मुझ पर किसी किस्म का शक कर सकते हो….? सर सुल्तान ने कहा

इमरान कुर्सी का हत्था खट-ख़टता रहा कुछ बोला नही….
लेकिन
वो अब भी सर सुल्तान की आँखों में देखता रहा था….!

बस अब जाओ….सर सुल्तान ने उकताए हुए लहजे में कहा….मेरी समझ में नही आता कि मैं यह बात कहाँ से शुरू करूँ

अगर….आप की समझ में नही आता….तो फिर….मुझे ही शुरू करने की इजाज़त दी जिए….इमरान ने कहा

क्या….?

इस तस्वीर के मतलूख….मैं अपनी यादश्त पर ज़ोर दे सकता हूँ

तो क्या तुम इसके बारे में जानते हो….सर सुल्तान सीधा हो कर बैठ गये

यक़ीनन….!

क्या जानते हो….?

यही कि दुनिया का एक रहस्मयी आदमी आप के पीछे पड़ गया है….

कौन….? तुम उसके मतलूख क्या जानते हो….?

देखिए….अब मैं जा रहा हूँ….इमरान उठता हुआ बोला….इसके बारे में फिर कभी गुफ्तगू करूँगा….हो सकता है कि मैं उस आदमी तक पहुँच ही जाउ….जिसे मख़्तूल (मृत) ने फोन किया था….मेरा दावा है कि वो आप के बंगल के आस-पास ही मंडरा रहा होगा….!

इमरान को उम्मीद थी कि सर सुल्तान उसे ज़रूर रोकेंगे….
लेकिन..............



sir sultan kuch nahi bole….imran bade gour se unka chehra dekh raha tha….use yaqeen tha ke wo kuch na kuch zaroor chupa rahe hai

imran ne kaha….aap ke telephone ke taar ke khambe se connection liya gaya tha….aur phone….ab aap sochiye ke wahan aqar telephone ka drama khelne ki kya zaroorat thi….
agar
aap sochenge to isi nateeje par pahunchenge ke qaatil yehi chata tha….kya number….jee haa….matlab yeh hai ke qaatil chahta tha ke marne se pahle makhtul (mrut) kisi ko phone zaroor kar de….isliye usne aap ka phone istemaal kiya
achha….ab main kuch na puchunga….abhi mere haath mein ek card maujood hai….
yani
wo aadmi jise phone kiya gaya tha….meri hi tarah ghaliban use bhi directory mein aap ka number dekh kar hairath hui hogi….yaa na hui ho….khuda jane

lekin….use talaash kaise karoge….tumhe kya maalum makhtul (mrut) ne kiss number par ring kiya tha….

jee haa….yeh to nahi maalum….
magar
dekhiye….main koshish zaroor karunga

us kamre mein imran aur sir sultan ke alawa aur koi nahi tha….
lekin
iska yeh matlab nahi tha ke ghar ke dusre afraad ko is haadse ki koi fikr na rahi ho….is kamre ke alawa saare kamron se logon ki awaazein aa rahi thi….takhreeban sabhi pareshan rahe honge
lekin
wo yahan is kamre mein aane ki himmat nahi kar sakte the….
kyun ke
sir sultan un logon mein se the jin ke matalookh kaha jata tha ke naak par makkhi bhi nahi baithne dete

achha….to ab mujhe ijazat di jiye….imran ne sir sultan ki taraf dekhe baghair kaha

achi baat hai….sir sultan ne uth kar uski taraf haath badhate hue kaha….jaise hi wo uthe unke kapdon se ek choti si tasveer nikal kar farsh par gir padhi….aur wo badi furti se use uthane ke liye jhuke

imran ka haath musafe ke liye faila hi rahe gaya….
lekin
tasveer par uski nazar padh hi gayi….
halaanke
sir sultan ne use uthane mein jaldi ki thi….

imran ko aisa mehsoos hua….jaise sir sultan zehni fitoor mein mubtela ho….
yeh
tasveer ullu ki thi….camera photo….ullu ki tasveer jise shayad sir sultan apne kapdon mein chupaye hue the

unhone imran ki taraf choron ki tarah dekha….
aur
jhempte hue andaaz mein muskura padhe

apne maamlat aadmi khud hi samajh sakta hai….imran ahista se badhbadhaya….aise hi waqiyat meri khopdi ulath dete hai….main paagal ho jata hu….fir logon ko mujhse shikayat hoti hai

kya baat hai….?

main us tasveer ke matalookh kuch puchna chahta hu….
kyun ki
uske piche khoon ka chota sa dhabba maujood hai
aur
shayad….kuch likha hua bhi hai….!

sir sultan ne ek lambi saans li….
aur
aaraam kursi mein gir gaye….bata sakta hu….lekin tum mujhe paagal samjhoge….unhone thodi der baad kaha.......!

main waada karta hu ke na samjhunga….imran ne kuch aise na-samajh bachche ke andaaz mein kaha jo har haal mein apni baat manwalene par tool gaya ho

sir sultan ne wo tasveer uski taraf badha di….

imran unke khareeb hi ki ek kursi par baith kar use dekhne laga….tasveer ke piche khoon ka dhabba tha….
aur
abhi uski rangat mein zyada tabdili nahi ayi thi….
aur
wo tahreer (writing) hairath-angez aur mazaqiya-angez bhi thi….sirf teen lafz the….

“raat ka shahzada”

kisi zaheen (hoshiyar) bachche ki shararat….imran sir sultan ki aankhon mein dekhta hua bola

lekin….mujhe yeh tasveer isi laash par rakhi hui mili thi….sir sultan ne kaha

aaj wo bachcha raat ko sote waqt zaroor darega….imran sanjeedhgi se bola….
fir
ullu ki tarah deede nachha kar kaha….janab-e-aala
agar
yeh laash par mili thi….to aap use ab tak chupaye kyun rahe….main haqeeqatan ab yahi maalum karna chahta hu….

kya tum bhi mujh par kisi khism ka shak kar sakte ho….? sir sultan ne kaha

imran kursi ka hatta khat-khatata raha kuch bola nahi….
lekin
wo ab bhi sir sultan ki aankhon mein dekhta raha tha….!

bas ab jao….sir sultan ne uktaye hue lahje mein kaha….meri samajh mein nahi aata ke main yeh baat kahan se shuru karu

agar….aap ki samajh mein nahi aata….to fir….mujhe hi shuru karne ki ijazath di jiye….imran ne kaha

kya….?

is tasveer ke matalookh….main apni yaadasht par zor de sakta hu

to kya tum iske baare mein jaante ho….sir sultan seedha ho kar baith gaye

yaqeenan….!

kya jaante ho….?

yahi ke duniya ka ek rahasmayi aadmi aap ke piche padh gaya hai….

kaun….? tum uske matalookh kya jaante ho….?

dekhiye….ab main jaa raha hu….imran uthta hua bola….iske baare mein fir kabhi guftgu karunga….ho sakta hai ke main us aadmi tak pahunch hi jau….jise makhtul (mrut) ne phone kiya tha….mera daawa hai ke wo aap ke bungle ke aas-paas hi mandla raha hoga….!

imran ko umeed thi ke sir sultan use zaroor rokenge….
lekin
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Re: रात का शहज़ादा--हिन्दी नॉवॅल

Postby Jemsbond » 08 Jan 2017 23:06

सर सुल्तान ने बैठे ही बैठे अलविदाई मुसाफा के लिए हाथ बढ़ा दिया.......!
हक़ीक़त यह थी कि इमरान उस तस्वीर के मतलूख कुछ भी नही जानता था….वैसे उसने अपनी समझ से अड़ने की कोशिश की थी….उसका ख़याल था कि वो सर सुल्तान से तस्वीर के बारे में सब कुछ उगलवा लेगा….
लेकिन
सर सुल्तान इस मामले में बिल्कुल ठोस साबित हुए….!

इमरान ने किसी रहस्मयी आदमी का ज़िक्र कर के थोड़ी देर के लिए उनके चहरे पर हैरत के आसार ज़रूर पैदा कर दिए थे….
लेकिन
वो खुद से कहने के बजाए इमरान के आगे बढ़ने का इंतेज़ार करते रहे….
और
इमरान….इमरान को समझना आसान काम नही था….!

वो चलते-चलते रोक कर बोला….लाश की तस्वीरें हासिल कर के मुझे भिजवा दी जिए….मैं नही चाहता कि कॅप्टन फायज़ से इस मामले पर उलझू….आप जानते ही होंगे कि हम दोनो के ताल्लुक़ात कितने अहमाक़ाना है
फिर
वो जवाब का इंतेज़ार किए बगैर कमरे से निकल गया….!

इमरान का ख़याल 100% दुरुस्त निकाला….सर सुल्तान के बंगल से थोड़े ही फ़ासले पर एक आदमी नज़र आया जो इस तरह खड़ा था….जैसे किसी का इंतेज़ार कर रहा हो….लिबास से खुश-हाल मालूम होता था
इमरान की कार उसके करीब से गुज़र गयी
इमरान सोच रहा था….मुमकीन यह वो आदमी ना हो….
क्यूँ कि ऐसे हालात में जब कि पोलीस वहाँ से एक लाश ले गयी थी उसका वहाँ ठहेरना मुश्किल ही होता….
लेकिन
इस सिलसिले में कोई वजह (स्पष्ट) राई कायम नही की जा सकती थी….हो सकता है कि वो पोलीस की करवाही ख़त्म होने के बाद वहाँ पहुचा हो….उसे इल्म ही ना रहा हो कि थोड़ी देर पहले वहाँ क्या हो चुका है….

यह ग़रीब आदमियों की बस्ती तो थी नही कि लोग घंटों सड़क पर खड़े हो कर उस वाकये के मतलूख बाते करते….यहाँ इस तबके की आबादी नही थी जिस के अफराद किसी आवारा कुत्ते की अचानक मौत पर भी अफ़सोस करने के लिए इकट्ठा हो जाते है….

यहाँ से पोलीस थोड़ी देर पहले एक आदमी की लाश ले गयी थी….
लेकिन अब ऐसा मालूम हो रहा था….जैसे कोई बात ही ना हुई हो….बस थोड़ी देर के लिए मकानों की खिड़कियाँ खुली थी….कुछ लोग सड़क पर निकल आए थे और फिर….कुछ भी नही….गोया परिंदो के झुंड पर किसी शिकारी ने गोली चलाई….एक गिरा….दूसरे उड़ गये….उसके बाद नीचे वही ज़मीन उपर वही बीखरा नीला आसमान….
और दोनो के दरमियाँ वही सन्नाटा….!

इमरान की कार उस आदमी से ज़्यादा दूर नही गयी थी….रफ़्तार पहले से कम थी….इमरान एक दोराहे पर उसे रोक कर दो बंग्लॉ के दरमियाँ जगह में इस तरह ब्रेक करने लगा जैसे ग़लत रास्ते पर निकल आने के बाद वापिस होना चाहता हो….
मगर उसकी कार दोबारा सड़क पर नही आई….इमरान उसे रोक कार नीचे उतर आया….गली के मोड़ पर पहुँच कर उसने देखा कि वो आदमी अब भी वही खड़ा है….
लेकिन
अब वो तन्हा नही था और अब ना उसके अंदाज़ में पहले की सी बे-फ़िक्री थी….वो एक दूसरे आदमी से गुफ्तगू कर रहा था….उनके करीब ही एक शानदार कार खड़ी थी

इमरान ने उन्हे कार में बैठते देखा….
और कार मुखालिफ़ सिम्त (विपरीत दिशा) में मूड गयी….!

इमरान तेज़ी से अपनी कार की तरफ झपटा….उसने एंजिन नही बंद किया था….
मगर उससे यह ग़लती बे-ख़याली में हुई थी….सोच समझ कर ऐसा नही किया गया था….उसकी कार दूसरी कार के पीछे रवाना हो गयी लेकिन इस स्टेज पर भी उसे यक़ीन नही था कि वो सही रास्ते पर है….किसी भी मामले की तफ़स्तीश की शुरुआत ऐसे ही गैर यक़ीनी हालात से होती है….महेज़ शक की बिना पर ग़लत रास्ते भी इकतियार कर लिए जाते है….कभी-कभी ऐसा होता है वो ग़लत रास्ता ही जासूस को उसकी मंज़िल तक पहुँचा देता है….

यानी वो हक़ीक़तन ग़लत रास्ता नही होता…. और फिर….इमरान तो उसका ख़याल था की….जैसे कोई माज्नी सितार पर उलथे-सीधे हाथ चलाते-चलाते कोई धुन निकाल लेता है….इसी तरह एक जासूस की बे-मक़सद भाग-दौड़ भी आख़िर उसे मंज़िल तक पहुँचा ही देती है

वो अगली कार का पीछा करता रहा….अब वो शहेर के सब से बारौनख् हिस्से में था

कार फगारो के कॉंपाउंड में दाखिल हुई….यह यहाँ के बहुत बड़े होटेल्स में से था….
और अब इमरान ने दूसरे आदमी को करीब से देखा….यह फिगारो के मॅनेजर के अलावा और कोई नही था….इमरान की कार कॉंपाउंड में दाखिल हो चुकी थी….

वो उनके पीछे-पीछे ही होटेल में दाखिल हुआ….इमरान समझा था कि मॅनेजर अपने कमरे में जाएगा….
लेकिन वो और उसका साथी डिन्निंग-हॉल ही में एक खाली मेज़ के गिर्द बैठ गये….दो कुर्सियाँ खाली थी

इमरान तीर की तरह उनकी तरफ गया….
और बड़े बे-तखल्लूफाना अंदाज़ में कुर्सी खींच कर बैठ गया….!

उन दोनो ने उसकी इस हरकत को हैरत और गुस्से की नज़र से देखा

जवाब में इमरान भी हैरत से मूह खोले उन्हे बारी-बारी से घूर रहा था….उसके अंदाज़ से ऐसा मालूम हो रहा था….जैसे उसे अचानक किसी ग़लती का अहसास हो गया हो….
फिर इससे पहले कि वो दोनो कुछ कहते इमरान बड़ी संजीदगी से बोला….
और फिर….जब आप ने टेलिफोन डाइरेक्टरी में देखा तो उससे वो नंबर मिल गया….
लेकिन वो नंबर होम-सेक्रेटरी सर सुल्तान का था….क्यूँ….क्या मैं ग़लत कह रहा हूँ….?

मॅनेजर का साथी मूह खोल कर कुर्सी की पुष्ट से टिक गया….उसकी आँखों में ख़ौफ़ झलक रहा था….

इमरान ने यह तब्दीली अच्छी तरह महसूस की….
लेकिन
मॅनेजर झल्लाए हुए लहजे में कहा….आप कौन है और क्या चाहते है….?

मैं आप दोनो का भला चाहता हूँ….
और दरवेश की सदा क्या है….इमरान ने जवाब दिया

मेरा ख़याल है कि मैने इससे पहले आप को कभी नही देखा….मॅनेजर घुर्राया

अगर….आप ने देखा भी होता तो क्या फ़र्क़ पड़ता….होने वाली बाते हो कर रहती है….मसलन इस पेन्सिल पर दाँतों के निशान मौजूद है….जिसे दाँतों में दबा कर आप के नंबर डाइयल किए गये थे….
और यह तय शुदा बात है कि मख़्तूल (मृत) मरने से पहले एक कुर्सी में जकड़ा हुआ था….
औरसर सुल्तान के पड़ोस के एक खाली बंगले में था….यह बात भी मालूम हो गयी कि तार सर सुल्तान के वाइयर पोल से दूसरे बंगल तक लट काया गया था….आहा….आप नही समझे….
फिर समझाऊ….बल्कि यूँ….

मैं नही समझा कि आप क्या कहे रहे है….मॅनेजर ने बात काट दी
लेकिन अब उसकी आवाज़ में कपकपाहट थी

मैं यह कह रहा हूँ कि आप उस वक़्त वहाँ पहुँचे थे जब लाश उठ चुकी थी….!

कैसी लाश….?मॅनेजर के साथी ने थूक निगल कर पूछा

अच्छी लाश….यानी मेरा मतलब यह है कि वो खराब नही हुई थी….इमरान ने जवाब दिया

आप हमारा वक़्त बर्बाद कर रहे है….मॅनेजर ने संभाल लिया….अजनबी से बे-तखल्लूफ होने की कोशिश करना बदतमीज़ी है

सिर्फ़ इसी सूरत में जनाब….इमरान दीदे नचा कर बोला….जब वो अजनबी औरतें हो….!

आप बराहे-करम यहाँ से उठ जाए….
वरना मॅनेजर उसे घूर्ने लगा….!

अच्छा….अब सुनिए….इमरान ने संजीदगी से कहना शुरू किया….
शायद आप को इल्म नही कि बड़े ऑफिसर्स और मिनिस्टर्स के टेलिफोन….आम टेलिफोन से अलग होते है….यानी एक्सचेंज में उनके मीटर से एक छोटा सा टॅली-प्रिंटर भी अटॅच होता है….यानी इधर आप ने उनके नंबर डाइयल किए….
और उधर वहाँ आप के नंबर खटा-खट छप गये….इसी तरह दोनो तरफ के नंबर्स छप जाते है….अब आप गालिबान समझ गये होंगे….कि मैं सीधा यहीं कैसे पहुच गया….

इमरान ने गप्प कुछ इस अंदाज़ में हांकी कि….
अचानक मॅनेजर का चहरा पीला पड़ गया….उसके साथी की हालत तो उससे भी ज़्यादा बत्तर थी….ऐसा मालूम हो रहा था जैसे उसके फेफड़ो में मज़ीद (अधिक) साँसों के लिए जगह ही ना रह गयी हो

आप कौन है….? मॅनेजर ने ख़ौफज़दा आवाज़ में पूछा

क्या अब भी यह बताने की ज़रूरत बाकी रहती है के मैं कौन हो सकता हूँ….?

पोलीस….!

100%.....जनाब….इमरान ने सर हिला कर बोला….अब आप जो कुछ भी कहेंगे सोच समझ कर कहेंगे….!

मैं नही जानता कि यह सब कैसे हुआ….मॅनेजर आहिस्ता से बड़बड़ाया

क्या हम कहीं तन्हाई में नही चल सकते….इमरान ने कहा….आप भी मोज़ीज़ (सम्मानित) आदमी है….मैं नही चाहता कि यह बात आम आदमियों में फैले….!

ओह….आप का बहुत-बहुत शुक्रिया….मेनेज़र जल्दी से बोला….मेरे ऑफीस में चलिए

वो तीनो वहाँ से उठ कर मॅनेजर की ऑफीस में चले आए….

इमरान ने खुद ही गुफ्तगू छेड़ी….उनके बोलने का इंतेज़ार नही किया….उसे दूसरे बंगले में हलाक कर के लाश सर सुल्तान के कॉंपाउंड में डाल दी गयी थी….आप को फोन करने के लिए सर सुल्तान का नंबर इस्तेमाल किया गया….मैं तो आप को यह भी बता सकता हूँ के मरने वाले ने फोन पर आप से क्या कहा था….!

मॅनेजर कुछ नही बोला….

इमरान उसके चहरे पर नज़र जमाए था….
फिर उसने कुछ देर बाद पूछा….जिस का क़त्ल हुआ….वो कौन था….?

फिगारो का एक हिस्सेदार….मिस्टर.करार….मॅनेजर ने मुर्दा सी आवाज़ में जवाब दिया

करार और हिस्सेदार का काफिया (कविता) मुझे पसंद आया….
बहेरहाल….मगर…. जनाब वो चक्कर क्या था….?

मैं किसी चक्कर से वाक़िफ़ नही….मॅनेजर ने कहा….ना यह जानता हूँ कि वो वहाँ पहुचे किस तरह

बिला सुबह (निस्स-संदेह) आप यह नही जानते कि मख़्तूल (मृत) वहाँ कैसे पहुँचा था….
लेकिन चक्कर से तो आप वाक़िफ़ है….इस सिलसिले में आप झूठ बोल कर कामयाब नही हो सकते….
क्यूँ कि मैं उस गुफ्तगू के एक-एक लफ्ज़ से वाक़िफ़ हूँ….जो आप दोनो के दरमियाँ फोन पर हुई थी

मॅनेजर फिर खामोश हो गया

बता देने में आप का फ़ायदा है….इमरान ने कहा….दूसरी सूरत में आप अपनी ख़तरनाक पोज़िशन से तो वाक़िफ़ ही है….
क्यूँ कि मामला होम-डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी का है….!

मॅनेजर सर झुकाए गहरी-गहरी साँसे लेता रहा….

हाँ….जल्दी की जिए….मेरे पास वक़्त कम है….
वरना आप को इसका जवाब भी देना पड़ेगा कि लाश सर सुल्तान के कॉंपाउंड में क्यूँ डाली गयी थी….
और शायद….आप के फरिश्ते भी इसका जवाब ना दे सके….
वैसे आप यह तो जानते होंगे कि किसी बात को उगलवाने के सिलसिले में पोलीस वाले ज़हुँनुम के फरिश्तों से भी कम नही होते….गुंगे, बहरे, और अंधे सिर्फ़ उनके हाथ मशीन की तरह चलते रहते है….वो ना बोल सकते है ना सुन सकते है….!

लेकिन….क्या यह ज़रूरी है कि आप मेरे बयान पर यक़ीन ही कर ले….!

उसका फ़ैसला मैं खुद करूँगा….इमरान ने नर्म लहजे में कहा

आप नही कर सकते….

लेकिन….मैं आप की ज़ुबान से कुछ ना कुछ सुनना ज़रूरी समझता हूँ….!
मॅनेजर थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहा….
फिर उसने कहा….
करार साहब एक आदमी के चक्कर में थे….उनका ख़याल था कि अगर उन्होने उस आदमी पर काबू पा लिया तो माला-माल हो जाएँगे….

वो आदमी कौन था….?

यह उन्होने नही बताया था….
अलबत्ता मैं यह जानता हूँ कि करार साहब की ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा साउत आफ्रिका में गुज़रा था….
और वो आदमी वहीं से ताल्लुक रखता था….!

क्या वो आज-कल यहाँ है….? इमरान ने पूछा

जी हाँ….करार साहब ने तो यही बताया था

कहाँ है….? कौन है….?

यह तो नही मालूम कि वो कौन है….
लेकिन इतना जानता हूँ कि उसका खियाम सेठ दाऊद के मेहमान खाने में है….
शायद आप को इल्म हो कि सेठ दाऊद का बिज़्नेस आफ्रिका में भी है….
और यहाँ अक्सर उनके पास अफरीसी बिज़्नेसमॅन आते रहते है….इसके लिए उन्होने ख़ास तौर से एक मेहमान खाना बना कर रखा है….!

हुहम….इमरान सिर्फ़ सर हिला कर रह गया….वो कुछ सोच रहा था….
फिर उसने कुछ देर बाद पूछा….करार ने आप को उसका नाम या हुलिया तो यक़ीनन बताया होगा

जी नही….ना मैने पूछा और ना उन्होने बताया….
वैसे मैं उन्हे बहुत करीब से जानता था….वो कीमिया गिरी (केमिकल्स) के खब्त में मुब्तेला थे….और….मुझे इस में ज़ररा बराबर भी दिलचस्पी नही…. क्यूँ कि यह चीज़ बिल्कुल मानशीयात (ड्रग्स) की तरह आदमी के वजूद से चिमट जाती है….करार साहब वैसे भी काफ़ी दौलतमंद थे….
लेकिन सोना बना ने का खब्त उन पर बुरी तरह सवार था….24 घंटे वही चक्कर….!

अच्छा….मुझे करार साहब का पता नोट करा दी जिए….इमरान ने जेब से नोट-बुक निकालते हुए कहा

13 मार्सटन रोड….वो वहाँ तन्हा रहते थे….!

उनके रिश्तेदार….

मुझे तो उनके किसी भी रिश्तेदार का इल्म नही….उन्होने कभी किसी का ज़िक्र नही किया

आप की तारीफ….इमरान ने मॅनेजर के साथी की तरफ देख कर कहा

मेरे असिस्टेंट….मिस्टर.तनवीर

अच्छा….सिर्फ़ एक सवाल और….इमरान ने नोट-बुक बंद कर के जेब में रखता हुआ बोला….क्या करार साहब ने आप से कहा था कि उस शक्श पर काबू पाने के लिए उसे आप की मदद की भी ज़रूरत पेश आ सकती है

जी हाँ….उन्होने कहा था….उनका ख़याल था कि वो बहुत ख़तरनाक और इंतिहाई चालाक आदमी है….
और एक बड़ा मुजरिम भी…..
लहज़ा मैं उनकी मदद करने पर तय्यार था….
क्यूँ कि मुझे मुजरिमों से ज़ररा बराबर भी हमदर्दी नही होती….!

खूब….इमरान मुस्कुराया….आप को तो पोलीस-ऑफीसर होना चाहिए था….अच्छा जनाब बहुत बहुत शुक्रिया….हो सकता है कि मैं फिर आप को तकलीफ़ दूं….!

मैं हर खिदमत के लिए हाज़िर हूँ….मॅनेजर ने बड़े खूलूस से कहा
थोड़ी देर बाद इमरान की कार मार्सटन रोड के 13वे बंगल के कॉम्पोन्ड में दाखिल हुई….बंगला शानदार था और बाग की हालत देख ही करार साहब की खुश मिज़ाजी ज़ाहिर हो रही थी….

sir sultan ne baithe hi baithe alwidaayi musafa ke liye haath badha diya.......!
haqeeqat yeh thi ke imran us tasveer ke matalookh kuch bhi nahi jaanta tha….waise usne apni samajh se adhne ki koshish ki thi….uska khayal tha ke wo sir sultan se tasveer ke baare mein sab kuch ugalwa lega….
lekin
sir sultan is maamle mein bilkul thos sabeet hue….!

imran ne kisi rahsmayi aadmi ka zikr kar ke thodi der ke liye unke chahre par hairath ke asaar zaroor paida kar diye the….
lekin
wo khud se kahne ke bajaye imran ke aage badhne ka intezar karte rahe….
aur
imran….imran ko samajhna asaan kaam nahi tha….!

wo chalte-chalte ruk kar bola….laash ki tasveerein haasil kar ke mujhe bhijwa di jiye….main nahi chahta ke captain fayaz se is maamle par uljhu….aap jaante hi honge ke hum dono ke talookhaat kitne ahmaqana hai
fir
wo jawaab ka intezar kiye baghair kamre se nikal gaya….!

imran ka khayal 100% durust nikala….sir sultan ke bungle se thode hi faasle par ek aadmi nazar aya jo is tarah khada tha….jaise kisi ka intezar kar raha ho….libaas se khush-haal maalum hota tha
imran ki car uske khareeb se guzar gayi
imran soch raha tha….mumkeen yeh wo aadmi na ho….
kyun ke
aise haalaath mein jab ke police wahan se ek laash le gayi thi uska wahan thaherna mushkil hi hota….
lekin
is silsile mein koi waazeh (spasht) rai khayam nahi ki jaa sakti thi….ho sakta hai ke wo police ki karwaahi khatm hone ke baad wahan pahucha ho….use ilm hi na raha ho saka ke thodi der pahle wahan kya ho chuka hai….

yeh ghareeb aadmiyon ki basti to thi nahi ke log ghanton sadak par khade ho kar us waqiye ke matalookh baate karte….yahan is tabkhe ki abaadi nahi thi jiss ke afraad kisi awaara kutte ki achhanak maut par bhi afsos karne ke liye ikkhatta ho jate hai….

yahan se police thodi der pahle ek aadmi ki laash ke gayi thi….
lekin
ab aisa maalum ho raha tha….jaise koi baat hi na hui ho….bas thodi der ke liye makaanon ki khidkiyan khuli thi….kuch log sadak par nikal aye the
aur
fir….kuch bhi nahi….goya pareendon ke jhund par kisi shikaari ne goli chalayi….ek gira….dusre udh gaye….uske baad niche wahi zameen upar wahi beekhra neela aasmaan….
aur
dono ke darmiyaan wahi sannata….!

imran ki car us aadmi se zyada dur nahi gayi thi….raftaar pahle se kam thi….imran ek doraahe par use rok kar do bunglow ke darmiyaan jagah mein is tarah break karne laga jaise ghalath raaste par nikal aane ke baad wapis hona chahta ho….
magar
uski car dobara sadak par nahi ayi….imran use rok car niche utar aya….gali ke modh par pahunch kar usne dekha ke wo aadmi ab bhi wahi khada hai….
lekin
ab wo tanha nahi tha aur ab na uske andaaz mein pahle ki si be-fikri thi….wo ek dusre aadmi se guftgu kar raha tha….unke khareeb hi ek shaandar car khadi thi

imran ne unhe car mein baithte dekha….
aur
car mukhaalif simt (viprit disha) mein mudh gayi….!

imran tezi se apni car ki taraf jhapta….usne engine nahi bandh kiya tha….
magar
usse yeh ghalthi be-khayali mein hui thi….soch samajh kar aisa nahi kiya gaya tha….uski car dusri car ke piche rawana ho gayi
lekin
is stage par bhi use yaqeen nahi tha ke wo sahi raaste par hai….kisi bhi maamle ki tafsteesh ki shuruaath aise hi ghair yaqeeni halaath se hoti hai….mahez shak ki bina par ghalath raaste bhi ikhtiyaar kar liye jate hai….kabhi-kabhi aisa hota hai wo ghalath raasta hi jasoos ko uski manzil tak pahuncha deta hai….
yani
wo haqeeqatan ghalath raasta nahi hota….
aur
fir….imran to uska khayal tha ke….jaise koi magni sitaar par ulthe-seedhe haath chalaate-chalaate koi dhoon nikaal leta hai….isi tarah ek jasoos ki be-maqsad bhaag-daud bhi aakhir use manzil tak pahuncha hi deti hai

wo agli car ka picha karta raha….ab wo shaher ke sab se baaraunakh hisse mein tha

car fagaaro ke compound mein daakhil hui….yeh yahan ke bahut bade hotels mein se tha….
aur
ab imran ne dusre aadmi ko khareeb se dekha….yeh figaaro ke manager ke alawa aur koi nahi tha….imran ki car compound mein daakhil ho chuki thi….

wo unke piche-piche hi hotel mein daakhil hua….imran samjha tha ke manager apne kamre mein jayega….
lekin
wo aur uska saathi dinning-hall hi mein ek khaali mez girdh baith gaye….do kursiyaan khaali thi

imran teer ki tarah unki taraf gaya….
aur
bade be-takhallufana andaaz mein kursi khinch kar baith gaya….!

un dono ne uski is harkat ko hairath aur ghusse ki nazar se dekha

jawaab mein imran bhi hairath se muh khole unhe baari-baari se ghoor raha tha….uske andaaz se aisa maalum ho raha tha….jaise use achhanak kisi ghalthi ka ahasaas ho gaya ho….
fir
isse pahle ke wo dono kuch kahte imran badi sanjeedhgi se bola….
aur
fir….jab aap ne telephone directory mein dekha to usse wo number mil gaya….
lekin
wo number home-secretary sir sultan ka tha….kyun….kya main ghalath kahe raha hu….?

manager ka saathi muh khol kar kursi ki pusht se teek gaya….uski aankhon mein khauf jhanak raha tha….

imran ne yeh tabdili achi tarah mehsoos ki….
lekin
manager jhallaye hue lahje mein kaha….aap kaun hai aur kya chahte hai….?

main aap dono ka bhala chahta hu….
aur
darwesh ki sada kya hai….imran ne jawaab diya

mera khayal hai ke maine isse pahle aap ko kabhi nahi dekha….manager ghurraya

agar….aap ne dekha bhi hota to kya farq padhta….hone wali baate ho kar rahti hai….maslan is pencil par daanton ke nishaan maujood hai….jise daanton mein daba kar aap ke number dial kiye gaye the….
aur
yeh tai shuda baat hai ke makhtul (mrut) marne se pahle ek kursi mein jakdha hua tha….
aur
sir sultan ke pados ke ek khaali bungle mein tha….yeh baat bhi maalum ho gayi ke taar sir sultan ke wire pole se dusre bungle tak le kaya gaya tha….ahaa….aap nahi samjhe….
fir
samjhau….balke yun….

main nahi samjha ke aap kya kahe rahe hai….manager ne baat kaat di
lekin
ab uski awaaz mein kapkapahath thi

main yeh kahe raha hu ke aap us waqt wahan pahunche the jab laash uth chuki thi….!

kaisi laash….?manager ke saathi ne thook nigal kar pucha

achi laash….yani mera matlab yeh hai ke wo kharaab nahi hui thi….imran ne jawaab diya

aap humara waqt barbaad kar rahe hai….manager ne sambhaal liya….ajnabiyon se be-takhalluf hone ki koshish karna badtameezi hai

sirf isi surat mein janab….imran deede nachha kar bola….jab wo ajnabi aurtein ho….!

aap baraahe-karam yahan se uth jaye….
varna
manager use ghoorne laga….!

achha….ab suniye….imran ne sanjeedhgi se kehna shuru kiya….
shayad
aap ko ilm nahi ke bade officers aur ministers ke telephone….aam telephone se alag hote hai….yani exchange mein unke meter se ek chota sa tally-printer bhi attach hota hai….yani idhar aap ne unke number dial kiye….
aur
udhar wahan aap ke number khata-khat chap gaye….isi tarah dono taraf ke numbers chap jate hai….ab aap ghaliban samajh gaye honge….ke main seedha yahin kaise pahuch gaya….

imran ne gapp kuch is andaaz mein haanki ke….
achhanak
manager ke chahra peela padh gaya….uske saathi haalath to usse bhi zyada battar thi….aisa maalum ho raha tha jaise uske fepdhon mein mazid (adhik) saanson ke liye jagah hi na rahe gayi ho

aap kaun hai….? manager ne khaufzada awaaz mein pucha

kya ab bhi yeh batane ki zaroorat baakhi rahti hai ke main kaun ho sakta hu….?

police….!

100%.....janab….imran ne sar hila kar bola….ab aap jo kuch bhi kahenge soch samajh kar kahenge….!

main nahi jaanta ke yeh sab kaise hua….manager ahista se badhbadhaya

kya hum kahin tanhai mein nahi chal sakte….imran ne kaha….aap bhi moazeez (sammanit) aadmi hai….main nahi chahta ke yeh baat aam aadmiyon mein faile….!

oh….aap ka bahut-bahut shukriya….manger jaldi se bola….mere office mein chaliye

wo teeno wahan se uth kar manager ki office mein chale aye….

imran ne khud hi guftgu chedhdi….unke bolne ka intezar nahi kiya….use dusre bungle mein halaak kar ke laash sir sultan ke compound mein daal di gayi thi….aap ko phone karne ke liye sir sultan ka number istemaal kiya gaya….main to aap ko yeh bhi bata sakta hu ke marne wale ne phone par aap se kya kaha tha….!

manager kuch nahi bola….

imran uske chahre par nazar jamaye tha….
fir
usne kuch der baad pucha….jiss ka qatl hua….wo kaun tha….?

figaaro ka ek hissedar….mr.karaar….manager ne murda si awaaz mein jawaab diya

karaar aur hissedar ka khafiya (kavita) mujhe pasand aya….
baherhaal….magar….
janab wo chakkar kya tha….?

main kisi chakkar se waqif nahi….manager ne kaha….na yeh jaanta hu ke wo wahan pahuche kiss tarah

bila shuba (niss-sandeh) aap yeh nahi jaante ke makhtul (mrut) wahan kaise pahuncha tha….
lekin
chakkar se to aap waqif hai….is silsile mein aap jhoot bol kar kaamyaab nahi ho sakte….
kyun ke
main us guftgu ke ek-ek lafz se waqif hu….jo aap dono ke darmiyaan phone par hui thi

manager fir khamosh ho gaya

bata dene mein aap ka faida hai….imran ne kaha….dusri surat mein aap apni khatarnaak position se to waqif hi hai….
kyun ke
maamla home-department ke secretary ka hai….!

manager sir jhukaye gehri-gehri saanse leta raha….

haa….jaldi ki jiye….mere paas waqt kam hai….
varna
aap ko iska jawaab bhi dena padhega ke laash sir sultan ke compound mein kyun daali gayi thi….
aur
shayad….aap ke farishte bhi iska jawaab na de sake….
waise
aap yeh to jaante honge ki kisi baat ko ugalwane ke silsile mein police wale jahunnum ke farishton se bhi kam nahi hote….gunge, bahre, aur andhe sirf unke haath machine ki tarah chalte rahte hai….wo na bol sakte hai na sun sakte hai….!

lekin….kya yeh zaroori hai ke aap mere bayaan par yaqeen hi kar le….!

uska faisla main khud karunga….imran ne narm lahje mein kaha

aap nahi kar sakte….

lekin….main aap ki zubaan se kuch na kuch sunna zaroori samajhta hu….!
manager thodi der tak kuch sochta raha….
fir usne kaha….
karaar sahab ek aadmi ke chakkar mein the….unka khayal tha ke agar unhone us aadmi par khaabu paa liya to maala-maal ho jayenge….

wo aadmi kaun tha….?

yeh unhone nahi bataya tha….
albatta
main yeh jaanta hu ke karaar sahab ki zindagi ka zyadatar hissa south africa mein guzra tha….
aur
wo aadmi wahin se talookh rakhta tha….!

kya wo aaj-kal yahan hai….? imran ne pucha

jee haa….karaar sahab ne to yahi bataya tha

kahan hai….? kaun hai….?

yeh to nahi maalum ke wo kaun hai….
lekin
itna jaanta hu ke uska khiyaam seth dawood ke mehmaan khane mein hai….
shayad
aap ko ilm ho ke seth dawood ka business africa mein bhi hai….
aur
yahan aksar unke paas africi businessman aate rahte hai….iske liye unhone khaas taur se ek mehmaan khana bana kar rakha hai….!

huh….imran sirf sar hila kar rahe gaya….wo kuch soch raha tha….
fir
usne kuch der baad pucha….karaar ne aap ko uska naam ya huliya to yaqeenan bataya hoga

jee nahi….na maine pucha aur na unhone bataya….
waise
main unhe bahut khareeb se jaanta tha….wo kimiya giri (chemicals) ke khabt mein mubtela the….aur….mujhe is mein zarra barabar bhi dilchaspi nahi….
kyun ke
yeh cheez bilkul manshiyath (drugs) ki tarah aadmi ke wajood se chimat jati hai….karaar sahab waise bhi kaafi daulathmand the….
lekin
sona bana ne ka khabt un par buri tarah sawaar tha….24 ghante wahi chakkar….!

achha….mujhe karaar sahab ka pata note kara di jiye….imran ne jeb se note-book nikaalte hue kaha

13 marston road….wo wahan tanha rahte the….!

unke rish….

mujhe to unke kisi bhi rishtedar ka ilm nahi….unhone kabhi kisi ka zikr nahi kiya

aap ki tareef….imran ne manager ke saathi ki taraf dekh kar kaha

mere assistant….mr.tanveer

achha….sirf ek sawaal aur….imran ne note-book bandh kar ke jeb mein rakhta hua bola….kya karaar sahab ne aap se kaha tha ke us shaksh par khaabu paane ke liye use aap ki madad ki bhi zaroorat pesh aa sakti hai

jee haa….unhone kaha tha….unka khayal tha ke wo bahut khatarnaak aur intehai chalaak aadmi hai….
aur
ek bada mujrim bhi…..
lehaza
main unki madad karne par tayyaar tha….
kyun ke
mujhe mujrimon se zarra barabar bhi humdardi nahi hoti….!

khoob….imran muskuraya….aap ko to police-officer hona chahiye tha….achha janab bahut bahut shukriya….ho sakta hai ke main fir aap ko takleef du….!

main har khidmath ke liye haazir hu….manager ne bade khuloos se kaha
thodi der baad imran ki car marston road ke 13ve bungle ke compond mein daakhil hui….bungla shaandar tha aur baagh ki haalath dekh hi karaar sahab ki khush mizaaji zaahir ho rahi thi….
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दिल से दिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

तुफानो में साहिल बड़ी मुश्किल से मिलते हैं!

यूँ तो मिल जाता है हर कोई!

मगर आप जैसे दोस्त नसीब वालों को मिलते हैं!
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Kamini
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Re: रात का शहज़ादा--हिन्दी नॉवॅल

Postby Kamini » 12 Jan 2017 13:55

plz is novel ko bhi dekhen

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